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खेल कहीं व्यवसाय न बन जाए

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधार को ले कर जस्टिस लोढ़ा कमेटी की ज्यादातर सिफारिशें मंजूर कर ली हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीसीसीआई लोढ़ा पैनल की सिफारिशें 6 महीने में लागू करे. अब बोर्ड में मंत्री और अधिकारी शामिल नहीं हो पाएंगे, राजनेताओं पर कोई पाबंदी नहीं है. बीसीसीआई में अब 1 व्यक्ति 1 पद का नियम लागू होगा. खिलाडि़यों का अपना संघ होगा. बीसीसीआई अधिकारियों की उम्रसीमा 70 वर्ष होगी. ओवर के बीच विज्ञापन पर बीसीसीआई ब्रौडकास्टर से बात कर हल निकालेगा. इस के अलावा सट्टेबाजी वैध हो और आरटीआई का दायरा हो, यह संसद पर छोड़ दिया गया.

उम्मीद की जा रही है कि इस से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में कुछ पारदर्शिता जरूर आएगी. अदालत ने सिर्फ प्रशासनिक पक्ष पर अपना फैसला दिया है. जाहिर है यदि प्रशासनिक पक्ष सुधरेगा तो बाकी चीजें भी सुधर जाएंगी. लेकिन मोदी सरकार की तरह, यहां भी खुद न बैठ कर अपने करीबी को बैठा दिया जाएगा, ऐसा संभव है.

चूंकि बीसीसीआई के पास अकूत पैसा है और सब से धनी संस्था भी है इसलिए हर राजनेता, उद्योगपति या फिर पहुंच रखने वाला व्यक्ति इस संस्था की ओर ललचाता है, हर कोई इस की मलाई खाना चाहता है. शायद इसीलिए इस संस्था में शुरू से ही राजनेताओं, उद्योगपतियों और पहुंच व पावर रखने वाले लोगों का एकछत्र राज रहा है.

बीसीसीआई में पारदर्शिता, मनमानी और भ्रष्टाचार को ले कर सवाल उठने लगे, बावजूद इस के, जवाबदेही किसी की नहीं. मामला इतना बढ़ गया कि सुप्रीम कोर्ट को इस में दखल देना पड़ा.

यह केवल क्रिकेट की ही बात नहीं है, तकरीबन हर खेल संघों में राजनेताओं या रसूखदारों की घुसपैठ है जो केवल पैसा बनाने या अपने स्वार्थ के कारण खेलों का इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि लगभग हर खेल की स्थिति दयनीय होती जा रही है. अब खिलाड़ी भी देश के लिए नहीं, बल्कि पैसों के लिए खेलते हैं. इसे यदि गंभीरता से नहीं सोचा गया तो शायद खेल खेल नहीं रहेगा, व्यवसाय बन कर रह जाएगा.    

डोपिंग का जाल

जब भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाएं शुरू होती हैं, चाहे वे एशियाई खेल हों, कौमनवैल्थ गेम्स हों या फिर ओलिंपिक, कुछ खिलाड़ी डोपिंग मामले में फंस जाते हैं, जैसा कि भारतीय रेसलर नरसिंह यादव और इंद्रजीत सिंह डोपिंग के जाल में उलझ गए थे. उस के बाद नरसिंह ने नाडा को लिखित में दिया कि वह निर्दोष है और उन्हें फंसाया गया है. जब से रियो ओलिंपिक में हिस्सेदारी को ले कर नरसिंह यादव का नाम सामने आया है तब से ही वे विवादों में घिर गए. ओलिंपिक विजेता रेसलर सुशील कुमार ने तब आपत्ति दर्ज की थी और वे अदालत पहुंच गए जहां सुशील कुमार फेल हो गए थे और नरसिंह यादव पास.

मगर राष्ट्रीय डोपिंग निरोधक यानी नाडा द्वारा कराई गई जांच में नरसिंह यादव फेल हो गए. लेकिन नरसिंह ने तब भी लड़ा था जब सुशील कुमार ने ट्रायल की मांग की थी और इस बार भी लड़ा और यह साबित कर दिया कि नरसिंह उन खिलाडि़यों में से नहीं हैं जो हार मान जाते हैं. नाडा की अदालत ने उसे बरी कर दिया. इसी के साथ 74 किलोग्राम भार में रियो ओलिंपिक में जाने का उन का रास्ता साफ हो गया. लेकिन इस घटना ने फिर से डोपिंग की प्रवृत्ति पर सोचने के लिए विवश कर दिया है कि आखिर ऐसी दवाओं का सेवन करने की जरूरत क्यों पड़ती है जबकि दुनियाभर में डोपिंग को ले कर आचार संहिता है जिस का सभी देश पालन करते हैं. इस के लिए नाडा व वाडा यानी वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी ने कड़े नियम भी बना रखे हैं. बावजूद इस के, डोपिंग के मामले कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं.

खिलाडि़यों के लिए कई दवाओं पर प्रतिबंध लगा हुआ है लेकिन प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में खिलाड़ी ऐसी दवाओं का सेवन इसलिए करते हैं ताकि उन का रक्त संचार तेज हो जाए. दवाओं के सेवन के बाद वे अपनेआप को ज्यादा ताकतवर महसूस करने लगते हैं, उन की खेलने की क्षमता बढ़ जाती है. रूस में ऐसी दवाओं पर प्रतिबंध नहीं है, इसलिए ओलिंपिक महासंघ ने वहां के खिलाडि़यों पर प्रतिबंध लगा रखा है. हाल के दशकों में डोपिंग के मामले विश्वभर में बढ़ रहे हैं और तकरीबन हर खेल में खिलाड़ी इस मामले में फंस रहे हैं. चाहे वह क्रिकेट हो, टैनिस हो, फुटबौल हो, कुश्ती हो या फिर अन्य खेल. खिलाडि़यों, कोच, देश और खेल पदाधिकारियों को डोपिंग को ले कर सोचना होगा क्योंकि केवल कड़ा नियम बना देने से अगर डोपिंग के मामले रुक जाते तो शायद एक भी मामला सामने नहीं आता. खिलाड़ी इस बात को जानतेसमझते हैं कि अगर वे डोपिंग में पकड़े जाएंगे तो उन का कैरियर चौपट हो जाएगा, फिर भी वे ऐसी दवाओं का सेवन करते हैं. अगर खेल को डोपिंग मुक्त करना है तो इस के लिए खिलाडि़यों को ही आगे आना होगा क्योंकि वे अगर ऐसी दवाओं का सेवन ही नहीं करेंगे तो शायद ही कोई मामला सामने आए. कृत्रिम ताकत के सहारे पदक जीत लेना कोई खिलाड़ी नहीं कहलाएगा.

अनइंडियन ब्रेट ली

क्रिकेट का फिल्मों से कोई आज का नाता नहीं है. क्रिकेट खिलाडि़यों की जिंदगी में जहां ढेरों फिल्में बन चुकी हैं और आज भी बन रही हैं, वहीं कई खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिन्होंने क्रिकेट की पिच से सीधे फिल्मी परदे पर एंट्री मारी है. सलिल अंकोला से ले कर विनोद कांबली, अजय जडेजा जैसे नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं. अब आस्ट्रेलिया के पूर्व तेज गेंदबाज ब्रेट ली अपनी आगामी रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘अनइंडियन’ से बौलीवुड स्टाइल में रोमांस करते नजर आएंगे. अनुपम शर्मा द्वारा निर्देशित ‘अनइंडियन’ भारत में 19 अगस्त को रिलीज होगी. फिल्म में ब्रेट ली के साथ तनिष्ठा चटर्जी और निकोलस ब्राउन जैसे सितारे हैं.

गुड बनाम पुअर ऐक्टर

इस बात का कोई पैमाना नहीं है जो पता कर सके कि अच्छा और बुरा ऐक्टर कौन होता है. एक ही ऐक्टर एक फिल्म में अच्छा अभिनय करता नजर आता है और वही ऐक्टर जब किसी खराब फिल्म में काम करते दिखता है तो लगता है कि इस से बुरा कोई अभिनेता हो ही नहीं सकता. अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने सुपरस्टार राजेश खन्ना को बहुत पुअर ऐक्टर बता डाला.

वैसे नसीर बेशक अच्छे अभिनेता हैं, लेकिन राजेश खन्ना न सिर्फ अच्छे अभिनेता थे बल्कि उन की जैसी मास अपील और स्टारडम नसीर को कभी नसीब नहीं हुई. वरना जिस तरह राजेश खन्ना ने कुछ बुरी फिल्मों में काम किया है तो नसीर ने भी कई फिल्मों में औसत से भी ज्यादा बुरा अभिनय किया है. तो क्या नसीर भी पुअर ऐक्टर हो गए?

अब दलित आंदोलन

गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन अभी सुलझा नहीं, कि दलितों का आंदोलन शुरू हो गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृहराज्य जाति के झगड़ों में बुरी तरह फंस गया है और नहीं लगता, कि मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इसे सुलझा पाएंगे. दलितों का आंदोलन विशुद्ध धार्मिक है. हुआ यह कि गोसेवकों का लबादा ओढ़े ऊंची जातियों के कुछ लोगों ने 4 दलितों को नंगा कर बुरी तरह मारा कि उन्होंने गाय का चमड़ा क्यों छीला. अब राज्यभर के दलित सड़कों पर उतर आए हैं. पाटीदारों की तरह उन्होंने भी कट्टरपंथियों के खिलाफ मोरचा खोल दिया है. जेल से छूटे हार्दिक पटेल ने दलितों का साथ देना शुरू कर दिया है.

गुजरात के अमरेली, गीर सोमनाथ, जूनागढ़, पोरबंदर और राजकोट इलाकों में भारी भीड़ ने आगजनी की. असल में गुजरात की शांति के नीचे जातीय अनबन सालों से सुलग रही थी. गुजरात की विशेषता यह रही कि वहां गैर सवर्ण समाज में से पिछड़ों को 100-150 सालों से पढ़ाईलिखाई के अवसर भी मिले और उन्हें व्यापारों में भी उतरने का अवसर मिला. मुसलिम राजाओं ने वहां जातिगत भेद का लाभ नहीं उठाया जिस के कारण पिछड़ी जातियां दमदार और पैसे वाली हो गईं और वे सवर्णों के मुकाबले ही नहीं, उन के साथ आ खड़ी हुईं. ये पिछड़ी जातियों के गुजराती ही थे जो दुनियाभर में व्यापार करने के लिए चले गए और आज अफ्रीका, अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका में ऐसे शहरी इलाके दिख जाएंगे जो राजकोट की गलियों जैसे लगेंगे. उन्होंने अपने अलग हिंदू मठ बना लिए और सवर्ण हिंदुओं से ज्यादा भव्य मंदिर बना डाले. लेकिन अब यह समाज धीरेधीरे सवर्णों से नाराज होने लगा है क्योंकि पढ़ाईलिखाई में यह सवर्णों का मुकाबला नहीं कर पा रहा और पैसा होने के बावजूद, इसे बराबर का नहीं समझा जा रहा.

जो समाज संपन्न पिछड़ों को अपने में न मिला सके वह दलितों और आदिवासियों को कैसे मिलाएगा? हार्दिक पटेल ने लाखों की भीड़ जमा कर जमीनी खाई से परदा उठा दिया है जो आर्थिक विकास की घास के नीचे दबी थी. गोहत्या का नाम ले कर कुछ दबंगों ने दलितों, पिछड़ों व सवर्णों के बीच पहले से ही मौजूद गहरी खाई को और ज्यादा गहरी कर दिया. जरूरत यह थी कि भारतीय जनता पार्टी धर्मसुधार का बीड़ा उठाती और सदियों के जाति के दलदल व जहरीली झाडि़यों को सफा करती. ऐसा अवसर कभीकभार मिलता है. देश की 90 प्रतिशत जनता भारतीय जनता पार्टी के टोकन प्रयास को भी सिरआंखों पर लेती. अपने गुजरात में ही इस प्रयोग को न कर के नरेंद्र मोदीऔर अमित शाह ने वही गलती की है जो मोहनदास करमचंद गांधी के बाद कांग्रेस ने की. देश में आर्थिक सुधारों व सामाजिक सुधारों दोनों की आवश्यकता है. गुजरात का पहले पाटीदार आंदोलन और फिर दलित आंदोलन यह साफ कर रहा है कि नेताओं में दूरदर्शिता का अभाव है.

दलित विद्रोह अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों से फिसलता नजर आ रहा है. ब्राह्मणों व ऊंचे सवर्णों के धुआंधार प्रचार व जमीनी मेहनत से भारतीय जनता पार्टी ने सफलता से पिछड़े व लगभग अछूत पिछड़ों और दलितों को मंदिर की राजनीति का वास्ता दे कर अपने साथ ले लिया था पर वह अपने कट्टर, कर्मठ और दिखने वाले नेताओं की मानसिकता को बदल नहीं पाई थी. सवर्णों ने ही नहीं, पैसे वाले सफल होते पिछड़ों ने भी दलितों को मुसलमान की तरह का सा मान कर यह समझ लिया था कि देश पर ये सामाजिक बोझ हैं और उन से जैसी मरजी व्यवहार किया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश में दयाशंकर सिंह ने मायावती के बारे में जो बोला वह घरों, गली, महल्लों में रोज बोला जाता है और दलित इन शब्दों को सुन कर भी चुप रह जाते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व का नाम तो लिया पर सनातन हिंदू धर्म को भी छाती से चिपकाए रखा. यदि वह अपनेआप दलितों और औरतों को धार्मिक पाखंडों में बराबरी के साथ शामिल कर लेती तो उन की आय बढ़ती और उन की स्वीकार्यता भी.

उस की जगह उस ने वर्णव्यवस्था की देन यानी सैंकड़ों सालों की घृणा के तहत दलितों और पिछड़ों को दास बनाए रखने के साथ बेमतलब के देवीदेवताओं को उन्हें दे कर खुश करना चाहा. एक पीढ़ी तो मान गई कि उन्हें शायद बराबर की जगह मिल जाए पर आज की युवा दलित पीढ़ी व पिछड़ों की युवा पीढ़ी मानने को तैयार नहीं कि वे सवर्णों के अधीन उसी तरह काम करेंगी जैसा पुराणों में वर्णित है. भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान नेता आज भी वही सुन रहे हैं जो सदियों  पहले सुनाया जाता था. यहां भी हालात इसलामिक स्टेट के जिहादियों और पोपीय चर्च से अलग नहीं हैं जो बारबार 1,400 या 2,000 साल पुराने रीतिरिवाजों को थोपने की कोशिश कर रहे हैं 500 सालों में जो तरक्की हुई है, चाहे उस में नए हथियारों के कारण करोड़ों मारे गए, वह धर्मविद्रोह के कारण हुई है. आज देश में चाहे कश्मीर हो, गुजरात हो या लखनऊ हो, आवश्यकता धर्मविद्रोह की है. जब तक धर्म का डंका पीटोगे, ये समस्याएं देश के विकास को रोकेंगी, देश को असमंजस में डालेंगी.

भारतीय जनता पार्टी कुछ न करे तो भी यह उफान ठंडा हो जाएगा क्योंकि हरेक को अपनी रोजीरोटी की फिक्र है. पर यह उफान शरीर पर कुछ फफोले छोड़ जाएगा. उन का दर्द काफी दिनों तक याद रहेगा.

जीवन की मुसकान

मैं और मेरी बेटी सोलन से ऊना तक का सफर बस से कर रही थीं. सोलन से लगभग आधा घंटे का सफर हो चुका था. अचानक हमारे आगे की सीट पर बैठे एक यात्री ने अजीब सी आवाज करनी शुरू कर दी. ऐसा लग रहा था कि उस को सांस लेने में दिक्कत हो रही है. मेरी बेटी, जो दंत चिकित्सक है, ने एकदम उसे अपनी पानी की बोतल से पानी पिलाने की कोशिश की.

उस व्यक्ति की हालत ज्यादा खराब लग रही थी. तभी बेटी ने बस रोकने को कहा. सब ने उस का समर्थन किया. बस रोक दी गई. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. तभी बेटी ने मेरे फोन से अपने भाई को फोन किया, जो डाक्टर है. उस ने 108 नंबर पर फोन करने का सुझाव दिया.

बेटी ने फोन कर दिया. स्थान बताने पर 108 नंबर गाड़ी 15-20 मिनट में आ गई. वह यात्री अकेला था और उस की गंभीर हालत देख कर उसे वे लोग गाड़ी में ले गए.

हम लोग यह बात लगभग भूल चुके थे. अचानक 3-4 महीने बाद मेरे फोन पर कौल आई. उन्होंने उस यात्री का नाम ले कर पूछा कि अब वे कैसे हैं? मैं ने बताया कि हमें तो उन का नामपता कुछ मालूम नहीं. वे तो केवल हमारे सहयात्री थे. तभी उधर से आवाज आई कि आप ने एक अनजान व्यक्ति का बहुमूल्य जीवन बचाया है, उस के लिए आप को धन्यवाद देते हैं. उस दिन अगर कुछ और देर हो जाती तो शायद उसे हम न बचा पाते.

उस समय जो खुशी मैं ने अनुभव की उस का मैं वर्णन नहीं कर सकती. अब जब भी कभी उधर से गुजरती हूं तो अपनेआप चेहरे पर मुसकान आ जाती है. जो खुशी किसी को बचाने में है, वह किसी को तकलीफ देने में कहां.

शशी कला, ऊना (हि.प्र.)

*

मैं नववर्ष के उपलक्ष्य में अपने पति व बेटी सहित वियतनाम गई. वहां एक रेस्तरां में कुछ खाने के लिए गए. बिल चुकाने का समय आया. हमारे पास पूरा बिल चुकाने के लिए वियतनामी मुद्रा नहीं थी. हम अमेरिकी डौलर में बिल चुकाना चाह रहे थे पर रेस्तरां के मालिक को समझ नहीं आ रहा था कि वह कितने डौलर ले. हमारी दुविधा देख कर वहां खाना खा रहे एक वियतनामी दंपती ने हमारा बिल चुका दिया और पैसे लेने से साफ इनकार कर दिया.

परदेस में एक अजनबी की निस्वार्थ सहायता ने हमें यह सोचने को मजबूर कर दिया कि इंसानियत, प्रेम, अपनत्व को किसी भी देश की सीमा में कैद नहीं किया जा सकता. जीवन में शायद फिर कभी उन भले लोगों से मुलाकात हो, पर हमारे दिल में उन के चेहरे हमेशा बसे रहेंगे.

साधना सूद, धनबाद (झारखंड)

इन्हें भी आजमाइए

– गर्भावस्था के दौरान पानी पीने को ले कर सावधानी बरतनी होती है. मगर रोजरोज और अधिक पानी पीना बोरिंग हो जाता है, इसलिए अपने मनपसंद जूस की आइस क्यूब जमा लीजिए और उस को आइसक्रीम की तरह चाटती रहिए.

– सैल्फ ग्रूमिंग जरूरी है. आप की इमेज अच्छी है मगर बाहर से आप की पर्सनैलिटी प्रभावशाली नहीं है, तो भी लोग आप को इतना वैलकम नहीं करेंगे. इसलिए बालों को संवारें, ऐक्सरसाइज कर के फिट रहें, साफ कपड़े पहनें और अपने को स्मार्ट लुक दें.

– 40 के बाद भी जवान दिखना चाहते हैं तो जितना हो सके उतना पानी पिएं क्योंकि पानी पीने से चेहरा हमेशा हाइड्रेट बना रहेगा. आप चाहें तो ग्रीन टी को नियमित पी सकते हैं.

– दालचीनी पाउडर के साथ 2 चम्मच औलिव औयल या फिर पैट्रोलियम जैली मिला कर चेहरे पर लगाएं, इस से चेहरे की महीन रेखाएं बिलकुल साफ हो जाएंगी.

– बालों के कलर को अधिक समय तक बनाए रखना चाहते हैं तो बाल गरम पानी से न धोएं. इस से बालों का कलर जल्दी निकल जाता है.

– दांतदर्द के लिए हींग के पाउडर को थोड़े से नारियल के तेल या सरसों के तेल में मिला कर दांतों और मसूढ़ों पर मालिश करें, दर्द से राहत मिलेगी.

VIDEO: इस राखी पर तो शर्म करो मनचलों, तुम्हारे घर में भी बहनें हैं..

राखी पर जहां भाई बहन इस त्योहार को मनाने के लिए खुशी में सराबोर हैं, वहीं एक बार ये वीडियो जरूर देखिए. इस लड़की को कुछ लड़कों ने छेड़ा…फिर जो हुआ वो हम सभी के लिए एक सबक है. उन सभी के लिए सबक है, जो सड़क पर छींटाकशी करते हैं.

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें

बरसात हो गई

तनहाई में मिलनामिलाना

अजब सी बात हो गई

हम को पता न चला

दिन कब रात हो गई

इक चेहरा तेरा उस पर

गजब की कशिश

आंखों की आंखों से

होंठों की होंठों से बात हो गई

हुई जब से मुहब्बत खुद पर

नाज करते हैं हम

ऐसा लगता है जैसे बांहों में

कायनात हो गई

तेरे रूप के उजाले से

दिन निकलता है अंगड़ाई के साथ

गेसुओं को इस तरह झटका तुम ने

कि रात हो गई

मेरी आरजू को इस तरह

गुदगुदाया है तुम ने

अरमान जाग उठे दिल में

रिमझिम बरसात हो गई.

       – वीना कपू

VIDEO: इस राखी पर तो शर्म करो मनचलों, तुम्हारे घर में भी बहनें हैं

हमारे देश में जितनी मुश्किलों और तकलीफों का सामना महिलाओं को करना पड़ता है, उतना शायद ही किसी और को करना पड़ता होगा. हर कदम पर कठिनाईयों और हर मोड़ पे चुनौतियां तैयार रहती हैं इनका इम्तिहान लेने के लिए. हमारे समाज में जहाँ लड़कियों के लिए समस्याओं का अम्बार लगा है, उन्ही समस्याओं में से एक है ईव टीजिंग यानि छेड़खानी.

ये वो समस्या या यूं कहे कि लड़कियों के लिए वो अभिशाप है, जिससे लड़कियों को तकरीबन रोज़ ही दो-चार होना पड़ता है. शायद ही कोई ऐसी लड़की या महिला होगी जिसे इस शर्मिंदगी से न गुजरना पड़ा हो. हमारे देश और समाज में ऐसे मनचलों की कोई कमी नहीं है जो लड़कियों को अपनी निजी संपत्ति समझते हैं. स्कूल-कालेज या सिनेमा के जब छूटने का समय होता है, तब देखिये कि शोहदों का कैसा जमावड़ा लगता है बाहर. लड़कियों को तो ऐसे घूरते हैं कि जैसे वो इनके बाप की जागीर हैं, अश्लील कमेन्ट पास करना, सीटी मारना, आंख मारना, लड़कियों का पीछा करना, उनका रास्ता रोकना जैसे दुष्कर्मों का तो जैसे इन शोहदों को लाइसेन्स मिला हुआ है और वो भी माँ-बाप ने दे रखा है कि जाओ….छेड़ो लड़कियों को…..कोई तुम्हे रोकने-टोकने वाला नहीं है.

जितनी बेखौफी से ये लोग लड़कियों को छेड़ते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि घरवालों ने नहीं बल्कि सरकार ने ही इन्हें इजाज़त दे रखी है. महिलाओं के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला यह शर्मनाक बर्ताव कभी-कभी इतना भयानक होता है कि इससे तंग आकर लड़कियां खुदखुशी तक कर लेती हैं. उन्हें इस कठोर निर्णय तक पहुँचाने के लिए कौन जिम्मेदार है?

कोई यह नहीं देखता या सोचता कि लड़की ने ऐसा क्यों किया होगा? उल्टा उस पर ही आक्षेप लगा देतें हैं कि लड़की का ही चाल-चलन ठीक नहीं होगा, तभी उसने ऐसा किया लेकिन सच्चाई जानने की तो कोई कोशिश भी नहीं करता. और कोई करे भी तो क्यों? इस समाज के ठेकेदार ही हैं…मर्द….अपने को मर्द तो बड़ी शान से कहतें हैं पर कर्म तो चूहों जैसा करतें हैं. अब आप ही बताइए कि किसी भी लड़की को छेड़ के बाइक या साईकिल पर भाग जाना कहाँ की मर्दानगी है. अगर वास्तव में मर्द के बच्चे हो तो वही रुक कर दिखाओ. किसी को अश्लील बात कहकर भाग जाने से बड़ा बुजदिली का काम कोई नहीं है.

लड़कियों के साथ छेड़खानी बहुत ही आम बात हो गई है. पुलिस और प्रशासन चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन इस समस्या से छुटकारा मिलना तो दूर की बात है, ये समस्या कम तक नहीं हुई है. महिला पुलिस को सादे कपड़ों में स्कूल-कालेज और सिनेमाओं के बाहर तैनात करके तथा ऑपरेशन दीदी भी चला कर देख लिया पर नतीजा सिफर ही निकला. अब इस मुसीबत से कैसे निपटा जाए या इन मनचलों को कैसे सबक सिखाया जाए. इस का एक ही हल दिखाई देता है कि हर लड़की अपनी सुरक्षा खुद करे और अपनी पुलिस खुद बने. अपने को शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से मजबूत बनाये और जब कोई मनचला उसे छेड़ने कि जुर्रत करे तो चुप-चाप सहने की बजाय उसका मुंहतोड़ जवाब दे. अभी तक ये शोहदे यही समझतें हैं कि इन लड़किओं के बसकी कुछ नहीं है, ये तुम्हारी हर बदतमीजी बिना कोई विरोध किए सहती रहेंगी क्योकि लड़कियां इनकी प्राइवेट प्रोपर्टी हैं.

लेकिन अब इन्हें भी यह याद दिलाना जरूरी है कि इनके घरों में भी माँ-बहने हैं और किसी दूसरे की बहन -बेटियों को छेड़ने से पहले दस बार सोचो. लड़कियां न तो शारीरिक रूप से कमजोर हैं और न ही मानसिक रूप से ये बात इन मनचलों को समझानी होगी….ऐसे नहीं तो वैसे…..बस चुप रहने की बजाय उसका सामना करना होगा….क्योंकि ये महिलाओं के सम्मान की लड़ाई है और अपने सम्मान की रक्षा करने का सबको अधिकार है. जो महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाएगा उसे उसका परिणाम भी भुगतना होगा.

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