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तेजी से फलताफूलता डेरी कारोबार

नए जमाने में वक्त के साथसाथ तमाम तरह की तब्दीलियां आ चुकी हैं. बात फिलहाल दूध की है, तो पुराने दौर में ज्यादातर लोग दूधियों से ही दूध लेते थे. चाहे वह पानी मिला दूध लाए या झाग के सहारे कम मात्रा में दूध दे, पर दूध लेने का जरीया साइकिल पर आने वाले दूध वाले ही होते थे. बोतल का दूध, पौलीथीन के पैकेट का दूध या सिक्कों के सहारे निकलने वाले दूध की बात लोगों की सोच से परे थी.

मगर मौजूदा दौर में डेरी कारोबार यानी दूध के उद्योग का दायरा दुनिया भर में बहुत ज्यादा बढ़ गया है. इस काम में अब लाखोंकरोड़ों रुपए के वारेन्यारे होते हैं. बेशक पानी मिला घटिया दूध बेचने वाले घोसी आज भी मौजूद हैं, पर उन का वजूद व दायरा दिनबदिन घटता जा रहा है.

आजकल तो पढ़ेलिखे लोग भी दूध का धंधा करने में जरा भी नहीं झिझकते, बल्कि इस काम को अपनी शान समझते हैं. एक ऊंची बिरादरी का परिवार है, जहां ज्यादातर लोग डाक्टर व इंजीनियर जैसे पदों पर काम कर रहे हैं. पर उसी परिवार की नई पीढ़ी का 20 साला लड़का इस बात पर अड़ गया कि वह डेरी का ही काम करेगा. उस ने खुलेआम ऐलान कर दिया कि बड़ा अफसर बनने की उसे कोई आरजू नहीं है. रिश्तेदारों ने उसे ‘दूध वाला भइया’ और ‘ग्वाला’ जैसे जुमालों से जलील करने की कोशिश की, मगर उस ने अपना इरादा नहीं बदला आखिरकार घर वालों ने उसे डेरी शुरू करने लायक रकम मुहैया करा दी और वह बंदा अपनी मुहिम में जुट कर आगे बढ़ रहा है.

गहराई से सोचा जाए तो डेरी का काम कोई छोटा या घटिया काम कतई नहीं है, बस सोच का सवाल होता है. गांधीजी जैसे लोग तो मैला ढोने को भी नीची निगाह से नहीं देखते थे. लिहाजा डेरी के काम से जुड़ने वालों को नीचा नहीं दिखाना चाहिए. वैसे भी आने वाले वक्त में इस कारोबार का दायरा और भी बढ़ता जाएगा.

दुनिया पर नजर डालें तो सब से अमीर व विकसित देश अमेरिका दूध उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है. वहां बड़े पैमाने पर इस कारोबार को चलाया जाता है. अपना भारत इस मामले में दूसरे नंबर पर है. यकीनन इस कारोबार में रोजगार के भी भरपूर मौके हैं. दूध उद्योग में अच्छी नौकरी पाई जा सकती है और जिन के पास थोड़े पैसे हैं, वे खुद का दुग्ध कारोबार शुरू कर सकते हैं.

महज खेती के क्षेत्र में ही साइंस और तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा, बल्कि डेरी कारोबार में भी ये चीजें शामिल हो चुकी हैं. अब दूध के कारोबार में नई व आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है और हर काम वैज्ञानिक तरीके से अंजाम दिया जा रहा है.

दिनबदिन दूध और उस से बनने वाली चीजों की मांग बढ़ती जा रही है. इसी हिसाब से डेरी कारोबार में विशेषज्ञों की जरूरत भी बढ़ रही है, ताकि दूध के उत्पादन को बेहतर कर के बढ़ाया जा सके.

आजकल भारत से उम्दा दूध व उस से बनी चीजें दूसरे देशों को भी भेजी जा रही हैं, लिहाजा इस कारोबार का दायरा लगातार बढ़ना लाजिम है.

डेरी कारोबार के तहत पशुओं की देखरेख, दूध उत्पादन व दूध की चीजें बनाना जैसे काम किए जाते हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से डेरी उद्योग का योगदान खासा अहम है, लिहाजा सरकार भी इसे पूरा बढ़ावा दे रही है.

भारत के ज्यादातर घरों में दूध व उस से बनी चीजों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है. इसी वजह से तमाम बड़ी व नामी कंपनियां भी दूध कारोबार में शामिल हो गई हैं. तमाम मल्टीनेशनल कंपनियां भी भारत के दूध कारोबार से जुड़ने में दिलचस्पी दिखा रही हैं.

भारत में बने दूध उत्पादों को बड़े पैमाने पर विदेशों में भेजने से काफी विदेशी मुद्रा भी भारत आ रही है. इस कारोबार की लगातार बढ़ती अहमियत को देखते हुए कई संस्थान और महाविद्यालय इस से संबंधित कोर्स भी करा रहे हैं. डेरी टेक्नोलाजी के तहत डेरी इंजीनियरिंग, डेरी कैमिस्ट्री व डेरी बैक्टीरियोलाजी वगैरह क्षेत्र आते हैं.

डेरी के कोर्स के तहत छात्रों को मिल्क प्रोडक्शन, डेरी इक्विपमेंट एंड यूटीलिटीज, मिल्क प्रोसेसिंग एंड पैकेजिंग, डेरी प्रोडक्ट्स, डेरी मैनेजमेंट और मार्केटिंग की तालीम दी जाती है.

आजकल डेरी के काम में तकनीकी जानकारियों को जरूरी माना जाता है, लिहाजा कोर्स करने की अहमियत बढ़ जाती है. डेरी का कोर्स करने के लिए छात्रों को 10+2 (पीसीएम) की परीक्षा कम से कम 50 फीसदी अंकों से पास करना जरूरी है. डेरी के कोर्स के लिए साइंस और एग्रीकल्चर स्ट्रीम के छात्रों को तरजीह दी जाती है.

डेरी का कोर्स करने के बाद छात्रों को डेरी प्लांटों में नौकरियां आसानी से मिल जाती हैं. इस बात में शक नहीं है कि डेरी उद्योग एक सदाबहार क्षेत्र है. भारत में इस?क्षेत्र में लगातार तरक्की हो रही है, इसीलिए यहां माहिरों यानी विशेषज्ञों की मांग काफी बढ़ गई है.

डेरी के क्षेत्र में नौकरी के अलावा अपनी खुद की डेरी शुरू करने का भी मौका रहता है. आजकल तमाम लड़कियां भी इस क्षेत्र में खासी दिलचस्पी ले रही हैं. डेरी टेक्नोलाजी के क्षेत्र में एमएससी इन डेरी टेक्नोलाजी, एमटेक इन डेरी टेक्नोलाजी, बीटेक इन डेरी टेक्नोलाजी, बीएससी इन डेरी टेक्नोलाजी और डिप्लोमा इन डेरी टेक्नोलाजी की पढ़ाई की जा सकती है. तमाम मान्यता प्राप्त संस्थानों में इन कोर्सों की सुविधा मौजूद है. ऐसे कुछ खास संस्थान हैं : इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट, आनंद एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (गुजरात) और नेशनल डेरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (हरियाणा).

कुल मिला कर डेरी उद्योग की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता. 2-4 लाख रुपए लगा कर भी यह काम शुरू किया जा सकता है. कुछ लोग आपस में मिल कर भी डेरी का कारोबार शुरू कर सकते हैं. वैसे आजकल सरकार भी डेरी कारोबार के लिए कम ब्याज पर कर्ज देने के साथसाथ अनुदान भी दे रही है. लिहाजा इच्छुक लोग धड़ल्ले से डेरी के काम को चालू कर सकते हैं.

लवेंडर की व्यावसायिक खेती

भारत में खुशबूदार औषधीय पौधों की खेती लगातार बढ़ती जा रही?है, जिस की वजह है इस की लगातार बढ़ती मांग और अच्छा मुनाफा. देश में अब किसान नई तकनीकों को अपना कर सुगंधित पौधों की खेती व्यावसायिक स्तर पर करने लगे?हैं. ऐसा ही एक सुगंधित पौधा है लवेंडर.

लवेंडर के तेल की मांग तेजी से बढ़ रही है. यह लैमियेसी कुल के लैवेंडुला वंश का पौधा है, जिस की दुनियाभर में करीब 28 प्रजातियां पाई जाती हैं. इन में से 3 प्रजातियों को खुशबूदार तेल निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ये 3 प्रजातियां हैं लवेंडर अंगस्टीफोलिया या ट्रू लवेंडर, लवेंडर लैटीफोलिया या स्पाइक लवेंडर और लवेंडर इंटरमीडिया या लावेंडीन. लवेंडर इंटरमीडिया या लावेंडीन, लवेंडर अंगस्टीफोलिया व लवेंडर लैटीफोलिया से बनाई गई संकर प्रजाति है. इन तीनों प्रजातियों में से लवेंडर अंगस्टीफोलिया या ट्रू लवेंडर का तेल खुशबूदार तेलों में सब से अच्छा माना जाता?है, जबकि लवेंडर लैटीफोलिया या स्पाइक लवेंडर का तेल, ट्रू लवेंडर की तुलना में कम खुशबूदार होता है और इस की महक लवेंडर और रोजमैरी के मिश्रण जैसी होती है. लवेंडर इंटरमीडिया के तेल में अन्य दोनों प्रजातियों के गुण पाए जाते हैं और इस के तेल की गुणवत्ता ज्यादा नहीं होती है. लेकिन यह तेल ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इस की उपज ज्यादा होती है और तेल की कीमत भी अच्छी मिल जाती है.

लवेंडर भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला पौधा?है. यह दक्षिणी फ्रांस, इटली और बुल्गारिया की ऊंची पहाडि़यों पर जंगली अवस्था में उगा हुआ पाया जाता है. लेकिन यूरोप और अन्य कई देशों में भी इस की खेती की जाती?है. भारत में इसे कश्मीर घाटी में उगाया जा चुका है और अब हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों में कम वर्षा वाले इलाकों में पहाडि़यों की ढलानों पर इसे उगाया जा रहा है.

इस्तेमाल

लवेंडर का तेल सब से ज्यादा प्रचलित खुशबुओं में से एक है. इस तेल का इस्तेमाल साबुन बनाने में खुशबू के तौर पर किया जाता है. इस के सूक्ष्मजीवीनाशक गुणों की वजह से यूरोप में इसे घरों, स्कूलों और सार्वजनिक भवनों में रोगाणुनाशक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. लवेंडर की खुशबू कई दूसरे तेलों में मिलाई जाती है. इंगलैंड में तेल, पानी और एल्कोहाल के मिश्रण से बना लवेंडर जल कौस्मैटिक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. अच्छी क्वालिटी (50 फीसदी एस्टर) वाले लवेंडर तेल का इस्तेमाल अच्छी किस्म के इत्र (परफ्यूम) बनाने में किया जाता है और मध्यम गुणवत्ता (38-42 फीसदी एस्टर) वाले तेल का इस्तेमाल लवेंडरजल, प्रसाधन सामग्री और यूडी कोलन वगैरह बनाने में किया जाता है. निम्न गुणवत्ता (30-35 फसदी एस्टर) वाले तेल का इस्तेमाल लवेंडर साबुन और पाउडर वगैरह बनाने में किया जाता है. इसे दवाओं को खुशबूदार बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. लवेंडर के फूलों से गुलकंद भी बनाया जाता है.

उम्दा प्रजातियां

बुल्गारिया में लवेंडर की 6 नई प्रजातियां निकाली गई हैं. ये प्रजातियां हैं काजन लुक, कारलोवो, हेमस, ऐरामा, स्वेटजैस्ट और वैनेट्स. कश्मीर घाटी में उगाई गई बुल्गारियन प्रजातियों में से सीमैप, लखनऊ ने भोरएकश्मीर नामक एक प्रजाति निकाली?है, जो बुल्गारियन प्रजातियों की तुलना में 80 से 100 फीसदी ज्यादा तेल पैदा करती है. इस प्रजाति का तेल पुरानी बुल्गारियन प्रजाति कारलोवो के तेल से अच्छा होता है. एएम 1, एएम 2, एएम 3, ए 5, ए 6, ए 7, ए 8, ए 9, बी 2 और बी 11 कुछ अन्य ज्यादा पैदावार वाली प्रजातियां हैं.

जमीन का चुनाव

लवेंडर की खेती के लिए हलकी, सूखी, चूनायुक्त और उर्वर जमीन, जिस में हवा आसानी से आ सके, अच्छी मानी जाती है. निम्न कार्बोनेट और बलुई जमीन में भी इस की खेती की जा सकती?है. लेकिन पानी से भरी जमीन इस के लिए सही नहीं होती है. क्षारीय जमीन (पीएच 7 से 8.4) में इस की फसल और तेल की ज्यादा पैदावार देखी गई है.

जलवायु

लवेंडर का पौधा ठंडी जलवायु में उगाया जाता?है. सर्दी के मौसम में अधिक ठंड और गरमी के मौसम में कम गरम इलाकों में यह अच्छा फलताफूलता है. इस की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, जिस से यह पहाड़ी ढलान वाली जमीन पर भी अच्छी तरह से उगता?है और क्षरण रोकने में भी काफी मदद करता है. यह सूखा और पाला प्रतिरोधी है. इसे बहुत ऊंचाई पर खेती लायक जमीन पर आसानी से उगाया जा सकता है.

बोआई और रोपाई

लवेंडर को बीज और कटिंग दोनों तरीकों से बोया जा सकता है. बीज से उत्पादन सस्ता और जल्दी होता है. परपरागण के कारण फसल में अलगअलग तरह से जनन हो सकता है, जिस से फसल की कटाई का सही समय निर्धारित करना कठिन हो जाता है.

नर्सरी तैयार करना

नवंबर व दिसंबर के महीने में बीजों को नर्सरी की क्यारियों में बोया जाता है. 1 वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र में 0.2 से 2.5 ग्राम बीज की जरूरत होती है. नर्सरी में बीज 1-2 सेंटीमीटर की गहराई पर बोए जाते हैं, जो अप्रैल के महीने में, जब तापमान 14 से 15 डिगरी सेल्सियस होता है, अंकुरित होते?हैं.

कटिंग तैयार करना

कटिंग को नर्सरी में तैयार करने के लिए पौध की 1 या 2 साल पुरानी शाखाओं का इस्तेमाल किया जाता?है. मैदानी क्षेत्रों में इस का सही समय अक्तूबर से नवंबर और पहाड़ी क्षेत्रों में फरवरी से मार्च होता है. शाखा के ऊपरी 8 से 10 सेंटीमीटर हिस्से को कटिंग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. नर्सरी लगाने से पहले कटिंग के निचले दोतिहाई भाग को 500 पीपीएम सांध्रता के आईबीए के घोल से उपचारित करना चाहिए. नर्सरी में कटिंग को 5×5 सेंटीमीटर की दूरी पर तकरीबन दोतिहाई निचले भाग तक गाड़ देना चाहिए और कटिंग के चारों ओर मिट्टी को अच्छी तरह से दबा कर पानी लगा देना चाहिए.

रोपाई

जड़युक्त कटिंग या सकरों को नर्सरी से निकाल कर खेत में 3.5 से 4.0 सेंटीमीटर की दूरी पर लाइनों में लगाया जाता है. लाइन से लाइन की दूरी 1.2 से 1.4 मीटर रखी जाती है. ज्यादा पैदावार के लिए 1 हेक्टेयर में तकरीबन 20000 पौधे होने चाहिए.

उर्वरक

खेत में पौधे लगाने से पहले 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. उस के बाद हर साल 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर 4 विभाजित खुराकों में देनी चाहिए. सीमैप के श्रीनगर केंद्र पर चूना इस्तेमाल किए गए खेत में 150 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल किया गया, जिस से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उच्चतम स्पाइक उपज हासिल हुई.

सिंचाई

लवेंडर की अच्छी उपज के लिए फसल को समयसमय पर पानी देते रहना चाहिए. इस संबंध में खास बात यह है कि जमीन सूखने से पहले ही हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. खेत को पानी से न भरें और लंबे समय तक खेत में पानी भरा न रहने दें.

अन्य खास काम

रोपाई से पहले 2 साल के दौरान 2-3 जुताइयां लाइनों के किनारेकिनारे और 5 जुताइयां लाइनों के बीच में करनी चाहिए. जुताई 8-10 सेंटीमीटर गहरी होनी चाहिए. ऐसा करने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है और खरपतवार खत्म हो जाते हैं. इस से पौधों की बढ़वार में मदद मिलती है. इस के अलावा खरपतवारों को खत्म करने के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई भी करनी चाहिए. 3 साल से ज्यादा पुरानी फसल हो जाने पर लाइनों के बीच मशीन से गुड़ाई करें और बसंत में फूल खिलने से पहले 1 खुदाई करें.

रोग व कीट

फसल को तकरीबन 50 प्रकार के कीट नुकसान पहुंचा सकते?हैं. मैलोडियोग्नी हल्पा नामक निमेटोड इस फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है. कीटों के अलावा इस फसल में कोमियोथायरिम लवेंडूले प्रजाति की फंगस के प्रकोप से उकठा रोग लग जाता है. इस से लवेंडर अंगस्टीफोलिया प्रजाति की पत्तियों पर एलु मोजैक वाइरस के कारण धब्बे पड़ जाते?हैं. इस के अलावा इस फसल पर बुल्गारिया से 5 खास बीमारियों का भी पता चला है.

कटाई

पहली भरपूर उपज रोपाई के 3 सालों बाद मिलती है और उस के बाद अगले 3 से 4 सालों तक फसल अच्छी उपज देती रहती है. जब पौधों के फूल पूरी तरह खिलने लगते हैं, तब फूलों को तने के साथ ही अधिकतम 12 सेंटीमीटर की लंबाई में काटा जाता है. इस समय खास लवेंडर रंग के फूल धूसर नीले रंग में बदल जाते हैं. जब 50 फीसदी फूल खिल चुके हों, तो कटाई शुरू कर देनी चाहिए और जब फूल खिलने बंद हो जाएं तो कटाई बंद कर देनी चाहिए.

तेल उपज

अलगअलग प्रजातियों में खुशबूदार तेल की मात्रा 0.5 फीसदी से 1.1 फीसदी के बीच पाई जाती है. आमतौर पर खुशबूदार तेल की मात्रा 0.8 फीसदी के आसपास होती है. जबकि कुछ बुल्गारियन प्रजातियों में 1.2 फीसदी से 1.4 फीसदी तक खुशबूदार तेल की मात्रा पाई जाती है. प्रति हेक्टेयर तेल की उपज 50 से 80 किलोग्राम दर्ज की गई है. इस को बाजार में बेच कर किसानों द्वारा अच्छा मुनाफा कमाया जा रहा है.

हरे चारे का बनाएं पौष्टिक साइलेज

पशुपालकों के सामने अपने दुधारू पशुओं के लिए साल भर हरे चारे का इंतजाम करना मुश्किल होता है, जबकि दुधारू पशुओं को पौष्टिक दाने व चारे के साथ हरा चारा खिलाना बेहद जरूरी होता है. हरा चारा खिलाने से पशु न केवल निरोग रहते हैं, बल्कि कई तरह के पोषक तत्त्वों की पूर्ति भी हो जाती?है. पशुपालक हरे चारे के रूप में बरसीम, नैपियर घास, जई, मक्का, बाजरा, लोबिया, उड़द व मूंग आदि का इस्तेमाल पशुओं को खिलाने के लिए करते हैं. लेकिन इस तरह का हरा चारा साल भर नहीं मिल पाता है. गरमी के मौसम में पशुपालक अपने पशुओं को सिर्फ सूखा चारा व दाना खिलाने पर मजबूर होते?हैं. इस से दुधारू पशु कम दूध देने लगते हैं. ऐसी स्थिति में किसान यह सोच कर परेशान होते हैं कि अपने पशुओं को हरे चारे की जगह क्या खिलाएं.

पोषक तत्त्वों से?भरपूर हरे चारे का जुगाड़ साइलेज बना कर किया जाता है. हरे चारे व पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद्यानन को मिला कर बनाए जाने वाले साइलेज से दूध उत्पादन में तेजी से बढ़ोतरी होती है. इस से हरे चारे को लंबे समय तक रखने में मदद मिलती है. वहीं साइलेज के रूप में हरे चारे का भंडारण भी लंबे समय तक किया जा सकता है.

साइलेज के रूप में हरे चारे में पाए जाने वाले गुण व पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते?हैं, बल्कि इस में और कई तरह के सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की बढ़ोतरी हो जाती?है. पशुओं के लिए साइलेज के रूप में हरे चारे की मौजूदगी सालभर बनाए रखने के लिए साइलेज को तैयार करने की विधि को ले कर कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया बस्ती में विषय वस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह से लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत है उन से हुई बातचीत के खास अंश:

साइलेज क्या है और इस से साल भर हरा चारा कैसे मिल सकता है?

पशुपालकों के सामने साल के कुछ महीने ऐसे भी आते हैं, जिन में हरा चारा नहीं मिल पाता?है. ऐसे में कुछ लोग हरे चारे को या तो सुखा कर रखते हैं या सुखा कर रखे गए चारे की कटाई कर के रखते हैं, जो हरा चारा न होने पर पशुओं को खिलाया जाता?है. लेकिन सुखा कर रखे गए हरे चारे में तमाम पोषक तत्त्व खत्म हो जाते?हैं. ऐसी स्थिति में हरे चारे में पाए जाने वाले पोषक तत्त्वों की मौजूदगी बनाए रखने के लिए साइलेज बनाया जाता है.

यह ज्वार, मक्का, नैपियर घास, बरसीम आदि हरे चारों को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर उस में नमक व दूसरे जरूरी पोषक तत्त्व मिला कर बनाया जाता है. इस को बनाने के लिए इसे भंडारित करने वाले गड्ढे यानी साइलोपिट में वायुरहित कर के दबाया जाता है. इसे साइलोपिट में दबाने के 3 महीने बाद से पशुओं को खिलाया जाता है. साइलोपिट में दबा कर रखे गए हरे चारे का इस्तेमाल कई महीनों तक किया जा सकता?है.

साइलेज बनाने के लिए किस तरह के हरे चारों की फसलों का इस्तेमाल किया जा सकता है?

साइलेज बनाने के लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस हरे चारे का इस्तेमाल किया जा रहा है, उस में कार्बोहाइड्रेट व सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा सही हो. ऐसे में जिन फसलों का इस्तेमाल साइलेज बनाने के लिए किया जाता है, उन में मक्का, ज्वार, जई, लूटसन, नेपियर घास, लोबिया, बरसीम, रिजका, लेग्यूम्स, जवी, बाजरा, गिन्नी व अंजन वगैरह खास हैं. साइलेज बनाने के लिए जिस फसल का चुनाव किया जा रहा है, अगर वह दाने वाली फसल जैसे मक्का, ज्वार, जई वगैरह है, तो जब दाने दूधिया हों तो तभी इसे काटना चाहिए. इस समय चारे में 65 से 70 फीसदी पानी रहता है. अगर पानी अधिक है, तो चारे को थोड़ा सुखा लेना चाहिए ताकि नमी की मात्रा 60 से 65 फीसदी तक आ जाए, क्योंकि अधिक नमी न होने से साइलेज सड़ता नहीं है.

साइलेज बनाने के लिए साइलोपिट का निर्माण किस तरह से किया जाए और इस के लिए जगह चुनने में किन चीजों का ध्यान रखा जाना चाहिए?

साइलेज बनाने के लिए जिस जगह को चुना जा रहा?है, वहां बरसात के पानी के अच्छे निकास का इंतजाम होना चाहिए और जमीन में जल स्तर काफी नीचे होना चाहिए. कोशिश करें कि साइलोपिट पशुओं को चारा खिलाने के स्थान के नजदीक बनाया जाए. साइलेज बनाने के लिए साइलोपिट का साइज चारे की मात्रा व मौजूदगी के हिसाब से होना चाहिए. वैसे 20 किलोग्राम चारे के लिए 1 घन फुट जगह की जरूरत पड़ती है. साइलोपिट कई प्रकार के हो सकते?हैं. 8 फुट गहराई वाले गड्ढे में 4 पशुओं के लिए 3 महीने तक का साइलेज बनाया जा सकता है. गड्ढा ऊंचा होना चाहिए और उसे अच्छी तरह से कूट कर सख्त बना लेना चाहिए.

साइलोपिट का फर्श व दीवारें पक्की बनानी चाहिए और यदि ऐसा न हो पाए तो दीवारों की लिपाई भी की जा सकती है और इन के साथ सूखे चारे की एक तह लगा देनी चाहिए या चारों ओर दीवारों के साथ पौलीथीन लगा दें. साइलोपिट बनाने के लिए जमीन पर चारों ओर सीमेंट व ईटों से जुड़ाई कर के उसे गड्ढे का आकार दे देना चाहिए. इस बनाए गए साइलोपिट को साइलेज बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है.

साइलेज किस तरह से बनाया जाए?

साइलेज बनाने के लिए जिस हरे चारे की कटाई की जा रही है, उस में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व खनिज लवणों की सही मात्रा होनी चाहिए. सब से पहले चारे को छोटेछोटे टुकड़ों में काट लेना चाहिए और काटे गए हरे चारे के?टुकड़ों को जमीन पर कुछ घंटे के लिए फैला देना चाहिए ताकि अधिक पानी की कुछ मात्रा उड़ जाए. साइलेज बनाने के लिए 2-5 सेंटीमीटर काटे गए हरे चारे के टुकड़ों को पहले से तैयार साइलोपिट में इस तरह रखना चाहिए जिस से किसी तरह से हवा अंदर न आने पाए इसलिए काटे गए चारे को साइलोपिट में खूब दबादबा कर भरते हैं. साइलोपिट में बाहरी हवा और पानी को जाने से रोकने के लिए इस के ऊपर पौलीथीन की मोटी परत बिछा कर उस पर चिकनी मिट्टी का लेप कर देना चाहिए और बीचबीच में यह देखते रहना चाहिए कि ऊपर लीपी गई मिट्टी में दरार न पड़े. दरार पड़ने पर दोबारा दरारों को मिट्टी से भर देना चाहिए. साइलोपिट में भंडारित किए गए हरे चारे के?टुकड़ों से साइलेज बनने लगता है. क्योंकि न तो इन्हें आक्सीजन मिलती है और न ही पानी. हवा के न होने से दबाए गए चारे में लैक्टिक अम्ल बनता है, जिस से चारा लंबे समय तक खराब नहीं होता है.

अच्छी गुणवत्ता वाले साइलेज को कैसे पहचानें?

साइलेज के तैयार होने में आक्सीजन न मिलने की वजह से पशुओं के लिए पोषक माने जाने वाले सूक्ष्म जीवाणु पैदा होते हैं. अच्छे साइलोपिट में तैयार साइलेज की गुणवत्ता को परखने के लिए उस के रंग को देखा जाता है. साइलेज में पोषक तत्त्वों की सही मात्रा बनाए रखने के लिए इस की गुणवत्ता पर खास ध्यान देना चाहिए. साइलेज हरा, सुनहरा, हलका सोने के रंग जैसा या हरेभूरे रंग का होता है, जो खाने व पचने में आसान होता है. साइलेज का जानवरों पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है. अच्छे साइलेज में खास तरह की खुशबू होती?है और जायका तेजाबी होता है. बरसीम, रिजका और लोबिया में घुलनशील कार्बोहाइड्रेट की मात्रा मक्का और ज्वार की तुलना में कम होती है और नमी व प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है, इसलिए इन से अपनेआप साइलेज नहीं बनता.

लिहाजा बरसीम, रिजका और लोबिया का साइलेज बनाने के लिए 4 भाग हरे चारे में 1 भाग धान का पुआल मिला कर साइलेज बनाया जा सकता?है. ऐसा करने से धान का पुआल हरे चारे की नमी को सोख लेता है, जिस से हरा चारा सड़ता नहीं?है और पुआल का पचनीय तत्त्व भी बढ़ जाता है. बनाए जा रहे साइलेज चारे में शीरा 2 फीसदी के हिसाब से मिला दें ताकि घुलनशील कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ जाए. बरसीम, रिजका, लोबिया आदि के चारे को मक्का, ज्वार, जई वगैरह के चारों के साथ मिला कर बनाए गए साइलेज का रंग पीला हो, तो यह सब से अच्छा साइलेज माना जाता है. पशुओं को इसे पचाने में आसानी होती है. अगर साइलेज की पाचकता ज्यादा हो, तो दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. यह ध्यान रखें कि साइलेज के गड्ढे भरने के 3 महीने बाद गड्ढों को खोलना चाहिए. खोलते समय ध्यान रखें कि साइलेज एक तरफ से परतों में निकाला जाए और गड्ढे का कुछ हिस्सा ही खोला जाए और बाद में उसे ढक दें. गड्ढा खोलने के बाद साइलेज को जितनी जल्दी हो सके पशुओं को खिला कर खत्म करना चाहिए. गड्ढे के ऊपरी भागों और दीवारों के पास में अकसर फफूंदी लग जाती है. यह ध्यान रखें कि ऐसा साइलेज पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए.

पशुओं को साइलेज खिलाने के लिए किन खास बातों पर ध्यान देने की जरूरत होती है?

पशुओं की नाद में डाली गई साइलेज के बचेखुचे हिस्से को हर बार हटा कर साफ कर देना चाहिए. चूंकि साइलेज की पूरी मात्रा पचनीय होती है, लिहाजा इसे भूसे के साथ मिला कर खिलाने से भूसे के पचने की उम्मीद भी बढ़ जाती है. एक दुधारू पशु जिस का औसत वजन 550 किलोग्राम हो, उसे 25 किलोग्राम की मात्रा में साइलेज खिलाया जा सकता है.

भेड़बकरियों को खिलाई जाने वाली मात्रा 5 किलोग्राम तक रखी जाती है. शुरुआती दौर में पशुओं को साइलेज का स्वाद कुछ अटपटा लग सकता है, लेकिन बाद में वे इसे बहुत चाव से खाने लगते हैं. 1 किलोग्राम सूखे चारे के साइलेज में 200 ग्राम स्टार्च हो तो उसे अच्छा माना जाता है. बढि़या साइलेज में 85 से 90 फीसदी हरे चारे के बराबर पोषक तत्त्व होते हैं, इसलिए चारे की कमी के समय साइलेज खिला कर पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. मक्के व घास से तैयार साइलेज की गुणवत्ता सब से अच्छी होती है. मक्के के साथ फलीदार पौधों का साइलेज खिलाने से दूध उत्पादन तेजी से बढ़ता है. किसान साइलेज के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए राघवेंद्र विक्रम सिंह (विषय वस्तु विशेषज्ञ), कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, बस्ती (उत्तर प्रदेश) से संपर्क कर सकते हैं.

नोटबंदी बेबसी में मंडी खेत और किसान

कालेधन के खात्मे के लिए नोटबंदी के बाद सब से ज्यादा किसान परेशान हैं. हालात देख कर यह लगता है, जैसे सब से ज्यादा कालाधन इन गरीब किसानों के पास ही है. किसानों पर नोटबंदी का ऐसा असर हुआ कि उन की धान की फसल औनेपौने दामों में बिक रही है और रबी की फसल के लिए उन को महंगी कीमत में खाद, बीज और कीटनाशक  खरीदने पड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश से ले कर हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार तक  के किसान इस मुसीबत में फंसे नजर आए. यह संकट केवल किसानों को ही परेशान नहीं कर रहा, बल्कि खेती के काम में लगे मजदूर तक इस से परेशान हैं. मंडियों में अनाज बेचने का काम करने वाले आढ़तिए व मजदूरी करने वाले पल्लेदार भी परेशानी में डूबे नजर आए. सब से ज्यादा परेशानी में धान और गुड़ की मंडियां हैं. मंडियों से मिली जानकारियों के अनुसार नोटबंदी के बाद पहले 10 दिनों में सब से ज्यादा असर मंडियों पर पड़ा है.   

मंडियों में धान और गुड़ को बेचनेखरीदने का काम बंद हो गया है. मंडी में सुबह भीड़ जुटती है, पर धीरेधीरे दोपहर तक खत्म हो जाती है. किसान, आढ़तिए और पल्लेदार इस बात को मानते हैं कि नोटबंदी सही है, पर यह पाबंदी लगाते समय पूरी तैयारी नहीं की गईं. अगर मुद्रा बाजार में छोटे नोट पहले से ही चलन में लाए गए होते, तो यह परेशानी नहीं होती. इस परेशानी से बचने के लिए किसान आढ़तियों को सब्जी जैसी खराब होने वाली पैदावार दे देते हैं. आढ़तिए उन को पहले पुराने नोट देने का काम करते हैं, जब किसान पुराने नोट नहीं लेते तो उन्हें चेक दिया जाता है. कई आढ़त वाले किसानों के नाम अपने रजिस्टर में लिख लेते हैं और पैसा बाद में देने को कहते हैं.

घटी धान व गुड़ की बिक्री

किसानों के पास पैसे नहीं हैं, तो वे दुकानदारों से उधार में बीज, खाद और कीटनाशक ले कर अपना काम चला रहे?हैं. नकद न मिलने से किसान परेशान हैं. वे मंडी में अपनी फसल बेचने से बच रहे?हैं. आढ़तिए किसानों को पुराने नोट देने की कोशिश करते हैं. पर किसान पुराने नोट लेना पसंद नहीं करते. जिस मंडी में धान के सीजन में प्रतिदिन औसतन 7000 क्विंटल धान बिकने आता था, वहां नोटबंदी के बाद 1500 क्विंटल धान बिकने आ रहा है. धान के साथ गुड़ मंडी में भी यही हाल है. किसानों की मजबूरी का लाभ उठा कर कई बार धान और गुड़ ले कर मंडी में आए किसानों से आढ़ती कम पैसे में खरीदारी करना चाहते हैं. ऐसे में कई किसान कम पैसे में धान व गुड़ बेचने की जगह पर उसे वापस ले जाने की कोशिश करते हैं. मगर ज्यादातर किसान लाचार हो कर औनेपौने दामों में फसल बेचने पर मजबूर हो रहे हैं.

सरकार एक के बाद एक फैसले करती जा रही है, पर उन को अमल में लाना मुश्किल काम है. मंडी में आढ़ती कहते हैं कि सरकार ने कहा है कि आढ़ती को 50,000 रुपए मिलेंगे. अगर उन के पास 100 किसान आते हैं, तो वे उन को कितना भुगतान कर सकते हैं, यह समझने वाली बात है. आढ़ती कहते?हैं कि उन का किसानों के साथ केवल दुकानदार और ग्राहक का संबंध नहीं है. वे एकदूसरे के साथ भावनात्मक रिश्ता भी रखते हैं. किसान फसल की बोआई नहीं कर पा रहे. आढ़ती उन की परेशानी देखसमझ रहे हैं.

प्रभावित हुई फसल की बोआई

नोटबंदी से किसान पूरी तरह से फसल की बोआई नहीं कर पाए. तमाम किसानों के पास बीज खरीदने के पैसे नहीं हैं, ऐसे किसान अपने खेत में बोआई नहीं कर पाए. रबी की फसल में गेहूं की बोआई के समय यूरिया खाद की कमी हो गई. दुकानदार बताते हैं कि जहां पहले रोज 10 बोरी यूरिया बिकती थी, अब 1-2 बोरियां ही बिक रही हैं. बैंकों ने किसानों को नोट बदल कर 2000 के नोट दिए, जिस के फुटकर पैसे दुकानदार के पास नहीं थे. ऐसे में नोट होते हुए भी किसानों को बीज और खाद नहीं मिल सकी. रबी की फसल में गेहूं के साथ तरबूज, पालक, सरसों और सब्जी की खेती होती है, ये खेती भी प्रभावित हुई. छोटे नोटों की कमी के चलते किसान सब से ज्यादा प्रभावित हुए. किसान कहते हैं कि एक तो बैंक से नोट नहीं मिले. बहुत मेहनत के बाद जब नए नोट मिले तो वे 2000 के थे. 2000 के नोट का फुटकर मिलना मुश्किल हो गया है. सब से बड़ी परेशानी फुटकर नोट की है, जिस की वजह से बाजार में बिक्री घट गई. इस के अलावा बैंकों में लाइन में लगने में किसानों का समय खराब हुआ. गांव में बैंक दूरदूर हैं. हर गांव में एटीएम नहीं हैं. बैंक मित्रों की जानकारी किसानों के पास नहीं है. नवंबर के तीसरे हफ्ते तक उत्तर प्रदेश में केवल 70 फीसदी आलू किसान और 40 फीसदी गेहूं किसान ही बोआई कर पाए हैं.

गांवों में ज्यादातर किसानों के पास खेतों की जुताई के लिए अपने टै्रक्टर नहीं हैं. हल और बैल से खेती बंद हो चुकी है. ऐसे में किराए के ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करानी पड़ती है. ट्रैक्टर के मालिक किसानों से पुराने नोट नहीं ले रहे हैं. जो किसान दूसरे के पंप सेट से सिंचाई करते हैं, वे भी ऐसे ही परेशान हो रहे हैं. इस से किसानों की फसल की बोआई नहीं हो पा रही है. खादबीज की प्राइवेट दुकानों में भी पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं. बैंकों से किसानों को पूरी मदद नहीं मिल पा रही. फुटकर नोट वहां से भी नहीं मिल रहे हैं.

बदइंतजामी में फंसीं सहकारी समितियां

किसानों की मदद का दावा करने वाली सहकारी समितियां बदइंतजामी में फंसी हैं. वे किसानों की मदद नहीं कर पा रही हैं. उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य जहां बैंक बहुत दूर हैं, वहां सहकारी समितियां किसानों की मदद करती थीं. अब वे किसानों को कर्ज नहीं दे पा रही हैं. पहले किसान बीज और खाद उधार पर लेते थे, पर अब नहीं ले पा रहे हैं. ऐसे में उत्तराखंड में 45 फीसदी बीजों और कीटनाशकों की खरीदारी में कमी आई है. पहाड़ी इलाकों में आलू की बोआई केवल 10 फीसदी ही हो पाई है. सरसों और मटर की 50 फीसदी बोआई ही हो पाई है. गांव में हालात खराब होने का असर पैदावार पर पड़ेगा, जिस से आने वाले दिनों में खाद्यान की कमी होगी.

खरीद कम होने का असर केवल किसानों पर ही नहीं पड़ रहा. बीज बेचने वाले दुकानदार भी परेशान हैं. सब से अधिक परेशानी आलू के बीज बेचने वालों को हो रही है. आलू के बीज किसान खरीद नहीं पा रहे, जिस की वजह से बीज सड़ रहे हैं.

नोटबंदी के कारण किसान धान के खेत काटने की जगह पर बैक में लाइन लगा रहे हैं. ऐसे में आलू की बोआई भी नहीं हो पा रही है. किसान छोटे नोट न मिलने से परेशान हो रहे?हैं. अगर उन की जरूरत के नोट मिलते तो उन की खेती प्रभावित नहीं होती. छोटे नोटों की कमी के चलते मंडी और खेत सूने पड़े हैं. सरकार किसानों की परेशानी समझ नहीं रही. किसान खेती के अलावा घर की शादियों और बीमारियों में भी परेशान हैं. यहां भी नोटबंदी ने उन्हें परेशान कर रखा है. शहरों से ज्यादा नोटबंदी से गांव के लोग परेशान हैं. यह बात केंद्र सरकार को समझ नहीं आ रही. सरकार के पास किसानों को मदद पहुचाने का कोई तंत्र नहीं है. इस का असर किसानों और सरकार के संबंधों पर पड़ेगा. किसानों को लग रहा है कि काले धन के खिलाफ मुहिम से काले धन रखने वाले नहीं, बल्कि किसान परेशान हो रहे हैं. जिन के पास मेहनत का सफेद धन बचत के रूप में रखा था, बैंक से उसे  बदलना मुश्किल हो रहा है.

कुछ कहती हैं तसवीरें

धूम मचा ले मौज मना ले : भारतचीन सीमा के पास मौजूद अरुणाचल प्रदेश के तवांग का तवांग फेस्टिवल दूरदूर तक मशहूर है. उत्सव के रंग में डूबे कलाकार खूंखार मुखौटे लगा कर और अलगअलग हुलिए बना कर दर्शकों को लुभाने में कामयाब रहते हैं.

स्वाद से भरपूर केसरकाजू गुझिया

घरेलू पकवान गुझिया का नाम लेते ही मैदे और मावा से तैयार गुझिया याद आ जाती है. होली के त्योहार पर यह पूरे देश में खाई और पसंद की जाती है. अब इस को चाशनी में डुबा कर खाने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है.  पूरे साल बिकने वाली गुझिया में केसरकाजू गुझिया का नाम सब से खास है. केसरकाजू गुझिया काजू, चीनी और केसर से तैयार की जाती है. सब से अच्छी बात यह है कि यह केसरकाजू गुझिया साल भर मिठाई की दुकानों में मिल जाती है.

600 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से शुरू होने वाली यह गुझिया जाड़े के त्योहारी सीजन में बहुत पसंद की जाती है. इस का कारण यह है कि इस में पड़ा मेवा जाड़ों में शरीर को ताकत देता है. इस से शरीर मजबूत होता है. मैदे और मावे से तैयार होने वाली गुझिया ज्यादा मीठी होती है, लिहाजा बहुत लोग इस को पसंद नहीं करते. केसरकाजू गुझिया में चीनी की मात्रा बहुत कम होती है, लिहाजा इसे सभी पसंद करते हैं. यह ज्यादा दिनों तक चलती है. ऐसे में इस को बहुत पसंद किया जाता है.

केसरकाजू गुझिया देखने में गुझिया के आकार की होती है. इस कारण इस को गुझिया नाम से जाना जाता है. यह साधारण गुझिया से पूरी तरह से अलग मेवे की मिठाई है.

बाजार में मैदे और मावे की गुझिया केवल होली के मौके पर बिकती है. केसरकाजू गुझिया पूरे साल बिकने लगी है. केसरकाजू गुझिया ज्यादा पसंद आती है. यह नए जमाने के लोगों को खूब पसंद आ रही है.’

कैसे बनती है केसरकाजू गुझिया

केसरकाजू गुझिया को बनाने में काजू, केसर व चीनी का इस्तेमाल होता है. सब से पहले काजुओं को पीस कर पेस्ट तैयार किया जाता है. इस में 20 फीसदी चीनी और केसर मिलाते हैं. मिक्स सामग्री को गुझिया बनाने के सांचे में डाला जाता है. इस प्रकार केसरकाजू गुझिया बन कर तैयार हो जाती है.

मिठाई बनाने वाले रामपाल यादव कहते हैं कि चांदी का वर्क लगाने से गुझिया हाइजीनिक रहती है. मैदे और मावे की गुझिया कम कीमत में बिकती है, जब कि केसरकाजू गुझिया काफी महंगी बिकती है.

डेरी का मंत्र दूध दोहन यंत्र

मशीन से दूध निकालने की शुरुआत डेनमार्क और नीदरलैंड से हुई और आज यह तकनीक दुनिया भर के लोगों द्वारा इस्तेमाल की जा रही?है. आजकल डेरी उद्योग से जुड़े अनेक लोग पशुओं से दूध उत्पादन मशीन के द्वारा ले रहे हैं. पशुओं का दूध दुहने वाली मशीन को हम मिल्किंग मशीन के नाम से भी जानते हैं. इस मशीन से दुधारू पशुओं का दूध बड़ी ही आसानी से निकाला जा सकता है. इस से पशुओं के थनों को कोई नुकसान नहीं होता है. इस से दूध की गुणवत्ता बनी रहती है और उस के उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. यह मशीन थनों की मालिश भी करती और दूध निकालती है. इस मशीन से पशु को वैसा ही महसूस होता है, जैसे वह अपने बच्चे को दूध पिला रही हो.

मिल्किंग मशीन से दूध निकालने से लागत के साथसाथ समय की भी बचत होती है और दूध में किसी प्रकार की गंदगी नहीं आती. इस से तिनके, बाल, गोबर और पेशाब के छींटों से बचाव होता है. पशुपालक के दूध निकालते समय?उन के खांसने व छींकने से भी दूध का बचाव होता है. दूध मशीन के जरीए दूध सीधा थनों से बंद डब्बों में ही इकट्ठा होता है.

मिल्किंग मशीन की जानकारी

दूध निकालने की मशीन के बारे में हमारी बातचीत मनप्रीत सिंह से हुई, जिन्होंने बताया कि उन की कंपनी एनके डेरी इक्यूप्मेंट के नाम से डेरी से संबंधित तमाम उपकरण बनाती?है और वे भारत में सब से पहले दूध निकालने वाली मशीन बनाने वालों में से एक हैं. उन की हाथ से चलने वाली मशीन तकरीबन 20000 रुपए की है. हाथ और बिजली दोनों से चलने वाली मशीन तकरीबन 35000 रुपए की है. उन की मशीन सालोंसाल चलती है. 1 साल का सर्विसिंग का खर्च मात्र 250 रुपए है. वे खरीदार को मशीन से दूध निकालने की जानकारी से ले कर उस के रखरखाव के बारे में पूरी जानकारी देते हैं, ताकि मशीन का इस्तेमाल करने में उसे कोई परेशानी न हो.

क्या इस मशीन से गाय और भैंस दोनों का दूध निकाला जा सकता है?

इस सवाल के जवाब पर मनप्रीत सिंह ने बताया कि गाय और भैंस के थनों की बनावट में थोड़ा फर्क होता है, इसलिए गाय का दूध दुहने वाली मशीन में थोड़ा सा बदलाव कर के इस मशीन से ही भैंस का दूध भी निकाला जा सकता है. भैंस का दूध निकालने के लिए मशीन का प्रेशर बढ़ाना होता है. उन्होंने आगे बताया कि उन की मिल्किंग मशीन की मांग बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा राज्यों में काफी है. वैसे मशीन की सप्लाई पूरे देश में है. यह कंपनी मिल्किंग मशीन के अलावा मिल्क एनालाइजर, पनीर, खोवा बनाने वाली मशीन, दूध से क्रीम निकालने वाली मशीन, दूध की जांच करने वाली मशीन, दूध पैकिंग करने की मशीन, डेरी पंप जैसे अनेक उपकरण बनाती है. किसान या पशुपालक डेरी से जुड़े किसी भी सामान या मशीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए मनप्रीत सिंह के मोबाइल नंबरों 9355013913, 9355113913 पर बात कर सकते हैं.

सरकार दे रही है बढ़ावा

किसानों की आय आने वाले 5 सालों में दोगुनी हो इस मकसद को ले कर केंद्र सरकार का तमाम कृषि योजनाओं पर काम चल रहा?है. इन्हीं योजनाओं के तहत पशुपालन व डेरी उद्योग पर भी सरकार का खासा ध्यान है. पशुओं में देसी नस्ल को बढ़ावा देने के लिए भी कोशिशें की जा रही हैं. डेरी उद्योग के लिए पशुपालक किसानों को सरकार अनुदान भी दे रही है. यह अनुदान पिछले दिनों तक केवल अनुसूचित जाति के लोगों को ही मिलता था, जो 33.33 फीसदी था. लेकिन अब 2016-17 से सभी वर्ग के लोग इस अनुदान का लाभ ले सकते हैं. सरकार द्वारा मिलने वाला अनुदान सामान्य व पिछड़ा वर्ग के लिए 25 फीसदी है, जबकि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए 33.33 फीसदी है. कुछ प्रदेशों की सरकारें ज्यादा अनुदान भी दे रही हैं.

किसे मिल सकता है अनुदान : खेतीबारी करने वाले, स्वयंसहायता समूह से जुड़े और पट्टेदार किसान इस अनुदान का फायदा ले सकते हैं.

डेरी उपकरण खरीद के लिए 13 लाख, 20 हजार रुपए और शीतभंडारण के लिए रेफ्रिजरेटर वगैरह खरीदने के लिए 33 लाख रुपए का लोन सरकार मुहैया करा रही?है.

दुधारू पशुओं के लिए :  कम से कम 10 पशुओं दुधारू पशुओं की खरीद के लिए जिन में उन्नत नस्ल जैसे संकर गाय, देशी नस्ल साहिवाल, रेड सिंधी, गिर, राठी, मुर्रा भैंस वगैरह शामिल हों, 6 लाख रुपए तक का लोन लिया जा सकता?है.

पशु चिकित्सा :  आप ने पशु चिकित्सा से संबंधित पढ़ाई की है और दवाओं की अच्छी जानकारी है तो पशु क्लीनिक लगा सकते?हैं. इस के लिए 2 लाख, 60 हजार रुपए तक लोन सरकार द्वारा दिया जाता है.

जैविक खाद :  जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए डेरी फार्म वाले 22 हजार रुपए तक की सहायता ले कर वर्मी कंपोस्ट यूनिट खोल सकते?हैं.

दूध निकालने की मशीन : दूध निकालने की मशीन, दूध का फैट निकालने की मशीन व शीत इकाई की मशीनों के लिए 26 लाख, 50 हजार रुपए तक का लोन लिया जा सकता है.

इन के अलावा केंद्र सरकार व राज्य सरकार की अनेक योजनाएं हैं, जिन के बारे में आप अधिक जानकारी ले सकते?हैं.

कैसे और कहां मिलेगी जानकारी : इस तरह की सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए आप अपने जिले के नाबार्ड बैंक से संपर्क करें और अपने जरूरी कागजात ले कर बैंक अधिकारी से मिलें.

डेरी खोलने की जानकारी के लिए आप एनडीआरआई करनाल से संपर्क कर सकते?हैं. आप उन की वेबसाइट 222.ठ्ठस्रह्म्द्ब.ह्म्द्गह्य.द्बठ्ठ से या मोबाइल नंबर 7697487710 पर जानकारी ले सकते?हैं.

दूध दुहने में सावधानी

* अगर पशु के पहले ब्यांत से ही मशीन से दूध निकालेंगे तो पशु को मशीन से दूध निकलवाने की आदत हो जाएगी.

* शुरुआत में मशीन द्वारा दूध दुहते समय पशु को पुचकारते हुए उस के शरीर पर हाथ घुमाते रहना चाहिए, ताकि वह अपनापन महसूस करे.

* दूध दुहने वाली मशीन को पशुओं के आसपास ही रखना चाहिए ताकि वे उसे देख कर उस के आदी हो जाएं, वरना वे अचानक मशीन देख कर घबरा सकते हैं या उस की आवाज से बिदक सकते हैं.

डेरी इंडस्ट्री में स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल

भारत में सब से ज्यादा (1463.3 मिलियन?टन) दूध का उत्पादन हर दिन होता है, लेकिन जब स्वास्थ्य की बात आती है, तो इस क्षेत्र के लिए कुछ खास दिशानिर्देश बनाने की जरूरत महसूस होती है. असंगठित क्षेत्र का फोकस लोगों के स्वास्थ्य पर न हो कर सिर्फ व्यावसायिक पहलू या मुनाफा कमाने से जुड़ा है, जिस के चलते दूध की प्रोसेसिंग और स्टोरेज के लिए इस में कई बार अवांछित पदार्थों को मिलाया जाता है. कई रिसर्च रिपोर्ट में यह जोर दे कर बताया गया है कि डेरी इंडस्ट्री में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों के इस्तेमाल से आम जनता के स्वास्थ्य पर काफी बुरा असर पड़ा है. इस से मिलावट की आदत भी जोर पकड़ती है. डेरी सैक्टर में अनेक रूपों में इस्तेमाल के लिए स्टेनलेस स्टील वैकल्पिक पदार्थ बन कर उभरा है. भारत में हर साल तकरीबन 8 से 10 हजार मीट्रिक टन स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल सामान के भंडारण, उस की प्रोसेसिंग और सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए होता?है.

आईएसएसडीए के अध्यक्ष केके पाहूजा ने कहा, ‘रिसर्च से यह पता चलता?है कि दूसरे पदार्थों की तुलना में दूध की प्रोसेसिंग और स्टोरेज के लिए स्टेनलस स्टील सब से स्वास्थ्यवर्धक और जैविक रूप से सब से सही पदार्थ है. गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा मानकों पर बढ़ते ध्यान के चलते ही स्टेनलेस स्टील के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई है.’

स्टेनलेस स्टील के बर्तनों में न तो जंग लगता है, न ही जल्दी वे किसी जगह से कटते या खराब होते?हैं. स्टेनलेस स्टील के बर्तनों की इसी जंगरोधक विशेषता को डेरी इंडस्ट्री ने पूरी खाद्य सुरक्षा और जनसामान्य के बेहतर स्वास्थ्य के लिए पहचाना है.

जिंदल स्टेनलेस (हिसार) लिमिटेड के निदेशक अशोक गुप्ता ने कहा, ‘हम इस क्षेत्र में गुणवत्ता मानक ठीक करने के नियंत्रकों की कोशिश की सराहना करते हैं. स्टेनलेस स्टील के दूध के डब्बों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के दिशानिर्देश का भी हम स्वागत करते हैं. इन प्रयासों से डेरी सेक्टर का ढांचा बदलेगा. जिंदल स्टेनलेस में हम ने कम लागत के?स्टील के दूध के डब्बे बनाए हैं, जिन की न केवल क्वालिटी बेहतर है, बल्कि लागत भी बेहद कम है, क्योंकि इस में वैकल्पिक स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल किया गया है. यह दूध के डब्बों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो के तय किए गए मानकों पर खरा उतरता?है.’

इंडियन डेरी एसोसिएशन

यह देश में डेरी इंडस्ट्री की शीर्ष संस्था?है. इस की स्थापना 1948 में डेरी क्षेत्र और सहायक एग्रो फीड बिजनेस में पेशेवर वैज्ञानिकों, किसानों और उपकरण निर्माताओं का ऐसा फोरम बनाने के मकसद से की गई थी. यह डेरी क्षेत्र में अपने शोध, योजना, उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के माध्यम से इस क्षेत्र के दिग्गजों के सामने अपने व्यवसाय और कारोबार को बढ़ाने के लिए नएनए अवसर सामने लाती है.

पेठा कद्दू की उन्नत खेती

अगर मिठाइयों के शौकीन हैं, तो आप ने जरूर आगरे के पेठे का नाम सुन रखा होगा और अगर आप को आगरा जाने का मौका मिला है, तो इसे चखने का मौका भी मिला होगा. आगरे का पेठा न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में मशहूर है. इसलिए इस की मांग भारत के दूसरे प्रदेशों के अलावा दुनिया के तमाम देशों में बनी हुई है. यह मिठाई कई स्वादों और खुशबुओं में मिलती है. अंगूरी पेठा, नारियल पेठा, सूखा पेठा व काजू पेठा वगैरह इस की कुछ खास किस्में हैं.पेठा कद्दू वर्गीय प्रजाति के फल से बनाया जाता है, इसलिए इस फल का नाम पेठा कद्दू कहलाता है. यह हलके रंग का होता है और लंबे व गोल आकार में पाया जाता है. इस का इस्तेमाल ज्यादातर पेठा बनाने में किया जाता है. इस फल के ऊपर हलके सफेद रंग की पाउडर जैसी परत चढ़ी होती है.

इस की कुछ प्रजातियां 1-2 मीटर लंबे फल भी देती हैं. पेठा कद्दू की मांग सब्जियों के लिए बहुत कम होती है, लेकिन पेठा बनाने के लिए जितनी मांग है, उतना उत्पादन आज नहीं हो पा रहा है. कद्दू पेठे की खेती सब से ज्यादा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में की जाती है. इस के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित पूरे भारत में इस की खेती की जाती है. कद्दू की इस प्रजाति को अलगअलग जगहों में अलगअलग नामों से जाना जाता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे भतुआ कोहड़ा, भूरा कद्दू, कुष्मान या कुष्मांड फल के नाम से भी जाना जाता है. यह पकने के बाद एकदम सफेद हो जाता है. इस प्रजाति के कुछ फल पकने के बाद पीलापन लिए हुए भी होते हैं. चूंकि पेठा कद्दू की मांग पेठा मिठाई बनाने के लिए है, ऐसे में इस की खेती किसानों के लिए माली आमदनी का अच्छा जरीया बन सकती है. कद्दू की इस प्रजाति की मार्केटिंग में किसानों को किसी तरह की परेशानी से नहीं जूझना पड़ता है, क्योंकि पेठा मिठाई के कारोबारी इस की तैयार फसल को खेतों से ही खरीद लेते हैं. इस की खेती सर्दी व गरमी दोनों ही मौसमों में की जाती है, लेकिन अधिक पैदावार के लिए यह कोशिश करनी चाहिए कि फसलों पर पाले का असर न होने पाए.

मिट्टी व खेत की तैयारी : पेठा कद्दू की खेती के लिए दोमट व बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी गई है. इस के अलावा यह कम अम्लीय मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है. जीवांशयुक्त मिट्टी इस की खेती के लिए सब से अच्छी होती है. इस की बोआई से पहले खेतों की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए और 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई कर के पाटा लगाना चाहिए. बोआई से पहले 1 हेक्टेयर खेत में करीब 40-50 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद, 20 किलोग्राम नीम की खली और 30 किलोग्राम अरंडी की खली अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए. इन सभी चीजों को मिट्टी में मिलाने के लिए पहले पाटा लगाए गए खेत में इन का बुरकाव कर दें. उस के बाद जुताई कर के दोबारा पाटा लगा दें.

खाद व उर्वरक : कद्दू पेठे की बोआई के समय 1 हेक्टेयर खेत के लिए 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय ही खेत में मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन की बाकी मात्रा का आधा भाग फसल में 3-4 पत्तियां आने के दौरान व बाकी आधा भाग फूल आने के दौरान फसल में इस्तेमाल करना चाहिए. कद्दू पेठे की जायद मौसम की फसल के लिए हर 15 दिनों पर सिंचाई की जरूरत पड़ती है, लेकिन खरीफ की फसल के लिए बारिश होने पर सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है, गरमी में ली जाने वाली फसल में हर 8-10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए. फसल की अच्छी बढ़वार व अच्छे उत्पादन के लिए फसल को खरपतवार से बचाए रखना चाहिए. कीट व बीमारियां : पेठा कद्दू की फसल में फल की मक्खी का सब से ज्यादा प्रकोप देखा जाता है. यह मक्खी फल के अंदर घुस कर अंडे देती है और अंडों से निकलने वाली सूंडि़यां फल को अंदर से खा कर उसे बेकार कर देती हैं. रोकथाम के लिए कार्बेनिल 10 फीसदी धूल का छिड़काव फसल में कीट का प्रकोप दिखने के समय ही कर देना चाहिए. इस के अलावा पेठा कद्दू में जिन कीटों का प्रकोप देखा गया है, उन में सफेद ग्रब व लालरी खास हैं. लालरी कीट का प्रकोप पौधों में पत्तियां व फूल आने के समय देखा गया है. यह कीट पत्तियों व फूलों के साथ जमीन के अंदर पौधों की जड़ों को काट कर नष्ट कर देता है. वहीं सफेद ग्रब कीट भी जमीन के अंदर पौधों की जड़ों को काट कर नष्ट कर देता है, जिस से फसल सूख जाती है. इस की रोकथाम के लिए क्लोरोपायरीफास 20 ईसी या प्रोफेनोफास 50 ईसी का छिड़काव करना चाहिए.

पेठा कद्दू में जिन रोगों का प्रकोप देखा गया है, उन में चूर्णी फफूंदी, मृदुरोमिल फफूंद, मोजैक, एंथ्रेक्नोज नाम की बीमारियां खास हैं. चूर्णी फफूंदी व मृदुरोमिल फफूंदी की वजह से पत्तियों व तनों पर सफेद व गोलाकार जलने जैसे निशान बन जाते हैं, जिन की वजह से पत्तियां कत्थई हो जाती हैं और पीली पड़ कर सूख जाती हैं. मोजैक बीमारी की वजह एक विषाणु है, जिस से पत्तियां मुड़ जाती हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है, इस की वजह से पौधों में लगने वाले फल का आकार एकदम छोटा हो जाता है. एंथ्रेक्नोज बीमारी की वजह से पत्तियों और फलों पर लाल व काले धब्बे पड़ जाते हैं. ऐसा बीजों के उपचारित न किए जाने की वजह से होता है. इस बीमारी से बचने के लिए थायरम या कैप्टान से बीजों को शोधित करना चाहिए. वहीं मोजैक व फफूंदी वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए कार्बंडाजिम, मैंकोजेब, थीरम, मेटालेक्जिल, डीनोकेप दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए.

फलों की तोड़ाई व लाभ : पेठा कद्दू की फसल बोआई के लगभग 3-4 महीने बाद तोड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. फलों की तोड़ाई से पहले यह देखना चाहिए कि फलों पर सफेद रंग के चूर्ण की परत चढ़ चुकी हो. वैसे फलों की तोड़ाई से पहले पेठा कारोबारियों से बात कर लेना ज्यादा सही होता है, क्योंकि वे तैयार फसल को खेतों से ही खरीद लेते हैं. फलों की तोड़ाई किसी तेज धारदार चाकू से करनी चाहिए. 1 हेक्टेयर खेत से तकरीबन 250-300 क्विंटल की उपज प्राप्त होती है, जिस का थोक बाजार मूल्य 800-1000 रुपए प्रति क्विंटल तक प्राप्त हो सकता है. 1 हेक्टेयर खेत में जुताई, बीज, उर्वरक व सिंचाई को  ले कर तकरीबन 35000 रुपए की लागत आती है. ऐसे में अच्छा उत्पादन होने की दशा में किसान लागत को छोड़ कर करीब 2 लाख रुपए की आमदनी पा सकता है. इस तरह कम समय, कम लागत व कम देखभाल के साथसाथ कम जोखिम उठा कर किसानों को पेठे की खेती से अच्छी आमदनी हो सकती है. अगर किसान पेठे की तैयार फसल से पेठा मिठाई बनाने की जानकारी हासिल कर के अच्छी क्वालिटी का पेठा बना कर सीधे उसे बाजार में बेचें, तो यह मुनाफा कई गुना तक बढ़ सकता है.                           

पेठा कद्दू की उन्नत प्रजातियां

पेठा कद्दू की खेती के लिए तमाम उन्नत प्रजातियां मौजूद हैं, जो न केवल ज्यादा उत्पादन देने वाली हैं, बल्कि उन पर कीटबीमारियों व विपरीत मौसम का असर भी कम होता है. इस की उन्नतशील प्रजातियों में पूसा हाइब्रिड 1, कासी हरित कद्दू, पूसा विश्वास, पूसा विकास, सीएस 14, सीओ 1 व 2, हरका चंदन, नरेंद्र अमृत, अरका सूर्यमुखी, कल्यानपुर पंपकिंग 1, अंबली, पैटी पान, येलो स्टेटनेप, गोल्डेन कस्टर्ड वगैरह खास हैं. इस की बोआई का सही समय सितंबर से अक्तूबर, फरवरी से मार्च व जून से जुलाई में होता है. इस के अलावा पहाड़ी इलाकों में इस की बोआई मार्च से अप्रैल महीने के बीच की जाती है, जबकि नदियों के किनारों पर यह नवंबर से दिसंबर के बीच बोया जाता है. 1 हेक्टेयर खेत के लिए 7-8 किलोग्राम बीजों की जरूरत पड़ती है.

फसलों में एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन

फसलों में रोगों व कीटों की रोकथाम के लिए बेतहाशा रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल बढ़ गया है, जिस से पर्यावरण तो प्रदूषित हो ही रहा है, सेहत पर भी गलत असर पड़ रहा है. कीटों और रोगकारकों ने तमाम प्रचलित रासायनिक दवाओं के प्रति अपने अंदर प्रतिरोधकता पैदा कर ली है, लिहाजा दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं. इसीलिए खेती अब घाटे का काम साबित हो रही है. ऐसे में हानिकारक कीटों और बीमारियों की रोकथाम के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई तरकीब निकाली है, जिसे एकीकृत नाशी जीव प्रबंधन कहते हैं. इस में कीटों व बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए एक से ज्यादा तरीकों को अपनाया जाता है.

इस तरकीब में कीटों, रोगों और खरपतवारों आदि के खात्मे के बजाय उन के प्रबंधन की बात की जाती है. वास्तव में इस प्रक्रिया में किसी जीव को हमेशाहमेशा के

लिए खत्म करना नहीं होता, बल्कि ऐसे उपाय करने होते हैं, ताकि फसल को नुकसान न पहुंच सके.

गन्ने के पाइरिला कीट और चने के फली छेदक कीट पर एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन से पूरा काबू पाया गया है. चने की फसल में कीटों और रोगों से 10 से 30 फीसदी तक का नुकसान देखा गया है, खासतौर पर चने का फली छेदक कीट तो सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला कीट है. इसलिए एकीकृत नाशीजीव जीव प्रबंधन को झटपट अपनाएं और लाभ पाएं.

क्या है एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन?

इस के तहत केवल एक ही तरीके (रासायनिक दवाओं) को अपनाने के बजाय सभी मौजूद साधनों का एकसाथ इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस में शस्य क्रियाएं, अवरोधी किस्मों के इस्तेमाल, यांत्रिक क्रियाएं, तकनीकी क्रियाएं व जैविक साधनों के साथसाथ जरूरत पड़ने पर रसायनों का इस्तेमाल करना चाहिए. इस विधि का प्रबंधन निम्न तरीकों से कर सकते हैं:

शास्य क्रियाएं

(फसल संबंधी काम)

* स्वस्थ और प्रमाणित बीज का इस्तेमाल होना चाहिए.

* चने के रोगों में उकठा, जड़ सड़न व रतुआ खास हैं. अनेक खास फफूंदजनित रोगों से बचाव के लिए बीज शोधन जरूर करें. इस के लिए थीरम, कैप्टान, कार्बंडाजिम को 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करें. इस के अलावा 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करें. खेत के उपचार के लिए 2 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 50 से 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर बोआई के 30 दिनों के अंदर 1 एकड़ खेत में छिड़काव करना चाहिए. ट्राइकोडर्मा मिट्टी और बीजों पर फफूंदी की बढ़वार को रोकता है, साथ ही साथ बीजों के जमाव व अंकुरण को बढ़ाता है.

* लाइन से लाइन व पौधे से पौधे के बीच में सही दूरी रखें. असिंचित दशा में 30 सेंटीमीटर और सिंचित दशा में 45 सेंटीमीटर कूड़ से कूड़ की दूरी रखें.

* पानी और खाद की सही मात्रा का इस्तेमाल करें.

* यदि उत्तर भारत में चने की अगेती बोआई 15-30 अक्तूबर तक कर दी जाए, तो फसल का सूंडि़यों के हमले से काफी हद तक बचाव हो जाता है.

* उकठा होने पर 3 से 4 साल बाद उस खेत में चने की खेती करें.

* गरमी के मौसम में खेत की गहरी जुताई जरूर होनी चाहिए. इस से जमीन में छिपे हानिकारक कीटों की विभिन्न अवस्थाएं ऊपर आ कर तेज धूप से खत्म हो जाती?हैं और पक्षियों द्वारा अनेक जिंदा और मरे कीट उन का भोजन बन कर खत्म हो जाते?हैं.

* रोगों से बचने के लिए रोग अवरोधी प्रजातियां बोनी चाहिए.

यांत्रिक रोकथाम

* फसलों की बराबर देखभाल करते रहें ताकि कीटों और रोगों वगैरह के बारे में जानकारी हो सके.

* औसतन 5 पौधों पर 1 शिशु कीट फूलफली बनने की अवस्था में दिखे, तो तुरंत रोकथाम के उपाय करने चाहिए. इस के लिए प्रकाश और फेरोमैन ट्रैप का इस्तेमाल कर के कीड़ों को खत्म करें.

* यदि दीमक का हमला हो तो खूब अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद का इस्तेमाल करना चाहिए.

जैविक रोकथाम

* फली छेदक कीट से बचाव के

लिए न्यूक्लियर पाली हेड्रोसिस वायरस (एनपीवी) की 100 सूडि़यों का रस 200 से 300 लीटर पानी में मिला कर 15 से 20 दिनों के अंतर में 2-3 बार प्रति एकड़ की दर से इस्तेमाल करें (जब खेत में सूडि़यों की संख्या अधिक हो).

* एनपीवी का छिड़काव सूरज के डूबने के समय ही करें और घोल तभी बनाएं जब छिड़काव करना हो. घोल को अच्छी तरह से हिला कर स्प्रे पंप में डालें और छिड़काव

इस तरह करें कि घोल पत्तियों पर अच्छी तरह पड़ जाए.

रासायनिक रोकथाम

रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल तभी करना चाहिए, जब नुकसानदायक कीटों से नुकसान ज्यादा होने लगे. इस के लिए निम्न में से कोई एक रसायन का इस्तेमाल करना चाहिए:

* क्यूनालफास 25 ईसी का 1.25-2 लीटर प्रति हेक्टेयर.

* मोनोक्रोटोफास 36 ईसी का 750 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर.

* कार्बोरिल 10 फीसदी धूल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर.

* मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी घूल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर.

* इसी तरह नीम से तैयार कीटनाशक जैसे निंबोसिडीन, नीमार्क या नीमगार्ड वगैरह के 5 फीसदी घोल से छिड़काव करने पर भी अच्छा असर देखा गया है.

* अच्छे और प्रभावी असर के लिए ध्यान रहे कि किसी भी कीटनाशी का इस्तेमाल 2 बार नहीं होना चाहिए.

* फफूंद जनित रोगों जैसे अंगमार, रतुआ या दूसरे किसी रोग के बढ़ने पर बचाव के लिए जिंक मैग्नीज कार्बामेंट 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कार्बेंडाजिम 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर या जीरम 80 फीसदी 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करना चाहिए.

कीट संसार की सब से बड़ी परेशानी हैं

राजधानी दिल्ली की रहने वाली प्रिया सक्सेना ने शादी के बाद अपनी पढ़ाई पूरी की. समाज और प्रकृति की सुरक्षा का जज्बा उन में बचपन से ही था. वे कैंसर और न्यूरो के मरीजों की सेवा का काम करती थीं. इस दौरान डाक्टरों के साथ होने वाली बातचीत से उन को पता चला कि कीटाणु केवल खेतीकिसानी को ही नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि घर में भी मौजूद रह कर इनसानों को भी बीमार बनाने का काम करते?हैं.

दिल्ली से लखनऊ आने के बाद जब उन्होंने मलीहाबाद में आम के बागबानों को आम के पेड़ों पर दवा का छिड़काव करते देखा, तो उन की परेशानियों को महसूस किया. दवा का छिड़काव करने वालों ने उन्हें बताया कि कीटनाशकों का छिड़काव करने के बाद उन की खाल खराब हो जाती?है, आंख में दर्द होने लगता है और सांस लेने में भी परेशानी होती है.

इस दर्द को महसूस कर के प्रिया ने अमन उजाला नाम से अपनी कंपनी खोली. इस के बाद नौन टोक्सिस, नौन पौइजन और नौन एल्कोहलिक कीटनाशक बनाने का फैसला किया, जो पूरी तरह से हर्बल उत्पादों से तैयार हों और पूरी तरह से कारगर भी हों. तैयार होने वाले फल और सब्जियां भी खतरनाक और जहरीले रसायनों से दूर रह सकें.

अमन उजाला ने तकरीबन सभी क्षेत्रों जैसे घरेलू, औद्योगिक, खेती के कामों और पशुपक्षियों के लिए कीटनाशकों को तैयार किया. ये सभी लोगों के लिए पूरी तरह से उपयोगी हैं. प्रिया सक्सेना अब इन उत्पादों को ले कर उपभोक्ताओं को जागरूक कर रही हैं. प्रिया से बात कर के पता चला कि देश में ही नहीं, पूरे विश्व में कीट और कीटनाशक एक?बड़ी परेशानी बन चुके?हैं. पेश हैं उन से की गई बातचीत के खास अंश:

हर्बल कीटनाशक क्या रासायनिक कीटनाशकों की तरह ही कारगर होते हैं?

हर्बल कीटनाशक जिन चीजों को मिला कर तैयार होते हैं, वे पूरी तरह से प्राकृतिक होती हैं. ये सौ फीसदी कारगर हैं. सब से अच्छी बात यह है कि ये केवल कीटों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन का कोई गलत असर न छिड़कने वाले पर पड़ता?है और न ही फलसब्जी या दूसरे उत्पाद इस से खराब होते?हैं. रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से फलसब्जी खराब हो जाते?हैं.

हमारा एक प्रोडक्ट ‘मिली सैक’ है. यह कम खर्च में ज्यादा फसल का वादा करता है. यह बाग और खेत दोनों में असरदार होता है. यह भी सौ फीसदी प्राकृतिक और सुरक्षित है. इसी तरह घरेलू खतरनाक कीटों से बचाव के लिए ‘पैनाडौर’ है. यह मच्छरों को भी दूर भगाता है.

कीटों की परेशानी कितनी बड़ी होती है?

कीटों की परेशानी एक देश की ही नहीं, पूरी दुनिया की है. कीटों से निबटने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं, उन में आने वाला खर्च अच्छाखासा होता है. कीटों में दीमक, कीटपतंगे व गुबरैले वगैरह स्वास्थ्य सेवाओं को बुरी तरह से तहसनहस कर रहे हैं. यह नुकसान विश्व स्तर पर करीब 77 अरब डालर का है. शोध बताते हैं कि वर्तमान समय में 25 लाख कीट प्रजातियां पूरे विश्व में फैली हुई हैं. कीट प्रजातियों में तेजी से इजाफा होता जा रहा है. ये कीट घर, खेतखलिहान, उद्योग और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं. सब से बड़ी परेशानी किसानों के सामने है. इन कीटों से फसलों को ज्यादा नुकसान हो रहा?है. दीमक के कारण इन्फ्रासट्रक्चर को नुकसान हो रहा?है. डेंगू, चिकनगुनिया और जीका वायरस सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं. इन के इलाज पर पूरे विश्व में बहुत ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है. ऐसे में इन से बचाव जरूरी है.

 सब से ज्यादा हानिकारक कीट कौनकौन से हैं?

वैज्ञानिकों ने सिर्फ 10 सब से ज्यादा नुकसान करने वाले कीटों पर अध्ययन किया है. जो आंकड़े मिलते हैं, उन में सब से ज्यादा नुकसान दीमक से हो रहा है. इस से करीब 31 अरब डालर का नुकसान होता है. इस के बाद गुबरैले का नंबर आता है. इसे ब्राउन स्प्रूस लौगहार्न बीटल कहा जाता है. यह 4.48 अरब डालर का नुकसान करता है. तीसरे नंबर पर गोभी कीट 4.6 अरब डालर का नुकसान करता है. केवल विकासशील और गरीब देश ही नहीं उत्तरी अमेरिका जैसे देशों में भी कीट अरबों डालर का नुकसान पहुंचाते हैं.

 सेहत और खेती पर इन के प्रभाव को किस तरह से देखा जाए?

ये कीट सेहत और खेती दोनों को बराबर नुकसान पहुंचाते हैं. करीब 100 करोड़ लोगों की भूख मिटाने के लिए विश्व स्तर पर जितने खाद्यान्न की जरूरत होती है, उतना ही कीट चट कर जाते हैं. 6.85 अरब डालर कीटों से होने वाली बीमारियों पर खर्च हो जाते?हैं. सब से खास बात यह है कि इस मद पर सब से ज्यादा खर्च एशियाई देशों में होता है. इस का कारण यह है कि यहां कीटों से बचाव के मामले में समय पर ध्यान नहीं दिया जाता और अच्छी योजना नहीं बनती है. बीमारियों की रोकथाम के लिए एशियाई देशों में सब से ज्यादा खर्च होता है. यहां पर 2.86 अरब डालर खर्च होते हैं. यहां के मुकाबले उत्तरी अमेरिका में 2.7 और मध्य और दक्षिण अमेरिका में 1.86 अरब डालर खर्च होते हैं. हाल के कुछ सालों में डेंगू सब से खतरनाक रोग बनता जा रहा है. सब से ज्यादा खर्च इस के बचाव पर होने वाला है.

 क्या हर्बल कीटनाशकों का प्रयोग कारगर होगा?

रासायनिक कीटनाशक 2 तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. एक तो वे फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, दूसरे इनसान को बीमार बनाते हैं, जिस से निबटने के लिए सालोंसाल दवाओं का सहारा लेना पड़ता है. हर्बल कीटनाशक सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. ऐसे में ये हर तरह से कारगर होते हैं. ज्यादा जानकारी के लिए किसान अमन उजाला के नंबरों 8090011250 और 8090011248 पर संपर्क कर सकते हैं.

-प्रिया सक्सेना, सीईओ, अमन उजाला

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