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ग्रंथी को उम्रकैद

27 जुलाई, 2016 को पंजाब के जिला जालंधर की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. हरप्रीत कौर की अदालत में हत्या के एक मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था. चूंकि इस मुकदमे में हत्या का दोषी मुख्य ग्रंथी को माना गया था, इसलिए उस से हमदर्दी रखने वाले पंजाब के तमाम गुरुद्वारों के ग्रंथी, सेवादार तो आए ही थे, आम लोग भी अदालत में जमा थे.

चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए मीडिया वाले भी अदालत परिसर में जमा थे. जिस की हत्या हुई थी, उस की बहन रंजीत कौर और मां भी अन्य घर वालों के साथ फैसला सुनने अदालत आई थीं. पिछली तारीख पर दोनों पक्षों के वकीलों की बहस होने के बावजूद बचाव पक्ष के वकील के अनुरोध पर 11 बजे से साढ़े 12 बजे तक एक बार फिर बहस हुई.

जबकि जज डा. हरप्रीत कौर ने पिछली तारीख पर हुई बहस के आधार पर ही इस मुकदमे का फैसला सुरक्षित कर लिया था. फिर भी बचाव पक्ष के वकील के अनुरोध पर उन्होंने बहस का आदेश दे दिया था, जो करीब डेढ़ घंटे तक चली थी.

लंच के बाद ठीक सवा 2 बजे जज डा. हरप्रीत कौर ने अदालत में प्रवेश किया तो वहां उपस्थित लोगों ने खड़े हो कर उन का स्वागत किया. इस के बाद वह अपनी सीट पर बैठ गईं तो मुकदमे के फैसले की फाइल पेशकार ने उन के सामने रख दी. उन्होंने इस मुकदमे में क्या फैसला सुनाया, यह जानने से पहले आइए इस पूरे मामले के बारे में जान लें.

5 अप्रैल, 2014 को जालंधर के पटेल अस्पताल की स्टाफ नर्स रंजीत कौर ने अपनी मां परविंदर कौर के साथ जा कर थाना डिवीजन नंबर 8 के थानाप्रभारी विमलकांत से मिल कर शिकायत दर्ज कराई थी कि उस की 30 साल की विधवा बहन कमलप्रीत कौर कल यानी 4 अप्रैल, 2014 से अपने पृथ्वीनगर स्थित मकान नंबर एनए-28 से दोपहर 12 बजे से स्कूटर के साथ गायब है.

दोपहर को उस के जेठ महेंद्र सिंह ने किसी से पैसा लेने के लिए बुलाया था. उसे महेंद्र सिंह का 14 साल का बेटा गगनदीप सिंह बुलाने आया था. उस के साथ वह भी गया था. देर रात तक कमलप्रीत नहीं लौटी तो उन्होंने महेंद्र सिंह को फोन किया. उस ने बताया कि कमलप्रीत को उस ने 12 बजे बुलाया था, लेकिन 2 बजे तक इंतजार करने के बाद भी जब वह नहीं आई तो वह अपने काम से कहीं और चला गया. उस के बाद से कमलप्रीत का कुछ पता नहीं है. उस के दोनों फोन भी बंद हैं.

विमलकांत ने रंजीत कौर की शिकायत पर कमलप्रीत की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश का आश्वासन दे कर उसे और उस की मां को घर भेज दिया. इस के बाद उन्होंने एएसआई अजमेर सिंह को कमलप्रीत के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी. इस मामले में वह कुछ करते, अगले दिन सवेरे ही रंजीत कौर थाने पहुंची और थानाप्रभारी को दूसरी तहरीर दे कर कहा कि उस की बहन कमलप्रीत के गायब होने के पीछे उस के जेठ महेंद्र सिह का हाथ है.

उसी ने उसे कहीं छिपा दिया है या फिर उस की हत्या कर के लाश गायब कर दी है. क्योंकि वह उस की बहन से रंजिश रखता था. रंजीत कौर की इस तहरीर के आधार पर विमलकांत ने अपराध संख्या 55/2014 पर कमलप्रीत के अपहरण का मुकदमा महेंद्र सिंह निवासी गुरुद्वारा भगतराम, गांव बुलीना, दोआबा के खिलाफ दर्ज करा कर उस की तलाश शुरू कर दी.

जांच शुरू करते ही विमलकांत ने कमलप्रीत के दोनों फोन नंबरों पर फोन किया. उन में से एक नंबर तो बंद था, पर दूसरे फोन की घंटी बज उठी. थोड़ी देर बाद किसी ने फोन उठाया तो उन के पूछने पर उस ने अपना नाम संजीव बता कर कहा, ‘‘सर, मैं लवली यूनिवर्सिटी का छात्र हूं. यह फोन मुझे लुधियाना जाने वाली बस में सीट के नीचे मिला था.’’

विमलकांत ने संजीव से थाने आ कर फोन जमा कराने को कहा तो उस ने थाने आ कर फोन जमा करा दिया. इस के बाद उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एएसआई संजीव कुमार, अजमेर सिंह, गुरदेव सिंह, जगदीश कुमार, हैडकांस्टेबल सतनाम सिंह, तरसेमलाल, मुंशी नरेंद्र मोहन और सिपाही जतिंद्र की एक टीम बनाई.

महेंद्र सिंह पुलिस के हाथ नहीं लग रहा था. उस के इस तरह गायब होने से उस पर संदेह बढ़ता जा रहा था. वह 2 दिनों से गुरुद्वारा साहिब से गायब था. पुलिस ने उस के बेटे गगनदीप सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मैं अपने पिता महेंद्र सिंह के कहने पर चाची कमलप्रीत को बुलाने गया था. मैं चाची के साथ ही था, लेकिन जम्मू रोड पर फ्लोईओवर से पहले चाची के फोन पर किसी का फोन आया तो फोन पर बात करने के बाद उन्होंने मुझे वहीं उतार दिया और अकेली ही फ्लाईओवर की ओर चली गईं.’’

बहरहाल, आगे की काररवाई करते हुए विमलकांत ने कमलप्रीत का हुलिया बता कर जिले के सभी थानों से उस के बारे में पता किया. इस के अलावा उस के फोटो सहित इश्तेहार शोरे गोगा छपवा कर शहर भर में चस्पा करवा दिए. महेंद्र सिंह की तलाश में पुलिस तो लगी ही थी, मुखबिर भी उस के बारे में पता कर रहे थे.

काफी मशक्कत के बाद मुखबिर की सूचना पर महेंद्र सिंह को पठानकोट चौक से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने भाई गुरमेल सिंह की हत्या का बदला लेने के लिए कमलप्रीत कौर की हत्या कर उस की लाश को सीवर में फेंक दिया था.

महेंद्र सिंह को लगता था कि उस के भाई गुरमेल सिंह की मौत अधिक शराब पीने से नहीं, बल्कि अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए कमलप्रीत कौर ने अपने प्रेमियों सन्नी और प्रिंस के साथ मिल कर शराब में जहर दे कर कराई थी. उस के पास इस बात के सबूत भी हैं. मरने से पहले कमलप्रीत ने उसे लिख कर दिया था.

इस के अलावा भी महेंद्र सिंह ने कमलप्रीत कौर की हत्या की एक और कहानी सुनाई. लेकिन उस की बातों पर ध्यान दिए बगैर विमलकांत ने उसे साथ ले जा कर उस की निशानदेही पर कमलप्रीत कौर की लाश बरामद कर ली. उन्होंने एसीपी सतीश मल्होत्रा, एडीसीपी (प्रथम) नरेश डोगरा को भी घटनास्थल पर बुला लिया था.

विमलकांत ने महेंद्र सिंह की निशानदेही पर गांव बुलीना, दोआबा के गुरुद्वारा साहिब भगतराम के सीवर से कमलप्रीत कौर की जो लाश बरामद की थी, वह मात्र ब्रा और पैंटी में थी. उन्होंने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने आ कर अपहरण के दर्ज मुकदमे को हत्या की धाराओं में तब्दील कर उसी दिन यानी 7 अप्रैल, 2014 को महेंद्र सिंह को जेईआईसी सिमरन सिंह की अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड अवधि के दौरान की गई पूछताछ में महेंद्र सिंह ने कमलप्रीत की हत्या की जो कहानी बताई, वह ईर्ष्या, आपसी रंजिश और दूसरे की संपत्ति हड़पने के लिए की गई हत्या की कहानी थी.

महेंद्र सिंह अपने 4 भाईबहनों में सब से बड़ा था. वह शुरू से ही काफी शरारती और लापरवाह किस्म का आदमी था. पिता सुरजीत सिंह की मौत के बाद सारे भाईबहन अपनीअपनी शादियां कर के अलग रहने लगे थे. महेंद्र सिंह के 2 बेटे और एक बेटी थी. बेटी शादी के बाद ससुराल चली गई थी तो बड़ा बेटा अलग रहने लगा था. उस के साथ सिर्फ छोटा बेटा गगनदीप सिंह ही रहता था.

महेंद्र सिंह की घटिया सोच और बुरी आदतों को सालों तक सहने के बाद अंत में परेशान हो कर उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. इस के बाद गांव के कुछ पुरानी जानपहचान वालों ने उस पर तरस खा कर बुलीना गांव के गुरुद्वारा भगतराम में उसे 4 हजार रुपए महीने की गुरुद्वारा के ग्रंथी पाठी की नौकरी दिलवा दी थी.

रहना और खानापीना सब गुरुद्वारा साहिब की ओर से था. वह चाहता तो फ्री का भोजन और बिना किराए के मकान में रह कर अपना और बेटे गगनदीप सिंह का भविष्य संवार सकता था. लेकिन उसे तो अपने और बेटे के भविष्य से ज्यादा चिंता अपने छोटे भाई के बढ़ते रुतबे और कमाई की थी.

महेंद्र सिंह का छोटा भाई गुरमेल भांगड़ा पार्टी में काम करता था. इस काम से उसे अच्छीखासी कमाई हो रही थी. वह मेहनती, ईमानदार और दूसरों की मदद करने वाला आदमी था. इसलिए वह हर तरह से सुखी था. उस की शादी कमलप्रीत कौर से हुई थी. कमलप्रीत कौर के पिता इकबाल सिंह बहरीन में काम करते थे. सालों पहले उन की मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद परिवार में विधवा मां परमिंदर कौर और छोटी बहन रंजीत कौर रह गई थी, जो पटेल अस्पताल में स्टाफ नर्स थी.

शादी के बाद गुरमेल और कमलप्रीत कौर 2 बेटियों खुशप्रीत कौर और राजबीर कौर के मातापिता बने. इस के बाद गुरमेल ने दोस्तों की मदद से लाम्मा पिंड चौक के पास राजा भांगड़ा ग्रुप के नाम से अपनी भांगड़ा पार्टी बना ली. देखते ही देखते उस का यह काम चल निकला और वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा.

पास में पैसे आए तो गुरमेल ने अपना मकान भी बनवा लिया. इस के अलावा उस की मां मरने से पहले पृथ्वीनगर वाला अपना मकान बहू कमलप्रीत के नाम कर गई थीं. जबकि महेंद्र सिंह उस मकान को हासिल करने के लिए दिनरात मां और भाई से झगड़ा करता रहता था.

इस तरह गुरमेल सिंह करोड़ों का मालिक बन गया था, जबकि महेंद्र सिंह के पास कुछ नहीं था. इसीलिए वह भाई की संपत्ति हथियाने की योजनाएं बनाने लगा था. दुर्भाग्य से 23 अक्तूबर, 2013 को गुरमेल की अधिक शराब पीने से मौत हो गई. उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं. पास में पैसे थे, इसलिए उस ने तमाम लोगों को काफी रकम उधार दे रखी थी, जिसे अब कोई लौटाने का नाम नहीं ले रहा था.

बहरहाल, छोटे भाई की मौत के बाद उस की जायदाद हथियाने के लिए महेंद्र सिंह को उचित मौका मिल गया था. उसे कुछ उन लोगों के बारे में पता था, जिन्होंने गुरमेल से रुपए उधार ले रखे थे. महेंद्र उन से रुपए वसूल करने लगा. इस के बाद वह गुरमेल की पत्नी कमलप्रीत कौर को बदनाम करने के लिए कहने लगा कि उस के पड़ोस में रहने वाले सन्नी और प्रिंस से अवैध संबंध हैं.

अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए ही उस ने प्रिंस और सन्नी के साथ मिल कर गुरमेल को जहर मिली शराब पिला दी थी, जिस से उस की मौत हो गई थी. विमलकांत ने महेंद्र सिंह के इस बयान की पुष्टि के लिए सन्नी और प्रिंस को थाने बुला कर पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वे कमलप्रीत को बहन मानते थे, जिस की वजह से वे उस का छोटामोटा काम कर दिया करते थे.

बहरहाल, महेंद्र सिंह द्वारा फैलाई गई अफवाह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया तो उसे गुस्सा आ गया और उस ने कमलप्रीत कौर की हत्या की योजना बना डाली. उसे लगा कि उस की मौत के बाद उसे अपनी मां द्वारा दी गई जायदाद तो मिल ही जाएगी, मृतक गुरमेल सिंह की बेटियों के संरक्षक के तौर पर उस की भी जायदाद उसे ही मिल जाएगी.

बहरहाल, कमलप्रीत कौर की हत्या की योजना बना कर उस ने 4 अप्रैल, 2014 की सुबह 11 बजे उसे फोन कर के कहा कि गुरमेल से एक आदमी ने डेढ़ लाख रुपए ले रखे थे, वह रुपए देने को तैयार है. 50-50 हजार कर के वह 3 बार में रुपए दे देगा. 50 हजार वह आज ही दोपहर को देने वाला है.

कमलप्रीत को उस की बातों पर विश्वास हो गया और वह रुपयों के चक्कर में उस के साथ जाने को तैयार हो गई. विश्वास जमाने के लिए उस ने दोपहर को उसे लाने के लिए अपने बेटे गगनदीप सिंह को भेज दिया. दोपहर साढ़े 12 बजे कमलप्रीत कौर गगनदीप को साथ ले कर अपनी ऐक्टिवा स्कूटर से निकली तो अपनी छोटी बहन रंजीत कौर को मैसेज कर दिया कि वह महेंद्र सिंह के साथ रुपयों की वसूली के लिए जा रही है.

कमलप्रीत कौर फ्लाईओवर तक पहुंची थी कि महेंद्र सिंह ने फोन कर के उस से कहा कि वह गगनदीप को वहीं छोड़ कर अकेली ही किशनपुरा आ जाए, यहीं से वह उस के साथ उस आदमी के गांव चलेगा.

महेंद्र सिंह से बात होने के बाद कमलप्रीत कौर ने गगनदीप को वहीं उतार दिया और खुद किशनपुरा की ओर चल पड़ी. किशनपुरा मोड़ पर महेंद्र सिंह उसे इंतजार करता मिल गया. कमलप्रीत ने उस से पूछा कि अब कहां चलना है तो उस ने कहा, ‘‘अभीअभी उस आदमी का फोन आया था कि वह रुपए ले कर गुरुद्वारा साहिब आ रहा है. इसलिए अब गुरुद्वारे चलना है.’’

महेंद्र सिंह झूठ बोल कर कमलप्रीत को गुरुद्वारा साहिब ले आया और उसे एक कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद उस ने गुरुद्वारा साहिब का मुख्यद्वार बंद किया और कमरे में आ कर उस की पिटाई कर के मन की भड़ास निकाली. इस के बाद कमलप्रीत की गरदन पर तलवार रख कर पूछा, ‘‘सचसच बता, प्रिंस और सन्नी तेरे यार हैं न? उन्हीं के साथ मिल कर तू ने मेरे भाई की हत्या की थी न?’’

‘‘मैं पति की हत्या कर के खुद को विधवा क्यों बनाऊंगी?’’ कमलप्रीत ने रोते हुए कहा, ‘‘आप को एक विधवा की जिंदगी के बारे में क्या पता होगा.’’

‘‘मुझे सब पता है. मरने के 2 महीने बाद गुरमेल ने मेरे सपने में आ कर मुझे बताया था कि जब तक मैं तुम से उस की मौत का बदला नहीं ले लेता, तब तक उस की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी.’’

महेंद्र सिंह का इरादा भांप कर कमलप्रीत कांप उठी थी. उस ने कमलप्रीत को कागज और पेन दे कर कहा, ‘‘इस पर लिखो कि तुम्हारा सन्नी और प्रिंस से नाजायज संबंध था और उन्हीं के साथ मिल कर तुम ने गुरमेल की हत्या की थी.’’

अपनी जान बचाने के लिए कमलप्रीत कौर ने महेंद्र ने जो कहा, वह लिख कर नीचे हस्ताक्षर कर दिए. दरअसल किसी वकील ने महेंद्र सिंह को सलाह दी थी कि अगर वह किसी तरह कमलप्रीत कौर को बदचलन साबित कर दे तो उस की बेटियों और मकान की देखभाल की जिम्मेदारी उसे मिल सकती है. इसीलिए उस ने ऐसा किया था.

कमलप्रीत ने जैसे ही उस की कही बातें कागज पर लिख कर दीं, उस ने धक्का दे कर उसे पलंग पर गिरा दिया और उस के सीने पर सवार हो कर गला दबाने लगा. जान बचाने के लिए कमलप्रीत कौर ने काफी संघर्ष किया, लेकिन महेंद्र सिंह के हाथों वह बच नहीं पाई.

कमलप्रीत की हत्या कर के महेंद्र सिंह ने कैंची से उस के शरीर के सारे कपड़े काट कर अलग किए और फिर गुरुद्वारा परिसर में ही बने सीवर टैंक में उस की लाश को डाल कर ढक्कन बंद कर दिया. इस के बाद कपड़ों को जला कर राख नजदीकी गांव जोहला के गुरुद्वारे के पास खेतों में बिखेर दी.

स्कूटर ले जा कर उस ने रेलवे स्टेशन की पार्किंग में खड़ी कर दी और कमलप्रीत कौर के दोनों मोबाइल फोन जालंधर से लुधियाना जा रही बस में रामामंडी के स्टैंड पर चढ़ कर बस की सीट के नीचे रख दिए और बाईपास के पास आ कर बस से उतर गया.

इतना सब कर के महेंद्र सिंह कमलप्रीत कौर के घर गया और उस की बहन रंजीत कौर तथा दोनों बेटियों से कहा कि उस ने किसी से रुपए लेने के लिए कमलप्रीत को बुलाया था, पता नहीं वह आई क्यों नहीं?

विमलकांत ने महेंद्र सिंह की निशानदेही पर रेलवे स्टेशन से स्कूटर और उस की चाबी, गुरुद्वारा साहिब के उस के कमरे से कैंची बरामद कर ली थी. उन्होंने जांच पूरी कर के समय से आरोप पत्र अदालत में दाखिल कर दिया था. इस मामले की सुनवाई 2 साल 3 महीने 18 दिन चली, जिस के बाद अदालत ने 28 जुलाई, 2016 को इस केस का फैसला सुना दिया.

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. हरप्रीत कौर ने महेंद्र सिंह को कमलप्रीत कौर की हत्या, उस की लाश खुर्दबुर्द करने और साक्ष्य मिटाने का दोषी मानते हुए सश्रम उम्रकैद की सजा सुनाई, साथ ही 20 हजार रुपए जुरमाना भी लगाया. जुरमाना न अदा करने पर अतिरिक्त सजा का प्रावधान रखा. इस तरह महेंद्र सिंह को उस के किए की सजा मिल गई.    

इन हस्तियों पर लगे संगीन आरोप

बॉलीवुड के कलाकारों पर आये दिन किसी ना किसी विवाद के कारण कोई न कोई खबर बन ही जाती है. कुछ विवाद तो ऐसे होते हैं जिनका दाग जीवन भर के लिए कलाकारों के दामन पर लग जाता है.

आज हम बॉलीवुड के उन कुछ कलाकारों से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं जो अपने काम से तो ज्यादा नहीं पर उन पर लगे आरोपों के चलते काफी चर्चित हुए. कई संगीन आरोप ऐसे भी थे जिनके कारण कुछ का करियर एकदम असफल हो गया.

शाइनी आहूजा : साल 2009 में अभिनेता शाइनी आहूजा पर उनके ही घर की नौकरानी ने बलात्कार करने का आरोप लगा था. जिस कारण उनका बॉलीवुड करियर तो असफल हुआ ही था औऱ साथ में उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी थी.

शक्ति कपूर : शक्ति कपूर भी आरोपों से अछूते नहीं रह सके हैं. साल 2005 में एक निजी चैनल द्वारा कराये गए एक स्टिंग आपरेशन में शक्ति कपूर एक यंग महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करते हुए नजर आ रहें है. उस समय इस किस्से ने तूल तो बहुत पकड़ा था.

राज कुमार संतोषी : ये बात है साल 1997-98 की जब फिल्म निर्देशक राज कुमार सन्तोषी पर फिल्म चाइना गेट की शूटिंग के दौरान अभिनेत्री ममता कुलकर्णी ने हरासमेंट का आरोप लगाया था.

जैकी श्रॉफ : हैरान कर देने वाली बात तो ये जरूर है, पर हम आपको बता देना चाहते हैं कि साल 1980 के दौरान उस समय की चर्चित बॉलीवुड अदाकारा तब्बू ने जग्गू दादा पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था.

मधुर भंडारकर : हिंदी सिनेमा में फैशन और हीरोइन जैसी अच्छी फिल्में बनाने वाले निर्देशक मधुर भंडारकर पर साल 1999 में अभिनेत्री प्रीति जैन ने कास्टिंग काउच जैसा संगीन आरोप लगाया था. प्रीति का कहना था कि मधुर ने उन्हें खुद की फिल्म में मुख्स भूमिका देने और शादी का वादा कर उनके साथ सेक्स किया था. लेकिन साल 2004 में वे अपने इस बादे से मुकर गए.

आदित्य पंचोली : यूं तो आदित्य पंचोली अक्सर सुर्खियों में छाये ही रहतें हैं. जब आदित्य पूजा बेदी को डेट कर रहे थे उस दौरान उन पर यह संगीन आरोप लगाए गए थे कि आदित्य ने पूजा की नौकरानी को किसी बड़ी फिल्म में काम दिलाने के बहाने उसके साथ शारीरिक सम्बंध बनाने की कोशिश की थी. अब इन बातों में कितनी सच्चाई है यो तो आदित्य जी ही बता सकते हैं.

आपके स्मार्टफोन के लिए जरुरी हैं ये ऐप

सूचना-प्रौद्योगिकी के इस दौर में हर इंसान के हाथ में मोबाइल फोन होना कोई बड़ी बात नहीं है. आज के समय में अधिकतर लोग स्मार्टफोन्स का प्रयोग कर रहे हैं.

लेकिन वे लोग फोन हैंग होने जैसी आम दिक्कतों से हर समय परेशान रहते हैं. गूगल प्ले स्टोर पर कुछ ऐसे फ्री ऐप उपलब्ध हैं जिन्हें फोन में रखने के बाद आपको मोबाइल से जुड़ी दिक्कतों का कम से कम सामना करना पड़ेगा.

App2SD

एंड्रायड स्मार्टफोन यूजर्स सबसे ज्यादा फोन के हैंग होने व इंटरनल स्टोरेज भरने से परेशान रहते हैं. आप चाहते हैं कि आपका फोन एकदम स्मूद चले तो इसके लिए आप App2SD ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस ऐप के जरिए आप दूसरे ऐप को भी मेमोरी कार्ड पर मूव कर सकते हैं. अगर आपके पास ऐसा स्मार्टफोन है जिसकी स्टोरेज बढ़ाई नहीं जा सकती तो इस ऐप की मदद से आप बेकार ऐप को फ्रीज या अनइंस्टॉल कर सकते हैं. 

Clean Master

स्मार्टफोन्स में बहुत से ऐप बैकग्राउंड पर चलते रहते हैं. बहुत से ब्रैंड्स अपने स्मार्टफोन्स में एक क्लीनर ऐप दिखाते हैं जो मोबाइल स्लो करने वाले ऐप को हटा देता है. अगर आपके फोन में ऐसा डिफॉल्ट ऐप नहीं है तो क्लीन मास्टर ऐप को इस्तेमाल कर सकते हैं. जब कभी फोन स्लो लगे, तो क्लीन मास्टर ऐप को रन करना होगा. ये ऐप बैकग्राउंड में चलने वाले सभी ऐप को भी बंद कर देता है. साथ ही मोबाइल का स्टोरेज भी बढ़ाता है.

Airdroid

बहुत बार स्मार्टफोन को पीसी से कनेक्ट करने की समस्या रहती है. अगर इसे कनेक्ट कर भी दिया जाए तो यह कंप्यूटर में एक्सटर्नल ड्राइव के रूप में नहीं दिखता. आप एयरड्रॉइड ऐप की मदद से अपने फोन को वाई-फाई के जरिए कनेक्ट कर सकते हैं और ऐप को मैनेज कर सकते हैं. एयरड्रॉइड ऐप की मदद से कॉल्स और मेसेज की नोटिफिकेशंस को भी मैनेज किया जा सकता है.

Battery Doctor

फोन की बैटरी खत्म हो जाने की समस्या भी बहुत परेशान करती है समान्यत: ऐसा बैकग्राउंड ऐप, खराब कनेक्टिविटी या ब्राइटनेस लेवल की वजह से ऐसा होता है. ज्यादा स्मार्टफोन्स में बैटरी ऑप्टिमाइजेशन मोड्स आते हैं मगर लोग फोन की फंक्शनैलिटी को सही रखने के लिए उसमें बदलाव से बचते हैं. इसलिए आप बैटरी डॉक्टर ऐप को इंस्टॉल कर सकते हैं. इससे आप स्मार्ट चार्जिंग और इंटेलिजेंट बैटरी ऑप्टिमाइजेशन कर सकते हैं.

QuickPicgallery

ज्यादातर यूजर्स बहुत सी तस्वीरें लेते हैं और विडियो भी रिकॉर्ड करते हैं. वे डुप्लिकेट और गैर-जरूरी तस्वीरों और विडियो को डिलीट भी नहीं करते. नतीजा यह रहता है कि इमेज गैलरी स्लो हो जाती है और पूरी तस्वीरों को दिखाने में टाइम लेने लगती है. आप क्विक पिक गैलरी ऐप का इस्तेमाल करके इस समस्या से मुक्त हो सकते हैं. यह काफी फास्ट है. इसे क्लाउड सर्विसेज के साथ भी इंटिग्रेट किया जा सकता है और वाई-फाई के जरिए पास के डिवाइस को तस्वीरें भी भेजी जा सकती हैं.

DiskUsage

कुछ हफ्तों तक मोबाइल फोन इस्तेमाल करने के बाद आप देखेंते हैं कि बड़ी फाइल्स सेव न करने के बावजूद भी स्मार्टफोन की स्टोरेज बहुत भर जाती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कई तरह की फाइल्स अपने आप सेव होती रहती हैं. इनमें से कुछ जरूरी सिस्टम फाइल्स होती हैं तो कुछ किसी काम की नहीं होतीं. इन फाइल्स को हटाकर मेमोरी को खाली किया जा सकता है. मेमोरील को खाली करने के लिए आप फ्री ऐप डिस्क यूजेस को इंस्टॉल कर सकते हैं. यह डिवाइस को स्कैन करता है और बताता है और फोल्डर का स्ट्रक्चर दिखाता है. यह थर्ड पार्टी फाइल मैनेजर की मदद से फाइल्स को डिलीट कर सकते हैं.

खुद की सुरक्षा करें सुनिश्चित

भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों नोटबंदी के बाद महंगाई बढ़ने की आशंका जताई थी और डिजिटल लेन देन पर भी बल दिया था. केंद्रीय बैंक ने जानकारी देते हुए कहा कि नोटबंदी का असर फरवरी के मध्य से ही कम होना शुरू हो गया था. केंद्रीय बैंक ने अपने आकलन में कहा कि नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन अब भी इसका आधार काफी छोटा है. बैंकों के कर्ता-धर्ता के ऐसे बयान से यह अटकले लगाई जा रही हैं कि जल्द ही आम आदमी पर महंगाई की मार पड़ सकती है.

आंकड़ों और दिन-प्रतिदिन बढ़ते खर्चों से भविष्य की प्लैनिंग कर पाना मुश्किल होता जा रहा है. रोजमर्रा के खर्चे ही नहीं निकल पाते, ऐसे में भविष्य के लिए बचत की भी जाए तो कैसे की जाए. पर आप कुछ तरीकों से महंगाई की मार से बच सकते हैं.

इन टिप्स से आप आसानी से महंगाई की मार से बच सकते हैं-

1. बढ़ाएं अपनी बचत की राशि

एक दायरे में रहकर खर्च करने की आदत डालें. अगर आपने लोन ले रखा तब तो ऐसा करना और भी ज्यादा जरूरी है. 8-9 घंटे की कड़ी मेहनत की कमाई को बेवजह जाया न करें. अगर आपको बचत करने में दिक्कत आती है तो एक बजट बना लें और उसका सक्ति से पालन करें. जितना जल्दी संभव हो अपने पुराने सारे लोन चुका दें और अपने एकाउंट्स को ऑर्गेनाइज करें. रिटायरमेंट प्लैनिंग भी शुरु कर दें क्योंकि कल किसी ने नहीं देखा है.

2. बढ़ाएं अपने निवेश का दायरा 

एक निवेश पोर्टफोलियो का निर्माण करें और दो के जोड़े में करें ताकि वह एक दूसरे से जुड़े रहें. अर्थव्यवस्था में किसी भी तरह के असंतुलन के समय दो निवेश एक दूसरे के साथ संतुलन बनाएं रखेंगी. यह तरीका आपके निवेश को महंगाई के असर से भी बचाकर रखेगा.

3. अलग-अलग आय के स्रोतों का करें निर्माण 

आपकी नौकरी आपके आज और कल को संभालने के लिए उपयुक्त नहीं है. कल क्या होगा किसी को नहीं पता, यानि की आपकी नौकरी और सैलरी दोनों का कोई भरोसा नहीं है. अगर आप अपनी नौकरी से बहुत खुश व संतुष्ट हैं तब भी आप अतिरिक्‍त आय स्रोत का रास्‍ता जरूर अपनायें, ऐसा आप किसी तरह का कंसल्टिंग या फिर ऑनलाइन काम के जरिये कर सकते हैं.

4. अपना इमरजेंसी फंड तैयार करें

अपने निवेश को महंगाई के असर से बचाने के लिए आप एक इमरजेंसी फंड तैयार करें. इस फंड में तीन माह के खर्च के बराबर राशि होनी चाहिए. अगर अपने अच्छे समय में आप यह फंड तैयार नहीं करते तो बुरे दिनों में आपको कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. अपने पुराने खर्चों में से कुछ कटौती और बचत के जरिये इसे तैयार करना ज्यादा आसान है. मंदी के दौर में आपको लोन मिलने में भी दिक्कतें आ सकती हैं.

5. भविष्य के बारे में सोचें

हमेशा भविष्य को ध्यान में रखकर निवेश करें. निवेश और बचत हमेशा भविष्य को ध्यान में रख कर करें. अलग अलग जगह निवेश करना एक बेहतर विकल्प है. मंदी कुछ दिनों के लिए ही होती है. अपने निवेश को मंदी से बचाने के लिए हमेशा लंबी अवधि के बारे में सोचकर निवेश करें.

गोवा-मणिपुर में चलेगा सत्ता का जोर

5 राज्यों के चुनाव में भाजपा को 2 और कांग्रेस को 1 राज्य में सरकार चलाने का बहुमत मिला. गोवा और मणिपुर में दोनों ही दलों को बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस नंबर 1 की पार्टी होने के बाद भी सरकार बनाने की दौड़ में पीछे है. भाजपा कांग्रेस के पुराने दांव से ही कांग्रेस को मात देकर 5 राज्यों के चुनाव का फैसला 4-1 से अपने पक्ष में करने के लिये अपनी साख को दांव पर लगाने को तैयार है. भाजपा के लिये अपनी साख से अधिक कांग्रेस मुक्त भारत की चिंता है.

जिस तरह से केन्द्र के दखल से राज्यों में कभी कांग्रेस सरकार बनाती बिगाड़ती थी, अब भाजपा भी उसी का अनुसरण कर रही है. गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में कांग्रेस जीत कर आई है. गोवा में कांग्रेस को 17 और मणिपुर में 28 सीटें मिली. इसके मुकाबले भाजपा को गोवा में 13 और मणिपुर में 21 सीटें ही मिल पाई. दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने के लिये बहुमत किसी दल के पास नहीं है. ऐसे में अन्य विधायकों को अपनी ओर करके भाजपा गोवा और मणिपुर में अपनी सरकार बनाने के लिये आगे बढ़ चुकी है. गोवा में भाजपा ने अपने सबसे योग्य उम्मीदवार मनोहर पार्रिकर को केन्द्र के रक्षा मंत्री से हटाकर गोवा के मुख्यमंत्री के रूप मे सरकार बनाने के लिये गोवा भेज दिया है. मणिपुर में भी भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है.

कांग्रेस इसे केन्द्र सरकार की सत्ता का दुरुपयोग बता रही है. वह इस मुद्दे को लोकसभा और सुप्रीम कोर्ट में भी ले जा रही है. यही नहीं जिस तरह से मणिपुर और गोवा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को सरकार बनाने के लिये नहीं बुलाया गया, उसको लेकर दोनो ही राज्यों के राज्यपालों पर भी आरोप लग रहे हैं. गोवा और मणिपुर में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हो सका है. ऐसे में राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है. आमतौर पर राज्यपाल जिस पार्टी के सबसे अधिक विधायक होते हैं उसे ही सरकार बनाने का न्यौता देते हैं. कई बार राज्यपाल अपने विवके से भी फैसला करते हैं.

पहले भी देश में ऐसे फैसले हुये हैं, जिनपर अदालत को दखल देना पड़ा है. अगर भाजपा के प्रयास पर अदालत का दखल होता है और फैसला उसके खिलाफ जाता है तो पार्टी की बड़ी किरकिरी होगी. उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार को लेकर इस तरह की किरकिरी पहले भी हो चुकी है. इसके बाद भी भाजपा के कुछ नेता गोवा और मणिपुर में पार्टी के सरकार बनाने के पक्ष में हैं. इनका तर्क है कि कांग्रेस पहले इस तरह के काम कर चुकी है. उसे किसी को नैतिकता का पाठ पढ़ाने की जरूरत नहीं है.

गोवा में ‘आयाराम गयाराम‘ की तर्ज पर पहले भी दलबदल खूब हुआ है. वहां के लिये यह कोई नया नहीं है. मणिपुर में पिछली बार भाजपा को केवल 1 सीट मिली थी, इस चुनाव में उसे 21 सीटें मिली हैं. भाजपा इसे अपने पक्ष में मान रही है. ऐसे में उसका मानना है कि प्रदेश के लोग भाजपा की सरकार चाहते हैं. प्रदेश के लोगों की इच्छा से ही पार्टी वहां सरकार बनाने का प्रयास कर रही है. 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को पूरा बहुमत हासिल हुआ, इस कारण उसे यहां सरकार बनाने की जल्दी नहीं है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के चुनाव से अहम भाजपा के लिये मणिपुर और गोवा के मुख्यमंत्री का चुनाव हो गया है. गोवा में मनोहर पार्रिकर को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है.

मैं 2 साल से गर्भधारण करने की कोशिश में हूं, लेकिन असफल हो रही हूं. क्या करूं.

सवाल

मुझे 3 साल पहले छाती की टीबी हुई थी. मैं 2 साल से गर्भधारण करने की कोशिश में हूं, लेकिन असफल हो रही हूं. बताएं, क्या करूं?

जवाब

आप को लैप्रोस्कोपी करानी पड़ सकती है. आप अपने डी एवं सी नमूने को टीबी के आकलन के लिए भेज दें. उस के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. इस की विस्तृत जांच जरूरी है.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मेरे अपने प्रेमी के साथ शारीरिक संबंध थे. मुझे लग रहा है कि यौन रोग का शिकार न हो जाऊं. क्या करूं.

सवाल

मेरी उम्र 24 साल है. मैं एक कंसलटैंसी में काम करती हूं. अपने प्रेमी के साथ शारीरिक संबंध थे. हालांकि हम सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते रहे. लेकिन फिर भी मुझे लग रहा है कि कहीं किसी यौन रोग का शिकार न हो जाऊं, बताएं, क्या करूं?

जवाब

आप किसी अच्छे गाइनेकोलौजिस्ट के पास जाएं और अपनी जांच करवाएं. आप का गर्भावस्था परीक्षण भी किया जा सकता है. साथ ही, भविष्य के लिए आप को सलाह है कि खुद को किसी ऐसी गतिविधि में फिर से शामिल न करें.

 

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पाक सेना से जुड़ना चाहता है यह कैरेबियाई क्रिकेटर

वेस्टइंडीज के बल्लेबाज मार्लोन सैमुअल्स ने पाकिस्तान आर्मी से जुड़ने की इच्छा अभिव्यक्त की है. दरअसल पिछले सप्‍ताह सैमुअल्‍स पाकिस्‍तान सुपर लीग (पीएसएल) का फाइलन मैच खेलने के लिए लाहौर गए थे. 2017 पाकिस्तान सुपर लीग (पीएसएल) का फाइनल लाहौर में खेलने वाले 36 वर्षीय सैमुअल्स ने दावे के साथ कहा कि पाकिस्तान उनके दिल में बस गया है.

वह इस लीग में पेशावर जाल्‍मी की तरफ से खेलते हैं. इस बार इसी टीम ने पीएसएल का खिताब जीता है. उसके बाद उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर खासा चर्चित हो रहा है. उस वीडियो में मर्लोन सैमुअल्‍स पाकिस्‍तानी सेना के सुरक्षा इंतजामों की तारीफों के पुल बांधते नजर आ रहे हैं. इससे खुश सैमुअल्‍स ने खुद पाकिस्‍तानी सेना में शामिल होने की इच्‍छा जताई है.

जमैकाई खिलाड़ी की पीएसएल फ्रैंचाइजी पेशावर जल्मी के मालिक जावेद अफरीदी ने ट्विटर पर एक वीडियो रिलीज किया है. सैमुअल्स ने कहा, 'मेरे लिए पाकिस्तान आना क्रिकेट मैच खेलने से ज्यादा महत्वपूर्ण रहा. इसमें खेल की भावना तथा टीम की सफलता देखने को मिली. इसके साथ ही उदास चेहरों पर मुस्कान देखना काफी शानदार अनुभव रहा. मैं दिल से पाकिस्तानी हूं और इसलिए पाकिस्तान (पीएसएल फाइनल) आने के लिए मुझे सोचने पर मजबूर नहीं होना पड़ा.'

दरअसल लाहौर में पीएसएल फाइनल के बाद पाक आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा सैमुअल्‍स की विजेता टीम से मिले थे. उनसे मुलाकात के बाद सैमुअल्‍स ने यह प्रतिक्रिया दी.

सिर्फ इतना ही नहीं सैमुअल्‍स ने अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) से पाकिस्‍तान में फिर से अंतरराष्‍ट्रीय मैचों को खेले जाने की संभावनाओं को तलाशने का आग्रह भी किया है. दरअसल 2009 में पाकिस्‍तान में श्रीलंकाई टीम पर आंतकी हमले की घटना के बाद से विदेशी टीमों ने पाकिस्‍तान नहीं जाने का फैसला किया है. इसके चलते पाकिस्‍तान में अंतरराष्‍ट्रीय मैच आयोजित नहीं हो पा रहे हैं.

सैमुअल्‍स ने आईसीसी से गुजारिश करते हुए कहा, ''आपको पाकिस्‍तान में फिर से क्रिकेट खेलने की दशाओं को देखने की जरूरत है क्‍योंकि यहां अनगिनत क्रिकेट प्रशंसक अपने सामने क्रिकेटरों को खेलते हुए देखना चाहते हैं. क्रिकेट निश्चित रूप से पाकिस्‍तान में लौटना चाहिए और मैं मरते दम तक इसको प्रमोट करता रहूंगा.''

पीएसएल फाइनल के दौरान पाकिस्‍तानी सेना के पुख्‍ता सुरक्षा इंतजामों की सराहना करते हुए सैमुअल्‍स ने कहा, ''मैं इस अवसर पर पाकिस्‍तानी सेना का आभार प्रकट करना चाहता हूं कि जिस तरह से उन्‍होंने सुरक्षा उपाय किए. ये उपाय टॉप क्‍लास के थे और हम इससे बेहतर सुरक्षा की कल्‍पना नहीं कर सकते.''

बता दें कि लाहौर में 2017 पीएसएल फाइनल के दौरान सैमुअल्स दिग्गज विदेशी खिलाड़ियों में से एक थे. दाएं हाथ के बल्लेबाज ने 17 गेंदों में 19 रन की पारी खेली, जिसमें उनकी टीम जल्मी ने कुएत्ता ग्लैडिएटर्स को 58 रन से हराया. कप्तान डैरेन सैमी ने फैंस की जोरदार चीयर के बीच ट्रॉफी उठाई.

सैमुअल्स ने क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में वेस्टइंडीज के लिए 300 से अधिक मैच खेले हैं. जमैकाई खिलाड़ी ने टीम में अपनी जगह तब गंवाई जब इंग्लैंड ने हाल ही में तीन मैचों की वन-डे सीरीज के लिए वेस्टइंडीज का दौरा किया. अपनी जगह गंवाने से नाराज सैमुअल्स ने वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड (डब्लूआईसीबी) को डर्बीशायर के साथ कोलपाक करार करने की धमकी दी. हालांकि, काउंटी ने कहा कि हाल ही की गतिविधियों को देखते हुए वह कैरीबियाई क्रिकेटर की सेवाएं लेने में रुचिकर नहीं है.

अभिनेत्री ने फिल्म में दिए ऐसे सीन कि अब मां-बाप से आ रही है शर्म

2015 में आई हॉलीवुड फिल्म फिफ्टी शेड्स ऑफ को जबरदस्त इंटीमेट सीन्स के चलते दुनिया भर में शोहरत मिली थी. अब इस फिल्म का दूसरा सीक्वल यानी फिफ्टी शेड्स डार्कर आ चुका है. वहीं इसी दौरान इस फिल्म की लीड अभिनेत्री डेकोटा जॉनसन ने अपने किरदार को लेकर बड़ा खुलासा किया है.

डेकोटा ने इस फिल्म में अभिनेता जेमी डोर्नन के साथ कई इरॉटिक सीन्स दिए हैं. जिनके चलते जहां एक तरफ काफी कॉन्ट्रोवर्सी हुई है वहीं दूसरी तरफ फिल्म को दुनिया भर में शोहरत भी मिली है. वहीं अभिनेत्री डेकोटा ने अपनी फिल्म में इतने बोल्ड सीन कर ‌दिए कि अब वो अपने मां-बाप को फिल्म दिखाने में भी शर्मा रही हैं.

इस फिल्म में जबरदस्त इंटीमेट सीन होने के चलते ये फिल्म भारत में बैन हो चुकी है. वहीं इसकी चर्चाएं भारत में भी कम नहीं हैं. दूसरी तरफ इस फिल्म में इंटीमेट सीन्स देने के बाद लीड अभिनेत्री अपने पेरेंट्स से शर्मा रही हैं. डेकोटो ने फिल्म करने से पहले अपने माता-पिता से करार किया था. करार में डेकोटा ने उन्हें फिफ्टी शेड्स सीरीज की फिल्में देखने से मना किया था. जाहिर है डेकोटा जानती हैं कि इस फिल्म में इरोटिक सीन्स उनके पेरेंट्स को पसंद नहीं आएंगे. जिसके चलते पहले ही करार कर लिया था.

ध्यान देने वाली बात ये है कि डेकोटा के माता-पिता मेलानी ग्रीफिथ और डॉन जॉनसन भी फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं. इसका सीधा मतलब है कि वे इंडस्ट्री के सारी बारीकियां समझते होंगे. फिर भी डेकोटा ने उनसे अपनी फिल्में नहीं देखने के लिए करार किया है.

अभिनेत्री डेकोटा ने एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा कि मुझे मालूम है कि इस फिल्म के इरोटिक सीन्स देखना पेरेंट्स के लिए मुश्किल है. इसलिए मैंने उनसे ये वादा ले लिया और वे इस वादे को बखूबी निभा रहे हैं. डेकोटा ने बताया कि फिफ्टी शेड्स डार्कर पहले पार्ट से भी ज्यादा इरोटिक है. इसके सीक्वल को जेम्स फॉली ने डायरेक्ट किया है और फिल्म में डेकोटा के साथ जैमी डॉर्नन लीड रोल में हैं.

फिल्म में बोल्ड और एरोटिक कंटेंट होने की वजह से यह फिल्म भारत में बैन हो गई थी. डकोटा जॉनसन और जेमी डोरनान स्टार यह फिल्म BDSM की थीम पर आधारित थी. जिसे भारत में आपत्तिजनक माना था और इस पर प्रतिबंध लगा दिया था

50 शेड्स ऑफ ग्रे साल 2015 में आई थी. इस फिल्म का दूसरा भाग 'फिफ्टी शेड्स डार्कर' जो कि 2 फरवरी 2017 को रिलीज हो गया है. 268 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में 3837 करोड़ रुपए की कमाई की थी.

इस फिल्म के पूरा होने पर डकोटा ने बड़ा बयान दिया था. डकोटा ने एक मैग्जीन के लिए फोटोशूट के दौरान इंटरव्यू में कहा था कि वे सेक्स सीन्स से भरपूर फिल्म से आगे कुछ करना चा‍हती हैं. इस फिल्म और इसके सीक्वल दोनों में कई सेक्स सीन्स थे, जिसके चलते ये फिल्म चर्चाओं में रही. ये फिल्म बीडीएसएम थीम पर आधारित थी. फिल्म में इस तरह के कंटेंट पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और फिल्म को भारत में रिलीज होने से रोक दिया था.

खैर आप देखें इस बोल्ड फिल्म का ट्रेलर.

प्रधानमंत्री ने दिया जनता को गच्चा

कालाधन, नकली नोट के खात्मे और आतंकियों की नाक में नकेल कसने के नाम पर नोटबंदी हुई. मोदी सरकार का यह कदम बहुतकुछ गले के टौंसिल का औपरेशन करते हुए गला ही काट दिए जाने सरीखा साबित हुआ. अगर पारंपरिक कहावत की बात करें तो हवन करते हुए हाथ जला लिया नरेंद्र मोदी ने, ऐसा कहा जा सकता है. नोटबंदी नरेंद्र मोदी का फ्लौप शो साबित हो गया है. एक हद तक आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने संसद में वित्तीय मामलों की स्थायी समिति के आगे पूरी पोलपट्टी यह कह कर खोल कर रख दी कि केंद्र्र सरकार ने नोटबंदी के फैसले की सूचना आरबीआई बोर्ड को 7 नवंबर यानी घोषणा से महज एक दिन पहले दी थी. स्थायी समिति में आरबीआई गवर्नर की पेशी के बाद पुख्ता तौर पर साफ हो गया कि नोटबंदी का फैसला अकेले नरेंद्र मोदी का था.  

नरेंद्र मोदी के इस खामखयाली फैसले से केवल मोदी का हाथ नहीं जला, बल्कि पूरा देश इस की तपिश झेल रहा है और न जाने कब तक झेलना पड़ेगा. अर्थशास्त्रियों के कयास तो अगले 5 से 10 साल के लिए हैं. अगर ये कयास सही हैं तो हमारा देश पिछले 10 सालों में अगर एक कदम आगे बढ़ा है तो नोटबंदी के फैसले के बाद महज 3 महीने में 2 कदम पीछे हो गया है. अपने नाम का श्रेय लेने के भूखे नरेंद्र मोदी के लिए एक हद तक बदनाम हुए पर नाम तो हुआ जैसा भले हो, लेकिन उन की पार्टी और उस से भी अधिक देश की अर्थव्यवस्था व देश में हर तबके की जनता के लिए मोदी का यह फैसला बहुत पीड़ादायक रहा. देश तो क्या, देश का हर घर, हर शख्स अर्थव्यवस्था की पटरी पर वापस लौटने की अनिश्चितता के अंधकूप में समा गया है.

मद में मदहोश मोदी

2014 में मोदी की पार्टी ने मतदाताओं को ऐसेऐसे सब्जबाग दिखाए कि जनता भरमा गई. उसे लगा कि एक मौका ‘गुजरात के हीरो’ को देने में क्या हर्ज है.  सफलता की मदहोशी बड़ी जालिम चीज है. आगापीछा सोचने की काबिलीयत तक छीन लेती है. लोकसभा चुनाव से ले कर मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन के प्रचारतंत्र ने विदेशों में बसे कट्टर हिंदू समर्थकों के सहारे दुनियाभर में मोदी की वाहवाही को कुछ इस तरह परोसा कि खुद मोदी भी अपनी वाहवाही से मदहोश हो गए. एक हद तक सोच यह भी कि अगर नोटबंदी का आइडिया सफल हो जाता है तो वे वाकई राजनीति के अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में सब से बड़े ‘हीरो’ बन जाएंगे.

ऐसे पलटा प्रधानमंत्री का पासा

प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर, 2016 को देश की जनता से 50 दिनों का समय मांगा था. लेकिन यह अवधि पूरी होने से पहले ही साफ हो गया कि नोटबंदी से पहले देशभर में जो करैंसी बाजार में प्रचलन में थी, वह 50 दिनों से पहले ही 85 प्रतिशत  बैंकों में जमा हो गई. साफ होने लगा कि कालाधन इतना नहीं था जितने का अनुमान लगाया गया था. नकली नोटों के पकड़े जाने की बात है तो महायज्ञ से नकली नोटों की इतनी बड़ी राशि निकल कर नहीं आई, जितनी अनुमान की जा रही थी. आरबीआई को भी सफाई देनी पड़ी कि नोटबदली अभियान के बाद भी जमा हुए नोटों में नकली नोटों की संख्या का आंकड़ा उस के पास उपलब्ध नहीं है. इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिए मुंबई में एक आरटीआई दाखिल की गई थी. सर्वव्यापी, भविष्यवक्ता प्रधानमंत्री का यह दावा कि नोटबंदी से नकली नोट समाप्त हो जाएंगे, नुक्कड़ के बाबा के वचन कि यह शुक्रवार लक्ष्मी लाएगा जैसा साबित हुआ.

सरकार ने दावा किया था कि नए नोटों की डिजाइन की नकल तैयार करना नामुमकिन है, जबकि एक हफ्ते के अंदर ही 2 हजार रुपए के नकली नोट सामने आ गए.

अर्थव्यवस्था में कालाधन

कालाधन पूंजी नामक सिक्के का भले ही एक अनैतिक व नकारात्मक पहलू भी हो पर अर्थव्यवस्था में इस की भूमिका को कम कर के नहीं आंका जा सकता. कालाधन कई रास्तों में तैयार होता है. एक, टैक्स चोरी कर के जमा किया जाता है. दो, रिश्वत ले कर तैयार किया गया है. तीन, नकली नोट के रूप में. इसीलिए यह काला कहलाता है. वैसे व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो कालाधन के नकारात्मक व अनैतिक पहलुओं को अलग कर दिया जाए तो यह वही सब करता है जो दूसरे तरह का धन यानी सफेदधन करता है. बाजार में जब यह कालापैसा, सफेदपैसे के साथ दौड़ता है तब इस का कोई रंग नजर नहीं आता.  अर्थव्यवस्था में इस की बड़ी भूमिका होती है. संगठित और असंगठित दोनों ही क्षेत्रों में यह रोजगार भी देता है. इसलिए कालेधन के खिलाफ कोई भी कदम सावधानी से उठाया जाना चाहिए.

हर अर्थव्यवस्था में एक अनौपचारिक सैक्टर भी होता है. इस सैक्टर को जिंदा रखने में कालेधन की प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों तरह से बड़ी भूमिका होती है. यह सैक्टर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, बुनकरों, मोची, कुम्हार, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी वालों, रद्दी वालों से ले कर कुटीर उद्योग में काम करने वालों का है. इन के लिए रोजगार का सृजन नहीं करने में सरकार सक्षम नहीं होती है. यह सैक्टर इन लोगों के घरपरिवार को पालता है. अर्थशास्त्र की भाषा में इन के श्रम को ‘अंडरप्राइसिंग’ श्रम भी कहा जाता है. इस के बल पर भरपेट न सही, आधापेट खाने का जुगाड़ हो ही जाता है. नोटबंदी से समाज के इस स्तर पर सब से बड़ा आघात लगा है.  नोटबंदी से देशभर के थोक बाजारों में ट्रकों-लौरियों से सामान चढ़ानेउतारने, वजन करने, गोदाम में माल पहुंचाने जैसे बहुत सारे कामों में लगे मजदूरों व उन के परिवारों के सदस्यों के पेट पर लात पड़ी. गौरतलब है कि ऐसे थोक बाजार का तमाम काम नकदी से होता है. यहां रुपए का कोई रंग नहीं देखता. नोटबंदी के दौरान लाखों मजदूरों ने कम मजदूरी में एक दिन पुराने नोटों में दिहाड़ी को स्वीकार किया, तो अगला पूरा दिन पुराने नोट की बदली के लिए कतार में लगाया यानी उन्हें 2 दिन काम करने पर एक दिन का पैसा मिला.

सहकारी बैंकों की करतूत

कालाधन खत्म होने का जो दावा मोदी ने किया था वह धरा रह गया. इस काम में सहकारी बैंकों की भूमिका का खुलासा आयकर विभाग ने किया. यह खुलासा एक आरटीआई से हुआ. आयकर विभाग ने अपने खुलासे में बताया कि पुणे के इस बैंक में पहले से ही 141 करोड़ रुपए मौजूद थे. लेकिन रिजर्व बैंक को दिए गए ब्योरे में इस सहकारी बैंक ने 242 करोड़ रुपए दिखाए. जाहिर है अतिरिक्त 101.07 करोड़ रुपए बैंक में पुराने नोटों के जमा हुए. और तो और, भाजपा सांसद डा. प्रीतम मुंडे, जो सहकारी बैंक (वै-नाथ सहकारी नागरी बैंक) की निदेशक हैं, पर भी कालेधन को सफेद करने का मामला सामने आया. मुंबई के इस सहकारी बैंक की शुरुआत गोपीनाथ मुंडे ने की थी, अब इस बैंक की महाराष्ट्र में लगभग 10 शाखाएं हैं. बैंक के खिलाफ सीबीआई ने 10.10 करोड़ रुपए की बरामदगी का मामला दर्ज किया है. बैंक की मुंबई समेत पुणे, औरंगाबाद, बीड़ की शाखाओं से बड़े पैमाने पर कालाधन सफेद किया गया है.

कुछ डाक्टरों का भी नाम सामने आया है. उंगली डा. प्रीतम मुंडे और पंकजा मुंडे पर भी उठी कि उन्होंने अपने राजनीतिक रुतबे और बैंक में निदेशक पद पर होने का दुरुपयोग कर इस काम को अंजाम दिया है. हालांकि, प्रीतम मुंडे ने ऐसी किसी बात से इनकार किया है. 30 दिसंबर को नोटबदली का आखिरी दिन था. 31 दिसंबर को देशभर के बैंकों को जमा हुए तमाम पुराने नोटों को रिजर्व बैंक के करैंसी चैस्ट में पहुंचाने का निर्देश रिजर्व बैंक ने दिया था. निर्देश में साफ कर दिया गया था कि 31 दिसंबर को तमाम बैंकों के क्लोजिंग बैलेंस में पुराने नोटों को शामिल नहीं किया जा सकेगा. पर सहकारी बैंकों द्वारा गलत तथ्य दिए जाने में ही कालेधन को सफेद करने का मामला सामने आया. गौरतलब है कि 14 नवंबर को सहकारी बैंकों को नोटबदली की प्रक्रिया बंद करने का निर्देश जारी हुआ. रिजर्व बैंक को आशंका थी कि देश के सहकारी बैंक कालेधन को सफेद करने में लगे हैं.

समानांतर अर्थव्यवस्था

अब जहां तक असंगठित पूंजी का सवाल है तो राजनीतिक चिंतक गौतम दास का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मूलतया 4 तरह की पूंजी पर निर्भर है. एक, क्रोनी कैपिटल, दो, कंप्रैडोर कैपिटल यानी दलाल पूंजी, तीन, विदेशी कैपिटल और चार, असंगठित पूंजी. नोटबंदी से हर तरह की पूंजी प्रभावित हुई. पर उपरोक्त 3 तरह की पूंजी के लिए यह सामयिक झटका है. इस का सब से बड़ा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ा.  कहते हैं नरेंद्र मोदी सरकार अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और कालेधन के बीच फर्क करने व इस के विस्तार का अंदाजा लगाने में नाकाम रही. मोदी ने अपने मिलने वालों की ही सलाह ली. यह सच है कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था में एक समानांतर व्यवस्था है, जो आर्थिक कानून, बैंकिंग और करव्यवस्था को अंगूठा दिखा निरंतर चलती रहती है.

जानकारों का मानना है कि यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पूरी की पूरी काली नहीं है. बताया जाता है कि इस का महज 20 प्रतिशत यानी लगभग 10.4 करोड़ रुपए की राशि काली है. यह तो एक मिसाल है. पर यह भी एक तथ्य है कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था से असंगठित पूंजी निकल कर बाहर हो गई. अब इस की भरपाई में सालोंसाल लग जाएंगे. यह सही है कि सरकार के खजाने में वृद्धि के लिए आय में बढ़ोतरी जरूरी है. इस के लिए सरकार टैक्स जमा करने के कदम उठाएगी ही. लेकिन यह करने के लिए अर्थव्यवस्था को सामयिक तौर पर ही सही, चोट पहुंचाए जाने या रोजगार के अवसर को संकुचित करने को किसी भी तरह से जायज नहीं ठहाराया जा सकता.

विश्व पूंजी के हवाले भारत

नरेंद्र मोदी का उद्देश्य क्या वाकई कालेधन और नकली नोट के खात्मे के साथ आतंकियों की नाक में नकेल कसना था? ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है, भोलीभाली जनता के एक तबके को ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार का यह फैसला एक बहुत बड़ी गलती है. लेकिन ऐसा है नहीं. उधर, राजनीतिक चिंतक गौतम दास नोटबंदी के इस पूरे प्रकरण को एक अलग ही नजरिए से देखते हैं. उन का मानना है कि नोटबंदी तो एक बहाना मात्र था. दरअसल, देश को विश्व पूंजी के हवाले कर देना था. वे कहते हैं, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी की जब घोषणा की, वह दिन 8 नवंबर का था और रात 12 बजे से भारतीय अर्थव्यवस्था में अब तक प्रचलित 500 और 1,000 रुपए के नोटों पर रोक लग गई. उधर रात 12 बजे तक अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान भी खत्म हो चुका था. अगले दिन चुनाव नतीजा आना था. इस से पहले ही बड़ी ही धूर्तता के साथ देश की स्वायत्त अर्थव्यवस्था को विश्व पूंजी को सौंप दिया गया. इस के बाद हमारा देश गुलामी के दूसरे चरण में लौट जाएगा. यह गुलामी आर्थिक गुलामी होगी.’’

वे कहते हैं कि देशभर से बड़े नोटों को वापस ले कर नए नोट जारी करने का मकसद नकदी लेनदेन को कम से कम करना ही था. नया नोट भी एक बहाना था. अब तक देश के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, हौकर, कारीगर, रेहड़ी लगाने वाला तबका बैंकिंग व्यवस्था से बाहर ही था. ऐसा इसलिए क्योंकि इन का कामधंधा नकद में ही चलता है. नोटबंदी के बाद कैशलैस व्यवस्था के तहत इन सब को बैंकिंग व्यवस्था में लाना मोदी का उद्देश्य है.इस के अलावा मुसलिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बैंकिंग व्यवस्था से इसलिए दूर रहता है क्योंकि इस धर्म में सूद यानी ब्याज को हराम माना जाता है. अब कैशलैस व्यवस्था के जरिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई कि इस समुदाय को भी बैंकिंग व्यव स्था के तहत आना ही पड़ेगा.  गौतम दास अपना मत व्यक्त करते हैं कि खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी निवेश की कोशिश पिछली सरकार ने भी की थी. वामपंथी पार्टियों के साथ देशभर के खुदरा कारोबारियों ने लामबंद हो कर इस का कड़ा विरध किया था. आखिरकार सरकार को पीछे हटना पड़ा था. लेकिन, गौर करें कि औनलाइन खरीदबिक्री को पिछले ढाई सालों में मोदी सरकार ने कांग्रेस की तुलना में खूब बढ़ावा दिया. इस से ईकौमर्स कारोबार का खूब विस्तार हुआ. बहुराष्ट्रीय कंपनियां सीधे तौर पर न सही, ईकौमर्स के जरिए देश के खुदरा व्यवसाय में प्रवेश कर गईं और इस की खबर विदेशी पूंजी निवेश का विरोध करने वालों को नहीं हुई.

नोटबंदी के बाद तो औनलाइन शौपिंग कंपनियों ने खूब चांदी काटी. इस दौरान इन कंपनियों की जड़ें पुख्ता तौर पर जम गई हैं. इसी के साथ ही पेटीएम से ले कर बहुत सारी ईवौलेट कंपनियों को भी कारोबार का बढि़या मौका मिल गया और ये कंपनियां दिनोंदिन फलफूल रही हैं. इन ईवौलेट और औनलाइन शौपिंग कंपनियों के प्रोफाइल को खंगाला जाए तो पता चलेगा कि इन में कितना विदेशी पूंजी निवेश है.

ऐसे पिटा मोदी का आकलन

नोटबंदी से पहले नरेंद्र मोदी ने जो कुछ आंकलन किया था, वह सब धरा का धरा रह गया. लंदन की पत्रिका ‘द इकोनौमिस्ट’ से ले कर ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच ने भी इस पूरी कवायद के बारे में कहा कि मुद्रा सुधार को सही तरीके से लागू करने में भारत सरकार फेल साबित हुई. वहीं, ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच ने तो भारत की रेटिंग कम कर दी है. जीडीपी वृद्धि की दर को 7.4 से घटा कर 6.3 कर दिया है. अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार फर्म डेलोइट का भी कहना है कि नोटबंदी से भारत के कृषि और अनौपचारिक क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है जो अगली कई तिमाही तक जारी रहेगा. नोबेल सम्मानप्राप्त अमर्त्य सेन, विश्व बैंक के सलाहकार कौशिक बसु, पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री व वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी  भी नोटबंदी को ले कर प्रतिकूल प्रतिक्रिया जता चुके हैं. यहां तक कि मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली को भी कहना पड़ा कि नोटबंदी का तो दूरगामी नतीजा ही अच्छा होगा. इस से पहले वे नोटबंदी के बाद अतिरिक्त कर तुरंत पाने का दम भर रहे थे. बड़े, मंझोले व लघु हर तरह के कारोबार नुकसान झेल रहे हैं. तमाम सरकारी दावों का परदाफाश हो चुका है. वैसे, प्रधानमंत्री को भी इस का एहसास नोटबंदी के तुरंत बाद ही हो गया था. तभी उन्होंने कालाधन को सफेद बनाने का एक और मौका यह कह कर दिया कि अगर कोई शख्स अब भी अपने कालेधन की घोषणा करता है तो कर, जुर्माना और सरचार्ज के बाद 50 प्रतिशत उस कालेधन का उपयोग सरकार गरीबों के कल्याण में करेगी.

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 9 लाख रुपए से ले कर 12 लाख रुपए तक के होमलोन में 3-4 प्रतिशत तक ब्याज में छूट, रबी की फसल के लिए सहकारी बैंक व सहकारी समिति से लिए गए कर्ज पर 60 दिनों का ब्याज माफ और छोटे कारोबारियों की कर्जसीमा 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत करने की घोषणा, गर्भवती महिलाओं को भत्ता, वरिष्ठ नागरिकों के लिए 7.5 लाख रुपए को 10 सालों के लिए जमा किए जाने पर 8 प्रतिशत का ब्याज तक-जैसे डोरे डालने का प्रयास किया प्रधानमंत्री ने. इन तमाम घोषणाओं से साफ हो गया कि नोटबंदी के पिछले 50 दिनों में 56 इंज की छाती कहींनकहीं सिकुड़ जरूर गई है. नोटबंदी की असफलता को आखिर कब तक छिपाया जा सकता था. 5 राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले नोटबंदी का जोखिम उठाया था नरेंद्र मोदी ने. उन का आकलन था कि इस से भ्रष्टाचार के खिलाफ उन की लड़ाई एक मिसाल बन जाएगी और देश में मोदी सुशासन का परचम लहराएगा. इस का लाभ 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिलेगा.

नोटबंदी का प्रतिकूल असर देश की जनता के जेहन में 2019 को होने वाले लोकसभा चुनाव तक जरूर रहेगा. प्रधानमंत्री के खामखयाली फैसले ने न केवल देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाया है, बल्कि आम जनता की कमर को तोड़ भी दिया है. फिर भी इन  50 दिनों तक दुखपीड़ातकलीफ के बावजूद जनता उम्मीद की आस लगाए रही. पर फिर सच सामने आने लगा.  रोज कुआं खोद पानी पीने वाली जनता की उम्मीद नदी के तटकटाव की तरह हर रोज थोड़ाथोड़ा कर के टूटने लगी है. नए 2 हजार रुपए के नोट में मंगलयान की तसवीर छाप कर यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि तकनीकी रूप से हमारा देश कितना विकसित है. जबकि बैंकों के एटीएम से ले कर ईरिक्शा तक के कलपुरजे चीन से आयात किए जाते हैं. मेक इन इंडिया के नाम पर चीन के भरोसे हम ख्वाब सजा रहे हैं. जाहिर है नरेंद्र मोदी का यह नया नोट गरीब जनता को मुंह चिढ़ाता है. शौचालय- विहीन व बिजलीविहीन गांवों में जब नकदविहीन समाज और प्लास्टिक मुद्रा की बात पहुंचती है तो ऊपर से नीचे तक पूरे शरीर में आग लग जाना लाजिमी है. साफ है कि नोटबंदी के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत में ही खोट था. नोटबंदी के बहाने देश की जनता को वे आर्थिक गुलामी की बेडि़यां पहनाने का जुगाड़ बिठा रहे थे. एक तरह से यह उस भारतीय आदेश को मानना था कि गरीब के पास धन न रहे.

अपने मकसद में वे किस हद तक कामयाब रहे, इस समय यह एक अलग सवाल है. और इस का जवाब आने वाला समय ही दे पाएगा. लेकिन प्रधानमंत्री ने देश की जनता को बड़ा गच्चा दिया है. उस का हिसाब जनता क्या लेगी? हमारा इतिहास तो यह रहा है कि हम ने देशीविदेशी क्रूर और सनकी राजाओं की उन के मरने के बाद भी पूजा की है. गांवों तक में क्रूर जमींदारों, महाजनों, पंडों के अनैतिक जुल्म को पिछले जन्मों का फल मान कर सहा है. राजा या राक्षस के विरोध में खड़ा होना तो हम ने सीखा ही नहीं है. शायद मोदी उसी तरह अत्याचार करने के बाद राज करने में सफल हो जाएं जैसे इंदिरा गांधी 1981 में आपातस्थिति का कीचड़ लगने के बावजूद सत्ता में आ सकी थीं.  

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