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lending money : उधार देने से पहले जान लें ये जरूरी Tips

lending money :  उधार देना बुरा नहीं है लेकिन बिना सोचेसमझे उधार देना गलत है. उधार देने से पहले आप को पता होना चाहिए कि सामने वाले को उधार क्यूं चाहिए. अगर वह वजह आप को सही लगे, उधार देने लायक लगे, तो जरूरतमंद की मदद करना बुरा भी नहीं है. 

“उधार न देना अच्छा, न लेना अच्छा; उधार स्नेह की कैंची है,” अंग्रेज नाटककार विलियम शेक्सपियर ने लिखा था. उन्होंने सदियों पुरानी बुद्धिमानी की बात दोहराई. यह तो पक्का है कि पैसा उधार लेनादेना बहुत ही नाजुक मामला है और इस से रिश्‍ते तक टूट जाते हैं. चाहे कितनी भी अच्छी योजना क्यों न बनाई गई हो और कितने भी नेक इरादे क्यों न रहे हों, कब स्थिति बदल जाए हम नहीं जानते.

क्या पता ऐसी स्थिति हो जाए कि उधार लेने वाले के लिए अपना कर्ज चुकाना मुश्‍किल या असंभव हो जाए. या ऐसा भी हो सकता है कि उधार देनेवाले को अचानक उस पैसे की जरूरत आन पड़े जो उस ने उधार दिया है. जब ऐसी बातें होती हैं, तो जैसा शेक्सपियर ने कहा, दोस्ती और रिश्‍तों में दरार पड़ सकती है.

जरूरतमंद की मदद घाटे का सौदा नहीं

कई बार व्यक्ति इतना मजबूर हो जाता है कि उस के पास उधार लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता. भूखे मरने तक की नौबत आ जाती है या फिर अपने किसी की जान पर बन आए तो वह उधार मांगेगा ही, नौकरी छूट गई है और घर का किराया देना है, नहीं तो सामान बाहर फेंक दिया जाएगा. ऐसी स्थति में अगर आप से उधार मांगा गया है, तो मना करने से पहले एक बार विचार कर लें.

उधार देना गलत बात नहीं है यह गलत तब हो जाता है जब सामने वाला उसे सही समय आने पर भी वापस न दें. लेकिन अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उधार देते समय कितनी सतर्कता बरतते हैं. उधार देने से पहले उधार लेने की वजह पूछें. अगर आप को लगता है उधार का लिया जाना इतना जरुरी है कि अगर वापस भी न मिला तो कोई गम नहीं, कम से कम मन में सुकून होगा कि किसी जरूरतमंद की मदद की है, तो ऐसे में उधार देना घाटे का सौदा नहीं होगा.

 

दोस्त और रिश्तेदारों के मुसीबत में काम नहीं आएंगे, तो कब काम आएंगे

एक परिवार के पास मकान तो है लेकिन आमदनी का जरिया बिलकुल बंद हो गया है. मकान तो है लेकिन जब तक वो बिकेगा नहीं हाथ में कैश नहीं है. अगर ऐसे में शक हो तो कैश उधार न दे कर चेक से पेमैंट करें.

 

अगर इलाज के लिए पैसा दे रहें हैं, तो जरूर दें

बीमारी या दुर्घटना कह कर नहीं आती मगर महंगे इलाज के लिए रकम जुटाना किसी के लिए भी मुश्किल हो सकता है. कोई दोस्त या रिश्तेदार इलाज के लिए मदद करने को कहें तो इस के लिए कभी मना न करें. भले ही उस व्यक्ति का रिकार्ड अच्छा न हो, यह पता हो कि उस को दिया पैसा वापस आना मुश्किल है लेकिन अगर आप देख रहें हैं कि उसे इलाज के लिए सच में पैसों की जरूरत है, तो मना न करें भले ही आप का पैसा वापस मिले न मिले.

अगर फिर भी इलाज अपनी हैसियत से बाहर जा रहा हो, तो मेडिकल इमरजेंसी के लिए कर्ज लिया जा सकता है, जो झटपट मिल भी जाता है. मेडिकल इमरजेंसी लोन भी असल में पर्सनल लोन ही होता है मगर इलाज पर होने वाले खर्च के लिए ही दिया जाता है. ऐसे कर्ज को मंजूरी चटपट मिल जाती है, पात्रता की शर्तें भी आसान होती हैं और कई बार ब्याज दर भी आम पर्सनल लोन की ब्याज दर से कम होती है.

इस में मिली रकम का इस्तेमाल अस्पताल में भर्ती होने पर बिल चुकाने में, औपरेशन में, जरूरी और महंगी दवाएं खरीदने में और औपरेशन के बाद होने वाले खर्च में किया जा सकता है. ये सब करने में भी रिश्तेदार की मदद करें.

घर बनाने के लिए पैसे न दें

सुनील ने अपनी बहन को फोन किया और कहा कि मैं अपने घर में काम करा रहा हूं और थोड़े पैसे कम पड़ रहें हैं. क्या तुम थोड़ी मदद कर दोगी. यह सुनकर राशि को न हां करते बना और न ही मना करते बना. उस ने कहा शाम को मैं तुम्हारे जीजाजी से पूछ कर बताती हूं.

राशि को पता था एक बार पैसे दिए तो जल्दी से वापस नहीं आने वाले लेकिन मना करते हुए भी नहीं बन रहा था. इसलिए बीच का रास्ता निकाल राशि ने भाई से कहा 1 हफ्ता पहले पैसे मांगते तो हम दे देते लेकिन अभी दो दिन पहले ही हमने म्यूच्यल फंड में सारा पैसा लगा दिया.

सच तो यह था कि राशि को घर बनाने के लिए पैसा उधार देना सही नहीं लगा. वह अपनी जगह सही भी थी. पैसा तब दिया जाता है जब सामने वाला मजबूरी की हालत में हो नाकि वह अपने ऐशो आराम पर खर्च कर रहा हो.

 

गाड़ी मोटरसाइकल के लिए पैसे न दें

अगर कोई गाड़ी मोटरसाइकल खरीद ने के लिए पैसा मांगे फिर चाहे वो करीबी दोस्त ही क्यूं न हो. उसे साफ मना कर दें. बल्कि सलाह दें कि हर महीने कुछ बचत कर के भी वह अपनी यह जरूरत पूरी कर सकता है. अगर नहीं कर सकता तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट में हजारों लोग सफर करते हैं उस से आएं जाएं.

 

तीर्थ यात्रा के लिए पैसे न दें

घरों में देखने में आता है कि घर के बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि हमे तीर्थ यात्रा पर जाना है पैसों का इंतजाम कर दें. लेकिन तीर्थ यात्रा पर जाना भी कोई सस्ता सौदा नहीं है. वहां पर भी लाखों रुपया खर्चा हो जाता है. ऐसे में कई बार बेटा मना नहीं कर पाता और पर्सनल लोन ले कर या अपने किसी सबंधी से पैसा उधार मांगता है. अगर कोई आप से ऐसी मांग करें तो आप तुरंत मना कर सकते हैं. ये कोई इतना जरूरी काम नहीं है जिस के लिए आप उधार दे कर अपने पैसे फंसाएं.

 

कोर्ट कचहरी के लिए पैसे दे देने चाहिए

अगर कोई मित्र कोर्ट कचहरी के किसी केस में गलत तरीके से फंस गया है तो उस की मदद जरूर करें. कोर्ट कचहरी में बहुत ज्यादा पैसा लग जाता है. लोगों की जमीन जायजाद तक बिक जाती है. अगर दोस्त मुसीबत में है और मदद मांग रहा है तो उस की मदद करें. लेकिन उस से बात कर लें कि जब वह इन चक्करों से निकल जाएगा तो पैसा वापस कर देगा.

 

पढ़ाई के लिए भी पैसे दे देने चाहिए

अगर कोई बच्चा होनहार है और आगे पढ़ना चाहता है लेकिन फीस देने में सक्षम नहीं है तो उस की हेल्प करें. फिर वो बच्चा चाहे मेड का हो, दोस्त का हो या फिर कोई अन्य गरीब हो. अगर यह लग रहा है कि दिए हुए पैसे का वापस आना मुश्लिल है तो भी अगर आप करने लायक हैं तो मदद करें इस से आप उस की पूरी जिंदगी बना देंगे.

 

जरूरतमंद को उधार देने के फायदें

  • जब आप जरूरतमंद होंगे तब आप को भी मदद मिलेगी.
  • रिलेटिव की गुड़ बुक्स में रहेंगे आप.
  • अपने मन को संतुष्टि मिलेगी की हम किसी के काम आएं.
  • उधार देने के बहाने रिश्ते संजों रहें हैं आप.

 

 

Hindi Satire : यही है बाप होना

Hindi Satire :  खास बात है, बाप होना. बनने और होने के भेद में वर्षों की साधना है. यह हुनर का काम है. कारीगरी का कमाल है. इनसान वर्षों प्रयास करता है तब कहीं जा कर बाप बन पाता है.

बाप बनता है. बाप होता है. जो बाप बनता है सो एक ही कारण से बनता है. कारण, बड़ा मासूम सा है. इधर एक मासूम पैदा हुआ, उधर दूसरा जो अब तक मासूम था, बाप बन गया.

बाप बनना एक साधारण घटना है. बाप बनाना उस से भी साधारण, यानी जिस से गरज पड़ी उसी को बाप बना लिया और मुहावरा हो गया ‘गधे को बाप बनाना.’ यह बात अलग है कि बिना गधा बने इनसान बाप नहीं बन सकता क्योंकि बाप बनने की एक जरूरी शर्त शादी करना  है. अत: साबित यही होता है कि बिना गधा हुए कोई शादी नहीं कर सकता और बिना शादी किए कोई बाप नहीं बन सकता.

जैसे सब नियमों में अपवाद की आशंका होती है वैसे ही इस में भी अपवाद की आशंका होती है.

गधों का बाप बनना या गधों को बाप बनाना कमोबेश बड़ी ही साधारण घटना है. हर खास और आम के जीवन में यह घटना घट जाती है. एक बार, कईकई बार और बारबार. कोईकोई अपनी एक ही भूल को बारबार दोहराते रहते हैं.

खास बात है, बाप होना. बनने और होने के भेद में वर्षों की साधना है. यह हुनर का काम है. कारीगरी का कमाल है. इनसान वर्षों तपस्या करता है तब कहीं जा कर बाप हो पाता है. यह गहन साधना का काम है. वर्षों नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है या कहें ‘रंग लाती है हिना पत्थर पर घिस जाने के बाद’ और इनसान जब, जिस के कारण बाप बना होता है वह बेल फैल जाती है. बेल बालिका है, बाप विनम्रता की काया व दीनता की मूर्ति. बालिका को जन्म देना उस का अपराध, जिस की सजा उसे भुगतनी ही है. यानी एक बाप हाथ बांधे दूसरे बाप के सामने जीहुजूरी में खड़ा है.

हुजूर जो हैं सो बेटे के बाप हैं. ऐसेवैसे बेटे के नहीं बल्कि विवाह योग्य बेटे के. चाल में तिरछा बांकपन, आवाज में खनक. कौन कहता है कि राजामहाराजा समाप्त हो गए या उन का प्रिवीपर्स बंद कर दिया गया. सरकार ने बंद किया और बेटी वालों के यहां खुल गया. नाम अलग हैं, नजराना, शुकराना, जुर्माना, जबराना. कारण एक है, बेटी.

विनम्रतापूर्वक खुद दिया तो नजराना, अर्जी स्वीकार करने पर दिया तो शुकराना, कह कर तय किया तो जुर्माना और जबर्दस्ती वसूल किया तो जबराना. कई दुष्टों की गाड़ी जबराने के बेरिकेटर पर भी नहीं रुकती.

इस के आगे लाललाल आग दहकती है, कभी लकडि़यों की, कभी देह की. जब आग नहीं दहकती तो राख सुलगती है. इस की चिंगारी पहचानने वाले शुरू में ही भांप जाते हैं. बाप नवाब की अदा से मसनद का सहारा लिए अधलेटा पड़ा है-‘हूं.’ वह ठकुरसुहाती सुन रहा है. उस के ‘हूं’ के विस्तार पर होने वाले रिश्ते का फैसला टिका है.

कई अपने सुत को श्रवणकुमार बताते हुए कहते हैं कि वह मेरी मर्जी के बगैर कुछ नहीं करता है. मां अभिमान के इस गोवर्धन में लाठी लगाती है, ‘‘उस ने तो कह दिया कि सब्जी क्या मुझ से पूछ कर लाती हो, जैसी चाहिए वैसी बहू ले आओ.’’ आज्ञाकारी सुत बुलाने पर आता है और झलक दिखा कर चला जाता है.

बाप की निगाहों में सवाल है. जवाब में बेटी के अपराधी बाप को अपनी सामर्थ्य का अंदाज लगा कर एक बोली उचारनी है. यह एक ऐसा अकेला बाजार है जिस में बेचने वाला मनमर्जी का दाम ले कर भी सामान की डिलीवरी नहीं देता. दाम गल्ले में, सामान भी पल्ले में. इस के साथ ही अपनी तमाम पूंजी भी उसी की गांठ में बांध खाली हाथ रखता है. वह भी खुले नहीं, जुड़े. इस के बाद भी रिकरिंग एक्सपेंडीचर यानी ब्याह के बाद भी. यह सावन, वह सनूना, तीजत्योहार, होलीदीवाली, सकटसंक्रांति तमाम कुलखानदान के जन्मदिन और वर्षदिवस, कहां जाओगे. जन्मजन्मांतर तक यही करो.

इस में लेने वाला धन्यवाद आदि की औपचारिकता निभाने के झमेले में नहीं पड़ता. उस की अदा पिंडारियों जैसी है. चौथ वसूल करनी है, करते रहनी है. हक का मामला है.

दोनों पक्ष निमित्त मात्र होने की भंगिमा बना लेते हैं. एक वकोध्यानम्के साथ कि बड़ी मछली को ताड़ ले और झट से दबोच ले और दूसरा कबूतर की तरह आंख मूंद ले कि आ बिल्ली, मुझे खा. बगुले और कबूतर में नियति का ही भेद है. कबूतर सफेद हो तो शांति के नाम उड़ा दिया जाए या खेल के नाम पर. बगुले के तमाम उजलेपन के बावजूद कोई न उसे फांसता है न उड़ाता है. करम की गति न्यारी.

न्यारी तो वह चाल भी है कि आप को बताते हैं. बताना क्या है, भांपना है, टटोलना है. यह सिद्धि वर्षों में प्राप्त की है. किश्ती नैप्पी बदलबदल कर इस हैप्पी तट तक आई है. अब मछेरा जाल डाले बैठा है. वह जो गणित के सवाल कल नहीं हल कर पाता था, आज हुंडी हो गया है. बाप अपनी हुंडी की असलियत जानता है. यह नौबत 10 दिन बजनी है फिर न यह पुर हैं, न पाटन, न गैल न गली. उस के बाद चमन उजड़ कर सहरा हो जाना है जिस में कईकई उच्छ्वासों में एक उच्छ्वास और मिलना है, ‘पूत पड़ोसी हो गए.’

उच्छ्वास बाहर तब निकलती है जब पहले सीने फूले हुए हों, इतने फूले रहें और इतनी देर फूले रहें कि काया से हवा का बोझ न सहा जाए. हवा नहीं गुब्बारा पिचके और बस्स… यही है बाप होना.

Short Stories in Hindi : मेरी बहू पल्‍लवी

Short Stories in Hindi :  ‘‘हमारा जीवन कोई जंग नहीं है मीना कि हर पल हाथ में हथियार ही ले कर चला जाए. सामने वाले के नहले पर दहला मारना ही क्या हमारे जीवन का उद्देश्य रह गया है?’’ मैं ने समझाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘अब अपनी उम्र को भी देख लिया करो.’’

‘‘क्या हो गया है मेरी उम्र को?’’ मीना बोली, ‘‘छोटाबड़ा जैसे चाहे मुझ से बात करे, क्या उन्हें तमीज न सिखाऊं?’’

‘‘तुम छोटेबड़े, सब के हर काम में अपनी टांग क्यों फंसाती हो, छोटे के साथ बराबर का बोलना क्या तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘तुम मेरे सगे हो या विजय के? मैं जानती हूं तुम अपने ही खून का साथ दोगे. मैं ने अपनी पूरी उम्र तुम्हारे साथ गुजार दी मगर आज भी तुम मेरे नहीं अपने परिवार के ही सगे हो.’’

मैं ने अपना सिर पीट लिया. क्या करूं मैं इस औरत का. दम घुटने लगता है मेरा अपनी ही पत्नी मीना के साथ. तुम ने खाना मुझ से क्यों न मांगा, पल्लवी से क्यों मांग लिया. सिरदर्द की दवा पल्लवी तुम्हें क्यों खिला रही थी? बाजार से लौट कर तुम ने फल, सब्जी पल्लवी को क्यों पकड़ा दी, मुझे क्यों नहीं बुला लिया. मीना अपनी ही बहू पल्लवी से अपना मुकाबला करे तो बुरा लगना स्वाभाविक है.

उम्र के साथ मीना परिपक्व नहीं हुई उस का अफसोस मुझे होता है और अपने स्नेह का विस्तार नहीं किया इस पर भी पीड़ा होती है क्योंकि जब मीना ब्याह कर मेरे जीवन में आई थी तब मेरी मां, मेरी बहन के साथ मुझे बांटना उसे सख्त नागवार गुजरता था. और अब अपनी ही बहू इसे अच्छी नहीं लगती. कैसी मानसिकता है मीना की?

मुझे मेरी मां ने आजाद छोड़ दिया था ताकि मैं खुल कर सांस ले सकूं. मेरी बहन ने भी शादी के बाद ज्यादा रिश्ता नहीं रखा. बस, राखी का धागा ही साल भर बाद याद दिला जाता था कि मैं भी किसी का भाई हूं वरना मीना के साथ शादी के बाद मैं एक ऐसा अनाथ पति बन कर रह गया जिस का हर कोई था फिर भी पत्नी के सिवा कोई नहीं था. मैं ने मीना के साथ निभा लिया क्योंकि मैं पलायन में नहीं, निभाने में विश्वास रखता हूं, लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव पर जब मैं सब का प्यार चाहता हूं, सब के साथ मिल कर रहना चाहता हूं तो सहसा महसूस होता है कि मैं तो सब से कटता जा रहा हूं, यहां तक कि अपने बेटेबहू से भी.

मीना के अधिकार का पंजा शादी- शुदा बेटे के कपड़ों से ले कर उस के खाने की प्लेट तक है. अपना हाथ उस ने खींचा ही नहीं है और मुझे लगता है बेटा भी अपना दम घुटता सा महसूस करने लगा है.

‘‘कोई जरूरत नहीं है बहू से ज्यादा घुलनेमिलने की. पराया खून पराया ही रहता है,’’ मीना ने सदा की तरह एकतरफा फैसला सुनाया तो बरसों से दबा लावा मेरी जबान से फूट निकला.

‘‘मेरी मां, बहन और मेरा भाई विजय तो अपना खून थे पर तुम ने तो मुझे उन से भी अलग कर दिया. मेरा अपना आखिर है कौन, समझा सकती हो मुझे? बस, वही मेरा अपना है जिसे तुम अपना कहो…तुम्हारे अपने भी बदलते रहते हैं… कब तक मैं रिश्तों को तुम्हारी ही आंखों से देखता रहूंगा.’’

कहतेकहते रो पड़ा मैं, क्या हो गया है मेरा जीवन. मेरी सगी बहन, मेरा सगा भाई मेरे पास से निकल जाते हैं और मैं उन्हें बुलाता ही नहीं…नजरें मिलती हैं तो उन में परायापन छलकता है जिसे देख कर मुझे तकलीफ होती है. हम 3 भाई, बहन जवान हो कर भी जरा सी बात न छिपाते थे और आज वर्षों बीत गए हैैं उन से बात किए हुए.

आज जब जीवन की शाम है, मेरी बहू पल्लवी जिस पर मैं अपना ममत्व अपना दुलार लुटाना चाहता हूं, वह भी मीना को नहीं सुहाता. कभीकभी सोचता हूं क्या नपुंसक हूं मैं? मेरी शराफत और मेरी निभा लेने की क्षमता ही क्या मेरी कमजोरी है? तरस आता है मुझे कभीकभी खुद पर.

क्या वास्तव में जीवन इसी जीतहार का नाम है? मीना मुझे जीत कर अलग ले गई होगी, उस का अहं संतुष्ट हो गया होगा लेकिन मेरी तो सदा हार ही रही न. पहले मां को हारा, फिर बहन को हारा. और उस के बाद भाई को भी हार गया.

‘‘विजय चाचा की बेटी का  रिश्ता पक्का हो गया है, पापा. लड़का फौज में कैप्टन है,’’ मेरे बेटे दीपक ने खाने की मेज पर बताया.

‘‘अच्छा, तुझे बड़ी खबर है चाचा की बेटी की. वह तो कभी यहां झांकने भी नहीं आया कि हम मर गए या जिंदा हैं.’’

‘‘हम मर गए होते तो वह जरूर आता, मीना, अभी हम मरे कहां हैं?’’

मेरा यह उत्तर सुन हक्काबक्का रह गया दीपक. पल्लवी भी रोटी परोसती परोसती रुक गई.

‘‘और फिर ऐसा कोई भी धागा हम ने भी कहां जोड़े रखा है जिस की दुहाई तुम सदा देती रहती हो. लोग तो पराई बेटी का भी कन्यादान अपनी बेटी की तरह ही करते हैं, विजय तो फिर भी अपना खून है. उस लड़की ने ऐसा क्या किया है जो तुम उस के साथ दुश्मनी निभा रही हो.

खाना पटक दिया मीना ने. अपनेपराए खून की दुहाई देने लगी.

‘‘बस, मीना, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि कल क्या हुआ था. जो भी हुआ उस का इस से बुरा परिणाम और क्या होगा कि इतने सालों से हम दोनों भाइयों ने एकदूसरे की शक्ल तक नहीं देखी… आज अगर पता चला है कि उस की बच्ची की शादी है तो उस पर भी तुम ताना कसने लगीं.’’

‘‘उस की शादी का तो मुझे 15 दिन से पता है. क्या वह आप को बताने आया?’’

‘‘अच्छा, 15 दिन से पता है तो क्या तुम बधाई देने गईं? सदा दूसरों से ही उम्मीद करती हो, कभी यह भी सोचा है कि अपना भी कोई फर्ज होता है. कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं चलता. सामने वाले को भी तो पता चले कि आप को उस की परवा है.’’

‘‘क्या वह दीपक की शादी में आया था?’’ अभी मीना इतना ही कह पाई थी कि मैं खाना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ.

मीना का व्यवहार असहनीय होता जा रहा है. यह सोच कर मैं सिहर उठता कि एक दिन पल्लवी भी दीपक को ले कर अलग रहने चली जाएगी. मेरी उम्र भर की साध मेरा बेटा भी जब साथ नहीं रहेगा तो हमारा क्या होगा? शायद इतनी दूर तक मीना सोच नहीं सकती है.

सहसा माली ने अपनी समस्या से चौंका दिया, ‘‘अगले माह भतीजी का ब्याह है. आप की थोड़ी मदद चाहिए होगी साहब, ज्यादा नहीं तो एक जेवर देना तो मेरा फर्ज बनता ही है न. आखिर मेरे छोटे भाई की बेटी है.’’

ऐसा लगा  जैसे किसी ने मुझे आसमान से जमीन पर फेंका हो. कुछ नहीं है माली के पास फिर भी वह अपनी भतीजी को कुछ देना चाहता है. बावजूद इस के कि उस की भी अपने भाई से अनबन है. और एक मैं हूं जो सर्वसंपन्न होते हुए भी अपनी भतीजी को कुछ भी उपहार देने की भावना और स्नेह से शून्य हूं. माली तो मुझ से कहीं ज्यादा धनवान है.

पुश्तैनी जायदाद के बंटवारे से ले कर मां के मरने और कार दुर्घटना में अपने शरीर पर आए निशानों के झंझावात में फंसा मैं कितनी देर तक बैठा सोचता रहा, समय का पता ही नहीं चला. चौंका तो तब जब पल्लवी ने आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है, पापा…आप इतनी रात गए यहां बैठे हैं?’’ धीमे स्वर में पल्लवी बोली, ‘‘आप कुछ दिन से ढंग से खापी नहीं रहे हैं, आप परेशान हैं न पापा, मुझ से बात करें पापा, क्या हुआ…?’’

जरा सी बच्ची को मेरी पीड़ा की चिंता है यही मेरे लिए एक सुखद एहसास था. अपनी ही उम्र भर की कुछ समस्याएं हैं जिन्हें समय पर मैं सुलझा नहीं पाया था और अब बुढ़ापे में कोई आसान रास्ता चाह रहा था कि चुटकी बजाते ही सब सुलझ जाए. संबंधों में इतनी उलझनें चली आई हैं कि सिरा ढूंढ़ने जाऊं तो सिरा ही न मिले. कहां से शुरू करूं जिस का भविष्य में अंत भी सुखद हो? खुद से सवाल कर खुद ही खामोश हो लिया.

‘‘बेटा, वह…विजय को ले कर परेशान हूं.’’

‘‘क्यों, पापा, चाचाजी की वजह से क्या परेशानी है?’’

‘‘उस ने हमें शादी में बुलाया तक नहीं.’’

‘‘बरसों से आप एकदूसरे से मिले ही नहीं, बात भी नहीं की, फिर वह आप को क्यों बुलाते?’’ इतना कहने के बाद पल्लवी एक पल को रुकी फिर बोली, ‘‘आप बड़े हैं पापा, आप ही पहल क्यों नहीं करते…मैं और दीपक आप के साथ हैं. हम चाचाजी के घर की चौखट पार कर जाएंगे तो वह भी खुश ही होंगे…और फिर अपनों के बीच कैसा मानअपमान, उन्होंने कड़वे बोल बोल कर अगर झगड़ा बढ़ाया होगा तो आप ने भी तो जरूर बराबरी की होगी…दोनों ने ही आग में घी डाला होगा न, क्या अब उसी आग को पानी की छींट डाल कर बुझा नहीं सकते?…अब तो झगड़े की वजह भी नहीं रही, न आप की मां की संपत्ति रही और न ही वह रुपयापैसा रहा.’’

पल्लवी के कहे शब्दों पर मैं हैरान रह गया. कैसी गहरी खोज की है. फिर सोचा, मीना उठतीबैठती विजय के परिवार को कोसती रहती है शायद उसी से एक निष्पक्ष धारणा बना ली होगी.

‘‘बेटी, वहां जाने के लिए मैं तैयार हूं…’’

‘‘तो चलिए सुबह चाचाजी के घर,’’ इतना कह कर पल्लवी अपने कमरे में चली गई और जब लौटी तो उस के हाथ में एक लाल रंग का डब्बा था.

‘‘आप मेरी ननद को उपहार में यह दे देना.’’

‘‘यह तो तुम्हारा हार है, पल्लवी?’’

‘‘आप ने ही दिया था न पापा, समय नहीं है न नया हार बनवाने का. मेरे लिए तो बाद में भी बन सकता है. अभी तो आप यह ले लीजिए.’’

कितनी आसानी से पल्लवी ने सब सुलझा दिया. सच है एक औरत ही अपनी सूझबूझ से घर को सुचारु रूप से चला सकती है. यह सोच कर मैं रो पड़ा. मैं ने स्नेह से पल्लवी का माथा सहला दिया.

‘‘जीती रहो बेटी.’’

अगले दिन पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार पल्लवी और मैं अलगअलग घर से निकले और जौहरी की दुकान पर पहुंच गए, दीपक भी अपने आफिस से वहीं आ गया. हम ने एक सुंदर हार खरीदा और उसे ले कर विजय के घर की ओर चल पड़े. रास्ते में चलते समय लगा मानो समस्त आशाएं उसी में समाहित हो गईं.

‘‘आप कुछ मत कहना, पापा,’’ पल्लवी बोली, ‘‘बस, प्यार से यह हार मेरी ननद को थमा देना. चाचा नाराज होंगे तो भी हंस कर टाल देना…बिगड़े रिश्तों को संवारने में कई बार अनचाहा भी सहना पड़े तो सह लेना चाहिए.’’

मैं सोचने लगा, दीपक कितना भाग्यवान है कि उसे पल्लवी जैसी पत्नी मिली है जिसे जोड़ने का सलीका आता है.

विजय के घर की दहलीज पार की तो ऐसा लगा मानो मेरा हलक आवेग से अटक गया है. पूरा परिवार बरामदे में बैठा शादी का सामान सहेज रहा था. शादी वाली लड़की चाय टे्र में सजा कर रसोई से बाहर आ रही थी. उस ने मुझे देखा तो उस के पैर दहलीज से ही चिपक गए. मेरे हाथ अपनेआप ही फैल गए. हैरान थी मुन्नी हमें देख कर.

‘‘आ जा मुन्नी,’’ मेरे कहे इस शब्द के साथ मानो सारी दूरियां मिट गईं.

मुन्नी ने हाथ की टे्र पास की मेज पर रखी और भाग कर मेरी बांहों में आ समाई.

एक पल में ही सबकुछ बदल गया. निशा ने लपक कर मेरे पैर छुए और विजय मिठाई के डब्बे छोड़ पास सिमट आया. बरसों बाद भाई गले से मिला तो सारी जलन जाती रही. पल्लवी ने सुंदर हार मुन्नी के गले में पहना दिया.

किसी ने भी मेरे इस प्रयास का विरोध नहीं किया.

‘‘भाभी नहीं आईं,’’ विजय बोला, ‘‘लगता है मेरी भाभी को मनाने की  जरूरत पड़ेगी…कोई बात नहीं. चलो निशा, भाभी को बुला लाएं.’’

‘‘रुको, विजय,’’ मैं ने विजय को यह कह कर रोक दिया कि मीना नहीं जानती कि हम यहां आए हैं. बेहतर होगा तुम कुछ देर बाद घर आओ. शादी का निमंत्रण देना. हम मीना के सामने अनजान होेने का बहाना करेंगे. उस के बाद हम मान जाएंगे. मेरे इस प्रयास से हो सकता है मीना भी आ जाए.’’

‘‘चाचा, मैं तो बस आप से यह कहने आया हूं कि हम सब आप के साथ हैं. बस, एक बार बुलाने चले आइए, हम आ जाएंगे,’’ इतना कह कर दीपक ने मुन्नी का माथा चूम लिया था.

‘‘अगर भाभी न मानी तो? मैं जानती हूं वह बहुत जिद्दी हैं…’’ निशा ने संदेह जाहिर किया.

‘‘न मानी तो न सही,’’ मैं ने विद्रोही स्वर में कहा, ‘‘घर पर रहेगी, हम तीनों आ जाएंगे.’’

‘‘इस उम्र में क्या आप भाभी का मन दुखाएंगे,’’ विजय बोला, ‘‘30 साल से आप उन की हर जिद मानते चले आ रहे हैं…आज एक झटके से सब नकार देना उचित नहीं होगा. इस उम्र में तो पति को पत्नी की ज्यादा जरूरत होती है… वह कितना गलत सोचती हैं यह उन्हें पहले ही दिन समझाया होता, इस उम्र में वह क्या बदलेंगी…और मैं नहीं चाहता वह टूट जाएं.’’

विजय के शब्दों पर मेरा मन भीगभीग गया.

‘‘हम ताईजी से पहले मिल तो लें. यह हार भी मैं उन से ही लूंगी,’’ मुन्नी ने सुझाव दिया.

‘‘एक रास्ता है, पापा,’’ पल्लवी ने धीरे से कहा, ‘‘यह हार यहीं रहेगा. अगर मम्मीजी यहां आ गईं तो मैं चुपके से यह हार ला कर आप को थमा दूंगी और आप दोनों मिल कर दीदी को पहना देना. अगर मम्मीजी न आईं तो यह हार तो दीदी के पास है ही.’’

इस तरह सबकुछ तय हो गया. हम अलगअलग घर वापस चले आए. दीपक अपने आफिस चला गया.

मीना ने जैसे ही पल्लवी को देखा सहसा उबल पड़ी,  ‘‘सुबहसुबह ही कौन सी जरूरी खरीदारी करनी थी जो सारा काम छोड़ कर घर से निकल गई थी. पता है न दीपक ने कहा था कि उस की नीली कमीज धो देना.’’

‘‘दीपक उस का पति है. तुम से ज्यादा उसे अपने पति की चिंता है. क्या तुम्हें मेरी चिंता नहीं?’’

‘‘आप चुप रहिए,’’ मीना ने लगभग डांटते हुए कहा.

‘‘अपना दायरा समेटो, मीना, बस तुम ही तुम होना चाहती हो सब के जीवन में. मेरी मां का जीवन भी तुम ने समेट लिया था और अब बहू का भी तुम ही जिओगी…कितनी स्वार्थी हो तुम.’’

‘‘आजकल आप बहुत बोलने लगे हैं…प्रतिउत्तर में मैं कुछ बोलता उस से पहले ही पल्लवी ने इशारे से मुझे रोक दिया. संभवत: विजय के आने से पहले वह सब शांत रखना चाहती थी.

निशा और विजय ने अचानक आ कर मीना के पैर छुए तब सांस रुक गई मेरी. पल्लवी दरवाजे की ओट से देखने लगी.

‘‘भाभी, आप की मुन्नी की शादी है,’’ विजय विनम्र स्वर में बोला, ‘‘कृपया, आप सपरिवार आ कर उसे आशीर्वाद दें. पल्लवी हमारे घर की बहू है, उसे भी साथ ले कर आइए.’’

‘‘आज सुध आई भाभी की, सारे शहर में न्योता बांट दिया और हमारी याद अब आई…’’

मैं ने मीना की बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘तुम से डरता जो है विजय, इसीलिए हिम्मत नहीं पड़ी होगी… आओ विजय, कैसी हो निशा?’’

विजय के हाथ से मैँ ने मिठाई का डब्बा और कार्ड ले लिया. पल्लवी को पुकारा. वह भी भागी चली आई और दोनों को प्रणाम किया.

‘‘जीती रहो, बेटी,’’ निशा ने पल्लवी का माथा चूमा और अपने गले से माला उतार कर पल्लवी को पहना दी.

मीना ने मना किया तो निशा ने यह कहते हुए टोक दिया कि पहली बार देखा है इसे दीदी, क्या अपनी बहू को खाली हाथ देखूंगी.

मूक रह गई मीना. दीपक भी योजना के अनुसार कुछ फल और मिठाई ले कर घर चला आया, बहाना बना दिया कि किसी मित्र ने मंगाई है और वह उस के घर उत्सव पर जाने के लिए कपड़े बदलने आया है.

‘‘अब मित्र का उत्सव रहने दो बेटा,’’ विजय बोला, ‘‘चलो चाचा के घर और बहन की डोली सजाओ.’’

दीपक चाचा से लिपट फूटफूट कर रो पड़ा. एक बहन की कमी सदा खलती थी दीपक को. मुन्नी के प्रति सहज स्नेह बरसों से उस ने भी दबा रखा था. दीपक का माथा चूम लिया निशा ने.

क्याक्या दबा रखा था सब ने अपने अंदर. ढेर सारा स्नेह, ढेर सारा प्यार, मात्र मीना की जिद का फल था जिसे सब ने इतने साल भोगा था.

‘‘बहन की शादी के काम में हाथ बंटाएगा न दीपक?’’

निशा के प्रश्न पर फट पड़ी मीना, ‘‘आज जरूरत पड़ी तो मेरा बेटा और मेरा पति याद आ गए तुझे…कोई नहीं आएगा तेरे घर पर.’’

अवाक् रह गए सब. पल्लवी और दीपक आंखें फाड़फाड़ कर मेरा मुंह देखने लगे. विजय और निशा भी पत्थर से जड़ हो गए.

‘‘तुम्हारा पति और तुम्हारा बेटा क्या तुम्हारे ही सबकुछ हैं किसी और के कुछ नहीं लगते. और तुम क्या सोचती हो हम नहीं जाएंगे तो विजय का काम रुक जाएगा? भुलावे में मत रहो, मीना, जो हो गया उसे हम ने सह लिया. बस, हमारी सहनशीलता इतनी ही थी. मेरा भाई चल कर मेरे घर आया है इसलिए तुम्हें उस का सम्मान करना होगा. अगर नहीं तो अपने भाई के घर चली जाओ जिन की तुम धौंस सारी उम्र्र मुझ पर जमाती रही हो.’’

‘‘भैया, आप भाभी को ऐसा मत कहें.’’

विजय ने मुझे टोका तब न जाने कैसे मेरे भीतर का सारा लावा निकल पड़ा.

‘‘क्या मैं पेड़ पर उगा था और मीना ने मुझे तोड़ लिया था जो मेरामेरा करती रही सारी उम्र. कोई भी इनसान सिर्फ किसी एक का ही कैसे हो सकता है. क्या पल्लवी ने कभी कहा कि दीपक सिर्फ उस का है, तुम्हारा कुछ नहीं लगता? यह निशा कैसे विजय का हाथ पकड़ कर हमें बुलाने चली आई? क्या इस ने सोचा, विजय सिर्फ इस का पति है, मेरा भाई नहीं लगता.’’

मीना ने क्रोध में मुंह खोला मगर मैं ने टोक दिया, ‘‘बस, मीना, मेरे भाई और मेरी भाभी का अपमान मेरे घर पर मत करना, समझीं. मेरी भतीजी की शादी है और मेरा बेटा, मेरी बहू उस में अवश्य शामिल होंगे, सुना तुम ने. तुम राजीखुशी चलोगी तो हम सभी को खुशी होगी, अगर नहीं तो तुम्हारी इच्छा…तुम रहना अकेली, समझीं न.’’

चीखचीख कर रोने लगी मीना. सभी अवाक् थे. यह उस का सदा का नाटक था. मैं ने उसे सुनाने के लिए जोर से कहा, ‘‘विजय, तुम खुशीखुशी जाओ और शादी के काम करो. दीपक 3 दिन की छुट्टी ले लेगा. हम तुम्हारे साथ हैं. यहां की चिंता मत करना.’’

‘‘लेकिन भाभी?’’

‘‘भाभी नहीं होगी तो क्या हमें भी नहीं आने दोगे?’’

चुप था विजय. निशा के साथ चुपचाप लौट गया. शाम तक पल्लवी भी वहां चली गई. मैं भी 3-4 चक्कर लगा आया. शादी का दिन भी आ गया और दूल्हादुलहन आशीर्वाद पाने के लिए अपनीअपनी कुरसी पर भी सज गए.

मीना अपने कोपभवन से बाहर नहीं आई. पल्लवी, दीपक और मैं विदाई तक उस का रास्ता देखते रहे. आधीअधूरी ही सही मुझे बेटी के ब्याह की खुशी तो मिली. विजय बेटी की विदाई के बाद बेहाल सा हो गया. इकलौती संतान की विदाई के बाद उभरा खालीपन आंखों से टपकने लगा. तब दीपक ने यह कह कर उबार लिया, ‘‘चाचा, आंसू पोंछ लें. मुन्नी को तो जाना ही था अपने घर… हम हैं न आप के पास, यह पल्लवी है न.’’

मैं विजय की चौखट पर बैठा सोचता रहा कि मुझ से तो दीपक ही अच्छा है जिसे अपने को अपना बनाना आता है. कितने अधिकार से उस ने चाचा से कह दिया था, ‘हम हैं न आप के पास.’ और बरसों से जमी बर्फ पिघल गई थी. बस, एक ही शिला थी जिस तक अभी स्नेह की ऊष्मा नहीं पहुंच पाई थी. आधीअधूरी ही सही, एक आस है मन में, शायद एक दिन वह भी पिघल जाए.

Love Story : बस वाली विदेसन

Love Story : मेसी मुझे जयपुर से पुष्कर जाने वाली टूरिस्ट बस में मिला था. मैं अकेला ही सीट पर बैठा था. उस वक्त वे तीनों बस में प्रविष्ट हुए. एक सुंदर विदेशी लड़की और 2 नवयुवक अंगरेज. लड़की और उस का एक साथी तो दूसरी सीट पर जा कर बैठे, वह आ कर मेरे बाजू वाली सीट पर बैठ गया. मैं ने उस की तरफ मुसकरा कर देखा तो उस ने भी जबरदस्ती मुसकराने की कोशिश करते हुए देखा.

‘‘यू आर फ्रौम?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘स्पेन,’’ उस ने उत्तर दिया, ‘‘मेरा नाम क्रिस्टियानो मेसी है. वह लड़की मेरे साथ स्पेन से आई है. उस का नाम ग्रेटा अजीबला है और उस के साथ जो लड़का बैठा है वह अमेरिकी है, रोजर फीडर.’’

लड़की उस के साथ स्पेन से आई थी और अब अमेरिकी के साथ बैठी थी. इस बात ने मुझे चौंका दिया. मैं ने गौर से उस का चेहरा देखा. उस का चेहरा सपाट था और वह सामने देख रहा था. मैं ने लड़की की तरफ नजर डाली तो रोजर ने उसे बांहों में ले रखा था और वह उस के कंधे पर सिर रखे अपनी जीभ उस के कान पर फेर रही थी.

 विदेशी लोगों के लिए इस तरह की हरकतें सामान्य होती हैं. अब हम भारतीयों को भी इस तरह की हरकतों में कोई आकर्षण अनुभव नहीं होता है बल्कि हमारे नवयुवक तो आजकल उन से भी चार कदम आगे हैं.

रोजर और गे्रटा आपस में हंसीमजाक कर रहे थे. मजाक करतेकरते वे एकदूसरे को चूम लेते थे. उन की ये हरकतें बस के दूसरे मुसाफिरों के ध्यान का केंद्र बन रही थीं. लेकिन मेसी को उन की इन हरकतों की कोई परवा नहीं थी.

वह निरंतर उन की तरफ से बेखबर सामने शून्य में घूरे जा रहा था. या तो वह जानबूझ कर उन की तरफ नहीं देख रहा था या फिर वह उन्हें, उन की हरकतों को देखना नहीं चाहता था. मेसी का चेहरा सपाट था मगर चेहरे पर एक अजीब तरह की उदासी थी.

‘‘तुम ने कहा, गे्रटा तुम्हारे साथ स्पेन से आई है?’’

‘‘हां, हम दोनों एकसाथ एक औफिस में काम करते हैं. हम ने छुट्टियों में इंडिया की सैर करने की योजना बनाई थी और हम 4 साल से हर महीने इस के लिए पैसा बचाया करते थे. जब हमें महसूस हुआ, काफी पैसे जमा हो गए हैं तो हम ने दफ्तर से 1 महीने की छुट्टी ली और इंडिया आ गए.’’

उस की इस बात ने मुझे और उलझन में डाल दिया था. दोनों स्पेन से साथ आए थे और इंडिया की सैर के लिए बरसों से एकसाथ पैसा जमा कर रहे थे. इस से स्पष्ट प्रकट होता है कि उस के और ग्रेटा के क्या संबंध हैं. ग्रेटा उस वक्त रोजर के साथ थी जबकि उसे मेसी के साथ होना चाहिए था. मगर वह जिस तरह की हरकतें रोजर के साथ कर रही थी इस से तो ऐसा प्रकट हो रहा था जैसे वे बरसों से एकदूसरे को जानते हैं, एकदूसरे को बेइंतिहा प्यार करते हैं या फिर एकदूसरे से गहरा प्यार करने वाले पतिपत्नी हैं.

‘‘क्या ग्रेटा और रोजर एकदूसरे को पहले से जानते हैं?’’ मैं ने उस से पूछा.

‘‘नहीं,’’ मेसी ने उत्तर दिया, ‘‘ग्रेटा को रोजर 8 दिन पूर्व मिला. वह उसी होटल में ठहरा था जिस में हम ठहरे थे. दोनों की पहचान हो गई और हम लोग साथसाथ घूमने लगे…और एकदूसरे के इतना समीप आ गए…’’ उस ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी.

मैं एकटक उसे देखता रहा.

‘‘ये पुष्कर क्या कोई धार्मिक पवित्र स्थान है?’’ मेसी ने विषय बदल कर मुझ से पूछा.

‘‘पता नहीं, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं. मैं मुंबई से हूं. अमृतसर से आते हुए 2 दिन के लिए यहां रुक गया था. एक दिन जयपुर की सैर की. आज पुष्कर जा रहा हूं. साथ ही ये बस अजमेर भी जाएगी,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘हम लोग दिल्ली, आगरा में 8 दिन रहे. जयपुर में 8 दिन रहेंगे. वहां से मुंबई जाएंगे. वहां 3-4 दिन रहने के बाद गोआ जाएंगे और फिर गोआ से स्पेन वापस,’’ मेसी ने अपनी सारी भविष्य की यात्रा की योजना सुना दी और आगे कहा, ‘‘सुना है पुष्कर एक पवित्र स्थान है, जहां मंदिर में विदेशी पर्यटक हिंदू रीतिरिवाज से शादी करते हैं. हम लोग इसीलिए पुष्कर जा रहे हैं. वहां ग्रेटा और रोजर हिंदू रीतिरिवाज से शादी करेंगे?’’ मेसी ने बताया.

‘‘लेकिन शादी तो गे्रटा को तुम से करनी चाहिए थी. तुम ने बताया कि तुम ने यहां आने के लिए एकसाथ 4 सालों तक पैसे जमा किए हैं और तुम दोनों एकसाथ काम करते हो.’’

‘‘ये सच है कि इस साल हम शादी करने वाले थे,’’ मेसी ने ठंडी सांस भर कर बताया, ‘‘इसलिए साथसाथ भारत की सैर की योजना बनाई थी. हम बरसों से पतिपत्नी की तरह रह रहे हैं मगर…’’

‘‘मगर क्या?’’ मैं ने प्रश्नभरी नजरों से मेसी की ओर देखा.

‘‘अब ग्रेटा को रोजर पसंद आ गया है,’’ उस ने एक ठंडी सांस ली, ‘‘तो कोई बात नहीं, ग्रेटा की इच्छा, मेरे लिए दुनिया में उस की खुशी से बढ़ कर कोई चीज नहीं है.’’

मेसी की इस बात पर मैं उस की आंखों में झांकने लगा. उस की आंखों से एक पीड़ा झलक रही थी. मैं ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा. वह 28-30 साल का एक मजबूत कदकाठी वाला युवक था. लेकिन जिस तरह बातें कर रहा था और उस के चेहरे के जो भाव थे, आंखों में जो पीड़ा थी मुझे तो वह कोई असफल भारतीय प्रेमी महसूस हो रहा था.

उस की प्रेमिका एक पराए पुरुष के साथ मस्ती कर रही है लेकिन वह फिर भी चुपचाप तमाशा देख रहा है, पे्रमिका की खुशी के लिए…इस बारे में सोचते हुए मेरे होंठों पर एक मुसकराहट रेंग गई. यह प्रेम की भावना है. जो भावना भारतीय प्रेमियों के दिल में होती है वही भावना मौडर्न कहलाने वाले यूरोपवासी के दिल में भी होती है. दिल के रिश्ते हर जगह एक से होते हैं. सच्चा और गहरा प्यार हर इंसान की धरोहर है, उसे न तो सीमा में कैद किया जा सकता है और न देशों में बांटा जा सकता है.

जब मेसी ये सारी बातें बता रहा था तो वह एक असफल प्रेमी तो लग ही रहा था, अपनी प्रेमिका से कितना प्यार करता है, उस की बातों से स्पष्ट झलक रहा था साथ ही उस की भावनाओं से एक सच्चे प्रेमी, आशिक का त्याग भी टपक रहा था. बस चल पड़ी. इस के बाद हमारे बीच कोई बात नहीं हो सकी. मगर वह कभीकभी अपनी स्पेनी भाषा में कुछ बड़बड़ाता था जो मेरी समझ में नहीं आता था लेकिन जब मैं ने एक बार उस की आंखों में आंसू देखे तो मैं चौंक पड़ा और मुझे इन आंसुओं का और उस की बड़बड़ाहट का मतलब भी अच्छी तरह समझ में आ गया. आंसू प्रेमिका की बेवफाई के गम में उस की आंखों में आ रहे थे और जो वह बड़बड़ा रहा था, मुझे विश्वास था उस की अपनी बेवफा प्रेमिका से शिकायत के शब्द होंगे. ग्रेटा और रोजर की मस्तियां कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं.

मैं तो पूरे ध्यान से उन की मस्तियां देख रहा था. वह भी कभीकभी मुड़ कर दोनों को देख लेता था लेकिन जैसे ही वह ग्रेटा और रोजर को किसी आपत्तिजनक स्थिति में पाता था, झटके से अपनी गरदन दूसरी ओर कर लेता था. जबकि मैं उन की आपत्तिजनक स्थिति से न सिर्फ पूरी तरह आनंदित हो रहा था बल्कि पहलू बदलबदल कर उन की हरकतों को भी देख रहा था.

पुष्कर आने से पूर्व हम ने एकदूसरे से थोड़ी बातचीत की. एकदूसरे के मोबाइल नंबर और ईमेल लिए, इस के बाद वे तीनों पुष्कर में मुझ से जुदा हो गए क्योंकि पुष्कर में बस 2-3 घंटे रुकने वाली थी. पुष्कर में एक बड़ा सा स्टेडियम है जहां पर हर साल प्रसिद्ध पुष्कर मेला लगता है. इस में ऊंटों की दौड़ भी होती है.

वहां मैं ने कई विदेशी जोड़ों को देखा, जिन के माथे पर टीका लगा हुआ था और गले में फूलों का हार था. पुष्कर घूमने के लिए आने वाले विदेशी पर्यटक बड़े शौक से हिंदू परंपरा के अनुसार विवाह करते हैं. उन का वहां हिंदू परंपरा अनुसार विवाह कराया जाता है फिर चाहे वह विवाहित हों या कुंवारे हों.

वापसी में भी वे हमारे साथ थे. मेसी मेरे बाजू में आ बैठा और ग्रेटा और रोजर अपनी सीट पर. तीनों के माथे पर बड़ा सा टीका लगा हुआ था और गले में गेंदे के फूलों का हार था जो इस बात की गवाही दे रहा था कि रोजर और ग्रेटा ने वहां पर हिंदू परंपरा के अनुसार शादी कर ली है. वापसी में बस अजमेर रुकी. मेसी भी मेरे साथ आया. जब वह उस स्थान के बारे में पूछने लगा तो मैं ने संक्षिप्त में ख्वाजा गरीब नवाज के बारे में बताया.

लौट कर बोला, ‘‘यहां बहुत लोग कह रहे थे कि कुछ इच्छा है तो मांग लो, शायद पूरी हो जाए.’’

‘‘तुम ने कुछ मांगा?’’ मैं ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘हां,’’ उस का चेहरा गंभीर था.

‘‘क्या?’’

‘‘हम ने अपना प्यार मांगा?’’

‘‘प्यार? कौन?’’

‘‘ग्रेटा.’’

एक शब्द में उस ने सारी कहानी कह दी थी. और उस की इस बात से यह साफ प्रकट हो रहा था कि वह गे्रटा को कितना प्यार करता है. वही गे्रटा जो कुछ दिन पूर्व तक तो उस से प्यार करती थी, इस से शादी भी करना चाहती थी…लेकिन यहां उसे रोजर मिल गया. रोजर उसे पसंद आ गया तो अब वह रोजर के साथ है. यह भी भूल गई है कि मेसी उसे कितना प्यार करता है. वे एकदूसरे को सालों से जानते हैं. सालों से एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी भी करने वाले थे. लेकिन पता नहीं उसे रोजर में ऐसा क्या दिखाई दिया या रोजर ने उस पर क्या जादू किया, अब वह रोजर के साथ है. रोजर से प्यार करती है. मेसी के प्यार को भूल गई है. यह भूल गई है कि वह मेसी के साथ भारत की सैर करने के लिए आई है. वह मेसी, जिसे वह चाहती है और जो उसे दीवानगी की हद तक चाहता है. सुना है कि विदेशों में प्यार नाम की कोई चीज ही नहीं होती है. प्यार के नाम पर सिर्फ जरूरत पूरी की जाती है. जरूरत पूरी हो जाने के बाद सारे रिश्ते खत्म हो जाते हैं.

शायद गे्रटा भी मेसी से अभी तक अपनी जरूरत पूरी कर रही थी. जब उस का दिल मेसी से भर गया तो वह अपनी जरूरत रोजर से पूरी कर रही है. लेकिन मेसी तो इस के प्यार में दीवाना है. बस वाले हमारा ही इंतजार कर रहे थे. हम बस में आए और बस चल पड़ी. 

रोजर और ग्रेटा एकदूसरे की बांहों में समाते हुए एकदूसरे का चुंबन ले रहे थे. वह पश्चिम का एक सुशिक्षित युवक दिल के हाथों कितना विवश हो गया है और अपने दिल के हाथों मजबूर हो कर स्वयं को धोखा देने वाली की बातें करने लगा है. गंडेतावीज भी पहनने लगा है जो अजमेर की दरगाह पर थोक के भाव में मिलते हैं.

जयपुर में वे अपने होटल के पास उतर गए, मैं अपने होटल पर. उस ने मेरा फोन नंबर व ईमेल आईडी ले लिया और कहा कि वह मुझे फोन करता रहेगा. मैं रात में ही मुंबई के लिए रवाना हो गया और उस को लगभग भूल ही गया. 8 दिन बाद अचानक उस का फोन आया.

‘‘हम लोग मुंबई में हैं और कल गोआ जा रहे हैं.’’

‘‘अरे तो पहले मुझ से क्यों नहीं कहा. मैं तुम से मिलता. आज या कल तुम से मिलूं?’’

‘‘आज हम एलीफैंटा गुफा देखने जाएंगे और कल गोआ के लिए रवाना होना है. इस से कल भी मुलाकात संभव नहीं.’’

‘‘गे्रटा कैसी है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘रोजर के साथ बहुत खुश है,’’ उस का स्वर उदास था.

इस के बाद उस का गोआ से एक बार फोन आया, ‘‘हम गोआ में हैं. बहुत अच्छी जगह है. इतना अच्छा समुद्री तट मैं ने आज तक नहीं देखा. मुझे ऐसा महसूस हो रहा है मानो मैं अपने देश या यूरोप के किसी देश में हूं. 4 दिन के बाद मैं स्पेन चला जाऊंगा. गे्रटा भी मेरे साथ स्पेन जाएगी. लेकिन वह दूसरे दिन न्यूयार्क के लिए रवाना हो जाएगी. वहां रोजर उस का इंतजार कर रहा होगा. वह हमेशा के लिए स्पेन छोड़ देगी. अब वे दोनों वहां के रीतिरिवाज के अनुसार शादी करने वाले हैं.’’ उस की बात सुन कर मैं ने ठंडी सांस ली, ‘‘कोई बात नहीं मेसी, गे्रटा को भूल जाओ, कोई और गे्रटा तुम्हें मिल जाएगी. तुम गे्रटा को प्यार करते हो न. तुम्हारे लिए तो गे्रटा की खुशी से बढ़ कर कोई चीज नहीं है. गे्रटा की खुशी ही तुम्हारी खुशी है,’’ मैं ने समझाया.

‘‘हां,अनवर यह बात तो है,’’ उस ने मरे स्वर में उत्तर दिया. इस के बाद उस से कोई संपर्क नहीं हो सका. एक महीने के बाद जब एक दिन मैं ईमेल चैक कर रहा था तो अचानक उस का ईमेल मिला : ‘गे्रटा अमेरिका नहीं जा सकी. रोजर ने उस से शादी करने से इनकार कर दिया. वह कई दिनों तक बहुत डिस्टर्ब  रही. अब वह नौर्मल हो रही है.

‘हम लोग अगले माह शादी करने वाले हैं. अगर आ सकते हो तो हमारी शादी में शामिल होने जरूर आओ. मैं सारे प्रबंध करा दूंगा.’ उस का ईमेल पढ़ कर मेरे होंठों पर एक मुसकराहट रेंग गई. और मैं उत्तर में उसे मुबारकबाद और शादी में शामिल न हो सकने का ईमेल टाइप करने लगा.

Hindi Stories : दादी का यार

 Hindi Stories :  दादी अकसर दादाजी से कहा करती थीं कि जिंदगी में एक यार तो होना ही चाहिए. सुनते ही दादाजी बिदक जाया करते थे. “किसलिए?” वे चिढ़ कर पूछते. “अपने सुखदुख साझा करने के लिए,” दादी का जवाब होता, जिसे सुन कर दादाजी और भी अधिक भड़क जाते.“क्यों? घरपरिवार, मातापिता, भाईबहन, पतिसहेलियां काफी नहीं हैं जो यार की कमी खल रही है.
भले घरों की औरतें इस तरह की बातें करती कभी देखी नहीं. हुंह, यार होना चाहिए,” दादाजी देर तक बड़बड़ाते रहते. यह अलग बात थी कि दादी को उस बड़बड़ाहट से कोई खास फर्क नहीं पड़ता था. वे मंदमंद मुसकराती रहती थीं.मैं अकसर सोचा करती थी कि हमेशा सखीसहेलियों और देवरानीजेठानी से घिरी रहने वाली दादी का ऐसा कौनसा सुखदुख होता होगा जिसे साझा करने के लिए उन्हें किसी यार की जरूरत महसूस होती है.

“दादी, आप की तो इतनी सारी सहेलियां हैं, यार क्या इन से अलग होता है?” एक दिन मैं ने दादी से पूछा तो दादी अपनी आदत के अनुसार हंस दीं. फिर मुझे एक कहानी सुनाने लगीं.

“मान ले, तुझे कुछ पैसों की जरूरत है. तू ने अपने बहुत से दोस्तों से मदद मांगी. कुछ ने सुनते ही बहाना बना कर तुझे टाल दिया. ऐसे लोगों को जानपहचान वाला कहते हैं. कुछ ने बहुत सोचा और हिसाब लगा कर देखा कि कहीं उधार की रकम डूब तो नहीं जाएगी.
आश्वस्त होने के बाद तुझे समयसीमा में बांध कर मांगी गई रकम का कुछ हिस्सा दे कर तेरी मदद के लिए जो तैयार हो जाते हैं उन्हें मित्र कहते हैं. और जो दोस्त बिना एक भी सवाल किए चुपचाप तेरे हाथ में रकम धर दे, उसे ही यार कहते हैं. कुछ समझीं?” दादी ने कहा.

“जी समझी यही कि जो दोस्त आप से सवालजवाब न करे, आप को व्यर्थ सलाहमशवरा न दे और हर समय आप के साथ खड़ा रहे वही आप का यार है. है न?” मैं ने अपनी समझ से कहा.

“बिलकुल सही. लेकिन तेरे दादाजी को ये तीनों एक ही लगते हैं,” कहते हुए दादी की आंखों में उदासी उतर आई. यार न होने की टीस उन्हें सालने लगी.

“मैं बचपन से ही अपने दादादादी के साथ रहती हूं, क्योंकि मेरे मम्मीपापा दोनों नौकरी करते हैं. चूंकि दादाजी भी सरकारी सेवा में थे, इसलिए दादी न तो उन्हें अकेला छोड़ सकती थीं और न ही वे चाहती थीं कि उन की पोती आया और नौकरों के हाथों में पले. इसलिए, सब ने मिल कर तय किया कि मैं अपनी दादी के पास ही रहूंगी. बस, इसीलिए मेरा और दादी का दोस्तियाप्पा बना हुआ है.

जब से हमारे सामने वाले घर में सीमा आंटी रहने के लिए आई हैं तब से हमारे घर में भी रौनक बढ़ गई है. सीमा आंटी हैं ही इतनी मस्तमौला. जिधर से निकलती हैं, हंसी के अनार फोड़ती जाती हैं. चूंकि हमारे घर आमनेसामने हैं, इसलिए इन अनारों की रोशनी सब से ज्यादा हमारे घर पर ही होती है.

सीमा आंटी शायद कहीं नौकरी करती हैं. आंटी को गपें मारने का बहुत शौक है. औफिस से आने के बाद वे शाम ढलने तक दादीदादाजी के साथ गपें मारती रहती हैं. दादी कहीं इधरउधर गईं भी हों तो भी उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता. चायकौफी के दौर में डूबी वे दादाजी के साथ ही देर तक गपियाती रहती हैं.

मैं ने कई बार नोटिस किया है कि जब दादाजी अकेले होते हैं तब सीमा आंटी के ठहाकों में गूंज अधिक होती है. उस समय दादाजी के चहरे पर भी ललाई बढ़ जाती है. पिछले कुछ दिनों से तो तीनों का बाहर आनाजाना भी साथ ही होने लगा है.

जब से सीमा आंटी हमारी जिंदगी का हिस्सा बनी हैं तब से दादाजी दादी के प्रति जरा नरम हो गए हैं. आजकल वे दादी के इस तर्क पर बहस नहीं करते कि जिंदगी में यार होना चाहिए कि नहीं. लेकिन हां, खुल कर इस की वकालत तो वे अब भी नहीं करते.

“आप को नहीं लगता कि सीमा आंटी दादाजी में ज्यादा ही इंटरैस्ट लेने लगी हैं,” एक दिन मैं ने दादी को छेड़ा. दादी हंस दीं और बोलीं, “शायद इसी से उन्हें जिंदगी में यार की अहमियत समझ में आ जाए.”

दादी की सहजता मुझे आश्चर्य में डाल रही थी. “आप को जलन नहीं होती?” मैं ने पूछा.

“किस बात की जलन?” अब आश्चर्यचकित होने की बारी दादी की थी.

“अरे, आप उन की पत्नी हो. आप के पति के साथ कोई और समय बिता रहा है. आप को इसी बात की जलन होनी चाहिए और क्या?” मैं ने अपनी बात साफ की.

“तो क्या हुआ, यार कहां पति या पत्नी के अधिकारों का अतिक्रमण करता है?” दादी ने उसी सहजता से कहा. मैं उन की सरलता पर हंस दी.

आज दादी हमारे बीच नहीं हैं. अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे हम सब को हतप्रभ सा छोड़ कर अनंत यात्रा पर चल दीं. 15 दिनों बाद मम्मीपापा सामाजिक औपचारिकताएं निभा कर वापस चले गए. वे तो मुझे और दादाजी को भी अपने साथ ले जाने की जिद कर रहे थे लेकिन दादाजी किसी सूरत में इस घर को छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुए. मैं उन की देखभाल करने के लिए उन के पास रुक गई. वैसे भी, मेरी स्नातक की पढ़ाई अभी चल ही रही थी.

एक दोपहर दादी की अलमारी सहेजते समय मुझे उन के पुराने पर्स के अंदर एक छोटी सी चाबी मिली. सभी ताले टटोल लिए, लेकिन उस चाबी का कोई ताला मुझे नहीं मिला. बात आईगई हो गई. फिर एक दिन जब मैं ने दादी का पुराना बक्सा खोल कर देखा तो उस में एक छोटी सी कलात्मक मंजूषा मुझे दिखाई दी. उस पर लगा छोटा सा ताला मुझे उस छोटी चाबी की याद दिला गया. लगा कर देखा तो ताला खुल गया.

मंजूषा के भीतर मुझे एक पुरानी पीले पड़ते पन्नों वाली छोटी सी डायरी मिली. ताले का रहस्य जानने के लिए मैं दादाजी को बिना बताए उसे छिपा कर अपने साथ ले आई. रात को दादाजी के सोने के बाद मैं ने वह डायरी निकाल कर पढ़ना शुरू किया.

पन्नादरपन्ना दादी खुलती जा रही थीं. डायरी में जगहजगह किसी धरम का जिक्र था. डायरी में लिखी बातों के अनुसार मैं ने सहज अनुमान लगाया कि धरम दादी की प्रेम कहानी का नायक नहीं था, वह उन का यार था. जब भी वे परेशान होतीं तो सिर्फ धरम से बात करती थीं.

मुझे याद आया कि दादी अकसर छत पर जा कर फोन पर किसी से बात किया करती थीं. दादाजी के आते ही तुरंत नीचे दौड़ आती थीं. जब वे वापस नीचे आती थीं तो एकदम हवा सी हलकी होती थी. मैं अंदाजा लगा रही हूं कि शायद वे धरम से ही बात करती होंगी.

दादी की डायरी क्या थी, दुखों का दस्तावेज़ थी. हरदम मुसकराती दादी अपनी हंसी के पीछे कितने दर्द छिपाए थीं, यह मुझे आज पता चल रहा है. पता नहीं क्यों दादाजी एक खलनायक की छवि में ढलते जा रहे हैं.

दादी और दादाजी का विवाह उन के समय के चलन के अनुसार घर के बड़ों का तय किया हुआ रिश्ता था. धरम उन दोनों के उन के बचपन का यार था. हालांकि, दुनियाजहान की बातेंशिकायतें दादी दादाजी से ही करती थीं लेकिन दादाजी का जिक्र या उन के प्रति उपजी नाराजगी को जताने के लिए भी तो कोई अंतरंग साथी होना चाहिए न. भावनाओं के मटके जहां छलकते थे, वह पनघट था धरम. यह बात दादाजी भी जानते थे लेकिन वे कभी भी स्त्रीपुरुष के याराने के समर्थक नहीं थे.

धीरेधीरे प्यार को अधिकार ढकने लगा और धरम दादाजी की आंखों में रेत सा अड़ने लगा. दादाजी को धरम के साथ दादी की निकटता डराने लगी. खोने का डर उन्हें अपराध करने के लिए उकसाने लगा. उन्होंने अपने प्यार का वास्ता दे कर दादी को उन के यार से दूर करने की साजिश की. दादाजी की खुशी और परिवार की सुखशांति बनाए रखने के लिए दादी ने धरम से दूरियां बना ली. वे अब दादाजी के सामने धरम का जिक्र नहीं करती थीं. दादाजी को लगा कि वे अपने षड्यंत्र में कामयाब हो गए, लेकिन वे दादी को धरम से दूर कहां कर पाए.

डायरी इस बात की गवाह है कि दादी अपने आखिरी समय तक धरम से जुड़ी हुई थीं. और मैं इस बात की गवाही पूरे होशोहवास में दे सकती हूं कि दादी की जिंदगी धरम को कलंकरहित यार का दर्जा दिलवाने की आस में ही पूरी हो गई.

आखिरी पन्ना पढ़ कर डायरी बंद करने लगी तो पाया कि मेरा चेहरा आंसुओं से तर था. दादी ने अपनी अंतिम पंक्तियों में लिखा था- “हमारे समाज में सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, बल्कि कुछ शब्द भी लैंगिक भेदभाव का दंश झेलते हैं. स्त्री और पुरुष के संदर्भ में उन की परिभाषा अगल होती है. उन्हीं अभागे शब्दों में से एक शब्द है ‘यार’. उस का सामान्य अर्थ बहुत जिगरी होने से लगाया जाता है लेकिन जब यही शब्द कोई महिला किसी पुरुष के लिए इस्तेमाल करे तो उस के चरित्र की चादर पर काले धब्बे टांक दिए जाते हैं.”

पता नहीं दादी द्वारा लिखा गया यही पन्ना आखिरी था या इस के बाद दादी का कभी डायरी लिखने का मन ही नहीं हुआ, क्योंकि दादी ने किसी भी पन्ने पर कोई तारीख अंकित नहीं की थी. लेकिन इतना तो तय था कि दादी के याराने को न्याय नहीं मिला. काश, कोई जिंदगी में यार की अहमियत समझ सकता. काश, समाज याराने को स्त्रीपुरुष की सीमाओं से बाहर स्वीकार कर पाता.

दादी के न रहने पर दादाजी एकदम चुप सा हो गए थे. कितने ही दिन तो घर से बाहर ही नहीं निकले. सीमा आंटी के आने पर जरूर उन का अबोला टूटता था. सीमा आंटी भी उन्हें अकेलेपन के खोल से बाहर लाने की पूरी कोशिश कर रही थीं. कोशिश थी, आखिर तो कामयाब होनी ही थी. दादाजी फिर से हंसनेबोलने लगे. रोज शाम सीमा आंटी का इंतज़ार करने लगे. जब भी कभी परेशान या दादी की याद में उदास होते, सब से पहला फोन सीमा आंटी को ही जाता.

आंटी भी अपने सारे जरूरी काम छोड़ कर उन का फोन अटेंड करतीं. मैं कई बार देखती कि जब दादाजी बोल रहे होते तब आंटी चुपचाप उन्हें सुनतीं.  न वे अपनी तरफ से कोई सलाह देतीं और न ही कभी किसी काम में दादाजी की गलती निकाल कर उन्हें कठघरे में खड़ा करतीं. क्या वे दादाजी की यार थीं?

सीमा आंटी दादाजी के लिए उस दीवार जैसी हो गई थीं जिस के सहारे इंसान अपनी पीठ टिका कर बैठ जाता है और मौन आंसू बहा कर अपना दिल भी हलका कर लेता है, यह जानते हुए भी कि यह दीवार उस की किसी भी मुश्किल का हल नहीं है. लेकिन हाँ, दुखी होने पर रोने के लिए हर समय हाजिर जरूर है.

दादी को गए साल होने को आया. 2 दिनों बाद उन की बरसी है. दादाजी पूरी श्रद्धा के साथ आयोजन में जुटे हैं. सीमा आंटी उन की हरसंभव सहायता कर रही हैं. मेरे मम्मीपापा भी आ चुके हैं. घर में एक उदासी सी तारी है. लग रहा है जैसे दादाजी के भीतर कोई मंथन चल रहा है.

“मिन्नी, आज शाम मेरा एक दोस्त धरम आने वाला है,” दादाजी ने कहा. सुनते ही मैं चौंक गई.  ‘धरम यानी दादी का यार… तो क्या दादाजी सब जान गए? क्या दादी की डायरी उन के हाथ लग गई?’ मैं ने लपक कर अपनी अलमारी संभाली. दादी की डायरी तो जस की तस रखी थी. धरम अंकल के आने का कारण मेरी समझ में नहीं आ रहा था. मैं ने टोह लेने के लिए दादाजी को टटोला.

“धरम अंकल कौन हैं, पहले तो कभी नहीं आए हमारे घर?” मैं ने पूछा.

“धरम तेरी दादी का जिगरी था. वह बेचारी इस रिश्ते को मान्यता दिलाने के लिए जिंदगीभर संघर्ष करती रही. लेकिन मैं ने कभी स्वीकार नहीं किया. आज जब अपने मन के पेंच खोलने के लिए किसी चाबी की जरूरत महसूस करता हूं तो उस का दर्द समझ में आता है,” दादाजी की आंखों में आंसू थे.

दादी की बरसी पर धरम अंकल आए. पता नहीं दादाजी ने उन से क्या कहा कि दोनों देर तक एकदूसरे से लिपटे रोते रहे. सीमा आंटी भी उन के पास ही खड़ी थीं. थोड़ा सहज हुए दादाजी ने सीमा आंटी की तरफ इशारा करते हुए धरम अंकल से उन का परिचय करवाया- “ये सीमा है. हमारी पड़ोसिन… मेरी यार.” और तीनों मुसकरा उठे.

मैं भी खुश थी. आज दादी के याराने को मान्यता मिल गई थी.

Lapata Ladies : औस्‍कर से लापता होने के पीछे ‘घूंघट के पट खोल’ कनेक्‍शन तो नहीं

 Lapata Ladies : आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ औस्कर से बाहर हो गई है. फिल्म औस्कर में भेजे जाने को ले कर पहले ही विवादों में थी. इस ने इंडस्ट्री में फेवरिज्म की बहस छेड़ी थी.

औस्कर की दौड़ से आमिर खान निर्मित और आमिर खान की पूर्व पत्नी किरण राव द्वारा निर्देशित फिल्म ‘लापता लैडीज’ ( Lapata Ladies) के बाहर होते ही एक बार फिर नई बहस छिड़ गई है. एक वर्ग सवाल उठा रहा है कि आखिर ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ हर साल क्यों गलत फिल्म ‘औस्कर’ यानी कि ‘अकादमी औफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज’ में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर श्रेणी के लिए भारत की तरफ से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजने की गलती कर भारतीय सिनेमा को वैश्विक स्तर पर पहचान नहीं बनाने देना चाहता?

यह सवाल काफी गंभीर और चुनौतीपूर्ण होने के साथ ही इस बार की चयन समिति के अध्यक्ष व असमिया फिल्मकार जाहनु बारूआ को भी कटघरे में खड़ा करता है. आरोप तो यह भी लग रहा है कि इस बार ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ के अध्यक्ष व औस्कर के लिए भारतीय फिल्म की चयन समिति के अध्यक्ष जाहनु बरूआ सरकार के हाथ की कठपुतली बने होने के साथसाथ मिस्टर परफैक्शनिस्ट के रूप में मशहूर अति दंभी कलाकार व निर्माता आमिर खान के दबाव में थे.

अन्यथा वह ऐसी फिल्म यानी कि लापता लैडीज ( Lapata Ladies)  का चयन ही न करते जिस पर चोरी का आरोप लगने के साथ ही जिसे उन अंग्रेजीदां लोगों द्वारा बनाया गया हो, जिन्होंने कभी भारत के गांव देखे ही नहीं हैं.

औस्कर के लिए फिल्म के चयन की प्रक्रिया

औस्कर के लिए भारतीय फिल्म उद्योग की तरफ से फिल्म को भेजने का काम ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ की एक चयन समिति करती है. हर साल नई समिति का गठन एक अध्यक्ष के साथ किया जाता है. इस बार इस समिति के अध्यक्ष असमिया फिल्मकार जाहनु बरूआ थे. जिन फिल्मकारों को अपनी फिल्म औस्कर में भेजना होता है, उन्हें फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया की इसी समिति के सामने आवेदन करना होता है.
उन में से एक फिल्म का चयन यह समिति करती है. हर साल इस समिति के कार्यकलापों पर उंगली उठती ही रहती हैं. इस बार समित के पास भारत में अवार्ड लेने से दूरी बना कर रखने वाले अति महत्वाकांक्षी व घमंडी आमिर खान लगभग हर साल अपनी फिल्म भेजने की प्रयास करते रहे हैं.

2001 में उन की फिल्म ‘लगान’ गई थी, जो कि बुरी तरह से मात खा गई थी. तो इस बार आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ के साथ ही कांस में पुरस्कृत पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’, दक्षिण की फिल्म ‘महाराजा’ सहित 29 फिल्में थी.

इन में से सभी को उम्मीद थी कि इस बार भारत की तरफ से पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’ को ही भेजा जाना चाहिए. लेकिन पिछले 40 साल से फिल्म पत्रकारिता करते हुए मेरे अपने जो अनुभव रहे हैं, उस आधार पर मुझे पता था कि पायल कपाड़िया की फिल्म औस्कर के लिए भारतीय प्रविष्टि नहीं बन सकती, हुआ भी वही. आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ को ही भेजा गया और जिस दिन फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया की तरफ से यह ऐलान किया गया था, उसी दिन हम ने मान लिया था कि इस बार भी हम औस्कर से खाली हाथ ही लौटेंगे और वही हुआ.

आल वी इमेजिन एज लाइट को न चुनने के पीछे की वजहें

‘औस्कर’ के लिए भारतीय प्रविष्टि के रूप में पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’ को न चुनने को ले कर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. लोगों का मानना है कि यह सरकार के दबाव में लिया गया निर्णय रहा. हम देखते रहे हैं कि देश का कोई भी खिलाड़ी जरा सी सफलता हासिल करता है या कोई दूसरा शख्स कोई छोटा सा अवार्ड जीतता है, तो देश के प्रधानमंत्री तुरंत उसे बधाई देते हैं.
लेकिन जब पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आल वी इमेजन एज लाइट’ को कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में पुरस्कृत किया गया, तो देश की सरकार को सांप सूंघ गया. सब चुप रहे. इस की मूल वजह 2015 में पायल कपाड़िया द्वारा सरकार के विरोध में खड़ा होना रहा. वास्तव में 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धीरेधीरे हर संस्थान में नई नियुक्ति करनी शुरू कर दी.
9 जून 2015 में जब अभिनेता और भाजपा के सक्रिय सदस्य गजेंद्र चौहाण को ‘पुणे फिल्म संस्थान’ का अध्यक्ष चुना गया, तो कुछ दिन बाद ही छात्र संघ की तरफ से इस का विरोध शुरू हो गया.उस वक्त यह विरोध काफी लंबा चला था और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय तक बना गया था.
यहां तक कि ‘पुणे फिल्म संस्थान’ के अध्यक्ष के नाते गजेंद्र चौहाण की तरफ से उस वक्त ‘पुणे फिल्म संस्थान’ में पढ़ रहे 73 छात्रछात्राओं के खिलाफ पुलिस में एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी.
इन 73 में दूसरा नाम पायल कपाड़िया का था. इस घटनाक्रम के बाद पायल कपाड़िया को ‘पुणे फिल्म संस्थान’ से मिलने वाली कई सुविधाओं से भी हाथ धोना पड़ा था. तो लोगों का मानना है कि ऐसे छात्र की उपलब्धि को सरकार कैसे मान लें.

क्यों औस्कर ने ‘लापता लैडीज’ के लौटा दिया

सब से पहले हम आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ की चर्चा करते हैं. इसे औस्कर की सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की 15 फिल्मों में भी नोमीनेट न होने की कई वजहें रही हैं. जिन से हर सिनेप्रेमी इस फिल्म के रिलीज होने के दिन से ही वाकिफ रहा है.
2024 में रिलीज फिल्म ‘लापता लैडीज’ पुरूष सत्तात्मक व पितृ सत्तातमक सोच की वकालत करने के साथ ही एक फेमनिस्ट फिल्म है, जिस की अंग्रेजीदां फिल्म क्रिटिक्स ने खूब प्रशंसा की थी, अन्यथा इस ने बौक्स औफिस पर कोई कमाई नहीं की और ओटीटी पर कितने दर्शक फिल्म देखते हैं, यह तो हमेशा रहस्य ही रहेगा.
इस फिल्म में जिस तरह की कहानी पेश की गई है, वह उन अंग्रेजीदां लोगों ने पेश की है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी गांव ही नहीं देखा, इस वजह से इस फिल्म के साथ भारतीय रिलेट ही नहीं कर पाए, तो भला औस्कर की ज्यूरी कैसे रिलेट कर पाती? इस के अलावा ‘औस्कर’ हमेशा मौलिक कथानक वाली फिल्म को ही स्वीकार करता है, चोरी वाली फिल्मों को पसंद नहीं करता.
पर कटु सत्य यह है कि फिल्म ‘लापता लैडीज’ के रिलीज होते ही अभिनेता व फिल्म निर्देशक अनंत महादेवन ने आरोप लगाया था कि, ‘लापता लैडीज’ तो उन के द्वारा निर्देशित फिल्म ‘घूंघट के पट खोल’ की नकल है. जो कि लगभग 10 साल पहले दूरदर्शन पर आई थी और यह फिल्म यूट्यूब पर अभी भी मौजूद है.
जब अनंत ने यह आरोप लगाया तब उन की यह फिल्म यूट्यूब पर भी मौजूद थी, मगर अनंत के आरोप लगाते ही इस फिल्म को यूट्यूब से गायब कर दिया गया. पर आज तक अनंत महादेवन के इस आरोप पर आमिर खान या किरण राव ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है.
अनंत महादेवन ने बाकायदा सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर आरोप लगाया था. तब भारतीय मीडिया में यह बात काफी उछली थी. ऐसे में आमिर खान और ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ ने यह कैसे मान लिया था कि चोरी के आरोप की भनक ‘औस्कर’ की कमेटी तक नहीं पहुंची होगी?

ऐसे में आप यदि उम्मीद कर रहे थे कि आप ‘औस्कर’ की ज्यूरी की आंखों मे धूल झोंक कर औस्कर ले आएंगे, तो आप को क्या कहा जाए. आमिर खान खुद ही इस का जवाब दे दें. हमें लगता है कि आमिर खान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भद्द पिटवा ली. इस से भी बड़ा दोषी तो ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ और ज्यूरी अध्यक्ष जाहनु बरूआ हैं, जिन्होंने इस बात को नजरंदाज कर दिया कि ‘लापता लैडीज’ पर चोरी का आरोप लगा है.

‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ के अध्यक्ष रवि कोट्टाराकारा हमें याद दिलाते हैं कि औस्कर के लिए मानदंड अलगअलग हैं और ‘लापता लैडीज’ तदनुसार फिट बैठती है. क्योंकि यह भारतीय सभ्यता व संस्कृति से ओतप्रोत फेमनिस्ट फिल्म है.
कोट्टाराकारा ने कहा था, ‘’आप पश्चिमी लोगों को घूंघट पहने हुए नहीं पाते हैं. ऐसा दक्षिण भारत में नहीं, बल्कि उत्तर भारत में है. यह कितना अच्छा है कि एक छोटा सा घूंघट दो विवाहित जोड़ों की जिंदगी बदल सकता है. और यही भारत की संस्कृति है. आखिरी बात, वह, जया/पुष्पा रानी (प्रतिभा रांता), पढ़ाई करना पसंद करती है और एक निश्चित तरीके से अपना जीवन जीना चाहती है.’’

माना कि इस में नारी उत्थान का मुद्दा है. फिल्म में लड़कियों की शिक्षा का भी मुद्दा है. मगर यह फिल्म एक पाखंड के अलावा कुछ नहीं है. पहली बात तो फिल्म की कहानी 2001 की है, उस वक्त मोबाइल फोन नहीं थे. दूसरी बात एक जोड़ा शादी से पहले एक साथ घूमता रहा है और उस के पास मोबाइल है, तो उस वक्त उस ने सेल्फी क्यों नहीं खींची थी. अगर खींची होती तो उस के मोबाइल में उस की पत्नी की बिना घूंघट वाली फोटो होती.

तब उसे पुलिस इंस्पेक्टर को अपने मोबाइल पर घूंघट वाली तस्वीर दिखा कर उस की तलाश करने की याचना नहीं करनी पड़ती. ‘लापता लैडीज’ में जिस तरह का गांव दिखाया गया है, उस तरह के गांव अब कहीं नजर नहीं आते. यही वजह है कि भारतीय दर्शकों ने इस फिल्म को सिरे से खारिज कर दिया था. सिर्फ फिल्म आलोचकों ने ही इसे सराहा था.

आमिर खान को क्यों है विदेशी अवार्ड का मोह

देखिए, लगभग 23 साल पहले आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ को भी औस्कर में भेजा गया था, तब भी आमिर खान मुंह के बल गिरे थे. लेकिन उस नाकामी से आमिर खान ने कुछ नहीं सीखा था. वास्तव में आमिर खान जैसे कलाकार हमेशा किसी से कुछ सीखने की बनिस्बत अपने आप से से ही मंत्रमुग्ध रहते हैं.

अगर पिछली नाकामी से आमिर खान ने कुछ सीखा होता तो वह ‘लापता लैडीज’ को औस्कर में भेजने के लिए ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ के समक्ष आवेदन ही न करते और जैसा कि अब आरोप लगाया जा रहा है, और अगर यह आरोप सच है कि आमिर खान ने इसे चयन करने के लिए फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ की ज्यूरी पर अपने प्रभुत्व का उपयोग न करते.

आमिर खान इस बात को ‘लगान’ के समय ही समझ गए थे कि वह अपने महान कलाकार और परफैक्शनिस्ट कलाकार का बनावटी हौव्वा सिर्फ भारत के भोलेभाले लोगों पर ही थोप सकते हैं, विदेश में उन का हौव्वा चलने से रहा.

आमिर खान ने ‘लापता लैडीज’ के मसले को जिस तरह से संभाला उस से वह पूरी तरह से अपरिपक्व इंसान और अपरिपक्व कलाकार के रूप में ही उभर कर आते हैं. यूं भी आमिर खान प्रपोगंडा करने में माहिर हैं.

एक तरफ वह भारत में बंटने वाले पुरस्कारों से दूरी बनाते हुए यह जाहिर करते हैं कि उन्हें पुरस्कार की लालसा नहीं है, जब कि औस्कर के लिए वह कई बार असफल प्रयास कर चुके हैं, इस से पहले हौव्वा खड़ा किया था कि वह 2000 करोड़ की लागत में फिल्म ‘महाभारत’ बना रहे हैं, जिस में वह अभिनय करेंगे. यह फिल्म पांच भाग में होगी. हर भाग दोदो साल बाद आएगा, पर फिर सब कुछ गायब हो गया.

आमोल पालेकर के रूदन का अर्थ

आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ के औस्कर से बैरंग वापसी के बाद अब मशहूर अभिनेता व निर्देशक अमोल पालेकर ने भी एक वीडियो जारी कर 2015 की घटना का उल्लेख करते हुए अपरोक्ष रूप से आमिर खान पर ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ पर दबाव बनाने का आरोप लगाया है.

अमोल पालेकर ने जो वीडियो जारी किया है, उस में उन्होंने कहा है कि 2015 में वह औस्कर में भारत की तरफ से भेजे जाने वाली फिल्म का चयन करने वाली ज्यूरी में थे, तब बौलीवुड के एक बहुत बड़े व महान अभिनेता ने अपनी फिल्म को ले कर बहुत दबाव बनाया था, पर बतौर ज्यूरी अध्यक्ष वह किसी दबाव में नहीं आए थे. यहां याद दिलाना जरुरी है कि 2015 में आमिर खान की फिल्म ‘पीके’ भी औस्कर के लिए भेजे जाने के लिए आवेदित हुई थी, पर ज्यूरी ने रिजैक्ट कर दिया था.
अमोल पालेकर के इस वीडियो के आने के बाद बौलीवुड के कुछ दिग्गज फिल्मकारों ने औफ द रिकौर्ड बात करते हुए अहम सवाल उठाया है. सभी का कहना है कि भारत में यह आम बात है. हर प्रभावशाली इंसान हर निर्णय में अपना ‘वीटो’ लगाता है, इस में कोई दो राय नहीं. ऐसा सिर्फ बौलीवुड ही नहीं हर क्षेत्र में होता आया है. और आज भी हो रहा है. लेकिन अमोल पालेकर आज जिस तरह का आरोप लगा रहे हैं, 2015 में ही उन्होंने यह बात क्यों नहीं कही थी?

दूसरी बात वह 2005 को ले कर खामोश क्यों रहते हैं. यह तो वही बात हुई कि ‘मीठामीठा गप्प, कड़वाकड़वा थू.’ यह रवैया तो किसी को भी नहीं अपनाना चाहिए और उस वक्त तो कभी नहीं जब आप दूसरों पर उंगली उठा रहे हों. यहां याद दिला दें कि 2005 में अमोल पालेकर ने फिल्म ‘पहेली’ का निर्देशन किया था.

फिल्म ‘पहेली’ का निर्माण करने के साथसाथ इस में महान कलाकार शाहरुख खान ने रानी मुखर्जी, अमिताभ बच्चन व नसीरूद्दीन शाह के साथ अभिनय किया था. अफसोस अमोल पालेकर की फिल्म ‘पहेली’ भी औस्कर नहीं ला पाई थी. पर यह सवाल जरूर उठ गया है कि क्या शाहरुख खान ने भी ‘पहेली’ को औस्कर में भिजवाने के लिए उस वक्त की फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया की ज्यूरी पर दबाव तो नहीं बनाया था? 2005 में अमोल पालेकर अपनेआप में महान व दिग्गज कलाकार थे.

जाहनु बरूआ की भी पिटी भद्द

लोगों की राय में औस्कर के लिए भारत की तरफ से फिल्मकार पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आल वी इमेजिन इन द लाइट’ को भेजा जाना चाहिए था. जिसे ज्यूरी ने रिजैक्ट कर ‘लापता लैडीज’ को चुना था. ‘लापता लैडीज’ को जब औस्कर की कमेटी ने पहले दौर की छंटनी में ही वापस कर दिया, तो अब जाहनू बरूआ ने जो बयान दिया है, वह अपनेआप में हास्यास्पद होने के साथ ही बतौर फिल्मकार उन की अपनी महत्ता व प्रतिभा पर भी सवालिया निशान लगाता है.

ज्यूरी के अध्यक्ष बरूआ ने कहा है, “पायल कपाड़िया की फिल्म ‘औल वी इमेजिन इन द लाइट’ तकनीकी रूप से कमजोर फिल्म है, इसलिए उसे नहीं भेजा था.” उन के इस बयान के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल की ज्यूरी नासमझ है, जिस ने मई 2024 में ही पायल कपाड़िया की इसी फिल्म को ‘कांस पाल्मे डि ओर’ पुरस्कार से नवाजा.

अथवा अब ‘गोल्डन ग्लोब’ की कमेटी नासमझ है, जिस ने पायल कपाड़िया की इस फिल्म को फिलहाल नोमीनेट किया है. अब तो यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि कहीं भारत में ही कोई लौबी तो नहीं है जो भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाप्त करने के प्रयासों में लगी हो. फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया के साथ ही व चयन समिति के अध्यक्ष जाहनु बरूआ पर अब कई फिल्मकार तंज कस रहे हैं.

इस बीच फिल्म निर्माता हंसल मेहता और संगीतकार रिक्की केज जैसी नामचीन हस्तियों ने फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया (एफएफआई) की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर खुल कर सवाल उठाए हैं. हंसल मेहता ने ट्वीट कर के फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि, “समझ में नहीं आता कि इन का स्ट्राइक रेट इतना कम क्यों है? फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया हर बार गलतियां करता है और असफल होता रहता है.”

पायल कपाड़िया की ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’ जीत सकती है औस्कर

पायल कपाड़िया की पहली फीचर फिल्म ‘‘आल वी इमजिन एज लाइट’ मलयालम, हिंदी और मराठी में बनी एक अंतर्राष्ट्रीय सहउत्पादन फिल्म है. इस के निर्माण के साथ फ्रांस, भारत, नीदरलैंड, लक्जमबर्ग और इटली की फिल्म प्रौडक्शन कंपनियां जुड़ी हुई हैं. जबकि निर्देशक पायल कपाड़िया के साथ इस फिल्म में कनी कुश्रुति, दिव्यप्रभा व छाया कदम जैसे पुरस्कृत कलाकार भारतीय ही हैं. इस फिल्म ने इस साल कान्स में स्पैशल जूरी पुरस्कार भी जीता.
हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि किस दबाव में भारत की तरफ से पायल कपाड़िया की इस फिल्म को भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में औस्कर में नहीं भेजा गया. मगर हर देश की सरकार को याद रखना चाहिए कि कला व सिनेमा कभी किसी भाषा या भौगोलिक सीमा की बंदिश में नहीं रहता.
जब भारत की तरफ से इस फिल्म को औस्कर में नहीं भेजा गया, तो इस फिल्म को यूके ने एक अन्य श्रेणी में औस्कर के लिए भेजा है. |
लोग उम्मीद कर रहे हैं कि यह फिल्म विजेता बनेगी. जब कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में पायल कपाड़िया को पुरस्कार दिया जा रहा था, तब पुरस्कार दिए जाने से पहले कहा गया ‘‘क्रिएटीविटी सुरक्षित जगहों से नहीं आती. कला सुरक्षित जगह से नहीं आती.’’

क्या है ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’

‘‘लापता लैडीज’ की ही तरह फिल्म ‘आल वी इमेजिन एज लाइट’ भी एक फेमनिस्ट फिल्म है और इस की कहानी के केंद्र में भी गांव है. यह फिल्म मलयाली भाषी नर्सों के इर्दगिर्द घूमती है. फिल्म में विस्थापन, अकेलापन, दोस्ती व लव जिहाद के मुद्दों पर बात की गई है. मुंबई की भीड़भाड़ में कैसे फिल्म की 3 महिला किरदार मिलते हैं और छाया कदम अन्य दो को ले कर कैसे गांव जाती हैं. फिर कैसे उन की सोचसमझ व उन के आपसी रिश्ते बदलने शुरू होते हैं, उसी की कहानी है.
दो महिलाओं में से एक विवाहित है, जिस का पति जरमनी जा चुका है, पर इस महिला का अपने पति से कोई संपर्क नहीं है. दोनों लड़कियां एकदूसरे के हित की सोचती हैं. जब कि दोनों अपने आप में किसी न किसी मुद्दे से जूझ रही हैं. मसलन, अविवाहित लड़की कनी कुश्रुति का किरदार केरला से है और वह हिंदू है, पर उस का प्रेमी मुसलिम है, जिसे वह सभी के सामने जाहिर नहीं कर सकती.

हिंदी भाषा की फिल्म ‘संतोष’ भी है अभी तक औस्कर में

दिलचस्प बात यह है कि भारत की तरफ से न सही पर यूके द्वारा भेजी गई संध्या सूरी निर्देशित हिंदी शहाना गोस्वामी और सुनीता राजवार अभिनीत संतोष नामक हिंदी फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर श्रेणी के तहत 15 फिल्मों की सूची में जगह बनाने में सफल रही है. इस का निर्माण व निर्देशन लंदन में रह रही मूलतः भारतीय मगर इंग्लैंड की नागरिक संध्या सूरी ने किया है, जिसे औस्कर में यूके की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजा गया है.

यह फिल्म हिंदी में भारतीय कलाकारों के साथ लखनउ में फिल्माई गई है. जी हां! ‘अकादमी औफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज (औस्कर) ने जिन फिल्मों के नामों का खुलासा किया, जो औस्कर 2025 की दौड़ के लिए पात्र हैं, उन में ग्रामीण उत्तर भारत में सेट हिंदी भाषा की अंतर्राष्ट्रीय सहनिर्माण फिल्म ‘संतोष’ को ‘सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म’ श्रेणी में जगह मिली है.

अफसोस की बात इतनी है कि इस फिल्म को यूनाइटेड किंगडम द्वारा अकादमी पुरस्कार 2025 के लिए उन की आधिकारिक प्रस्तुति के रूप में भेजी गई थी. इस फिल्म का प्रीमियर मई 2024 में 77वें कान फिल्म समारोह में भी हुआ था और इसे आलोचकों द्वारा खूब सराहा गया था.

फिल्म ‘संतोष’ में संतोष का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री शाहना गोस्वामी ने इंस्टाग्राम पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए लिखा, ‘’हमारी फिल्म संतोष को मिली इस छोटी सी उपलब्धि के लिए टीम के लिए बहुत खुश हूं, खास कर हमारी लेखिकानिर्देशक संध्या सूरी के लिए! 85 फिल्मों में से शौर्टलिस्ट होना कितना अविश्वसनीय है. इसे पसंद करने वाले, इस का समर्थन करने वाले और इस के लिए वोट करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद.’’

संध्या सूरी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में शहाना गोस्वामी एक युवा विधवा की भूमिका में हैं. उस का पति पुलिस विभाग में कार्यरत होता है, पर भीड़ द्वारा मार दिया जाता है, तब उसे उस के पति की जगह पर पुलिस विभाग में कांस्टेबल की नौकरी मिल जाती है. जब कि वह खुद को संस्थागत भ्रष्टाचार में फंसी हुई पाती है. वह निचली जाति की दलित समुदाय की एक किशोरी लड़की से जुड़े क्रूर हत्या के मामले में कठोर अनुभवी पुलिस इंस्पेक्टर शर्मा (सुनीता राजवार) के साथ काम करने के लिए उत्साहित होती है.

फिल्म में ग्रामीण भारत के सामाजिक तानेबाने पर एक सम्मोहक रूपक नजर आता है. फिल्म में एक महत्वपूर्ण दृश्य है. जिस में संतोष की वरिष्ठ गीता शर्मा (सुनीता राजवार) कड़वी सच्चाई का खुलासा करते हुए कहती हैं, ‘‘इस देश में, दो प्रकार के अछूत हैं, एक जिन्हें कोई नहीं छूना चाहता और दूसरे वह जिन्हें कोई छू नहीं सकता.’’

फिल्म में भारत की कुछ कमजोरियों को भी उजागर किया गया है, जिन से तथाकथित राष्ट्रवादी आगबबूला हो सकते हैं. यह फिल्म जातिवर्ग और जातीय विभाजन की भी पड़ताल करती है, कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा और लिंग पूर्वाग्रह पर वैध चिंताओं को संबोधित करती है, लेकिन सूरी ने इसे सामान्यीकरण नहीं किया है. फिर चाहे मामला रिश्ते में धोखा देने का हो या घूस का. फिल्म में लैगिक पूर्वाग्रहों का भी चित्रण है.

कुल मिला कर किसी भी साजिश के तहत भले ही आमिर खान की फिल्म ‘लापता लैडीज’ अनुपयुक्त होते हुए भी भेजा गया हो, जिस के चलते वह ‘औस्कर’ से पहली छंटनी में ही बैरंग वापस आ गई हो, पर अभी उम्मीदें हैं कि औस्कर में भारत का परचम लहरा सकता है. आखिर ‘कांस’ में कुछ माह पहले ही कहा गया था कि ‘कला और क्रिएटिविटी सुरक्षित जगह से नहीं आती.’

Film Review : देह व्‍यापार पर बनी उबाऊ मूवी है वरुण धवन की ‘Baby John’

Film Review :  25 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई वरूण धवन की फिल्म ‘बेबी जौन’ देख थिएटर से बाहर निकल रहे दर्शक गुनगुना रहे हैं- ‘‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’’. वास्तव में भारतीय दर्शक दीवाली, होली, ईद या क्रिसमस के मौके पर एक बेहतरीन मनोरंजक फिल्म देखने के अरमा अपने सीने में पाल कर रखता है.

इसी तरह इस बार भी क्रिसमस पर एक बेहतरीन फिल्म देख कर मनोरंजन पाने के अरमा ले कर जब दर्शक सिनेमाघर पहुंचे तो उसे मनोरंजन की बजाए सिरदर्द और ऐसी यातना मिली कि वह सिनेमाघर से बाहर निकलते हुए गुनगुना रहें हैं, ‘दिल के…’

वास्तव में पिछले कुछ वर्षों से बौलीवुड के कलाकार और फिल्म सर्जक अपनी फिल्म के कथानक आदि पर मेहनत करने की बजाए इस कदर सरकार परस्ती का तमगा लेने पर उतारू हैं कि वह अपनी ‘कला’ का ही सत्यानाश करने पर आमादा हैं.

राजनीतिक दिग्गजों की प्रशंसा करना, यहां तक कि नेताओं को ‘हनुमान’ बताना बौलीवुड से जुड़े लोगों का एकमात्र मकसद बन गया है. लेकिन यही सितारे तब चुप रहते हैं, जब बिलकिस बानो के बलात्कारियों और उस के परिवार के हत्यारों की सजा जल्दी कम कर दी जाती है और रिहाई पर उन्हें माला पहनाई जाती है. ऐसे कलाकार व फिल्मकार जब अपने सिनेमा में महिलाओं की सुरक्षा का ढिंढोरा पीटते हुए फिल्म के नायक से बलात्कारी को सजा दिलाते हैं, तो यह सब हर आम भारतीय को खोखला नजर आता है.

हमारी वर्तमान सरकार भी ‘नारी उत्थान’ के नाम पर कई तरह की मुहिम चला रही हैं. सरकारें महिलाओं को सशक्त करने के नाम पर उन्हें 1500 या 2000 रूपए की रेवड़ी भी बांट रही हैं. फिल्मकार ‘नारी सम्मान’ की बात करने वाली या बलात्कारियों को सजा देने वाली फिल्में भी बना रहे हैं, इस के बावजूद आएदिन छोटी लड़कियों के संग बलात्कार करने व उन की हत्यांए करने की घटनाएं सामने आती रहती हैं.

वरूण धवन के अभिनय से सजी फिल्म ‘बेबी जौन’ में भी नारी सम्मान, नारी सुरक्षा व बलात्कारी को सजा का मुद्दा ही उठाया गया है, मगर बहुत ही घटिया तरीके से.

अपनी इसी घटिया फिल्म को सफल बनाने के लिए अभिनेता वरूण धवन कुछ दिन पहले ही देश के गृहमंत्री अमित शाह से मिलने गए थे और वरूण धवन ने अमित शाह को ‘हनुमान’ बताया है, तो वहीं फिल्म ‘बेबी जौन’ में वरूण धवन की अति घटिया परफार्मेंस ने हर किसी को रूला दिया.
2016 में विजय जोसफ की एटली के निर्देशन में बनी ऐक्शन व रोमांचक तमिल फिल्म ‘थेरी’ ने बौक्स औफिस पर धमाल मचा दिया था, जिसे हिंदी में डब कर भी रिलीज किया गया था. इसी का हिंदी रीमेक ‘बेबी जौन’ अब 25 दिसंबर को रिलीज हुई है, जिस में वरूण धवन की मुख्य भूमिका है.

वैसे फिल्म के रिलीज से पहले वरूण धवन ने फिल्म ‘बेबी जौन’ को ‘थेरी’ का रीमेक कहे जाने पर एतराज जताया था. वैसे हालांकि यह याद रखना चाहिए कि थेरी स्वयं तमिल फिल्म चत्रियन (1990) और हौलीवुड फिल्म होमफ्रंट (2013) से काफी हद तक प्रेरित थी. यहां याद दिलाना जरुरी है कि करीब 10 करोड़ के आसपास व्यूज ‘थेरी’ के हिंदी में डब संस्करण को यूट्यूब पर ही मिल चुके हैं.

फिल्म की कहानी केरला में तब शुरू होती है, जब जौन उर्फ डीसीपी सत्या वर्मा (वरुण धवन) अपने अतीत को छिपा कर जौन के नाम से केरला में अपनी बेटी खुशी (जियाना), कुत्ते टाइगर व राम सेवक (राज पाल यादव) के साथ खुशनुमा जिंदगी जी रहा है. केरला में जौन एक बेकरी चलाता है, उसे उस की बेटी खुशी बेबी के नाम से पुकारती है. फिर जौन का अतीत सामने आता है.

पता चलता है कि लुंगी पहनने वाला बेबी जौन अतीत में मुंबई में एक पुलिसकर्मी सत्या वर्मा हुआ करता था, उस की प्रेमिका से पत्नी बन चुकी डाक्टर मीरा (कीर्ति सुरेश) और मां (शीबा चड्ढा) थी. उस वक्त डीसीपी सत्या वर्मा के साथ हवलदार रामसेवक (राज पाल यादव) था. लेकिन लड़कियों के देह व्यापार के सरगना बब्बर शेर उर्फ नानाजी की साजिश में फंस कर डीसीपी सत्या वर्मा को मां तथा मीरा को खोना पड़ता है.

पर बेटी खुशी को ले कर मीरा को दिए गए वादे के कारण सत्या वर्मा चुपचाप केरला आ कर नाम व बाल बड़े कर के रहने लगते हैं. लेकिन इसी बीच जौन की पिछली जिंदगी एक बार फिर उस के वर्तमान पर हावी होने लगती है, जब खतरनाक विलेन नानाजी (जैकी श्रौफ) के गुर्गों के चंगुल से मासूम बच्चियों को बचाने में कामयाब हो जाता है. कैसे नाना के खतरनाक मंसूबों से जौन खुद को और अपनी बेटी को बचा पाता है, फिल्म की कहानी इसी के इर्दगिर्द घूमती है.

फिल्म ‘बेबी जौन’ की सब से बड़ी कमजोर कड़ी इस की पटकथा और इस के स्तरहीन संवाद हैं. ऐसा लगता है जैसे कि कैमरामैन किरण कौशिक ने 40-50 दृश्य अच्छी लोकेशन पर फिल्माएं और निर्देशक कालीस ने उन दृश्यों को एडिटिंग टेबल पर जोड़ दिया. हैरानी की बात यह है कि इतनी घटिया फिल्म के साथ ‘जवान’ फेम निर्देशक एटली ने बतौर निर्माता बौलीवुड में अपने कैरियर की शुरूआत की है.

फिल्म में भावनाओं, रोमांस और मनोरंजन का घोर अभाव है. एक्शन सीक्वेंस पुराने, बहुत लंबे, थकाऊ और देखने में उबाऊ हैं. एक्शन दृश्यों में फिल्मकार ने बंदूकों, तलवारों, मुक्कों, या वह चीजें जिन्हें हथिायार में बदल सकते हैं का उपयोग कुछ भी फिल्माया है.

फिल्म के ज्यादातर एक्शन दृश्य व डीसीपी सत्या वर्मा की कार्यप्रणाली यथार्थ से परे है. फिल्म में मनोरंजन की बजाए टौर्चर ही टौर्चर है. काश फिल्मकार, लेखक व वरूण धवन ने बलात्कार पीड़ितों या उन के परिवारों के साथ बातचीत की होती.

क्लाइमैक्स में खुशी फिल्म के विलेन नानाजी के पास जा कर उन्हें दादू कह कर उन से कहती है कि उसे पता है कि उस की मां और उस की दादी को उन्होंने ही मारा था, अब वह सौरी बोल दें तो उस के पापा उन्हें माफ कर देंगे. जब कि यह कांड तब हुआ था, जब खुशी महज एक साल की थी और वह बाथ टब के अंदर थी, उस ने देखा ही नहीं था कि कौन किसे मार रहा है?

पर फिल्म में यह दृश्य देख कर फिल्मकार व लेखक की सोच पर तरस आता है. इसी तरह एक दृश्य में, सत्या अपनी मां (शीबा चड्ढा) को अपनी सरकारी कार में चेंबूर छोड़ने से नैतिकता का हवाला दे कर मना कर देता है. लेकिन कुछ ही देर में वह उन नैतिकताओं को पूरी तरह से त्यागते हुए, खुशीखुशी अपनी प्रेमिका मीरा (कीर्ति सुरेश) को उसी पुलिस वैन में छोड़ देता है. यह कैसी नैतिकता है?

फिल्मकार कालीस का डीएसपी कहीं भी पहुंच जाता है. मुंबई का डीएसपी खेतखलिहानों में जा कर वह विलेन के बेटे को अकेले ही मार दे रहा है? मजेदार बात यह है कि डीसीपी सत्या वर्मा जहां भी जाते हैं, हवलदार राम सेवक भी वहां उन के साथ मौजूद रहता है. यह कैसे संभव है? क्या इस बात की जरुरत समझ में नहीं आती है कि पुलिस की कार्यशैली पर बनने वाली फिल्मों के लेखकों को सब से पहले ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ को पढ़ना चाहिए.
इसी तरह से फिल्म में एक चौंकाने वाला दृश्य है. जिस में कंस्ट्रक्शन वर्क की जगह पर इमारत की छत से कुछ गरीब मजदूर मर जाते हैं. मृतकों में से एक महिला अपने पीछे 6 साल का बेटा छोड़ गई है. क्रूर भवन निर्माता व नाना का ही गुर्गा उस बच्चे को ‘नार्थ ईस्ट’ का बच्चा बताते हुए रूपयों का बंडल दिखा कर उस का मजाक उड़ाता है, फिर उसे चौकलेट के लिए केवल 10 रुपए देता है.

उसी शाम उसी क्रूर भवन निर्माता का अंत हो जाता है. इमारत से जब वह नीचे गिरता है, तब वही नार्थ ईस्ट का बालक हाथ में चौकलेट लिए हुए प्रकट होता है और मृत व्यक्ति को देख कर मुसकराता है. पहली बात तो सेंसर बोर्ड को इस पर औब्जेक्शन क्यों नहीं हुआ? फिल्म में जिस तरह ‘नार्थ ईस्ट’ का बालक कह कर उस का मजाक उड़ाया गया है, वह अक्षम्य है.

यह तो फिल्मकार की असंवेदनशीलता है. अब जिस फिल्म में इसी तरह के अवास्तविक व अविश्वसनीय दृश्य होंगे, वह फिल्म दर्शकों को मनोरंजन देने की बजाए रुलाने का ही काम करेगी.

फिल्म का क्लाइमैक्स तो बहुत ही घटिया है. इस फिल्म में बलात्कारी व लड़कियों की तस्करी से जुड़े इंसान को सजा दी गई या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.
जहां तक अभिनय का सवाल है तो डीसीपी सत्या वर्मा उर्फ बेबी जौन के किरदार में वरुण धवन ने एक बार फिर बुरी तरह से निराश किया है.
वरुण धवन कहीं से भी एक्शन स्टार या पुलिस अफसर नजर नहीं आते. हर दृश्य में वह कालेज छात्र की तरह दिखते हैं. जब कि उन्हें 6 साल की बच्ची के पिता के रूप में परिपक्व नजर आना चाहिए. पिछले कुछ साल से वरूण धवन अपने अभिनय पर ध्यान देने की बजाए इंस्टाग्राम रील्स बनाने से ले कर उटपटांग बयानबाजी करने में ही अपनी सारी एनर्जी लगा रहे हैं.

तभी तो वह कलंक, बवाल, अक्टूबर, स्ट्रीट डासंर थ्री डी, सुई धागा, जुगजुग जीयो, दिलवाले, ढिशुम, भेड़िया जैसी असफल फिल्में दे कर अपने दर्शकों को निराश करते आए हैं. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कीर्ति सुरेश ने अपनी पहली हिंदी फिल्म में खुद को बरबाद ही किया है.
हिंदी में कीर्ति की शुरुआत भूलने योग्य है. अभिनय में उन का कोई योगदान नहीं है. केरला में तारा नामक शिक्षिका के छोटे किरदार में वामिका गाबी अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं. वह खराब लिखी गई भूमिका या स्क्रिप्ट को अपने ऊपर हावी नहीं होने देतीं.

राज पाल यादव ने वरूण धवन के चक्कर में अपनी अभिनय प्रतिभा पर कुल्हाड़ी मार ली है. पिछले चार दशकों में जैकी श्रौफ ने अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी है. इतना ही नहीं दक्षिण भारत की 2010 में रिलीज हुई फिल्म ‘अरण्य कांडम’ में बतौर विलेन जैकी श्रौफ ने जो परफार्मेंस दी थी, उस के मुकाबले बेबी जौन में वह 10 प्रतिशत भी नहीं दे पाए. फिल्मकार ने उन्हें नानाजी के किरदार में अजीब सा मेकअप दे दिया है.

घनी मूंछें और हल्दी का लेप से तो वह विलेन की बजाए अघोरी ज्यादा नजर आते हैं. 6 साल की खुशी के किरदार में जियाना जरुर ध्यान खींचने में सफल रही हैं. सान्या मल्होत्रा ने भी निराश किया. इस फिल्म में सलमान खान ने अनावश्यक कैमियो क्यों किया, यह समझ से परे है.

New Year 2025 : चरित्रहीन कौन

New Year 2025 :  आयुषी बैंक में नौकरी करती है और उमेश एलआईसी कार्यालय में है. उमेश तो घर से 10-11 बजे निकलता है, पर आयुषी को घर से जल्दी निकलना पड़ता है. उन के 2 बच्चे हैं- बेटी पावनी 11 साल की और बेटा सनी 7 साल का.

आयुषी दोनों बच्चों को स्कूल भेज उमेश का लंच पैक कर बाकी का काम बाई पर छोड़ तैयार हो कर बैंक निकल जाती. उसे हमेशा यही डर सताता है कि पता नहीं उस के पीछे उमेश और बाई कहीं कुछ…

कितनी बार आयुषी ने उमेश को अखबार की ओट से बाई को गंदी नजरों से घूरते देखा है. अब झाड़ूपोंछा लगाते वक्त किसी के भी कपड़े अस्तव्यस्त हो ही जाते हैं. इस का यह मतलब तो नहीं है कि कोई उसे गंदी नजरों से घूरे. ऐसे में कोई भी बाई असहज हो जाएगी. आयुषी ऐसे ही पति पर शक नहीं कर रही थी.

‘‘नंदा, मैं औफिस जा रही हूं. तुम काम खत्म कर के चली जाना… और हां फ्रिज में कुछ खाने का सामान रखा है उसे लेती जाना,’’ कह एक दिन आयुषी औफिस चली गई.

आयुषी थोड़ी दूर ही पहुंची थी कि उसे याद आया कि वह अपनी दराज की चाबी भूल आई. उस ने तुरंत स्कूटी घर की तरफ घुमाई. घर की दूसरी चाबी आयुषी के पास रहती थी. अत: वह दरवाजा खोल कर जैसे ही अंदर गई उस के पैर वहीं ठिठक गए. उमेश और नंदा दोनों आयुषी के बैड पर एकदूसरे से लिपटे थे.

आयुषी को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था. बाई तो भाग गई… उमेश हकलाते हुए कहने लगा, ‘‘आयुषी मैं नहीं वही जबरदस्ती करने…’’

आयुषी ने बिना उमेश की पूरी बात सुने एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर दे मारा और फिर कहने लगी, ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें झूठ बोलते हुए… बिना तुम्हारी मरजी के वह और तुम… छि… छि:…,’’ कह आयुषी अपने आंसू पोंछते हुए आगे बोली, ‘‘उस दिन को कोसती हूं मैं, जिस दिन मेरी तुम से शादी हुई थी.’’

आयुषी औफिस तो चली गई, पर अपनी तबीयत खराब होने का बहाना कर तुरंत घर आ गई. पूरा दिन और रात वह सिसकती रही. किसी से कुछ नहीं कहा. न ही अपने बच्चों को इस बारे में कुछ पता लगने दिया. वह सोचने लगी कि कभी बच्चों को अपने पापा की इन गंदी हरकतों का पता चला, तो दोनों नफरत करेंगे उन से… उमेश की तो अब हिम्मत ही नहीं थी कि वह आयुषी के सामने जाए.

आयुषी बच्चों को सुबह स्कूल भेज कर घर का सारा काम खत्म कर औफिस चली जाती थी. कोई भी कामवाली सुबह आने को तैयार नहीं थी. सब यही कहतीं कि 9 बजे के बाद ही आ सकती हैं. आयुषी का मन तो करता कि नौकरी छोड़ दे, पर बच्चों के स्कूल और पढ़ाई पर जो मोटा पैसा खर्च होता है वह कहां से आएगा. आसमान छूती महंगाई के युग में एक की कमाई से घर चलाना संभव नहीं था.

एक बाई आई भी, पर कुछ दिन काम कर के छोड़ गई. वही बात सुबह 8 बजे नहीं आ सकती. आयुषी की तो कमर जवाब देने लगी थी. आखिर वह घरबाहर कितना करेगी.

आयुषी ने अपनी सहेली वैशाली से बाई के बारे में पूछने के लिए फोन किया, तो उस ने बताया, ‘‘हां एक बाई आती तो है मेरे घर काम करने, पर वह थोड़ी बूढ़ी है. अगर तुम कहो तो भेज देती हूं.’’

वैशाली की बात सुन कर आयुषी खुश हो गई, उसे यही तो चाहिए था. वह मन ही मन मुसकराई कि उमेश अब बूढ़ी औरत को क्या घूरेगा.

कांता बाई दूसरे दिन से ही काम पर आने लगी. अब आयुषी को कोई फिक्र नहीं थी. सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा था.

कांता बाई 2-3 दिनों से नहीं आ रही थी, वैशाली से पता चला कि उस की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए कुछ दिनों बाद आएगी. सुन कर आयुषी के पसीने छूट गए.

कांता बाई एक रोज किसी और को ले कर आई और कहने लगी, ‘‘मैडमजी, यह मेरी बहू है रूपा. अब से यही आप के घर काम करेगी.’’

‘‘कांता बाई जब आप की तबीयत ठीक हो जाएगी तब तो आओगी न काम पर?’’ आयुषी ने पूछा.

‘‘मैडमजी अब मुझ से काम नहीं होता है… गठिया की शिकायत है मुझे. काम करती हूं तो दर्द और बढ़ जाता है. मगर आप चिंता न करो मेरी बहू मुझ से भी अच्छा काम करेगी,’’ कांता बाई ने कहा.

आयुषी ने हां तो कह दी पर फिर वही शर्त कि सुबह 8 बजे आना पड़ेगा. रूपा मान गई.

रूपा काम तो अच्छा करती थी, पर आयुषी को डर लगा रहता था कि उमेश की गंदी नजर कहीं रूपा पर भी न पड़ जाए. रूपा थी भी बहुत खूबसूरत और फिर उम्र भी ज्यादा नहीं थी. यही कोई 22-23 साल. आयुषी के सामने ही वह काम कर के चली जाती थी.

आयुषी रविवार के दिन रूपा से खाना बनाने में भी मदद ले लिया करती थी. रूपा का व्यवहार भी अच्छा था. आयुषी हमेशा उसे कुछ न कुछ दे देती थी. जैसे पुराने सलवारसूट, चूडि़यां, बिंदी, लिपस्टिक आदि. रूपा भी बहुत खुश रहती थी. आयुषी को वह अब मैडमजी नहीं, दीदी कह कर बुलाने लगी थी.

आयुषी ने जब एक दिन रूपा से पूछा कि तुम्हारा पति क्या करता है, तो बोली, ‘‘दीदी, मेरा मर्द मजदूरी करता है. हमारी शादी के अभी 2 साल ही हुए हैं.’’

रूपा अपने मायके, ससुराल, नातेरिश्तेदारों सब के बारे में बताती रहती थी. आयुषी अब रूपा पर भरोसा करने लगी थी, परंतु उसे अपने पति पर कतई भरोसा न था.

रूपा को आयुषी के घर काम करते हुए करीब 7 महीने हो चुके थे. अब तो रूपा कभीकभार लेट भी आती, तो आयुषी कुछ नहीं कहती थी. उसे लगता था कि अगर रूपा ठीक है, तो उमेश कुछ नहीं कर सकता है.

रूपा अब बड़े सलीके से सजधज कर रहने लगी थी. आयुषी ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘रूपा, आज तो तुम बहुत अच्छी लग रही हो और यह तुम्हारा सलवारसूट भी. कहां से खरीदा? बहुत ही सुंदर रंग है.’’

रूपा कहने लगी, ‘‘दीदी, मेरी मां ने दिया था.’’

रूपा का चेहरा कुछ दिनों से बड़ा ही खिलाखिला सा लगने लगा था. आयुषी ने पूछा भी, ‘‘रूपा आजकल बड़ी खुश नजर आ रही है… कोई बात है क्या?’’ तब रूपा ने मुसकरा कर कहा, ‘‘नहीं दीदी.’’

रूपा कुछ महीनों से काम करने लेट से आने लगी थी. पूछने पर कहने लगी ‘‘मेरी सास बीमार हैं, इस कारण देर हो जाती है,’’

आयुषी कुछ नहीं कहती, उस पर घर छोड़ कर औफिस चली जाती थी. आयुषी को इस बात की हैरानी होती थी कि उमेश इतना कैसे सुधर गया, रूपा उसे चाय देने भी जाती, तो नजर उठा कर भी नहीं देखता है. आयुषी को लगा कि शायद उसे उस दिन का थप्पड़ याद है और फिर मुसकरा उठी.

रूपा को काम पर न आए आज हफ्ता हो गया. आयुषी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, किस से पूछे कि रूपा क्यों नहीं आ रही है. फिर याद आया कि वैशाली से पूछती हूं.

वैशाली ने कहा कि उस के घर भी रूपा कई दिनों से नहीं आ रही है. उस ने यह भी कहा कि रूपा का घर आयुषी के घर से थोड़ी दूर पर ही है. जा कर पूछ ले. आयुषी को लगा कि वैशाली सच कह रही है. उसे जा कर देखना चाहिए कि क्यों नहीं आ रही है और वह काम पर आएगी भी या नहीं.

संकरी सी गली में 1 कमरे का घर, 1 खटिया पर कांता बाई लेटी थी. बाहर से ही सब दिख रहा था.

‘‘कांता बाई,’’ आयुषी की आवाज सुनते ही कांता बाई बाहर आ गई.

‘‘रूपा कई दिनों से नहीं आ रही है, तो देखने आ गई, तबीयत तो ठीक है न उस की? आयुषी ने कांता बाई से पूछा.

कांता बाई अपना सिर पीटते हुए कहने लगी, कर्मजली मर जाए तो अच्छा है.’’

‘‘कांता बाई ऐसा क्यों कह रही… कोईर् बात हो गई क्या?’’ आयुषी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैडमजी, तो और मैं क्या बोलूं?’’ पता नहीं ये कलमुंही कहां से अपना मुंह काला करवा कर आई है… किस का पाप अपने पेट में लिए घूम रही है… यह देखने से पहले मैं मर क्यों नहीं गई. अपने बेटे को क्या जवाब दूंगी. कांता बाई ने बिलखते हुए कहा.

‘‘आप को अपने बेटे को क्यों जवाब देना पड़ेगा… रूपा के पेट में तो आप के बेटे का ही बच्चा…’’

कांता बाई बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘मेरा बेटा तो साल भर से गुजरात में है. वहां कमाने गया है, तो उस का बच्चा कैसे हो सकता है मैडमजी?’’

आयुषी को जोर का झटका लगा. वह रूपा से मिले बिना ही घर आ गई. उस ने तो रूपा को एक अच्छी और सुलझी हुई औरत समझा था, पर वह तो चरित्रहीन निकली.

आयुषी को यह भी डर सताने लगा कि पता नहीं रूपा किस के बच्चे की मां बनने वाली है. कहीं मेरे पति? फिर अपने दिमाग को झटका देती हुई अपनेआप को ही समझाने लगी कि नहींनहीं ऐसा कैसे हो सकता है. रूपा तो मेरे सामने ही रोज काम कर के चली जाती थी. हां कुछ दिन लेट आई थी, पर उमेश तो उसे देखता भी नहीं था… फिर वह तो कितने घरों में काम करती है… कोई भी हो सकता है. मगर आयुषी को अंदर ही अंदर कोई अनजाना डर सताने लगा था.

आयुषी को यह भी समझ नहीं आ रहा था कि दूसरी बाई कहां से ढूंढ़ेगी और अगर मिल भी गई तो फिर वह कैसी होगी? ये सब सोचसोच कर ही आयुषी का दिमाग चकराने लगता था. उसे अब बाई के नाम से ही डर लगने लगा था.

आयुषी ने औफिस से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली, क्योंकि घर और बाहर दोनों जगह काम करना उस के लिए मुश्किल हो गया था.

आयुषी को काम करते देख कर एक दिन उमेश ने कहा, ‘‘लगता है तुम्हारी बाई भाग गई.’’

आयुषी ने कहा, ‘‘उस की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए नहीं आ रही है.’’

‘‘अरे, यह तबीयत खराब तो एक बहाना है पैसे बढ़वाने का. जानती है कि तुम औरतों का उस के बिना काम नहीं चलने वाला, इसलिए नखरे दिखाती है,’’ एक कुटिल मुसकान के साथ उमेश ने कहा.

‘‘जब तुम्हें कुछ पता नहीं है, तो बकबक क्यों करते हो?’’ आयुषी ने उमेश को झिड़कते हुए कहा, लेकिन उमेश को टटोलना भी था कि कहीं रूपा की इस हालत का जिम्मेदार उमेश तो नहीं है.

‘‘कांता बाई कह रही थी कि रूपा पेट से है, पर ताज्जुब की बात है कि उस का पति साल भर से उस से दूर है… फिर वह पेट से कैसे रह गई? खैर, जो भी हो पर कांता बाई तो रोरो कर कह रही थी कि जिस ने भी उस की बहू के साथ यह कुकर्म किया, उसे वह छोड़ेगी नहीं… यह भी कह रही थी कि पुलिस को सच बता देगी,’’ आयुषी उमेश को देख कर बोल रही थी और उस का चेहरा भी पढ़ने की कोशिश कर रही थी.

‘‘तो तुम मुझे क्यों सुना रही हो?’’ हकलाते हुए उमेश ने कहा, ‘‘और वैसे भी आज मुझे जल्दी औफिस के लिए निकलना है, तो नाश्ता लगा दो,’’ उमेश अपनेआप को ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहा था कि ये फालतू की बातों से उसे क्या लेनादेना. मगर आयुषी को उमेश पर शक होने लगा था.

आयुषी सोचने लगी कि रूपा ही बता सकती है कि कौन है वह इंसान, जिस ने उस के साथ ये सब किया. पर मैं क्यों पूछूं. कहीं उस ने उमेश पर ही झूठा इलजाम लगा दिया तो? आयुषी मन ही मन बड़बड़ा रही थी.

कांता बाई को अचानक अपने घर आए देख कर आयुषी डर गई. बोली, ‘‘क्या बात है कांता बाई?’’

‘‘मैडमजी, मैं ने अपनी बहू को बहुत मारापीटा कि बताओ कौन है इस का जिम्मेदार वरना तुझे तेरी मां के घर भेज दूंगी.’’

आयुषी के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. बोली, ‘‘तो मुझे क्यों सुना रही हो कांता बाई?’’ फिर एक सवालिया नजरों से वह कांता बाई को देखने लगी.

‘‘मैडमजी, मुझे माफ कीजिए पर रूपा ने आप के साहब का ही नाम बताया.’’

‘‘कांता बाई, पागल हो गई हो क्या, जो ऐसी बातें कर रही हो… और आप की बहू… उसे मैं ने क्या समझा था और क्या निकली… किसी और का पाप मेरे पति के सिर मढ़ने की कोशिश कर रही है,’’ आयुषी ने तैश में आते हुए कहा.

‘‘मैडमजी, मैं झूठ नहीं बोल रही हूं. रूपा ने जो कहा वही बता रही हूं और मैं उसे डाक्टर के पास भी ले कर गई थी गर्भपात करवाने, पर डाक्टर ने कहा कि अब गर्भपात नहीं हो सकता है. टाइम ज्यादा हो गया है. आप ही कुछ करो मैडमजी, नहीं तो मुझे सब को आप के पति की करतूत बतानी पड़ेगी,’’ एक तरह से कांता बाई ने धमकी देते हुएकहा. वह भी बेचारी क्या करती. जो उसे समझ आया कह कर चली गई.

कांता बाई तो चली गई, पर आयुषी को ढेरों टैंशन दे गई. अपने पति का चरित्र तो उसे पहले से पता था. बेशर्म कहीं का… सुधरने का ढोंग कर रहा था… और मेरे पीछे छि: अपना ही सिर पकड़ कर आयुषी चीखने लगी कि अब क्या करूं.

जब शाम को उमेश घर आया तो आयुषी ने उसे कांता बाई की कही सारी बातें बता दीं.

उमेश कहने लगा, ‘‘झूठ बोल रही है वह औरत. एक रोज मुझ से ही पैसा मांगने लगी कि मेरी सास बीमार है, डाक्टर को दिखाना है. मुझे दया आ गई तो दे दिए, फिर तो वह हमेशा पैसे की मांग करने लगी. तब मैं ने मना कर दिया. शायद इसलिए मुझ पर गंदा इलजाम लगा रही है,’’ सफाई देते हुए उमेश ने कहा, पर उस के चेहरे से झूठ साफ झलक रहा था.

‘‘कांता बाई तो अपनी बहू का गर्भपात भी कराने गई थी, लेकिन डाक्टर ने यह कह कर मना कर दिया कि समय ज्यादा हो गया है, जान को खतरा हो सकता है फिर अब तो एक जांच से पता चल जाता है कि बच्चे का बाप कौन है,’’ अपनी नजरें उमेश पर गड़ाते हुए आयुषी ने कहा.

‘‘मुझे ये सब क्यों सुना रही हो? मैं ने कहा न कि मैं ने कुछ भी नहीं किया… बारबार मुझे ये बातें न सुनाओ,’’ उमेश ने अपनी नजरें चुराते हुए कहा.

आयुषी रात भर करवटें बदलती रही. देखा तो उमेश भी नहीं सोया था. आयुषी को अपने दोनों बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता नजर आ रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे.

दोनों बच्चों को स्कूल भेज कर और उमेश के औफिस जाने के बाद आयुषी ने कांता बाई के घर का रुख किया.

‘‘कांता बाई, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?’’ बाहर से ही आयुषी ने आवाज देते हुए कहा.

कांता बाई आयुषी को अंदर अपनी कोठरी में ले गई.

आयुषी ने कहा, ‘‘रूपा अगर तुम सब सचसच बताओगी, तो मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हूं.’’

‘‘दीदी, पहले तो आप मुझे माफ कर दो.’’

आयुषी ने कहा, ‘‘हां कर दिया. अब बोलो.’’

‘‘आप को याद होगा, जब मैं पहली बार आप के घर लेट आई थी… जैसे ही मेरा काम खत्म हो गया और मैं अपने घर जाने लगी, तो साहब ने कहा कि 1 कप चाय बना दो, फिर चली जाना. चाय दे कर मैं जाने लगी, तो वे बोले कि रूपा थोड़ी देर बैठो. फिर मेरी बनाई चाय की तारीफ करने लगे. फिर कहने लगे कि तुम्हारी दीदी (यानी आप) इतनी अच्छी चाय नहीं बना पाती है. चाय क्या उस के बनाए खाने में भी स्वाद नहीं होता है. फिर कहने लगे कि मैं आप को कुछ न बताऊं. वे अब रोज मेरी तारीफ करने लगे,’’  बोलतेबोलते रूपा चुप हो गई.

रूपा फिर कहने लगी, ‘‘साहब ने एक रोज मुझ से कहा कि तुम्हारा पति यहां नहीं है, तो तुम्हारा कभी मन नहीं करता है?’’

उन की नजरों और उन की कही बातों को मैं समझ गई.

फिर कहने लगे, ‘‘देखा रूपा, यह कोई शर्म की बात नहीं है. यह तो शरीर की जरूरत है और सभी को चाहिए ही… तुम्हारी दीदी तो मेरे साथ बैठना भी पसंद नहीं करती है.’’

‘‘साहब रोज मुझे पैसे पकड़ा देते थे… कहते थे कि अपनी दीदी को कुछ न बताना… कभी भी किसी चीज या पैसे की जरूरत हो तो मुझ से मांग लेना. बिलकुल संकोच मत करना… तुम जरा लेट ही काम करने आया करो… इसी बहाने तुम्हारे हाथों की बनी चाय पीने को मिल जाया करेगी…साहब की सारी बातें मुझे सच्ची लगने लगी थीं और रूपा की आंखों से आंसू बह निकले.

आयुषी ने कहा, ‘‘आगे क्या हुआ वह बताओ.’’

‘‘मैं साहब की चिकनीचुपड़ी बातों में आ गई और फिर… मुझे माफ कर दो दीदी, मुझे नहीं पता था कि इस का अंजाम ये सब होगा,’’ कह कर रूपा फफकफफक कर रो पड़ी.

‘बेचारी, अभी इस की उम्र ही क्या है?’ आयुषी सोचने लगी.

‘‘मैडमजी, कल साहब भी आए थे. माफी मांग रहे थे. कहने लगे कि वह एक डाक्टर को जानते हैं और फिर मुझे वहां ले गए. मगर डाक्टर ने गर्भपात करने से यह कह कर मना कर दिया कि मेरी जान को खतरा है. साहब उसे पैसों का लालच भी देने लगे कि डाक्टर आप आराम से सोचना, हम परसों फिर आएंगे.’’‘‘रूपा, तुम कल जाओ, मैं भी पीछे से आती हूं… साहब को मत बताना कि तुम ने मुझे कुछ बताया है,’’ रूपा को समझा कर आयुषी अपने घर वापस आ गई.

‘‘उमेश, सुबह औफिस की कह कर घर से जल्दी निकल गया. आयुषी तो इसी ताक में थी. उस ने उमेश का पीछा किया. देखा तो उमेश ने अपनी गाड़ी एक क्लीनिक के पास रोक दी. रूपा वहां पहले से खड़ी थी. जैसे ही दोनों क्लीनिक के अंदर गए, आयुषी भी उन के पीछे चल पड़ी.

‘‘मैं ने आप को पहले भी कहा था कि यह गर्भपात अब नहीं हो सकता है… इन की जान को खतरा है,’’ डाक्टर उमेश से कह रहा था.

आयुषी दंग थी कि उमेश पहले भी रूपा को यहां ले कर आ चुका है गर्भपात करवाने और मुझे बेवकूफ बना रहा था कि उस ने कुछ नहीं किया है.

‘‘डाक्टर, आप जितना पैसा कहेंगे दूंगा, पर आप को यह गर्भपात किसी भी तरह करना ही पड़ेगा,’’ उमेश गिडगिड़ाते हुए डाक्टर से कहे जा रहा था.

पैसा है ही ऐसी चीज कि पाप भी पुण्य लगने लगता है. अत: डाक्टर रूपा का गर्भपात करने के लिए तैयार हो गया. आयुषी अब अपनेआप को नहीं रोक पाई. नर्स रोकती रही, वह दनदनाते हुए क्लीनिक के अंदर चली गई.

आयुषी को देखते ही उमेश के पसीने छूटने लगे और डाक्टर कहने लगा, ‘‘कौन हैं आप? ऐसे बिना परमिशन के अंदर कैसे आ गईं?’’

‘‘जैसे आप बिना परमिशन के एक औरत का गर्भपात करने जा रहे हैं डाक्टर. क्या आप को पता है कि इस का अंजाम क्या होगा?’’ आयुषी ने गुस्से में कहा.

डाक्टर, तुरंत गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मुझे माफ कर दो मैडम… मैं तो कब से इस आदमी को यही समझाने की कोशिश कर रहा हूं, पर…’’

उमेश भी कहने लगा, ‘‘आयुषी, इस में मेरी कोई गलती नहीं है. यह चरित्रहीन औरत है. मैं तुम्हें बताने ही वाला था कि इस ने मुझे कैसे…?’’

उमेश की बात पूरी होने से पहले ही आयुषी ने एक जोरदार तमाचा उमेश के गाल पर जड़ दिया, ‘‘चुप एकदम चुप… अब और नहीं… छल, फरेब, धोखेबाजी सब कुछ तो तुम में भरा पड़ा है… चरित्रहीन रूपा नहीं तुम हो तुम. तुम ने इस की गरीबी का फायदा उठाया है… अब इस का अंजाम भी तुम्हीं भुगतोगे.’’

‘‘आयुषी, मुझे माफ कर दो. अब कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा… अंतिम बार मेरा भरोसा कर लो,’’ उमेश ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘भरोसा और तुम्हारा? वह तो इस जन्म में नहीं होगा… अपनी गलती को सुधारने का एक ही उपाय है कि इस बच्चे को अपना नाम दे दो वरना उम्र भर सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाओ,’’ आयुषी ने दोटूक शब्दों में कहा.

फिर वह थोड़ा रुक कर बोली, ‘‘अब मैं जो कह रही हूं वह करो. तुम इस बच्चे को अपना लो. यही एक रास्ता है तुम्हारे पास.’’

दोनों ने सहमति से तलाक लिया और उमेश रूपा को ले कर एक कमरे के मकान में रहने लगा. आयुषी को पता चला कि रूपा अब ठाट से रहती है और उमेश का सारा पैसा ऐंठ लेती है.

एक रोज सुबह दरवाजे पर खटखट हुई. देखा बढ़ी दाढ़ी, बिखरे बालों वाला एक आदमी खड़ा था.

‘‘आयुषी मैं उमेश, तुम्हारा गुनाहगार…’’

इस से पहले कि वह कुछ और कहता, आयुषी गरज उठी, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे दरवाजे पर आने की… चले जाओ यहां से. न मैं और न ही मेरे बच्चे तुम्हारी सूरत देखने को तैयार हैं.’’

उमेश गिड़गिड़ाया, ‘‘आयुषी रूपा गली के एक ड्राइवर के साथ भाग गई. वह मेरा पैसा भी ले गई. अब तुम्हीं मेरा आसरा हो. प्लीज मुझे माफ कर दो.’’

आयुषी ने बेरुखी से दरवाजा बंद कर दिया पर घंटे भर तक वह दरवाजे पर ही सिसकती रही. उमेश से कभी वह कितना प्यार करती थी. आज वह धोखेबाज गिड़गिड़ा रहा है. पुराने प्यार का हवाला दे रहा है पर वह कुछ नहीं कर सकी. बच्चों से भी नहीं कह सकती कि उन का पिता आया था. यह जहर तो उसे अकेले ही पीना होगा.

5 Special Stories : मीठा अहसास जगाने वाली स्‍टोरीज

5 Special Stories : मन में रिश्‍तों को लेकर मीठा अहसास कराती हैं ये कहानियां. आपके जीवन में होने वाले उतारचढ़ावों से मिलतीजुलती है ये कहानियां 5 New Year Special Stories.  इन कहानियों की खास बात यह है कि जिन रिश्‍तों की अहमियत को आज अपनी लाइफस्‍टाइल की वजह से लोग भूलते जा रहे हैं, वो हमारे लिए कितनी जरूरी हैं, पढ़ें 5 New Year Special Stories . नए साल पर सरिता की ओर से यह 5 New Year Special Stories का तोहफा !

1. अपनी खुशी के लिए: क्या जबरदस्ती की शादी से बच पाई नम्रता?

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‘‘नंदिनी अच्छा हुआ कि तुम आ गईं. तुम बिलकुल सही समय पर आई हो,’’ नंदिनी को देखते ही तरंग की बांछें खिल गईं.

‘‘हम तो हमेशा सही समय पर ही आते हैं जीजाजी. पर यह तो बताइए कि अचानक ऐसा क्या काम आन पड़ा?’’

‘‘कल खुशी के स्कूल में बच्चों के मातापिता को आमंत्रित किया गया है. मैं तो जा नहीं सकता. कल मुख्यालय से पूरी टीम आ रही है निरीक्षण करने. अपनी दीदी नम्रता को तो तुम जानती ही हो. 2-4 लोगों को देखते ही घिग्घी बंध जाती है. यदि कल तुम खुशी के स्कूल चली जाओ तो बड़ी कृपा होगी,’’ तरंग ने बड़े ही नाटकीय स्वर में कहा.

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2. गर्ल टौक: आंचल खुद रोहिणी की कैसे बन गई दोस्त

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एक दिन साहिल के सैलफोन की घंटी बजने पर जब आंचल ने उस के स्क्रीन पर रोहिणी का नाम देखा तो उस के माथे पर त्योरियां चढ़ गईं.

रोहिणी के महफिल में कदम रखते ही संगीसाथी जो अपने दोस्त साहिल की शादी में नाच रहे थे, के कदम वहीं के वहीं रुक गए. सभी रोहिणी के बदले रूप को देखने लगे.

‘‘रोहिणी… तू ही है न?’’ मोहन की आंखों के साथसाथ उस का मुंह भी खुला का खुला रह गया.

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3. एक साथी की तलाश: क्या श्यामला अपने पति मधुप के पास लौट पाई?

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शाम गहरा रही थी. सर्दी बढ़ रही थी. पर मधुप बाहर कुरसी पर बैठे शून्य में टकटकी लगाए न जाने क्या सोच रहे थे. सूरज डूबने को था. डूबते सूरज की रक्तिम रश्मियों की लालिमा में रंगे बादलों के छितरे हुए टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे. उन की स्मृति में भी अच्छीबुरी यादों के टुकड़े कुछ इसी प्रकार तैर रहे थे.

2 दिन पहले ही वे रिटायर हुए थे. 35 सालों की आपाधापी व भागदौड़ के बाद का आराम या विराम… पता नहीं…

‘‘पर, अब… अब क्या…’’ विदाई समारोह के बाद घर आते हुए वे यही सोच रहे थे. जीवन की धारा अब रास्ता बदल कर जिस रास्ते पर बहने वाली थी, उस में वे अकेले कैसे तैरेंगे.

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4. अपनी खुशी के लिए: क्या जबरदस्ती की शादी से बच पाई नम्रता?

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‘‘नंदिनी अच्छा हुआ कि तुम आ गईं. तुम बिलकुल सही समय पर आई हो,’’ नंदिनी को देखते ही तरंग की बांछें खिल गईं.

‘‘हम तो हमेशा सही समय पर ही आते हैं जीजाजी. पर यह तो बताइए कि अचानक ऐसा क्या काम आन पड़ा?’’

‘‘कल खुशी के स्कूल में बच्चों के मातापिता को आमंत्रित किया गया है. मैं तो जा नहीं सकता. कल मुख्यालय से पूरी टीम आ रही है निरीक्षण करने. अपनी दीदी नम्रता को तो तुम जानती ही हो. 2-4 लोगों को देखते ही घिग्घी बंध जाती है. यदि कल तुम खुशी के स्कूल चली जाओ तो बड़ी कृपा होगी,’’ तरंग ने बड़े ही नाटकीय स्वर में कहा.

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5. कोरा कागज: आखिर कोरे कागज पर किस ने कब्जा किया

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1996, अब से 25 साल पहले. सुबह के 9 बजने को थे. नाश्ते की मेज पर नवीन और पूनम मौजूद थे. नवीन अखबार पढ़ रहे थे और पूनम चाय बना रही थी, तभी राजन वहां पहुंचा और तेजी से कुरसी खींच कर उस पर जम गया.

“गुड मौर्निंग मम्मीपापा,” राजन ने कहा. “गुड मौर्निंग बेटा,” पूनम ने मुसकरा कर जवाब दिया और उस के लिए ब्रैड पर जैम लगाने लगी.

“मम्मी, सामने वाली कोठी में लोग आ गए क्या…? अभी मैं ने देखा कि लौन में एक अंकल कुरसीपर बैठे हैं.”

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5 Best Hindi Stories : दिल की गहराइयों में उतरने वाली कहानियां

5 Best Hindi Stories  : हर कहानी कुछ कहती है, कुछ सिखा जाती है क्‍योंकि कहानी के रूप में यह जीवन के गहरी भावनाओं से जुड़ी होती है.  ऐसी ही सरिता की 5 Best Hindi Stories आपके लिए लेकर आए हैं. दिल की गहराइयों में उतर जाने वाली ये 5 Best Hindi Stories  से आपको  कई तरह की सीख मिलेगी. जो आपके दिल में हर किसी के लिए प्‍यार की भावनाओं को जगाएगी, पढ़ें ये  5 Best Hindi Stories. 

1. तुम कैसी हो : आशा के पति को क्या उसकी चिंता थी?

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एक हफ्ते पहले ही शादी की सिल्वर जुबली मनाई है हम ने. इन सालों में मु झे कभी लगा ही नहीं या आप इसे यों कह सकते हैं कि मैं ने कभी इस सवाल को उतनी अहमियत नहीं दी. कमाल है. अब यह भी कोई पूछने जैसी बात है, वह भी पत्नी से कि तुम कैसी हो. बड़ा ही फुजूल सा प्रश्न लगता है मु झे यह. हंसी आती है. अब यह चोंचलेबाजी नहीं, तो और क्या है? मेरी इस सोच को आप मेरी मर्दानगी से कतई न जोड़ें. न ही इस में पुरुषत्व तलाशें.

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2. शिकायतनामा : कृष्णा क्यों करता था इतना अत्याचार ?

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देर शाम अनुष्का का फोन आया. कामधाम से खाली होती तो अपने पिता विश्वनाथ को फोन कर अपना दुखसुख अवश्य साझा करती. शादी के 3 साल हो गए, यह क्रम आज भी बना हुआ था. पिता को बेटियेां से ज्यादा लगाव होता है, जबकि मां को बेटों से. इस नाते अनुष्का निसंकोच अपनी बात कह कर जी हलका कर लेती.

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3. रिश्तों की कसौटी : क्या हुआ था सुरभी को ?

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‘‘अंकल, मम्मी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई क्या?’’ मां के कमरे से डाक्टर को निकलते देख सुरभी ने पूछा.

‘‘पापा से जल्दी ही लौट आने को कहो. मालतीजी को इस समय तुम सभी का साथ चाहिए,’’ डा. आशुतोष ने सुरभी की बातों को अनसुना करते हुए कहा.

डा. आशुतोष के जाने के बाद सुरभी थकीहारी सी लौन में पड़ी कुरसी पर बैठ गई.

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4. पति नहीं सिर्फ दोस्त : स्वाति का क्यों नहीं आया था फोन ?

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3 दिन हो गए स्वाति का फोन नहीं आया तो मैं घबरा उठी. मन आशंकाओं से घिरने लगा. वह प्रतिदिन तो नहीं मगर हर दूसरे दिन फोन जरूर करती थी. मैं उसे फोन नहीं करती थी यह सोच कर कि शायद वह बिजी हो. कोई जरूरत होती तो मैसेज कर देती थी. मगर आज मुझ से नहीं रहा गया और शाम होतेहोते मैं ने स्वाति का नंबर डायल कर दिया. उधर से एक पुरुष स्वर सुन कर मैं चौंक गई. हालांकि फोन तुरंत स्वाति ने ले लिया मगर मैं उस से सवाल किए बिना नहीं रह सकी.

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5. भाभी : गीता को क्यों याद आ रहे थे पुराने दिन ?

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अपनी सहेली के बेटे के विवाह में शामिल हो कर पटना से पुणे लौट रही थी कि रास्ते में बनारस में रहने वाली भाभी, चाची की बहू से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. बचपन की कुछ यादों से वे इतनी जुड़ी थीं जो कि भुलाए नहीं भूल सकती. सो, बिना किसी पूर्वयोजना के, पूर्वसूचना के रास्ते में ही उतर गई.

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