गुजरात में पटेल आंदोलन को कुचलने के लिए मुख्यमंत्री आनंदीबाई पटेल की सरकार उसी तरह का अलोकतांत्रिक कदम उठा रही है जिस तरह का खालिस्तान आंदोलन के समय इंदिरा गांधी की सरकार ने उठाया था. आनंदीबाई पटेल को आपातकाल की तरह के कदम उठाने में कोई हिचक नहीं हो रही है क्योंकि उन्हें डर है कि अगर यह आंदोलन पनप गया तो गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की गद्दी हिल सकती है. आनंदीबाई और नरेंद्र मोदी ने हार्दिक पटेल को जेल में डाल दिया है. अक्तूबर से जेल में बंद हार्दिक पटेल को विभिन्न अदालतों से छूट नहीं मिल रही. चूंकि पटेल जाति के लोग अभी तक हरियाणा के जाटों, आंध्र प्रदेश के कापुओं और राजस्थान के गुर्जरों की तरह मरनेमारने को तैयार नहीं है, इसलिए पटेल आंदोलन को काबू में करना सरकार के लिए आसान हो रहा है. शायद यह महात्मा गांधी की विरासत है कि गुजरात के पटेल भी आमतौर पर शांतिप्रिय हैं.

पर इस का अर्थ यह नहीं कि सरकार इंटरनैट और मोबाइल सेवाएं बंद कर के सूचना के आदानप्रदान पर कर्फ्यू लगा सकती है. आंदोलनकारी एकदूसरे को भड़का न सकें. इस के लिए सरकार के पास इंटरनैट या मोबाइल को बंद करने का अगर कानूनी हक है तो भी उसे असंवैधानिक माना जाना चाहिए. किसी भी सरकार को चाहे वह कश्मीर की हो, गुजरात की हो या हरियाणा की, दंगों को भड़कने से रोकने के लिए प्रैस, टैलीविजन, इंटरनैट, मोबाइल आदि को बंद करने का हक नहीं है. संवाद के ये तरीके मानव के अब मौलिक अधिकार हैं और एक तरह से संविधान से भी ऊपर हैं. किसी भी सरकार, चाहे तानाशाही क्यों न हो, को इन अधिकारों को छीनने का हक नहीं है. इन अधिकारों को छीनना असल में मानसिक हत्या के रूप में माना जाना चाहिए. यह एक तरह का नरसंहार है जो अंतर्राष्ट्रीय अपराध है और भारत भी इंटरनैशनल कोर्ट औफ क्रिमिनल जस्टिस का सदस्य है. ऐसे में गुजरात सरकार के खिलाफ इस तरह के अपराध का मुकदमा चलना चाहिए.

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