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स्वाद कुछ खास

जब कुछ खाने का मन करता है तब जायकेदार, स्वादिष्ठ व्यंजनों के बारे में सोच कर ही मुंह में पानी आ जाता है. ऐसे में एक से बढ़ कर एक कुछ मीठे कुछ नमकीन व्यंजन सामने परोस दिए जाएं तो कहने ही क्या. फिर देर किस बात की, अपने हाथों से बनाएं ये लजीज व्यंजन, जिन का स्वाद आप हमेशा याद रखेंगे.

चैरीबैरी

सामग्री : 2 बड़े चम्मच स्ट्राबैरी क्रश्ड, 2 कप क्रीम, चैरी सजाने के लिए, 1 कप पानी.

विधि : पहले वैनिला स्पौंज केक बना कर 3 लेयर में काटें. 1 बड़ा चम्मच क्रश्ड स्ट्राबैरी को पानी में अच्छी तरह मिला कर स्ट्राबैरी सिरप तैयार करें. बाकी बची क्रश्ड स्ट्राबैरी में क्रीम मिला कर स्मूद मिश्रण बनाएं. वैनिला स्पौंज केक की प्रत्येक लेयर को स्ट्राबैरी के सिरप में भिगोएं. प्रत्येक लेयर पर स्ट्राबैरी का मिश्रण लगाएं. एक के ऊपर एक लेयर रख कर स्ट्राबैरी मिश्रण से ऊपरी लेयर के किनारे बनाएं और बीच में चैरी से सजा कर परोसें.

पाइनऐप्पल कप केक

सामग्री : 11/2 छोटे चम्मच पाइनऐपल ऐसेंस, आवश्यकतानुसार क्रीम, 2-3 बूंदें पीला रंग, कलर्ड चौकलेट क्रीम, कलर्ड चौकलेट स्प्रिंकल्स, पाइनऐप्पल के टुकड़े आवश्यकतानुसार.

वैनिला स्पौंज की सामग्री : 100 ग्राम मैदा, 30 ग्राम मक्खन, 3 अंडे, 90 ग्राम कैस्टर शुगर, 1 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर.

विधि : वैनिला स्पौंज मिश्रण बनाएं और इस में 1 छोटा चम्मच पाइनऐप्पल ऐसेंस अच्छी तरह मिलाएं. फिर 1 कप मोल्ड में इसे आधा कप डाल कर ओवन में 160 डिग्री सैल्सियस पर 10 मिनट बेक करें. इसे ठंडा होने दें. फिर पीला रंग, पाइनऐप्पल ऐसेंस और क्रीम अच्छी तरह से मिलाएं. अब प्रत्येक कप केक के ऊपर क्रीम मिश्रण सजाएं. इसे पाइनऐप्पल के टुकड़े और कलर्ड चौकलेट स्प्रिंकल्स से सजा कर परोसें.

 

कौफी ग्लेज

सामग्री : 2 छोटे चम्मच कौफी पाउडर, 1 कप क्रीम, 1/2 कप चीनी, 11/2 कप पानी, स्ट्राबेरी सजाने के लिए.

चौकलेट स्पौंज की सामग्री : 100 ग्राम मैदा, 30 ग्राम मक्खन, 3 अंडे, 90 ग्राम कैस्टर शुगर, 1 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर, 50 ग्राम चौकलेट.

चौकलेट स्पौंज की विधि : मैदे और बेकिंग पाउडर को मिलाएं. अंडे को फेंट कर मक्खन और कैस्टर शुगर में डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. फिर सभी को मैदे के मिश्रण में मिलाएं. अब इस में चौकलेट पिघला कर अच्छी तरह मिलाएं. मिश्रण को चिकनाई लगी बेकिंग डिश में डाल कर ओवन में 200 डिगरी सैल्सियस पर 15 मिनट बेक करें.

विधि : चौकलेट स्पौंज केक ठंडा होने पर 3 लेयर्स में काटें. एक बाउल में

1 छोटा चम्मच कौफी पाउडर, चीनी और पानी को मिला कर कौफी सिरप तैयार करें. दूसरे बाउल में बचा कौफी पाउडर और क्रीम मिला कर क्रीम मिश्रण तैयार करें. प्रत्येक लेयर को कौफी सिरप में भिगो कर क्रीम मिश्रण से कवर करें. एकदूसरे के ऊपर रख कर क्रीम मिश्रण से सजाएं. 10-15 मिनट फ्रिज में रख कर स्ट्राबैरी से सजा कर सर्व करें.

 

 

बढ़ रहे तलाक के मामले

देश में तीन तलाक के मुद्दे पर सियासी और सामाजिक माहौल गरमाया हुआ है. मजहबी कट्टरपंथी मुसलिम पर्सनल ला में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध कर रहे हैं जबकि हिंदूवादी संगठन और केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने को आमादा दिख रही है.

यह ठीक है कि मुसलमानों में तलाक को ले कर मुसलिम महिलाएं बहुत त्रस्त हैं. केवल 3 बार तलाक कह कर औरत को छोड़ दिया जाता है. इस मामले में हिंदू संगठनों को खुश होने की जरूरत नहीं है. देश में हिंदुओं में भी तलाक के मामले बढ़ते जा रहे हैं. वह भी ऐसे में जब सगाई से ले कर फेरे तक धर्म के रीतिरिवाजों द्वारा आस्थापूर्ण तरीके से विवाह संपन्न कराए जाते हैं.

हम सुनते आए हैं कि जोडि़यां आसमान से बन कर आती हैं. सच तो यह है कि जोडि़यां टूटती धरती पर हैं. तलाक का रोग अब धीरेधीरे भारत में भी फैलता जा रहा है. हालांकि पश्चिमी देशों की तुलना में तलाक के मामले अभी भी यहां बहुत कम हैं. भारत में तलाक के ज्यादातर मामले बड़े शहरों कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, लखनऊ आदि में नजर आए हैं. पिछले एक दशक में कोलकाता में तलाक के मामले लगभग 350 प्रतिशत बढ़े हैं. मुंबई और लखनऊ में तो पिछले 5 वर्षों में यह 200 प्रतिशत बढ़ा है. तलाक के बढ़ते मामलों को देखते हुए बेंगलुरु में 2013 में 3 नए फैमिली कोर्ट खोलने पड़े थे. शादी के 5 साल के अंदर ही तलाक चाहने वाले ज्यादातर युवाओं के तलाक के हजारों मामले कचहरी में लंबित पड़े हैं.

आखिर हमारे देश में भी तलाक के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? हम शादी के फेरे लेते समय तो सात जन्म तक साथ रहने की कसमें खाते हैं. पर फिर ऐसा क्या हो जाता है जो तलाक की नौबत आ जाती है. तलाक के अनेक कारण हो सकते हैं जैसे पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक समस्याएं आदि. सब से पहले तो हमें यह समझना होगा कि औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण की दौड़ में अब संयुक्त परिवार टूट कर बिखर चुके हैं. तरक्की के मामले में अब गांव कसबा बन गया है, कसबा शहर और शहर मैट्रो. जहां सरसों के खेत थे, भैंसें बंधी होती थीं, उस जमीन पर अब मौल्स, शौपिंग कौंप्लैक्स, अपार्टमैंट्स और आईटी कंपनियों के दफ्तर बन गए हैं खासतौर से गुड़गांव में. यही हाल बाकी शहरों का भी है. साथ ही तलाक के मामले भी बढ़ रहे हैं.

तलाक के बढ़ते मामलों की सब से बड़ी वजह धर्म है. प्रेम, शादी और तलाक के बीच धर्म की गहरी घुसपैठ है. भला ब्याहशादी में धर्म का क्या काम? पंडे, पादरी, मुल्लामौलवी बीच में क्यों? किसी भी जोड़े के बीच सब से पहले धर्म, जाति, गोत्र का सवाल सामने आता है. अगर कोई जोड़ा धर्म की इन बाधाओं को पार कर के शादी कर भी लेता है तो परिवार, समाज का सामना करना उन के लिए मुश्किल होता है और आखिर नौबत रिश्ता टूटने तक आ जाती है.

हर धर्म के अपनेअपने पर्सनल ला बने हुए हैं. विवाह, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार जैसे मामलों में धर्म की दखलंदाजी है. वहीं, महिला पहले की अपेक्षा अब पढ़लिख रही है, तरक्की कर रही है.

रूढि़वादी बंधन : पहले की अपेक्षा स्त्रियों की शिक्षा दर में काफी वृद्धि हुई है. अब लगभग 46 प्रतिशत महिलाएं स्नातक या 12वीं पास हैं, पीएचडी में 40 प्रतिशत, 28 प्रतिशत इंजीनियरिंग में, 40 प्रतिशत आईटी में, 32 प्रतिशत वकालत में और 35 प्रतिशत मैनेजमैंट में लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं. इन कोर्सेज की पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च होता है. जाहिर है इतना खर्च कर के पढ़लिख कर वे घर में तो नहीं बैठेंगी. वे भी नौकरी करने लगती हैं तो उन में कुछ आत्मसम्मान, स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता की भावना आना भी स्वाभाविक है. वे कठोर या रूढि़वादी बंधन अब बरदाश्त नहीं कर सकती हैं. ऐसे में आपसी टकराव और रंजिशें बढ़ने लगती हैं. अब औरत भी रिश्ते में बराबरी चाहती है पर धर्म उसे बेडि़यों में जकड़े रखना चाहता है.

सासससुर का दखल : एक तरफ जहां बेटे की शादी के बाद भी अकसर मां बेटे पर पहले जैसा ही अधिकार समझती है तो दूसरी तरफ पत्नी का भी पूर्ण अधिकार अपने पति पर होना स्वाभाविक है. कभी बेटी के मातापिता पतिपत्नी के बीच के छोटेमोटे विवाद में अपनी बेटी का जरूरत से ज्यादा पक्ष लेते हैं. इस से विवाद बढ़तेबढ़ते बड़ा रूप ले लेता है. परिवार अपनी बहू से लड़का ही चाहता है. लड़की होने पर बहू का तिरस्कार किया जाता है. कदाचित तलाक के एक ऐसे केस में अदालत को और्डर देना पड़ा था कि 6 महीने तक पतिपत्नी को साथ रहने दिया जाए, इस बीच दोनों में किसी के मातापिता उन से कोई संपर्क नहीं रखें. 6 महीने साथ रहने के बाद भी अगर वे तलाक चाहते हैं तो कोर्ट उस पर विचार करेगा.

इच्छा के विरुद्ध शादी : मातापिता अपनी संतान की शादी उन की इच्छा के विरुद्ध अपनी मरजी से कर देते हैं, कभी तिलक की रकम तो कभी जातपात या धर्म के चलते. इस के चलते पतिपत्नी में प्रेम का अभाव होता है.

सासबहू का झगड़ा : सास अपनी बहू पर ज्यादा रोब जमाने लगती हैं. धार्मिक परंपराओं को निभाने का दबाव डालती है. एक या दो पीढ़ी पहले उन की सास उन के साथ रहा करती होंगी लेकिन आजकल की पढ़ीलिखी कमाऊ बहू को यह बरदाश्त नहीं है और वह विद्रोह करती है. इस से घर में तनाव पैदा होता है और पति के साथ भी रिश्ता बिगड़ जाता है.

धारा 498 ए और घरेलू हिंसा के नियम का दुरुपयोग : कुछ वर्ष पहले औरतों को दहेज विरोधी उपरोक्त नियम से कुछ विशेष अधिकार मिले थे ताकि उन को पति या ससुराल का कोई सदस्य दहेज न मिलने या कम मिलने के चलते प्रताडि़त न करे. इस की आड़ में छोटीमोटी बातों को तोड़मरोड़ कर पत्नी, पति के विरुद्ध मुकदमा इस धारा के तहत दायर कर देती है. आगे चल कर मुकदमे का अंजाम ज्यादातर तलाक ही होता है.

साजिश के तहत शादी : कभी कोई गरीब या साधारण घर की लड़की बहुत अमीर घर के लड़के से शादी कर लेती है. आगे चल कर ब्लैकमेल कर मोटी रकम ले कर तलाक कर समझौता कर लेती है. स्थिति इस के विपरीत भी हो सकती है यानी कोई गरीब लड़का और अमीर लड़की.

प्यार में कमी आना : लड़कालड़की प्रेमविवाह तो कर लेते हैं पर कभीकभी उसे निभा नहीं पाते हैं. शादी के कुछ अरसे बाद उन का प्यार कम होने लगता है और वे अलग होना ही बेहतर समझते हैं. क्योंकि वे धर्म और जाति की रूढि़वादी परंपराओं में अलगअलग रह नहीं पाते.

व्यभिचार का होना : कभीकभी तो पति या पत्नी का व्यभिचारी होना भी तलाक का कारण बन जाता है. हमारा कोर्ट भी इसे तलाक के लिए जायज मुद्दा मानता है और साबित हो जाने पर इस आधार पर तलाक मंजूर हो जाता है.

किसी प्रकार की मृगमरीचिका : कभीकभी पति या पत्नी को यह वहम होता है कि उस का वर्तमान साथी उसे वह खुशी नहीं दे पा रहा है जो कोई दूसरा पुरुष या महिला उस को दे सकती है. ऐसी कल्पना मात्र से दोनों के एकदूसरे के प्रति प्रेम और रुचि में कमी आ जाती है.

मायके से ज्यादा नजदीकी : शादी के बाद भी औरत अगर ससुराल को नजरअंदाज कर मायके को प्राथमिकता देती है तो यह पति या ससुराल वालों को अच्छा नहीं लगता है. औरत अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा मायके पर खर्च करे, तो ससुराल वालों को आपत्ति होती है. इस से कमाऊ पत्नी नाराज हो जाती है.

इस के अतिरिक्त हजारों ऐसे मामले भी हैं जहां पति या पत्नी एकदूसरे से बिना तलाक के अलग रह रहे हैं. वे चाहे कितनी भी लंबी अवधि तक अलग रहें, यह तलाक का आधार नहीं हो सकता है. हां, जहां पति या पत्नी ने पहले से ही तलाक की अर्जी दे रखी है, कोर्ट उन को एक खास समय के लिए कानूनी अलगाव की मंजूरी देता है ताकि वे एकदूसरे से अपने रिश्ते के बारे में पुनर्विचार करें. इस अवधि में वे कानून की नजर में शादीशुदा रहेंगे. फिर अगर वे साथ रहने का फैसला लेते हैं तो कोर्ट उन की तलाक की अर्जी खारिज कर सकता है. अगर वे साथ न रहना चाहें तो कानून के अंतर्गत उन की तलाक याचिका सुनी जाएगी.

जो भी हो, तलाक पति या पत्नी किसी के लिए अच्छा नहीं है. मानसिक तनाव तो दोनों को होता है. अगर उन के बच्चे हुए तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है.

हमारा कोर्ट भी तलाक के मामले में अंत तक पतिपत्नी को मिलाने का प्रयास करता है. एकदूसरे की छोटीमोटी गलतियों या कमियों को उजागर न कर के, उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है ताकि रिश्ते में माधुर्य बना रहे और बात घर से बाहर निकल कर कोर्टकचहरी तक पहुंचने की नौबत न आए. पतिपत्नी में परस्पर विश्वास बना रहे, वे एकदूसरे की भावना और पारिवारिक जिम्मेदारी को महत्त्व दें. 

2016 का अमेरिकी चुनाव : दुनिया की लोकतांत्रिक प्रणालियों पर धब्बा

अमेरिकी राष्ट्रपति पद पर डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. सारे चुनावी अनुमान ध्वस्त हो गए हैं. ऐसी जीत की किसी को उम्मीद नहीं थी. ट्रंप के समर्थन में हवा चल रही थी और तमाम विशेषज्ञ इसे समझने में नाकाम रहे. विश्व के सब से पुराने, मजबूत और आदर्श माने गए अमेरिकी लोकतंत्र में जहरीली हवा फैला कर हासिल की गई यह जीत अब डरावनी लगने लगी है. इसलिए अमेरिका के अनेक हिस्सों में ट्रंप की जीत के खिलाफ धरने प्रदर्शन शुरू हो गए. ‘नौट आवर प्रेसिडैंट’ की तख्तियां लिए सड़कों पर उतरे लोग ट्रंप के पुतले फूंक रहे हैं. क्या स्वतंत्रता, बराबरी, न्याय के सिद्धांत पर आधारित लोकतंत्र के लिए यह जीत दुनिया की लोकतंत्र प्रणालियों पर काला धब्बा है?

अमेरिका की नस्लवादी और पुरुषवादी श्वेत व रंगीन आबादी ने ट्रंप को खासे बहुमत से जिता कर यह जाहिर कर दिया है कि उसे अपने राष्ट्रवाद, नस्लवाद और अमीर अर्थतंत्र की चिंता है न कि मानव इतिहास में बदलाव, सामाजिक सुधार और क्रांति की, यानी यह जीत नस्लीय सामाजिक व्यवस्था पर मुहर है.

मीडिया को भले ही यह उम्मीद रही हो कि अमेरिकी राष्ट्रपति के 225 साल के इतिहास में पहली बार एक महिला को राष्ट्रपति बनाने का मौका मिला है और वह हिलेरी क्लिंटन को जिता कर उदारवादी, समानता की सोच पर मुहर लगाएंगे पर इस जीत से स्पष्ट है कि अमेरिका में कट्टर राष्ट्रवाद का जन्म हो रहा है और वास्तविक उदारवाद हार रहा है. यह दृश्य एशिया में भारत से ले कर अब अमेरिका, यूरोप और अरब देशों में भी देखने को मिल रहा है.

खतरे में लोकतंत्र

जो स्थितियां लोकतंत्र को किसी भी देश में सफल बनाती हैं, वे अब गौण हो रही हैं. यह लोकतंत्र के लिए गंभीर समस्या है. अमेरिकी चुनावी नतीजों से वहां के उस समाज की सोच का भी खुलासा हो गया जो उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों के खोखले दावे करता आया है और दुनिया को लोकतंत्र की सीख देता आ रहा है.

दरअसल 18 महीने लंबा चुनाव अभियान श्वेतों, अश्वेतों, धर्म और नस्ल के आधार पर सब से विभाजनकारी चुनाव था. प्रचार अभियान के दौरान वास्तविक मुद्दे गायब थे. चुनाव प्रचार के दौरान निचले स्तर की बयानबाजी के साथ एकदूसरे के परिवार को भी नहीं बख्शा गया.

रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप ने मुसलमानों, अश्वेतों, अप्रवासियों के खिलाफ जम कर जहर उगला. उन्होंने मसजिदों पर निगरानी रखने, मुसलमानों को देश से बाहर निकालने, आईएस जैसे आतंकी ठिकानों पर बमबारी, अमेरिका-मैक्सिको के बीच दीवार खड़ी करने और अप्रवासियों को रोकने जैसी बातें कहीं. ट्रंप का यह रवैया घृणा से प्रेरित था. कट्टर मानसिकता वाली जनता के बीच उन की यह कारगुजारी काम कर गई.

चुनावी सभाओं में कड़वाहट इस कदर व्याप्त थी कि जगहजगह झड़पें होती रहीं. ट्रंप की सभाओं में अश्वेतों व विरोधियों के साथ मारपीट की गई.

ट्रंप महिला विरोधी बयानों व यौन उत्पीड़न समेत कई विवादों से घिरे रहे. कई सैलिब्रिटी, मौडल्स समेत महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. हौलीवुड अदाकारा लिंडसे लोहान का वीडियो चर्चित रहा जिस में ट्रंप उन पर भद्दी टिप्पणियां कर रहे हैं. और भी कई वीडियो सामने आए जिन में टं्रप अश्लीलता की सीमाएं लांघते दिखे. ट्रंप ने अपनी प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन के पति पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की के सैक्स स्कैंडल्स को भी खूब उछाला.

ट्रंप को लगभग सारे सर्वे हरा रहे थे. न्यूयार्क टाइम्स, सीएनएन सहित 80 प्रतिशत अमेरिकी मीडिया व 75 फीसदी बड़े उद्योगपति उन के खिलाफ थे. उन की खुद की रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने ट्रंप को हराने की अपील की थी. दुनिया के 27 देशों के मीडिया ने ट्रंप की जीत को खतरनाक बताया था. अखबारों ने उन्हें वोट नहीं देने की अपील तक की थी. इस के बावजूद परिणाम हतोत्साहित करने वाले निकले और ट्रंपबाजी मार ले गए.

मुद्दे नदारद

अमेरिका के मशहूर लेखक डगलस कैनेडी ने ट्रंप के घृणास्पद प्रचार पर यहां तक कह दिया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के जीतने की संभावना नहीं है पर अगर वे जीत जाते हैं तो अमेरिका के मुसोलिनी साबित होंगे. साउथ कैरोलिना की गवर्नर निक्की हेली ने भी कहा कि मैं हर दिन इस बात पर सांस रोक लेती हूं कि अब ट्रंप क्या बोलेंगे यानी वे निचले स्तर की बयानबाजी की तमाम सीमाएं लांघ चुके हैं.

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान रोजगार, विकास, विदेश नीति जैसे बुनियादी मुद्दों पर चर्चा न के बराबर हुई. ट्रंप को उन की पार्टी के ही नेता जालसाज बता चुके थे. उन्होंने अमेरिका में मुसलमानों और लैटिन अमेरिका मूल के लोगों के बारे में भेदभाव की वकालत की थी.

मतदान से पहले यह बात सामने आ चुकी थी कि मतदाता अमेरिकी राजनीति से घृणा करने लगे हैं. उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं रहा कि ऐतिहासिक रूप से अब तक के सब से गंदे प्रचार के बाद चुना गया राष्ट्रपति क्या देश को एकजुट कर पाएगा. वोटरों को नहीं लगता कि नफरत व नैराश्य से भरे इस चुनावी वातावरण के बाद देश को पुरानी धारा में लौटाना किसी के लिए संभव होगा, क्योंकि 10 में से 8 वोटरों ने कहा था कि इन चुनावों ने उन में उत्साह जगाने के बजाय उन्हें निराशा की ओर धकेल दिया है.

चुनावों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप पूरे अमेरिका का चक्कर लगा चुके थे.  सर्वे में 84 प्रतिशत अफ्रीकी मूल के अमेरिकी ट्रंप को नस्लवादी मानते रहे. 89 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे हिलेरी को वोट देंगे. इस की वजह उन्होंने ओबामा को बताया था. 52 प्रतिशत युवा चुनाव के दौरान चली बयानबाजी से तनाव में रहे. डोनाल्ड ट्रंप को पूरी दुनिया के लिए खतरा बताया जाता रहा. तमाम नकारात्मक प्रचार के बावजूद ट्रंप 289 वोटों से जीत गए, हिलेरी को अनुमान से बहुत कम 218 मत ही प्राप्त हुए. यह आश्चर्य व अफसोस की बात है.

50 में से 46 राज्यों से ही ट्रंप की जीत पक्की हो गई थी. पिछले 18 महीनों में ऐसा कुछ नहीं बचा जो अमेरिका और बाकी दुनिया ने नहीं देखा. धर्म, नस्ल आधार पर  नफरत फैलाने, विरोधियों के दीवारों पर पोस्टर लगाने, चुनावी सभाओं में समर्थकों का एकदूसरे पर हमला, मतदाताओं को भयभीत करने, लालच देने, निजी बातें उघाड़ने जैसी तमाम हरकतें जाहिर कर रही थीं मानो सभ्य अमेरिकी समाज में नहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं.

उम्मीद थी कि अमेरिका की जनता आखिर उस उम्मीदवार को नहीं चुनेगी, जो जाहिर तौर पर इस सर्वोच्च पद के लिए पात्र नहीं है और जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत विचार रखता हो. हालांकि अमेरिका अभी नस्ली पूर्वाग्रह और लैंगिक भेदभाव से उबरा तो नहीं था पर अत्यधिक खुला और सहिष्णु दिखने लगा था.

कट्टर राष्ट्रवादी सोच

ट्रंप के विचारों का असर खासतौर से ग्रामीण इलाकों में रहने वाली श्वेत अमेरिकी जनता पर पड़ा. इन की संख्या बहुत है, उन के लिए अपनी धरती, परंपरागत पितृसत्ता और नस्लीय सामाजिक व्यवस्था सर्वोपरि है. कई लोग ऐसे भी थे जो लोकतंत्र विरोधी मूल्यों से सहमति तो नहीं रखते थे पर वे भारत की तरह हिंदुत्व, कट्टर राष्ट्रवाद के नाम पर रिपब्लिकन पार्टी के किसी भी प्रत्याशी को वोट देने को तैयार हो गए.

दरअसल, ट्रंप बड़ी चालाकी से धर्म, नस्ल और राष्ट्रवाद के आधार पर मतदाताओं का धु्रवीकरण करने में सफल रहे. उन्होंने जरमन तानाशाह एडोल्फ हिटलर के ‘चलो जरमनी को फिर से महान बनाएं’ नारे की तर्ज पर ‘चलो अमेरिका को फिर से महान बनाएं’ का नारा दिया. उन के इस तरह के उग्र विचारों का असर हुआ और उन 69 प्रतिशत श्वेत मतदाताओं को भयभीत कर दिया कि उन्होंने अगर उन्हें वोट नहीं दिया तो मुसलिम, हिस्पैनिक, ब्लैक, एशियन आप के रोजगार, सुरक्षा के लिए खतरा बन जाएंगे जोकि बन रहे हैं और आप को पीछे धकेल रहे हैं. डोनाल्ड की यह जीत लोकतांत्रिक मूल्यों को परे कर डर व धमकी भरे बयानों पर टिकी दिखी.

ट्रंप ने हिलेरी पर निशाना साधते हुए बारबार कहा था कि अगर उन्हें जिताया तो आईएस मजबूत होगा, हमले बढ़ेंगे, मुसलमान आव्रजन बढ़ेगा, जोकि श्वेतों के लिए खतरा है.

डोनाल्ड ट्रंप की जीत बिलकुल वैसी ही थी जिस तरह कट्टर हिंदुत्व की लहर बन कर भारत में तमाम दिग्गज नेताओं को पछाड़ते हुए नरेंद्र मोदी भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बने थे. मोदी के पक्ष में भी जम कर धार्मिक, जातीय आधार पर वोटों का धु्रवीकरण हुआ. भय, लालच का खेल रचा गया. ब्राह्मण, बनिए और पिछड़ों ने मोदी को सिर आंखों पर बिठा लिया तो दलित, मुसलमान उन से दूर ही रहे.

30-32 प्रतिशत दलित, मुसलिम मतों के सहारे विपक्षी कांग्रेसी और अन्य दल पीछे रह गए. ये दोनों वर्ग आज भी भाजपा, संघ और मोदी की नीतियों से डरे रहते हैं.

पिछले कुछ समय से दुनिया भर में समाजवादी, वामपंथी लोकतांत्रिक सरकारें धार्मिक कट्टरपंथी राजनीतिक दलों के हाथों मात खा रही हैं. लोकतांत्रिक विचारधारा वाले देशों में दक्षिणपंथी लोकतंत्र के नाम पर सत्ता में काबिज हो रहे हैं. इस का कारण यही है कि समाजवादी, वामपंथी विचारों वाली सरकारें सामाजिक, आर्थिक भेदभाव पाटने में नाकाम रही हैं. उन का भ्रष्टाचार दुनिया भर में बढ़ा है. देशों की पूंजी और संसाधन चंद लोगों के हाथों में सिमट आए हैं. गरीब, किसान, आदिवासी, मजदूरों की दशा सुधरने के बजाय बदतर होती जा रही है.

नतीजतन, दुनियाभर में बदलाव के लिए आंदोलन शुरू हो गए. अमेरिका में ‘औक्यूपाई वाल स्ट्रीट,’ यूरोप, मिस्र, सूडान, भारत समेत कई देशों में क्रांति का बिगुल बज उठा. कई जगह तख्तापलट हुआ. मिस्र में कट्टरपंथी मुसलिम ब्रदरहुड सत्ता में आई तो भारत में हिंदूवादी भाजपा. इस दौरान इसराईल में नेतान्याहू. इस से पहले अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबान सरकार आ चुकी थी. पाकिस्तान में कहने को लोकतंत्र के नाम पर चुनी हुई नवाज शरीफ सरकार है पर वहां राज चलता है कट्टरपंथी मुल्लामौलवियों और सेना में बैठे मजहबी अफसरों का.

उधर यूरोप की राजनीति पर भी लोगों की नाराजगी हावी है. फ्रांस में अगले साल चुनाव है और वहां सोशलिस्ट पार्टी अपनी पराजय देख रही है. जरमनी, डेनमार्क, आस्ट्रेलिया, फिनलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन जैसे देशों में भी धुर कट्टर राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी दल तेजी से उभर रहे हैं.

लोकतंत्र के लिहाज से अमेरिकी समाज कितना अपरिपक्व है, इन चुनावी नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है. दोनों उम्मीदवार एकदूसरे को नंगा करने व नीचा दिखाने में ही व्यस्त रहे.

बराक ओबामा ने कहा भी था कि बीते 8 सालों में अमेरिका द्वारा हासिल की गई प्रगति और विभिन्न समुदायों को जोड़ने की विरासत मटियामेट हो जाएगी.

अमेरिका में एक नए तरह का अविश्वास बुरी तरह फैल गया है. प्रचार अभियान के दौरान जितनी नफरत और बुराइयां सामने आईं, उस से अमेरिकी प्रबुद्ध जनता आहत हुई. ट्रंप ने तो प्रत्यक्ष रूप से मतदाताओं को धमकाना शुरू कर दिया था. उन्होंने यहां तक कहा था कि अगर हिलेरी जीतीं तो वे उन पर महाभियोग चलाएंगे इसलिए धु्रवीकरण में उन की बातों का प्रभावी असर हुआ.

अमेरिका में ट्रंप के उभार का कारण कुछ समय से यहां सामाजिक, सांस्कृतिक बदलाव भी रहे हैं. 62 प्रतिशत गैर हिस्पैनिक श्वेतों के परंपरावादी धार्मिक गु्रप ट्रंप के कट्टर समर्थक थे जोकि अब घटते जा रहे हैं. अमेरिकी सेंसस ब्यूरो के अनुसार 2015 में 45,282,080 अफ्रीकन अमेरिकन अमेरिका की कुल आबादी का 14.4 प्रतिशत थे. इन के हालात भारत के दलितों की तरह हैं.

हावी होती संकीर्णता

भारत में नरेंद्र मोदी को 2014 से पहले विभाजनकारी माना जाता था. जब उन का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए उभरा तो उदारवादी लोगों ने कहा था कि मोदी को भारत कभी स्वीकार नहीं करेगा. यही पैटर्न अमेरिका में ट्रंप की  जीत से सामने आया.

असल में अमेरिकी चुनावी नतीजों से साफ है कि सामूहिक चेतना पर संकीर्णता हावी हो गई है. वाल्टर क्रोंकाइट ने कहा था कि हम अभी इतने शिक्षित नहीं हैं कि बुद्धिमता के साथ अपने नेताओं को चुन सकें.

जौर्ज वाश्ंिगटन ने कहा था कि मेरी पहली इच्छा मानव जाति के प्लेग युद्ध को इस धरती से खत्म करने की है. पर लंबे अरसे बाद भी अमेरिकी धरती से युद्ध के ऐलान होते रहे. जौर्ज बुश ने इराक और अफगानिस्तान को युद्ध से तबाह किया. इसराईल और फिलीस्तीन में अभी भी युद्ध जारी है. कुल मिला कर धर्मों ने विश्व में सिर्फ युद्ध और तनावों को बढ़ाया है.

भारत और अमेरिका विश्व के बड़े और पुराने लोकतंत्र होने के बावजूद संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं. दोनों देशों में आर्थिक बराबरी नहीं है. जातीय मतभेद, हिंसा दोनों देशों में लगातार जारी है. धर्म के इस्तेमाल पर भारत और अमेरिका में कोई परहेज नहीं है. दोनों ही जगह तकनीक व विकास के प्रोत्साहन की कमी है. सुशासन को जनता तरस रही है. पारिवारिक सुरक्षा नहीं है. राजनीतिक बदले की भावना मौजूद है इसलिए भारत के नेताओं द्वारा विरोधी को जेल भेजने की धमकी की तरह ट्रंप द्वारा प्रतिद्वंद्वी हिलेरी को जेल भेजने और महाभियोग की धमकी दी गई. भारत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है. लेखकों, पत्रकारों, संपादकों, कलाकारों पर झूठे अभियोग ठोंक दिए जाते हैं. हालांकि अमेरिका में अपेक्षाकृत थोड़ी उदारता है.

अमेरिकी चुनाव वास्तव में लोकतांत्रिक प्रणालियों पर धब्बा साबित हुआ है. कहने को भारत और अमेरिका में संविधान आप को वह स्वतंत्रता देता है जो लोकतंत्र के मूल में है पर क्या संवैधानिक लोकतंत्र के अनुसार हमारी सामाजिक सोच है? नहीं है क्योंकि धर्म ने विवेक और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई जगह छोड़ी ही नहीं.

गैर लोकतांत्रिक आचरण

अमेरिकी और भारतीय नेताओं के आचरण लोकतंत्र के अनुकूल नहीं हैं. झूठे वादे करना इन की फितरत है. लोकप्रियता और जीत पर गर्व से इतराना इन के लिए सामान्य बात है. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में न्यायमूर्ति ने कहा था कि लोकतंत्र में ढोंग, मिथ्याचार और दंभ के लिए कोई जगह नहीं है.

देश के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा जनता को शिक्षा, प्रगति की सीख देना राजनीतिक दलों को लगता है, उन के खिलाफ ऐसा कर के भड़काया जा रहा है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि नागरिकों को ज्ञान देना, शिक्षा देना, जागरूक करना निसंदेह लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ाना है पर सरकारें लोकतंत्र के इन जरूरी मूल्यों के बीच बाधक बन कर खड़ी रहती हैं.

सरकारें स्वतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति को रोकती हैं. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने अपने एक निर्णय में टिप्पणी की है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इकट्ठे हो कर शांतिपूर्ण धरना व प्रदर्शन का आंदोलन लोकतांत्रिक प्रणाली के बुनियादी तत्त्व हैं. लोकतांत्रिक देशों के लोगों को सरकार के निर्णयों और कार्यों के खिलाफ आवाज उठाने या सरकार के किसी सामाजिक मामले के प्रति कार्यवाही पर नाराजगी जाहिर करने का हक है. सरकार को इस विरोध या नाराजगी का सम्मान करना चाहिए और इस तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

लोकतांत्रिक देशों में आज भी गैरबराबरी बरती जाती है. आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक असमानता व्याप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि स्वतंत्रता, बराबरी और न्याय लोकतंत्र के मूल तत्त्व हैं जहां कोई मालिक न हो, कोई गुलाम न हो. राजनीतिक सत्ता संस्था में इस प्रकार का लिखित संविधान नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार देता है.

डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी प्रचार में कही गई बातें और आक्रामक व्यवहार लोकतंत्र के विरुद्ध रहा. नैतिक मोरचे पर भी निचले दरजे का तो रहा ही साथ में संविधान में कहा गया है कि लोकतंत्र में नियम और कानून द्वारा शासन होता है जहां किसी भी रूप में निरंकुशता दूर रहती है.

एक अन्य फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कहा गया है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति का अधिकार मुख्य है. यह हक लोकतंत्र में संरक्षित है. निश्चित ही अभिव्यक्ति का अधिकार आजादी की पहली शर्त है. लोकतंत्र की उदारवादी परंपरा में स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय जैसी अवधारणा का प्रमुख स्थान है.

बदलाव की जरूरत

एक फैसले में यह भी कहा गया है कि लोकतंत्र लोगों के अधिकतम सुख को अधिकतम संरक्षण प्रदान करता है क्योंकि लोग अपने शासकों से तथा एकदूसरे से संरक्षण की अपेक्षा करते हैं.

लोकतंत्र किसी भी अन्य शासन प्रणाली की तुलना में मानवजाति के नैतिक, व्यक्तित्व विकास में सर्वाधिक योगदान करता है. लोकतंत्र वैयक्तिक क्षमताओं के विकास एवं विस्तार का सर्वोच्च माध्यम है.

संवैधानिक सर्वोच्च फैसलों में समानता, स्वतंत्रता, न्याय जैसे मुद्दों पर कही गई बातें किसी भी देश के लोकतंत्र की मजबूत सीखें हैं. अगर सरकारें, राजनीतिक दल और आम नागरिक इन बातों का पालन करें तो ही बेहतर समाज और देश बन सकता है.

लोकतंत्र को अमेरिका जैसे देशों में दुनिया की बेहतरी का सर्वोच्च विकल्प माना गया है पर आज अमेरिका, पाकिस्तान, आईएस, तालिबान, अलकायदा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे देश और आतंकी संगठनों के खिलाफ किस मुंह से बात कर सकता है. चुनाव प्रचार में पैदा हुआ जहरीला वातावरण नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खत्म कर पाएंगे, इस में भी संदेह है.         

 

बढ़ते आप्रवासी (प्रतिशत में)

साल          एशियन      हिस्पैनिक    अश्वेत         श्वेत

1965                5              14            1              80

1975                11            25            4              59

1985                19            36            6              38

1995                23            44            7              25

2005                23            48            7              21

2015                26            47            8              18

 

प्रवासी मतदाता और घटते देसी (प्रतिशत में)

साल          एशियन      हिस्पैनिक    अश्वेत         श्वेत

2000                2              7              12            78

2004                3              8              12            75

2008                3              9              12            73

2012                4              11            12            71

2016                4              12            12            69

फरहान अख्तर को जावेद अख्तर का तमाचा

आम तौर पर फिल्म कलाकार अपनी ईमेज को बरकरार रखने के लिए कई तरह के अनर्गल बयान देते रहते हैं. उनके इस बयान का विरोध कोई नही करता. यहां तक कि कलाकारों, खासकर स्टार पुत्रों के माता पिता भी मूक बनकर अपने बेटे के बयान का समर्थन करते रहते हैं. लेकिन अभिनेता व फिल्मकार फरहान अख्तर के पिता जावेद अख्तर ने एक सही पिता की तरह फरहान अख्तर के बयान को गलत बताते हुए खुलेआम फरहान अख्तर पर बहुत बड़ा तमाचा जड़ा है.

वास्तव में नोटबंदी के ऐलान के तीन दिन बाद फरहान अख्तर की बतौर निर्माता व अभिनेता फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ प्रदर्शित हुई थी. इस फिल्म ने दो सप्ताह में महज 10 करोड़ रूपए ही बाक्स आफिस पर कमाए. फिल्म ने पहले दिन दो करोड़ कमाए थे. अपनी फिल्म की बाक्स आफिस पर इस दुर्गति के लिए फरहान अख्तर ने मीडिया से कहा था कि नोटबंदी के कारण उनकी फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ को दर्शक नहीं मिले. यहां तक कि फरहान अख्तर के दोस्त और फिल्म ‘रॉक ऑन 2’ के अभिनेता अर्जुन रामपाल ने भी फरहान की ही हां में हां मिलाते हुए कहा था कि,‘‘नोटबंदी अच्छा कदम है. पर इसके लिए किसी को तो कुर्बानी देनी ही थी. यह कुर्बानी ‘रॉक ऑन 2’ ने दी.’’

लेकिन अब फरहान अख्तर के पिता और फिल्म ‘‘रॉक ऑन 2’’ के गीतकार जावेद अख्तर ने एक ईवेंट में इस पर खुलकर बात की और कहा-‘‘यह कहना पूरी तरह से गलत है कि नोटबंदी के चलते ‘रॉक ऑन 2’ ने बहुत कमाई नहीं की. यदि यह कहा जा रहा है कि नोटबंदी के चलते सिर्फ एक फिल्म ‘रॉक ऑन 2’ ने ही कमाई नहीं की, तो यह बहुत बड़ा बेवकूफी वाला बयान है.’’

जावेद अख्तर के इस बयान से 17 नवंबर को ‘‘सरिता’’ में छपी खबर की पुष्टि होती है. हमने 17 नवंबर को ‘‘सरिता’’ पत्रिका में यहीं पर ‘‘क्या फरहान अख्तर ने डुबायी ‘रॉक ऑन 2’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा था कि किस तरह फरहान अख्तर ने ‘रॉक ऑन 2’ को डुबाया. हमने इसमें बताया था कि जावेद अख्तर ने पहले ही फरहान से कह दिया था कि ‘रॉक ऑन 2’ नहीं चलेगी. जावेद अख्तर ने फरहान को इस फिल्म को आधी से ज्यादा पुनः फिल्माने की सलाह दी थी, पर फरहान अख्तर ने अपने पिता की सलाह ठुकरा दी थी.

‘सैराट’ की हिंदी रीमेक का निर्देशन करेंगे शशांक खेतान

आलिया भट्ट और वरुण धवन के अभिनय से सजी सफल रोमांटिक फिल्म ‘‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’’ के लेखक निर्देशक शशांक खेतान को बतौर फिल्म निर्देशक भले ही काफी तकलीफें झेलनी पड़ी हो, मगर अब उनके सितारे बुलंदियों पर हैं. तभी तो वह इन दिनों करण जोहर के खास व चहेते बने हुए हैं. इन दिनों एक तरफ वह एक बार फिर वरुण धवन और आलिया भट्ट को लेकर करण जोहर की कंपनी धर्मा प्रोडक्शन के लिए ‘‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’’ का निर्देशन कर रहे हैं, तो वहीं अब करण जोहर ने मराठी की सफलतम रोमांटिक फिल्म ‘‘सैराट’’ की हिंदी रीमेक को निर्देशित करने की जिम्मेदारी शशांक खेतान को देने का फैसला किया है, जिसे शशांक खेतान मना भी नहीं कर सकते. आखिर शशांक के सितारे तभी से चमके हैं, जब से उन्हे करण जोहर का साथ मिला है.

यह एक कटु सत्य है. कोलकता में जन्में तथा नासिक में पले बढ़े मारवाड़ी परिवार के सदस्य शशांक खेतान पहले क्रिकेट और टेनिस के खेल में रूचि रखते थे. पर 17 वर्ष की उम्र में उनका झुकाव फिल्मों की तरफ हो गया. फिर वह सुभाष घई के फिल्म इंस्टीट्यूट ‘‘व्हिसलिंग वूड’’ से जुड़े. 2006 में शशांक खेतान ने ‘व्हिसलिंग वूड’ के विद्यार्थियों को लेकर फिल्म ‘‘शेरवानी कहां है’’ का निर्माण शुरू किया था, मगर यह फिल्म पूरी नहीं हुई. फिर 2008 में उन्होंने एक लघु फिल्म ‘‘रूड़की बाय पास’’ में अभिनय किया. उसके बाद उन्होंने सुभाष घई के साथ बतौर सहायक निर्देशक फिल्म ‘‘ब्लैक एंड व्हाइट’’ की. पर उनका करियर आगे नहीं बढ़ पा रहा था. यानी कि उनके सितारे उनका साथ नहीं दे रहे थे.

शशांक खेतान ने ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की पटकथा कई निर्माताओं को दिखायी, पर बात नहीं बनी. अंततः वह अपनी पटकथा लेकर करण जोहर के पास पहुंचे. करण जोहर को यह पटकथा पसंद आ गयी. तब करण जोहर ने ‘‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ का निर्माण किया तथा शशांक खेतान ने लेखन व निर्देशन किया. फिल्म ऐसी सफल हुई कि करण जोहर का उन पर विश्वास गहरा गया. उसके बाद जैसे ही शशांक खेतान ने ‘‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’’ की पटकथा लिखी, वैसे ही करण जोहर ने इसे भी बनाने का ऐलान कर दिया और अब यह फिल्म लगभग पूरी हो चुकी है. सूत्र दावा करते हैं कि ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ के कुछ अंश देखकर करण जोहर काफी खुश हैं, इसी के चलते उन्होने ‘‘सैराट’’ के हिंदी रीमेक का निर्देशक शशांक खेतान को ही बनाने का निर्णय लिया है.

29 अप्रैल 2016 को प्रदर्शित फिल्मकार नागराज मंजूले की मराठी भाषा की रोमांटिक फिल्म ‘‘सैराट’’ ने सौ करोड़ रूपए कमा कर सौ करोड़ क्लब में नाम दर्ज कराने के साथ ही एक नए इतिहास को रचा. इससे पहले मराठी भाषा की इक्का दुक्का फिल्में ही बीस से पचीस करोड़ कमा पायी थीं. मजेदार बात यह है कि ‘‘सैराट’’ में रिंकू राजगुरू और आकाश थोसार इन दोनों ने पहली बार अभिनय किया था. इसमें महाराष्ट् के गांव की पृष्ठभूमि की प्रेम कहानी के साथ ऑनर किलिंग भी है.

‘वजह तुम हो’ में सेक्स की कहानी नहीं है: गुरमीत चौधरी

छोटे परदे पर स्टार बनने के बाद गुरमीत चौधरी ने महेश भट्ट के बैनर की फिल्म ‘‘खामोशियां’’ से बौलीवुड में कदम रखा, जो कि एक हॉट व सेक्सी फिल्म थी. अब गुरमीत चौधरी विशाल पंड्या लिखित व निर्देशित तथा टीसीरीज निर्मित ईरोटिक फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ में वकील के किरदार में नजर आने वाले हैं. पेश है उनसे हुई बातचीत के अंश..

आपको नहीं लगता कि आपने टीवी से फिल्मों की तरफ कदम बढ़ाने में काफी देर कर दी?

– मुझे ऐसा नहीं लगता. बल्कि मैं अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि बहुत जल्द मैं टीवी का स्टार कलाकार बन गया. इसकी एक वजह यह भी रही कि मैंने 5-6 साल लंबे चलने वाले डेली सोप में अभिनय नहीं किया. मेरे ज्यादातर शो एक साल के ही थे. रियालिटी शो ‘झलक दिखला जा’ जीता. ‘नच बलिये’ और ‘खतरों के खिलाड़ी’ में ‘रनरअप’ रहा. तो टीवी ने मुझे रातों रात स्टार बना दिया. अब तो टीवी बहुत बड़ा हो गया है. मेरे पास प्रशंसकों की इतनी लंबी चौड़ी संख्या है कि बालीवुड के चंद बडे़ कलाकारों के अलावा किसी के पास नहीं होंगे.

देखिए, मैं रातों रात टीवी स्टार बन गया. पर मैं हमेशा से फिल्मों में अभिनय करना चाहता था. मैंने पहले से तय कर लिया था कि 2015 में मैं फिल्मों से जरूर जुडूंगा. मगर मैं कोई भी फिल्म किसी भी निर्माता या निर्देशक के साथ नहीं करना चाहता था. मैंने सोच रखा था कि जब हम फिल्मों में काम करते हैं, तो फिल्म ऐसी होनी चाहिए, जो सही ढंग से ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंच सके. जब मैंने सीरियल ‘‘रामायण’’ में अभिनय करना शुरू किया था, तभी से मेरे पास फिल्मों के ऑफर आने लगे थे. पर मुझे कभी निर्माता पसंद नहीं आता, तो कभी निर्देशक नहीं, तो कभी कहानी पसंद नही आती.

फिल्मों के ऑफर मिल रहे थे, इसलिए मैंने टीवी छोड़ने का कदम नहीं उठाया. टीवी के कलाकार अक्सर गलती यह करते हैं कि एक सीरियल में अभिनय करते हुए शोहरत मिलते ही टीवी को अलविदा कह फिल्मों के लिए संघर्ष करना शुरू कर देते हैं. ऐसे में उन्हें बडे़ निर्माता निर्देषशकों की फिल्में मिलती नहीं है. आखिरकार बेचारे ना टीवी के रहते हैं और ना फिल्म के. मैंने यह गलती नहीं की. मैंने पूरी योजना बनाकर काम किया. जब मुझे महेश भट्ट ने ‘विशेष फिल्म्स’ की फिल्म में काम करने का ऑफर दिया, तो मैंने स्वीकार कर लिया. बालीवुड में इससे बड़ी लांचिंग हो भी नहीं सकती. दूसरी फिल्म ‘वजह तुम हो’ टीसीरीज के साथ की है.

आपने ‘‘खामोशियां’’ के बाद दूसरी फिल्म भी ईरोटिक फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ चुनी?

– इरोटिक का नाम आते ही लोग मान लेते हैं कि सेक्स फिल्म है. जबकि इस फिल्म की कहानी सेक्स को लेकर नहीं है. इसलिए मुझे इस फिल्म को करने में कोई बुराई नजर नहीं आयी. मैं फिल्मों का चयन करते समय निर्माता, निर्देशक, पटकथा व अपने किरदार पर गौर करता हूं. मेरे इस तर्क पर यह फिल्म खरी उतरी. दो सफलतम फिल्मों के निर्देशक विशाल पंड्या ने जब मुझे इस फिल्म का कांसेप्ट सुनाया, तो मुझे काफी रोचक लगा. ‘वजह तुम हो’ अंत तक दर्शकों को पंसद आएगी. इसमें एक सेटेलाइट चैनल को हैक कर उस पर लाइव मर्डर होते हुए प्रसारित किया जाता है. इस फिल्म का कंटेट बहुत सशक्त है. सोशल मीडिया पर हमारी फिल्म के ट्रेलर को जबरदस्त हिट्स मिल रहे हैं.

ट्रेलर को सोशल मीडिया पर जो हिट्स मिलते हैं, वह बाक्स आफिस पर कितना लाभ देता है?

– यह मान लेना कि सोशल मीडिया पर मिले हिट्स दर्शकों की संख्या में परिवर्तित हो जाएंगे, यह गलत है. पर हिट्स मिलने का मतलब यह होता है कि फिल्म के प्रति दर्शकों की उत्सुकता जागी है. यह रिकार्ड है कि जिस ट्रेलर को लोगों ने रिजेक्ट किया, वह फिल्म बाक्स आफिस पर नहीं चली. पर हमारी फिल्म का ट्रेलर पसंद किया गया. इसलिए हमें उम्मीद है कि हमारी फिल्म चलेगी. हर निर्माता चाहता है कि उनकी फिल्म का ट्रेलर हिट हो. वैसे हमारी फिल्म में सारे मसाले हैं. इसमें एक्शन, ड्रामा, इरोटिक सीन, सेक्स, गाने, अच्छी लोकेशन, अच्छे कलाकार सब कुछ है.

पर मेरे पास वह आंकड़े भी हैं, जहां हिट्स बहुत बड़ी संख्या में हुए, पर  फिल्म नहीं चली?

– मैंने पहले ही कहा कि हिट्स को सफलता की गारंटी नहीं मानना चाहिए. पर लोगों की नजर में फिल्म आ गयी, यह तय हो जाता है. फिल्म की सफलता के लिए अच्छी कहानी होनी चाहिए. आपको पता होगा कि सोशल मीडिया पर पहले शो होते ही दर्शकों की प्रतिक्रिया आ जाती है. यदि किसी दर्शक ने भी लिख दिया कि फिल्म बेकार है, तो जिन्होंने ट्रेलर को पसंद किया था, वह भी फिल्म देखने नही जाते.

पर ‘खामोशियां’ के बाद ‘वजह तुम हो’ कर आप एक खास ईमेज में नहीं बंधते जा रहे हैं?

– ऐसा बिलकुल न कहें. दोनो फिल्मों के किरदार काफी अलग हैं. इसके बाद मैं दो फिल्में कर रहा हूं, उनमे भी मेरे किरदार काफी अलग हैं. यह फिल्में अलग जानर की हैं. मैं बहुत योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा हूं. मैं डर कर काम नहीं करता. यदि ईमेज में बंधने का डर मुझे सताता, तो मैं धार्मिक सीरियल ‘‘रामायण’’ में राम का धार्मिक पात्र निभाने से दूर रहता. मुझसे पहले और बाद में कई लोग धार्मिक सीरियलों से जुड़ने के बाद उससे बाहर नहीं निकल पाए. यदि आप मेरे करियर पर नजर दौड़ाएंगे, तो पाएंगे कि मैंने ‘राम’ के किरदार को निभाने से लेकर ‘वजह तुम हो’ में वकील रणवीर बजाज का किरदार निभाने तक अपने आपको कई बार अलग अलग किरदारों में पेश किया है. मैंने रियालिटी शो भी किए.

वक्त इंसान को बदलने पर मजबूर कर देता है: सुजॉय घोष

लेखक निर्देशक सुजॉय घोष की बौलीवुड में अपनी एक अलग पहचान है. उनकी पहली फिल्म ‘‘झंकार बीट्स’’ ने सफलता के झंडे गाड़े थे. मगर फिर ‘होम डिलीवरी’ और ‘अलादीन’ ने बाक्स आफिस पर सफलता नहीं पायी थी. मगर उनकी चौथी फिल्म ‘कहानी’ ने बाक्स आफिस पर सफलता बटोरने के साथ ही सुजॉय घोष को सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक के राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ साथ फिल्मफेयर अवार्ड भी दिला दिया था. मगर ‘‘कहानी’’ के बाद उन्हे दूसरी फिल्म बनाने में काफी समय लग गया. कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. पर अब वह ‘कहानी 2: दुर्गारानी सिंह’ को लेकर काफी उत्साहित हैं. हाल ही में उनसे हुई लंबी बातचीत इस प्रकार रहीः

क्या ‘कहानी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के दबाव के कारण उसके सिक्वअल की कहानी लिखने में समय लगा?

– जी नहीं! दबाव के साथ काम नही करता. मेरे दिमाग में पुरस्कार मिलने की बात कभी आती ही नही है. कहानी लिखते समय मेरे दिमाग में था कि मुझे जो इज्जत मिली है, वह बरकरार रहे. मैं दर्शकों के प्यार को पकड़ कर रखना चाहता हूं. वैसे मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि ‘कहानी 2 : दुर्गारानी सिंह’ मेरी पिछली सफल फिल्म ‘कहानी’ का सिक्वअल नहीं, बल्कि उस सफल फिल्म की फ्रेंचाइजी है. यदि ‘कहानी 2 : दुर्गारानी सिंह’ सफल हो गयी, तो ‘कहानी 3’ भी बनाउंगा.

दूसरी बात मेरी पहली जिम्मेदारी दर्शकों के प्रति होती है कि उन्हे मनोरंजन मिले. दूसरी जिम्मेदारी एक फिल्मकार के रूप में अपनी हर फिल्म के माध्यम से कुछ कहना होता है. मैं अपनी सोच के अनुसार कुछ कहने का प्रयास करता हूं, वह बात दर्शक को सुनाई दी या नहीं, यह एक अलग मसला है. इसलिए एक विषय या सोच को कहानी का रूप देने में भी समय लगा.

आप ‘कहानी’ के बाद ‘दुर्गारानी सिंह’ बना रहे थे, जिसे करने से कंगना रानौट व ऐश्चर्या राय बच्चन सहित कोई भी अदाकारा तैयार नहीं हुई. इसीलिए आपने अब ‘‘कहानी 2’’ के नाम के साथ दुर्गारानी सिंह भी जोड़कर फिल्म का नाम ‘‘कहानी 2 : दुर्गारानी सिंह’’ रखा?

– वह कहानी अलग थी. पर मुझे दुर्गारानी सिंह नाम बहुत पसंद था, इसलिए उसे इस फिल्म के साथ जोड़ दिया. इसी के साथ उस कहानी से कुछ चीजें लेकर मैंने इस फिल्म की कहानी में जोड़ दिया.

अभी भी आप ‘‘दुर्गारानी सिंह’’ फिल्म बनाने वाले हैं?

– नहीं! ‘दुर्गारानी सिंह’ की ही तरह मैं कई फिल्में नहीं बना पाया. वास्तव में जब हमने इस फिल्म की कहानी लिखी, तो इसके निर्माण में काफी समस्याएं आती रहीं. कभी फिल्म बनाने के लिए हमें पैसा मिल जाता, तो उस वक्त अभिनेत्री गायब हो जाती थी. कभी अभिनेत्री होती, तो पैसा गायब हो जाता. कई तरह की समस्याएं आयी. शायद कहीं यह लिखा हुआ था कि मुझे अगली फिल्म विद्या बालन के साथ ही बनानी है. तो दूसरी समस्याएं आती रहीं. अब तो मुझे लगता है कि जो लिखा होता है, वही होता है.

बतौर निर्देशक आप फिल्म नहीं बना पा रहे थे. इसलिए आपने बंगला फिल्म ‘‘सत्यान्वेषी’’ में ब्योमकेश बक्षी का किरदार निभाया था?

– ऐसा ना कहें. मैं रितुपर्णो घोष के साथ काम करना चाहता था. इसलिए मैंने उनकी फिल्म में अभिनय किया. रितुपर्णो घोष को ना बोलने वाला अभी तक कोई कलाकार पैदा नहीं हुआ, तो मैं उन्हें ‘ना’ कैसे कह देता. अमिताभ बच्चन जैसा कलाकार भी उन्हें ना नही हो बोल सकता. रितुपर्णो घोष ने एक दिन कहा कि वह मेरे साथ फिल्म बनाना चाहते हैं. मेरे मन में तो उनके साथ काम करने का सपना था. मुझे उनके साथ काम करके बहुत कुछ सीखना था. तो उनके निर्देशन में बंगला फिल्म करके मैंने बहुत कुछ सीखा. पर अभी भी सीखना बाकी है. मगर वह अब रहे नहीं. मेरी राय में उनसे बेहतरीन निर्देशक भारत में नही है. उनके जैसा लेखन कार्य कोई नही कर सकता. मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया, इसलिए लोग मुझे बहुत अच्छा पटकथा लेखक भले मान लें, पर मैं रितुपर्णो घोष के सामने कहीं नहीं ठहरता. उनके साथ काम करने का अपना एक अलग तर्जुबा रहा.

फिल्म ‘‘कहानी 2’’ क्या है?

– एक मां की कहानी है. यह कहानी किसी की भी मां की कहानी हो सकती है. एक मां की खुद ब खुद ओढ़ी हुई जिम्मेदारी होती है, उसी की कहानी है. देखिए, मां बनते ही नारी पूर्णतः बदल जाती है. वह अचानक अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर इस कदर जागरुक रहने लगती है कि वह उसके लिए कोई भी कदम उठा सकती है. एक मां उस लड़की या औरत से एकदम भिन्न हो जाती है, जिसे आप या हम पहले से जानते रहते हैं. एक औरत जब मां बनती है तो वह किसी भी सूरत में बच्चे को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होने देती. इस फिल्म में रोमांच है, पर सस्पेंस नहीं है. ‘कहानी’ और ‘कहानी 2’ में बहुत बड़ा अंतर है. यह अंतर कहानी के साथ साथ हम जो कहना चाहते हैं, उसमें है. ‘कहानी’ में एक अलग कलकत्ता था और ‘कहानी 2’ में एक अलग कलकत्ता है. ‘‘कहानी 2’’ में कलकत्ता कम और कालिम्पोंग ज्यादा है.

इस फिल्म में आपने मां के किस रूप को दिखाया है?

– हमारी फिल्म की यह मां वह है, जो कि फिल्म ‘दीवार’ में मां थी, जहां मां (निरुपमा राय) ने शशि कपूर के हाथ में बंदूक देते हुए कहा था कि, ‘भाई के उपर भी गोली चलाते हुए तेरे हाथ ना कांपे.’ यानी कि यह वह मां है, जिसे अन्याय बर्दाश्त नहीं. यह वह मां है, जिसे सही व गलत का अंतर पता है.

पर क्या वर्तमान समय में लोग हर चीज को सही व गलत के रूप में देखते हैं?

– मेरा निजी ज्ञान यह है कि जब मैं बच्चा था, तो मेरे पास जानकारी कम होती थी, तो उन दिनों हम हर चीज को सिर्फ अच्छे या बुरे के नजरिए से देखते थे. पर अब गूगल, इंटरनेट का जमाना आ गया है. आज का बालक एक ही इंसान के बारे में बहुत कुछ देखता व समझता है. इसलिए वह हर चीज को ‘ग्रे’ के हिसाब से देखने लगा है.

पुरानी कहावत है कि एक ही इंसान के चेहरे पर कई मुखौटे लगे हुए हैं. यह बात आपकी फिल्म में कैसे आती है?

– जब आप फिल्म देखेंगे, तो आपको एक ही मां के कई चेहरे नजर आएंगे.

स्टूडियो सिस्टम से फिल्म की रचनात्मकता को कितना फायदा या कितना नुकसान हुआ?

– मेरे हिसाब से स्टूडियो सिस्टम चलना चाहिए. स्टूडियो सिस्टम के आने से पहले सबसे बड़ी समस्या सही समय पर फिल्म निर्माण के लिए पैसे मिलने की हुआ करती थी. उस वक्त निर्माता की जेब में जब पैसा होता था, तब वह शूटिंग के लिए पैसा देता था, अन्यथा शूटिंग रुकी रहती थी. स्टूडियो सिस्टम में शूटिंग के अनुसार पैसे मिलते रहते हैं. इसलिए अब सही समय पर सही बजट के साथ फिल्में पूरी होती हैं. पर मैंने अब तक स्टूडियो के साथ ज्यादा काम नहीं किया है. इसलिए मेरे अनुभव नहीं है. जहां तक रचनात्मकता का सवाल है, तो मुझे उनकी बातें समझ में आती है. क्योंकि एक वक्त वह था, जब मैं भी उनकी तरह कुर्सी संभालता था. उस वक्त मुझे अपनी कुर्सी से चिपक कर रहना होता था. इसलिए मैं अकेले निर्णय नहीं लेता था. कुर्सी बचाने के चक्कर में हम अकेले निर्णय नहीं लेते हैं. सब सामूहिक निर्णय होता है. अब समूह में किसी एक ने ना कर दिया तो वह ना होता है, जिसके अपने फायदे व नुकसान हैं. स्टूडियो ने कुछ अच्छी व कुछ बुरी फिल्में बनायी हैं .

पर डिजनी या बालाजी ने हिंदी फिल्में बनाने से तौबा क्यों कर लिया?

– मुझे इस बारे में कुछ नही पता. मेरे अनुभव बहुत कम हैं.

लोग कहते हैं कि स्टूडियो में गैर फिल्मी यानी कि एमबीए करके लोग बैठे हैं. इसलिए सही निर्णय नही ले पा रहे हैं?

– मैं नहीं मानता. यदि मैं फिल्म नही बनाता हूं, पर मुझे फिल्मों का अच्छा सेंस हो सकता है. एक फिल्म आलोचक, एक अच्छा निर्देशक हो यह जरूरी नहीं है. स्टूडियो में बैठा इंसान पटकथा पढ़कर निर्णय लेने की क्षमता रखता है, पर इसके यह मायने नहीं है कि उसे फिल्म बनाना चाहिए.

जब भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई, तब स्टूडियो सिस्टम हुआ करता था. एक ही स्टूडियो में कलाकार व निर्देशक नौकर हुआ करते थे. पूरे विश्व में स्टूडियो सफल हैं और दुनिया भर में राज कर रहे हैं. पर वही स्टूडियो भारत में आकर असफल हो गए. क्यों?

– मुझे इसकी कोई जानकारी नही है. यह बहुत कठिन सवाल है. इसका जवाब डिजनी वाले ही दे सकते हैं. मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि फिल्मे जल्दी बननी चाहिए. एक फिल्म के बनने में चार साल का समय नहीं लगना चाहिए.

अमृता सिंह ने छोड़ी फिल्म ‘मुबारका’

अनीस बज़मी निर्देशित फिल्म ‘‘मुबारका’’ का संकट खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. जब से इस फिल्म की घोषणा हुई थी, तब से इस फिल्म के कई कलाकार बदले जा चुके हैं. अब जबकि अनिल कपूर और अर्जुन कपूर के साथ इस फिल्म की शूटिंग शुरू की गयी, तो फिर संकट खड़ा हो गया. अब फिल्म ‘‘मुबारका’’ में अर्जुन कपूर के किरदार की मां का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री अमृता सिंह ने खुद को ‘मुबारका’ से अलग कर लिया है.

इस फिल्म से अमृता सिंह के अलग होने की पुष्टि करते हुए फिल्म के निर्माता मुराद खेतानी कहते हैं-‘‘पहले अमृता सिंह हमारी फिल्म कर रही थीं. मगर अब वह यह फिल्म नहीं कर रही है. वास्तव में शूटिंग की तारीखों की समस्या के चलते अमृता सिंह ने इस फिल्म से खुद को अलग कर लिया है. और हमने अब उसी किरदार को निभाने के लिए रत्ना पाठक शाह को अनुबंधित किया है.’’

फिल्म ‘‘मुबारका’’ के निर्माता मुराद खेतानी फिल्म से अमृता सिंह के अलग होने की जो वजह बता रहे हैं, वह किसी के गले नहीं उतर रही है. क्योंकि अमृता सिंह ‘मुबारका’ के अलावा कोई फिल्म कर ही नहीं रही थी. इसके अलावा अमृता सिंह ने भी इस फिल्म को छोड़ने के मसले पर चुप्पी साध रखी है. लोगों को उस दिन का बेसब्री से इंतजार है, जब इस मसले पर अमृता सिंह अपनी चुप्पी तोड़ेंगी.

अनावश्यक टकराव से बचे नेपाल

नेपाल में सरकार आखिरकार इस पर राजी हो गई है कि मधेसी और जनजाति पार्टियों की शिकायतों के मद्देनजर वह संविधान में संशोधन के लिए कदम उठाएगी. नए प्रस्ताव के अनुसार, प्रांत नंबर 5 का बंटवारा इस तरह होगा कि इसमें पहाड़ी जिलों को अलग किया जाएगा और मैदानी जिलों को जोड़ते हुए नवलपरासी से लेकर बर्दिया जिले तक एक प्रांत बनाया जाएगा.

प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल का मानना है कि इससे थारू की अलग राज्य की मांग पूरी हो सकेगी. वैसे, सरकार के लिए एक बड़ी रुकावट प्रमुख विपक्षी पार्टी सीपीएन-यूएमएल है. यूएमएल अध्यक्ष केपी ओली ने संविधान संशोधन की जरूरत को लगातार खारिज किया है. लिहाजा प्रधानमंत्री यूएमएल के समर्थन के बिना संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. और यह संभव भी है, अगर कुछ छोटी पार्टियां और अभी एक हुई आरपीपी और आरपीपी-एन संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में वोट दे.

दूसरी तरफ, यूएमएल नेताओं ने देश भर में विरोध-प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी है. वैसे अगर यूएमएल को अपने साथ लाया जाता है, तो संभव है कि सरकार इस प्रस्ताव को थोड़ा उदार बनाने को मजबूर हो जाए. इससे आंदोलन करने वाली पार्टियों का विश्वास जीतने की बजाय उनके और उग्र होने का खतरा होगा. उस स्थिति में सरकार वही गलती कर रही होगी, जो उसने संविधान के पारित होने के समय किया था. इसके बरक्स, अगर संशोधन प्रस्ताव पर यूएमएल की कई सारी आपत्तियां हों, तो मधेसी पार्टियां भी इस पर सहमत नहीं होंगी.

फिलहाल, मोर्चा के एक बड़े धड़े ने प्रधानमंत्री दाहाल से वादा किया है कि अगर कुछ आरक्षण मिले, तो वह प्रस्ताव का समर्थन करेगी. हालांकि उपेंद्र यादव ने इसके विरोध की बात कही है, तो कुछ को इस प्रस्ताव में कूटनीतिक बू लग रही है. साफ है कि सरकार के लिए चुनौती बड़ी है. हालांकि मोर्चा का विरोध संविधान को लेकर है, इसलिए उचित यही है कि सरकार यूएमएल की बजाय उसकी मांगों पर गौर करे. उम्मीद है कि शायद यूएमएल और मोर्चा कोई बीच का रास्ता निकाल ले, ताकि देश अब और अनावश्यक टकराव से बचे.

मैदान में फिर से एंजला मर्केल

अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों में ऐसे कानूनी प्रावधान हैं कि कोई नेता कितने वर्षों तक या कितनी बार सत्ता संभाल सकता है. ब्रिटेन जैसे कुछ मुल्कों में भी यह सीमा अधिकतम दस वर्षों की है. ऐसे में, जर्मनी की चांसलर एंजला मर्केल का चौथी बार पद संभालने की इच्छा जताना इस नजरिये के खिलाफ माना जाएगा.

अगर वह 2017 का चुनाव जीतती हैं और अपना कार्यकाल पूरा करती हैं, तो उनके खाते में 16 वर्षों तक जर्मनी की चांसलर बने रहने की उपलब्धि होगी. इस तरह, वह बिस्मार्क के बाद सबसे ज्यादा दिनों तक पद संभालने वाली नेत्री बन जाएंगी. हालांकि हेल्मुट कोल भी उनके समकक्ष होंगे, जिन्होंने 1982-98 तक जर्मनी का नेतृत्व किया था.

एक मायने में यह समझ में आता है कि मर्केल को क्यों फिर से मैदान में उतरना चाहिए. वह न सिर्फ लोकप्रिय हैं, बल्कि उनके सामने कोई कद्दावर विपक्षी नेता भी नहीं है. वक्त भी उनके अनुकूल है, क्योंकि प्रवासन, ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतना, रूस से खतरा, ब्रेग्जिट, यूरोजोन संकट जैसे तमाम मसलों की वजह से फिलहाल जर्मनी की स्थिरता पर, जोकि उसका खजाना है, अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं. इससे ऐतराज नहीं है कि मर्केल कितनी जहीन नेता हैं, मगर आज के दौर में यह संभव नहीं है कि वह तमाम उलझनें सुलझा लेंगी.

मौजूदा दशक के अंत में जिस जर्मनी का वह नेतृत्व कर रही होंगी, वह 2005 के उस दौर से काफी अलग होगा, जब विश्व युद्ध के बाद यूरोप की स्थिरता और विकास की चमक बरकरार थी. अगर यूरोपीय देशों की समृद्धि वापस लानी है, तो उन्हें अपनी बुनियादी मूल्यों को फिर से अपनाना होगा. यानी, यूरोपीय देशों के बीच आपसी सहयोग बनाना होगा, ताकि वे सुरक्षा का अनुभव कर सकें. जाहिर है कि यह काम अकेले जर्मनी से संभव नहीं है. इसी तरह, बढ़ती राष्ट्रवादी लहर के बीच जर्मनी और यूरोपीय संघ को जोड़े रखना भी मर्केल के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगी. हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि उनके लिए सब कुछ बुरा ही होगा. यदि वह तमाम मसलों पर व्यावहारिक नजरिया परोसती हैं, तो उनके लिए रास्ते आसान हो सकते हैं.

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