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दीपिका को अब केवल अफवाहों का सहारा

एक बार किसी ने कहा था कि अफवाहों के बल पर अभिनय करियर की नैय्या पार नहीं की जा सकती. मगर बेचारी दीपिका पादुकोण को तो महज अफवाहों का ही सहारा है. पर अफसोस की बात यह है कि दीपिका पादुकोण अपने प्रचारक या अपने बिजनेस मैनेजर अथवा अपने किसी शुभचिंतक की सलाह पर जो भी अफवाह रूपी गुब्बारा उड़ाती हैं, उसकी हवा दो दिन में ही निकल जाती है और उनका दांव हर बार खाली जाता है.

फिल्म ‘‘बजीराव मस्तानी’’ के बाद से दीपिका पादुकोण के करियर पर ग्रहण लगा हुआ है. दीपिका इस ग्रहण से छुटकारा पाने के लिए प्रयासरत हैं. आए दिन वह किसी न किसी तरह की खबर को फैला या अफवाह उड़ाकर खुद को मीडिया में सुर्खियों में रखने का असफल प्रयास करती जा रही हैं. अफसोस यही है कि उनकी सारी खबरे या अफवाहें ज्यादा समय तक टिक नही पाती. इतना ही नहीं इस तरह खुद को सुर्खियों में बनाए रखने के बावजूद उन्हे फिल्म भी नहीं मिल पा रही है.

अभी दो दिन पहले कुछ अंग्रेजी अखबारों में खबर छपी थी कि दीपिका पादुकोण अब फिल्म निर्देशक श्रीराम राघवन के निर्देशन में हर्षवर्धन कपूर के साथ एक रोमांचक फिल्म करने जा रही हैं. मगर दो दिन में ही इस खबर की भी पोल खुल गयी.

जब ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने इस खबर को लेकर फिल्म निर्देशक श्रीराम राघवन से संपर्क करने की कोशिश की, तो पता चला कि उन्होंने इस खबर के संदर्भ में मीडिया से दूरी बना रखी है. मगर उनके अति नजदीकी सूत्रों ने दावा किया कि श्रीराम राघवन ने हर्षवर्धन कपूर से जरूर अपनी आगामी रोमांचक फिल्म को लेकर बात की है और हर्षवर्धन कपूर ने इस फिल्म को ‘भावेष जोशी’’ की शूटिंग खत्म करने के बाद करने की बात कही है. मगर श्रीराम राघवन और दीपिका पादुकोण के बीच किसी फिल्म को लेकर कोई चर्चा भी हुई है, इसकी पुष्टि करने को कोई तैयार नहीं है.

सलमान के साथ क्यों काम करना चाहती हैं ऐश्वर्या

जब से ऐश्वर्या राय बच्चन ने कुछ शर्तों के साथ सलमान खान के साथ फिल्म करने की मंशा जाहिर की है, तब से बौलीवुड में लोग आश्चर्यचकित हैं. हर किसी को पता है कि सलमान खान और ऐश्वर्या राय के बीच क्या रिश्ते रहे हैं और इस रिश्ते में किस तरह की कड़वाहट आयी थी. इसी के चलते अभिषेक बच्चन के साथ शादी करने के बाद  ऐश्वर्या राय बच्चन ने सलमान खान के साथ कभी कोई संबंध नहीं रखा. लेकिन एक बहुत पुरानी कहावत है ‘मजबूरी में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है.’ ऐश्वर्या राय बच्चन के अति नजदीकी सूत्रों की माने तो ऐश्वर्या राय बच्चन भी इसी कहावत के अनुसार काम कर रही हैं.

वास्तव में अभिषेक बच्चन के साथ विवाह करने के बाद से ऐश्वर्या राय बच्चन का करियर निरंतर पतन की ओर ही अग्रसर रहा. इतना ही नहीं उनके पति अभिषेक बच्चन का करियर भी ठीक से आगे नहीं बढ़ पाया. एक बेटी आराध्या की मां बनने के पांच साल बाद ऐश्वर्या राय ने अपने करियर की नई शुरुआत फिल्म ‘‘जज्बा’’ के साथ की. इस फिल्म में वह सहनिर्माता भी थी. उन्हे उम्मीद थी कि इस फिल्म से उनके करियर को गति मिल जाएगी. लेकिन इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर पानी भी नहीं मांगा.

इसके बाद प्रदर्शित फिल्म ‘‘सरबजीत’’ की कमजोर कड़ी ऐश्वर्या राय बच्चन साबित हुई. परिणामतः उनके करियर पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लग गया. अभिनय करियर के गडमड होते ही उनके हाथ से इंडोर्समेंट निकलने शुरू हो गए. उधर उनके पति अभिषेक बच्चन भी बिना काम के घर पर बैठे हुए हैं.

अब ऐश्वर्या राय के सामने समस्या थी कि वह किसी तरह अपने अभिनय करियर को पटरी पर लाएं. यही सोचकर ऐश्वर्या राय बच्चन ने करण जोहर के निर्देशन में मल्टीस्टार फिल्म ‘‘ऐ दिल है मुश्किल’’ कर ली. और उन्होंने इस फिल्म में कई बोल्ड व किसिंग सीन दे डाले. सूत्रों का दावा है कि इन दृश्यों के बाहर आने के साथ ही अब ऐश्वर्या राय बच्चन को अपने घर के अंदर ही अमिताभ बच्चन की नाराजगी झेलनी पड़ रही है. हालात ऐसे हो गए हैं कि अब ऐश्वर्या राय बच्चन को मजबूरन फिल्म ‘‘ऐ दिल है मुश्किल’’ को प्रमोट करने से दूरी बनाने का निर्णय लेना पड़ा.

तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी अभिनेता फवाद खान की वजह से ‘ऐ दिल है मुश्किल’ का प्रदर्शन अधर में लटक गया है. इस फिल्म के बाद कहने के लिए तो ऐश्वर्या राय बच्चन ने प्रहलाद कक्कड़ की फिल्म ‘‘हैप्पी एनीवर्सरी की है. जिसकी शूटिंग खत्म हो चुकी है. इसमें उनके साथ उनके पति अभिषेक बच्चन व सुष्मिता सेन हैं. यह फिल्म 2016 में ही प्रदर्शित होने वाली थी, पर फिलहाल इस फिल्म का भविष्य भी पता नहीं. वैसे फिल्म ‘‘हैप्पी एनीवर्सरी’’ के निर्माता गौरंग दोषी की दूसरी फिल्म ‘‘आंखे 2’’ अमिताभ बच्चन कर रहे हैं.

इस तरह से ऐश्वर्या राय बच्चन के पास इन दिनों एक भी फिल्म नहीं है. उनके पास खुद को खबरों में बनाए रखने के लिए भी कुछ नहीं है. जबकि बौलीवुड जैसे शो बिजनेस में कलाकार का हमेशा सुर्खियों में रहना जरूरी माना जाता है. इतना ही नहीं वह कई इंडोर्समेंट खो चुकी हैं. ऐसे में अपने आपको सुर्खियों में बनाए रखने के लिए तथा नई फिल्म पाने के लिए कुछ तो शगूफा छोड़ना ही पड़ेगा. यही सोचकर ऐश्वर्या राय बच्चन ने सलमान खान के साथ फिल्म करने की इच्छा जाहिर करते हुए शर्त रख दी कि यदि अच्छा निर्देशक और अच्छी पटकथा होगी, तो वह सलमान खान के साथ काम करना चाहेंगी.

आज की तारीख में सलमान खान ही सफलतम अभिनेता हैं. इसलिए उनके नाम पर दांव लगाना ज्यादा बेहतर रहा. इससे वह एक बार खबरों में छा गयी. यदि कोई फिल्म मिल गयी, तो सोने पे सुहागा हो जाएगा. रहा सलमान खान के साथ फिल्म करने की, तो शर्त पूरी होनी चाहिए. अब शर्त ऐसी है जो कि कभी पूरी नहीं हो सकती..क्योंकि एक बेहतरीन व सफल निर्देशक हर कलाकार की  नजर में अच्छा हो, यह जरूरी नहीं. इसी तरह एक पटकथा हर कलाकार को पसंद आ जाए, यह जरूरी नही..बहरहाल, हमारी नजर इस बात पर टिकी हुई है कि ऐश्वर्या राय बच्चन ने जो तीर छोड़ा है, वह उनकी सोच के अनुरुप सही निशाने पर लगता है या नहीं.

तीसरे टेस्ट में करुण नायर लेंगे धवन की जगह

कर्नाटक के युवा बल्लेबाज करुण नायर को चोटिल शिखर धवन की जगह न्यूजीलैंड के खिलाफ आठ अक्टूबर से इंदौर में होने वाले तीसरे टेस्ट मैच के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया है.

नायर ने भारत के लिए दो वनडे इंटरनैशनल खेले हैं उन्हें कोलकाता में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में शिखर धवन के बाएं अंगूठे में फ्रैक्चर के कारण टीम में शामिल किया गया है.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इसकी पुष्टि की है. बीसीसीआई के सचिव अजय शिर्के ने एक बयान में कहा, 'अखिल भारतीय सीनियर चयन समिति ने चोटिल शिखर धवन की जगह करुण नायर को टीम में शामिल किया है. बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो जाने के कारण वह न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाले तीसरे टेस्ट मैच में नहीं खेल पाएंगे.'

धवन को दूसरे टेस्ट मैच में ट्रेंट बोल्ट की गेंद पर चोट लग गई थी. भारत ने यह टेस्ट मैच 178 रनों से जीत सीरीज में 2-0 की बढ़त ले ली है.

अब फेसबुक पर बेच पाएंगे अपना पुराना सामान

सोशल मीडिया वेबसाइट Facebook ने एक नया आनलाइन ‘मार्केटप्लेस’ शुरू किया. इसकी मदद से फेसबुक यूजर्स आपस में खरीद-फरोख्त कर संकेंगे. इस नए फीचर से फेसबुक क्रेग्सलिस्ट जैसे स्थानीय आनलाइन बिक्री प्लेटफार्म के साथ प्रतिस्पर्धा में आ गया है. इसके साथ ही यह इबे जैसे मार्केटप्लेस के विकल्प की पेशकश करेगी.

फेसबुक ने एक पोस्ट में लिखा है कि इस नये फीचर की मदद से कंपनी उसे औपचारिक रूप दे रही है जो कि फेसबुक ग्रुप के जरिए लोग वर्षों से कर रहे हैं. कंपनी की प्राडक्ट मैनेजर केरी कू ने लिखा है,‘ यह गतिविधि फेसबुक ग्रुप में शुरू हुई और तेजी से बढ़ी. हर महीने 45 करोड़ से अधिक लोग खरीदोफरोख्त ग्रुपों में आते जाते हैं.’

फेसबुक ने कहा है कि कई सदस्य पहले ही फेसबुक समूह बनाकर ऐसा करते थे. अब फेसबुक ने इस नए प्रोग्राम के जरिये बेचने और खरीदने को औपचारिक तौर पर लॉन्च कर दिया है. प्रोडक्ट मैनेजर मैरी क्यू ने ब्लॉग पोस्ट में लिखा है, ‘आजकल फेसबुक में लोग कुछ अन्य तरीकों से एक दूसरे से जुड़ रहे हैं. वे एक दूसरे को सामान खरीद बेच रहे हैं.’

उन्होने बताया कि लगभग 45 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक में अपना सामान खरीदते बेचते हैं. इस नए फीचर से लोगों को और मदद मिलेगी. इस नए फीचर में लोग अपनी लोकेशन, अपनी पसंद और बजट के हिसाब से सामान चुन पाएंगे.

व्हॉट्सएप्प में कैसे भेजें बड़ी फाइल?

व्हॉट्सएप्प पर आप फाइलों को आसानी से शेयर कर सकते हैं. ये फीचर 2016 में ही व्हॉट्सएप्प ने प्रोवाइड किया है, लेकिन अगर आपका ब्राउजर, वेब वर्जन को सपोर्ट नहीं कर रहा है, तो आपके सामने मुश्किल खड़ी हो सकती है.

इन 8 स्टेप्स की मदद से आप अपनी मुश्किल को आसान बना सकते हैं.

स्टेप 1: ड्रॉपबॉक्स एप्प को इंस्टॉल करें. अपना एकाउंट बनाएं और इसमें अपने करंट एकाउंट से लॉगइन करें.

स्टेप 2: अगला, अपनी एंड्रॉयड डिवाइस पर क्लाउडसेंड को इंस्टॉल करें और सुनिश्चित करें कि एप्प आपकी सभी फाइलों को एक्सेस करने की परमिशन दे रही है या नहीं.

स्टेप 3: ड्रॉपबॉक्स एप्प पर वापस लौटने के लिए, आपको सभी फाइल को एक्सेस करने के लिए क्लाउडसेंड के लिए ऑथराइजेशन प्रदान करने की आवश्यकता होती है. आप देखेंगे कि एप्प उसी नाम से दूसरे फोल्डर को क्रिएट कर देती है.

स्टेप 4: अब हम फाइलों को भेजने की प्रक्रिया शुरू करते हैं. अपने फाइल मैनेजर में, फाइल को ब्राउज करें कि आप फाइल भेजना चाहते हैं, जब तक कि आपको क्लाउडसेंड का ऑप्शन नहीं दिख जाता है.

स्टेप 5: क्लाउडसेंड को सेलेक्ट करने पर, सेलेक्टेड फाइल, ठीक उसी नाम के साथ ड्रॉपबॉक्स में फोल्डर के लिए अपलोडेड कर दी जाएगी.

स्टेप 6: क्लाउडसेंड एप्प, फाइल साइज के लिए कोई निश्चित प्रतिबंध नहीं लगाती है. यह यूजर्स को दो तरीके से शेयर करने के लिए अलॉउ करती है. या तो फाइल को सीधे शेयर किया जा सकता है या दिये गये लिंक से संदर्भित लिंक से शेयर किया जायें.

स्टेप 7: शेयर बटन पर क्लिक करते हुए, आपको शेयर करने के लिए कई विकल्प सामने दिखेंगे कि आपको कहां और किस प्लेटफॉर्म पर शेयर करना है.

स्टेप 8: अंत में, व्हॉट्सएप्प को सेलेक्ट करें और जिनको भी भेजना हो, उनके नाम पर टिक मारते जायें. सभी को फाइल सेंड हो जायेगी.

राफेल डील: रिलायंस-दसॉल्ट ने बनाया ज्वाइंट वेंचर

देश में निजी रक्षा उद्योग के क्षेत्र में एक बड़ा करार हुआ है. इसके तहत राफेल लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन एवं अनिल अंबानी की अगुवाई वाले रिलायंस समूह ने संयुक्त रणनीतिक उपक्रम स्थापित करने का ऐलान किया है.

इस उपक्रम को राफेल विमानों के लिए बड़ा भारत में निर्माण सामग्री का बड़ा ऑर्डर मिलने की संभावना है. इससे रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र में रोजगार बढ़ेंगे. यह उपक्रम लड़ाकू विमान सौदे के तहत 22,000 करोड़ रुपये के ‘ऑफसेट’ अनुबंध को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

भारत से खरीद होगी

भारत और फ्रांस ने 23 सितंबर को 36 लड़ाकू विमानों की खरीद के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते में 50 फीसदी का ऑफसेट अनुबंध का प्रावधान है जिसका मतलब यह हुआ कि सौदे की आधी राशि की सामग्री भारत में निर्मित होगी.

यानी दसॉल्ट एविएशन या इससे जुड़ी कंपनियां इसे भारत से खरीदेगी. इसी कड़ी में रियालंस एयरोस्पेस ने एक संयक्त उपक्रम को मंजूरी दी है.

दसॉल्ट-रिलायंस एयरोस्पेस

रियायंस समूह के बयान के मुताबिक संयुक्त उपक्रम दसॉल्ट-रिलायंस एयरोस्पेस के नाम से होगा. नागपुर में रिलायंस एयरोस्पेस पार्क स्थापित कर रहा है, जहां राफेल के लिए सामग्री तैयार होगी. यह सामग्री क्या होगी इसका ब्योरा जल्द तैयार होगा. साथ ही अभी स्पष्ट नहीं है कि इस उपक्रम को कितना बड़ा ऑर्डर मिलेगा. लेकिन रिलायंस समूह का दावा है कि वह इसमें एक अहम भागीदार होगा. सौदे के बाद यह पहला साझा उपक्रम है.

भागीदारी में क्या-क्या

दसॉल्ट और रिलायंस के बीच प्रस्तावित रणनीतिक भागीदारी में स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित एवं विनिर्मित (आईडीडीएम) के तहत परियोजनाओं के विकास पर जोर होगा. आईडीडीएम कार्यक्रम रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर की एक नई पहल है.

विमानों का सौदा

लड़ाकू विमानों का यह सौदा 7.87 अरब यूरो (करीब 59,000 करोड़ रुपये) का है. राफेल सौदे में अन्य कंपनियां फ्रांस की एमबीडीए तथा थेल्स शामिल हैं. इसके अलावा सैफरान भी ऑफसेट बाध्यता का हिस्सा है.

प्रौद्योगिकी साझेदारी

ऑफसेट अनुबंध में प्रौद्योगिकी साझेदारी की भी बात है जिस पर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के साथ चर्चा हो रही है. इसके साथ ही बड़े भारतीय कार्यक्रम का विकास होगा जिससे पूरे एयरोस्पेस क्षेत्र को लाभ होगा.

मेक इन इंडिया को गति मिलेगी

बयान के अनुसार, नया संयुक्त उपक्रम दसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया और कुशल भारत अभियान को गति देगा. बता दें कि रिलायंस समूह रक्षा क्षेत्र में जनवरी 2015 में आया. ऐसे में यह समझौता समूह के लिए उत्साहजनक है.

जियो को टक्कर देने आया ‘वोडाफोन प्ले’

दूरसंचार बाजार में ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए वोडाफोन ने अपने ग्राहकों के लिए एक और शानदार ऑफर की पेशकश की है.

जी हां, अब वोडाफोन की सिम प्रयोग करने वाले ग्राहकों के लिए कंपनी की ओर से ‘वोडाफोन प्ले’ तीन महीने तक मुफ्त में देने की पेशकश की है. यह एप वीडियो, मूवी, टीवी शो और म्यूजिक की पेशकश करती है.

कंपनी ने बयान में कहा कि उसने अपने सभी ग्राहकों को 31 दिसंबर, 2016 तक वोडाफोन प्ले की पेशकश मुफ्त में करने का फैसला किया है.

वोडाफोन इंडिया के निदेशक वाणिज्यिक संदीप कटारिया ने कहा कि लोग अब अपने स्मार्टफोन पर अधिक से अधिक वीडियो देख रहे हैं और संगीत सुन रहे हैं. कई एप डाउनलोड करने के बजाय उन्हें सिर्फ वोडाफोन प्ले डाउनलोड करना होगा, जिसमें उनकी मनोरंजन की जरूरत के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ सामग्री उपलब्ध होगी.

गौरतलब है कि इससे पहले भी कंपनी अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए कई ऑफर पेश कर चुकी है. पिछले माह वोडाफोन ने डाटा वार में शामिल होकर 250 रुपए में 1 जीबी 4जी डाटा रि‍चार्ज कराने पर 9 जीबी 4जी डाटा फ्री देने का एलान किया था.

आपको बता दें कि कंपनी की ओऱ से दिए गए इस ऑफर के तहत 1 जीबी या उससे ज्‍यादा का रि‍चार्ज करने पर 9 जीबी का 4जी डाटा फ्री दि‍या जा रहा है. यानी वोडाफोन 250 रुपए में कुल 10 जीबी 4जी डाटा देगा. यह ऑफर भी 90 दिन के लिए है. कंपनी का यह ऑफर 26 सि‍तंबर से शुरू हो गया है और 31 दि‍संबर तक जारी रहेगा.

निपटा लें बैंक के काम, हो सकती है कैश की किल्लत

त्यौहारों का मौसम आ चुका है. दशहरा, दिवाली, छठ जैसे त्यौहारों को लेकर बजारों में रौनक है. लोग शॉपिंग में व्यस्त है. ऐसे में हमारी सलाह है कि आप अपने लिए घर में कैश का इंतजाम 7 अक्टूबर से पहले कर लें.

दरअसल बैकों में लगातार 5 दिनों की छुट्टियां शुरू हो जाएंगी. ऐसे में आपको कैश की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए बेहतर है कि आप घर में पहले से ही कैश का इंताजम कर लें ताकि आपकी खरीदारी में खलल ना पड़ें.

बैकों की छुट्टियां

कैश के साथ-साथ अगर आपको बैंक से संबंधित कोई भी काम करना है तो उसे निपटा लें, क्योंकि 8 से 12 अक्टूबर के बीच बैंक बंद रहेंगे. आपको बता दें कि इसके अलावा इस महीने चार दिन और बैंक बंद रहेंगे. पांच दिन लगातार बैंक बंद रहने से एटीएम में कैश की किल्लत हो सकती है.

कब से कब तक बैंक रहेंगे बंद

 – छुट्टियों की शुरुआत 8 अक्तूबर से होगी, क्योंकि उस दिन महीने का दूसरा शनिवार है.

– 9 अक्तूबर को रविवार की छुट्टी है, इसलिए बैंक बंद रहेंगे.  

– 10 अक्तूबर को रामनवमी की छुट्टी है.

– 11 अक्टूबर को दशहरा की छुट्टी है. अक्तूबर को मोहर्रम की छुट्टी रहेगी.

इसके अलावा 16 अक्तूबर को फिर रविवार पड़ रहा है.  29 को चौथा शनिवार होने के कारण छुट्टी रहेगी, जबकि 30 अक्तूबर को दीवाली है, तो 31 को गोवर्धन पूजा की छुट्टी के कारण बैंक बंद रहेंगे. ऐसे में अक्टूबर में बैंक 11 दिन बंद रहेंगे.

हिंदी पत्रकारिता: अर्थ का अनर्थ न करें

आज हम कोई भी हिंदी अखबार उठा कर देखते हैं तो सभी में खबर लिखने के तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए कई पत्रकार यहां तक कि टीवी चैनल्स पर भी ऐसी गलतियां देखने को मिलती हैं. खबरों के प्रस्तुतिकरण को ले कर अखबारों व टैलीविजन चैनल्स में बाकायदा नियम हैं, लेकिन फिर भी गड़बडि़यां लगातार होती रहती हैं. छोटाबड़ा हर पत्रकार इस तरह की गलतियां या चूक कर ही देता है. इन गलतियों से खबर तो हास्यास्पद हो जाती है और कई बार तो वह अपना अर्थ भी खो देती है.

यहां ऐसी ही कुछ गलतियों के बारे में बताया जा रहा है. जो पत्रकारों से अकसर अनजाने में हो रही हैं जो युवा पत्रकारिता में प्रवेश करने जा रहे हैं या करने की इच्छा रखते हैं, उन्हें भी इन छोटीछोटी गलतियों के प्रति सतर्क रहना चाहिए ताकि न सिर्फ खबर सही रूप में लोगों के सामने जाए, बल्कि उन की पत्रकारिता में भी एक नई धार पैदा हो सके.

‘बताया’ और ‘कहा’ में अंतर समझें

इस वाक्य पर गौर कीजिए, ‘याकूब कुरैशी ने अखबार से बातचीत में बताया कि अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन है.’

अकसर पत्रकार खबर लिखते या टैलीविजन पर पढ़ते समय ‘बताया’ और ‘कहा’ में भेद करना भूल जाते हैं. ‘बताया’ शब्द का इस्तेमाल तब होता है जब वक्ता कोई जानकारी देता है. जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता ने बताया कि उन की पार्टी के संगठनात्मक चुनाव दिसंबर में होंगे.

अमूमन पहले से प्रचारित या अस्तित्व में आ गई बात के लिए ‘बताया’ शब्द नहीं आएगा. अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन है, यह किसी की निजी राय है. यह कोई जानकारी नहीं है. इसलिए यहां ‘बताया’ के स्थान पर ‘कहा’ शब्द का प्रयोग होना चाहिए.

मृतक को जिंदा न करें

एक वाक्य देखिए, ‘बदमाशों ने अंधाधुंध फायरिंग की, जिस में कैलाश की मौके पर ही मौत हो गई. मृतक के परिजनों ने बताया कि मृतक घटना से कुछ ही देर पहले बेटी की शादी के लिए बाजार से खरीदारी कर के आया था. बदमाशों को देख कर मृतक ने भागने की भी कोशिश की, मगर विफल रहा.’

अकसर पत्रकार खबर में लिखते हैं कि मृतक यह कर रहा था या मृतक ने ऐसा किया. आखिर मरा हुआ व्यक्ति कैसे कुछ कर सकता है. भूतकाल की घटनाओं के वर्णन में मृतक शब्द का इस्तेमाल बिलकुल गलत है.

यहां हम मृतक का नाम ही इस्तेमाल करें, जैसे, ‘कैलाश के परिजनों ने बताया कि वह घटना से कुछ ही देर पहले बेटी की शादी के लिए बाजार से खरीदारी कर के आया था.’

पूरा होने से पहले ही वाक्य खत्म

यह वाक्य देखिए, ‘रामदीन बहुत तेज दौड़ा. जबकि वह बुखार में तप रहा था.’

कई पत्रकार ऐसे वाक्य लिखते हैं जिन के पूरा होने से पहले ही उन में पूर्णविराम लग जाता है. यहां वाक्य ‘तप रहा था’ पर खत्म हुआ, लेकिन जबकि से पहले भी पूर्णविराम लगा दिया गया. ‘जबकि’, ‘जो’, ‘लेकिन’, ‘जिन का’ जैसे वाक्यों को जोड़ने वाले शब्दों से पहले कभी भी पूर्णविराम नहीं होना चाहिए. इन से पहले कौमा यानी अर्द्धविराम का इस्तेमाल कीजिए या फिर कुछ भी मत लगाइए.

‘रामदीन बहुत तेज दौड़ा, जबकि वह बुखार से तप रहा था.’

ने, के, का, से बहुत परेशान करते हैं

वाक्यों को जोड़ने वाले ये अक्षर बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, जिन का इंट्रो लिखते वक्त गलत इस्तेमाल करने से अकसर पूरा वाक्य ही गड़बड़ा जाता है.

यह वाक्य देखिए, ‘कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि ने संस्था के पूर्व सदस्यों को सम्मानित भी किया गया.’ अकसर पत्रकार लंबे वाक्य में ‘ने’ अक्षर के पूरक शब्द ‘किया, दिया आदि’ का ध्यान नहीं रख पाते और ‘गया’ शब्द अतिरिक्त लगा देते हैं. ऐसा ही ‘के’, ‘का’ और ‘से’ के इस्तेमाल में होता है.

इसीलिए कोई वाक्य लिखते समय उस के शुरू और अंत में यह जरूर देखना चाहिए कि ‘ने’, ‘के’, ‘का’, ‘से’ आदि का बाकी शब्दों से तारतम्य सही बैठ रहा है या नहीं.

आयोजन आज है या कल, पता ही नहीं चलता

जब भी किसी खबर में तारीख या दिन का उल्लेख होता है तो कई पत्रकार गलती कर जाते हैं. उदाहरण के रूप में शनिवार 16 अप्रैल की शाम को एक पत्रकार खबर लिख रहा है. खबर में यह जानकारी दी जानी है कि क्रिकेट प्रतियोगिता सोमवार 18 अप्रैल से शुरू होगी.

अकसर पत्रकार लिख जाते हैं, ‘आयोजक ने आज प्रैस कौन्फ्रैंस में जानकारी दी कि क्रिकेट प्रतियोगिता कल से शुरू होगी.’ अखबार चूंकि अगले दिन यानी रविवार सुबह पाठक के पास पहुंचता है, इसलिए इसे पढ़ कर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है कि प्रतियोगिता रविवार से शुरू होगी या सोमवार से. बेहतर यही है कि हम खबर में आज या कल के बजाय दिन और तारीख का इस्तेमाल करें.

जैसे, ‘आयोजक ने शनिवार को प्रैस कौन्फ्रैंस में जानकारी दी कि क्रिकेट प्रतियोगिता सोमवार 18 अप्रैल से शुरू हो रही है.’ शीर्षक यानी हैडिंग को हम उस दिन के हिसाब से लगाते हैं जिस दिन अखबार पाठक के हाथ में जा रहा होता है. अखबार रविवार सुबह पहुंचेगा तो हम हैडिंग में सोमवार के लिए कल का इस्तेमाल कर सकते हैं.

मौत कभी संदिग्ध नहीं होती

अकसर अखबारों के शीर्षक में लिख दिया जाता है, ‘सुभाष नगर में श्रमिक की संदिग्ध मौत.’ वास्तव में मौत तो हो गई. उस में तो कोई संदेह है ही नहीं. संदिग्ध तो हालात, स्थितियां, परिस्थितियां होती हैं. इसलिए संदिग्ध मौत के बजाय संदिग्ध हालात में मौत, संदिग्ध परिस्थितियों में मौत लिखा जाना चाहिए.

तत्त्वावधान का नहीं है विधान

कोई भी व्यक्ति साधारण बोलचाल में तत्त्वावधान शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. फिर भी कई खबरों के इंट्रो में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है, जबकि इस से आसानी से बचा जा सकता है. द्वारा शब्द भी बोलचाल का नहीं है, पर कभीकभी इस से बचा नहीं जा सकता, लेकिन तत्त्वावधान से आसानी से बचा जा सकता है.

अकसर लिखा जाता है, ‘देशभक्ति कार्यक्रम का आयोजन महल्ला समिति के तत्त्वावधान में किया जा रहा है.’ इसे बड़ी आसानी से हम यों लिख सकते हैं, ‘देशभक्ति कार्यक्रम महल्ला समिति करा रही है या महल्ला समिति की तरफ से कार्यक्रम हो रहा है.’

‘इस अवसर पर’ और ‘उन्होंने कहा’ से बहुत लगाव है ये 2 शब्द ऐसे हैं, जिन का किसी खबर में बारबार और बेवजह इस्तेमाल होता है. बारबार उन्होंने कहा, उन्होंने कहा, लिख कर यह बात फलां व्यक्ति कह रहे हैं, लेकिन एक पैराग्राफ में सिर्फ एक बार ‘उन्होंने कहा’ लिखने से यह तो नहीं हो जाएगा कि उस बात को कोई और व्यक्ति कहने लगेगा. इसलिए एक पैरा में एक ही बार,’ उन्होंने कहा, का इस्तेमाल करें. ‘इस अवसर पर’ को भी एक ही बार इस्तेमाल करना चाहिए.

गलत किया तो महंगा तो पड़ेगा ही

2 शब्द हैं, ‘महंगा पड़ना’ इन्हें हम जानेअनजाने खूब इस्तेमाल करते हैं. जैसे, ‘मनचलों को महंगा पड़ा लड़की छेड़ना’, ‘चोरों को पुलिस लाइन में घुसना महंगा पड़ा.’ इस तरह नकारात्मक बातों में ‘महंगा पड़ा’ शब्द का प्रयोग असंगत है.

अगर कोई लड़की छेड़ने चला है यानी गलत काम करने चला है तो उसे तो यह काम महंगा पड़ना ही है. यह तो किसी क्रिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. कोई अच्छा काम करने चले और उस में नुकसान उठाना पड़ जाए, तब हमें कहना चाहिए कि उसे यह काम महंगा पड़ा.

किसी को पहाड़ पर नहीं चढ़ाना है

अखबारों में किसी अतिथि या मुख्य वक्ता के नाम का किसी खबर में जब दोबारा छोटे रूप में इस्तेमाल होता है तो भी ‘श्री’ या ‘श्रीमती’ शब्द का इस्तेमाल नहीं होता. जैसे ‘श्री सिंह’ या ‘श्री यादव’ ने कहा के बजाय ‘यादव ने कहा’ ही लिखा जाता है. इस के बावजूद कई पत्रकार ऐसा नहीं करते. वे बारबार नाम से पहले ‘श्री’ लगाते हैं.

बलात्कार पीडि़ता का नाम नहीं देना है

बलात्कार की खबर में पीडि़ता की पहचान छिपाई जानी चाहिए यानी न सिर्फ उस का नाम बल्कि उस के परिजनों का नाम भी नहीं दिया जाता है. अनेक अखबार छेड़खानी जैसी खबरों में भी इस नियम का पालन करते हैं, लेकिन पर्याप्त निगरानी के

अभाव में उन में काम करने वाले पत्रकार इन नियमों का अकसर उल्लंघन करते हैं.

अधिकारी का काम है निरीक्षण करना

ज्यादातर अखबारों में किसी अधिकारी के वक्तव्य से हैडिंग बनाने से परहेज बरतने का नियम है. इसीलिए अधिकारी का वक्तव्य या उस का नाम हैडिंग में तभी होना चाहिए जब वह कोई फैसला ले या ठोस कार्यवाही करे. खबर के अंदर भी अधिकारी या अतिथि के गुणगान से बचना चाहिए. भाषण में ‘ये होना चाहिए’ जैसी सतही चीजों को कम कर के ठोस बातों, फैसलों पर फोकस करना चाहिए.

ये सब लिखित, अलिखित नियम होने पर भी अनेक पत्रकार अधिकारियों के निरीक्षण पर हैडिंग लगाते हैं और उन का अनावश्यक भाषण छापते हैं. अरे भई, निरीक्षण करना तो अधिकारी का काम है, उसे तो वह करेगा ही.

आरोपी से भी पूछ लीजिए

‘क’ ने ‘ख’ पर कोई आरोप लगाया. हम ने ‘क’ के सारे आरोप छाप दिए और ‘ख’ से उस का पक्ष पूछा ही नहीं. ऐसा सभी अखबारों के पत्रकार खूब कर रहे हैं. ऐसी खबरों से बचा जाना चाहिए. ‘ख’ की प्रतिक्रिया लिए बिना कुछ विशेष परिस्थितियों में तब खबर दी जा सकती है जब किसी अथौरिटी (पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी या संस्था, सरकार) ने ‘ख’ के खिलाफ कोई कार्यवाही कर दी हो. कार्यवाही नहीं हुई, ‘ख’ का पक्ष भी नहीं लिया जा सका और खबर महत्त्वपूर्ण भी है यानी उसे रोका नहीं जा सकता. ऐसी स्थिति में हम आरोपी यानी ‘ख’ की पहचान गुप्त रख कर खबर दे सकते हैं.

नामजद है तो क्या हुआ

राष्ट्रीय स्तर पर बड़े मामलों में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर आरोपी का नाम खूब छपता है. स्थानीय स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण मामलों में ऐसा होता है. ऐसा इसलिए होता है कि बड़े मामले गंभीर और पुख्ता किस्म के होते हैं. इस के बनिस्पत हर छोटेछोटे मामले में केवल नामजद रिपोर्ट होना ही आरोपी का नाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर लोग अनेक झूठे मुकदमे दर्ज कराते हैं और उन में वे नाम भी लिखवाते हैं जो मौके पर थे ही नहीं. इसीलिए सामान्य स्थितियों में गिरफ्तारी होने या हिरासत में लेने से पहले नामजद व्यक्ति का नाम नहीं देना चाहिए. इस नियम के बावजूद अखबारों में धड़ल्ले से रिपोर्ट में नामजद लोगों के नाम छपते हैं.

अरे भई, बाप की क्या गलती है

कोई युवक यदि किसी अपराध में पकड़ा गया तो पुलिस कार्यवाही में उस के पिता का नाम भी दर्ज होता है, लेकिन खबर में अभियुक्त के पिता का नाम नहीं घसीटना चाहिए. पिता का उस अपराध में कोई दोष नहीं होता, इसलिए पिता का नाम नहीं देना चाहिए. हां, उस का पेशा दे सकते हैं. जैसे, ‘नामी बिल्डर का बेटा चेन झपटते दबोचा गया.’ इस नियम का पालन भी ज्यादातर अखबारों में नहीं होता.

हंगामा, सनसनी, हड़कंप, घेराव, हाहाकार का पीछा छोड़ें

इन भारी शब्दों को पत्रकारों ने इतना हलका बना दिया है कि हर खबर में इन का इस्तेमाल बहुतायत से होता है. किसी महल्ले में थोड़ी देर बिजली नहीं आई तो हाहाकार मच जाता है. यदि कयामत जैसी चीज आ जाएगी तो आप क्या मचाएंगे? फोटोग्राफर के कहने पर प्रदर्शन कर रहे कुछ लोगों ने हाथ उठा कर दोचार नारे क्या लगा दिए, खबर में तुरंत हंगामा हो जाता है. हर खबर सनसनी फैला देती है या फिर हड़कंप मचा देती है. फोटो में 4 छुटभैए नेता अफसर के सामने बैठ कर बात कर रहे होते हैं और खबर व फोटो परिचय बताता है कि अफसर का घेराव किया गया.

गड़बड़ कर देती हैं ‘इ’ और ‘ई’

अंगरेजी के जिन शब्दों के अंत में इ या उ की ध्वनि निकलती है, उन में आमतौर पर उन के दीर्घ रूप का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे आई, माई, हाई. इसी तरह यदि इ अक्षर किसी शब्द के बीच में आता है तो ज्यादातर वह छोटी इ के रूप में ही लिखा जाता है. जैसे, ड्राइवर, साइकिल, लाइन आदि. लगभग सभी अखबारों में इस तरह के शब्दों को ले कर बहुत अराजकता की स्थिति है. एक ही अखबार में हमें ‘ड्राईवर’भी देखने को मिलता है और ‘ड्राइवर’ भी. वर्तनी को ले कर तो खैर अखबारों में बिलकुल भी एकरूपता नहीं है. कुछ शब्दों को हर अखबार अलगअलग तरीके से इस्तेमाल कर रहा है. इस पर भी अलग से विचार की जरूरत है. वैसे दिल्ली प्रैस ने वर्तनी को ले कर एक मानक बनाया है, इस का इस्तेमाल अगर बाकी प्रकाशन संस्थान भी करें तो हिंदी की वर्तनी संबंधी सारी गड़बडि़यां दूर हो सकती हैं.                                       

कुछ और नियम

–       किसी व्यक्ति की उम्र बताने के लिए पूरा वाक्य इस्तेमाल नहीं होता. उम्र कोष्ठक में (45) लिखी जाती है. ‘वह 85 वर्ष के थे’ जैसे पूरे वाक्य का इस्तेमाल विशिष्ट व्यक्तियों की उम्र बताने में ही किया जाता है.

–       इकाई यानी एक अंक की संख्या हमेशा शब्दों में लिखनी चाहिए. जैसे एक, दो, पांच, नौ. इस के बाद की संख्याएं अंकों में लिखें जैसे 10, 11, 15 आदि.

–       10वीं, 5वीं, 21वीं के स्थान पर दसवीं, पांचवीं, इक्कीसवीं का ही प्रयोग करना चाहिए. हां, हैडिंग में 10वीं, 5वीं लिखा जा सकता है.

–       हैडिंग में द्वारा और व शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही शब्द बोलचाल के दौरान इस्तेमाल नहीं होते. खबर में भी द्वारा से बचना चाहिए, हालांकि हर बार ऐसा हो नहीं पाता.     

सपने मनीषा के

हिंदी फिल्म ‘आखिर कब तक’ में अपनी ऐक्टिंग की छाप छोड़ने वाली मनीषा सिंह पेशे से टैक्सटाइल इंजीनियर हैं. मौडलिंग के जरीए वे फिल्मों में आईं. आज वे हिंदी फिल्मों के साथसाथ मराठी और तेलुगु फिल्में भी कर रही हैं. उन्होंने टैलीविजन पर भी सीरियल किए हैं, जिन में ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ खास है. दिल्ली में मनीषा सिंह जब एक टैक्सटाइल कंपनी में काम कर रही थीं, तब वहां उन्हें मौडलिंग के कुछ औफर मिले. नौकरी करने के साथसाथ उन्होंने यह काम भी शुरू किया, जो लोगों को पसंद आया. इस के बाद मनीषा सिंह ऐक्टिंग के क्षेत्र में आ गईं और कई टैलीविजन सीरियल भी किए. यहीं से उन्हें फिल्मों में काम करने का औफर मिला. दक्षिण भारत की फिल्मों के भी कई औफर आए. अब उन की मराठी और हिंदी फिल्में भी बन रही हैं, जिन में ‘ट्विस्ट पे ट्विस्ट’ और ‘लव इन हैवन’ खास हैं.

क्या आप को हिंदी, दक्षिण भारतीय और मराठी फिल्मों के बीच तालमेल करने में कोई परेशानी तो नहीं आती है? इस सवाल पर मनीषा सिंह कहती हैं, ‘‘मैं बहुत सरल स्वभाव की हूं. ऐसे में सभी के साथ तालमेल हो जाता है. मुझे अच्छा काम करना है. इसी आधार पर परिवार वालों का सपोर्ट मिला.

‘‘फिल्म ‘आखिर कब तक’ दहेज की समस्या पर बनी है. इस में केवल दहेज से होने वाली लड़कियों की परेशानियों को ही नहीं दिखाया गया है, बल्कि दहेज के चलते अब लड़कों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. आज अच्छे लड़के देखे व पसंद किए जाते हैं. पहले केवल लड़कियों को ही देखा जाता था, पर अब लड़कों को भी लड़की वालों की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है.’’ मनीषा सिंह आर्मी परिवार से हैं. लिहाजा, फिल्मों में आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? इस सवाल पर वे कहती हैं कि उन का परिवार खुले विचारों का है. कैरियर बनाने में उन का बड़ा सहयोग मिलता रहा है. वे अच्छा काम करने की कोशिश में हैं. फिल्म छोटीबड़ी कोई भी हो सकती है, पर कहानी और किरदार अहम होते हैं. अब उन का फोकस हिंदी फिल्मों पर है. मनीषा सिंह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली हैं. उन की शुरुआती पढ़ाई वहीं हुई. कानपुर से पौलिटैक्निक कर के वे टैक्सटाइल इंजीनियर बनीं. भोजपुरी उन की बोली है. वे उस का पूरा सम्मान करती हैं. पर उन्हें भोजपुरी फिल्मों में काम करना कतई पसंद नहीं है. उन का परिवार भी नहीं चाहता कि वे भोजपुरी फिल्मों में काम करें. फिल्म और मौडलिंग के बाद अगर समय मिले और अच्छे फैशन शो का औफर मिले, तो वे उस में काम करती रहेंगी.

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