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तापसी पन्नू को बॉलीवुड में खलती है यह कमी

मूलतः पंजाबी तापसी पन्नू ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत दक्षिण भारत की फिल्मों से की. उन्हे दक्षिण में स्टार कलाकार माना जाता है. सिनेमा के बदलते रूप के साथ ही अब तापसी पन्नू ने तेलगू फिल्मों में नकारात्मक किरदार निभाने शुरू कर दिए हैं. तो दूसरी तरफ फिल्म ‘‘पिंक’’ की सफलता के साथ ही अब वह हिंदी फिल्मों में भी चर्चा का केंद्र बन गयी हैं. चर्चाएं हो रही हैं कि तापसी पन्नू अब ‘पिंक’ के तेलगू रीमेक में भी अभिनय कर रही हैं. मगर खुद तापसी इस बात से इंकार करती हैं.

फिल्म ‘‘पिंक’’ में अभिनय करने के बाद आप देश की लड़कियों से क्या कहना चाहेंगी?

– मैं हर लड़की को क्राव मागा जैसे मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेने की सलाह दूंगी. क्राव मागा सीख चुकी लड़की पुरुषों की तरह शारीरिक रूप से सशक्त न होने पर भी पुरुषों से अपने आपको बचा सकती है. क्योंकि क्राव मागा में कुछ तकनीक ऐसी है कि सामने वाला पुरुष चाहे जिस कद का हो और चाहे जितना स्ट्रांग हो, उसे परास्त किया जाना आसान है.

दक्षिण भारत खासकर तेलगू सिनेमा करने के अनुभव क्या रहे?

– बहुत अच्छे. मैंने बहुत इज्जत पायी. तेलगू सिनेमा आपको खत्म नहीं करता. वह आपको बिगाड़ते भी हैं. वह आपके साथ रानी जैसा व्यवहार करते हैं. आप जैसे ही अपनी वैनिटी वैन से बाहर निकलते हैं, वह खड़े हो जाते हैं और जब तक आप वहां से चले नहीं जाते, वह बैठते नहीं है. वह आपको बहुत सम्मान देते हैं. वहां जो अपनापन मिलता है, उसकी कमी मुझे बॉलीवुड में खलती है.

सुना है आप ‘पिंक’ के तेलगू भाषा की रीमेक भी करने जा रही हैं?

– मुझे तो इस बात की जानकारी नहीं है कि यह फिल्म तेलगू में रीमेक हो रही है. मगर ऐसा हुआ और मुझे आफर मिला, तो यह फिल्म करने में मुझे खुशी होगी.

किस कलाकार के साथ काम करने की तमन्ना है?

– रितिक रोशन व आमिर खान के साथ काम करना चाहती हूं. लेकिन मुझमें इतना साहस नही है कि मैं किसी निर्देशक से जाकर कहूं कि मुझे रितिक रोशन के साथ काम करना है. मैं मणि रत्नम के निर्देशन में भी अभिनय करना चाहती हूं.

सरकारी लाभ के लिये पिछड़े बन रहे दलित

एक ओर दलितों को समाज बराबरी का अधिकार नहीं दे रहा, तो दूसरी ओर पिछड़ी जातियां दलित बनने के लिये लामबंदी कर रही हैं. 2003 की मुलायम सरकार से लेकर 2012 की अखिलेश सरकार तक यह प्रयास जारी है. 2017 के विधानसभा चुनाव के पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की कैबिनेट ने 17 पिछड़ी जातियों को दलित जाति का दर्जा दे दिया है. समाजवादी पार्टी के इस कदम को बहुजन समाज पार्टी सही नहीं मान रही.

बसपा नेता मायावती ने कहा ‘सपा इन जातियों को गुमराह करने की कोशिश कर रही है. 2005 में सपा ने यही काम इन जातियों के साथ किया था. जिससे यह जातियां न पिछडी रह पाई न दलित बन पाई. इनको मिलने वाला आरक्षण तक छिन गया था. तब बसपा सरकार ने इनका आरक्षण बहाल कराया था और दलितों का कोटा बढ़ाने के सुझाव के साथ केन्द्र को मसला भेजा था. दलित पर दर्जा देने का मसला केन्द्र के पास लंबित है.’

दलित बनने के पीछे का राज आरक्षण और सरकारी सुविधाओं से जुड़ा है. सरकारी लाभ के लिये पिछड़े वर्ग की 17 जातियां दलित बनना चाहती हैं. जिससे उनको भी दलितों की तरह आरक्षण का लाभ मिल सके. इन जातियों में कहार, कश्यप, राजभर, भर, बाथम, तुरहा, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिन्द, तुरहा, गोंड, माझी, और मछुआ शामिल हैं. समाजिक रूप से यह जातियां दलितों से अपने को अलग मानती हैं. इनके बीच किसी भी तरह का रोटी बेटी का संबंध नहीं है. एक साथ बैठ कर खाना भी नहीं खाते. यह बात अलग है कि आरक्षण की मलाई खाने के लिये यह दलित बनने के लिये प्रयासरत हैं.

उत्तर प्रदेश राज्य पिछडा जाति आयोग के अध्यक्ष राम आसे विश्वकर्मा मानते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले से इन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा. जबकि सच्चाई यह है कि राज्य सरकार के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में इन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा. राष्ट्रीय स्तर पर यह लाभ तभी मिल सकेगा, जब केन्द्र सरकार इस को मंजूर करेगी.

ऊपर से दिखने वाला जाति का बदलाव केवल सरकारी सुविधाओं के लिये है. केन्द्र सरकार आरक्षण के मौजूदा प्रतिशत को बढ़ाने में सक्षम नहीं है. ऐसे में दलित जातियों को यह लगता है कि नई जातियों के दलित वर्ग में शामिल होने से उनका हक मारा जायेगा, क्योंकि आरक्षण में दलितों का कोटा नहीं बढ़ा है. ऐसे में यह कदम चुनावी कदम है.

सपा इसको लागू कर यह दिखाना चाहती है कि वह पिछड़ों को दलित का दर्जा देकर सरकारी लाभ दिलाने का काम कर रही है. बसपा इसका विरोध कर दलितों को यह जताना चाहती है कि वह दलित हितों के लिये तत्पर है. बसपा की मांग है कि किसी भी नई जाति को दलित कोटे में तब ही शामिल किया जाये जब आरक्षण का कोटा बढ़ाया जाये.

आईओए और खेल मंत्रालय ने नौकरों जैसा बर्ताव किया: चौरसिया

शीर्ष भारतीय गोल्फर एसएसपी चौरसिया ने भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) और खेल मंत्रालय पर गंभीर आरोप लगाए हैं. चौरसिया ने रियो ओलिंपिक की तैयारियों के लिए आवंटित की गई पूरी राशि अभी तक नहीं मिलने के लिए आईओसी और खेल मंत्रालय को लताड़ा.

चौरसिया ने यहां तक कहा कि रियो ओलंपिक में खिलाड़ियों के साथ नौकरों वाला बर्ताव किया गया. इसके अलावा वादे के मुताबिक ओलंपिक की तैयारी में लगाए गए 30 लाख रुपये का भी भुगतान नहीं किया गया.

चौरसिया और उनके साथी भारतीय खिलाड़ी अनिरबान लाहिरी, दोनों को अब तक खेल मंत्रालय द्वारा मंजूर की गई वो राशि नहीं मिली है. जहां चौरसिया को अब तक सिर्फ 5.5 लाख रुपये दिए गए हैं वहीं, दुनिया भर में 16 खिताब जीत चुके लाहिरी को अब तक एक रुपया नहीं मिला है.

चौरसिया ने कहा, 'मेरे पास वो पत्र मौजूद है जिसमें उन्होंने 30 लाख रुपये चुकाने का वादा किया था लेकिन रियो ओलंपिक के बाद हमसे कहा गया कि इस रकम को घटाकर 15 लाख कर दिया गया है.'

रियो ओलंपिक के बारे में अपनी बात रखते हुए चौरसिया ने कहा, 'वाहनों से लेकर किसी भी चीज में सही व्यवस्था नहीं की गई थी. वहां बहुत ठंड थी और बारिश भी हो रही थी लेकिन इन लोगों ने छाते या रेनकोट का इंतजाम भी नहीं किया था. वो ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे वे मालिक हैं और हम नौकर.'

आईओए और खेल मंत्रालय के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हुए चौरसिया ने आगे कहा, 'एयरपोर्ट पर वाहन के लिए हमको चार घंटों तक इंतजार कराया गया जबकि लाहिरी को अपना इंतजाम करके ही आना पड़ा. हमे बहुत खराब लग रहा था. अब ओलंपिक में हिस्सा लेने से पहले हमे दो बार सोचना होगा. हम इस चीज में और पड़ना नहीं चाहते क्योंकि हम आगे के कड़े लक्ष्य के लिए तैयारियों में व्यस्त रहना चाहते हैं.'

चौरसिया ने कहा कि कुछ दिन पहले उम्मीद की एक किरण जरूर नजर आई जब मंत्रालय ने एक ई-मेल किया जिसमें दोबारा सभी जानकारियां मांगी गईं.

आईसीसी अवॉर्ड: अश्विन बनें क्रिकेटर ऑफ द ईयर

आईसीसी द्वारा जारी साल 2016 के अवार्ड्स में टीम इंडिया के स्टार स्पिनर आर अश्विन को साल का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर और सर्वश्रेष्ठ टेस्ट क्रिकेटर चुना गया है.

आईसीसी क्रिकेटर ऑफ द ईयर और टेस्ट क्रिकेटर ऑफ द ईयर 2016 अवॉर्ड के लिए चुने गए भारतीय ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने खुशी जताते हुए कहा है कि ‘उनके लिए सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गज क्रिकेटरों की तरह यह सम्मान पाना गर्व की बात है. इसके अलावा टेस्ट क्रिकेटर ऑफ द ईयर बनना और भी खास उपलब्धि है.’

अश्विन साल के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर बनने वाले तीसरे भारतीय खिलाड़ी हैं. अश्विन से पहले यह सम्मान पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ (2004) और सचिन तेंदुलकर (2010) को मिला था.

वह सर्वश्रेष्ठ टेस्ट क्रिकेटर भी चुने गये हैं और इसी के साथ द्रविड़ के बाद मात्र दूसरे भारतीय क्रिकेटर बन गए हैं जिन्हें एक ही साल में वैश्विक संस्था ने दोनों पुरस्कारों के लिए चुना है. साल 2004 में पूर्व कप्तान द्रविड़ को आईसीसी ने साल के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर और सर्वश्रेष्ठ टेस्ट क्रिकेटर के रूप में चुना था.

भारतीय क्रिकेटर अश्विन ने कहा, 'इस सफलता के लिए मैं बहुत सारे लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं. मेरे लिए पिछले कुछ साल अहम रहे हैं लेकिन यह साल और भी खास हो गया है. मैंने इस साल जिस तरह से गेंदबाजी और बल्लेबाजी की वह मेरे लिए खेल का सबसे उल्लेखनीय सुधार रहा है. लेकिन इस सफलता के पीछे बहुत सारे लोगों की मेहनत है.'

उन्होंने कहा, 'मैं अपने परिवार को यह ट्रॉफी समर्पित करना चाहता हूं. साथ ही आईसीसी और टीम के साथियों को इस सफलता के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं. मेरे सपोर्ट स्टाफ ने भी बहुत मदद की है. महेंद्र सिंह धौनी के टेस्ट से संन्यास के बाद टीम में कई बदलाव आये. एक युवा खिलाड़ी ने कप्तानी संभाली और सही दिशा में टीम को आगे बढ़ाया. इसके अलावा टीम में अब कई नए खिलाड़ी भी हैं.'

इस बीच अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने अश्विन को बधाई देते हुएये कहा, 'अश्विन के लिए यह साल यादगार रहा है और उन्होंने मैचों में ऑलराउंड प्रदर्शन किया है. वह इस युग के सर्वश्रेष्ठ स्पिनरों में गिने जाने के योग्य हैं.'

उन्होंने कहा, 'आईसीसी के क्रिकेटर ऑफ द ईयर और टेस्ट क्रिकेटर ऑफ द ईयर दोनों पुरस्कारों के लिए चुना जाना बड़ी उपलब्धि है. अश्विन का प्रदर्शन खुद ही यह बयां करता है कि वह इसके हकदार हैं. मैं उन्हें आईसीसी की ओर से बधाई देता हूं.'

इन्हें भी मिल चुका है आईसीसी प्लेयर ऑफ ईयर सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर का दोहरा अवार्ड

अश्विन से पहले छह खिलाड़ियों जैक्स कैलिस (2005), रिकी पोंटिंग (2006), कुमार संगकारा (2012), माइकल क्लार्क (2013), मिशेल जॉनसन (2014) और स्टीवन स्मिथ (2015) को आईसीसी प्लेयर ऑफ ईयर सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर का दोहरा अवार्ड मिल चुका है.

अश्विन की अन्य उपलब्धियां

आईसीसीकी टेस्ट टीम-2016 में स्थान पाने वाले एकमात्र भारतीय.

लगातार दो साल तक नंबर वन गेंदबाज बनने वाले पहले भारतीय.

कोहली: वनडे में इन, टेस्ट में आउट

भारत की टेस्ट टीम के कप्टान विराट कोहली को आईसीसी ने 2016 के लिए आईसीसी वनडे टीम ऑफ द ईयर का कप्तान चुना है. आईसीसी ने अपनी वनडे और टेस्ट टीम की घोषणा की, जिसमें विराट को इस टीम की अगुआई करने का मौका मिला है.

आईसीसी ने अपनी वनडे टीम में 12 खिलाड़ियों की घोषणा की जिसमें विराट के अलावा दुनिया भर से नामचीन खिलाड़ियों को इस टीम में जगह मिली है. आईसीसी की इस टीम में विराट समेत भारत के 3 खिलाड़ियों ने अपनी जगह पक्की की है. इसमें विराट के अलावा रोहित शर्मा और रवींद्र जाडेजा का नाम शुमार है.

आईसीसी की 12 खिलाड़ियों की इस टीम में भारत और ऑस्ट्रेलिया के 3-3 खिलाड़ी, इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज से 1-1 और वहीं साउथ अफ्रीका से सबसे ज्यादा 4 खिलाड़ियों को चुना गया है.

लेकिन हैरानी की बात है कि भारत की टेस्ट टीम के कप्तान विराट कोहली को आईसीसी की टेस्ट टीम में जगह नहीं मिली है, जबकि इस साल उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में तीन-तीन दोहरे शतक जड़े हैं और अपने टेस्ट औसत में सुधार कर उसे 50 के पार पहुंचाया है. लाखों-करोड़ों भारतीय फैंस के लिए ये खबर दिल तोड़ने वाली हो सकती है लेकिन ये सच है!

जी हां आईसीसी ने साल 2016 की टेस्ट टेस्ट टीम का ऐलान किया जिसमें भारत की तरफ से एकमात्र भारतीय खिलाड़ी स्पिनर आर अश्विन हैं.

आईसीसी के द्वारा जारी की गई लिस्ट में 4 ऑस्ट्रेलियाई, 4 इंग्लिश, 1 भारतीय, 1 न्यूजीलैंड, 1 दक्षिण अफ्रीकी और 1 श्रीलंकाई खिलाड़ी को जगह दी गई है. भारत के स्टार स्पिनर आर अश्विन को इस टेस्ट टीम में चुना गया है. इसके अलावा साल 2016 टेस्ट की कप्तानी एलिस्टर कुक को दी गई है. जबकि इंग्लैंड के ही स्टार परफॉर्मर जॉनी बेयरस्टो को विकेटकीपर बल्लेबाज चुना गया है.

इसके अलावा बतौर ओपनर डेविड वार्नर और एलिस्टर कुक को रखा गया है. जबकि तीसरे नंबर पर केन विलियमसन, चौथे नंबर पर जो रूट, पांचवे नंबर पर एडम वोग्स, छठे नंबर पर जॉनी बेयरस्टो, सातवें नंबर पर बेन स्टोक्स, आठवें पर आर अश्विन, नौवें पर रंगना हेराथ, दसवें नंबर पर मिचेल स्टार्क जबकि ग्याहरवे नंबर पर डेल स्टेन हैं. टीम में बतौर बारहवां खिलाड़ी ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ को रखा गया है.

आईसीसी वनडे टीम 2016

डेविडवार्नर (ऑस्ट्रेलिया), क्विंटन डी कॉक (दक्षिण अफ्रीका), रोहित शर्मा (भारत), विराट कोहली (कप्तान), बी डीविलियर्स (दक्षिण अफ्रीका), जो बटलर(इंग्लैंड), मिशेल मार्श (ऑस्ट्रेलिया), रवींद्र जडेजा (भारत), मिशेल स्टार्क (ऑस्ट्रेलिया), कैगिसो रबाडा (दक्षिण अफ्रीका), सुनील नारायण (वेस्टइंडीज) आैर इमरान ताहिर (दक्षिण अफ्रीका)

आईसीसी टेस्ट टीम 2016

डेविड वार्नर (ऑस्ट्रेलिया), एलेस्टेयर कुक (इंग्लैंड), केन विलियम्सन (न्यूजीलैंड), जो रूट (इंग्लैंड), एडम वोग्स (ऑस्ट्रेलिया), जॉनी बेयरस्टो (इंग्लैंड), बेन स्टोक्स (इंग्लैंड), रविचंद्रन अश्विन (भारत), रंगना हेराथ (श्रीलंका), मिशेल स्टार्क (ऑस्ट्रेलिया), डेल स्टेन (दक्षिण अफ्रीका) आैर स्टीवन स्मिथ (ऑस्ट्रेलिया)

नोटबंदी का मारा, आम आदमी बेचारा

8 नवंबर, 2016 को केंद्र सरकार ने 5 सौ और एक हजार के नोटों को बंद कर उन्हें नए नोटों से बदलने का फैसला कर पूरे देश को हैरान कर दिया. इस फैसले से कोई सहमत हो या नहीं, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस नोटबंदी से करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर खासा असर पड़ा. सब्जी बेचने वाली 35 साला सरोज पंवार उस समय घर में थीं, जब उन्होंने नोटबंदी की खबर सुनी. वे बताती हैं कि उन्हें पहला विचार यही आया कि उन के ग्राहक अब कैसे पैसा देंगे? वे आगे कहती हैं, ‘‘मैं पहले रोजाना 5-6 सौ रुपए कमाती थी, पर अब मेरा 4-5 सौ रुपए का नुकसान हो रहा है. पहले ग्राहकों ने जोर डाला कि मैं उन के 5 सौ के पुराने नोट ले लूं, पर मैं उन का क्या करती? अब वे 2 हजार का नया नोट दिखा रहे हैं, जो बड़ा सिरदर्द हो गया है.

‘‘2 हजार का नया नोट गरीब की सब से बड़ी परेशानी बन गया है. अगर 5 सौ रुपए का नोट भी हो, तो भले ही सौ रुपए की सब्जी खरीदो, हम बाकी

4 सौ रुपए लौटा सकते हैं, पर 2 हजार के नोट के खुले करना बहुत ही मुश्किल हो रहा है.’’

सरोज पंवार का बैंक अकाउंट नहीं है, न ही उन के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड है. उन के पति का अकाउंट है. पर जब यह खबर आई, तब वे 10 दिनों के लिए गांव गए हुए थे.

30 साला अजय राणे 2 साल से ठाणे में औटोरिकशा चला रहे हैं. उन्होंने नोटबंदी की खबर औटोरिकशा में बैठे हुए एक आदमी से ही सुनी थी, पर उन के पास काम छोड़ कर बैंक जा कर लंबी लाइन में खड़े होने का समय ही नहीं था.

नोटबंदी से पहले वे रोजाना 8-9 सौ रुपए कमा लिया करते थे. वे बताते हैं, ‘‘अब मेरी कमाई आधी हो गई है. चिंता हो रही है कि कहीं गैस वगैरह की कीमतें न बढ़ जाएं. हमारे सामने 2 हजार के नोट ने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है. कोई खुले पैसे नहीं दे रहा है. गांव में अपने घर पैसे नहीं भेज पा रहा हूं, क्योंकि बैंक की लाइन खत्म ही नहीं हो पा रही है. नोट बदलने के लिए बहुत समय चाहिए.’’

25 साला मोनिका गुप्ता, जो पेशे से चार्टर्ड अकांउटैंट हैं, अपनी सहेली के घर टैलीविजन देख रही थीं जब काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक का ऐलान हुआ. उसी दोपहर उन्होंने 25 सौ रुपए निकाले थे.

उन्होंने बताया, ‘‘कामवाली को पैसा देना था. मैं ने एक दोस्त से 3 सौ रुपए उधार लिए. मैं ने सोचा था कि 1-2 दिन में सब ठीक हो जाएगा. मुझे लगा कि सरकार ने अच्छा कदम उठाया है, पर 2 दिन बाद ही महसूस हो गया कि मैं भी सब के साथ कितनी बड़ी परेशानी में फंस गई हूं.’’

कैश बचाने के लिए मोनिका गुप्ता ने दफ्तर पैदल जाना शुरू कर दिया, जो उन के फ्लैट से 25 मिनट दूर था. दफ्तर की कैंटीन में उधार पर ही लंच किया.

उन्होंने बैंक और एटीएम जाने की कोशिश भी नहीं की, क्योंकि एटीएम में कैश नहीं था और बैंक की लाइन तो हद से ज्यादा लंबी थी. लाइन में खड़ा होने की उन की हिम्मत ही नहीं हुई.

4 घंटे लाइन में लग कर उन की दोस्त जो पैसे लाईं, उन्होंने उसी में से 3 सौ रुपए ले लिए, फिर 9 दिन तक 6 सौ रुपए में किसी तरह काम चलाया और उस के बाद बैंक की लाइन में 3 घंटे लग कर अपना पैसा निकाल सकीं.

वे कहती हैं, ‘‘अगर सरकार अर्थव्यवस्था से 86 फीसदी करंसी हटा रही है, तो एक निश्चित बैकअप होना चाहिए था, जिस से लोगों के पास कुछ बैलैंस तो होता. इस बात पर कुछ और बेहतर तरीके से सोचा जा सकता था.’’

50 साला कादिर पेशे से एक पेंटर हैं. वे गोरेगांव, फिल्मसिटी के पास रहते हैं और रोजाना काम की तलाश में खार लेबर बाजार जाते हैं. उन्हें कभी काम मिलता है, कभी यों ही बैठे रहते हैं.

वे भी इस नोटबंदी से बिलकुल खुश नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘‘इस खबर के बाद कई दिन कोई काम नहीं मिला, किराना स्टोर से खुले पैसे भी नहीं मिले, खाना मिलने में ही बड़ी परेशानी हो गई. मुझे अपने पुराने नोट डिस्काउंट में बदलने पड़े, क्योंकि कोई इनसान भूखा तो रह नहीं सकता.’’

कादिर को अब काम तो मिल गया है, पर पूरा पैसा नहीं मिल पा रहा है. पहले उन्हें 6-7 सौ रुपए रोजाना मिलते थे, अब 2-3 सौ रुपए मिल रहे हैं. ठेकेदार कुछ खुले पैसे दे देता है, उसे बाकी पैसे की बहुत परेशानी है. उन का भी बैंक अकाउंट नहीं है.

कादिर कहते हैं, ‘‘2 हजार का नोट पहले लाना सरकार की गलती है. अगर 5 सौ का नोट पहले आता, तो शायद परेशानी कम होती. पैसे वालों पर फर्क नहीं पड़ता, गरीब आदमी के लिए मरने के से हालात हैं. किसी के मरने के बाद पानी पिलाने से क्या कोई जिंदा हो सकता है?’’

19 नवंबर, 2016 को बैंक में सिर्फ सीनियर सिटिजन के लिए ही लाइन होगी, ऐसा ऐलान किया गया. परंतु ऐसा कुछ नहीं था, जगहजगह सीनियर सिटिजन नागरिक धक्के खाते देखे गए. किसी को चोट लगी, कोई गिरा. कोई नियम नहीं था, कोई सिक्योरिटी नहीं थी.

बैंक औफ बड़ौदा, मुजफ्फरनगर की लाइन में जहां 50 लोग ही सीनियर सिटिजन नागरिक थे, वहां 3-4 सौ लोग 40 से 50 साल की उम्र वाले ऐसे लोग थे, जिन्होंने इन सीनियर सिटिजन को धक्का मार कर किनारे कर दिया था.

75 साल की एक रिटायर्ड टीचर को इस धक्कामुक्की से बचने की कोशिश के बावजूद पैर में कितनी ही चोटें आईं, 4 घंटे की लाइन में खड़े होने के बाद वे खाली हाथ ही वापस आईं.

19 नवंबर, 2016 की शाम को ही अस्पताल में भरती 35 साला पंडाराम अपकुट्टी को घर जाने के बजाय सीधे बैंक जाना पड़ा, क्योंकि अस्पताल बिल के लिए उन्हें अपनी पैंशन चाहिए थी.

पूर्व भारतीय रेलवे कर्मचारी पंडाराम का बेटा श्रीधर उन के साथ था. अस्पताल से अस्थायी चैक आउट किया गया, क्योंकि परिवार के पास कैश खत्म हो चुका था.

बापबेटा साढ़े 8 बजे माटुंगा में एक बैंक की ब्रांच में पहुंचे और काफी भागदौड़ के बाद बैंक कर्मचारी की सहायता से पंडाराम अपने सेविंग अकाउंट से 24 हजार रुपए निकाल सके.

जनता वोट देती है, ताकि उस के द्वारा चुना प्रतिनिधि उन की तरक्की और भले के लिए काम करे. आज आम आदमी को अपनी ही मेहनत के पैसे के लिए 3 से 4 घंटे लाइन में लगना पड़ रहा है. क्यों? बस, इसलिए कि सरकार हम ने चुनी है, इसलिए हमें भुगतना होगा, कोई चारा नहीं? नेताओं को अपनी पीठ थपथपाने से पहले देश के हित के बारे में भी सोच लेना चाहिए.           

बैडरुम सीन करने में हिचक होती है : विक्रांत सिंह राजपूत

विक्रांत सिंह राजपूत भोजपुरी सिनेमा के सब से स्मार्ट और फिट हीरो माने जाते हैं. उन्होंने ऐक्शनकौमेडी फिल्म ‘मुन्ना बजरंगी’ के साथ इस इंडस्ट्री में कदम रखा था, जिस के बाद उन्होंने ‘दूल्हा अलबेला’, ‘पायल’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘कर्तव्य’, ‘सैयां तूफानी’, ‘प्रेमलीला’ जैसी तकरीबन एक दर्जन से भी ज्यादा फिल्में कीं.

विक्रांत सिंह राजपूत द्वारा निभाए गए दमदार किरदारों की भोजपुरी सिनेमा उद्योग में हमेशा से चर्चा होती रही है. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

भोजपुरी फिल्मों में बने रहने के लिए आप क्या करते हैं?

किसी रोल का चुनाव करने में बहुत सावधानी बरतना मेरी पहली जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि मुझे मालूम है कि एक गलत कदम मुझे काम से बाहर करा सकता है. भोजपुरी फिल्म उद्योग में फिल्मों के चुनाव से मैं खुद एक अलग स्टैंडर्ड सैट कर चुका हूं, इसीलिए मैं हिट फिल्में देने का दबाव भी महसूस करता हूं. यहां गलाकाट होड़ मची है.

आप को कामयाबी कैसे मिली?

मुझे बचपन से ही ऐक्टिंग करने का शौक था. मैं स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया करता था. घर वालों को पता चला, तो मैं डरा हुआ था कि उन्हें यह सब पसंद न हों और गुस्सा करें, बल्कि इस के उलट वे बहुत खुश हुए. उन का सपोर्ट रहा और मेरे पापा खुद मुझे खुशीखुशी मुंबई छोड़ने आए थे.

‘मुन्ना बजरंगी’ मेरी पहली फिल्म थी और उस के बाद मुझे पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा. अब मेरी कई सारी फिल्में आ चुकी हैं. घर के लोगों से खुद की तारीफ सुनता हूं, तो खुशी होती है.

फिल्मों को चुनने में कलाकार को क्या क्या सावधानियां बरतनी होती हैं?

मैं ने अलगअलग किरदार निभाए हैं और समय के साथ फिल्मों की अच्छी समझ भी बनती गई. मेरे हिसाब से एक उम्दा फिल्म ही इंडस्ट्री के प्रति आप का नजरिया बदल देती है और नजरिया बदलने से कई मुसीबतें हल हो जाती हैं. आप के नजरिए में भी बदलाव आता है, तब आप छोटीछोटी चीजों को ले कर मायूस होना छोड़ देते हैं और मैं इसी कोशिश में हूं कि मेरी हर फिल्म इस उद्योग से जुड़े हर किसी की उम्मीद पर खरी उतरे.

आप के द्वारा निभाए गए किरदारों में कौन सा किरदार सब से बढि़या है?

यह बताना बहुत मुश्किल है कि मेरा कौन सा किरदार मुझे सब से ज्यादा पसंद है. वैसे, मुझे फिल्मों में बैडरूम सीन फिल्माने में हिचक होती है.

अपनी आने वाली फिल्मों के बारे में बताएं?

‘मिलन: एक संजोग’, ‘जय श्रीराम’, ‘नथुनिए पे गोली मारे-2’ के अलावा कुछ अनाम फिल्मों पर बात चल रही है.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में आप से भी ज्यादा पौपुलर है आप का गठीला बदन. बिजी शैड्यूल के बीच फिटनैस और शूटिंग में कैसे तालमेल बिठाते हैं?

शूटिंग के दौरान भी मैं हर रोज 30 मिनट तक दिल को सेहतमंद रखने वाली कसरतें, जिस में दौड़ना, जौगिंग और किक बौक्सिंग वगैरह शामिल हैं, करता हूं.

वैटलिफ्टिंग मेरे वर्कआउट का खास हिस्सा है. मुझे बाहर जा कर वर्कआउट करना ज्यादा पसंद है, लेकिन समय की कमी में ऐसा मौका कम ही मिल पाता है.                                  

अदालतों और सरकार के बीच डोलती शराबबंदी

राज्य में शराबबंदी अदालतों, राज्य सरकार और विरोधी दलों के बीच डोल रही है.  शराब लौबी शराबबंदी के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में दस्तक देती है, तो राज्य सरकार उसे कायम रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाती है. अब सरकार ने 2 अक्तूबर, 2016 को नया और पहले से कड़ा शराबबंदी कानून लागू किया है, तो उस के खिलाफ भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी शुरू हो गई है. पटना हाईकोर्ट ने 30 सितंबर, 2016 को बिहार में पूर्ण शराबबंदी के राज्य सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए उसे रद्द करने का फरमान जारी कर दिया था.

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस नवनीति प्रसाद सिंह ने राज्य में पूरी तरह से शराबबंदी कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया था कि राज्य सरकार ने शराबबंदी से संबंधित 5 अप्रैल, 2016 को जो अधिसूचना जारी की थी, वह संविधान के अनुकूल नहीं है. इस वजह से इसे लागू नहीं किया जा सकता है. हाईकोर्ट ने 20 मई, 2016 को इस मामले पर पूरी सुनवाई होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

इस के पहले सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से उन के वकीलों ने दलील दी थी कि राज्य सरकार के संशोधित उत्पाद कानून के तहत 1 अप्रैल, 2016 से समूचे राज्य में देशी शराब को बेचने पर पाबंदी लगाई थी और उस के बाद धीरेधीरे विदेशी शराब पर भी रोक लगाने की बात कही गई थी. इस के बाद अचानक सरकार ने 5 अप्रैल, 2016 को राज्य में हर तरह की शराब के खरीदने और बेचने पर रोक लगा दी. सरकार ने बार चलाने के लिए 1 अप्रैल, 2016 को एक साल के लिए लाइसैंस दिया था और लाइसैंस लेने वालों से एक साल की फीस भी जमा करवा ली थी. इस लिहाज से अचानक शराब पर रोक लगाना जायज नहीं है. बिहार सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील राजीव धवन और राज्य के प्रधान अपर महाधिवक्ता ललित किशोर ने दलील दी कि भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत ही शराब पर बैन लगाया गया है. उन्होंने कोर्ट से यह भी कहा कि सरकार ने नागरिकों की सेहत को ध्यान में रख कर यह फैसला लिया है और इस तरह का फैसला लेना सरकार के अधिकार में भी है. दिलचस्प बात यह है कि विदेशी शराब पर रोक को लागू करने वाली अधिसूचना को उत्पाद अधिनियम की धारा 19(4) को असंवैधानिक करार देने वाली पटना हाईकोर्ट की डबल बैंच के दोनों जजों ने अलगअलग फैसले लिखे. दोनों जज शराब पर रोक लगाने के लिए एकमत तो हुए, पर कुछ पहलुओं पर दोनों की राय अलगअलग रही.

पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी ने अधिसूचना को और धारा 19(4) को सरकार की नीति के विरोधाभासी होने की वजह से असंवैधानिक करार दिया. वहीं जस्टिस नवनीति प्रसाद सिंह ने राय दी कि शराब पीने पर रोक किसी शख्स के मौलिक अधिकार का हनन और उस की प्राइवेसी के अधिकार पर हमला है. पटना हाईकोर्ट के ऐक्जिक्यूटिव चीफ जस्टिस रह चुके नागेंद्र राय का मानना है कि सरकार अगर सोचविचार कर शराबबंदी कानून लागू करती, तो उस की फजीहत नहीं होती. पटना हाईकोर्ट के वकील अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि बिहार विधानमंडल से पास कराए गए उत्पाद संशोधन अधिनियम में कोई गाइड के बगैर ही 5 अप्रैल, 2016 की अधिसूचना जैसतैसे जारी कर दी गई थी.

29 दिसंबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए शराब पर पाबंदी को जारी रखने का फैसला सुनाया था. हाईकोर्ट ने 10 साल के भीतर राज्य को अलकोहल फ्री करने की नीति पर रोक लगाने से मना कर दिया था. हाईकोर्ट ने साफ कर दिया था कि शराब बेचना मौलिक अधिकार नहीं है और शराब नीति बनाना राज्य सरकार का काम है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि पांचसितारा होटलों में शराब परोसी जा सकती है, क्योंकि उस की स्टार रेटिंग केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय उन की सुविधाओं के हिसाब से तय करता है. इस पर राज्य सरकार का कोई अधिकार नहीं होता है. इस के साथ ही वैसे होटलों पर भी शराब परोसने पर बैन नहीं रहेगा, जो 4 सितारा से पांचसितारा में तबदील किए गए हैं. पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार की  शराबबंदी कानून को जहां रद्द करने का फैसला सुनाया, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी. 7 अक्तूबर, 2016 को बिहार सरकार की अपील पर सुनवाई करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शराब बेचना और पीना किसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. इस के लिए कोर्ट की प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. जनहित याचिका और शराब एकदूसरे के विरोधी हैं. शराब पीने या बेचने के लिए जनहित याचिका कैसे दायर की जा सकती है? ऐसी याचिकाओं पर जुर्माना लगना चाहिए. गौरतलब है कि 5 अप्रैल, 2016 को लागू किए गए नीतीश सरकार की शराबबंदी कानून को जब पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया, तो उस के बाद 30 सितंबर, 2016 को हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी थी. उस में राज्य सरकार ने गुजारिश की थी कि बिहार में देशी, विदेशी समेत हर तरह की शराब पर बैन को जारी रखा जाए.

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी साफ करने की मांग की थी कि शराब पीने को किसी शख्स की ओर से मौलिक अधिकार बना कर दावा पेश किया जा सकता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिहार सरकार के शराबबंदी कानून के पक्ष में फैसला आने के बाद बिहार (उत्पाद) संशोधन अधिनियम 2016 की धारा 19 की उपधारा 4 में संशोधन करते हुए राज्य में शराब बनाने की फैक्टरी, बौटलिंग प्लांट, लाइसैंस, बोतलबंदी, वितरण, बिक्री, खरीद, ढोने और पीने पर पूरी तरह से बैन लगा दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खुश होते हुए नीतीश कुमार कहते हैं कि शराबबंदी कानून का गलत इस्तेमाल कर के किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिले, इस पर कड़ी निगाह रखी जा रही है. नीतीश कुमार कहते हैं कि शराबबंदी से सरकार को तकरीबन 5 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है, लेकिन इस के साथ ही साथ आम आदमी के तकरीबन 10 हजार करोड़ रुपए हर साल शराब में डूब जाते थे. यह आंकड़ा किसी को दिखाई नहीं दे रहा है.

बिहार में शराबबंदी कानून को सख्ती से लागू किया जा रहा है. इस के तहत 5 महीने के दौरान उत्पाद अधिनियम का उल्लंघन करने के मामले में कुल 13 हजार, 839 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इस के अलावा 11 हजार, 679 लिटर भारत से बनी शराब और 92 हजार, 291 लिटर विदेशी शराब जब्त की गई. पुराने शराबबंदी कानून को खत्म कर राज्य सरकार ने नए कानून को लागू किया है, जो पहले कानून से काफी सख्त है.

भारत में क्यों है सब से ज्यादा गरीबी

कुछ समय पहले वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि दुनिया में सब से ज्यादा गरीब लोग भारत में हैं. ‘गरीबी व साझा खुशहाली’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 में भारत की 30 फीसदी आबादी की औसत आमदनी 1.90 अमेरिकी डौलर यानी तकरीबन 126 रुपए रोज से भी कम थी, इसलिए दुनिया में हर तीसरा गरीब भारतीय है. बेशक भारत तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन गरीबी का मसला छोटा नहीं है, क्योंकि यह सच है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं, जबकि गरीब अपनी जरूरतों के लिए जूझ रहे हैं. दिल्ली, मुंबई वगैरह कुछ शहरों में आसमान छूती इमारतें, चिकनी सड़कें, लंबे फ्लाईओवरों और बिजली की चकाचौंध से लगता है कि हमारा देश बहुत तेजी से बदल रहा है, लेकिन यह तसवीर का सिर्फ अधूरा पहलू है, जो सरकारें दिखाती हैं. दीया तले का असल अंधेरा तरक्की पर तमाचा व गरीबी दूर करने के खोखले नारों व स्कीमों का कड़वा सच है.

इन की उलटबांसी

एक ओर नेता, अफसर, कारोबारी व धर्म के धंधेबाज चांदी काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव, कसबों, पहाड़ी, रेतीले इलाकों, मलिन बस्तियों व झोंपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब जानवरों से बदतर जिंदगी जी रहे हैं. वे दो दून की रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा व सिर छिपाने के लिए टूटे छप्पर या खपरैल जैसी बुनियादी जरूरतें भी आसानी से पूरी नहीं कर पाते हैं. यह गरीबों के साथ सरासर नाइंसाफी नहीं तो और क्या है? बेशक एक ओर मोबाइल फोन, कंप्यूटर और गाडि़यों की गिनती तेजी से बढ़ रही है, वहीं इस के उलट दूसरी ओर दिल दहलाने वाली घटनाएं मीडिया में आ रही हैं. मसलन, पिछले दिनों एक गरीब 12 किलोमीटर तक अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर ढोने को मजबूर हुआ, तो दूसरे को कूड़े के ढेर में आग लगा कर लाश का क्रियाकर्म करना पड़ा.

सरकारी इश्तिहारों में भले ही खुशहाली के दावे किए जाते रहे हों, लेकिन गरीबों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. शहरी गरीबों के लिए तो आवास मंत्रालय है, लेकिन गंवई गरीबों के हालात ज्यादा खराब हैं. उन के लिए बसावट, तालीम, इलाज, सफर व इंसाफ सब टेढ़ी खीर हैं. सहूलियतें सिर्फ अमीरों के हिस्से में हैं, गरीब हर कदम पर धक्के खाते हैं.

गलत हैं तरीके

गरीबी हटाने के नाम पर केंद्र व राज्यों की बहुत सी सरकारी स्कीमें हैं, लेकिन खामी यह रही कि गरीबी की वजहों पर पूरा ध्यान ही नहीं दिया गया. किसी मसले को हल करने की कोशिश ही नहीं की गई. सरकारी लोगों को यह सोचने की फुरसत हीकहां है. इस का नतीजा यह है कि दुनिया में सब से ज्यादा गरीब भारत में हैं. गरीबों को रोजगार के मौके व उन की आमदनी बढ़ाने व उन्हें सस्ता अनाज मुहैया कराने पर जोर दिया गया. मनरेगा वगैरह योजनाओं में पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन ये सारे उपाय ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुए, क्योंकि इन स्कीमों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे खा गए. नतीजतन, गरीबों को उन का हक नहीं मिला. राज करने वाले भूल जाते हैं कि अगर ये तरीके कारगर होते, तो बीते 70 सालों में गरीबी दूर हो जाती. गरीब आज भी गरीब हैं, लेकिन उन की आड़ में, उन का हिस्सा हड़प कर सरकारी मुलाजिम व छुटभैए नेता जरूर अमीर हो गए.

आसान शिकार

झूठे, धोखेबाज और मक्कार नेता लच्छेदार व ललचाऊ भाषणों में गरीबों को सुनहरे सपने दिखाते हैं. उन के लिए सिर्फ घडि़याली आंसू बहाते हैं. असलियत में गरीबों के मुद्दे उठाने व उन्हें सुलझाने का कोई सच्चा हिमायती रहनुमा ही नहीं है. कुरसी पाते ही नेता गरीबों को भूल जाते हैं. लूटनेखसोटने, अपना घर भरने व कुनवापरस्ती में लग जाते हैं. गरीब वह गाय है, जिसे नेता, सरकारी मुलाजिम व दाढ़ीचोटी वाले सब बड़े आराम से दुहते हैं और फिर कचरा खाने के लिए उस के हाल पर खुला छोड़ देते हैं. वोट, घास व चढ़ावा ऐंठने के लिए अपनेअपने मतलब से गरीबों से फायदा सब उठाते हैं, लेकिन गरीबों की समस्याओं पर कभी कोई ध्यान नहीं देता. सब गरीबों की अनदेखी करते हैं, क्योंकि सब अमीर यही चाहते हैं कि गरीबों की गिनती बढ़ती रहे, ताकि वे उन का शिकार करते रहें.ये हैं वजहें

* हमारे देश में गरीबी होने के भी कई बड़े कारण हैं. मसलन, शिक्षा से समझ, सूझबूझ, जानकारी, रोजगार और जागरूकता बढ़ती है, दिमाग की खिड़कियां खुलती हैं व खुद पर यकीन बढ़ता है, लेकिन पिछड़ों, दलितों, गरीबों को सदियों से पढ़ाईलिखाई से दूर रखा गया, उन्हें कमजोर किया गया, इसलिए देश में ज्यादातर गरीब अनपढ़ व कम पढ़े हैं. ऊपर से पढ़ाईलिखाई महंगी है. इसलिए गरीबों के लिए पढ़नालिखना आसान नहीं है.

* हुनरमंदों की कमी से अकुशल मजदूरों की भरमार है. इसलिए रोज सुबह उन अड्डों पर भारी भीड़ लगी रहती है, जहां दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर ईंटपत्थर ढोने जैसे इमारती काम की तलाश में इकट्ठा होते हैं. तनबदन में जान रहने तक वे मेहनतमजदूरी करते हैं, लेकिन 60 साल की उम्र आने पर इन गरीब मजदूरों का जीना मुश्किल हो जाता है. हुनर सिखाने की सरकारी स्कीमें सिर्फ शहरों तक सिमटी हैं, इसलिए गांवों के गरीब जस के तस हैं.

* हुनर सिर्फ कारीगरी या दस्तकारी का ही नहीं होता. जिंदगी को सुख से जीने, ज्यादा पैसा कमाने, उसे समझदारी से खर्च करने, बचाने व सही जगह लगा कर बढ़ाने का हुनर भी बेहद अहम होता है. गुरबत से नजात पा कर अमीर बनने के लिए सिर्फ पैसा कमाना ही काफी नहीं है. माली इंतजाम के गुर जानना भी लाजिमी है. कर्ज ले कर मुंडन व मृत्युभोज करना गलत है, लेकिन सरकारें गरीबगुरबों को ऐसी जानकारी देने के लिए कभी कुछ भी नहीं करतीं.

* असल दोष धर्म के उन धंधेबाजों का भी है, जिन्होंने गरीबी को पिछले जन्मों के पापों का फल बताया है. गरीबी को भगवान का प्रसाद व परीक्षा मान कर खुशी से मंजूर करना सिखाया है. गरीबी को ब्राह्मणों का जेवर व भिक्षा को उन का धन बताया है. इसलिए बहुत से लोग गरीबी में जीते रहने के आदी हैं. वे गरीबी को अपनी किस्मत मानते हैं. उन की इस खराब सोच को सुधारने का कहीं कोई उपाय नहीं किया जाता.

* धर्म की किताबों में लिखा है कि ऊपर वाला दीनहीनों में रहता है. गरीब को ऊपर वाला जैसा बताया गया है. इसलिए गरीब लोग अपनी गुरबत से नफरत नहीं करते. वे उस से निकलने की कोशिश नहीं करते. खुद को ऊपर वाला समझने की गफलत में खराब हालात से भी समझौता कर के गरीबी के दलदल में ही पड़े रहते हैं. ऐसे में देश में गरीब तो ज्यादा होंगे ही.

* हमारे देश में साधुसंत, भिखारी, अपाहिज, नशेड़ी ही नहीं, निठल्ले भी बहुत हैं. वे सहीसलामत होते हुए भी पूरा दिन बिना कुछ किए, खाली बैठ कर, ताश खेल कर या फालतू की बकवास कर के गंवा देते हैं. निकम्मापन भी इतना ज्यादा है कि मैलेकुचैले व फटे चिथड़ों में, बगैर नहाए व बाल बढ़ाए बेमकसद जिंदगी को ढो रहे हैं. वे गरीबी का सांप खुद गले में डाले रखते हैं.

* अपने देश में आज भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम. ऐसी सोच व बेवकूफी भरी बातें बचपन से ही सिखाई जाती हैं. जिस समाज की रगरग में ऐसी बातें हों, वहांगरीबी बढ़ेगी व बरकरार रहेगी ही.

* ज्यादातर गरीब अपना अच्छाबुरा नहीं सोचते. कम कमाई के बावजूद नशे की लत गरीबी की एक बड़ी वजह है. बीड़ीसिगरेट, गुटका, तंबाकू, अफीम, गांजा व शराब पीने से जेब हलकी होती है. नशे में बीवीबच्चों को पीटना, गाली देना, लड़ाईझगड़ा करना, बीमार पड़ना व जल्दी मरना आम है.

राह भी उलटी

लानत है हमारे उन मतलबी नेताओं पर, जो आग में घी डालने के आदी हैं. वे गरीबों को ऊपर नहीं उठने देते. वे कभी नहीं चाहते कि गरीब अपनी मेहनत व सूझबूझ से, दिमाग लगा कर, नई साच ले कर आगे बढ़ें, अमीर बनें. नेता गरीबों को मुफ्तखोरी सिखाते हैं. वे उन्हें तरहतरह के लालच देते हैं. गरीबों की जमीन मार कर उन्हें भिखारी बनाते हैं. बिना करे पाने की गलत राह दिखाते हैं. इस खोट के चलते भी हमारे देश में सब से ज्यादा गरीब हैं. आज विज्ञान के सहारे दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन हमारे देश में आज भी करोड़ों लोग लकीर के फकीर हैं. उन की सोच वैज्ञानिक न होने से बहुत पुरानी रूढि़यों की जंजीरें उन के पांवों में पड़ी हैं. वे पुरानी परंपराओं के इतने आदी हैं कि उन्हें पिछड़ना मंजूर है, लेकिन वे वक्त के साथ बदलना व सुधरना ही नहीं चाहते. इसलिए उन की आमदनी कम है. समाज में फैले धार्मिक अंधविश्वासों ने भी गरीबी को बढ़ाने का काम  किया है. जीने से मरने तक के कर्मकांड, मठमंदिर, टोनेटोटके, गंडेतावीज, पूजा, हवन, जागरण, कथाकीर्तन, शोभायात्राओं के जुलूस, तीर्थ, दानपुण्य व चढ़ावे में भोलीभाली जनता व भक्तों की जेबें खूब हलकी होती हैं और दानपात्र व पंडेपुजारियों, संतोंमहंतों के घर भरते हैं.

उपाय हैं…

हमारे देश के ज्यादातर किसान छोटे व गरीब हैं. इसलिए कर्ज लेना उन की आदत व मजबूरी है. अगर वे अपनी उपज की कीमत बढ़ाना सीख लें, उस की प्रोसैसिंग व पैकेजिंग कर के बेचने लगें. आपस में मिल कर गांव में ही अपनी यूनिट लगा लें, तो खेती से ज्यादा कमा सकते हैं, लेकिन सरकारें फूड प्रोसैसिंग में उन की मदद नहीं करतीं. इन सभी वजहों से जाहिर है कि शासक व शोषक नहीं चाहते कि गरीबी दूर हो. इसलिए वे हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि गरीब और गरीब ही बने रहें. उन्हें यह डर सताता रहता है कि अगर गरीब गरीब न रह कर अमीर हो गए, तो वे उन की नहीं सुनेंगे, उन की मार व उन के वार नहीं सहेंगे. तब उन की खिदमत कौन करेगा?

आरक्षण : जाति की खाई गहरी है

है क्या वजह कि जीओ और जीने दो
का उसूल हमें आज भी नहीं भाता,
यह खोट है नजर का कि दूसरों का सुखचैन हम से देखा नहीं जाता.

इनसानी कमजोरी पर ये लाइनें बड़ी मौजूं लगती हैं. जाति के आधार पर इनसान का इनसान में फर्क करना, बेवजह की दूरी और ऊंचनीच के फासले बनाना एक सामाजिक बुराई है. तालीम व तरक्की बढ़ने के बावजूद पल रही ऐसी बुराइयों की वजह जातिवाद, पिछड़ी सोच व धार्मिक कट्टरता है. बगलाभगत सब से एकजैसा सा बरताव करने, दीनदुखियों की मदद करने व उन्हें गले लगाने की महज बातें करते हैं. उन की कथनी और करनी एक नहीं होती है. हालांकि भेदभाव की बुनियाद पर टिकी इमारतें बेहद पुरानी व खंडहर हो चुकी हैं, लेकिन उन का वजूद बरकरार है, जो आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. यही वजह है कि आरक्षण से पिछड़ों, दलितों को सरकारी दफ्तरों में नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन असलियत में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिलता. अकसर उन्हें ताने सुनने को मिलते हैं. उन का मजाक उड़ाया जाता है.

बड़ों की सोच छोटी

एक सरकारी महकमे से रिटायर हुई सुधा रानी की जिंदगी जद्दोजेहद भरी रही. तकरीबन 40 साल पहले बमुश्किल पढ़लिख कर उन्हें स्टैनो की नौकरी मिली, लेकिन पूरे सेवाकाल में उन्हें एक टीस बराबर बनी रही. सुधा रानी ने बताया, ‘‘ऊंची जाति के सहकर्मी लंच के वक्त या किसी की फेयरवैल पार्टी वगैरह में घुमाफिरा कर अकसर यह एहसास कराते थे कि मैं उन से अलग हूं, नीची जाति की हूं, इसलिए उन की बराबरी न करूं.’’ एक दलित अफसर का कहना है, ‘‘जैसे हाथी के दांत खाने के और व दिखाने के और होते हैं, वैसे ही सरकारी दफ्तरों में भी बहुत से अगड़े अफसर व मुलाजिम आज भी बेहद पिछड़ी सोच के शिकार हैं. उन्होंने अपने अलग गुट बना रखे हैं. हमारे साथ बैठने व खाने तक से परहेज करते हैं. वे बातबात पर नाकभौं सिकोड़ते हैं.

‘‘ऊंची जाति वाले अकसर अपनी जाति वालों की तरफदारी करते हैं. हमें गैर समझते हैं, इसलिए अपनों की पैरोकारी में तबादले व तैनाती के फरमान जारी होते हैं. इस भेदभाव के चलते हमें बहुत सी चीजों से अलग रखा जाता है.’’

मुट्ठी से फिसलती रेत

यह बात सच है कि ऊंची जाति में पैदा होने, ज्यादा पैसा या पावर पा लेने या फिर उम्र में बड़ा हो जाने से ही कोई इनसान बड़ा नहीं हो जाता. उस के काम, उस की मेहनत व सूझबूझ से हासिल मुकाम ही उस को बड़ा बनाते हैं. समझदार लोग इसे मानते भी हैं, लेकिन इस के बावजूद हमारे समाज का एक कड़वा सच इस के बिलकुल उलट है. संतमहंत उपदेशों व कथाप्रवचनों में भी दूसरों को बराबरी की सीख देते हैं, लेकिन बात ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली तर्ज पर आ कर ठहर जाती है. इसलिए जब उस पर अमल होने की बारी आती है, तो अगड़े खुद को ऊंचा और दूसरों को नीचा साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते. इस गरज से वे कमजोरों की टांगखिंचाई करने से भी बाज नहीं आते.

सदियों से हमारे समाज में धनदौलत, ओहदा, रुतबा वगैरह पर कब्जा अगड़ी जातियों का ही रहा है. यह सिलसिला आज भी बरकरार है, इसलिए महज मुट्ठीभर लोग ही सारी आन, बान और शान को अपनी जागीर समझते हैं. जायजनाजायज हुक्म दे कर दूसरों से काम कराने को वे अपना हक मानते हैं. सब जानते हैं कि भारतीय संविधान में देश के हर नागरिक को बराबरी का हक है. इस के बावजूद सरकारी दफ्तरों में आरक्षण की वजह से नौकरी व तरक्की पाने वाले लोग भी अगड़ों की आंखों में किरकिरी बने रहते हैं. यह कितने अफसोस की बात है कि अच्छेखासे खातेपीते व अमीर जाति वाले लोग भी अब अपने लिए आरक्षण की मांग करने लगे हैं.

कड़वा तजरबा

देखा गया है कि सरकारी नौकरी में दलितों और पिछड़ों को आरक्षण की सहूलियत मिलने की बात ज्यादातर अगड़ों के गले आसानी से नहीं उतरती. दरअसल, जब उन्हें अपने आसपास दूसरी छोटी जाति वाले बढ़ते दिखते हैं, तो वे बेवजह ही उन की बातों पर लालपीले होने लगते हैं. कभी क्रीमीलेयर का मुद्दा उठाते हैं, तो कभी प्रमोशन में आरक्षण को गलत बताते हैं. इतना ही नहीं, मौका पाते ही वे अपने मातहतों को डरानेधमकाने व सताने से भी बाज नहीं आते.

फर्क इतना है कि पहले बाहुबल से डराधमका कर बंधुआ बना लिया जाता था, मारपीट कर सताया व बेइज्जत किया जाता था, जबरन जमीनें व बहूबेटियां छीन ली जाती थीं, लेकिन अब पढ़ेलिखे अगड़े नए तरीके से दिमागी तौर पर सताने लगे हैं. उन के बरताव में कदमकदम पर बेजा गुस्सा, घमंड व रोब टपकता है. यह बात अलग है कि सरकारी नियमकानून के डर से अगड़े आरक्षण का फायदा लेने वालों को सीधे व खुल कर विरोध नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी दिमागी तौर पर सताने के लिए कोशिशें जरूर की जाती हैं. मसलन बेबुनियाद आरोप लगाने, जांच में फंसाने व कार्यवाही करने में अगड़े अकसर गुस्सा निकालते हैं, झूठी शिकायतें कर के उन्हें बेवजह परेशान करते हैं.

मेरठ, उत्तर प्रदेश के गन्ना महकमे में मंडलीय लैवल के एक दलित अफसर को उन के नाम के हिज्जे बिगाड़ कर उन के संगीसाथी पहले तो खूब मजाक बनाते थे, फिर जब उन का चयन आईएएस में हो गया, तो रोड़ा अटकाने के लिए उन की झूठी शिकायत कर दी कि उन्होंने लखनऊ मीटिंग विभागीय सफर में सैकंड क्लास का टिकट ले कर फर्स्ट क्लास का टीए लिया था. इस की जांच हुई व दलित अफसर बेगुनाह पाए गए. वे तो अपनी काबिलीयत से डीएम व कमिश्नर बन गए और उन से जलने वाले सारे अगड़े वहीं कदमताल करते रह गए, लेकिन ऐसी खुराफातों से अलगाव, टकराव व तनाव बढ़ता है.

ऐसे बदलाव होगा ही नहीं

यह सच है कि सरकारी महकमों, सार्वजनिक निगमों व सहकारी संगठनों में तयशुदा आरक्षण मिलता है, लेकिन आरक्षण पाने वालों की गिनती कम ही रहती है. आमतौर पर अगड़ों को ही अव्वल समझा जाता है. यह बात गलत है. सिर्फ इम्तिहान में हासिल नंबरों को सुबूत मान कर कामयाबी की दलीलें दी जाती हैं. बिना परखे ही अगड़ों के हुनर का गुणगान किया जाता है. आरक्षण के चलते नौकरी पाने वालों को कमतर आंका जाता है. इतना ही नहीं, उन्हें नकारा समझा जाता है. साथ ही, मौका लगते ही उन्हें खूब खरीखोटी सुनाई जाती है. कहींकहीं तो आज भी शादीब्याह में, कुओं पर, मंदिरों में उन के साथ खराब बरताव किया जाता है. सोशल मीडिया पर भी कई तरह की बेसिरपैर की भड़ास देखीपढ़ी जा सकती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में भी गैरबराबरी का चलन होना बहुत बुरा है. इस माहौल के जल्द सुधरने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि  हर जाति में जातिवाद गहरे तक समाया हुआ है.

पुरानी है बीमारी

गैरबराबरी से जुड़े इस मसले के कई पहलू हैं. दरअसल, गरीबगुरबे, दलित, पिछड़े सदियों से अगड़ों की जबरदस्ती की मार के शिकार रहे हैं. ताकत, जागरूकता, तालीम की कमी, गरीबी व जातिवाद, छुआछूत और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं. गंवई इलाकों में रहने वाले ही नहीं, बल्कि शहरी भी भेदभाव करने के हिमायती हैं, इसलिए तरक्की के बावजूद हमारे समाज में पसरी सामंती सोच की वजह से दफ्तरों में आज भी कमजोरों के साथ भेदभाव होता है.

बहुमत में मौजूद सरकारों ने पिछड़ों व निचलों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ों को आरक्षण की सहूलियत दी, इस से डूबते को तिनके का सहारा मिला, लेकिन अगड़ोंदबंगों, निठल्लों व कब्जेदारों को यह रास नहीं आता, क्योंकि जरूरतमंदों को आरक्षण मिल जाने से उन्हें अपने हाथों से कठपुतलियां फिसलती नजर आती हैं. कपड़ों के नीचे छिपे इस कोढ़ को हमेशा के लिए दूर किया जाए, समाज में ऐसा नया माहौल बनाया जाए, जिस में सभी अगड़े दलितों व पिछड़ों से चिढ़ना छोड़ें, उन्हें सिर्फ अपना खिदमतगार न समझें.

ऐसा करना कोई मुश्किल काम नहीं है. बस, जरूरत है नए दौर के पंडेपुजारियों के उन झूठे किस्सेकहानियों की पोल खोलने की, जिन की घुट्टी बचपन से पिलाई गई है. दरअसल, ऐसी बातें सिर्फ हम सब को अलगथलग कर के खुद अपना घर भरने की गरज से की जाती हैं. अगड़े, नेता, पंडेपुजारी, कट्टरपंथी, धर्म और समाज के ठेकेदार अपने फायदे के लिए भेदभाव के बीज बो कर लोगों को भरमाते, भटकाते व भड़काते हैं. अमीर मुल्क बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और हम सदियों पुराने पचड़ों में पड़े हैं. साथ ही, आरक्षण से नौकरी की सहूलियत पाने वालों को भी कोशिश करनी चाहिए कि वे नौकरी को अपनी मंजिल नहीं, सफर समझें. काम का तजरबा व हुनर सीख कर खुद अपना रोजगार करें, ताकि नौकरी करने के बजाय अपने यहां दूसरों को काम पर रखने वाले बन सकें. मेहनत, कोशिश व सूझबूझ से आगे बढ़ें और ऐसा करना मुश्किल नहीं है.                 

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