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नजदीकी की जिद

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे लंबे समय से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खफा चल रहे थे जिस से शिवसेना और भाजपा के बीच दूरियां बढ़ रही थीं. बीती 24 दिसंबर को नरेंद्र मोदी कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेने मुंबई पहुंचे तो उद्धव ने पहले तो उन के कार्यक्रमों में जाने से इनकार कर दिया था पर शिवसेना के ही कुछ नेताओं ने उन्हें समझाया कि अब इस जिद और ठसक से कुछ हासिल नहीं होने वाला, तो वे नरम पड़े. लेकिन प्रधानमंत्री के आयोजनों में शामिल होने के लिए उद्धव ने बच्चों जैसी जिद ठान ली कि ठीक है, शामिल होऊंगा पर बैठूंगा नरेंद्र मोदी के अगलबगल में. इस हठ को सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया. बड़े आदमी के बगल में बैठने से छोटा आदमी भी अपनेआप को बड़ा समझने लगता है. उस के लिए यह मौका किसी उपलब्धि से कम नहीं होता. ऐसे टोटकों से दूरियां कम हों न हों पर उद्धव क्यों मोदी के सान्निध्य के लिए इतने बेचैन थे, यह किसी की समझ नहीं आया.

साहित्य भी बदल रहा है

जयपुर में 19 जनवरी से आयोजित होने जा रहे लिटरेचर फैस्टिवल में पहली दफा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े चेहरे मनमोहन वैद्य और दत्तात्रेय होसबोले प्रमुखता से नजर आएंगे. 5 दिवसीय  साहित्यिक जलसे में इस दफा असहिष्णुता के मुद्दे पर ज्ञानपीठ पुरस्कार लौटा चुके साहित्यकार उदय प्रकाश, के सच्चिदानंद और अशोक वाजपेयी आमंत्रित नहीं किए गए हैं.

पिछले 10 वर्षों में ऐसा पहली दफा हो रहा है जब साहित्य और हिंदुत्व का अनूठा संगम देखने को मिलेगा. जब देश बदल रहा है तो उसे हर स्तर पर बदलना चाहिए क्योंकि सत्ता के साथसाथ आस्थाएं और विचारधाराएं भी तो बदल जाती हैं. ढाई सौ के लगभग साहित्यकारों और विचारकों के बीच आरएसएस के ये चिंतक शायद ही बताएंगे कि संस्कृति और साहित्य के माने क्या होते हैं और ये कैसेकैसे एक षड्यंत्र के तहत बदले गए थे. अब इन्हें इन के मूल स्वरूप में ऐसे समारोहों के जरिए पुनर्स्थापित किया जाएगा.

रामराज-मोदीराज

अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और नितिन गडकरी, इन तीनों मंत्रियों में कौन नरेंद्र मोदी का बड़ा चाटुकार है, यह तय कर पाना मुश्किल काम है. मोदी की खुशामद करने की इन तीनों की अलगअलग शैली और तौरतरीके हैं. नितिन गडकरी ने घोषित कर दिया है कि मोदीराज असल में लगभग रामराज है.

रामराज एक अवधारणा है जिस में प्रजा को कोई कष्ट नहीं है, चारों तरफ खुशहाली है, लोग पूजापाठ में लगे रहते हैं. कुटियों में रह रहे ऋषिमुनियों के लिए फलफूल और चढ़ावा ले जाते हैं और बदले में एक अदद आशीर्वाद ला कर फिर से राम की स्तुति में लग जाते हैं. यही गडकरी बता रहे हैं कि सब दुखदर्द भूल जाओ, मोदी का गुणगान करो तो दुख पास नहीं फटकेगा. इस दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान का सार कुछकुछ राहुल गांधी के उस बयान सरीखा है कि गरीबी एक मानसिक अवस्था है. ठीक इसी तरह, रामराज की फीलिंग का मशवरा गडकरी दे रहे हैं. यानी सुख होता नहीं है, बल्कि महसूस करना पड़ता है. वैसे, रामराज में क्या होता था, यह अगर वाल्मीकि रामायण में आंखें खोल कर पढ़ा जाए तो समझ आ जाएगा कि राम को इस महाकाव्य में जो करते दर्शाया गया है वही नरेंद्र मोदी कर रहे हैं और तर्क में विश्वास रखने वालों को यह आसानी से पचेगा नहीं.

 

दोनों तरफ शशिकला

जयललिता कइयों की अभिभावक थीं पर घोषित तौर पर खुद का वारिस नहीं छोड़ गई हैं. नतीजतन, कोई भी उन की छोड़ी खैरात और अकूत दौलत को नश्वर नहीं समझना चाहता. शुरुआती समझौते या फार्मूले के तहत जयललिता के चहेते पनीर सेल्वम मुख्यमंत्री बन गए और जयललिता की अभिन्न सहेली शशिकला नटराजन यानी चिन्नमा (मौसी) को पार्टी की बागडोर सौंप देने पर सहमति बन गई.

अन्नाद्रमुक की एक बागी नेता शशिकला पुष्पा चिन्नमा को पार्टी महासचिव बनाए जाने के लिए पार्टी के बड़े नेता लामबंद हैं. मुमकिन है, वे कुछ न कर पाएं लेकिन अन्नाद्रमुक की टूटफूट और रंग लाएगी जिस का फायदा उठाने के लिए भाजपा ने तैयारियां शुरू कर दी हैं. इस का पहला चरण फिल्म अभिनेता रजनीकांत को मुख्यि बना कर पेश करना है. खुद रजनीकांत भी तमिलनाडु का सीएम बनने के लिए छटपटा रहे हैं और इस टूटफूट का फायदा उन्हें मिलना तय है.

सैक्स सुखदायक है पर…

सैक्सोलौजिस्ट डा. चंद्रकिशोर कुंदरा के मुताबिक, ‘प्रेमीप्रेमिका के बीच सैक्स संबंध स्थापित करने के लिए भौतिक, रासायनिक व मनोवैज्ञानिक कारक ही जिम्मेदार होते हैं. सैक्स ही एक ऐसी सरल क्रिया है जो प्रेमीप्रेमिका को एकसाथ एक ही समय में पूर्ण तृप्ति देती है.’

सैक्स की संपूर्णता प्रेमिका के बजाय प्रेमी पर निर्भर करती है, क्योंकि प्रेमी ही इस की पहल करता है. प्रेमिका सैक्स में केवल सहयोग ही नहीं करती बल्कि पूर्ण आनंद भी चाहती है. अकसर प्रेमीप्रेमिका सैक्स को सुखदायक मानते हैं, लेकिन कई बार सहवास ऐंजौय के साथसाथ कई समस्याओं को भी सामने लाता है. अनुभव के आधार पर इन को दूर कर प्रेमीप्रेमिका सैक्स का सुख उठाते हैं.

शरारती बनें

सैक्स को मानसिक व शारीरिक रूप से ऐंजौय करने के लिए प्रेमीप्रेमिका को शरारती बनना चाहिए. उत्साह, जोश, तनावमुक्त, हंसमुख, जिंदादिल, शरारती प्रेमीप्रेमिका ही सैक्स को संपूर्ण रूप से भोगते हैं.

आत्मविश्वास की कमी न हो

कई बार आत्मविश्वास की कमी हो जाती है. प्रेमी सैक्स के समय उतावलेपन के शिकार हो कर सैक्स के सुखदायक एहसास से वंचित रह जाते हैं.

सैक्स संबंध बनाते समय प्रेमीप्रेमिका के मन में यदि पौजिटिव सोच होगी, तभी दोनों पूर्ण रूप से संतुष्ट हो पाएंगे और सैक्स में कभी कमजोर नहीं पड़ेंगे.

पोर्न फिल्मों से प्रेरित न हों

प्रेमीप्रेमिका अकसर पोर्न फिल्में देख कर, किताबें पढ़ कर सैक्स में हर पल लिप्त रहने की कोशिश करते हैं. अत्यधिक मानसिक कामोत्तेजना की स्थिति में शीघ्रपतन व तनाव में कमी हो जाती है.

सैक्स में जल्दबाजी

कई बार सैक्स में प्रेमीप्रेमिका जल्दबाजी कर जाते हैं. शराब पी कर सैक्स करना चाहते हैं जोकि ठीक नहीं है. हमेशा मादक पदार्थों से दूर रहें. सैक्स के दौरान प्रेमिका ही मादकता का काम करती है.

बढ़ाएं शारीरिक आकर्षण

सहवास के लिए प्रेमी का शारीरिक आकर्षण, स्मार्टनैस, सैक्सी लुक, साफसफाई काफी महत्त्वपूर्ण है. पुरुषोचित्त गुण के साथसाथ गठीले बदन वाले चतुर सुरुचिपूर्ण वस्त्र, रसिक स्वभाव के प्रेमी ही सैक्स में सफल होते हैं.

रोमांटिक स्वभाव रखें

प्रेमिका सहवास के दौरान चाहती है कि उस का प्रेमी रोमांस व ताजगी द्वारा उसे कामोत्तेजित करे. अत: रोमांस की बातें कर सैक्स को सुखदायक बनाएं.

जब सैक्स का मौका मिले

प्रेमीप्रेमिका अकसर सैक्स के लिए मौके की तलाश में रहते हैं. जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे एकदूसरे में समाने के लिए बेताब हो जाते हैं, लेकिन इस दौरान कई बार ऐसे अचानक किसी का दरवाजा खटखटाना व फोन की घंटी बज जाती है. ऐसी बाधाओं को दूर कर सहवास को मानसिक व शारीरिक रूप से सुखदायक बनाएं.

पेरिस : सपनों का शहर

बचपन से ही दिल में पेरिस घूमने की ख्वाहिश थी, जो इस साल पूरी हुई. 2 फ्लाइट बदलने और 16 घंटे सफर करने के बाद जब हम पेरिस के चार्ल्स डि गौले एयरपोर्ट पहुंचे तो थकान के बावजूद सभी बहुत खुश और उत्साहित थे. हम एयरपोर्ट से सीधे होटल पहुंचे. हमारा घूमनेफिरने का प्रोग्राम अगले दिन से था, क्योंकि हम उस दिन शाम 8 बजे के करीब वहां पहुंचे थे. जब एयरपोर्ट से बाहर निकले तो अच्छीखासी धूप निकली हुई थी, क्योंकि वहां अंधेरा 10 बजे के आसपास होता है और सुबह 5 बजे तक दिन निकल आता है. हम सब उजाला देख कर बहुत खुश हुए.

होटल तक के कई किलोमीटर लंबे रास्ते में हम ने कई बातें नोट कीं जैसे वहां की बिल्डिंग्स बहुत खूबसूरत हैं, पूरे शहर में कहीं भी गंदगी का नामोनिशान नहीं है, यहां सभी गाडि़यां लैफ्ट हैंड ड्राइव हैं और यहां भी काफी देर तक ट्रैफिक जाम में फंसना पड़ता है.

अगले दिन हम लोग सब से पहले डिज्नीलैंड गए, जो शहर से थोड़ा दूर है. वाल्ट डिज्नी के पात्रों और फिल्मों की थीम पर बना यह पार्क इतना बड़ा है कि एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाने के लिए ट्रेन का सहारा लेना पड़ता है.

जैसेजैसे हम अंदर की ओर बढ़ते गए. ऐलिस इन वंडरलैंड, पीटर पैन, पाइरेट्स औफ द कैरेबियन स्नोव्हाइट आदि जितने भी डिज्नी के मशहूर पात्र हैं, सब हमारी आंखों के आगे जीवंत हो उठे. हर राइड मानो अपने पात्र की पूरी कहानी बयां कर रही थी. स्लीपिंग ब्यूटी का महल पार्क के बीचोंबीच बना हुआ है और यह पूरे डिज्नीलैंड की शान है. यह महल इतना सुंदर है कि एक बार को तो हमें ऐसा लगा मानो हम सचमुच परीलोक में ही आ गए हैं.

शाम के समय इस में लेजर शो होता है, जो दर्शकों को सम्मोहित करता है. बड़ेबड़े पेड़ों पर बने रोबिनसन के घर (ट्री हाउस) देखने के लिए संकरी सीढि़यों से चढ़ कर जाना पड़ता है, जो बड़ा ही रोमांचक है. पाइरेट्स की राइड में जब घने अंधेरे और डाकुओं की तलवारों के शोरशराबे के बीच अचानक आप की गाड़ी कई फुट नीचे गिरती है तो रोमांच के साथसाथ थोड़ा डर भी लगता है. शाम के समय निकलने वाली परेड देख कर तो मजा आ गया. इस में डिज्नी के सारे पात्र नाचतेकूदते पूरे डिज्नीलैंड का चक्कर लगाते हैं. पूरा दिन यहां बिता कर शाम को हम ली इन्वैलिड्स गए.

यहां कुछ म्यूजियम और कुछ अन्य इमारतें बनी हुई थीं, जिन्हें लुइ 14वें ने युद्ध में घायल सैनिकों के इलाज के लिए बनवाया था. बूढ़े और अपाहिज सैनिकों व उन के परिवारों के लिए यहां मुफ्त में खानेपीने, इलाज और रहने का इंतजाम किया जाता था. नैपोलियन और उस के परिवार के कई सदस्यों तथा फौज के अनेक मार्शलों की कब्रें भी यहीं पर बनी हुई हैं.

यहां से हम आर्क औफ ट्राइंफ गए, जो इंडिया गेट की याद दिला रहा था. फ्रांस की क्रांति और अनेक युद्धों में मारे गए शहीदों की याद में यह गेट बनाया गया है और इंडिया गेट की ही तरह इस की दीवारों पर भी शहीदों के नाम खुदे हुए हैं.

अब रात के 9 बज चुके थे और हमें वापस होटल लौटना था. रास्ते में हमारे गाइड ने पेरिस के बनने की कहानी सुनाई, जो बड़ी रोचक थी. वर्ष 1852 तक पेरिस आम शहर जैसा ही था. 1852 में नैपोलियन बोनापार्ट का भतीजा लुई राजा बना. वह शहर को बिलकुल नए रूप में ढालना चाहता था और राजा बनते ही उस ने इस पर काम शुरू भी कर दिया.

बैरन हौसमैन नामक इंजीनियर को उस ने यह काम सौंपा. वह चाहता था कि उस का शहर न सिर्फ सुंदर बने बल्कि उस के हर हिस्से से अमीरी टपकती दिखाई दे. लुई ने शहर में जितनी भी गरीब बस्तियां थीं, उन्हें उजाड़ कर जनता को जबरदस्ती शहर के बाहरी हिस्सों में भेज दिया और फिर चौड़ी खूबसूरत सड़कों, बड़ेबड़े ब्लौक्स और महंगे बाजारों तथा बड़े सुंदर घरों का निर्माण शुरू किया. हरियाली की कमी न हो, इस बात का भी दोनों ने पूरा ध्यान रखा.

17 साल तक यह सारा काम चलता रहा और जनता हौसमैन को कोसती और गालियां देती रही. गरीब तो गरीब, अमीरों ने भी उस का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन 1870 तक जो पेरिस बन कर तैयार हुआ, उस ने हैरान कर दिया और कुछ ही समय में सारा विरोध खत्म हो कर यह शहर पूरे यूरोप के गर्व का कारण बन गया. अगले दिन सुबह सब से पहले हम एफिल टावर देखने गए. 2 घंटे लाइन में इंतजार करने के बाद जब हम ऊपर पहुंचे, तो वहां से पूरे पेरिस का सुंदर दृश्य देखने को मिला, उसे देख कर हम सब अभिभूत हो गए. वेसे तो इस की ऊंचाई लगभग 1 हजार फुट है, लेकिन मैटल से बना होने के कारण सूर्य की गरमी से प्रभावित हो कर यह मौसम के अनुसार 15 सेंटीमीटर तक घटताबढ़ता रहता है. इस के डिजाइनर अलैक्जेंडर गुस्ताव एफिल के नाम पर ही इस का नाम रखा गया है.

हमारे गाइड ने बताया कि वर्ष 1889 में फ्रांस की क्रांति के 100 साल पूरे होने पर फ्रांस में जश्न मनाया जा रहा था. इस के लिए वहां एक बड़ा वर्ल्ड फेयर आयोजित किया जा रहा था, जिस के मुख्य द्वार के रूप में एक बड़ा भव्य टावर बनाने का निश्चय किया गया, जिसे बाद में तोड़ा जाना था. लेकिन जब यह बन कर तैयार हुआ, तो इस की सुंदरता को देख कर इसे नष्ट करने का विचार त्याग दिया गया.

आजकल इसे एक बड़े रेडियो ऐंटीना की तरह प्रयोग किया जाता है. आज की तारीख में यह टावर पेरिस की पहचान और शान दोनों बन गया है. वहां के लोग अपनी इस धरोहर से कितना प्यार करते हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब हिटलर पेरिस में घुसा तो लोगों ने टावर की लिफ्ट के केबल काट दिए ताकि  वह उन के शहर की इस शान पर चढ़ न सके. हिटलर कुछ सीढि़यां तो चढ़ा, पर फिर हार मान कर लौट गया.

इस के बाद हम सैंट चैपल चर्च और नोट्रे डैम कथीड्रल गए. दोनों ही चर्च दुनिया के मशहूर चर्चों में से हैं और अत्यंत खूबसूरत हैं. नोट्रे डैम कथीड्रल में जीजस क्राइस्ट के क्रौस का एक छोटा सा टुकड़ा क्राउन औफ थोर्न तथा कुछ अन्य रेलिक्स भी रखे गए हैं. नैपोलियन बोनापार्ट का राज्याभिषेक भी यहीं हुआ था. यहां बहुत बड़ेबड़े 10 घंटे हैं, जिन में से सब से बड़ा 13 टन से भी अधिक भारी है और इस का नाम इमान्युएल है. यहां से हम कौनकौर्ड स्क्वायर होते हुए लूव्र म्यूजियम पहुंचे. कौनकौर्ड स्कैवायर वह जगह है जहां लुई 16वें और उस की पत्नी मैरी एंटोनिएट के सिर काटे गए थे. लुई की तानाशाही से फ्रांस की जनता बहुत दुखी थी और मैरी से तो सब घृणा करते थे. एक तो वह आस्ट्रिया के राजपरिवार की बेटी थी और दूसरे बहुत ही फुजूलखर्च, घमंडी और बेवकूफ थी.

जब उसे यह बताया गया कि उस के राज्य में लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है और वे भूखों मर रहे हैं, तो उस बेवकूफ औरत का जवाब था, ‘‘उन के पास रोटी नहीं है तो वे केक क्यों नहीं खा लेते?’’ इस से पहले से ही गुस्साई जनता और भड़क गई और उन दोनों को पकड़ कर उन्होंने मार दिया. इस प्रकार कौनकौर्ड स्क्वायर फ्रांस की क्रांति का प्रतीक बना. जब हम लूव्र म्यूजियम पहुंचे तो उस के सामने बना कांच का विशाल पिरामिड देखा.

यह म्यूजियम कई वजहों से खास है. पहला, यह पूरे संसार के कुछ सब से बड़े म्यूजियमों में से एक है. इस के बारे में कहा जाता है कि अगर आप यहां की हर कलाकृति को सिर्फ 4 सैकंड के लिए देख कर आगे बढ़ जाएं तो भी आप को पूरा म्यूजियम देखने के लिए 3 महीने का समय चाहिए. दूसरा, मोनालिसा, वर्जिन औफ द रौक्स और हम्मूराबी की आचारसंहिता जैसी अनेक विश्वप्रसिद्ध कलाकृतियां यहीं पर हैं, जिन्हें देखने विश्व के कोनेकोने से लोग आते हैं. मोनालिसा की पेंटिंग के आगे जब हम खड़े हुए तो उस की भव्यता देख कर समझ आया कि सारी दुनिया उस की दीवानी क्यों है. लेखक डैन ब्राउन की बहुचर्चित पुस्तक  ‘द डा विनची कोड’ में इस म्यूजियम का बहुत ही मनोरंजक चित्रण किया गया है. यह हमारी पेरिस यात्रा का अंतिम पड़ाव था और यहां से वापस होटल जाते समय पेरिस घूमने की खुशी थी तो जल्दी वापस जाने का गम भी. सपनों के शहर पेरिस का यह ट्रिप हमें हमेशा याद रहेगा.                          

ले डूबी रंगीनमिजाजी

मई, 2016 को स्पेन में मलागा की अदालत से आने वाले एक चर्चित मामले के फैसले का लोगों को बड़ी बेसब्री से इंतजार था. आरोपी और पीडि़त के परिजनों से ले कर मीडिया के लोगों तक को फैसला सुनने की उत्सुकता थी. यह हाईप्रोफाइल मामला ब्रिटेन के 48 वर्षीय सोने के व्यापारी एंडी बुश की हत्या का था. उन की हत्या 5 अप्रैल, 2014 को स्पेन के शहर मारबेला के कोस्टा डेल सोल नामक मशहूर बीच पर स्थित होटल हौलिडे विला में उन की पूर्व प्रेमिका द्वारा गोली मार कर की गई थी. हत्या का आरोप 26 वर्षीया स्विमवियर मौडल मायका मैरीका कुकुकोवा पर था. अपराध साबित हो जाने के बाद उसे सजा के लिए दोषी करार दिया जा चुका था.

अदालत में बुश की 22 वर्षीया बेटी एल्ली अपनी 44 वर्षीया बुआ रशेल के साथ मौजूद थी. जबकि ज्यूरी के सामने सिर झुकाए चिंतातुर बैठी आरोपी कुकुकोवा अपने चेहरे को हथेली से बारबार ढंकने का प्रयास कर रही थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी से खासकर एल्ली और रशेल से नजरें मिलाने से बचना चाह रही हो. हालांकि सुनवाई के दौरान उन तीनों का अदालत में पहले भी कई बार आमनासामना हो चुका था, लेकिन तब वे अपनीअपनी बातों को साबित करने की कोशिश करते हुए इतनी अधिक असहज महसूस नहीं करती थीं, जितना कि उन्हें फैसले की घड़ी के वक्त महसूस हो रहा था.

मायका मैरीका कुकुकोवा अपने बचाव के लिए हर संभव प्रयास कर चुकी थी. लेकिन सबूतों के अभाव में उस की दलीलों को खारिज कर दिया गया था. फिर भी क्यूडेड ला जस्टिका के निर्णायक मंडल द्वारा उसे एक और अंतिम मौका दिया गया था, ताकि वह बचाव संबंधी औपचारिक याचिका दायर कर सके.

कुकुकोवा ने भले ही बचाव के लिए कोई याचिका नहीं दायर की थी, लेकिन इतना जरूर कहा था कि बुश ने उस के ऊपर हमला किया था और उस ने अपनी आत्मरक्षा में उसे गोली मारी थी.

बुश को चोट पहुंचाने का उस का कोई मकसद कभी नहीं था, क्योंकि अपनी उम्र से दोगुनी उम्र का होने के बावजूद वह उस से बेइंतहा मोहब्बत करती थी. उस ने भावुकता के साथ कहा था कि वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी, लेकिन उन के प्रेम में किसी तीसरे के शामिल होने से वह काफी दुखी थी.

निर्णायक मंडल ने फैसला सुनाने के दरम्यान कहा कि घटना के 6 महीने पहले ही कुकुकोवा और बुश के बीच संबंध खराब हो चुके थे. वह ईर्ष्या, द्वेष की भावना से भरी हुई थी.

सरकारी वकीलों को उम्मीद थी कि इस मामले में 26 वर्षीया मौडल कुकुकोवा को 25 साल की जेल की सजा तो सुनाई ही जाएगी, लेकिन जजों के निर्णायक मंडल ने उसे 15 साल की सजा सुनाने के साथ बुश की 21 वर्षीया बेटी को 1,22,000 पाउंड और 44 वर्षीया बहन रशेल को 30,500 पाउंड की राशि जुरमाने के तौर पर देने का आदेश दिया.

इसी के साथ न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आरोपी का पूर्व का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं है. उस ने जो भी अपराध किया है, वह भावुकता में किया है. इस लिहाज से उसे अपना पक्ष रखने का एक और मौका दिया जाता है लेकिन बचाव के अंतिम मौके का भी कुकुकोवा को कोई लाभ नहीं मिल पाया.

अदालत ने फैसले से संबंधित 17 पृष्ठों का दस्तावेज बुश के परिजनों को भी दे दिया. इस फैसले पर भले ही एल्ली और उस की बुआ रशेल ने न्याय मिलने का संतोष व्यक्त किया, लेकिन बुश से तलाक ले चुकी एल्ली की मां ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि कुकुकोवा को कम सजा हुई है. उसे कम से कम 20 साल की सजा होनी चाहिए थी. वह अदालत में अपनी बेटी के साथ नहीं थी, लेकिन उस ने खुद उस की भावनाओं को काफी शिद्दत के साथ महसूस करते हुए कई ट्वीट किए थे.

अदालती सुनवाई और जांचपड़ताल की काररवाई में पाया गया था कि बुश को .38 की रिवौल्वर से 3 गोलियां मारी गई थीं. 2 गोलियां उस के सिर में लगी थीं, जबकि एक गोली उस के कंधे में लगी थी. न्यायाधीश ने फैसले में कहा कि बुश का हाथ रिवौल्वर के साथ इस तरह से रखा गया था, ताकि पहली नजर में लगे कि उस ने आत्महत्या की है. हत्या के बाद कुकुकोवा बुश की महंगी हमर गाड़ी से करीब 3012 किलोमीटर दूर स्लोवाकिया स्थित अपने घर चली गई थी, जहां उस का प्रेमी इंतजार कर रहा था.

कुकुकोवा ने न केवल 2 देशों की सीमाएं लांघीं, बल्कि इस लंबी यात्रा को 27 घंटे में पूरा भी किया. हालांकि कुछ दिनों बाद ही उसे स्लोवाकिया स्थित उस के पुश्तैनी गांव नोवा बोसाका से हिरासत में ले लिया गया था. उस की गिरफ्तारी स्पैनिश अधिकारियों के अनुरोध पर यूरोपीय वारंट के आधार पर की गई थी.

मायका मैरीका कुकुकोवा एक जमाने में बहुचर्चित स्विमवियर मौडल रही. सन 1990 में उस का जन्म स्लोवाकिया के एक गांव नोवा बोसाका में हुआ था. ग्रामीण परिवेश के साधारण परिवार में पलीबढ़ी कुकुकोवा जब किशोरावस्था में आई तो उसे अहसास होने लगा कि उस के अंदर खूबसूरती के साथसाथ हीरोइन बनने के भी तमाम गुण मौजूद हैं. जब उस के दोस्तों ने उस की सुंदरता की तारीफ के पुल बांधे तो उस की सपनीली आंखों में मौडलिंग की रंगीन दुनिया तैरने लगी.

कुकुकोवा के मातापिता ने उसे अपनी मनमर्जी से कैरियर चुनने की आजादी दे रखी थी. उस ने मौडलिंग के लिए कोशिश की तो थोड़े प्रयास में ही उसे मौका मिल गया. मौडलिंग की दुनिया में शुरुआत की पहली कोशिश में ही उसे सफलता मिल गई.

आगे भी सफलता की सीढि़यां चढ़ने में उसे ज्यादा वक्त नहीं लगा. ऊंची जगह बनाने के लिए भी उसे अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा. उस की खूबसूरती और पहली ही नजर में किसी को भी आकर्षित कर लेने वाले ग्लैमर की वजह से उस का आगे का रास्ता खुदबखुद बनता चला गया.

जल्दी ही कुकुकोवा एक परफेक्ट मौडल बन गई. चाहे रैंप पर चलना हो या कैमरे के किसी भी एंगल के सामने खुद को प्रदर्शित करना हो, वह बहुत कम समय में सीख गई. फलस्वरूप जल्द ही वह एक पेशेवर मौडल बन गई. उसे कुछ नामीगिरामी मौडलों के साथ रैंप पर चलने का मौका मिला तो वह एक चर्चित मैगजीन के कवर पर भी जगह बनाने में सफल रही.

इस के बाद फोटोग्राफरों ने उसे इंटरनेशनल मौडलिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की सलाह दी. उस ने ऐसा ही किया और स्लोवाकिया के फैशन और मौडलिंग की दुनिया का मक्का माने जाने वाले शहर मिलान की ओर रुख किया. मौडलिंग की बदौलत कुकुकोवा ने अपनी खास पहचान बना ली. ब्रिटिश और अमेरिकन मौडलों से टक्कर लेते हुए उस ने स्विमवियर या बिकिनी के पहनावे के साथ रैंप पर चल कर निर्णायक मंडल का दिल जीत लिया.

फिर क्या था, उस का सितारा बुलंद हो गया. मल्टीनेशनल कंपनियां उसे जहां अपने ब्रांड के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाने को लालायित रहने लगीं, वहीं उसे नौकरी के कुछ औफर भी मिले. लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही वह देर रात तक चलने वाली पार्टियों में भी आनेजाने लगी.

मौडलिंग की दुनिया में इस प्रोफेशन को अपनाने वाली मौडल्स अगर अपनी अदाकारी और शारीरिक सुंदरता बिखेरती हैं तो इस में अमीरजादे प्लेबौय की भी भरमार रहती है. उन की सोच के हिसाब से सुंदरियां मौजमस्ती की सैरगाह में मनोरंजन और रोमांस के साधन की तरह होती हैं. ऐसे ही लोगों में से एक थे इंगलैंड के गोल्ड बिजनेसमैन ‘किंग औफ ब्लिंग’ के नाम से चर्चित एंडी बुश. वह अधेड़ावस्था की दहलीज पर आ चुके थे, लेकिन मौजमस्ती के लिए सुंदरियों के साथ डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

एंडी ब्रिटेन में सोने के आभूषणों के अरबपति कारोबारी थे. उन की गिनती अमीरजादों में होती थी. 1990 में उन्होंने बीबीसी टीवी प्रजेंटर साम मैसन से शादी की थी. उसी से एक बेटी एल्ली पैदा हुई थी. लेकिन बाद में साम मैसन से उन का तलाक हो गया था. वह एल्ली को बहुत प्यार करते थे और उसे हर तरह से खुश और सुखी रखने की कोशिश करते थे.

एल्ली अपनी मां से ज्यादा बुआ रशेल के करीब रही. दूसरी तरफ बुश की पहचान रंगीनियों में डूबे रहने वाले शख्स की बन गई थी. वह आए दिन लेट नाइट पार्टियों या फैशन शो में जाया करते थे. गर्लफ्रैंड के साथ लौंग ड्राइव या डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

कुकुकोवा को रैंप पर चलते देख बुश पहली बार में ही उस पर फिदा हो गए थे. बुश को न केवल उस का ग्लैमर भरा सौंदर्य पसंद आया था, बल्कि उस की शारीरिक सुंदरता और अदाएं भी बहुत अच्छी लगी थीं. संयोग से बुश उस फैशन शो वीक के प्रायोजक भी थे, जिस में कुकुकोवा को बतौर मौडल जगह मिली थी. तब दोनों की औपचारिक मुलाकात हुई थी.

पहली मुलाकात में ही कुकुकोवा ने बुश के दिल में इतनी तो जगह बना ही ली थी कि वह कारोबारी व्यस्तता के बावजूद उस से मिलनेजुलने के लिए समय निकालने लगे थे.

इस तरह शुरू हुई मुलाकातों के दौरान कुकुकोवा ने उन से अपने लिए कोई काम तलाशने की इच्छा जताई. इस पर बुश ने उसे ब्रिस्टल स्थित अपने ही सोने के आभूषणों के शोरूम में नौकरी दे दी.

अब बुश के लिए उस से मिलनाजुलना आसान हो गया था. नतीजा यह हुआ कि उन की मुलाकातें प्रगाढ़ संबंध में बदलती चली गईं.

बुश अपनी सुगठित और चुस्तदुरुस्त देह के लिए काफी मेहनत करते थे. यही वजह थी कि वे 48 की उम्र में भी 28-30 के युवा की तरह दिखते थे. उन की सब से बड़ी कमजोरी सुंदरियों के पीछे भागना थी. नईनई प्रेमिकाएं बनाना, उन्हें महंगे उपहार देना और उन के साथ डेटिंग या लौंग ड्राइव पर जाना उन की जीवनशैली का अहम हिस्सा था.

उन के पास महंगी कारों की बड़ी शृंखला थी, जिन में लाल रंग की फेरारी और ग्रे रंग की लेंबोरगिनी के अतिरिक्त हमर रेंज की कई कारें थीं. उन की कई गाडि़यां कानसेलाडा के समुद्र तटीय गांव स्थित स्पैनिश विला में रखी जाती थीं.

अपनी आरामदायक जिंदगी गुजारने के लिए उन्होंने सन 2002 में करीब 3,20,000 पाउंड में 5 बैडरूम का एक मकान खरीदा था, जो केप्सटो के भीड़भाड़ वाले इलाके से काफी दूर ग्रामीण क्षेत्र मानमाउथशिरे में स्थित था. यह भव्य मकान 7 फुट ऊंची चारदीवारी से घिरा था.

इस के बावजूद इस मकान में सुरक्षा के तमाम अत्याधुनिक इंतजाम किए गए थे. उन्होंने सुरक्षा के लिए विख्यात राट्टेवाइलर डौग गार्ड भी वहां तैनात किए थे. आधिकारिक तौर पर बुश के 4 तरह के कारोबार थे, जिस में 3 तो फिलहाल निष्क्रिय थे. सिर्फ ट्रेडिंग कंपनी बिगविग से ही उन्हें मुनाफा होता था.

बुश के दिल में कुकुकोवा के लिए कितनी जगह थी या फिर कुकुकोवा बुश से कितनी मोहब्बत करती थी, यह कहना मुश्किल था, लेकिन इतना जरूर था कि वह उन के तमाम निजी कार्यों में दखलंदाजी करती थी. वह बुश के उसी शोरूम में एक कर्मचारी थी, जिस का कामकाज बुश की बहन रशेल और बेटी एल्ली संभालती थीं.

सन 2012 में बुश की कुकुकोवा के साथ डेटिंग चरम पर थी. इस का फायदा उठाते हुए कुकुकोवा बुश के साथ रशेल और एल्ली पर भी अपना रौब दिखाती थी. हालांकि उन के ‘लिव इन रिलेशन’ की मधुरता में जल्द ही नीरसता आ गई और नवंबर 2013 में तो उन के संबंध पूरी तरह से खत्म हो गए. इस की वजह यह थी कि उसी दौरान बुश की जिंदगी में एक 20 वर्षीया रूसी युवती मारिया कोरोतेवा आ गई थी.

मारिया इंगलैंड के पश्चिमी इलाके में स्थित एक यूनिवर्सिटी में ह्यूमन रिसोर्सेस की छात्रा थी. उस से बुश की मुलाकात ब्रिस्टल के कोस्टा कैफे की एक शाखा में हुई थी. मारिया बुश की बेटी एल्ली से मात्र एक साल बड़ी थी.

नई प्रेमिका का साथ मिलने पर वह कुकुकोवा को समय नहीं दे पा रहे थे. इतना ही नहीं, वह मारिया को अपना जीवनसाथी भी बनाना चाहते थे. कुकुकोवा अपनी उपेक्षा को महसूस कर रही थी. यह सब मारिया की वजह से हुआ था, इसलिए इस का दोषी वह मारिया को मान रही थी.

वह मारिया से ईर्ष्या करने लगी थी. इस की वजह से वह हमेशा तनाव में भी रहने लगी थी. और तो और वह फोन, ईमेल और डेटिंग ऐप के जरिए उस का पीछा भी करती थी. इस की शिकायत मारिया ने बुश से भी की थी. बुश को भी कुकुकोवा की यह हरकत पसंद नहीं आई. नतीजतन उन दोनों के बीच जबतब तकरार होने लगी. कुकुकोवा उन पर अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश करती थी.

एल्ली का कहना था कि कुकुकोवा बहुत जल्द गुस्से में आ जाती थी. दुकान की महंगी चीजों को फर्श पर फेंक देती थी. कई बार तो वह बुश का मोबाइल तक फेंक देती थी, पासपोर्ट छिपा देती थी और उन की गैरमौजूदगी में उन का पर्सनल कंप्यूटर चेक करती थी.

इसी तरह का एक वाकया एल्ली के जन्मदिन के अवसर पर भी हुआ. एल्ली अपने 18वें जन्मदिन के मौके पर पिता और कुकुकोवा के साथ दुबई में थी. एक मौल में महंगी खरीदारी को ले कर कुकुकोवा ने न केवल हंगामा खड़ा कर दिया था, बल्कि गुस्से में उस ने बुश पर अपना बैग फेंक कर हमला भी किया था.

बुश ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, पर उस ने उसी दिन बुश का लैपटौप भी तोड़ डाला था. उस की वजह से एल्ली के जन्मदिन की खुशियों भरे माहौल में खलल पड़ गया. इंगलैंड वापस लौट कर बुश ने दुबई की घटना को नजरअंदाज करना ही बेहतर समझा.

कुकुकोवा की अजीबोगरीब आदतों को झेलना बहुत ही मुश्किल हो गया था. वह हमेशा तेवर में रहती थी. सितंबर, 2013 में कुकुकोवा बगैर कुछ बताए बुश के यहां से चली गई. वह एक जगह स्थिर नहीं रहती थी. एक शहर से दूसरे शहर घूमती रहती थी. बुश ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे, लेकिन कुकुकोवा को लगता था कि बुश उसे फिर से अपना लेगा. इस के लिए वह अपने फेसबुक एकाउंट पर प्रेमसंबंधों का सबूत देने वाले चुंबन और गले लगने के वीडियो अपलोड करती रहती थी.

कुकुकोवा के परिजनों के अनुसार, हत्या की घटना के 2 सप्ताह पहले वह अपना पुश्तैनी घर छोड़ गई थी. उस वक्त उस के पिता बीमार चल रहे थे. बुश की हत्या की खबर जब अखबारों की सुर्खियां बन गईं और उस की पूर्व पत्नी समेत दूसरे परिजनों ने हत्या का आरोप सीधे तौर पर कुकुकोवा पर लगाया.

इस के बाद स्पेन समेत स्लोवाकिया की पुलिस भी सक्रिय हो गई और बुश की हत्या के 2 दिनों बाद ही कुकुकोवा को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे न्यायिक हिरासत में ले कर मलागा के निकट अल्हउरा डेला टोर्रो जेल में डाल दिया गया. उस की गिरफ्तारी से उस की मां लुबोमीर कुकुका (50) और पिता दानक कुकुकोवा (51) को काफी दुख हुआ. उन्हें लगा जैसे उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई है.

कुकुकोवा की वजह से उस के मातापिता की पूरे इलाके में काफी बदनामी हुई. इस के बावजूद वे बेटी को बचाने की कोशिश के लिए स्पेन गए. उन्होंने एक महंगा वकील किया, जिस की फीस जुटाने में उन का पुश्तैनी मकान तक बिक गया.

पुलिस के अनुसार, घटना वाली रात को कुकुकोवा बुश के उसी घर में थी, जिस में बुश ने अपनी नई प्रेमिका मारिया कोरातेवा को बुला रखा था. मारिया किसी वजह से कुछ देर के लिए बाहर चली गई थी. संभवत: वह वापस जाना चाहती थी. थोड़ी देर में ही उस ने गोली चलने की आवाज सुनी. यही गवाही मारिया ने कोर्ट में दी थी.

बुश के स्मार्टफोन पर डेटिंग ऐप के जरिए कुकुकोवा को पता चल चुका था कि बुश और मारिया 5 अप्रैल, 2014 की रात अपनी मुलाकात का पांचवां महीना पूरा होने पर जश्न मनाने वाले हैं. इस के लिए स्पैनिश विला कोस्टा डेल सोल में खास किस्म का रोमांटिक आयोजन किया गया था. इस से पहले ब्रिस्टल हवाई अड्डे पर बुश ने मारिया को 10,000 पाउंड की हीरे की एक अंगूठी भेंट की थी. इस के साथ ही उन्होंने कहा कि वे विला पर उस से एक खास बात पर चर्चा करना चाहते हैं.

घटना के बारे में मारिया ने बताया, ‘‘5 अप्रैल की सुबह जब हम लोग (मैं और बुश) विला पहुंचे, तब सूर्योदय नहीं हुआ था. हम लोगों ने एकदूसरे का हाथ थामे प्रेमी युगल की तरह हंसहंस कर बातें करते हुए विला में प्रवेश किया. विला के कर्मचारियों ने हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. हम सहज भाव से कमरे में चले गए.’’

मारिया ने आगे बताया, ‘‘बुश ने कमरे की बत्ती जलाई. मुझे कमरे में कुछ अच्छा नहीं लगा. मैं ने दरवाजे के पास एक रैक में ‘ब्रा और किंकर्स’ टंगे देखे. यह देख कर मैं समझ गई कि निश्चित तौर पर यहां पहले से कोई औरतें आती होंगी. मैं बुश से थोड़ा आगे बढ़ी तो कुछ दूरी पर फर्श पर एक अधखुला सूटकेस पड़ा था, जिस में 2 कटार रखे दिखे. उसे देख कर मैं घबरा गई. मैं उलटे पैर मुड़ कर ऊपर की सीढि़यों पर चली गई.

‘‘जब मैं सब से ऊपर पहुंची, तब देखा कि वहां कुकुकोवा बिलकुल शांत, स्थिर एकदम चट्टान की तरह खड़ी थी. वह मुझे ही घूर रही थी. उस ने अपने बाल नीचे किए हुए थे और पाजामा पहन रखा था. ऊपर वह शार्ट्स पहने हुए थी. मैं ने पलभर के लिए उसे देखा और चिल्लाती हुई वहां से भाग कर घर से बाहर आ गई.’’

इसी बीच कुकुकोवा ने बुश पर 3 गोलियां दाग दीं. मारिया ने समझा कि टीवी या सीढि़यों से कोई भारी सामान गिर गया है. कुछ मिनट बाद ही कुकुकोवा बाहर आई तो उस के हाथ में गाड़ी की चाबी थी. उस ने मुझ से कहा, ‘‘कार से दूर हट जाओ.’’

उस वक्त वह बहुत ही शांत थी. मुझे आश्चर्य हुआ कि बुश ने उसे अपनी हमर कार की चाबी कैसे दे दी. इस से मारिया को शक हुआ. जब तक वह घर में जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी, तब तक कुकुकोवा कार को तेजी से ड्राइव करते हुए फरार हो गई. मारिया विला के अंदर पहुंची तो बुश की रक्तरंजित लाश देख कर घबरा गई.

मारिया ने तुरंत बुश की बहन रशेल और पुलिस को बुलाया. पुलिस के साथ आई डाक्टरों की टीम ने बुश को मृत घोषित कर दिया.

बुश की हत्या के बाद जहां मारिया के सपने साकार होने से पहले ही चूरचूर हो गए, वहीं कुकुकोवा को पूरी जवानी जेल की सलाखों के पीछे गुजारनी होगी. उस के मातापिता पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा है. न तो बुढ़ापे का कोई सहारा है और न ही सिर छिपाने को छत बची है. सब कुछ बेटी को जेल जाने से बचाने में खत्म हो गया है. रही बात एल्ली और बहन रशेल की, तो उन को बुश की यादों के सहारे जीना होगा.

दुष्कर्मियों को बनाया जाएगा नपुंसक

जब तक कानून का सख्ती के साथ अमल न हो, तब तक अपराधियों के हौसले बुलंद ही रहते हैं. सही समय पर दी गई सख्त सजा ही अपराधियों के मन में भय पैदा करती है. हाल ही में इंडोनेशिया में दुष्कर्मियों के खिलाफ ऐसा सख्त कानून बनाया गया है, जो आजकल हर देश में चर्चा का विषय बना हुआ है.

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में जो निर्भया कांड हुआ था, उस की गूंज दुनिया भर में पहुंची थी. निर्भया केस की ही तरह इंडोनेशिया में भी करीब 5 महीने पहले एक घटना घटी. मई, 2016 में 14 साल की एक लड़की के साथ 12 लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म कर के उस बच्ची की हत्या कर दी थी.

इस घटना के विरोध ने पूरे इंडोनेशिया में आंदोलन शुरू हो गया था. लोगों का कहना था कि उन के देश में दुष्कर्म के रोजाना करीब 35 मामले दर्ज होते हैं, जबकि हकीकत में इन की संख्या बहुत अधिक है. क्योंकि 90 प्रतिशत मामलों में पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती.

आक्रोशित जनता दुष्कर्मियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग कर रही थी, ताकि दुष्कर्मियों के मन में खौफ पैदा हो. राष्ट्रपति जोको विडोडो ने जब देखा कि जनता का गुस्सा शांत नहीं हो रहा है तो उन्होंने जनता को भरोसा दिया कि वह दुष्कर्मियों के खिलाफ नया कानून बनाएंगे.

राष्ट्रपति जोको विडोडो ने संसद में नए कानून का मसौदा पेश किया. उस मसौदे पर संसद में चर्चा हुई. जबरदस्त बहस के बाद 2 पार्टियों ने कानून के विरोध में वोट डाले. लेकिन विरोध के बजाय समर्थन में अधिक वोट पड़े, जिस से कानून संसद में पास हो गया. अब इस नए कानून के मुताबिक बच्चों का यौनशोषण करने वालों को कम से कम 10 साल की सजा देने के साथ उन्हें रासायनिक तरीके से नपुंसक बनाया जाएगा. उन की यौन आक्रामकता कम करने के लिए उन में महिलाओं वाले हारमोंस डाले जाएंगे.

इतना ही नहीं, उन के नाम भी सार्वजनिक किए जाएंगे, ताकि अन्य लोग भी उन के चरित्र के बारे में जान सकें. आरोपियों की गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए उन के शरीर पर एक चिप भी लगाई जाएगी. यह चिप उन की सजा पूरी होने के बाद भी लगी रहेगी. इस के अलावा नए कानून में गंभीर मामलों में दुष्कर्मी को मौत तक की सजा का भी प्रावधान रखा गया है.

इंडोनेशिया की संसद ने यह कानून बना जरूर दिया है, पर वहां की महिला आयोग और डाक्टरों का संघ इस कानून के पक्ष में नहीं है. महिला आयोग की अध्यक्ष एजरीना का कहना है कि दक्षिण कोरिया, पोलैंड, रूस और कुछ अमेरिकी राज्यों में भी इसी तरह के कानून हैं, पर वहां बच्चों के दुष्कर्म के मामलों में कमी नहीं आई है.

उन का कहना है कि यह सजा देने में पैसा बहुत खर्च होता है. यदि यही पैसे पीडि़तों की मदद पर खर्च कर दिए जाएं तो अच्छा रहेगा. वहीं डाक्टरों के संघ का कहना है कि किसी को नपुंसक बनाना उन के पेशेवर सिद्धांतों के खिलाफ है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस कानून पर दोबारा विचार करने की अपील की है.

इंडोनेशिया की तरह भारत में भी दुष्कर्म के रोजाना करीब 98 केस दर्ज होते हैं. इन में 95 प्रतिशत मामलों में दुष्कर्म करने वाले उन के अपने ही परिजन होते हैं. निर्भया कांड के बाद भारत में भी महिलाओं से जुड़े कुछ कानूनों में संशोधन किया गया था. उस के बाद भी दुष्कर्म के मामलों में कमी आती दिखाई नहीं दे रही.

कानून चाहे कितना भी सख्त बना दिया जाए, इस से अपराधियों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता. इस की वजह यह है कि कोर्ट में केस सालों तक चलता है. इस दौरान पीडि़ता भी मानसिक रूप से परेशान रहती है. अपराधियों में यदि खौफ पैदा करना है तो केस का निपटारा जल्द होना चाहिए. त्वरित न्याय ही अपराधियों में कानून का भय पैदा कर सकता है.

पार्टनर पर रखनी है नजर तो डाउनलोड करें ये ऐप

इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अपने पार्टनर से हर वक्त जुड़े रहना, सारी जानकारियां रखना लगभग असंभव सा है. यहां हम आपको ऐसे 5 ऐप्स के बारे में बता रहे हैं, जिनके जरिए आप जान सकते हैं कि किस वक्त आपका पार्टनर क्या कर रहा है?

उन लोगों के लिए यह ऐप बहुत ही कारगार है जिन्हें अपने पार्टनर की वफादारी पर शक हो. हालांकि, हम तो आपको यही सलाह देंगे कि इन ऐप्स का इस्तेमाल दिल के करीबी लोगों से जुड़ने में करें, जासूसी में नहीं.

कपल ट्रैकर (Couple Tracker)

इस ऐप के जरिए आप अपने पार्टनर की फोन कॉल हिस्ट्री, टेक्सट मेसेज हिस्ट्री, लोकेशन, डिलीट किए हुए मेसेज तो देख ही सकते हैं, साथ ही यह ऐप फेसबुक ऐक्टिविटीज को भी ट्रैक कर आपको जानकारी देने में सक्षम है. यह दो वर्जन में मौजूद है.

फाइंड माई पार्टनर (Find my partner)

इस ऐप के जरिए आप अपने पार्टनर, परिवार, बच्चों आदि की लोकेशन पता लगा सकते हैं. बेहतर परिणामों के लिए अपना जीपीएस, डेटा ऑन करके रखें. यह ऐप बाकी लोकेशन फाइंडर ऐप्स की तरह ही काम करता है. एक बार रजिस्टर होने के बाद आपको कहीं साइन-अप करने की जरूरत नहीं पड़ती.

ट्रैक योर कपल (Track your couple)

इस ऐप के जरिए आप अपने पार्टनर की कॉल, मेसेज डीटेल्स पा सकते हैं. जीपीएस लोकेशन के साथ-साथ यह साथी के फोन के सभी इनकमिंग-आउटगोइंग स्टफ्स आप तक पहुंचा देगा.

कपल मॉनिटर डिवाइस ट्रैकर (Couple monitor device tracker)

यह ऐप भी आपके पार्टनर के फोन कॉल अपडेट्स, टेक्सट मेसेज का ब्यौरा, लोकेशन आप तक पहुंचा देगा. साथ ही विडियोज, फोटोज, ऑडियो रेकॉर्डिंग्स की जानकारी भी आप तक मुहैया करवा देगा.

कपल कीपर (Couple keeper)

इस ऐप के जरिए आप लोकेशन ट्रैकिंग, ऐक्टिविटी डीटेल्स आदि आसानी से पा सकते हैं. टेक्सट मेसेज, कॉल हिस्ट्री के साथ-साथ आप अपने पार्टनर के फोन की बैटरी, फ्लैशलाइट पर भी अपना कंट्रोल रख सकते हैं.

इन खिलाड़ियों पर भी बननी चाहिए बायोपिक

पिछले कुछ साल से स्पोर्टस बायोपिक फिल्मों ने बॉक्स ऑफस पर काफी धमाल मचाया है. इस दौरान बड़ी स्क्रीन पर खिलाड़ियों की कई प्रेरणादायक कहानियां निकलकर सामने आई.

भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की संघर्षपूर्ण कहानी हो या फिर समाज के विपरीत जाकर गीता फोगाट के स्वर्ण पदक जीतने की या अजहरउद्दीन के फिक्सिंग की कहानी, इन खिलाड़ियों के बायोपिक को दर्शकों ने काफी पसंद किया. मैरीकॉम की कहानी भी काफी प्रेरणादायक रही.

भारतीय खेलों पर शानदार फिल्म बनी, लेकिन ऐसे कई एथलीट हैं, जिन्होंने उपलब्धि हासिल करके देश का सम्मान बढ़ाया और संघर्षों से पार भी पाया. हालांकि यह मुमकिन नहीं कि भारत को गौरवान्वित करने वाले प्रत्येक एथलीट पर बायोपिक बने, लेकिन कुछ ऐसे दिग्गज एथलीट जरुर हैं जिनकी कहानी काफी प्रेरणादायक है और उनकी उपलब्धि बड़ी स्क्रीन पर दिखाई जा सकती है.

अभिनव बिंद्रा

अभिनव बिंद्रा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. वह एकमात्र भारतीय हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा में ओलंपिक गेम्स में स्वर्ण पदक जीता. निशानेबाज ने भारतीय झंडे का लगभग हर प्रतियोगिता में मान बढ़ाया. बिंद्रा ने अपने शांत रवैये और पेशेवर अंदाज से भारत का उच्च स्तर पर प्रतिनिधित्व किया.

अंजली भागवत के बाद भारतीय निशानेबाजी के पोस्टर बॉय अभिनव बिंद्रा बने. 2008 में पीठ दर्द की समस्या के बाद अभिनव ने शानदार वापसी की और भारत को ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में पहला स्वर्ण पदक जिताया. भले ही बिंद्रा अगले ओलंपिक में भारत को पदक नहीं जिता सके, लेकिन भारत में इस खेल की लोकप्रियता को बढ़ाने में उनका योगदान अतुलनीय है.

बिंद्रा ने अपनी किशोरावस्था में कई राष्ट्रीय स्तर के अवॉर्ड्स जीते. उन्होंने 18 की उम्र में अर्जुन अवॉर्ड और 19 की उम्र में राजीव गांधी खेल रत्न का पुरस्कार जीता. बीजिंग में अपार सफलता हासिल करने के बाद बिंद्रा को भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया.

उन्होंने 2016 रियो ओलंपिक के बाद अपने संन्यास की घोषणा की. बचपन से ही विद्वान होने से लेकर भारत को ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक दिलाने वाले बिंद्रा पर बड़ी स्क्रीन के लिए फिल्म बनाई जा सकती हैं.

पीटी उषा

हम सभी ने पीटी उषा का नाम जरुर सुना होगा, लेकिन हम में से शायद ही किसी को पता होगा कि उन्होंने 101 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं. इसी बात से पता चलता है कि उन पर फिल्म बन सकती है जो काफी हिट भी साबित हो सकती है.

पयोली एक्सप्रेस के नाम से मशहूर पिलावुल्लाकंडी ठेक्केर्पराम्बिल उषा भारत के महान एथलीटों में से एक हैं. 1984 लॉस एंजेलिस ओलंपिक में 400 मीटर हर्डल स्पर्धा में उषा चौथे स्थान पर रही और बहुत ही कम अंतर से पदक जीतने से चूक गई. वह भारतीय महिला एथलीटों में सर्वश्रेष्ठ में से एक हैं.

उन्होंने 101 अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते हैं और उनकी उपलब्धियां हमारी बॉलीवुड सेलिब्रिटीज के करियर से संभवतः बड़ी हैं. 16 की उम्र में उषा ने 1980 मास्को ओलंपिक में हिस्सा लिया और वह ऐसा करने वाली भारत की सबसे युवा स्प्रिंटर बनी.

उषा की कहानी काफी प्रेरणादायक है और उन पर एक अच्छी फिल्म बन सकती हैं. मौजूदा समय में उषा केरल में अपनी एकेडमी में कोचिंग दे रही हैं.

विश्वनाथन आनंद

आनंद शतरंज के महान खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ज्यादा चर्चाएं तो नहीं बंटोरी, लेकिन देश को काफी सम्मान दिलाया है.

मध्य वर्गीय परिवार में जन्मे आनंद के पिता दक्षिण रेलवेज में महाप्रबंधक थे और उनकी मां गृहणी थीं. आनंद जब 6 वर्ष के थे तब उनकी मां ने ही उन्हें शतरंज खेलना सिखाया.

आनंद को अपने जमाने के सर्वश्रेष्ठ रैपिड शतरंज खिलाड़ियों में से एक माना जाता है. वह 2007-2013 तक शतरंज के बादशाह रहे. उन्होंने 2000, 2007, 2008, 2010 और 2012 में कुल मिलाकर 5 बार विश्व शतरंज चैंपियनशिप जीती. आनंद ने 6 बार शतरंज ऑस्कर जीता और वह उन 6 खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्होंने फिडे की रेटिंग सूची में 2800 का आंकड़ा पार किया. आनंद के नाम कई अंतर्राष्ट्रीय पदक भी दर्ज हैं और उनके ध्यान के आधार पर एक शानदार फिल्म बन सकती हैं.

कई अवॉर्ड्स के साथ ही ध्यान देने वाली बात यह है कि आनंद ने पद्मविभूषण, पद्मभूषण, राजीव गाँधी खेल रत्न, पद्मश्री और अर्जुन अवॉर्ड जीता.

पंकज आडवाणी

बिलियर्ड खिलाड़ी पंकज आडवाणी ने अपने नाम कई उपलब्धियां दर्ज कर रखी हैं. उनके बारे में रोचक तथ्य पढ़ना काफी रुचिकर है. महज 6 वर्ष की उम्र में अपने पिता की मृत्यु के बाद पंकज को उनके बड़े भाई डॉ श्री आडवाणी ने बिलियर्ड से परिचय कराया. श्री काफी मशहूर स्पोर्ट और परफॉरमेंस साइकोलोजिस्ट हैं. आडवाणी के कोच अरविंद सावुर ने उन्हें पहली बार रिजेक्ट कर दिया था क्योंकि वह काफी छोटे कद के थे. मगर बाद में उन्होंने इस पर ध्यान नहीं देते हुए अपनी निगरानी में पंकज को ट्रेनिंग दी.

पंकज ने 12 वर्ष की उम्र में अपना पहला खिताब जीता और फिर आगे चलकर कई रिकॉर्ड स्थापित किये. 18 की उम्र में पंकज ने चीन में आईबीएसएफ वर्ल्ड स्नूकर चैंपियनशिप जीती और ऐसा करने वाले सबसे युवा भारतीय खिलाड़ी बने.

आडवाणी ने 2005 में माल्टा में आईबीएसएफ वर्ल्ड बिलियर्ड चैंपियनशिप का खिताब जीता और वह पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने समय और अंक दोनों के आधार पर मुकाबले जीते. यही उपलब्धि उन्होंने बैंगलोर में 2008 में दोबारा दोहराई.

आडवाणी ने 2014 से प्रो स्नूकर से संन्यास लिया क्योंकि वह बिलियर्ड्स पर अपना पूरा ध्यान लगाना चाहते थे. काफी लोकप्रियता हासिल कर चुके पंकज पर बायोपिक अवश्य बनाई जा सकती है.

कर्णम मल्लेश्वरी

अगर आप पहली बार यह नाम सुन रहे हैं तो बता दें कि आंध्र प्रदेश की कर्णम मल्लेश्वरी भारत की पहली महिला भरोत्तोलक और ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी हैं.

2000 में सिडनी ओलंपिक में उन्होंने स्नैच में 110 जबकि क्लीन और जर्क में 130 किलोग्राम का वजन उठाया और कुल 240 किलोग्राम का वजन उठाया. उन्होंने बाद में कहा था कि उन्हें स्वर्ण पदक नहीं जीतने का मलाल है. आज तक मल्लेश्वरी ने अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी है.

मल्लेश्वरी के अनुसार, उनके कोचों का गणित गलत रहा और स्वर्ण के लिए अंतिम एटेम्पट में उन्हें 137.5 किग्रा वजन उठाने के लिए कहा गया, जहां वह नाकाम रही. वह अगर 132.5 किग्रा का वजन उठा लेती तो भी स्वर्ण पदक जीत लेती.

उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि सिडनी गेम्स ही हैं जहां उन्होंने 69 किग्रा वर्ग में पदक जीता. 1994 में मल्लेश्वरी ने इस्तांबुल में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और 1995 में कोरिया में हुई एशियाई चैंपियनशिप में 54 किग्रा वर्ग में पदक जीता.

मल्लेश्वरी की संघर्षशील कहानी पर एक फिल्म जरुर बनना चाहिए.

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