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मिस यूनिवर्स इरिस मितेनाएर का ये हॉट अवतार देखा आपने

सौंदर्य प्रतियोगिता मिस यूनिवर्स में दुनियाभर की सुंदरियों को मात देते हुए फ्रांस की इरिस मितेनाएर ने यह खिताब अपने नाम कर लिया है. फ्रांस की इरिस मितेनाएर को मिस यूनिवर्स 2017 चुना गया है. उन्होंने मिस हैती रकेल पेलिसिसर और मिस कोलंबिया एंड्रिया टोवर को हारते हुए खिताब अपने नाम किया है. फर्स्ट रनरअप का खिताब मिस पेलिसिसर को और सेकंड रनरअप का खिताब मिस टोवर को दिया गया है.

प्रतियोगिता में 13 फाइनलिस्ट शामिल थी. जो केन्या, इंडोनेशिया, मेक्सिको, पेरू, पनामा, कोलंबिया, फिलीपिंस, कनाडा, ब्राजील, हैती, थाईलैंड और यूएसए से ताल्लुक रखती थी. प्रतियोगिता को इस बार पूर्व मिस यूनिवर्स और बॉलीवुड अभिनेत्री सुष्मिता सेन द्वारा जज किया गया था.

फिलीपींस की राजधानी मनीला के मॉल ऑफ एशिया एरेना में मेजबान हार्वे ने इरिस के नाम का ऐलान किया. मिस यूनिवर्स 2015 पिया वुर्टजबाक ने इरिस (23) को ताज पहनाया.

इरिस डेंटल सर्जरी की डिग्री कर रही हैं. उन्हें खेलकूद, दुनियाभर में घूमने और नए फ्रांसीसी व्यंजन बनाने का भी शौक है. भारत की रोशमिता हरिमूर्ति शीर्ष 15 में भी स्थान बनाने में कामयाब नहीं रही.

आप भी देखिए मिस यूनिवर्स 2017 इरिस मितेनाएर की कुछ अदाएं…

क्रिकेट नहीं था युजवेंद्र का पहला प्यार

भारत-इंग्लैंड के बीच हुए तीसरे टी20 में युजवेंद्र चहल ने 6 विकेट लिए थे जो किसी भी भारतीय गेंदबाज का अंतरराष्ट्रीय टी-20 में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. लेकिन क्या आप यह यकीन करेंगे कि स्पिनर युजवेंद्र चहल का पहला प्यार क्रिकेट नहीं शतरंज था. चहल राज्य और राष्ट्रीय स्तर के चैंपियन रह चुके हैं. उन्होंने 2013 में जूनियर चेस वर्ल्ड कप भी खेला था मगर महंगा खेल होने के कारण इसे आगे जारी नहीं रख सके.

उस वक्त उनकी उम्र 12-13 साल थी. तब उन्होंने अपने दूसरे पसंदीदा खेल क्रिकेट में हाथ आजमाया. शायद यही कारण है कि उनकी गेंदबाजी में भी शतरंज की बिसात सरीखे पैंतरे नजर आते हैं.

पैसों के कारण छोड़ना पड़ा शतरंज

युजवेंद्र ने जूनियर राष्ट्रीय चैंपियन (चेस) बनने के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े टूर्नामेंट में हिस्सा लिया, मगर आगे बढ़ने के लिए अच्छे कोच की जरूरत थी. ग्रैंड मास्टर स्तर के कोच पर महीने में एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो जाते हैं. लेकिन युजवेंद्र के पास इतने पैसे नहीं थे. लिहाजा उन्हें शतरंज छोड़ना पड़ा.

खेती की जमीन पर बनाया क्रिकेट का मैदान

जींद में क्रिकेट की सुविधाएं अच्छी नहीं थी. युजवेंद्र के लिए उनके पिता ने खेती की जमीन में डेढ़ एकड़ के हिस्से में उसके लिए मैदान तैयार कराया जहां वह अकेले ही घंटों अभ्यास करते थें.

रोहतक हरियाणा के क्रिकेट का बड़ा केंद्र है. यहीं पर जूनियर क्रिकेटरों के एक कैंप में अपने समय के दिग्गज लेग स्पिनर नरेंद्र हिरवानी के टिप्स युजवेंद्र के लिए करियर बदलने वाले साबित हुए. इससे पहले तक वह बाकी बच्चों की तरह मीडियम पेस और मिलीजुली गेंदबाजी करते थे. हिरवानी की सलाह पर ही युजवेंद्र ने लेग स्पिन पर ध्यान दिया.

रैंकिंग में लंबी छलांग

तीसरे टी-20 में छह विकेट चटकाने वाले चहल ने गेंदबाजी रैंकिंग में लंबी छलांग लगाई है. वह सीधे 86वें स्थान पर पहुंच गए हैं. उनके खाते में 404 रेटिंग अंक है. चहल ने इग्लैंड के खिलाफ सीरीज में सर्वाधिक आठ विकेट हासिल किए.

तीसरा टी20 जीतने के बाद क्या हुआ युजी और युवी के बीच

2011 वनडे क्रिकेट वर्ल्ड कप के हीरो युवराज सिंह को हम एक ऐसे जुझारू क्रिकेटर के तौर पर देखते आए हैं, जिन्होंने कैंसर को भी मात देकर टीम इंडिया में शानदार वापसी की. अभी तक हम उन्हें बल्लेबाजी में जौहर दिखाते, अपनी शानदार फील्डिंग या गेंद से बेहतरीन प्रदर्शन करते देखते आए हैं. लेकिन इंग्लैंड के खिलाफ बंगलुरु में खेले गए तीसरे टी-20 मैच के बाद वह उस समय अलग अवतार में दिखे जब उन्होंने मैच के हीरो युजवेंद्र चहल का इंटरव्यू लिया.

युवराज का इंटरव्यू लेने का अंदाज बेहद मजेदार रहा. दुबले-पतले युजवेंद्र चहल ने इस मैच में 6 विकेट लिए थे जो किसी भी भारतीय गेंदबाज का अंतरराष्ट्रीय टी-20 में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. युवराज का चहल से पहला सवाल था कि बॉल ज्यादा भारी है या आप? जवाब में चहल ने कहा कि वह बॉल से थोड़े भारी हैं. युवराज का आखिरी सवाल भी मजेदार था और उतना ही मजेदार रहा चहल का जवाब. युवराज ने पूछा कि आपको कैसा लगा जब मैंने आपको गोंद में उठाया. चहल ने जवाब दिया, 'बहुत अच्छा लगा, डीडीएलजे जैसी फीलिंग्स आ रही थी.'

आप भी देखिए यह मजेदार इंटरव्यू…

भारत में लॉन्च हुआ हीरो का नया फ्लैश ई-स्कूटर

दिल्ली में होने वाले GMX शो में हीरो ने अपना नवीनतम ई-स्कूटर फ्लैश शुरू किया है. देश में बढ़ते पॉल्यूशन को देखते हुए हीरो इलेक्ट्रिक ने अपना ये नया ईको फ्रेंडली स्कूटर Flash लॉन्च किया है. इसकी कीमत 19,990 रुपये तय की गई है. देश में इन दोपहिया वाहनों को यह बात ध्यान में रखकर लॉन्च किया गया है कि कस्टमर्स आसानी से इन्हें खरीद सकें और आसानी से मेन्टेन भी रख सकें.

इन स्कूटर्स की डिजाइन में उन कस्टमर्स का खासा ध्यान रखा गया है जो पहली बार कोई ई-व्हीलर खरीद रहें हैं. एक बार चार्ज करने पर ये स्कूटर 65 किलोमीटर तक चल सकता है और ये केवल 87 किग्रा वजन का है. इसमें मैग्नेशियम अलॉय व्हील, टेलीस्कोपिक सस्पेंशन और फुल बॉडी गार्ड जैसी सभी सुविधाऐं दी गई हैं. ये ई-स्कूटर रेड, ब्लेक और सिल्वर ब्लेक रंगों के विकल्पों में बाजार में उपलब्ध है और सबसे अच्छी बात ये है कि इसकी सवारी करने के लिए आपको ड्राइविंग लाइसेंस या किसी भी प्रकार के अन्य पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है.

इस स्कूटर में 250 वॉट का मोटर है जिसमें 48 Volt 20 Ah VRLA की बैटरी है. नये स्कूटर में शॉट सर्किट प्रोटेक्शन का पूरा ध्यान रखा गया है और सीट के नीचे स्टोरेज की भी पर्याप्त स्पेस दी गई है. 

इसके बाद अब हीरो इलेक्ट्रिक और दो नए टू-व्हीलर लॉन्च करने की योजना भी बना रहा है, जिसमें से एक स्मार्ट स्कूटर होगा और एक कम गति वाला नया ई-स्कूटर. ये स्मार्ट स्कूटर इस साल के बीच में तो वहीं ई-स्कूटर आने वाले साल के मार्च में मतलब 2018 में शुरू किया जाएगा.

फैशन छोटे शहरों का

अकसर दोढाई साल में होने वाले तबादलों के कारण सीमा इतने सारे शहरोंप्रदेशों से गुजरी है कि हर बार कपड़ों को ले कर नई उलझन में पड़ जाती है कि क्या पहने और क्या नहीं  क्या आप के साथ भी ऐसा ही होता है  अगर महानगर में हैं तब तो आप बेहिचक जो चाहे पहन सकती हैं, मगर छोटे शहरों में यह देखना पड़ता है कि वहां का माहौल कैसा है. क्या अब भी घूंघट प्रथा चल रही है या महिलाओं का पल्ला सिर तक सीमित रह गया है  उसी माहौल के अनुसार अपने वार्डरोब को तैयार करना होता है वरना आप अपनेआप को सब के बीच सहज नहीं महसूस कर पातीं.

2004 में सीमा जब तबादला होने पर हरदोई, उत्तर प्रदेश पहुंची थी तब वहां सभी महिलाएं साड़ी पहने सिर ढके होती थीं व लड़कियां सूट पहनती थीं. बहुत कम किशोरियां जींस पहनती थीं और वह भी कभीकभी. आज इतने सालों में अब बहुत अंतर आ गया है. अब वही महिलाएं लैगिंग्स और कुरतियां पहनने लगी हैं और लड़कियां जींसटौप. आज यही हाल अनूपपुर, मध्य प्रदेश का है. अब कोई हरदोई से फोन कर यहां के हालचाल पूछता है तो सीमा यही कहती है कि बिलकुल वैसा ही है जैसा 12 वर्ष पहले हरदोई था, तो पूछने वाला भी हंस पड़ता है.

क्या पहनें

यह तो सच है कि जैसा देश वैसा भेष. जब पूरे शहर में सभी महिलाएं साड़ी पहने रहती हैं, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप भी साड़ी के अलावा कुछ नहीं पहन सकतीं, बल्कि ऐसे में साड़ी के अतिरिक्त सलवारकमीज, चूड़ीदार, लैगिंग, पैरलर आदि पहनने में झिझक न करें. एकदूसरे को देख कर इस तरह के कपड़े पहनने का जल्द ही आसपास की महिलाओं का मन भी मचलने लगता है. यदि आप किसी शादी में जा रही हैं, तो साड़ी से बेहतर कुछ नहीं लगेगा. ऐसे में आप भी पारंपरिक रूप से तैयार हो कर सब को फैशन की टक्कर दे सकती हैं. रोज साड़ी, चूड़ीदार से सजी रहने वाली महिलाएं आप का पारंपरिक रूप देख कर दंग रह जाएंगी. लेकिन ऐसे ही मिलनेमिलाने के अवसर पर पैरलर, लैगिंक या सलवारसूट के साथ दुपट्टा लहरा सकती हैं. यदि आप को जेठ या ससुर से परदा करना है, तो अपने दुपट्टे को सिर पर अच्छी तरह ओढ़ कर पिन से फिक्स कर लें. ऐसा करने पर आप का सिर से पल्ला भी नहीं सरकेगा और आप के फैशन पर भी ऊंगली नहीं उठेगी.

यदि साड़ी से मन भर गया है, तो उत्सवों में लहंगाचोली (गुजराती वर्क मिरर और गोटे से सजी, राजस्थानी बंधेज कपड़े से बनी या कशीदाकारी से सजी राजसी वैभव वाली) जैसी भी आप को पसंद हो उसे पहन कर लुभाएं. चाहें तो रैडीमेड लहंगासाड़ी भी अपनी सुविधा के हिसाब से पहन सकती हैं. युवतियां जींस या पैंट के साथ घुटनों तक साइज की कुरती व स्टोल पहन कर अपना शौक पूरा कर सकती हैं. यह पहनावा दूर से कुरती व लैगिंग का लुक देता है. इस से आप भीड़ से अलग भी नहीं दिखेंगी. यदि कम उम्र की युवती हैं तो लौंग स्कर्ट और शौर्ट कुरती के साथ स्टोल पहन कर तीजत्योहार में अपना अलग लुक रख सकती हैं.

यदि आप का मिनी मिडी या हौट पैंट पहनने का मन हो और आप का है संयुक्त परिवार, तो आप पति के साथ एकांत में, अपने बैडरूम में यह ड्रैस पहन इतरा सकती हैं और अगर कहीं दूसरे शहर घूमने जा रही हैं, तो वहां भी अपनी मनपसंद ड्रैस पहन सकती हैं. बस अपना फोटो सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि पर पोस्ट न करें, क्योंकि लौट कर तो उन्हीं लोगों के बीच आ कर रहना है. अत: बेकार में बात का बतंगड़ क्यों बनाएं.

क्या न पहनें

अब कुछ अति उत्साही महिलाएं या बहुएं ऐसे ऊटपटांग कपड़े पहन लेती हैं कि हंसी का पात्र बनती हैं. जैसे नैट की साड़ी पहन कर घूंघट निकाल के घूमती हैं. अब कोई इन से पूछे कि क्या ढका है और क्या खुला है  कुछ महिलाएं स्किन टाइट लैगिंग के साथ कुरता पहन लेती हैं, तो ऐसा दिखता है जैसे सिर्फ कुरता ही पहना है, ऐसे में बहुत ही भद्दा दृश्य उत्पन्न होता है. अत: चुस्त लैगिंग पहनते समय उस के रंग पर अवश्य ध्यान दें. कुछ महिलाएं गाउन पहने ही घर से सब्जीभाजी लेने या फिर पड़ोसिन से गपियाती घंटों रोड पर खड़ी रहती हैं. ऐसे में वे बहुत अभद्र दिखाई देती हैं. अत: घर से बाहर निकलते समय अपनी वेशभूषा का विशेष खयाल रखें.

साड़ी अपनेआप में संपूर्ण पोशाक है, मगर इसे भी पहनने के कईर् तरीके हैं. साड़ी सीधे पल्ले, उलटे पल्ले या फिर किसी भी पारंपरिक तरीके से पहनी गई हो मगर उस के संग मैचिंग ब्लाउज, पेटीकोट न हो तो उस का सौंदर्य जाता रहता है. यदि सलीके से बांधी न गई हो जैसे ऊंची उठी हुई, फौल उधड़ा हुआ, पल्लू लटका हुआ हो तो वह भी बहुत बेहूदा दिखाई देता है. यदि जींस या पैंट पहनें तो शौर्ट टौप या स्किन टाइट जींस पहनने से बचें. लौंग स्कर्ट के साथ टाइट कमीज या टीशर्ट न पहनें. छोटे शहरों में ऐसे कपड़े पहनने वाली को लोग ऐसे घूरते हैं जैसे कोई जानवर चिडि़याघर से निकल रोड पर आ गया हो. चूंकि आप किसी की मानसिकता नहीं बदल सकते, इसलिए अपना पहनावा बदल लें.

परिधान चाहे कोई भी पहनें अगर वह करीने से न पहना गया हो तो वह आप के रूप को बढ़ाने की जगह घटा देता है. कुछ महिलाओं का मानना है कि महंगे वस्त्र ही सुंदर लगते हैं, मगर ऐसा नहीं है. रोजमर्रा की पोशाक में रंग संयोजन, डिजाइन आदि का ज्यादा महत्त्व होता है बजाय मूल्य का. अत: जो भी पहनें सलीके से पहनें. उस के रंग से मिलते रंग की चूडि़यां, कड़े, बे्रसलेट, आर्टिफिशियल ज्वैलरी पहन कर आप अपने सौंदर्य में चार चांद लगा सकती हैं.

अभिव्यक्ति पर पहरा

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भगवा सरकार को अपरोक्ष रूप से चेताया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अंगरेजी में कहे जाने वाले शब्द  ‘डाउट, डिसएग्री और डिस्प्यूट’ भी शामिल हैं. भगवा ब्रिगेड कुछ दिनों से इस बात को सिद्ध करने में लगी है कि किसी को भी धर्म, धर्मग्रंथों, धर्म के विचारों, धर्म से जुड़े देवीदेवताओं के बारे कोई संदेह, भिन्न मत प्रकट करने और विरोध करने का हक नहीं है. देशभर में छोटेछोटे गुट, हिंदू धर्म की सनातन परंपरा की रक्षा के नाम पर, विचारों की अभिव्यक्ति पर तरहतरह से आक्रमण करते रहते हैं.

यह कोई नई बात नहीं है. हर सरकार व संस्था चाहती है कि उस की सत्ता पर कोई रोकटोक न लगे, कोई उस की पोल न खोले. धर्मों ने तो सदियों तक मुंह बंद कर ही सत्तासुख भोगा था और ईशनिंदा को मृत्युदंड के लायक बना दिया. राजाओं, जमींदारों, सेठों ने भी अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले को दंड दिया. अभी हाल में नोटबंदी पर रिजर्व बैंक औफ इंडिया ने स्पष्ट कर दिया कि इस के कारण बताना जनहित में न होगा. गनीमत यही है कि सरकार ने नोटबंदी के विरोध को पुराने नोटों को रखने की तरह अपराध नहीं माना है. जो है, जैसा है, वैसा मान लो की परंपरा ने ही मानव समाज को ज्यादा उन्नति करने से रोका है. जबजब समाज में खुली सोच की छूट मिली है, उन्नति हुई है. ग्रीस और रोमन साम्राज्य बने ही इसलिए थे कि उन्होंने असहमति को स्वीकारा था.

मार्टिन लूथर द्वारा पोप का भंडाफोड़ करने की आजादी हासिल कर पाने के कारण यूरोप में वैचारिक क्रांति हुई जिस के कारण भरपूर विकास हुआ. भारत में विचारों की स्वतंत्रता रही पर वह जातिगत व्यवस्था के दायरे में रही और उसे तोड़ने में यह स्वतंत्रता कभी भी सफल नहीं हुई और इसीलिए पर्याप्त प्राकृतिक साधनों के बावजूद भारत बिखरा व पिछड़ा रहा. आज देश के नागरिकों के पास संवैधानिक अधिकार हैं पर देशवासी उन्हें मानने को तैयार नहीं. अधिकांश लोग अपनी खरीखरी बात कहने से नहीं, बल्कि सही विचार सुनने व पढ़ने से भी कतराते हैं. प्रणब मुखर्जी ने विचारों की अभिव्यक्ति में जिस डाउट यानी संदेह की बात की है वह तो यहां न के बराबर है. आप विष्णु, राम, कृष्ण, मोहम्मद, ईसा के चरित्र के बारे में कुछ कहने का प्रयास तो करें. आप को, बिना सत्य परखे, अपराधी घोषित कर दिया जाएगा.

आप सरकारी, धार्मिक, सामाजिक मान्यताओं से असहमति प्रकट नहीं कर सकते. अगर करते हैं तो आप को तुरंत अलगथलग कर दिया जाएगा. आप योग और आयुर्वेद को नाटक कह कर देखिए, कौओं के झुंड सिर पर मंडराने लगेंगे. आप सरकार, धार्मिक संस्थाओं, बैंकों, बड़ी कंपनियों से कोई विवाद नहीं कर सकते. वे बड़ेबड़े वकील लगा कर वर्षों तक आप को उलझाए रख, थका डालेंगे. हमारी सरकारें, समाज, धर्मसंस्थाएं, बैंक, कंपनियां, पार्टियां चाटुकारों को पसंद करती हैं. जो जय बोले, वही जीतता है.

इसलिए फूंका गया भागवत का पुतला

मध्य प्रदेश का आदिवासी बाहुल्य जिला बैतूल आमतौर पर शांत रहता है, लेकिन इन दिनों यहां अशांति की आंच सुलग रही है. वजह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का 8 फरवरी को प्रस्तावित हिन्दू सम्मलेन है, जिसकी तैयारियां संघ और उसके आनुषांगिक संगठन और भाजपा बीते छह महीनों से कर रहे थे. इस सम्मेलन में आरएसएस  के मुखिया मोहन भागवत की खासी दिलचस्पी थी और अभी भी है ,  जो अब चिंता में तब्दील होती जा रही है. भागवत की चिंता यह नहीं है कि कुछ आदिवासी संगठनों ने उनका पुतला फूंका. भागवत की असल चिंता यह है कि क्यों आदिवासी खुद को हिन्दू मानने तैयार नहीं और किस जतन से उन्हें खुद को यह कहने राजी किया जाये.

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं

गौरतलब है कि जनवरी के तीसरे हफ्ते से ही आदिवासी संगठनों ने इस हिन्दू सम्मेलन में शामिल होने से न केवल इंकार कर दिया था, बल्कि यह सवाल भी पूछना शुरू कर दिया था कि वे हिन्दू किस बिना पर हैं. इस सवाल का सटीक जबाब न पहले किसी के पास था न आज है. हां कुछ आरोप प्रत्यारोप जरूर हैं, जिनका हिन्दू या सनातन धर्म के इतिहास से गहरा ताल्लुक है. जब पूरे देश में गणतन्त्र दिवस समारोह पूर्वक मनाया जा रहा था तब बैतूल में आदिवासी समाज संगठन इस आशय के पर्चे बांट रहा था कि आदिवासी इस हिन्दू सम्मेलन का बहिष्कार करें, क्योंकि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं.

विवाद कितना संवेदनशील और विस्फोटक है इसका अंदाजा समस्त आदिवासी समाज संगठन के संयोजक कल्लू सिंह के इस बयान से लगाया जा सकता है कि हम आदिवासी बड़ादेव का पूजन करते हैं, हमारा हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं, हमें तो आरएसएस जबरन हिन्दू बनाने पर उतारू है. बक़ौल कल्लू सिंह आदिवासियों के कोई 20 संगठन उनके साथ हैं और बहिष्कार का समर्थन कर रहे हैं. इधर आरएसएस को यह बयान और विरोध रास नहीं आये, तो उसने आदिवासियों को इस सम्मेलन में लाने की कोशिशें और तेज कर दीं.

26 जनवरी को ही बैतूल में लगभग 1400 गांवो में 2600  जगहों  पर एक साथ भारत माता की पूजन इन्हीं कोशिशों का एक हिस्सा थी, जिसमें बाकायदा हिन्दू विधि विधान से भारत माता की तसवीर की पूजा की गई और उसकी आरती भी गाई  गई. इस आरती में हिन्दू देवियों के नाम भी भारत माता के साथ लिए गए और ॐ शब्द का भी इस्तेमाल किया गया. कई स्थानों पर नारियल फोड़कर प्रसाद भी चढ़ाया गया. इस साजिश को कल्लू सिंह जैसे सैकड़ों आदिवासी नेताओं ने संजीदगी से लिया और बात पर्चों से निकालकर सड़कों पर लाते मोहन भागवत का पुतला फूंकते भाजपा सांसद ज्योति धुर्वे से भी पत्र लिखते पूछा कि क्या आदिवासी हिन्दू हैं. अगर हां तो कैसे और क्या आप से आरएसएस ने इस बाबत सहमति ली है और अगर आपने ऐसी कोई सहमति दी है तो यह आदिवासियों के प्रति अक्षम्य अपराध है.

अब हालत यह है कि ज्योति धुर्वे जैसे भाजपाई  नेता आदिवासियों के इस यक्ष प्रश्न से मुंह चुरा रहे हैं. 7 लाख आदिवासी मतदाताओं बाले बैतूल संसदीय क्षेत्र मे भाजपा का परचम लहराया, तो इसकी वजह हिन्दू–आदिवासी विवाद नहीं, बल्कि कांग्रेस की दुर्गति ज्यादा है, जिसका फायदा उठाने की गरज से संघ ने यहां छोटे मोटे आयोजनो के बाद हिन्दू सम्मेलन का फैसला ले लिया.

दहशत की वजह

आरएसएस या हिन्दुत्व को लेकर आदिवासियों के डर और विरोध की अपनी वजहें हैं, जिनमे पहली तो यह है कि हिन्दू धर्म में आदिवासियों की हैसियत हमेशा से ही बदतर रही है और उन्हे अछूत मानते हमेशा तिरिस्कृत ही किया गया है. आरक्षण के बलबूते पर अब थोड़े बहुत आदिवासी पढ़ लिख कर सरकारी नौकरियों में आने लगे तो अब उन्हे पूछ और पुचकार कर हिन्दू कहा जा रहा है. अधिकांश आदिवासी चाहे वे अनपढ़ हों या शिक्षित यह मानते हैं कि आरएसएस कभी उनका हितेषी नहीं हो सकता, उल्टे वह उन्हे हिन्दू घोषित कर आरक्षण छीनने की साजिश रच रहा है और उन्हे पंडा और ब्राह्मण वाद की गिरफ्त में लाने की भी साजिश कर रहा है. इससे आदिवासी और पिछड़ेंगे.

विदिशा के एसएटीआई कालेज से कंप्यूटर इंजीनियारिग की पढ़ाई कर रहे एक आदिवासी छात्र की मानें तो आरएसएस के कार्यकर्ता मुद्दत से आदिवासियों के पास गांव गांव जाकर उन्हे हिन्दू देवी देवताओं की तस्वीरें, धार्मिक साहित्य और सामग्री बांटते उन्हे उनके हिन्दू होने का एहसास कराते रहते हैं और दबाब भी बनाते हैं.  भाजपा के प्रभाव में आने के बाद तो इस तरह का प्रचार प्रसार और बढ़ गया है लेकिन आदिवासी कभी मन से खुद को हिन्दू नहीं स्वीकारता. इसलिए हिन्दू सम्मेलन का विरोध करते भागवत का पुतला फूंक कर कोई गलती नहीं कर रहा.

अगर वक्त रहते हिंदुवादियों ने अपने कदम वापस नहीं खींचे तो यह अंचल हिंसा की गिरफ्त में भी आ सकता है और न केवल बैतूल बल्कि उससे सटे जिलों छिंदवाड़ा, होशंगाबाद, सिवनी और बालाघाट में भी हिन्दू –आदिवासी उपद्रव हो सकता है. हम आदिवासी सदियों से हिंदुओं की तमाम ज़्यादतियाँ बर्दाश्त कर रहे हैं लेकिन अपनी संस्कृति और सभ्यता से छेडछाड़ और खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे, अब अगर कोई अनहोनी हुई तो उसका जिम्मेदार आरएसएस होगा और इन जिलों के वोट दोबारा कांग्रेस के खाते में चले जाएंगे. इसलिए वक्त रहते भाजपा को बात समझ लेनी चाहिए .

ये हिन्दू थे ही कब ?

दरअसल में यह लड़ाई आज की नहीं बल्कि एतिहासिक है और दिलचस्प भी है जिसे मूलतः द्रविड-आर्य या आर्य-अनार्य संघर्ष कहा जाना बेहतर होगा. मौटे तौर पर देखें तो आदिवासी ही भारत  का मूल निवासी है. द्रविड़ इतिहासकार साबित कर चुके हैं कि आर्य यानि ब्राह्मण बाहर से आए थे और छलपूर्वक यहां कब्जा कर लिया, जिसके लिए उन्होंने धर्म और धर्मग्रंथो का सहारा लिया. आदिवासी चूंकि सीधे और भोले होते हैं, इसलिए वे आर्यों का मुक़ाबला नहीं कर पाये, लेकिन बावजूद कई युद्धों और प्रताड़नाओं के उन्होने अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी.

एक इतिहासकर  संत प्रेमदास की माने तो, आर्य केवल भेड़ बकरी चराने वाले लोग थे. उनका भारत आगमन 1500 ईसा पूर्व हुआ. इन लोगों ने ईरण में अवेस्ता नाम की पुस्तक की रचना की थी.  हिंदुस्तान आकर इनहोने अपने विचारों को विस्तार दिया. वेदों की भाषा अवेस्ता की भाषा से मिलती जुलती है. आर्य बेहद छली, कपटी चालाक और खूंखार लोग थे. अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए किसी धर्मात्मा का धर्म भ्रष्ट करने, किसी पतिव्रता स्त्री का सतीत्व नष्ट करने तथा षड्यंत्र रचाकर किसी वैभवशाली का सर्वनाश करने में वे तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे. कई पौराणिक उदाहरण देने वाले रामदास जैसे इतिहासकारों की कमी नहीं, जो वामन नाम के ब्रामहण को छली बताते हैं और जलंधर नाम के शासक से न जीत पाने पर उसकी पत्नी वृन्दा का सतीत्व विष्णु देवता द्वारा भंग किया जाना सिद्ध करते हैं.

इन बातों का मौजूदा हिन्दू सम्मेलनों से गहरा ताल्लुक है कि असल मंशा  आदिवासी संस्कृति को हथियाना और मिटाना आज भी है. एक उदाहरण सफाई कर्मचारियों का लिया जाना प्रासंगिक होगा, जो मूलतः सूरमा समुदाय के थे. आर्यों ने इन्हे हराकर मेहतर या भंगी बना दिया और इस बाबत भी धर्म ग्रन्थों का सहारा लिया – गृह द्वार शुचि स्थानर ध्यावस्कर शोधनम . गुहयोग स्पर्शनोच्छी विष्मूत्र ग्रहनोज्क्षनम .. ( नारद स्मृति श्लोक – 67 ) यानि दासों( मेहतरों ) को गृह के द्वार , मार्ग और पहाड़ी आदि को साफ करने में शरीर के गुहयांग ( गुप्तांग या मल )की सफाई करने में ,  मूत्र आदि के फेकने जैसे कार्य मे लगाना चाहिए.

इसमे कोई शक नहीं जिसे वर्तमान मुख्यधारा के पैरोकार भी बेहतर जानते हैं कि पूरे ऋग्वेद में आर्य–अनार्य संघर्ष ही है. आर्यों की चालाकी और अनार्यों की हत्याओं से भरे पड़े ऋग्वेद में तत्कालीन आर्य बात बात में अपने आराध्य इन्द्र का आव्हान करते थे और अनार्यों को साम, दाम, दंड, भेद जिस किसी भी तरीके से हो किनारे कर देते थे. बात बहुत सीधी और सटीक है कि बैतूल के जरिये इतिहास दोहराया जा रहा है, जिसकी इस सदी और लोकतन्त्र में कतई जरूरत उपयोगिता या अहमियत नहीं. फिर भी ऐसा हो रहा है तो बात को वर्तमान इन्द्रों को तटस्थ और निरपेक्ष होकर देखना चाहिए नहीं तो नतीजे हिंदुओं और आदिवासियों दोनों के हक मे अच्छे निकलने वाले किसी भी लिहाज से नहीं.   

कुंगफू योगा : योगा नही सिर्फ एक्शन

क्या हम यह मानते हैं कि भारत आज 21वीं सदी में भी महज जादू टोने व सांप संपेरों का देश है? कम से कम चीन की फिल्म निर्माण कंपनी के साथ संयुक्त रूप से सोनू सूद द्वारा निर्मित फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ तो इसी बात को साबित करती है. फिल्म के नाम के साथ योगा शब्द जुड़ा है, मगर फिल्म में योगा नदारद है. फिल्म के एक सीन में जब जैक खलनायकों से जान बचाते हुए पानी में गिर जाते हैं, तब अश्मिता उनसे कहती है कि योगा के बल पर आठ मिनट तक सांस ली जा सकती है. अन्यथा पूरी फिल्म से योगा नदारद है. हकीकत में यह फिल्म न सिर्फ भारतीय दर्शकों के साथ खिलवाड़ करती है, बल्कि देश की अस्मिता के साथ भी खिलवाड़ करती है. फिल्म देखने के बाद सबसे पहला व अहम सवाल उठता है कि आखिर सोनू सूद की क्या मजबूरी थी, जो कि उन्होंने न सिर्फ फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ में अभिनय किया, बल्कि इसका सह निर्माण व भारत में वितरण भी किया? यह फिल्म सोनू सूद के करियर पर एक बड़ा धब्बा साबित हो जाए, तो कोई आश्वर्य नहीं होना चाहिए. कथानक के नाम पर भी यह फिल्म शून्य है. बहुत बारीकी से सोचा जाए तो यह फिल्म पूर्णरूपेण भारत को लेकर चीन की जो सोच है, उसे जरुर परिलक्षित करती है. 

रोमांचक नाटकीय फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ की शुरुआत प्राचीन भारत व 300 ईसापूर्व के इतिहास  और उस वक्त के एक युद्ध के बारे में बताते हुए होती है. जबकि कहानी के केंद्र में चीन के एक म्यूजियम में कार्यरत पुरातत्वविद जैक (जैकी चैन) हैं. जिनसे मिलने के लिए एक दिन भारत से एक प्रोफेसर अश्मिता (दिश पटानी) और उनकी टीचिंग सहायक कायरा (अमायरा दस्तूर) पहुंचते हैं. अश्मिता ने अपने साथ एक हजार साल पुराना मैप लिया हुआ है, जिसकी मदद से जैक मगध का पुराना खजाना खोजने की कोशिश करता है. कहानी चीन से दुबई और फिर भारत में राजस्थान पहुंचती है. राजस्थान में एक किले के बाहर सांप व संपेरों का खेल तथा जादू टोना आदि का खेल दिखाया गया है. (अब यह सोनू सूद या जैकी चैन या फिल्म के चीनी निर्देशक स्टैनली टांग ही बेहतर बता सकते हैं कि भारत में किस किले के पास पर्यटकों को लुभाने के लिए आज भी जादू टोना या सांप सपेरों का खेल चलता रहता है.)

बहरहाल, मगध के खजाने की तलाश के सिलसिले में जैक की पूरी टीम की मुलाकात रैंडल (सोनू सूद) से होती है. जिसकी कोशिश रहती है कि वह पूरे खजाने को अपना बना ले. उसका दावा है कि यह खजाना उसकी पुश्तैनी परिवारिक संपत्ति है. फिल्म का क्लायमेक्स और अंत बहुत बचकाना सा है. फिल्म के कुछ रोमांचक सीन छोटी उम्र के बच्चों को जरुर आकर्षित कर सकते हैं. फिल्म को अच्छे सेट बनाकर फिल्माया गया है. कैमरामैन ने बेहतरीन काम किया हैं. मगर फिल्म आकर्षित नहीं करती है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो इस फिल्म में सोनू  सूद किसी जोकर से कम नजर नहीं आते. वह फिल्म के मुख्य खलनायक हैं, मगर वह निराश करते हैं. फिल्म की पटकथा भी उनके रैंडल के किरदार को बहुत कमजोर बनाती है. सोनू सूद का पात्र रैंडल, मगध के खजाने को हर हाल में अपने कब्जे में करने के लिए जैक की पूरी टीम से अपने दलबल के साथ मंदिर में युद्ध करता है, मगर अचानक कुछ साधु व भक्त आ जाते हैं और जैक कहता है कि यह खजाना तुम्हारा नहीं पूरी दुनिया का है और फिर जैक के साथ साथ रैंडल भी खुशी में नृत्य करने लगता है. यह मंदिर जिस जगह है, वहां पर जैक व रैंडल के लोगों को पहुंचने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा. यह जमीन से नीचे लगभग पाताल में है, तो फिर यह साधु व भक्त वहां कैसे पहुंच गए. फिल्म के एक्शन दृश्यों में 62 वर्षीय जैकी चैन कमजोर नजर नहीं आते हैं. दिशा पटानी का अभिनय ठीक ठाक हैं.

फिल्म के तमाम सीन रोमांच पैदा करने की बजाय बोर करते हैं. फिर चाहे वह दुबई में हीरो की नीलामी का मसला हो या भेड़ियों से लड़ाई के दृश्य हों. यहां तक कि गाड़ी के अंदर शेर की मौजूदगी और जैकी चैन का उस गाड़ी में रहना तथा रैंडल का पीछा करना हास्यास्पद लगता है. यूं तो कार चेजिंग के सीन अच्छे बन पड़े हैं, मगर गाड़ी के अंदर जैकी चैन व शेर की मौजूदगी..डर या रोमांच पैदा नहीं कराता..समझ में नहीं आता कि इस सीन को रखकर निर्देशक दर्शकों को क्या नया परोसने की इच्छा रखते है.

फिल्म के निर्देशक व पटकथा लेखक पूरी तरह से विफल नजर आते हैं. यह फिल्म नहीं बल्कि  किसी सीरियल के कुछ एपीसोड नजर आते हैं. एक घंटा बयालिस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘कुंगफू योगा’’ के निर्देशन स्टैनली टांग, संगीतकार नाथन वांग कोमैल शिवान हैं.

बहन भाई का खुराफाती कारनामा

28 नवंबर, 2016 की शाम मोहाली के थाना सोहाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरसिमरन सिंह बल फील्ड के कामों से फारिग हो कर अपने औफिस पहुंचे थे कि उन का एक खास मुखबिर उन के सामने आ खड़ा हुआ. नमस्कार करने के बाद उस ने कहा, ‘‘सर, बढि़या इनाम तैयार रखिए, ऐसी जबरदस्त खबर लाया हूं कि सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

यह मुखबिर लंबे समय से हरसिमरन सिंह के लिए मुखबिरी करता आ रहा था. यह उन का निहायत भरोसे का आदमी था, जिस की सूचनाएं अकसर सही निकलती थीं. वह पढ़ालिखा था और मामले की गहराई में जाने के बाद जब उसे पूरा विश्वास हो जाता था कि मामला पूरी तरह से सच है, उस के बाद ही वह उन के पास आता था.

उस दिन भी उस के चेहरे पर ऐसा ही आत्मविश्वास झलक रहा था. हरसिमरन सिंह ने उसे अपने रिटायरिंग रूम में ले जा कर कहा, ‘‘इनाम की चिंता मत करो, सूचना बढि़या होनी चाहिए.’’

‘‘मैं ने कहा न सर, ऐसी जबरदस्त सूचना लाया हूं कि सुन कर उछल पड़ेंगे. सरकार द्वारा जो यह दम भरा जा रहा है कि 2 हजार रुपए के नए नोट की कभी नकल नहीं हो सकेगी यानी जाली नोट नहीं छापे जा सकेंगे, मेरी सूचना उसी के बारे में है.’’ मुखबिर ने उत्साह के साथ कहा.

‘‘मतलब, किसी ने इतनी जल्दी उस की नकल तैयार कर ली यानी 2 हजार रुपए के नकली नोट छाप लिए ’’ हरसिमरन सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘नकल तैयार ही नहीं कर ली सर, करोड़ों के जाली नोट छाप कर मार्केट में चला भी दिए हैं.’’

‘‘2 हजार के जाली नोट चला भी दिए ’’

‘‘जी सर.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ’’ कहने के साथ उन्होंने पूछा, ‘‘यह अपराध क्या मेरे इलाके में हुआ है ’’

‘‘सर, यह तो पता नहीं, लेकिन मुझे जो जानकारी है, उस के अनुसार लालबत्ती लगी औडी कार पर सवार हो कर 3 लोग, जिन में एक लड़की भी शामिल है, 2 हजार रुपए के जाली नोटों के साथ आप के एरिया में घूम रहे हैं.’’

‘‘उन लोगों के पास इस समय भी 2 हजार रुपए के जाली नोट हैं, अगर हैं तो कितने होंगे ’’

‘‘एकदम सटीक तो नहीं बता सकता सर, लेकिन जो भी है, वे लाखों में हैं. आप तुरंत नाकाबंदी करवाइए. अगर देर हो गई तो वे आप के इलाके से निकल भी सकते हैं. सर, मेरे कहने का मतलब यह है कि अगर इस समय आप ने उन लोगों को पकड़ लिया तो बड़ी मात्रा में 2 हजार रुपए के जाली नोट पकड़ने का यह पहला मामला होगा. अगर ऐसा हो गया तो मैं भी बढि़या इनाम पाने का हकदार हो जाऊंगा.’’ ट्राइसिटी (मोहाली-चंडीगढ़-पंचकूला) के कुछ बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नए नोटों की पुख्ता पहचान के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिस में बताया गया था कि 2 हजार रुपए के नोट पर सीधी तरफ सी थ्रू रजिस्टर में 2 हजार रुपए लिखा है. महात्मा गांधी के चित्र की दाईं ओर देवनागरी में 2 हजार रुपए लिखा गया है, जिस में रुपए का नया साइन है. महात्मा गांधी का चित्र नोट के ठीक बीच में है. नोट पर बाईं ओर माइक्रालैटर्स में आरबीआई और 2 हजार लिखा है. नोट को थोड़ा टेढ़ा कर के देखने पर थ्रेड का रंग हरे से नीले में बदलता दिखाई देता है. नोट की दाईं ओर गवर्नर के हस्ताक्षर, गारंटी और प्रौमिस क्लाज दिया गया है.

इस में आरबीआई का साइन भी देखा जा सकता है. नोट को लाइट में देखने पर सफेद जगह में महात्मा गांधी का चित्र दिखाई देता है. वहीं इलैक्ट्रोटाइप वाटरमार्क है तो नीचे की तरफ दाईं ओर अशोक स्तंभ है, जिस के ऊपरी भाग पर रैक्टेंगल में 2 हजार रुपए लिखा गया है. बाईं ओर 7 लाइनें भी चिह्नित की गई हैं. नोट में पिछली तरफ स्वच्छ भारत का लोगो दिया गया है. वहीं पर कई भाषाओं में नोट की वैल्यू लिखने के अलावा मंगलयान का चित्र भी दिया गया है.

सरकार पहले ही दिन से दावा कर रही थी कि इस नए 2 हजार रुपए के नोट का जाली नोट तैयार करना कठिन ही नहीं, एकदम असंभव है. बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नोट के बारे में जो आयोजन किया था, उस में हरसिमरन सिंह ने भी भाग लिया था. उन दिनों उन के पास थाना सोहाना के अलावा मोहाली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित थाने का भी चार्ज था. उस समय वह वहीं से आए थे, जब उन का वह मुखबिर उन से मिलने आया था.

मुखबिर द्वारा मिली सूचना के बारे में उच्चाधिकारियों को फोन द्वारा बता कर दिशानिर्देश लेने के बाद हरसिमरन सिंह ने एक तहरीर तैयार कर अपराध संख्या 276 पर भादंवि की धाराओं 420, 489ए, 489बी, 489सी, 489डी, 489ई एवं 120बी के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर एक टीम तैयार की, जिस में एसआई चरणजीत सिंह के अलावा हवलदार परमजीत कुमार, इकबाल सिंह, संजय कुमार, बलविंदर सिंह और जगतपाल सिंह, सीनियर सिपाही गुरमुख सिंह, देवेंद्र सिंह, सिपाही बलवीर सिंह व महिला हवलदार गुरविंदर कौर को शामिल किया गया.

अपनी इस पूरी टीम के साथ मुखबिर के बताए अनुसार, जगतपुरा के टी पौइंट पर उन्होंने नाका लगा दिया. यह शाम के करीब साढ़े 7 बजे की बात है. गाडि़यां आतीजाती रहीं और जरूरत के हिसाब से उन्हें रोक कर तलाशी ली जाती रही. जिस गाड़ी का इस पुलिस टीम को इंतजार था, वह अभी तक कहीं दिखाई नहीं दी थी.

आखिर आधी रात को साढ़े 12 बजे के करीब वीआईपी नंबर की लालबत्ती लगी सफेद रंग की औडी कार आती दिखाई दी. शायद इसी गाड़ी के बारे में मुखबिर ने बताया था, इसलिए हरसिमरन सिंह ने अपने एक सिपाही को इशारा कर के उस कार को रोकने को कहा.

सिपाही के इशारे पर गाड़ी चालक ने बड़ी शराफत से गाड़ी एक तरफ ले जा कर रोक दी. उस के बाद खिड़की का शीशा नीचे कर के गरदन बाहर निकाल कर पूछा, ‘‘क्या बात है भई, गाड़ी क्यों रुकवाई  देख नहीं रहे हो कि यह वीआईपी गाड़ी है.’’

  तब तक हरसिमरन सिंह गाड़ी के पास पहुंच गए थे. सिपाही के बजाए उन्होंने उस की बात का जवाब दिया, ‘‘गाड़ी इसलिए रुकवाई है, क्योंकि इस की तलाशी लेनी है.’’

‘‘वह किसलिए ’’ ड्राइविंग सीट पर बैठे आदमी ने रुखाई से पूछा.

इस पर हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में जितने भी लोग हैं, चुपचाप बाहर आ कर खड़े हो जाएं. हमें अपना काम करने दें.’’

‘‘कमाल है सर, वीआईपी नंबर वाली गाड़ी है, जिस पर रैड बीकन भी लगी है, ऐसे में आप को मालूम होना चाहिए…’’

‘‘मुझे यह मालूम करने की जरूरत नहीं है कि तुम लोग किस तरह के वीआईपी हो और अपनी गाड़ी पर लालबत्ती लगाने का अधिकार तुम ने कहां से हासिल किया है. ऊपर से आदेश के अनुसार हमें तुम्हारी गाड़ी की तलाशी लेनी है. बेहतर होगा कि तुम लोग शराफत से बाहर आ कर खड़े हो जाओ वरना हमें सख्ती से काम लेना होगा.’’ हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज को सख्त करते हुए कहा.

इस बीच उन के इशारे पर टीम के अन्य लोगों ने कार को चारों ओर से घेर लिया था. यह सब देख कर ड्राइविंग सीट पर बैठे युवक ने अंदर कोई इशारा किया और दरवाजा खोल कर बाहर आ गया. वह एक स्मार्ट सा युवक था. उस की बगल वाली सीट से एक आकर्षक युवती उतरी तो पिछली सीट से अधेड़ उम्र का एक आदमी बाहर आया. कार से बाहर आ कर ये सभी हरसिमरन सिंह को यह समझाने की कोशिश करने लगे कि वे ऊंचे पदों पर बैठे प्रतिष्ठित परिवार से संबंधित हैं और उन की गाड़ी में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे अनुचित कहा जा सके. अधेड़ शख्स ने कुछेक राजनेताओं के नाम ले कर प्रभावित करने की कोशिश की.

हरसिमरन सिंह ने उन की बातों पर ध्यान न दे कर खुद कार की तलाशी लेने लगे. इस तलाशी में उन के हाथ ऐसे 3 बैग लगे, जिन में 2 हजार रुपए के नोटों की गड्डियां ठसाठस भरी थीं. देखने में वे तमाम नोट एकदम असली लग रहे थे, लेकिन मुखबिर ने उन के पास जाली नोटों के होने के बारे में बताया था. फिर भी नोटबंदी के दौर में इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी का एक जगह मिलना किसी अपराध से कम नहीं था.

हरसिमरन सिंह तीनों को उन की गाड़ी और करेंसी सहित थाने ले आए, जहां शुरुआती पूछताछ में ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए उगल दिया कि उन से बरामद सारी करेंसी नकली है और वे कुल 42 लाख के नोट हैं. फिर क्या था, तीनों को विधिवत हिरासत में ले कर फिलहाल हवालात में बंद कर दिया गया. अगले दिन सुबह उन्हें अदालत में पेश कर के कस्टडी रिमांड पर ले कर तीनों से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उन्होंने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से उच्चशिक्षित एवं अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों के लड़केलड़की द्वारा अपना एक गिरोह बना कर आपराधिक राह पर चलने की जो दास्तान सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

सरवमित्तर वर्मा हरियाणा सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन की पत्नी सैन्य विभाग में लैफ्टिनेंट कर्नल डाक्टर हैं. इस जाली नोटों के साथ पकड़ा गया युवक इन्हीं वर्मा दंपति का 21 साल का बेटा है अभिनव वर्मा. वह पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार था. मूलरूप से ये लोग हरियाणा के जिला फरीदाबाद के कस्बा बल्लभगढ़ के रहने वाले थे.

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अभिनव चंडीगढ़ चला आया था. यहीं रह कर उस ने चंडीगढ़ से 25 किलोमीटर दूर पंजाब के जिला मोहाली के कस्बा बनूड़ स्थित चितकारा यूनिवर्सिटी से बीटेक किया.

 अभिनव ने कई प्रोजैक्टों पर काम करते हुए न केवल अपार सफलताएं अर्जित कीं, बल्कि अपना नाम भी रोशन किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ का हिस्सा बन कर उस ने अंधे लोगों के लिए एक ऐसा उपकरण बनाया, जिसे किसी अंधे की छड़ी अथवा अंगूठी में आसानी से फिट किया जा सकता है. नेत्रहीन अगर अकेला चला जा रहा है तो किसी भी तरह की बाधा आने पर यह उपकरण सेंसर की तरह काम करते हुए उन्हें चौकन्ना कर देता है. इस उपकरण की न केवल खूब चर्चा हुई बल्कि अभिनव इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतारने की तैयारी करने लगा. इस के लिए ‘लाइव ब्रेल सौल्यूशन’ नाम से अपनी कंपनी बना कर चंडीगढ़ के इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 में उस ने अपना आलीशान औफिस भी खोल लिया. रहने के लिए उस ने जीरकपुर के ढकौली स्थित पाइनहोम अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया. अभिनव घर से काफी संपन्न था. वैसे भी उस की प्रतिभा को निखारने के लिए घर वाले उस का हर तरह से सहयोग कर रहे थे. पिछले साल उस के पिता का अचानक देहांत हो गया तो उस की मां का प्यार उस पर कुछ ज्यादा ही उमड़ने लगा.

अपना व्यापार चलाने के लिए अभिनव अब तक 16 देशों की यात्रा कर चुका है. नेट के जरिए वह विश्व भर की कंपनियों व ग्राहकों से जुड़ता जा रहा था. ऐसे में उसे योग्य स्टाफ की जरूरत थी. कपूरथला की रेलवे कोच फैक्ट्री में इंजीनियर के पद पर काम कर रहे रामरक्खा वर्मा रिश्ते में अभिनव के मामा हैं.

वह फैक्ट्री के सी टाइप वार्ड के अपने सरकारी फ्लैट में पत्नी और बेटी विशाखा के साथ रहते थे. विशाखा ने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था. इन दिनों वह लुधियाना के एक बड़े प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी करती थी. लुधियाना की गगनदीप कालोनी में रहने वाले नागपाल के अनेक राजनेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

एमबीए करने के बाद विशाखा ने अभिनव से कहीं नौकरी दिलाने को कहा था. लेकिन वह उसे कहीं नौकरी नहीं दिला सका था. इस के बाद विशाखा ने लुधियाना में प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी कर ली थी, जबकि वह इस से कहीं बढि़या नौकरी करने में सक्षम थी.

अभिनव को अपना काम जमता नजर आने लगा तो उसे अपने औफिस के लिए विशाखा की जरूरत महसूस हुई. विशाखा उस से भले ही 2 साल बड़ी थी, मगर वह उसे मानती बहुत थी. लिहाजा अभिनव के कहने भर की देर थी कि उस ने प्रौपर्टी डीलर के यहां वाली नौकरी छोड़ दी और अभिनव के औफिस में जौइन कर लिया.

अभिनव को इस क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य नजर आ रहा था. उस का बनाया उपकरण खरीदने के लिए पूरी दुनिया से और्डर आ रहे थे. उस के लिए उन की मांग पूरी कर पाना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में उसे अपने पैर जमाने के लिए काफी बड़ी रकम की जरूरत थी, जिसे वह न खुद पूरी कर सकता था और न ही उस के परिवार वाले पूरी कर सकते थे. अचानक नोटबंदी के तहत 500 और 1000 रुपए के नोटों का प्रचलन बंद कर सरकार द्वारा 2 हजार रुपए के नए नोट मार्केट में उतार दिए गए. ऐसे में मार्केट और आम लोगों की परेशानी को देख कर अभिनव के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न 2 हजार रुपए के जाली नोट छाप कर बाजार में चला दिए जाएं.

प्रयोग के तौर पर उस ने नए नोट को स्कैन कर के उस का प्रिंट निकाला. प्रिंट इतना बढि़या निकला कि देखने में किसी भी तरह से असली नोट से कम नहीं लग रहा था. उस ने इस बारे में विशाखा से बात की तो वह भी उस की मदद के लिए तैयार हो गई. फिर तो उन्होंने 2 हजार रुपए के 10 जाली नोट तैयार कर के अपने कर्मचारियों के माध्यम से मार्केट में भिजवाए जो आसानी से चल गए. इस सफलता से उत्साहित हो कर उन्होंने अपने कर्मचारियों का अपना एक गैंग बना लिया. यही नहीं, लुधियाना के प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल को भी लालच दे कर अपने गिरोह में शामिल कर लिया. 54 वर्षीय यह अधेड़ बिना आगेपीछे की सोचे अपराध की राह पर चलने को तैयार हो गया. आगे जो योजना बनी, उस के अनुसार, थोड़ीबहुत नहीं, 2 हजार रुपए के करोड़ों के नकली नोट तैयार कर के इन लोगों ने उन लोगों के हवाले कर दिए, जिन के पास 5 सौ व 1 हजार रुपए के नोटों की शक्ल में ब्लैकमनी भरी पड़ी थी. ऐसे में 30 प्रतिशत कमीशन काट कर नकली नोटों को असली कह कर उन के हवाले कर 70 प्रतिशत असली नोटों की कमाई कर ली जाए. इन पैसों से काम के अनुसार, गिरोह के सदस्यों का कमीशन फिक्स कर दिया गया.

फिर क्या था, पूरे उत्साह के साथ ये सभी इस काम में शिद्दत से लग गए. दिनरात मेहनत कर के कुछ ही समय में इन्होंने 3 करोड़ रुपए के नकली नोट तैयार कर के 2 करोड़ के नोट बाजार में चला भी दिए.

पूछताछ में उन लोगों ने जो बताया, उस के अनुसार, अभिनव ने मोहाली में अपनी एक फैक्ट्री खोल रखी थी, जिस में विशाखा को एचआर की अहम पोस्ट दी गई थी. उसी फैक्ट्री में पैसा लगा कर उसे ऊंचाइयों तक ले जाने का उस ने सपना देखा था. पकड़े गए सारे नोट इसी फैक्ट्री में तैयार किए गए थे. पुलिस ने अभिनव और विशाखा की निशानदेही पर डिजिटल प्रिंटर, पेपर और कटर वगैरह बरामद कर लिया था. पूछताछ में इन लोगों ने बताया था कि अपने इस धंधे में अभिनव ने आधा दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों को लगा रखा था. लेकिन उन में हर्ष और प्रमोद की भूमिका अहम थी. पुलिस ने उन की गिरफ्तारी के लिए तमाम जगहों पर छापे मारे, पर वे पकडे़ नहीं जा सके. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में अभिनव ने यह भी स्वीकारा कि 2009 मौडल की वीआईपी नंबर एचआर 70यू 0004 वाली औडी कार उस ने 20 लाख रुपए में जीरकपुर के कार बाजार से खरीदी थी. उस कार को अपने नाम पर ट्रांसफर न करवा कर उस पर अवैध रूप से लालबत्ती लगा कर वह पुलिस और अन्य लोगों की आंखों में धूल झोंक कर नकली नोटों के अपने धंधे को अंजाम देता रहा.

अखबारों में खबरें छपने के बाद कई लोगों ने थाने जा कर अभिनव और उस के साथियों द्वारा ठगे जाने की अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं. मजे की बात यह है कि वे भी अभियुक्तों से मिले 2 हजार रुपए के नकली नोट आसानी से असली के रूप में चला चुके थे. नकली नोटों के बदले लोगों से मिले पुराने असली नोटों को अभिनव न केवल अपने पर्सनल और कंपनी के खातों में जमा कराता था, बल्कि कुछ पैसा उस ने अपने कर्मचारियों के बैंक खातों में भी जमा कराए थे. 14 लाख के पुराने नोट उस के घर से भी बरामद किए गए थे. खुद तैयार किए गए 3 करोड़ के 2 हजार के नोटों में से उस के पास 42 लाख रुपए ही बचे थे, जिन्हें वह विशाखा और सुमन नागपाल के साथ अपनी कथित वीआईपी गाड़ी से एक पार्टी को देने जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

अभिनव से बरामद नोटों के बारे में आरबीआई की रिपोर्ट आ चुकी है कि वे सभी नोट जाली हैं और उन की छपाई हलके कागज पर हुई है.

पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर अभिनव, विशाखा और सुमन नागपाल को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां से उन तीनों को न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया गया. कथा लिखे जाने तक न तो उन की जमानतें हुई थीं और न ही इस मामले के 7 अन्य अभियुक्तों में से कोई पकड़ा जा सका था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बी प्रैक्टिकल

बीके सिंह ईस्ट ऐंड वैस्ट कंपनी में काम करते हैं. वे जन्मजात प्रैक्टिकल आदमी हैं. कायदे से उन के जैसे काबिल आदमी का प्रमोशन हो जाना चाहिए. वह भी तब, जब जोनल मैनेजर अपनी जाति का हो. लेकिन जुगाड़ बैठ नहीं रहा है. दरअसल, बीके सिंह का मुकाबला एक दूसरे प्रैक्टिकल आदमी से है. दूसरा यानी केपी पांडे. वे चतुर तो हैं ही, बैकग्राउंड से मजबूत भी हैं. वे 10-20 हजार रुपए यों ही खर्च कर सकते हैं. यह तो खतरे की घंटी है. सावधान हो गए बीके सिंह. उन को गिरने से पहले ही संभलने की आदत है. मन ही मन उन्होंने एक ऐसी चाल सोची, जिस की काट केपी पांडे के पास नहीं थी.

केपी पांडे विधुर हैं और बीके सिंह एक खूबसूरत पत्नी के पति. बीके सिंह की किस्मत से जलने वालों में जोनल मैनेजर भी थे. जोनल मैनेजर ने शादियां तो की थीं 3, पर 2 स्वर्ग सिधार गईं, एक ने तलाक दे दिया. अरबपति आदमी पति न हो, तो लड़कियां चिंतित हो जाती हैं. जोनल मैनेजर की चिंता करने वालियों की भी कमी नहीं थी. यह चिंतन शिविर उन की टपकती हुई लार को धार बना रहा था. एक दिन बीके सिंह ने अपनी पत्नी सुलोचना को कह ही दिया, ‘‘सोच रहा हूं कि बौस को किसी दिन डिनर पर बुला लूं. कैसा रहेगा ’’

‘‘कौन से बौस को  तुम्हारे तो कई बौस हैं. अभी तो बौस शायद खन्ना हैं, जिन से तुम्हारी बिलकुल नहीं बनती.’’ बात को काटते हुए बीके सिंह ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर को बुलाने की सोच रहा हूं. वे कई बार कह चुके हैं कि घर के खाने का मजा ही कुछ और है. बेचारे विधुर जिंदगी जी रहे हैं.’’

‘‘क्यों… हैट्रिक तो वे लगा ही चुके हैं. अब उन्हें क्या परेशानी है  वे एक और ले आएं.’’

बातचीत से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि सुलोचना उन पत्नियों में से नहीं हैं, जो केवल ‘जी हां’ कहती हैं. वह वकालत में ग्रेजुएट थी. प्रैक्टिस शुरू नहीं की थी. उसे अपने पति के पैतरे पसंद नहीं थे. उसे जो बात पसंद नहीं आती, साफसाफ कहना पसंद करती थी. यह सच बीके सिंह पर भी शादी के सालभर के अंदर ही सामने आ चुका था. बीके सिंह ने बच्चे पैदा करने की योजना पर बात करने की कोशिश की, तो सुलोचना ने साफ मना कर दिया. उस का मानना था कि पहले एकदूसरे को जान तो लें कि बच्चे पाल भी सकेंगे या नहीं. कम से कम 2 साल तो पूरे हो जाने दो. बीके सिंह को अगर शाप देना आता, तो कमंडल से पानी ले कर सुलोचना को शाप दे देते, ‘ऐ दुष्ट बालिके, तू ने बाबा की आत्मा को कष्ट दिया है. जा, तू अनंतकाल तक मां नहीं बनेगी. पर ऐसा हो न सका.

‘‘मैं इस रविवार को ही उन्हें खाने पर बुला लेता हूं,’’ ऐसा कह कर बीके सिंह ने अपनी बात रखी.

सुलोचना ने भी ज्यादा बहस नहीं की, तो बीके सिंह ने उसे हां के रूप में लिया और रविवार को जोनल मैनेजर को डिनर पर बुला लाए. जोनल मैनेजर हिंदी कविताओं के रसिया थे, साथ ही हनी सिंह के गानों के दीवाने भी. डिनर सर्व कर रही सुलोचना को उन्होंने इशारा कर के बात बीके सिंह से कही, ‘‘हिंदी कविताओं में तो एक ही कवि हुए सुमित्रानंदन पंत… बाले तेरे रूपजाल में कैसे उलझा दूं लोचन. उन के बाद के कवि तो रोते रह गए. उस के बाद भी एक कवि और हो गए. नाम याद नहीं आ रहा. उन की कविता है, ‘अगर मैं ने किसी के होंठ चूमे, अगर मैं ने किसी की मदभरी अंगड़ाइयां चूमीं. महज इस से किसी का पुण्य, मुझ पर पाप कैसे बन गया ’ वाह… वाह… इसे कहते हैं कविता.’’

जोनल मैनेजर को पता था कि यहां कविताएं उन के अलावा किसी और को नहीं आतीं. जो पढ़ेंगे, वह सही ही होगी. वैसे भी बौस जो करते हैं, सही करते हैं. हुआ भी यही. सुलोचना मटन का डोंगा रख कर जा चुकी थी. सुलोचना के चले जाने से जोनल मैनेजर साहब नाराज हो रहे थे. उन्होंने घूर कर बीके सिंह को देखा. बीके सिंह प्रैक्टिकल आदमी थे. तुरंत वे बात की तह तक पहुंच गए. सुलोचना को आवाज दी, ‘‘अरे, जरा दही लाना.’’सुलोचना दही ले कर आई. जोनल मैनेजर साहब ने हनी सिंह की चर्चा छेड़ दी, ‘‘दुनिया में जीना कितना मुश्किल है. देखो बेचारे हनी सिंह को. उस पर बारबार बेहूदगी फैलाने के आरोप लगा दिए जाते हैं. वह तो गायक है. कलाकार इन चीजों से परे होता है. मैं कहता हूं कि मर्दऔरत का संबंध तो सदियों से चला आ रहा सच है.’’

‘‘आदमी की सोच ही अब छोटी हो गई है सर. एक बच्ची नंगी पड़ी हो, तो भी हमें बेहूदगी नजर नहीं आती है, क्योंकि हम उसे औरत की नजर से नहीं देखते. सोच का ही सारा खेल है,’’ बीके सिंह ने कहा. जोनल मैनेजर साहब खुश हो रहे थे कि बात की दिशा बिलकुल सटीक जा रही है. बात को और पकड़ाने के लिए उन्होंने सीधे सुलोचना से कहा, ‘‘आप को भी साथ में डिनर कर लेना चाहिए था.’’

‘‘जी नहीं, मैं मांसाहारी नहीं हूं,’’ छोटा सा जवाब दे कर वह चुप हो गई. जोनल मैनेजर साहब के गरम तवे पर दो बूंद पानी पड़ा. वे बीके सिंह से बोले, ‘यह गलत बात है सिंह. सुलोचना अगर मांसाहारी नहीं हैं, तो शाकाहारी खाना बनवा लेते. तीनों मिल कर खाना खाते.’’जोनल मैनेजर साहब को पूरी उम्मीद थी कि सुलोचना अपना कीमती समय उन की झोली में डाल देगी, लेकिन वह तो वहां से जा चुकी थी. जोनल मैनेजर ने जल्दीजल्दी खाना खत्म किया और कार में बैठ कर चले गए. जाते समय सुलोचना नमस्कार करने के लिए हाजिर हुई, लेकिन इस से उन का मन नहीं भरा.

जोनल मैनेजर साहब के जाते ही बीके सिंह की साढ़ेसाती शुरू हो गई. वह उलझ पड़े, ‘‘अगर 2 मिनट उन के पास बैठ जाती, तो क्या बिगड़ जाता. घर आया मेहमान है, थोड़ा प्रैक्टिकल होना पड़ता है. काम भागे तो नहीं जा रहे थे.’’

‘‘कहां बैठ जाती… उस की गोद में… देखा नहीं, कैसे घूर रहा था वह. तुम अपनी बातें अपने पास ही रखो. मुझे ये चोंचले पसंद नहीं हैं.’’

इस बात को अभी 5 दिन भी नहीं बीते थे कि जोनल मैनेजर साहब की लार बदस्तूर टपकने लगी. उन्होंने बीके सिंह को बुलाया. उस दिन के खाने की तारीफ की. सुलोचना के गुणों की तारीफ की. संस्कारों पर भाषण दिया. लगे हाथ यह कहना भी नहीं भूले कि अगले महीने गुप्ता रिटायर हो रहा है. उस की जगह ईस्ट जोन को एक ईमानदार और मेहनती सबमैनेजर चाहिए. बीके सिंह ने इसे अपने लिए औफर समझा. उन्होंने अगले रविवार आने का जोनल मैनेजर साहब को न्योता दे दिया. सुलोचना को इस बात से न तो पहले कोई परेशानी थी, न अब है. उस ने नौकरानी से कह दिया कि एक आदमी का खाना ज्यादा बनेगा. नियत समय से एक घंटा पहले ही अपनी नीयत संभाले जोनल मैनेजर साहब तशरीफ ले आए. इस बार उन के पास गानों की सीडी के साथसाथ एक किताब भी थी ‘लोलिता’.

बीके सिंह मिठाई लाने अभीअभी मार्केट चले गए थे. उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि साहब एक घंटा पहले ही घर आ जाएंगे. जोनल मैनेजर साहब ने आते ही सुलोचना के हाथ में वह किताब रखी और बोले, ‘‘यह पुस्तक वर्ल्ड फेम की है. लोलिता नाम की एक किशोरी की कहानी है. आम सोच का पाठक इस में सैक्स देखता है, लेकिन यह एक चिंतन है. आप इसे जरूर देखें. आप तो एक सुलझी हुई औरत हैं.’’ सुलोचना ने किताब ले तो ली, लेकिन उसे उन के सामने ही टेबिल पर रख कर अंदर कमरे में जा कर तकिए पर नया कवर चढ़ाने लगी. जब सुलोचना पानी ले कर जोनल मैनेजर के पास आई, तो उन्होंने कहा, ‘‘आप इतनी खूबसूरत हैं… मौडलिंग वगैरह क्यों नहीं कर लेतीं ’’

इस पर सुलोचना ने जो कहा, उस की उम्मीद नहीं थी, ‘‘आप की उम्र इतनी ज्यादा हो गई है. आप किसी आश्रम में क्यों नहीं चले जाते ’’ जोनल मैनेजर साहब यह सुन कर सोचने लगे, ‘क्या यह बदनसीब नहीं जानती कि उन के पति की किस्मत उन के ही हाथों में कैद है  क्या इस अभागी को इस बात की भी जानकारी नहीं कि वे अगर खुश हो जाएं, तो उस की जिंदगी बना सकते हैं ’ अब जोनल मैनेजर साहब अपने असली रूप में आने लगे,  ‘‘आप मेरी बेइज्जती कर रही हैं. मैं ने आप की तारीफ की और आप मेरी बुराई कर रही हैं. यह शिष्टाचार नहीं है.’’ ‘‘इस में बुराई वाली बात कहां से आ गई. बूढ़ा होना कोई गुनाह नहीं है. सभी लोग बूढ़े होते हैं. यह बेइज्जती कैसे हो गई  एक सचाई आप ने कही और एक सचाई मैं ने.

‘‘रही शिष्टाचार की बात, तो किसी सहकर्मी के घर उस की गैरहाजिरी में आना और उस की पत्नी को बेहूदा किताब भेंट करना क्या है  मैं तो कहती हूं कि समय के पहले आना भी अशिष्टता है.’’

‘‘तुम नहीं जानती कि किस से बात कर रही हो. मैं चाहूं तो एक क्षण में तुम्हारे पति को सड़क पर खड़ा कर सकता हूं.’’

‘‘और अगर मैं चाहूं, तो तुम्हें अटैंप्ट टू रेप के जुर्म में जेल भिजवा सकती हूं. मैं ने भी वकालत की डिगरी चोरी से हासिल नहीं की है. ‘‘जब तक कोर्ट में यह साबित होगा कि तुम ने मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाने की कोशिश की या नहीं, तब तक तुम्हारा मुंह पूरी तरह से काला हो चुका होगा. चुपचाप शांत बैठो और खाना पकने तक इंतजार करो.’’ जोनल मैनेजर साहब एकदम से दनदनाते हुए निकल जाना चाहते थे, लेकिन लग रहा था कि किसी ने सारी हवा निकाल दी हो. टांगें काम नहीं कर रही थीं. उन्हें बीके सिंह पर गुस्सा आ रहा था कि मनहूस कहां चला गया. अब तक उसे आ जाना चाहिए था. उस को तो कलाकंद मिठाई लाने के लिए भेजा था, कोलकाता जाने को तो नहीं कहा था. कलाकंद मिठाई का पैकेट लिए बीके सिंह आए तो देखा कि साहब किसी से फोन पर बात कर रहे हैं. उन्होंने बीके सिंह की ओर देखा भी नहीं और बोले, ‘‘आज का प्रोग्राम रहने दो, फिर कभी खा लेंगे. एक अर्जैंट फोन आ गया है…’’

बीके सिंह अभी बोलने के लिए उचित शब्द तलाश ही रहे थे कि साहब दनदनाते हुए निकल गए. भागते हुए बीके सिंह कार तक गए जरूर, लेकिन दरवाजा खोलने का भी मौका नहीं मिला. अंदर आते ही बीके सिंह सुलोचना पर फुंफकारे, ‘‘तुम ने हमारे साहब की बेइज्जती की होगी. वह इतने गुस्से में क्यों थे ’’ सुलोचना, जो जोनल मैनेजर के जाने की खुशी मना रही थी, इस बेहूदा सवाल से झल्ला गई. उस ने कहा, ‘‘जोनल मैनेजर की बेइज्जती तो की ही, लेकिन उस के असली हकदार तुम हो. उस के कहने पर कलाकंद मिठाई लेने चले गए अकेली पत्नी को दांव पर लगा कर. बौस खुश हो गया, तो प्रमोशन हो जाएगा. क्यों  

‘‘तुम ने मुझे पहचाना ही नहीं आज तक, नहीं तो मुझे प्लेट में सजा कर पेश करने की हिम्मत नहीं दिखाते. अच्छा हुआ वह चला गया, नहीं तो चप्पल से खातिरदारी करती मैं उस की.’’

‘‘तुम समझती क्या हो अपनेआप को. बड़ा आदमी है, जरा हंसबोल लोगी, तो तुम्हारा यह रूप घिस नहीं जाएगा. वह अगले महीने मुझे ईस्ट जोन का सबमैनेजर बनाने वाला था. तुम ने सब गुड़गोबर कर दिया.’’

‘‘अपने बूते कुछ कर नहीं सकते, तो बीवी को ढाल बना लिया. मैं द्रौपदी

नहीं हूं कि दांव पर लगा दोगे और मैं कन्हैयाकन्हैया कर के रोने लगूंगी. मैं उस का मुंह नोच लूंगी. उस का भी और तुम्हारा भी. मुझे तो तुम्हारे चेहरे से घिन हो रही है.’’ बीके सिंह अभी इतने भी प्रैक्टिकल नहीं हुए थे कि बीवी की गालियां सुनने के बाद भी मुसकरा सकें. उन की नजर में जरा सा हंसबोल लेना गलत नहीं था. सभी करती हैं. यह जमाना ही कारोबार का है. जिस के पास जो बैस्ट है, दे रहा है. एक बार आदमी कामयाब हो जाए, तो कोई नहीं पूछता कि कामयाबी के सूत्र क्या थे   सुलोचना थोड़ी पुराने खयालों की थी. वह अभी उतनी प्रैक्टिकल नहीं हुई थी.

पढ़ाई सुधर गई

जैसे ही दोपहर के खाने की घंटी बजी, सारे बच्चे दौड़ते हुए खाने की तरफ भागे. दीपक सर, जो गणित के टीचर थे और हाल ही में इस स्कूल में आए थे, स्कूल के इन तौरतरीकों को देख कर हैरान थे. आज बच्चों का खाना देख कर तो और भी हैरान हो गए. दाल बिलकुल पानी जैसी, भात और सब्जी के नाम पर उबले हुए चने. कैसे किसी के गले से उतरेंगे   स्टाफ रूम में सारे टीचर अपनेअपने खाने का डब्बा खोल कर खाने बैठ गए थे. दीपक सर ने जैसे ही अपने खाने का डब्बा खोला, मिश्रा सर, जो हिंदी के टीचर थे, कहने लगे, ‘‘दीपक सर, क्या बात है… आज तो आप के खाने के डब्बे से बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है ’’

‘‘जी,’’ मुसकराते हुए दीपक सर ने कहा और अपने खाने का डब्बा उन के आगे बढ़ा दिया.

थोडी़ देर बाद दीपक ने वहां बैठे दूसरे टीचरों से पूछा, ‘‘चलिए, मैं तो चलता हूं, अगली क्लास लेने. आप सब को नहीं चलना है ’’

‘‘अरे भैया, क्यों इतने उतावले हो रहे हो  बैठो जरा. बच्चे कहां भागे जा रहे हैं,’’  संस्कृत के पांडे सर ने कहा.

विज्ञान की टीचर वंदना मैडम बोल पड़ीं, ‘‘बच्चे अगर 1-2 सब्जैक्ट नहीं भी पढ़ेंगे, तो कौन सा आईएएस बनना है उन्हें, जो नहीं बन पाएंगे ’’

‘‘वंदना मैडम, बच्चों को पढ़ाना हमारी ड्यूटी है और अगर हम ईमानदारी से बच्चों पढ़%

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