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मेसेंजर के डेस्कटॉप वर्जन पर भी ग्रुप वॉयस कॉलिंग फीचर

फेसबुक अपने मेसेंजर ऐप के डेस्कटॉप वैरियंट के लिए ग्रुप वॉयस कॉलिंग फीचर की टेस्टिंग कर रहा है. TechCrunch नामक अंग्रेजी वेबसाइट के मुताबिक कंपनी इस फीचर को सीमित यूजर्स के साथ टेस्ट कर रही है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक जो लोग इस फीचर को टेस्ट कर रहे हैं, उन्हें ग्रुप चैट्स में फोन का आइकॉन नजर आता है. इस पर टैप करके यूजर्स अन्य मेंबर्स को ग्रुप वॉयस कॉल में शामिल होने के लिए इनवाइट कर सकते हैं. फेसबुक ने इस साल अप्रैल में यही फीचर अपने मेसेंजर मोबाइल ऐप के लिए भी लॉन्च किया था.

गौरतलब है कि यूजर्स के मामले में फेसबुक मेसेंजर की ग्रोथ शानदार रही है. कंपनी ने हर महीने 1 अरब मंथली ऐक्टिव यूजर्स होने का दावा किया है. ऐसे में यूजर्स का मेसेजिंग एक्सपीरियंस बेहतर करने के इरादे से कंपनी मेसेंजर ऐप में लगातार नए फीचर्स ऐड कर रही है.

हाल ही में मेसेंजर ऐप में नया इन-ऐप कैमरा फीचर ऐड किया गया है. फेसबुक मेसेंजर का इन-ऐप कैमरा स्नैपचैट की तरह काम करता है. टैप करने पर तस्वीर खींचता है और देर तक प्रेस करने पर विडियो रेकॉर्ड करता है. साथ ही तस्वीरों और विडियोज़ में कुछ आर्टिस्टिक फिल्टर्स भी किए जा सकते है.

सोशल मीडिया कंपनी ने बहुत सारे स्टिकर्स, फ्रेम्स, मास्क और इफेक्ट्स भी ऐड किए हैं, ताकि मेसेज को पर्सनलाइज किया जा सके.

पुरानें नोटों के लिए नए आदेश

सरकार ने अब बैंकों में 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को जमा करने की सीमा तय कर दी है. नए आदेश के तहत अब आप 30 दिसंबर तक एक अकाउंट में 5,000 रुपये से ज्यादा मूल्य के पुराने नोट सिर्फ एक बार जमा कर पाएंगे. बैंक खातों के जरिए काले धन को सफेद करने के सिलसिले पर रोक लगाने के लिए सरकार ने यह नया फैसला लिया है.

इससे पहले सरकार के नियम के अनुसार 30 दिसंबर 2016 तक बैंकों में 500 और 1000 रुपए के बैन हो चुके नोटों को जमा करवाने को लेकर ऐसी कोई शर्त नहीं थी. सरकार द्वारा सोमवार को इस नियम का ऐलान किया गया. पर वित्त मंत्रालय ने यह साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत धन जमा करवाने की कोई सीमा नहीं होगी.

वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताया, 'बड़े नोट बैंक खातों में बार-बार नहीं जमा कराए जा सकते हैं. लोग अब 5,000 रुपये तक जमा करा सकते हैं जिस पर कोई प्रतिबंध नहीं है.'

रिजर्व बैंक की ओर से जारी गाइडलाइंस में कहा गया है कि 5,000 रुपये से ज्यादा जमा सिर्फ केवाइसी उपलब्ध खातों में ही हो पाएंगे. साथ ही दो अधिकारी आपसे पूछताछ भी करेंगे कि आपने अब तक पैसे जमा क्यों नहीं कराए. इस सवाल का संतोषजनक जवाब मिलने के बाद ही 5,000 रुपये से ज्यादा के पुराने नोट जमा हो पाएंगे. आरबीआई की गाइडलाइंस में कहा गया है कि 5,000 रुपये से ज्यादा की रकम एकमुश्त जमा होगी.

आरबीआई ने कहा कि जिस खाताधारी ने केवाइसी जमा नहीं कराया है, उसके अकाउंट में 50,000 रुपये तक ही जमा कराने की सीमा होगी. हालांकि, इसका फैसला संबंधित अकाउंट से जुड़ी गतिविधियों के मुताबिक तय दिशा-निर्देशों के आधार पर होगा. आप किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में भी 50,000 रुपये तक करा सकते हैं, बशर्ते वह व्यक्ति इसकी लिखित अनुमति दे. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के नाम से काला धन घोषणा की नई स्कीम के तहत पैसे जमा कराने की कोई सीमा नहीं होगी.

मैं अपने प्रेमी के साथ शादी के बाद भी सेक्स करती रही. पर अब वह रूठ गया है. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 27 साल की हूं. मेरी शादी को 11 साल हो चुके हैं. मेरे बचपन का प्रेमी शादी के 4 साल बाद मेरी जिंदगी में फिर से आ गया और साढ़े 6 सालों तक हम दोनों पति पत्नी वाला काम करते रहे हैं, पर अब वह मुझ से रूठ गया है. मगर मैं उस के बगैर रह नहीं पाती. मेरे 2 बच्चे भी हैं. बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

आप ने आवारागर्दी की हद कर दी. फिर भी पति को पता नहीं चला, यह हैरानी वाली बात है. साढ़े 6 सालों तक आप अपने प्रेमी के साथ मस्ती करती रहीं और पति अनजान रहे.

दरअसल, आप का प्रेमी लंबे अरसे तक मुफ्त का माल खाखा कर ऊब गया होगा, इसलिए रूठने के नाम पर खिसक गया. आप के 2 बच्चे हैं, जो पता नहीं किस के होंगे. अब अपने बच्चों को पालिए और बेगुनाह व मासूम पति की इज्जत का खयाल कीजिए. इसी में आप की भलाई है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

चेन्नई टेस्टः नायर ने बनाया अनोखा रिकॉर्ड

चेन्नई में चल रहे 5वें टेस्ट मैच में इंग्लैंड के खिलाफ अपना तीसरा टेस्ट मैच खेल रहे करुण नायर ने अनोखा रिकॉर्ड कायम किया है. अपने पहली सेंचुरी में ही तिहरा शतक लगाने वाले एकलौते भारतीय बल्लेबाज बन गए हैं, जबकि दुनिया में तीसरे ऐसे बल्लेबाज बन गए हैं जिन्होंने पहली ही सेंचुरी में तिहरा शतक लगाया है.

नायर से पहले 1964 में ऑस्ट्रेलिया के बॉब सिंप्सन ने इंग्लैंड के खिलाफ 311 रन बनाए थे. 52 साल साल ऐसा कारनामा करने वाले करुण नायर हैं. इससे पहले दो भारतीयों ने दोहरा शतक लगाकर यह कारनामा किया था.

19 फरवरी 1993 में मुंबई पिच पर इंग्लैंड के ही खिलाफ विनोद कांबली ने पहली सेंचुरी में ही दोहरा शतक लगाकर रिकॉर्ड बनाया था. कांबली ने भी पहली ही पारी में 224 रन बनाए थे. विनोद कांबली से पहले 12 मार्च 1965 को दिलीप सरदेसाई ने मुंबई क्रिकेट ग्राउंड पर न्यूजीलैंड के खिलाफ नाबाद 200 रन बनाए थे.

करुण नायर भारतीय क्रिकेट इतिहास में पहली ही सेंचुरी में तिहरा शतक लगाने वाले एकलौते भारतीय बल्लेबाज बन गए हैं. करुण नायर का हाइएस्ट स्कोर नाबाद 303 रन हो गया है. अप्रैल 2006 में अपने पहली ही सेंचुरी में ऑस्ट्रेलिया के फास्ट बॉलर जेसन गिलेस्पी ने दोहरा शतक लगाया था. गिलेस्पी ने बांग्लादेश के खिलाफ नाबाद 201 रन बनाए थे.

नायर अपने पहले शतक में ट्रिपल सेंचुरी लगाने वाले टॉप बल्लेबाजों की लिस्ट में शामिल हो गए हैं. सबसे अधिक नाबाद 365 रन बनाने वाले वेस्ट इंडीज के बल्लेबाज सर गैरी सॉबर्स हैं. उन्होंने यह कारनामा 1958 में पाकिस्तान के खिलाफ बनाया था.

इसके बाद 1964 में ऑस्ट्रेलिया के बॉब सिंप्सन ने इंग्लैंड के खिलाफ 311 रन बनाए थे. तीसरे नंबर पर भारतीय क्रिकेटर अरूण नायर ने नाबाद 303 रन बनाया.

सिर्फ नायर ने ही नहीं भारतीय क्रिकेट टीम ने भी इंग्लैंड के खिलाफ चेन्नई में एक और इतिहास रचा है. भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ पांचवे टेस्ट मैच के चौथे दिन एक पारी में सबसे बड़ा स्कोर बनाया है. भारत ने मुंबई में श्रीलंका के खिलाफ बनाए गए सात साल पुराने 726 रनों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है.

चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ चौथे दिन जब भारतीय टीम ने 759/7 (पारी घोषित) की, तो टेस्ट क्रिकेट में यह उनका सबसे बड़ा स्कोर है. भारत ने इससे पहले साल 2009 में श्रीलंका के खिलाफ 726/9 (पारी घोषित) का स्कोर सर्वाधिक था. यह चौथी बार है जब भारत ने टेस्ट पारी में 700 से अधिक स्कोर बनाया है.

साल 2010 में कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ खेलते हुए पूरी भारतीय टीम 707 रनों में आउट हो गई थी. साल 2004 में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में 705/7(पारी घोषित) का स्कोर बनाया था.

भारतीय क्रिकेट टीम ने एक पारी में इंग्लैंड के खिलाफ सबसे बड़ा स्कोर बनाने का जो इतिहास रचा उसके हीरो रहे हैं युवा बल्लेबाज केके नायर, जिन्होंने बिना आउट हुए 303 रन बनाए. उनके अलावा भारतीय ओपनर केएल राहुल ने 199 रन बनाए. पार्थिव पटेल ने 71, पुजारा ने 16, विराट कोहली ने 15, मुरली विजय ने 29, अश्विन ने 67 और जडेजा 51 रन बनाकर आउट हुए.

मिस्त्री ने दिया टाटा की सभी कंपनियों से इस्तीफा

सायरस मिस्त्री ने बड़ी लड़ाई की तैयारी का एलान करते हुए ग्रुप की सभी कंपनियों से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने रतन टाटा पर फर्जीवाड़े का इल्जाम लगाया और कहा कि रतन टाटा की अगुवाई में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. उन्होंने 2-जी घोटाले समेत दूसरी गड़बड़ियों के लिए भी रतन टाटा पर सवाल उठाए.

मिस्त्री ने कहा कि वो कंपनी की विरासत बचाने के लिए अब तक लड़ रहे थे लेकिन अब वक्त आ गया है कि लड़ाई को ईजीएम से बाहर किसी बड़े प्लैटफॉर्म पर ले जाया जाए. उन्होंने रतन टाटा के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोलने के संकेत दिए. बता दें कि कल से टाटा की 4 कंपनियों की ईजीएम होनी है.

वहीं टाटा संस ने मिस्त्री के इस्तीफे पर बयान जारी किया है और कहा है कि सायरस मिस्त्री ने रणनीति के तहत इस्तीफा दिया है और उनकी ओर से लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं. इस बयान में ये भी कहा गया है कि शेयरधारकों की बड़ी संख्या मिस्त्री के खिलाफ है और टाटा संस ग्रुप की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है. हगौरतलब है कि आज से टाटा ग्रुप की कंपनी इंडियन होटल्स की ईजीएम होने वाली है और इस कंपनी में टाटा संस की 28 फीसदी हिस्सेदारी है.

गौरतलब है कि टाटा संस ने गत 24 अक्टूबर को मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाकर उनकी जगह रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया था. इसके बाद टाटा समूह की कई अन्य कंपनियों ने ईजीएम बुलाई है ताकि यह तय किया जा सके कि उनके बोर्ड में मिस्त्री को रखना है या नहीं. टाटा संस भी पहले मिस्त्री से यह कह चुकी है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस पर उन्हें अपने दावे के मुताबिक चलते हुए टाटा समूह की कंपनियों के बोर्ड से इस्तीफा देना चाहिए.

रियल मैड्रिड ने दूसरी बार जीता फीफा क्लब विश्व कप

पुर्तगाल के स्टार फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो की हैट्रिक की बदौलत रियल मेड्रिड ने फाइनल मुकाबले में जापानी क्लब काशिमा को 4-2 से हराकर फीफा क्लब विश्व कप का खिताब दूसरी बार जीत लिया.

इससे पहले रियल ने 2014 में इस टूर्नामेंट का खिताब अपने नाम किया था. योकोहामा के अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में खेला गया यह खिताबी मुकाबला 90 मिनट की निर्धारित अवधि तक बेहद रोमांच से भरा रहा. मुकाबले के 9वें मिनट में करीम बेंजेमा ने गोल दागकर रियल का खाता खोला.

रोनाल्डो की हैट्रिक

काशिमा की ओर से गाकू शिबासकी ने मैच के 44वें मिनट में रियल के गोल का जवाब देते हुए गोल दागा और स्कोर 1-1 से बराबर कर लिया. दूसरे हाफ की शुरुआत काशिमा क्लब के गोल से हुई. टीम के लिए यह गोल भी शिबासकी ने 52वें मिनट में किया. इसके बाद रोनाल्डो ने प्रतिद्वंद्वी क्लब के गोल का जवाब देते हुए 60वें मिनट में रियल के लिए दूसरा गोल दागा और स्कोर 2-2 से बराबर किया.

रोनाल्डो का रहा शानदार प्रदर्शन

निर्धारित समय के खेल में स्कोर बराबर रहने के बाद खेल अतिरिक्त समय में गया. इसका फायदा रियल को मिला. रोनाल्डो ने इस अतिरिक्त समय के पहले हाफ में दो गोल किए. पुर्तगाली स्टार स्ट्राइकर ने ये गोल 98वें और 104वें मिनट में किए. अतिरिक्त समय के दूसरे हाफ में काशिमा कोई गोल नहीं कर सकी और रियल खिताब पर कब्जा करने में सफल रहा.

चटपटी करारी आलूबेसन भुजिया

भारत में भुजिया बनाने का काम राजस्थान के बीकानेर से शुरू हुआ. वहां जो नमकीन तैयार होता है, उस में भुजिया सब से ज्यादा बनती है. भारत के दूसरे शहरों में भुजिया की जगह बेसन से तैयार सेव ज्यादा बनाए जाते हैं, जो भुजिया से मोटे होते हैं. शुरुआत में भुजिया केवल बेसन से तैयार होती थी. इसे चटपटा बनाने के लिए बेसन के बड़े टुकड़े तल कर डाले जाते थे, जो पूरी तरह से मसालेदार होते थे. समय के साथ भुजिया बनाने में बदलाव हुआ. अब भुजिया बनाने के लिए बेसन के साथ आलू का इस्तेमाल भी होने लगा है. इस के बाद से भुजिया का बाजार बढ़ने लगा है. आलू और बेसन से तैयार भुजिया खाने वालों को ज्यादा पसंद आने लगी. अब यह बाजार में बिकने के लिए पैकेटों में आने लगी है. पूरे देश के नमकीन बनाने वालों को भुजिया बनाने का फायदेमंद काम पसंद आने लगा है. इस से  चने और आलू की खेती करने वालों को भी नया रास्ता दिख गया है. वे भी अब भुजिया बनाने लगे हैं. पूरे देश में भुजिया बनाने का काम गृहउद्योग की तरह फैल गया है.

चटपटे पकवानों की शौकीन लखनऊ की मनीषा त्रिपाठी कहती हैं, ‘भुजिया खाने में दूसरे नमकीनों के मुकाबले काफी अच्छी होती है. सब से अच्छी बात यह है कि इसे बनाना सरल होता है. केवल मशीन से ही नहीं, हाथों से भी इसे बनाया जा सकता है. यह रोजगार का अच्छा जरीया हो सकती है.’

हमारे देश में आलू की अच्छी पैदावार होती है. आलू भुजिया की मांग बढ़ने के बाद से आलू के किसानों की फसल बरबाद नहीं होगी. उस के दाम कम नहीं होंगे और आलू किसानों को अच्छा मुनाफा मिलेगा. इस तरह फूड प्रसंस्करण होने से किसानों का मुनाफा बढ़ रहा है. फसलों से जुड़ी चीजों का इस्तेमाल इस तरह हो तो किसानों को ज्यादा मुनाफा मिलेगा.

आलू भुजिया और नमकीन सेव का स्वाद अलग और खास होता है. आलू भुजिया को कई तरह से बनाया जाता?है. इसे आलू और बेसन मिला कर या आलू, बेसन और मोंठ का आटा मिला कर या आलू, बेसन और चावल का आटा मिला कर बनाया जाता है. हर तरह से बनाई गई भुजिया का स्वाद अलग होता है, लेकिन बनाने का तरीका एक ही होता है. आप के पास जो भी सामग्री मौजूद हो उसी से आलू भुजिया बनाई जा सकती है. लेकिन बेसन मिली आलू भुजिया का स्वाद लाजवाब होता?है.

भुजिया बनाने की सामग्री

बेसन 200 ग्राम, आलू 400 ग्राम, नमक स्वादानुसार, हलदी पाउडर एक चौथाई छोटा चम्मच, हींग स्वादानुसार, गरम मसाला आधा छोटा चम्मच और तलने के लिए तेल.

बनाने की विधि

आलुओं को उबाल लें. उन्हें छील कर कद्दूकस कर लें. बेसन को किसी बरतन में छान कर निकाल लें. अब कद्दूकस किए हुए आलू बेसन में डाल लें. नमक, हींग, हलदी पाउडर और गरम मसाला डाल कर सारी चीजों को अच्छी तरह मिला लें और चिकना आटा जैसा गूंध कर तैयार कर लें. इसे 20 मिनट के लिए ढक कर रख दें ताकि ये फूल कर सेट हो जाए. सेव बनाने वाली मशीन पर बारीक जाली लगा दें. हाथ पर थोड़ा सा तेल लगाएं. अब गुंधी सामग्री का एक हिस्सा (जितना मशीन में?ठीक से आ सके) लंबे आकार की लोई बना कर मशीन में डालें और मशीन का ढक्कन बंद कर दें. कढ़ाई में तेल डाल कर गरम करें. मीडियम गरम तेल के ऊपर मशीन को दबा कर निकले हुए सेव डालें. जितने सेव कढ़ाई में आसानी से तले जा सकें, उतने सेव ही तेल में डालें. जब सेव हलके सिक जाएं तो उन्हें पलट दें. सेवों को हलका भूरा होने तक तलें और किसी नैपकिन पेपर बिछी प्लेट में निकालें. बाकी सारी सामग्री को भी इसी तरह सेव की मशीन में भर कर गरम तेल में तल कर सेव बना लें.

आलू भुजिया सेव को अच्छी तरह से ठंडा होने दें और फिर किसी एयरटाइट डब्बे में भर कर रख लें. आप इसे 1 महीने से भी ज्यादा समय तक आराम से खा सकते?हैं. आप अपनी पसंद से आलू भुजिया सेव को कम या ज्यादा मसाले वाले बना सकते हैं. आप चाहें तो इन्हें कम मसाले वाले बना लें ताकि बच्चे भी आसानी से खा सकें और जब आप का मन ज्यादा मसाले वाले सेव खाने का हो तो आप इन पर थोड़ा सा चाट मसाला डाल कर खाएं.

मिर्च की वैज्ञानिक खेती से अच्छी फसल

सलाद से ले कर हर वक्त के खाने में मिर्च शामिल होती है. तीखा खाने वाले तो बगैर मिर्च के रह ही नहीं पाते. यही वजह है कि मिर्च की खेती से किसान काफी फायदा उठा सकते हैं. मिर्च की वैज्ञानिक खेती बहुत कारगर रहती है. हम मिर्च को किसी भी मौसम में उगा सकते हैं, लेकिन मिर्च की खेती सर्दी के मौसम में करने से ज्यादा फायदा होता है. इसे उगाने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है. उत्तर भारत में जहां सिंचाई की सुविधाएं मौजूद हैं, वहां मिर्च का बीज मानसून आने से करीब 6 हफ्ते पहले बोया जाता है और मानसून आने के साथसाथ इस की पौध खेतों में लगा दी जाती है. इस के अलावा दूसरी फसल के लिए बोआई नवंबरदिसंबर में की जाती है और फसल मार्च से मई तक ली जाती है.

मिर्च कैप्सिकम वंश का एक फल माना जाता है. यह सोलेनेसी कुल का एक सदस्य है. मिर्च भारतीय व्यंजन में डाला जाने वाला खास मसाला है. देश में मिर्च का इस्तेमाल हरी मिर्च की तरह व मसाले के रूप में किया जाता है. इसे सब्जियों और चटनियों में डाला जाता है. इस को हरी खाने के साथसाथ मसाले व अचार की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है. इस की खेती जायद व खरीफ दोनों मौसमों में की जाती है.

मिर्च की खेती  की शुरुआत दक्षिण अमेरिका से हुई थी और अब सभी देशों में इस की खेती की जाती है. भोजन में तीखापन लाने वाली हरी मिर्च, स्वाद के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है. यह आप के स्वास्थ्य को कई तरह से बेहतर बनाए रखने में मदद करती है. हरी मिर्च कई तरह के पोषक तत्त्वों जैसे विटामिन ए, बी 6, सी, आयरन, कौपर, पोटेशियम, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है. यही नहीं इस में बीटा कैरोटीन वगैरह की भी काफी मात्रा होती है. हरी मिर्च में भरपूर मात्रा में विटामिन सी होता है, जो रोगों से लड़ने की कूवत में बढ़ोतरी करता है. इस में भरपूर मात्रा में एंटी आक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर की आंतरिक सफाई करने के साथ ही शरीर को फ्री रेडिकल से बचा कर कैंसर के खतरे को कम करते हैं. विटामिन ई से भरपूर हरी मिर्च त्वचा के लिए भी फायदेमंद होती है.

भारतीय नाम : लाल मिर्च, हरी मिर्च, मोरची, लाल मिरचा आदि.

जलवायु : मिर्च गरम व नम आबोहवा में अच्छी तरह उगती है. लेकिन फलों के पकते समय शुष्क मौसम का होना जरूरी है. गरम मौसम की फसल होने के कारण इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो और पाले का खतरा टल न गया हो. बीजों का अच्छा अंकुरण 18-30 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान पर होता है. अगर फूलते समय और फल बनते समय जमीन में नमी की कमी हो जाती है, तो छोटे फल गिरने लगते हैं. मिर्च के फूल व फल आने के लिए सब से सही तापमान 25-30 डिगरी सेंटीग्रेड है. फूलते समय ओस गिरना या तेज बारिश होना फसल के लिए नुकसानदायक होता है, क्योंकि इस की वजह से फूल व छोटे फल टूट कर गिर जाते हैं.

मिर्च की उन्नतशील प्रजातियां

मिर्च की 2 तरह की प्रजातियां होती हैं. पहली प्रजाति में पूसा ज्वाला, पंत सी 1, पूसा सदाबहार, जी 4, आजाद मिर्च 1, चंचल, कल्यानपुर चमन वगैरह शामिल हैं. दूसरी संकर प्रजातियां होती हैं, जिन में तेजस्वनी, अग्नि, चैंपियन, ज्योति व सूर्या वगैरह खास हैं.

निजी कंपनियों द्वारा विकसित किस्में

सिजेंटा इंडिया : रोशनी, हाटलाइन, पीकाडोर, अभिरेखा, एचपीएच 2424.

नामधारी सीड्स : एनएस 686, 222, 1701, 408, 407, 250, 208, प्रगति.

अंकुर सीड्स : आचारी, गुलजार, एआरसीएच 226, 32, 313, 162, 547, 531.

जेके एग्री जेनेटिक्स : जेकेएचपीएच 301, जेके दिव्या 178, जेके 1020.

सेमिनिस वेजीटेबल्स : ज्वालामुखी, दिल्ली हाट, रविंदू, सितारा, रेडहाट, मेगाहाट, हाट पेपर.

नुनहेम्स सीड्स : क्रांति रुद्रा, सोल्जर, उजाला 2680, न्यू वरदान, अभिरेखा, वीरू, सिंदूर.

बेजो शीतल : अनमोल, अर्जुन, सावित्री, अग्रीमा 269, गरिमा 378, सुपर अर्जुन, झनकार, जलवा.

बीज दर : संकर किस्मों के बीजों की 120-150 ग्राम व अच्छी पैदावार देने वाली किस्मों के बीजों 200-250 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से लगती है. 1 से डेढ़ किलोग्राम अच्छी मिर्च का बीज करीब 1 हेक्टेयर रकबे में रोपने लायक पौधे बनाने के लिए काफी होता है. साथ ही ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहिए, जो इलाके के मौसम, बाजार व उपभोक्ता के अनुसार अच्छी पैदावार देने वाली हों.

पौधशाला (नर्सरी) : पौधशाला के लिए उपजाऊ, अच्छी पानी सोखने वाली व पानी निकास वाली, पेड़ की छाया रहित, खरपतवार मुक्त जमीन का चुनाव करना चाहिए. पौधशाला में सही मात्रा में धूप का आना भी जरूरी है. पौधशाला को पाले से बचाने के लिए नवंबरदिसंबर की बोआई में पानी का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

पौधशाला की लंबाई 10-15 फुट व चौड़ाई 2.3-3 फुट से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, ताकि निराई व दूसरे कामों में परेशानी न हो. पौधशाला की ऊंचाई आधा फुट रखनी चाहिए. जमीन बराबर करने के बाद 5 से 10 सेंटीमीटर के अंतर पर 2 से 2.5 सेंटीमीटर गहरी नाली बना कर उस में बीज बोने चाहिए. बोआई कतारों में करें और कतारों का फासला 5-7 सेंटीमीटर रखें. लगभग 6 हफ्ते में पौधे तैयार हो जाते हैं.

पौधशाला की देखभाल: पौधशाला में जरूरत के हिसाब से फुहारे से पानी देते रहें. गरमियों में एग्रोनेट का इस्तेमाल करने से भी जमीन से नमी जल्दी उड़ जाती है, लिहाजा कभीकभी दोपहर के बाद 1 दिन के अंतर पर पानी छिड़कें. बारिश के मौसम में पानी के निकास का इंतजाम करें. बीजों के अंकुरण के 4 से 5 दिनों बाद घास वगैरह हटाएं. नर्सरी में खरपतवार न उगने दें. अगर सूक्ष्म तत्त्वों की कमी दिखे तो पानी में घुलनशील सूक्ष्म तत्त्वों का छिड़काव करें.

मिट्टी व खेत की तैयारी : मिर्च कई तरह की मिट्टियों में उगाई जा सकती है, पर अच्छी जल निकास व्यवस्था वाली कार्बनिक तत्त्वों वाली दोमट मिट्यिं इस के लिए सब से अच्छी होती हैं. जहां फसल काल छोटा है, वहां बलुई व बलुई दोमट मिट्टियों को प्राथमिकता दी जाती है. बरसाती फसल भारी और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बोई जानी चाहिए. जमीन 5-6 बार जोत कर व पाटा चला कर समतल कर लेनी चाहिए. खेती की ऊपरी मिट्टी को महीन और समतल कर लिया जाना चाहिए और उचित आकार की क्यारियां बना लेनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से जुताई के समय मिट्टी में मिला देनी चाहिए. रोपाई से पहले 150 किलोग्राम यूरिया, 175 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 100 किलोग्राम म्यूरिएट औफ पोटाश का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. 150 किलोग्राम यूरिया बाद में प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए. यूरिया फूल आने से पहले जरूर दे देने चाहिए.

रोपाई : 1 एकड़ में 60 हजार पौधे और हर जगह 2 पौधे के हिसाब से रोपाई करनी चाहिए. मिर्च के पौधे को गड्ढे में इस प्रकार रोपें, जिस से पौधे का आखिरी पत्ता जमीन में सटे. रोपाई के लिए 60×60 सेंटीमीटर का अंतर रखें. पौधे को लाल कीड़ी, दीमक, केंचुआ, कृमि व रस चूसक कीट से बचाने के लिए खाद के साथ 300 ग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से डाल कर जमीन में मिला दें. मिर्च को शाम के वक्त लगभग 4 बजे के बाद रोपना चाहिए ताकि धूप कम हो जाए. धूप में मिर्च के पौधे को रोपने से वह मुरझा जाता है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में रोपाई : अनिश्चित बढ़वार, झाड़ीनुमा सीधे बढ़ने वाली किस्मों को 5 फुट की दूरी पर ड्रिप लाइन पर एकल कतार विधि से रोपना चाहिए. पौधे से पौधे की दूरी व कतार से कतार की दूरी  30 से 40 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. संकर किस्मों को युगल कतार विधि द्वारा लगाना चाहिए. मिर्च के पौधे की सिंचाई ड्रिप विधि से की जानी चाहिए, क्योंकि ड्रिप सिस्टम मिर्च की जड़ों को हमेशा जीवित रखता है.

सिंचाई : पहली सिंचाई रोपाई के एकदम बाद की जाती है. बाद में गरम मौसम में हर 5-7 दिनों और सर्दी में 10-12 दिनों के अंतर पर फसल को सींचा जाता है.

निराईगुड़ाई : पौधों की बढ़वार की शुरुआती अवस्था में खरपतवारों पर नियंत्रण पाने के लिए निराई करना जरूरी होता है. रोपाई के 2 या 3 हफ्ते बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ाई जानी चाहिए.

अन्य देखभाल : अगर खेत में जिंक, लौह या बोरौन की कमी दिखे तो 40 ग्राम फेरस सल्फेट, 20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम बोरिक एसिड को 10 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

सूक्ष्म तत्त्वों का घोल बनाने का तरीका : 10 लीटर पानी में 250 ग्राम चूना रात में भिगो कर रख दें. दूसरे दिन इस घोल में से 1 लीटर चूने का पानी तैयार करें. फिर 1 लीटर पानी में 40 ग्राम फेरस सल्फेट, 20 ग्राम जिंक सल्फेट और 10 ग्राम बोरिक एसिड को मिक्स कर छान लें. इस में 1 लीटर चूने का पानी, 8 लीटर सादा पानी मिला कर 10 लीटर का घोल बनाएं. घोल में टीपोल या साबुन का घोल डाल कर प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह जल्दी या शाम को 7 दिनों के अंतर पर 2 बार छिड़कें.

रोपाई का सही समय 15 अगस्त से 15 सितंबर के बीच का है. हलकी बारिश गिरते समय रोपाई करने से पौधे अच्छी तरह से लग जाते हैं. अच्छी बढ़वार के लिए बोआई के 5 से 6 हफ्ते बाद 15 से 20 सेंटीमीटर के सही पौधे की 60×60 सेंटीमीटर के अंतर पर रोपाई करें. एक जगह पर 5 सेंटीमीटर के अंतर पर 2 पौधे लगाएं. पौधों की सही संख्या के लिए रोपाई के 10-15 दिनों बाद खाली जगह में नए पौधे लगाएं.

उपज : सिंचित क्षेत्रों में हरी मिर्च की औसत पैदावार करीब 88-94 क्विंटल और सूखी मिर्च की औसत पैदावार करीब 18-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

मिर्च की खेती के लिए सुझाव

* टमाटर व मिर्च की खेती एक ही खेत में या आसपास के खेतों में न करें, क्योंकि इन में कीड़े व रोग एक जैसे होते हैं. सह फसलों से एंथ्रेक्नोज और बैक्टीरियल झुलसा रोग फैल सकते हैं.

* प्याज व धनिया के साथ मिश्रित खेती करने से ज्यादा आमदनी मिलती है व खरपतवारों की संख्या कम करने में भी सहायता मिलती है.

* यदि मिर्च के साथ प्याज, लहसुन और गेंदे की मिश्रित खेती की जाए, तो सूत्रकृमि की रोकथाम में मदद मिलती है.       

मिर्च फसल में कीट व रोगों से बचाव

आर्द्रगलन रोग : यह रोग ज्यादातर नर्सरी के पौधों में आता है. इस रोग में जमीन से सटा हुआ तना गलने लगता है और पौधा मर जाता है. इस रोग से बचाने के लिए बोआई से पहले बीजों का उपचार फफूंदनाशक दवा कैप्टान से करना चाहिए. दवा का 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. इस के अलावा कैप्टान की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर सप्ताह में 1 बार नर्सरी में छिड़काव किया जाना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज रोग : इस रोग में पत्तियों और फलों में खास आकार के हरे, भूरे और काले रंग के धब्बे पड़ते हैं. इस के असर से पैदावार बहुत घट जाती है. इस रोग से बचाव के लिए वीर एम 45 या बाविस्टीन नामक दवाओं की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

लीफ कर्ल रोग : यह मिर्च की एक भयंकर बीमारी है. यह रोग बरसात की फसल में ज्यादातर आता है. इस से शुरू में पत्ते मुरझा जाते हैं व बढ़वार रुक जाती है. अगर इस को समय रहते काबू नहीं किया जाता तो यह पैदावार को भारी नुकसान पहुंचाता है. यह एक विषाणु रोग है, जिस को किसी दवा से काबू नहीं किया जा सकता है. यह बीमारी सफेद मक्खी से फैलती है. लिहाजा इस की रोकथाम भी सफेद मक्खी से छुटकारा पा कर ही की जा सकती है. इस बीमारी से बचने के लिए बीमारी लगे पौधों को उखाड़ कर खत्म कर दें और 15 दिनों के अंतर पर कीटनाशक रोगर या मैटासिस्टाक्स की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.  इस रोग की प्रतिरोधी किस्में जैसे पूसा ज्वाला, पूसा सदाबहार और पंत सी 1 को लगाना चाहिए.

मौजेक रोग : इस रोग में हलके पीले रंग के धब्बे पत्तों पर पड़ जाते हैं. बाद में पत्तियां पूरी तरह से पीली पड़ जाती हैं व बढ़वार रुक जाती है. यह भी एक विषाणु रोग है, जिस का नियंत्रण मरोडि़या रोग की तरह ही है.

थ्रिप्स व एफिड : ये कीट पत्तियों से रस चूसते हैं और उपज के लिए हानिकारक होते हैं. इन कीटों की वजह से पत्तियां सिमट छोटी हो जाती हैं और एक ओर मुड़ जाती हैं, जिस से पौधे का विकास रुक जाता है. कीट लग जाने की वजह से पौधे में फूल बहुत ही कम निकलते हैं. साथ ही फल भी कम हो जाते हैं. रोगर या मैटासिस्टाक्स दवा की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करने से इन को काबू किया जा सकता है.

मिर्च तोड़ाई में सावधानी

* हरी मिर्च तोड़ते समय यह खयाल रखें कि फूल व बढ़ रही मिर्चें खराब न होने पाएं. हरी मिर्च की तोड़ाई 6 से 8 बार औसतन 5 से 6 दिनों के अंतर से करें.

* गरमी व सर्दी के मौसम में मिर्च पकने पर सुखा कर बेचते हैं. कभीकभी अचार वाली जातियों को गीला बेचने के लिए तोड़ा जाता है.

* अमूमन पकी हुई मिर्चों को थोड़ेथोड़े समय के अंतर पर हाथ से तोड़ लिया जाता है. मिर्च की 3 से 6 बार तोड़ाई की जाती है. आमतौर पर मिर्च को सूरज की रोशनी में सुखाते हैं.

* तोड़ाई के बाद मिर्च की फलियों को ढेर के रूप में रातभर के लिए रखते हैं, जिस से आधे पके फल पक जाते हैं.

* दूसरे दिन मिर्च को ढेर से उठा कर सुखाने के स्थान पर 2-3 इंच मोटी परत में फैला देते हैं.

* 2 दिनों के बाद, हर दिन सुबह मिर्च को उलटनेपलटने से सूरज की रोशनी हर परत पर समान रूप से पड़ती है.

* सूरज की रोशनी में मिर्च को सुखाने के लिए 10-25 दिन लगते हैं.

* सौर ऊर्जा से चलने वाली मशीन का इस्तेमाल भी मिर्च को सुखाने के लिए किया जाता है. इस से 10-12 घंटे में मिर्च को सुखाया जा सकता है.

* सौर ऊर्जा द्वारा सुखाई गई मिर्च अच्छे गुणों वाली होती है.

डा. बालाजी विक्रम, डा. दिनेश कुमार

दूध की प्रोसेसिंग : कम पूंजी से करें ज्यादा कमाई

कहते हैं कि हमारे देश में दूध की नदियां बहती थीं यानी पुराने जमाने में भी दूध भरपूर होता था. दादीनानी खुश हो कर ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ का आशीर्वाद देती थीं. ‘दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है’ जैसे मुहावरे चलन में आम थे यानी दूध हमारे यहां जनजन से सीधे जुड़ा हुआ था.

कई तरह के कुदरती गुण होने से दूध सेहत के लिए फायदेमंद है. दूध कमजोरी दूर कर के ताकत देता है. दूध पशुपालकों की माली कमजोरी दूर कर के उन्हें ताकतवर भी बना सकता है, लेकिन ज्यादातर पशुपालक कच्चा व खुला दूध बेचते हैं, इसलिए उन्हें सही कीमत नहीं मिलती. वे यदि दूध की प्रोसेसिंग कर के उस की कीमत बढ़ा लें, तो डेरी के काम में ज्यादा कमाई की जा सकती है.

नए तरीके

दूध से दही, घी, मक्खन, छेना व खोया जैसी कई चीजें हमारे देश में सदियों से बनाई जाती रही हैं. फर्क इतना है कि पहले भट्टी, चूल्हे व कढ़ाव जैसे खुले व पुराने तरीके थे और अब ये सारे काम बंद मशीनों वाले नए प्लांटों में होते हैं. दूध सावधानी से न रखने पर जल्द खराब हो जाता है, लिहाजा बेहतर तरीके अपनाने जरूरी हैं.

डेरी का काम कर रहे ज्यादातर उद्यमी सदियों पुराने तरीकों से काम करने के आदी हैं, लिहाजा उत्पादन कम व घटिया होता है. बहुत से पशुपालक इस बात पर कोई ध्यान ही नहीं देते कि अब दूध व उस से बनी चीजों को बेहतर, महफूज, ताजा व ज्यादा टिकाऊ बनाने व उन की पैकेजिंग तक में कई सुधार व बदलाव हुए हैं. आज के दौर में उन्हें अपनाना बहुत जरूरी है.

नई तकनीकों की बदौलत ही दूध व उस से तैयार चीजों की फेहरिस्त पुराने जमाने के मुकाबले अब और लंबी हो गई है. पशुपालक किसानों द्वारा मिल कर बनाई गई मशहूर कोआपरेटिव डेरी अमूल दूध से बनी एक दो नहीं दर्जनों चीजें बना कर बेच रही है.

दूध व उस से बनने

वाली चीजें

डेरियों द्वारा दूध को फुल क्रीम, टोंड व डबल टोंड वगैरह बना कर बेचा जाता है. दूध से बनाई जाने वाली अन्य खास चीजें हैं दूध पाउडर, बाल आहार, दही, लस्सी, छाछ, मक्खन, क्रीम, घी, फ्रूट योगर्ट, श्रीखंड, मिल्क केक, खीर, पेड़े, सफेद रसगुल्ले, बर्फी, पनीर, छेना, खोया, आइसक्रीम, कुल्फी व चाकलेट वगैरह.

पशुपालक किसान व उन के बच्चे पाश्चुराइजेशन स्टारलाइजेशन जैसी तकनीकें सीख कर दूध की कूलिंग व प्रोसेसिंग करें. वे अलगअलग तरह की जायकेदार चीजें बना कर ज्यादा कमा सकते हैं.

आम आदमी की औसत आमदनी बढ़ने से खानेपीने के तौरतरीके बदल रहे हैं. खाने की तैयार चीजों की मांग, बिक्री व खपत बेतहाशा बढ़ रही है. डेरी के काम में लगे पशुपालक इस ओर ध्यान दे कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं. साथ ही अपने बच्चों को बेहतर रोजगार में लगा सकते हैं. दूध से दही, खोया, पनीर, घी, मक्खन, क्रीम व मिल्ककेक आदि कई ऐसी चीजें बनती हैं, जिन में सुधरे तरीके अपनाने जरूरी हैं. वैसे शुरू में ज्यादा पूंजी या प्लांट की जरूरत नहीं पड़ती.

गौरतलब है कि डेरी उत्पाद बनाने में पशुपालकों से ज्यादा कमाई प्रोसेसिंग करने वाले कारोबारी कर रहे हैं. यानी यह काम करना फायदेमंद है. सोचने की बात है कि जब दूसरों से दूध खरीद कर क्रीम निकालने व फुटकर दूध बेचने वाले मालामाल हो रहे हैं, तो फिर पशुपालकों के लिए तो लाभ कमाने की और भी ज्यादा गुंजाइश है.

ऐसा करें किसान

सब से पहले यह तय करें कि दूध से क्या चीज बनने की इकाई लगानी है. हमेशा इलाकाई मांग के मुताबिक उत्पाद बनाने का काम चुनें. उस की ट्रेनिंग लें. सरकार ने किसानों व उद्यमियों को डेरी का काम सिखाने के लिए माकूल इंतजाम किए हैं, लेकिन ज्यादातर किसानों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्हें जानकारी होनी चाहिए. तभी वे अपना रोजगार ठीक से चला पाएंगे.

डेरी में देश के सब से बड़े सेंटर राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल से यह काम सीखा जा सकता है. इस संस्थान ने बरसों पहले भैंस के दूध से भी गाय के दूध जैसे नरम स्पंजी सफेद रसगुल्ले बनाने व परत विधि से ज्यादा घी बनाने जैसी कई तकनीकें निकाली थीं, लेकिन ज्यादातर पशुपालकों को आज भी ऐसी बहुत सी बातों की जानकारी नहीं है.

पहले सीखें

किसानों व पशुपालकों में जानने की जागरूकता व सीखने की ललक होना जरूरी है. खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मैसूर, कृषि विज्ञान केंद्रों, राज्यों के दूध विकास महकमों, कृषि विश्वविद्यालयों व प्रादेशिक सहकारी दूध फेडरेशनों आदि से डेरी के सामान बनाने की जानकारी ली जा सकती है.

ज्यादातर पशुपालक कम पढ़े व गरीब होते हैं. उन्हें नई व पूरी जानकारी नहीं होती, लिहाजा वे तजरबे के लिए डेरी उत्पाद बना रहे किसी कारखाने में रह कर भी एक सिरे से पूरा काम सीख सकते हैं.

पूंजी व पड़ताल

ज्यादातर किसान व पशुपालक छोटे व मंझोले दर्जे के होते हैं, उन के लिए दूध ठंडा रखने व दूध के पालीपैक तैयार करने के प्लांट और अपनी प्रोसेसिंग इकाई लगाना आसान नहीं है. वे शुरू में सरकारी स्कीम में बैक से कर्ज हासिल कर के, छोटे पैमाने पर अकेले काम कर सकते हैं. यदि लगन व जानकारी हो तो उत्पादक संघ, स्वयं सहायता समूह या सहकारी समिति के जरीए पूंजी जुटा कर बड़ा कारोबार किया जा सकता है.

इस मैदान में उतरने वालों को चाहिए कि वे बड़ेबड़े स्टोर व मौल्स में जाएं और खुद सर्वे करें. वे पहले अमूल, मदर डेरी, नैस्ले व दूसरी छोटीबड़ी देशीविदेशी कंपनियों के सारे दुग्ध उत्पाद खरीदें, ध्यान से देखें, उन्हें चखें व गौर से समझें. उन की पैकिंग देखें, उस पर लिखी हर बात पढ़ें ताकि बाजार का रुख पता चले.

यह पता लगाएं कि बाजार में कौन से उत्पाद की बिक्री सब से जल्दी व ज्यादा होती है. इस के बाद अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट खुद बनाएं या बनवाएं. लाइसेंस व मंजूरी लेने वगैरह की कागजी खानापूरी करें. फिर अपनी हैसियत व हुनर के मुताबिक मशीनें वगैरह खरीदें व अपनी इकाई लगाएं. बाजार, बिक्री व इश्तहार वगैरह पर पूरा ध्यान दें.

दूध की छोटीबड़ी मशीनों व डेरी संबंधी दूसरे उपकरणों की ज्यादा जानकारी के लिए इच्छुक पशुपालक व किसान इन पतों पर संपर्क कर सकते हैं:

* मै. वेद इंजीनियरिंग, सेक्टर 60, नोएडा, उत्तर प्रदेश.

मो.नं.  08042969330.

* मै. ओम मैटल एंड इंजीनियरिंग, थरेगांव, पुणे.

मो.नं. 08079453210.

* मै. जया इंडस्ट्रीज, जैसोर, कोलकाता, पं. बंगाल.

मो.नं. 0837688418

* मै. स्काईलार्क इंजीनियरिंग, ए- 21, मायानगरी, पुणे.

मो.नं. 09890169993.                     ठ्ठ

बीज कंपनियों के फरेब में फंसे किसान

सरकारी बीज केंद्रों पर बीजों की भारी कमी, उन से खरीदने के झमेले और जरूरत के मुताबिक व समय पर बीज नहीं मिलने की वजह से परेशान किसान हर सीजन में प्राइवेट बीज कंपनियों से बीज खरीदने को मजबूर होते हैं. अकसर यह देखा गया है कि प्राइवेट बीज कंपनियों के दावों और सचाई में जमीनआसमान का फर्क होता है.

बिहार के शेखपुरा जिले के भदौंस गांव के किसान रामबालक सिंह प्राइवेट बीज कंपनी का बीज खरीद कर कर्ज में डूबे हुए हैं. वे बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने 11 एकड़ में मक्के के बीज बोए. अच्छे पौधों के निकलने के बाद उन में बालियां भी आईं, लेकिन बालियों में दाने नहीं आए.

यह पूछने पर कि उन्होंने किस कंपनी के बीज खरीदे थे, वे कहते हैं, ‘पता नहीं, किस कंपनी के बीज थे, दुकानदार ने कहा था कि चुलबुलिया बीज है. इस से फसल समय से पहले और 25 फीसदी ज्यादा होगी.’

रामबालक की तरह ज्यादातर किसानों का यही हाल है. अनपढ़ होने की वजह से किसानों को पता ही नहीं चल पाता है कि वे किस कंपनी का बीज खरीद रहे हैं और बीज के पैकेट पर कंपनी का क्या दावा लिखा हुआ है? बीज को खेतों में लगाने, सिंचाई करने और

देखभाल करने के तरीके क्या हैं? क्याक्या सावधानियां बरतनी हैं? खरीदे गए बीज की रसीद लेने से क्या फायदा है? दुकानदार ने जो कह दिया, उसी पर आंखें मूंद कर किसान अमल करते हैं.

कृषि वैज्ञानिक ब्रजेंद्र मणि कहते हैं कि फसलों की पैदावार बढ़ाने में उन्नत बीजों की सब से बड़ी भूमिका होती है. अच्छे बीजों का इस्तेमाल कर के किसान फसलों की पैदावार में 20 से 30 फीसदी तक का इजाफा कर सकते हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसानों को समय पर अच्छे बीज नहीं मिल पाते हैं और अकसर वे उम्दा किस्म के बीजों के नाम पर ठगे जाते हैं. इस से उन की पूंजी, मेहनत और समय बरबाद होता है. बिहार के किसानों को बीज बेचने वालों ने खासा चूना लगाया है. सूबे के कई इलाकों में धान, मक्का और आलू के घटिया बीजों ने किसानों की मेहनत और पूंजी पर पानी फेर दिया है.

बिहार की राजधानी पटना से सटे नौबतपुर गांव के किसान मनोज पांडे कहते हैं कि रोपनी के 10 दिनों के बाद ही धान के पौधों में बालियां लग गईं. कृषि वैज्ञानिकों से ले कर अफसरों तक ने इस मामले में अपने हाथ खड़े कर दिए हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि फसल को बचाने का कोई उपाय ही नहीं है, वहीं अफसर यह कह कर कन्नी काट लेते हैं कि किसानों ने सही दुकानों से बीज नहीं खरीद कर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है.

कृषि विभाग का दावा है कि कृषि विज्ञान केंद्रों में बीज भरे रहते हैं, उस के बाद भी किसान प्राइवेट बीज कंपनियों के झांसे में फंस जाते हैं. किसानों के बीच यह प्रचार भी किया गया था कि राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अधिकृत बीज केंद्रों से ही बीज खरीदें. इस के बाद भी किसान प्राइवेट बीज कंपनियों के बीज खरीदने के लिए होड़ लगाए रहते हैं.

अकेले बिहार में प्राइवेट बीज कंपनियां हर साल 225 करोड़ रुपए के बीज बेचती हैं. मिसाल के तौर पर राज्य में हर साल डेढ़ लाख क्विंटल मक्के के बीज की जरूरत होती है, जिस में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय 500 क्विंटल, तराई बीज विकास निगम 500 क्विंटल और नेशनल सीड कारपोरेशन 3000 क्विंटल बीज का ही इंतजाम कर पाते हैं. 95 फीसदी से ज्यादा बीज प्राइवेट कंपनियों के ही इस्तेमाल किए जाते हैं. प्राइवेट कंपनियों के बीजों पर किसानों को अनुदान नहीं मिल पाता है. सरकारी बीज अगर 20 से 25 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलते हैं, तो प्राइवेट कंपनियों के बीज 200 से 250 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलते हैं. सरकारी बीजों पर सरकार अनुदान और फसल खराब होने पर हर्जाना भी देती है.

एग्रीकल्चर ट्रेनिंग एंड मैनेजमेंट एजेंसी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डा. वेदनारायण सिंह कहते हैं कि खेती और फसलों की पैदावार में बीज सब से खास हिस्सा हैं. बीज की क्वालिटी पर ही पैदावार निर्भर करती है. अच्छी क्वालिटी के शुद्ध बीज फसलों के उत्पादन में 20 से 25 फीसदी तक इजाफा कर देते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर खास खाद्यान्न फसलों की पैदावार में तेजी से होने वाला इजाफा उम्दा क्वालिटी के बीजों की वजह से ही मुमकिन हो सका है. उम्दा और उन्नत किस्म के बीजों की कमी की वजह से किसानों की मेहनत, पूंजी और समय का बेहतर नतीजा उन्हें नहीं मिल पाता है.

प्राइवेट बीज कंपनियों का कोई अफसर कंपनियों के दावों और उन के नतीजों के बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. एक अफसर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मिट्टी की उर्वरा ताकत, इलाके की आबोहवा, सिंचाई, देखभाल वगैरह का पैदावार पर काफी असर होता है. इस में बीज कंपनियों की कोई गलती नहीं है. हर कंपनी चाहती है कि उस के उत्पाद की कोई शिकायत न हो. कभी कोई शिकायत मिलती भी है, तो उस पर पूरी पड़ताल होती है और कमियों को दूर किया जाता है. प्राइवेट कंपनी किसानों को जबरन बीज खरीदने को मजबूर नहीं करती है. किसान खुद अपनी पसंद का बीज खरीदते हैं. यह सवाल तो किसानों से पूछा जाना चाहिए कि अगर बीज कंपनियों के बीज खराब होते हैं, तो वे उन के बीज क्यों खरीदते हैं? सरकारी बीजों की क्वालिटी और दामों से प्राइवेट कंपनियों को कोई मतलब नहीं होता है. वे तो अपने उत्पादों को किसानों के बीच ले जाती हैं और किसान उन्हें खरीदते हैं.

20 सालों से खेती में लगे शंकर कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियों के बीजों के पैदावार संबंधी दावों और हकीकत में काफी फर्क होता है. कंपनी द्वारा बताए गए तरीकों से खेती करने के बाद भी उन का दावा खरा नहीं उतरता है. पिछले साल उन्होंने धान के लिए इंडोअमेरिकन हाईब्रिड बीज का इस्तेमाल किया था. 6 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की दर से 4 एकड़ में बोए थे. कंपनी का दावा था कि प्रति एकड़ 30 क्विंटल धान की उपज होगी, लेकिन 21 क्विंटल उपज ही हो सकी. वे सरकारी बीज केंद्रों से बीज क्यों नहीं खरीदते हैं? के जबाव में शंकर कहते हैं कि वहां से बीज खरीदने में बहुत झमेला है और जितने बीजों की जरूरत होती है, उतने मिलते भी नहीं हैं.

बेगूसराय जिले के रामदीरी गांव के किसान चंद्रिका सिंह सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल के पद से रिटायर होने के बाद खेती में लग गए. वे खेती की नई तकनीकों को अपनाते रहते हैं. वे कहते हैं कि बीज कंपनियां जो दावा करती हैं, असलियत उस से कोसों दूर होती है. कंपनियों के एजेंट गांवों में घूमते रहते हैं और किसान उन के जाल में फंस जाते हैं. फसल होने पर अनपढ़ किसानों को ठगे जाने का एहसास होता है. पिछले साल उन्होंने धान के लिए 7029 एमकेयू बीज का इस्तेमाल 4 एकड़ खेत में किया था. प्रति एकड़ 12 किलोग्राम बीज लगे. कंपनी का दावा था कि प्रति एकड़ 25 क्विंटल धान की पैदावार होगी, पर 17 क्विंटल ही हुई. यही हाल गेहूं का भी हुआ. 343 और 502 प्रजातियों के गेहूं के बीज लगाए थे, फसल तो समय पर तैयार हो गई, लेकिन उपज बहुत ही कम हुई.

समस्तीपुर के मोहालीपुर गांव के किसान चन्नू सिंह बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने शक्तिमान कंपनी के 343 प्रजाति के गेहूं के बीजों का इस्तेमाल किया था. उन्होंने 20 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बीज खरीदे और 6 एकड़ में लगाए. प्रति एकड़ 25 किलोग्राम बीज लगे. कंपनी के एजेंट ने कहा था कि प्रति एकड़ 30 क्विंटल पैदावार होगी, लेकिन 20 क्विंटल पैदावार ही हो सकी.

उन्होंने गेहूं की 460 और 502 प्रजातियों के बीजों को भी लगाया था, जिस में भी कंपनी के दावे से 20 फीसदी कम पैदावार हुई. चन्नू कहते हैं कि सरकारी बीज कभी भी समय पर नहीं मिलते हैं. काफी भागदौड़ के बाद जितने बीज मिलते हैं, उन्हें पूरे खेतों में नहीं लगाया जा सकता है. प्राइवेट कंपनियां आर्डर ले कर घर तक बीज पहुंचाने के लिए तैयार रहती हैं.

सरकारी और प्राइवेट बीज कंपनियों के अपनेअपने दावे हैं, लेकिन किसी के भी दावे खरे नहीं उतर रहे हैं. सरकार के पास योजनाओं की लंबीचौड़ी लिस्ट है और प्राइवेट बीज कंपनियां खुद पर लगे आरोपों को सिरे से नकार देती हैं. ऐसे में ज्यादा पैसा खर्च कर के कम पैदावार पाने वाले बेचारे किसानों के पास सिर पीटने के अलावा कोई चारा नहीं है.

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