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विकृत मानसिकता का उदयन

हाल ही में बांकुड़ा की आकांक्षा शर्मा और भोपाल के उदयन दास के नाम सुर्खियों में आए हैं. उदयन ने अपनी प्रेमिका आकांक्षा शर्मा की हत्या से 4 साल पहले अपने मातापिता की भी दरिंदगी से हत्या कर उन्हें बगीचे में दफना दिया था. रोंगटे खड़े कर देने वाले इस हत्याकांड में उदयन दास गिरफ्तारी के बाद रोज नए खुलासे करता रहा.इस मामले ने दरिंदगी, झूठफरेब की हर सीमा को लांघ लिया है. पुलिस उदयन को साइकोपैथ किलर मान कर चल रही है और इस शातिर हत्यारे को उस के वकील पागल करार देने की जुगाड़ में हैं.  भोपाल और बंगाल पुलिस की हिरासत में जिरह के दौरान इस हत्याकांड की जितनी बातें सामने आई हैं वे रोंगटे खड़ी कर देने वाली है. हाल के समय में इसे सब से नृशंस किस्म का हत्याकांड माना जा रहा है, संभवतया निर्भया कांड के बाद. बांकुड़ा के थाने में उदयन के खिलाफ आकांक्षा के पिता शिवेंद्र शर्मा ने दिसंबर में आकांक्षा के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी. उस के बाद मामले की एकएक परत खुलने लगी और 3 हत्याकांडों का खुलासा हुआ.

पुलिस का मानना है कि उदयन साइकोपैथ किलर यानी एक विकृत दिमाग का हत्यारा है. हताशा उस के भीतर घर कर गई है. बंगाल पुलिस का मानना है कि संभवतया मातापिता की हत्या के बाद उदयन ट्रौमा का भी शिकार हो गया. इसी कारण वह मानसिक रूप से संतुलित नहीं है. अकेले रहने से भी वह डरता था. गाड़ी चलाते हुए भी अगर उस के साथवाली सीट पर कोई नहीं हो तो एक टेडीबेयर को वह जरूर बिठाता, सीट बैल्ट के साथ. यही नहीं, साकेतनगर फ्लैट में विरला ही वह अकेला रहता. वह अवसाद से घिरा हुआ है. आकांक्षा हत्याकांड की पूरी कहानी है क्या. आइए, जानते हैं.

सोशल मीडिया जी का जंजाल

2007 में यानी 10 साल पहले सोशल नैटवर्किंग साइट और्कुट के जरिए उदयन और आकांक्षा का परिचय हुआ था. तब उदयन ने खुद को दिल्ली आईआईटी का ग्रेजुएट बताया था. दरअसल, वह भोपाल के स्कूल से महज 12वीं पास था. लेकिन आकांक्षा जयपुर में इलैक्ट्रौनिक की स्टूडैंट थी. एक साल बाद 2008 में उन का परिचय दोस्ती में बदला. दोनों की पहली मुलाकात जयपुर में हुई. आकांक्षा उदयन से मिलने अपने तत्कालीन प्रेमी को साथ ले कर आई थी. तब से दोनों एकदूसरे के साथ संपर्क में थे. इस के बाद 2014 में हावड़ा में आकांक्षा और उदयन मिले. हावड़ा में एक लौज में दोनों ने रात बिताई.

जनवरी 2015 में आकांक्षा दिल्ली गई. वहां उस ने एक किराए का फ्लैट लिया. इस फ्लैट में उदयन भी अकसर 3-4 दिनों के लिए आ कर रुकता. आकांक्षा भी उदयन के साथ रहने दिल्ली से देहरादून चली जाती थी. ये तमाम जानकारियां पश्चिम बंगाल पुलिस को उदयन से जिरह के तहत हासिल हुई हैं. लेकिन इन बातों की पुष्टि के लिए आकांक्षा अब जिंदा नहीं है.

लिव इन रिलेशन

बहरहाल, 2016 में आकांक्षा भोपाल में उदयन के साथ लिवइन में रहने लगती है. हालांकि उदयन का दावा है कि लिवइन रिलेशन से पहले भी आकांक्षा उदयन से मिलने भोपाल आया करती थी. पर जून से दोनों लिवइन रिलेशन में थे. उदयन ने बंगाल पुलिस को बताया कि महज 17 दिनों के बाद जुलाई महीने में आकांक्षा के साथ संबंध में गड़बड़ी तब शुरू हुई जब उस ने आकांक्षा के फोन पर उस के पूर्व प्रेमी का टैक्स्ट मैसेज देखा. दोनों के बीच जम कर झगड़ा शुरू हुआ और यह अकसर होने लगा. जुलाई में ही एक दिन चिकचिक के दौरान उदयन ने आकांक्षा का गला दबा कर उसे मार डाला. इस के बाद मृत आकांक्षा का गला रेत कर उस ने लाश को 5 फुट बाई 3 फुट के एक ट्रंक में भर कर किचन में ही रखा. इस के बाद लाश को कंक्रीट में तबदील करने के इरादे से आकांक्षा की लाश के साथ सीमेंट डाल कर दफनाया था. इस कारण लाश निकालने के लिए पुलिस को 3-3 ड्रिल की मदद लेनी पड़ी. 7-8 घंटे की बड़ी मशक्कत के बाद आकांक्षा के देहावशेष को सीमेंट से अलग किया जा सका.

अब जहां तक उदयन की कमाई का सवाल है तो जिरह में उस ने बताया कि उस के मातापिता का एक फ्लैट था दिल्ली की डिफैंस कालोनी में. इस फ्लैट से 10 हजार रुपए हर महीना किराया मिलता था. इस के अलावा रायपुर में भी एक फ्लैट से हर महीने 7 हजार रुपए और भोपाल में एक फ्लैट से 5 हजार रुपए किराया मिलता था. पिता के 8 लाख रुपए फिक्स्ड डिपौजिट से भी ब्याज मिलता था. साथ में, अपने मृत मातापिता की पैंशन भी वह उठाता था.

बारबार बदलते बयान

हालांकि जिरह के दौरान वह बारबार अपना बयान बदलता रहा. उस के मातापिता भी लंबे समय से लापता थे. पर उस ने पहले पुलिस को बताया कि उस की मां इंद्राणी रायपुर की ही थीं और पिता हावड़ा के एक बंगाली परिवार से थे. उन की लवमैरिज थी. लेकिन उदयन का जन्म और पालनपोषण रायपुर और भोपाल में ही हुआ. उदयन ने पुलिस को बताया कि उस की मां इंद्राणी दास अमेरिका में हैं और वहीं से वे उसे पैसे भेजती हैं. जब उस से मां का फोन नंबर मांगा गया तो वह आनाकानी करने लगा. उस ने पुलिस को बताया कि उस के पिता डी के दास बीएचईएल यानी भेल में फोरमैन थे. रिटायर होने के बाद वे एक कारखाना चलाते थे. 2010 में दिल का दौरा पड़ने से उन का देहांत हो गया. जबकि सचाई यह थी कि 2010 में ही उस ने छत्तीसगढ़ के रायपुर के मकान में मातापिता दोनों की हत्या कर दी थी. अगले ही दिन उन की लाश को बगीचे में दफन कर दिया था. इस के बाद फर्जी पावर औफ अटौर्नी के बल पर उस मकान को उस ने बेच भी दिया.

कड़ी जिरह में उदयन ने हत्या की बात को कुबूल किया. इस के बाद उदयन को पुलिस छत्तीसगढ़ के रायपुर ले कर गई. बड़े ही निर्विकार भाव से पुलिस को उदयन ने बगीचे में मातापिता की लाशों के ठिकाने को दिखा दिया, जहां से उदयन के मातापिता के देहावशेष मिले हैं.

झूठ व फरेब का पिटारा

उदयन इंजीनियरिंग कालेज में भरती हुआ था पर फेल हो गया. उस ने घर पर किसी को यह नहीं बताया. पढ़ाई का खर्च लेता रहा. इसी तरह फर्जी इंजीनियरिंग के जब 5 साल बीत गए तो मातापिता ने उस पर नौकरी करने का दबाव बनाना शुरू किया. इस को ले कर लगभग हर रोज मातापिता से उस का झगड़ा होता. ऐसे ही झिकझिक के बीच पहले गला दबा कर मां इंद्राणी दास को मारा. उस समय पिता घर पर नहीं थे. वे मीट लेने बाजार गए हुए थे.जब कभी डी के दास कहीं बाहर से घर लौटते थे तो बगैर दूध की चाय जरूर पीते थे. उस दिन बाजार से घर लौटते ही उदयन ने बाहर के कमरे में पिता को नींद की दवा मिला कर चाय पीने के लिए दे दी, जिसे पी कर वे अचेत हो गए. तब बेहोशी में  ही पिता की गला दबा कर उस ने हत्या की. उस समय घर पर मरम्मती का काम भी चल रहा था. उदयन ने 500 रुपए दे कर राजमिस्त्री से कुदाल वगैरा मंगवाया. उसी रात उस ने बगीचे में गड्ढा खोदा और दोनों लाशों को दफना दिया.  

हत्या के बाद एक साल तक मां की पैंशन की रकम वह उठाता रहा. इस के लिए उस ने फर्जी ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ दिखाया था. लेकिन आगे चल कर पैंशनभोगियों के लिए नियम बदल गया और अब पैंशनभोगी को सशरीर हाजिर हो कर पैंशन उठाना अनिवार्य हो गया. जाहिर है तब पैंशन की रकम उठाना मुमकिन नहीं था. तब उस ने होशंगाबाद से मां का फर्जी डैथ सर्टिफिकेट बनवाया. पुलिस का मानना है कि चूंकि लंबे समय तक उदयन अपने नातेरिश्तेदारों के संपर्क में नहीं था, इसीलिए उस के मातापिता को ले कर किसी को कोई सिरदर्द भी नहीं हुआ. इस बीच, उस ने अपने नाम की पावर औफ अटौर्नी बनवा कर रायपुर वाला मकान बेचा और भोपाल चला आया.

उदयन के झूठ की भी फेहरिस्त बड़ी लंबी है. अपने कुछ परिचितों के बीच उस ने अपना परिचय आईएफएस यानी इंडियन फौरेन सर्विस के अधिकारी के रूप में दे रखा था. उस ने बताया था कि वह वाशिंगटन में बराक ओबामा से मिल चुका है. ट्रंप के साथ भी एक बार डिनर कर चुका है. पुलिस का कहना है कि जांच में उस के कम से कम 40 फेसबुक प्रोफाइल्स का पता चला है. उदयन वन रिखथोफेन मेहरा, निखिल अरोड़ा मुखर्जी, पुशकिन स्टैसजियुस्का और रायनासोल जैसे प्रोफाइलों का पता चला. वह फेसबुक में नएनए प्रोफाइल बना कर नएनए फ्लैट और नई गाडि़यों की तसवीरें पोस्ट किया करता था. इन फेसबुक अकाउंट में उस ने झूठ का एक साम्राज्य स्थापित कर रखा था. किसी फेसबुक में वह खुद को राष्ट्रसंघ का कर्मचारी बताता तो किसी में अमेरिकी विदेश विभाग का. यहां तक कि न्यूयौर्क विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में डौक्टरेट का भी झूठ उस ने परोसा था. जहां तक शिक्षा का सवाल है तो वह दिल्ली आईआईटी का ग्रेजुएट बताता रहा है. पुलिस का मानना है कि आकांक्षा उस के ऐसे ही किसी झांसे में आ गई थी. इतना ही नहीं, उस के साकेतनगर फ्लैट से कई देशों के झंडे भी पुलिस ने जब्त किए हैं. अकसर वह फोन पर लोगों से विदेश में होने की बात कहता था. और भी बहुतकुछ झूठ व प्रपंच का खुलासा हुआ है.

आकांक्षा का फरेब जानलेवा

अब बात करते हैं आकांक्षा के फरेब की. आकांक्षा के मातापिता पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा निवासी हैं. एक राष्ट्रीयकृत बैंक में चीफ मैनेजर आकांक्षा के पिता शिवेंद्र शर्मा बताते हैं कि जयपुर से इलैक्ट्रौनिक्स इंजीनियरिंग के बाद जून 2016 को आकांक्षा घर लौटी. यूनिसेफ का नियुक्तिपत्र दिखा कर आकांक्षा ने बताया कि नौकरी के लिए दिल्ली होते हुए अमेरिका जा रही है. लेकिन उस नियुक्तिपत्र में वेतन का कोई जिक्रन था. इस से उन को (बैंक मैनेजर पिता शिवेंद्र शर्मा को) खटका लगा. पूछने पर बेटी ने बताया, ‘अमेरिका जाने के बाद वेतन फिक्स होगा.’ सहज मन से उन्होंने मान लिया. जून में वह रवाना हुई. घर से निकलने के कुछ दिनों के बाद आकांक्षा ने फोन कर के बताया कि वह अमेरिका पहुंच गई हैं. जबकि सच तो यह था कि वह अमेरिका गई ही नहीं थी. हालांकि बीचबीच में व्हाट्सऐप पर ही मातापिता से बातें करती थी और जल्द ही अमेरिकी सिम मिलने पर फोन करने का वादा करती.

कई बातों से शर्मा परिवार की चिंता बढ़ी. मां शशिबाला ने आकांक्षा को मैसेज किया था कि वह अपना एक सैल्फी भेजे और फोन पर बात करे. जवाब आया कि अमेरिकी सिम अभी तक नहीं मिला है, मिलते ही फोन करेगी. लेकिन नवंबर तक दोनों में से कुछ भी नहीं किया आकांक्षा ने. एक बार तो आकांक्षा के भाई ने एक जुगत लगा कर उसे मैसेज किया कि पिता को दिल का दौरा पड़ा है, पैसों की जरूरत है, जल्द भेजो. गौरतलब है कि शिवेंद्र्र के सीने में पेसमेकर लगा हुआ है. जवाब आया कि वह घर आ रही है. यह नवंबर के आखिर में हुआ. नवंबर 2016 को मैसेज किया कि वह दिल्ली से हावड़ा तक पहुंच चुकी है. लेकिन फिर अचानक घर आए बगैर वह लौट गई. उस ने मैसेज किया कि उसे अमेरिका वापस जाना पड़ रहा है. शर्मा दंपती को व्हाट्सऐप पर ही यह मैसेज मिला. हैरानी तो हुई, पर उस की नौकरी के बारे में सोच कर उन लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस के बाद आकांक्षा के फोन से व्हाट्सऐप मैसेज आया कि यूनिसेफ में सेवारत उस का दोस्त उदयन घर जा रहा है. 2 दिन वहीं ठहरेगा.

मां शशिबाला शर्मा कहती हैं कि आज यह सब सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि अपनी ही बेटी के हत्यारे उदयन के साथ बांकुड़ा में वे 2 रात गुजार चुकी हैं. उदयन का नाम आकांक्षा से पहले ही शर्मा दंपती सुन चुके थे. उदयन आया और हिंदी, अंगरेजी व बांग्ला भाषा में आराम से बातें करता था. उस ने कहा कि दिल्ली में वह आकांक्षा के मातापिता और भाई आयुष को अमेरिका ले जाने के लिए वीजा का बंदोबस्त करेगा. दुर्गापूजा के बाद दिल्ली पहुंच कर उसे फोन करने की बात कह कर गया. उस की बातों में आ कर पूजा के बाद शर्मा परिवार दिल्ली गया भी. लेकिन लाख कोशिश करने के बाद भी उदयन ने उन का फोन नहीं उठाया. न ही वह आ कर मिला. तब शर्मा परिवार को थोड़ा शक हुआ. उन्होंने बेटी आकांक्षा को व्हाट्सऐप पर इस की जानकरी भी दी. जवाब में आकांक्षा ने लिखा कि उदयन की हत्या हो गई है. वह उस की मां से मिलने भोपाल जा रही है. शर्मा परिवार हैरान हुआ.

शक के बीज

शक का एक और कारण यह था कि उन की बेटी आकांक्षा के घर से जाने के बाद एकाध बार ही फोन पर बात हुई. लंबे समय से व्हाट्सऐप के जरिए या एसएमएस के जरिए बातें होतीं. फोन पर बात न होने से शक गहराने लगा. उधर आकांक्षा के बैंक अकाउंट से मोटीमोटी रकम निकलती जा रही थी. यह रकम उस के ब्याह के लिए जमा की गई थी. शर्मा दंपती को आशंका होने लगी. फोन पर बात करने की लाख कोशिश करने के बाद भी सफलता नहीं मिली. 5 दिसंबर, 2016 को बांकुड़ा में आकांक्षा के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. जांच में आकांक्षा के मोबाइल फोन की लोकेशन ट्रैस की गई तो वह भोपाल के साकेतनगर में पाई गई. आकांक्षा के पिता शिवेंद्र और भाई आयुष भोपाल पहुंच गए. पर लाख दरवाजा पिटने पर भी वह नहीं खुला. आकांक्षा के पिता और भाई ने गोविंदपुरा थाने में मौखिक शिकायत की.

इस के बाद गोविंदपुरा पुलिस उस के साकेतनगर ठिकाने पर जब कभी गई, वहां ताला लगा मिला. फिर एक दिन अचानक उदयन थाने पहुंच गया. उस ने बताया कि आकांक्षा से ब्याह का सर्टिफिकेट थाने के पते पर उस ने पोस्ट कर दिया है, 1-2 दिनों में मिल जाएगा. पुलिस के मन से शक दूर करने के लिए आकांक्षा के नाम से एक पत्र पुलिस थाने में भेजा. जिस में कहा गया था कि वह बालिग है और अपनी मरजी से उदयन से ब्याह कर साकेतनगर में रह रही है. इस बयान के बाद पुलिस के मन में शक की कोई गुंजाइश नहीं रही. अब पश्चिम बंगाल पुलिस का मानना है कि आकांक्षा की हत्या उदयन ने जुलाई में ही कर दी थी. आकांक्षा के मोबाइल पर व्हाट्सऐप और फेसबुक को उदयन खुद ही हैंडिल कर रहा था. उस ने आकांक्षा की फेसबुक से उस के भाई को ब्लौक कर दिया था. व्हाट्सऐप पर बहन से आयुष ने इस बारे में पूछा तो उसे  बताया गया कि अपना फेसबुक प्रोफाइल अकाउंट ही उस ने डिसेबल कर दिया है.

यहां तक कि आकांक्षा का बैंक अकाउंट भी उदयन हैंडिल कर रहा था. शर्मा दंपती का कहना है कि उन की बेटी के 2 अकाउंट थे. एक अकाउंट से एक लाख 20 हजार रुपए तक निकाले गए. यह निकासी आकांक्षा की हत्या के बाद भी हुई. आकांक्षा का एक और अकाउंट था, जिस में लगभग 16 लाख रुपए थे. आकांक्षा के मामा राजेश सिंह का कहना है कि यह अकाउंट आकांक्षा के ब्याह के लिए था. हो सकता है एक बैंक अकाउंट का पिन नंबर उदयन जान गया हो, इसीलिए आकांक्षा की हत्या हो जाने के बाद भी उस अकाउंट से पैसे निकाले गए. दूसरे अकाउंट का पिन नंबर जानने के लिए उदयन ने दबाव बनाना शुरू किया हो और इस में उसे कामयाबी न मिली हो तो उस ने आकांक्षा की हत्या कर दी हो. राजेश सिंह का यह भी कहना है कि हो सकता है बड़े ही सरल मन से आकांक्षा ने फेसबुक में उदयन को अपने बैंक अकाउंट के बारे में पहले ही बता दिया हो.

उदयन जैसे कई हैं

आकांक्षा प्रकरण से याद आता है कि प्रेम, जनून और हत्या की घटनाएं पहले भी कई अलगअलग रूपों में देखी गई हैं जहां 2 प्रेमी मिलते हैं फिर कुछ ऐसे घटनाक्रम बनते हैं कि जिस में मांबाप समेत अन्य सगेसंबधियों तक की जान पर बात बन आती है. 1835 में फ्रांस में किसान परिवार के पियेरे रिविएरे नामक युवक द्वारा हंसिए से अपनी मां, बहन और छोटे-से भाई की दरिंदगी से हत्या किए जाने का मामला प्रकाश में आया था. अंत में उस ने आत्मसमर्पण कर दिया. अपने हलफनामा में पियेरे ने कहा कि अपने पिता को ‘क्लेश’ से मुक्ति देने के लिए उस ने ये हत्याएं की. उस समय की इन 3 हत्याओं की घटना ने तत्कालीन समाज को झकझोर कर रख दिया था. यह वारदात लंबे समय तक समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के लिए चर्चा, विश्लेषण व शोध का विषय रही. उस समय मनोविश्लेषकों ने पियेरे को पेरीसाइड नामक मनोविकार से ग्रस्त बताया था. इस के बाद 1973 में फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फुको ने पियेरे के हलफनामा को आधार बना कर एक किताब लिख डाली.

इस के बाद 1976 में फुको की किताब पर फ्रांस में एक फिल्म भी बनी. आज उदयन दास का मामला भी मनोविज्ञान के लिए चर्चा का विषय बन गया है.ऐसे ही अन्य कुछ मामलों के बारे में जानते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि इस विकृत मानसिकता के पीछे का मनोवैज्ञानिक सच क्या होता है. इन सभी मामलों के केंद्रीय चरित्र की पहचान बदल दी गई है. इन की चरणबद्ध काउंसलिंग चल र ही है.  

मामला-1 : मां एक प्रख्यात स्कूल में प्रिंसिपल, पिता केंद्रीय शोध संस्थान में वैज्ञानिक. मातापिता की तरह उन का एकमात्र बेटा अभिजीत (बदला हुआ नाम) भी कुछ कम नहीं. वह मेधावी है. पढ़ाई के दौरान ही अमेरिका की एक बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी में नौकरी मिल गई. फिर उस का ब्याह हुआ.

धीरेधीरे अभिजीत एकदम से बदल गया. शुरुआत कुछ इस तरह हुई–एक दिन मां की कोई बात खल गई तो आव देखा न ताव, सीधे हाथ छोड़ दिया. फिर माफी भी मांगी. लेकिन यही बात कुछ दिनों के बाद उस ने फिर दोहराई. एक दिन ऐसा हुआ कि पिता की बात उसे नागवार लगी तो पिता को जोर से धक्का दे दिया. ऐसी हर हरकत के बाद वह गिड़गिड़ा कर माफी मांगने लगता. मातापिता उसे माफ कर देते. लेकिन यह सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि शुरू हो गया था. घर की इज्जत का खयाल करते हुए मातापिता ने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया. सिर्फ बेटे से बोलचाल बंद कर दी. लोग बताते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी उसे ले डूबी. सभ्यसुसंस्कृत लड़के में धीरेधीरे बदलाव आने लगा, जो महल्ले व पड़ोसियों को भी नजर आने लगा था. बेटे के अनियंत्रित गुस्से का डर मातापिता के मन में बैठ गया. एक दिन किसी पड़ोसी के सुझाव पर पीडि़त मातापिता मनोचिकित्सक से मिलने गए. किसी बहाने बेटे को मनोचिकित्सिक से मिलावाया. हालांकि बेटे को पता नहीं था कि वह किसी मनोचिकित्सक से बात कर रहा है. बहरहाल, मनोचिकित्सक ने लंबी बातचीत की.

मनोचिकित्सक का कहना है कि अभिजीत बाईपोलर अफैक्टिव डिसऔर्डर का मरीज है. उस के स्वभाव में बदलाव के पीछे उस का मेधावी होना ही है. कैसे? स्कूल के दिनों से वह अव्वल रहा है. स्कूली पढ़ाईलिखाई से ले कर कैरियर तक के सफर में नाकामी कभी उस ने देखी नहीं है. अब वह खुद को सब से ऊपर देखने का आदी हो चुका है. अपने आगे मांबाप तक को वह कुछ नहीं समझने लगा. यही कारण है अपने मन के खिलाफ होने वाली बातें उसे नागवार लगती हैं. कामयाबी उस की आदत में शुमार हो गई है. ‘न’ को वह बरदाश्त नहीं कर सकता और उस का गुस्सा बेकाबू हो जाता है.

मामला-2 : कौशिक के पिता एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में हैं. मां हाउसवाइफ हैं. कौशिक एक नामी स्कूल में 9वीं का छात्र है. मातापिता की एकमात्र संतान है. एक दिन बेटे के कमरे में सिरहाने एक बड़ा सा चाकू देख कर मां के होश उड़ गए. 2 दिनों पहले किसी बात पर गुस्सा हो कर कौशिक मां पर चाकू तान चुका है. पर पिता को इस बात की खबर नहीं थी. अब जब बेटे की खबर ली तो पता चला, आजकल कौशिक ड्रग माफिया के चक्कर में पड़ गया है.

बेटे की काउंसलिंग के दौरान कौशिक ने बताया कि ड्रग माफिया के आगे उसे अपने ‘गट्स’ को साबित करना था. इस के लिए वह एक अदद हत्या कर के दिखा देना चाहता था. ऐसी सोच के तह में जाने के लिए मनोचिकित्सक ने मातापिता से भी बात की. पता चला, इस परिवार में मातापिता के बीच संबंध बहुत स्वाभाविक नहीं थे. दोनों के बीच अकसर कहासुनी होती रही है. इस का असर कौशिक पर पड़ता रहा है और उस के आत्मविश्वास में कमी आती गई. पर वह अपनेआप को साबित करना चाहता था. ऊपर कुछ घटनाओं का जिक्र किया गया है, उन से साफ है कि आज के युवासमाज में कुछ खास तरह के मनोविकार के लक्षण पैदा हो रहे हैं. कोलकाता के जानेमाने मनोचिकित्सक डा. ए डी महापात्र का कहना है कि जिस पैमाने पर आएदिन ऐसे मामले उन की क्लीनिक में आ रहे हैं, उस से साफ है हमारे समाज में कई उदयन हैं. आज नहीं तो कल, हमारे अड़ोसपड़ोस या हमारे अपने ही घरोंपरिवारों में ऐसा मामला देखने को मिल जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए. हम जो कर सकते हैं वह यह है कि समय रहते सचेत हो जाएं.

किशोरों में मनोविकार के लक्षण

डा. महापात्र कहते हैं कि आधुनिक जीवनशैली कई किस्मों की समस्याएं पैदा कर रही है, खासतौर पर किशोर उम्र के बच्चों में इस का अधिक प्रभाव पड़ रहा है. कभी घर पर मातापिता के बीच अकसर बातबतंगड़ से घर का माहौल खराब होता है तो कभी जबरन आधुनिक जीवनशैली अपनाने की जद्दोजेहद सरल जीवनयापन को प्रभावित करती है. वहीं, इंटरनैट और सोशल मीडिया के जरिए वर्चुअल वर्ल्ड में जरूरत से ज्यादा सक्रियता समस्या पैदा करती है. इन वजहों से किशोरवय बच्चों में बड़ी तेजी से मूड स्विंग होता है. आएदिन युवा समाज की सनक अखबारों की सुर्खियां बन रही है. इस पीढ़ी में सनक किसी भी चीज को ले कर हो सकती है. स्मार्टफोन और इंटरनैट में व्यस्त रहना, घंटों फेसबुक व ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में लगे रहना, जानेअनजाने लोगों से दोस्ती के नाम पर देररात तक चैटिंग करना, वौयसकौल व वीडियोकौल में लगे रहना, घंटों वीडियो देखना, पार्टी और क्लबों में जीवन का सुख ढूंढ़ना, रईस जीवनशैली अपनाने की ललक, तुरतफुरत पैसे कमाने के लिए अपराध करने से भी नहीं हिचकना जैस समस्याओं से अभिभावक रूबरू हो रहे हैं.

मातापिता या अभिभावक की रोकटोक इन्हें बरदाश्त नहीं. ऐसी स्थिति में ये आपे से बाहर हो जाते हैं. कभीकभार मनचाही मुराद पाने के लिए वे झूठ, प्रपंच और फरेब का सहारा लेते हैं. उदयन के मामले में पता चला कि वह 40-40 फेसबुक अकाउंट्स झूठ और फरेब के साथ हैंडिल करता था. अब जरा सोचिए इन फेसबुक अकाउंट्स में जो फ्रैंड्स होंगे, क्या उन्होंने कभी सोचा भी होगा कि उन का एक फेसबुक फ्रैंड ऐसा दरिं दा हो सकता है या हत्यारा हो सकता है. अकेले उदयन की बात जाने भी दें तो यह भी तथ्य है कि हर दिन झूठे परिचय के बल पर, अपनी असली उम्र और लिंग छिपा कर हजारों अकाउंट्स खोले जाते हैं.

सर्वे के चौंकाने वाले नतीजे

कुछ समय पहले टाटा कंसल्ंिटग सर्विस की ओर से हमारे देश के 15 शहरों में 8वीं से ले कर 11वीं तक के लगभग 11 हजार किशोरकिशोरियों के बीच एक सर्वे कराया गया था. सर्वे का नतीजा बताता है कि हमारे देश में हर 3 फेसबुक फ्रैंड्स में से एक अनजान होता है. स्कूल स्टूडैंट्स की फेसबुकों में 40 प्रतिशत ऐसे फ्रैंड्स होते हैं, जिन्हें वे निजी तौर पर कतई नहीं जानते. लेकिन ये ‘वर्चुअल फ्रैंड्स’ ही इन के लिए सबकुछ हैं. टीनएजर के बीच फेसबुक फ्रैंड्स की गिनती में भी होड़ चलती है. जिन के फ्रैंड्स की लिस्ट जितनी लंबी, उस का उतना ही बड़ा रुतबा. यही कारण है देशीविदेशी कोई भी फ्रैंड्स रिक्वैस्ट आई नहीं, कि तुरंत ‘ऐक्सैप्ट’ कर दिया. सर्वे यह भी बताता है कि देश के ज्यादातर शहरों में टीनएजर की फ्रैंड्स लिस्ट में महज 10 प्रतिशत पारिवारिक सदस्य और दूसरे सगेसंबंधी होते हैं. जब कि 90 प्रतिशत अनजान लोग होते हैं. 

जाहिर है बांकुड़ा की आकांक्षा के मामले में भी ऐसा ही हुआ. आकांक्षा ने अनजान उदयन के झूठ को परखे बिना अधिक भरोसा किया. और घरवालों से झूठ बोल कर मनोविकार से ग्रस्त उदयन पर आंखें मूंद कर भरोसा करने का खमियाजा उसे अपनी जान दे कर चुकाना पड़ा.अब सवाल है कि पैसों के लालच में ही उदयन ने आकांक्षा की हत्या की? शर्मा दंपती का कहना है कि हो सकता है इस बीच आकांक्षा को उदयन के मातापिता की हत्या की खबर लग गई हो, इसलिए उदयन ने उस की हत्या कर दी गई हो. असल  बात कुछ भी हो, जिस तरह से उदयन ने 3-3 हत्याओं को अंजाम दिया, उस से यह सबक जरूर लेना चाहिए कि सोशल मीडिया के प्रति सहज होना जरूरी है. यहां हर तरह की सूचनाएं, खासतौर पर निजी सूचनाएं नहीं देनी चाहिए. और, सोशल मीडिया की तमाम सूचनाओं पर आंख मूंद कर भरोसा करने से बचना भी चाहिए.

राजनेताओं की बीमारी राज क्यों?

30 साल से भी पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन के अस्पताल में भरती होने पर एक पत्रिका ने लिखा था, ‘‘पूरे अक्तूबर ही सैंट्रल मद्रास के अपोलो अस्पताल में रहस्य और अनिश्चितता की हवा बहती रही.’’ ये शब्द आसानी से जयललिता, राज्य की मुख्यमंत्री, के आिखरी दिनों को बयान करते हैं. 23 सितंबर, 2016 को जब जे जयललिता को बुखार व डिहाइड्रेशन के लिए भरती किया गया और 4 दिसंबर को उन्हें दिल का दौरा पड़ा,  लोगों को कम ही जानकारी हो पाई. उन के निवासस्थान  या उन की पार्टी के औफिस से कोई न्यूज बाहर नहीं आई. बस, अस्पताल के आम मैडिकल बुलेटिन आते रहे.

आखिरी बुलेटिन कुछ ऐसा था, ‘‘सम्माननीय मुख्यमंत्री का रेस्पिरेटरी सपोर्ट और पैसिव फिजियोथेरैपी का इलाज चल रहा है. धीरेधीरे उन के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है.’’ यह बुलेटिन इतना अस्पष्ट व अधूरा सा था कि कुछ लोगों ने कोर्ट में केस भी कर दिया कि सरकार मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य की पूरी जानकारी दे. लेखक वसंथी कहते हैं, ‘‘इस चुप्पी की आशा थी. 30 साल पहले एमजीआर के बहुत निकट होने के बाद भी जयललिता को उन की गंभीर बीमारी का पूरा अंदाजा नहीं था.’’

दरअसल, आज भारतीयों को अपने नेताओं की हैल्थ के राज को राज रहने की आदत डाल लेनी चाहिए, विशेषरूप से जब उन की हालत खराब हो रही हो. ऐसा आजादी से पहले से चल रहा है. तत्कालीन मुसलिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना को भारत-पाक बंटवारे से एक साल पहले टीबी हुई थी. लैरी कौलिंस और डौमिनिक लपरी ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ में लिखते हैं, ‘‘अगर जिन्ना साधारण मरीज होते तो सारी उम्र सैनेटोरियम में रह जाते. वे आम मरीज नहीं थे, जिन्ना जानते थे कि अगर उन के हिंदू शत्रुओं को पता चल जाता कि वे मर सकते हैं, तो उन का राजनीतिक आउटलुक बदल जाता.’’

एक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी वाराणसी में बीमार पड़ीं. 10 दिन दिल्ली के अस्पताल में रहीं. खबर इतनी ही बाहर आई कि उन्हें फीवर और डिहाइड्रेशन था, उन की पार्टी ने पहली बार उन की बीमारी की न्यूज नहीं छिपाई. अगस्त 2011 में कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा था कि उन का औपरेशन हुआ है जो सफल हुआ. सर्जरी किसलिए हुई, यह नहीं बताया गया था. दिल्ली के सब से बड़े हैल्थ सीक्रेट्स में से एक है, पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की हैल्थ. इन्हें 2008 में हार्टअटैक के बाद कई साल लाइफ सपोर्ट पर रखा गया. प्रियरंजन दासमुंशी अभी भी अपोलो अस्पताल में हैं. उन की पत्नी दीपा, उन के स्वास्थ्य के बारे में प्रश्न पूछने पर कोई जवाब नहीं देतीं. उन का अस्पताल का बिल सरकार भरती है.

ब्रैंडिंग गुरु सुहेल सेठ कहते हैं, ‘‘दिल्ली और भारत में लोगों का मानना है कि हैल्थ और सैक्स की बात सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए. बीमारी उन्हें आम इंसान बना देती है और उन्हें यह भी चिंता होती है कि बीमारी के  कारण कहीं उन्हें पार्टी से किनारे न कर दिया जाए.’’ इमेज कंसल्टैंट और कौलमनिस्ट दिलीप चेरियन कहते हैं, ‘‘नेताओं में ताकत होती है, बीमारी के मामलों में पार्टी सच सामने नहीं आने देती. अनिश्चितता पार्टी के लिए अच्छी नहीं होती, इसलिए पार्टी वाले कुछ नहीं बताते.’’ इस के विपरीत भाजपा आजकल अपने नेताओं के स्वास्थ्य से संबंधी हाल बता रही है. सुषमा स्वाराज ने पिछले महीने ट्वीट किया, ‘‘मैं किडनी फेलियर के कारण एम्स में हूं. इस समय मैं डायलिसिस पर हूं. किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मेरे टैस्ट्स हो रहे हैं.’’ सुषमा अपने ट्रीटमैंट का हाल बताती रहीं.

भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी कहती हैं कि हर पार्टी का काम करने का अपना तरीका होता है.अमेरिका में ऐसे मैडिकल डेटा की कोई कानूनी जरूरत नहीं है पर हाल के प्रैसिडैंट्स ऐसा करते हैं. मार्च 2016 में बराक ओबामा ने अपनी हैल्थ की 2 पेज की रिपोर्ट दी जिस में बेसिक सूचना के साथ कोलैस्ट्रौल स्तर के डिटेल्स भी थे. जौर्ज बुश ने भी  2006 में अपनी हैल्थ की 4 पेज की रिपोर्ट रिलीज की थी. फिर भी, लास एंजेल्स टाइम्स के अनुसार, अमेरिका के इतिहास में आधे से ज्यादा प्रैसिडैंट्स को सीरियस बीमारी थी और उन्होंने उसे छिपाया था.

दिलीप चेरियन और पूर्व रेल मंत्री व टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी मानते हैं कि राजनीतिज्ञों को अपने स्वास्थ्य के बारे में साफसाफ बताना चाहिए, पब्लिक फिगर को पारदर्शी होना चाहिए. अगर आप गरमी सहन नहीं कर सकते तो किचन से बाहर चले जाना चाहिए. डा. जलील पारकर, जिन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का इलाज वर्ष 2000 में किया था और नवंबर 2012 में उन की मृत्यु की घोषणा भी उन्होंने की थी, कहते हैं, ‘‘कभीकभी नर्स, टैक्नीशियंस, सिक्योरिटी स्टाफ से गलत न्यूज लीक हो जाती हैं, बाल ठाकरे के समय मुझे मुंबई पुलिस कमिश्नर, आईबी दिल्ली से फोन आए क्योंकि राजनीतिक हलचल हो रही थी पर अंत में यह परिवार के फैसले पर निर्भर करता है.’’

दरअसल, पावर खोने का खतरा रहता है. भारत जैसे देश में जहां पार्टी अकसर एक व्यक्ति से बंधी रहती है, खतरा बढ़ जाता है. सो, बीमारियां राज बनी रहती हैं. पब्लिक कुछ भी कहती रहे, कुछ भी चाहती रहे, राजनीति में जनता की भावनाओं का क्या महत्त्व. जनता एक व्यक्ति की अंधभक्त बनी रहे तो बनी रहे, क्या और किसे फर्क पड़ता है. जनता की भावनाओं से हमेशा खिलवाड़ किया जाता रहा है, आगे भी किया जाता रहेगा.       

बनता चला गया

चले तो थे हम अकेले, कारवां बनता गया

कोई राहबर बना तो कोई पलट गया

कभी खार की चुभन, कभी गुल की महक

सब को अपना समय मिलता गया

कभी अजीयत का आलम, कभी आसूदगी

हर इक बात का किस्सा बनता गया

बैठ गई थक कर जब एक मोड़ पर ‘हेमा’

हर दिशा से कोई पुकारता गया

शब में आराइश-ए-खयाल कुछ ऐसा

हर इक विचार सितारा बनता गया

इस कहानी में इक पल ऐसा भी आया

सुकूत-ए-वक्त हर इंसां यज्दां बनता गया.

       

– हेमा लोखंडे

विचारों पर प्रतिबंध

जैसे जैसे भारतीय जनता पार्टी की पहुंच केंद्र के बाद राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों में हो रही है, अलग बोलने की स्वतंत्रता और सामाजिक सुधारों की बातों का स्वर धीमा होता जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी की जीत के पीछे कट्टर धर्मवादियों का लगातार व मेहनती काम है जो वे धर्म और धर्म से पैदा होने वाले पैसों व पावर के लिए करते हैं. दूसरे दल अपने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक लाभ तो दिला सकते हैं पर उन की हर गली, सड़क पर पैसा बनाने की धर्म की फैक्टरियां नहीं हैं जिन में वे अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं को खपा सकें.

ओडिशा और महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन का मुख्य कारण है ही यह कि उस के कार्यकर्ता पूरे साल न केवल खुद लगे रहते हैं, सैकड़ों आमजनों को जोड़े भी रखते हैं. प्रभातफेरी, अखंड जागरण, स्वामी का प्रवचन, योग शिविर, अमरनाथ यात्रा, कुंभ स्नान, रामायणपाठ जैसे अनेक कार्यक्रम करते रहते हैं जिन के लिए उन्हें आसानी से चंदा मिल जाता है. और बड़ी बात यह है कि युवाओं, औरतों व खाली बैठे आदमियों को कुछ करने का मौका मिल जाता है.दूसरी पार्टियों के पास अपने कार्यकर्ताओं को बांधे रखने के लिए कुछ नहीं होता. सोशल मीडिया में जितने भी संदेश धर्मसम्मत होते हैं, उन्हें तैयार करने वाले वे कट्टर ही होते हैं जो सोचते हैं कि ज्ञान की अंतिम सीमाएं तो धर्मग्रंथों में आ चुकी हैं.

इसलामी या ईसाई कट्टरपन भी इसी तरह चला. ईसाइयों का कट्टरपन आज फिर अमेरिका में उभर रहा है और इसलामी कट्टरपन तो अपने देशों को भी जलाने में लगा है. उस के खिलाफ कोई न बोले, यह हर कट्टर चाहता है और चूंकि उस के पास भीड़ होती है, वह यह आसानी से करा सकता है. दिल्ली के रामजस कालेज में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उदारवादी छात्र अपनी बात न कह सकें, इस के लिए कट्टरवादी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने जम कर हंगामा किया. सोच पर पहरे की यह पहली जरूरत है. किसी को दूसरी तरह का विचार ही न रखने दो, समाज का एक वर्ग यह हमेशा चाहता है चाहे वह धर्म का अनुयायी हो या किसी खास राज्य का या किसी वाद का.

विचारों पर प्रतिबंध अब दिखने लगा है. धीरेधीरे समाजसुधार की बातों पर अंकुश लगने लगा है. पहरावा भी एक तरह का थोपा जा रहा है. ‘पर्व हमारे मनेंगे, तुम्हारे नहीं’ की भावना तेज हो रही है.कांग्रेस भी बहुत उदार नहीं थी. फिर भी उस पर अंबेडकर, नेहरू जैसों का असर था जो असहमति के अधिकार को विकास का मूल मंत्र मानते थे. आज, सब से कहा जा रहा है, मिल कर बोलो, ‘‘जय … की.’’

इन्हें भी आजमाइए

– बच्चों को खाने के स्वाद से ज्यादा उस के आकार, रंग और डिजाइन में रुचि होती है. अगर आप किसी साधारण खाने को अच्छे तरीके से सजा कर सुंदर बना कर देते हैं तो बच्चा खाने को अधिक रुचि ले कर खाएगा.

– यदि घर में ऐलोवेरा का पौधा है तो रोज उस की ताजा पत्ती तोड़ कर उसे छीलें और फिर उस के जैल से त्वचा की मालिश करें. ऐसा करने से सनबर्न में राहत मिलेगी और टैनिंग भी हलकी होगी.

– जो इंसान आप को सच्ची खुशी दे सकता है वह आप खुद हैं. इसलिए खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर रहना छोड़ दीजिए और हो सके तो छोटीछोटी खुशियों में भी खुश रहना सीखें.

– नेल पेंट लगाने से पहले नाखूनों पर एक बार ट्रांसपेरैंट नेल पौलिश जरूर लगाएं. ट्रांसपेरैंट नेल पौलिश लगाने से नेल पेंट में अच्छी चमक व शाइनिंग आ जाती है.

– ब्राउन ब्रैड पर शहद की पतली लेयर लगा कर खाने से यह कम कैलोरी में ज्यादा एनर्जी देगी. इसे आप डिनर में खाएं तो ज्यादा अच्छा रहता है.

– आप अपनेआप को जैसा देखना चाहते हैं वैसी ही कल्पना करें, यह जोश आप को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने को प्रेरित करेगा.

बच्चों के मुख से

मेरा 4 साल का पोता उत्कर्ष जब मेरे साथ खेलने के लिए आया. तब मैं सोने की तैयारी में लेटा हुआ था. उस की दादी ने उसे समझाते हुए कहा कि बेटा, तेरे दादाजी की बैटरी डाउन हो गई है, चलो हम दोनों खेलते हैं. उत्कर्ष मुसकराते हुए बोला, ‘‘मैं अभी दादाजी की बैटरी चार्ज कर देता हूं’’ यह कह कर उस ने अपनी उंगली मेरे पेट में गड़ा दी. उस की बात सुन कर और उस की उंगली अपने पेट? से लगी देख, मैं और उस की दादी दोनों हंस पड़े.      

डा. सी बी सिंह

*

अलीगढ़ में उस दिन वोट डाले जाने थे. मेरी ढाई वर्ष की नातिन बहुत तेज और चुलबुली है. हम लोग सुबह से ही वोट डालने की तैयारी कर रहे थे. वह भी हमारे साथ चल पड़ी. वोटस्थल पर जा कर वह बोली, ‘‘नाना, यहां बोट और पानी तो कहीं है ही नहीं.’’ और फिर जोरजोर से रो कर बोली, ‘‘नाना, हमें बोट में बैठना है.’’ उस की बात समझ कर सभी ने मिल कर उसे चुप कराया. वह वोट नहीं जानती थी, उस ने वोट को बोट समझा था. 

विजय कुमार कपूर

*

मैं अपने 5 वर्षीय बेटे की खिलौनों, टौफीज, बिस्कुट की रोजाना की जिद्द से परेशान थी. एक दिन वह पढ़ाई नहीं कर रहा था तो मैं ने उसे समझाते हुए कहा कि बेटा, पढ़ोगे नहीं तो औफिसर कैसे बनोगे? और पैसे कैसे कमाओगे? जब पैसे कम मिलेंगे तो अपने बच्चों को चीजें कैसे दिलाओगे? तुम्हें उन को कई चीजों के लिए मना करना पड़ेगा तब क्या तुम्हें अच्छा लगेगा?

तब उस ने बड़ी ही सहजता से पूछा, ‘‘मम्मी, क्या आप लोगों ने पढ़ाईलिखाई नहीं की थी?’’       

अभिलाषा गौर

*

मैं बेटे की याद में उदास हो कर रो रही थी. मेरी 5 वर्ष की पोती मेरे पास आई और मुझ से बोली, ‘‘दादीमां, आप क्यों रो रही हो?’’ मैं ने उस से कहा कि तेरे पापा यानी मेरा बेटा मुझ से दूर दूसरे शहर (नौकरी पर) चला गया है न, उसी को याद कर के रो रही हूं. इस पर वह मासूमियत से बोली, ‘‘दादीमां, अभी मत रोओ, कुछ दिनों बाद मैं और मम्मी भी पापा के पास चले जाएंगे, तब आप हमें याद कर के एकसाथ ही रो लेना.’’ उस की यह बात सुन कर मुझे रोतेरोते हंसी आ गई.     

पूनम जैन

एओर्टिक स्टेनोसिस : समय पर इलाज जरूरी

डायबिटीज रोगी 77 साल के बिपिन चंद्रा की जिंदगी अब थोड़ी सुकूनभरी है लेकिन साल 2014 में उन की स्थिति काफी तकलीफदेह हो गई थी. किडनी की बीमारी से जूझ रहे बिपिन चंद्रा की बाईपास सर्जरी हो चुकी थी. उम्र के इस पड़ाव में उन का चलनाफिरना या काम करना मुश्किल हो गया था. थोड़ा चलने पर ही वे हांफने लगते. उन की बढ़ती समस्या को देखते हुए डाक्टर से परामर्श लिया गया.

डाक्टर ने उन के कुछ टैस्ट किए जिन में एमएससीटी (इस तकनीक में हृदय और वैसल्स की 3डी इमेज बनाने के लिए एक्सरे बीम तथा लिक्विड डाई का इस्तेमाल किया जाता है) भी शामिल है. टैस्ट के बाद खुलासा हुआ कि वे गंभीररूप से एओर्टिक स्टेनोसिस से पीडि़त थे. बिपिन चंद्रा की सर्जरी हुए 2 साल हो गए हैं और अब वे बेहतरीन जिंदगी जी रहे हैं.

एओर्टिक स्टेनोसिस क्या है?

जब हृदय पंप करता है तो दिल के वौल्व खुल जाते हैं जिस से रक्त आगे जाता है और हृदय की धड़कनों के बीच तुरंत ही वे बंद हो जाते हैं ताकि रक्त पीछे की तरफ वापस न आ सके. एओर्टिक वौल्व रक्त को बाएं लोअर चैंबर (बायां वैंट्रिकल) से एओर्टिक में जाने के निर्देश देते हैं.

एओर्टिक मुख्य रक्तवाहिका है जो बाएं लोअर चैंबर से निकल कर शरीर के बाकी हिस्सों में जाती है. अगर सामान्य प्रवाह में व्यवधान पड़ जाए तो हृदय प्रभावी तरीके से पंप नहीं कर पाता. गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस यानी एएस में एओर्टिक वौल्व ठीक से खुल नहीं पाते.

मेदांता अस्पताल के कार्डियोलौजिस्ट डा. प्रवीण चंद्रा कहते हैं कि गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस की स्थिति में आप के हृदय को शरीर में रक्त पहुंचाने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है. समय के साथ इस वजह से दिल कमजोर हो जाता है. यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है और इस वजह से सामान्य गतिविधियां करने में दिक्कत होती है. जटिल एएस बहुत गंभीर समस्या है. अगर इस का इलाज न किया जाए तो इस से जिंदगी को खतरा हो सकता है. यह हार्ट फेल्योर व अचानक कार्डिएक मृत्यु का कारण बन सकता है.

लक्षण पहचानें

एओर्टिक स्टेनोसिस के कई मामलों में लक्षण तब तक नजर नहीं आते जब तक रक्त का प्रवाह तेजी से गिरने नहीं लगता. इसलिए यह बीमारी काफी खतरनाक है. हालांकि यह बेहतर रहता है कि बुजुर्गों में सामने आने वाले विशिष्ट लक्षणों पर खासतौर से नजर रखनी चाहिए. ये लक्षण छाती में दर्द, दबाव या जकड़न, सांस लेने में तकलीफ, बेहोशी, कार्य करने में स्तर गिरना, घबराहट या भारीपन महसूस होना और तेज या धीमी दिल की धड़कन होना हैं.

बुजुर्ग लोगों को एओर्टिक स्टेनोसिस का बहुत रिस्क रहता है क्योंकि इस का काफी समय तक शुरुआती लक्षण नहीं दिखता. जब तक लक्षण, जैसे कि छाती में दर्द या तकलीफ, बेहोशी या सांस लेने में तकलीफ, विकसित होने लगते हैं तब तक मरीज की जीने की उम्र सीमित हो जाती है. ऐसी स्थिति में इस का इलाज सिर्फ वौल्व का रिप्लेसमैंट करना ही बचता है. हाल ही में विकसित ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वौल्व रिप्लेसमैंट (टीएवीआर) तकनीक की मदद से गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस रोगियों का इलाज प्रभावी तरीके से किया जा सकता है जिन की सर्जरी करने में बहुत ज्यादा जोखिम होता है.

एओर्टिक वौल्व रिप्लेसमैंट

टीएवीआर से उन एओर्टिक स्टेनोसिस रोगियों को बहुत लाभ मिलेगा जिन्हें ओपन हार्ट सर्जरी करने के लिए अनफिट माना गया है. इस उपचार की सलाह उन मरीजों को दी जाती है जिन का औपरेशन रिस्कभरा होता है. इस से उन के जीने और कार्यक्षमता में बहुत सुधार होता है.

गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस में जान जाने का खतरा रहता है और अधिकतर मामलों में सर्जरी की ही जरूरत पड़ती है. कुछ सालों तक इस बीमारी का इलाज ओपन हार्ट सर्जरी ही थी. लेकिन टीएवीआर के आने से अब काफी बदलाव हो रहे हैं. टीएवीआर मिनिमल इंवेसिव सर्जिकल रिप्लेसमैंट प्रक्रिया है जो गंभीर रूप से पीडि़त एओर्टिक स्टेनोसिस रोगियों और ओपन हार्ट सर्जरी के लिए रिस्की माने जाने वाले रोगियों के लिए उपलब्ध है. इस के अलावा जो रोगी कई तरह की बीमारियों से घिरे हुए हैं, उन के लिए भी यह काफी प्रभावी और सुरक्षित प्रक्रिया है.

टीएवीआर ने दी नई जिंदगी

देहरादून के 53 साल के संजीव कुमार का वजन 140 किलो था और वे हाइपरटैंशन व डायबिटीज से पीडि़त थे. इस के साथ उन्हें अनस्टेबल एंजाइना की समस्या थी जिस में रोगी को अचानक छाती में दर्द होता है और अकसर यह दर्द आराम करते समय महसूस होता है.

संजीव को कई और बीमारियां जैसे कि नौन क्रीटिकल क्रोनोरी आर्टरी बीमारी (सीएडी), औबस्ट्रैक्टिव स्लीप अपनिया (सोते समय सांस लेने में तकलीफ), उच्च रक्तचाप, क्रोनिक वीनस इनसफिशिएंसी (बाएं पैर), ग्रेड 2 फैटी लीवर (कमजोर लीवर), हर्निया और गंभीर एलवी डायफंक्शन के साथ खराब इंजैक्शन फ्रैक्शन 25 फीसदी (हृदय के पंपिग करने की कार्यक्षमता) थीं.

संजीव की स्थिति दिनबदिन गंभीर होती जा रही थी और उन का पल्स रेट

98 प्रति मिनट (सामान्य से काफी ज्यादा) था. सीटी स्कैन और अन्य परीक्षणों के बाद खुलासा हुआ कि वे गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस से भी पीडि़त थे.

इतनी बीमारियों के कारण डाक्टर ने मोेटापे से ग्रस्त संजीव का इलाज ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वौल्व रिप्लेसमैंट (टीएवीआर) से किया. हालांकि जब फरवरी 2016 में उन पर यह प्रक्रिया अपनाई गई, तब तक वे 25-30 किलो वजन कम कर चुके थे और जिंदगी को ले कर उन का नजरिया काफी सकारात्मक हो गया था.

समय पर चैकअप जरूरी

गौरतलब है कि एएस की बीमारी आमतौर पर जब तक गंभीर रूप नहीं ले लेती तब तक इस बीमारी के लक्षणों का पता नहीं चलता. इसलिए नियमित चैकअप कराने की सलाह दी जाती है. उम्र बढ़ने के साथ एएस के मामले भी बढ़ते जाते हैं. इसलिए बुजुर्ग रोगियों को वौल्व फंक्शन टैस्ट के बारे में डाक्टर से पूछना चाहिए और गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस के इलाज की आधुनिक तकनीकों की जानकारी भी लेते रहना चाहिए.

क्या आप जानते हैं?

–       भारत में लगभग 15 लाख लोग गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस से पीडि़त हैं. उन में से 4.5 लाख रोगी सर्जरी के लिए अनफिट हैं.

–       अगर समय पर एओर्टिक वौल्व रिप्लेस न किए जाएं तो पाया गया है कि 50 फीसदी एओर्टिक स्टेनोसिस रोगी दिल का दौरा पड़ने पर 2 साल और छाती में दर्द के साथ 5 साल तक ही जीवित रह पाते हैं.

रिस्क फैक्टर्स

गंभीर एएस को आमतौर पर रोका नहीं जा सकता. इस की वजह से एओर्टिक वौल्व सिकुड़ने लगते हैं. इस में निम्न कारण हो सकते हैं :

–       उम्र

–       कैल्शियम के जमाव से एओर्टिक वौल्व का सिकुड़ना.

–       रेडिएशन थेरैपी.

–       हृदय में बैक्टीरिया संक्रमण का इतिहास (रिह्यूमेटिक फीवर)

–       रक्तवाहिका में फैट का बढ़ना (कोलैस्ट्रौल का ज्यादा होना).

अल्जाइमर्स सिर्फ ढलती उम्र का रोग नहीं

अल्जाइमर्स रोग मनोभ्रंश का सब से आम कारण है. शब्द मनोभ्रंश से ही इस के संकेतों का पता चल जाता है. पहली बार इस बीमारी को वर्णित करने वाले चिकित्सक अलोइस अल्जाइमर के नाम पर इस बीमारी का नाम अल्जाइमर्स हुआ. यह मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला ऐसा रोग है जिस में इस की शक्ति दिनोंदिन क्षीण होने लगती है. याददाश्त का कम होना, अल्जाइमर्स रोग के प्रमुख लक्षणों में से एक है. इस बीमारी का सब से प्रमुख लक्षण है हालिया जानकारियों को भूल जाना, दूसरा लक्षण है महत्त्वपूर्ण तारीखों या घटनाओं का याद न रहना, एक ही जानकारी को बारबार पूछना तथा उन्हें फिर भूल जाना, स्मृति सहयोगियों पर आश्रित रहना यानी रिमाइंडर नोट्स या किसी इलैक्ट्रौनिक यंत्र में प्रमुख तथा सामान्य जानकारियां फीड रखना जो कि सामान्यतया आराम से याद रखी जा सकती हैं. या परिवार के किसी सदस्य पर ऐसे कामों के लिए आश्रित रहना जो खुद से आसानी से किए जा सकते हैं.

इस बीमारी के कारण लोगों को ऐसे कार्यों को भी करने में तकलीफों का सामना करना पड़ता है जिन से वे भलीभांति परिचित हैं या काफी समय से नियमित करते आ रहे हैं. उदाहरण के तौर पर परिचित रास्तों को भूल जाना व पैसे संबंधी लेनदेन का समझ में न आना आदि. यह बीमारी रोजमर्रा के हर एक ऐसे कामों को प्रभावित करती है जिसे लोग कई बरसों से करते आ रहे हैं. समय या स्थान के बारे में भ्रम, दृश्यचित्र और स्थानिक संबंधों को समझने में दिक्कतों तथा इन जैसे तमाम लक्षणों का सीधा संबंध अल्जाइमर्स रोग से है. इन सारे लक्षणों को लोग जानकारी के अभाव में अनदेखा कर देते हैं. नतीजतन, इस बीमारी से पीडि़त व्यक्ति सामान्य मानसिक कार्यों को करने में असमर्थ होने की वजह से अपनेआप को समाज से तथा सामाजिक गतिविधियों से अलगथलग रखने लगता है.

बिगड़ते हालात

स्वभाव तथा व्यक्तित्व में परिवर्तन भी इस के अहम लक्षणों में से हैं. इस बीमारी से पीडि़त व्यक्तियों में स्वभाव तथा व्यक्तित्व में परिवर्तन आने लगता है. वे अकसर संदिग्ध, उदास, भयभीत या अनमने से रहने लगते हैं. चाहे अपने काम के प्रति हो या अपने परिजनों के प्रति, उन का बरताव अलग तथा अनमना सा होने लगता है. वे चिड़चिड़े से हो जाते हैं.अल्जाइमर्स रोग के लक्षण समय के साथ बद से बदतर होने लगते हैं. इस बीमारी की शुरुआत होने के बाद यह कितने समय में क्या रूप लेगी, इस के बारे में भी कुछ सटीक कह पाना मुश्किल है. आमतौर पर इस बीमारी के होने के बाद पीडि़त 8  वर्षों तक जीवित रह सकता है. अगर सभी कारणों तथा इलाज पर गौर किया जाए तो उसे लगभग एक स्वस्थ जीवन 20 वर्षों के लिए प्रदान किया जा सकता है. यह भी गौरतलब है कि लक्षणों के सामने आने से पहले ही यह बीमारी ग्रसित लोगों के दिमाग पर अपना असर छोड़ने लगती है.

क्यों होता है अल्जाइमर्स

मस्तिष्क रोग अल्जाइमर्स से पीडि़त मस्तिष्क में पाए जाने वाले प्रोटीन की

मात्रा असामान्य रूप से एक स्वस्थ मस्तिष्क में पाए जाने वाले प्रोटीन की मात्रा से अधिक होती है. परिणामस्वरूप, न्यूरौन्स (मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिका) क्षय होने लगती है. एक सामान्य मस्तिष्क की यह क्षमता होती है कि वह न्यूरौन्स के बीच पाए जाने वाले प्रोटीन फ्रैग्मैंट्स (आमिलोइड पेप्टाइड) को घुला सके लेकिन अल्जाइमर्स से ग्रसित मस्तिष्क में पाए जाने वाले आमिलोइड पेप्टाइड जम कर कठोर हो जाते हैं तथा न्यूरौन्स के बीच अघुलनशील टकड़ों की तरह रह जाते हैं. एक प्रोटीन जिसे हम टाऊ के नाम से जानते हैं वह अपने प्राकृतिकरूप की तुलना में असामान्य हो जाता है तथा न्यूरौन्स के बीच टंगेल्स कहलाने वाले ट्विस्टैड फाइबर्स की रचना करता है.

ये टंगेल्स तथा अघुलनशील टुकड़े अल्जाइमर्स से ग्रसित मस्तिष्क में एक पैटर्न की रचना करते हैं तथा जैसेजैसे यह बीमारी बढ़ती है वैसेवैसे यह मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं का क्षय करने लगती है. जिस के चलते स्नायु तंत्रिका सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाती है. इस के प्रभाव लोगों को अपने रोजमर्रा के जीवन में इस बीमारी के लक्षण के रूप में नजर आने लगते हैं.

चिंताजनक आंकड़े

अल्जाइमर्स रोग के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में डिमेंशिया से ग्रसित लोगों की कुल संख्या 2010 में 35.6 करोड़ के आसपास अनुमानित थी तथा यह आने वाले 20 वर्षों में दोगुनी हो जाएगी और वर्ष 2050 तक इस बीमारी से ग्रसित रोगियों की संख्या दुनिया में लगभग 115.4 करोड़ हो जाएगी. भारत में इस बीमारी के अध्ययन अभी शुरुआती चरण में हैं तथा दक्षिण भारत में हुए एक अध्ययन से जानकारी मिली है कि अल्जाइमर्स रोग के बढ़ते मामलों में प्रत्येक 1,000 लोगों में अल्जाइमर्स के रोगियों की संख्या औसतन 9.19 है.

हम प्रत्येक वर्ष अल्जाइमर्स रोग के अमूमन 30 से 35 मामले देखते हैं. इस बीमारी के शुरुआती लक्षण ऐसे हैं जिन्हें लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ध्यान नहीं देते हैं. इन लक्षणों की पूरी तरह डाक्टरी जांच होनी बहुत ही आवश्यक है. लापरवाही के कारण या इन्हें ढलती उम्र के मामूली लक्षण समझ कर नजरअंदाज कर देने से ये बीमारी को और भी गंभीर बना देते हैं. लोग जितना इस बीमारी के बारे में जागरूक होंगे तथा इस के शुरुआती लक्षणों के बारे में जानेंगे, उतना हमें इस के इलाज में आसानी होगी तथा हम मरीजों को इस बीमारी के गंभीर परिणामों से बचा सकेंगे. सुरक्षा ही बचाव है, यह बात हर बीमारी के बारे में सही है. कुछ चीजों को ध्यान में रख कर इस लाइलाज बीमारी से बचा जा सकता है. स्वच्छ तथा स्वस्थ भोजन, सही मात्रा में शारीरिक तथा मानसिक व्यायाम किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वस्थ तथा सजग रखने में बहुत सहायक होते हैं. डिप्रैशन को नजरअंदाज न करें तथा सही समय पर सटीक इलाज लें.                     

डा. विवेक कुमार
(लेखक न्यूरोलौजिस्ट हैं)

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हिंदुत्व का परचम

भगवा रंग और गाढा हो गया है. संकीर्णता की आंधी जब समूची दुनिया में चल रही हो तो धर्म, जातियों का गढ़ भारत कैसे बच सकता है. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की तर्ज पर भेदभाव, नफरत की हवा ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में कथित धर्मनिरेपक्ष समाजवादियों के तंबू उखाड़ दिए और हिंदुत्व का परचम लहरा दिया है. 5 राज्यों में हुए चुनावों में धार्मिक नफरत भरी और समाज को बांट कर रखने वाली सोच की जीत दर्ज हुई है. खासतौर से नरेंद्र मोदी, अमित शाह उत्तर प्रदेश में धार्मिक, जातीय ध्रुवीकरण करने में कामयाब रहे. ये चुनाव मोदी और अमित शाह के लिए बड़ी चुनौती थे क्योंकि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर विपक्ष उन के खिलाफ माहौल तैयार कर रहा था.

असल में यह भाजपा की जीत नहीं, न मोदी की जीत है. यह जीत धर्म के बीच व्याप्त भेदभाव, ईर्ष्या, नफरत की जीत है, जिस के आधार पर यहां के मतदाता अपनी सरकार चुनने पर विवश होते हैं. चुनावी मैदान पर मोदी अमित शाह ने जो शतरंज बिछाई, और धार्मिक, जातीय पासे चले, वे कामयाब हो गए. उत्तर प्रदेश में भाजपा का कोई बड़ा नेता नहीं है. अमित शाह कई महीनों पहले से यहां डेरा डाले हुए थे. प्रचार के दौरान भाजपा की वह ओछी सोच सामने आती रही जो लोकतंत्र और संपूर्ण समाज के लिए घातक होती है.

कुछ समय से विश्व भर में उदार बनाम संकीर्ण विचारों की लड़ाई चल रही है. इस में लोकतंत्र के नाम पर संकीर्ण विचारों की विजय होती दिख रही है. भारत जैसे सब से बड़े लोकतंत्र में ऐसी शक्तियों का मजबूत होना निश्चित ही नुकसानदायक है. अमेरिका की तरह इन चुनावों में विकास की बात ही नहीं हुई, कहीं हुई तो यह गौण हो गई. सारी बातें, सोरी चर्चाएं, भाषण और सारी कवायद धर्म, जाति, मंदिर, मस्जिद, श्मशान, कब्रिस्तान को ले कर हुई.

यह चुनाव मुद्दों, विचारों पर नहीं, व्यक्तियों के बीच लड़ा गया. जहां मोदी, राहुल, अखिलेश, मायावती थे. अमित शाह के नेतृत्व में भय माहौल बनाने के प्रयास हुए. मतदाताओं तक इस तरह का संदेश पहुंचा. ये चुनावी नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे. अब यह तय है कि आने वाले समय में देश में संकीर्णता फैलेगी. लोकतंत्र की उदारता के लिए कोई जगह नहीं होगी. सोच विस्तृत होने के बजाय सिकुड़ती जाएगी क्योंकि माहौल ऐसा बनाया जा रहा है. तर्क, बहस के लिए जगह नहीं रहेगी. स्वतंत्र बोलने, लिखने वालों पर देशद्रोही होने का खतरा बढ़ जाएगा. कौलिजों, विश्वविद्यालयों और स्कूलों से इस की शुरुआत की जा चुकी है. हर जगह असहमति के विचार रखने वालों पर हिंसा का प्रयोग किया जाने लगा है. विचारों से मतभेद रखने वालों की खैर नहीं होगी.

राजनीतिबाजों के हाथ में धर्म हमेशा लोकतंत्र को खत्म करने का हथियार रहा है. उत्तर प्रदेश में वैसे भी घृणा भरी बातें करते वाले भगवाधारियों की कमी नहीं है. अब ये लोग लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही रवैए को जगजाहिर करने पर उतारू होंगे. देश के सब से बड़े राज्य में भारी बहुमत से मोदी की जीत के बाद उन की जिम्मेदारी बढ़ गई है. क्या वह नफरत फैलाने वालों पर अंकुश लगा पाएंगे? इस जीत के संकेत शुभ नहीं हैं. 2019 के बाद के भारत की तस्वीर साफ हो गई है. आगे इस देश, समाज का भविष्य क्या होगा, यह बुद्घिजीवियों के लिए चिंताजनक है.

सबके लिए न्यूड होने को तैयार है ये एक्ट्रेस

हमेशा ही अपनी बोल्ड तस्वीरों के कारण सुर्खियों में रहने वालीं एक्ट्रेस पूनम पांडे को कौन नहीं जानता. कहना गलत नहीं होगा कि ये एक्ट्रेस बॉलीवुड की सबसे हॉट और सेक्सी एक्ट्रेस की लिस्ट में आती हैं. पूनम पांडे 'क्रिकेट वर्ल्‍ड कप' में भारत की जीत पर न्‍यूड होने वाले बयान के लिए मशहूर हैं. पूनम एक भारतीय मॉडल और अभिनेत्री हैं. अगर आप पूनम के इंस्टाग्राम अकाउंट पर जाएंगे तो आपको वहां उनकी बेहद हॉट तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी. चलिए नज़र डालते हैं पूनम की कुछ कॉन्ट्रोवर्सी पर..

कहा..वह नग्न हो जाएंगी

विश्व कप क्रिकेट 2011 के दौरान, पूनम पांडे ने घोषणा की कि यदि भारतीय क्रिकेट टीम विश्व कप जीतता है तो वह नग्न हो जाएंगी लकिन ऐसा हुआ नहीं. पूनम पांडे ने अपना वादा पूरा नहीं किया.

लाइमलाइट में रहने की कोशिश

पूनम पांडे हमेशा से ही खुद को सबसे आगे रखने की कोशिश में रहती हैं. कुछ दिन पहले जब शर्लिन चोपड़ा का जन्मदिन था तो उन्होंने अपना जन्मदिन मुंबई के रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर्स के साथ मनाया था. तो पूनम ने भी सोचा कि अपना जन्मदिन कुछ खास बनाया जाए. तब पूनम ने भी सोचा कि अपना जन्मदिन कुछ खास बनाया जाए. तो उन्होंने ट्वीट किया 'लकी मेरा जन्मदिन साल के 69वें दिन आता है. शायद इसीलिये मैं इतनी नॉटी हूं.'

हर मौके पर कपड़े उतारने के लिए तैयार

कभी शाहरूख के लिए तो कभी सचिन के नाम पर, पूनम पांडे हर मौके पर कपड़े उतारने के लिए तैयार नजर आईं.

60 की उम्र में भी करेंगी बिकिनी तस्वीरें पोस्ट

पूनम पांडे ने में एक स्टेटमेंट दिया कि वो 60 की उम्र की होने के बाद भी अपनी बिकनी तस्वीरें पोस्ट करती रहेंगी और अपने फैंस को एंटरटेन करती रहेंगी.

क्रिसमस डे पर जिंगल

क्रिसमस डे पर पूनम पांडे ने जिंगल बेल..का नया और अपना सॉन्ग निकाला जो काफी अश्लील था.

पूनम का ट्वीट

मद्रास हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जो कपल शादी के पहले शादी के पहले सेक्स करते हैं, उन्हें विवाहित माना जाएगा. इस पर पूनम पांडे ने ट्विट किया था कि 'Madras HC I am Married then 😉 Hehehehe LOL'.

सचिन के लिए भी न्यूड होने को तैयार

सचिन के लिए भी न्यूड पूनम पांडे की वह तस्वीर काफी विवादित रही थी. जिसमें एक्ट्रेस ने हाथों में सचिन तेंदुलकर की एक तस्वीर पकड़ी थी. इस तस्वीर में सचिन का चेहरा भगवान की प्रतिमा पर फोटोशॉप किया गया था. वहीं, भगवान बने सचिन के सामने एक पाकिस्तानी क्रिकेटर झुका हुआ दिखाया गया था.

''न्यूड होने से संतुष्ट नहीं हुईं''

2012 में लेखिका तसलीमा नसरीन के साथ हुए गाली गलौज को लेकर भी पूनम विवादों में रहीं. तसलीमा ने ट्वीटर पर लिखा कि 'पूनम पांडे न्यूड हो गई, लेकिन अभी भी वह संतुष्ट नहीं है. वह ऐसी कोई गंदी हरकत करना चाहती हैं, जो कि अभी तक किसी ने नहीं की.' वहीं पूनम ने भी जवाब दिया कि 'लोग जो कह रहे हैं उसकी परवाह मत करो (फ*** वॉट पीपल से) और अपना काम करो.

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