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तुगलकी फरमान किस काम का

नए नोटों के कारण अपने घरों से दूर रह रहे छात्रों और ट्रेनियों को कितनी परेशानी हो रही है, इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. छोटे शहरों से आ कर बड़े शहरों में पढ़ाई कर रहे ज्यादातर छात्र नक्दी पर काम करते हैं. उन के मातापिता जहां रहते हैं या जितने पढ़ेलिखे हैं उन से नोटों को बदलना सांपसीढ़ी का खेल खेलने सरीखा मुश्किल है. उन के पास बच्चों की पढ़ाई के लिए जो था, वह नक्द था और अब छूमंतर हो गया है. सैकड़ों छात्र वापस अपने कसबों में चले जाएं तो बड़ी बात नहीं है. इन छात्रों ने रहने का जो ठीहा ढूंढ़ा है वह भी नक्दी पर काम करते हैं और वे ओवर नाइट बदल जाएंगे, इस की उम्मीद न करें. जब से बैंकों ने अकाउंट्स खोलने के लिए तरहतरह के प्रमाणपत्र मांगने शुरू किए हैं, वैसे भी कठिनाइयां होने लगी हैं.

ये छात्र सड़कछाप ढाबों के सहारे जीते हैं और इन के पास भी इतना पैसा नहीं होता कि ये कई दिन तक उधार दे सकें या क्रैडिट कार्ड (अगर किसी के पास है तो) का इस्तेमाल करने की मशीन रख सकें. नोट अवैधीकरण की मार बड़ों को पड़े या न पड़े छोटों को जरूर पड़ेगी, इस में शक नहीं. यह नोट अवैधीकरण इन छात्रों का कल सुधारेगा, इस की कोई गारंटी नहीं है. 19 जुलाई, 1969 को बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था तो लगा था कि अब चमचमाता सूरज निकलेगा. 50 साल बाद क्या हुआ? सरकारी बैंक बीमार हैं और निजी बैंक फिर से मौजूद हैं. इंदिरा गांधी का तुगलकी फैसला किस काम का रहा? उस समय के छात्र समुदाय ने समाजवाद का जम कर समर्थन किया था, पर वे छात्र आज वृद्ध हो गए हैं और उन्हें क्या मिला है? क्या बैंकों के सरकारीकरण का लाभ हुआ? परिणाम तो यह हुआ कि गद्दी बचाने के लिए 1975 में आपातस्थिति घोषित करनी पड़ी.

नोट अवैधीकरण भी ऐसी हालत ले आए तो बड़ी बात नहीं. प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जिस सुखद भविष्य के सपने दिखा रहे हैं वह 10-15 वर्ष में आएगा. मुसीबतों का पहाड़ तो आज टूटा है, वह भी एक तुगलकी फैसले से, बिना जनता को मौका दिए. आज की युवापीढ़ी बदलाव चाहती है. वह टैक्नोलौजी ड्रिवन है. वह कैशलैस माहौल में खुश रह सकती है, पर वह धैर्य भी रखती है, इस में संदेह है. वह मिनटों में नाराज हो जाती है, आपा खो बैठती है. पश्चिमी एशिया में ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और सीरिया में ये युवा ही थे जिन्होंने क्रांति की लकीरें खींची थीं जो पता चला कि बारूद के ढेरों में बदल गईं और पूरा इलाका धूधू कर जल रहा है. वह पीढ़ी नोटों के अवैधीकरण के नारे को कैसे देखती है और उस के सपने इस से पूरे न हुए तो वह क्या करती है, कहना कठिन है पर दूसरे देशों के उदाहरण कुछ अच्छे नहीं हैं.

रोमांस नहीं, कैरियर संवारें : सायशा सैगल

अपने समय की मशहूर अदाकारा सायरा बानो व ट्रैजिडी किंग दिलीप कुमार की भतीजी शाहीन बानो की बेटी सायशा सैगल को अभिनय विरासत में मिला है. तभी तो महज 19 साल की उम्र में सायशा सैगल एक तेलुगू फिल्म ‘अखिल’ में अभिनय करने के अलावा अजय देवगन निर्देशित हिंदी फिल्म ‘शिवाय’ में अनुष्का का किरदार निभा कर अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब रही हैं. मजेदार बात यह है कि सायशा सैगल ने सब से पहले हिंदी फिल्म शिवाय अनुबंधित की थी. मगर जब यह फिल्म एक वर्ष के लिए रुक गई तो उस बीच उन्होंने तेलुगू फिल्म ‘अखिल’ कर ली. इन दिनों वे एक तमिल फिल्म ‘कुमारी कंदम’ में अभिनय कर रही हैं.

आप सलमान खान की होमप्रोडक्शन फिल्म से बौलीवुड में कैरियर शुरू करने वाली थीं?

मैं ‘शिवाय’ से अपना कैरियर शुरू कर के खुश हूं. सलमान सर मुझे ले कर कोई फिल्म कभी नहीं बना रहे थे, पर मैं उन से सलाह लेती रहती हूं. वे हमारे पारिवारिक मित्र हैं, भविष्य में उन के साथ फिल्म करना चाहूंगी. अब तो अजय देवगन सर भी परिवार की तरह हो गए हैं.

आप की पहली बौलीवुड फिल्म ‘शिवाय’ प्रदर्शित हो चुकी है. किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं?

मैं बहुत खुश हूं कि मुझे बौलीवुड के मशहूर अभिनेता अजय देवगन के साथ फिल्म ‘शिवाय’ से अभिनय कैरियर शुरू करने का अवसर मिला. इस फिल्म का निर्देशन भी अजय देवगन सर ने किया है. हम ने इस फिल्म की शूटिंग बुल्गारिया में की थी. इस में काफी खतरनाक स्टंट सीन्स भी हैं. यह बहुत महंगी फिल्म है. मुझे इस फिल्म से जिस तरह की उम्मीद थी उस से कहीं ज्यादा अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. लोग फिल्म व उस की कहानी के साथसाथ फिल्म में मेरे किरदार अनुष्का की भी काफी तारीफ कर रहे हैं.

यों तो मेरी पहली तेलुगू फिल्म ‘अखिल’ 2015 में प्रदर्शित हो गई थी. फिल्म ने काफी सफलता बटोरी थी. इस के बावजूद फिल्म ‘शिवाय’ के प्रदर्शन से पहले मैं बहुत नर्वस थी, लेकिन अब जिस तरह से दर्शकों ने मुझे स्वीकारा है. उस से मेरा हौसला बढ़ गया है.

पर लोग ‘शिवाय’ की दूसरी अभिनेत्री एरिका कर की भी प्रशंसा कर रहे हैं?

जी हां, मैं ने पहले ही कहा कि लोग पूरी फिल्म की तारीफ कर रहे हैं. आप ने तो फिल्म देखी है. इसलिए आप को भी पता है कि हम दोनों के किरदार बहुत अलग हैं. हम दोनों ने ही इस फिल्म के लिए काफी मेहनत की है. मगर आप इस बात को मानेंगे कि मुझे इस फिल्म में अपनी प्रतिभा को दिखाने का काफी मौका मिला. मैं भी कई खतरनाक दृश्यों का हिस्सा हूं. लोगों ने मेरे किरदार को इसलिए भी ज्यादा पसंद किया, क्योंकि मैं ने इस में एक भारतीय लड़की अनुष्का का किरदार निभाया है जोकि बुल्गारिया में रहते हुए भी भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत है. फिल्म ‘शिवाय’ ने मुझे सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी स्टार अभिनेत्री बना दिया है.

जब अजय देवगन ने इस फिल्म के लिए आप से संपर्क किया था, तो आप की पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

सच यह है कि मैं खुद अजय देवगन सर से मिलने गई थी. मैं तो बचपन से ही अभिनेत्री बनना चाहती थी. जब मैं 9 वर्ष की थी, तभी से मेरी मम्मी ने मुझे नृत्य की शिक्षा दिलवानी शुरू कर दी थी. मैं ने ओडिशी, कत्थक, बेले, हिपहौप सहित कई प्रकार के नृत्य सीखे हैं. इन दिनों मैं जिमनास्टिक सीख रही हूं. मैं ने लंदन और ब्राजील में लैटिन अमेरिकन नृत्य की ट्रेनिंग ली. मैं ने लंदन के अलावा दक्षिण अफ्रीका में स्टेज शो भी किए. फिर स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद मेरे दिमाग में फिल्मों में अभिनय करने का खयाल आया, तो मैं ने लोगों से मिलना शुरू किया. लेकिन जब मैं अजय देवगन सर से मिली, तो उन्होंने बताया कि वे फिल्म ‘शिवाय’ पर काम कर रहे हैं. मुझे लगा कि यह फिल्म मुझे बड़ी आसानी से मिल जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ. मुझे इस फिल्म के लिए पूरे 6-7 घंटे का लंबा औडिशन देना पड़ा. उस के बाद ही मेरा चयन हुआ, पर मेरे लिए इस फिल्म का मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि रही. फिल्म ‘शिवाय’ मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगी, क्योंकि मुझे यह फिल्म मेरे 17वें जन्मदिन पर मिली थी.

बतौर निर्देशक अजय देवगन किस तरह के निर्देशक लगे?

वे एक सुलझे हुए इंसान, बेहतरीन निर्देशक व अभिनेता हैं. उन्हें फिल्म मेकिंग का अच्छा अनुभव है. अभिनेता बनने से पहले उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में काम किया था. इसलिए वे अच्छे तकनीशियन भी हैं. दूसरी बात उन्होंने खुद फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है तो उन के दिमाग में स्पष्ट था कि उन्हें किस दृश्य में कलाकार से क्या चाहिए. वे तो हमें कई बार खुद अभिनय कर के भी बताते थे कि वे क्या चाहते हैं.

फिल्म ‘शिवाय’ देख कर आप के परिवार वालों की क्या प्रतिक्रिया रही?

मेरी मां शाहीन बानो की फूफी नानी सायरा बानो बहुत खुश हैं. उन्हें मेरा काम पसंद आया है. मेरे फूफा नाना यानी कि दिलीप कुमार ने अब तक फिल्म नहीं देखी है. उन की तबीयत ठीक नहीं चल रही है पर जैसे ही वे ठीक हो जाएंगे, मैं उन्हें यह फिल्म दिखाना चाहूंगी.

फिल्म ‘शिवाय’ में आप के बाथ टब स्नान के दृश्य की काफी चर्चा है?

खूबसूरती की चर्चा होनी चाहिए. यह दृश्य कहीं से भी अश्लील नहीं है बल्कि यह दृश्य पटकथा का अहम हिस्सा है. मुझे अश्लीलता व नंगेपन से परहेज है. मुझे किसिंग या इंटीमेट सीन देने से परहेज नहीं है. फिल्म की हीरोइन को ग्लैमरस होना ही चाहिए. मैं किसी भी फिल्म में स्विमिंग सूट या टूपीस बिकिनी सहजता से पहन सकती हूं, पर अश्लील दृश्यों को कभी भी अंजाम नहीं दूंगीं.

पर बोल्ड दृश्य हों तो?

जब तक अश्लीलता नहीं है, तब तक मैं कर सकती हूं. लेकिन बोल्ड दृश्य करना है या नहीं, यह बात निर्देशक और सह कलाकार कौन है इस बात पर भी निर्भर करेगी. कुछ निर्देशक हर दृश्य को बड़ी कलात्मकता के साथ फिल्माते हैं, जबकि कुछ निर्देशकों के दिमाग में तो नंगापन ही रहता है. मैं ऐसे निर्देशकों से दूरी बना कर रखना चाहूंगी. मैं उस दृश्य को कभी अंजाम नहीं दे सकती, जहां मैं खुद को सहज नहीं पाऊंगी.

आप फिल्मी परिवार से हैं. इसलिए आप के लिए सबकुछ बहुत आसान रहा?

मेरी राय में हम फिल्मी परिवारों से आने वाले कलाकारों से लोगों को कुछ ज्यादा ही उम्मीदें होती हैं. उन उम्मीदों को पूरा करने का हम पर दबाव होता है. माना कि किसी स्टार की बेटी होने की वजह से हमें निर्मातानिर्देशकों से मिलने का मौका आसानी से मिल जाता है. मगर हमें अपनी प्रतिभा को साबित करना पड़ता है. यहां महज पहचान या रिश्तेदार होने की वजह से किसी को काम नहीं मिलता, क्योंकि फिल्म कला के साथसाथ व्यापार भी है. एक फिल्म के निर्माण में कई करोड़ रुपए लगते हैं. जहां तक मेरी जानकारी है फिल्म ‘शिवाय’ का बजट 100 करोड़ से अधिक है. इतनी बड़ी लागत वाली फिल्म में महज किसी कलाकार की बेटी या फिल्मी परिवार की सदस्य होने की वजह से काम नहीं दिया जा सकता.

अब आप तमिल व तेलुगू फिल्मों को अलविदा कह देंगी या…?

अलविदा कहने का मेरा कोई इरादा नहीं है. मैं हर भाषा की फिल्में करना चाहती हूं. बशर्ते उस की कहानी बेहतरीन हो और निर्देशक अच्छा हो. फिलहाल तो मेरे हिस्से हिंदी, तमिल व तेलुगू तीनों भाषाओं की बेहतरीन फिल्में आ रही हैं.

लेकिन मैं ने सुना है कि आप पहले सिर्फ हिंदी फिल्में ही करना चाहती थीं?

जी हां, हम जिस माहौल में पलेबढ़े होते हैं, उसी माहौल में रमना चाहते हैं. मैं बचपन से ही बौलीवुड की फिल्में देखते हुए बड़ी हुई हूं. मैं ने बचपन में अपने पिता सुमित सहगल को भी हिंदी फिल्में करते हुए देखा है. मैं ने अपनी मम्मी शाहीन की फिल्में भी देखी हैं. मुझे अपनी मम्मी की फिल्म ‘आई मिलन की रात’ बहुत पसंद है. मैं ने 17 वर्ष की उम्र में हिंदी फिल्म ‘शिवाय’ ही अनुबंधित की थी और इसी फिल्म से मेरे अभिनय कैरियर की शुरुआत होनी थी. लेकिन कुछ वजहों से फिल्म ‘शिवाय’ एक वर्ष के लिए रुक गई थी. मेरे पास समय था पर उस वक्त दक्षिण भारत में काम करने का मेरा कोई इरादा नहीं था. मैं ने सोचा था कि मुझे सिर्फ हिंदी फिल्में ही करनी हैं, लेकिन जब तेलुगू फिल्म के निर्देशक वी वी विनायक मेरे पास तेलुगू फिल्म ‘अखिल’ का औफर ले कर आए तो इस फिल्म की कहानी ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं ने हामी भर दी.

दूसरी बात इस फिल्म में दक्षिण भारत के सुपर स्टार नागार्जुन के बेटे अखिल हीरो थे. फिल्म ‘अखिल’ के प्रदर्शित होने पर जम कर तारीफ मिली और मुझे तमिल फिल्म ‘कुमारी कंदम’ मिल गई. मेरे पास इन दिनों कई फिल्मों के औफर हैं. मैं ने दक्षिण भारत में 2 फिल्मों के लिए हामी भरी है. एक हिंदी फिल्म भी करने वाली हूं, पर अभी इस की घोषणा होना बाकी है. ‘शिवाय’ के प्रदर्शन के बाद भी कुछ औफर मिले हैं, पर पटकथा पढ़ने के बाद ही निर्णय लूंगी.

लगता है आप भी अपनी मां शाहीन की तरह जल्द विवाह करने वाली हैं?

बिलकुल नहीं, मेरी मां ने बहुत जल्दी शादी कर ली थी. शादी के बाद उन्हें अभिनय को अलविदा कहना पड़ा. उस के बाद उन के साथ जो कुछ हुआ, उस को ले कर मैं चर्चा नहीं करना चाहती पर मैं और मेरी मां बहुत खुश हैं. मैं जल्द शादी करने के मूड में नहीं हूं. अभी तो मेरा कैरियर शुरू हुआ है. मुझे अभिनय जगत में बहुत काम करना है. मैं अपना सारा ध्यान अपने अभिनय कैरियर को संवारने में लगाना चाहती हूं.

गृहस्थी के मैदान में हारा खिलाड़ी

बाहरी दिल्ली के कंझावला थाने के अंतर्गत निजामपुर गांव का रहने वाला रोहित छिल्लर कबड्डी का राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी था. वह सोशल मीडिया का मुरीद था. फेसबुक के द्वारा ही उस की बात ललिता नाम की एक युवती से हुई. ललिता दिल्ली के नांगलोई क्षेत्र में अपने मांबाप के साथ रहती थी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट थी.

फेसबुक पर ललिता की फोटो देख कर रोहित बहुत प्रभावित हुआ. वह बेहद खूबसूरत थी. उस के दिल में ललिता के प्रति चाहत पैदा हो गई. अब वह उस से और अधिक चैटिंग करने लगा. ललिता को भी रोहित अच्छा लगता था. वह एक राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी था और नेवी में नौकरी करता था. उस से दोस्ती कर के वह खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी. चैटिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर भी दे दिए तो बाद में उन की फोन पर बात होती रहती.

बातचीत के लहजे से ललिता को रोहित समझदार और शरीफ युवक लगा. फलस्वरूप दोनों के बीच दोस्ती गहरी होती गई और जल्दी ही यह दोस्ती प्यार में बदल गई. अब तो उन की रात की नींद और दिन का चैन गायब हो गया. जब तक वह रोजाना फोन पर बात नहीं कर लेते, उन्हें चैन नहीं आता था. इतना ही नहीं, दोनों ही बालिग थे इसलिए उन्होंने शादी करने का फैसला भी ले लिया. लेकिन वे संभ्रांत परिवार से थे इसलिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे जिस से उन के घर वालों की बदनामी हो. यानी अपनी पसंद में वे घरवालों की सहमति की मुहर लगवाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने इस बारे में अपने घर वालों से बात करने की ठान ली.

रोहित खेल के क्षेत्र में एक उभरता हुआ सितारा था. उस के घर वालों को उम्मीद थी कि उस के लिए अच्छे परिवारों से रिश्ते आएंगे लेकिन एक दिन रोहित ने अपने पिता विजय सिंह से अपने मन की बात बता दी कि वह नांगलोई की ललिता नाम की लड़की को पसंद करता है यदि उस से शादी हो जाए तो अच्छा रहेगा.

बेटे की यह बात सुन कर विजय सिंह चौंकते हुए उसे देखते रह गए कि यह क्या कह रहा है. जवान बेटे से वह सख्ती भी नहीं कर सकते थे. इसलिए उन्होंने उस से ललिता के परिवार आदि के बारे में पूछा तो रोहित को उसे ललिता के परिवार के बारे में जोजो बात मालूम थी, बता दी.

विजय सिंह दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल थे. वह उस की शादी किसी बहुत अच्छे परिवार की लड़की से कराने के ख्वाब देख रहे थे, पर बेटे ने यह बात कह कर उन के सपनों को जैसे धराशाई कर दिया. बेटा कोई लफंगा भी नहीं था जो वह उस की बात पर ध्यान नहीं देते. पहले तो उन्होंने बेटे को समझाने की कोशिश की पर जब उन्हें लगा कि उन के समझाने का भी उस पर कोई असर नहीं पड़ रहा है तो बेटे की खुशी के लिए उन्हें कहना पड़ गया कि इस बारे में वह ललिता के घर वालों से मिल कर बात करेंगे.

ललिता उर्फ बाबरी के पिता करण सिंह डबास नांगलोई की भूतों वाली गली में रहते थे. एक दिन विजय सिंह अपने बेटे रोहित की शादी का प्रस्ताव ले कर करण सिंह के घर पहुंच गए. उन्होंने उन्हें बताया, ‘‘आप की बेटी ललिता और मेरा बेटा रोहित एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. बच्चों की खुशी के लिए इन की शादी कर दी जाए तो ठीक रहेगा.’’

ललिता अपने घर वालों से कोई बात नहीं छिपाती थी. पर ललिता ने इस बारे में अभी तक करण सिंह को कुछ नहीं बताया था इसलिए उन्होंने कह दिया कि इस बारे में उन्हें अभी कुछ पता नहीं है. पहले वह बेटी से बात करेंगे. उस के बाद ही वह कोई जवाब देंगे. तब निराश हो कर विजय सिंह अपने घर लौट आए.

विजय सिंह के जाने के बाद करण सिंह सोचने लगे कि इतनी बड़ी बात के बारे में ललिता ने उन से चर्चा क्यों नहीं की. शाम को ललिता जब घर लौटी तो करण सिंह ने उस से इस बारे में बात की. ललिता ने स्वीकार किया कि वह रोहित को चाहती है. वह बहुत अच्छा लड़का है और कबड्डी का राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी भी है.

ललिता पहले ही ठोकर खाई हुई थी. दरअसल उस का पहले पति से तलाक हो चुका था. उस के बाद वह पिता के घर पर ही पढ़ाई कर के सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही थी. करण सिंह शादी के मामले में जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे. सोचसमझ कर ही वह उस का घर बसाना चाहते थे. पता नहीं क्यों रोहित से उस की शादी करने को उन का मन तैयार नहीं हो रहा था. मन की बात उन्होंने बेटी को बताई भी पर वह नहीं मानी. तब वह असमंजस में पड़ गए कि क्या करें. इस बारे में उन्होंने अपनी पत्नी से भी बात की. पत्नी भी उस की शादी रोहित से कराने के पक्ष में नहीं थी. पर ललिता अपनी जिद पर थी.

रोहित और ललिता की फोन पर बातें होती ही रहती थीं. उन की शादी के संबंध में घर में जो बातें होती थीं, उन्हें वे आपस में शेयर करते रहते थे. उसी दौरान रोहित ने अपने पिता को एक बार फिर ललिता के पिता से बात करने के लिए भेजा. बेटे के लिए वह फिर से करण सिंह के घर पहुंच गए. उधर करण सिंह भी बेटी को नाराज नहीं करना चाहते थे, इसलिए दोनों ही अपनेअपने बच्चों की खुशी की खातिर यह रिश्ता करने को मजबूर थे.

बातचीत के बाद दोनों ही परिवार इस रिश्ते के लिए राजी हो गए. रिश्ता तय हो जाने पर रोहित और ललिता बहुत खुश हुए. फिर सामाजिक रीतिरिवाज से 11 मार्च, 2016 को उन की शादी हो गई. करण सिंह ने बड़े ही आलीशान तरीके से बेटी की शादी की. उन्होंने रोहित को होंडा सिटी कार के अलावा लाखों रुपए का दहेज दिया. चूंकि शादी ललिता और रोहित दोनों की ही मरजी से हुई थी, इसलिए उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी. ललिता हंसीखुशी से निजामपुर गांव स्थित अपनी ससुराल में रहने लगी.

ललिता की ससुराल में सासससुर के अलावा एक ननद थी. कोई भी लड़की जब विदा हो कर ससुराल पहुंचती है तो उस पर दुख के अलावा उसे खुद को दूसरी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार करना पड़ता है. दुख उसे मातापिता का घर छोड़ने का होता है. चूंकि वह ससुराल के लोगों के स्वभाव से अनजान होती है, इसलिए वह यही कोशिश करती है कि ससुराल में वह सभी को खुश रखे यानी इस नई जिम्मेदारी को वह ठीक से निभाने की कोशिश करती है.

ललिता रोहित के स्वभाव को तो कुछ समझ चुकी थी, इसलिए वह सासससुर और ननद को भी खुश रखने की कोशिश करने लगी. वह यही कोशिश करती थी कि किसी को उस के काम और बातव्यवहार से कोई परेशानी न हो. लेकिन शादी के 6 महीने बाद ही ललिता के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गईं कि उस का वैवाहिक जीवन एक तरह से डगमगाने लगा. और एक दिन ऐसा आया कि वह अपने मायके वालों को रोताबिलखता छोड़ गई.

करण सिंह दिल्ली परिवहन निगम में कंडक्टर थे. 7-8 साल पहले उन्होंने वीआरएस ले लिया था, जिस के बाद वह घर पर ही रहते थे. उन का नांगलोई की भूतों वाली गली में एक 3 मंजिला आलीशान मकान है. उन की 3 बेटियां थीं जिन में ललिता सब से छोटी थी. बड़ी बेटी एक बैंक में सीनियर मैनेजर है. करण सिंह दूसरे फ्लोर पर रहते थे. तीनों बेटियों की शादी करने के बाद घर में वह और उन की पत्नी ही रह गई थीं. 17 अक्तूबर 2016 को उन की छोटी बेटी ललिता मायके में ही थी. वह पिछले एक महीने से मायके में ही थी.

उस दिन सब कुछ सामान्य था. शाम का समय था. करण सिंह की पत्नी किचन में खाना बनाने की तैयारी कर रही थीं. पहली मंजिल पर ललिता का स्टडीरूम था और वहीं पर उस का जिम था. अपने स्टडीरूम में रखी किताबों की रैक की सफाई करने के लिए ललिता अपनी मां के पास से पहली मंजिल स्थित अपने कमरे में आ गई. वह उस समय रोजाना की तरह सामान्य ही थी. उसे अपने कमरे में आए हुए करीब एकडेढ़ घंटा हो गया. तब तक मां ने खाना भी तैयार कर लिया था. खाना तैयार होने पर मां ने ललिता को खाने के लिए आवाज दी.

कई आवाजें देने के बाद भी ललिता का कोई जवाब नहीं आया तो ललिता की मां खुद ही उसे बुलाने के लिए पहली मंजिल पर पहुंचीं. उन्हें ललिता का कमरा अंदर से बंद मिला. दरवाजा खटखटाते हुए उन्होंने बेटी को फिर से आवाज लगाई. इस के बावजूद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई. तब उन्होंने पति को बुलाया.

करण सिंह जब नीचे पहुंचे तो उन्हें पत्नी घबराई हुई दिखीं. पत्नी ने उन्हें बताया, ‘‘देखिए, ललिता का कमरा अंदर से बंद है. दरवाजा पीटने के बाद भी वह दरवाजा नहीं खोल रही.’’

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो, वह सो गई होगी. थोड़ी देर में जब सो कर उठ जाएगी तो खुद ही दरवाजा खोल कर आ जाएगी.’’ करण सिंह ने पत्नी को समझाया.

‘‘आज तक वह कभी भी दरवाजा बंद कर के नहीं सोती थी. पता नहीं आज क्यों बंद कर लिया.’’ पत्नी बोलीं.

बात तो सही थी. ललिता सोते समय दरवाजे को केवल भिड़ा देती थी. अंदर सिटकनी नहीं लगाती थी. पर आज उस ने ऐसा क्यों किया. करण सिंह सोचने लगे. उन्होंने उस का फोन नंबर मिलाया तो वह भी स्विच्ड औफ मिला.

अब तो करण सिंह भी परेशान हो गए. उन्होंने भी बेटी को आवाज देते हुए जोर से दरवाजा खटखटाया. जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन की पत्नी का दिल घबराने लगा. उन्होंने जोर से धक्का दे कर दरवाजे की सिटकनी तोड़ दी.

दरवाजा खुलने पर जैसे ही उन्होंने सामने देखा तो दोनों की चीखें निकल गईं. ललिता पंखे में बंधी चुनरी से लटकी हुई थी. करण सिंह जल्दी से दौड़ कर किचन से चाकू ले आए और उन्होंने पत्नी के सहयोग से बेटी के गले में बंधी चुनरी काटी. बेड पर उसे लिटा कर वह उस की सांस चेक करने लगे. पर उस की मौत हो चुकी थी. बेटी को इस हालत में देख कर पतिपत्नी रोने लगे. पत्नी तो बिलखबिलख कर रो रही थी.

करण सिंह के घर से अचानक ही रोने की आवाजें सुन कर पड़ोसी भी उन के घर पहुंचे. वहां जब उन्हें पता चला कि ललिता ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली है तो वे चौंक गए. इस के बाद तो पूरे मोहल्ले में यह खबर फैल गई. करण सिंह ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के इस की सूचना दे दी.

पश्चिमी दिल्ली के थाना नांगलोई के ड्यूटी औफिसर को शाम 7 बज कर 20 मिनट पर पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि भूतों वाली गली नंबर-2 में करण सिंह की बेटी ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. इस सूचना पर एएसआई मदनमोहन 2 कांस्टेबलों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

पहली मंजिल पर उन्हें करीब 27 साल की ललिता बेड पर पड़ी हुई मिली. अपनी मां की हरे रंग की चुनरी से उस ने जो फांसी लगाई थी, उस चुनरी का आधा हिस्सा वहीं पड़ा था और आधा पंखे में बंधा लटक रहा था. एएसआई मदनमोहन ने करण सिंह से इस घटना के संबंध में बात की तो उन्होंने सिलसिलेवार पूरी बात बता दी.

इस के बाद उन्होंने यह सूचना थानाप्रभारी सुनील शर्मा को दे दी. थानाप्रभारी को जब पता चला कि राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी की पत्नी ने आत्महत्या कर ली है तो वह भी एसआई प्रेम यादव के साथ मौके पर पहुंच गए.

जिस कमरे में ललिता ने आत्महत्या की थी, उस कमरे का उन्होंने सरसरी तौर पर निरीक्षण किया. ललिता के गले पर चुनरी बांधने का निशान साफ दिखाई दे रहा था. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी उन्होंने मौके पर बुला लिया. खबर मिलने पर डीसीपी विजय कुमार और एसीपी आनंद सागर भी वहां पहुंच गए.

तलाशी लेने पर ललिता के लोअर की जेब से 2 पेज का एक सुसाइड नोट मिला जो अंगरेजी में लिखा था. कमरे में ही टेबल पर मृतका का फोन भी रखा था. पुलिस ने सुसाइड नोट और फोन अपने कब्जे में ले लिया. सुसाइड नोट में उस ने यह भी लिखा था कि उस के मोबाइल फोन में एक वौइस मेसेज है. अंतिम संस्कार से पहले वह मैसेज सभी को सुना दिया जाए. चूंकि मृतका का फोन पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया था, इसलिए परिजनों के मन में यह जिज्ञासा हो रही थी कि पता नहीं उस ने मैसेज में क्या कहा है. खैर, बाद में पुलिस ने वह मैसेज मृतका के घर वालों को सुना दिए.

क्राइम टीम ने कमरे से जरूरी सबूत जुटाए. इस के बाद डीसीपी ने मृतका के पिता करण सिंह से बात की. करण सिंह ने पुलिस को बताया कि ललिता को उस के ससुराल वाले शादी के 15 दिन बाद से ही परेशान करने लगे थे. वह उस से दहेज की मांग कर के उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करते थे. जिस की वजह से उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा.

पुलिस को मामला दहेज हत्या से संबंधित लगा तो इस की सूचना उपजिलाधिकारी (पंजाबी बाग) अनिल चौधरी को दे दी गई. एसडीएम भी नांगलोई में करण सिंह के घर पहुंच गए. उन्होंने मृतका के घर वालों से बात कर उन के बयान दर्ज किए.

मौके की जरूरी कारवाई निपटाने के बाद पुलिस ने 27 वर्षीय ललिता की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. करण सिंह की तहरीर पर पुलिस ने ललिता के पति रोहित छिल्लर, पिता विजय सिंह और मां सुशीला के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए, 304बी, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

ललिता का पति जो कबड्डी का नेशनल प्लेयर था, वह उस समय मुंबई में था. पत्नी की मौत की खबर मिलने के बावजूद भी वह घर नहीं आया था. उस के मातापिता को जब पता चला कि उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है तो वह भी घर से फरार हो गए. चूंकि मामला मीडिया में हाईलाइट हो चुका था, इसलिए पुलिस भी बहुत सक्रिय हो गई थी. थानाप्रभारी सुनील शर्मा एसआई प्रेम यादव को ले कर रोहित की तलाश में मुंबई निकल गए क्योंकि वह नेवी में नौकरी करता था, उस समय उस की पोस्टिंग मुंबई  में थी. दिल्ली पुलिस ने नेवी अधिकारियों से मुलाकात के बाद कबड्डी खिलाड़ी रोहित छिल्लर को हिरासत में ले लिया. यह 19 अक्तूबर, 2016 की बात है. आरोपी रोहित छिल्लर को मुंबई की कोर्ट में पेश करने के बाद पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर दिल्ली ले आई. उसी दिन रोहित छिल्लर के पिता विजय सिंह ने भी थाने में आत्मसमर्पण कर दिया. ललिता के सुसाइड नोट, वौइस मैसेज, उस के पिता के बयानों के बाद उस के सुसाइड करने की जो वजह सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

रोहित छिल्लर से शादी करने के बाद ललिता के मन में तमाम आकांक्षाएं थीं. चूंकि वह राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी प्लेयर की पत्नी बन चुकी थी, इसलिए उसे यह उम्मीद थी कि पति के साथ वह खूब घूमेगी फिरेगी. जहां भी उस का टूर्नामेंट हुआ करेगा, वह भी उस के साथ जाया करेगी. ऐसा वादा रोहित ने शादी से पहले ललिता से किया भी था. पर ऐसा नहीं हो सका. रोहित ने शादी से पहले ललिता से जो वादे किए थे, वह उन्हें पूरा नहीं कर सका. सच बात यह थी कि वह अपने गृहस्थ जीवन के बजाय खेल को ज्यादा महत्त्व देता था.

रोहित को पता था कि अपनी पहचान बनाने के लिए उस ने कितनी मेहनत की थी. तभी तो वह प्रो कबड्डी के पहले सेशन में पटना पायरेट्स की तरफ से खेला तो वहीं प्रो कबड्डी के दूसरे सेशन में वह बेंगलुरु बुल्स की टीम में खेला. 2016 के साउथ एशियन गेम्स में भी वह गोल्ड मेडलिस्ट रहा. इस से पहले उसे स्पोर्ट्स कोटे के तहत नेवी में नौकरी मिली. तब से वह नेवी की तरफ से ही खेल रहा था. शादी के बाद वह अकसर घर से बाहर ही रहा.

ललिता उस से गृहस्थ जीवन के लिए समय देने की मांग करती तो रोहित कोई न कोई बहाना बना देता था. इस के अलावा घर पर उस के सासससुर भी उसे परेशान करते. वह दिन भर घर के सभी कामों में कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती थी. चूंकि ललिता की सन 2012 में नजफगढ़ के पंकज नाम के युवक से शादी हुई थी. पंकज एक अच्छे परिवार से था पर बाद में पता चला कि वह क्रिकेट के आईपीएल मैचों पर मोटा सट्टा खेलता है.

ललिता को यह पसंद नहीं था. वह मना करती तो पंकज घर में कलह करता था. पति की प्रताड़ना से तंग आ कर ललिता ने 2014 में उस से तलाक ले लिया था. रोहित छिल्लर के मातापिता का आरोप है कि ललिता ने पहले पति से तलाक लेने की बात उस से छिपाई जबकि ललिता कहती थी कि उस ने रोहित को अपने बारे में पहले ही सब कुछ बता दिया था. इतना ही नहीं, उस के पिता ने भी रोहित के पिता को सब बता दिया था.

इस के बाद भी पता नहीं क्यों रोहित के मातापिता ललिता को जबतब इसी बात को ले कर ताने मारते रहते थे. ललिता का आरोप था कि एक बार तो ससुर ने उस की पिटाई तक कर दी थी. यह बात उस ने पति को बताई तो उस ने पिता से पिटाई की वजह तक नहीं पूछी बल्कि उसे ही चुप रहने को कहा. ससुराल में ऐसा कोई नहीं था, जिस से वह अपना दर्द कह सके. पति से ही उम्मीद होती है, पर वह भी मांबाप की हां में हां मिला देता था.

वहीं रोहित ने पुलिस को बताया कि ललिता बहुत समझदार थी पर वह कभीकभी छोटीछोटी बातों को ले कर जिद कर बैठती थी. वह उस के साथ मुंबई चलने को कहती पर वह उसे साथ रखने में असमर्थ था. इस की वजह यह थी कि कभी उस की ट्रेनिंग मुंबई में होती तो कभी बेंगलुरु में तो कभी हैदराबाद में तो कभी दिल्ली में. ऐसे हालात में भला वह उसे साथ कैसे रख सकता था. वह उस की मजबूरी को गंभीरता से नहीं समझती थी.

रोहित ने बताया कि एक बार वह शादी में मिली होंडा सिटी कार से दिल्ली में ही अपने दोस्त के घर से अपने घर निजामपुर लौट रहा था, तभी कार का एक्सीडेंट हो गया, जिस में उस के चोट भी आई थी. घर पहुंच कर उस ने एक्सीडेंट वाली बात पत्नी को बताई तो वह उस की चोट की बजाय यह पूछ रही थी कि गाड़ी में कितना नुकसान हुआ है. उस की इस हरकत पर वह गुस्से में अपने घर के नीचे के फ्लोर पर ही सो गया. जबकि ललिता ऊपर के फ्लोर पर बैडरूम में जा कर सो गई.

रात 12 बजे के बाद ललिता उस के पास आई और उसे उठा कर बैडरूम में ले गई. वह कमरे में पहुंचा तो पंखे से एक चुनरी बंधी हुई मिली. चुनरी का आधा हिस्सा फर्श पर पड़ा था. रोहित ने ललिता से जब इस के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस ने फांसी लगाने की कोशिश की थी पर चुनरी पुरानी थी. जैसे ही वह गले में बांध कर लटकी तो चुनरी के 2 टुकड़े हो गए, जिस से वह फर्श पर गिर गई और चोट भी लग गई.

रोहित ने बताया कि एक बार वह दिल्ली के लाखन माजरा स्थित अपने ट्रेनिंग कैंप में था. ललिता उस से कहती थी कि वह कैंप से रात को घर आ जाया करे, पर रोहित ने ऐसा करने से मना कर दिया तो एक दिन उस ने अपने हाथ की नस काट ली थी. रोहित का कहना है कि वह अपना कैरियर बनाने के लिए भले ही अभी उसे पूरा टाइम नहीं दे पा रहा था, पर वह जो भी कर रहा था, अपने और उस के भावी जीवन को उज्ज्वल बनाने के लिए कर रहा था तो वहीं ललिता के परिवार वालों का कहना है कि शादी के बाद रोहित ने अपनी घरगृहस्थी और जिम्मेदारी को नहीं समझा.

शादी के बाद वह केवल 15 दिन ही ललिता के साथ रहा होगा. वह जब घर से बाहर होता तो ललिता का फोन तक रिसीव नहीं करता था. उस के सासससुर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त करते. अपना दर्द बयां करने के लिए वह उसे फोन करती पर वह फोन नहीं उठाता था, जिस की वजह से ललिता बहुत तनाव में रहती थी. तब वह अपनी मां को फोन कर के आपबीती सुनाती. मां भी उसे समझा देती थीं. रोहित के मातापिता को पता था कि ललिता के कोई भाई नहीं है. उस की 3 बहनें हैं. इसलिए उस के मातापिता की सारी प्रौपर्टी तीनों बहनों की ही होगी. पिता की प्रौपर्टी से अपना हिस्सा लेने की बात वह उस से कहते रहते थे.

इसी बात को ले कर 24 सितंबर, 2016 को रोहित के घर वालों ने ललिता से झगड़ा किया. रोहित उस दिन घर पर ही था. वह भी अपने मांबाप की तरफ हो गया. इस का ललिता को बड़ा दुख हुआ. उसी दिन रोहित गुस्से में ललिता को अपने घर से ले गया और गांव के बाहर छोड़ कर कहीं चला गया. काफी देर इंतजार करने के बाद भी रोहित नहीं आया तो ललिता ने उसे फोन किया, पर उस का फोन आउट औफ कवरेज आ रहा था. ललिता बहुत परेशान थी. मजबूरी में उस ने वहां से अपने पिता को फोन किया. तब करण सिंह बेटी को घर ले गए.

ललिता ने अपने मांबाप को रोरो कर बताया था कि रोहित ने उस के साथ धोखा किया है. मैं उसे समझती क्या थी और वह क्या निकला. अपनी जिद में आ कर उस ने उस से जो शादी की उस का उसे पछतावा अब हो रहा है. उस ने अपने पिता से कहा उस समय आप ठीक थे, पर मैं ने आप की बात नहीं मानी. शादी से पहले रोहित ने प्यार का जो दिखावा किया था, वह केवल छलावा निकला. यहां तक कि उस ने अपनी गरदन पर उस का नाम जो गोदवाया था, वह केवल दिखावा साबित हुआ. मांबाप ने ललिता को तसल्ली दी कि सब्र करो, कुछ दिन में सब नौरमल हो जाएगा. वह बेटी को हमेशा समझाते रहते थे.

24 सितंबर, 2016 से वह अपने मायके में ही रह रही थी. मांबाप की तसल्ली के बाद उसे उम्मीद थी कि रोहित को एक दिन अपनी गलती का अहसास हो जाएगा. 15 अक्तूबर को वह गुरुद्वारा भी गई और अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की दुआ मांगी. ललिता अब अपने पैरों पर खड़े होने के लिए शिक्षिका की नौकरी की तैयारी कर रही थी. इस के लिए वह एक इंस्टीट्यूट से कोचिंग भी ले रही थी.

ललिता ऊपर से एकदम सामान्य दिखती थी लेकिन अंदर ही अंदर ससुराल वालों की बातों को ले कर वह घुटती जा रही थी. वह कितनी परेशान थी, इस का पता उस के सुसाइड नोट और 1 घंटा 27 मिनट के उस के वौइस मैसेज में देखने को मिला. जिस की वजह से उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. करण सिंह ने रोते हुए बताया कि उन की बेटी को आत्महत्या करने के लिए विवश करने वाले नामजद अभियुक्तों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए.

पुलिस ने ललिता के ससुर विजय सिंह से पूछताछ के बाद 22 अक्तूबर को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. जबकि रोहित छिल्लर को 23 अक्तूबर, 2016 को तीसहजारी कोर्ट के महानगर दंडाधिकारी श्री सुशील कुमार की कोर्ट में पेश कर 2 दिन का पुलिस रिमांड लिया. रिमांड अवधि में विस्तार से पूछताछ के बाद उसे 25 अक्तूबर को पुन: न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक रोहित की मां सुशीला देवी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी.

रोहित और ललिता ने प्यार होने के बाद अपनी पसंद से अरेंज मैरिज की थी, पर शादी के बाद दोनों एकदूसरे की भावनाओं को शायद नहीं समझ सके. यदि रोहित घर से बाहर रहता था तो कम से कम उस के मांबाप को ललिता के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए था, जिस से वह पति की गैरमौजूदगी के दिनों को आसानी से बिता सके. पर वह तो उस के अतीत को ले कर ही उस पर कटाक्ष करते रहते थे. जिस का जिक्र ललिता ने अपने वौइस मैसेज में किया है.

शादी के शुरुआती दिनों में नववधू को एडजस्ट होने में कुछ वक्त जरूर लगता है, इस बात को कुछ सासससुर नहीं समझ पाते. वह तो बहू को कामवाली समझते है और सारे काम उस के जिम्मे छोड़ देते हैं. यहीं से उस नववधू की सोच बदल जाती है.

इस केस में रोहित की जो लापरवाही रही वो थी ही, साथ ही उस के मांबाप का रोल भी विवाद को बढ़ाने में अहम रहा. थोड़ी सी समझदारी दिखाई गई होती तो शायद ललिता यह कदम नहीं उठाती. बहरहाल, उस की मौत का जितना दुख उस के मांबाप को हुआ है, उतना शायद किसी को नहीं हुआ होगा. केस की जांच एसआई प्रेम यादव कर रहे हैं. 

– कथा पुलिस सूत्रों और ललिता के मां बाप से की गई बातचीत पर आधारित

– कपूर चंद     

महिला कुश्ती को प्रोत्साहित करती फिल्म ‘दंगल’

रियल लाइफ की गीता फोगट और बबीता कुमारी से प्रेरित होकर बनाई गई फिल्म ‘दंगल’ रेसलर के जीवन में कामयाबी पाने के लिए कितनी जद्दोजहद होती है, उसे बड़ी खुबसूरती से परदे पर उतारने में सफल रही है. ये सही भी है कि मेडल पाने के लिए एक खिलाड़ी को अपने आत्मविश्वास को चरम सीमा पर ले जाने की जरुरत होती है. कुछ सेकंड की दांव-पेंच ही पूरे खेल के इमेज को बदल देती है. इसके अलावा खेल को सही दिशा में ले जाने के लिए एक अच्छे कोच की भी आवश्यकता होती है. ये आसान नहीं होता, क्योंकि भ्रष्ट राजनीति और सिस्टम इस पर हमेशा हावी होता आया है. फिल्म में गीता और बबीता की भूमिका निभाने वाली फातिमा शेख और सान्या मल्होत्रा ने जबरदस्त भूमिका निभाकर रियल लाइफ की गीता और बबीता के साथ पूरा न्याय किया है.

परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वे अपने काम की हर बारीकियों को देखते हैं. कहानी से लेकर पटकथा, संवाद और अभिनय सब कुछ बहुत ही उम्दा है. साक्षी तंवर ने आमिर खान की पत्नी की भूमिका सटीक निभाई है. निर्देशक नितीश तिवारी की यहां तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने एक पल के लिए भी दर्शकों को बोर नहीं होने दिया. इतना ही नहीं ये फिल्म उन राज्य, परिवार और धर्म के ठेकेदारों के लिए एक जोरदार तमाचा है जो लड़कियों को सिर्फ चूल्हा चौका और शादी कर बच्चे पालना ही उनका काम समझते हैं. पुरुष मानसिकता के लिए ये एक अच्छी फिल्म है, जो लड़के को अपना सबकुछ मानते हैं और उसे पाने के लिए कुछ भी कर डालते है.  

फिल्म की कहानी इस प्रकार है-

हरियाणा के एक छोटे से गांव में भूतपूर्व नेशनल चैम्पियन कुश्ती प्लेयर महावीर सिंह फोगट (आमिर खान) अपनी पत्नी दया कौर (साक्षी तंवर) के साथ रहते हैं. उनकी इच्छा है कि उनका एक बेटा हो, जो उनके लिए अन्तर्राष्ट्रीय कुश्ती चैम्पियन में गोल्ड मेडल जीते और देश का नाम रोशन करे. ये उनका सपना था, जो वे किसी कारणवश खुद पूरा कर नहीं पाए थे. लेकिन हर बार उन्हें लड़की ही होती थी.

निराश होकर महावीर ने एक दिन अपने सारे अचिवेमेंट और सपने को एक बॉक्स में बंद कर दिया. लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें लगने लगा कि उनकी छोरियां, गीता फोगट (फातिमा शेख) और बबीता कुमारी (सान्या मल्होत्रा) किसी छोरे से कम ना हैं और उसी दिन से वे उन्हें सख्ती से ट्रेनिंग देने लगे. इसमें उन्हें बहुत कठिनाइयां आई, पर वे टस से मस नहीं हुए. अनुशाषित जीवन, लगन, मेहनत, सही खान-पान और सही तकनीक ही उन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचाती है. रस्ते में जहां भी मुश्किलें आई, महावीर एक मजबूत चट्टान की तरह सामने खड़े रहे.

फिल्म के संगीत निर्देशन को प्रीतम ने बहुत खूबसूरती से गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के शब्दों को कहानी के अनुरूप पिरोया है. ये एक बेहतरीन फिल्म इस साल की है, जिसे पूरा परिवार साथ मिलकर देख सकता है. इसे फोर एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.

पारिवारिक आर्थिक स्तर की चाबी किशोरों के हाथ

वर्तमान में कैसा भी परिवार हो, एकल या संयुक्त, मातापिता के मिल कर नौकरी अथवा व्यापार आदि करने के बाद भी बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है, जो वे अपने बच्चों के लिए करना चाहते हैं, पर पैसों की कमी के कारण नहीं कर पाते.

किशोरावस्था में बच्चे बहुत से सपने देखते हैं. वे नई चीजें सीखना चाहते हैं, घूमना चाहते हैं. नएनए कपड़े खरीदना चाहते हैं, अपने फ्रैंड्स को बर्थडे पर कीमती उपहार देना चाहते हैं. वे अपना जन्मदिन किसी अच्छे रेस्तरां में मनाना चाहते हैं, अपने लिए मोबाइल, लैपटौप आदि खरीदना चाहते हैं. ऐसी अनगिनत अपनी छोटीछोटी इच्छाएं किशोरों को दबानी पड़ती हैं. चाहते हुए भी मातापिता उन की इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाते, जिस का असर परिवार के माहौल पर पड़ता है.

ऐसे माहौल में पलने वाले किशोर अकसर हीनभावना के शिकार हो जाते हैं. परिणामस्वरूप उन के व्यक्तित्त्व का विकास ठीक ढंग से नहीं हो पाता.

यदि किशोर चाहें तो अनेक ऐसे काम हैं जिन्हें वे अपनी पढ़ाई के साथसाथ करते हुए अपने शौक तो पूरे कर ही सकते हैं साथ ही परिवार के आर्थिक स्तर को भी ऊंचा उठा सकते हैं.

छोटे शहर की एक कालोनी में रहने वाला विकास 11वीं कक्षा का छात्र है. उस के पिता एक प्राइवेट कंपनी में 20 हजार रुपए वेतन पाते हैं. उस की 2 छोटी बहनें हैं जो 10वीं और 8वीं में पढ़ रही हैं. मां भी बच्चों के स्कूल जाने के बाद घर का काम निबटा कर एक ब्यूटी पार्लर चला कर 5 हजार रुपए तक कमा लेती हैं, पर इतने पैसे से बच्चों की इच्छाएं पूरी नहीं हो पातीं.

विकास चाहता है कि वह भी अपने अन्य मित्रों की तरह परिवार के साथ फिल्म देखने जाए. जन्मदिन पर सब खाना खाने बाहर जाएं. अपनी इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए उस ने अपने खाली समय में छोटेछोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम शुरू किया. पहले तो उस के पास केवल तीसरी कक्षा के 2 बच्चे पढ़ने आए, पर उस की कम फीस तथा पढ़ाने के ढंग को देखते हुए आज वह शाम को 10-10 बच्चों को 2 बैच में पढ़ा कर 10हजार रुपए महीने तक कमा लेता है.

उस ने अपनी पढ़ाई का खर्च अपने मातापिता से लेना बंद कर दिया है. अब वह अपने परिवार के साथ महीने में एक बार घूमने जाता है. अपनी हर छोटीबड़ी इच्छा को पूरा होते देख वह अब बहुत खुश है.

उस के परिवार का माहौल खुशनुमा हो गया है और विकास में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होने के कारण उस के व्यक्तित्व में स्वावलंबन का गुण विकसित होने लगा है.

10वीं कक्षा में पढ़ने वाली प्रीति ने स्कूल से आने के बाद सिलाई सीखना शुरू कर दिया. जब उस की हमउम्र लड़कियां अपना समय टीवी देखने, इधरउधर की बातें करने में बिताती हैं वहीं प्रीति आसपड़ोस के लोगों के कपड़े सिल कर महीने में 5-6 हजार रुपए कमा लेती है.

उस के इस प्रयास से मातापिता भी बहुत खुश हैं. वह अपनी छोटीबड़ी सभी जरूरतें स्वयं पूरी करती है और साथ ही मातापिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरत का ध्यान भी रखती है.

किशोरों को चाहिए कि वे मातापिता पर निर्भर न रहते हुए अपनी ऊर्जा, बुद्धि व समय का सदुपयोग करते हुए पढ़ने के साथसाथ परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने में पेरैंट्स की मदद करें.

पिछले दिनों डाक्टर ने मेरी ईसीजी की तो उन्हें राइट बंडल ब्रांच ब्लौक होने के लक्षण मिले. अब क्या करूं.

सवाल

मेरी उम्र 43 साल है. मैं छोटे से कसबे में रहता हूं. पिछले दिनों बीमार पड़ने पर जब डाक्टर ने मेरी ईसीजी की तो उस में उन्हें राइट बंडल ब्रांच ब्लौक होने के लक्षण मिले. डाक्टर का कहना था कि मेरे बुखार से इस लक्षण का कोई संबंध नहीं है और इस असामान्यता के मिलने से मैं विचलित नहीं हूं. पर जब से यह जानकारी मिली है मैं मन ही मन बहुत परेशान हूं. समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं. कृपया मार्गदर्शन करें?

जवाब

आप किसी योग्य कार्डियोलौजिस्ट से मिल कर ठीक से जांच करा सकती हैं. हमारे दिल के सुरताल के धड़कने में हृदय पेशियों में बसे नैचुरल इलैक्ट्रिक कंडक्शन सिस्टम का बहुत बड़ा हाथ रहता है. इस सिस्टम में समय से उठने वाली विद्युत तरंगों के चलते ही दिल के अलगअलग हिस्से समय से फैलतेसिकुड़ते हैं.

दिल के दाहिने भाग में राइट बंडल और बाएं हिस्से में लैफ्ट बंडल की तारें बिछी हुई होती हैं, जिन से विद्युत सिगनल पा कर ही दिल का दायां निचला चैंबर और बायां निचला चैंबर क्रमश: हरकत में आते हैं. पर कुछ लोगों में जन्म से या बाद में कुछ खास किस्म के रोगों के होने से यह राइट बंडल ठीक से काम नहीं करता. उस में उठे विद्युत सिगनल बीच में ही टूट जाते हैं. इसे ही राइट बंडल ब्रांच ब्लौक कहते हैं. इस सूरत में बाएं निचले चैंबर में प्रेरित विद्युत सिगनल ही दाईं ओर जा कर दाएं निचले चैंबर को हरकत में लाता है.

यदि यह विकार जन्म से है, तो उस से स्वास्थ्य पर प्राय: कोई बुरा असर नहीं पड़ता. अध्ययनों में पाया गया है कि स्वस्थ से स्वस्थ लोगों में से भी 1.5 से 2% में जन्म में राइट बंडल ब्रांच ब्लौक होता है. इस का ईसीजी से ही पता चलता है.

 

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मैंने अपनी विधवा चाची के साथ कई बार सेक्स किया है. अब वे मुझ से शादी करना चाहती हैं. क्या करूं.

सवाल

मैं 24  साल का हूं. मैं ने अपनी 36 साल की विधवा चाची के साथ कई बार सेक्स किया है. अब वे मुझ से शादी करना चाहती हैं. मेरी चाची की 17 साल की बेटी भी मुझ से बहुत प्यार करती है और शादी करने के लिए जोर दे रही है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

लगता है कि आप घरेलू खिलाड़ी लगते हैं, जो चाची और चचेरी बहन के चक्करों में फंसे हैं. इन चक्करों से दूर निकल कर अपनी जिंदगी बनाने की कोशिश करें, वरना किसी दिन ऐसी मुसीबत में फंसेंगे कि न तो घर के रहेंगे, न ही घाट के.

 

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जियो को टक्कर दे रहा है एयरटेल का अनलिमिटेड प्लान

देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने अपने यूजर्स के लिए दो जबरदस्त प्लान लॉन्च किए हैं. प्री-पेड के बाद कंपनी ने पोस्टपेड प्लान्स पेश किए हैं, जिसके तहत यूजर्स को डाटा, वॉयस कॉल और एसएमएस जैसी सुविधाएं दी जाएंगी. माना जा रहा है कि कंपनी ने रिलायंस जिओ को टक्कर देने के लिए ही ये प्लान्स लॉन्च किए हैं.

एयरटेल लॉन्च करेगी दो इनफिनिटी पैक्स

एयरटेल दो इनफिनिटी पैक्स लॉन्च करने का सोच रही है. पहले प्लान की कीमत 549 रुपये है तो दूसरे की कीमत 799 रुपये है. इनकी वैधता 1 महीने की होगी.

पहला प्लैन

549 रुपये के पैक में 4जी हैंडसेट यूजर्स को 2जीबी 4जी डाटा दिया जाएगा वहीं, 2जी और 3जी यूजर्स को 1जीबी डाटा दिया जाएगा. इसके साथ ही अनलिमिटेड एसएमएस और किसी भी नेटवर्क पर वॉयस कॉलिंग सुविधा दी जाएगी. आपको बता दें कि यूजर एक दिन में 100 एमएमएस ही कर सकते हैं. इसके साथ ही यूजर्स को विंक म्यूजिक (Wynk Music) और विंक मूवीज (Wynk Movies) का पूरा और फ्री सब्सक्रिप्शन मिलेगा.

दूसरा प्लैन

799 रुपये के पैक में 4जी हैंडसेट यूजर्स को 4जीबी 4जी डाटा और 2जी/3जी यूजर्स को 2जीबी डाटा दिया जाएगा. इसके साथ ही जो 549 रुपये के पैक में सुविधाएं दी जा रही हैं, वहीं फायदे इस पैक में भी दिए जाएंगे.

पैसा दांत से पकड़ें

दुनिया के सब से अमीर लोगों में शुमार ‘वारेन बफे’ को कौन नहीं जानता? वे न केवल शेयर मार्केट के बादशाह हैं बल्कि दुनिया के सब से बड़े दानी भी हैं. उन्होंने जीवन में कमाई हुई अधिकतर संपत्ति दान कर दी है. बचपन से ही उन्हें पैसे कमाने की इतनी ललक थी कि वे साइकिल से रोज सुबह अखबार बेचने जाते थे. जब वे केवल 15 वर्ष के थे तब वे अखबार बांट कर 175 डौलर हर महीने कमाते थे और उन पैसों को निवेश में लगा देते थे. इस प्रकार कालेज की पढ़ाई पूरी होने से पहले उन्होंने 90 हजार डौलर कमा लिए थे. इस के बाद उन्होंने अपना मल्टी बिलियन डौलर का साम्राज्य खड़ा किया था.

ठीक इसी तरह क्या आप सोच सकते हैं कि बचपन में दूध बेचने वाला और होटल में वेटर का काम करने वाला व्यक्ति लाखों लोगों को नौकरी पर रख सकता है, किसी इंडस्ट्री को पूरी तरह बदल सकता है. वह दुनिया की सब से बड़ी कंपनी बना सकता है और खुद बन सकता है अमेरिका का रिचैस्ट मैन. यहां हम बात कर रहे हैं दुनिया की सब से बड़ी रिटेल कंपनी ‘वालमार्ट’ के संस्थापक सैम वेल्टन की, जिन्हें मौडर्न रिटेल का जनक भी कहा जाता है. वे 1982 से 1988 तक अमेरिका के सब से अमीर व्यक्ति थे. आज भी वालमार्ट हमेशा टौप 10 कंपनीज में रहती है और अरबों डौलर का व्यापार करती है. यह सब संभव हुआ सैम वेल्टन के मजबूत इरादों और पैसा कमाने की ललक की वजह से.

इसलिए किशोरों को चाहिए कि ऐसे प्रेरक व्यक्तियों से सीख लें व पैसे को दांत से पकड़ें यानी पैसा कमाने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने दें. आइए जानें कैसे :

कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता

किशोरों को लगता है कि हमें जौब हमारी ऐजुकेशन के अनुसार ही मिलनी चाहिए. वैसे देखा जाए तो यह सोच गलत भी नहीं है, लेकिन अगर आप के सामने कोई ऐसा औफर है जो आप के स्टेटस का नहीं है, बस,कामचलाऊ है तो अपनी ईगो में आ कर उसे इनकार न करें बल्कि उस औफर को स्वीकार करें और साथ में अच्छी नौकरी भी तलाश करते रहें. इस से आप किसी न किसी काम पर तो लगे ही रहेंगे और हो सकता है आगे चल कर आप को आप की मनपसंद नौकरी भी मिल जाए. छोटा काम कर के ऐक्सपीरियंस ले कर ही आप बड़े काम कर पाएंगे.

पार्टटाइम काम करें

अगर आप को पार्टटाइम ट्यूशन पढ़ाने या फिर इसी तरह का कुछ घंटे के लिए कोई काम मिल रहा है तो उस काम को कर लें, क्योंकि पढ़ाई के साथसाथ इस तरह का पार्टटाइम काम करने से पैसे कमाने के साथसाथ आप का अनुभव और कौन्फिडैंस भी बढ़ेगा.

लाइन से हट कर जौब हो तो भी करें

किशोरों को लगता है कि हम ने जिस फील्ड की पढ़ाई की है उसी में जौब चाहिए जैसे कंप्यूटर साइंस से पढ़ाई की है तो उसी में जौब चाहिए, लेकिन कई बार तमाम कोशिशों के बाद भी उस फील्ड में जौब नहीं मिल पाती. ऐसे में घर में बेकार बैठे रहना मूर्खता है बल्कि इस के विपरीत यदि किसी और फील्ड में जैसे एचआर वगैरा में कोई अच्छी जौब मिल रही है तो उसे कर लें, क्या पता यहीं से आप के लिए आगे का रास्ता खुल जाए.

अगर आप बेकार बैठे रहेंगे तो आगे इंटरव्यू में आप से यह सवाल भी किया जा सकता है कि कोर्स पूरा होने के बाद 6 महीने तक आप ने क्या किया. तब कम से कम यह तो कह सकते हैं कि मैं ने यह जौब की है.

कौल सैंटर बुरा औप्शन नहीं

कई लोगों को लगता है कि कौल सैंटर की जौब भी भला कोई जौब है, लेकिन सच है कि किशोरों के लिए कौल सैंटर की जौब भी शुरुआत करने के लिए बुरी नहीं है. यहां सैलरी भी ठीकठाक मिलती है और आनेजाने की सुविधा भी. अगर बात अच्छी नौकरी की है तो दिन में इंटरव्यू के लिए भी आराम से जा सकते हैं.

सही समय के इंतजार में बैठे न रहें

अभी तो मैं पढ़ रहा हूं. अभी मेरी उम्र ही क्या है, अभी तो पापा पौकेटमनी दे ही देते हैं. अगर आप भी इन्हीं जुमलों पर यकीन कर आगे बढ़ रहे हैं तो यह अच्छी बात नहीं है. पैसा कमाने की कोई उम्र नहीं होती, वह तो कभी भी कमाना शुरू किया जा सकता है. बस, आप में काबिलीयत होनी चाहिए. कब तक पापा से पौकेटमनी लेते रहेंगे, अपनी राह खुद बनाइए. यह जरूरी नहीं कि कालेज के बाद ही नौकरी का सही वक्त आएगा. पैसा कमाने का सही वक्त वही होगा जब आप कमाना शुरू कर देंगे बल्कि जितना जल्दी कमाना शुरू करेंगे उतना ही जल्दी लाइफ में सैटल भी होंगे.                                              

इन बातों पर भी ध्यान दें

– मौका बारबार नहीं मिलता. अगर आप के पास पैसा कमाने का कोई अच्छा जरिया है तो उसे यों ही हाथ से न जाने दें बल्कि पूरी तन्मयता के साथ उसे पकड़ें और पैसा कमाने में जुट जाएं, क्योंकि जो सुविधा और अवसर आप को आज मिला है जरूरी नहीं कि वह कल भी मिले.

– घर पर खाली बैठना ठीक नहीं है. इस से कुछ हासिल नहीं होगा, कहीं काम करेंगे तो चार पैसे ही हाथ में आएंगे.

– पैसे भले ही कम हों, लेकिन ऐक्पीरियंस तो अच्छा मिल रहा है न.

– नौकरी नहीं होगी तो लोग भी बातें बनाएंगे कि देखो अभी तक खाली है. लोग आप की काबिलीयत पर भी सवाल उठाने लगेंगे कि इस में ही कोई कमी होगी तभी नौकरी नहीं मिली. ये बातें जाहिर है आप को भी अच्छी नहीं लगेंगी.

– पैसा कमा कर लाएंगे तो घर में छोटे भाईबहन और मातापिता भी आप को जिम्मेदार समझने लगेंगे और सब की नजरों में आप की इज्जत बढ़ जाएगी.

– खाली बैठ कर सोचते रहना और समय बरबाद करने से कुछ हासिल नहीं होगा इसलिए समय का सदुपयोग करें.

– इस का मतलब यह नहीं है कि पैसा कमाने के लिए गलत रास्ता अख्तियार कर लें. पैसा कमाएं जरूर लेकिन सही रास्ता अपनाएं.

– पैसा कमाने के चक्कर में अपनी पढ़ाई को डिस्टर्ब न करें. पढ़ाई और जौब में ऐडजस्टमैंट बैठाएं.

अवसर पैदा करें

– अखबारों में आने वाली नौकरियों पर नजर रखें. आएदिन अखबारों में नौकरियों से संबंधित विज्ञापन छपते रहते हैं, उन पर ध्यान दें.

–  अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से कहें कि वे नौकरी ढूंढ़ने में आप की मदद करें.

– नौकरी डौट कौम आदि कई ऐसी साइट्स हैं, जिन पर अपना रिज्यूमे भेज कर आप नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते हैं.

– कुछ अच्छी कंपनियों के पते निकाल कर पर्सनली रिज्यूमे दे कर आएं तथा उन के संपर्क में रहें.

– जहां मौका मिले वहां फ्रीलांसिंग का काम शुरू करें, हो सकता है काम पसंद आने पर आप को फुलटाइम भी कर दिया जाए.

– कालेज प्लेसमैंट में बढ़चढ़ कर पूरी तैयारी के साथ हिस्सा लें और अच्छा प्रदर्शन कर नौकरी पाए.

अब सूर्य की किरणों से बनेगा उर्वरक

वैज्ञानिकों ने सूर्य के प्रकाश का इस्तेमाल करके उर्वरक के मुख्य घटक अमोनिया की एक नई पर्यावरणोन्मुखी किस्म का निर्माण किया है.

अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अनुसंधान में पाया कि डाईनाइट्रोजन (एन2) में बदलाव के लिए प्रकाश ऊर्जा का इस्तेमाल करके उससे नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के यौगिक अमोनिया (एनएच3) का निर्माण किया जा सकता है. एन2 एक अणु है जो नाइट्रोजन के दो परमाणुओं से मिलकर बना होता है.

अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि अमोनिया का निर्माण करने वाली प्रकाश संचालित नई रासायनिक प्रक्रिया से वैश्विक स्तर पर कृषि को बढ़ावा मिलेगा और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटेगी. अमेरिका के ऊर्जा मंत्रालय के राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा प्रयोगशाला (एनआरईएल) और कोलोराडो बोल्डर (सीयू बोल्डर) यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि प्रकाश की उपस्थिति में कैडमियम सल्फाइड यौगिक के नैनो आकार के रवों का इस्तेमाल करने से रासायनिक परिवर्तन के दौरान इलेक्ट्रॉन में इतनी उर्जा जुड़ जाती है कि इसके कारण एन2 अमोनिया में परिवर्तित हो जाता है.

जीवों के इस्तेमाल के लिए धरती के वातावरण में नाइट्रोजन एक आम गैस है. पारंपरिक तौर पर नाइट्रोजन परिवर्तन के दो मुख्य तरीके हैं – पहला जैविक प्रक्रिया है, जिसमें वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन फलियों (लेग्यूम) जैसे कुछ पादपों की जड़ों में पाए जाने वाले जीवाणु के संपर्क में आता है और फिर नाइट्रोजीनेज नामक एंजाइम की उपस्थिति में अमोनिया में परिवर्तित होत है. 

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