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रिटायर्ड कर्नल ने खेती में किया कमाल

बस्ती जिले के रहने वाले करीब 65 साल के सेना से रिटायर कर्नल केसी मिश्र अपने खेती में किए जा रहे नवाचारों के चलते अलग पहचान रखते हैं. वे खेती से मुंह मोड़ चुके कई युवाओं को दोबारा खेती से जोड़ने में कामयाब रहे हैं. उन्होंने घाटे से जूझ रही खेती को मुनाफे की तरफ मोड़ने के लिए कई ऐसे तरीके अपनाए हैं, जिन से सीख ले कर आसपास के कई किसानों ने अपनी खेती को मुनाफेदार बनाया है. साल 2007 में जब वे सेना से रिटायर हुए तो उन की घरेलू चीजों के अलावा 370 किस्म के 1 ट्रक पौधे भी उन के साथ लाए गए. चूंकि वे सेना में एक जिम्मेदार पद पर थे, इसलिए रिटायरमेंट के बाद उन के सामने तमाम विभागों से नौकरियों के आफर आने लगे, लेकिन उन्होंने सेना से रिटायर होने के बाद खुद खेतीबारी में समय देने का फैसला किया और बस्ती जिले के दक्षिणी किनारे पर चरकैला गांव की पैतृक जमीन पर खेतीबारी को नए तरीके से करने की कोशिश की, लेकिन उन की खेती की जमीन घाघरा नदी से सटी होने के कारण बाढ़ में डूब गई थी, इसलिए उन्होंने बाढ़ क्षेत्र से हट कर ऐसी जमीन खोजनी शुरू की जहां बाढ़ का पानी न भरता हो.

बंजर जमीन को खेती लायक बनाने में पाई सफलता : यह कर्नल केसी मिश्र की खेतीकिसानी की इच्छा का ही नतीजा था कि उन्हें किसी ने बताया कि बस्ती शहर से सटी करीब 3 एकड़ जमीन बिकाऊ है. उन्होंने उस जमीन को खरीद कर उस पर खेती करने की ठानी. जब इस बात की जानकारी उन के जानने वालों को हुई, तो कई लोगों ने उन्हें यह कह कर मना किया कि वे इस जमीन को न खरीदें, क्योंकि यह जमीन करीब 30 सालों से बंजर पड़ी है. लेकिन उन्होंने लोगों की बातों को अनसुना कर के उस जमीन को खरीद कर उसे खेती लायक बनाने का इरादा कर लिया था. ऐसे में उन्होंने साल 2008 में उस बंजर जमीन को खरीद कर खेती लायक बनाने की कोशिश शुरू कर दी.

 उस बंजर जमीन को खरीदने के बाद उन के सामने समस्या थी, उस को बराबर और उपजाऊ बनाने की. इस के लिए सेना के तजरबों व कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से उन्होंने उस जमीन पर उगे जंगली पेड़पौधों कीकर, बबूल, सरपत कास वगैरह की सफाई कराई और जंगली जानवरों साही, सियार वगैरह द्वारा खोदे गए गड्ढों को समतल करने के लिए 4 ट्रैक्टरों से 38 दिनों तक लगातार काम कराया. जमीन के बराबर होने के बाद कंटीले तारों व दीवार से जमीन की घेराबंदी कराई और साल 2010 में पहली फसल बोने की शुरुआत की.

जैविक खेती को बनाया आधार : फसल बोने से पहले उन्होंने मिट्टी जांच केंद्र से मिट्टी की जांच करा कर यह तय किया कि किस तरह की खादों व सूक्ष्म पोशक तत्त्वों का इस्तेमाल कर के इस ऊसर जमीन को उपजाऊ बनाया जाए. मिट्टी जांच की रिपोर्ट के आने के बाद उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई खादों व उर्वरकों का इस्तेमाल करने के अलावा कई टन गोबर की खाद व कंपोस्ट का इस्तेमाल किया. इस के बाद उन्होंने पहली बार सरसों की फसल बोई, जिस से उन्हें भरपूर पैदावार हासिल हुई.

दुर्लभ पेड़पौधों की भरमार : कर्नल केसी मिश्र ने सेना में रहते हुए देश के अलगअलग हिस्सों से इकट्ठा किए गए दुर्लभ पौधों को इस जमीन पर रोप कर उसे बस्ती की आबोहवा में उगाने का निर्णय लिया, ताकि यहां के नौजवान उन पौधों को कारोबारी तौर पर उगा सकें. उन की यह कोशिश सफल रही और देश के अलगअलग हिस्सों से लाए गए तमाम पौधे फल दे रहे हैं और वे पूरी तरह से इस जलवायु के मुफीद हो चुके हैं. उन्होंने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून से लाई गई बांस की दुर्लभ काली व पीली प्रजातियों को उगाने में भी सफलता पाई है.

कर्नल का कहना है कि बांस की इन प्रजातियों को बस्ती की आबोहवा में उगाना आसान नहीं था, लेकिन वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए सुझावों से उन्हें इन प्रजातियों को आसानी से उगाने में सफलता मिली. बांस की काली और पीली प्रजातियों का इस्तेमाल महंगी सजावटी चीजों को बनाने के लिए किया जाता है. इस के चलते इन प्रजातियों का बाजार मूल्य बहुत अच्छा है. आने वाले दिनों में 650 रुपए प्रति पौधे की दर वाले इन प्रजातियों के पौधों को वे किसानों में मुफ्त बांट कर इन की खेती को बढ़ावा देने का भी मन बना चुके हैं.

अपने खेतों में उन्होंने दुर्लभ पौधों की श्रेणी में टैगोर चांदनी, पश्चिम बंगाल के कलिगपोंग से लाए गए खास श्रेणी के कैक्टस, आर्टिमिसिया, कालमेघ, चीकू, फालसा, अदरक व हलदी वगैरह उगा रखे हैं और इन की व्यावसायिक खेती के लिए वे समयसमय पर किसानों और युवाओं को टिप्स भी देते रहते हैं.

फलदार पौधों की विशेष प्रजातियां: कर्नल केसी मिश्र ने देश के अलगअलग क्षेत्रों के लिए मुफीद माने जाने वाले कई फलदार पेड़ों की प्रजातियों को बस्ती की आबोहवा में उगाने में सफलता पाई है, जिन से वे व्यावसायिक लेवल पर फल भी प्राप्त कर रहे हैं. उन्होंने अपने 10 बिस्वा खेत में अमरूद की अलगअलग 12 किस्में भी लगा रखी हैं, जो मौसम के अनुसार अलगअलग समय में फल देती हैं. सघन बागबानी के तहत लगाए गए इन पौधों की किस्मों में लखनऊ 49, इलाहाबादी सुरखा, इलाहाबादी सफेदा, श्वेता, हिसार सुरखा, पंत प्रभात व जैम बनाने के लिए सब से मुफीद मानी जाने वाली ललिता प्रजातियां शामिल हैं.

इन के अलावा कर्नल के बाग का काला अमरूद अपनी खास पहचान रखता है. उस में भारी मात्रा में आयरन व कम मात्रा में शुगर पाई जाती है. इस वजह से बाजार में इस की बहुत मांग होती है. अन्य फलदार पेड़ों में उन्होंने बीज रहित नीबू, लीची व अनार की कई प्रजातियां लगा रखी हैं.

आम की बागबानी बनी आकर्षण का केंद्र : कर्नल केसी मिश्र ने आम की खुद की तैयार की गई प्रजातियों के साथसाथ कई दुर्लभ प्रजातियों की भी बागबानी की है. उन के द्वारा तैयार किए गए एक ही पौधे पर 12 अलगअलग पौधों की क्राप्टिंग से तैयार पेड़ 12 अलगअलग तरह के फल देते हैं. वहीं कर्नाटक के रत्नागिरी के मशहूर अल्फांसो, अरुनिमा, सूर्या, स्वर्णरेखा, मलीहाबादी दशहरी, आम्रपाली,  इंडोनेशिया व वृंदावनी जैसी प्रजातियां भी उन के बागों की शोभा बढ़ा रही हैं. उन के आमों की खास प्रजातियों में काला पत्थर नाम का आम पकने से 10-12 दिनों तक खराब नहीं होता. इस प्रजाति का इस्तेमाल मैंगो फ्रूटी बनाने में किया जाता है. उन्होंने मुंबई के एलीफैंटा टापू से लाए गए जामुन की एक ऐसी प्रजाति लगाई है, जिस के फलों का वजन 50 से 100 ग्राम तक होता है.

एग्रो फारेस्ट्री से डबल मुनाफा : उन्होंने अपने खेतों में पौपुलर व अन्य लकड़ी की प्रजातियों के पौधों को लगाया है, जिन के बीच वे खाद्यान्न फसलों की खेती कर के डबल मुनाफा कमा रहे हैं. उन का कहना है कि एग्रो फारेस्ट्री अपनाने से उन की खाद्यान्न फसलों को पेड़पौधों की पत्तियों के सड़ने से जैविक खाद की भरपूर आपूर्ति हो जाती है. मोटे अनाजों को बढ़ावा : वे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर मोटे अनाजों के बीजों को बढ़ावा देने के लिए उन की खेती पर खास जोर दे रहे हैं. वे समाप्त हो रही प्रजातियों सांवा, अलसी, काकुन, मडुआ व मसूर वगैरह की खेती पर जोर दे रहे हैं और लोगों को भी इन की खेती करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. उन के अनुसार अगर मोटे अनाजों की खेती की जाए तो आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली कंपनियों को उन्हें अच्छे मुनाफे पर बेचा जा सकता है.

युवाओं को दे रहे हैं ट्रेनिंग : कर्नल केसी मिश्र की खेती की यह जमीन उन के घर से 5 किलोमीटर दूर है. वे रोज सुबह अपने खेतों में फसल की देखभाल करने जाते हैं और खेतों से वापस आने के बाद अपने समय का सदुपयोग करने के लिए इलाके के युवाओं को रोजगार व नौकरियों के बारे में समझाने का काम भी करते हैं. उन के द्वारा दिए जा रहे सुझावों से जिले के तमाम युवा सेना व बैंकिंग वगैरह क्षेत्रों में जाने के साथसाथ व्यावसायिक खेती करने में भी सक्षम हुए हैं.

कर्नल केसी मिश्र का कहना है कि 34 सालों तक सेना में रह कर देश की सेवा करने के बाद अब वे किसानों के हित के लिए काम कर रहे हैं. वे अपने अनुभवों को बांटने के साथसाथ किसानों के अनुभवों से सीखते भी हैं. उन का कहना है कि खेती को घाटे से उबारने के लिए जरूरी है कि उन्नत तकनीकी ज्ञान व यंत्रीकरण का इस्तेमाल किया जाए. अगर किसानों को कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग व मार्केटिंग की जानकारी हो तो खेती को मुनाफे की तरफ मोड़ा जा सकता है.

कर्नल केसी मिश्र द्वारा की जा रही उन्नत खेती की अधिक जानकारी के लिए उन के मोबाइल नंबर 9452213333 या वाट्सएप नंबर 8795282699 पर संपर्क किया जा सकता है.

टीवी एक्‍ट्रेस ने कराया ट्रांसपेरेंट फोटोशूट, तस्वीरें हुई वायरल

टीवी सीरियल जमाई राजा में रोशनी के रूप में लोकप्रिय हुई निया शर्मा को इन दिनों टेलीविजन पर सबसे बोल्ड अभिनेत्री माना जाता है. आप को बता दें की निया शर्मा ने तमाम अदाकारों को पीछे छोड़ते हुए एशिया की तिसरी सबसे सेक्सी महिला का खिताब अपने नाम किया.

निया का सोशल मीडिया उनकी बोल्ड सेक्सी फोटोज से भरा हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि निया पहली टीवी एक्ट्रेस हैं जिनको इस लिस्ट में शामिल किया गया था और अब उनको तीसरे नंबर पर रखा गया है.

टीवी एक्ट्रेस निया शर्मा ने हाल ही में एक न्यू हॉट फोटोशूट करवाया है. जिसके कुछ फोटो एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट पर शेयर ‌किए हैं. फोटो में निया बेहद ही अलग अंदाज में नजर आ रही हैं. निया ‌इन दिनों वेब सीरीज में काम कर रही हैं.

एक फोटो में निया बेहद ही ट्रांसपेरेंट ड्रेस में नजर आ रही हैं. दूसरे फोटो में वो वाइट ड्रेस में बहुत ही खूबसूरत दिख रही हैं. सेक्सिएस्ट एशियाई महिला का खिताब जीतने के बाद निया ने कहा था कि वह ना तो खूबसूरत चेहरे के साथ पैदा हुई थी और ना ही वह बचपन से सेक्सी थी.

आप भी देखिए निया के इस हॉट फोटोशूट की कुछ तस्वीरें

इस खिलाड़ी ने एक ही ओवर में की दोनों हाथों से गेंदबाजी

बात दरअसल हाल ही में हुए सैय्यद मुश्ताक अली ट्रॉफी की है. इस टूर्नामेंट में टीम इंडिया से बाहर चल रहे सीनियर प्लेयरों के साथ ही युवा क्रिकेटर भी टीम में आने के लिए जी जान लगाकर खेल रहे थें.

इस ट्रॉफी में ‘विदर्भ’ और ‘बड़ौदा’ के बीच हुए मुकाबले में युवा स्पिनर अक्षय कर्णवार ने ऐसी गेंदबाजी की जिसे देख आप चौंक जाएंगे. 23 साल के अक्षय कर्णवार ने अपनी बॉलिंग से सभी को हैरान कर दिया है.

दरअसल अक्षय ने बड़ौदा के खिलाफ एक ही ओवर में दोनों हाथों से बॉलिंग करते हुए सबको हैरान कर दिया. जी हां अक्षय ने इस मैच में एक नहीं बल्कि अपने दोनों हाथों से गेंदबाजी की. अक्षय ने ओवर की पहली गेंद दाएं हाथ से की जिस पर बाउंड्री पर खड़े फील्डर ने कैच टपका दिया. इसके बाद दूसरी गेंद बाएं हाथ से फेंकी गई, जिस पर बल्लेबाजों ने एक सिंगल लिया.

इसी तरह अक्षय ने ओवर की सारी गेंदें हाथ बदल-बदल कर फेंकी जिससे बल्लेबाज हर बार भौंचक रह गए और चाहकर भी लंबे शॉट नहीं खेल पाए. अक्षय दोनों हाथों से बेहद आसानी से बॉलिंग कर ले रहे थे. उन्हें देखकर लग रहा था कि वो इस तरह से बॉलिंग करने में बेहद सहज हैं. हालांकि उनकी इस रैंडम बॉलिंग स्टाइल से बल्लेबाज जरूर हैरान परेशान थे.

अक्षय ने बताया कि 13 साल की उम्र में उनके कोच बालू नावघेरे ने कहा कि वो दोनों हाथों गेंद फेंके. शुरुआत में परेशानी हुई लेकिन आगे चलकर वो दोनों हाथों से गेंद फेंकेने में सफल हो गए. वे 6 साल की उम्र से क्रिकेट खेल रहे हैं.

तो ये हैं भीम ऐप के नए फीचर्स

भारत इंटरफेस फोर मनी (भीम) को नए अपडेट के साथ साथ गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध करवाया गया है. 30 दिसंबर को लॉन्च किए गए इस ऐप का यह दूसरा वर्जन है. यूपीआई पर आधारित इस ऐप से सिर्फ आधार कार्ड से पेमेंट संभव होगा.

भीम 1.2 में उड़िया, बंगाली, तमिल, तेलुगु मलयालम, कन्नड़ व गुजराती भाषायें शामिल की गई हैं. अभी इस ऐप का मौजूदा संस्करण केवल अंग्रेजी और हिंदी में है.

इसमें ‘आधार नंबर को पैसा भेजें‘ का फीचर शामिल किया गया है जिसमें किसी बैंक खाते से जुड़े आधार नंबर को पैसा भेजा जा सकेगा.

पिछले महीने नैशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा लॉन्च किए गए UPI पर आधारित ऐप BHIM का नया वर्जन पेश किया गया है. इस अपडेटेड वर्जन में कुछ नए फीचर्स ऐड किए गए हैं और कुछ खामियों को ठीक किया गया है.

भीम ऐप के नए 1.2 वर्जन में Pay to Aadhaar Number का पेमेंट ऑप्शन भी जोड़ा गया गया है. इससे यूजर्स बेनिफिशरीज के बैंक अकाउंट से साथ लिंक आधार नंबर पर भी मनी ट्रांसफर कर सकते हैं. इसके अलावा एक स्पैम रिपोर्ट फीचर भी ऐड किया गया है, जिससे पैसों के लिए रिक्वेस्ट करने वाले अज्ञात लोगों को ब्लॉक किया जा सकेगा. NPCI ने इंप्रूव्ड कस्टमर रीड्रेसल मकैनिजम भी ऐड किया है.

इसके साथ ही भीम ऐप की प्राइवेसी सेटिंग्स भी अपडेट की गई हैं. अब mobile-number@upi के ऑप्शन को भी डिसेबल किया जा सकता है. 

राजनीति के एजेंट

अफसोस की बात है कि देश की गैरभाजपा पार्टियों ने जनता की तकलीफों पर आंख मूंद ली है और वे बस इस ताक में बैठी हैं कि भाजपा का घड़ा अपनेआप फूटे और उन्हें बैठेबिठाए राजपाट मिल जाए. भारतीय जनता पार्टी ने पूरी तरह सत्ता में आने के लिए 70 साल बड़ी मेहनत की थी. उस ने सैकड़ों तरह के काम किए. गौरक्षा का नाम ले कर 1960-70 में हल्ला मचाया. पंजाब में हिंदी को थोपने की कोशिश की. गलीगली में मंदिर बनवाए. तीर्थों को टूरिज्म का हिस्सा बनवाया. अछूतों, दलितों, पिछड़ों को अपने छोटे देवता दिए, आदिवासियों के इलाके में स्कूल भी खोले, उन के अपने देवीदेवताओं के मंदिर बनवा डाले.

भाजपा ने जहां गलीगली में अपने एजेंट बना डाले. आजादी की लड़ाई में तैयार हुए आजादी के सिपाहियों को कांग्रेस ने 100-200 की पैंशन दे कर भुला दिया. कम्यूनिस्टों ने मजदूरों की फौज तैयार की, पर जिस देश में कारखाने ही मुट्ठीभर हों, वहां मजदूरों की गिनती कहां होगी. उन्होंने कारखाने ही बंद करवा दिए और उन का वोट जमा करने वाला धीरेधीरे छिटक गया. पिछड़ी जातियों ने आरक्षण की मांग ले कर भीड़ जमा की, पर जैसे ही पिछड़ी जातियों को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग से जगह दी, उन की फूंक खिसक सी गई और उन्होंने अपना झंडा उठाने वालों को निकम्मा बना डाला. आज इन सब दलों में जो काम कर रहे हैं, वे सब बस रुपए की चाशनी चाहते हैं. वे किसी मकसद के लिए काम नहीं कर रहे हैं और इसीलिए भारतीय जनता पर्टी के खिलाफ मोरचा खोलने में पिछड़ रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी के सुब्रह्मण्यम स्वामी सही कहते हैं कि सत्ता में आ जाने के बाद सड़कें, बांध, स्कूल, पुल, कारखाने, अस्पताल बना देने से वोट नहीं मिलते. उन्हें पक्का भरोसा है कि भाजपा को कोई हिला नहीं सकता, क्योंकि भाजपा का धार्मिक एजेंडा अनूठा है. विरोधी दलों के पास इस की काट है कि इसी धर्म के सहारे गरीबों को गरीब रखा जा रहा है, इसी से जाति की खाइयां खुदी हैं, इसी से घरघर में क्लेश पैदा होता है, जब अलग जातियों के लड़केलड़कियों में प्यार हो जाए और वे शादी करना चाहें. ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, प्रकाश करात, नवीन पटनायक, करुणानिधि के बेटे स्टालिन, अन्ना द्रमुक में जयललिता के बाद आई शशिकला की नजरें सिर्फ कुरसी पर हैं, पर वे कुरसी के लिए न अपना अलग डिजाइन बना रहे हैं, न लकड़ी, जबकि भाजपा 70 साल से यही कर रही थी. नोटबंदी ने सुनहरा मौका दिया, जब गरीबों को 50 दिन तक कतारों में खड़ा कर दिया गया था. अफसोस, उन्होंने इसे सतलुज, यमुना, गंगा, नर्मदा, कावेरी में बहा दिया.

हाईवे की शराब

सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी सड़कों पर से शराब के ठेके हटाने का हुक्म तो दे दिया है, पर यह आधाअधूरा है. इस देश में पीने का पानी चाहे 4-5 किलोमीटर तक न मिले, उन सड़कों पर जो शहरों को जोड़ती हैं, हर कदम पर ‘ठेका देशी शराब’, ‘शराब की दुकान’ के बोर्ड मिल जाएंगे, जो हर ड्राइवर को दावत देते हैं, आओ, पीओ और चलाओ और मरो. एक तो यहां की सड़कें खराब, दूसरे यहां के लोगों को न चलाना आता है, न चलना और ऊपर से शराब पी कर चलाने की दावत. हादसे नहीं होंगे, तो क्या होगा. हर साल देश में सवा लाख मौतों की जिम्मेदार शराब है.

शराब के ठेके सड़कों के किनारे खोले इसलिए जाते हैं कि वहां मोटी कमाई होती है. राज्य सरकारों को टैक्स मिलता है. शराब कंपनियों की बिक्री होती है. अफसरों को टैक्स चोरी करने की छूट दे कर जेबें भरने का मौका मिलता है और कहीं कोई हादसा हो जाए, तो पुलिस वालों को मरने व मारने वाले दोनों को लूटने का मौका मिलता है. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा तो है कि सड़क से 5 सौ मीटर तक शराब की दुकान न होगी, पर जिसे सैकड़ों किलोमीटर जाना हो, उस के लिए 5 सौ मीटर क्या हैं और फिर 5 सौ मीटर की नपाई करेगा कौन  पुलिस वाला ही न  वह तो कह देगा और लोग एक बैंच लगा कर सड़क के किनारे बोतलें रख कर ऐसे शराब बेचने लगेंगे, जैसे फलसब्जियां और खाने की चीजें मिलती हैं.

शराब की लत प्रकृति ने नहीं दी है. यह आदत तो डलवाई जाती है. पक्का है कि सदियों से राजा और धर्म शराब को बहुत आसरा देते थे, क्योंकि एक तो इस के नाम पर टैक्स मिलता था और दूसरे इस से पैदा होने वाली घरेलू लड़ाइयों में पंडोंमुल्लों, पादरियों को लाभ होता था. इसलाम में तो ‘शराब हराम’ इसीलिए कहा गया, क्योंकि वहां समझ लिया गया कि यह वैसे नुकसानदेय है, पर न तो मुसलमानों ने इसे पूरी तरह अपनाया, न राजाओं व मुल्लाओं ने थोपा. धर्म या धर्मगुरु के खिलाफ कुछ सच बोल दो तो तलवारतमंचे निकल आएंगे, पर शराब को पिला दो तो कुछ नहीं.

गाड़ी और शराब दुनिया का सब से बड़ा कहर है, सब से बड़ी बीमारी है, गरीब को लूटने का सब से बड़ा तरीका है, पर इस के खिलाफ न राजा बोला, न अफसर, न नेता, न पुजारी और न लेखकपत्रकार. सब को शराबी बना कर खरीदा जा चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने डेढ़ लाख मौतों का हवाला दे कर दुकानें खिसकवाई भले ही हों, पर बंद नहीं करवा पाया. शराब की दुकानें ही क्यों, लोग अपनी शराब बना सकते हैं, तो बनाएं और पीएं. और नहीं बना सकते तो बिना पीए रह जाएं. मर नहीं जाएंगे बिना शराब पीए. शराब पी कर मरना आसान है.

दो बार बोल्ड होने के बावजूद भी आउट नहीं हुए रूट

भारत और इंग्लैंड के बीच कानपुर में हुआ पहला टी-20 मैच मेहमान टीम ने 7 विकेट से जीत लिया. इंग्लैंड के जो रूट पहले टी20 मैच में दो बार भाग्यशाली साबित हुए.

मैच के 17वें ओवर में जसप्रीत बुमराह ने जो रूट को बोल्ड किया लेकिन रूट आउट नहीं हुएं. बुमराह ने अगली बॉल पर फिर उन्हें बोल्ड किया, लेकिन वे तब भी खेलते रहे. आइए हम आपको बताते हैं कि ऐसा कैसे हुआ.

बुमराह ने जो रूट को बोल्ड किया लेकिन गेंद नो बॉल थी. इसके बाद उन्हें फ्री हिट मिला. बुमराह ने इस पर अगली गेंद पर फिर रूट को बोल्ड किया, लेकिन वे आउट नहीं हुए क्योंकि पिछली गेंद नोबॉल थी और बल्लेबाज के लिए फ्री हिट का मौका था.

इस वक्त रूट 32 रन बनाकर क्रीज पर थे. उन्होंने इस जीवनदानों का लाभ उठाया और 46 रनों की नाबाद पारी खेलते हुए टीम को जीत दिलाकर वापस लौटे.

संतान सुख पाने की नई तकनीकें

असिस्टिड रीप्रोडक्टिव टैक्नीक्स (एआरटी) ने संतानहीनता की समस्या से जूझ रहे लोगों को उम्मीद की नई किरण दिखाई है. कुछ वषोें पहले इन तकनीकों के द्वारा संतान प्राप्ति का प्रतिशत बहुत कम था, लेकिन अत्याधुनिक खोजों ने इस की सफलता के अवसर बढ़ा दिए हैं. एग फ्रीजिंग और एग डोनेशन ने मातृत्व सुख प्राप्त करने की संभावनाओं को कईर् गुना बढ़ा दिया है. एग फार्मेशन इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा.

फीमेल एग

एक महिला जब जन्म लेती है तब वह अपने पूरे अंडों के साथ जन्म लेती है. बल्कि जब वह अपनी मां के गर्भ में रहती है तभी यह निर्धारित हो जाता है कि उस के अंडक में कितने एग्स का संचय रहेगा. कौमार्य प्रारंभ होने पर जब हारमोनल गतिविधियां प्रारंभ होती हैं तब तक ये अंडे निष्क्रिय स्थिति में पड़े रहते हैं. प्रतिमाह अंडों का एक गुच्छा अंडोत्सर्ग की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ करता है. केवल सर्वश्रेष्ठ का चयन होता है और बाकी प्राकृतिक रूप से अलग कर दिए जाते हैं. 37 साल की उम्र तक एग रिजर्व में तेजी से कमी आती है और 40 साल के बाद यह संख्या और तेजी से कम हो जाती है. मेनोपौज तक पहुंचतेपहुंचते एग रिजर्व लगभग खाली हो जाता है.

एग फ्रीजिंग

कैरियर और सही साथी मिलने के इंतजार में कई महिलाएं शादी करने और मां बनने की योजना को डिले कर देती हैं. 35 साल के बाद महिलाओं की प्रजनन क्षमता कम होने लगती है और 40 साल के बाद तेजी से कम हो जाती है. हालांकि मैडिकल टैक्नोलौजी के तेजी से विकसित होने के कारण महिलाएं अब भविष्य में इस्तेमाल करने के लिए अपने अंडे फ्रीज कर सकती हैं. अब महिलाएं 35 साल के बाद भी सफलतापूर्वक मां बन सकती हैं.

एग फ्रीजिंग असिस्टिड रीप्रोडक्टिव टैक्नोलौजी के क्षेत्र में नवीनतम डैवलपमैंट है. फ्रीजिंग एग्स उम्र बढ़ने के विरुद्ध महिलाओं का बायोलौजिकल इंश्योरैंस है.

प्रक्रिया

अंडों के निर्माण को बढ़ाने के लिए पेशैंट को 1 सप्ताह या अधिक समय तक फर्टिलिटी ड्रग दी जाती है. अंडों के निर्माण पर अल्ट्रासाउंड स्कैन के  द्वारा नजर रखी जाती है. इस के बाद ऐनेस्थीसिया दे कर अंडों को सर्जरी के द्वारा निकाला जाता है. फिर इन्हें माइनस 196 डिग्री पर तरल नाइट्रोजन में डुबोया जाता है. उस के बाद फ्रीज किया जाता है, विट्रिफिकेशन के द्वारा जिसे फास्ट फ्रीजिंग कहते हैं.

हाल में हुए अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि जिन अंडों को विट्रिफिकेशन के द्वारा फ्रीज किया जाता है उन से गर्भधारण करने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि इस से एग्स के जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है.

विट्रिफिकेशन के द्वारा एग्स को 5 या अधिक वर्षों तक संभाला जा सकता है. उन की गुणवत्ता खराब नहीं होती है. एग्स को क्रायोटैंक्स या क्रायोबैंक्स में स्टोर किया जाता है. ये सिलैंडर्स होते हैं, जो नाइट्रोजन से भरे होते हैं.

किस उम्र में कराएं

कई महिलाओं का मानना है कि एग्स को कभी भी फ्रीज कराया जा सकता है. वे तब तक इंतजार करती हैं जब तक कि 40 साल की नहीं हो जाती हैं. लेकिन इस समय तक बहुत देर हो जाती है. 25 से 37 साल की उम्र के बीच एग्स को फ्रीज कराना सब से बेहतर रहता है. जो महिलाएं एग्स फ्रीज करवाना चाहती हैं उन्हें देर नहीं करनी चाहिए. 34 साल से पहले ही अपने अंडों को फ्रीज करा लेना चाहिए.

कितने एग्स फ्रीज कराएं

कितने एग्स फ्रीज कराएं, यह व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है. वैसे लगभग 10 एग्स फ्रीज कराने की सलाह दी जाती है. एक सिंगल फ्रोजन एग के द्वारा जीवित बच्चे को जन्म देने की संभावना लगभग 2 से 12% तक होती है. लेकिन अगर फ्रीज किए अंडों की संख्या अधिक होती है तो संभावना बढ़ जाती है.

एग डोनेशन

डोनर एग्स का इस्तेमाल अधिक सामान्य होता जा रहा है. विशेषरूप से 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में. 2010 में लगभग 11% असिस्टिड रीप्रोडक्शन टैक्नीक्स में डोनर एग्स का इस्तेमाल होता था. इस से फर्टिलिटी प्रक्रिया की सफलता की दर बढ़ जाती है. इस के अतिरिक्त जो महिलाएं फ्रैश भू्रण का इस्तेमाल करती हैं उन के प्रत्येक साइकिल में गर्भवती होने की संभावना 43.4% होती है.

अधिकतर एग्स डोनेशन में डोनर के बारे में पता नहीं होता है, लेकिन कुछ एग्स डोनर के बारे में जानने को प्राथमिकता देते हैं, जिस के लिए कानूनी प्रतिबद्धताएं पूरी करनी पड़ती हैं. कुछ लोग अपने निकट संबंधी को ही एग्स डोनर के रूप में चुनते हैं. डोनर एग्स की व्यवस्था असिस्टिड रीप्रोडक्टिव क्लिनिक करते हैं.

अमेरिकन सोसायटी फौर रीप्रोडक्टिव मैडिसिन सिफारिश करती है कि एग डोनर की आयु 34 साल से कम होनी चाहिए.

एग्स डोनेशन के साइड इफैक्ट्स

एग्स डोनेशन आईवीएफ की सफलता की दर पारंपरिक आईवीएफ की तुलना में 3 से 10 गुना अधिक होती है. लेकिन जो महिलाएं कई वर्षों तक एग्स डोनेट करती हैं उन्हें इस के कई गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ता है. मसलन:

– एग्स डोनेट करने वाली महिलाओं में ब्लीडिंग, संक्रमण और ब्लैडर अथवा पेट के अंगों में चोट लगने का खतरा रहता है.

– एग्स डोनेशन में कई महीने लगते हैं और इस से जुड़ी कुछ चिकित्सकीय प्रक्रियाएं शारीरिक रूप से थोड़ी असुविधाजनक होती हैं.

– एग्स प्राप्त करने से पहले कई दवाएं दी जाती हैं, जिन के मूड स्ंिवग्स, सिरदर्द, पेट में मरोड़, भार बढ़ना, जी मिचलाना और जहां इंजैक्शन लगाया जाता है वहां तेज दर्द होना जैसे साइड इफैक्ट्स दिखाई दे सकते हैं.

भू्रण प्रत्यारोपण

इस तकनीक में पहले से फ्रोजन किए गए भू्रण का उपयोग किया जाता है, जो किसी और दंपती के आईवीएफ ट्रीटमैंट के बाद बच गया होता है. उस युगल ने संभवतया गर्भधारण कर लिया होगा या आईवीएफ तकनीक का उपयोग न करने का मन बना लिया होगा. वे क्लिनिक को अधिकार दे देते हैं कि उन के बचे हुए भू्रणों का उपयोग दूसरे दंपतियों के लिए कर लिया जाए.

क्या है एग फौर्मेशन

महिलाओं के अंडाशय में ऐसी कोशिकाएं होती हैं जो नए एग्स का निर्माण कर सकती हैं. वैज्ञानिक इन्हें ऊगोनियल स्टेम सैल्स कहते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि 2 पुरुषों की त्वचा से ह्यूमन एग्स का निर्माण कर सकते हैं. लेकिन इस से डिजाइनर चाइल्ड का खतरा पैदा हो गया है.

2 समान लिंग के वयस्कों की त्वचा से बच्चों का जन्म संभव है. अगले 2 वर्षों में 2 वयस्क महिलाओं की त्वचा से स्पर्म का निर्माण और 2 वयस्क पुरुषों की त्वचा से एग्स का निर्माण संभव होगा.                        

– डा. अल्का, इंदिरा टैस्ट ट्यूब बेबी सैंटर, उदयपुर

इन्हें भी होता है दर्द का एहसास

‘द इंटरनैशनल ऐसोसिएशन फौर द स्टडी औफ पेन’ दर्द को कुछ इस तरह परिभाषित करता है- दर्द एक किस्म का ऐसा अप्रिय एहसास व आवेश है, जो हमारे मौजूदा उतकों को ही नहीं, बल्कि नए तैयार होने वाले उतकों को भी नष्ट कर देता है. भले ही इस एहसास को जबानी बता पाना संभव न हो, लेकिन दर्द के एहसास को नकारा नहीं जा सकता. अकसर यह सवाल पूछा जाता रहा है कि क्या मछलियों को दर्द होता है  यह भी मान लिया गया है कि जीवजंतुओं में भी दर्द सहने की क्षमता होती है, पर उन में इस से जूझने का तरीका इनसानों से जरा अलग होता है.

विक्टोरिया ब्रिथबेट ने अपनी किताब ‘डू फिश फील पेन’ में वैज्ञानिक प्रमाण दे कर बताया है कि मछलियां होशियार और मानसिक तौर पर बड़ी सक्षम होती हैं. सैकड़ों अध्ययनों में यही एक बात सामने आई है कि मछलियां बड़ी बुद्धिमान होती हैं और उन की याददाश्त अचूक और लंबे समय तक तरोताजा रहती है. प्रवासी सलमन की याददाश्त तो पूरा जीवन बनी रहती है. हां, इतना जरूर है कि मछलियां चीख नहीं सकतीं, जब वे कांटों में फंसाती हैं या फंस जाती हैं, तो जो तकलीफ उन्हें होती है वह उन के बरताव से जरूर नजर आ जाती है, बशर्ते हम देखना चाहें. मछलियों की इंद्रियां हमारी सभी इंद्रियों से अधिक संवेदी होती हैं.

दर्द का एहसास

मछलियों में इनसानों से कहीं ज्यादा इंद्रियां होती हैं. एक पतली पार्श्व रेखा जैसी विशेष संवेदी रिसैप्टर्स या अभिग्राहिकाएं पूरे शरीर तक जाती हैं, जो उन्हें अपने आसपास की वस्तुओं का एहसास कराती हैं.  ब्लाइंड कैव फिश, जो मैक्सिको में समुद्र के नीचे कंदराओं में रहती हैं, इन का इस्तेमाल देखने के लिए करती हैं. इलैक्ट्रिक ईल, जिस की पूंछ के अंत में एक विशेष अंग होता है, जो इस के शिकार को बेकायदा करने के लिए बिजली के झटके देता है. नाइफ फिश या ऐलिफैंट नोज फिश संप्रेषण के लिए एक हलका इलैक्ट्रिक सिगनल भेजती है.

मछलियों के मस्तिष्क के भी 3 हिस्से होते हैं- अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क और पश्व मस्तिष्क. हालांकि मछलियों में नियोकोर्टैक्स नहीं होता है. यही एक चीज है जो इस बहस में मुख्य भूमिका अदा करती है. यहां तक कि जो यह कहते हैं कि मछलियों में दर्द का एहसास नहीं होता है, वे भी मानते हैं कि जीवजंतुओं में भावनाओं के एहसास के मामलें में नियोकोर्टैक्स अहम भूमिका अदा करता है. एमआरआई दिखाता है कि नियोकोर्टैक्स मस्तिष्क का हिस्सा है. दर्द में यह सक्रिय हो जाता है. मस्तिष्क के दूसरे हिस्से भी सक्रीय हो जाते हैं और अपनाअपना काम करने लगते हैं.

इनसानों की तरह अनुभूति

डा. इऐन डंकन कहते हैं कि हम लोगों को इन का बरताव और शरीर विज्ञान भी देखना पड़ता है, न केवल शारीरिक संरचना. मस्तिष्क में संभावना होती है कि यह दूसरी तरह से भी काम करने में विकसित हो जाए. मछलियों के मामले में यही होता है. दर्द के मामले में इन के मस्तिष्क का वह हिस्सा उसी तरह से विकसित हो गया है. मछलियों जैसे विकसित मेरुदंड जीवजंतुओं के पास ऐंडोर्फिन जैसा न्यूरोट्रांसमीटर होता है, जो दर्द में राहत दिलाता है. शोधकर्ताओं ने दर्द अभिग्राहिकाओं के साथ उन हिस्सों का भी एक विस्तृत नक्शा तैयार किया है, जहां मछलियां पकड़ने का कांटा जा कर फंसता है. डा. स्टेफिन यूई लिखते हैं, ‘‘दर्द में अनुकूलन का भी क्रमिक विकास होता है, जो जीव की जिंदा रहने में मदद करता है. दर्द की अनुभूति जैसी खासीयत किसी विशेष वर्ग के जीवों में एकदम से गायब नहीं हो जाती है.’’

नोसिस्पेटर एक संवेदी तांत्रिका कोशिका होती है, जो क्षतिग्रस्त होने पर या क्षतिग्रस्त होने की संभावना होने पर प्रतिक्रियास्वरूप उत्तेजना व उद्दीपन को मेरुदंड और मस्तिष्क में संकेत के जरीए भेजने लगती है. इस से दर्द की अनुभूति होने लगती है. (लैटिन में नोसी का अर्थ दर्द है.) नोसिस्पेटर स्तनधारियों में जैसे काम करता है, मछलियों में भी उसी तरह काम करता है और यह ताप, दबाव और ऐसिड व मधुमक्खी के डंक के जहर जैसे हानिकारक रासायनिक के संपर्क में आने पर प्रतिक्रिया करता है.

अन्य जीवों की तरह अनुभूति

फिजियोलौजिस्ट लेने स्नेडोन के एक अध्ययन को 2004 में प्रकाशित किया. यह अध्ययन कहता है कि मछलियां पीड़ा का पता लगा लेती हैं और इस का एहसास भी उन्हें होता है. स्नेडोन ने मानव जैसे स्तनधारी समेत उभयचर और पक्षियों के साथ 58 पीड़ा अभिग्राहिकाओं की खोज की है, जो नोसिस्पेटर के नाम से जाने जाते हैं. ऐसी अभिग्राहिकाएं ट्राउट नामक मछली के मुंह और उभयचरों, पक्षियों व इनसान जैसे स्तनधारियों के होंठों में एकसमान होती हैं. मधुमक्खी के डंक के जहर या ऐसिटिक ऐसिड जैसे रासायनिक के संपर्क में आने पर वे भी अन्य जीवों की तरह ही बरताव करती हैं. वे अपनी नाक को पत्थर से रगड़ती हैं या अपने पूरे शरीर को झकझोरती हैं. मछलियों का बरताव ठीक उसी तरह होता है जैसाकि किसी अन्य विकसित मेरूदंड वाले स्तनधारियों में देखा जा सकता है. ऐसी स्थिति में राहत देने के लिए मौर्फिन सक्रीय हो उठता है.

सोचने समझने की क्षमता

स्वभाव से ट्राउट नियोफोबिक होते हैं यानी वे किसी भी नई चीज से दूरी बना कर चलते हैं. लेकिन अगर उन्हें इंजैक्शन के जरीए ऐसिटिक ऐसिड दिया जाए तो उन में ऐसिड की तकलीफ में भी कोई प्रतिक्रिया दिखाईर् नहीं देगी और वे फिश टैंक में डाली गई किसी भी रंगीन व चमकदार चीज से दूरी बनाने के बदले उस के पास से हो कर गुजर जाएंगे. उन का ध्यान किसी रंगीन व चमकदार चीज पर नहीं जाएगा. इस के विपरीत ट्राउट को स्लाइन का इंजैक्शन दिया जाता है या फिर ऐसिड के बाद दर्दनिवारक दिया जाए तो वे अपने स्वभाव के अनुरूप सावधानीपूर्वक उस नई चीज से बच कर निकल जाएंगे. ऐसा ही बरताव हम इनसानों में भी देखते हैं, खासकर ऐसे मरीज में, जो किसी बीमारी के कारण पीड़ा की स्थिति से गुजर रहा हो. ऐसा इसलिए होता है कि दर्द हमारी स्वाभाविक सोचनेसमझने की क्षमता को प्रभावित करता है.

नौर्वे की पुरड्यू यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि गोल्डफिशेज पूरे होशोहवास में दर्द को महसूस करती हैं. इन्हें स्लाइन के घोल का इंजैक्शन दिए जाने पर या परीक्षण टैंक में गरम पानी के संपर्क में आने के बाद इन्हें फिर से इन के अपने टैंक में डाल दिए जाने पर ये एक ही जगह मंडराने लगती हैं. इस का अर्थ यह हुआ कि डर व भय की स्थिति में बच कर चलने का बरताव तर्कसंगत है, बेबसी नहीं.

खूनी खेल की तरह

अन्य प्रजाति की मछलियों को मौर्फिन का इंजैक्शन दिए जाने पर उन में भयभीत होने का बरताव नहीं दिखता. क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट में हुए एक अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि अन्य जीवजंतुओं की तरह मछलियां भी दर्द से बचना जानती हैं. वे उन जगहों में जाने से बचती हैं, जहां उन्हें चोट पहुंची हो. वे एक गलती को फिर नहीं दोहराती हैं. उन की याददाश्त अच्छी होती है और इसलिए स्थिति के अनुरूप अपने बरताव में बदलाव लाती हैं. एफएडब्ल्यूसी की 2014 की रिपोर्ट कहती है कि मछलियों में नुकसानदायक उद्दीपन को पहचानने और उस के प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता होती है. मछलियों में दर्द का एहसास होता है इस बारे में वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति बनाने की दिशा में एफएडब्ल्यूसी उन्हें सपोर्ट भी करता है. मछलियां पकड़ना क्रूरतापूर्ण खूनी खेल से ज्यादा कुछ नहीं है. जब मछलियों को कांटे में फंसाया जाता है या पानी से बाहर निकाला जाता है तो यह उन के लिए कोई खेल नहीं होता है. वे भयभीत हो जाती हैं, उन्हें तकलीफ होती है और जिंदा रहने के लिए तड़पती हैं.

कू्र तरीका

नौर्थ कोरोलिना यूनिवर्सिटी में ऐक्वाटिक (जलक्रीड़ा), वन्य जीवन और प्राणीशास्त्र औषधि के जानकार प्रोफैसर माइकल स्टोजकोफ कहते हैं कि यह मानना बहुत बड़ी भूल है कि मछलियों को इन स्थितियों में दर्द नहीं होता. शोधकर्ता डा. कुलम ब्राउनकहते हैं कि मछलियों सहित अन्य जीवजंतुओं के लिए पूरे होशोहवास में दर्द को महसूस करने की क्षमता के बगैर जीवित रह पाना अंसभव है. हम इनसानों द्वारा यह मान लेना कि मछलियां विलक्षण होती हैं और इसलिए उन्हें दर्द का एहसास नहीं होता अपनेआप में क्रूरता ही कहा जाएगा. यकीनन बिजली का झटका इनसानों या किसी भी स्तनधारी के लिए बहुत दर्दनाक होता है. लेकिन टोडफिश पर इस का क्या असर होता है, जानने के लिए एक प्रयोग किए जाने पर पाया गया कि  जबजब बिजली का झटका दिया गया, तबतब टोडफिश कराहने लगती है. एक समय के बाद इलैक्ट्रोड को देखने भर से वह कराहने लगती है. इस से यह साबित होता है कि इनसानों की तरह मछलियां भी दर्द के प्रति क्रियाशील होती हैं और दर्द का एहसास उन के बरताव में साफ तौर पर दिखाई पड़ता है.

पीटर सिंगर कहते हैं कि मछलियों के लिए किसी कसाईघर की जरूरत नहीं होती. ज्यादातर जगहों में समुद्र व नदियों से वे पकड़ी जाती हैं और मार दी जाती हैं. ट्रोलर जाल फैलाने पर मछलियां उस में फंस जाती हैं. जाल को पानी से निकाल कर जहाज में इन का ढेर लगा दिया जाता है, जहां वे छटपटाती दम घुटने से मर जाती हैं. सवाल है कि बगैर पीड़ा पहुंचाए क्या हमारा ग्रह जिंदा नहीं रह सकता  जिस हवा में हम सांस लेते हैं उस में क्रूरता और हिंसा कूटकूट कर भरी पड़ी है. हमारे आसपास क्रूरता का प्रदूषित वातावरण एक काले कफन की तरह लटका है. अगर मैं कहूं कि जीवजंतुओं को इस कदर तकलीफ पहुंचा कर हम खुद को ही दुखी कर रहे हैं, तो इस में किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए.

बिना किसी लिमिट के निकालें कैश

एटीएम की लाइनें छोटी हो गई हैं. पर देश अभी तक नोटबंदी के जख्म से पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया है. सरकार पर देश को कैशलेस बनाने की जो धुन सवार हुई है, उससे न जाने कितनों के पेट पर तालें लग गए हैं. पर एटीएम कार्ड वालों के लिए एक खुशखबरी है. सूत्रों के मुताबिक आरबीआई जल्द ही साप्ताहिक निकासी सीमा को समाप्त करने वाली है. कहने का मतलब यह है कि बहुत जल्द ही 24,000 निकालने की सीमा खत्म हो जाएगी.

एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट 'इकोरेप' में उम्मीद जताई गई है कि नकदी उपलब्धता के हिसाब से अगले दो महीने में हालात लगभग सामान्य हो जाएंगे. एसबीआई शोध रिपोर्ट के अनुसार, 'फरवरी अंत में 78-88 प्रतिशत मुद्रा फिर से चलन में आ जाएगी. इसमें अधिक छोटे नोटों के साथ मुद्रा का बेहतर ढंग से वितरण भी शामिल है.'

एक सार्वजनिक बैंक के वरिष्ठ अधिकारी ने भी बताया कि हालात में सुधार हो रहे हैं और निकासी पर अब कुछ ही सप्ताह की बात है. अधिकारी ने कहा, 'मेरा मानना है कि यह चालू वित्त वर्ष की समाप्ति से पहले ही होगा, रिजर्व बैंक लगातार प्रतिबंधों को ढीला कर रहा है.'

गौरतलब है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने संसद की स्थायी समिति के समक्ष बैंकिंग प्रणाली के सामान्य होने के बारे में कोई समयसीमा नहीं बताई थी. आरबीआई ने कहा कि चलन से हटाई गई मुद्रा का 60 प्रतिशत यानी 992 लाख करोड़ रुपये वापस बैंकिंग तंत्र में पहुंचाए जा चुके हैं.

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