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‘‘देश का बंटवारा हुआ था या आजादी मिली थी, समझ नहीं पाया’’

15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ था. इस आजादी को 69 वर्ष हो रहे हैं. पर यह आजादी क्या है? आजादी के बाद देश ,समाज व सिनेमा में क्या बदलाव आए? इस पर विचार करने की जरूरत है. इसीलिए हमने दस साल पहले फिल्म ‘‘रंग दे बसंती’’ से युवा पीढ़ी के अंदर जोश भरने वाले फिल्मकार राकेश ओम प्रकाश मेहरा से बात की.

भ्रष्टाचार पर ‘‘रंग दे बंसती’, धर्म व जात पात के खिलाफ ‘‘दिल्ली 6’’, खेल के साथ देश के बंटवारे पर ‘‘भाग मिल्खा भाग’’ बनाने के बाद अब राकेश ओम प्रकाश मेहरा प्रेम की व्याख्या करने वाली फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ बनायी है, जो कि सात अक्टूबर को प्रदर्शित होगी.

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने हमारा यह सवाल सुनने के बाद कहा- ‘‘सच कहूं तो उस वक्त देश का बंटवारा हुआ था या हमें आजादी मिली थी, यह बात आज तक मेरी समझ में नही आयी. जहां तक सिनेमा का सवाल है तो, लेखक व निर्देशक वही कहानी बता सकेगा, जो उसे तंग करती है.’’

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा- ‘‘जब देश को आजादी मिली थी, तब एक नया जोश था.उमंग थी, तब ‘साथी हाथ बढा़ना रे’, यह देश है वीर जवानों का’गीत बने थे.

उस वक्त कमाल का सिनेमा बना. ‘दो आंखे बारह हाथ’,‘नया दौर’ जैसी फिल्में बनी. उस वक्त देश वासियों के साथ साथ फिल्मकारों के दिल में भी था कि चलो देश बनाते हैं. मगर देश बना नहीं. अचानक युवा वर्ग को नौकरियां नहीं मिली. भ्रष्टाचार बढ़ गया. बंगाल फेमिना आ गया. महाराष्ट्र में अकाल पड़ गया. पाकिस्तान के साथ दो तीन युद्ध हो गए. चीन से चपट खायी. हाल यह हुआ कि ‘जिन्हें हिंद पर नाज है, वह कहां हैं? कहां हैं? कहां हैं? मतलब, ‘नहीं चाहिए यह दुनिया, यह ताजो यह तख्त.’ और तब हमारा हीरो वह बन गया, जो उस वक्त ब्लैक में सिनेमा की टिकट बेचता था. काला बाजारी करता था. देव आनंद पहले अभिनेता थे, जो नेगेटिव यानी कि नकारात्मक किरदार निभाकर हीरो/नायक बना.

अन्यथा उन दिनों हीरो तो स्कूल शिक्षक हुआ करता था. पहले पुलिस आपके मोहल्ले में आ जाए, तो पूरा मोहल्ला बदनाम हो जाता था. पर कहां चोर हीरो बनने लगा. 1965 के काल में जब इतना बुरा हाल हुआ, तो हमने पलायनवाद ढूंढ़ लिया. हमारा हीरो नाचने लगा. पहली बार नाचा. इससे पहले सिनेमा की शुरूआत से हीरो नाचता नहीं था. वह गीत भले गा लेता था. राज कपूर,अशोक कुमार और दिलीप कुमार तो देव आनंद से बड़े हीरो रहे हैं. के एल सहगल से बड़ा स्टार रहा ही नहीं.

जब शम्मी कपूर साहब पहली बार नाचे थे, मेरी उनसे बात भी हुई, उन्होंने खुद कबूल किया था कि उन्हें भी यह बात बहुत बाद में समझ में आयी थी. क्योंकि देश रो रहा था. उसे खुशियों की जरूरत थी. जो उसकी रोज की जिंदगी में नहीं मिल रही थी. उस वक्त हम ट्रेन पकड़ने के लिए रेलवे स्टेशन रवाना होते समय मानकर चलते थे कि जहां हमें पहुंचना है, वहां पहुंचने तक ट्रेन सोलह से 17 घंटे लेट होनी ही है.

ट्रेन कहीं भी रूक जाएगी. पटरी से उतर जाएगी, एक्सीडेंट हो जाएगा. जेब कतरे या डाकू ट्रेन के डिब्बे में घुस जाएंगे. तो हमने अपने सिनेमा में पलायनवाद डाला. और फिल्म में हमारा हीरो नाचने लगा. अब शायद समय बदला. बीच में डार्क स्टेज आ गया था. हमने ऐसा हीरो पैदा किया, जो सिस्टम के विरुद्ध था. तब ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्में बनी.

अमिताभ बच्चन जी की कई फिल्में इसी तरह की आयीं.फिर चाहे वह‘दीवार’रही हो या ‘त्रिशूल’ या कोई अन्य.जब हमने सिस्टम के खिलाफ स्मगलर बन गए, हमने स्मगलर को अपना हीरो बना दिया, तो समाज का पतन का परिचायक था. स्मगलर को पैसा दिखता है और लोगों को उस वक्त पैसा ही चाहिए था.

फिर हीरो ही गायब हो गए. बीस तीस साल तक फिल्म से हीरो गायब रहा. क्योंकि समाज से ही हीरो गायब हो चुका था. किसको हीरो बनाएं. तब दकियानूसी बातें होने लगीं. उस वक्त फिल्मकार ने सोचा कि किसी को हीरो नहीं बनाते.

पोलीटीशियन/ राजनेता को ही गालियां बकते जाओ,वही हीरो हो गया. हीरो वाली बात थी ही नहीं. हीरो वह होता है जो आपको प्रेरणा दे. वैसा प्रेरणा देने वाला कोई आया ही नहीं.तो फिल्मों में मसाला, धूम धड़ाम, एक्शन,सब पिरोया जाने लगा. पलायनवाद एक नए स्तर पर पहुंच गया.’’

अपनी ही लय में बोलते हुए उन्होंने आगे कहा- ‘‘अब सुनने में आया है कि इकोनामी खुली है, जिसकी वजह से चीजें बदली हैं. कहा जा रहा है कि लोगों के पास पैसा आ गया. मुझे लगता है कि कन्जूमेरिज्म आ गया है. प्रगति आयी या नहीं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा. क्योंकि अभी भी गरीब तो बेचारा गरीब ही है. आपने गरीब के लिए आफिस जाने के लिए ऐसी कोई ए.सी. ट्रेन बनाकर नहीं दी, जिसमें वह आराम से बैठकर आ जा सके. उसे दूसरे का पसीना नहीं सूंघना पड़ता. उसका मोबाइल छीनकर कोई न भागता. हर दिन आठ दस लोग लोकल ट्रेन में चढ़ते उतरते मरते हैं.

अभी लोग रेलवे पटरी पर बैठकर शौच करते हैं और ट्रेन उन्हे उड़ाकर ले जाती है. तो सिनेमा वही बनेगा, जो समाज व देश में हो रहा है. या समाज को रिफलेक्ट करेगा या उसे न्याय संगत बताएगा. समाज में जो कुछ हो रहा है, उससे सिनेमा प्रेरित होगा अथवा उससे वह आपको पलायनवाद देगा.’’

वह आगे कहते हैं- ‘‘सिनेमा की यह जो स्थिति है,उसके लिए फिल्मकार या गैर फिल्मकार या आम जनता या राजनेता किसी का दोष नहीं है.उन्होने न तो अच्छा काम किया और न ही बुरा काम किया.’’

‘‘यदि फिल्मकार समाज का बदलाव कर रहा है,तो इसके यह मायने नहीं कि वह बहुत भारी काम कर रहा है. हम फिल्मकार कोई बड़ा काम नहीं कर रहे हैं. हमारा काम दर्शकों का मनोरंजन करना, उसको कहानी सुनाना है, यह मानना बहुत जरुरी है अन्यथा मेरी नानी मुझे थप्पड़ मार देगी. उसका कहना है कि मान लिया तुमने सब कुछ कर लिया,पर मोरल आफ स्टोरी क्या है? मैं खुश हूं या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. देश बदल रहा है या नहीं, यह अति महत्वपूर्ण है. देश बदलेगा,तभी समाज व हम बदलेंगे.’’  

अब हमारे देश में हीरो कम कैसे हो गए? इस सवाल पर ‘‘सरिता’’पत्रिका से राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने कहा- ‘‘क्योंकि हमने सही बात नहीं सिखायी. हम बच्चे को सिखाते हैं कि चिंता मत कर. तेरा ड्रायविंग लायसेंस बनकर आ जाएगा. रेड लाइट क्रास करने पर वह कुछ रूपए देकर जिस तरह से आगे बढ़ जाता है,उससे लड़के को लगा कि यह तो ज्यादा आसान है.तो कहीं न कहीं परिवार के स्तर पर ही हमने अपने अंदर के हीरो को मार दिया. तो परदे पर हीरो कैसे नजर आएगा. परदे पर हमने हीरो को सिर्फ नारे लगाते ही दिखाया. इसीलिए हीरो खत्म हो गए.

फिल्मी अंदाज में पकड़े गये संदीप और नीतू के हत्यारे

संदीप और नीतू की कहानी प्यार, स्वार्थ और बेवफाई के रंग में पूरी तरह से रंगी थी. उनकी हत्या भी फिल्मी अंदाज में हुई जब दोनो अपने ही साथियों का शिकार हो गये. लखनऊ जोन के आईजी ए सतीश गणेश, एसएसपी मंजिल सैनी और एसएसपी एटीएफ अमित पाठक की बेहतर पुलिसिंग से हत्यारों को उस समय पकड़ लिया गया जब वह मुंबई जाने वाले हवाई जहाज पर बैठ गये थे और जहाज उडान भर चुका था.

पुलिस की पहल पर एयरपोर्ट एथॅारिटी ने विमान को रनवे छोडने से पहले ही रोक दिया. कहानी की शुरूआत भी फिल्मों से प्रेरित है. इलाहाबाद के रहने वाले इमरान ने मुम्बई जाकर एक्टिंग की दुनिया में नाम करने की सोची. वहां रहने और अपने खर्चे पूरे करने के लिये उसने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर ली. एक बार उसकी डयूटी फिल्म डायरेक्टर रामगोपाल वर्मा के फिल्म में लग गई. वहां उसने देखा कि फिल्मों में अपराध को किस तरह से पेश किया जाता है.

इमरान को यहां जीवेश मिला. जीवेश से मिलकर इमरान ने अपराध का ठेका लेने वाला एक गिरोह बना लिया. लोगों का अपहरण कर फिरौती वसूल करने को अपना धंधा बना लिया. राजस्थान, दिल्ली और लखनऊ उसके निशाने पर थे. इसी क्रम में इमरान की मुलाकात संदीप और नीतू से हुई.

नीतू खुद को महिला आयोग का सदस्य बताकर लोगों को प्रभावित करती थी. वह संदीप के साथ लिव इन रिलेशन में रहती थी. दोनों इमरान के साथ जुड़ चुके थे. वह भी अपहरण के धंधे में लग गये. एक दिन संदीप और नीतू ने उत्तर प्रदेश जल निगम के सेक्शन अफसर 56 साल के सलीम फरीदी के अपहरण की योजना बनाई.

फिरौती में 3 करोड़ वसूलने का इंरादा था. नीतू और संदीप उनको जानते थे. ऐसे में इन दोनो ने उनको लखनऊ के सहारागंज मौल के पास बुलाया और वहां से उनका अपहरण कर लिया. अपहरण करने के बाद इमरान उनको लेकर इलाहाबाद गया.

जहां फिरौती की बातचीत की तो पता चला कि सलीम फरीदी की माली हालत 3 करोड़ देने वाली नहीं है. जब सौदा 10 लाख में पट गया.

फिरौती की रकम पाने के बाद नीतू का कहना था कि फरीदी को मार दिया जाये क्योंकि वह उसे पहचानता है. संदीप चाहता था कि नीतू को मार दिया जाये यह अब बोझ हो गई है. नीतू संदीप से अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी.

इमरान फरीदी से वादा कर चुका था कि वह फिरौती की रकम मिलने के बाद जान से नहीं मारेगा. ऐसे में जब नीतू ने फरीदी को मारने की जिद की तो इमरान ने नीतू को गोली मार दी. संदीप फिरौती की रकम में अपना हिस्सा मांगने लगा तो उसने संदीप को जान से मार दिया.

संदीप और नीतू की हत्या के बाद इमरान और जीवेश मुम्बई भागने की फिराक में जुट गये. लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट से दोनो ने अपना मुम्बई का टिकट कटाया और जहाज में बैठ गये. इस बात की सूचना लखनऊ पुलिस को लग चुकी थी. तब तक जहाज रनवे से उड़ान भरने की तैयारी में स्पीड पकड़ चुका था. इसी बीच विमान की इमरजेंसी लैंडिग का संकेत मिला.विमान रनवे पर रूका तो पुलिस ने विमान को घेर लिया. विमान के अंदर से पुलिस ने इमरान और जीवेश को पकड़ लिया.

लखनऊ पुलिस ने 24 घंटे के अंदर इलाहाबाद में हुये डबल मर्डर के सनसनीखेज कांड को उजागर कर दिया. आईजी जोन ए सतीश गणेश ने कहा कि बेहतर पुलिसिंग और तालमेल से किये गये काम से यह संभव हो पाया. उत्तर प्रदेश के डीजीपी जावीद अहमद ने पुलिस टीम को 50 हजार इनाम की घोषणा की.

संदीप और नीतू भले ही एक दूसरे के साथ लिव इन रिलेशन में रह रहे थे पर दोनों के बीच भरोसा और विश्वास नहीं रह गया था. जिसकी वजह से इमरान ने एक के बाद एक दोनो की हत्या करके फिरौती की रकम को खुद की हड़प करने की सोची और पकड़ा गया.                

  

‘पद्मावती’ में नहीं होंगे रणवीर सिंह

पिछले कुछ सप्ताह के दौरान ‘सरिता’ पत्रिका ने आपको यह खबर दी थी कि संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती में रणवीर सिंह नही होंगे. मगर अंग्रेजी मीडिया लगातार लिखता आया है कि पद्मावती में अलाउद्दीन खिलजी के किरदार में रणवीर सिंह होंगे. पर अब यह साफ हो गया है कि फिल्म पद्मावती में रणवीर सिंह नहीं होंगे. अब इस बात को अंग्रेजी मीडिया ने भी मान लिया है.

यदि संजय लीला भंसाली के नजदीकी सूत्रों पर यकीन किया जाए, तो फिल्म पद्मावती में दीपिका पादुकोण भी नहीं होगी.

किस किस के प्रशंसक हैं ‘रूस्तम’ के निर्देशक टीनू देसाई

फिल्म रूस्तम के प्रदर्शन के साथ ही बौलीवुड में हर तरफ फिल्म के निर्देशक टीनू सुरेश देसाई की काबीलियत की ही चर्चा हो रही है. मजेदार बात यह है कि टीनू सुरेश देसाई के पिता सुरेश देसाई ‘जी पी सिप्पी फिल्मस’ में ‘शोले’ व ‘शान’ से लेकर ‘अकेला’ तक कई फिल्मों में बतौर प्रोडक्शन मैनेजर काम कर चुके हैं, मगर टीनू सुरेश देसाई ने प्रोडक्शन में हाथ आजमाने की बजाय निर्देशन के क्षेत्र में काम करने की इच्छा के साथ बौलीवुड में कदम रखा.

टीनू ने रमेश सिप्पी, कुक्कू कोहली व राहुल रवैल के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम किया. जबकि रूमी जाफरी, अब्बास मस्तान, विक्रम भट्ट और नीरज पांडे के साथ बतौर एसोसिएट निर्देशक काम किया. उसके बाद नीरज पांडे ने उन्हें स्वतंत्र निर्देशक के रूप में अनुबंधित किया. पर अच्छी कहानी की तलाश में दो साल का वक्त लग गया. इस बीच टीनू दसाई ने विक्रम भट्ट की फिल्म ‘1920’ के सिक्वअल ‘1920 लंदन’ निर्देशित की. कुछ वजहों से यह फिल्म बीच में लटकी रही, पर अंततः 6 मई 2016 को यह फिल्म रिलीज हुई.

1920 लंदन के प्रदर्शन से पहले ही टीनू सुरेश देसाई ने रूस्तम की शूटिंग पूरी कर ली थी. यह फिल्म अब प्रदर्शित हुई है. अपनी अब तक की यात्रा पर रोशनी डालते हुए ‘सरिता’ पत्रिका को टीनू देसाई ने बताया, ‘मेरे पिता फिल्मों से जुडे़ हुए थे. इसलिए कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही मैं बतौर सहायक निर्देशक फिल्मों से जुड़ गया था. मैंने सबसे पहले रमेश सिप्पी के साथ बतौर रनर निर्देशक सीरियल ‘किस्मत’ में काम किया. फिर रजत रावल के साथ दो फिल्में, रवि चोपड़ा के साथ ‘महाभारत 2’ तथा राहुल रवेल के साथ ‘अर्जुन पंडित’ में बतौर सहायक निर्देशक काम किया. इसके बाद कुक्कू कोहली के साथ ‘अनाड़ी नंबर वन’, रूमी जाफरी के साथ ‘गॉड तूस्सी ग्रेट हो’ और ‘लाइफ पार्टनर’, विक्रम भट्ट के साथ ‘शापित’ और नीरज पांडे के साथ ‘स्पेशल 26’ बतौर एसोसिएट निर्देशक काम किया. फिर मैंने ‘1920 लंदन’ का निर्देशन किया. यह फिल्म कई साल तक रूक गयी थी. मगर मुझे स्वतंत्र निर्देशक के रूप में नीरज पांडे ही लॉंच करना चाहते थे, पर हमें अच्छी कहानी नही मिली, इसलिए मामला अटका रहा. 1920 लंदन के रिलीज होने से पहले ही मैंने फिल्म रूस्तम की शूटिंग पूरी कर ली थी.’

टीनू देसाई कई दिग्गज फिल्मकारों के साथ काम किया है. पर वह मौलिक काम करना चाहते हैं. इस संबंध में उन्होंने कहा, ‘मैंने दिग्गज निर्देशकों के साथ काम करते हुए उनसे बहुत कुछ सीखने की कोशिस की. पर मेरी यह कोशिश रही है कि मैं कुछ नया करूं. मेरी फिल्म देखते समय कही किसी को किसी की छाप नजर आए, तो मैं कुछ कह नहीं सकता. क्येंकि मुझे खुद नहीं पता कि किस निर्देशक से मेरे अंदर क्या बात आयी है, जिसका उपयोग मैं अपनी फिल्म में कर रहा हूं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कुक्कू कोहली को संगीत की समझ बहुत अच्छी है. स्व. रवि चोपड़ा जी बहुत विनम्र थे. वह सेट पर सभी को सम्मान देते थे. पारिवारीक माहौल होता था. राहुल रवेल तो जीनियस हैं, उनकी याद्दाश्त की दाद देनी पड़ेगी. रूमी जाफरी बहुत अच्छे लेखक हैं, तो उनसे मुझे लेखन की समझ आयी. अब्बास मस्तान के साथ एक अच्छी थ्रिलर फिल्म बनाना और पेपर वर्क करना सीखा. नीरज पांडे का अपनी अलग स्टाइल है. उनकी फिल्मों में रोमांच के साथ-साथ यथार्थ होता है.’

सिनेमा के बदलाव पर उन्होंने कहा, ‘परिवर्तन संसार का नियम है. परिवर्तन हमेशा अच्छे के लिए ही होता है. सिनेमा में जो बदलाव आ रहे हैं, उसकी वजह से ही अब नयी तरह की फिल्में बन रही हैं. मैं  आपको यश चोपड़ा जी का उदाहरण देना चाहूंगा. वह समय के साथ खुद को बदलते रहते थे. उनकी फिल्मों में वह बदलाव नजर आता रहा है, जिसकी वजह से उनकी फिल्में हिट रही हैं.’

टीनू देसाई ने अभिनेता अक्षय कुमार की तारीफ करते हुए कहा, ‘वही काफी समझदार हैं. उन्हें पटकथा की काफी अच्छी समझ है. वह कभी दुविधा में नहीं रहते. वह हमेशा अपने गट्स के आधार पर काम करते हैं और एक बार जो निर्णय ले लेते हैं, उससे पीछे नहीं हटते. वह अपने हर काम को बेहतर तरीके से करने में यकीन करते हैं. मेहनती हैं,इसलिए रिस्क उठाते हैं और उन्हें फायदा होता है.’

जानें फोन पर किसके साथ बिजी है दोस्त

कभी-कभी ऐसा होता है कि आप अपने दोस्त को कॉल कर रहे होते हैं और उसका फोन बिजी चल रहा होता है. चलिए एक बार कॉल करने पर अगर फोन बिजी गया, तो ये नॉर्मल है, ऐसा सभी के साथ होता होगा. लेकिन जरा सोचिए कि अगर आप उसे कुछ घंटों के बाद फोन करे और तब भी उसका फोन बिजी जा रहा हो तो आप क्या करते हैं. जाहिर है कि आपको गुस्सा आता होगा और ये जानने की भी इच्छा होती होगी की आखिर वो इतनी देर से कहां बिजी चल रहा है.

ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे तरीके के बारे में जिसके जरिए आप ये जान पाएंगे की आपका दोस्त इतनी देर से किससे बात कर रहा है. ये एक काफी चर्चित एप है जिसका नाम है ट्रूकॉलर. ये एप आपको बताएगा की आपका दोस्त किससे बात कर रहा है.

कैसे काम करती है ये एप?

ये एप तब काम करेगी जब आपके और आपके दोस्त के फोन में इंटरनेट डाटा होगा. इसके जरिए पता लगाया जा सकता है कि जो आपको कॉल कर रहा है उसका नाम क्या है इसके साथ ही उसकी फोटो भी नजर आएगी. यही नहीं, ये एप उन लोगों के भी नाम और फोटो यूजर्स को दिखा देता जिनके नंबर आपकी फोनबुक में नहीं हैं. इसके अलावा अगर आपका दोस्त किसी और के साथ फोन पर बिजी होगा तो आपको ये भी पता चल जाएगा कि वो किसके साथ बिजी है.

जाहिर है कि ये एक ऐसी एप है जिसे दुनिया भर के करोड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं और इनमें से कोई भी आपको कॉल करे तो उसका नाम और फोटो पता लग जाता है.

खत्म हो जाएगा ‘रेल बजट’ का सफर

अगले वित्त वर्ष से रेलवे के लिए अलग बजट नहीं बनेगा. 1924 से चला आ रहा यह सिलसिला वहीं खत्म हो जाएगा. वित्त मंत्रालय रेल बजट को आम बजट में ही मिला देने के प्रस्ताव पर सहमत हो गया है.

सरकार की यह पहल काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के वर्षों में और खासकर 1996 के बाद आई गठबंधन सरकारों में राजनीति पर दबदबा रखनेवालों ने रेल बजट का इस्तेमाल अपनी छवि बनाने में किया था. रेल मंत्रालय अक्सर क्षेत्रीय दिग्गजों के अधीन रहा, इसलिए रेल बजट में रेल मंत्री की राजनीतिक प्राथमिकताओं को ही ज्यादा तवज्जो दी जाती रही. इस दौरान विभागीय नौकरशाहों की ओर से भी कड़ा प्रतिरोध सामने आया.

लेकिन, चमक-दमक का त्याग करने की रेल मंत्री सुरेश प्रभु की तत्परता से रेल बजट की परंपरा पर अब विराम लगने जा रहा है क्योंकि लोकसभा में पूर्ण बहुमत की वजह से बीजेपी रेल मंत्रालय का जिम्मा अपने सहयोगी दल को देने की बजाय इसे अपने पास रखने में सक्षम हो पाई है. अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही रेल बजट की परंपरा पर विराम लगाने पर चर्चा तब शुरू हुई जब नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय और किशोर देसाई ने इसे खत्म करने की सलाह दी.

प्रभु ने राज्यसभा को बताया कि उन्होंने रेलवे और देश की अर्थव्यवस्था के हित में वित्त मंत्री से रेल बजट का आम बजट में विलय करने का आग्रह किया है. हालांकि, उन्होंने इसकी कोई समय-सीमा नहीं बताई थी. अगर रेल बजट का आम बजट में विलय हो जाता है तो रेलवे भी उन दूसरे विभागों की तरह हो जाएगा जिन्हें बजट अलॉट किया जाता है, लेकिन इनके खर्च एवं आमदनी पर वित्त मंत्रालय की नजर होती है.

1924 तक ब्रिटिश सरकार संयुक्त बजट पेश किया करती थी, लेकिन अर्थशास्त्री विलियम एकवर्थ की अध्यक्षता में एक समिति ने पुनर्गठन के लिए अलग-अलग बजट का प्रावधान करने का सुझाव दिया तो चीजें बदल गईं. अब मामला बिल्कुल उलटा हो रहा है क्योंकि मोदी सरकार रेलवे के काम-काज के तौर-तरीक बदलने पर आमदा दिखती है. सरकार की इच्छा का प्रदर्शन रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन की प्रक्रियाओं में भी होता है

ओलंपिक: फेल्प्स ने तोड़ा किसका रिकॉर्ड

माइकल फेल्प्स ने ओलंपिक में अब तक 22 गोल्ड मेडल जीते जो अपने आप में ओलंपिक रिकॉर्ड है. पूर्व सोवियत संघ की जिमनास्ट लारिसा लातनिना ने 1956 से 1964 के ओलंपिक खेलों के दौरान कुल नौ गोल्ड मेडल जीते थे.

लेकिन आधुनिक ओलंपिक खेलों से पहले प्राचीन ओलंपिक खेलों के दौरान एक एथलीट ऐसा था जिसने 12 इवेंट में जीत हासिल की थी और उनके कारनामे को फेल्प्स रियो ओलंपिक में ही पीछे छोड़ पाए हैं.

दरअसल माइकल फेल्प्स ने अब तक जो 22 गोल्ड मेडल जीते हैं, इसमें से नौ तो रिले टीम के गोल्ड मेडल हैं. ऐसे में व्यक्तिगत गोल्ड मेडल के हिसाब से देखें तो फेल्प्स ने रियो में अपना 13वां गोल्ड जीत कर लियोनेड्स ऑफ रोड्स का रिकॉर्ड तोड़ा है.

रोड्स ने ईसा से 164 साल पूर्व, 160 साल पूर्व, 156 साल पूर्व और 152 साल पूर्व में आयोजित लगातार चार ओलंपिक खेलों में अलग अलग तरह के तीन रेसों में जीत हासिल की थी. उस दौर में विजेता खिलाड़ियों को गोल्ड, सिल्वर या फिर ब्रांज मेडल देने का चलन नहीं था, केवल जैतून की पत्तियां दी जाती थीं.

रोड्स ने करीब 200 मीटर, 400 मीटर की रेस और कवच पहनकर होने वाले रेसों में लगातार चार ओलंपिक में जीत हासिल की. एक ही ओलंपिक में तीन इवेंट में जीत हासिल करने वाले एथलीट को ट्रिपलर कहा जाता है. ऐसे केवल सात एथलीट हैं.

रोड्स ऐसे एथलीट हैं जो एक बार से ज्यादा ये कारनामा दिखा चुके हैं. इतना ही नहीं, जब उन्हें चौथी बार ये कारनामा दिखाया था, तब उनकी उम्र 36 साल की थी, फेल्प्स से पांच साल अधिक.

उस जमाने में रेस के दौरान खिलाड़ी नंगे ही दौड़ते थे, लेकिन कवच वाले रेस में खिलाड़ी को युद्ध के दौरान पहने वाले कवच, हेलमेट पहनकर भागना होता था. ब्रिटिश म्यूजियम के सीनियर क्यूरेटर जूडिथ स्वाडलिंग कहते हैं, “इन सभी इवेंट में हिस्सा लेना भी काफी बड़ी उपलब्धि थी.”

वहीं कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पॉल कार्टलेज कहते हैं, “कवच पहनकर दौड़ना मुश्किल काम था, वो भी 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में. इसके लिए मांसपेशियों में दमखम के साथ साथ जिमनास्ट वाली खूबियां भी जरूरी थीं.”

लेकिन इस एथलीट के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है और ना ही उनकी कोई तस्वीर भी मौजूद है. कार्टलेज के मुताबिक उनका नाम शेर के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्रीक शब्द से निकला है, जिससे जाहिर होता है, वह काफी अभिजात्य रहे होंगे, संपन्न भी होंगे और संभवत एथलीट परिवार में जन्मे हों.

जूडिथ स्वाडलिंग के मुताबिक यूनान के रोड्स इलाके के इस एथलीट की मौत के बाद उन्हें उस वक्त के स्थानीय लोग ईश्वर जैसा ही मानते थे.

वैसे लियोनेड्स का जिक्र प्राचीन यूनानी साहित्य में भी मिलता है, जिसमें उन्हें सबसे प्रसिद्ध धावक कहा गया है. उनकी एक मूर्ति रोड्स में लगी हुई है और उनकी ख्याति तेज दौड़ने में ईश्वर जैसी क्षमता वाले धावक की थी.

ऐसे लीक होने से बचाएं इंटीमेट फोटोज

स्मार्टफोन के आने के बाद से लाइफ बड़ी आसान सी लगती है. सब कुछ छोटे से डिवाइस में सेव रहता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ ऐसा Data भी होता है जिसे स्मार्टफोन पर बिलकुल सेव नहीं रखना चाहिए.स्मार्टफोन में ना सेव करें ये Data…

1. क्या ना करें सेव

इंटीमेट फोटोज

क्यों ना करें सेव

एंड्रॉइड फोन में हैकिंग और Data लीक होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है. अगर आप एंड्रॉइड फोन में बैकअप भी लेते हैं तो भी आपका Data ऑनलाइन भी आसानी से हैक हो सकता है. अगर आप इंटीमेट फोटोज सेव कर रहे हैं फोन में और गलती से भी किसी पोर्न साइट को विजिट कर रहे हैं तो उसकी कुकीज फोन से ऐसी फोटोज चुरा भी सकती हैं. पोर्न साइट्स आपको ट्रैक करती हैं और साथ-साथ थर्ड पार्टी ऐप्स में सबसे ज्यादा मालवेयर का खतरा होता है.

क्या करें

अगर आपकी कोई ऐसी फोटोज हैं भी तो उन्हें किसी USB डिवाइस में सेव रखें. किसी पेन ड्राइव में ये ज्यादा सेफ रहेंगी. पेन ड्राइव में भी प्रोटेक्शन के लिए पासवर्ड लगाया जा सकता है.

2.क्या ना करें सेव

पर्सनल अकाउंट नंबर, आधार नबंर या पिन नंबर जैसी चीजें

क्यों ना करें सेव

स्मार्टफोन में ये सब एक ही जगह सेव रखने से Data लीक होने की समस्या आ सकती है. ऐसा फोन चोरी होने से, वायरस आ जाने से या ऑनलाइन हैकिंग के कारण भी हो सकता है.

3. क्या ना रखें सेव

Wifi सिग्नल बूस्टिंग ऐप्स

क्यों ना रखें सेव

वाई-फाई सिग्नल बूस्टिंग ऐप्स या वाई-फाई पासवर्ड क्रैकिंग ऐप या ऐसे ही किसी ऐप को सेव करने से आप अपने फोन के साथ रिस्क लेते हैं. ऐसे ऐप्स ज्यादातर स्पाईवेयर होते हैं जो फोन को वायरस या मालवेयर से इन्फेक्ट करते हैं. ऐसे में आपका Data हैकर्स के पास जा सकता है.

4. क्या ना रखें सेव

ऑनलाइन शॉपिंग या इंटरनेट बैंकिंग पासवर्ड्स

क्यों ना रखें सेव

ईबे, Paypal, फ्लिपकार्ट, नेटबैंकिंग के पासवर्ड्स कभी अपने फोन में सेव नहीं रखने चाहिए. हर बार जब भी आपको लॉगइन करना हो "save your user ID or password" बटन को अनक्लिक करें. इन ऐप्स पर अगर आप लॉगइन रहते हैं तो आपके अकाउंट संबंधित जानकारी लीक हो सकती है.

क्या करें

जितनी बार भी इन ऐप्स का इस्तेमाल करें काम खत्म होने के बाद हमेशा लॉगआउट करें.

5. क्या ना करें सेव

क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या किसी अन्य पर्सनल ID की फोटो

क्यों ना करें सेव

जिस तरह इंटिमेट फोटोज को खतरा रहता है उसी तरह ATM कार्ड, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या किसी भी ID को खतरा रहता है. आपके किसी भी बैंकिंग संबंधित डॉक्युमेंट की स्कैन कॉपी के जरिए बैंकिंग फ्रॉड हो सकता है.

खादी संग मनाइए आजादी का त्यौहार

इंडसदीवा के फैशन ब्रांड खादी ओरिजनल्स अब मिंत्रा (Myntra) पर उपलब्ध होगी. इसमें पारंपरिक से लेकर कार्यस्थल वाले पोशाक शामिल होंगे. एक बयान में कहा गया कि मुंबई खादी ग्रामोद्योग(एमकेवीआईए) संघ के सहयोग से ऐसा किया जाएगा.

मूल खादी जमीनी पहचान, न्यूनतम ठाठ और सूक्ष्म परिष्कार का मिश्रण है. इसे महिला और पुरुष के साधारण, सहज और आरामदायक पोशाक के रूप में तैयार किया गया है. प्रकृति से प्रेरित होकर इसे हर मौसम के अनुकूल बनाया गया है. खादी मूल रूप में मिंत्रा पर करीब 200 से ज्यादा उत्पाद एक औसत मूल्य 1,699 रुपये में उपलब्ध होंगे.

इंडसदीवा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनीत सक्सेना ने कहा, ‘भारत की नौजवान पीढ़ी अपने इस पारंपरिक परिधान को कई कारणों से खो रही है. इसे पुराने फैशन के तौर पर और ज्यादा नहीं पहने जाने वाले भारतीय पारंपरिक परिधान के रूप में देखा जा रहा है, जिसे ज्यादातर युवा अपने माता-पिता के आलमारियों में करीने से रखी धोती और साड़ी की तरह समझते हैं.'

जब एटीएम में फंस जाएं पैसे…

अक्‍सर आपको पैसे निकालने के लिए दूसरे बैंक का एटीएम यूज करना पड़ता है. दूसरे बैंक का एटीएम यूज करते समय आपको कुछ अहम बातों का ध्‍यान रखना चाहिए. अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपको फाइनेंशियल नुकसान के साथ मानसिक परेशानी भी उठानी पड़ सकती है

संभाल कर रखें ट्रांजेक्‍शन स्लिप

अगर आप दूसरे बैंक के एटीएम का यूज करते हैं तो आप ट्रांजेक्‍शन के बाद निकलने वाली स्लिप जरूर संभाल कर रखें. एटीएम मशीन में खराबी की वजह से कई बार ऐसा देखा गया है कि मशीन से पैसा नहीं निकलता है लेकिन पैसे कट जाते हैं. ऐसे में अगर आप ने स्लिप संभाल कर नहीं रखी है तो आप के पास कोई प्रूफ नहीं होगा और आपको दिक्‍कत हो सकती है.

अगर पैसा कट गया है तो करें कंप्‍लेन

दूसरे बैंक के एटीएम से ट्रांजेक्‍शन के दौरान अगर मशीन से पैसा नहीं निकला है और आपके अकाउंट से पैसा कट गया है तो आप को अपने बैंक और जिस बैंक के एटीएम को आपने यूज किया है दोनों में कंप्‍लेन करनी चाहिए. इस कंप्‍लेन में एटीएम आईडी का रेफरेंस जरूर दें.

फ्रॉड होने पर कराएं एफआईआर

अगर आप दूसरे बैंक के एटीएम से ट्रांजेक्‍शन करते हैं और आप फ्रॉड का शिकार हो जाते हैं तो आपको सबसे पहले इसके बारे में पुलिस के पास एफआईआर दर्ज करानी चाहिए. इसके अलावा आपको अपने बैंक और जिस बैंक‍ के एटीएम से आपने ट्रांजेक्‍शन किया है दोनों में कंप्‍लेन करनी चाहिए. इस कंप्‍लेन में भी एटीएम आईडी का रेफरेंस जरूर दें. इसके आधार पर आपका बैंक दूसरे बैंक से सीसीटीवी फुटेज मंगा कर यह देखेगा कि आपकी डीटेल्‍स किस तरह से चोरी हुई और आपके अकाउंट से पैसे किसने निकाले.

कटे- फटे नोट निकलने पर नजदीकी ब्रांच से करें संपर्क

दूसरे बैंक के एटीएम से पैसा निकालने पर अगर कटे फटे नोट निकलते हैं तो आप उस बैंक की नजदीकी ब्रांच में जाकर नोट बदलवा सकते हैं. अब लगभग सभी बैंक कटे फटे नोट बदलने की सुविधा देते हैं.

बैंकिंग लोकपाल से करें शिकायत

एटीएम से संबंधित किसी और समस्‍या के लिए आप सबसे पहले अपने बैंक से शिकायत करें. इस शिकायत पर अगर एक माह तक कोई कार्रवाई नहीं होती है तो आप बैंकिंग लोकपाल से शिकायत कर सकते हैं.

कंज्‍यूमर कोर्ट में जाएं

अगर आप बैंकिंग लोकपाल के पास नहीं जाना चाहते हैं तो कन्‍ज्‍यूमर कोर्ट की मदद ले सकते हैं. लेकिन इसकी मदद लेने से पहले आपको बैंक को शिकायत पर कार्रवाई के लिए एक महीने का समय देना होगा.

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