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Baba Bageshwar : हिंदू एकता का प्रपंच

Baba Bageshwar : यह देहाती कहावत थोड़ी पुरानी और फूहड़ है कि मल त्याग करने के बाद पीछे नहीं हटा जाता बल्कि आगे बढ़ा जाता है. आज की भाजपा और अब से कोई सौ सवा सौ साल पहले की कांग्रेस में कोई खास फर्क नहीं है. हिंदुत्व के पैमाने पर कौन से हिंदूवादी आगे बढ़ रहे हैं और कौन से पीछे हट रहे हैं, आइए इस को समझाने की कोशिश करते हैं.

हिंदुत्व के नए और लेटैस्ट पोस्टरबौय बागेश्वर बाबा उर्फ धीरेंद्र शास्त्री की हिंदू एकता यात्रा के आखिरी दिन बुंदेलखंड के छोटे से कसबे ओरछा में लाखों की तादाद में सवर्ण हिंदू भक्त देशभर से पहुंचे थे. इस 9 दिनी यात्रा का घोषित मकसद एक नारे की शक्ल में यह था कि जातपांत की करो विदाई, हम हिंदू हैं भाईभाई. अब यह बाबा भी शायद ही बता पाए कि आखिर यह हिंदू शब्द क्या बला है और जो थोड़ाबहुत है भी तो उस से यह साफ फिर भी नहीं होता कि क्या सभी हिंदू हैं, यानी दलित भी हिंदू हैं या सदियों पहले की तरह केवल सवर्ण ही हिंदू हैं और अगर वही हिंदू हैं तो उन में अद्भुत एकता है. ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों में कोई आपसी मतभेद नहीं है क्योंकि उन में रोटीबेटी के संबंध हैं.

इस हिंदू या सनातन एकता यात्रा के संपन्न होने के बाद यकीन मानें, कोई सवर्ण किसी दलित के घर, अपनी बेटी तो दूर की बात है, बेटे का भी रिश्ता ले कर यह कहते नहीं गया कि आओ भाई, आज से हमतुम दोनों हिंदू हैं. अब समधी बन जाना शर्म की नहीं बल्कि फख्र की बात है. बागेश्वर बाबा ने हमें हिंदू होने के असल माने समझा दिए हैं तो जातपांत की विदाई की पहली डोली अपने ही आंगन से उठाते एकता की मिसाल कायम करते हैं. यह रिश्तेदारी कायम करना तो दूर की बात है, हिंदू एकता यात्रा के साक्षी बने सवर्णों ने रास्ते में किसी दलित के घर पानी भी नहीं पिया, फिर आग्रह कर खाना खाना तो दूर की बात है, जिसे राजनेता बतौर दिखाने, कभीकभी करते हैं.

असल में मुसलमानों का खौफ दिखाती और हर स्तर पर उन के बहिष्कार की अपील करती इस यात्रा में लगभग सभी सवर्ण थे. दलित न के बराबर भी नहीं थे. जातिगत एकता की बात और दुहाई कतई नई बात नहीं है. सब से पहले यह मुद्दा आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने उठाया था. बीती 6 अक्तूबर को राजस्थान के बारां में उन्होंने एक बार फिर कहा कि हिंदू समाज को अपनी सुरक्षा के लिए मतभेद भुला कर एकजुट हो जाना चाहिए.

हिंदू किस से असुरक्षित

अब न तो यह मोहन भागवत बताते और न ही कोई बागेश्वर बाबा बताता कि हिंदू असुरक्षित किस से है और हिंदुओं के ही अलावा उसे खतरा किस से है. इन दोनों किस्मों के लोग डर मुसलमानों और ईसाईयों का दिखाते हैं. देश का यह वह दौर है जिस में सवर्ण यानी पूजापाठी हिंदू लगातार कट्टर होता जा रहा है, जबकि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को इस तरह के नारों, भाषणों व यात्राओं से कोई सरोकार ही नहीं है, इसलिए नहीं कि वह पूजापाठी नहीं है बल्कि इसलिए कि वह इसलाम या ईसाईयत को खतरा नहीं मानता. उलटे, कई मानो में तो वह खुद को सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले इन से ज्यादा नजदीकी महसूस करता है.

कभी किसी दलित नेता या दलित धर्मगुरु ने इस आशय की कोई बात नहीं कही और न ही इस नए नारे का समर्थन किया कि बंटेंगे तो कटेंगे. यह मांग और मुहिम सवर्णों की है जिसे आकार और आवाज ब्राह्मण दे रहे हैं. ये वही ब्राह्मण हैं जो सदियों से दलितों को धर्मग्रंथों की बिना पर लतियाते रहे हैं लेकिन आज उन्हें गले लगाने का ड्रामा कर रहे हैं जिसे दलित बखूबी सम?ा रहा है.

जाति व्यवस्था पर चुप्पी

बारीकी से देखें तो अंदरूनी तौर पर हालात एकदम उलट हैं. बात जातिगत भेदभाव मिटाने या खत्म करने की की जा रही है लेकिन वर्णव्यवस्था, जो इस फसाद की जड़ है, पर न बाबा बागेश्वर कुछ बोल रहे और न ही मोहन भागवत. फिर किसी भाजपा नेता से तो इस विषय पर कुछ सुनने की उम्मीद करना ही बेकार की बात है.

इस ड्रामे की पोल खोलते मध्य प्रदेश के प्रमुख दलित नेता और कांग्रेसी विधायक फूल सिंह बरैया कहते हैं कि भाजपाई और धर्मगुरु यात्राओं के जरिए नरेंद्र मोदी के इशारे पर गुंडागर्दी कर रहे हैं. ये लोग दलितों के हमदर्द न कभी पहले थे और न आज हैं. ये लोग असल मुद््दों से लोगों का ध्यान बंटा रहे हैं. ये दलितों को अगर मंदिर बुला रहे हैं तो उन का मकसद और मंशा दलितों से मंदिरों में झाड़ूबुहारी करवाना और अपने चप्पलजूतों की रखवाली करवाना है. दिक्कत तो यह भी है कि इस धार्मिक होहल्ले में कोई बेरोजगारी और महंगाई की बात नहीं करता. बरैया हिंदू शब्द पर भी सवाल उठाते कहते हैं कि आखिर हिंदू है कौन, किसी धर्मग्रंथ में हिंदू शब्द का उल्लेख नहीं है.

यह एक खूबसूरत तर्क हो सकता है लेकिन मौजूदा समस्याओं का हल इसे भी नहीं कहा जा सकता. अगर किसी धर्मग्रंथ में या पौराणिक साहित्य में हिंदू शब्द का उल्लेख होता तो क्या ये समस्याएं हल हो जातीं और दरअसल समस्याएं हैं क्या जो आम लोगों को बेचैन किए हुए हैं तो सम?ा आता है कि असल समस्या महंगाई या बेरोजगारी नहीं है बल्कि धर्म है, जाति है और उस से भी बड़ी है भारतीय दिलोदिमाग में पसरी वर्णव्यवस्था, धार्मिक भेदभाव और ऊंचनीच. दलित विचारकों या विद्वानों ने कभी हिंदू एकता की वकालत नहीं की. उलटे, वे वर्णव्यवस्था को खत्म करने की बात करते रहे. लेकिन आजकल के दलित नेता इस पर कुछ नहीं बोलते क्योंकि वे तमाम सिरे से संघ और भाजपा की धार्मिक तिजोरी में दलित हितों और अस्मिता को गिरवी रख सत्ता की मलाई चाट रहे हैं.

अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत में बसपा प्रमुख पानी पीपी कर वर्णव्यवस्था को कोसते कांशीराम का दिया यह नारा बुलंद करती रहती थीं कि, ‘तिलक तराजू और तलवार इन को मारो जूते चार.’ जब वही मायावती यह कहने लगीं कि, ‘ब्रह्मा, विष्णु, महेश है, हाथी नहीं गणेश है’ तो दलितों ने उन्हें और बसपा को खारिज कर दिया. मायावती और बसपा दोनों अब सियासी दौड़ से बाहर हैं और खुद को ठगा सा महसूस कर रहे दलित समुदाय का बड़ा हिस्सा सचमुच में ब्रह्मा, विष्णु और महेश वालों की पार्टी को वोट देने को मजबूर हो गया.

संविधान है पर मुद्दे नहीं

संविधान हाथ में ले कर घूम रही कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को लोकसभा चुनाव में जरूर उस ने वोट दिया लेकिन पहले हरियाणा और फिर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि दलित समुदाय धार्मिक चकाचौंध और बाबाओं के फैलाए जाल में फंसता जा रहा है क्योंकि वह जातिगत भेदभाव दूर करने के नारे में छिपी वर्णव्यवस्था को नहीं देख पा रहा है जिसे दूर और खत्म करने के लिए कभी नामचीन दलित नेताओं ने हिंदू धर्म तक छोड़ दिया था. इन में संविधान निर्माता डाक्टर भीमराव अंबेडकर का नाम सब से ऊपर है.

उन्होंने कहा था, ‘जातिव्यवस्था और वर्णव्यवस्था एकदूसरे से अलग नहीं हैं. वर्णव्यवस्था ने जातिव्यवस्था को वैधता प्रदान की और इस से दलित समुदाय पर अत्याचार हुए. ज्योतिराव फुले वर्णव्यवस्था को ब्राह्मण वर्ग द्वारा दलित और शूद्र समुदाय के शोषण का उपकरण मानते थे. दक्षिण भारत के दलित चिंतक और सुधारक ई वी रामास्वामी पेरियार भी मानते थे कि ब्राह्मणवाद और वर्णव्यवस्था दलितों व गैरब्राह्मणों के शोषण का आधार हैं. बी एस वेंकटराव की दलील यह थी कि वर्णव्यवस्था ने केवल सामाजिक अन्याय को ही नहीं बल्कि आर्थिक असमानता को भी जन्म दिया. दलितों को उन के श्रम और संसाधनों से वंचित कर उन्हें हमेशा निर्भर बनाए रखा.

दलितों की दोयम स्थिति

इन सभी ने इस रोग से छुटकारे की दवा शिक्षा को बताया था लेकिन दलित शिक्षा का हाल यह है कि आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करने वाली एक याचिका पर अपना फैसला सुनाते सुप्रीम कोर्ट की बैंच के एक जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा था कि सब से पिछड़े वर्गों के लगभग 50 फीसदी छात्र कक्षा 5 के पहले और 75 फीसदी कक्षा 8 के पहले स्कूल छोड़ देते हैं. हाईस्कूल लैवल पर तो यह आंकड़ा 95 फीसदी तक पहुंच जाता है. यानी एक फीसदी दलित भी स्नातक नहीं हो पाते. ऐसे में वे शायद ही बटेंगे तो कटेंगे जैसे नारों की हकीकत सम?ा पाएंगे. बकौल फूल सिंह बरैया, भाजपा हिंदू एकता यात्रा जैसी मुहिम से लोगों को वेबकूफ बना रही है जिस से लंबे समय तक राज किया जा सके.

किसी धर्मगुरु संघ प्रमुख या हिंदूवादी नेता की मंशा जाति या वर्णव्यवस्था को खत्म करने की नहीं है क्योंकि यही हिंदू, वैदिक या सनातन धर्म कुछ भी कह लें, की बुनियाद है जिस पर सत्ता के महल और मंदिर खड़े होते हैं. इन सब का मैसेज यह है कि दलित, पिछड़े और आदिवासी सवर्णों की बादशाहत स्वीकारते फिर से उन की गुलामी ढोएं, इस से ही उन के पाप धुलेंगे. यह पाप छोटी जाति और नीच योनि में पैदा होना है. ये वे भाजपाई हिंदू हैं जो पीछे हटने की कोशिश में वक्तीतौर पर आगे बढ़ते जा रहे हैं और कांग्रेसी हिंदू आगे बढ़ने की कोशिश के बाद भी पिछड़ते जा रहे हैं क्योंकि उन के पूर्वज लोकमान्य तिलक जैसे घोर मनुवादी नेता भी थे.

आज भी कांग्रेस में ऐसे नेताओं की भरमार है जिन्हें वर्णव्यवस्था से कोई एतराज नहीं. वे सिर्फ गांधीनेहरू परिवार के कंधों पर सवार हो कर सत्ता की मलाई चाट लेना चाहते हैं और वहां न मिले तो भाजपा के द्वार तो इन के लिए खुले ही हुए हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और सुरेश पचोरी जैसे दर्जनों नेता अपने ब्राह्मण होने का गरूर टूटने से बचाने के लिए भाजपा की गोद में जा बैठे. दरअसल ये नेता तिलक के मनुवादी संस्कारों से ग्रस्त थे कि दलितों और औरतों को शिक्षा का अधिकार नहीं और जातिव्यवस्था व वर्णव्यवस्था उन के भले के लिए बनाई गई थीं.

 

 

 

Superstition : तेरहवीं के भोज के नाम पर लूटपाट

Superstition :  मौत के बाद, बजाए शरीर के ख़ाक होने के, व्यक्ति के साथ क्या होता है इस का कोई प्रमाण नहीं. बावजूद हिंदूओं में मृत्यपरांत धार्मिक कर्मकांड भरे पड़े हैं. इस के केंद्र में पंडे हैं जो दानदक्षिणा की धंधा चलाए रखना चाहते हैं.

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक पोस्ट दिखी जिस में एक इमेज थी. इमेज में मुंबई के ताजमहल होटल में 5-7 बजे एक शोक सभा का आयोजन किया गया था और जिस में लिखा था, ‘नो होम विजिट प्लीज’ यानी ‘कृपया घर पर न आएं.’ यह यूनीक तरीका था परिवार जन द्वारा शोक संदेश देने का.

पहले इस तरह के दुख की घड़ी में आसपास के पड़ोसी, दोस्तरिश्तेदारों का महीने तक परिवार को ढांढस देने के लिए घर पर आनाजाना लगा रहता था. लेकिन आजकल लोग लिखने लगे हैं कि कोई हमारे घर न आएं. न परिवार, न दोस्त, न पड़ोसी किसी को खुद के करीब आने नहीं देना चाहते.

एक बार तो आप भी हैरान हो रहे होंगे कि भला ये क्या बात हुई कि शोक की इस घड़ी में संवेदना देने वालों को घर पर आने से मना किया जा रहा है और शोक सभा एक होटल में आयोजित की जा रही है. लेकिन वास्तव में ध्यान से व्यवहारिक हो कर सोचेंगे तो आप को शोक सभा का यह आयोजन और “कृपया घर पर न आएं” संदेश का उद्देश्य समझ आएगा और उन का यह निर्णय सही लगेगा.

आइए जानते हैं कैसे –

हाल में मेरे किसी नजदीकी का देहांत हो गया और उन की मृत्यु के दिन से ले कर तेरहवीं और उस के बाद के कार्यक्रमों में मैं ने जो देखा और महसूस किया, मुझे मुंबई वाला शोक सभा का आयोजन बिल्कुल सही और व्यवहारिक लगा.

दरअसल हमारे समाज में जीवन से ले कर मौत में पंडों का बिजनेस चल रहा है. किसी जाने वाले के परिवार की मानसिक, आर्थिक स्थिति से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है. मतलब मरने के बाद भी बिजनेस चल रहा है और पाखंड का अंत नहीं हो रहा.

एक तो जिस का कोई अपना चला गया वह उस दुख से दुखी है ऊपर से कभी भी, किसी भी समय पर घर पर, किसी का शोक प्रकट करने के लिए चले आना, किसी का मिलने आने का कोई निश्चित टाइम नहीं. कई जगहों पर तो लोग हर रोज मिलने, शोक प्रकट करने आ जाते हैं और बैठक रहती है यानी जबरन शोक मनाया जाता है, यह कहां तक सही है?

धर्म के नाम पर डराना

एक तो किसी का अपना दुनिया से चला गया ऊपर से चौथा, तेरहवीं, श्राद्ध, त्रिपिंडी, ब्राह्मणभोज जैसी रस्मों से ले कर नारायण बलि, रुद्राभिषेक, पूजा सामग्री और प्रसाद की व्यवस्था. इन कार्यक्रमों पर, डैकोरेशन, भजनमंडली, म्यूजिक सिस्टम, खानापीना इन सब के खर्चे जीतेजागते इंसान को मारने के लिए काफी हैं. समझ नहीं आता जो बेचारा अभी किसी अपने को बचाने के लिए अस्पताल का लाखों का बिल भर कर आ रहा है मृत्युपरांत उस पर पाखंड और आडंबर का बोझ क्यों डालना.

तेरहवीं में ब्राह्मणभोज और लंबीचौड़ी दानदक्षिणा के नाम पर मृतक के परिवार वालों को डराया जाता है. कहा जाता है ब्राह्मणों द्वारा यह सब क्रिया न कराई गई तो मृतक की आत्मा पर ब्राह्मणों का कर्ज चढ़ जाता है. भले ही ब्राह्मणों के इस कर्ज को उतारने के चक्कर में जीता जागता इंसान कर्ज के बोझ तले दुनिया से चला जाए.

मृत्यु भोज (तेरहवीं) भारतीय समाज में व्याप्त एक बुराई

मृत्यु भोज (तेरहवीं) भारतीय समाज में व्याप्त एक बुराई है. न चाहते हुए भी कई लोगों को ये करना पड़ता है. दरअसल, तेरहवीं संस्कार समाज के चंद पाखंडी, लालची और चालाक लोगों के दिमाग की उपज है.

किसी व्यक्ति की मृत्यु पर लजीज व्यंजनों को खा कर शोक मनाना क्या किसी ढोंग से कम नहीं? किसी घर में खुशी का मौका हो तो समझ आता है कि मिठाई बना कर खिला कर खुशी का इजहार किया जाए लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाइयां परोसा जाना क्या यह शर्मनाक परंपरा नहीं है?

शोक और जश्न में कोई अंतर नहीं

लोग क्या कहेंगे की बुनियाद पर टिके हैं ये आडंबर. घर के किसी सदस्य के दुनिया से चले जाने पर किसी को खुशी नहीं होती, फिर भी अधिकांश लोग धर्म के डर और लोकलाज के चक्कर में ये सब करते हैं. शादी समारोह की तरह लोग किसी अपने के चले जाने पर भी लाखों रुपए खर्च करने को मजबूर हैं. भले ही कर्जा उठा कर खर्च करना पड़े.

सभ्य और शिक्षित समाज में यह अजीबोगरीब लगता है कि शोक मनाने के लिए आने वाले परिचितों रिश्तेदारों को स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जाते हैं. कई जगह तो शराब तक पिलाई जाती है. इतना ही नहीं, तेरहवीं पर नाचगाना होता है और बेटियों को कपड़ों के साथ सोनेचांदी के गिफ्ट तक दिए जाते हैं. कुछ जगह तो मृत्युभोज के साथसाथ भोज में आए लोगों को भी नकद रुपए, मिठाई का डिब्बा और गिफ्ट भी दिए जाते हैं. शोक और जश्न में कोई अंतर नजर नहीं आता.

कहीं पर यह संस्कार एक ही दिन में किया जाता है तो कहीं तीसरे दिन से शुरू हो कर बारहवेंतेरहवें दिन तक चलता है. कुछ लोग तो दिखावे और शान के लिए 500–1000 लोगों तक को मृत्युभोज करवाते हैं. यानी रिवाज के नाम पर एक और बेमतलब का ढोंग और मरने वाले के बाद परिवार पर जबरन खर्च करने का प्रेशर. तेरहवीं तक मृत्युभोज पर एक सामान्य परिवार का औसत खर्च दो लाख रुपए तक आता है.

कई बार तो यह भी सुनने में आता है कि मृतक बेहद गरीब परिवार से था, घर वालों के पास तेरहवीं के लिए पैसे नहीं थे लेकिन समाज और धर्म के डर से मृतक के परिवार ने कर्ज ले कर मृत्यु भोज कराया. पंडे और नातेरिश्तेदार तो तेरहवीं के कर्मकांड में आ कर चला जाते हैं और बाद में वह परिवार किस तरह अपना घर चला रहा है इस से किसी को मतलब नहीं होता.

कई बार गांवों में तो बिरादरी से निकाले जाने के भय से मृतक का पूरा परिवार इसलिए आत्महत्या तक कर लेता है क्योंकि उन के पास उन की पूरी बिरादरी को मृत्युभोज कराने का इंतजाम नहीं होता.

पहले ऐसा नहीं होता था

बुजुर्ग बताते हैं कि उन के जमाने में ऐसा नहीं था. मृत व्यक्ति के घर 12 दिन तक कोई भोजन नहीं बनता था. 13वें दिन कुछ सादे क्रियाकर्म होते थे और ब्राह्मणों एवं घरपरिवार के लोगों का खाना बनता था. शोक तोड़ दिया जाता था बस. किसी की मृत्यु होने पर समाज के लोग कपड़े, घर से अनाज, राशन, फल, सब्जियां इत्यादि ले कर मृतक के घर पहुंचते थे. लोगों द्वारा लाई गई सामग्री से ही भोजन बना कर लोगों को खिलाया जाता था.

पाखंड में एक और एडिशन भजनमंडली

आजकल एक नया आडंबर होने लगा है शोक सभा में धन खर्च कर भजनमंडली को बुलाना. यह संगीतमय कार्यक्रम करवाया जाता है. लोग इस दौरान फ्यूनरल आर्टिस्ट्स को भजनकीर्तन और शांतिपाठ के लिए भी बुलाते हैं. इन सब का खर्च अलग से होता है. इस सब का क्या औचित्य है? समझ नहीं आता भजन कर के क्यों लोगों को बोर करना, शोक सभा में भजन कार्यक्रम की आखिर क्या जरूरत है? आप को जान कर हैरानी होगी भजनमंडली का गायक जितना फेमस होगा वह उतना अधिक पैसा चार्ज करेगा, यानी यहां भी धर्म का धंधा और पैसे वालों की शो बाजी. मैं ने देखा शोकसभा के लिए हौल में डैकोरेशन कराने का चलन भी बढ़ रहा है जैसे यह कोई शादीब्याह जैसा खुशी का मौका हो.

व्यर्थ का आडंबर क्यों

मृत्युभोज बंद कर के शोक के दिन घटाए जाने चाहिए. परंपराओं की आड़ में आडंबर बंद होना चाहिए. घर के किसी सदस्य के दुनिया से चले जाने पर शादी से ज्यादा खर्च होने लगा है. ऐसे खर्चों से संपन्न लोगों को फर्क नहीं पड़ता, मगर उन का अनुसरण करते हुए गरीब लोग कर्ज उठा कर खर्च करते हैं. अपनों को खोने का दुख और ऊपर से भजन मंडली, हवन, पंडितों की दानदक्षिणा का भारी भरकम खर्च, यह किसी आम इंसान के गले की गड्डी से कम नहीं.

Suicide : हर 40 मिनट में एक युवा जान दे रहा है, कहां है सरकार

Suicide : यदि देश में सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था कायम हो. सबको समान अवसर उपलब्ध हों, सबको समान शैक्षिक संसाधन प्राप्त हों, तो उनका मानसिक दबाव बहुत हद तक कम हो जाएगा. गाँव के स्कूल से पढ़ कर आने वाले बच्चे की क्षमता वही होगी जो शहर के स्कूल में पढ़ कर निकले बच्चे की होगी. लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाने की मंशा किसी सरकार की नहीं रही.

कोविंद कमेटी का गठन

सरकार वन नेशन वन इलेक्शन के लिए जान दिए दे रही है. इसके लिए बाकायदा कोविंद कमेटी का गठन किया गया. उस कमेटी के सुझावों पर फ़टाफ़ट बिल भी तैयार हो गया और सदन में प्रस्तुत भी कर दिया गया. अब बिल पास कराने के लिए दोनों सदनों में सिर फुटव्वल भी होगी और अंततः बिल पास करवा लिया जाएगा.
मगर लाखों छात्रों की मौतों और लगातार हो रही मौतों के बावजूद सरकार वन नेशन वन एजुकेशन की बात पर विचार नहीं करेगी क्योंकि पूरे देश में जिस तरह के शिक्षा तंत्र का जंजाल बिछाया गया है उसमें संतरी से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार का पैसा निर्विघ्न पहुंच रहा है. लिहाजा इस सिस्टम को बदलने या सुधारने की मंशा किसी की नहीं है, भले देश के युवा अवसाद में डूब कर आत्महत्याएं करते रहें.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार बीते 5 वर्षों में 59 हजार से ज्यादा छात्रों ने अपनी जान दी है. देश में हर दिन 35 से ज्यादा छात्र आत्महत्या कर रहे हैं. साल 2018 से 2022 तक देश में 59,153 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी. देश का हर समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल्स हर दिन बच्चों की आत्महत्या की ख़बरों से रंगे रहते हैं. मगर सरकार आंखों पर पट्टी चढ़ाये हुए है.

झकझोरती Suicide की घटनाएं

9 सितंबर 2024 : गुवाहाटी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी ) में कंप्यूटर साइंस के तृतीय वर्ष के छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उत्तर प्रदेश के रहने वाले छात्र का शव ब्रह्मपुत्र हॉस्टल के उसके कमरे में मिला. वह कंप्यूटर साइंस में तीसरे वर्ष का छात्र था. वह मानसिक रूप से काफी दबाव में था.

10 अक्टूबर 2024 : आईआईटी कानपुर में पीएचडी छात्रा प्रगति ने हॉस्टल में आत्महत्या कर ली. 28 वर्षीय प्रगति अर्थ साइंस से पीएचडी फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही थी. चकेरी थाना क्षेत्र स्थित सनीगंवा सजारी में रहने वाले उसके पिता गोविंद खारया लाला पुरुषोत्तम दास ज्वेलर्स में स्टॉक मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं. अपनी होनहार बेटी से उन्हें बहुत उम्मीदें थीं. प्रगति बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थी, उसने दिल्ली के हंसराज कॉलेज से बीएससी, झांसी के बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से एमएससी की थी. इसके बाद वह आईआईटी कानपुर से पीएचडी कर रही थी.

23 अक्टूबर 2024 : आईआईटी दिल्ली में पढ़ रहे देवघर के होनहार छात्र का कमरे में पंखे से लटका शव मिला. दिल्ली के अरावली छात्रावास स्थित अपने कमरे में देर रात यश कुमार नामक छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. 21 वर्षीय यश एमएससी सेकंड ईयर का छात्र था. वह काफी समय से डिप्रेशन में था. यश के पिता अनिल कुमार झा देवघर उपायुक्त कार्यालय में विधि शाखा में लिपिक थे और 30 सितंबर को वे सेवानिवृत्त हुए थे.

24 अक्टूबर 2024 : रुदौली क्षेत्र के भेलसर गांव में 17 वर्षीय छात्र सक्षम ने पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. छात्र अयोध्या में अपनी बुआ के पास रहकर इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा था. घर के सभी सदस्य बाहर थे जब उसने यह आत्मघाती कदम उठाया.

26 अक्टूबर 2024 : दिल्ली के जामिया नगर थाना क्षेत्र के शाहीन बाग में एक छात्रा ने सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली. 17 वर्षीय छात्रा जेईई की तैयारी कर रही थी. इस परीक्षा में पास न होने के चलते उसने यह आत्मघाती कदम उठाया. छात्रा के पास एक सुसाइड नोट भी मिला है. जिसमें उसने लिखा है कि वह परिवार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी. मृतका के पिता निजी कंपनी में नौकरी करते हैं और उसकी मां गृहिणी हैं.

Student Suicide – एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया के अनुसार

स्टूडेंट सुसाइड – एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जहाँ हर साल 2 फीसदी की दर से आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं, वहीं छात्रों में आत्महत्या की दर 4 फीसदी प्रतिवर्ष के हिसाब से बढ़ रही है. यानी देश में आत्महत्या के जितने मामले हर साल आते हैं, उनमें छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा होती है.

आंकड़े बताते हैं कि साल 2021 में 13,089 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि, साल 2022 में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की. वहीं 2018 से 2020 के दौरान कुल 33,020 छात्रों ने आत्महत्या कर ली. छात्र आत्महत्या की घटनाएं जनसंख्या वृद्धि दर और कुल आत्महत्या ट्रेंड दोनों को पार करती जा रही हैं. पिछले दशक में, जबकि 0-24 साल की आयुवर्ग आबादी 58.2 करोड़ से घटकर 58.1 करोड़ हो गई, वहीं छात्र आत्महत्याओं की संख्या 6,654 से बढ़कर 13,044 हो गई.

भारत की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी युवा है लेकिन, अब इसी देश में हर 40 मिनट में एक युवा अपनी जान दे रहा है. स्टूडेंट सुसाइड – एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया ने अंतर्राष्ट्रीय करियर और कॉलेज परामर्श (आइसी3) की सालाना कॉन्फ्रेंस में अपनी रिपोर्ट साझा की है. इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है. बता दें कि आइसी3 एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है जो पूरी दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है.

Mental Health और Suicide

छात्रों की आत्महत्या के ज्यादातर मामलों में वजह मेंटल हेल्थ है. अवसाद, हताशा, चिंता, दबाव, निराशा, बेइज्जत होने का डर जैसे कारक छात्रों को ऐसी मानसिक स्थिति की तरफ धकेल रहे हैं जो अंततः उन्हें आत्महत्या के लिए प्रेरित करती है. यूनिसेफ की मेंटल हेल्थ सम्बंधी एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में 15 से 24 साल का हर 7 में से एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या से जूझ रहा है
. यह मानसिक समस्या इसलिए है क्योंकि कम्पटीशन के दौर में हर छात्र पर यह दबाव है कि वह कुछ बन कर दिखाए. हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में है. नहीं निकल पाया तो जीवन को व्यर्थ समझने की मानसिकता से ग्रस्त हो जाता है. इस नकारात्मक भाव से उबरने में उसके मातापिता, भाईबहन, दोस्त, समाज, स्कूल-कॉलेज के टीचर कोई भी उसकी मदद नहीं करते, उलटे ताने मार मार कर उसकी मानसिक स्थिति को और बदतर बना देते हैं.

जब भी किसी छात्र की आत्महत्या की कोई खबर आती है तो हम उसके माता पिता को दोष देने लगते हैं कि हो ना हो उन्होंने ही अपने बच्चे से बहुत अधिक अपेक्षाएं पाल रखी होंगी. आखिर माँ बाप बच्चों से अपेक्षाएं क्यों ना रखें?
एक बाप दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करता है ताकि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सके और उन्हें उच्च अधिकारी बना सके ताकि जो अभावग्रस्त जीवन उसने जिया है वह उसके बच्चों को ना जीना पड़े. वह कर्ज लेता है, बीवी के गहने बेचता है, मकान-जमीन गिरवी रख देता है ताकि अपने बच्चों की उच्च शिक्षा और कम्पटीशन में सफल होने के लिए अच्छी कोचिंग दिलवा सके.

आईएएस-आईपीएस बनने का सपना आँखों में लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर, शादीपुर, आजादपुर, कालकाजी जैसे क्षेत्रों में किराए पर रह रहे छात्रों से बात करने पर पता चलता है, कि कभी कभी उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते हैं. दो जोड़ी कपड़ों में पूरा साल निकाल देते हैं. एक एक कमरे में चार चार, छह-छह लड़के एकसाथ रहते हैं.पिता ने जैसे तैसे करके उनकी महंगी ट्यूशन के लिए पैसे का जुगाड़ किया और दिल्ली भेजा, इस उम्मीद से कि आईएएस की कोचिंग करके वह कम्पटीशन निकाल लेगा और अधिकारी बन जाने पर बाप के सिर पर चढ़ा सारा कर्जा उतार देगा. तो यदि माँ बाप की अपेक्षाएं अपने बच्चे से हैं तो इसमें क्या गलत है?

गरीबी का नेगेटिव इंपैक्‍ट

जिसके पास भी कम पैसा है और उसी पैसे के सहारे उसे अपने बच्चे को कुछ बनाना है तो उसकी यही चाहत होगी कि पहले ही अटेम्प्ट में बच्चा निकल जाए. इसी लिए लड़के पर भी कम्पटीशन में सफल होने का जबरदस्त दबाव होता है. क्योंकि उसे मालूम है यदि वह असफल हुआ तो उसका खेत-मकान भी जाएगा, माँ के गहने भी जाएंगे और बाप के सिर पर कर्ज का ब्याज बढ़ता जाएगा.

यह दबाव अमीर छात्रों पर नहीं होता है. वे जानते हैं कि पहले अटेम्प्ट में सफल ना हुए तो आगे तीन और अटेम्प्ट और हैं. उनको कोचिंग के लिए पैसे की कमी भी नहीं है. यह दबाव उन छात्रों पर भी नहीं है जो अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ कर आये हैं. जिनको अच्छे शैक्षिक साधन मिले, अच्छे टीचर मिले. अच्छी शिक्षा मिली. जिनकी इंग्लिश स्पीकिंग अच्छी है. जिन्हें अपने ऊपर कॉन्फिडेंस है और जिन्होंने पहले भी काफी ट्यूशन की हैं.

मानसिक दबाव में वे छात्र होते हैं जो गरीब घरों से आते हैं, जिनकी स्कूली शिक्षा किसी सरकारी स्कूल से हुई जहां कभी टीचर आते हैं कभी नहीं, जिन्होंने कभी ट्यूशन का मुँह नहीं देखा. जिन्होंने अंग्रेजी कभी बोली ही नहीं. जिनके बाप के पास दूसरे अटेम्प्ट के लिए पैसे का कोई इंतजाम नहीं है. कुछ हद तक वे छात्र भी मानसिक दबाव में होते हैं जिनके पिता और अन्य परिवारीजन प्रशासनिक अधिकारी होते हैं और उनका पूरा प्रेशर इस बात पर होता है कि उनके बच्चे को भी आईएएस अधिकारी ही बनना है.

माता पिता, कोचिंग संस्थानों को लाखों रुपए की फीस देते हैं जिसका परोक्ष रूप से दबाव छात्र पर पड़ता है. परिवारवाले, रिश्तेदार व अन्य लोग केवल सफलता की उम्मीद करते हैं लेकिन किन्हीं परिस्थितियों की वजह से जब वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो वह गहरी निराशा में डूब जाता है और आत्महत्या ही उसे एकमात्र उपाय नजर आता है.

यदि देश में सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा व्यवस्था कायम हो. सबको समान अवसर उपलब्ध हों, सबको समान शैक्षिक संसाधन प्राप्त हों, तो उनका मानसिक दबाव बहुत हद तक कम हो जाएगा. गाँव के स्कूल से पढ़ कर आने वाले बच्चे की क्षमता वही होगी जो शहर के स्कूल में पढ़ कर निकले बच्चे की होगी. लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाने की मंशा किसी सरकार की नहीं रही.

बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति की दोषी देश की सरकार ही है. देश में जिस तरह का शिक्षा तंत्र सरकार ने स्थापित कर रखा है वह बच्चों को सही ज्ञान देने और सही तरीके से शिक्षित करने में पूरी तरह अक्षम है. देश में शिक्षा के नाम पर विभिन्न तरीके के सिस्टम चल रहे हैं. एक ओर बड़े बड़े नामी पब्लिक स्कूल हैं. महंगे और शो-बाजी से भरे हुए. इनमें अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं. फिर सरकारी स्कूल हैं. जहाँ ना टीचर ना पढाई. बेसिक स्कूल हैं जहाँ बच्चों के बैठने के लिए कमरे और फर्नीचर तक नहीं है. टीचर्स तो यदाकदा ही दिखाई देते हैं.

अलगअलग बोर्ड और कौम्‍पीटिशन का प्रेशर

इसके अलावा अनेक तरह के बोर्ड हैं. हर प्रदेश का अपना बोर्ड तो है ही, इसके अलावा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE), इंडियन सर्टिफ़िकेट फ़ॉर सेकेंडरी एजुकेशन (ICSE), इंटरनेशनल बैकलॉरेट (IB), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओपन स्कूलिंग (NIOS), इंटरनेशनल जनरल सर्टिफ़िकेट ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (IGCSE) और कैंब्रिज एसेसमेंट इंटरनेशनल एजुकेशन (CIE). हर बोर्ड का अपना पाठ्यक्रम, सीखने का अपना तरीका, मूल्यांकन मानदंड, और परीक्षा आयोजित करने का तरीका सब अलग अलग होता है.

अलग अलग माहौल में पढ़ कर आये हुए छात्र जब किसी कम्पटीशन में एक साथ बैठते हैं तो उसमें सफल छात्रों की संख्या बहुत कम होती है. उदाहरण के तौर यूपीएससी यानी सिविल सेवा की परीक्षा को ही लें जिसको पास करने के बाद छात्र आईएएस और आईपीएस अधिकारी बनता है. यूपीएससी की परीक्षा में 24 से 26 साल के युवाओं का चयन सबसे ज्यादा होता है.

यूपीएससी की परीक्षा में हर साल करीब 10 लाख छात्र शामिल होते हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 0.01 प्रतिशत से 0.2 प्रतिशत ही परीक्षा पास कर पाते हैं. साल 2022 में यूपीएससी परीक्षा के लिए 11,52,000 छात्रों ने आवेदन किया था, जिनमें से केवल 933 लोगों का चयन हुआ था. जो हार गए उनमें से कुछ तो अगले अटेम्प्ट की तैयारी में लग जाते हैं, जिनको पैसे की तंगी नहीं है. कुछ दूसरे काम करने लगते हैं मगर बहुतेरे बच्चे हताशा और निराशा में घिर जाते हैं. जिन्हें घर परिवार से ताने-उलाहने नहीं मिलते वे अवसाद में जाने से बच जाते हैं. मगर कुछ अभागे बच्चे डर और निराशा के अन्धकार में डूब कर मौत को गले लगा लेते हैं.

कोचिंग संस्थानों में छात्रों के तनाव, चिंता और असफलता से जुड़ी भावनात्मक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता है. छात्रों पर केवल अंकों और प्रतिस्पर्धा का बोझ डाला जाता है. कोचिंग संस्थानों में काउंसलर्स नहीं होते हैं. यदि होते हैं तो नाममात्र के ही होते हैं. छात्रों में जागरूकता की कमी है. छात्र खुलकर बात नहीं कर पाते हैं. परिवार और समाज भी मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेता है.

महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश वो राज्य हैं, जहां छात्र सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं. यहां जितने छात्र आत्महत्या करते हैं वह देश में होने वाली कुल आत्महत्याओं का एक तिहाई है, जबकि अपने उच्च शैक्षणिक वातावरण के लिए जानाजाने वाला राजस्थान 10वें स्थान पर है, जो कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों से जुड़े गहन दबाव को दर्शाता है.

पेपर लीक की समस्‍या आम

सरकारी एजेंसियों में भ्रष्टाचार का दीमक इस कदर लगा हुआ है कि पेपर लीक की समस्या अब बहुत आम हो चुकी है. आईएएस या पीसीएस के अलावा अधिकांश प्रतिस्पर्धाओं के पेपर लीक हो जाते हैं. पेपर लीक होने से युवाओं को तैयारी का अमूल्य समय खराब हो जाता है. इससे उनका मनोबल टूट जाता है. जिससे वह गलत कदम उठाते हैं. पेपर लीक होने पर आमतौर पर एग्जाम कैंसिल हो जाता है. इस चक्कर में बहुतेरे छात्र ओवर एज हो जाते हैं. फिर उन्हें किसी छोटी मोटी नौकरी से काम चलाना पड़ता है. इससे हताशा पैदा होती है.

परिवार द्वारा अंतहीन अपेक्षाएं, समाज में सफलता के अप्राप्य मानदंड ,बड़े शहरों का ऐसा अकेलापन जो जीवन का रस समाप्त कर देता है, कोचिंग की अंधी होड़ और निराधार आश्वासन, ये सभी कारण विद्यार्थियों के जीवन की सरसता को संघर्ष में बदल चुके हैं, जिससे असफलता का भय मृत्यु से अधिक हो चुका है. उपभोक्तावादी संस्कृति, भविष्य की चिंता एवं पारिवारिक परेशानियों के चलते युवा अत्यधिक दबाव में रहते हैं. फीस का दबाव, प्रतिस्पर्धा एवं अनुकूल माहौल ना मिलने के कारण वे तनावग्रस्त हो जाते हैं और आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं.

Satire : धर्म, शादी, चंदा और जीवन

Satire : महल्ले के मध्य में घर और आनेजाने के लिए चार तरफ से रास्ते. चारों रास्तों पर बीच वाले घर में शादी होने से शादी का शामियाना तान दिया गया है. अब वे लोग कहां से निकलें जिन का घर इन रास्तों के बाद आता है. उन से कहा गया कि भाई, आगे हमारा घर है, हमें जाना है. आप रास्ता न रोकें. उन का उत्तर था, ‘‘तो क्या हम शादी न करें. हमारी खुशी आप से बरदाश्त नहीं हो रही है. दूसरे रास्ते भी तो हैं.’’

‘‘लेकिन दूसरे रास्तों में भी तंबू तने हुए हैं. कुरसियां लगी हुई हैं. वे भी यही कर रहे हैं.’’

वे गुस्से से बोले, ‘‘हम भी यही कह रहे हैं. शादी तो हो कर रहेगी.’’

हम ने कहा, ‘‘आप शादी करें. मेरी तरफ से बधाई भी स्वीकारें किंतु घर जाने का रास्ता तो खोलें.’’ वे फिर गुस्से में बोले, ‘‘आप के घर का रास्ता मेरे घर के आगे से जाता है तो इस में मेरा क्या कुसूर. इतनी ही तकलीफ है तो किसी और कालोनी में मकान लेना था.’’

 अब हमें भी गुस्सा आ गया, ‘‘आप को शादी का इतना शौक है तो कोई लौन बुक कराना था. रास्ता घेर कर क्यों बैठ गए. यह कोई तरीका है. आप ने आनेजाने वालों के बारे में जरा भी नहीं सोचा.’’ उन्होंने कहा, ‘‘देखिए साहब, शादी वाला घर है. सौ टैंशन होती हैं दिमाग में.

आप व्यर्थ में बहस मत करिए. इतना रुपया नहीं है कि महंगे लौन को किराए पर लें. हमारे तो सारे कार्यक्रम घर के सामने वाले रास्ते पर ही होते हैं. घर हमारा है तो सामने का रास्ता भी हमारा है. हम अपने रास्तों का उपयोग भी न करें? क्या आप एकदो दिन तकलीफ नहीं सह सकते इंसानियत के नाते?’’

हम ने कहा, ‘‘तकलीफ होती है. सह लेता हूं. अभी आप सारी रात लाउडस्पीकर, डीजे बजा कर हमारी रातें खराब करेंगे. ब्लडप्रैशर वाला बेचैन रहेगा. छोटे बच्चे सो नहीं पाएंगे. आप पटाखों के धमाके करेंगे. बच्चेबूढ़े परेशान हो जाएंगे. रातभर का शोरशराबा. बचा हुआ खाना, प्लास्टिक के सामान जिन में आप खाना परोसेंगे, उन का कचरा आप नाली में फेंकेंगे. नाली जाम होगी.

सड़े भोजन की दुर्गंध फैलेगी. रोड पर टैंट गाड़ने से सड़क पर गड्ढे होंगे. फिर ऐक्सिडैंट होंगे. ये सब तो हम सभी को झेलना ही है किंतु रात को घर जाना जरूरी है. हम निकलें कैसे? आप को हमारा भी तो कुछ खयाल करना होगा? क्या अब हमें अपने ही शहर में लौज में कमरा किराए पर लेना होगा?’  मेरी बात सुन कर उन्होंने जोर की आवाज लगाई, ‘‘बब्बू, गोलू, मोनू, सोनू…’’

किशोर उम्र के लड़के हाथों में लाठीडंडे लिए आ खड़े हुए.

‘‘क्या हुआ, मौसाजी?’’ चारों एकसाथ बोले. उन्होंने कहा, ‘‘इन जनाब को तकलीफ हो रही है. इन्हें समझाओ. मेरे पास ढेरों काम हैं,’’ इतना कह कर वे चले गए. और चारों लट्ठधारी लड़कों ने हमें घेर लिया. उन में से एक ने कहा, ‘‘अंकलजी, बात समझ में नहीं आ रही है, समझाएं?’’ मैं घबरा गया. मैं भावी हमले के डर से भयभीत हो गया. मैं ने कहा, ‘‘भाइयो, मुझे कोई तकलीफ नहीं हो रही. बस, मेरा घर उस पार है. मां बीमार हैं. दवा ले कर जाना जरूरी है.’’ तभी महल्ले के पार्षद ने स्थिति भांप ली और वे तेजी से मेरे पास आ कर बोले, ‘‘यार मिश्राजी, आप कोऔपरेट नहीं करते. कल आप के घर में भी किसी की शादी होगी. परिवार वाले हो. आप को समझना चाहिए. थोड़ा घूम कर दूसरा रास्ता पकड़ लो.’’ मैं ने उन्हें बताया कि सारे रास्तों पर तंबू गड़े हैं. मैं तो घर जाना चाहता हूं. मैं आप के साथ हूं. इस घर की शादी मेरे घर की शादी जैसी है. लेकिन आप बताएं कि घर कैसे जाएं? वे गंभीर हो कर बोले, ‘‘हां, यह तो विकट समस्या है. आप ऐसा करिए, अपनी मोटरसाइकिल यहीं खड़ी कर दीजिए, मंदिर के पास. इतनी भीड़भड़क्कन में किसी चोर की हिम्मत भी न होगी. अब रही आप की बात, तो यह जो नाला है, इस में पानी बहुत कम है. कोशिश करिए निकलने की. कामयाब हो जाएं तो निकल जाइए. बाकी आप ही जानें.’’

कोई रास्ता नहीं था. इस से पहले कि मेरे जैसे आम आदमी के साथ फौजदारी हो जाए, अस्पताल की शरण में जाना पड़े, अच्छा है कि रिस्क लिया जाए. पुलिस के पास जाने का कोई लाभ नहीं था. एक बार शिकायत की थी पिछले साल ऐसी ही समस्या आने पर तो थानेदार ने कहा था कि हम क्या किसी की शादी रुकवाने के लिए बैठे हैं. जाइए, हमें और भी काम हैं. फिर जब भी घर के सामने से निकलते, कभी गाली देते, कभी पत्थर फेंकते, कभी झूठी रिपोर्ट दर्ज करा कर अंदर करा देने की धमकी देते रहते. थक कर मैं ने गलती की माफी मांग ली, तो उन्होंने कहा, ‘‘चलो आप को अपनी गलती का एहसास तो हुआ. अन्यथा हम तो आप को स्त्री से छेड़छाड़ के आरोप में अंदर करवाने की सोच रहे थे. एससी एसटी ऐक्ट अलग से लगता. जाओ, माफ किया.’’ 

तब से थाने का खयाल दिल से यों निकल गया जैसे बेवफा प्रेमिका का खयाल दिल से निकल जाता है. हां अपनेआप होने की टीस जरूर रही, जैसे बेवफाई से आहत रहता है दिल. तो हम डरतेडरते नाले में प्रवेश कर गए. जान बचाने के लिए महामृत्युंजय का जाप भी करते रहे. नाले पर चढ़ने के चक्कर में बैलेंस बिगड़ा, फिर गंदे पानी में गिरे. चीखे, डरे, फिर पैरों को साध कर आगे बढ़े. हिम्मत की और फूलती सांस नाले के गंदे पानी से सराबोर शरीर पर चोटों के निशान के साथ किसी तरह घर पहुंचे. 

ऐसी ही स्थिति तब आती है जब प्रत्येक गली के बेरोजगार गुंडे टाइप लड़के अपनीअपनी गली को अलग महल्ला सिद्ध कर के गणेश व दुर्गा की स्थापना कर वातावरण को धर्ममय करते हैं. चारों तरफ चंदा दो. हर वर्ष चंदे की रकम बढ़ाई जाती है. यह कह कर कि मूर्ति महंगी है. लाइटिंग, डीजे सब के रेट बढ़ गए हैं. फिर हम पीछे नहीं रहना चाहते. दूसरे महल्ले वालों ने ज्यादा महंगी मूर्ति ली है. हम अपनी नाक नीची नहीं होने देंगे, उन से बड़ी मूर्ति रखेंगे. इस बार 501 रुपए से काम नहीं चलेगा. 1,100 रुपए चाहिए. चंदा यों मांगा जाता जैसे हफ्तावसूली की जा रही हो. न देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. होली के हुड़दंग में घर पर कचरा, मैला, गोबर फेंका जाता है. घर की स्त्रियों पर भद्दे कमैंट्स और घर से निकलना मुश्किल हो जाता है.

तो हम दूध वाले, राशन वाले का पेमैंट और घर के जरूरी सामान रोक कर चंदा देते हैं. देना पड़ता है. फिर चारों ओर कानफोडू संगीत, जिस में शीला की… मुन्नी बदनाम…जैसे गाने चौबीसों घंटे बजते हैं. धर्म की बात है. पंडे टाइप के लोग इन मुस्टंडों को यह कहते रहते हैं, ‘‘अरे धर्म का काम है, कुछ दे दोगे तो पुण्य मिलेगा, स्वर्ग में जगह मिलेगी.’’

फिर एक जुमला सुनने को मिलेगा, ‘‘देखते नहीं शुक्रवार को कैसे गलियां, सड़कें भर जाती हैं, तब तो आप कुछ नहीं कहते. यह तो हम हिंदुओं की कमजोरी है कि आप विरोध कर पा रहे हैं.’’ यानी छिपे शब्दों में पूरी धमकी. अब आप टोक कर जान जोखिम में कैसे डाल सकते हैं? फिर ऐसे समय में हमें अपना वाहन कहीं अन्यत्र खड़ा करना पड़ता है और किसी तरह पैदल घर जाते हैं. पत्नी, बेटी का तो उतने समय घर से बाहर निकलना बंद रहता है. स्कूल जाना भी. क्योंकि ये सारे लड़के शराब, गांजे के नशे में चूर रह कर अपने को श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं. चंदे के पैसों से ही इन का नशा कार्यक्रम चलता है और जब तक कि ये धार्मिक आयोजन या वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न नहीं हो जाते, हमारी आफत रहती है. यदि इन के कार्यक्रम में टोकाटाकी करें तो हमारे क्रियाकर्म की संभावना भी बन सकती है.

जबजब हम अपना दोपहिया वाहन घर तक न पहुंच पाने के कारण दूसरी जगह खड़ा करते हैं भगवान भरोसे. दूसरे दिन हमें हमारी बाइक से पैट्रोल गायब मिलता है. बाइक से ट्यूब नदारद रहते हैं. वाहन की बैटरी गायब रहती है. ऐसे में आप सोचिए, हम किसी मैकेनिक के पास अपने वाहन को किसी हाथठेले, रिकशे में लाद कर ले जाते हैं. जेब के साथसाथ दिलदिमाग को तकलीफ अलग. एक बार तो गाड़ी चोरी हो गई. लाख पूछताछ की, रिपोर्ट की लेकिन सब ने कहा, ‘‘थोड़ी देर पहले तक तो यहीं थी.

पता नहीं. पुलिस वाले कहते हैं, रिपोर्ट लिख ली है. तलाश जारी है. लेकिन चोरी की गई चीज उस आतंकवादी की तरह होती है जो पड़ोसी मुल्क में छिपा होता है. मिल भी गई तो हजार कानूनी झमेले हैं. अच्छा है कि आप दूसरी गाड़ी किस्तों में खरीद लें. फिर हम ने भी मन मार कर सैकंडहैंड मोटरसाइकिल खरीद ली.
लेकिन महल्ले का अभी भी यही आलम है. किसी की शादी हो या देवीदेवताओं की बैठक, रास्ते बंद हो ही जाते हैं. कहते हैं कि जब सारे रास्ते बंद हो जाएं तो भगवान कोई न कोई रास्ता खोलता ही है. 
लेकिन जब रास्ता भगवान के कारण ही बंद हो तब तो कोई रास्ता खुलने का सवाल ही पैदा नहीं होता. तो अब हमें जैसे पता चलता है कि किसी के घर शादी होने वाली है या दुर्गाजीगणेशजी बैठने वाले हैं, उतने दिन के लिए हम गाड़ी घर में रख कर पैदल ही चलते हैं. कभी नाले में से, कभी कोई दीवार फांद कर, कभीकभी तो अवकाश ही ले लेते हैं और घर में बैठे रहते हैं.

चंदा देना तो जरूरी ही होता है चैन से जीने के लिए. फिर चंदा देना न केवल धर्म का काज है बल्कि सुरक्षा का भी. सुरक्षा धर्म से नहीं, महल्ले के उन गुंडों से जो हर शादी, हर जागरण के बाद 4 दिनों तक चौराहे पर बोतलें खोले रात के 2 बजे तक पीते रहते हैं और शुभ कार्यों को अंतिम अंजाम देते रहते हैं.

Onlinne Hindi Story 2025 : इडली सांभर

Onlinne Hindi Story 2025 : पहली मुलाकात के बाद जिस तरह पुरवा और सुहास का प्यार परवान चढ़ा उसे देखते हुए पुरवा सुहास में एक बेहतर जीवनसाथी होने के सारे गुण ढूंढ़ने लगी, लेकिन क्या सुहास उस की उम्मीदों पर खरा उतर पाया?

उस दिन बस में बहुत भीड़ थी. कालिज पहुंचने की जल्दी न होती तो पुरवा वह बस जरूर छोड़ देती. उस ने एक हाथ में बैग पकड़ रखा था और दूसरे में पर्स. भीड़ इतनी थी कि टिकट के लिए पर्स से पैसे निकालना कठिन लग रहा था. वह अगले स्टाप पर बस रुकने की प्रतीक्षा करने लगी ताकि पर्स से रुपए निकाल कर टिकट ले सके.   बस स्टाप जैसे ही निकट आया कि अचानक किसी ने पुरवा का पर्स खींचा और चलती बस से कूद गया. पुरवा जोरजोर से चिल्ला पड़ी, ‘‘मेरा पर्स, अरे, मेरा पर्स ले गया. कोई पकड़ो उसे,’’ उस के स्वर में बेचैनी भरी चीख थी.

पुरवा की चीख के साथ ही बस झटके से रुक गई और लोगों ने देखा कि तुरंत एक युवक बस से कूद कर चोर के पीछे भागा.

‘‘लगता है यह भी उसी चोर का साथी है,’’ बस में एकसाथ कई स्वर गूंज उठे.

बस रुकी हुई थी. लोगों की टिप्पणी बस में संवेदना जता रही थी. एक यात्री ने कहा, ‘‘क्या पता साहब, इन की पूरी टोली साथ चलती है.’’

तभी नीचे हंगामा सा मच गया. बस से कूद कर जो युवक चोर के पीछे भागा था वह काफी फुर्तीला था. उस ने भागते हुए चोर को पकड़ लिया और उस की पिटाई करते हुए बस के निकट ले आया.

‘‘अरे, बेटे, इसे छोड़ना मत,’’ एक बुजुर्ग बोले, ‘‘पुलिस में देना, तब पता चलेगा कि मार खाना किसे कहते हैं.’’

उधर कुछ यात्री जोश में आ कर अपनेअपने हाथों का जोर भी चोर पर आजमाने लगे.

पुरवा परेशान खड़ी थी. एक तो पर्स छिनने के बाद से अब तक उस का दिल धकधक कर रहा था, दूसरे, कालिज पहुंचने में देर पर देर हो रही थी. बस कंडेक्टर ने उस चोर को डराधमका कर उस की पूरी जेब खाली करवा ली और फिर कभी बस में सूरत न दिखाने की हिदायत दे कर बस स्टार्ट करवा दी.

सभी यात्री महज उस बात से खुश थे कि चलो, जल्दी जान छूट गई, वरना पुलिस थाने में जाने कितना समय खराब होता.

युवक ने पुरवा को पर्स देते हुए कहा, ‘‘देख लीजिए, पर्स में पैसे पूरे हैं कि नहीं.’’

उस युवक के इस साहसिक कदम से गद्गद पुरवा ने पर्स लेते हुए कहा, ‘‘धन्यवाद, आप ने तो कमाल कर दिया.’’

‘‘नहीं जी, कमाल कैसा. इतने सारे यात्री देखते रहते हैं और एक व्यक्ति अपना हाथ साफ कर भाग जाता है, यह तो सरासर कायरता है,’’ उस युवक ने सारे यात्रियों की तरफ देख कर कहा तो कुछ दूरी पर बैठे एक वृद्ध व्यक्ति धीरे से बोल पड़े, ‘‘जवान लड़की देख कर हीरो बनने के लिए बस से कूद लिया था. हम बूढ़ों का पर्स जाता तो खड़ाखड़ा मुंह देखता रहता.’’

 

इस घटना के बाद तो अकसर दोनों बस में टकराने लगे. पुरवा किसी के साथ बैठी होती तो उसे देखते ही मुसकरा देती. यदि वह किसी के साथ बैठा होता तो पुरवा को देखते ही थोड़ा आगे खिसक जाता और उस से भी बैठ जाने का आग्रह करता. जब पहली बार दोनों साथ बैठे थे तो पुरवा ने कहा था, ‘‘मैं ने अपने मम्मीपापा को आप के साहस के बारे में बताया था.’’

‘‘अच्छा,’’ युवक हंस दिया, ‘‘आप को लगता है कि वह बहुत साहसिक कार्य था तो मैं भी मान लेता हूं पर मैं ने तो उस समय अपना कर्तव्य समझा और चोर के पीछे भाग लिया.’’

‘‘आप क्या करते हैं?’’ पुरवा ने पूछ लिया.

‘‘अभी तो फिलहाल इस दफ्तर से उस दफ्तर तक एक अदद नौकरी के लिए सिर्फ टक्करें मार रहा हूं.’’

‘‘आप तो बहुत साहसी हैं. धैर्य रखिए, एक न एक दिन आप अपने मकसद में जरूर कामयाब होंगे,’’ पुरवा को लगा, युवक को सांत्वना देना उस का कर्तव्य बनता है.

पुरवा के उतरने का समय आया तो वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘कुछ भी पुकार लीजिए,’’ युवक मुसकरा कर बोला, ‘‘लोग मुझे सुहास के नाम से जानते हैं.’’

अगली बार एकसाथ बैठते ही सुहास ने पूछ लिया, ‘‘आप ने इतने दिनों में अपने बारे में कुछ बताया ही नहीं.’’

‘‘क्या जानना चाहते हैं? मैं एक छात्रा हूं. एम.ए. का अंतिम वर्ष है और मैं अंधमहाविद्यालय में संगीत  भी सिखाती हूं.’’

फिर बहुत देर तक दोनों अपनीअपनी पढ़ाई पर चर्चा करते रहे. विदा होते समय सुहास को याद आया, वह बोला, ‘‘आप का नाम पूछना तो मैं रोज ही भूल जाता हूं.’’

पुरवा मुसकरा दी और बोली, ‘‘पुरवा है मेरा नाम,’’ और चहकती सी बस से उतर गई.

एक दिन सुहास भी  उसी बस स्टाप पर उतर गया जहां पुरवा रोज उतरती थी तो वह चहक कर बोली, ‘‘आज आप यहां कैसे…’’

‘‘बस, तुम्हारे साथ एक कप चाय पीने को मन हो आया,’’ सुहास के स्वर में भी उल्लास था. फिर सुहास को लगा जैसे कुछ गलत हुआ है अत: अपनी भूल सुधारते हुए बोला, ‘‘देखिए, आप के लिए मेरे मुंह से तुम शब्द निकल गया है. आप को बुरा तो नहीं लगा.’’

पुरवा हंस दी. मन में कुछ मधुर सा गुनगुनाने लगा था. धीरे से बोली, ‘‘यह आज्ञा तो मैं भी चाहती हूं. हम दोनों मित्र हैं तो यह आप की औपचारिकता क्यों?’’

‘‘यही तो…’’ सुहास ने झट से उस की हथेली पर अपने सीधे हाथ का पंजा थपक कर ताली सी बजा दी, ‘‘फिर हम चलें किसी कैंटीन में एकसाथ चाय पीने के लिए?’’ सुहास ने आग्रह करते हुए कहा.

चाय पीते समय दोनों ने देखा कि कुछ लड़के इन दोनों को घूर रहे थे. सुहास का पौरुष फिर जाग उठा. उस ने पुरवा से कहा, ‘‘लगता है इन्हें सबक सिखाना पड़ेगा.’’

‘‘जाने दो, सुहास. समझ लो कुत्ते भौंक रहे हैं. सुबहसुबह उलझना ठीक नहीं है.’’

चाय पी कर दोनों फिर सड़क पर आ गए.

‘‘सुनो, सुहास,’’ पुरवा ने उसे स्नेह से देखा, ‘‘तुम्हें इतना गुस्सा क्यों आ रहा था कि उन की मरम्मत करने को उतावले हो उठे.’’

‘‘देख नहीं रही थीं, वे सब कैसे तुम्हें घूर रहे थे,’’ सुहास का क्रोध अभी तक शांत नहीं हुआ था.

‘‘मेरे लिए किसकिस से झगड़ा करोगे,’’ पुरवा ने उसे समझाने की चेष्टा की, लेकिन उस के मन में एक मीठी सी गुदगुदी हुई कि इसे मेरी कितनी चिंता है, मेरी मर्यादा के लिए मरनेमारने को तत्पर हो उठा.

धीरेधीरे कैंटीन में बैठ कर एकसाथ चाय पीने का सिलसिला बढ़ गया. अब दोनों के ड्राइंगरूम के फोन भी घनघनाने लगे थे. देरदेर तक बातें करते हुए दोनों अपनेअपने फोन का बिल बढ़ाने लगे.

दोनों जब कभी एकसाथ चलते तो उन की चाल में विचित्र तरह की इतराहट बढ़ने लगी थी, जैसे पैरों के नीचे जमीन नहीं थी और वे प्यार के आकाश में बिना पंख के उड़े चले जा रहे थे.

 

एक उच्च सरकारी पद से रिटायर हुए मकरंद वर्मा के 3 बेटे और एक बेटी थी. बेटी श्वेता इकलौती होने के कारण बहुत दुलारी थी. एक बार जो कह दिया वह पूरा होना ही चाहिए.

उन के लिए तो सभी बच्चे लाडले ही थे. उन का बड़ा बेटा निशांत डाक्टर और दूसरा बेटा आकाश इंजीनियर था. सब से छोटा बेटा सुहास अभी नौकरी की तलाश में था.

पढ़ाई में अपने दोनों बड़े भाइयों से अलग सुहास किसी तरह बी. काम. पास कर सका था. बस, तभी से वह लगातार नौकरी के लिए आवेदन भेज रहा है. कभीकभी साक्षात्कार के लिए बुलावा आ जाता है तो आंखों में सपने ही सपने तैरने लगते हैं.

मकरंद वर्मा की बूढ़ी आंखों में भी उत्साह जागता है. सोचते हैं कि शायद अब की बार यह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए पर दोनों में से किसी का भी सपना पूरा नहीं होता.

सुहास खाली समय घर वालों का भाषण सुनने के बजाय बाहर वालों की सेवा करने में अधिक खुश रहता है. उस सेवा में मित्रों के घर उन के मातापिता को अस्पताल ले जाने से ले कर बस में चोरउचक्कों को पकड़ना भी शामिल है.

सुहास अपनी बहन श्वेता को कुछ अधिक ही प्यारदुलार करता है. श्वेता भी भाई का हर समय साथ देती है. मम्मी रजनी बाला अपनी लाडली बेटी को जेब खर्च के लिए जो रुपए देती हैं उन में से बहन अपने भाई को भी दान देती रहती है क्योंकि उसे पता है कि भाई बेकार है. अपने दोनों बड़े भाइयों की तरह जीवन में सफल नहीं है इसलिए उस की तरफ लोग कम ध्यान देते हैं. लेकिन श्वेता को पता है कि सुहास कितना अच्छा है जो उस का हर काम करने को तत्पर रहता है. बाकी दोनों भाई तो विवाह कर के अपनीअपनी बीवियों में ही मगन हैं. इसीलिए उसे सुहास ही अधिक निकट महसूस होता है.

 

मकरंद वर्मा को अपने दोनों छोटे बच्चों, श्वेता व सुहास के भविष्य की बेहद चिंता थी पर चिंता करने से समस्या कहां दूर होती है. श्वेता के लिए कई लड़के देखे, पर उसे सब में कुछ न कुछ दोष दिखाई दे जाता है. श्वेता रजनी से कहती है, ‘‘मम्मा, ये मोटी नाक और चश्मे वाला लड़का ही आप को पसंद करना था.’’

रजनी उसे प्यार से पुचकारतीं, ‘‘बेटी, लड़कों का रूपरंग नहीं उन का घरपरिवार और पदप्रतिष्ठा देखी जाती है.’’

इस तरह 1 से 2 और 2 से 3 लड़के उस की आलोचना के शिकार होते गए.

श्वेता को सहेलियों के साथ घूमना जितना अच्छा लगता था उस से कहीं अधिक मजा उसे अपने भाई सुहास को चिढ़ाने में आता था.

उस दिन रविवार था. शाम को श्वेता को किसी सहेली के विवाह में जाना था. कारीडोर में बैठ कर वह अपने लंबे नाखूनों की नेलपालिश उतार रही थी. तभी उस ने सुहास को तैयार हो कर कहीं जाते देखा तो झट से टोक दिया, ‘‘भैयाजी, आज छुट्टी का दिन है और आप कहां नौकरी ढूंढ़ने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, घर से निकलो नहीं कि टोक देती है,’’ फिर श्वेता के निकट आ कर हथेली खींचते हुए बोला, ‘‘ये नाखून किस खुशी में इतने लंबे कर रखे हैं?’’

‘‘सभी तो करती हैं,’’ श्वेता ने हाथ वापस खींच लिया.

‘‘सभी गंदगी करेंगे तो तुम भी करोगी,’’ सुहास झुंझला गया.

‘‘कुछ कामधाम तो है नहीं आप को, बस, यही सब टोकाटाकी करते रहते हैं,’’ श्वेता ने सीधे उस के अहं पर चोट कर दी तो वह क्रोध पी कर बाहर दरवाजे की ओर बढ़ गया.

‘‘सुहास,’’ रजनी के स्वर कानों में पड़ते ही वह पलट कर बोला, ‘‘जी, मम्मी.’’

‘‘बिना नाश्ता किए सुबहसुबह कहां चल दिए?’’

‘‘मम्मी, एक दोस्त ने चाय पर बुलाया है. जल्दी आ जाऊंगा.’’

‘‘दोस्त से फुरसत मिले तो शाम को जल्दी चले आइएगा,’’ श्वेता बोली, ‘‘एक सहेली की शादी में जाना है. वहीं आप की जोड़ीदार भी खोज लेंगे.’’

‘‘मेहरबानी रखो महारानी. अपना जोड़ीदार खोज लेना, हमारा ढूंढ़ा तो पसंद नहीं आएगा न,’’ सुहास ने भी तीर छोड़ा और आगे बढ़ गया.

 

पुरवा जल्दीजल्दी तैयार हो रही थी तभी उस की मम्मी ने उसे टोका, ‘‘छुट्टी के दिन क्यों इतनी तेजी से तैयार हो रही है? आज तुझे कहीं जाना है क्या?’’

‘‘अरे मम्मा, तुम्हें याद नहीं, मुझे अंधमहाविद्यालय भी तो जाना है.’’

‘‘लेकिन आज, छुट्टी वाले दिन?’’ मम्मी ने उस के बिस्तर की चादर झाड़ते हुए कहा, ‘‘कम से कम छुट्टी के दिन तो अपना कमरा ठीक कर लिया कर.’’

‘‘वापस आ कर कर लूंगी, मम्मी. वहां बच्चों को नाटक की रिहर्सल करवानी है,’’ पुरवा ने चहकते हुए कहा और अपना पर्स उठा कर चल दी.

‘‘कम से कम नाश्ता तो कर ले,’’ मम्मी तकियों के गिलाफ सही करती हुई बोलीं.

‘‘कैंटीन में खा लूंगी, मम्मी,’’ पुरवा रुकी नहीं और तीव्रता से चली गई.

सुहास निश्चित स्थान पर पुरवा की प्रतीक्षा कर रहा था.

‘‘हाय, पुरवा,’’ पुरवा को देखते ही उल्लसित हो सुहास बोला.

‘‘देर तो नहीं हुई?’’ पुरवा ने उस की बढ़ी हुई हथेली थाम ली.

‘‘मैं भी अभी कुछ देर पहले ही आया था.’’

दोनों के चेहरे पर एक अनोखी चमक थी. पुरवा के साथसाथ चलते हुए सुहास ने कहा, ‘‘घर वालों से झूठ बोल कर प्यार करने में कितना अनोखा आनंद है.’’

‘‘क्या कहा, प्यार…’’ पुरवा चौंक कर ठहर गई.

‘‘हां, प्यार,’’ सुहास ने हंस कर कहा.

‘‘लेकिन तुम ने अभी तक प्यार का इजहार तो किया ही नहीं है,’’ पुरवा ने कुछ शरारत से कहा.

‘‘तो अब कर रहा हूं न,’’ सुहास ने भी आंखों में चंचलता भर कर कहा.

‘‘चलो तो इसी खुशी में कौफी हो जाए,’’ पुरवा ने मुसकरा कर कहा.

रेस्तरां की ओर बढ़ते हुए दोनों एकदूसरे के परिवार का इतिहास पूछने लगे. जैसे प्यार जाहिर कर देने के बाद पारिवारिक पृष्ठभूमि की जानकारी जरूरी हो.

‘‘सबकुछ है न घर में,’’ सुहास कौफी का आर्डर देते हुए हंस कर बोला, ‘‘मम्मीपापा हैं, 2 भाईभाभी, एक लाडली सी बहन, भाभियों का तो यही कहना है कि मम्मीपापा ने मुझे लाड़ में बिगाड़ रखा है लेकिन मैं किसी तरफ से तुम्हें बिगड़ा हुआ लगता हूं क्या?’’

पुरवा ने आगेपीछे से उसे देखा और गरदन हिला दी, ‘‘लगते तो ठीकठाक हो,’’ उस ने शरारत से कहा, ‘‘नाक भी ठीक है, कान भी ठीक जगह फिट हैं और मूंछें…तौबातौबा, वह तो गायब ही हैं.’’

‘‘ठीक है, मैडम, अब जरा आप अपनी प्रशंसा में दो शब्द कहेंगी,’’ सुहास ने भी उसे छेड़ने के अंदाज में कहा.

‘‘क्यों नहीं, महाशय,’’ पुरवा इतरा उठी, ‘‘मेरी एक प्यारी सी मम्मी हैं जो मेरी बिखरी वस्तुएं समेटती रहती हैं. पापा का छोटा सा व्यापार है. बड़े भाई विदेश में हैं. एक छोटा भाई था जिस की पिछले साल मृत्यु हो गई.’’

‘‘ओह,’’ सुहास ने दुखी स्वर में कहा.

 

इस के बाद दोनों गंभीर हो गए थे. थोड़ी देर के लिए दोनों की चहक शांत हो गई थी.

कौफी का घूंट भरते हुए सुहास ने पूछा, ‘‘क्या खाओगी?’’

‘‘जो तुम्हें पसंद हो,’’ पुरवा ने कहा.

‘‘यहां सुबहसुबह इडलीचटनी गरम सांभर के साथ बहुत अच्छी मिलती है.’’

‘‘ठीक है, फिर वही मंगवा लो,’’ पुरवा निश्ंिचत सी कौफी पीने लगी. मन में अचानक कई विचार उठने लगे. मम्मी से झूठ बोल कर आना क्या ठीक हुआ, आज तक जो कार्य नहीं किया वह सुहास की संगत पाने के लिए क्यों किया? यह ठीक है कि उसे अंधमहाविद्यालय के लिए नाटक की रिहर्सल करवानी पड़ती है, पर आज तो नहीं थी. उस ने सुहास की ओर देखा. इतने बड़े घर का बेटा है, पर दूसरों के दुख को अपना समझ कर कैसे सहायता करने को तड़प उठता है. उस के इसी व्यक्तित्व ने तो पुरवा का मन जीत लिया है.

इडलीसांभर आ चुका था. पुरवा ने अपनी प्लेट सरकाते हुए कहा, ‘‘मम्मी ने बड़े प्यार से हलवा तैयार किया था, पर मैं बिना नाश्ता किए ही भाग आई.’’

‘‘हाथ मिलाओ यार,’’ सुहास ने तपाक से हथेली बढ़ा दी, ‘‘मेरी मम्मा भी नाश्ते के लिए रोकती ही रह गईं, पर देर हो रही थी न, सो मैं भी भाग आया.’’

‘‘अरे वाह,’’ कहते हुए पुरवा ने पट से उस की हथेली पर अपनी कोमल हथेली रख दी तो उस का संपूर्ण शरीर अनायास ही रोमांचित हो उठा. यह कैसा विचित्र सा कंपन है, पुरवा ने सोचा. क्या किसी पराए व्यक्ति के स्पर्श में इतना रोमांच होता है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. उस के मन ने तर्क किया. यह तो एक सद्पुरुष के प्यार भरे स्पर्श का ही रोमांच होगा. कितनी विचित्र बात है कि एक छोटी सी घटना जीवन को एक खेल की तरह अपनी डगर पर मोड़ती चली गई और आज दोनों को एकदूसरे की अब इतनी जरूरत महसूस होती है. शायद इसे ही प्यार कहते हैं.

New Year Special Story : पत्नी व देश का संविधान

New Year Special Story: इस समय देश का हर नागरिक संवैधानिक हो गया है. अवैधानिक काम करने वाला भी बातबात में संविधान की बात कर रहा है. एक कहता है कि भारतमाता की जय बोलना संविधान में कहां लिखा है, तो दूसरा कहता है कि कहां लिखा है कि नहीं बोल सकते.

अब छोटीछोटी बात में भी लोग संविधान की आड़ ले रहे हैं.  हमारा एक दोस्त मैसेजेस का जवाब नहीं देता था. एक दिन हम ने मैसेज किया कि भाई, थोड़ा सा सोशल हो जा सोशल मीडिया में, तो उस का मैसेज आ गया कि कहां लिखा है संविधान में कि हर मैसेज का जवाब देना आवश्यक है. मैं ने कहा कि यार, तूने तो मिलियन डौलर का प्रश्न खड़ा कर दिया. तू सही कह रहा है कि नहीं, यह मैं कैसे सही या गलत ठहराऊं.

अब यह संविधान की आड़ लेने वाली बात छूत के रोग की तरह हर तरफ फैलती जा रही है. उस दिन मैं सब्जी बाजार में था. मैं ने मोलभाव करना चाहा, तो सब्जी वाला बोला, ‘साहब पढ़ेलिखे हो कर भी एक दाम की तख्ती आप ने नहीं पढ़ी. संविधान में मोलभाव करने का उल्लेख नहीं है. कहां लिखा है, यदि लिखा हो तो हमें बताएं.’ मैं बहुत देर तक उस का थोबड़ा देखता रहा कि अब तो सब्जी मंडी में भी सब्जी वाला सब्जीभाजी की कम, संविधान की ज्यादा जानकारी रखने लगा है.

संविधान गलीकूचेबाजार से होते हुए घर के किचन में कब घर कर गया, हमें वैसे ही भान ही नहीं हुआ जैसे दिल्ली में भाजपाकांग्रेस का सफाया होने का नहीं हुआ था. पिछले रविवार को मैं ने पत्नी के सामने इच्छा प्रकट की कि आज रविवार है, कुछ खास डिश हो जाए? तो उस ने आंखें तरेर लीं कि पत्नी रविवार को पति के लिए खास डिश तैयार करेगी, यह संविधान में कहां लिखा है.

मैं भौचक था इस संविधान के घर के रसोई तक आ पहुंचने से. मैं ने सोचा, यह बाहर जो हवा बह रही है, शायद उसी का परिणाम है. वैसे, इस देश में आजकल किसी भी बात की हवा के चहुंओर पहुंचने में समय नहीं लगता है. मेड 2 दिन नहीं आई. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. मेड इस तरह से मेड है कि वह आकस्मिक रूप से कभी भी गायब हो जाती है. पत्नी ने पूछ लिया कि 2 दिन कहां रही, बिना बताए छुट्टी मार ली, ऐसे नहीं चलेगा? तो वह हाथ नचा कर बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि 2 दिन मेड बिना बताए नहीं आ सकती? और मैडमजी, आप की यह पड़ताल गैरसंवैधानिक ढंग की लग रही है? मैं मेड के संविधान के प्रति अचानक उपज आई सजगता से अचंभित था.

गांवों में नईनवेली आई पत्नियों के शौचालय के अभाव में ससुराल छोड़ने के तो आप ने कई किस्से पढ़े होंगे. अब नईनवेली बहू को किसी ने ज्ञान देने की कोशिश की कि सुबह उठ कर सासससुर के पैर छूना चाहिए. तो वह बोली कि फिर कहना कि रात को सास के पैर दबाना चाहिए. उस ने आंख मार कर आगे कहा कि संविधान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है, इसलिए वह बाध्य नहीं है. उस के आराध्य न पति है और न सास. उस का कैरियर ही उस का आराध्य है, उस का संविधान है.

महिला मंडल की किटी पार्टियों का यह मौसम है. हम ने एक दिन हिम्मत बटोर कर, पत्नी से कहा कि अब किटी पार्टियां बंद कर दो क्योंकि बच्चों की परीक्षा नजदीक आ रही है. तो वह बोली कि संविधान का अध्ययन कर लो, उस में ऐसा कहीं लिखा नहीं है. मैं ने कहा कि बहुत जवाब देने लगी हो? तो वह तपाक से बोली कि संविधान में यह कहां लिखा है कि पत्नी केवल सुन सकती है, पलट कर जवाब नहीं दे सकती. आगे वह बोली, ‘‘जब मोदीजी कह रहे हैं कि उन का धर्म देश का संविधान है तो फिर हम कैसे इस का सम्मान करने में पीछे रह सकते हैं.’’

बौस के घर में एक कार्यक्रम था. हम ने पत्नी से गुजारिश की कि चलना है तो वह तपाक से बोली कि संविधान में कहां लिखा है कि पत्नी का बौस के यहां के हर बोरिंग फंक्शन में जाना जरूरी है. बौस आप का होगा, हमें तो उस दिन किटी पार्टी में जाना है.

ये दोटूक बातें आजकल संविधान की बैकिंग के कारण हमें हर जगह सुनने को मिल रही हैं. सरकार ने डाक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस करने से रोका क्या, कि उन की यूनियन खड़ी हो गई कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है कि डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर सकता. उस ने तो शपथ ली हुई है मरीज का इलाज करने की. इस के बदले में यदि स्वेच्छा से कोई मरीज कुछ दे जाता है तो इस के लिए डाक्टर कहां जिम्मेदार है?

शाम को पत्नी घर पर नहीं थी. चाय खुद बनानी पड़ी. वह 8 बजे घर में आई. हम पूछ बैठे कि कहां चली गई थी, हमें चाय भी आज खुद ही बनानी पड़ी? हमारा इतना कहना था कि वह बिफर गई, नहीं, सही कर लेता हूं कि वह भड़क पड़ी. ध्यान रहे पत्नियां अकसर भड़कती हैं पति नामक जीव पर. और पति की बोलती बंद हो जाती है, ले बच्चू अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया है. वह बोली कि देश के संविधान में कहां लिखा है कि मैं कहीं जाऊंगी तो पूछ कर जाऊं और आगे भी कि यह कहां लिखा है कि चाय रोज मैं ही बना कर दूंगी. और संवैधानिक जानकारी लो, काम आएगी कि, संविधान में पति द्वारा चाय बना कर पत्नी को पिलाने की कोई रोक नहीं है? सो, तुम्हें तो अपनी चाय के साथ ही एक अदद चाय मेरे लिए भी बना कर थर्मस में रख देनी थी.

मैं अब निरुत्तर था. आप के पास कोई उपाय हो तो बताएं संविधान के घेरे से निकलने का. वैसे, आप की भी स्थिति मेरे से कम बदतर नहीं होगी, यह मैं जानता हूं, फिर भी आप से पूछ रहा हूं.

Happy New Year 2025 : मिस्‍टर हैलमेटधारी

Happy New Year 2025 :अगर कोई आप से पूछे कि आप हैलमैट क्यों पहनते हैं? तो आप का सीधा सा जवाब होगा कि हादसे के समय सिर को बचाने के लिए हैलमैट पहनते हैं. मगर हैलमैट पहनने की केवल यही एक वजह नहीं है. इस की जानकारी मुझे अपने दोस्त गिरधारीजी से मिली.

एक दिन मैं यों ही गिरधारीजी के घर गया. वे घर पर नहीं थे. भाभीजी ने आदर से मुझे बैठाया. अभी हम चायपानी कर ही रहे थे, इतने में गिरधारीजी घर आ गए. स्कूटर बाहर खड़ा कर हैलमैट लगाए हुए ही वे अंदर चले आए. उन्होंने मुझे हैलमैट को उतार कर नमस्कार किया, यह सब मुझे बड़ा अटपटा लगा.

पूछने पर वे कहने लगे, ‘‘हैलमैट के बहुत फायदे हैं. जैसे अगर आप दफ्तर से देर से घर आए हैं. आप की बीवी खरीदारी पर जाने के लिए कब से आप का इंतजार करतेकरते थक गई है, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा ही. जैसे ही आप घर में दाखिल होंगे, बीवी की बेलनरूपी मिसाइल से केवल हैलमैट ही आप को बचा सकता है और कोई नहीं.

‘‘अगर दफ्तर जाने में देर हो जाए. घबराने की जरूरत नहीं है. आप आराम से हैलमैट लगाए हुए ही दफ्तर के अंदर जाएं. बौस पहले आप को देखेगा, फिर घड़ी को देख कर चीखेगा, मगर आप को हैलमैट के चलते कुछ सुनाई नहीं देगा.

‘‘फिर भी बौस का गुस्सा न उतरा हो, तो वह केबिन में बुलाएगा. फिर आप कहिएगा, ‘सर, हैलमैट पहने था, इसीलिए आप की बातें सुन न सका.’

‘‘अगर आप की बीवी दफ्तर जाते समय रोज कभी सब्जी, कभी राशन लाने को कहे, तो आप भी परेशान हो जाते होंगे. दिनभर दफ्तर के पकाऊ काम से थके होने के चलते खरीदारी करना बड़ा सिरदर्द होता है. इस दर्द का इलाज यह हैलमैट ही है.

‘‘बीवी जब टमाटर मंगाए, तो घर में आलू ले जाइए. मिर्च की जगह नीबू खरीदें. बीवी गुस्सा होगी. कहना कि हैलमैट पहने हुए था. सुनाई नहीं दिया होगा. दूसरे दिन से बीवी आप से सब्जी मंगाना बंद कर देगी.

‘‘अगर आप के दोस्त आप से उधार मांगने के लिए दफ्तर के बाहर खड़े हो कर आप को आवाज दें. आप देख कर भी उन्हें अनदेखा कर दें. जब कोई उलाहना दे, तो कहें कि दोस्त, हैलमैट पहने था. सुनाई नहीं दिया होगा. इस तरह हैलमैट आप के रुपयों को डूबने से बचा लेता है.

‘‘अगर आप बीवी के साथ सड़क पर घूम रहे हैं, तो अगलबगल ताकझांक करने पर बीवी का कंट्रोल होता है. इस का भी अचूक उपाय है. हैलमैट पहन कर आप मनचाही जगह ताकझांक करो, कोई आप को पकड़ नहीं पाएगा.’’

मैं गिरधारीजी की बातों से हैरान था. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘हैलमैट में गुण बहुत हैं, सदा रखिए संग…’

Happy New Year 2025 : कभी अलविदा न कहना

Happy New Year 2025 :  डलास (टैक्सास) में लीना से रीवा की दोस्ती बड़ी अजीबोगरीब ढंग से हुई थी. मार्च महीने के शुरुआती दिन थे. ठंड की वापसी हो रही थी. प्रकृति ने इंद्रधनुषी फूलों की चुनरी ओढ़ ली थी. घर से थोड़ी दूर पर झील के किनारे बने लोहे की बैंच पर बैठ कर धूप तापने के साथ चारों ओर प्रकृति की फैली हुई अनुपम सुंदरता को रीवा अपलक निहारा करती थी. उस दिन धूप खिली हुई थी और उस का आनंद लेने को झील के किनारे के लिए दोपहर में ही निकल गई.

सड़क किनारे ही एक दक्षिण अफ्रीकी जोड़े को खुलेआम कसे आलिंगन में बंधे प्रेमालाप करते देख कर वह शरमाती, सकुचाती चौराहे की ओर तेजी से आगे बढ़ कर सड़क पार करने लगी थी कि न जाने कहां से आ कर दो बांहों ने उसे पीछे की ओर खींच लिया था.

तेजी से एक गाड़ी उस के पास से निकल गई. तब जा कर उसे एहसास हुआ कि सड़क पार करने की जल्दबाजी में नियमानुसार वह चारों दिशाओं की ओर देखना ही भूल गई थी. डर से आंखें ही मुंद गई थीं. आंखें खोलीं तो उस ने स्वयं को परी सी सुंदर, गोरीचिट्टी, कोमल सी महिला की बांहों में पाया, जो बड़े प्यार से उस के कंधों को थपथपा रही थी. अगर समय पर उस महिला ने उसे पीछे नहीं खींचा होता तो रक्त में डूबा उस का शरीर सड़क पर क्षतविक्षत हो कर पड़ा होता.

सोच कर ही वह कांप उठी और भावावेश में आ कर अपनी ही हमउम्र उस महिला से चिपक गई. अपनी दुबलीपतली बांहों में ही रीवा को लिए सड़क के किनारे बने बैंच पर ले जा कर उसे बैठाते हुए उस की कलाइयों को सहलाती रही.

‘‘ओके?’’ रीवा से उस ने बड़ी बेसब्री से पूछा तो उस ने अपने आंचल में अपना चेहरा छिपा लिया और रो पड़ी. मन का सारा डर आंसुओं में बह गया तो रीवा इंग्लिश में न जाने कितनी देर तक धन्यवाद देती रही लेकिन प्रत्युत्तर में वह मुसकराती ही रही. अपनी ओर इशारा करते हुए उस ने अपना परिचय दिया. ‘लीना, मैक्सिको.’ फिर अपने सिर को हिलाते हुए राज को बताया, ‘इंग्लिश नो’, अपनी 2 उंगलियों को उठा कर उस ने रीवा को कुछ बताने की कोशिश की, जिस का मतलब रीवा ने यही निकाला कि शायद वह 2 साल पहले ही मैक्सिको से टैक्सास आई थी. जो भी हो, इतने छोटे पल में ही रीवा लीना की हो गई थी.

लीना भी शायद बहुत खुश थी. अपनी भाषा में इशारों के साथ लगातार कुछ न कुछ बोले जा रही थी. कभी उसे अपनी दुबलीपतली बांहों में बांधती, तो कभी उस के उड़ते बालों को ठीक करती. उस शब्दहीन लाड़दुलार में रीवा को बड़ा ही आनंद आ रहा था. भाषा के अलग होने के बावजूद उन के हृदय प्यार की अनजानी सी डोर से बंध रहे थे. इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद रीवा के पैरों में चलने की शक्ति ही कहां थी, वह तो लीना के पैरों से ही चल रही थी.

कुछ दूर चलने के बाद लीना ने एक घर की ओर उंगली से इंगित करते हुए कहा, हाउस और रीवा का हाथ पकड़ कर उस घर की ओर बढ़ गई. फिर तो रीवा न कोई प्रतिरोध कर सकी और न कोई प्रतिवाद. उस के साथ चल पड़ी. अपने घर ले जा कर लीना ने स्नैक्स के साथ कौफी पिलाई और बड़ी देर तक खुश हो कर अपनी भाषा में कुछकुछ बताती रही.

मंत्रमुग्ध हुई रीवा भी उस की बातों को ऐसे सुन रही थी मानो वह कुछ समझ रही हो. बड़े प्यार से अपनी बेटियों, दामादों एवं 3 नातिनों की तसवीरें अश्रुपूरित नेत्रों से उसे दिखाती भी जा रही थी और धाराप्रवाह बोलती भी जा रही थी. बीचबीच में एकाध शब्द इंग्लिश के होते थे जो अनजान भाषा की अंधेरी गलियारों में बिजली की तरह चमक कर राज को धैर्य बंधा जाते थे.

बच्चों को याद कर लीना के तनमन से अपार खुशियों के सागर छलक रहे थे. कैसा अजीब इत्तफाक था कि एकदूसरे की भाषा से अनजान, कहीं 2 सुदूर देश की महिलाओं की एक सी कहानी थी, एकसमान दर्द थे तो ममता ए दास्तान भी एक सी थी. बस, अंतर इतना था कि वे अपनी बेटियों के देश में रहती थी और जब चाहा मिल लेती थी या बेटियां भी अपने परिवार के साथ हमेशा आतीजाती रहती थीं.

रीवा ने भी अमेरिका में रह रही अपनी तीनों बेटियों, दामादों एवं अपनी 2 नातिनों के बारे में इशारों से ही बताया तो वह खुशी के प्रवाह में बह कर उस के गले ही लग गई. लीना ने अपने पति से रीवा को मिलवाया. रीवा को ऐसा लगा कि लीना अपने पति से अब तक की सारी बातें कह चुकी थी. सुखदुख की सरिता में डूबतेउतरते कितना वक्त पलक झपकते ही बीत गया. इशारों में ही रीवा ने घर जाने की इच्छा जताई तो वह उसे साथ लिए निकल गई.

झील का चक्कर लगाते हुए लीना रीवा को उस के घर तक छोड़ आई. बेटी से इस घटना की चर्चा नहीं करने के लिए रास्ते में ही रीवा लीना को समझा चुकी थी. रीवा की बेटी स्मिता भी लीना से मिल कर बहुत खुश हुई. जहां पर हर उम्र को नाम से ही संबोधित किया जाता है वहीं पर लीना पलभर में स्मिता की आंटी बन गई. लीना भी इस नए रिश्ते से अभिभूत हो उठी.

समय के साथ रीवा और लीना की दोस्ती से झील ही नहीं, डलास का चप्पाचप्पा भर उठा. एकदूसरे का हाथ थामे इंग्लिश के एकआध शब्दों के सहारे वे दोनों दुनियाजहान की बातें घंटों किया करते थे.

घर में जो भी व्यंजन रीवा बनाती, लीना के लिए ले जाना नहीं भूलती. लीना भी उस के लिए ड्राईफू्रट लाना कभी नहीं भूली. दोनों हाथ में हाथ डाले झील की मछलियों एवं कछुओं को निहारा करती थीं. लीना उन्हें हमेशा ब्रैड के टुकड़े खिलाया करती थी. सफेद हंस और कबूतरों की तरह पंक्षियों के समूह का आनंद भी वे दोनों खूब उठाती थीं.

उसी झील के किनारे न जाने कितने भारतीय समुदाय के लोग आते थे जिन के पास हायहैलो कहने के सिवा कुछ नहीं रहता था.

किसीकिसी घर के बाहर केले और अमरूद से भरे पेड़ बड़े मनमोहक होते थे. हाथ बढ़ा कर रीवा उन्हें छूने की कोशिश करती तो हंस कर नोनो कहती हुई लीना उस की बांहों को थाम लेती थी.

लीना के साथ जा कर रीवा ग्रौसरी शौपिंग वगैरह कर लिया करती थी. फूड मार्ट में जा कर अपनी पसंद के फल और सब्जियां ले आती थी. लाइब्रेरी से भी किताबें लाने और लौटाने के लिए रीवा को अब सप्ताहांत की राह नहीं देखनी पड़ती थी. जब चाहा लीना के साथ निकल गई. हर रविवार को लीना रीवा को डलास के किसी न किसी दर्शनीय स्थल पर अवश्य ही ले जाती थी जहां पर वे दोनों खूब ही मस्ती किया करती थीं.

हाईलैंड पार्क में कभी वे दोनों मूर्तियों से सजे बड़ेबड़े महलों को निहारा करती थीं तो कभी दिन में ही बिजली की लडि़यों से सजे अरबपतियों के घरों को देख कर बच्चों की तरह किलकारियां भरती थीं. जीवंत मूर्तियों से लिपट कर न जाने उन्होंने एकदूसरे की कितनी तसवीरें ली होंगी.

पीले कमल से भरी हुई झील भी 10 साल की महिलाओं की बालसुलभ लीलाओं को देख कर बिहस रही होती थी. झील के किनारे बड़े से पार्क में जीवंत मूर्तियों पर रीवा मोहित हो उठी थी. लकड़ी का पुल पार कर के उस पार जाना, भूरे काले पत्थरों से बने छोटेबड़े भालुओं के साथ वे इस तरह खेलती थीं मानो दोनों का बचपन ही लौट आया हो.

स्विमिंग पूल एवं रंगबिरंगे फूलों से सजे कितने घरों के अंदर लीना रीवा को ले गई थी, जहां की सुघड़ सजावट देख कर रीवा मुग्ध हो गई थी. रीवा तो घर के लिए भी खाना पैक कर के ले जाती थी. इंडियन, अमेरिकन, मैक्सिकन, अफ्रीका आदि समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के खाने का लुत्फ उठाते थे.

लीना के साथ रीवा ने ट्रेन में सैर कर के खूब आनंद उठाया था. भारी ट्रैफिक होने के बावजूद लीना रीवा को उस स्थान पर ले गई जहां अमेरिकन प्रैसिडैंट जौन कैनेडी की हत्या हुई थी. उस लाइब्रेरी में भी ले गई जहां पर उन की हत्या के षड्यंत्र रचे गए थे.

ऐेसे तो इन सारे स्थलों पर अनेक बार रीवा आ चुकी थी पर लीना के साथ आना उत्साह व उमंग से भर देता था. इंडियन स्टोर के पास ही लीना का मैक्सिकन रैस्तरां था. जहां खाने वालों की कतार शाम से पहले ही लग जाती थी. जब भी रीवा उधर आती, लीना चीपोटल पैक कर के देना नहीं भूलती थी.

मैक्सिकन रैस्तरां में रीवा ने जितना चीपोटल नहीं खाया होगा उतने चाट, पकौड़े, समोसे, जलेबी लीना ने इंडियन रैस्तरां में खाए थे. ऐसा कोई स्टारबक्स नहीं होगा जहां उन दोनों ने कौफी का आनंद नहीं उठाया. डलास का शायद ही ऐसा कोई दर्शनीय स्थल होगा जहां के नजारों का आनंद उन दोनों ने नहीं लिया था.

मौल्स में वे जीभर कर चहलकदमी किया करती थीं. नए साल के आगमन के उपलक्ष्य में मौल के अंदर ही टैक्सास का सब से बड़ा क्रिसमस ट्री सजाया गया था. जिस के चारों और बिछे हुए स्नो पर सभी स्कीइंग कर रहे थे. रीवा और लीना बच्चों की तरह किलस कर यह सब देख रही थीं.

कैसी अनोखी दास्तान थी कि कुछ शब्दों के सहारे लीना और रीवा ने दोस्ती का एक लंबा समय जी लिया. जहां भी शब्दों पर अटकती थीं, इशारों से काम चला लेती थीं.

समय का पखेरू पंख लगा कर उड़ गया. हफ्ताभर बाद ही रीवा को इंडिया लौटना था. लीना के दुख का ठिकाना नहीं था. उस की नाजुक कलाइयों को थाम कर रीवा ने जीभर कर आंसू बहाए, उस में अपनी बेटियों से बिछुड़ने की असहनीय वेदना भी थी. लौटने के एक दिन पहले रीवा और लीना उसी झील के किनारे हाथों में हाथ दिए घंटाभर बैठी रहीं. दोनों के बीच पसरा हुआ मौन तब कितना मुखर हो उठा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस की अनंत प्रतिध्वनियां उन दोनों से टकरा कर चारों ओर बिखर रही हों.

दोनों के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी. शब्द थे ही नहीं कि जिन्हें उच्चारित कर के दोस्ती के जलधार को बांध सकें. प्रेमप्रीत की शब्दहीन सरिता बहती रही. समय के इतने लंबे प्रवाह में उन्हें कभी भी एकदूसरे की भाषा नहीं जानने के कारण कोई असुविधा हुई हो, ऐसा कभी नहीं लगा. एकदूसरे की आंखों में झांक कर ही वे सबकुछ जान लिया करती थीं. दोस्ती की अजीब पर अतिसुंदर दास्तान थी. कभी रूठनेमनाने के अवसर ही नहीं आए. हंसी से खिले रहे.

एकदूसरे से विदा लेने का वक्त आ गया था. लीना ने अपने पर्स से सफेद धवल शौल निकाल कर रीवा को उठाते हुए गले में डाला, तो रीवा ने भी अपनी कलाइयों से रंगबिरंगी चूडि़यों को निकाल लीना की गोरी कलाइयों में पहना दिया जिसे पहन कर वह निहाल हो उठी थी. मूक मित्रता के बीच उपहारों के आदानप्रदान देख कर निश्चय ही डलास की वह मूक मगर चंचल झील रो पड़ी होगी.

भीगी पलकों एवं हृदय में एकदूसरे के लिए बेशुमार शुभकामनाओं को लिए हुए दोनों ने एकदूसरे से विदाई तो ली पर अलविदा नहीं कहा.

Sports : राइफल की रानी निशानेबाज सुमा शिरूर का इंटरव्‍यू

Sports : सुमा शिरूर भारतीय निशानेबाज हैं. वर्तमान में सुमा भारतीय जूनियर राइफल शूटिंग टीम की कोच हैं. सुमा शूटिंग में अबतक कई मैडल जीत चुकी हैं, वहीं उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.

जिंदगी में अगर कुछ कर दिखाने की हिम्मत आप में हैं, तो कितनी भी मुश्किलें रास्ते में आए, उसे पार कर अपनी मंजिल पा लेते हैं. ऐसा ही कर दिखाया है, कर्नाटक राज्य के चिक्काबल्लापुर में जन्मीं पूर्व भारतीय निशानेबाज सुमा शिरुर. वे 30 साल से शूटिंग के क्षेत्र में एक प्लेयर और अब कोच के रूप में बिता रही हैं.

वर्ष 1993 में महाराष्ट्र स्टेट शूटिंग चैम्पियनशिप से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सुमा शिरूर ने साल 2002 और साल 2006 एशियन गेम्स में रजत और कांस्य पदक जीता है. साथ ही कौमनवेल्थ गेम्स में एक गोल्ड मैडल समेत 3 पदक जीते. उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल संयुक्त विश्व रिकौर्ड बनाया हैं, उन्होंने क्वालिफिकेशन राउंड में अधिकतम 400 अंक बनाए हैं, जो उन्होंने 2004 एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप कुआलालंपुर में हासिल किया था. सोमा के लिए Sports एक पैशन है.

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अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित

वर्ष 2003 में, उन्हें भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. आज वह भारतीय जूनियर राइफल शूटिंग टीम की ‘हाई परफौरमेंस कोच’ हैं. वर्ष 2020 पैरालिंपिक महिलाओं की SH1 स्पर्धा, 10 मीटर राइफल में स्वर्ण और महिलाओं की SH1 स्पर्धा, 50 मीटर 3 पोजिशन राइफल कांस्य पदक विजेता अवनि लेखरा की कोच भी हैं. 30 नवंबर 2022 को उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
आप को बता दें कि विनम्र, हंसमुख, धैर्यवान सुमा शिरुर ने नवी मुंबई से अपनी शिक्षा पूरी की. उन्होंने रसायन विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. अपने स्नातक पाठ्यक्रम के दौरान, वह राष्ट्रीय कैडेट कोर का हिस्सा थीं. उसी दौरान उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें शूटिंग में रुचि है और उन्होंने द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता संजय चक्रवर्ती और महाराष्ट्र राइफल एसोसिएशन के श्री बीपी बाम की निगरानी में इस खेल को सीखना शुरू किया और कामयाबी हासिल की.
वर्ष 2018 से 2024 तक सुमा ने एक कोच के रूप में काम किया है, जिस में इस वर्ष पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर ने 10 मीटर और 25 मीटर पिस्टल निशानेबाजी स्पर्धाओं में दो कांस्य पदक जीते. पैरालिंपिक के दौरान, निशानेबाज अवनि लेखरा ने पेरिस में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में अपना खिताब बरकरार रखा है और इस तरह वह पैरालिंपिक में दो स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं हैं.
अभी सुमा शूटिंग कोच से ब्रेक ले कर परिवार के साथ समय बिता रही है और खुद शूटिंग की प्रैक्टिस कर रही हैं, ताकि अपने खिलाड़ियों को खेल के नए तकनीक से परिचय करवा सकें.

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Sports में मिलती है खुशी

खिलाड़ियों का ओलंपिक में जीतने को ले कर सुमा कहती हैं, “शूटिंग में मैं ने ही ओलंपिक और पैरालिंपिक में बच्चों को गाइड किया है. मैं खिलाड़ी अवनी लेखरा की पर्सनल कोच हूं, उन्होंने टोकियो पैरालिंपिक में गोल्ड और ब्रौन्ज मैडल जीता है. पैरिस में भी गोल्ड जीता है.
“एक कोच के रूप में मेरे लिए ये बहुत ही संतोष और खुशी की बात है. sports के लिए खिलाड़ी जितना सैक्रिफाइस करता है, उतना कोच को भी करना पड़ता है. प्रैक्टिस के अलावा खिलाड़ियों के इमोशन भी ऊपरनीचे होते रहते हैं. लगातार गाइडेंस, जिम्मेदारी और एथलीट का ट्रस्ट कोच पर होता है, ऐसे मैं उन्हें उन के गोल तक पहुंचा सकूं. इसे मैँ शब्दों में बयां नहीं कर सकती.”

अधिक चुनौती

सुमा कहती हैं, “सीखने और सिखाने में बहुत अधिक अंतर होता है, जब हम एथलीट होते हैं तो सफलता और असफलता की जिम्मेदारी मेरी होती है, जबकि एक कोच बनने पर चुनौती अधिक होती है, क्योंकि ऐसे में मुझे एकदूसरे खिलाड़ी को समझना, सुनना और धैर्य रखना पड़ता है, ताकि सामने वाले खिलाड़ी का मूड और धैर्य को समझा जा सकें.
“कोच के तौर पर मैं ने खुद को बहुत बदला है, धीरज अपने अंदर लाई हूं. सब से अधिक चुनौती एक शूटर को कोच करना होता है, जिस में सही कौर्डिनेशन होना आवश्यक होता है. इस में समय लगता है, लेकिन अगर शूटर ने जल्दी कोई प्रतियोगिता खेली और हार गया, तो उस का मौरल टूट जाता है. खुद को दोषी मानने लगता है. उस फेज से उन्हें निकालने और खुद पर विश्वास बनाए रखना आसान नहीं होता. बहुत चुनौतीपूर्ण होता है.”

 

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स्वीकारें लर्निंग फेज को

इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद हमारे देश के खिलाड़ी अधिक ओलंपिक मैडल नहीं ला पाते, जबकि छोटेछोटे देश ओलंपिक में गोल्ड मैडल लाते हैं, इस की वजह के बारे में सुमा बताती हैं कि इस के लिए पूरे चक्र को देखना पड़ेगा. देखा जाए तो 4 साल के इस चक्र में पिछले वर्षों से शूटिंग में खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है. ऐसे में लगातार विकास होने की जरूरत है, बैठ कर इंतजार करना ठीक नहीं, सभी को कन्सटेंट ग्रोथ को बनाए रखना पड़ता है, हर दिन नई सीख मिलती है, जिस के लिए फ्लैक्सिबल होना जरूरी है और बदलाव को खुद में लाना पड़ता है, इसे ओपन माइंड के साथ अपनाना पड़ता है. कभीकभी उस बदलाव को खिलाड़ी स्वीकार नहीं कर पाते, जबकि एक खिलाड़ी को हमेशा लर्निंग फेस में रहना जरूरी है.
वह कहती हैं, “हमारा देश काफी इमोशनल है, जिस का प्रभाव खिलाड़ियों पर पड़ता है और वे मैडल के करीब पहुंच कर भी कामयाब नहीं हो पाते, जबकि छोटेछोटे देश मैडल ले आते हैं. इस की वजह उन देशों के बच्चों में बचपन से अधिक आत्मविश्वास का होना है, जिस की कमी हमारे देश में है. अभी थोड़ी माइंडसेट बदली है और आगे कुछ अच्छा अवश्य होगा.”

 

पेरैंट्स का सहयोग जरूरी

सुमा कहती हैं, “हमारे देश में कहीं भी उच्च दर्जे की ट्रैनिंग क्लासेस नहीं हैं और किसी बच्चे ने शुरुआत बचपन में किसी खेल को सीखा है, तो उसे वह माहौल आगे चल कर नहीं मिलता. इन ट्रेनिंग सेंटर्स को अच्छा होने की आवश्यकता है, साथ ही अलगअलग खेल में जाने और सीखने का मौका बच्चों को कम उम्र से मिलना चाहिए, तब जा कर स्पोर्टिंग कल्चर होगा, जो नहीं है. इसलिए मातापिता भी उस ओर ध्यान नहीं देते, जबकि उन का सहयोग बहुत जरूरी होता है.”
वह कहती हैं, “मेरे ट्रेनिंग सेंटर में असिस्टेंट कोच भी महिला है, लड़कों की संख्या से मेरे पास लड़कियां ही अधिक आती है. इस के अलावा मेरी एकेडमी के साथ एक प्राइवेट कंपनी ने शूटिंग रेंज का पार्टनरशिप किया है, जिसे ‘गर्ल्स फौर गोल्ड’ नाम दिया गया है. इस प्रोग्राम के तहत 15 से 19 साल की लड़कियों के लिए पूरी स्पौन्सरशिप उन्होंने दिया है, इस में 7 लड़कियों को चुना गया है. इन लड़कियों को इंडिया के लिए मैडल लाने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है.”

Sports में राजनीति ठीक नहीं

इस के आगे सुमा कहती हैं, “राजनीति आजकल हर जगह है, ऐसे में खेल में होना कोई नई बात नहीं है. खेल में राजनीति गलत है, लेकिन खिलाड़ी को उस तरफ ध्यान दिए बिना आगे बढ़ते रहना है, तभी वे कामयाब हो सकते हैं.”

ये भी सही है कि sports के कुछ इक्विप्मन्ट काफी महंगे होते हैं, मसलन तीरंदाजी या शूटिंग दोनों में आम परिवार के बच्चे उसे खरीद नहीं पाते, ऐसे में उन के हुनर को आगे लाना संभव नहीं होता. इस के जवाब में सुमा कहती हैं कि “शुरुआत के स्तर पर उन्हें किसी क्लब से वह इक्विपमेंट मिल जाता है, लेकिन आगे चल कर उन्हें खुद के राइफल की जरूरत पड़ती है, जिस में सरकार के साथसाथ एकेडमी का सहयोग जरूरी है, जिस में सरकार और प्राइवेट संस्था का एक अच्छा कौम्बीनेशन होना चाहिए.
“मेरी एकेडमी के सारे अरेंजमेंट मैं ने अपनी तरफ से किए हैं, ऐसे में अगर सरकार की तरफ से कुछ ग्रांट मिलता है, तो मैं आगे कुछ अधिक अच्छा कर सकती हूं.”

Sports में किससे मिली प्रेरणा

सुमा ने 18 साल की उम्र में राइफल पकड़ी और शूटिंग की शुरुआत की थी. वे कहती हैं, “जब मैं ने शूटिंग की शुरुआत की थी, तो शूटिंग एक ओलंपिक स्पोर्ट है, ये भी पता नहीं था, लेकिन स्पोर्ट्स में मेरी बहुत रुचि थी, स्कूल के हर स्पोर्ट में मैँ भाग लेती थी और बेस्ट स्पोर्ट्स का एवार्ड भी मिला. इस के बाद जब मैं ने कालेज ज्वाइन किया, तो एनसीसी था, उसे मैं ने जौइन किया और वहां मेरे हाथ में बंदूक मिली. मैँ शूटिंग में अच्छा करने लगी थी, तब मेरे सीनियर मुझे महाराष्ट्र स्टेट एसोसिएशन के शूटिंग सेंटर में ले गए. वहां मुझे पता चला कि ये एक ओलिंपिक स्पोर्ट है और इसे करने की प्रेरणा मिली. मेरे मेहनत को देख कर मेरे पेरैंट्स ने सहयोग दिया, जबकि मेरे परिवार के सारे लोग एकेडमिकली बहुत स्ट्रौंग हैं. शादी के बाद मेरे सासससुर और पति का भी पूरा सहयोग मिला है.

पहली कामयाबी और शादी

सुमा हंसती हुई कहती हैं, “मेरी पहली बड़ी अचीवमेंट वर्ष 1995 है, जिस में मुझे कोमनवैल्थ शूटिंग चैंम्पियनशिप में मुझे मैडल मिला और एशियन शूटिंग के लिए चुनी गई. इस तरह साल 1995 में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई.” सुमा आगे कहती हैं कि “शादी के बाद sports को लेकर  भी परिवार के साथ स्पर्धा में भाग लेना मुश्किल नहीं था, क्योंकि मैँ अपने पति सिद्धार्थ शिरुर को कालेज के समय से जानती थी और मेरी शादी भी साल 1999 में हुई जब मैं ने थोड़ी कामयाबी पा ली थी. पूरा सहयोग होने की वजह से मैँ आगे बढ़ सकी. साल 2001 में बड़ा बेटा हुआ. 2002 में एशियन गेम्स के दौरान बेटा बहुत छोटा था, लेकिन पति और सासससुर ने पूरा सहयोग दिया. 8 महीने के बेटे को ले कर मैँ कौमनवेल्थ गेम्स में गई और मैडल जीता. मेरे लिए यह बहुत बड़ी चुनौती और खुशी रही है.”

निशानेबाज के क्षेत्र में कब आए

sports woman सुमा कहती हैं कि बहुत छोटी उम्र में शूटिंग के क्षेत्र में आना सही नहीं होता, क्योंकि बच्चे का फिजिकल डेवलपमेंट इस खेल के लिए सही होना चाहिए, मिनमम उम्र 10 से 12 साल सही मानी जाती है, लेकिन बच्चे को छोटी उम्र से दूसरे खेलों में भाग लेने की जरूरत होती है, ताकि उन का शारीरिक ग्रोथ सही हो. इस के बाद शूटिंग शुरू कर सकते हैं. उस दौरान एक अच्छा एकेडमिक बैलेन्स होना चाहिए, ताकि पढ़ाई के साथसाथ खेल में भी पूरा मन बच्चा लगा सके, क्योंकि जिस भी खेल को वे चुनते हैं, उस में एक क्वालिटी टाइम और कमिटमेंट देना पड़ता है, जो उन के भविष्य में उन्हें उन के गोल तक पहुंचा सकता है.

रामभद्राचार्य और शंकराचार्य क्यों भड़के Mohan Bhagwat पर

Mohan Bhagwat : तंबाकू बनाने और बेचने वाले ही कैंसर की दवा बनाने लगें तो इसे आप क्या कहेंगे यह आरएसएस प्रमुख के हालिया बयानों से सहज समझा जा सकता है जिसे ले कर संत समाज उन पर भड़का हुआ है जो इशारा यह कर रहा है कि अब हज करने की तुक क्या?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विगत दिनों एक ऐसा बयान दिया जो चर्चा का विषय बनने के बाद अब हिंदुओं के गले की हड्डी बनता जा रहा है. उन्होंने कहा, “धर्म के नाम पर होने वाले सभी उत्पीड़न और अत्याचार गलतफहमी और धर्म को समझ की कमी के कारण हुए हैं.”
महाराष्ट्र के अमरावती में महानुभाव आश्रम के शताब्दी समारोह में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा, “धर्म महत्वपूर्ण है और इस को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए. धर्म का अनुचित और अधूरा ज्ञान अधर्म की ओर ले जाता है.” इस बयान की देशभर में चर्चा है इस के अलगअलग अर्थ निकाले जा रहे हैं लेकिन सब से बड़ा सवाल है कि मोहन भागवत को ऐसा क्यों कहना पड़ा है और इस के भीतर का अर्थ क्या है यह समझना आवश्यक है.
दरअसल, मोहन भागवत के अनुसार, धर्म हमेशा से अस्तित्व में रहा है और सब कुछ इस के अनुसार चलता है, इसीलिए इसे सनातन कहा जाता है.
उन्होंने यह भी कहा कि धर्म का आचरण ही धर्म की रक्षा है और अगर धर्म को सही तरीके से समझा जाए तो इस से समाज में शांति, सद्भाव और समृद्धि आ सकती है.
यह बयान एक महत्वपूर्ण समय पर आया है, जब देशभर में धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही हैं. उत्तर प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ अथवा जम्मूकश्मीर, मणिपुर, असम हर एक राज्य में माहौल विषाक्त होता चला जा रहा है. जो आने वाले समय में देश में अनेक संकट और विषमता है पैदा कर सकता है इस दिशा में सत्ता और समाज के अगुवा लोगों को सद्भावना का संदेश देना होगा.

भड़का संत समाज

मोहन भागवत की मंशा बहुत साफसुथरी या स्पष्ट थी इस में शक है लोग किसी नतीजे पर पहुंच पाते इस के पहले ही संत समाज ने धर्म के असल माने बता दिए कि धर्म का शांति, सद्भाव या भाईचारे से कोई लेनादेना नहीं है इस का असल मकसद लोगों के दिलोदिमाग और व्यक्तिगत सामाजिक जिंदगी पर शासन करना है जिस से वे पूजापाठी बने रह कर दानदक्षिणा के कारोबार के ग्राहक बने रहें और जो इस के आड़े आएगा उसे सबक सिखाने में धर्म के ठेकेदार हिचकिचाएंगे नहीं फिर भले ही वे धर्म का मतलब सिखाते रहने वाले मोहन भागवत ही क्यों न हों.

लोग भागवत से सहमत होने की वजह ढूंढ पाते इस से पहले ही साधुसंतों ने उन्हें अपने निशाने पर लेना शुरू कर दिया. ताजा बयान वैष्णव संत रामभद्राचार्य का है जिन्होंने भागवत से सहमत होने से इनकार करते हुए दो टूक कहा कि हम भागवत के अनुशासक हैं वे हमारे अनुशासक नहीं हैं जो भागवत की बात को हिंदू या हम मानें. इस के पहले एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने तो और भी तीखे अंदाज में कहा था कि जब उन्हें सत्ता हासिल करना थी तब वह मंदिरमंदिर करते थे अब सत्ता मिल गई तो मंदिर नहीं ढूंढने की सलाह दे रहे हैं.

देखा जाए तो ये संत गलत कुछ नहीं कह रहे हैं जिस का सार यह है कि अब हज करने क्यों जाया जा रहा है? आरएसएस ने अपने उद्भव से ही हिंदुओं को भड़काने का काम किया है और अब अहिंसा परमोधर्म जैसे आउटडेटेड उपदेश दे रहा है. अब बबूल बोकर गुलाब के फूल तो मिलने से रहे.

खास मकसद से दिए गए बयान के बाद भी मोहन भागवत की बातों का असर निम्नलिखित हो सकता है:

मोहन भागवत के बयान से लोगों को धर्म के प्रति नई सोच का आगाज हो सकता है. ऐसा सोचना भी बेईमानी है. वे धर्म को एक नए दृष्टिकोण से देख सकते हैं यह सोचने की भी कोई वजह नहीं और न ही वे इस के मूलसिद्धांतों को भूलने का प्रयास कर सकते हैं. ये बातें भी मन बहलाऊ ही हैं कि मोहन भागवत के बयान से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिल सकता है. लोग धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए एकजुट हो सकते हैं और समाज में शांति और सद्भाव को बढ़ावा दे सकते हैं. मोहन भागवत के बयान का राजनीतिक प्रभाव भी हो सकता है. यह बयान भारतीय जनता पार्टी को धर्म के प्रति अपनी नीतियों को बदलने के लिए प्रेरित कर सकता है और धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए कदम उठा सकते हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि लोग दोनों में से किस की बात पर ध्यान देते हैं.

मोहन भागवत के बयान से सामाजिक परिवर्तन की संभावना भी न के बराबर है क्योंकि उन की अब कोई सुनता नहीं और सुनता भी है तो उस पर अमल नहीं करता अगर अमल ही करना होता तो गांधी और नेहरू क्या बुरे थे. मोहन भागवत ने ऐसा बयान देने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. यहां कुछ संभावित कारण हैं:

भागवत ने कहा है, ”धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही शांति और समृद्धि का मार्ग है”. यह बयान धर्म की सही समझ को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है. लेकिन यही धर्म की सही समझ होती तो देश का माहौल बिगड़ता ही क्यों?
भागवत ने कहा है कि धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए एकजुट होना आवश्यक है. यह बयान सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.

भागवत का बयान राजनीतिक संदेश भी हो सकता है. यह बयान भाजपा की धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सद्भाव के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाने के लिए दिया गया हो सकता है. लेकिन भाजपा की तरफ से इस आशय का कोई वक्तव्य अभी तक न आना बताता है कि वह दो पाटों के बीच फंस चुकी है.
भागवत ने कहा है कि धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही विश्व शांति का मार्ग है. यह बयान विश्व शांति को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.
भागवत का बयान हिंदू धर्म की रक्षा के लिए भी दिया गया हो सकता है. यह बयान हिंदू धर्म के मूल्यों और सिद्धांतों को बचाने और बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.

यह सवाल काफी संवेदनशील है, और इस का जवाब देना मुश्किल है क्योंकि हर धर्म की तरह हिंदू धर्म की बुनियाद भी हिंसा, बैर और झगड़ेफसाद जंग आदि पर ही रखी गई है.
हाल के वर्षों में भारत में धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं अत्यंत बढ़ गई हैं. कई मामलों में, हिंदू धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं हुई हैं.

ऐसे में मोहन भागवत का बयान एक प्रयास हो सकता है कि धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोका जाए. यह बयान एक संदेश हो सकता है कि धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही शांति और समृद्धि का मार्ग है.
लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या यह बयान पर्याप्त है? क्या यह बयान धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए पर्याप्त है? यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हो या दुनिया की सब से बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए और अधिक गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है.

दरअसल, असल लड़ाई दानदक्षिणा की हिस्साबांटी की है. संत समाज को लगता है कि सरकारी पैसे से संघ की इमारतें चमक रही हैं जबकि मोहन भागवत का सोचना यह हो सकता है कि मंदिर तो खूब चमक चुके हैं.

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