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प्यार में सैक्स जरूरी नहीं: कृति खरबंदा

कन्नड़ और तेलुगू फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली पंजाबी गर्ल कृति खरबंदा फिल्म ‘राज रिबूट’ में मुख्य भूमिका निभा रही हैं. 3 साल की उम्र में उन्होंने मौडलिंग शुरू की थी. धीरेधीरे यही शौक उन्हें फिल्मों की ओर ले आया. कृति पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्मों में आईं, क्योंकि उन के मातापिता चाहते थे कि वे अपनी शिक्षा पूरी करें. वे बेंगलुरु की सब से काबिल वुमन और देश की हौटैस्ट नायिका मानी जाती हैं. यह फिल्म उन की डेब्यू है. कृति से बात करना रोचक था, क्योंकि वे हर बात का जवाब बेझिझक देती हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

फिल्मों में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

वैसे तो मैं दिल्ली की हूं पर मेरा पालनपोषण बेंगलुरु में हुआ. बचपन से ही हिंदी फिल्में देखने का शौक था. अंगरेजी फिल्में मैं पसंद नहीं करती थी. 14 साल की उम्र में मेरी सहेलियां मुझे ‘ड्रामा क्वीन’ कह कर पुकारती थीं. उन का कहना था कि तुझे तो फिल्मों में होना चाहिए. मौडलिंग तो मैं करती थी, लेकिन तब मैं ने सोचा नहीं था कि फिल्में करूंगी. मैं ने 3 साल की उम्र से मौडलिंग शुरू की थी. विज्ञापन अधिक करती थी. रैंप पर चलने का शौक तो था पर मेरी हाइट कम है इसलिए हो नहीं पाया. इस के बाद मुझे ‘मिस इंडिया’ बनने का शौक चढ़ा, क्योंकि मुझे ‘क्राउन’ पहनने की इच्छा थी. फिर मैं ने स्कूल के कई कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया. मैं ने राजस्थानी फोक डांस सीखा. सालसा की ट्रेनिंग ली, ये सारी चीजें मैं ने शौकशौक में सीखीं. ऐक्ट्रैस बनूंगी ऐसा कभी नहीं सोचा था.

जब मैं 15 साल की थी तब मुझे एक कन्नड़ मूवी का औफर मिला जो एक बहुत बड़े स्टार के साथ थी. मां ने मना कर दिया था. उस समय उन्होंने 50 हजार रुपए का औफर दिया था जो मेरे लिए बड़ी बात थी. इतने सपने देख लिए थे कि लगा, पूरी दुनिया खरीद लूंगी. लेकिन मां के मना करने पर मैं ने काम नहीं किया. इस के बाद 17 साल की उम्र में फिर औफर आया जो तेलुगू फिल्म ‘बोनी’ से था.

पहले तो मुझे मजाक लगा और लगा कि मेरे परिवार वाले मना करेंगे, लेकिन इस बार तो मां ही नहीं दादी ने भी मुझे बड़े परदे पर देखने की इच्छा जताई. मैं हैरान रह गई और मुझे वह फिल्म मिली. मैं ने इस फिल्म में अभिनय किया और फिर 2-3 साल बे्रक ले कर अपनी पढ़ाई पूरी की. इस के अलावा मैं ने ज्वैलरी डिजाइनर का डिप्लोमा कोर्स व फैशन डिजाइनिंग का औनलाइन कोर्स किया. मुझे क्रिएटिव फील्ड में जाने की बहुत इच्छा थी. साउथ की करीब 13 फिल्मों में मैं ने काम किया है.

‘राज रिबूट’ फिल्म के बारे में बताएं?

मैं एक विज्ञापन के लिए मुंबई में शूटिंग कर रही थी. तभी मुझे इस फिल्म का औफर मिला. इस फिल्म में मुझे सोलो काम करने का मौका मिला है.

फिल्म में अंतरंग दृश्य करने में कितना सहज हो पाती हैं?

इस फिल्म में वैसा कोई दृश्य नहीं है. केवल 2 किस सीन्स इमरान और गौरव अरोड़ा के साथ हैं. लव मेकिंग सीन्स नहीं हैं. किसी भी फिल्म में मैं इंटीमेट सीन्स नहीं कर सकती. मैं ने कई फिल्मों को इसलिए मना कर दिया, क्योंकि उन में बिकिनी पहननी थी. मैं ऐसे सीन्स में कंफर्टेबल नहीं हूं. मेरी फिगर भी ऐसी नहीं है कि मैं बिकिनी पहनूं. मेरे हिसाब से ऐसा पहनावा उन्हें ही अच्छा लगता है जिन की बौडी और पर्सनैलिटी दोनों ही उन का साथ दें. मैं कोई भी ऐसी ड्रैस नहीं पहनती जो मुझे सूट न करे.

इमरान हाशमी और गौरव अरोड़ा के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

साउथ और यहां का फिल्मी पैटर्न काफी अलग है. मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी ताकि मेरे कोस्टार को बारबार रीटेक न देना पड़े. मुझे अपना चरित्र निभाना काफी कठिन लग रहा था, क्योंकि यह मेरी उम्र के हिसाब से ‘मैच्योर’ था. मैं ने किसी को फौलो नहीं किया. निर्देशक की सुनी. गौरव अरोड़ा के साथ अभिनय करने का अनुभव बहुत अच्छा था. वे कोई भी दृश्य बड़ी सहजता से कर लेते हैं. इस से मुझे भी किरदार निभाने में आसानी हुई.

आप किस में अधिक विश्वास रखती हैं रिलेशनशिप में या शादी में?

मेरा शुरू से ही शादी में विश्वास रहा. शादी का अपना अलग महत्त्व है. मैं प्यार करना जानती हूं और खुद भी वैसी ही आशा रखती हूं. मेरे हिसाब से मेरा पार्टनर ईमानदार हो, मेरे परिवार की भी केयर करे.

क्या प्यार में सैक्स जरूरी है?

कभी भी नहीं, शारीरिक अनुकूलता एक समय के बाद खत्म हो सकती है, कम हो सकती है, लेकिन प्यार और दोस्ती हमेशा कायम रहती है. इसलिए जरूरी नहीं प्यार में सैक्स हो.

खाली समय में क्या करती हैं?

मैं 25 दिन तक शूट करती हूं. इस के बाद जो समय बचता है उस दौरान मैं घर में रहती हूं. कुकिंग का मुझे बहुत शौक है. मैं खाली समय में कुकिंग भी करती हूं.

कितनी फैशनेबल हैं और कितना मेकअप करना पसंद करती हैं?

घर पर मैं सिंपल रहती हूं. बाहर निकलने पर अच्छी ड्रैस पहनती हूं. मेकअप अधिक पसंद नहीं, पर अभिनय के हिसाब से करना पड़ता है.

किस बात से गुस्सा आता है?

छोटीछोटी बातों पर गुस्सा आ जाता है. मेरे साथ या मेरे सामने अगर कोई गलत बात करे, तो मुझ से सहन नहीं होता.

कोई ऐसी फिल्म, जिसे आप ने बारबार देखा हो?

‘सोचा न था’ और ‘रहना है तेरे दिल में’ फिल्में कई बार देखी हैं. इस के अलावा मुझे हर तरह की फिल्में देखना और उन में अभिनय करना पसंद है.              

भाषा उड़ान की

सन 1966 की एक सुबह कोलकाता के प्रसिद्ध सेंट जेवियर्स कालेज के प्रिंसिपल के कक्ष के बाहर खड़े 16 वर्षीय, दुबलेपतले किशोर ने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी और सहमते हुए अंदर आने की अनुमति मांगी. प्रिंसिपल ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर अंदर आने को कहा. सकुचाते हुए लड़के ने बताया कि वह यहां बीकौम में ऐडमिशन पाने की मंशा से आया था. वह धीरेधीरे, हिचकिचाते हुए अपनी बात कहे जा रहा था. वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि प्रिंसिपल ने उसे बीच में टोक कर कहा कि ऐडमिशन ज्यूरी पहले ही तुम्हें ऐडमिशन न देने का फैसला कर चुकी है. मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता.

लेकिन वह छात्र जानता था कि ज्यूरी ने उसे ऐडमिशन न देने का फैसला प्रिंसिपल के कहने पर ही लिया था. सेंट जेवियर्स कालेज देश के सब से प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में शुमार है. वहां अमूमन अमीर घरों के महंगे स्कूलों में पढ़ चुके, फर्राटेदार अंगरेजी बोलने वाले छात्रों को ही ऐडमिशन मिलता था. सादुलपुर, राजस्थान का रहने वाला यह छात्र कोलकाता के चितपुर इलाके में किराए के घर में रहता था. यह छात्र फर्राटेदार तो क्या हलकीफुलकी अंगरेजी भी नहीं बोल पाता था, क्योंकि पिछले 8 वर्ष से वह श्री दौलतराम नोपानी नामक स्कूल में हिंदी माध्यम से पढ़ाई कर रहा था. इसीलिए सेंट जेवियर्स कालेज का प्रिंसिपल उसे प्रवेश देने से कतरा रहा था.

उस के बाकी फ्रेंड्स को तो अन्य कालेजों में प्रवेश मिल चुका था, लेकिन उस पर तो सेंट जेवियर्स कालेज में दाखिला लेने की धुन सवार थी. प्रिंसिपल के दरवाजे पर दस्तक देने का यह क्रम अगले कई दिनों तक चलता रहा. आखिरकार प्रिंसिपल ने अन्य अध्यापकों से सलाहमशवरा किया और फिर बेमन से ही सही, उसे ऐडिमिशन दे दिया. उन्हें यकीन था कि यह लड़का परेशान हो कर खुद ही कालेज छोड़ देगा.

वह लड़का बेहद शर्मीला और अंतर्मुखी था. उसे अन्य छात्रों के साथ घुलनेमिलने में काफी दिक्कतें आईं. अंगरेजी ठीक से न बोल पाने के कारण एक समय वह हीनभावना से घिर गया था, लेकिन उस ने हार नहीं मानी. परीक्षा में जब उस ने अकाउंट्स और गणित में शतप्रतिशत अंकों के साथ प्रथम स्थान प्राप्त किया तो वही प्रिंसिपल, जो उस को ले कर शुरू में आशंकित थे, उस के मुरीद हो गए. और तो और, ग्रैजुएशन के तुरंत बाद उन्होंने उस लड़के को सेंट जेवियर्स कालेज में लैक्चरर की नौकरी देने का प्रस्ताव भी उस के सामने रखा लेकिन उस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. वह अपने पिता के कारोबार में उन का हाथ बंटाने लगा. साथ ही वह पढ़ाई भी करता रहा. वह दिन में काम करता और शाम को कोलकाता विश्वविद्यालय में फाइनैंस और मार्केटिंग की पढ़ाई करता. आज वही छात्र लक्ष्मी निवास मित्तल के नाम  से दुनियाभर में मशहूर है. जी हां, लंदन में रहने वाले पद्मविभूषण से सम्मानित लक्ष्मी निवास मित्तल दुनिया की सब से बड़ी इस्पात और खनन कंपनी आर्सेलर मित्तल के मालिक हैं और दुनिया के सब से धनी लोगों में गिने जाते हैं. उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और आज उसी हिम्मत के बलबूते पर इतनी ऊंचाई तक पहुंचे हैं.

जगमोहन मुंद्रा

नोपानी विद्यालय में मित्तल से 2 साल सीनियर थे जगमोहन मुंद्रा. एक पारंपरिक राजस्थानी परिवार में पलेबड़े मुंद्रा ने 9वीं तक की पढ़ाई हिंदी माध्यम से की थी. वे अंगरेजी बोलने वालों से जितना खौफ खाते थे, उतना ही उन का आदर भी करते थे. उस समय उन्हें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि यह शख्स आगे चल कर हिंदी के साथसाथ हौलीवुड में कई अंगरेजी फिल्मों का लेखन और निर्देशन भी करेगा. 2011 में 63 वर्ष की आयु में अपने जीवन के अंत तक वे फिल्मी दुनिया में काफी सक्रिय थे. मुंद्रा ने एक बार कहा था, ‘‘मैं हमेशा बड़े सपने देखा करता था. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मेरी शुरुआती शिक्षा हिंदी में होने की वजह से उन सपनों को वास्तविकता में बदलने की मेरी क्षमता किसी भी प्रकार से प्रभावित हुई हो.’’

मुंद्रा का यह विश्वास तब और पुख्ता हुआ जब उन्होंने प्रतिस्पर्धा का सामना कर आईआईटी मुंबई जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाया. उन्होंने एक भेंटवार्त्ता में कहा था, ‘‘मेरे विभाग में अलगअलग राज्यों से आए छात्र थे. उन में से एक छात्र बिहार से था जिस की अंगरेजी के नाम पर घिग्गी बंध जाती थी, लेकिन परीक्षा में उस ने अपनी प्रतिभा का ऐसा जौहर दिखाया कि अच्छे से अच्छे लोग भी उस का लोहा मान गए. आईआईटी के उन दिनों ने विनम्रता का एक बहुत अहम सबक मुझे सिखाया.’’

मुंद्रा ने आगे चल कर अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री ली और बाद में डौक्टरेट प्राप्त किया. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में 1 साल अध्यापन करने के बाद वे 1979 में पूरी तरह फिल्म निर्माण से जुड़ गए.

सुष्मिता सेन

9वीं कक्षा तक की पढ़ाई हिंदी माध्यम से करने वाली सुष्मिता सेन का नाम देश की सफल हस्तियों में शुमार है. सुष्मिता सेन ने 1994 में केवल 18 साल की उम्र में मिस यूनिवर्स का खिताब जीता था. स्पर्धा के निर्णायक प्रश्नोत्तर राउंड में उन्होंने अंगरेजी में मार्मिक जवाब दे कर निर्णायकों को स्तब्ध कर दिया. उन्हें मिस यूनिवर्स चुन लिया गया, जबकि 16 साल की उम्र तक  उन का अंगरेजी से दूरदूर तक कोई संबंध नहीं था, लेकिन फिर भी उन्होंने सफलता हासिल की. वे बताती हैं कि जब उन्हें अंगरेजी में बहुत खराब अंक मिले तो उन्होंने अपनी अंगरेजी भाषा पर कमांड अच्छी करने का मन बना लिया. यह काम काफी कठिनाइयों से भरा था और अपना आत्मविश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी था. इसलिए अंगरेजी सीखने में सुष्मिता ने दिनरात एक कर दिया. उस मेहनत का नतीजा आज दुनिया के सामने है. सुष्मिता न केवल पत्रकारिता में डिग्री हासिल कर चुकी हैं बल्कि वे अंगरेजी में कविताएं भी लिखती हैं.

उदय प्रकाश अरोड़ा

उत्तर प्रदेश के बस्ती, मुरादाबाद तथा सीतापुर के हिंदी माध्यम स्कूलों में पढ़े उदय प्रकाश अरोड़ा आज ग्रीको भारतीय इतिहास के शीर्ष विद्वानों में जाने जाते हैं. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नाकोत्तर डिग्रियां प्राप्त कीं और कई किताबें लिखीं, जिन का संदर्भ ग्रंथों (रेफरेंस बुक्स)  के तौर पर आज भी व्यापक उपयोग हो रहा है.

अशोक वाजपेयी

प्रसिद्ध कवि तथा समीक्षक अशोक वाजपेयी ने हिंदी माध्यम से पढ़ाई कर के न सिर्फ साहित्य की दुनिया में बड़ा नाम कमाया, बल्कि एक सफल आईएएस अधिकारी के अपने 26 वर्ष के कार्यकाल में कई नामचीन साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थानों की नींव भी रखी. हिंदी में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद सागर, मध्य प्रदेश में पलेपढ़े अशोक वाजपेयी ने काफी परिश्रम से अंगरेजी भी सीखी. वे बताते हैं कि उन का विश्व साहित्य से परिचय अंगरेजी अनुवादों के माध्यम से ही हुआ. इसी कारण वे सदा अंगरेजी के ऋणी रहेंगे. वाजपेयी ने आगे चल कर दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफन कालेज से एमए किया और कुछ साल अध्यापन भी किया. उन के शब्दों में, ‘‘मैं अंगरेजी नहीं बोल पाता था लेकिन मैं ने रेनू मारिया रिल्का और कई अन्य प्रमुख कवियों को अनुवादों के जरिए पढ़ा था.’’

अंगरेजी का अपना लहजा ठीक करने के लिए भी उन्होंने काफी मेहनत की. वे कभी विदेश में नहीं पढ़े. पहली बार भारत से बाहर ही 32 वर्ष की आयु में गए, लेकिन उन के अंगरेजी उच्चारण में कैंब्रिज अंगरेजी का पुट झलकता है.

सत्य नारायण बंसल

जयपुर से 80 किलोमीटर दूर एक गांव में जन्मे और हिंदी में शिक्षा प्राप्त करने वाले सत्य नारायण बंसल आज बार्कलेज वैल्थ मैनेजमैंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं. उन के गांव के स्कूल की इमारत नहीं थी. वहां 5वीं तक की ही शिक्षा उपलब्ध थी. अगली कक्षाओं की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव पैदल जाना पड़ता था. शिक्षक अकसर गायब रहते थे, इसलिए विद्यार्थियों को खुद ही पढ़ाई करनी पड़ती थी. जीवन का सब से बड़ा सपना यही होता था कि किसी बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल जाए, पर सत्य नारायण बंसल अपने सपनों को बंधक बनाने वालों में से नहीं थे. बहुत जद्दोजेहद के बाद उन्होंने सीए की पढ़ाई पूरी की और बैंकिंग के क्षेत्र में कैरियर बनाया. वे कहते हैं, ‘‘चुनौती से बेहतर शिक्षा हो ही नहीं सकती.’’

पवन कुमार गोयनका

महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के कार्यकारी निदेशक डा. पवन कुमार गोयनका ने भी चुनौतियों को अवसरों में बदलने में एक मिसाल कायम की है. मध्य प्रदेश के एक मध्यवर्गीय राजस्थानी परिवार में जन्मे गोयनका की स्कूली शिक्षा कोलकाता के एक हिंदी माध्यम विद्यालय में हुई. वे अंगरेजी में बेहद कमजोर थे लेकिन वह उन की प्रगति को बाधित नहीं कर सकी. उन्होंने आईआईटी कानपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में गैजुएशन करने के पश्चात अमेरिका के कौर्नेल विश्वविद्यालय से मास्टर्स और डौक्टरेट की डिग्री अर्जित की और डेट्रौइट में जनरल मोटर्स से अपना कैरियर आरंभ किया. वे बताते हैं कि आरंभ में उन की अंगरेजी इतनी खराब थी कि जनरल मोटर्स को उन्हें 14 हफ्ते की संवाद कौशल प्रशिक्षण की ट्रैनिंग के लिए भेजना पड़ा था. 1993 में वे महिंद्रा ऐंड महिंद्रा से जुड़े और सफलता के शिखर पर पहुंचे.

जगदीप डांगी

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाले जगदीप डांगी की कहानी भी कम प्रेरणाप्रद नहीं है. हिंदी में शिक्षा प्राप्त करने वाले डांगी को हिंदी ब्राउजर विकसित करने का श्रेय जाता है. काफी कम उम्र में पोलियो ने उन का एक पांव और एक आंख लील ली थी. किंतु अपनी शारीरिक कमजोरी को उन्होंने अपने संकल्प की राह में नहीं आने दिया. एक अत्यंत साधारण किसान परिवार से आने वाले डांगी ने अथक परिश्रम से कंप्यूटर साइंस में ग्रैजुएशन की और अगले 4 साल भाषा सेतु नामक प्रकल्प के जरिए अंगरेजी जानने वालों के लिए इंटरनैट की चमत्कारी दुनिया के दरवाजे खोलने की कोशिश में दिनरात एक कर दिया. हिंदी ब्राउजर के साथसाथ शब्दकोश व अनुवादक जैसे सौफ्टवेयर भी तैयार किए. वे कहते हैं, ‘‘मैं ने जब कालेज जाना शुरू किया, तो मुझे न तो प्राध्यापकों की बताई चीजें समझ आती थीं, न ही मैं अपने सहपाठियों से बात कर सकता था. यहीं से मेरे जेहन में हिंदी सौफ्टवेयर की कल्पना जागी. मैं ने देखा कि अधिकांश लोगों की समस्या प्रौद्योगिकी नहीं, बल्कि उसे उन की पहुंच से दूर ले जाने वाली भाषा है. मैं ने किताबें और पत्रिकाएं पढ़ीं और इंटरनैट की मदद से प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज का अध्ययन किया. प्रादेशिक भाषाओं में कंप्यूटिंग से ही इंटरनैट क्रांति को सर्व समावेशी बनाया जा सकता है.’’

आनंद कुमार

पटना निवासी आनंद कुमार की कहानी विख्यात है. कुमार के साधारण परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे उन्हें महंगे स्कूलों में पढ़ा पाते. कुमार ने एक हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ाई की. बाद में उन के भीतर गणित की ऐसी दिलचस्पी जागी कि वे अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और जर्नलों में लेख और शोधपत्र भेजने लगे. आगे उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय से एक कोर्स के लिए सम्मति प्राप्त हुई, लेकिन एक बार फिर घरेलू दिक्कतों के कारण वे उस अवसर से वंचित रह गए. तब उन्होंने रामानुज स्कूल औफ मैथेमैटिक्स की शुरुआत की, उन गरीब लेकिन गुणी विद्यार्थियों के लिए जिन के पंख हालात ने काट दिए थे. अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार के विजेता आनंद कुमार पिछले एक दशक से भी अधिक समय से हर साल 30 विद्यार्थियों को आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं के लिए प्रशिक्षण और इस तरह अपना भविष्य बनाने, संवारने का मौका देते आ रहे हैं.

कहानी टौपर्स की

जुलाई, 2015 में घोषित चार्टर्ड अकाउंटैंसी की परीक्षा के परिणामों में 75.75त्न अंकों के साथ पूरे देश के 42,847 परीक्षार्थियों में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली दिल्ली की 25 वर्षीय शैली चौधरी भी हिंदी माध्यम स्कूल से ही पढ़ी हैं. दिसंबर, 2013 में आयोजित कंपनी सैक्रेटरी परीक्षा में अपने पहले प्रयास में ही न केवल उत्तीर्ण होने वाली, बल्कि पूरे देश में प्रथम आने वाली अंबिकापुर, छत्तीसगढ़ निवासी श्रुति गोयल भी बारियों ग्राम की एक हिंदी माध्यम स्कूल की ही उपज हैं.

महेशलता, दक्षिण चौबीस परगना के एक पटसन कामगार के बेटे जफर अली ने कोलकाता के खिद्दरपोर के हिंदी माध्यम स्कूल से पढ़ाई की, न केवल हाजरा लौ कालेज से कानून में ग्रैजुएशन कर सफलतापूर्वक पूरी की बल्कि 2014 की न्यायिक सेवा परीक्षा में पश्चिम बंगाल में 45वां स्थान भी प्राप्त किया.

आज के इस युग में भाषा एक साधन भी है और एक शस्त्र भी. सफलता के ऐसे उदाहरणों को देख कर कहना होगा कि हमारी विकास यात्रा में भाषा कोई बेड़ी नहीं, मात्र एक सहज पड़ाव है.                                             

रियो ओलिंपिक: खोखलेपन पर इतराता देश

सिंधु, साक्षी, दीपा, पदक के भूखे भारत को ये 3 खिलाड़ी मिल गई हैं, लेकिन इन के त्याग, समर्पण और दमखम का अंदाजा न तो भारत की सरकार व जनता को है और न ही कौरपोरेट घरानों को. हम सब की समझ खेलों को ले कर उथली है. तभी तो सब शोभा न देने वाले बयानों के साक्षी बनते हैं या तो कड़ी आलोचना करते हैं या फिर मक्खी की तरह उन की कामयाबी पर भिनभिनाने लगते हैं.

बेशक इन तीनों के साथसाथ ललिता बाबर, जोकि 3 हजार मीटर बाधा दौड़ फाइनलिस्ट है, ने भी कमाल किया है, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि हम खेलों के लिहाज से बेहद खराब चरित्र वाले देश से हैं. आज जो ब्रैंड जीतने वाले पर सबकुछ निछावर कर रहे हैं, उन्हीं ने एक साल पहले सिंधु का मजाक उड़ाया था. ओलिंपिक ऐथलीट ओ पी जैशा को 42 किलोमीटर की मैराथन के दौरान देश की तरफ से पानी तक मुहैया नहीं कराया गया. नतीजतन, वह रेस पूरी होते ही बेहोश हो गई और इधर, पटियाला में हैंडबौल की नैशनल प्लेयर पूजा को इसलिए खुदकुशी करनी पड़ी, क्योंकि माली तंगी के चलते उसे होस्टल की सहूलत नहीं मिल पाई.

पटियाला में नैशनल लैवल की हैंडबौल खिलाड़ी पूजा की खुदकुशी सरकार और समाज के लिए बेहद शर्म की बात है. इस से यह भी साफ हो जाता है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश रियो ओलिंपिक में एक स्वर्ण पदक भी क्यों नहीं जीत पाया. एक कांस्य और एक रजत पदक पर ही देश इतरा रहा है. जिस देश में नैशनल लैवल के एक खिलाड़ी को होस्टल की फीस नहीं भर पाने की वजह से खुदकुशी करनी पड़े वह देश ओलिंपिक जैसे विश्वस्तरीय मुकाबले में सम्मानजनक जगह कैसे हासिल कर सकता है?

बीए सैकंड ईयर की छात्रा और हैंडबौल खिलाड़ी पूजा को महज 3,720 रुपए जमा नहीं करवा पाने के कारण कोच ने होस्टल में कमरा देने से मना कर दिया. इस से पूजा इतनी हताशनिराश हुई कि उस ने खुदकुशी का रास्ता चुन लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खून से लिखा खत भी छोड़ गई.

हालांकि खुदकुशी करना किसी भी समस्या का हल नहीं है. कहा भी गया है कि जान है, तो जहान है. इस के बावजूद पूजा ने जो कदम उठाया, उस ने सरकार और समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया है. इस से साफ है कि ओलिंपिक में रजत और कांस्य पदक जीतने वाली महिला खिलाडि़यों पर करोड़ों रुपयों की बौछार करने वाली सरकारें खिलाडि़यों की आगे बढ़ने में मदद नहीं करतीं. खेल संघ और स्कूलकालेज भी खिलाडि़यों की मदद करने के बजाय उन्हें निराश करते ही नजर आते हैं और फिर सरकार में बैठे नुमाइंदे कहते फिरते हैं कि अभिभावक अपने बच्चों को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करते, जबकि सच तो यह है कि सरकार और खेल संघ जब तक खेल प्रतिभाओं को संभालने और संवारने की जिम्मेदारी नहीं लेंगे, तब तक उन का मनोबल नहीं बढ़ने वाला.

गौरतलब है कि भारत एक भावुकजज्बाती देश है, लेकिन लोगों की शुभकामनाओं के बलबूते पदक जीते जाते तो भारत ओलिंपिक में काफी आगे होता. लिहाजा, आज जो लोग, संगठन और सरकारें सिंधु, साक्षी और दीपा कर्माकर पर इनामों की बारिश कर रही हैं, उन्हें यह उदारता खेलों के लिए माहौल बनाने और उस की सही तैयारी में दिखानी चाहिए थी.

ओलिंपिक और भारत को ले कर फौरी बयानबाजी से आगे की बात करें तो ओलिंपिक में भारत के पिछड़ने की वजह भी साफ समझ में आ जाती है. आज हमारे प्रधानमंत्री देश के बाहर घूमघूम कर भले ही यह बात कहते हैं कि भारत आज जिस गति से तरक्की कर रहा है, उस से पूरी दुनिया की निगाहें हमारी तरफ हैं. लेकिन खेलों में हम पिछड़ रहे हैं.

खेल में क्यों पिछड़ा भारत

इंटरनैशनल इकोनौमिक सर्वे एजेंसियों से ले कर कई वैश्विक संगठन भारत को इस उम्मीद के साथ देख रहे हैं कि माली नजरिए से यहां की जमीन काफी उपजाऊ है, लेकिन ओलिंपिक जैसे गौरवशाली इवैंट में हमारे खिलाडि़यों के प्रदर्शन ने हमारी साख और हैसियत की कलई खोल दी है, जिस में एक भी स्वर्ण नहीं है, जबकि इस बार 119 खिलाडि़यों का बड़ा दल ओलिंपिक के लिए रवाना हुआ था. पदक तालिका में 67वें स्थान पर टिकी हमारी हैसियत देश में खेलों को ले कर कई विरोधाभासी तथ्यों की ओर इशारा करती है.

पिछले दिनों चीन की एक सरकारी वैबसाइट में तार्किक तौर पर इस सत्यापन के लिए खबर छपी थी कि भारत ओलिंपिक में फिसड्डी है. वैबसाइट के मुताबिक, पिछले 3 ओलिंपिक एथेंस-2004, बीजिंग-2008 व लंदन-2012 को देखें तो भारत ने अपनी आबादी के लिहाज से जितने मैडल जीते हैं, उस हिसाब से वह देशों की प्रदर्शन सूची में आखिरी नंबर पर आता है.

इस की वजह टटोलते हुए वैबसाइट ने कर्नाटक और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में किए गए एक सर्वे का हवाला दिया है. ग्रामीणों से पिछले एक दशक में सुनी सब से अच्छी नौकरी के बारे में पूछा गया. इस पर जो जवाब आए, उन में सौफ्टवेयर इंजीनियर, आर्किटैक्चर, डाक्टर और वकीलों का तो जिक्र था, लेकिन खेलों को ले कर कोई जिक्र नहीं था. इस की एक जाहिर वजह क्रिकेट तो है ही, लेकिन दूसरी और भी कई वजहें हैं.

हम चीनी वैबसाइट का हवाला न भी लें तो यह बात तो साफ है कि हमारे यहां खेलों को तरजीह न के बराबर दी जाती है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन महज 3 पैसे खेलों पर खर्च हो रहे हैं, जबकि बात करें ओलिंपिक में लगातार अपने को अव्वल साबित कर रहे अमेरिका की तो उस ने औसतन 74 करोड़ रुपए खर्च किए हैं अपने ऐथलीटों को रियो में पदक जिताने लायक बनाने में. भारत के पड़ोसी और हर लिहाज से प्रतियोगी चीन में खर्च का यह आंकड़ा 47 करोड़ रहा है.

जाहिर है कि बगैर तैयारी और खिलाडि़यों की तंदुरुस्ती व प्रैक्टिस पर माली निवेश के ओलिंपिक में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद बेमानी है, बहुत पीछे न भी जाएं तो बीते ढाई दशक के उदारीकरण में इस देश में आईटी से ले कर रीयल इस्टेट तक वर्टिकल ग्रोथ की भले ही कई चमकदार कहानियां दोहराई जाती रही हैं, लेकिन इस ने खेलों और युवाओं के स्वाभाविक साझे को तो बुरी तरह तहसनहस कर ही दिया है.

भूले नहीं हैं लोग कि इसी देश में स्कूलों में फुटबौल, कबड्डी, वौलीबौल से ले कर दौड़, कुश्ती और तैराकी के कई खेल नियमित गतिविधियों का हिस्सा थे. ये कुछ निजी स्कूलों में होता हो, ऐसा भी नहीं था. असल में सार्वजनिक निकायों की तरह सरकारी स्कूलों की बदहाली ने भी सबकुछ चौपट कर के रख दिया है. इस की जगह जिस सनक और ललक ने ली है, उस ने युवा प्रतिभा को सैक्स, सक्सैस और सैंसैक्स के तिघेरे में बांध कर रख लिया है.

आज भारत भले ही दुनिया का सब से युवा देश है, लेकिन ये तथ्य ओलिंपिक जैसे इवैंट में अपना कोई दमखम नहीं दिखा पाए तो यह सरकार व समाज के लिए वाकई बड़ी चिंता का कारण होना चाहिए.

आज जो लोग टीवी चैनलों से ले कर सोशल मीडिया तक रियो ओलिंपिक में भारत को पिछली बार से भी गिरने की बातें करने में लगे हैं, उन से यह पूछा जाना चाहिए कि ओलिंपिक में भारत को सब से ज्यादा सम्मान दिलाने वाले मेजर ध्यानचंद को यदि आज तक भारत रत्न के लायक नहीं समझा गया तो इस का बुरा कितने लोगों को लगा.

साल 1928 से ले कर 2016 तक भारत ने अब तक कुल 28 पदक ओलिंपिक में जीते हैं, जिन में 11 पदक अकेले हौकी के बूते आए हैं.

मतलब, जिस खेल के बूते पूरे विश्व के सब से बड़े खेल आयोजन में हम सब से ज्यादा कामयाब रहे हैं, वह आज की तारीख में देश का सब से लोकप्रिय खेल नहीं बन सका है. हौकी महासंघ अपनी गुटबाजी साधने में लगा है, तो हौकी खिलाड़ी अपने कैरियर को भाग्य भरोसे मान रहे हैं. यही हाल दूसरे खेलों व संघों का है. उन से जुड़े खिलाड़ी और ऐथलीट भी लगन और उत्साह से भरपूर तो हैं, लेकिन उन के अभ्यास, संसाधन और प्रशिक्षण के लिए ऐसा कोई पुख्ता बंदोबस्त नहीं है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय क्या मामूली स्तर पर भी हम संतोषजनक कह सकें.

नूराकुश्ती में चित हुआ देश

नैशनल डोपिंग एजेंसी यानी नाडा और नरसिंह यादव व सुशील कुमार की नूराकुश्ती के चलते कुश्ती में पदक जीतने का सपना चारों खाने चित हो गया. जिन 2 पहलवानों सुशील कुमार और नरसिंह यादव पर देश अब तक लगातार नाज करता आ रहा था, डोपिंग मामले के बाद दुनियाभर में हमारी हालत बेहद विवादित और शर्मनाक हुई है.

पिछले साल सितंबर माह में विश्व सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुमार ने किनारा किया, नरसिंह प्रवीण राणा पर भारी पड़ा और इस चैंपियनशिप में नरसिंह कांस्य पदक जीत कर ओलिंपिक कोटा हासिल करने वाला पहलवान बन गया. उस समय कुश्ती महासंघ के आला अधिकारियों ने ओलिंपिक प्रतियोगिता को यह कह कर दबा दिया कि देश ने सिर्फ 74 किलोग्राम भार वर्ग में कोटा हासिल किया है. ओलिंपिक में कौन जाएगा यह कुश्ती फैडरेशन तय करेगी.

इस दौरान सुशील कुमार भी अभ्यास में जुटे रहे और नरसिंह यादव भी. मई में विवाद तब बढ़ा जब कुश्ती फैडरेशन ने अपनी पुरानी परंपराओं का हवाला देते हुए नरसिंह के ही ओलिंपिक में जाने का ऐलान कर दिया, लेकिन यह फैसला सुशील कुमार को पसंद नहीं आया और मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा.

तालीमी लैवल पर फेल खेल और खिलाड़ी

ओलिंपिक में हमारी जो दुर्गति हुई है या अब तक होती आई है, वह मौजूदा हालात में तो जारी ही रहेगी. हमारे देश में खेलखिलाडि़यों के लिए कोई बड़ी योजनाएं नहीं हैं. पदक विजेता खिलाड़ी तैयार करने में कम से कम 10 से 12 साल लगते हैं. वह खिलाड़ी किनकिन हालातों से गुजरता है, उस पर कोई गौर नहीं करता. हमारे देश का जो ऐजुकेशन सिस्टम है, उस में भी कोई नहीं झांकता. वहां महज किताबी रेस होती है, जबकि खेलों के प्रति गंभीरता स्कूल स्तर से ही पैदा होती है, क्योंकि ऐथलीट, जिमनास्ट या तैराक आदि बचपन से ही तैयार करने होते हैं.

तालीम केंद्रों को युवाशक्ति का असीम स्रोत ऐसे ही नहीं कहा जाता. इस का ताजा नमूना पेश किया है रियो ओलिंपिक में सब से ज्यादा तमगों पर कब्जा जमाने वाले अमेरिका यूनिवर्सिटीज ने. अमेरिका के 500 से ज्यादा खिलाडि़यों की टीम में से ज्यादातर किसी न किसी यूनिवर्सिटी से ताल्लुक रखते हैं. अमेरिका की यूनिवर्सिटी औफ जार्जिया से 11 खिलाड़ी रियो ओलिंपिक का हिस्सा बने. रियो ओलिंपिक में सब से ज्यादा दबदबा रहा यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया का. इस के विभिन्न कैंपसों से कुल 44 छात्रों ने ओलिंपिक में हिस्सा लिया. इस के अलावा पेंसिलवेनिया से 13, औरेगन से 12 व यूनिवर्सिटी औफ वाशिंगटन से 11 खिलाडि़यों ने ओलिंपिक में हिस्सा ले कर अपने खेल का जौहर दिखाया.

वहीं हमारे खिलाड़ी कालेजयूनिवर्सिटीज में तैयार होने के बजाय खेल एसोसिएशन और फैडरेशन से जूझते रहते हैं. वहां भी खेल से ज्यादा खेल पर राजनीति हावी है. हौकी का ही हाल देख लें, कभी इस में हमारा परचम लहराता था, आज पिछड़े हुए हैं. सही कदम की कमी और नीतिगत खामियों से हमारे खेलखिलाड़ी पैंदे में हैं. शुरुआत स्कूली स्तर से हो तभी नतीजों में सुधार हो सकता है.

नेपाल: अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए

नेपाल में पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से जिस तरह की राजनीतिक अराजकता रही, उसका सार्वजनिक खर्च पर काफी बुरा असर पड़ा है. शांति प्रक्रिया शुरू होने के बाद कई सरकारें तो जबर्दस्त सियासी उठापटक के कारण वक्त पर बजट तक पेश नहीं कर सकीं. फिर विभिन्न मंत्रालयों में राजनीतिक मतभेद रहा और स्थानीय स्तर पर भी काफी असहमतियां रहीं. सत्ता में तेजी से बदलाव के कारण भी सरकार की प्राथमिकताओं में स्थिरता नहीं रही.

कुल मिलाकर, आलम यह रहा कि एक के बाद दूसरी सरकारें बजट में आवंटित रकम को प्रभावी तरीके से खर्च करने में नाकाम रहीं. इस तरह, ज्यादातर रकम यूं ही रह गई. इस साल हालात कुछ बेहतर हुए हैं. इस साल सालाना बजट तय वक्त से लगभग डेढ़ महीने पहले ही घोषित हो गया था. इसने यह पता चला कि देश की बड़़ी पार्टियों की मिल-जुलकर काम करने की क्षमता पहले से सुधरी है.

जिस समय बजट को जारी किया गया था, उससे यह उम्मीद जगी थी कि बजट राशि वक्त पर और प्रभावी तरीके से खर्च होगी. लेकिन दुर्योग से यह न हो सका. पुरानी आदत और नौकरशाही की काहिली अब भी दूर नहीं हुई है, इस कारण आवंटित राशि को खर्च करने में रुकावट बनी हुई है. मौजूदा वित्त वर्ष को शुरू हुए लगभग तीन महीने होने को आ गए, मगर सरकार कुल बजट का 0.9 फीसदी राशि ही खर्च कर सकी है. यही रफ्तार रही, तो वित्त मंत्रालय के लिए पहले चार महीने में पूंजीगत बजट की 32 प्रतिशत राशि खर्च करने का लक्ष्य हासिल करना असंभव हो जाएगा.

यह स्थिति नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए शुभ नहीं है. देश की पनबिजली, सिंचाई परियोजनाओं, हवाई अड्डों व सड़कों के निर्माण में निवेश निजी क्षेत्र को आकर्षित करने और रोजगार पैदा करने के लिहाज से काफी महत्व रखता है. इसके अलावा, वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में पूंजीगत व्यय में कमी न सिर्फ आर्थिक कुप्रबंधन के जोखिम पैदा करता है, बल्कि बाद के महीनों में इसकी वजह से भ्रष्टाचार की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं. इसलिए सरकार सार्वजनिक खर्च के स्तर को सही बनाने के लिए तुरंत तमाम जरूरी कदम उठाए.

 

पाक को पछाड़ भारत बना टेस्ट टीम नंबर 1

कोलकाता में खेले गए दूसरे टेस्‍ट में न्‍यूजीलैंड को हराकर टीम इंडिया फिर टेस्‍ट रैंकिंग में शीर्ष पर काबिज हो गई है. कोलकाता में मिली यह शानदार जीत बेहद खास है. प्रबल प्रतिद्वंद्वी पाकिस्‍तान को पीछे छोड़ते हुए विराट की ब्रिगेड ने यह उपलब्धि हासिल की है.

सीरीज के अंतर्गत कानपुर में हुए पहले टेस्‍ट में भी टीम इंडिया ने जीत हासिल की थी. दूसरे मैच में जीत के बाद टीम इंडिया तीन टेस्‍ट की सीरीज में 2-0 से आगे हो गई है.

गौरतलब है कि इंग्‍लैंड के खिलाफ टेस्‍ट सीरीज में अपने बेहतर प्रदर्शन के बाद पाकिस्‍तान ने टीम इंडिया को बारीक अंतर से पीछे छोड़कर शीर्ष रैंकिंग हासिल की थी.

कानपुर में अपने 500वें टेस्ट मैच में जीत के बाद भारत, पाकिस्तान से आईसीसी टेस्ट गदा हासिल करने से केवल एक जीत दूर था. इस उपलब्धि को उसने कोलकाता में मिली जीत से हासिल कर लिया.

न्यूजीलैंड के खिलाफ तीन टेस्ट मैचों की सीरीज शुरू होने के वक्‍त भारत अपने धुरविरोधी से केवल एक अंक पीछे था. टीम इंडिया के लिहाज से बात करें तो घरेलू मैदान पर इसे अभी तक पिछले 13 मैचों में हार का सामना नहीं करना पड़ा है, उसने इनमें से 11 में जीत दर्ज की हैं और दो ड्रॉ खेले हैं. भारतीय टीम ने इस सफर की शुरुआत दिसंबर 2012 में इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज में 1-2 से हार के बाद की थी.

सार्क सम्मेलन का इस तरह रद्द होना

सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का 19वां सम्मेलन रद्द कर दिया गया है. यह बैठक अब कब होगी, इसकी अब तक कोई घोषणा नहीं की गई है. इससे समझा जा सकता है कि 31 वर्षों के सफर में सार्क की 18 बैठकें ही क्यों हुईं? जाहिर है, सदस्य मुल्कों के शासनाध्यक्ष किसी न किसी वजह से सार्क चार्टर के मुताबिक सालाना बैठक से बचते रहे हैं. इस बार इसकी बैठक इसलिए रद्द की गई है, क्योंकि भारत, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने इसमें न शामिल होने का फैसला किया है.

भारत का गुस्सा उरी हमले को लेकर है, तो बांग्लादेश अपने अंदरूनी मामलों में, खासतौर से युद्ध अपराधियों के मुकदमों और सजा के मामले में पाकिस्तान की दखलंदाजी से नाराज है. अफगानिस्तान ने भी अपने यहां पाकिस्तान की कथित भूमिका की वजह से सार्क सम्मेलन से किनारा करने का फैसला किया है. बेशक, इससे ऐतराज नहीं कि कई मसलों पर पाकिस्तान के रुख से इस क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता बढ़ी है, और संभवत: इस्लामाबाद इससे भी बड़ी चोट का हकदार है. मगर पाकिस्तान को घेरने के लिए सार्क सम्मेलन एक बेहतर मंच हो सकता है.

यह दलील दी जा सकती है कि जिन मसलों के कारण इन तीन मुल्कों ने इस सम्मेलन में न जाने का फैसला किया, वह उनका पाकिस्तान के साथ आपसी मसला है. यह कहने में भी कोई दिक्कत नहीं कि जिस अतिवाद और दहशतगर्दी फैलाने की वजह से पाकिस्तान पर अंगुली उठाई गई है, उसे ये मुल्क द्विपक्षीय बातचीत में ज्यादा तवज्जो नहीं देते, लिहाजा इस मसले को सार्क सम्मेलन का एजेंडा बना दिया जाना चाहिए.

बहरहाल, दहशतगर्दी का समाधान एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत करके ही निकल सकता है, और इसके लिए सार्क सम्मेलन का होना निहायत जरूरी है. इतना ही नहीं, अगर यूं ही बहिष्कार जारी रहा, तो आने वाले दिनों में मौजूदा परिस्थिति का उदाहरण देते हुए किसी गैर-वाजिब मसले पर भी यही रुख अपनाया जा सकता है. हमें कमजोर नहीं, बल्कि एक मजबूत सार्क चाहिए. तमाम कमियों के बावजूद हम इसे खत्म होने नहीं दे सकते.

अपने भाव और ज्ञान हिंदी भाषा में

भाषा अभिव्यक्ति का सरल और सुदृढ़ माध्यम है, जिस भाषा को हम अच्छी तरह जानते और समझते हैं अगर उस में अपने भाव अभिव्यक्त करें तो न केवल दूसरों तक सही बात पहुंचा पाएंगे बल्कि अपनी बात रखने में भी आसानी होगी बजाय अन्य किसी भाषा के. इसी तरह अगर हम किसी भी प्रकार की जानकारी या ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं तो उस के बारे में यदि हमें अपनी भाषा में किताबें, नोट्स और अन्य स्रोत से प्राप्त सामग्री मिले तो हम उस ज्ञान को ज्यादा बेहतर ढंग से ग्रहण कर उस का सही इस्तेमाल कर पाएंगे. हिंदी से सरल अन्य भाषा किसी भारतीय के लिए हो ही नहीं सकती, जिसे पूरे देश में हर कोई आसानी से समझ लेता है.

क्या हैं फायदे

दूसरों को समझाने में आसानी

कहा जाता है कि व्यक्ति जिस भाषा का ज्ञाता होता है उस भाषा में वह अपने विचारों का आदानप्रदान आसानी से कर सकता है और सामने वाले पर अपना अच्छा प्रभाव जमा सकता है. ऐसा ही कुछ स्नेहा के साथ हुआ. वह हर क्षेत्र में बहुत तेज थी सिवा अंगरेजी बोलने के, जिस कारण उसे खुद पर बहुत झुंझलाहट होती. एक बार उस के स्कूल में डिबेट कंपीटिशन था. सभी छात्र इंगलिश में स्पीच दे रहे थे. स्नेहा ने भी हिम्मत नहीं हारी. स्टेज पर चढ़ने से पहले ही उस ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि आज वह हिंदी में ही अपना भाषण देगी. भले ही वह जीते या न जीते. उस ने शब्दों और भाषा पर अपनी मजबूत पकड़ की वजह से ऐसा भाषण दिया कि सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गए. वहां उपस्थित छात्रों के साथसाथ जूरी मैंबर्स भी खड़े हो कर तालियां बजाने पर मजबूर हो गए.

भले ही वहां का माहौल अंगरेजी का बना हुआ था, लेकिन सिवा स्नेहा के किसी ने भी कौंसैप्ट की गहराई को समझ उसे आज के संदर्भ से जोड़ने की कोशिश नहीं की थी और इसी का नतीजा था कि वह अव्वल आई.

अपनी भाषा में बेहतर रिजल्ट

आजकल अधिकांशतया देखने में आता है कि छात्र देखादेखी सब्जैक्ट्स व भाषा का चयन कर लेते हैं, लेकिन आगे चल कर उस में असफल हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि अगर वे अपने फ्रैंड्स या रिलेटिव्स को यह बताएंगे कि वे हिंदी माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं तो सब के मन में यही सोच पैदा होगी कि शायद अंगरेजी भाषा पर पकड़ न होने के कारण हम ने हिंदी माध्यम से पढ़ने का फैसला लिया.

सोच कर देखिए तब क्या होगा जब देखादेखी लिया गया निर्णय आप को फेल कर देगा और वही दोस्त आप को यह बोलने में भी पीछे नहीं रहेंगे कि जब बस का नहीं था तो किस ने कहा था अंगरेज बनने को. ऐसे में अगर आप अपना बेहतर कैरियर बनाना चाहते हैं तो जरूरी नहीं कि अंगरेजी माध्यम से ही पढ़ाई करें, आप हिंदी माध्यम से भी सफलता हासिल कर सकते हैं.

फेस ऐक्सप्रैशन भी बेहतर

अपनी लैंग्वेज में बात करने का सब से बड़ा फायदा यह होता है कि शब्दों के साथसाथ हमारा फेस भी बोलता है जिस से हमें अपनी काबिलीयत साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि अपनी भाषा में बात करते समय चेहरे पर नैचुरल भाव आते हैं और हम किसी की भी बात का सहज हो कर उत्तर दे पाते हैं.

जबकि दूसरी भाषा में प्रभाव जमाने के लिए हम उसे दिल से नहीं बल्कि बोझ समझ कर ग्रहण करते हैं और कई बार इतना अधिक रटने के बावजूद ठीक से ऐक्सप्रैस नहीं कर पाते इसलिए बेहतर यही है कि न तो हिंदी को अपनाने में झिझकें और न ही उस में अपने विचार प्रकट करने में शर्म महसूस करें.

आते हैं ज्यादा क्रिएटिव विचार

जिस भाषा पर हमारी अच्छी कमांड होती है हमें उस में काम करने में भी बहुत मजा आता है, जिस से हमारा दिमाग ज्यादा क्रिएटिव सोचता है. इस से हमें कई तरह की योजनाएं बना कर बेहतर रिजल्ट मिल पाते हैं वरना दूसरी भाषा में काम करते हुए हमें उसे समझने में काफी समय लग जाता है ऐसे में उस भाषा में क्रिएटिव सोचने का तो सवाल ही नहीं उठता.

किसी से छिपने की जरूरत नहीं

हो सकता है कि आप हिंदी के मास्टर हों और दूसरा अंगरेजी का, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आज अंगरेजी का वर्चस्व होने के कारण आप अपनी भाषा की वजह से लोगों से कटेकटे रहें. इस से तो आप जानबूझ कर अपनी कमियां दूसरों के सामने उजागर करेंगे.

आप को चाहिए कि पूरे कौन्फिडैंस के साथ आप लोगों के सामने आएं, उन से बात करें. अगर इस दौरान कोई अंगरेजी में बोल कर इंप्रैशन झाड़े तो आप भागें नहीं बल्कि अपनी भाषा में ही अपने ज्ञान से उसे ऐसा धोएं कि वह दोबारा आप के सामने आने के बारे में दस बार सोचे. लेकिन ऐसा आप तभी कर पाएंगे जब आप अपने ज्ञान को मजबूत बनाएंगे.

चीजों को ग्रहण करने में आसानी

रोहन के घर एक हिंदी और एक अंगरेजी का अखबार आता था, क्योंकि उसे हिंदी का और उस की बहन को अंगरेजी का अखबार पढ़ना पसंद था.

एक दिन दोनों ही अखबारों में स्टार्टअप क्या है और कैसे इसे शुरू करें इस विषय को ले कर स्टोरी पब्लिश हुई. दोनों ने ही उसे अपनेअपने ढंग से समझने की कोशिश की, लेकिन जब उन के मम्मीपापा ने इस विषय पर शाम को चर्चा करते हुए पूछा तो बहन विषय को समझने में अटकने लगी, जबकि रोहन ने उस के हर बिंदु को अच्छी तरह समझाया. इस के लिए रोहन की खूब तारीफ हुई. बहन को भी लगा कि काश उस ने अंगरेजी मोह के बजाय अगर हिंदी में समझा होता तो आसानी से समझ आता.

लगन+उत्साह+जनून=सक्सैस

अटल बिहारी वाजपेयी, कपिल देव, मुलायम सिंह यादव, राबड़ी देवी आदि बहुत से सैलिब्रिटीज और नेता ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी के दम पर ही देश में नाम रोशन किया है.

इन्होंने अपनी कामयाबी से उन लोगों को झूठा साबित कर दिया जो यह कहते फिरते हैं कि वे इंगलिश न आने के कारण असफल हो गए.

पेटीएम के संस्थापक की प्रेरणादायक कहानी

अकसर लोग जीवन की मुश्किलों से हार मान लेते हैं और अपने भाग्य को कोसने लगते हैं. लेकिन पेटीएम के संस्थापक ने दिखा दिया कि अगर सच्ची लगन हो तो कुछ भी असंभव नहीं.

पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के छोटे से गांव में हुआ और वहीं से उन की स्कूली शिक्षा भी हुई. हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने के कारण वे अंगरेजी भाषा के ज्ञान से कोसों दूर थे. लेकिन इंजीनियर बनने की चाह के कारण उन्होंने दिल्ली के कालेज औफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया. यहां सभी स्टूडैंट्स और टीचर्स अंगरेजी में बात करते थे, जिस कारण वे किसी भी बात का उत्तर नहीं दे पाते थे और शर्म महसूस करते थे.

इसी कारण वे लोगों से कटने लगे. लेकिन एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा कर के तो वे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं इसलिए उन्होंने अपनी कमी को दूर करने के लिए लाइब्रेरी में समय बिताना शुरू किया वहां उन्होंने हिंदी के साथसाथ अंगरेजी की किताबें, नौवल्स आदि खूब पढ़े. इस से उन्हें खुद में काफी सुधार महसूस हुआ, लेकिन उन की सोच बदली सौफ्टवेयर स्टार्स, इनोवेटर्स की सक्सैस स्टोरी पढ़ने से.

उन के दिमाग में खुद की कंपनी स्थापित करने का विचार आया जिस में वे असफल हुए. जेब में पैसे भी नहीं थे, लेकिन फिर भी हारे नहीं. आज इसी का परिणाम है कि वे पेटीएम जैसी कंपनी जिस का कारोबार करोड़ों में होने के साथसाथ अंगरेजी में बिजनैस होता है, के मालिक हैं. इस उदाहरण से यही साबित होता है कि जिस के इरादे पक्के हों वह कभी हारता नहीं.  

कैसे बनाएं भाषा पर पकड़

–       प्रतिदिन हिंदीअंगरेजी के अखबारों का अध्ययन करें.

–       लाइब्रेरी में पढ़ने की हैबिट बढ़ाएं.

–       लेखन व डिबेट कंपीटिशन में भाग लें.

–       भाषा उच्चारण ठीक करने के लिए न्यूज चैनल्स देखें.

–       ऐसे मित्र बनाएं जिन की भाषा पर अच्छी पकड़ हो.

–       विभिन्न पत्रपत्रिकाओं के लिए लिखें. इस से भी लेखन में सुधार आएगा.

–       डरें नहीं बल्कि कमियों पर जीत हासिल करने

सैक्स रहित प्रेम अच्छा है पर होता नहीं

युवावस्था उम्र की वह दहलीज है जिस में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होना लाजिमी है. यह आकर्षण कब प्यार में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता. कालेजगोइंग युवकयुवतियों में तो प्रेम सिर चढ़ कर बोल रहा है. वैसे प्रेम करने में कोई बुराई नहीं है. अगर प्रेम में सीरियसनैस हो, लेकिन ऐसा होता नहीं है. आज की पीढ़ी ने तो प्रेम को मात्र ऐंजौय का जरिया बना रखा है. वे शारीरिक आकर्षण को ही प्रेम सम झ बैठे हैं.

प्रेम का नशा महानगरों के युवकयुवतियों पर ही नहीं चढ़ा है बल्कि छोटे शहरों यहां तक कि गांवदेहातों तक के युवा प्रेम का लुत्फ उठाते हुए देखे जा सकते हैं. महानगरों में तो पार्कों, मैट्रो, मौल्स और खंडहरों में युवा एकदूसरे से आलिंगनबद्ध होते नजर आ जाते हैं. उन्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे ये स्थल खासतौर पर प्रेमी युगलों के लिए ही बनाए गए हों.

सच तो यह है कि सैक्स की पूर्ति के लिए ही युवक प्रेम का ढोंग रचते हैं. वे अपनी गर्लफ्रैंड को प्रेम का  झांसा दे कर उस से सैक्स संबंध बनाते हैं और जब उन का उस से जी भर जाता है तो उसे छोड़ कर नई गर्लफ्रैंड बना लेते हैं. फिर उस को कौन्फिडैंस में ले कर उस के साथ भी सैक्स संबंध बनाते हैं. अगर गर्लफ्रैंड उसे इस के लिए मना करती है तो वह अभिनय करते हुए कहते हैं, ‘‘ट्रस्ट मी यार, मैं ताउम्र तेरा साथ निभाऊंगा.’’ भोलीभाली युवतियां ऐसे फरेबी बौयफ्रैंड के जाल में फंस कर अपना सर्वस्व लुटा देती हैं और फिर समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहतीं.

पिछले काफी समय से बौयफ्रैंड व उस के दोस्तों द्वारा गैंगरेप की घटनाएं आम हो गई हैं. ऐसे युवा प्रेम का नाटक कर के अपनी गर्लफ्रैंड को किसी एकांत स्थान पर ले जाते हैं और अपने दोस्तों को भी बुला लेते हैं. फिर गर्लफ्रैंड को इन वहशियों की हवस का शिकार होना पड़ता है.

बहुत कम युवतियां ही अपने साथ हुए इस दुराचार को अपने पेरैंट्स को बताने की हिम्मत जुटा पाती हैं वरना अधिकतर तो घुटघुट कर ही जीती हैं या बदनामी के भय से आत्महत्या जैसे कृत्य को अंजाम दे बैठती हैं.

दिल्ली की रहने वाली श्वेता शुरू से ही ब्यूटी व फैशन कौंशस युवती थी. ग्रैजुएशन के बाद उस ने मौडलिंग को अपना कैरियर बना लिया. मौडलिंग के दौरान ही उस की मुलाकात सुहेल से हो गई. दोनों के बीच प्रेम के बीज कब अंकुरित हुए, पता ही नहीं चला. धीरेधीरे उन का प्रेम परवान चढ़ने लगा. दोनों मौडलिंग ट्रिप पर साथ जाते और घंटों साथसाथ बिताते. श्वेता उस के प्रेम में पूरी तरह पागल थी. उसे वह दिलोजान से चाहने लगी थी. एक अच्छे जीवनसाथी की जो तसवीर उस ने अपने दिल में संजो रखी थी, वे सभी गुण सुहेल में थे.

दोनों पढ़ेलिखे थे, इसलिए जातिबंधन की समस्या भी उन के बीच नहीं थी. सुहेल ने भी श्वेता से शादी करने का वादा कर रखा था, लेकिन एक दिन सुहेल ने अचानक श्वेता के सामने सैक्स करने की अपनी इच्छा उजागर कर दी.

श्वेता ने पहले तो नानुकर की पर सुहेल ने वादा किया कि वह उसे धोखा नहीं देगा इसलिए वह मान गई. दोनों के बीच सैक्स संबंध कायम हो गए. अब अकसर सुहेल उस से सैक्स की फरमाइश करता. यह सिलसिला काफी समय तक चलता रहा.

इस बीच जब श्वेता प्रैग्नैंट हो गई तो उस ने सुहेल से शादी करने को कहा ताकि वह बदनामी से अपने को बचा सके. सुहेल को श्वेता की यह बात नागवार गुजरी. उस ने शादी करने से इनकार कर दिया. यह सुन कर श्वेता के पैरों तले जमीन खिसक गई. आखिर उसे अपने मातापिता को सबकुछ साफसाफ बताना पड़ा. श्वेता के पेरैंट्स ने सुहेल के मातापिता से बात की. खैर उन्होंने किसी तरह सुहेल को शादी के लिए रजामंद कर लिया पर हर मातापिता ऐसे नहीं होते जो शादी से पहले ही प्रैग्नैंट हो गई युवती को अपना लें.

श्वेता तो महज एक उदाहरण है, अकसर हजारों युवतियां युवकों के प्रेमजाल में फंस कर शारीरिक शोषण का शिकार हो जाती हैं, जिन में से अनेक खुदकुशी जैसे कृत्य को अंजाम दे बैठती हैं. कहीं आप भी ऐसे प्रेमी के चक्कर में न फंस जाएं इसलिए यहां कुछ ऐसे टिप्स दिए जा रहे हैं जिन को अपना कर आप प्रेमी का चयन कर सकती हैं :

प्रेमी के चयन में जल्दबाजी न करें

अकसर युवतियां किसी भी युवक की मीठीमीठी बातों में आ कर बिना सोचेसम झे उसे दिल दे बैठती हैं और साथ मरनेजीने की कसमें खाती हैं. ऐसा करना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है. प्यार करने से पहले सोचिए कि प्यार एक बार होता है बारबार नहीं. न ही प्रेमी जींस की तरह होता है कि कुछ दिन पहनी और जब मन भर गया तो फिर नई खरीद ली. प्रेम एक पवित्र रिश्ता होता है, जिस की बुनियाद एकदूसरे के प्रति विश्वास और समर्पण पर टिकी होती है.

इसलिए प्रेम करते समय कतई जल्दबाजी न करें. प्रेमी को अच्छी तरह जांच परख लें फिर प्यार की पींगें बढ़ाएं. ‘लव एट फर्स्ट साइट’ के फार्मूले पर चलना भविष्य में परेशानी का सबब बन सकता है पर ऐसा होता बहुत कम है. ज्यादातर युवतियां हर उस युवक की ओर आकर्षित होती हैं, जो डैशिंग हो, स्मार्ट हो. यह जरूरी नहीं है कि हर डैशिंग पर्सनैलिटी वाला युवक सिंसीयर प्रेमी साबित हो बल्कि देखने में आया है कि ऐसे युवक ज्यादा फरेबी होते हैं. इसलिए सोचसम झ कर ही प्रेमी का चयन करें.

युवक के बारे में पहले पता कर लें

प्रेम करने से पहले युवती को चाहिए कि पहले पता कर ले कि जो युवक उसे पसंद आ रहा है, उस का बैकग्राउंड क्या है, क्या उस में एक अच्छे प्रेमी होने के सभी गुण मौजूद हैं?

अकसर युवक किसी युवती को पटाने के चक्कर में बड़ीबड़ी बातें करते हैं लेकिन असलियत में ऐसा कुछ भी नहीं होता. युवतियां ऐसे युवकों की बातों में फंस कर उन्हें दिल दे बैठती हैं.

युवकों का तो काम ही है प्रेम का नाटक करो और फिर सैक्स संबंध बनाओ. युवतियां चूंकि ऐसे युवकों के जाल में फंस चुकी होती हैं, इसलिए वे लाचार हो जाती हैं अपना सर्वस्व लुटाने के लिए. ऐसे युवक अपना उल्लू सीधा करते ही भाग खड़े होते हैं. इसलिए युवतियों को प्रेमी का चयन करते समय उस के बारे में अवश्य पता कर लेना चाहिए कि वह कितने पानी में है.

प्रेमी के साथ सुनसान जगह पर न जाएं

आज के युवकयुवतियां बिंदास किस्म के होते हैं. वे कहीं पर भी चल पड़ते हैं. वीरान जगहों पर प्रेमी के साथ जाने पर सीमाओं का अतिक्रमण होगा ही होगा. इसे कोई रोक नहीं सकता, क्योंकि अब लैलामजनूं, शीरींफरहाद जैसे समर्पित प्रेमी तो रहे नहीं. आज के प्रेमियों का सैक्स पर कंट्रोल नहीं होता. वे सैक्स को ही प्रेम सम झते हैं. युवकों में तो सैक्स के प्रति क्रेज होता ही है, युवतियां भी इस में पीछे नहीं रहतीं. वे खुद अपने प्रेमी के साथ सैक्स संबंध बनाने की इच्छुक रहती हैं. दूसरा, आजकल ऐसी भड़काऊ ड्रैसेस आ गई हैं जिन्हें जब प्रेमिका पहन कर प्रेमी के साथ एकांत स्थान पर जाती है तो सब्र का बांध टूटने लगता है और सैक्स संबंध स्थापित हो जाते हैं.

यदि युवतियों को अपने को सैक्स संबंधों से बचाना है तो कभी भी किसी सुनसान जगह पर प्रेमी के साथ न जाएं और न ही भड़काऊ ड्रैस पहनें.

प्रेमी को अपने माता पिता से मिलवाएं

चोरीछिपे प्रेम करना ठीक नहीं है. अगर आप दिल से किसी को प्रेम करती हैं तो उसे अपने पेरैंट्स से जरूर मिलवाएं. इस से यह फायदा होगा कि आप के मातापिता आप को बता पाएंगे कि आप का चुनाव सही है या गलत, क्योंकि उन्हें काफी अनुभव होता है. दूसरा फायदा यह होगा कि आप के पेरैंट्स का आप के प्रति विश्वास बढ़ जाएगा कि उन की बेटी ने सबकुछ सचसच बता दिया. हर स्तर पर वे आप के मददगार साबित होंगे. इसी तरह आप भी अपने प्रेमी से कहें कि वह आप को अपने पेरैंट्स से मिलवाए. अगर वह आप को उन से मिलवाने में टालमटोल करता है तो सम झ लें कि उस का प्रेम महज एक धोखा है और वह एक नंबर का चीट है. ऐसी स्थिति में जितनी जल्दी हो सके उस से किनारा कर लेना ही ठीक होगा.

प्रेमी के साथ नशा न करें

आजकल प्रेमीप्रेमिकाओं में नशाखोरी का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. डिस्कोथिक व बार में युवतियों को भी शराब पीते देखा जा सकता है. वर्किंग गर्ल्स खासतौर से एमएनसी में काम करने वाले युवा खूब शराब पीते हैं. आजकल ‘टकीला’  नामक एक लेडीज ड्रिंक भी बाजार में आ गया है जो युवतियों का फेवरिट ड्रिंक है, इस से एकदम से नशा चढ़ता है. प्रेमी शराब की शौकीन ऐसी युवतियों का जम कर शारीरिक शोषण करते हैं. जब शराब का नशा उतरता है तब युवतियों को एहसास होता है कि वे गलती कर बैठी हैं. इसलिए कभी भी प्रेमी के साथ शराब पीने की भूल न करें.

लेटनाइट पार्टियों से दूर रहें

आजकल ज्यादातर पार्टियां लेटनाइट तक चलती हैं इसलिए प्रेमी जितना भी जोर डाले आप उसे साफसाफ कह दें कि आप लेटनाइट पार्टी में नहीं जा सकतीं. इन पार्टियों में मौजमस्ती और फन के चक्कर में प्रेमी अपनी प्रेमिका का जम कर दैहिक शोषण करते हैं. उस समय वे भूल जाते हैं कि वे तो प्रेमीप्रेमिका हैं. अत: लेटनाइट पार्टी में जाने से बचें.                   

बड़े काम की हैं ये 12 Function Keys

क्या आपने कभी अपने कंप्यूटर की-बोर्ड की सबसे ऊपरी लाइन गौर से देखी है? अगर हां, तो ऊपर की कतार में 12 Function Keys भी देखे होंगे जो वाकई बड़े काम के हैं. इनकी मदद से आप कंप्यूटर पर तेजी से काम कर सकते हैं.

कंप्यूटर की-बोर्ड पर सबसे ऊपर मौजूद F1 से लेकर F12 कुंजियों को 'फंक्शन की' कहते हैं. ये ऐसी कुंजियां हैं जिनसे कोई अक्षर टाइप नहीं होता. असल में इन्हें की-बोर्ड के जरिए कंप्यूटर या उसके ऑपरेटिंग सिस्टम को खास तरह के निर्देश देने के लिए बनाया गया है.

आइए, देखते हैं कि आप इनका इस्तेमाल करके कैसे अपने कामकाज को ज्यादा तेज और स्मार्ट बना सकते हैं.

F1

– अगर कंप्यूटर को स्विच ऑन करते ही यह कुंजी दबा देंगे तो कंप्यूटर का सेटअप (CMOS) खुल जाएगा, जिसमें सेन्सिटिव कंप्यूटर सेटिंग्स को देखा या बदला जा सकता है.

– अगर आपने विंडोज खोल लिया है, तो इस कुंजी को दबाने पर विंडोज हेल्प एंड सपोर्ट डायलॉग खुलेगा, जिसमें सामान्य समस्याओं के समाधान दिखाए गए हैं.

– अगर आप इंटरनेट एक्सप्लोरर ब्राउजर में काम कर रहे हैं, तो यह कुंजी दबाने पर इस ब्राउजर का हेल्प पेज खुलेगा.

– क्रोम ब्राउजर में यही कुंजी दबाने पर गूगल क्रोम का हेल्प सेंटर खुल जाएगा.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में कंट्रोल+F1 दबाने पर सॉफ्टवेयर फुल स्क्रीन मोड में चला जाएगा. फिर से दबाने पर दोबारा सामान्य हो जाएगा.

F2

– विंडोज में किसी फाइल, आइकन या फोल्डर पर क्लिक करने के बाद F2 दबाने पर उसे फौरन रीनेम किया जा सकता है.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में कंट्रोल+F2 दबाने से प्रिंट प्रिव्यू पेज खुलेगा, जो दिखाता है कि आपका डॉक्युमेंट प्रिंट होने पर कैसा दिखेगा.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में Alt+Control+F2 को दबाने पर फाइल ओपन डायलॉग बॉक्स खुल जाता है.

F3

– विंडोज में F3 दबाने से सर्च बॉक्स खुल जाता है, जिसका इस्तेमाल फाइलों या फोल्डरों को खोजने के लिए कर सकते हैं.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में Shift+F3 दबाने पर अंग्रेजी का सलेक्ट किया हुआ मैटर अपर केस या लोअर केस में बदला जा सकता है.

– माइक्रोसॉफ्ट डॉस या कमांड प्रॉम्प्ट विंडो में F3 दबाने पर पहले टाइप की गई कमांड दोबारा टाइप हो जाती है.

F4

– विंडोज एक्सप्लोरर (कंप्यूटर, माइ कंप्यूटर वगैरह) में इसे दबाने पर अड्रेस बार खुल जाती है. इंटरनेट एक्सप्लोरर में भी वेबसाइट का पता डालने के लिए अड्रेस बार खुलती है.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में यह कुंजी दबाने पर वही काम रिपीट हो जाएगा, जो आपने अभी-अभी किया था. अगर आपने कोई शब्द टाइप किया है, तो वह दोबारा टाइप हो जाएगा. टेबल बनाई है, तो एक और टेबल बन जाएगी. अगर कोई टेक्स्ट बोल्ड किया है तो वह फिर से सामान्य और फिर से बोल्ड हो जाएगा.

– Alt+F4 को दबाने पर वह सॉफ्टवेयर बंद हो जाएगा जो अभी खुला हुआ है.

– Control+F4 दबाने पर किसी सॉफ्टवेयर के भीतर खुली कई विंडोज में से मौजूदा विंडो बंद हो जाएगी. जैसे इंटरनेट एक्सप्लोरर में खुले कई टैब में से एक टैब बंद हो जाएगा या फिर वर्ड में खुले कई दस्तावेजों में से एक बंद हो जाएगा.

F5

– यह रिफ्रेश की के तौर पर काम करता है. विंडोज में कोई फोल्डर कॉपी होने के बाद दिखाई नहीं दे रहा, तो इसे दबाइए, दिखने लगेगा. इंटरनेट ब्राउजरों में दिख रहे वेब पेजों को रिफ्रेश या रिलोड करने के लिए यह बहुत इस्तेमाल होता है.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में इसे दबाने पर Find and replace डायलॉग खुल जाता है. – पावरपॉइंट में F5 दबाने पर स्लाइड शो चालू हो जाता है.

– माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल में Shift+F5 दबाने पर Find and Replace सुविधा खुलती है.

– फोटोशॉप में इसे दबाने पर कई तरह के ब्रश सामने आ जाते हैं, जिनमें से अपनी पसंद का ब्रश चुना जा सकता है.

F6

– इसे दबाने पर विंडोज टास्कबार में खुले फोल्डरों की सामग्री दिखने लगती है.

– इंटरनेट ब्राउजर में इसे दबाने पर करसर अड्रेस बार में चला जाता है और आप फौरन वेब अड्रेस टाइप कर सकते हैं.

– अगर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में कई डॉक्युमेंट खुले हैं, तो उन्हें एक-एक कर देखने के लिए Control+Shift+F6 का प्रयोग कर सकते हैं.

F7

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में कोई दस्तावेज टाइप करने के बाद अगर F7 दबाएंगे, तो उसकी स्पेलिंग चेक होनी शुरू हो जाएगी.

– इंटरनेट एक्सप्लोरर में इसे दबाने पर कैरट ब्राउजिंग सुविधा शुरू हो जाती है, जिसका इस्तेमाल कीबोर्ड के जरिए वेब पेजों पर टेक्स्ट सलेक्ट करने, आगे-पीछे जाने आदि के लिए किया जा सकता है.

F8

– अगर कंप्यूटर को स्टार्ट करते समय इसे दबा देंगे, तो ऑपरेटिंग सिस्टम को खोलने के लिए उपलब्ध कई मोड दिखाई देंगे, जिनमें सेफ मोड और कमांड प्रॉम्प्ट भी शामिल हैं.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में Alt+F8 दबाने पर मैक्रो तैयार करने की सुविधा शुरू हो जाती है, जिसके जरिए बार-बार किए जाने वाले कामों को करने के लिए छोटे-छोटे स्थायी निर्देश रेकॉर्ड किए जा सकते हैं.

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में टेक्स्ट को सिलेक्ट करने के लिए F8 का इस्तेमाल किया जा सकता है.

F9

– माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक में ईमेल पाने-भेजने (सेंड-रिसीव) के लिए इसका इस्तेमाल करें.

– क्वार्क एक्सप्रेस में इसे दबाने पर मेजरमेंट टूलबार खुल जाता है.

– कुछ लैपटॉप में इसे दबाकर स्क्रीन की चमक (ब्राइटनेस) को कंट्रोल किया जा सकता है.

F10

– किसी सॉफ्टवेयर में काम करते हुए इस कुंजी को दबाने पर मेन्यू बार सक्रिय हो जाता है, जैसे आपने वहां क्लिक किया हो.

– Shift+F10 को एक साथ दबाने का ठीक वैसा असर होता है, जैसा माउस के राइट क्लिक का. किसी आइकन, फाइल या इंटरनेट एक्स्प्लोरर में किसी लिंक पर इन कुंजियों को दबाकर देखिए, कॉन्टेक्स्ट मेनू खुल जाएगा.

– Control+F10 का इस्तेमाल माइक्रोसॉफ्ट वर्ड की विंडो का आकार घटाने-बढ़ाने (मिनिमाइज- मैक्सिमाइज) करने के लिए किया जा सकता है.

F11

– इंटरनेट एक्सप्लोरर, क्रोम आदि ब्राउजरों में फुल स्क्रीन को सक्रिय-निष्क्रिय करने के लिए इसे आजमाएं.

– Alt+F11 को दबाने पर माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के सॉफ्टवेयरों में विजुअल बेसिक कोड विंडो खुल जाती है, जिसका इस्तेमाल एक्सपर्ट यूजर करते हैं.

F12

– माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में इसे दबाने पर Save As.. डायलॉग बॉक्स खुलता है.

– Shift+F12 से माइक्रोसॉफ्ट वर्ड का डॉक्युमेंट सेव हो जाता है.

– Control+Shift+F12 से माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में खुला डॉक्युमेंट प्रिंट हो जाता है.

हर उम्र में त्वचा की देखभाल कुछ इस तरह

कहते हैं उम्र के हर दौर में त्वचा की जरूरतें अलग अलग होती हैं. इसलिए अपने को उम्र भर जवां बनाएं रखने के लिए आप को अपनी त्वचा के प्रकार को जानना बहुत जरूरी है क्योंकि आप की ढीली त्वचा ही आप की बढ़ती उम्र का राज खोलती है. आप जितनी जल्दी अपनी त्वचा के प्रकार को जान कर उस पर ध्यान देंगी बढ़ती उम्र में उतना ही अच्छा होगा. अपनी त्वचा किस प्रकार ध्यान दे. इस बारे में बता रही हैं कौस्मोटोलौजिस्ट एंड माइंड थेरेपिस्ट अवलीन खोखर.

हमारी त्वचा के फंक्शन, फिजिकल स्ट्रक्चर और एनाटोमी बहुत जटिल होते हैं. जो हमारे मन व विचारों में होता है. वही बाहर दिखता है और यह हमारे शरीर और दिमाग में भी प्रभाव डालता है. जितना अधिक हम अपनी त्वचा के बारे में जानेंगे उतनी बेहतर तरीके से हम अपनी त्वचा के बारे में जानेंगे उतनी बेहतर तरीके से हम अपनी त्वचा के लिए ब्यूटी प्रोडक्ट्स चुन पाएंगे. हमारे शरीर का सब से बड़ा और संवेदनशील आर्गन त्वचा होती है जिस का एरिया 600 स्क्वायर इनचेज होता है और उस का वजन 3-4 किलो होता है. हमारे शरीर में सब से एरिया हमारे हाथों, पैरों के तलवों पर होता है. सब से पहला एरिया हमारे आयलिड्स पर होता है. हमारी त्वचा एक ऐसा आर्गन है जिस से औक्सीजन देने के लिए और कार्बन डाई औक्साइड छोड़ने के लिए सांस लेने की जरूरत होती है और साथ ही यह त्वचा में मौइश्चराइजर की मात्रा भी बनाए रखती है.

त्वचा रूखी और बेजान है तो यह आप के लिए चेतावनी है कि अब आप को इस का खयाल रखना शुरू करना चाहिए अगर आप एक ऐसा रूटीन अपनाते हैं जिस से आप की त्वचा को पोषण मिले और वह सुरक्षित भी रहे तो आप की त्वचा लंबे समय तक जवां और चमकदार रहेगी.

आमतौर पर हमारी त्वचा खुद की रक्षा करने में सक्षम होती है लेकिन यह हमारी त्वचा को धूप के प्रभाव, सिगरेट के धुएं और वातावरण में प्रदूषण से नहीं बचा पाती तो यह बहुत जरूरी होता है कि हम अपनी मिनरल्स और न्यूट्रीएंट्स दें. जिस से हमारी त्वचा को धूप की किरणों के प्रभाव से बचा सकती है.

हर उम्र में अपनी त्वचा को समझें

अपनी त्वचा का खयाल रखने सब से पहली और जरूरी चीज है आप अपनी त्वचा को हर उम्र में समझें. जवां उम्र में हमारी त्वचा बहुत सुंदर होती है. हमारे सैल्स जो न्यूट्रीएंट्स और फाइबर से भरे होते हैं वे हमारी त्वचा को एकसाथ जोड़ कर उसे इलास्टिक, स्कूथ और यंग दिखाते हैं क्योंकि इस उम्र में केराटिनाइजेशन सही मात्रा में होती है पर जैसेजैसे आप की उम्र बढ़ने लगती है वैसे ही आप की त्वचा अंदरूनी और बाहरी हिस्सों से प्रभावित होने लगती है. कोलेजन फाइबर के सूखने से ये त्वचा में से लचीलेपन को खत्म कर देते हैं. बढ़ती उम्र में ये सभी चीजें हमारी त्वचा को प्राकृतिक रूप से सुरक्षा देती है और वे सभी पदार्थ जो त्वचा में मौइश्चराइजर की मात्रा बनाए रखते हैं उन सभी का उत्पादन कम होने लगता है. इस के परिणामस्वरूप हमारी त्वचा में इरीटेशन होने लगती है और तो और त्वचा रूखी भी होने लगती है. अंत में त्वचा में झुर्रियां और लाइन्स आने लगती हैं.

त्वचा की विषमताएं व प्रकार

त्वचा 5 प्रकार की होती है

सूखी त्वचा

जिन लोगों की त्वचा सूखी होती है उन की त्वचा की सतह बहुत पतली होती है और अंदर की कैपिलरीज बहुत आसानी से नजर आने लगती है, चेहरा धोने के बाद बहुत तना हुआ महसूस होने लगता है और बाहरी तत्त्वों के कारण चेहरा लाल भी पड़ने लगता है चेहरे पर फाइन लाइन और पिगमेंट्स के धब्बे भी नजर आने लगते हैं.

सामान्य त्वचा की समस्या

डिहाइड्रेशन और सर्दियों के मौसम में त्वचा पर से डेड स्किन उतरने लगती है. सूखी त्वचा का उपचार करने के लिए आप को ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए और अपने चेहरे को गरम पानी से न धोएं, चेहरे को बहुत जोर से दबा कर न पोंछें और अपनी त्वचा के हिसाब से स्किन फ्रैंडली कौस्मैटिक पदार्थ का इस्तेमाल करें.

औयली स्किन

इस तरह की स्किन में तेल औयल अधिक होने से स्किन अधिक चमकने लगती है. जिस से एक्ने हो सकते हैं एक्ने भी 2 प्रकार के होते हैं.

ट्रू एक्नेः इस प्रकार के एक्ने शरीर के अंदर होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण होते हैं.

इनफ्यूजड एक्नेः इस प्रकार के एक्ने अकसर गरमियों के मौसम में अथवा चेहरे पर गहरे घाव पड़ जाने से होते हैं. इस का उपचार करने के लिए आप को ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए. जिस से बैक्टीरिया और डस्ट बाहर निकल सके और त्वचा सुरक्षित हो.

कौंबिनेशन स्किन

जिस की त्वचा औयली व ड्राई दोनों होती है उसे कौंबिनेशन स्किन कहते हैं. अकसर टी जोन में स्किन औयली होती है और गालों पर सूखी अगर आप की त्वचा ऐसी है तो आप को औयली जगहों के लिए अलग से प्रोड्क्ट्स खरीदना चाहिए. अपनी त्वचा को समझे बिना प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से समस्या हो सकती है.

सेंसेटिव स्किन

इस तरह की त्वचा स्मूथ होती है लेकिन बाहरी चीजों जैसे परफ्यूम या एल्कोहल से रैशेज हो सकते हैं कुछ लोगों की त्वचा पर पैची स्केल्प आ सकते हैं और यह किसी भी उम्र में हो सकता है. सैंसिटिव स्किन वाले लोगों को अकसर एलर्जिक रिएक्शन हो जाते हैं या आनुवांशिक समस्या.

बेसिक स्किन केयर

महत्त्वपूर्ण हैं बेसिक स्किन केयर टिप्स

आप की त्वचा चाहे किसी भी टाईप की हो. उस की देखभाल के तरीके एक जैसे ही होते हैं. केवल ब्यूटी प्रोडक्ट्स ही त्वचा की टाइप के अनुसार बदलते हैं. अगर आप को बहुत अच्छी और बैलैंस्ड स्किन चाहिए तो आप को कुछ स्टेप्स फालो करने पड़ेंगे.

सी क्लींजिंग

लगभग सभी ब्यूटी उत्पादों में तेल की मात्रा बहुत अधिक होती है. हमें कुछ ऐसे उत्पादों की जरूरत है, जो हमारे चेहरे को साफ करें.

अपनी आंखों और होंठों के पास से आईमेकअप रिमूवर से स्किन को साफ करें. इस रिमूवर में इस्तेमाल होने वाले तत्त्व त्वचा के लिए माइल्ड होते हैं. इसलिए इस का इस्तमाल सही होगा.

अपने फेस मेकअप को क्लींजिंग मिल्क और वर्जिन कोकोनेट औयल से साफ करें जिस से स्किन क्लीन और सौफ्ट हो जाए.

अपने चेहरे को क्लींजिंग जैल और क्लींजिंग फोम से साफ करें. अपनी त्वचा के हिसाब से उत्पाद को चुनें.

हफ्ते में एक बार अपने चेहरे पर स्क्रब करें और मास्क भी लगाएं.

टी-टोनिंग

यह आप की त्वचा में बैलैंस्ड ले कर आएगा और त्वचा में पीएच की मात्रा को भी बैलेंस में रखेगा. अपनी त्वचा के हिसाब से सही उत्पाद चुनें.

एम-मौइश्चराइजिंग

मौइश्चराइजिंग हमारी स्किन के लिए न्यूट्रीएंट्स के समान होता है. यह त्वचा में मौइश्चर की कमी को पूरा करता है और उसे पहले से जवां, स्वस्थ और कोमल बनाता है. आप को अपनी त्वचा को हमेशा धूप, प्रदूषण से बचाए रखना चाहिए और साथ ही ऐसी चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए. जिन से आप की त्वचा के सैल्स रिपेयर हो सकें. ऐसा करने से आप की त्वचा पर झुर्रियां और फाइनलाइंस उम्र से पहले नहीं आएंगी.

सुबह के समय

सब से पहले किसी ऐसे उत्पाद का इस्तेमाल करें जो आप के चेहरे को मौइश्चराइजर दें और उसे फ्री रेडिकल्स से बचाएं. अपने चेहरे पर कम से कम 20 एस पी एफ या उस से अधिक का सनस्क्रीन जरूर लगा कर रखें. अपनी त्वचा का और भी बेहतर तरीके से खयाल रखने के लिए अगर आप को धूप में बहुत अधिक समय गुजारना होता है तो ऐसा सनस्क्रीन लगाएं जिस में एस पी एफ और पी ए दोनों हो.

सोने से पहले

जिस प्रोडक्ट का इस्तेमाल आप ने सुबह किया था उस के न्यूट्रीएंट्स इनग्रीडिएंट्स और रात के समय इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोडक्ट्स के न्यूट्रीएंट्स इनग्रीडिएंट्स में फर्क होगा. जो उत्पाद आप रात में इस्तेमाल करेंगे उस में सेरामाइड की मात्रा होती है जो सोल जैसे – रेटिनौल, विटामिन सी ई के रेटिनोल और एंटी औक्सीडेंट की प्रक्रिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है.

स्पेफिक स्किन ट्रीटमैंट

यह समस्या असामान्य मेलेनोसाइट्स, धूप या यूवी किरणों की वजह से होती है. इस से बचने के लिए लंबे समय तक धूप में न रहें. अगर आप को बाहर जाना पड़ता है तो अपने शरीर पर सही एसपीएफ और पीएच सनस्क्रीन लगाएं. आप कोई खास नरिशिंग प्रोडक्ट भी चुन सकते हैं.

फ्रेकल्स, मेलास्मस

मेलास्मस शरीर में हार्मोंस के बदलाव और यूवी किरणों की वजह से होते हैं. यह चेहरे पर बड़ेबड़े धब्बे होते हैं. यह अक्सर चेहरे के फैले हुए हिस्सों पर होते हैं.

यूवी किरणों से होने वाले फ्रेकल्स अक्सर गालों और नाक के पास के एरिया में होते हैं. कोई भी हार्मोन का इंजैक्शन लेने से पहले हमेशा अपने डाक्टर से सलाह लें. ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करें. जो मेलेनिन की मात्रा को कम करें.

लाइंस और अनइवन टैक्सचर

यह समस्या बढ़ती उम्र और एक्ने व स्कार्स की वजह से हो सकती है. ऐसे उत्पाद चुनें जो स्किन शेडिंग में आप की मदद करें और स्किन सैल्स रिन्यू करें और साथ ही त्चा अपर लेयर को भी जीवित करें. यह त्वचा के स्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में मदद करता है और त्वचा को कोमल बनाता है.

झुर्रियां

त्वचा में गिरावट और दृढ़ता की कमी यह समस्याएं समय के साथ बढ़ती उम्र और यूवी किरणों की वजह से होती है 80% त्वचा में झुर्रियां यूवी किरणों से होती है जो डर्मिस लेयर के अंदर कोलेजन और इलास्टिन टिश्यू को नष्ट कर देता है जिस से त्वचा गिरने लगती है और दृढ़ता की कमी भी आने लगती है. इस को ठीक करेन के लिए ऐसे उत्पाद चुनें जिस में माइक्रोकोलेजन और इलास्टिन के रूप में प्रोटीन्स हों जिन में आप की डर्मिस लेयर स्वस्थ हो सके.

इमोशनल लाइंस के लिए खास देखभाल

आप के एैक्स एंक्सप्रैशन लाइन्स जैसे गालों की लाइंस, आंखों के नीचे और माथे के आसपास झुर्रियां और डीप लाइंस आने लगती हैं.

त्वचा टाइप के अनुसार शरीर की देखभाल

हमारे शरीर पर त्वचा का काम हमें गरमी, रासायनिक पदार्थ और प्राकृतिक रोगाणुओं से बचाने का होता है, इसी कारण हमारी सब से ऊपर वाली त्वचा थिक होती है और इस में सेबेसियस ग्लांड्स भी कम होते हैं जिस से त्वचा में मौइश्चर और कोमलता कम होने लगती है. हमारी त्वचा पर रासायनिक पदार्थों और तेज धूप का बहुत अधिक प्रभाव होता है जिस से वे गहरी काली और रूखी हो जाती है. डेली बौडी केयर एक ऐसी चीज है जिसे हम नए उत्पादों के कारण नजरअंदाज नहीं कर सकते.

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