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पर्सनैलिटी बनाएं परफैक्ट

हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व होता है और यही व्यक्ति की पहचान होती है. जिस से वो जाना जाता है. कुछ लोग जन्म से अट्रैक्टिव होते हैं तो कुछ अपने नेचर से लोगों को अट्रैक्ट करते हैं. व्यक्ति चाहे कितना भी सुंदर हो अगर उस के बोलने के ढंग में बनावटीपन व रूखापन है तो वह कभी भी किसी को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाएगा. हर कोई आकर्षक व्यक्तित्व पा सकता है. बस कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जिस से व्यक्तित्व का विकास हो और यही सफलता की कुंजी भी है.

अपना आंकलन स्वयं करें: अपनी परख खुद करें बिना, आंकलन के अपनी शक्ति का एहसास नहीं होता, अपनी कमजोरियों और दुर्बलताओं को सुधार कर अपने कर्तव्यों और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहें.

खुद को संपूर्ण बनाएं: व्यक्तित्व, व्यक्ति की उस संपूर्ण छवि का नाम होता है, जो वह दूसरों के सामने बनाता है. किसी भी व्यक्ति की खूबियां जैसे ज्ञान, अभिव्यक्ति, सहनशीलता, गंभीरता, प्रस्तुतीकरण आदि होते हैं जिस से वह सर्वगुण संपन्न और परिपूर्ण बनता है.

आत्मविश्वास है जरूरीः व्यक्तितव को बनाने में आत्मविश्वास होना बहुत जरूरी है, अगर आप अपने आप को खुश रखेंगे और पसंद करेंगे तभी आप दूसरों का पसंद कर सकते हैं.

सकारात्मक बनें: हमेशा पौजिटिव सोच और एनर्जी रखें, अपने आप को न खोए, अपनी सारी समस्याओं को समझाने की कोशिश करें, समस्याएं सब के साथ होती हैं, उस के हल का इंतजार करें.

दूसरों को भी महत्त्व दें: आप जब भी किसी व्यक्ति से बात करें तो उसे भी यह एहसास कराएं कि वह व्यक्ति कितना इंर्पोटे्रट है, उसे कंफर्टेबल फील कराएं किसी से बात करते समय कभी भी आप की बातों में घमंड या अभिमान नहीं झलकना चाहिए.

एक अच्छे श्रोता बनें: हमेशा अपनी ही बातों को व्यक्त न करें दूसरे की बातें भी ध्यानपूर्वक सुनें, जब कोई आप से बात कर रहा हो तो कहीं और ध्यान लगा कर या उस की बातों को नजरअंदाज करना अच्छी बात नहीं. ऐसे में आप के व्यक्तित्व की छवि खराब हो सकती है.

विश्वास बनाएं: हमेशा प्रासंगिक रहें, कई बार अपने जीवन की बातों को बांटें पर ध्यान रहे इस दौरान ऐसा कुछ न कहें जिस से आप की छवि खराब हो.

बहस न करें: अपनी गलत बात को सही साबित करने के लिए बहस न करें और न ही दूसरे से बात करते हुए चिल्ला कर बोलें.

अपशब्दों का प्रयोग न करें: अपने से बड़े या छोटे किसी भी व्यक्ति से अपशब्दों का प्रयोग न करें. खास कर किसी के पीठ पीछे उस के बारे में तो बिलकुल नहीं, नहीं तो बेकार में बात दूसरा और गलत रूप धारण कर सकती है.

किसी को छोटा न समझें: अगर आप किसी बड़े पद पर कार्यरत है तो अपने पद का मान रखते हुए अपने से नीचे कार्य करने वालों को छोटा न समझें. अपने पद की गरिमा बनाएं रखें व ऐसी स्थिति से बचें कि आप को छोटा व्यक्ति जवाब दे जाएं.

मजाक मत उड़ाएं: किसी के लुक्स और बातों का कभी भी मजाक न उड़ाएं. हर व्यक्ति के बात करने का ढंग और लुक्स अलग होता है और हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेषता होती है उस पर ध्यान दें.

मुसकुराहट रखें बरकरार: व्यक्तित्व को निखारने में मुसकान का बहुत बड़ा रोल है मुसकान वो मनोहर चाबी है जोकि हर दरवाजे का ताला खोल सकती है. किसी के पास जाएं तो मुसकरा के जाएं. बशर्ते मुसकुराहट नकली न हो. इस तरह मुसकान पर लोग ध्यान देंगे, लेकिन कुछ भी ओवर न करें.

बौडी लैंग्वेज हो खास: आप की बौडी लैंग्वेज सौफ्ट और ग्रेसफुल होनी चाहिए, आप की प्रेजेंस बोलती है. अगर आप भी इन सब बातों का ध्यान रखेंगे तो आप कभी भी अपने पर्सनैलिटी को परफैक्ट बना सब के चहेते बन सकते हैं क्योंकि हम अच्छे व्यक्तित्व के साथ पैदा नहीं होते बल्कि हम इसे कई तरीकों से बनाते हैं.

यह क्या बोल गए रांझा विक्रम सिंह

सिनेमा का वैश्वीकरण हो गया है. सिनेमा में बदलाव की बातें भी की जा रही हैं. बॉलीवुड से जुड़ा हर शख्स सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है. हर कोई यही दावा कर रहा है कि  सोशल  मीडिया से बॉलीवुड को फायदा हो रहा है. मगर सफलतम फिल्म ‘‘हीरोपंती’’ के मुख्य विलेन का किरदार निभाकर शौहरत बटोर चुके तथा हिंदी व पंजाबी दोनों भाषाओं में बनी फिल्म ‘‘25 किले’’ के अभिनेता रांझा विक्रम सिंह की राय में  सोशल  मीडिया से सिनेमा और कलाकारों को काफी नुकसान हो रहा है.

‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए रांझा विक्रम सिंह ने कहा कि सच कहूं तो  सोशल  मीडिया एक मजाक बन गया है. कलाकारों का स्टारडम कम हुआ है. सोशल  मीडिया की वजह से कलाकार सोच रहा है कि उसकी इमेज चमक रही है, पर  सच यह है कि इससे उनके स्टारडम को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. पहले लोग आपको पसंद करते थे, आपके दर्शन पाने, आपको देखने के लिए दौड़ते थे.

लोग सोचते थे कि मुझे मुंबई शहर फलां अभिनेता को देखने के लिए जाना है. अब यह चार्म खत्म हो गया है. सोशल  मीडिया में जो लाइक्स मिल रही है, उससे कलाकार समझ रहा है कि उसका स्टारडम बढ़ रहा है,जबकि ऐसा नहीं है.अब कलाकार अपनी हर छोटी बड़ी बात  सोशल  मीडिया के द्वारा अपने प्रशंसकों तक पहुंचा रहा है, इससे धीरे धीरे प्रशंसक के मन में उनके प्रति जो आकर्षण होता था, वह कम होता जा रहा है.

अमिताभ बच्चन को महानायक कहा जाता है. पर हमें याद रखना चाहिए कि स्टार, सुपर स्टार या महानायक वह उस वक्त बने, जब  सोशल  मीडिया नहीं था. लोग सिर्फ अमिताभ बच्चन को देखने के लिए भाग कर मुंबई आया करते थे, दो तीन दिन तक उनके घर के सामने खड़ा रहा करते थे.पर जबसे वह भी  सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, तब से उनसे मिलने की उत्सुकता लोगों में नहीं रही.

तो जो क्रेज पहले उनको लेकर लोगों में था, वह अब नहीं रहा. मैंने देखा है कि जब फिल्म ‘‘बाहुबली’’ की शूटिंग होती थी, तब प्रभास को देखने के लिए लोग किस तरह पेड़ों पर चढ़े रहते थे. प्रभास भी  सोशल  मीडिया पर नही है.

36 साल बाद ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम

भारतीय महिला हॉकी टीम ने पिछले 36 साल में पहली बार ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया है. भारतीय महिला हॉकी टीम ने अब तक सिर्फ एक बार 1980 में मास्को में ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया है लेकिन तब क्वालीफिकेशन प्रक्रिया नहीं थी.

डिफेंडर सुशीला चानू, रियो डि जनेरियो में 5 से 21 अगस्त तक होने वाले आगामी ओलंपिक खेलों में 16 सदस्यीय भारतीय महिला हॉकी टीम की अगुआई करेंगी. हॉकी इंडिया ने मंगलवार को सुशीला को रितु रानी की जगह टीम का कप्तान नियुक्त किया. चयनकर्ताओं ने रितु रानी को खराब फॉर्म और रवैये की समस्या के कारण टीम से बाहर कर दिया.

रक्षा पंक्ति में सुशीला की साथी दीपिका खेलों के दौरान उप कप्तान होंगी. टीम में पांच डिफेंडर, पांच मिडफील्डर, पांच फारवर्ड और सिर्फ एक गोलकीपर सविता को शामिल किया गया है. डिफेंस में टीम के पास दीपिका, सुनीता लाकड़ा, नमिता टोप्पो और दीप ग्रेस एक्का जैसी अनुभवी खिलाड़ी हैं.

मिड फील्ड में रेणुका, लिलिमा मिंज, मोनिका, नवजोत कौर और युवा निक्की प्रधान को शामिल किया गया है जबकि अग्रिम पंक्ति में रानी रामपाल, पूनम रानी, वंदना कटारिया, अनुराधा देवी थोकचोम और प्रीति दुबे जिम्मेदारी संभालेंगी.

पुरूष टीम की तरह महिला टीम में भी डिफेंडर हनियालुम लाल रूआत फेली और गोलकीपर रजनी एटिमारपू के रूप में दो रिजर्व खिलाड़ियों को शामिल किया गया है.

टीम के बारे में पूछने पर भारतीय महिला हॉकी टीम के मुख्य कोच नील हागुड ने कहा कि उन्होंने योग्यता के आधार पर सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध टीम चुनी है.

यहां टीम की घोषणा के लिए आयोजित समारोह के बाद हागुड ने कहा, ‘हमने शरीरिक और मानसिक रूप से सर्वश्रेष्ठ तैयारी वाली टीम चुनी है.’ उन्होंने कहा, ‘यह लड़कियों के लिए ऐतिहासिक लम्हा है फिर हम चाहे किसी को भी चुने क्योंकि वे कभी ओलंपिक में नहीं खेली. पुरूष टीम को ओलंपिक में खेलने का अनुभव है क्योंकि चुने गए सात खिलाड़ी लंदन खेलों में खेले थे. इसलिए हमें नहीं पता कि हमारा सामना किस चीज से होने वाला है.’

टीम से अनुभवी रितु रानी को बाहर करने पर हागुड ने कहा, ‘हमने ट्रायल के जरिये 16 सदस्यीय प्रतिबद्ध टीम चुनी है. हमने 16 सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुनी है.’ भारतीय महिला टीम की कप्तान सुशीला ने कहा कि उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है और वह अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के अनुसार इस पर खरा उतरने की कोशिश करेंगी.

सुशीला ने कहा, ‘मैं बेहद खुश हूं लेकिन थोड़ी तनाव में भी हूं क्योंकि ओलंपिक में 36 साल बाद टीम की अगुआई करना बड़ी जिम्मेदारी है.’ भारतीय महिला टीम गुरूवार को अमेरिका के लिए रवाना होगी जहां उसे कनाडा के खिलाफ तीन और अमेरिका के खिलाफ दो अभ्यास मैच खेलने हैं. टीम 29 जुलाई को ओलंपिक खेलों के लिए पहुंचेगी.

टीम

सुशीला चानू (कप्तान), नवजोत कौर, दीप ग्रेस एक्का, मोनिका, निक्की प्रधान, अनुराधा देवी थोकचोम, सविता, पूनम रानी, वंदना कटारिया, दीपिका, नमिता टोप्पो, रेणुका यादव, सुनीता लाकड़ा, रानी, प्रीति दुबे और लिलिमा मिंजा.

स्टैंडबाई

हनियालुम लाल रूआत फेली और रजनी एतिमारपू.

थिएटर की दुनिया चले स्वानंद किरकिरे

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मशहूर गीतकार स्वानंद किरकिरे ने बॉक्स ऑफिस पर असफल फिल्म ‘‘क्रेजी कुक्कड़’’ में अभिनय कर अभिनय के क्षेत्र में कदम बढ़ाया था. उसके बाद उन्हें कोई दूसरी फिल्म नहीं मिली. पर अब वह थिएटर की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने वाले हैं.

जी हां !इन दिनों स्वानंद किरकिरे मशहूर नाट्यकर्मी सलीम आरिफ निर्देशित व गुलजार लिखित नाटक ‘‘चक्कर चलाए घनचक्कर’’ में अभिनय कर रहे हैं.

फिलहाल इस नाटक के लिए वह श्रुति सेठ व लुबना सलीम के साथ रिहर्सल करने में व्यस्त हैं. सूत्रों के अनुसार गुलजार लिखित यह नाटक दो फिल्मों ‘‘अंगूर’’ और ‘‘दो दुनी चार’’ की कहानियों का मिश्रण है.

नाटकों की दुनिया से जुड़ने की चर्चा करते हुए स्वानंद किरकिरे कहते हैं- ‘‘जिंदगी के हर रंग व स्वाद का अनुभव हमें लेना चाहिए.’’

पेड़ लगे तो पर बचेंगे कैसे

‘ग्रीन यूपी-क्लीन यूपी’ सोंच को पूरा करने के लिये उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक ही दिन में 5 करोड़ पेड़ लगा कर रिकार्ड तो बना लिया है. यह पेड़ कैसे बचेंगे कैसे यह सोचने वाली बात है. प्रदेश में 6166 जगहो पर पेड़ लगाने का यह कार्यक्रम चला.

केवल उत्तर प्रदेश सरकार ने ही नहीं समाजवादी पार्टी के हर नेता और कार्यकर्ता ने इस अभियान में अपना पूरा योगदान दिया. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनकी पत्नी सांसद डिंपल यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने खुद इस अभियान में हिस्सा लिया.

ज्यादातर पीपल, नीम और पाकड के पेड़ लगाये गये. इन पेड़ों को जानवर चरे नहीं इसके लिये सुरक्षा की नजर से पेड़ों की ऊंचाई 8 से 12 फिट रखी गई थी.

खुद मुख्यमंत्री ने सभी से कहा कि वह 5 पेड़ लगाये. बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लेकर इस अभियान को सफल बनाने का काम किया.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि इस अभियान से लोगों में पेड़ लगाने का रूझान बढा है.इससे प्रदेश में मौजूद वनक्षेत्र बढ जायेगा. जिससे पर्यावरण को लाभ मिलेगा. सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा कि आज की पीढ़ी पेड़ लगाने के महत्व को भूल चुकी है.गांव के लोग कम पढ़े जरूर होते थे पर वह यह जानते थे कि पेड़ लगाना लाभकारी होता है. आज लोगों में पेड़ लगाने का चलन खत्म हो चुका है.

मुलायम सिंह ने कहा यह अभियान सरकार ने शुरू किया है पर इसे जनता का अभियान बनाना है. जिस दिन हर आदमी 5-5 पेड़ लगाने का संकल्प ले लेगा उस दिन उत्तर प्रदेश हराभरा हो जायेगा और पर्यावरण को लाभ होगा. सरकार और पार्टी दोनो ही स्तर पर इस अभियान की सफलता के लिये पूरा प्रयास किया गया.

पेड़ लगाने से बडी चुनौती पेड़ की रक्षा की है. सरकार ने पेड़ लगाने के समय इस बात का पूरा ध्यान रखा है. शत-प्रतिशत पेड़ भले ही न लगे पर जितनी ज्यादा संख्या में पेड़ बचे रहेंगे अभियान उतना ही सफल रहेगा.

इसके प्रयास भी होने चाहिये. सरकार की तरफ से वन विभाग इस बात के लिये प्रयास कर रहा है कि पेड़ बचे रहें. जनता को अपने स्तर पर भी प्रयास करने चाहिये. समाजवादी पार्टी की सरकार ने कुछ ऐसे सामाजिक काम जरूर किये हैं जिनकी तरफ  बाकी दलों का कोई ध्यान नहीं था. इनमें पेड़ लगाना और साइकिल से चलने की शुरूआत खासतौर पर उल्लेखनीय है.

यह जरूर है कि सरकार के कहने और करने से यह सब शुरू नहीं होगा. इसके बाद भी जो प्रयास है उससे उस दिशा में बढ़ने की मदद मिलेगी. यह एक सामाजिक शुरूआत है. जिसका असर देर से आयेगा पर अच्छा आयेगा.

इस तरह के प्रयास आने वाली पीढ़ियो के लिये सुखद भविष्य की राह मजबूत करेगी. पेड़ लगाना एक अभियान सा होना चाहिये. हर पेड़ लगाने वाले को कोशिश करनी चाहिये कि उसका लगाया पेड़ जीवित रहे. यह अभियान तभी सफल होगा जब लगाये गये ज्यादा से ज्याद पेड़ जीवित और सुरक्षित रहें. 

पुर्तगाल बना यूरो चैंपियन

साल 1984 और साल 2000 में फुटबाल का 'यूरो कप' अपने नाम करने वाले फ्रांस को इस बार मेजबानी रास नहीं आई और पुर्तगाल के साथ हुए रोमांचक फाइनल मुकाबले में वह 0-1 से हार गया.

दूसरी तरफ पुर्तगाल ने इतिहास रच दिया. 41 साल बाद उस ने फ्रांस को किसी मैच में हराया है. इस से पहले पुर्तगाल ने साल 1975 की 26 अप्रैल को फ्रांस के खिलाफ जीत दर्ज की थी. इतना ही नहीं, पिछले 10 मैच भी पुर्तगाल ही फ्रांस से हारा था.

'यूरो कप' के पेरिस में खेले गए फाइनल मुकाबले में तय 90 मिनटों में कोई भी टीम गोल नहीं कर सकी और मुक़ाबला गोल रहित रहा. 15 मिनट के पहले एक्स्ट्रा समय में भी कोई टीम गोल नहीं कर सकी.लेकिन 15 मिनट के दूसरे एक्स्ट्रा समय में पुर्तगाल के खिलाड़ी एडर ने गोल दाग कर टीम को जोश से भर दिया.

पुर्तगाल ने तकरीबन पूरा मैच अपने स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बिना खेला, जो फ्रांस के मिडफ़ील्डर खिलाड़ी दिमित्री पेयेट से टकराने के बाद 24वें मिनट में मैदान से बाहर हो गए थे. इस के बाद रोनाल्डो की आंखों से आंसू निकल पड़े और स्टेडियम में मौजूद पुर्तगाली समर्थकों के चेहरे पर निराशा फैल गई. पर मैच में मिली जीत ने उन का यह गम भुला दिया.

पुर्तगाल के कोच सांतोस ने इस जीत का क्रेडिट रोनाल्डो को दिया. उन्होंने कहा, “हमारे कप्तान ने टूर्नामेंट में शानदार खेल दिखाया. कई लोगों की आलोचना झेलने के बाद भी उन्होंने बेहतरीन खेल भावना का प्रदर्शन किया. ड्रेसिंग रूम में उन की मौजूदगी बहुत अहम होती है."  क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने भी इस जीत के बाद  कहा, “यह वैसा फाइनल नहीं था, जिस की मुझे उम्मीद थी, लेकिन मैं इस जीत से बहुत खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं. यह ट्राफी सभी पुर्तगालियों के साथ ही हर उस प्रशंसक को समर्पित है, जिस ने हमारी टीम पर भरोसा जताया."

'यूरो कप, 2016 ' का खिताब जीत कर लौटी पुर्तगाल टीम का राजधानी लिस्बन में शानदार स्वागत किया गया. हजारों प्रशंसक एयरपोर्ट पर अपने फुटबाल हीरो का स्वागत करने के लिए मौजूद थे. टीम के खिलाड़ी ट्राफी के साथ खुली बस में सवार हुए और एयरपोर्ट से पोम्बल स्क्वायर  तक जुलूस की शक्ल में पहुंचे. रास्तेभर प्रशंसक 'हम चैंपियन हैं’ के नारे लगाते रहे.

दूसरी और, पुर्तगाल के हाथों मिली इस हार के बाद फ्रांस में हुई हिंसा के मद्देनजर वहां की पुलिस ने तकरीबन 40 लोगों को गिरफ्तार किया. फुटबाल के दीवानों ने एफिल टावर के नीचे बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं, जिस के बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े.

किसी खेल को ले कर दीवानगी होना ठीक है, पर इस तरह हारने के बाद उत्पात मचाना कहां की अकलमंदी है? वर्ल्ड चैंपियन फ्रांस को यह शोभा नहीं देता है. वैसे भी इस से पुर्तगाल के जीत के जश्न में कोई कमी नहीं आएगी. वेलडन पुर्तगाल.

आमिर खान का दोमुंहापन या इंद्र कुमार प्रेम

आमिर खान और इंद्रकुमार के संबंध जग जाहिर हैं. इसलिए आमिर खान हमेशा इंद्र कुमार को सलाह देते रहते हैं. वह उनके पक्ष में बातें करते रहते हैं. मगर 2013 में जब इंद्रकुमार ने एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ का निर्माण किया था, तब इस फिल्म को देखने के बाद आमिर खान ने इंद्र कुमार को सलाह दी थी कि वह ग्रैंड मस्ती को सिनेमाघरों में रिलीज न करें.

लेकिन इंद्र कुमार ने आमिर खान की सलाह को दरकिनार करते हुए पर ग्रैंड मस्ती को सिनेमाघरों में रिलीज कर दिया था और ग्रैंड मस्ती ने सौ करोड़ का व्यापार कर लिया था. उसके बाद 2 जनवरी 2014 को ‘सरिता’ पत्रिका से बात करते हुए आमिर खान ने कहा था, ‘मैं किसी फिल्म का नाम नहीं लेना चाहता था. आप मेरे नाम को ‘कोट’ मत कीजिए. मैं ‘ग्रैंड मस्ती’ के खिलाफ हूं. इस तरह की फिल्में नहीं बननी चाहिए. इस फिल्म के निर्देशक इंद्र कुमार मेरे मित्र हैं. मैंने उनसे कहा था कि वह इस फिल्म को रिलीज ना करें.पर उन्होंने मेरी सलाह नहीं मानी और फिल्म रिलीज की. बॉक्स आफिस की कमायी से नफा नुकसान नहीं आंका जाना चाहिए. बॉक्स आफिस की कमायी से हमें आज फायदा नजर आ रहा है, पर हम कितना बड़ा नुकसान कर गए हैं, इसका हमें अहसास नहीं है.’

लेकिन अब दो साल बाद आमिर खान की सोच बदल गयी है या इंद्रकुमार के प्रति उनका प्यार उमड़ पड़ा है. यह तो वही जाने. पर अब जबकि इंद्र कुमार की एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्म ग्रेट ग्रैंड मस्ती ऑन लाइन लीक हो गयी, तो इंद्र कुमार ने अपनी इस फिल्म को 22 जुलाई की बजाय 15 जुलाई को रिलीज करने की योजना बना ली.

15 जुलाई को ग्रेट ग्रैंड मस्ती को ज्यादा से ज्यादा थिएटर मिल सके, इसके प्रयास खुद आमिर खान ने किया. जितनी दूसरी छोटी फिल्में थी, वह सब 15 जुलाई से 22 जुलाई चली गयी.

सूत्रों के अनुसार आमिर खान ने अपने घर पर कुछ बड़े निर्माताओं की मीटिंग बुलाकर बात की कि ग्रेट ग्रैंड मस्ती की मदद की जानी चाहिए, क्योंकि यह फिल्म इंटरनेट पर लीक हो चुकी है. सूत्रों की माने तो इस मीटिंग में करण जोहर, एकता कपूर सहित कई निर्माता मौजूद थे. लेकिन आदित्य चोपड़ा मीटिंग में नहीं पहुंचे. तो आमिर खान ने स्वयं आदित्य चोपड़ा से फोन पर बात की. उसके बाद आदित्य चोपड़ा ने आमिर खान को आश्वस्त किया कि वह अपनी फिल्म ‘सुल्तान’ को कुछ थिएटरों से निकालकर उन थिएटरों में ग्रेट ग्रैंड मस्ती के रिलीज के लिए जगह दे देंगे. ग्रेट ग्रैंड मस्ती 2013 में प्रदर्शित इंद्र कुमार की फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ का सिक्वअल है.

अब महज -सजयाई तीन साल के अंतराल में ऐसा क्या घटित हो गया कि एडल्ट सेक्स कॉमेडी फिल्मों को लेकर आमिर खान के विचार बदल गए. सूत्रों के अनुसार कुछ लोग इसे इंद्र कुमार द्वारा ‘दिल’ का रीमेक बनाने के निर्णय से जोड़कर देख रहे हैं. तो कुछ लोग इसे मुसीबत में मित्र की मदद का मसला मान रहे हैं.

साड़ी सब से सैक्सी पहनावा लगती है -अर्चना प्रजापति

मुंबई में पलीबढ़ी अर्चना प्रजापति उत्तर प्रदेश के गोरखपुर इलाके की रहने वाली हैं. मुंबई में अर्चना के पिता का अपना कारोबार है. स्कूल में पढ़ाई के समय से ही अर्चना को ऐक्टिंग अच्छी लगती थी. जब वे ग्रेजुएशन करने के लिए कालेज पहुंचीं, तो उन को एक म्यूजिक अलबम में काम करने का मौका मिला. इस के बाद वे फिल्मों की तरफ चल पड़ीं जल्दी ही अर्चना प्रजापति को कई भोजपुरी फिल्में मिल गईं. इन में ‘जिद्दी’ और ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ खास हैं, जो बड़े परदे पर आ चुकी हैं.

अर्चना प्रजापति ने जिन म्यूजिक अलबमों में काम किया है, उन में ‘शिकवा’ और ‘नवाजिश’ खास हैं. वे एक हिंदी फिल्म भी करने जा रही हैं.

पेश हैं, अर्चना प्रजापति से हुई बातचीत के खास अंश :

ऐक्टिंग जगत में जगह बनाना कितना मुश्किल काम है?

आज के समय में हर क्षेत्र में एक से एक प्रतिभाएं मौजूद हैं. ऐसे में अपने लिए जगह बनाना बहुत ही मुश्किल काम है. जरूरत इस बात की होती है कि आप मेहनत करें, सही दिशा में कोशिश करें. इस के बाद आप में टेलैंट होगा, तो कामयाबी जरूर मिलेगी. बिना मेहनत के कुछ भी मुमकिन नहीं है.

भोजपुरी फिल्मों से ऐक्टिंग की शुरुआत करने से आप को भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन का ठप्पा लगने का डर तो नहीं था?

आज के समय में भोजपुरी सिनेमा काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है. हिंदी और दूसरी इलाकाई बोली के कलाकार भी इस में काम करने आ रहे हैं. अब भोजपुरी फिल्मों का ठप्पा जैसा कुछ नहीं है. भोजपुरी मेरी अपनी बोली है. ऐसे में यहां काम करने में जो खुशी मिलती है, वह सब से खास है.

घर से आप को किस से सब से ज्यादा सहयोग मिलता है?

मेरे मम्मीपापा दोनों ही बहुत सहयोगी हैं. जब मेरी फिल्म ‘इलाहाबाद से इसलामाबाद’ की चर्चा लोगों ने की, तो हमारे घर वालों को लगा कि मैं ने सही काम किया है.

भोजपुरी फिल्में अपनी बोल्डनैस के लिए ज्यादा बदनाम हैं. आप को क्या लगता है?

जिस तरह से भोजपुरी फिल्मों की बुराई होती है, वह कुछ ज्यादा ही लगती है. चाहे किसी भी भाषा की फिल्में हों, उन में खुलापन बराबर होता है. भोजपुरी गांवदेहात की भाषा है, शायद इस वजह से इस की ज्यादा बुराई होती है. फिल्मकार वही फिल्में बनाते हैं, जिन को दर्शक देखते हैं. जब दर्शक इसे गलत नहीं मानते, तो बुराई करने से क्या होता है.

आप को इन फिल्मों में रोल करने से क्या कोई परेशानी होती है?

कहानी की मांग के मुताबिक खुलेपन से कोई एतराज नहीं है. हां, यह बात सच है कि अगर खुलेपन की मांग ऐसी हो, जो देखने वालों को पसंद न हो, तो उसे करने से क्या फायदा. जब इन बातों को ले कर लोग भोजपुरी फिल्मों की बुराई करते हैं, तो बुरा लगता है. हम भोजपुरी फिल्मी परिवार का हिस्सा हैं. हमें खुद इन बातों का खयाल रखना चाहिए कि लोगों को ज्यादा बुराई करने का मौका ही न मिले.

भोजपुरी फिल्मों में डांस आइटम बहुत होते हैं. क्या आप ने भी डांस सीखा है?

मुझे डांस करने का शौक है. मैं ने अभी तक डांस सीखा नहीं है. मैं जल्दी ही डांस सीखने के लिए क्लास लूंगी. वैसे, आजकल के डांस कोरियोग्राफर इतने माहिर होते हैं कि वे डांस कलाकारों से बहुत आसानी से काम करा लेते हैं, पर डांस सीखने के बाद उस का अलग ही अंदाज आता है.

आप को और क्या काम करना पसंद हैं?

मुझे खाली समय में पत्रिकाओं में छपी कहानियां पढ़ने का बहुत शौक है. ‘सरस सलिल’ मैं खूब पढ़ती हूं. इस की कहानियां और लेख मुझे पसंद आते हैं. मैं दूसरी पत्रिकाएं भी पढ़ती हूं. मुझे पहनने में साड़ी बहुत पसंद है. मुझे यह सब से सैक्सी पहनावा लगती है. घूमने और खाने का मुझे खास शौक नहीं है.

शादी से पहले क्यों खुश नहीं थे शाहिद

बॉलीवुड अभिनेता शाहिद कपूर ने पिछले हफ्ते अपनी शादी की पहली सालगिरह मनाई और तब ये कबूल किया कि शादी से पहले उन्हें अकेलापन सताता था. लेकिन शादी के बाद वे खुश हैं, उनकी जिंदगी में कोई है जो उनका ख्याल रखता है.

शाहिद ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि जिन्दगी में में करना अलग बात है. मगर एक समय आता है जब जीवन को संतुलित करना जरूरी हो जाता है. मैं 22 साल की उम्र से अकेला रहता था घर के पारिवारिक माहौल को मिस करता था. मैं अकेलापन महसूस करता था.

शाहिद ने ये भी कहा कि कामयाबी मिलने पर या पुरुस्कार जीतने पर मम्मी (नीलिमा अजीम) और डैड (पंकज कपूर) मेरे आसपास होते थे मगर ऐसा कोई नहीं था जिसके साथ मैं अपनी खुशियां तुरंत बांट सकुं.

अब शाहिद के जीवन में खुशियां भरने वाली और उनके समय का हिसाब-किताब रखने वाली के रूप में उनके पास उनकी पत्नी मीरा हैं. शाहिद बताते हैं कि पहले जब वो कहीं बाहर जाते थे तब कोई पूछने वाला नहीं था कि 'तुम पहुंचे या नहीं, तुम कैसे हो'. मगर अब अब मीरा हैं उनसे यह सब पूछने वाली. इतना ही नहीं, शाहिद के फोन पर आने वाले संदेशों में हर दूसरा संदेश मीरा का होता है.

 

उत्तर प्रदेश : दलबदल में जुटे नेता

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. हर दल अपने हिसाब से खुद को मजबूत और दूसरे को कमजोर साबित करने में लग गया है. इस को आज की राजनीति में चुनाव प्रबंधन का नाम दिया जाता है. अपने फायदे के लिए ये दल कार्यकर्ताओं की बलि दे कर दूसरे दल के नेताओं को टिकट देने में जुट गए हैं. कई पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ का दौर भी शुरू हो चुका है. ये नेता कुछ साल पहले पार्टी में ‘दम घुटने’ का आरोप लगा कर बाहर हो गए थे. पार्टी छोड़ कर ‘खुले में सांस लेने वाले’ ये नेता अब पुरानी पार्टी में वापस आ कर सुकून की सांस लेने लगे हैं.

मजेदार बात यह है कि पुरानी पीढ़ी के कई नेता अब अपने साथसाथ अपने परिवार, बेटाबेटी को भी राजनीति में जमाना चाहते हैं.

बागी हुए बसपा के साथी

चुनावी राजनीति के इस खेल में 20 साल से बसपा में रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने पार्टी छोड़ दी है. पार्टी छोड़ते वक्त उन्होंने बसपा प्रमुख मायावती पर टिकट के बदले पैसे लेने का आरोप लगाते हुए उन को ‘दौलत की बेटी’ कहा था. मायावती के लिए यह कोई नई बात नहीं है. इस के एक नहीं कई उदाहरण सामने हैं. बहुत पुराने समय में न जाएं, तो भी हाल के दिनों में ऐसे तमाम नेताओं के नाम लिए जा सकते हैं. आरके चौधरी, मसूद अहमद, दीनानाथ भास्कर, बाबू सिंह कुशवाहा, अखिलेश दास और जुगुल किशोर प्रमुख नाम हैं. बसपा के नेता पार्टी में रहते हुए जब चुनाव जीत जाते हैं, तो वे इसे अपनी ताकत समझ लेते हैं. असल में इन नेताओं को जो वोट मिलते हैं, वे बसपा के नाम पर मिलते हैं. पार्टी छोड़ कर यही नेता जब बाहर होते हैं, तो इन को जनाधार का पता चलता है. ये दूसरे नेताओं की सीट जितवाने का दावा जरूर करते हैं, पर खुद अपनी सीट पर भी चुनाव नहीं जीत पाते हैं.   

बाबू सिंह कुशवाहा बसपा में बहुत कद्दावर नेता माने जाते थे. मायावती के बाद उन की नंबर 2 के नेता की हैसियत थी. हैल्थ घोटाले में बसपा ने जब बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी से निकाला, तो वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने गए, पर वहां उन का विरोध शुरू हो गया. इस के बाद बाबू सिंह कुशवाहा ने जन अधिकार मंच नाम से अपना दल बनाया, पर वे अभी तक अपने जनाधार को साबित नहीं कर सके हैं. बसपा महासचिव रहे जुगुल किशोर बसपा से राज्यसभा सदस्य थे. बसपा से बाहर होने के बाद वे भाजपा में चले गए, पर वहां उन को पुरानी हैसियत नहीं मिल सकी है. वे भाजपा में हाशिए पर हैं. आरके चौधरी भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं. बसपा से अलग होने के बाद वे स्वाभिमान पार्टी बनाने के बाद अपना जनाधार नहीं बना पाए और वापस बसपा में शामिल हो गए. अब बसपा में वे अपनी पुरानी हैसियत हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

सपा के बागी हुए साथी

समाजवादी पार्टी ने अपने पुराने नेताओं अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को न केवल पार्टी में वापस लिया, बल्कि उन को राज्यसभा का सदस्य भी बनवा दिया. अमर सिंह अपनी पार्टी बना कर चुनाव लड़ चुके थे और बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस में शामिल हो चुके थे. इन लोगों के लिए अभी भी समाजवादी पार्टी की विचारधारा की कोई अहमियत नहीं है. बेनी प्रसाद वर्मा अपने बेटे राकेश वर्मा की समाजवादी पार्टी में जगह बनाने की कोशिश में लगे हैं. समाजवादी पार्टी में बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के शामिल होने को ले कर सपा नेताओं में विरोध शुरू हो गया. इस को ले कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उन के पिता और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और पार्टी महासचिव शिवपाल यादव के बीच तनाव फैल गया. मुख्तार अंसारी का दबदबा पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाजीपुर और मऊ जिले में है. मुसलिम वोट बैंक को खुश करने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इमेज के खिलाफ फैसला किया. कौमी एकता दल की केवल 2 सीटें विधानसभा में हैं. ऐसे में इस के सपा में शामिल होने से किसी बड़े फायदे की उम्मीद नहीं है.

आनेजाने का दौर

उत्तर प्रदेश में राजनीति बदहवासी के दौर में है. किसी भी दल को यह उम्मीद नहीं है कि वह अपने बल पर सरकार बनाने में कामयाब होगी. ऐसे में पार्टियां तमाम तरह के प्रयोग करने में लगी हैं. नेताओं के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो चुका है. यह चुनाव तक जारी रहेगा. कहने के लिए समाजवादी पार्टी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सीधी, सरल और ईमानदार इमेज को ले कर चुनाव मैदान में उतरना चाहती है, पर सचाई यह है कि उसे डर है कि केवल इस से काम नहीं होने वाला. ऐसे में वह पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ व बाहुबलियों के गठजोड़ को साथ रखना चाहती है.

बसपा को लगता है कि वह कानून व्यवस्था के मसले पर मायावती की कड़क इमेज के मुद्दे पर चुनाव जीत जाएगी. बसपा की कमजोरी यह है कि दलित और पिछड़े वर्ग के बहुत सारे लोग धर्म के प्रभाव मे फंस कर भाजपा के बहकावे में आ जाते हैं. बसपा ने पुराने समय में हिंदू समाज में दलितों की हालत को ले कर बड़ा संघर्ष किया था. बाद में बसपा खुद ब्राह्मणवाद का शिकार हो गई. ऐसे में दलित वोटर धर्म के मुद्दे पर भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया.

भाजपा ने बसपा को कमजोर करने के लिए उस के निकाले गए नेताओं पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए हैं. जुगुल किशोर और रिटायर हुए चुके आईपीएस ब्रजलाल भाजपा में शामिल हो चुके हैं. उम्मीद की जा रही है कि जरूरत पड़ने पर बाबू सिंह कुशवाहा और स्वामी प्रसाद मौर्य भी चुनाव के बाद भाजपा की मदद कर सकते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा विकास और हिंदुत्व की दोधारी तलवार पर चल कर चुनाव जीतना चाहती है. इस को ले कर वह कभी कैराना को मुद्दा बनाती है, तो कभी नरेंद्र मोदी की साफ इमेज को सामने रखती है. कांग्रेस अभी भी उत्तर प्रदेश में अपनी साख नहीं बना पाई है. उस की कोशिश यह है कि कुछ दलों के तालमेल से चुनाव लड़े और जीते. उत्तर प्रदेश में नेताओं के दलबदल का खेल आगे और भी तेज होता जाएगा, तब नेताओं के रंग देखने वाले होंगे.

नेताओं की अपनीअपनी राय

समाजवादी पार्टी अपनी सरकार की नीतियों और कामों को ले कर चुनाव मैदान में जाएगी. पार्टी ने 4 साल में प्रदेश मे विकास के जो काम किए हैं, वे पिछली किसी सरकार में नहीं हुए. पार्टी ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, उन को पूरा किया है. हमारी सफलता है कि विरोधी दलों के पास कोई मुद्दा नहीं रह गया है. ऐसे में वे बेकार के मुद्दों को उठा रहे हैं. हम ने विकास के लैवल पर प्रदेश को पूरे देश में सब से आगे खड़ा कर दिया. आज जो लोग सपा में शामिल हो रहे हैं, वे हमारी नीतियों से प्रभावित हो कर ही आ रहे हैं.       – अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश.

जो लोग हमारे ऊपर टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं, वे यह क्यों नहीं बता रहे हैं कि उन्होंने टिकट के लिए कितने पैसे दिए थे? स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी विरोधी गतिविधियों में लंबे समय से लगे थे. उन को कई बार सुधरने के लिए कहा भी था. वे बसपा में रहते हुए अपने परिवार को राजनीति में जमाना चाहते थे. बसपा में यह मुमकिन नहीं है. बसपा में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता. उन को वहीं मदद मिल सकती है, जहां परिवारवाद चल रहा हो. बसपा के लोग ऐसे नेताओं को चुनाव में सबक सिखा देंगे. बसपा बाबा साहब और मान्यवर कांशीराम के दिखाए रास्ते पर चलेगी.    – मायावती, बसपा प्रमुख.

बसपा में पहले काम करने वाले उन लोगों को टिकट मिलता था, जो पार्टी के लिए खूनपसीना बहाते थे. साल 2012 के बाद पार्टी में पैसे वालों को टिकट दिए जाने लगे. इस का सब से बड़ा सुबूत यह है कि सैकड़ों लोगों के टिकट काटे गए. मायावती डाक्टर अंबेडकर और कांशीराम के बताए रास्ते से भटक गई हैं. अब वे दलित की बेटी नहीं दौलत की बेटी बन गई हैं. पार्टी के पास फंड की कमी नहीं है. ऐसे में टिकट के बदले पैसे लेने की जरूरत नहीं है. मायावती की नीतियों के चलते दलित समाज को नुकसान हो रहा है. यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा.          -स्वामी प्रसाद मौर्य, पूर्व बसपा महासचिव.

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