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क्रिकेट के ऐसे रिकॉर्ड जो आपने कभी नहीं सुने होंगे

क्रिकेट का इतिहास इतना पुराना है कि क्रिकेट के बारे में सब कुछ जान पाना लगभग नामुमकिन है. क्रिकेट के मैदान पर और मैदान से बाहर, कुछ जानबूझ कर तो कुछ अनजानें में बहुत सी ऐसी घटनाएं हुईं जिनके बारे में आप शायद नहीं जानते होंगे.

जैसे बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि शाहिद आफरीदी ने जिस बल्ले से वनडे में 37 गेंदों पर शतक बनाया था वो बल्ला उनका नहीं था, वो बल्ला सचिन तेंदुलकर का था, हो गए ना आश्चर्यचकित. क्रिकेट में ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जो आपको चौंका देगी. तो आइए ऐसी ही कुछ चौंकाने वाली घटनाओं पर नजर डालें.

मैच के पहले गेंद पर छक्का

1877 में खेले गए पहले टेस्ट से आज तक टेस्ट मैच की पहली गेंद पर सिर्फ एक ही बल्लेबाज छक्का लगा सका है. जी हां सिर्फ एक बल्लेबाज और वो हैं वेस्टइंडीज के धाकड़ बल्लेबाज क्रिस गेल. अपनी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी के लिये मशहूर क्रिस गेल ने 2012 में बांग्लादेश के खिलाफ मैच की पहली गेंद पर छक्का लगाया था.

हिट विकेट आउट

क्रिकेट के सबसे महान बल्लेबाज कहे जाने वाले सर डॉन ब्रेडमैन टेस्ट क्रिकेट में सिर्फ एक बार हिट विकेट आउट हुए हैं और उनको हिट विकेट आउट करने का रिकॉर्ड भारत के लेंजेंडरी खिलाड़ी लाला अमरनाथ के नाम दर्ज है. लाला अमरनाथ में 1948 में खेले गए ब्रिस्बेन टेस्ट में यह कारनामा किया था.

टेस्ट करियर में सिर्फ 6 छक्के

डॉन ब्रेडमैन को क्रिकेट का महान बल्लेबाज माना जाता है उनके नाम ना जाने कितने रिकॉर्ड है लेकिन एक बात शायद आपको ना पता हो कि टेस्ट क्रिकेट के इस महानतम बल्लेबाज ने पूरे टेस्ट करियर में सिर्फ 6 छक्के लगाए हैं.

10 दिन का टेस्ट मैच

1939 में इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका के बीच खेला गया पांचवा टेस्ट मैच 10 दिनों तक चला था. सबसे रोचक बात ये रही कि 10 दिनों तक चले इस टेस्ट मैच का कोई नतीजा नहीं निकल सका था. अंतिम पारी में इंग्लैंड को जीत के लिए 696 रन का लक्ष्य मिला था इंग्लैंड टीम नौवे दिन 5 विकेट खोकर 654 रन के स्कोर पर थी, इंग्लैंड टीम को इंग्लैंड वापसी के लिए अपनी शीप पकड़नी पड़ी जिसके कारण मैच बेनतीजा रहा.

विश्व कप जीतने का रिकॉर्ड

भारत एकलौती ऐसी टीम है जिसने 60 ओवर, 50 ओवर और टी-20 विश्व कप जीता है. 1983 विश्व कप में मैच 60 ओवर के थे, जबकि 2011 विश्व कप में मुकाबले 50 ओवर के थे, 2007 में भारत ने पहला टी-20 विश्व कप जीत कर ये अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम किया.

जन्म और रन के अंक एक समान

इंग्लैंड के विकेटकीपर बल्लेबाज एलेक स्टीवर्ट के नाम एक अनोखा रिकॉर्ड है उनका जन्म 8-4-63 को हुआ था और उन्होने इंग्लैंड के लिए खेलते हुए टेस्ट मैचों में कुल 8463 रन बनाए हैं.

इन बल्लेबाजों ने हर क्रम पर बल्लेबाजी की

क्रिकेट में हर बल्लेबाज का एक बल्लेबाजी क्रम होता है लेकिन क्या आपको पता है साउथ अफ्रीकी बल्लेबाज लांस क्लूजनर, पाकिस्तानी बल्लेबाज शोएब मलिक और अब्दुल रज्जाक और श्रीलंका के बल्लेबाज हसन तिलकरत्ने ने अपनी-अपनी टीमों के लिए हर क्रम पर बल्लेबाजी की है. इन बल्लेबाजों ने नंबर एक से नंबर दस तक बल्लेबाजी की है.

मैच के पहले ओवर में हैट्रिक

इरफान पठान टेस्ट मैच के पहले ओवर में हैट्रिक जमाने वाले पहले गेंदबाज हैं. पठान ने 2006 कराची टेस्ट मैच में मैच के पहले ओवर की चौथी, पांचवी और छठी गेंद पर सलमान बट्ट, युनुस खान और मोहम्मद युसुफ को आउट कर ये कारनामा दिखाया था.

एक इनिंग में सबसे ज्यादा विकेट

एक टेस्ट में सबसे ज्यादा विकेट लेने का रिकॉर्ड इंग्लैंड के ऑफ स्पिनर जिम लेकर के नाम है. जिम लेकर ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक मैच में 19 विकेट लिए थे. लेकर ने 1956 में ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए मैच की पहली पारी में 9 और दूसरी पारी में पूरे 10 विकेट लेकर इस कारनामे को अंजाम दिया था.

जब मैदान पर कैद हुए धोनी के ऐसे कमेंट्स, देखिए वीडियो

महेंद्र सिंह धोनी ने वनडे और टी20 से भी कप्तानी तो छोड़ दी, लेकिन टीम इंडिया को उनके जैसा कैप्टन कूल मिलना शायद ही संभव हो. 9 साल तक बतौर कप्तान उन्होंने क्रिकेट फैन्स को ऐसे तमाम मोमेंट्स दिए, जिसे शायद ही कोई भूल पाए. चाहें वो 2011 में वनडे वर्ल्ड कप जिताना हो या फिर कप्तान बनते ही 2007 में टीम इंडिया को टी20 का वर्ल्ड चैम्पियन बनाना.

फील्ड पर कोई भी प्लेयर चाहे कितनी भी बड़ी गलती क्यों न कर दे, वे उसपर झल्लाते नहीं थे, बल्कि समझाते थे. विकेट के पीछे से कई ऐसे कमेंट्स करते थे, जिससे टीम हंसने को मजबूर हो जाती थी और उनमें एनर्जी बनी रहती थी. कप्तानी के दौरान उनके ऐसे ही कई कमेंट्स विकेट के पीछे लगे माइक्रोफोन पर कैद हो गए, जिसने फैन्स को भी इंटरटेन किया.

आप भी देखिए ऐसे कमेंट्स का ये वीडियो

कामकाजी महिलाएं यूं करें इनकम टैक्स प्लान

नौकरीपेशा पुरुषों की ही तरह नौकरीपेशा महिलाओं के लिए भी टैक्स के प्रावधान समान हैं. कुछ साल पहले तक टैक्स भुगतान करने वाली महिलाओं के लिए 5 हजार की अतिरिक्त छूट होती थी. लेकिन कुछ अरसा पहले उसे हटा दिया गया था.

हैल्थ इंश्योरैंस

अब सैलरीड महिलाओं के लिए टैक्स प्लानिंग की बात करते हैं. यहां 2 महत्त्वपूर्ण सैक्शंस हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. वे हैं सैक्शन 80सी और सैक्शन 80डी. सब से पहले सैक्शन 80डी पर चर्चा करते हैं, जो 20 हजार तक का हैल्थ इंश्योरैंस प्रीमियम का भुगतान करने के लिए टैक्सेबल इनकम से कटौती की अनुमति देता है. हैल्थ इंश्योरैंस हर व्यक्ति की बेसिक जरूरत है और सैलरीड महिलाओं के लिए भी. चाहे वह उन के इंप्लौयर्स द्वारा किन्हीं मैडिकल अनिश्चितताओं के लिए कवर क्यों न हो, प्रत्येक सैलरीड महिला को उचित राशि का हैल्थ इंश्योरैंस कराना चाहिए और सही राशि 5 लाख है.

यह देखा गया है कि कई व्यक्तियों के पास हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसीज तो हैं, लेकिन राशि अपर्याप्त है जैसेकि 1 लाख या 2 लाख. लेकिन इलाज के लिए अस्पतालों के बढ़ते बिलों को देखते हुए यह जरूरी और उपयुक्त रहता है कि इंश्योरैंस राशि कम से कम 5 लाख होनी चाहिए. इसी प्रकार यदि इंप्लौयर्स हैल्थ इंश्योरैंस के फायदे दे रहे हैं, लेकिन केवल 1 लाख या 2 लाख की सीमा है, तो सैलरीड महिलाओं का अतिरिक्त हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसी लेना उचित रहता है ताकि कुल कवरेज 5 लाख से ऊपर चला जाए. यदि कुछ उन के आश्रित भी हैं जैसे मातापिता, बच्चे जो उन की आमदनी पर आश्रित हैं, तो फैमिली फ्लोटर प्लान लेना उचित रहता है, जिस में आश्रित मातापिता और बच्चों का मैडिकल इलाज भी शामिल होता है अन्यथा अप्रत्याशित मैडिकल खर्च जीवन भर की बचत को खत्म कर सकता है. इसलिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि सैलरीड महिलाओं की हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसी में आश्रित मातापिता और बच्चे भी कवर्ड हों.

अन्य विकल्प

अब दूसरा महत्त्वपूर्ण सैक्शन है, सैक्शन 80सी, जहां सैलरीड महिलाएं सैक्शन सी अंब्रेला के तहत विभिन्न टैक्स सेविंग विकल्पों में इनवैस्ट करते हुए 1.5 लाख तक की कटौती का दावा कर सकती हैं. यहां चुनते समय हर महिला को अपने खास हालात को देखना होगा कि कौन सा विकल्प सैक्शन 80सी के तहत क्लेम की कटौती के लिए उसे चुनना चाहिए. पिछले बजट की घोषणा में राशि 1 लाख को 1.5 लाख तक बढ़ाया गया है. अब सैक्शन 80सी के तहत विभिन्न टैक्स सेविंग विकल्पों और सैलरीड महिलाओं के लिए उन की उपयुक्तता को समझते हैं.

एक प्रौविडैंट फंड्स की बास्केट है, इसलिए आमतौर पर हर सैलरीड महिला कर्मचारी प्रौविडैंट फंड (ईपीएफ) में योगदान कर रही होती है और कुछ राशि का योगदान इंप्लौयर द्वारा करना अनिवार्य होता है. इसलिए यह खुद ही सैक्शन 80सी के तहत योग्य हो जाता है. इस पब्लिक प्रौविडैंट फंड्स अकाउंट की सैलरीड महिला सहित हर व्यक्ति की अत्यधिक सिफारिश की जाती है, क्योंकि उन के पास आज नौकरी है, लेकिन शायद कल न हो. या वे रिटायरमैंट के नजदीक हों, तो पीपीएफ निश्चित रूप से भविष्य के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बहुत प्रभावी तरीका है, जिस की हर व्यक्ति को निश्चित रूप से जरूरत पड़ती है. इसलिए ईपीएफ के अलावा, पब्लिक प्रौविडैंट फंड की भी बहुत ज्यादा सिफारिश की जाती है.

पीपीएफ और ईपीएफ

पीपीएफ में कितनी राशि इनवैस्ट करनी चाहिए: यह हर महिला के हिसाब से अलगअलग होगा और हमारी राय में युवा सैलरीड महिलाओं के लिए, जो 40 साल से कम उम्र की हैं, ईपीएफ और पीपीएफ के लिए दोनों को मिला कर 50 हजार इनवैस्ट किए गए होने चाहिए. उदाहरण के लिए यदि 40-50 हजार हैं, तो अगले 25 हजार हर साल पीपीएफ में रखे जा सकते हैं. हालांकि यदि अकेले ईपीएफ में ही 40-50 हजार हैं तो सैलरीड महिलाओं की बचत क्षमता के अनुसार पीपीएफ के लिए सालाना 10-20 हजार अलग से रखे जा सकते हैं. लेकिन याद रखें कि 1 साल में पीपीएफ में इनवैस्ट करने की अधिकतम सीमा सालाना 1.5 लाख तक बढ़ाई गई है. यह सब से सुरक्षित विकल्प है, जहां वे सालाना योगदान में न केवल टैक्स की बचत कर सकती हैं, बल्कि साथ में इस तरह की इनवैस्ट से ब्याज भी कमा सकती हैं, जो टैक्स फ्री होता है और जब मैच्योरिटी के बाद राशि निकाली जाती है तो वह भी टैक्स फ्री होती है. इसलिए इन सभी फायदों के कारण पीपीएफ प्रत्येक सैलरीड महिला के लिए अनिवार्य है.

म्यूचुअल फंड

अन्य विचार किया जाने वाला विकल्प म्यूचुअल फंड्स द्वारा लौंच की गई इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) है. यह लंबी अवधि के लक्ष्यों वाली सैलरीड महिलाओं के लिए अतिआवश्यक होती है. लंबी अवधि के लक्ष्य रिटायरमैंट, उन के बच्चों की शिक्षा या उन के बच्चों की शादी हो सकती है. पैसा बनाने के लिए, इक्विटी में पैसा डालना महत्त्वपूर्ण होता है और इस जरूरत को कुल 1.5 लाख में से विभिन्न ईएलएसएस स्कीमों में कम से कम 50 हजार इनवैस्ट करते हुए पूरा किया जा सकता है और साथ में इनवैस्ट करने का तरीका लमसम के बजाय सिस्टैमेटिक इनवैस्ट प्लान (एसआईपी) होना चाहिए.

तीसरे विकल्प के तौर पर सैलरीड महिलाओं को अलगअलग तरह के लाइफ इंश्योरैंस प्लान पर विचार करना अनिवार्य होता है, जो यूलिप, टर्म प्लान या ट्रैडिशनल प्लान अथवा पैंशन प्लान हो सकता है. चाहे नौकरी पैंशन वाली है या कोई भी, कवर इंप्लौयर द्वारा प्रदान किया गया है या नहीं, इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपने परिवार या आश्रितों को सुरक्षा देने के लिए उचित प्लान चुनना चाहिए.

यदि सैलरीड महिला का कोई आश्रित नहीं है और वह एक अकेली महिला की तरह जी रही है तो ऐसे मामले में लाइफ इंश्योरैंस अनावश्यक हो सकता है या इस की जरूरत नहीं हो सकती है. लेकिन ज्यादातर मामलों में ऊपर बताए गए इंश्योरैंस प्लांस की आवश्यकता होती है. इसलिए हर सैलरीड महिला को अपने सभी भविष्य के लक्ष्यों की सूची बनानी चाहिए और उन लक्ष्यों तक पहुंचना, इन 3 कैटेगरीज में विभिन्न टैक्स सेविंग विकल्पों जो पीपीएफ, ईएलएसएस और इंश्योरैंस प्लांस हैं, के द्वारा सुनिश्चित करना चाहिए.

अब सैलरीड महिलाओं में से सैंट्रल गवर्नमैंट/केंद्र सरकार या स्टेट गवर्नमैंट/राज्य सरकार उपक्रमों में काम करने वाली महिलाओं का भी सैशन है. यहां ज्यादातर कर्मचारी पैंशन प्लांस के तहत कवर हैं, इसलिए पैंशन प्लानिंग का ख्याल रखा जाता है. इस के अलावा सरकार द्वारा सीजीएचएस प्लान के माध्यम से हैल्थ इंश्योरैंस के विस्तृत फायदे दिए जाते हैं और ईपीएफ भी होता है, जिन्हें सरकार के मामले में जीपीएफ कहा जाता है. केंद्र सरकार में काम करने वाली महिलाएं अपनी सैलरी स्तर के आधार पर ज्यादा पैसा बनाने के लिए इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) में ज्यादा इनवैस्ट कर सकती हैं.

1.5 लाख में से यदि प्रौविडैंट फंड्स में 30-40 हजार चले जाते हैं तो बाकी राशि को लंबी सीमा अवधि के साथ ईएलएसएस में इनवैस्ट किया जा सकता है. याद रखें कि टर्म प्लान महत्त्वपूर्ण है और कुल सम एश्योर्ड/बीमा राशियां इंश्योरैंस पौलिसी राशि आप की सालाना सैलरी से कम से कम 7 से 10 गुना होनी चाहिए. यदि वे 10 लाख सालाना कमाते हैं तो सैलरीड महिला का 1 करोड़ का कवरेज जरूर होना चाहिए. लेकिन यह केवल उन सैलरीड महिलाओं के लिए ही अतिआवश्यक है, जो परिवार की देखभाल करती हैं. उन महिलाओं के लिए यह इंश्योरैंस कवर शायद उपयुक्त न हो जो स्वतंत्र हैं, अकेली रहती हैं, अविवाहित हैं.     

– अनिल चोपड़ा

ग्रुप सीईओ ऐंड डायरैक्टर बजाज कैपिटल लि.

सोशल मीडिया को ताकतवर मानते हैं राज कुमार राव

इन दिनों सोशल मीडिया को को लेकर कई तरह की बहस छिड़ी हुई हैं. मगर अभिनेता राजकुमार राव की नजर में सोशल मीडिया काफी सशक्त है. वह कहते हैं-‘‘मैं सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी राय देता हूं. यदि मुझे किसी फिल्म का ट्रेलर पसंद आ जाता है. तो उस पर अपनी राय दे देता हूं. अभी मैंने  ट्विटर पर लिखा है कि मेरी फिल्म ‘बहन होगी तेरी’ 26 मई को प्रदर्शित होगी. पर मैं यह नही लिखता कि मैं क्या खा रहा हूं? क्या कर रहा हूं? दूसरों के इस तरह के लिखने पर बयां नहीं कर सकता. क्योंकि कलाकारों के प्रशंसक यह जानना चाहते हैं कि उनका पसंदीदा कलाकार क्या खाता है?’’

सोशल मीडिया पर फिल्म का जो प्रचार किया जाता है, उससे बाक्स आफिस पर मदद मिलती है या नहीं? इस संबंध में वह कहते हैं-‘‘हमारा सोशल मीडिया बहुत ताकतवर हो गया है. इसका असर बाक्स आफिस पर पड़ता है. फेसबुक पर जब मैं अपनी किसी फिल्म की चर्चा करता हूं, तो उससे लोग प्रभावित होते हैं और फिल्म देखने जाते हैं.’’

वीडियो : लड़की को छेड़ रहे थे मनचले, आतिफ असलम ने सिखाया सबक

पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम का कॉन्सर्ट चल रहा था, दर्शक उस पर झूम रहे थे कि तभी आतिफ ने अपना शो रोक दिया. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक स्टेज के सामने पहली ही लाइन में कुछ लड़के एक लड़की के साथ बदसलूकी कर रहे थे, आतिफ ने शो बीच में रुकवाकर उन लड़कों से कहा कि क्या उन्होंने पहले कभी लड़की नहीं देखी?

पाकिस्तानी मीडिया ग्रुप जियो न्यूज़ के मुताबिक यह मामला कराची ईट 2017 कॉन्सर्ट का है जब शनिवार की रात शो के बीच में आतिफ ने कुछ युवाओं के एक लड़की के साथ छेड़खानी करते हुए देखा. शो को बीच में रोककर आतिफ उन लड़कों के पास गए और उन्हें डांटने लगे. उन्होंने कहा 'यहां आपकी मां या बहन भी हो सकती थी.' बाद में आतिफ के कहने पर उस लड़की को वहां से सुरक्षित हटा दिया गया.

गौरतलब है कि यह मामला ऐसे वक्त सामने आया है जब कराची ईट 2017 के आयोजकों को इसलिए ट्विटर पर घेरा जा रहा था क्योंकि उन्होंने कार्यक्रम में सिर्फ 'परिवारों' को आने की अनुमति दी थी. इस मामले पर अभी तक आयोजकों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

महिला डाक्टर की महत्ता

हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने एक शोध में पाया गया है कि आमतौर पर प्रौढ़ मरीजों को महिला डाक्टरों से ज्यादा अच्छा इलाज मिलता है. उन्हें गंभीर बीमारियों में भी अपेक्षाकृत कम बार अस्पताल आना पड़ता है और बीमारियों का अंत मृत्यु में कम होता है. चूंकि महिला और पुरुष डाक्टर एकसाथ पढ़ते हैं, उन की ट्रेनिंग एकसाथ होती है, वे एकसाथ अस्पतालों में काम करते हैं, इसलिए इस नतीजे ने शोध करने वालों को चौंकाया था. हालांकि स्वास्थ्य सुधार का यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है पर इतना अवश्य साबित करता है कि महिला डाक्टर एक तो अपने कार्य के प्रति ज्यादा गंभीर होती हैं और साथ ही, मरीजों की समस्याओं को वे आसानी से समझ लेती हैं. अगर अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या से इस फर्क को देखा जाए तो 32 हजार जानें बच सकती थीं अगर सभी डाक्टर महिलाएं होतीं.

यह स्वाभाविक भी लगता है क्योंकि लाखों वर्षों से प्रकृति ने औरतों को ही शिशुओं के दुखदर्द को बिना कहे जानने की कला सिखा दी है और पहली बार मां बनने वाली औरत भी जानती है कि उस का बच्चा कब, क्यों परेशान है या क्या चाहता है. पुरुष डाक्टर इस दंभ में रहते हैं कि जब तक उन से बताया न जाए, वे मरीज का दर्द समझने की कोशिश नहीं करेंगे. यही नहीं, महिला डाक्टर अपने काम में शौर्टकट रूट नहीं अपनातीं. यह शायद इसलिए है कि महिलाओं को खाना पकाने में शौर्टकट काम करने के दुर्गुणों का असर मालूम होता है. पुरुष आमतौर पर समूहों में काम करते हैं और एक की कमी को दूसरा ठीक कर देता है. पुरुष डाक्टर ज्यादा मैकेनिकल भी होते हैं, वे सोचते हैं कि इस दुनिया में हर पल संघर्ष होता ही है और मृत्यु कोई अचरज नहीं. इसी कारण हजारों सालों से युद्घ की कला का विकास पुरुषों ने किया है, औरतें तो युद्ध की शिकार होती हैं चाहे वे विजयी पक्ष की हों या पराजयी पक्ष की.

महिला डाक्टरों की जरूरत को सभी सरकारों को समझना चाहिए और उन के पेशे में उन्हें विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए. यदि आरक्षण न भी दिया जाए तो उन्हें फीस में छूट, छुट्टियों, काम के घंटों में ढील आदि सुविधाएं दी जानी चाहिए. महिला डाक्टरों की जरूरत ज्यादातर यौनांग संबंधी बीमारियों में होती है, जबकि वे हर तरह की बीमारी में पुरुष डाक्टरों से बेहतर हैं.

दलितों की आसान नहीं जिंदगी

वर्ष 2016 में सामाजिक व राजनीतिक उथलपुथल के चलते देश में जाति विभाजन की पीड़ा सहते लोगों का दर्द देखने को मिला. जनवरी में पीएचडी स्टूडैंट रोहित वेमुला द्वारा की गई आत्महत्या ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि हमारी शिक्षा प्रणाली दलित विद्यार्थियों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को गिनें तो देश की जनसंख्या का 25 प्रतिशत दलित समाज है.

दलित समाज के लोगों से बात करने पर उन्होंने अपने मन की बातें कहीं-काशी, मुंबई के कचरा उठाने वाले सफाईकर्मी अजय का परिवार मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखाग्रस्त जालना जिले में रहता है. उस के संयुक्त परिवार के पास

6 एकड़ जमीन है. सिंचाई की असुविधा के कारण उस के पिता सफाईकर्मी का काम करने के लिए मुंबई आ गए थे. जैसा कि इस काम को करने वाले अन्य लोगों का अंत होता है, वैसे ही अजय के पिता की भी क्षय रोग यानी टीबी से ही मृत्यु हुई. अजय की मां भी यही काम करने मुंबई आ गई थी. 10वीं कक्षा पास न कर पाने पर अजय ने भी बृहत मुंबई म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन यानी बीएमसी की क्लीनर फोर्स को जौइन कर लिया.

अजय का कहना है, ‘‘अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने भाजपा प्रशासन के जरिए रिजर्वेशन के खिलाफ अपना मौलिक एजेंडा लागू करवाना शुरू किया है. मैं सभी तथाकथित मराठों और ब्राह्मणों से पूछना चाहता हूं कि आप लोग यह कचरे वाली नौकरी क्यों नहीं करते, आप अपने शहर को वैसे साफ क्यों नहीं करते जैसे हम करते हैं, बहुजनों के लिए ही इस रोजगार में शतप्रतिशत आरक्षण क्यों है? मैं यह काम नहीं करना चाहता. मेरी 3 बेटियां स्कूल जा रही हैं. मैं चाहता हूं कि समाज हमारे काम का महत्त्व समझे, दूसरे लोग भी अपने हाथ गंदे करें. मराठों और ब्राह्मणों द्वारा यह काम किया जाना तो दूर की बात है, हम सब हाउसिंग सोसाइटी में भी जाते हैं तो वहां का गार्ड भी डस्टबिन उठाने में हमारी मदद नहीं करता. हमारे काम का हर तरफ अपमान किया जाता है.’’

वहीं, एक कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर के पद पर सेवारत 25 वर्षीया रीता पवार अपने समुदाय के अच्छे भविष्य के लिए कुछ करना चाहती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मैं कभी नहीं छिपाती कि मैं बुद्घ को मानती हूं और डा. बाबासाहेब अंबेडकर की अनुयायी हूं. मैं हमेशा धाराप्रवाह अंगरेजी बोलती हूं. फिर भी कौर्पोरेट वर्ल्ड में लेग मुझ से कहते हैं, ‘अरे, तुम तो बिलकुल भी उन में से नहीं लगती, तुम तो ब्राह्मण लगती हो.’ मैं ने उन से पूछा, ‘‘क्या आप को नहीं पता कि बाबासाहेब, जिन्होंने भारत का संविधान लिखा, हम में से ही एक थे. यह कहने का मतलब क्या है कि मैं दलित नहीं लगती, क्या सभी दलित गंदे और सांवले ही होने चाहिए?’’

आरक्षण पर रीता अपने विचार स्पष्ट रूप से बताती हैं, ‘‘शहरी लोगों को लगता है कि आरक्षण का गलत प्रयोग होता है पर यदि आप ध्यान दें तो कुछ ही दलितों को आर्थिक रूप से इस का फायदा होता है. पर ग्रामीण क्षेत्रों में, उपेक्षित बस्तियों में हमें लोगों को शिक्षित करने के लिए आरक्षण की आवश्यकता है. दलितों से क्रूरता की भावना के चलते पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती, यह सचाई है. मेरे समुदाय के बारे में मुझे देख कर ही फैसला न लें.’’

57 वर्षीय राधा 2012 में गुजरात में ग्राम पंचायत की सदस्या चुनी गईं. सरपंच को दलित स्त्री के साथ काम करना रास नहीं आ रहा था. उन्हें अकेले को ही नहीं, अन्य लोगों को भी पंचायत औफिस में राधा मंजूर नहीं थी. राधा ने इस से निबटने की ठानी. वे बताती हैं, ‘‘वे नहीं चाहते थे कि मैं औफिस आऊं पर मैं ने जाना नहीं छोड़ा. यह मेरा अधिकार था. वे मुझे रोकने वाले कौन थे. मुझे ऐसे कोई नहीं डरा सकता. मुझे लोगों ने चुना है. यही प्रेरणा मुझे रोज काम पर भेजने के लिए काफी थी. पर परेशानियां कम नहीं थीं. सरपंच लगातार मेरा अपमान करता रहा. मैं ने फोन पर उन की बातें रिकौर्ड कर लीं और शिकायत दर्ज करवा दी. मैं समृद्घ किसान परिवार से हूं. मैं रोज काम पर जाती हूं. अपनी कुरसी पर गर्व से बैठती हूं और सब फैसले अपनी मरजी से लेती हूं.’’

दलित लड़कियों को गांव में दूसरी कक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता  क्योंकि यह डर रहता है कि ऊंची जाति के लड़के उन्हें परेशान करेंगे, उन का शोषण होगा. राधा कहती हैं, ‘‘सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया. हाल ही में मेरे गांव के लड़कों को बहुत पीटा गया क्योंकि वे एक दुकान के बाहर शौर्ट्स पहन कर खड़े थे.’’ दलितों को तो ऊंची जाति वाले लोगों के हिसाब से ही व्यवहार करना चाहिए. खाना, पीना, विवाह, कपड़े पहनना सब ऊंची जाति वालों के बनाए नियमों से करने चाहिए. ऊंची जाति वाले शौर्ट्स पहनते हैं, इसलिए दलित नहीं पहन सकते.

पहचान की तलाश

महेश सर्वेय्या को अपने 13 सदस्यीय परिवार के साथ अपेक्षाकृत ज्यादा पावरफुल अहीर समुदाय द्वारा मजबूर करने पर उना जिले के अंकोलाजी गांव को छोड़ना पड़ा. 500 लोगों की भीड़ ने उस के भाई लालजी को जला दिया क्योंकि उन्हें शक था कि लालजी का 19 वर्षीया अहीर लड़की से अफेयर चल रहा है. गांव से उना 10 मिलोमीटर दूर है जो 2012 में घटी इस घटना के बाद सुर्खियों में तब फिर आया जब मृत गाय की खाल निकालने के लिए दलितों को पीटा गया और नग्न अवस्था में घुमाया गया. उस के भाई के कातिल को गिरफ्तार तो किया गया पर जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया गया. गांव में महेश के परिवार का जीवन दूभर हो गया. सो, उन्हें गांव छोड़ना ही पड़ा. परिवार ने अपनी जमीन वापस लेने के लिए सरकार से बहुत फरियाद की. 2014 में 139 दिनों की भूखहड़ताल भी की.

महेश अब किराए के मकान में रहता है. उस का कहना है, ‘‘राज्य सरकार ने हमें जमीन नहीं दी, सिर्फ झूठे वादे किए. हम ने अब उम्मीद ही छोड़ दी है.’’  परिवार के स्त्रीपुरुष जीवनयापन के लिए अब हर छोटा कहा जाने वाला काम भी करते हैं. 8वीं तक पढ़े महेश को लगता है कि गुजरात में दलित होने का मतलब जीतेजी मर जाना है, चाहे चपरासी हो या पुलिस अफसर, एमएलए हो या एमपी. गुजरात के दलितों के पास न तो पावर है न पहचान. हम पैरों तले कुचले हुए तब भी थे, आज भी हैं. हम अमीरों और प्रभावशाली जातियों के नौकर ही हैं. दलित के जीवन में सरकारी पद का भी कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि पूरे कैरियर में उसे लोअर रैंक पर ही रखा जाता है. राज्य में दलितों के विकास की उम्मीद नहीं है, यहां सिर्फ चपरासी ही बन सकते हैं.

बनारस के एक कालेज में 30 वर्षों से क्लर्क के पद पर कार्य कर रहे  57 वर्षीय राजेश का अपना घर है. उन के 3 बच्चे हैं. वे अपने छात्रजीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं, ‘‘ब्राह्मण लड़कों को आगे बिठाया जाता था, मुझे पीछे. मेरे पास एक ही शर्ट थी जो वहां से मिली थी जहां मां काम करती थी. पहले तो सिर्फ स्पोर्ट्स टीचर ही मुझे बिना बात के मारा करते थे, फिर उच्च जाति के लड़कों का मुझे मारना ही उन का खेल हो गया था. मैं स्कूल जाने से इतना डरता था कि मेरी मां ने मुझे स्कूल भेजना ही बंद कर दिया था. कुछ नहीं बदला है, न हिंदू धर्म, न ब्राह्मण, न कुछ और. रोज दलितों को मारा जाता है. मैं ने दलितों की अधिकार संस्था — दलित संघर्ष समिति जौइन कर ली. मैं अब भले ही बूढ़ा हो जाऊं पर अब दलितों के अधिकार के लिए लड़ता ही रहूंगा.’’

विक्रोली, मुंबई की 40 वर्षीया रमा 15 वर्षों से सरकारी कर्मचारी हैं. वे कहती हैं, ‘‘झाड़ू लगाना, डिलीवरी का काम, माली, सफाई, सब आज भी दलित ही करते हैं. हमारे यहां किसी भी त्योहार पर न पड़ोसी आएंगे, न खाएंगे.’’

कुल मिला कर देखा जाए तो स्थिति बहुत चिंताजनक है. हम इंसान ही इंसानों के बीच धर्म, जाति की दीवारें खड़ी करने में लगे रहेंगे तो उन्नति कब करेंगे, आगे कब बढ़ेंगे. कोई भी धर्म, जाति, राजनीतिक पार्टी देश के उज्जवल भविष्य से बढ़ कर तो नहीं है. 

यह भी खूब रही

हमारे पड़ोस में एक रिटायर्ड आयुर्वेदिक डाक्टर रहते थे. उन का लड़का मेरे भैया का घनिष्ठ मित्र था. वे अकसर हमारे घर आया करते थे. वे जब भैया से मिलते तो अपने अन्य मित्रों के बारे में ये कहते हुए नहीं थकते थे कि वो साला बहुत खराब है, वो साला ऐसा है, वैसा है, वगैरावगैरा. यह सब सुनतेसुनते मेरे भैया परेशान हो गए तो एक दिन बातबात में बोले, ‘‘अरे जीजाजी, होगा आप का साला खराब, लेकिन इतना गुस्सा करना आप के लिए ठीक नहीं. वैसे, यह बताओ, ऐसे कितने साले हैं आप के.’’ यह सुन कर वे बहुत शर्मिंदा हुए और उस के बाद से उन्होंने बातबात पर ‘साला’ कहना बंद कर दिया.

विद्या व्यास, मंदसौर  (म.प्र.)

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हम उन दिनों पटना में रहते थे. पति के दोस्त की शादी बिहार के एक गांव में हुई थी. रिवाज के मुताबिक गौना कुछ सालों के बाद होता है. दोस्त पत्नी को विदा कराने गांव पहुंचे. उन्होंने गांव के मेले में अपनी दुलहन को एक बार देखा था पर पत्नी ने शायद उन्हें नहीं देखा था. विदाई के बाद पत्नी ट्रेन में अपनी सीट पर बैठ गई थी और पति अपने साले साहब के साथ प्लेटफौर्म पर खड़े हो कर बात कर रहे थे. इसी बीच पत्नी को पानी लेने के लिए प्लेटफौर्म के नल पर पहुंचते पति ने देख लिया था. नल पर भीड़ थी. पत्नी की मदद के लिए पति उस के पीछे पहुंच गए और उन्होंने पत्नी के हाथ से जग ले कर भरने की कोशिश की तो उसी क्षण पत्नी ने आव देखा न ताव, एक चांटा पति को जड़ दिया. पति सन्नाटे में थे. तभी उन का साला ‘मेहमानमेहमान’ (जमाईसाहब) कहते हुए आ गया. पत्नी के होश गुम हो गए. वह फौरन पति के पैर पकड़ कर माफी मांगने लगी. आसपास के सारे लोग माजरे को समझने की कोशिश करते हुए मुसकरा रहे थे.

चेतना भाटिया, नालगोंडा (आं.प्र.)

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एक दिन बड़े भैया हमें समझा रहे थे कि हम सब को आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए. आपसी सहयोग से कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है. बुरे व्यक्ति के साथ बुराई करने से किसी को कुछ लाभ नहीं मिलता है. सो, अपना दिल बड़ा कर के उस को वक्त पर छोड़ देना चाहिए. तभी छोटे भाई इंद्रेश स्वर को गंभीर बना कर बोला, ‘‘बड़े भैया, यदि हम ने दिल बड़ा कर लिया तो हम सब को ‘इनलार्जमैंट औफ हार्ट’ की बीमारी हो जाएगी.

उस की यह बात सुन कर हम सब के साथ बड़े भैया भी हंस पड़े. 

अनु वडोला, धौलपुर (राज.)

इन्हें भी आजमाइए

 – मक्खियों को भगाने के लिए कुछ तेल मिलते हैं जैसे लैवेंडर, नीलगिरी, पुदीना, लैमनग्रास आदि. ये एयरफ्रैशनर का काम करते हैं. इन्हें छिड़कने से मक्खियां नहीं आतीं और घर भी महक जाता है.

– ग्रीन टी पैरों की दुर्गंध को दूर करने में सहायक होती है. इस्तेमाल की हुई ग्रीन टी को ठंडे पानी में डाल लें और उस पानी में 20 मिनट पैरों को डुबो कर रखें. दुर्गंध दूर हो जाएगी.

– अगर आप को रात में अचानक भूख लगे तो चिप्स या नमकीन खाने से परहेज करें. इन की जगह पर कोई भी ड्राईफ्रूट खाएं.

– फूलगोभी पकाते समय उस में 1 चम्मच दूध डाल दें. इस से उस का वास्तविक रंग नहीं जाएगा और सब्जी भी स्वादिष्ठ बनेगी.

– नाखूनों को चमकदार और सफेद बनाने के लिए नारियल और अरंडी के तेल से मसाज करनी चाहिए.

– लौंग का पेस्ट बना कर त्वचा के कटेछिले स्थान पर लगाने से वह ठीक हो जाता है क्योंकि लौंग त्वचा के बैक्टीरिया का नाश करती है.

– खांसी होने पर यदि आप बिना दूध वाली कौफी पिएं तो काफी आराम मिलता है.

नोटबंदी

हो हजार या नोट पांच सौ

रद्दी अब ये सारी है

थोड़े दिन की मुश्किल झेलो

ये फरमान सरकारी है

बैंकों में हैं लंबी कतारें

छोड़ के आए काम सभी

कामधंधे सब ठप हुए हैं

छाई बस बेकारी है

नजर बचा कर सब से मां ने

रुपए दिए जो सावन में

मजबूरी में दिए पति को

पड़ी डकैती भारी है

बेटी की शादी में आफत

बाबा बिलखे कतारों में

कैसे नेताओं के घर से

निकली शान सवारी है

कैशलैस हो गए हैं बैंक

रुपए नहीं हैं देने को

नए नोटों की खूब दबा के

चल रही कालाबाजारी है

आएंगे अच्छे दिन जल्दी

मन में आस यही पाले

भीख मांगती खुद का पैसा

जनता हुई बेचारी है.

       

– पारुल ‘पंखुरी’

 

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