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ऐसा भी होता है

मैं अपने 4 वर्ष के बेटे को आया शीला के भरोसे छोड़ कर कालेज जाती थी. 5 बजे जब कालेज से आती तो आया जिस का नाम शीला था तभी अपने घर वापस जाती. बच्चों की बोर्ड की प्रैक्टिकल परीक्षा होनी थी. उस दिन मुझे 6 बज गए. परीक्षक महोदय देर लगा रहे थे. मैं ने उन से कहा भी कि मैं अपने छोटे बेटे को घर में आया के भरोसे छोड़ कर आई हूं. फिर मैं ने आया को फोन किया और कहा, ‘‘शीला जब तक मैं घर न आ जाऊं, तुम अपने घर मत जाना. बाबू को कुछ खिलापिला दो और उसे जगाए रखना जब तक मैं न आ जाऊं.’’

शीला बोली, ‘‘मेमसाहब, बाबू आप को बहुत याद कर रहा है. मैं बाबू के पास ही हूं. आप के आने के बाद ही मैं घर जाऊंगी.’’

फिर वह बोली, ‘‘मेमसाहब, जैसे आप को अपने बाबू की चिंता है, उसी तरह मुझे भी अपने बेटे की चिंता है. मैं अपने बेटे को पड़ोसिन के पास छोड़ कर आती हूं. वह 5 बजे के बाद मेरा इंतजार करता है. मेरी पड़ोसिन उसे समझाबुझा कर खाना खिला देगी और सुला भी देगी.’’ फोन रखने के बाद मैं सोचने पर मजबूर थी कि मेरी और उस की नौकरी में कितनी समानता है. मैं अपना बच्चा आया के भरोसे छोड़ कर आती हूं और वह अपना बच्चा पड़ोसिन के पास छोड़ कर निश्ंिचत होती है.    

उपमा मिश्रा

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हमें अपनी सर्विस के दौरान मजदूरों से लोडिंग व अनलोडिंग का काम करवाना पड़ता था. सरकारी विभाग के अनुसार दोनों टाइम 20 मिनट का टीब्रैक होता था. जिस में मजदूर कार्य छोड़ कर चाय, नाश्ता, करने आदि को चले जाते थे. सिर्फ हमें ही कार्यस्थल पर निगरानी के बतौर (अपनी जिम्मेदारी समझते हुए) रहना पड़ता था. मजदूर 20 मिनट के बजाय आधे घंटे के बाद ही वापस आते थे. पूछने पर वे कहते, ‘‘साहब, हमारे पास घड़ी नहीं है. कोई कहता, बीड़ी पीने में देर हो गई.’’

सभी मजदूर बीड़ी पीने के आदी थे. मैं उन के बीड़ी पीने के जवाब पर कहता कि बीड़ी का आविष्कारक बहुत ही समझदार व्यक्ति होगा. मजदूर पूछते कि कैसे? तो मैं कहता कि जब तुम लोगों को एक इंच लंबी बीड़ी पीने में 15 से 20 मिनट लगते हैं यदि उन्होंने बीड़ी का आकार 6 इंच लंबा कर दिया होता तो तुम्हें बीड़ी पीने में कितना समय लग जाता. मेरी यह बात सुन कर वे खिसियानी हंसी हंस देते.

रामदास धुसिया

हमारी बेड़ियां

पड़ोसी के घर में सांप निकला, तो उन्होंने उसे मार दिया. अन्य पड़ोसियों को इस बात का पता चला तो उन्होंने उस पड़ोसी को अधर्मी बताते हुए उस से कहा, ‘‘तुम ने सावन के महीने में बहुत बड़ा पाप किया है. सावन के महीने में तो सांपों को दूध पिलाया जाता है.’’ कुछ दिनों बाद बारिश में भीगने के बाद उस पड़ोसी का 7 वर्षीय बेटा बीमार हो गया तो पड़ोसियों ने इसे सांप की घटना से जोड़ दिया. पड़ोसियों ने उस से पंडितों से पूजापाठ करवाने व उन्हें दिल खोल कर दक्षिणा देने को कहा.

उस ने मजबूरीवश ऐसा ही किया. आखिर कब तक हम ऐसी बेडि़यों में जकड़े रहेंगे? सांप को न मारता तो वह पड़ोसी और क्या करता, यदि सांप उस के  परिवार के किसी सदस्य को डस लेता, तब क्या अनर्थ न होता? 

सुनंदा गुप्ता

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मेरे घनिष्ठ शर्माजी का परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का माना जाता था. बैसाख शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन उन के घर पर धूपपूजा होती थी. घर के सभी लोगों को हिदायत थी कि कोई भी भैरवबाबा की पूजा होने तक अन्नजल ग्रहण नहीं करे. एक बार पूजा में देर हो गई और दिन के 1 बज गए. घर में दादाजी भूखप्यास से व्याकुल हो रहे थे. उन्हें शुगर, रक्तचाप व अन्य बीमारियां थीं. डायबिटीज के मरीज को अधिक समय तक भूखा नहीं रहना होता है. इस बात को जानते हुए भी घर के बाकी सदस्य पूजापाठ के कर्मकांडों में व्यस्त रहे.

समय पर खानापीना न होने से दादाजी अचेत हो गए. उन की अचानक ऐसी स्थिति होने से पूरा परिवार सदमे में आ गया. तत्काल उन्हें अस्पताल ले जाया गया. डाक्टर ने उन की ऐसी हालत देख कर उन्हें आईसीयू में दाखिल करवाया. अस्पताल में 2 दिनों तक उन का इलाज चला.

शर्माजी के परिवार पर नाराज होते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘शुगर के मरीज व एक बुजुर्ग को इतने समय तक बिना खानापानी के रखा जाना मौत को निमंत्रण देना है. यह तो अच्छा हुआ कि इन्हें समय पर ठीक उपचार मिल गया, नहीं तो इन की जान चली जाती.’’ डाक्टर ने आगे कहा कि इस तरह की धार्मिक रूढि़यां, आडंबर और परंपराओं को अपनाने के कारण हम अनजाने में किसी की भी मौत के कारण बन जाते हैं. भला ऐसी पूजपाठ का क्या फायदा जिस से किसी की जान पर बन आए.

एस सी कटारिया

मैं ने कुछ गलत फिल्में कीं : शाहिद कपूर

शाहिद कपूर के कैरियर पर जब निगाह दौड़ाते हैं, तो पता चलता है कि उन्होंने जबजब विशाल भारद्वाज के निर्देशन में फिल्में की हैं, तबतब उन्हें क्रीटिकल कमर्शियल सफलता मिली है. हाल में रिलीज हुई विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म ‘रंगून’ को ले कर वे काफी उत्साहित दिखे. उन के कैरियर में कई टर्निंगपौइंट रहे, जिन को ले कर वे कहते हैं-

‘‘मेरी जिंदगी व मेरे कैरियर में पहला टर्निंगपौइंट पहली फिल्म ‘इश्क विश्क’ का मिलना रहा. मैं किसी स्टार का बेटा नही हूं. मेरे पिता कलाकार हैं, स्टार नहीं. कलाकार और स्टार में बहुत बड़ा फर्क होता है. दोनों को अलग तरह से ट्रीट किया जाता है. उस के बाद दूसरा टर्निंगपौइंट रहा जब मैं ने ‘विवाह’ और ‘जब वी मेट’ जैसी फिल्में की. इन फिल्मों से मेरी एक रोमांटिक इमेज लोगों के जेहन में बसी. अब इस इमेज को तोड़ना भी मेरे लिए चुनौती बन गई थी.

उस के बाद तीसरा टर्निंगपौइंट फिल्म ‘कमीने’ करना रहा, जहां मैं ने अपनी इमेज को तोड़ा. यह मेरे लिए अच्छी बात रही. इमेज में बंध कर काम करना मुझे कभी भी पसंद नहीं रहा. मेरा मानना है कि जब कलाकार किसी इमेज में बंध जाता है तो कई बंदिशों से वह घिर जाता है. इस के बाद चौथा टर्निंगपौइंट फिल्म ‘आर राजकुमार’ को मिली सफलता रहा क्योंकि इस से पहले मेरी 3-4 फिल्में बुरी तरह से असफल हो चुकी थीं. इस वजह से ‘आर राजकुमार’ मेरे लिए बहुत महत्त्व रखती है.

‘‘फिर 2-3 वर्षों में ‘हैदर’, ‘उड़ता पंजाब’ और अब ‘रंगून’ टर्निंगपौइंट हैं. इस के बाद ‘पद्मावती’ भी मेरे कैरियर में टर्निंगपौइंट ले कर आएगी. हां, बीच में ‘शानदार’ की असफलता भी टर्निंगपौइंट थी, इस ने मुझे हिला दिया था, पर बहुतकुछ सिखाया भी. यह सच है कि हर टर्निंगपौइंट के समय मैं अलगअलग स्टेट औफ माइंड में रहा. इन सभी टर्निंगपौइंट ने मुझे एक ऐसी दिशा दी जिस से मैं कलाकार के तौर पर कुछ बेहतरीन काम कर सका. मैं नई चीजें दर्शकों और प्रशंसकों को देना चाहता हूं. यदि ‘पद्मावती’ सफल हो गई, तो मेरा आत्मविश्वास और बढ़ेगा. दर्शकों का मुझ पर यकीन भी बढ़ेगा.’’

अपने कैरियर में फिल्मों के चयन में हुई गलतियों को ले कर वे कहते हैं, ‘‘मैं ने कुछ गलत फिल्में की. फिर अंदर से ही मेरी गलतियों का एहसास जागा. अमित राय (कैमरामैन) जैसे कुछ शुभचिंतकों ने भी मुझे आगाह किया. मुझे लगता है कि हम कुछ अनुभवों व समय के साथ अपने अंदर की आवाज को बेहतर तरीके से सुनने व समझने लगते हैं.

‘‘‘उड़ता पंजाब’ और ‘रंगून’ के किरदार एकदूसरे से काफी अलग हैं. ‘उड़ता पंजाब’ में पंजाबी स्टार गायक है, जोकि ड्रग्स के शिकंजे यानी कि ड्रग्स की लत का शिकार है. घमंडी है, खुद को ही सबकुछ समझता है. जबकि अंदर से एक डरा हुआ बच्चा है. तो दूसरी तरफ ‘रंगून’ में नवाब मलिक आजादी से पहले ब्रिटिश सेना में है, पर अंदर से भारतीय व देशभक्त है. जो अपने देश के लिए मरमिटने को तैयार है. उस के सामने अजीब सी दुविधा है. वह अंदर से देशप्रेमी है पर वह निजी जिंदगी में अपने देश की ही दुश्मन ब्रिटिश सेना में नौकरी कर रहा है. ऐसे में वह अपनी इस दोहरी जिंदगी के साथ जूझता है. इस तरह नवाब मलिक बहुत ही ज्यादा रोचक किरदार है. फिल्म में जो कुछ नवाब मलिक करता है, वह बहुत ही ज्यादा ‘हीरोइक’ है. इस फिल्म को करने के बाद भारतीय सेना के प्रति मेरे मन में सम्मान व प्यार बढ़ गया.

‘‘‘रंगून’ से पहले मैं  ने अपने पिता पंकज कपूर के निर्देशन में फिल्म ‘मौसम’ की थी. जिस में मैं ने एयरफोर्स पायलट का किरदार निभाया था. इस के लिए मैं ने ग्वालियर में एअरबेस में जा कर ट्रेनिंग भी ली थी. मैं ने वहां पर कई दिन बिताए थे. वहां पर विंग कमांडर सरताज हैं, उन से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी. जब सेना के किसी भी अंग से जुड़े सैनिक से मिला तो बहुतकुछ सीखा व समझा है. इस से हमें प्रेरणा मिलती है, हमें समझ में आता है कि असली हीरो कौन है.’’

फिल्म ‘रंगून’ के नवाब मलिक के किरदार को ले कर हुई तैयारियों पर शाहिद कहते हैं, ‘‘विशाल सर ने इस पर काफी रिसर्च किया था. वे 8 वर्षों से पटकथा पर काम कर रहे थे. ज्यादातर चीजें मुझे उन के माध्यम से ही पता चलीं. उन्होंने मुझे उस के कुछ वीडियो शेयर किए. उस वक्त इन को जमादार कहा जाता था. जमादार नवाब मलिक सुन कर मैं चौंक गया. तब विशाल भारद्वाज ने मुझे बताया कि वीडियो ध्यान से देख कर समझो. वीडियो देख कर समझ में आया कि उस वक्त लोगों की दिमागी सोच क्या थी? जो भारतीय युवा सैनिक थे मगर ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे, उन्हें वह मानसम्मान नहीं मिलता था, जैसा ब्रिटिश मूल के सैनिकों को मिलता था. फिर भी नौकरी करने की वजह से वे लड़ते थे.

‘‘उन के अंदर का जज्बा किसी भी सैनिक से कम नहीं होता था. इस फिल्म को कर के आजादी से 4-5 वर्षों पहले के समय को समझना बहुत रोचक रहा. आजादी को ले कर कई फिल्में बनी हैं लेकिन आजादी से 3 साल पहले जब आजादी को ले कर सरगरमियां बढ़ी थीं, उस दौर पर कोई फिल्म नहीं बनी. जब आजादी की आग पूरे देश में फैल रही थी, तो लोगों के अंदर देशभक्ति का जज्बा बहुत ज्यादा था. नवाब मलिक उसी जज्बे का प्रतीक है. नवाब मलिक का किरदार कई स्टेज से गुजरता है.

‘‘फिल्म की कहानी प्रेम आधारित है लेकिन पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्व युद्ध भी है. किरदार के साथ युद्ध के दृ??श्य भी हैं. युद्ध के दृश्यों को फिल्माने से पहले जिस तरह की तैयारी की जरूरत थी, उस के लिए मुझे गोल्ड मैडलिस्ट से ट्रेनिंग लेनी पड़ी. हम ने इस फिल्म को बहुत ही यथार्थपरक बनाया है. फिल्म की कहानी व फिल्म के हर किरदार के साथ न्याय करने की मैं ने पूरी कोशिश की है.

ट्रेनिंग के दौरान क्या आप सैनिकों की भावनाओं से भी रूबरू हुए, इस सवाल पर उन का जवाब यों था, ‘‘जी हां, कलाकार का काम ही ऐसा है. हम कलाकार देश के अलगअलग हिस्सों में रहने वाले अलगअलग तरह के काम करने वाले लोगों से मिलते हैं. उन के हावभाव, उन के बात करने का लहजा, उन के जज्बात आदि को समझने और फिर उसे अपने किरदारों के माध्यम से परदे पर पेश करने का बड़ा काम करते रहे हैं. और मेरी पिछले कुछ वर्षों की यात्रा इसी तरह की है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘यदि आप मेरे कैरियर पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि मैं ने फिल्म ‘हैदर’ की, जो कि कश्मीर के दिल में बसी हुई है. इस में मैं ने ऐसे आम इंसान का किरदार निभाया है जिस का पिता जब खो जाता है, तो उसे क्या महसूस होता है. कश्मीर के आम इंसान के एहसास को परदे पर उकेरना बहुत मुश्किल रहा. मुझे लगता है कि मेरे लिए यह बहुत अच्छा मौका था. उस के बाद फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ जो पंजाब के अंदर फैले ड्रग्स के व्यापार पर बनी थी. अब ‘रंगून’ आजादी से 3-4 साल पहले की कहानी है. हमें इस के लिए अरुणाचल में जा कर सीमा पर शूटिंग करने का मौका मिला. वहां के लोगों से हमें मिलने का मौका मिला. जब हम इस तरह के किरदार निभाते हैं, तो कहीं न कहीं अपनेपन का एहसास ही होता है. परदे पर इस तरह के किरदारों को देख कर दर्शक को भी उसी तरह के जज्बातों का एहसास होता है.’’

विशाल भारद्वाज के साथ शाहिद ने 3 फिल्में की. इन फिल्मों को करते समय विशाल के साथ बने समीकरणों को ले कर वे कहते हैं, ‘‘विशाल सर के साथ तो मेरे रिश्ते बहुत रोचक रहे हैं. ‘कमीने’ के वक्त हम दोनों के बीच बहुत खास रिश्ता था. ‘हैदर’ के समय मुझे लगा कि हम दोनों निजी रूप में बहुत करीब आ गए हैं. इस फिल्म ‘रंगून’ के समय मुझे बारबार लग रहा था कि वे मुझे ज्यादा वक्त नहीं दे रहे हैं. दरअसल, इस फिल्म में 2 बड़े सह कलाकार थे, तो उन्हें उन को भी कुछ समय देना पड़ा.

‘‘इस तरह मैं ने ‘रंगून’ करते समय सीखा कि कलाकारों के साथ कैसे शेयर करना चाहिए. विशाल सर के संग हमारे संबंध बहुत बेहतरीन हैं. मेरे लिए यह उपलब्धि वाली बात है कि मुझे विशाल सर के साथ 3 फिल्में करने का मौका मिला. वे इतने बेहतरीन निर्देशक हैं कि हर कलाकार उन के  साथ काम करने को लालायित रहता है. वे अब तक कलाकार के तौर पर मुझ से बोर नहीं हुए हैं.

‘रंगून’ की शूटिंग अरुणाचल में हुई. उत्तरपूर्वी भारत, भारत की मुख्यधारा से अलगथलग ही रहता है. ऐसे में अनुभव क्या रहे, इस पर शाहिद याद करते हुए कहते हैं, ‘‘जी, कमाल की बात यह रही कि उन्होंने हमारा शानदार स्वागत किया. जबकि मैं भी सोच रहा था कि पता नहीं वहां हिंदी फिल्में देखते हैं या नहीं? वे हमें अपने बीच पा कर कोई अड़चन तो पैदा नहीं करेंगे? कहीं उन्हें ऐसा तो नहीं लगेगा कि हम उन्हें परेशान करने के लिए पहुंचे हैं. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

‘‘मेरी तमाम शंकाएं निर्मूल साबित हुईं. मुझे याद है, हम फ्लाइट पकड़ कर मुंबई से डिब्रूगढ़ गए. वहां से सड़कमार्ग से ब्रह्मपुत्र गए. फिर हम ने ब्रह्मपुत्र नदी पार की. उस के बाद लगभग 3 घंटे की यात्रा कर के असम सीमा पार की. फिर 1 घंटे की यात्रा कर हम पासीघाट पहुंचे, जो कि अरुणाचल प्रदेश में है. मुझे याद है कि जब हम असम की सीमा पर पहुंचे, तो हमारा स्वागत करने के लिए ढाईतीन हजार लोग मौजूद थे. उस जगह पर असम की पुलिस ने हमें छोड़ा और अरुणाचल प्रदेश की पुलिस हमारे साथ हो गई. इसी के चलते हमें लगभग एक मिनट रुकना पड़ा. मैं ने देखा कि उस वक्त वहां खड़े लोग इस तरह से चिल्ला रहे थे जैसे कोई लाइव शो चल रहा हो.

‘‘मुझे एहसास हुआ कि वहां के लोग हम कलाकारों और हमारी फिल्मों से कितना प्यार करते हैं. जब हम होटल पहुंचे, तो वहां बहुत भीड़ जमा थी. उस के बाद हम वहां 25 दिन रहे. हर दिन 2 बार नीचे जा कर वहां मौजूद लोगों का हम हाथ हिला कर अभिवादन करते थे या उन से कुछ बातचीत करते थे. फिर वे लोग वापस अपने घर चले जाते थे. यह सब देख कर मैं बहुत भावुक हुआ. मुझे उन लोगों से बहुत अपनापन और प्यार मिला.’’

पिता बनने के बाद आई सोच में बदलाव को ले कर वे कहते हैं, ‘‘सच कहूं तो ज्यादा समय मैं मीशा के साथ रहने का प्रयास करता हूं. पिता बनते ही कई तरह के एहसास अपनेआप जाग गए. अब खुश हूं. अंदर से और मेहनत करने, अच्छा काम करने की भावना जगी है. अब मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं जिन्हें मैं अपनी बेटी को गर्व के साथ दिखा सकूं.’’        

शासन की मनमानी

नोटबंदी आखिर में नसबंदी की तरह असफल हुई है, यह साफ सा है. जिन लोगों ने 8 नवंबर से 31 दिसंबर के बीच पुराने नोट भारी संख्या में बैंकों में जमा कराए हैं उन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं. नोटबंदी के समय कंप्यूटर सिस्टम चालू था, सो, यह देखना आसान था कि किसकिस ने तय सीमा से ज्यादा पैसा जमा कराया था. सरकारी विभागों ने ईमेल से 18 लाख लोगों को नोटिस भेजे हैं हालांकि बहुतों ने नोटिसों के जवाब नहीं दिए हैं. अब असली कवायद शुरू होगी. जिन्होंने ईमेल का सरकारी वैबसाइट पर जवाब नहीं दिया है उन के दरवाजों पर अफसर पहुंचेंगे. यह नए भ्रष्टाचार की शुरुआत होगी. साधारण व्यापारी, जिन्होंने 8 नवंबर के बाद बिके माल का भुगतान पुराने नोटों से लिया था, क्योंकि नए नोट तो थे ही नहीं, वे कैसे और क्या जवाब देंगे? देश में अरबों रुपयों का व्यापार कच्ची कौपियों पर होता है और सरकारी वैबसाइट पर जो सुबूत मांगे गए हैं, संभव नहीं कि वे भेजे जा सकें.

ऐसे में आयकर विभाग की बन आएगी. आयकर विभाग वाले किस की गरदन पर फंदा डालें, किस की नहीं, यह उन की मरजी पर निर्भर होगा. अगर दरवाजे पर पहुंच कर उन्होंने जांचपड़ताल की तो अब या तो संपत्ति दिखेगी या गहने, (नकदी तो भी लोगों के पास कम ही है क्योंकि पुराने नोटों के बदले दी गई नई नकदी जरूरत से अभी भी कम है). संपत्ति या स्टौक की कीमत क्या है, यह जांचनापरखना, फिर साबित करना कि यह कालाधन ही है, इन जैसे हक तो नोटबंदी के पहले भी आयकर विभाग के पास थे.

अगर 10-15 लाख लोगों को इस तरह कठघरे में खड़ा कर के कालाधन निकालना था तो पूरे देश की 120 करोड़ जनता को सजा देना कौन सा सुशासन है. आयकर अफसरों के हाथों में असीमित अधिकार देने का अर्थ होगा कि ब्लैकमनी का हस्तांतरण हुआ है, वह सरकारी खजाने में नहीं गई. पहले बैंक वालों, रसूखदार अफसरों और लाइन में खड़े होने की क्षमता रखने वालों ने पैसे बनाए और कालाधन काला ही रहा. अब आयकर अफसर कमाएंगे. इस चक्कर में आम आदमी और छोटा व्यापारी फंसेगा और सरकारी आय में मामूली सी बढ़ोतरी होगी जबकि पूरी अर्थव्यवस्था पर गहरा घाव बना रहेगा. कालाधन विलासिता को पैदा करता है, यह अकसर अनुपयोगी कामों में लगाया जाता है, यह कानून का उल्लंघन है. ये बातें सही हैं पर फिर भी जिस तरह बंदरों के उत्पात को रोकने के लिए जंगल को नहीं जलाया जाता, उसी तरह कुछ लोगों की ब्लैकिया करतूतों के लिए पूरे देश को परेशान करना मनमानी के अलावा कुछ नहीं है. अफसोस यह है कि अपने देश में ही नहीं, दूसरे देशों में भी क्रूर, गलत, सिरफिरे शासकों के ढेरों ऐसे समर्थक मिल जाते हैं जो बढ़चढ़ कर शासकों को गलत काम करने देते हैं और उन का गुणगान करते रहते हैं.

जब रातोंरात सुपरस्टार बन गई गांव की ये लड़की

महाराष्ट्र में 7 मार्च से दसवीं की परीक्षा शुरू हो गई है. 'सैराट' फिल्म की एक्ट्रेस रिंकू राजगुरु भी इस बार 10 वीं की परीक्षा दे रही हैं. अकलुज के जीजामाता कन्या स्कूल के सेंटर पर रिंकू परीक्षा देने पहुंचीं. इस दौरान केंद्र की प्रमुख मंजुषा जैन ने फूल देकर उनका वेलकम किया. बता दें कि मराठी फिल्म 'सैराट' में काम कर रिंकू रातोंरात सुपरस्टार बन गईं. रिंकू सोलापुर जिले के अकलुज कस्बे की शिक्षक कॉलोनी में रहने वाली एक मिडल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती हैं. रिंकू के पिता का नाम महावीर है. 'सैराट' फिल्म हिट होने के बाद रिंकू को स्कूल छोड़ना पड़ा था. दरअसल, फिल्म के बाद रिंकू जब स्कूल गईं तो उन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी. इस वजह से रिंकू ने स्कूल छोड़ दिया और फिर 17 नंबर का फॉर्म (प्राइवेट स्टूडेंट्स के लिए) भरकर दसवीं की परीक्षा देने का फैसला किया था. बता दें कि 9वीं क्लास में रिंकू को 81 परसेंट मार्क्स मिले थे.

'सैराट' के कन्नड़ रिमेक में रिंकू ने लीड रोल किया है. उनकी आने वाली फिल्म का नाम ‘मनसु मल्लिगे’ है. पिछले साल दिवाली में इस फिल्म की शूटिंग पूरी हुई थी. इसके बाद दो महीने में उन्होंने दसवीं के लिए पढ़ाई की.

मराठी फिल्म 'सैराट' से रातोंरात हिट हुई एक्ट्रेस रिंकू राजगुरु को स्कूल से निकाले जाने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. कहा गया कि उनकी अटेंडेंस कम होने के कारण स्कूल मैनेजमेंट ने उन्हें स्कूल से बाहर निकाल दिया था. हालांकि, बाद में रिंकू के पिता और स्कूल मैनेजमेंट ने इसे अफवाह बताया था.

रिंकू, महाराष्ट्र के सोलापुर डिस्ट्रिक्ट में आने वाले अकलुज गांव की रहने वाली हैं. एक्टिंग से लोहा मनवाने वाली एक्ट्रेस केवल 16 साल की हैं, 'सैराट' उनकी डेब्यू फिल्म है. उनकी फिल्म 'सैराट' मराठी बॉक्स ऑफिस पर इस कदर हिट हुई की रिंकू रातोंरात एक साधारण लड़की से स्टार बन गई. आमिर खान, सुभाष घई, रितेश देशमुख, आयुष्मान खुराना समेत कई बड़े एक्टर्स सैराट फिल्म और रिंकू की एक्टिंग की तारीफ कर चुके हैं. रिंकू को सैराट में एक्टिंग के लिए 63वें नेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया है.

सैराट फिल्म में रिंकू लीड एक्ट्रेस हैं, जिसका नाम है आर्ची. उन्हें इस रोल के लिए फिल्म के डायरेक्टर नागराज मंजुले ने सिलेक्ट किया था. नागराज किसी काम के सिलसिले में अकलुज गांव गए थे. जब रिंकू को गांव में नागराज के आने की बात पता लगी तो वो अपने दोस्तों के साथ उन्हें देखने पहुंची. इस बीच नागराज की नजर रिंकू पर पड़ी और उन्होंने उसे फिल्म का ऑफर दिया. इसके बाद उन्होंने 10 मिनट का ऑडिशन दिया. कुछ दिन बाद उन्हें फोन आया कि वे फिल्म के लिए चुन ली गई हैं.

रिंकू राजगुरु को नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद बधाई देने के लिए लगातार फोन कॉल्स आने लगे थे. यहां तक कि हैकर्स ने उनका फेसबुक पेज हैक कर उस पर महाराष्ट्र के उद्योगमंत्री सुभाष देसाई का मोबाइल नंबर अपलोड कर दिया. इसके बाद देसाई के फोन पर अनचाहे कॉल आने लगे. इन अनचाही कॉल्स से परेशान देसाई ने पुलिस की साइबर सेल में कम्प्लेंट दर्ज करवाई. मामला मीडिया में आने के बाद रिंकू की फेसबुक वॉल से देसाई का नंबर हटाया गया है. जांच में पता चला है कि फिल्म रिलीज़ होने के बाद रिंकू राजगुरु के नाम से कई फर्जी फेसबुक अकाउंट्स ओपन किए गए हैं.

फिल्म सैराट एक अमीर लड़की और गरीब लड़के की इमोशनल प्रेम कहानी है. लड़का गरीब है, उसे ऊंची जाति वाली जमींदार की लड़की से प्रेम हो जाता है. जमींदार को प्रेम का पता चल जाता है. इसके बाद सोसाइटी और जमींदार से भागते हुए प्रेम और उसके संघर्ष को दिखाया गया है. 'सैराट' में रिंकू के अपोजिट आकाश ठोसर ने काम किया है. आकाश की भी ये डेब्यू फिल्म है.

बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई करने वाली मराठी फिल्म 'सैराट' के दोनों लीड एक्टर्स रिंकू राजगुरु और आकाश ठोसर के मोम के पुतले पुणे के वैक्स म्यूजियम में लगाए जाएंगे. फिल्म से पहले दोनों को कोई नहीं जानता था. दोनों साधारण गांव के रहने वाले हैं. म्यूजियम के शिल्पकार सुनील कंडलूर ने खुद रिंकू राजगुरु और आकाश ठोसर के घर जाकर उनकी बॉडी का नाप लिया था.

नयनतारा : जिसने उजाड़ दिया प्रभुदेवा का घर

हॉट एक्ट्रेसेस में शुमार नयनतारा का नाम साउथ की सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद हस्तियों में है. कभी गुजरात के जामनगर शहर की स्टूडेंट रही नयनतारा का नाम दो वजहों से काफी चर्चा में रहा. पहला, साउथ फिल्मों के सुपर स्टार और डांसर प्रभु देवा से शादी करने के लिए ईसाई धर्म छोड़ हिंदू बनने का और दूसरा शाहरुख खान की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में आइटम सॉन्ग करने से मना करने के लिए.

रजनीकांत की ब्लॉकबस्टर मूवी ‘चंद्रमुखी’ की एक्ट्रेस नयनतारा ने प्रभुदेवा से शादी करने के लिए हिंदू धर्म अपना लिया था. नयनतारा मूल रूप से ईसाई थीं और उनका जन्म बेंगलुरु में एक कट्टर ईसाई फैमिली में हुआ था. उनका मूल नाम ‘डायना मरियम कुरियन’ है. नयनतारा के पिता कुरियन कोदियात्तु एयरफोर्स में थे, जबकि मां ओमाना कुरियन हाउसवाइफ हैं. एयरफोर्स में होने की वजह से वो कई शहरों में रहे, जिसके चलते नयनतारा ने देश के कई शहरों जैसे चेन्नई, जामनगर, थिरुवला और दिल्ली में पढ़ाई की.

नयनतारा ने 2008 में एक्टर-डायरेक्टर प्रभुदेवा को डेट करना शुरू किया. 2010 में प्रभुदेवा की पत्नी ने फैमिली कोर्ट में पिटीशन लगाई की प्रभुदेवा नयनतारा के साथ लिव-इन में रह रहे हैं. इसके बाद लता ने धमकी दी थी कि अगर उन्होंने नयनतारा से शादी की तो वो भूख हड़ताल करेंगी. यहां तक कि कई महिला संगठनों ने नयनतारा पर तमिल कल्चर को बदनाम करने को लेकर उनके खिलाफ प्रोटेस्ट (प्रदर्शन) किया और उनका पुतला भी फूंका था.

नयनतारा से अफेयर के बाद प्रभुदेवा ने शादी के 16 साल बाद पत्नी से अलग होने का फैसला किया. जुलाई, 2011 में उन्होंने पत्नी लता को तलाक दे दिया. हालांकि, बाद में साल 2012 में नयनतारा ने कहा कि वो अब प्रभुदेवा से अपने सारे रिश्ते खत्म कर चुकी हैं.

प्रभुदेवा को पत्नी लता से हुए तलाक ने उन्हें दिवालिया होने की कगार पर ला दिया था. उन्हें अपनी पत्नी को 10 लाख रुपए का गुजारा भत्ता देने के अलावा प्रॉपर्टी भी देनी पड़ी थी. इसकी कीमत 20-25 करोड़ रुपए थी. साथ ही, दो कारें व अन्य संपत्ति भी उन्होंने लता को दी थी. प्रभु और लता की शादी सितंबर 1995 में हुई थी और तलाक जुलाई 2011 में. प्रभुदेवा के तीन बेटे थे. हालांकि उनके एक बेटे की मौत 2008 में कैंसर से हो गई थी.

शाहरुख खान के साथ काम करने की एक्ट्रेस में होड़ लगी रहती है. जिसे मौका हाथ लगता है, वह उसे गंवाना नहीं चाहता लेकिन नयनतारा इस मामले में दूसरी एक्ट्रेस की तुलना में बिल्कुल उलट निकलीं. उन्होंने शाहरुख की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में आइटम सॉन्ग करने से मना कर दिया था. मीडिया में नयनतारा के बारे में यहां तक लिखा गया था कि शाहरुख के साथ काम करने से इनकार करने वाली शायद वे पहली एक्ट्रेस हैं.

शाहरुख की फिल्म में काम न करने के पीछे वजह यह बताई गई कि नयनतारा ने शाहरूख या रोहित शेट्टी की वजह से नहीं, बल्कि डांस गुरु प्रभुदेवा के कारण वह फिल्म छोड़ी थी.

अपने हॉट किरदार के लिए पहचानी जाने वालीं नयनतारा का एक विवाद एक्टर सिंबू के साथ उनके लिप लॉक किस को लेकर भी है. नयनतारा और सिंबू का यह किस काफी विवादास्पद रहा था और इसके लिए नयनतारा व सिंबू से माफी मांगने के लिए भी कहा गया था.

नयनतारा ने फिल्मी करियर की शुरुआत 2003 में आई मलयालम फिल्म ‘मनासिनाक्करे’ से की. इसके बाद 2004 में वे ‘विस्मयथुंबाथू’ और 2005 में ‘आया’ फिल्म में नजर आईं. फिल्म ‘आया’ में दमदार रोल कर नयनतारा ने काफी सुर्खिया बटोंरी और इसके बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा.

नयनतारा की सबसे सुपरहिट फिल्म रजनीकांत की ‘चंद्रमुखी’ रही, जो हिंदी में ‘भूलभुलैया’ नाम से रिलीज हुई. फिल्म की स्क्रिप्ट ने साउथ ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड में भी जमकर धमाल मचाया और फिल्म सुपरहिट रही.

2007 में आई तमिल फिल्म ‘बिल्ला’ के बाद नयनतारा का सितारा ऐसा चमका कि इसके बाद उन्होंने दर्जनों हिट फिल्में दीं और अब उनका नाम साउथ की सबसे हॉट एक्ट्रेस में शुमार हो गया था. साल 2009 में नयनतारा केरल के ओट्टापालम के निकट किलिकावु अम्मान मंदिर में साड़ी न पहनकर सलवार-कमीज में पहुंच गई थीं. इस पर नयनतारा को प्रशासन और श्रद्धालुओं ने मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया था. इसके पीछे वजह यह बताई गई कि उन्होंने मंदिर परिसर में कपड़े पहनने के नियमों को तोड़ा है. दक्षिण भारत में महिलाएं मंदिर में आमतौर पर साड़ियों में ही प्रवेश करती हैं. इसके बाद उन्हें लोगों ने साड़ी से भरा एक बड़ा बक्सा ही पार्सल कर दिया था.

नयनतारा आईपीएल 20-20 क्रिकेट टूर्नामेंट में चेन्नई टीम की ब्रांड एम्बेसडर भी रह चुकी हैं. हालांकि, उन्होंने व्यस्तता के कारण जल्द ही इस पद से इस्तीफा दे दिया था. नयनतारा फिलहाल साउथ की सबसे महंगी एक्ट्रेसेस में शुमार हैं. वो एक फिल्म के लिए करीब 2.5 से 3 करोड़ रुपए चार्ज करती हैं. 

क्या आपने देखी है बिना इंटरवेल के फिल्म

'ट्रैप्ड' के निर्माता दर्शकों को भी ट्रैप करने के चक्कर में हैं. अब दो घंटे तक आपको सिनेमाहॉल में बिना ब्रेक के बैठाया जाएगा तो ऐसा ही महसूस होगा ना. सूत्र बताते हैं कि राजकुमार राव स्टारर 'ट्रैप्ड' में कोई इंटरवेल नहीं होगा. यह फिल्म 17 मार्च को रिलीज हो रही है.

फिल्म 'ट्रैप्ड' एक ऐसे शख्स की कहानी है, जो एक अपार्टमेंट में बंद हो जाता है जहां उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं होता. पीने के लिए पानी नहीं होता और बिजली भी नहीं होती. इस शख्स का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कट जाता है. इसे बिना इंटरवल देखने में मजा आएगा. लोगों को मनोरंजन में कोई रुकावट नहीं होगी और दर्शकों को एक अच्छा रोमांचक अनुभव मिलेगा. फिल्म निर्देशक और फिल्म से जुड़े सभी सहयोगी फिल्म के प्रदर्शन के लिए राजी हो गए हैं.

'ट्रैप्ड' निर्देशक विक्रमादित्य ने इससे पहले रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म 'लुटेरा' का निर्देशन किया था. वे अनुराग कश्यप के लिए चर्चित फिल्म 'उड़ान' भी बना चुके हैं. इस फिल्म को कमाल की समीक्षाएं हासिल हुई थीं.

फिल्म 'ट्रैप्ड' विक्रमादित्य की पहली थ्रिलर है. इस फिल्म के लिए राजकुमार ने खूब मेहनत की है. वे अपने कैरेक्टर को समझने के लिए हफ्तों तक भूके रहे थे. उन्होंने खुद को कमरे में बंद कर लिया था और एक गाजर खाकर दिन गुजारा करते थे. कभी-कभी राजकुमार एक कप ब्लैक कॉफी पर पूरे दिन भूखे रहा करते थे. राजकुमार राव स्टारर फिल्म 'ट्रैप्ड' को किसी अंग्रेजी फिल्म से प्रेरित भी बताया जा रहा है.

क्या आपके स्मार्टफोन के सारे ऐप्स असली हैं

क्या आप जानते हैं आपके स्मार्टफोन में गूगल प्‍ले स्‍टोर पर कई नकली या जाली ऐप्स मौजूद होते हैं, जिन्हें हम पहचान भी नहीं पाते हैं. आप सभी लोग गूगल प्‍ले-स्‍टोर से कई ऐप्स डाउनलोड करते हैं और उनका इस्‍तेमाल भी करते हैं.

प्‍ले-स्‍टोर, ऐप्स को डाउनलोड औऱ अपडेट करने के लिए एक महत्‍वपूर्ण प्‍लेटफॉर्म है. लेकिन कई बार, इसमें फेक एप भी आ जाती हैं और उन्‍हें डाउनलोड करने से आपकी व्‍यक्तिगत जानकारी लीक हो सकती है और आपके निजी जीवन पर इशका पिरभाव पड़ सकता है.

बहुत बार ऐसा होता है कि प्‍ले-स्‍टोर में भी फेक ऐप्स हमें नजर तो आती हैं पर हम इन्हें पहचान नहीं पाते हैं. ये ऐप्स इन दिनों एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं क्‍योंकि इन ऐप्स में ऐसे वायरस होते हैं जो आपकी या किसी भी उपयोगकर्ता की किसी भी प्रकार की कोई जानकारी को कुछ ही देर में हैक कर सकते हैं.

अगर आपको ऐसे ऐप्स से बचना है तो आपको यो जाननी ही होगी कि कौन सी ऐप असली है और कौन सी नकली. तो इन ऐप्स को पहचानने के लिए कुछ खास तरीके इस प्रकार है:

1. पब्लिशर को चेक कर लेना चाहिए

सबसे पहले आपको ये देखना चीहिए कि इस ऐप को पब्लिश करने वाला कौन है. कई बार हैकर्स, उन्‍हीं नाम को हल्‍का सा परिवर्तित करके या उन्हीं नामों से ही ऐप्स डाल देते हैं. ताकि आप भ्रम में पड़ जाएं, इसलिए आपको उनका नाम सही से पढ़ना चाहिए.

2. स्टोर पर कस्‍टमर रिव्‍यू पढ़ना चाहिए

जिस भी ऐप को आप डाउनलोड करना चाहते हैं, उसका कस्‍टमर रिव्‍यू जरूर पढ़ लें. ये रिव्‍यू आपको ऐप के बारे में सही-सही जानकारी देते हैं और आपको पता चलता है कि ये ऐप सही है या नहीं.

3. ऐप को जारी करने की तिथि की जांच

किसी भी ऐप को कब और किस समय जारी किया गया है, उसकी तिथि पर गौर अवश्य फरमाइए. अगर तारीख बहुत पहले की दी गई हो तो उसे डाउनलोड नहीं करना चाहिए. अगर हाल ही में ऐप को जारी किया गया है तो उससे जुड़ी खबरों को पहले टेक वेबसाइट्स पर पढना चाहिए. अगर उससे संबंधित कोई खबर नहीं है तो आप उस ऐप को भूल से भी डाउनलोड न करें.

4. स्‍पेलिंग में गलती हो तो

फेक या नकली ऐप्स में स्‍पेलिंग्स की गल्तियां जरूर होती हैं. इन ऐप्स को कॉपी करके बनाया जाता है और इसी चक्‍कर में इनमें बहुत ही हल्‍का सा अंतर रखने के लिए स्‍पेलिंग की मिस्‍टेक की जाती है जो कि उपयोगकर्ता की नजर में आसानी से नहीं आ पाती है और आप नकली ऐप को डाउनलोड करने की गलती कर बैठते हैं.

इनके नाम है आईपीएल में सबसे ज्यादा शतक जड़ने का रिकॉर्ड

आईपीएल के धूम-धड़ाके में अब बस कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं. जैसे-जैसे दिन गुजरते जा रहे हैं, वैसे-वैसे दर्शकों का इंतजार और बढ़ता जा रहा है. आईपीएल का आगाज 5 अप्रैल से होना है.

इस बात में कोई दोराए नहीं है कि आईपीएल में दुनियाभर के खिलाड़ी भाग लेते हैं और सभी बड़े और आक्रामक बल्लेबाजों के बीच खुद को श्रेष्ठ साबित करने की टक्कर होती है. तो आइए जानते हैं कि वे पांच बल्लेबाज कौन हैं, जिन्होंने आईपीएल में सबसे ज्यादा शतक ठोके हैं.

क्रिस गेल

दुनिया का सबसे धाकड़ बल्लेबाज और शतक लगाने के मामले में सबसे आगे ना हो, ऐसा तो मुमकिन ही नहीं हो सकता. क्रिस गेल ने आईपीएल में जमकर जलवा बिखेरा है और वह शतक लगाने के मामले में भी सबसे आगे हैं. गेल ने अब तक आईपीएल के 92 मैचों में 5 शतक ठोके हैं.

गेल के बल्ले से पहला शतक कोलकाता के खिलाफ साल 2011 में आया था. इस मैच में उन्होंने 55 गेंदों में 102 रनों की पारी खेली थी. इसके बाद उन्होंने साल 2011 में ही किंग्स XI पंजाब के खिलाफ 49 गेंदों में 107 रनों की पारी खेली.

गेल ने 2012 में दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ 62 गेंदों में नाबाद 128 रन बनाए. साल 2013 में उन्होंने पुणे वॉरियर्स के खिलाफ 66 गेंदों में 175* रनों की पारी खेल डाली और साल 2015 में उन्होंने किंग्स XI पंजाब के खिलाफ 57 गेंदों में 117 रनों की बेहतरीन पारी खेली.

विराट कोहली

सूची में दूसरे स्थान पर भी रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु के खिलाड़ी और कप्तान हैं. विराट कोहली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की ही तरह आईपीएल में भी जमकर रन बनाते हैं. और इसी सिलसिले को बरकरार रखते हुए उन्होंने आईपीएल में अब तक 4 शतक लगाए हैं और वह दूसरे स्थान पर हैं. दिलचस्प बात यह है कि कोहली ने सभी चारों शतक पिछले साल यानी 2016 में ही जड़े हैं. जिस तरह से कोहली ने पिछले सत्र में लगातार शतकों की झड़ी लगाई है उसके बाद उनके प्रशंसकों को उनसे इस बार भी धमाल मचाने की उम्मीद होगी.

एबी डिविलियर्स

शतक लगाने के मामले में तीसरे स्थान पर भी रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु का ही खिलाड़ी है. दुनिया के सबसे विस्फोटक बल्लेबाजों में गिने जाने वाले एबी डिविलियर्स इस सूची में 3 शतकों के साथ तीसरे स्थान पर हैं. डिविलियर्स ने 120 मैचों में 3 दमदार शतक लगाए हैं. डिविलियर्स ने पहला शतक साल 2009 में दिल्ली की टीम से खेलते हुए चेन्नई सुपर किंग्स के विरुद्ध लगाया था.

एडम गिलक्रिस्ट

अपने दौर के सबसे तेज-तर्रार बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्ट ने आईपीएल में भी अपनी चमक बिखेरी और कई बड़ी पारियां खेलीं. इसी क्रम में सबसे ज्यादा शतक लगाने वाले बल्लेबाजों की सूची में वह चौथे स्थान पर हैं. गिलक्रिस्ट के नाम 80 मैचों में 2 शतक हैं.

ब्रैंडन मैकुलम

ब्रैंडन मैकुलम ने भी आईपीएल में अपने बल्ले से जमकर रन बरसाए हैं और इस दौरान उन्होंने कई बड़ी पारियां खेलीं हैं. आईपीएल का पहला ही शतक मैकुलम के नाम है. मैकुलम के नाम 92 मैचों में 2 शतक हैं और वह सबसे ज्यादा शतक लगाने के मामले में पांचवें स्थान पर आते हैं.

इन सभी बड़े बल्लेबाजों ने आईपीएल में जमकर जलवा बिखेरा है अब देखना ये होगा कि क्या ये बल्लेबाज इस आईपीएल में भी अपनी चमक बिखेरते हैं, या फिर कोई दूसरा बल्लेबाज इनकी सल्तनत को चुनौती देने में कामयाब हो पाता है.

आधी रात के बाद

18 नवंबर, 2016 की रात के यही कोई डेढ़ बजे मुंबई से सटे जनपद थाणे के उल्लासनगर के थाना विट्ठलवाड़ी के एआई वाई.आर. खैरनार को सूचना मिली कि आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेक्स की तीसरी मंजिल स्थित एक फ्लैट में काले रंग के बैग में लाश रखी है. सूचना देने वाले ने बताया था कि उस का नाम शफीउल्ला खान है और उस फ्लैट की चाबी उस के पास है.

35 साल का शफीउल्ला पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. रोजीरोटी की तलाश में वह करीब 8 साल पहले थाणे आया था, जहां वह उल्लासनगर के आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेकस के तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 308 में अपने परिवार के साथ रहता था. वह राजमिस्त्री का काम कर के गुजरबसर कर रहा था.

उस के फ्लैट से 2 फ्लैट छोड़ कर उस का मामा राजेश खान अपनी प्रेमिकापत्नी खुशबू उर्फ जमीला शेख के साथ रहता था. 10-11 महीने पहले ही खुशबू राजेश खान के साथ इस फ्लैट में रहने आई थी. वह अपना कमातीखाती थी, इसलिए वह राजेश खान पर निर्भर नहीं थी. राजेश खान कभीकभार ही उस के यहां आता था. ज्यादातर वह पश्चिम बंगाल स्थित गांव में ही रहता था.

18 नवंबर की दोपहर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर जा रहा था, तभी इमारत की सीढि़यों पर उस की मुलाकात राजेश खान से हो गई. उस समय काफी घबराया होने के साथसाथ वह जल्दबाजी में भी था. लेकिन शफीउल्ला सामने पड़ गया तो उस ने रुक कर कहा, ‘‘शफी, अगर तुम मेरे साथ नीचे चलते तो मैं तुम्हें एक जरूरी बात बताता.’’

‘‘इस समय तो मैं कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि मुझे बहुत तेज भूख लगी है. जो भी बात है, बाद में कर लेंगे.’’ कह कर शफीउल्ला जैसे ही आगे बढ़ा, राजेश खान ने पीछे से कहा, ‘‘यह रही मेरे फ्लैट की चाबी, रख लो. तुम्हारी मामी मुझ से लड़झगड़ कर कहीं चली गई है. मैं उसे खोजने जा रहा हूं. मेरी अनुपस्थिति में अगर वह आ जाए तो यह चाबी उसे दे देना. बाकी बातें मैं फोन से कर लूंगा.’’

राजेश खान से फ्लैट की चाबी ले कर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर चला गया तो राजेश खान नीचे उतर गया.  करीब 12 घंटे बीत गए. इस बीच न राजेश खान आया और न ही उस की पत्नी खुशबू आई. शफीउल्ला को चिंता हुई तो उस ने दोनों को फोन कर के संपर्क करना चाहा. लेकिन दोनों के ही नंबर बंद मिले.

शफीउल्ला सोचने लगा कि अब उसे क्या करना चाहिए. वह कुछ करता, उस के पहले ही रात के करीब एक बजे उस के फोन पर राजेश खान का फोन आया. उस के फोन रिसीव करते ही उस ने पूछा, ‘‘तेरी मामी आई या नहीं?’’

‘‘नहीं मामी तो अभी तक नहीं आई. यह बताओ कि इस समय तुम कहां हो?’’ शफीउल्ला ने पूछा.

‘‘तुम्हें राज की एक बात बताता हूं. अब तुम्हारी मामी कभी नहीं आएगी, क्योंकि मैं ने उसे मार दिया है. इस में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए. मेरे फ्लैट के बैडरूम में बैड के नीचे काले रंग का एक बैग पड़ा है, उसी में तुम्हारी मामी की लाश रखी है. तुम उसे ले जा कर कहीं फेंक दो. जल्दबाजी में मैं उसे फेंक नहीं पाया. इस समय मैं ट्रेन में हूं और गांव जा रहा हूं.’’

खुशबू की हत्या की बात सुन कर शफीउल्ला के होश उड़ गए. उस ने उस बैग के बारे में आसपड़ोस वालों को बताया तो सभी इकट्ठा हो गए. उन्हीं के सुझाव पर इस बात की सूचना शफीउल्ला ने थाना विट्ठलवाड़ी पुलिस को दे दी थी.

एआई वाई.आर. खैरनार ने तुरंत इस सूचना की डायरी बनवाई और थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट तथा पुलिस कंट्रोल रूम एवं पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर वह कुछ सिपाहियों के साथ राजाराम कौंपलेक्स पहुंच गए. रात का समय था, फिर भी उस फ्लैट के बाहर इमारत के काफी लोग जमा थे. उन के पहुंचते ही शफीउल्ला ने आगे बढ़ कर उन्हें फ्लैट की चाबी थमा दी.

फ्लैट का ताला खोल कर वाई.आर. खैरनार सहायकों के साथ अंदर दाखिल हुए तो बैडरूम में रखा वह काले रंग का बैग मिल गया. उन्होंने उसे हौल में मंगा कर खुलवाया तो उस में उन्हें एक महिला की लाश मिली.

बैग से बरामद लाश की शिनाख्त की कोई परेशानी नहीं हुई. शफीउल्ला ने उस के बारे में सब कुछ बता दिया. लाश बैग से निकाल कर वाई.आर. खैरनार जांच में जुट गए. वह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट, एसीपी अतितोष डुंबरे, एडिशनल सीपी शरद शेलार, डीसीपी सुनील भारद्वाज, अंबरनाथ घोरपड़े के साथ आ पहुंचे.

फोरैंसिक टीम के साथ पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण किया. अपना काम निपटा कर थोड़ी ही देर में सारे अधिकारी चले गए.

लाश के निरीक्षण में स्पष्ट नजर आ रहा था कि मृतका की बेल्ट से जम कर पिटाई की गई थी. उस के शरीर पर तमाम लालकाले निशान उभरे हुए थे. कुछ घावों से अभी भी खून रिस रहा था. उस के गले पर दबाने का निशान था. लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के सुरेंद्र शिरसाट ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए उल्लासनगर के मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

घटनास्थल की पूरी काररवाई निपटा कर सुरेंद्र शिरसाट थाने लौट आए और सहयोगियों से सलाहमशविरा कर के इस हत्याकांड की जांच एआई वाई.आर. खैरनार को सौंप दी.

वाई.आर. खैरनार ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई, जिस में उन्होंने एआई प्रमोद चौधरी, ए. शेख के अलावा हैडकांस्टेबल दादाभाऊ पाटिल, दिनेश चित्ते, अजित सांलुके तथा महिला सिपाही ज्योति शिंदे को शामिल किया.

पुलिस को शफीउल्ला से पूछताछ में पता चल गया था कि राजेश खान ने कत्ल कर के गांव जाने के लिए कल्याण रेलवे स्टेशन से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ ली है. अब पुलिस के लिए यह चुनौती थी कि वह गांव पहुंचे, उस के पहले ही उसे पकड़ ले. अगर वह गांव पहुंच गया और उसे पुलिस के बारे में पता चल गया तो वह भाग सकता था.

इस बात का अंदाजा लगते ही पुलिस टीम ने जांच में तेजी लाते हुए राजेश खान के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह जिस ट्रेन से गांव जा रहा था, वहां से उसे गांव पहुंचने में करीब 10 घंटे का समय लगता.

पुलिस टीम किसी भी तरह उसे हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी, इसलिए वाई.आर. खैरनार ने सीनियर अधिकारियों से बात कर के राजेश खान की गिरफ्तारी के लिए एआई ए. शेख और हैडकांस्टेबल माने को हवाई जहाज से कोलकाता भेज दिया. दोनों राजेश के पहुंचने से पहले ही हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए और उसे गिरफ्तार कर लिया.

26 साल के राजेश खान को मुंबई ला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुशबू से प्रेम होने से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

राजेश खान पश्चिम बंगाल के जनपद मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. गांव में वह मातापिता एवं भाईबहनों के साथ रहता था. गांव में उस के पास खेती की जमीन तो थी ही, बाजार में कपड़ों की दुकान भी थी, जो ठीकठाक चलती थी. उसी दुकान के लिए वह कपड़ा लेने थाणे के उल्लासनगर आता था. वह जब भी कपड़े लेने उल्लासनगर आता था, अपने भांजे शफीउल्ला से मिलने जरूर आता था.

24 साल की खुशबू उर्फ जमीला से राजेश खान की मुलाकात उस की कपड़ों की दुकान पर हुई थी. वह उसी के गांव के पास की ही रहने वाली थी. उस की शादी ऐसे परिवार में हुई थी, जिस की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वह जिन सपनों और उम्मीदों के साथ ससुराल आई थी, वे उसे पूरे होते नजर नहीं आ रहे थे. खुली हवा में सांस लेना घूमनाफिरना, मनमाफिक पहननाओढ़ना उस परिवार में कभी संभव नहीं था.

इसलिए जल्दी ही वहां खुशबू का दम घुटने लगा. खुली हवा में सांस लेने के लिए उस का मन मचल उठा. दुकान पर आनेजाने में जब उस ने राजेश खान की आंखों में अपने लिए चाहत देखी तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी.

चाहत दोनों ओर थी, इसलिए कुछ ही दिनों में दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जल्दी ही उन की हालत यह हो गई कि दिन में जब तक दोनों एक बार एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता. उन के प्यार की जानकारी गांव वालों को हुई तो उन के प्यार को ले कर हंगामा होता, उस के पहले ही वह खुशबू को ले कर मुंबई आ गया और किराए का फ्लैट ले कर उसी में उस के साथ रहने लगा. मुंबई में उस ने उस से निकाह भी कर लिया.

मुंबई पहुंच कर खुशबू ने आत्मनिर्भर होने के लिए एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली. इस से राजेश खान चिंता मुक्त हो गया. वह महीने में 10-15 दिन मुंबई में खुशबू के साथ रहता था तो बाकी दिन गांव में रहता था.

मुंबई आ कर खुशबू में काफी बदलाव आ गया था. ब्यूटीपार्लर में काम करने के बाद उस के पास जो समय बचता था, उस समय का सदुपयोग करते हुए अधिक कमाई के लिए वह बीयर बार में काम करने चली जाती थी. पैसा आया तो उस ने रहने का ठिकाना बदल दिया. अब वह उसी इमारत में आ कर रहने लगी, जहां शफीउल्ला अपने परिवार के साथ रहता था. वहां उस ने सुखसुविधा के सारे साधन भी जुटा लिए थे.

खुशबू के रहनसहन को देख कर राजेश खान के मन संदेह हुआ. उस ने उस के बारे में पता किया. जब उसे पता चला कि खुशबू ब्यूटीपार्लर में काम करने के अलावा बीयर बार में भी काम करती है तो उस ने उसे बीयर बार में काम करने से मना किया. लेकिन उस के मना करने के बावजूद खुशबू बीयर बार में काम करती रही. इस से राजेश खान का संदेह बढ़ता गया.

18 नवंबर की सुबह खुशबू बीयर बार की ड्यूटी खत्म कर के फ्लैट पर आई तो राजेश खान को अपना इंतजार करते पाया. उस समय वह काफी गुस्से में था. उस के पूछने पर खुशबू ने जब सीधा उत्तर नहीं दिया तो वह उस पर भड़क उठा. वह उस के साथ मारपीट करने लगा तो खुशबू ने साफसाफ कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं वहीं करूंगी.’’

‘‘खुशबू, तुम मेरी पत्नी ही नहीं, प्रेमिका भी हो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. तुम अपनी ब्यूटीपार्लर वाली नौकरी करो, मैं उस के लिए मना नहीं करता. लेकिन बीयर बार में काम करना मुझे पसंद नहीं है. मैं नहीं चाहता कि लोग तुम्हें गंदी नजरों से ताकें.’’

‘‘मैं जो कर रही हूं, सोचसमझ कर कर रही हूं. अभी मेरी कमानेखाने की उम्र है, इसलिए मैं जो करना चाहती हूं, वह मुझे करने दो.’’ कह कर खुशबू बैडरूम में जा कर कपड़े बदलने लगी.

राजेश खान को खुशबू से ऐसी बातों की जरा भी उम्मीद नहीं थी. वह भी खुशबू के पीछेपीछे बैडरूम में चला गया और उसे समझाने की गरज से बोला, ‘‘इस का मतलब तुम मुझे प्यार नहीं करती. लगता है, तुम्हारी जिंदगी में कोई और आ गया है?’’

‘‘तुम्हें जो समझना है, समझो. लेकिन इस समय मैं थकी हुई हूं और मुझे नींद आ रही है. अब मैं सोने जा रही हूं. अच्छा होगा कि तुम अभी मुझे परेशान मत करो.’’

खुशबू की इन बातों से राजेश खान का गुस्सा बढ़ गया. उस की आंखों में नफरत उतर आई. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘मेरी नींद को हराम कर के तुम सोने जा रही हो. लेकिन अब मैं तुम्हें सोने नहीं दूंगा.’’

यह कह कर राजेश खान खुशबू की बुरी तरह से पिटाई करने लगा. हाथपैर से ही नहीं, उस ने उसे बेल्ट से भी मारा. इस पर भी उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो फर्श पर पड़ी दर्द से कराह रही खुशबू के सीने पर सवार हो गया और दोनों हाथों से उस का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

खुशबू के मर जाने के बाद जब उस का गुस्सा शांत हुआ तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे जेल जाने का डर सताने लगा. वह लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को फ्लैट में ही छिपा कर गांव भाग जाने में अपनी भलाई समझी. उस का सोचना था कि अगर वह गांव पहुंच गया तो पुलिस उसे कभी पकड़ नहीं पाएगी.

उस ने बैडरूम मे रखे खुशबू के बैग को खाली किया और उस में उस की लाश को मोड़ कर रख कर उसे बैड के नीचे खिसका दिया. वह दरवाजे पर ताला लगा कर बाहर निकल रहा था, तभी उस का भांजा शफीउल्ला उसे सीढि़यों पर मिल गया, जिस की वजह से खुशबू की हत्या का रहस्य उजागर हो गया.

घर की चाबी शफीउल्ला को दे कर वह सीधे कल्याण रेलवे स्टेशन पहुंचा और वहां से कोलकाता जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव के लिए चल पड़ा.

राजेश खान से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ अपराध संख्या 324/2016 पर खुशबू की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एआई वाई.आर. खैरनार कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित 

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