Download App

अब व्हाट्सऐप की चैट अपने आप होगी डिलीट

व्हाट्सऐप अब सभी के लिए एक ऐसा ऐप बन गया है, जिस पर सभी अपनी पर्सनल बातें कर सकते है. अपनी पर्सनल फोटो शेयर कर सकते है. लेकिन अपनी बातों और फोटो को पर्सनल रखने के लिए हमें हमारी व्हाट्सऐप की चैट एवं फोटो डिलीट करना होता है. लेकिन अब अपके व्हाट्सऐप पर एक बार मैसेज पढ़ने और फोटो देखने के बाद अपने आप डिलीट हो जाएगा. इसके लिए आपको टाइम सेट करना होगा कि कितनी देर आप व्हाट्सऐप के मैसेज और फोटो रखना चाहते है.

व्हाट्सऐप, मैसेज पढ़ने के बाद अपने आप मैसेज डिलीट करने की सुविधा नहीं देता है. इस सुविधा का लाभ लेने के लिए आपको एक थर्ड पर्टी ऐप Kaboom  डाउनलोड करना होगा. व्हाट्सऐप के अलावा फेसबुक, ट्विटर और गूगल हैंगआउट पर भी सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज (पढ़ने के बाद अपने आप डिलीट होने वाला मैसेज) भेज सकते है.

इसके लिए आपको सबसे पहले गूगल प्ले स्टोर से Kaboom ऐप डाउनलोड करना होगा. ऐप डाउनलोड करने के बाद जब आप इसे रन करेंगे तो यह आपको मैसेज टाइप करने और फोटो एड करने का ऑप्शन देगा. इसके बाद आप सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज का टाइम निश्चित करके अपने दोस्त को भेज सकते है. सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज आपके टाइम के हिसाब से विजिबल होता है. सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज का समय आप एक व्यू से 1000 दिन तक सेट कर सकते है.

ये मैसेज आपके दोस्तों को एक लिंक के रूप में दिखाई देगा. जिस पर क्लिक करने से आपके दोस्त मैसेज देख पाएंगे.

समस्याएं

इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि, इसके मैसेज एक लिंक के रूप में दिखने की वजह से यूजर्स इसे मॉलवेयर समझ सकते है और मैसेज पर क्लिक करने की बजाए मैसेज डिलीट भी कर सकते है. Kaboom फिलहाल इतनी मशहूर ऐप नहीं है, इसलिए यूजर्स को इसकी ज्यादा जानकारी नहीं हैं. हालांकी Kaboom सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज पर अभी और काम कर रहा है.

सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज सेवा के द्वारा भेजे गए मैसेज की सुरक्षा के बारे में अभी पुष्टी नहीं की गई है. हालांकी इसे सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज बताया जा रहा है जिसे सर्वर सेव नहीं करता. लेकिन इस पर अपनी निजी जानकारी और फोटोज् भेजने में जोखिम हो सकता है.

स्नैपचैट और आईमैसेज पर सेल्फ डिस्ट्रक्टिव मैसेज की सुविधा पहले से उपलब्ध है.

हेयर कलर ऐंड ऐक्सैसरीज

आजकल ब्राइड्स अपनी हेयरस्टाइल के साथ नएनए प्रयोग करती हैं. जहां कुछ दुलहनें बालों को कलर या हाइलाइट करवाना पसंद करती हैं, वहीं कुछ बालों को ऐक्सैसरीज के द्वारा अलग लुक देना चाहती हैं. आइए, जानते हैं कि किस तरह की ऐक्सैसरीज ब्राइड को परफैक्ट लुक देगी और बालों को कलर करवाने वाली दुलहनों को किस तरह की सावधानियां बरतनी चाहिए:

हेयर ऐक्सैसरीज

हेयर ऐक्सैसरीज से ब्राइडल हेयरस्टाइल काफी ग्लैमरस और ज्वैलसीफाई लगती है. अगर ब्राइडल हेयर ऐक्सैसरीज की बात करें तो बीडेड चेन, ग्लिटरिंग हेयरबैंड्स, ज्वैल्ड पिन्स, मांगटीका और झूमर जैसे अनेक औप्शन मौजूद हैं.

बीडेड चेन्स: ये पर्ल्स और स्टोंस दोनों की हो सकती हैं, जिन्हें हेयर बन के साथ कैरी किया जा सकता है.

झूमर: झूमर पर्ल और स्टोन दोनों में स्टाइलिश लगते हैं. ब्राइड अगर चाहे तो गोल्डन ज्वैलरी के साथ कलरफुल झूमर भी कैरी कर सकती हैं

मांगटीका: किसी भी इंडियन ब्राइड को परफैक्ट लुक देने में मांगटीका महत्त्वपूर्ण रोल अदा करता है. मार्केट में कुंदन, क्रिस्टल, पर्ल, स्टोन मांगटीका की बहुत वैरायटी उपलब्ध हैं. अपने आउटफिट के साथ मैच कर के कोई भी ब्राइड स्टाइलिश और ग्लैमरस लुक पा सकती है.

टियारा: यह किसी भी ब्राइड को प्रिंसेस लुक देता है. यह फूलों से ले कर स्टोन, पर्ल किसी का भी हो सकता है.

हेयर कलर के बाद सावधानियां

– हेयर कलर कराना आसान होता है, लेकिन अगर सही देखभाल न की जाए तो कलर जल्दी हटने लगता है, इसलिए अच्छी क्वालिटी का कलर प्रिवैंट शैंपू का इस्तेमाल करें. यह कलर को जल्दी हलका होने से रोकता है. कभी कलर्ड बालों में हार्श शैंपू का इस्तेमाल न करें और न ही ऐंटीडैंड्रफ शैंपू चुनें.

– कलर किए बालों में कोई भी कंडीशनर न लगाएं. कलर किए बालों के लिए खास बना कंडीशनर ही लगाएं.

– कलर किए बालों के लिए तेल जरूरी होता है. ध्यान रहे तेल सिर्फ बालों में ही न लगाएं, बल्कि जड़ों में भी लगाएं.

– हेयर मास्क का इस्तेमाल करें. ये बालों को सौफ्ट बनाते हैं.

– हेयर स्पा जरूर लें. यह बालों में ड्राईनैस की समस्या को दूर करता है.

– कलर किए बालों को तेज धूप से बचाएं.

लव और लस्ट दोनों जरुरी : अंजना सुखानी

विज्ञापन से अभिनय के क्षेत्र में आने वाली अंजना सुखानी का जन्म जयपुर में हुआ था, जबकि पालनपोषण मुंबई में हुआ. उन की बचपन से फिल्मों में आने की इच्छा नहीं थी, उन्होंने इंटरनैशनल बिजनैस स्कूल से मैनेजमैंट की पढ़ाई की और एक अच्छी जौब कर सैटल हो जाना चाहती थीं. पढ़ाई के दौरान ही उन्हें विज्ञापनों में काम मिलता गया. उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ एक विज्ञापन में काम किया है. उन की बहन मीना सुखानी ने फिल्म ‘बचना ऐ हसीना’ में उन्हें मिनीषा लांबा की एक दोस्त के रूप में अभिनय करने का मौका दिया, जिस में काम करना उन्हें अच्छा लगा और धीरेधीरे वे फिल्मों में अभिनय की तरफ बढ़ गईं. फिल्म ’सलामे इश्क’ उन के जीवन का टर्निंग पौइंट थी. इस समय वे ‘कौफी विद डी’ के प्रमोशन को ले कर काफी उत्सुक हैं, क्योंकि यह एक अलग तरह की कौमेडी फिल्म है.

इस फिल्म को पा कर आप कितनी खुश हैं? बहुत दिन बाद आप फिर से फिल्म इंडस्ट्री में आ रही हैं, क्या वजह रही?

उत्सुकता बहुत है. यह एक कौमेडी फिल्म है, जिस में मेरे साथ सुनील ग्रोवर हैं और मैं फिल्म में उन की पत्नी बनी हूं. यह अलग तरह की फिल्म है, जिसे देखने में दर्शकों को मजा आएगा. मैं कुछ पारिवारिक कारणों से फिल्मों में नहीं आ पाई. इस के अलावा इस दौरान साउथ की कुछ फिल्में कर रही थी, साथ ही मुझे कोई रुचिपूर्ण स्क्रिप्ट भी नहीं मिली, इसलिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा.

आप को किस तरह की फिल्में अधिक पसंद हैं? किस में आप को अधिक मेहनत करनी पड़ती है?

मुझे हर तरह की फिल्में पसंद हैं और मेहनत सब में लगती है. जब आप अपने इमोशन से हट कर अलग भूमिका निभाते हैं तो उस में घुसना मुश्किल होता है. कई बार आप किसी कारणवश दुखी हैं, लेकिन सीन्स आप को खुशी के करने पड़ते हैं. इमोशन लैवल पर एक कलाकार को अभिनय करना मुश्किल होता है. शारीरिक तौर पर जो अभिनय किया जाता है उस में भी आप के शरीर का उस चरित्र के हिसाब से फिट होना बहुत जरूरी है, जिस में रोज वर्कआउट, सही डाइट, अपनी देखभाल सब शामिल होता है. कई बार फिल्म की जरूरत के अनुसार अपनेआप को तैयार करना पड़ता है.

आजकल द्विअर्थी कौमेडी की जाती है, आप किसे अधिक सही मानती हैं?

कौमेडी का अपना अलग महत्त्व है और अच्छी कौमेडी क्रिएट करना आसान नहीं होता, इसलिए कुछ लोग द्विअर्थी कौमेडी का सहारा लेते हैं, जो आसान होती है. इस फिल्म में सिचुएशनल कौमेडी है जो बहुत मेहनत से लिखी गई है. इस में दिखाया गया है कि अगर किसी डौन का इंटरव्यू करना हो तो कैसे किया जा सकता है. बहुत ही अच्छा और मजेदार कौंसैप्ट है. मुझे हर तरह की कौमेडी पसंद है.

फिल्म के कौन से भाग में अभिनय करना आप को कठिन लगा?

फिल्म का पूरा काम निर्देशक और लेखक ने कर रखा था, ऐसे में अभिनय करना आसान था. फिर अगर आप के सामने सुनील ग्रोवर जैसा ऐक्टर हो तो अभिनय और भी आसान हो जाता है.

फिल्मों में आना इत्तफाक था या बचपन से इच्छा थी?

शुरू में इत्तफाक ही था पर बाद में पैशन बन गया, क्योंकि जब हमें कोई काम समझ आ जाता है तो वह काम हमें अच्छा लगने लगता है और हम बाद में उसी काम में जम जाते हैं. अब तो लगता है कि यही मंजिल है. मेरे परिवार में कोई भी इस क्षेत्र से नहीं था. मेरी जर्नी इंटरैस्टिंग थी. मैं ने एड कमर्शियल से अपनी जर्नी शुरू की थी. फिर ‘सलामे इश्क’, ‘जय वीरू’, ‘गोलमाल रिटर्न’, ‘डिपार्टमैंट’, ‘कमाल धमाल’, ‘साहेब बीबी’ और ‘गैंगस्टर्स रिटर्न’ आदि फिल्में कीं. मैं उस के लिए अपनेआप को ‘थैंकफुल’ समझती हूं कि गौडफादर न रहने के बावजूद मुझे काम मिला.

आजकल स्टार्स के बच्चे ही बौलीवुड पर कब्जा जमाए बैठे हैं, ऐसे में आप को यहां तक पहुंचने में कितना संघर्ष करना पड़ा?

मेरे हिसाब से शाहरुख खान का कोई गौडफादर नहीं था और वे आज सुपर स्टार हैं. मेरे लिए यहां तक पहुंचना मुश्किल नहीं था, चुनौती थी. ऐसा कौन सा किरदार है, जिसे मैं नहीं निभा सकती और यह मुझे प्रूव करना था. लाइन में मैं अगर खड़ी हूं तो क्यू छोड़ कर न जाना ही मेरी जिद थी, ताकि दूसरे लोग उस में लग न जाएं. मौका आप को मिलेगा पर धैर्य न छोड़ना ही उचित समझा, इसलिए यहां तक पहुंच पाई हूं.

कोई खास निर्देशक जिस के साथ आप काम करना चाहती हैं?

मेरी लिस्ट में कई निर्देशक हैं. एक का नाम लेना संभव नहीं. इम्तियाज अली, राजू हिरानी, कबीर खान, संजय लीला भंसाली आदि सभी के साथ काम करना चाहती हूं.

आप के जीवन का टर्निंग पौइंट क्या था?

मेरी पहली फिल्म ‘सलामे इश्क’ थी, जिस से मुझे फिल्मों में आने का मौका मिला.

आप जीवन में किसे अधिक प्राथमिकता देती हैं लव को या लस्ट को?

‘लव’ और ‘लस्ट’ दोनों ही जीवन में जरूरी हैं. ’लव’ अगर मानसिक आकर्षण है तो ‘लस्ट’ शारीरिक जरूरत. दोनों ही आप के जीवन में जरूरी हैं, लेकिन दोनों का सामंजस्य जरूरी है. ’लव’ से एकदूसरे के प्रति सम्मान, निष्ठा और सुरक्षा मिलती है और यह जीवन में मिठास और रिश्ते को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है.

अंतरंग दृश्य करने में कितनी सहज हैं?

पहले और आज के सिनेमा में काफी बदलाव आया है, पहले फिल्म में प्यार की अभिव्यक्ति अलग तरीके से होती थी, अब सोच अलग हो चुकी है. इसलिए फिल्मों में उस का असर देखने को मिल रहा है, पर भारत में अब भी लोग इसे गलत कहते हैं जबकि विदेशों में ‘किस’ को प्यार जताने का एक साधारण सा तरीका माना जाता है. यह सही है कि हमारी जनसंख्या अधिक है, साक्षरता की कमी है, ऐसे में सोच बदलने में काफी समय लगेगा. आज भी कहीं रेप या मोलेस्टेशन होने पर महिलाओं को ही दोषी करार दिया जाता है. फिल्मों में मैं एक चरित्र निभाती हूं, ऐसे में अगर स्क्रिप्ट की मांग है तो मुझे करना पड़ेगा. जिन्होंने लिखा है या जो फिल्म का निर्देशन करेंगे, उन का एक विजन होता है. कलाकार एक ‘पपेट’ की तरह होता है, उसे जो कहा जाता है, वह करता जाता है. इसलिए अगर स्क्रिप्ट की मांग है तो मैं ऐसे दृश्यों को गलत नहीं समझती.

सोशल मीडिया पर आप कितनी ऐक्टिव हैं? सोशल मीडिया आप की नजर में कितना सही या कितना गलत है?

मैं ऐक्टिव हूं. हर मीडिया का अपना सकारात्मक और नकारात्मक असर होता है. देखना यह है कि आप इसे कैसे लेते हैं. पहले ऐसे बहुत से मुद्दे होते थे, जिन्हें उठाने के लिए व्यक्ति को सोचना पड़ता था कि कैसे आवाज उठाई जाए. सोशल मीडिया इस दिशा में एक अच्छा प्लेटफौर्म है. जहां कोई भी अपनी बात रख सकता है. यहां अगर आप के फौलोअर अधिक हैं, तो वे आप की बात सुन कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे, जिस से आप को किसी बात को निर्णय तक पहुंचाना आसान होता है. गलत इस वजह से है, अगर आप ने बिना सोचेसमझे कुछ लिख दिया, तो उस का असर नकारात्मक हो जाता है.

आप के कैरियर में परिवार का कितना सहयोग रहा है?

परिवार के बिना तो कुछ भी संभव नहीं हो सकता. उन्होंने हर समय मेरा साथ दिया और आज मैं यहां तक पहुंच पाई.

जो यूथ फिल्मों में आना चाहते हैं, उन को क्या मैसेज देना चाहती हैं?

अगर ऐक्टिंग में आना चाहें, तो सब से पहले संघर्ष के लिए तैयार रहें, क्योंकि यहां कुछ भी हो सकता है. इस के अलावा आप ने ऐक्टिंग में ट्रेनिंग ली हो, डांस आता हो, वित्तीय रूप से स्ट्रौंग हों आदि सबकुछ होना चाहिए ताकि आप मन लगा कर कोशिश करें, अगर आप में प्रतिभा है, तो आप को काम अवश्य मिलेगा. धैर्य की बहुत आवश्यकता है. काम में सौ प्रतिशत अपना योगदान ईमानदारी से दें.

खाली समय में आप क्या करना पसंद करती हैं?

साल 2016 बहुत व्यस्त गुजरा है. अगर समय मिलता है तो डांस करती हूं. मुझे डांस के सभी फौर्म आते हैं. संगीत, रीडिंग, खाना बनाना सबकुछ करती हूं.

दायित्व और देशभक्ति

यह विडंबना है कि हमारे देश में सीमाओं पर लड़ने वाली सेना टैंकों, राइफलों, लड़ाकू हवाईजहाज और अपने ही रहने के कैंटों, जो देशभर में फैले हैं, में अतिक्रमण की शिकार हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक फैसले में यह तो कह दिया कि गैरकानूनी रूप से रह रहे बाशिंदों को कैंट वार्डों के चुनावों में वोट देने का हक नहीं है पर उस ने उन्हें हटाने का कोई आदेश नहीं दिया.

सेना के पास लगभग 17 लाख एकड़ जमीन देश के 62 कैंटों में है और करीब 15 लाख एकड़ कैंटों से बाहर है पर इस पर कितनों ने, कब से कब्जा कर रखा है, इस का कोई हिसाब सेना के पास नहीं है. यह ठीक है कि देश में सेना की जमीन पर अतिक्रमण करने वाले दुश्मन तो नहीं हैं पर फिर भी गैरकानूनी काम तो कर रहे हैं और वह भी सेना की नाक के नीचे. जो लोग सैनिकों की दुहाई देते हुए देशभक्ति के पैरोकार बने रहते हैं उन्हें क्या इस भयंकर अपराध का अंदाजा नहीं है?

27 सितंबर, 2016 को दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि अधिकारियों को तुरंत इन अवैध कब्जाइयों को हटाना चाहिए पर ऐसा हो नहीं पाएगा.

स्कैटिंग : रिस्क और रोमांच का मजा

दुनिया में ऐडवैंचर प्रेमियों की कमी नहीं है. कभी वे पर्वत की ऊंचाइयों को छूने की कोशिश करते हैं तो कभी लहरों के बीच जा कर भीगने का आनंद उठाते हैं. कभी बाइक पर खतरनाक स्टंट कर के देखने वालों का दिल दहला देते हैं. दरअसल, ऐडवैंचर का शौक ही ऐसा है. इन्हीं ऐडवैंचर्स खेलों में स्कैटिंग भी काफी पौपुलर है, जिसे आप स्कूलकालेज के ग्राउंड से ले कर बर्फ पर भी कर सकते हैं. बस, आप को जरूरत है अपने कदमों को बैलेंस बनाते हुए हवा को चीरते हुए आगे बढ़ कर स्कैटिंग का लुत्फ उठाने की. इस में पांवों के दबाव से गति और घुमाव देखते ही बनता है.

स्कैट्स के आविष्कार का श्रेय

1760 में पहला रोलर स्कैट बनाने का श्रेय जौन जोसफ मर्लिन को जाता है, जिन के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न छोटे धातु के पहिए लगा कर स्कैट्स तैयार किए जाएं. उन का यह विचार सफल भी हुआ, लेकिन शुरुआती चरण में कुछ कमियां रहीं, जिन्हें बाद में सुधार कर बेहतरीन स्कैट्स तैयार किए गए. आज जो इनलाइन स्कैट्स से मिलतेजुलते हैं. अभी तक इनलाइन स्कैट्स का ही चलन था, लेकिन 1863 में क्वाड स्कैट्स आए, जो विकसित डिजाइन था. इस में हर पैर के लिए 2 आगे और 2 पीछे पहिए होते थे. इस स्कैट से टर्न लेने और तेजी से आगे बढ़ कर खुद को कंट्रोल करने में आसानी होती थी. इसे बनाने का श्रेय न्यूयौर्क के जेम्स लेनौर्ड प्लिंपटन को जाता है.

1990-93 में सेफ्टी के उद्देश्य से रोलर ब्लेड आधारित ब्रैंडेड स्कैट्स लौंच किए गए, जिन्हें काफी पसंद किया गया और इन की बढ़ती प्रसिद्धि को देखते हुए दूसरी कंपनियों ने भी इन से मिलतेजुलते स्कैट्स बना कर प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाया. आज तो ऐडवांस स्कैट्स दुनिया के सामने हैं, जिन्हें प्रयोग में ला कर स्कैट्स प्रेमी स्कैटिंग का लुत्फ उठाते हैं.

स्कैटिंग की श्रेणियां

रोलर स्कैटिंग

रोलर स्कैटिंग ऐसी स्कैटिंग है, जिस का मजा आप घर और बाहर दोनों जगह उठा सकते हैं. इस में आप किसी भी समतल सतह पर रोलर स्कैट्स की मदद से आनंद उठा सकते हैं. इस तरह के स्कैट्स में 2 पहिए आगे और 2 पीछे लगे होते हैं.

इनलाइन स्कैटिंग

इनलाइन स्कैटिंग में स्कैटर बहुत ही हलके बूट्स, जिन के नीचे 3 से 5 पहिए एक ही लाइन में अटैच होते हैं, पहन कर स्कैटिंग करते हैं. इन्हें बनाने का श्रेय अमेरिका के स्कौट ओल्सेन को जाता है. इन स्कैट्स में धातु के ब्रेक, यूरेथेन व्हील्स और हील ब्रेक लगे होते हैं. इन की मदद से स्कैटर को बैलेंस बनाने में आसानी होती है साथ ही जब उन्हें रोकना होता है, तो हील बे्रक का यूज करते हैं, जिस में रबड़ पैड स्कैट्स के पीछे अटैच होता है, जिस से चोट लगने का डर नहीं रहता.

आइस स्कैटिंग

आइस स्कैटिंग के खेल में जो स्कैटर्स होते हैं वे खास तरह के स्कैट्स पहन कर बर्फ पर इस खेल का आनंद उठाते हैं. यह खेल ज्यादातर उन देशों में खेला जाता है जहां ज्यादा ठंड पड़ती है.

बर्फ पर स्कैटिंग किस तरह की

–       आइस स्कैटिंग में आइस स्कैट्स की मदद से बर्फ पर स्कैटिंग की जाती है

–       फिगर स्कैटिंग में अलग या आइस पर स्कैटिंग की जाती है. इसे 1908 में पहली बार ओलिंपिक में विंटर स्पोर्ट्स में शामिल किया गया.

–       स्पीड स्कैटिंग में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच प्रतियोगी एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं.

–       टूर स्कैटिंग में बर्फ पर स्कैट्स की सहायता से लंबी सैर का लुत्फ उठाया जाता है.

ठोस सतह पर स्कैटिंग किसकिस तरह की

–       रोलर और इनलाइन स्कैटिंग में समतल जगह पर घूमने का आनंद उठाया जाता है.

–       वर्ट स्कैटिंग में वर्ट रैंप पर राइड का लुत्फ उठाया जाता है.

–       जिस तरह हम सड़क पर साइकिल चला कर खुद को रोमांच प्रदान करते हैं, ठीक उसी तरह रोड स्कैटिंग में सड़क पर स्कैटिंग करते हैं.

–       स्कैट बोर्ड को प्रयोग कर के भी स्कैटिंग के मजे को कई गुना बढ़ाया जाता है.

–       आर्टिस्टिक रोलर स्कैटिंग भी फिगर स्कैटिंग से मिलताजुलता खेल ही है, लेकिन इस में भाग लेने वाले आइस स्कैट्स की जगह रोलर स्कैट्स पर दौड़ते हैं.

स्कैटिंग चैंपियनशिप

–       ‘द फ्रैंच फिगर स्कैटिंग चैंपियनशिप’ फ्रांस में प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है, जिस का उद्देश्य प्रतियोगिता के माध्यम से देश के बैस्ट स्कैटर्स की पहचान कर के उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना है. इस में मैडल बैस्ट महिला व बैस्ट पुरुष स्कैटर के साथ पियर स्कैटिंग व आइस डांसिंग में बैस्ट प्रदर्शन करने वालों को दिया जाता है.

–       ‘द स्विस फिगर स्कैटिंग चैंपियनशिप’ जो स्विट्जरलैंड में आयोजित की जाती है, में विजेताओं को ताज पहना कर सम्मानित किया जाता है.

–       2016 में दक्षिण कोरिया के सियोल में वर्ल्ड शौर्ट ट्रैक स्पीड स्कैटिंग चैंपियनशिप का आयोजन हुआ, जिसे काफी पसंद किया गया.

इसी तरह देशदुनिया में स्कैटिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है.

स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद

खुद को स्वस्थ रखने के लिए हमें नियमित ऐक्सरसाइज करना जरूरी होता है. वैसे तो यह आप पर निर्भर करता है कि आप खुद को स्वस्थ रखने के लिए जौगिंग, ब्रिस्क वौक, स्किपिंग वगैरा में से क्या करना पसंद करते हैं लेकिन चाहें तो रोलर स्कैटिंग से बहुत कम समय में ज्यादा कैलोरी बर्न कर सकते हैं. जैसे अगर एक सामान्य पुरुष का वजन 190 पाउंड के बराबर है, तो वह रोलर स्कैटिंग से हर मिनट में 10 कैलोरीज बर्न करता है जबकि 163 पाउंड वजन वाली महिला हर मिनट में 9 कैलोरीज बर्न करती है. साथ ही इस से हड्डियों को भी मजबूती मिलती है. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के एक शोध के अनुसार रोलर स्कैटिंग से हार्ट को भी मजबूती प्रदान होती है यानी इस से फायदे अनेक हैं.

टी20 क्रिकेट के कुछ दिलचस्प रिकॉर्ड्स

क्रिकेट के हर मैच में कुछ ना कुछ रिकॉर्ड बनता है और टूटता है. वर्तमान समय में क्रिकेट का सबसे छोटा फॉर्मेट टी20 लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है. टी20 यानी की फटाफट क्रिकेट में जितनी जल्दी मैच खत्म होता है उतनी ही जल्दी रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते हैं. तो आइए जानते हैं टी20 के कुछ दिलचस्प रिकॉर्ड्स के बारे में.

जीरो पर आउट हुए बिना सबसे ज्यादा मैच

भारतीय क्रिकेट के दिग्गज बल्लेबाज महेंद्र सिंह धोनी जीरो पर आउट हुए बिना सबसे ज्यादा मैच खेलने वाले बल्लेबाज हैं. मसलन यह की धोनी सबसे कम बार जीरो रन पर आउट हुए हैं. साल 2006 में धोनी साउथ अफ्रीका के खिलाफ खेले गए मैच में आखिरी बार जीरो पर आउट हुए थें.

एक ओवर में सबसे ज्यादा रन

टी20 वर्ल्ड कप के पहले संस्करण (2007) में युवराज सिंह ने इंग्लैंड के खिलाफ स्टुअर्ट ब्रॉड के ओवर में 6 छक्के जड़े थे. इस तरह एक ओवर में 36 रन बनें जो आज तक का टी20 फॉरमेट में सर्वाधिक स्कोर है.

एक साल में सबसे ज्यादा रन

एक साल में सर्वाधिक रन बनाने का रिकॉर्ड वर्तमान भारतीय कप्तान विराट कोहली के नाम है. उन्होंने साल 2016 में 641 रन बनाए थे.

सबसे तेज 50 विकेट

टी20 मुकाबले में सबसे तेज 50 विकेट लेने का रिकॉर्ड श्रीलंका के अजंता मेंडिस के नाम है. उनहोंने यह कारनामा किर्फ 26 मैच में ही कर लिया था.

सबसे ज्यादा गेंद खेलने वाले बल्लेबाज

भारत के खिलाफ खेले गए टी20 मैच में ऑस्ट्रेलिया के शेन वॉट्सन ने 71 गेंदों में 124 रनों की पारी खेली थी. यह किसी भी बल्लेबाज द्वारा खेले गए सबसे ज्यादा गेंद हैं.

सबसे ज्यादा गेंद फेंकने वाले खिलाड़ी

पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी टी20 इतिहास में सबसे ज्यादा गेंद फेंकने वाले खिलाड़ी हैं. अफरीदी ने 98 मैचों में 2144 गेंद फेंकी हैं.

सबसे तेज हाफ सेंचुरी

युवराज ने साल 2007 में मात्र 12 गेंदो में 50 रन बनाया था. टी20 इतिहास में यह आज तक का सबसे तेज हाफ सेंचुरी है.

एक पारी में सर्वाधिक छक्के

साल 2013 में ऑस्ट्रेलियाई ओपनर एरोन फिंच ने इंग्लैंड के खिलाफ 63 गेंदों में 156 रनों की पारी खेली थी. फिंच ने अपनी इस पारी में 14 छक्के जड़े थे.

सबसे लंबी साझेदारी

टी20 में सबसे लंबी साझेदारी का रिकॉर्ड कीवी बल्लेबाजों के नाम है. 2016 में मार्टिन गुप्टिल और केन विलियमसन ने 171 रनों की साझेदारी की थी. 

साइबर चोरी से बचाएं डिजिटल वौलेट

नोटबंदी के बाद सरकार का जोर है ‘कैशलैस’ लेनदेन पर. एक सीमा से अधिक नकद कोई रख ही नहीं सकता. जाहिर है, बाजार में नकदी की किल्लत है और इस के चलते देरसबेर लोग ई वौलेट पर निर्भर होने को मजबूर हैं. पेटीएम, ई वौलेट, ई औक्सीजन, आईसीआईसीआई बैंक का आई मोबाइल, पौकेट्स, स्टेट बैंक बडी, ई पेमैंट, सिटरस वौलेट, पेयूमनी, रूपे और न जाने क्या क्या की बाजार में सक्रियता बढ़ गई है. जेब में पैसे न होने से लोग ई वौलेट का रुख कर वर्चुअल पेमैंट कर रहे हैं. इस वर्चुअल वौलेट से एक अलग किस्म का खतरा खड़ा हो गया है.

मगर यह सोच लेना कि जनता की जेब में पैसे नहीं हैं तो चोरों और जेबकतरों का बाजार मंदा चल रहा है गलत है. वह कहावत है न कि ‘चोर चोरी से जाए हेराफेरी से न जाए’. इन दिनों यह कहावत खरी उतर रही है. चोर भी डिजिटल हो गए हैं. इन की चोरी की गिनती साइबर क्राइम के तहत होती है. साइबर विशेषज्ञों की मानें तो आजकल डिजिटल चोर पूरे देश में सक्रिय हो गए हैं. इन की नजर ई वौलेट पर है. ये आप के वर्चुअल वौलेट हैक करने की फिराक में हैं. साइबर क्राइम के जानकार पुलिस अधिकारी असित घोष का कहना है कि यह काम इतनी चालाकी से हो रहा है कि आप को कानोंकान खबर नहीं होगी. जब खबर होगी तब तक आप लुट चुके होंगें.

डिजिटल चोरी

वर्चुअल चोरी या साइबर अपराध का दायरा बढ़ रहा है और साइबर पुलिस के लिए यह एक नई चुनौती के रूप में सामने आया है. असित घोष कहते हैं कि जब हम बैंक के माध्यम से लेनदेन करते हैं तो आज हर बैंक में केवाईसी यानी नो योर कस्टमर फार्म भरना पड़ता है. इस के सपोर्ट में कई दस्तावेज बैंक में जमा करने होते हैं. लेकिन ई वौलेट के मामले में ऐसा कोई फार्म भरने की बाध्यता नहीं होती. इसी का फायदा मिलता है डिजिटल चोरों को. बड़ी आसानी से ई वौलेट खोल कर वर्चुअल पैसे उड़ा लेते हैं. ऐसी चोरी की जांच में पुलिस को कई तरह की दिक्कतें आती हैं.

दक्षिण 24 परगना में एक व्यक्ति ने अचानक पाया कि उस के अकाउंट से बड़ी रकम औन लाइन ट्रांजक्शन के जरीए गायब हो गई है. इस की खबर उसे कुछ दिनों के बाद मिल पाई. पुलिस में इस की शिकायत की गई. जांच में पुलिस ने पाया कि उस व्यक्ति के अकाउंट से जो रकम गायब हुई वह औनलाइन वौलेट के जरीए गायब की गई थी. उस के ई वौलेट से हजारों रुपए का मोबाइल और डीटीएच रिचार्ज कराया गया था. इस के अलावा मोटी रकम की औनलाइन खरीदारी भी की गई थी.

सावधानी जरूरी

कोलकाता पुलिस में साइबर क्राइम के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि फर्जी डैबिट कार्ड या क्रैडिट कार्ड तैयार कर लेने या अकाउंट हैक करने की शुरुआत कुछ साल पहले ही हो गई थी. पिन नंबर की चोरी से इस तरह की चोरी को अंजाम दिया जाता रहा है. किसी अकाउंट से बड़ी रकम किसी दूसरे या चोर अपने अकाउंट में ट्रांसफर करता है. लेकिन अब तो वर्चुअल तरीके से नकदी चोरी हो रही है.

साइबर कानून के जानकार विभास चटर्जी का कहना है कि बैंक में अकाउंट खोलने का काम रिजर्व बैंक के दिशानिर्देश के तहत होता है. जिस किसी को अकाउंट खोलना है उसे कुछ दस्तावेजों के साथ आवेदन करना पड़ता है. लेकिन ई वौलेट के लिए किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं पड़ती है. वर्चुअल चोरी के मामले में पाया गया है कि झांसा देने वाला या ठगी करने वाला कुछ समय के लिए ग्राहक का वर्चुअल पैसा अपने ई वौलेट में रख कर उस का इस्तेमाल कर सकता है. इसे एक गेटवे की तरह इस्तेमाल करता है.

ऐसी ठगी पर रोक लगाने के लिए ई वौलेट अकाउंट खोलने के मामले में कुछ खास तरह का नियंत्रण लगाना भी जरूरी है.

इस के अलावा और भी कई तरीके हैं ई वौलेट से चोरी या ठगी के. ई वौलेट के लिए स्मार्टफोन और उस का फोन नंबर काफी है. कभी फोन चोरी होने पर या फोन हैक कर लिए जाने पर इस तरह की चोरी आसान हो जाती है. फोन हैक कर लेने से फोन के जरीए आप का सब कुछ साइबर चोर के हाथों में पड़ जाता है.

ऐसे रखें सुरक्षित

अपने ई लेनदेन को सुरक्षित रखना है तो इन बातों पर गौर करें:

– अपना पासवर्ड व आईडी किसी के साथ शेयर न करें. बैंक भी कभी आप से इन की जानकारी नहीं मांगता.

– समय समय पर ट्रांजक्शन पासवर्ड बदलते रहें.

विज्ञान ने देश को भुखमरी से उबारा

भारत की आजादी के समय के हालात ये थे कि गेहूं की रोटियां तो रिश्तेदारों के लिए ही बना करती थीं. बुजुर्गों की मानें तो गांवों में किसान सुबह शाम दलिया खाया करते थे. उन्हें रोटियां एक समय दोपहर में ही मिला करती थीं.

ज्यादातर लोग मोटे अनाज यानी ज्वार, बाजरा, मक्का या चना जैसी चीजें ही खाया करते थे. इतना ही नहीं जिस खेत में आज 30 क्विंटल अनाज पैदा होता है, उस में आजादी के समय 4 क्विंटल अनाज पैदा होता था.

देश में अब करीब 25 करोड़ टन अनाज हर साल पैदा होता है. यानी 1 आदमी के हिस्से में 1923 किलोग्राम अनाज सालाना आ रहा है. सरकार ने अनेक गोदाम बनवाए हैं, लेकिन भंडारण के लिए गोदामों की कमी की वजह से 38 फीसदी अनाज हर साल सड़ कर खराब हो जाता है. अन्न के जरूरत से ज्यादा भंडारण होने 

के बाद भी करीब 19 करोड़ लोग भूखे रहने के लिए मजबूर हैं. भंडारण और वितरण की व्यवस्था ठीक से हो तो कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए.

6 लाख गांवों के देश भारत में खेती की कहानी बड़ी लंबी है. इस क्षेत्र में विज्ञान ने 

खेती को नया रूप दिया है. जनसंख्या बढ़ने के साथ जोत छोटी हुई है, लेकिन कृषि पर निर्भरता बढ़ी है. यह स्थिति तब है, जबकि लोग खेती छोड़ रहे हैं. जिस हरित क्रांति के दम पर आज हम भरपेट रोटी खा रहे हैं, उस को भी 50 साल पूरे हो गए हैं. किसानों ने अपने पसीने से जमीन को सींच कर सब कुछ पैदा करने लायक बना दिया है. लेकिन 50 सालों में सारी तरक्की बेमानी सी लगने लगी है. उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल ने खेती की जमीन को खराब कर दिया है. 

आजादी के समय लारमा रोजो और सुनहरा 64 जैसी एक-दो किस्में ही पूरे देश में उगाई जाती थीं. जिन की उपज बेहद कम होती थी. डा. एमएस स्वामीनाथन ने काफी प्रयास कर के मैक्सिको के डा. बारलाग से कुछ कम लंबाई वाली गेहूं की किस्मों के बीज मंगवा कर कुछ खास इलाकों में उन्हें बोया. मैक्सिको से बीजों की पहली खेप साल 1963 में मिली. इन की खेती सब से पहले दिल्ली के नजदीक हरियाणा जैसे राज्यों में की गई.

शुरुआती तौर पर इन किस्मों का प्रदर्शन ज्यादा अच्छा नहीं रहा, लेकिन हमारे वैज्ञानिकों ने इन में कुछ सुधार कर के इन्हें भारतीय हालात के हिसाब से उपजाऊ बना लिया. इन किस्मों के परिणाम अच्छे मिलने के साथ ही कुछ सालों में ये पूरे देश में फैल गईं. इन बीजों के आने से पहले गेहूं की उपज 1 टन प्रति हेक्टेयर मिलती थी, जो नए बीजों से बढ़ कर 5 टन तक होने लगी. कुछ जागरूक किसानों ने बीज के कारोबार निजी क्षेत्रों में जमा कर प्रगतिशील लोगों तक नई किस्मों की पहुंच को आसान कर दिया. इस के साथ ही रिश्तेदारों के लिए बनने वाली गेहूं की रोटी हर किसान के यहां बनने लगी.

गेहूं की उपज बढ़ने के साथ ही सरकार को इस बात की चिंता सताने लगी कि उत्पादित अनाज के लिए भंडारण का इंतजाम भी हो. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्व उपप्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश में भंडारण गोदाम योजना को पूरा कराने की जिम्मेदारी डाली. देश में एफसीआई गोदामों का जाल बिछाया गया. आजादी के समय की 35 करोड़ लोगों का पेट भरने में अक्षम जमीन और किसानों ने विज्ञान के दम पर यह कर दिखाया कि भारत आज 125 करोड़ लोगों का पेट भरने के साथ चावल की सुगंधित और बासमती श्रेणी की किस्मों से समूचे विश्व का पेट भर रहा है. आज भी देश की 70 फीसदी जनता का पेट खेती-किसानी से जुड़े धंधों से भरता है. आजादी के 20 साल बाद भी 41 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रही थी, जो आज 16 फीसदी रह गई है.

अनाज का उत्पादन बढ़ाने के बाद वैज्ञानिक नई नई किस्मों के विकास में लग गए, इन में इस तरह के प्रयोग भी किए जाने लगे कि किस्में ऐसी हों, जिन में रोग कम लगें. यानी रोग प्रतिरोधी किस्मों को लगाया जाने लगा. बौनी, रोग रोधी, ज्यादा कल्ले देने वाली, पोषण युक्त किस्मों के आने से देश में खाद्य सुरक्षा का सपना साकार होने लगा. इन में अब हाईब्रिड बीजों ने क्रांति ला दी है. साल 1990 में देश में आए इंडो अमेरिकन कंपनी के पहले टमाटर के हाइब्रिड बीज के बाद तो सैकड़ों कंपनियों के एक से एक बेहतरीन बीज बाजार में मौजूद हैं. 

अब बहस चल रही है जीएम फसलों पर यानी जेनेटिक मौडीफाइड क्रौप पर. वे फसलें जिन में जीन परिवर्तित कर के रोग संक्रमण वगैरह पर खर्च होने वाले करोड़ों अरबों रुपयों के साथ मानव स्वास्थ्य को इन के बुरे असर से बचाया जा सके.

बासमती श्रेणी के चावल और सुगंधित श्रेणी के धान की आधा दर्जन से ज्यादा 1121-1509 जैसी किस्में विकसित कर के पूसा के वैज्ञानिकों ने विश्व में अपनी धमक बनाई और अरब देशों को निर्यात कर के देश में विदेशी पैसे को बढ़ाया. इन किस्मों से किसानों को अपनी माली हालत सुधारने में बेहद मदद मिली.

साल 1950-51 की तुलना में खाद्यान्न उत्पादन में 5 गुने, बागबानी उत्पादन में 6 गुने, मछली उत्पादन में 12 गुने, दूध उत्पादन में 8 गुने और अंडा उत्पादन में 27 गुने की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.

फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए पिछले 2 सालों में ही 227 नई किस्में विकसित की गईं. इतना ही नहीं 2015-16 में अनाज की 19, दलहन की 20 और तिलहन की 24 सूखा प्रतिरोधी और बाढ़ को सहने वाली किस्में विकसित की गईं. देश की खाद्य सुरक्षा में धान की मुख्य भूमिका को देखते हुए धान की स्वर्णा सब 1 किस्म तैयार की गई है. स्वाद में अच्छी यह किस्म 2 हफ्ते तक पानी में डूबे रहने के बाद भी नहीं मरती. 140 दिनों में पकने वाली यह किस्म 5 से 6 टन उत्पादन देती है. कम पानी वाले इलाकों के लिए खास धान विकसित किया गया है.

देश में अरहर की दाल की महंगाई को काबू करने के लिए कम समय में पकने वाली किस्म पूसा संस्थान के संयुक्त निदेशक केवी प्रभू और उन की टीम ने तैयार की है. अभी प्रयोगों से बाहर आई यह किस्म देश में अरहर की दाल के उत्पादन में इजाफा करेगी.

खाद्य सुरक्षा में अहम योगदान देने वाली मुख्य दूसरी फसल गेहूं की सूखा और सामान्य से ज्यादा तापमान झेलने वाली पूसा की एचडी 2888 किस्म 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दे रही है. कम समय में पकने और रोग रोधी किस्मों की बड़ी खेप बीज के रूप में आज देश के संस्थानों के पास मौजूद है. करीब 

650 कृषि विज्ञान केंद्र खेती के साथसाथ पशुपालन व मछलीपालन जैसे क्षेत्रों में तमाम अनुसंधान कर के लोगों की जीविका में सहायक बन रहे हैं.

खाने पीने से जुड़ी कुछ खास जानकारियां

इनसान की जिंदगी यों तो तमाम झमेलों से भरी होती है, मगर सुबह से रात तक खाने की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता है. इनसान की सारी गतिविधियों का मकसद कुछ कमाना और भर पेट खाना होता है. सजनासंवरना और मनोरंजन करना जैसी चीजें खाने के बाद ही आती हैं. भूखे इनसान को पढ़नालिखना, घूमनाफिरना या कुछ भी करना अच्छा नहीं लगता. जब पेट भरा हो तभी खेलकूद जैसी चीजें इनसान को रास आती हैं. इश्क और रोमांस जैसी गतिविधियां भी भरे पेट ही अच्छी लगती हैं. खानपान से जुड़ी बातें पत्रिकाओं व अखबारों में छपती ही रहती हैं, मगर यहां पेश हैं खानपान से संबंधित कुछ खास खबरें :

मशीन सूंध कर बताएगी कि खाना ठीक है या नहीं : अकसर यह अंदाजा लगाना ठिन होता है कि कोई खाना खाने लायक है या नहीं. कुछ लोग सूंघ कर कहेंगे कि खाना तो सही लग रही है, पर वही खाना किसी को खराब महसूस होता है.

अब यह काम मशीनों के जरीए होगा. ये मशीनें सूंघ कर बता देंगी कि खाना खाने लायक है या नहीं. ये मशीनें यह भी बताएंगी कि वातावरण में फैले प्रदूषण का स्तर इनसान के लिए कितना घातक है. भारतीय मूल के एक शोधकर्ता के साथ मिल कर कुछ वैज्ञानिकों ने लंदन (इंगलैंड) में एक ऐसा बायो सेंसर तैयार किया है, जो मशीनों को इनसानों की ही तरह अच्छी और खराब महक में फर्क करने की कूवत देता है. भारतीय वैज्ञानिक के साथ इंगलैंड और इटली के वैज्ञानिकों ने इनसान की नाक को सूंघने की कूवत देने वाले प्रोटीनों से यह बायो सेंसर बनाया है. यह शोध ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में छपा है. यानी आने वाले वक्त में किसी खाने की अच्छाई या खराबी का वारान्यारा मशीनों द्वारा किया जाएगा.

तलीभुनी चीजें खाने से अल्जाइमर का डर : तलीभुनी करारी व जायकेदार चीजें खाने का शौक ज्यादातर लोगों को होता है, मगर यह कितना घातक हो सकता है, इस का अंदाजा लोगों को नहीं होता. न्यूयार्क (अमेरिका) में किए गए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि ज्यादा तलीभुनी चीजें खाने से अल्जाइमर होने का खतरा रहता है.

शोध करने वालों के मुताबिक खाने को तेज आंच पर पकाने से उस में ऐसे तत्त्व आ जाते हैं, जिन के कारण अल्जाइमर के साथसाथ ज्यादा उम्र में होने वाली दूसरी बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है. तलनेभूनने के दौरान अमूमन चीजों को तेज आंच पर ही चढ़ाया जाता है. तलीभुनी चीजें यकीनन खाने में तो लजीज लगती हैं, पर उन्हें खाने से धीरेधीरे भूलने की बीमारी यानी अल्जाइमर की चपेट में आने का डर बढ़ जाता है. लोगों को इस बात का खयाल रखना चाहिए वरना यादों की कूवत घटने का पूरापूरा खतरा हो सकता है. यह शोध ‘जर्नल आफ अल्जाइमर डिजीज’ में छापा गया है.

गमलों में लगाएं सेब : खुद की मेहनत से घर के बगीचे या क्यारियों में उगाए गए फल सभी को भाते हैं. इसी तरह घर की सब्जियां भी स्वादिष्ठ व सेहत के लिए उम्दा होती हैं. लेकिन जमीन की कमी की वजह से घर के फल या सब्जियां खाना सभी के लिए मुमकिन नहीं हो पाता. ऐसे ही लोगों के लिए सेब की रूट स्टाक सुपर चीफ और शैलेट स्पर प्रजातियां बेहद फायदेमंद हो सकती है.

ये प्रजातियां थोड़ी सी जगह में ही जल्दी उत्पादन देने लगती हैं. इन प्रजातियों के पौधों को गमलों से आराम से लगाया जा सकता है. ऐसे एक पौधे से 30 किलोग्राम तक पैदावार ली जा सकती है.

बागबानी वैज्ञानिकों के मुताबिक जितनी जमीन पर सामान्य प्रजाति के सेब के 250 पौधे लगाए जा सकते हैं, उतनी ही जगह पर स्पर प्रजाति के 4000 पौधे लगाए जा सकते हैं. इन्हें 1 से डेढ़ मीटर के फासले पर लगाते हैं. ये पौधे 3 सालों बाद ही फल देने लगते हैं.

देहरादून के चकराता, कालसी, मसूरी और दूसरे पहाड़ी इलाकों में इस प्रजाति के पौधों को किचन गार्डन के साथसाथ घरों में गमलों में भी लगाया जा सकता है. सेब की ये स्पर प्रजातियां हालैंड की हैं.

बागबानी मिशन के निदेशक बीएस नेगी के मुताबिक फिलहाल पहाड़ों में सेब की स्पर प्रजातियां काफी कम हैं, जबकि उन्हें गमलों में भी लगाया जा सकता है. नेगी के मुताबिक पहाड़ों में 60 फीसदी से ज्यादा डेलिसियस सेब की प्रजातियां मौजूद हैं.

जापानी तकनीक वाले ठेलों से सुधरेगी चाट : आमतौर पर चटकारे लेले कर चाट खाना ज्यादातर लोगों को भाता है. यह बात अलग है कि खटाई व मिर्चमसालों से भरपूर ठेलों की चाट सेहत की तो वाट लगा देती है. मगर अब चाटपकौड़ों के ठेलों को सुधारने की मुहिम चालू की गई है.

सरकार के सहयोग से जापानी तकनीक वाले ठेलों को तरजीह देने की योजना तैयार की जा रही है. योजना की तैयारी फूड व सेफ्टी विभाग की सिफारिश पर की जा रही है.

जापानी तकनीक वाली ठेली पर साफ पानी, गरम चाट व मच्छरमक्खी रहित माहौल मौजूद होगा. ठेलियों की छतों पर सौर ऊर्जा वाली प्लेटे लगाई जाएंगी. सौर ऊर्जा से मिलने वाली सप्लाई से ठेली का वाटर प्योरीफायर व फूड हीटर चलाए जाएंगे. ये ठेलियां सौर ऊर्जा की रोशनी से जगमगाती रहेंगी. इन ठेलियों की कीमत फिलहाल तय नहीं की गई है.

यकीनन ये जापानी नस्ल की ठेलियां आम ठेलियों के मुकाबले काफी महंगी होंगी, मगर इन का नतीजा भी बेहतरीन होगा. डीओ फूड सेफ्टी विनीत कुमार के मुताबिक इन ठेलियों पर बिकने वाले सामान की बराबर चेकिंग की जाएगी और खयाल रखा जाएगा की चीजें एकदम ताजी व उम्दा हों.

आमतौर पर चाट के शौकीन बहुत बड़ी तादाद में होते हैं, लिहाजा जापानी तकनीक वाली नई ठेलियों को बढ़ावा दिया जाना जरूरी है. बिजली की कमी से साधारण ठेली वाले सफाई व ताजगी का बंदोबस्त नहीं कर पाते. सौर ऊर्जा का बंदोबस्त होने से चाट की ठेलियां लाजवाब बन जाएंगी.

कैंसर को पछाड़ेगी चाय की पत्ती से तैयार दवा : कैंसर बीमारी का नाम सुनते ही लोगों की रुह तक कांप जाती हैं. कोई यह सोचना भी पसंद नहीं करता कि उसे कैंसर हो सकता है. मगर दुनिया भर में कैंसर के तमाम मामले सामने आते ही रहते हैं.

एक नई खोज के मुताबिक चाय की बेकार या बची हुई पत्तियों से तैयार की गई खास दवा का इस्तेमाल कर के कैंसर का मुकाबला किया जा सकता है. खराब याददाश्त वाले लोगों के लिए भी चाय की पत्तियां कारगर साबित होती हैं.

चाय की पत्तियों में कैटेकिनस तत्त्व होता है, जिस में कैंसर व अन्य बीमारियों का मुकाबला करने की खूबी होती है. काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) संस्थान, पालमपुर ने लंबी खोज के बाद पहली दफा भारत में चाय की पत्तियों से कैटेकिनस तत्त्व का फार्मूला तैयार किया है. इस तत्त्व से बनाई जाने वाली दवाओं को मार्केट में लाने के लिए संस्थान ने अपने नायाब फार्मूले को कांगड़ा के पपरोला की एक एक प्राइवेट कंपनी को दिया है. उम्मीद है कि कंपनी जल्द ही इस से दवाएं तैयार कर के मार्केट में लाएगी.

गौरतलब है कि संसार भर में कैटेकिनस की मार्केट 8-9 फीसदी है. जापान व चीन कैटेकिनस के सब से बड़े सप्लायर हैं. करीब 75 फीसदी बाजार पर चीनजापान का कब्जा है. अभी तक दुनिया भर में हर्बल चाय की धूम थी, मगर अब कैटेकिनस की चाय की डिमांड लगातार बढ़ रही है.

काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च संस्थान का मानना है कि इस से चाय कारोबार को भी बढ़ावा मिलेगा और साधारण चाय उत्पादक भी माली तौर पर पुख्ता होगा.

संस्थान के डायरेक्टर डा. दिनेश कुमार के मुताबिक संस्थान के वैज्ञानिकों ने चाय से कैटेकिनस का ऐसा फार्मूला बनाया है, जो कैंसर व घटिया याददाश्त को दुरुस्त करने में कारगर है.

यकीनन चाय की पत्तियों से कैंसर जैसी बीमारी का मुकाबला करने वाली खोज दुनिया भर के लोगों को फायदा पहुंचाएगी.

सब्जियों के लिए कारगर है शराब : शराब, मदिरा या दारू जैसे नामों से मशहूर

पी जाने वाली चीज देशी हो या विलायती, सेहत के लिहाज से घातक ही होती है.

शराब के कायल लोग महंगी से महंगी शराब शान से डकारते हैं, मगर इस से उन की सेहत का सत्यानाश ही होता है.

मगर सब्जियों के मामले में शराब का किरदार अलग हो जाता है. देशी दारू के इस्तेमाल से सब्जियों की खेती को बेहद फायदा पहुंचता है. देशी दारू के छिड़काव से सब्जियों के पौधे ताजे, हरेभरे व मजबूत हो जाते हैं, नतीजतन पैदावार में भी इजाफा हो जाता है.

सब्जियों की खेती में शराब के फायदे की खोज मेरठ के माहिर किसानों द्वारा की गई है. इन किसानों का मानना है कि शराब का सब्जियों के खेतों में इस्तेमाल, महंगी कीटनाशक दवाओं के मुकाबले काफी सस्ता और बेहद कारगर है.

कृषि वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि अल्कोहल यानी शराब सब्जियों को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को खत्म कर देती है. चूंकि इस मसले पर कोई शोध नहीं किया गया है, लिहाजा फिलहाल कृषि वैज्ञानिक फसलों पर शराब के छिड़काव की सिफारिश नहीं करते.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माहिर किसान फसलों के मामले में अकसर खोजबीन करते रहते हैं. यह खोज उसी का नतीजा है. मेरठ के किसानों ने लौकी, तुरई, मिर्च व बैगन सहित तमाम हरी सब्जियों पर देशी शराब का छिड़काव सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है.

दिमाग के लिए कारगर हैं हरी सब्जियां : हरी सब्जियों की महिमा का बखान हमेशा ही किया जाता है. माना जाता है कि पालक जैसी हरी सब्जियां खाने से खून की मात्रा बढ़ती है और हीमोग्लोबिन की कमी भी ठीक हो जाती है. मगर वाशिंगटन (अमेरिका) में पिछले दिनों की गई खोज के मुताबिक हरी सब्जियों के इस्तेमाल से दिमाग भी तेज हो जाता है.

हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक गोभी व पालक जैसी हरी सब्जियां खाने से दिमाग तंदुरुस्त और युवा हो जाता है. वैज्ञानिकों ने 950 बूढ़े लोगों पर खोजबीन कर के नतीजा निकाला है कि जो लोग सरसों का साग, पालक व गोभी जैसी हरी सब्जियां रोजाना 1 या 2 बार खाते हैं, उन का दिमाग बहुत तेज होता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक हरी सब्जियां खाने वालों को अल्जाइमर व डिमेंशिया जैसे रोग होने का डर भी नहीं रहता. हरी सब्जियों में पाए जाने वाले विटामिन के, फोलेट व बीटा कैरोटीन दिमाग को दुरुस्त रखने में कारगर रहते हैं.

मांस खाने से गुरदे को खतरा : आमतौर पर मांसाहारी खाना सेहत के लिए मुफीद माना जाता है, मगर हाल में की गई खोजों में इस के नुकसानदायक पहलू भी सामने आए हैं. नई खोजों के मुताबिक खाने में मांस से बनी चीजें ज्यादा मात्रा में होने से किडनी (गुरदा) फेल होने का खतरा बढ़ जाता है. गुरदे के पुराने मरीजों में इस बात का खौफ और ज्यादा होता है.

यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया से जुड़ी तनुश्री बनर्जी और उन के सहयोगियों के मुताबिक इनसान के खाने का सेहत के तमाम पहलुओं के साथसाथ गुरदे के काम पर भी असर पड़ता है. इन लोगों ने नतीजा निकाला कि अम्लीय खाना खाने से किडनी फेल होने का डर 3 गुना बढ़ जाता है.

अमेरिकन सोसाइटी आफ नेफ्रोलाजी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक शोध के दौरान जिन मरीजों ने खाने में मीट के बजाय फल व सब्जियां ज्यादा खाईं, उन्हें किडनी के मामले में बेहतर नतीजे मिले.

हरी मिर्च घटाएगी मोटापा : यों तो आयुर्वेद में हरी मिर्च को सेहत के लिहाज से अच्छा माना जाता है, मगर अब नए जमाने के वैज्ञानिकों को भी हरी मिर्च में तमाम खूबियां नजर आने लगी हैं. वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि हरी मिर्च खाने से मोटापा घटाया जा सकता है.

अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ वेयोनिंग में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डा. भास्कर त्यागराजन ने बायोफिजिकल सोसायटी की बैठक में इस शोध की जानकारी दी. डा. भास्कर के मुताबिक हरी मिर्च में कैप्सेसिन खास तत्त्व के तौर पर पाया जाता है, जो कैलोरी पर रोक लगाए बगैर ऊर्जा को बढ़ावा देता है.

डा. भास्कर के मुताबिक हरी मिर्च मोटापे पर लगाम लगाने के साथसाथ टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर और दिल संबंधी रोगों को दुरुस्त करने में भी कारगर होती है.

आमतौर पर मोटापा ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाने और ऊर्जा के खर्च में असंतुलन की वजह से होता है. हरी मिर्च खाने और ऊर्जा के खर्च में संतुलन बनाती है, नतीजतन मोटापा काबू में रहता है.

स्तनपान सिखाता है ठोस आहार लेना : यह हकीकत तो जगजाहिर है कि नवजात शिशुओं के लिए मां का दूध ही सब से ज्यादा मुफीद होता है. फ्रंटियर्स इन सेलुलर एंड इंफेक्शन माइक्रोबायोलाजी में छपे नए अध्ययन के मुताबिक पैदा होने के बाद शुरू में स्तनपान के अलावा दूसरे जरीयों से खुराक लेने वाले बच्चों के मुकाबले महज स्तनपान करने वाले शिशु ठोस आहार खाना जल्दी सीख जाते हैं. ऐसे बच्चों की सेहत भी अच्छी होती है.

यूनिवर्सिटी आफ नार्थ कैरोलिना के वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरूशुरू में स्तनपान का बच्चे की शारीरिक बनावट पर गहरा असर पड़ता है. मां के दूध में ऐसे नायाब तत्त्व पाए जाते हैं, जो बच्चे के हाजमे को सही करते हैं. इसी वजह से बच्चे जल्दी ही ठोस आहार खाने लायक हो

जाते हैं.

बीयर सुधारती है दिमाग : आमतौर पर हलकीफुलकी बीयर को शराब की छोटी बहन मान कर नकार दिया जाता है, मगर सेहत के लिहाज से अगर जरा सी बीयर पी जाए तो इस में बुराई नहीं है. वैज्ञानिकों के मुताबिक याददाश्त से जुड़ी बीमारियों में बीयर कारगर रहती है.

लांझाउ विश्वविद्यालय (अमेरिका) के शोधकर्ताओं का कहना है कि बीयर में शांथोहुमोल नामक तत्त्व पाया जाता है, जो दिमाग की कोशिकाओं को महफूज रखता है, नतीजत अल्जाइमर व पार्किंसन जैसी बीमारियां नहीं होने पाती. यानी बीयर पीने से इनसान की याददाश्त चौकस रहती है.

कैंसर से बचाती है ग्रीन टी : ग्रीन टी को सामान्य चाय के मुकाबले हमेशा तरजीह दी जाती है, अलबत्ता आम लोगों को आम चाय का ही ज्यादा चसका होता है.

नई खोजों से खुलासा हुआ है कि ग्रीन टी पीने से मुंह के कैंसर का खतरा नहीं रहता है. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने ग्रीन टी में एक ऐसा तत्त्व पाया है, जो मुंह की कैंसर कोशिकाओं को मार सकता है. इस से स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं होता.

कुल मिला कर ग्रीन टी सेहत के लिए बेहद मुफीद होती है, लिहाजा सभी को इस का इस्तेमाल करना चाहिए.                        

माहिरा खान को कितना जानते हैं आप

पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान “रईस” में शाहरुख खान के साथ नजर आई. कई तरह की रुकावटों के बाद भी राहुल ढोलकिया निर्देशित शाहरुख खान और माहिरा खान अभिनीत फिल्म “रईस” 200 करोड़ के क्लब में शामिल हो गई है. माहिरा खान ने इसके पहले भी बहुत सी हिट फिल्में की है लेकिन “रईस” ने उनकी सभी फिल्मों के रिकॉर्ड तोड दिए हैं.

माहिरा खान की रोचक बातें

मशहूर पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान का जन्म 21 दिसम्बर 1982 को करांची, सिंध, पाकिस्तान में हुआ था. माहिरा खान ने कुछ टीवी शो में भी काम किया है. माहिरा की पहली डेब्यूट फिल्म “बोल” 2011 में रिलीज हुई थी. माहिरा ने स्कूल के बाद अपनी पढ़ाई कैलिफोर्निया से पूरी की थी. पढ़ाई के साथ माहिरा ने पार्ट टाइम जॉब भी की. पढ़ाई के दौरान माहिरा ने कैशियर से लेकर दुकान में झाड़ू-पोछा लगाने तक का काम किया.

माहिरा ने अपने कैरियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में रेडियो जॉकी की नौकरी से की थी. माहिरा ने बतौर रेडियो जॉकी “मोस्ट वॉन्टेड” और “वीकेन्ड विथ माहिरा” जैसे शो में काम किए हैं.

माहिरा ने 2007 में अपने पिता के खिलाफ जाकर अली अस्कारी से शादी की थी. माहिरा के दो बच्चें भी हैं. साल 2012 में माहिरा को सबसे खूबशूरत महिला होने का खिताब भी मिला था.

माहिरा खान की फिल्में

माहिरा खान की थिएटर में रीलीज हुई पहली फिल्म “बोल”(2011) थी, उसके बाद “बिन रोए”(2015), “मंटो”(2015), “हो मन जहां”(2016) और हाल ही रिलीज हुई फिल्म “रईस”(2017). माहिरा ने अपने फिल्मी कैरियर में सभी हिट फिल्में की है.

माहिरा और टी वी शो

माहिरा ने फिल्मों में आने से पहले कुछ टी वी शो भी किए है. MTV “मोस्ट वॉन्टेड”(2006), “वीकेन्ड विथ माहिरा”(2008), “हमसफर”(2011) “शहर-ए-जात”(2012).

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें