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दरिंदगी का शिकार चीता

हमारे गांवों और कसबों में किस तरह हिंसा कूटकूट कर भरी है, इस का एक नमूना हरियाणा के सोहना जिले के मंडावर गांव में देखने को मिला, जहां एक चीता गलती से पहुंच गया. देश में इस तरह के जंगली जानवर अब कम होने लगे हैं और अरबों रुपए उन को बचाने पर लगाए जाते हैं, पर लठैत, मूरख, मारपीट को धर्म मानने लगे गांव वालों को चीते पर अपनी मर्दानगी दिखाने का मौका मिल गया और उन्होंने उसे लाठियों से मारमार कर ऐसी जीत का जश्न मनाया, मानो इसलामाबाद फतेह कर लिया हो.

पुलिस और वन अधिकारी पहुंच गए थे और वन अधिकारी उसे बेहोश करने की कोशिश में थे, पर लाठियों और तलवारों से लैस युवाओं को तो अपनी मर्दानगी दिखानी थी और उन्होंने चीते को वही सजा दी, जो वे अपनी बहनबेटियों को किसी दूसरी जाति के लड़के के साथ भाग जाने पर देते हैं.

देशभर के गांवों में पढ़ाई पहुंच गई है, पर जो नहीं पहुंचा, वह है अच्छा व्यवहार. हमारे यहां हर गांव में 4-5 मंदिरमसजिद और गुरुद्वारे होंगे, पर हरेक में अपने दुश्मन का काम तमाम करने की ही शिक्षा दी जाती है. गांवों में गालियों के बदले गोलियां चलना आम है और अगर दूसरी तरफ का दूसरी जाति या दूसरे धर्म का हो, तो दंगे होने के आसार बन जाते हैं. जो तसवीरें चीते का पीछा करती दिखी हैं, उन में एक चीते के पीछे सैकड़ों की तादाद में लाठियां, फरसे उठाए भीड़ है. हर घर में मानो लाठियों का भंडार रहता है.

वन अधिकारी कहते हैं कि तमाशाइयों की भीड़ इस तरह की थी कि वे चीते को नशे में करने की गोली नहीं चला पाए. ये तमाशाई वही हैं, जो घर की बेटियों को पिता और भाइयों से मार खाते देखते हैं, जो औरतों को सरेआम अपने पतियों से पिटते देखते हैं, जो एक अकेली लड़की को छेड़े जाते दिखते हैं और इस सब हिंसा का मजा लेते हैं. यही मजा उस चीते को घेरने में मिल रहा था, जिस को बचाने के लिए सरकार ने हजारों एकड़ के जंगल खाली कराए हैं, ताकि मांसाहारी पशुओं को जीने की जगह मिले और वे खत्म न हो जाएं.

मारपीट ही हमारी असल संस्कृति है. हम जिस विश्वगुरु होने का दावा करते हैं, वह खोखला और बनावटी है. हमारा शांति का दावा कमजोरों वाला है. हमारे साधु गुरु जब प्रेम और इज्जत की बात करते हैं, उन का मकसद केवल गुरुओं, साधुओं, मुल्लाओं, ग्रंथियों से प्रेम करना है, ताकि वे लूट सकें. इन में अब सरकारी अफसर और नेता शामिल हो गए हैं, जिन से हम डरते हैं. चीते से क्या डरना? उसे मारने के लिए 1000 की भीड़ जमा हो जाती है, पर जेबों पर डाका डालने वाली मजबूत सरकार को कुछ कहने में जीभ तालु से चिपक जाती है.

जीत के साथ ही टीम इंडिया ने लगाई रिकॉर्ड्स की झड़ियां

भारत और इंग्लैंड के बीच खेली गई 5 टेस्ट मैचों की सीरीज को भारत ने 4-0 से जीत कर शानदार अंजाम दिया. चेन्नई में इंग्लैंड को एक पारी और 75 रन से हराकर टीम इंडिया ने सीरीज तो जीती ही, कई रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए हैं.

इंग्लैंड पर भारतीय टीम की क्रिकेट इतिहास की ये सबसे बड़ी जीत है. विराट कोहली की कप्तानी में भारतीय टीम रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रही है. कोहली की कप्तानी में भारत की ये लगातार पांचवीं टेस्ट सीरीज जीत है.

टेस्ट क्रिकेट में भारत ने बनाया सर्वोच्च स्कोर

इस टेस्ट मैच में भारत ने अपने सर्वोच्च स्कोर का नया कीर्तिमान रचा. भारत अपनी पहली पारी को 759/7 पर घोषित किया. यह टेस्ट क्रिकेट में भारत की ओर से बनाया गया सर्वाधिक स्कोर है. इससे पहले टेस्ट क्रिकेट में भारत का सर्वोच्च स्कोर 726 रन था, जो उसने 2009 में श्रीलंका के खिलाफ बनाए थे.

दूसरी बार 4 टेस्ट जीत कर सीरीज जीती

ऐसा दूसरी बार है, जब भारतीय टीम ने किसी टेस्ट सीरीज के 4 टेस्ट मैचों को जीतकर सीरीज अपने नाम की है. इससे पहले 2012-13 में ऑस्ट्रेलिया से बॉर्डर-गावस्कर सीरीज के चारों टेस्ट मैच जीतकर अपने नाम किया था और इस बार 2016 में इंग्लैंड से यह 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में 4-0 से जीत दर्ज की है.

कोहली ने की गावस्कर की बराबरी

लगातार 18 टेस्ट मैचों से भारत ने कोई मैच नहीं गंवाया है. इस रेकॉर्ड से विराट कपिल देव से आगे निकल गए हैं और उन्होंने पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर की बराबरी कर ली है. गवास्कर ने भी 1976-80 के बीच लगातार 18 टेस्ट मैचों में एक भी मैच में हार का मुंह नहीं देखा था. वहीं कपिल देव की अगुआई में टीम 17 टेस्ट मैचों तक एक भी मैच हारी नहीं थी.

जडेजा बने बेस्ट, मैच में लिए 10 विकेट

रवींद्र जाडेजा (48/7) के करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बल पर भारत ने इंग्लैंड की दूसरी पारी 207 रनों पर समेट दिया. इस मैच में जाडेजा ने कुल 10 विकेट अपने नाम किए. यह पहला मौका है, जब जाडेजा ने किसी मैच में 10 विकेट अपने नाम किए हों.

पहली पारी में उन्होंने 3 विकेट लिए थे, तो इंग्लैंड की दूसरी पारी में जड्डू काल बन कर आए. उन्होंने 7 बल्लेबाजों को पविलियन भेजकर इंग्लिश बैटिंग ऑर्डर की कमर ही तोड़ दी. जाडेजा ने सीरीज में पहली बार 5 या उससे अधिक विकेट लिए.

इसके अलावा जड्डू ने बैटिंग करते हुए 51 रन का योगदान दिया. जाडेजा का योगदान यहीं नहीं रुका. उन्होंने इस मैच में लंबी दूरी तक पीछे दौड़कर जॉनी बेयरस्टो का शानदार कैच भी लपका. इस कैच को देखकर कपिल देव के उस कैच की याद आ गई, जब उन्होंने 1983 के विश्व कप फाइनल में विव रिचर्ड का कैच पकड़ा था.

जाडेजा ने कुक को 6 बार किया आउट

लेफ्टआर्म स्पिन गेंदबाज रवींद्र जाडेजा इस सीरीज में इंग्लैंड के कप्तान ऐलेस्टर कुक के पीछे हाथ धोकर पड़ गए. इस सीरीज में कुक द्वारा खेली गईं 10 पारियों में से 6 बार उन्हें जाडेजा ने ही आउट किया. इस प्रदर्शन के बाद जाडेजा भारत की ओर से पहले ऐसे बोलर बन गए हैं, जिसने किसी एक सीरीज में एक ही बल्लेबाज को सबसे ज्यादा बार आउट किया है.

करुण ने किया कमाल

अपने करियर का तीसरा टेस्ट मैच खेल रहे करुण ने इस टेस्ट मैच में पहली बार शतक जमाया. इस शतक को उन्होंने तिहरे शतक में बदलकर विराट शतक में बदल दिया. अपने पहले ही शतक तो तिहरे शतक में बदलने वाले वह पहले भारतीय बल्लेबाज बने और ऐसा करने वाले वह दुनिया के तीसरे बैट्समैन हैं.

करुण से पहले वेस्ट इंडीज के सर गैरी सोबर्स और ऑस्ट्रेलिया के पेट सिम्पसन ऐसा कारनामा कर चुके हैं, जिन्होंने पहले ही शतक को तिहरे शतक में बदला था. करुण की इस शानदार पारी के लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया.

विराट बनें कोहली

इस सीरीज में दो शतक और दो अर्धशतक लगाने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली को प्लेयर ऑफ द सीरीज का खिताब मिला. इस सीरीज में विराट ने अपने टेस्ट करियर का बेस्ट स्कोर 235 भी बनाया. इसके अलावा उन्होंने इस सीरीज में कुल 655 रन बनाए.

इस दौरान उनका स्ट्राइक रेट 60.87 का रहा. इस दौरे से पहले विराट का इंग्लैंड के खिलाफ करीब 20 का औसत था, लेकिन अब विराट ने इसमें जबरदस्त सुधार कर लिया है. इस सीरीज से पहले उनका करियर औसत 44 के करीब था, जिसे बढ़ाकर अब वह 50 तक ले गए हैं.

पहली पारी में 477 बनाने के बाद सबसे बड़ी हार

इंग्लैंड की टीम ने इस टेस्ट की पहली पारी में 477 रन का बड़ा स्कोर बनाया था. इसके बावजूद इंग्लैंड इस मैच को पारी और 75 रन से हार गया. यह टेस्ट क्रिकेट में पहली पारी में 400 से अधिक रन बनाने के बाद सबसे बड़ी हार है. इससे पहले भी यह रेकॉर्ड इंग्लैंड के ही नाम था.

जब 2001 में इंग्लैंड ने श्रीलंका के खिलाफ पहली पारी में 432 रन बनाए थे. इसके बावजूद इंग्लिश टीम पारी और 25 रन से हार गई थी. ऐसा 6 ही बार हुआ है, जब किसी टीम ने पहली पारी में 400 से अधिक का स्कोर खड़ा किया और इसके बावजूद वह पारी से हार गई. इन 6 में से 4 बार इंग्लैंड की टीम हारी है.

4-0 से इंग्लैंड की हार

यह दूसरी बार है, जब इंग्लैंड की टीम ने किसी सीरीज को 4-0 से गंवाया है. इससे पहले 2012-13 में ऐशेज ट्रॉफी में इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया से वह सीरीज 4-0 से गंवाई थी.

कैलेंडर ईयर में कोहली की कप्तानी में नौवीं जीत

टीम इंडिया के स्टार बल्लेबाज और कप्तान विराट कोहली की कप्तानी में भारतीय टीम ने एक कैलेंडर ईयर में रिकॉर्ड नौवीं जीत दर्ज की है. इस साल कोहली की कप्तानी में भारत ने 12 टेस्ट मैच खेले जिनमें 9 जीते और तीन ड्रॉ रहे. इसके बाद नंबर महेंद्र सिंह धोनी का आता है. धोनी की कप्तानी में साल 2010 में भारत ने 13 टेस्ट खेले थे. जिनमें सात में जीत, तीन में हार और तीन मुकाबले ड्रॉ रहे थे.

टीम इंडिया का लगातार 18 मैच न हारने का रिकॉर्ड

इस मुकाबले में जीत हासिल कर भारतीय टीम ने एक खास रिकॉर्ड भी बनाया है. कोहली की टीम ने अपनी जीतने की लय के रिकॉर्ड को 18 मैच तक बढ़ा दिया है और उन्होंने पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर के रिकॉर्ड की बराबरी भी कर ली है.

गावस्कर की कप्तानी में भारत ने 24 जनवरी 1976 से लेकर 20 जनवरी 1980 तक 18 टेस्ट मैच खेले थे. जिनमें से एक में भी हार नहीं मिली थी. गावस्कर की कप्तानी में भारत ने 18 टेस्ट में से छह में जीत दर्ज की थी और 12 ड्रॉ रहे थे.

इंग्लैंड के खिलाफ पहली सीरीज जीतने में भारत को लगे थे 30 साल

इस सीरीज को मिलाकर भारत और इंग्लैंड के बीच अब तक 32 सीरीज खेली जा चुकी हैं, जिनमें से 18 सीरीज में इंग्लैंड जीती हैं, जबकि 10 सीरीज में टीम इंडिया, वहीं चार सीरीज ड्रॉ रही हैं. दोनों टीमों के बीच पहली टेस्ट सीरीज 1932 में हुई थी, जिसमे इंग्लैंड को जीत मिली थी.

इंग्लैंड के खिलाफ अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीतने के लिए भारत को 30 साल लगे थे. इंग्लैंड के खिलाफ भारत ने पहली टेस्ट सीरीज नरी कॉन्ट्रेक्टर की कप्तानी में 1962 में जीती थी. दोनों टीमों के बीच खेली गई पांच मैचों की इस टेस्ट सीरीज को भारत ने 2-0 से जीता था.

नकदी की कमी से गांवों में लौटा सामान के बदले सामान लेने का दौर

आजकल नोटबंदी के दौर में उपजी नकदी की कमी से निबटने के लिए गांवदेहात सामान के बदले सामान लेनेदेने के पुराने दौर में वापस चले गए हैं. इस से किसानों को नुकसान हो रहा है, क्योंकि उन की उपज औनेपौने दामों पर बिक रही है. वैसे, विनिमय एक सिद्धांत है. जिस में किसी चीज को खरीदने के लिए पैसे की जगह पर दूसरी चीज ही देनी होती है. गांव में चीनी, नमक, मसाले और जरूरत की दूसरी चीजों को खरीदने के लिए किसान धान को देता है, तो दुकानदार धान को नकद पैसे की तरह से लेता है. इस को ऐसे समझा जा सकता?है कि जैसे चीनी की कीमत 40 रुपए किलोग्राम है और धान की कीमत 10 रुपए किलोग्राम तो 1 किलोग्राम चीनी की खरीद के लिए किसान को 4 किलोग्राम धान देना पड़ रहा?है.

परेशानी की बात यह है कि दुकानदार धान की कीमत बाजार में चल रही कीमत से कम लगाते हैं. ऐसे में दुकानदार को दोहरा मुनाफा हो रहा है. वह चीनी पर फायदा तो कमा ही रहा है, कम कीमत पर धान ले कर भी उस पर अलग से मुनाफा पा रहा?है. किसानों का जो धान बाजार में 12 से 15 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है, वह दुकानदार 10 से 12 रुपए में ही खरीद रहा है. किसान बाजार में धान ले कर 1-2 महीने के बाद पैसा देने की बात कर रहा है. ऐसे में किसान अपनी जरूरतों के लिए धान को दे कर दूसरे सामान ले रहा है.

हो रहा नुकसान

गांव के लोग अपनी छोटीछोटी जरूरतों के लिए वस्तु विनिमय का सहारा तो पहले भी लेते थे, पर अब खाद, बीज और दूसरी खरीदारी के लिए भी ‘वस्तु विनिमय’ का सहारा लेने लगे?हैं. गांव के आसपास लगने वाले बाजारों को देखें तो वहां पर लगे आनाज के ढेर देख कर पता चलता है कि लोग किस तरह से नकदी न होने से परेशान हैं और अपने धान को औनेपौने दाम पर बेच रहे हैं. लखनऊ के इटौंजा गांव के रहने वाले दिवाकर कहते हैं, ‘धान को बेच कर पैसा नकद नहीं मिल रहा. ऐसे में हम इसे बेच कर जरूरत का दूसरा सामान ले रहे हैं.’ इसी गांव के रहने वाले सुरेश कहते हैं, ‘धान बेच कर हम अभी काम चला ले रहे हैं. धान के बिकने के बाद से हम आगे कैसे गुजरबसर करेंगे, पता नहीं. अब हमें शहरों में काम नहीं मिल रहा. अगर ऐसे ही हालात आगे चलते रहे और मजदूरी नहीं मिली, तो गुजरबसर कर पाना मुमकिन नहीं होगा.’

बेकार हो रही फसल

गांवों में नकदी की कमी के चलते किसान परेशान हैं. वे अपने गुस्से का इजहार करने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंच गए. भारतीय किसान यूनियन के बैनर के तले किसान विधानसभा भवन के सामने पहुंच गए और सैकड़ों क्विंटल आलू और धान की फसल राहगीरों को बांटने लगे. भारतीय किसान यूनियन के मंडल अध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा ने बताया कि वे किसानों की समस्याओं को ले कर विधानसभा भवन पर प्रदर्शन को ले कर जिला प्रशासन से इजाजत मांग रहे थे, पर जिला प्रशासन कोई बात सुनने को तैयार नहीं था. हरिनाम सिंह वर्मा ने बताया कि न तो किसानों से धान खरीदा जा रहा है, न ही रबी की बोआई के लिए नहरों में पानी है. खादबीज मुहैया नहीं हैं. आलू का दाम 200 रुपए प्रति क्विंटल है, जबकि किसानों को?स्टोर मालिकों को 220 रुपए प्रति क्विंटल किराया देना पड़ रहा है. ऐसे में किसान न तो रबी की बोआई कर पा रहे हैं, न ही अपना धानआलू बेच पा रहे?हैं.

नहीं मिल रहा बैंकों से पैसा

यह हाल केवल लखनऊ के किसानों का ही नहीं है, बल्कि देशभर के किसानों का यही हाल है. हर जगह किसान बेहाल हैं. जिन किसानों का बैंक में अपना पैसा जमा है, उन किसानों को भी पैसा नहीं मिल रहा है. किसान रातरात भर जागजाग कर बैंकों के सामने लाइनें लगाए हैं. इस के बाद भी उन को जरूरत भर का पैसा नहीं मिल रहा है. शादी और दूसरे कामों के लिए किसान अपने पैसों के होते हुए भी खर्च के लिए पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं. ऐसे में किसान परेशान हो रहे हैं.

कुछ कहती हैं तसवीरें

फतह दिवस : जांबाजी में सरदारों का कोई सानी नहीं होता. हट्टेकट्टे घोड़ों को हाथ फैला कर महज मुंह से काबू करना सिक्खों के बूते की ही बात है. 650 मीटर की पगड़ी पहनने और घुड़सवारी के हैरतअंगेज कारनामों के ये नजारे दीवाली के अगले दिन होने वाले फतह दिवस उत्सव के हैं.

मूली की खेती

भारत में मूली की खेती पूरे साल की जाती है. यह बीज बोने के 1 महीने बाद तैयार हो जाती है. मूली की फसल से 2 महीने बाद खेत खेत खाली हो जाता?है.

मूली की खेती ठंडे इलाकों से ले कर ज्यादा तापामन वाले इलाकों में भी की जा सकती है, लेकिन ज्यादा तापमान वाले इलाकों में मूली की फसल कठोर और चरपरी होती है. मूली की खेती के लिए रेतीली दोमट और दोमट मिट्टियां उम्दा होती हैं. मटियार जमीन में इस की खेती करना फायदेमंद नहीं होता है, क्योंकि उस में मूली की जड़ें सही तरीके से बढ़ नहीं पाती?हैं.

मूली के लिए ऐसी जमीन का चयन करना चाहिए, जो हलकी भुरभुरी हो और उस में जैविक पदार्थों की भरपूर मात्रा हो. मूली के खेत में खरपतवार नहीं होने चाहिए, क्योंकि उन से जड़ों की बढ़वार रुक जाती है.

खेत की तैयारी : मूली की फसल लेने के लिए खेत की कई बार जुताई करनी चाहिए. पहले 2 बार कल्टीवेटर से जुताई कर के पाटा लगा दें, उस के बाद गहरी जुताई करने वाले हल से जुताई करें. मूली की जड़ें जमीन में गहरे तक जाती हैं, ऐसे में गहरी जुताई न करने से जड़ों की बढ़वार सही तरीके से नहीं हो पाती है.

मूली की उन्नत किस्में : मूली की फसल लेने के लिए ऐसी किस्म का चयन करना चाहिए, जो देखने में सुंदर व खाने में स्वादिष्ठ हो. मूली की रैपिड रेड, पूसा चेतवी, पूसा रेशमी, पूसा हिमानी, हिसार मूली नंबर 1, पंजाब सफेद व व्हाइट टिप वगैरह किस्मों को अच्छा माना जाता है.

मूली की खेती मैदानी इलाकों में सितंबर से जनवरी तक और पहाड़ी इलाकों में मार्च से अगस्त तक आसानी से की जा सकती है. वैसे मूली की तमाम ऐसी किस्में तैयार की गई?हैं, जो मैदानी व पहाड़ी इलाकों में पूरे साल उगाई जा सकती हैं. पूसा चैतकी, पूसा देसी व जापानी सफेद वगैरह किस्में ऐसी हैं, जिन्हें साल भर उगाया जा सकता है.

मूली की 1 हेक्टेयर खेती के लिए करीब 10 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. बारिश के मौसम में मेंड़ बना कर इस की बोआई की जाती है, जबकि दूसरे मौसमों में इसे समतल जमीन में भी उगाया जा सकता?है. अगर मूली की फसल मेड़ों पर ली जा रही?है, तो मेंड़ों से मेंड़ों की दूरी 45 सेंटीमीटर व ऊंचाई 22-25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.

खाद व उर्वरक?: चूंकि मूली की जड़ें सीधे तौर पर इस्तेमाल की जाती?है, लिहाजा इस में कम से कम रासायनिक खादों का इस्तेमाल किया जाना ठीक माना जाता है. मूली की बोआई से पहले ही मिट्टी में 120 क्विंटल गोबर की खाद व 20 किलोग्राम नीम की खली प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 75 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से आखिरी जुताई के समय मिट्टी में मिलानी चाहिए.

सिंचाई : बारिश के मौसम में मूली की फसल को सिंचाई की कोई जरूरत नहीं होती है, लेकिन गरमी में 4-5 दिनों के अंतराल पर फसल की सिंचाई करते रहना चाहिए. सर्दी वाली फसलों की सिंचाई 10-15 दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए.

खरपतवार व कीट : मूली की फसल से खरपतवारों को समयसमय पर निकालते रहना चाहिए, चूंकि खरपतवारों से फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, लिहाजा हर 15 दिनों पर खेतों में उगने वाले खरपतवारों के निकाल देना चाहिए.

मूली की फसल को सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों में पत्ता काटने वाली सूड़ी, सरसों की मक्खी व एफिड शामिल हैं. इन कीटों की रोकथाम के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करना सही नहीं होता?है. इन कीटों की रोकथाम के लिए हमेशा जैविक कीटनाशकों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस के लिए 5 लीटर गोमूत्र व 15 ग्राम हींग को आपस में मिला कर फसल पर छिड़काव करते रहना चाहिए.

आमतौर पर मूली की फसल में कोई खास रोग नहीं लगता है, फिर भी कभीकभी इस में दतुआ रोग का हमला देखा गया है. इस की रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा, गोमूत्र व तंबाकू मिला कर फसल को पूरी तरह से तरबतर करते हुए छिड़काव करना चाहिए.

उपज व लाभ : मूली की फसल जब कोमल हो तभी इस की खुदाई कर लेनी चाहिए, क्योंकि ऐसी अवस्था में इस के दाम बहुत अच्छे मिलते हैं. बोआई के 30-35 दिनों बाद मूली की फसल उखाड़नी शुरू कर देनी चाहिए.

मूली के 1 हेक्टेयर रकबे से अलगअलग प्रजातियों के मुताबिक 100 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज मिलती है, जो आमतौर पर 1000 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बाजार में आसानी से बिक जाती है. इस हिसाब से किसान को 1 हेक्टेयर खेत से करीब 3 लाख रुपए की आमदनी होती है. अगर फसल की लागत को निकाल दिया जाए तो किसान 2-3 महीने में 1 हेक्टेयर खेत से आसानी से 2 लाख रुपए की आमदनी हासिल कर सकते हैं.

अनार की खेती

अनार का रस स्वाद से भरा होता है. इस में औषधीय गुण भी होते हैं. अनार सेहत के लिए बहुत फायदेमंद और पोषक तत्त्वों से भरपूर फल माना जाता है. अनार में खासतौर से विटामिन ए, सी, ई, फौलिक एसिड और एंटी आक्सीडेंट पाए जाते हैं.

जलवायु

फलों के विकास व पकने के समय गरम व शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. फल के विकास के लिए सही तापमान 38 डिगरी सेंटीग्रेड माना जाता है.

मिट्टी

अनार की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है. फलों की गुणवत्ता व रंग हलकी मिट्टी में अच्छा होता है.

किस्में

गणेश : इस किस्म के फल मझोले आकार के व बीज मुलायम गुलाबी रंग के होते हैं. यह महाराष्ट्र की मशहूर किस्म है.

ज्योति : फल मझोले से थोड़े बड़े आकार के चिकने व पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं. इस के बीज मुलायम व बहुत मीठे होते हैं.

मृदुला : फल मझोले आकार के चिकनी सतह वाले गहरे लाल रंग के होते हैं. दाने गहरे लाल रंग के, बीज मुलायम, रसदार व मीठे होते हैं. इस किस्म के फलों का औसत वजन 250-300 ग्राम होता है.

भगवा : इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के चिकने व चमकदार होते हैं. दाने आकर्षक लाल रंग के व बीज मुलायम होते हैं. अच्छा प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 30-40 किलोग्राम उपज हासिल की जा सकती है. यह किस्म राजस्थान व महाराष्ट्र में ज्यादा उगाई जाती है.

अरक्ता : यह एक ज्यादा उपज देने वाली किस्म है. फल बड़े आकार के मीठे, मुलायम बीजों वाले होते हैं. दाने लाल रंग के व छिलका चमकदार लाल रंग का होता है. अच्छा प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 25-30 किलोग्राम उपज हासिल की जा सकती है.

कंधारी : इस के फल बड़े और ज्यादा रसीले होते हैं, लेकिन बीज कुछ सख्त होते हैं. अनार की अन्य किस्में रूबी, करकई, गुलेशाह, बेदाना, खोग व बीजरहित जालोर आदि हैं.

पौधे लगाने का समय

अनार के पौधों को लगाने का सही समय अगस्त से सितंबर या फरवरी से मार्च के बीच होता है.

गड्ढा खुदाई व भराई

पौध रोपण के 1 महीने पहले 60×60×60 सेंटीमीटर (लंबाई, चौड़ाई, गहराई) आकार के गड्ढे खोदें. गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 20 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 50 ग्राम क्लोरो पायरीफास चूर्ण मिला कर गड्ढों को सतह से 15 सेंटीमीटर ऊंचाई तक भर दें. गड्ढे भरने के बाद सिंचाई करें, ताकि मिट्टी अच्छी तरह से जम जाए. उस के बाद पौधों की रोपाई करें. रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई करें.

पौधों की रोपाई

आमतौर पर 5×5 या 6×6 सघन विधि में बाग लगाने के लिए 5×3 मीटर की दूरी पर अनार की रोपाई की जाती है. सघन विधि से बाग लगाने पर पैदावार डेढ़ गुना तक बढ़ सकती है. इस में करीब 600 पौधे प्रति हेक्टेयर लगाए जा सकते हैं.

सिंचाई

अनार एक सूखी फसल है. इस की सिंचाई मई से शुरू कर के मानसून आने तक करते रहना चाहिए. बारिश के मौसम के बाद फसलों के अच्छे विकास के लिए 10-12 दिनों पर सिंचाई करनी चाहिए. बूंदबूंद सिंचाई अनार के लिए बेहतर होती है. इस में 43 फीसदी पानी की बचत व 30-35 फीसदी उपज में बढ़ोतरी पाई गई है.

खाद व उर्वरक

पहले साल नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटेशियम सभी 125 ग्राम.

दूसरे साल नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम सभी 225 ग्राम.

तीसरे साल नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम क्रमश: 350 ग्राम, 250 ग्राम, 250 ग्राम.

चौथे साल नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम क्रमश: 450 ग्राम, 250 ग्राम, 250 ग्राम.

5 साल बाद 10-15 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद और 600 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस व 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा देना चाहिए.

कीट व रोग

अनार का मुख्य कीट अनार बटर फ्लाई?है.

रोकथाम : साईपर मैथरिन 200 मिलीलीटर (रिपकार्ड) या मोनोक्रोटोफास 200 मिलीलीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

उपज

अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल हर साल 25-30 सालों तक देता रहता है. सघन विधि से बाग लगाने पर करीब 480 टन सालाना उपज हो सकती है, जिस से 1 हेक्टेयर से 5-8 लाख रुपए सालाना आमदनी हो सकती है. नई विधि से अनार उगाने में खाद व उर्वरक की लागत में महज 15 से 20 फीसदी की बढ़ोतरी होती है, जबकि पैदावार 50 फीसदी बढ़ने के अलावा दूसरे नुकसानों से भी बचाव होता है.

– पिंटू लाल मीणा

नोटबंदी नहीं, व्यापार बंदी

नोटबंदी में सरकार छोटे कारोबारियों को दरकिनार कर बड़े कारोबारी घरानों को लाभ पहुंचा रही है. यह नोटबंदी नहीं यह गलाबंदी, व्यापार बंदी और सरासर लूट है. प्रधानमंत्री आये दिन अपने बयान बदलते रहते हैं. नोटबंदी में सबसे अधिक समस्या अगर किसी वर्ग को हुई है तो वह कारोबारी वर्ग है. छोटा, बडा मझोला एक भी ऐसा कारोबारी नहीं है जिसकों नुकसान न हुआ हो. नोटबंदी पर अपने विचार व्यक्त करते उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के प्रांतीय अध्यक्ष बनवारीलाल कंछल ने यह बातें मेरठ में प्रांतीय कार्यसमिति में कही.

बनवारीलाल कंछल ने अपनी योजना की जानकारी देते कहा कि 26 दिसम्बर को सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर जिलाधिकारी के जरीये प्रधानमंत्री और केन्द्रीय वित्तमंत्री को कारोबारियों की समस्याओं से संबंधित ज्ञापन दिया जायेगा.

नोटबंदी में खामियों की खिलाफ अपने अभियान में बनवारीलाल कंछल ने कहा कि कारोबारी कालेधन और आतंकवाद के पूरी तरह से खिलाफ हैं. परेशानी की बात यह है कि सरकार नोटबंदी को लेकर कारोबारियों को होने वाली परेशानियों को नहीं देख रही है. नोटबंदी में प्रदेश का कारोबार 40 से 80 फीसदी तक घट गया है. कारोबारियों की उधारी डूब रही है. कारखाने बंद हो रहे हैं. कारोबारी सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करते थे. इसके बाद भी जब जब भाजपा की सरकार आई है कारोबारियों का उत्पीडन हुआ है.

केन्द्र सरकार एक तरफ बिग बाजार जैसी बड़ी कंपनियों को नोट बदलने की इजाजत देती है दूसरी ओर छोटे व्यापारियों को परेशान करती है. इससे साफ है कि केन्द्र सरकार बड़े कारोबारियों का हित साध रही है. कैशलेस व्यवस्था के लिये धीरे धीरे काम करने की जरूरत थी. इस तरह से औन लाइन दुकानदारी करने वाली बड़ी कंपनियों को मुनाफा होगा. छोटे कारोबारी के हित मारे जायेंगे. कैशलेश व्यवस्था में पेटीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनी का मुनाफा करोड़ों में बढ़ गया.

बनवारीलाल कंछल ने कहा कि देश की प्रगति में छोटे कारोबारी का भी बड़ा हाथ है. बहुत सारे रोजगार वह देता है.कारोबार का नुकसान होने से देश में बेरोजगारी बढेगी. इसका प्रभाव केवल कारोबारी पर ही नहीं किसान, मजदूर, और कर्मचारी सब पर पड रहा है. बैकों से पैसा निकालने की लिमिट तय होने से कारोबारी अपनी जरूरत भर का पैसा ही नहीं निकाल पा रहा है. ऐसे में उसका व्यापार प्रभावित हो रहा है. बनवारीलाल कंछल ने कहा कि कैशलेश व्यवस्था जबरदस्ती न सौंपी जाये. इसके लिये पूरे देश में माहौल बनाया जाये. इसके प्रयोग पर लगने वाले चार्ज को खत्म किया जाये. सरकार अगर कालेधन के खिलाफ है तो सभी राजनीतिक दलों को भी आयकर कानून के दायरे में लाया जाये.  

अपराधी औरतें : राह में कांटे ही कांटे

नटवरलाल और बंटी और बबली के फिल्मी किस्से तो मशहूर हैं पर यदाकदा बबलियां वास्तव में दिख भी जाती हैं. दिल्ली में हिमाचल प्रदेश की रहने वाली एक औरत पकड़ी गई जो खुद को कभी आईएएस औफिसर तो कभी आईपीएस औफिसर कहती थी. अपने को आईपीएस औफिसर बता कर उस ने एक युवक से नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे ऐंठ लिए. उस युवक की हिम्मत थी कि उस ने शिकायत कर दी और वह औरत पकड़ी गई वरना इस तरह के धोखों के शिकार खुद शिकायत नहीं करते, क्योंकि वे अपने को भी अपराधी मानते हैं.

औरत हो कर इस प्रकार की बेईमानी करने के लिए अच्छाखासा जिगरा चाहिए. पुरुष तो जोखिम लेने में हिचकिचाते नहीं पर औरतें हिचकिचाती हैं. उन्हें अपने शरीर की भी चिंता होती है और मानसम्मान की भी. अधिकांश औरतों को डर रहता है कि पकड़े जाने पर यदि जेल जाना पड़ा तो पीछे से बच्चों का क्या होगा. औरतें अगर कम अपराध करती हैं तो इसलिए नहीं कि वे शराफत से लबालब भरी होती हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें परिणामों से डर रहता है.

आजकल बहुत से नए कानून बन गए हैं, जिन में औरतों को गिरफ्तार करा जाने लगा है और ये अपराध बहुत से तकनीकी होते हैं पर फिर भी जेल जाने का डर तो रहता ही है. इस औरत का तो जिगरा है कि वह जेल जाने और सजा पाने के डर के बावजूद नकली आईएएस और आईपीएस बन कर ‘बंटी और बबली’ की बबली बन गई.

यों औरतों के हाथों लुट जाने पर आदमियों की दुर्गति तो जरूर होती होगी. सदियों से आदमी औरतों को धोखा देते रहे हैं. प्रेम, शादी, संपत्ति, विरासत, रीतिरिवाजों, धर्म के नाम पर औरतें तनमन और धन से लुटती रही हैं. कितनी ही प्रसिद्ध अभिनेत्रियों को उन के भाइयों और पतियों ने लूट कर खोखला कर दिया. जब उलटा समाचार पढ़ने को मिलता है तो इस तरह का संतोष तो होता है कि चलो कभी तो घोड़ी आदमी पर चढ़ी.

अपराधी औरतों का जीवन संकटों से भरा होता होगा, इस में शक नहीं है. उन्हें कभी सही साथी नहीं मिलेगा. अगर बच्चे हो गए तो वे मां को आदर्श नहीं मानेंगे और खुद मां को लूटेंगे. उन के कुकर्म मां को गहरा सदमा देते रहेंगे और ऐसी मां आंसुओं में भी अपना गम नहीं छिपा सकती, क्योंकि वह खुद बेईमान है.       

करें डिजिटल भुगतान, भरें कम टैक्स

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा कि 2 करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाले छोटे व्यापारी और कंपनियां अगर बैंक और डिजिटल माध्यमों से भुगतान स्वीकार करते हैं तो उन्हें कम कर देना होगा.

उन्होंने कहा कि 2016-17 के बजट में 2 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले ऐसे छोटे व्यापारियों एवं व्यवसायिओं, जो समुचित खाते नहीं रखते हैं, उनके बारे में मान लिया गया था कि उन्होंने कर के लिहाज से 8 प्रतिशत आय या लाभ कमाया. किन्तु यदि वे भुगतान के डिजिटल माध्यम अपनाएंगे तो उनकी आय कारोबार का 6 प्रतिशत मानी जाएगी न कि 8 प्रतिशत.

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने एक नोटिस में कहा, ‘कानून की धारा 44एडी के तहत लाभ को कारोबार का 8 प्रतिशत माने जाने की मौजूदा दर को कम कर छह प्रतिशत करने का निर्णय किया गया है. यह 2016-17 के लिये बैंक चैनल डिजिटल माध्यमों से प्राप्त कुल कारोबार या सकल प्राप्ति की राशि के संदर्भ में लागू होगा.’ यह फैसला सरकार के अर्थव्यवस्था में नकदी के कम उपयोग के लक्ष्य हासिल करने और डिजिटल माध्यमों से भुगतान स्वीकार करने वाले छाटे कारोबारियों, कंपनियों को प्रोत्साहन देने के मकसद से किया गया है.

कर विभाग ने यह भी कहा, ‘हालांकि कानून की धारा 44एडी के तहत उस स्थिति में जबकि कुल कारोबार या सकल प्राप्ति नकद में हासिल की जाती है तो कर लगाने के लिये लाभ को आठ प्रतिशत ही माना जाएगा.’ सीबीडीटी ने कहा कि इस संदर्भ में विधायी संशोधन वित्त विधेयक 2017 के जरिये किया जाएगा. नोटबंदी के बाद सरकार ने नकद रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के लिये कई उपाय किये हैं.

आंखों का काम करेगा आपका जूता

एक शोधकर्ता ने एक ऐसा जूता तैयार किया है जो दृष्टिबाधित लोगों के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति को रास्ता बता सकता है. इससे लोगों का कहीं भी आना-जाना आसान हो सकेगा. इस जूते को ‘लेचल’ नाम दिया गया है.

मिशिगन यूनिवर्सिटी से स्नातक और हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाले क्रिस्पेन लॉरेंस ने हैप्टिक तकनीक की बदौलत दृष्टिबाधित लोगों का कहीं भी आना-जाना आसान बनाने के बारे में सोचा. हैप्टिक तकनीक से बल, कंपन या गति का इस्तेमाल कर उपयोक्ता को स्पर्श का ज्ञान कराया जा सकता है.

उन्होंने महसूस किया कि फोन में इस्तेमाल होने वाला जीपीएस उपयोक्ताओं को उनके गंतव्य तक पहुंचाने में मदद करता है. इसके बावजूद कई लोग भटक जाते हैं. लॉरेंस ने कहा, हमने साल 2011 में इसकी शुरुआत की थी. तब लेचल महज एक विचार था, जिसे हम साकार करना चाहते थे. हमने इस पर जितना काम किया, उतने ही नमूने तैयार हुए. हमने उन सभी का परीक्षण किया. तब हमने यह महसूस किया कि यह केवल दृष्टिबाधित लोगों की बजाय सबके काम की चीज हो सकता है.

उन्होंने पाया कि सामान्य लोग भी जीपीएस के जरिये रास्ते पर आगे बढ़ने में सहज नहीं रहते और तकनीक की गिरफ्त महसूस करते हैं. वह लोगों को इस असुविधा से मुक्त करना चाहते थे. लॉरेंस के अनुसार, यही विचार ‘लेचल’ जूतों के निर्माण की प्ररेणा बने.

लॉरेंस ने कहा, लेचल जूते दरअसल पहनने वाली एक तकनीक हैं. ये आपके शरीर का एक विस्तार हैं. अब तक ऐसी जो तकनीकें रही हैं, वे ज्यादातर सुनने या देखने पर आधारित रही हैं. हमने महसूस किया कि स्पर्श की क्षमता सबसे शक्तिशाली होती है, लेकिन तकनीक के निर्माण में उसका पर्याप्त उपयोग नहीं किया गया है.

लॉरेंस की कंपनी ड्यूसेर टेक्नोलॉजीज ने हाल ही में लेचल को जारी किया. उन्होंने इसे एक स्टार्टअप की तरह शुरू किया था. इनकी कंपनी में करीब 100 लोग कार्यरत हैं, जिनमें से 75 फीसदी विशेष रूप से सक्षम हैं.

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