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आमची मुंबई के रंग

सपनों के शहर मुंबई यानी मायानगरी के बारे में यह कहावत प्रचलित है कि बड़े से ले कर छोटे कामकाज करने वाले सभी लोग यहां अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दूरदूर से आते हैं और नाकामयाबी के बाद भी वे यह शहर छोड़ नहीं पाते. इस की माया में वे ऐसे बंध जाते हैं कि सफलता की उम्मीद लगाए सालोंसाल काट लेते हैं. भौगोलिक दृष्टिकोण से महाराष्ट्र का मुंबई लावा द्वारा निर्मित 7 छोटेछोटे द्वीपों को जोड़ कर बनाया गया शहर है. एक ओर समुद्री किनारा तो दूसरी ओर सहयाद्रि की पर्वत शृंखला इस की शोभा को बढ़ाते हैं. प्राकृतिक रूप से कटेफटे समुद्री किनारे होने की वजह से यह स्थान बंदरगाह के लिए बहुत उपयुक्त है.

यह देश की आर्थिकनगरी होने के साथसाथ फिल्म उद्योग का प्रमुख केंद्र है. यह देश और विदेश के हर शहर से किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है. अरब सागर से सटे होने की वजह से यहां की जलवायु माइल्ड है, न तो अधिक गरमी, न ही अधिक सर्दी. यही वजह है कि सैलानी यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं. शहर में घूमने के लिए टूरिस्ट बसें, आटो और लोकल ट्रेन काफी लाभदायक हैं. परिवहन यहां अधिक महंगा नहीं. यहां आने पर खास जगहों को देखना न भूलें. मुंबई घूमने दुनियाभर से पर्यटक आते हैं और इस औद्योगिक नगरी में जम कर मौजमस्ती करते हैं. प्रमुख तौर पर यहां गेटवे औफ इंडिया सब से पौपुलर जगह है जहां सैलानी सब से पहले आना पसंद करते हैं. 1911 में किंग जौर्ज के भारत में स्वागत के लिए इस का निर्माण कराया गया था. कोलाबा में अपोलो बंदरगाह के सिरे पर मुंबई बंदरगाह के किनारे यह विजयद्वार पीले बैसाल्ट पत्थरों से निर्मित है. इसे देख कर आप को दिल्ली के इंडिया गेट की याद बरबस आ जाएगी. यहां से एलिफैंटा द्वीप के लिए मोटर बोट चलती हैं. गेटवे औफ इंडिया के अलावा फ्लोरा फाउंटेन भी एक बार विचरण करने लायक जगह है. इस का निर्माण 1869 में सर बार्टले फरेरे के सम्मान में किया गया. यह फाउंटेन उस क्षेत्र में है, जहां महाराष्ट्र राज्य के लिए शहीद होने वालों की याद में स्मारक बनाया गया है.

फिल्मों में आप मरीन ड्राइव का नाम सुनते आए होंगे. यकीन मानिए यहां आ कर फिल्मों में दिखने वाली मरीन ड्राइव बिलकुल अलग एहसास देती है. 1920 में निर्मित मरीन ड्राइव अरब सागर के किनारेकिनारे, नरीमन पौइंट पर सोसाइटी लाइब्रेरी और मुंबई राज्य सैंट्रल लाइब्रेरी से ले कर चौपाटी से होते हुए मालाबार हिल तक के क्षेत्र में है. यह जगह लोकल मुंबइकर्स के लिए भी बड़ी चहेती है. मरीन ड्राइव की तरह जुहू और चौपाटी के भी नाम आप उत्तर भारतीय फिल्मों में देखते और सुनते रहते हैं. जुहू बीच की खूबसूरती के क्या कहने. 5 किलोमीटर लंबा यह तट पिकनिक स्पौट का सब से उम्दा स्थल है. यहां सपेरे, खिलौने बेचने वाले, फलविक्रेता, गोलचक्कर वाले झूले और ज्योतिषी आदि भी मिल जाते हैं. ज्योतिषों से जरा बच कर रहें. भविष्य बताने के नाम पर ये ठगने में उस्ताद होते हैं. जबकि चौपाटी बीच में तो हमेशा रंगीनी छाई रहती है. यहां रातदिन रैलियां, फिल्मों की शूटिंग आकर्षण बने रहते हैं. यहां आएं तो भेलपूरी और चाट का जायका लेना न भूलें. धोबीघाट भी विदेशी पर्यटकों को काफी रोचक लगता है. जब एक जगह पर पूरे मुंबई शहर के कपड़े धुलते दिखेंगे तो इलाका तो मजेदार दिखेगा ही.

महालक्ष्मी स्थित नगरनिगम के इस घाट में लगभग 5,000 व्यक्ति शहरभर से लाए गए कपड़ों की धुलाई करते हैं. ‘धोबीघाट’ के नाम से तो आमिर खान ने एक फिल्म भी बनाई थी. साथ में, मालाबार हिल भी आकर्षक जगह है, खासतौर से यहां का हैंगिंग गार्डन. यहां झाडि़यों को काट कर जानवरों की शक्ल दी गई है, जो इस गार्डन की विशेषता बन गए हैं. गौथिक शैली में बना विक्टोरिया टर्मिनस का डिजाइन फ्रैडरिक स्टीवंस ने तैयार किया तथा 1887 में इस का निर्माणकार्य पूरा हुआ. कम लोगों को पता है कि अपनी मुंबई यात्रा के दौरान महात्मा गांधी मणि भवन में रुके थे. तब से इस जगह और उन कमरों को ठीक उसी हाल में रखा गया है. यहां उन के जीवन से संबंधित चिह्नों को प्रदर्शित किया गया है. यह भवन रोजाना सुबह 9.30 बजे से सायं 6.00 बजे तक खुला रहता है तथा यहां प्रवेश निशुल्क है.

इन तमाम जगहों के अलावा बैंडस्टैंड, जीजामाता उद्यान, खाऊ गली, तारापोरवाला एक्वेरियम और छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय भी दर्शनीय स्थल हैं.

बैंडस्टैंड

मुंबई के बांद्रा उपनगर के पश्चिमी किनारे का 1.2 किलोमीटर लंबा मार्ग जौगिंग व समुद्री किनारे का आनंद लेने के लिए खास है. यहां अधिकतर प्रेमीप्रेमिका अपने प्रेम का इजहार करने व सुकून में बातचीत करने के लिए आते हैं. लैंड्स एंड के अंतिम छोर पर एक ‘प्रोमोनेड’ है जहां मुंबई फैस्टिवल का आयोजन किया जाता है. जिस में यहां की कला और संस्कृति से जुड़े नाटक का मंचन, शास्त्रीय संगीत और नृत्य का आयोजन हर साल किया जाता है. यहां का सूर्यास्त देखने लायक है. इस के अलावा यहां बांद्रा किला और माउंट मैरी चर्च भी काफी लोकप्रिय हैं. हिंदी सिनेमा जगत के प्रसिद्ध कलाकारों के सम्मान में यहां पीतल की 6 प्रतिमाएं लगाई गई हैं जो देखने लायक हैं. बैंडस्टैंड से निकल कर अगर आप आटो से 3 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं तो लिंकिंग रोड आता है. जहां पहुंचने पर आप को करीने से सजी हुई जूतों, चप्पलों और ड्रैस की दुकानें मिलती हैं.

यहां के जूते और चप्पलें अधिकतर मुंबई के आसपास के शहरों जैसे माथेरान, नासिक और कोल्हापुर से आती हैं. ये सामान खरीदते वक्त आप को मोलभाव करने की जरूरत अधिक होती है, क्योंकि यहां पर मिलने वाले सामान की कीमतें उन के दाम से दोगुनी बताई जाती हैं. लिंकिंग रोड से निकल कर आप आटो या बस से बांद्रा स्टेशन पहुंच कर चर्चगेट वाली ट्रेन पकड़ कर मुंबई सैंट्रल उतर जाएं, वहां से टैक्सी द्वारा 10 से 15 मिनट का सफर कर आप जीजामाता उद्यान पहुंच सकते हैं.

जीजामाता उद्यान

मुंबई के भायखला पूर्व में जीजामाता उद्यान है. 53 एकड़ में बना यह ‘जू’ भारत का सब से पुराना चिडि़याघर है. यह भायखला स्टेशन और मुंबई सैंट्रल स्टेशन से पास पड़ता है. यह चिडि़याघर विभिन्न प्रकार के पेड़पौधों, जानवरों और पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है. यहां 26 प्रजातियों के 200 जानवर, 8 मगरमच्छ और 45 प्रजातियों की 450 पक्षियां हैं. लेकिन कुछ दशकों से इस के रखरखाव पर ध्यान न देने की वजह से जानवरों और पेड़पौधों की संख्या में कमी आई है. हाल ही में नगरपालिका की नजर इस विरासत पर पड़ने की वजह से अब इस पर ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि यह पर्यटन की दृष्टि से काफी आकर्षक है. यहां अफ्रीकी शेर, जेबरा, तेंदुआ, पैंगोलिन, माउस हिरण, हाथी, हिप्पो पोटेमस आदि देखने के लिए उपलब्ध हैं. इस चिडि़याघर की नई आकर्षण है 8 हंबोल्ट पेंगुइन, जो दक्षिण कोरिया के सिओल से लाई गई है. जिन में से एक की मृत्यु हो जाने पर अभी 7 पेंगुइन हैं, जिन की पूरी तरह से देखभाल की जा रही है. उन के लिए पर्याप्त साफसफाई और सही तापमान का भी खयाल रखा जा रहा है.

इस की लागत अधिक होने की वजह से इस की टिकट दर अधिक है. इसे देखने के लिए वयस्कों का 100 रुपए और 16 साल से कम के लिए 50 रुपए का टिकट है. उद्यान के खुलने का समय सुबह 10.30 से सायं 5.30 बजे तक है. केवल जीजामाता चिडि़याघर में प्रवेश पाने के लिए बड़ों के लिए 5 रुपए और बच्चों के लिए 2 रुपए के टिकट हैं. घूमतेघूमते जब आप थक जाते हैं, तो आप को एक अच्छी खाने की जगह चाहिए, ऐसे में मुंबई की जावेरी बाजार की खाऊ गली को देखना न भूलें, जहां आप की जेब के हिसाब से तरहतरह की मुंबइया चाट, भेलपूरी, बर्फ का कालाखट्टा गोला, गन्ने का जूस, जलेबी, फाफड़ा आदि सब मिलता है. इस के लिए आप जीजामाता उद्यान से टैक्सी द्वारा 20 मिनट का रास्ता तय कर वहां पहुंच सकते हैं.

खाऊ गली

खाऊ गली फूडी लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र है. वैसे तो मुंबई में कई खाऊ गली हैं, जहां महाराष्ट्र की परंपरागत चाट, भेलपुरी, रगड़ा पाव, बड़ा पाव आदि सही दाम पर मिलते हैं, पर यह गली व्यापार के लिए भी खास है. गोल्ड और डायमंड व्यापारी यहां करोड़ों रुपयों का व्यवसाय बैठेबैठे ही कर लेते हैं. करीब 5 हजार लोग हर दिन अपनी भूख मिटाने यहां आते हैं. व्यापार के साथसाथ खानपान भी चलता रहता है. यहां की कचौड़ी, पापड़ी, प्याज और मूंग दाल की भजिया के साथ बादाम का शरबत और गन्ने का जूस काफी पौपुलर है. खाऊ गली से निकल कर आप टैक्सी से 15 मिनट का रास्ता तय कर तारापोरवाला एक्वेरियम जा सकते हैं. मुंबई शहर के मुख्य आकर्षणों में मरीन ड्राइव पर स्थित तारापोरवाला मछलीघर भारत का सब से पुराना एक्वेरियम है. यहां खारे पानी और मीठे पानी में रहने वाली 400 प्रजातियों की 2 हजार मछलियां हैं. मछलीघर में 12 फुट लंबी और 180 डिगरी एक्रेलिक में एक कांच की सुरंग है, जो इस की खास आकर्षण है.

इस के अलावा एक पूल में ऐसी मछलियां हैं, जो हानिरहित हैं, जिन्हें बच्चे छू सकते हैं. मछलियों को कांच के बड़े टैंक में एलईडी लाइट के सहारे उचित तापमान में रखा गया है. मुंबई दर्शन के लिए आने वाले पर्यटकों के लिए यह एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है.

छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय

3 एकड़ के एरिया में बना हुआ यह संग्रहालय पाम ट्रीज और फूलों के बगीचे से घिरा है. इस का निर्माण प्रिंस औफ वेल्स ने भारतयात्रा के समय मुंबई के उद्योगपतियों द्वारा करवाया था. यह गेटवे औफ इंडिया के निकट दक्षिणी मुंबई में स्थित है. इस की वास्तुकला ‘इंडो सरसेनिक’ शैली में है, जो मुगलों और मराठाओं की खास शैली थी. पहले इस का नाम प्रिंस औफ वेल्स था, लेकिन मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज के बाद इस का नाम बदल कर छत्रपति शिवाजी संग्रहालय रखा गया. इस संग्रहालय में करीब 50 हजार देसी और विदेशी कलाकृतियों को देखा जा सकता है. जिन में सिंधु घाटी की सभ्यता से ले कर गुप्त, मौर्य, चालुक्य आदि के अवशेष शामिल हैं. यहां आप पूरे परिवार के साथ आ कर ऐतिहासिक वस्तुओं को नजदीक से देख सकते हैं. इतिहास में अगर आप की रुचि है, तो इसे अवश्य देखें. यहां से चर्चगेट स्टेशन काफी नजदीक है. मिनिमम किराए की टैक्सी ले कर आप चर्चगेट स्टेशन पहुंचें, फिर वहां से अपने गंतव्य स्थान के लिए लोकल ट्रेन ले सकते हैं. इस के अलावा बांद्रा-वर्ली समुद्रसेतु, होटल ताज, हाजी अली भी मुंबई के आकर्षक पर्यटनस्थल है.

सैंटी कर देगा दिलीप कुमार साहब का ये वाला वीडियो

अभिनेता दिलीप कुमार का एक वीडियो सामने आया है, जो काफी भावुक कर देने वाला है. इसमें उनके साथ उनकी पत्नी सायरा बानो भी हैं. इस वीडियो के साथ ही ‘ट्रेजडी किंग’ फेसबुक पर आ गए हैं. अब वो अपने चाहने वालों तक फेसबुक के माध्यम से भी पहुंच रहे हैं. इस वीडियो का कैप्शन उन्होंने लिखा, ‘पीठ के निचले हिस्से में रहने वाले दर्द को एक कप चाय कुछ पल राहत देती है.’

गौरतलब है कि मंगलवार, यानी 11 अप्रैल 2017 को पंजाब एसोसिएशन ने दिलीप कुमार साहब को लीविंग लीजेंड लाइफटाइम अवॉर्ड से सम्मानित किया था.

खैर आप भी देखिए ये खूबसूरत वीडियो…

बादलों व झरनों का शहर चेरापूंजी

चेरापूंजी भारत के उत्तरपूर्वी राज्य मेघालय का एक छोटा शहर है जो शिलौंग से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह स्थान दुनियाभर में सब से ज्यादा बारिश के लिए जाना जाता है. यहां के स्थानीय लोग इसे ‘सोहरा’ नाम से जानते हैं. यह बंगलादेश की सीमा के काफी करीब है, इसलिए यहां से बंगलादेश का नजारा भी देखा जा सकता है. वर्षाऋतु के बाद यहां दूरदूर से पर्यटक घूमने आते हैं. आप सोच रहे होंगे कि बारिश के अलावा यहां ऐसा क्या खास है कि पर्यटक यहां घूमने आते हैं. दरअसल, चेरापूंजी में बारिश के अलावा यहां की प्राकृतिक खूबसूरती झरने और गुफाएं पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं.

शिलौंग से चेरापूंजी की ओर जाते समय रास्ते में हलकी चढ़ाई, दोनों ओर पहाड़, 2 पहाड़ों के बीच की घाटियां, अनन्नास के पेड़, सुंदर पत्तियों वाले पेड़ और किस्मकिस्म की वनस्पतियां पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं. चेरापूंजी से थोड़ा आगे बढ़ते ही 6 किलोमीटर की दूरी पर है मास्मई गुफा. यहां पर्यटक बिना किसी तैयारी व गाइड के भी आसानी से घूम सकते हैं. 150 मीटर लंबी इस गुफा को बाहर से देखने पर थोड़ी घबराहट जरूर होती है लेकिन जब आप इस के अंदर जाते हैं तब आप प्रकृति की वास्तविक खूबसूरती से रूबरू होते हैं. गुफा का अंदरूनी हिस्सा कई प्रकार के जीवजंतुओं और पौधों की प्रजातियों का घर है. गुफा के अंदर कई मोड़ और घुमावदार रास्ते हैं जो काफी रोमांचक अनुभव प्रदान करते हैं. गुफा के अंदर जब आप जाते हैं तो आप को बिलकुल भी गंदगी नहीं दिखेगी. गुफा के अंदर लाइट की उचित व्यवस्था है लेकिन फिर भी आप अपने साथ टौर्च अवश्य ले कर जाएं ताकि गुफा की अंदरूनी खूबसूरती को अच्छी तरह से देख सकें.

पानी के टपकते रहने की वजह से रास्ता थोड़ा फिसलन भरा है, इसलिए अंदर संभल कर चलें. इस के अंदर 4-5 रास्ते ऐसे भी हैं जो ऊंचाई पर हैं, जहां आप को चढ़ कर ही जाना होगा. यहां लंबे लोगों के साथ थोड़ी कठिनाई हो सकती है, उन्हें गुफा के अंदर कुछ जगहों पर झुक कर जाना पड़ सकता है. गुफा में अंदर घुसने से पहले आप को टिकट काउंटर से टिकट लेना पड़ेगा. यहां 10 साल तक के बच्चों के लिए प्रवेश निशुल्क है जबकि 10 से ऊपर के लोगों के लिए 20 रुपए का टिकट लेना अनिवार्य है. अगर आप कैमरा साथ ले कर अंदर जाना चाहते हैं तो आप को 25 रुपए का टिकट अलग से लेना पड़ेगा. यह गुफा सुबह 9 बजे खुल जाती है. यहां उन लोगों को ले कर जाने से बचें जिन के पैरों में, घुटने व पीठ में दर्द की शिकायत हो, क्योंकि उन्हें चढ़नेउतरने में दिक्कत होगी. यहां जब जाएं तो आरामदायक कपड़े पहनें जैसे ट्रैकपैंट या लोअर वगैरा और कभी भी यहां चप्पल या हाईहील पहन कर न जाएं, स्पौर्ट्स शूज पहनना ही आरामदायक रहेगा.

गुफा के  बाहर कई छोटेछोटे होटल व चायकौफी की दुकानें हैं, जहां आप को खानेपीने की कई चीजें मिल जाएंगी. अगर आप के पास समय है तो चेरापूंजी से केवल 15 मिनट की दूरी पर है नोहकालिकाई झरना. उसे भी जरूर देखें. यह भारत का सब से ऊंचा झरना माना जाता है. यह 1,100 फुट से नीचे गिरता है. अगर आप को फोटोग्राफी का शौक है तो यह जगह आप के लिए ही है. जैसेजैसे आप इस झरने के करीब पहुंचते हैं, ऊंचाई से गिरते पानी की आवाज आप के कानों में गूंजने लगती है और पानी को गिरता देख उस में डुबकी लगाने का दिल करने लगता है. झरने के ठीक सामने व्यू पौइंट से झरने की खूबसूरती देखते ही बनती है. अगर आप झरने को और करीब से देखना चाहते हैं तो पत्थरों व पहाड़ों की सहायता से चढ़ कर आसपास के कई छोटे झरनों को पास से देख सकते हैं, भीगने का आनंद ले सकते हैं, पत्थरों पर चढ़ कर फोटो भी खिंचवा सकते हैं. लेकिन ध्यान रहे, यहां थोड़ी फिसलन होती है, इसलिए सैल्फी लेने की चाहत में अपनी सुरक्षा को अनदेखा न करें. बारिश के मौसम में यहां जाना थोड़ा जोखिमभरा होता है क्योंकि बारिश की वजह से बादलों के कारण झरना साफसाफ दिखाई नहीं देता. अगर आप दिसंबर से फरवरी के बीच में जाते हैं तो हो सकता है आप को झरने में पानी न दिखे, इसलिए यहां हमेशा बारिश के बाद सितंबर से नवंबर के महीने में जाएं.

इस समय इस की खूबसूरती देखते ही बनती है. कोहरे से निकलते बादलों की नम हवा ऐसा महसूस कराती है मानो आप आसमान में हैं. झरने से गिरता पानी और आसपास का दृश्य पूरी तरह से आप को रिलैक्स करने वाला होता है. यहां पहुंचना काफी आसान है. शिलौंग तथा चेरापूंजी के बीच सड़क परिवहन काफी अच्छा है. व्यक्तिगत वाहनों के साथसाथ सरकारी यातायात के साधन भी हमेशा उपलब्ध रहते हैं. यहां झरने के पास ही बांस से बने खिलौने बिकते हैं जो काफी अलग होते हैं. पर्यटक इसे खरीदे बिना आगे नहीं बढ़ते. यहां एक बाजार भी है जहां स्थानीय स्मृति चिह्नित वाली चीजें मिलती हैं. यहां घूमने जाएं तो दालचीनी जरूर खरीदें. आप ने हमेशा छोटेछोटे टुकड़ोंमें दालचीनी देखी होगी लेकिन यहां दालचीनी छड़ी के रूप में मिलती है.

भुलाए न भूले चिखलदरा की सैर

स्कूल के अध्यापकों की इच्छा थी कि दूसरे अध्यापकों व विद्यार्थियों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर घूमने जाएं. वे पर्यटन पर चलने के लिए दूसरे अध्यापकों को तैयार करने लगे, लेकिन ज्यादातर के पास न चलने के कई बहाने थे- ‘मेरा साला आने वाला है, वह नहीं आया तो चलूंगा,’ ‘नाम लिख लो लेकिन पक्का नहीं है’, ‘2 के बजाय 1 दिन का टूर रख लो’ वगैरावगैरा. अध्यापक असद अली सब को समझाने और तैयारियों में लगे रहे. आखिरकार, यात्रा पर रवाना होने का दिन आया. महाराष्ट्र के विदर्भ में सतपुड़ा पहाड़ी शृंखला के मशहूर स्थल चिखलदरा की सैर के लिए हम 12 अध्यापकों को ले कर मिनी बस बारसी टाकली से निकल पड़ी.

सफर के शुरुआती भाग में सभी बातें बहुत करते हैं, शोर होता रहता है. तब सभी के पास बोलने के लिए बहुत कुछ होता है. अकोट आने तक ऐसी ही स्थिति रही. कुछ देर बाद पर्वत दिखाई देने लगे, ठंडी हवाओं के झोंके लगने लगे. जो लोग पहली बार आ रहे थे, खुश हो गए कि प्रवास पहले चरण में ही रोचक होने लगा है. सूर्यनाला जाने वाली सड़क पर मुड़ते ही पहली बार घना जंगल, ऊंचेऊंचे पेड़, गहरी वादियां, खतरनाक मोड़, आसपास और दूरनजदीक बहुत ऊंचेऊंचे पर्वत दिखाई देने लगे. लहलहाते हुए जंगल का नजारा पूरे शबाब पर है. लगता है जंगल अपनी उम्र के 16वें साल में है. जो लोग पहली बार इस तरफ आते हैं, हर्ष और भय दोनों का आनंद उठाते हैं.

हम बेलकुंड के खूबसूरत रैस्टहाउस के लिए ऊपर की ओर जा रहे हैं. सड़क के दायीं ओर एक खूबसूरत नदी नजर आई जो हमारे साथसाथ चलने लगी. हम जितना आगे बढ़ते, नदी उतनी नीचे चली जाती. 1-2 जगह यह नजारा इतना खूबसूरत है कि गाड़ी रोकी गई. हर तरफ खामोशी है. हम भी खामोश हुए और 100 फुट ऊंचे जिस पर्वत के कंधों पर खड़े हैं, उसी के कदमों को देखने लगे.

नीचे बहने वाली नदी की आवाज सुनाई दे रही है. आवाज बहुत दूर से आ रही है, कमजोर है. साफ सुनने के लिए सब लोग ध्यान से नदी की ओर देखने लगे जैसे आवाज सुनने की नहीं, देखने की चीज है. आगे का रास्ता भागते सांप की भांति लहरदार हो गया. हम कभी आगे कभी पीछे, कभी लैफ्ट कभी राइट, हिचकोले खातेखाते परेशान हो गए. हड्डियां और अंतडि़यां ढीली हो गईं. डेढ़ घंटे तक बैठेबैठे अकड़ गए. जब बेलकुंड का रैस्टहाउस आया और बस से उतरने की घोषणा हुई तो सारे शिक्षक फुरती व उल्लास से गाड़ी से बाहर कूदने लगे, जैसे स्कूल में छुट्टी की घंटी बजी हो. यह रैस्टहाउस 1891 में अंगरेजों ने बनाया था. इस की देखभाल के लिए सरकार की ओर से एक व्यक्ति दिखाई देता है जो बगल के सर्वेंट र्क्वाटर में रहता है. वह यहां आने वालों को खामोशी से देखता रहता है, रैस्टहाउस की सीढि़यों पर बैठा रहता है. सैलानियों के एकजैसे प्रश्नों के उत्तर उचाट मन से देता है.

हमारे साथ के अध्यापक उस से प्रश्न कर रहे हैं और मैं 40-50 फुट ऊंचे वृक्ष के पैरों में बैठा उस चौकीदार को देख कर सोच रहा हूं कि शाम के वक्त जब सारे मुसाफिर चले जाते होंगे, पहाड़ों की पहाड़ जैसी रात गुजारने के लिए यह यहां अकेला पड़ जाता होगा. तब इस को यह रहस्यमय जंगल, यह सन्नाटा कैसा लगता होगा. वह क्या सोचता होगा. रात में कौनकौन से अवलोकनों और अनुभवों से गुजरता होगा. जिस प्रकार यह इमारत अपने अंदर बीते जमानों के अनगिनत रहस्य छिपाए हुए है, इस व्यक्ति के पास भी कितनी घटनाएं और कौनकौन सी सच्ची व मनोरंजक कहानियों के रहस्य होंगे. यह किस को सुनाता होगा. लोगों को यहां आते हुए और फिर वापस होते देख कर इस को कैसा लगता होगा. मैं जब भी यहां आया, ऐसा लगा यह इमारत और चौकीदार कुछ कहना चाहते हैं लेकिन पूछो तो बताते ही नहीं.

चिखलदरा की सैर करने वाले इस रास्ते को कम ही अपनाते हैं. दिनभर में 10-15 गाडि़यां इस जगह आती होंगी. यही इस चौकीदार के मनोरंजन का सामान है. हर दिन, गुजरे दिन से अलग, हर गाड़ी के लोग गुजरी हुई गाड़ी के लोगों से भिन्न. यदि यह लेखक हुआ तो इस के पास कितनी कहानियां हैं लिखने के लिए.

घना जंगल, काली रात

सूरज डूबते ही पत्तों ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया. आसमान ने रंग दिखाने शुरू कर दिए. पहले नारंगी हुआ, फिर लाल, फिर जामुनी और बाद में बहुत गहरा नीला हो गया. बादल पतले हो कर उड़ रहे हैं. आसमान कभी बादलों से ढक जाता, कभी साफ दिखाई देता. पत्तों ने सूरज के इश्क में सुबह से हरे और धानी रंगों का शृंगार कर रखा था. अब उन्होंने अपना शृंगार उतारना शुरू कर दिया. गहरे हरे हुए, फिर काले हो गए और जब उन को यकीन हो गया कि सूरज अगली सुबह तक उन के हुस्न को निहारने नहीं आएगा तो उन्होंने देखने वालों की नजरों से भी परदा कर लिया और अंधेरे को ओढ़ लिया. नदियों और झरनों ने चमकना व उछलनाकूदना बंद कर दिया. हर तरफ एक रहस्यमय खामोशी है. शोर है तो सिर्फ गाड़ी के दौड़ने का. गाड़ी के क्रमबद्ध झटकों से एक साथी की तबीयत खराब हुई. गाड़ी रुकवाई गई. एकएक कर के सब लोग उतर पड़े. कोई बिल्ली की भांति अंगड़ाइयां ले रहा है, 2-3 लोग उत्तर में, 2-3 दक्षिण में टहलते हुए निकल गए हैं.

रात, जंगल, मीलों तक आदम न आदमजात. और हम सड़क पर खड़े हुए. एक खुशबू है, बेनाम, अनजानी. लेकिन खास जंगल की खुशबू. कुछ आवाजें हैं बहुत दूर से आती हुई. किस की हैं? परिंदे, दरिंदे या कुछ और. और यहां  पर वृक्ष कितने ऊंचे हैं. इन की डालियां कैसी भयंकर लग रही हैं. क्या उन पर कोई बैठा है? अगर वह हमला कर दे? इस जंगल में और कौनकौन से प्राणी हैं जो नजर नहीं आते. यह जंगल इतना रहस्यमय क्यों लग रहा है? यहां ज्यादा रुकना ठीक नहीं. हमारे साथी कहां चले गए? सब गाड़ी में बैठ गए अपनी जगहें बदल कर. सचिन अच्छा ड्राइवर सिद्ध हुआ. उस ने गति और बढ़ा दी है. आखिर सेमाडो आ ही गया. रात के 8 बजे हैं. लेकिन इस जगह ऐसा लग रहा है जैसे आधी रात.

एक जागता स्वप्न

एक बड़े होटल के सामने गाड़ी रोकी गई. सब लोग उतर कर खुले आसमान के नीचे रखी कुरसियों की ओर जाने लगे. मैं ने उन के चलने पर ध्यान दिया, फिर खुद के चलने पर. मुझे लगा जैसे मैं चिकनगुनिया का रोगी हूं. सारी रगें और हड्डियां ऐंठ गई हैं. और मैं केकड़े की तरह चल रहा हूं. उन दिनों चिकनगुनिया का दौर आया था. उस समय आसपास के स्थानों से लोग कारों और आटोरिकशों में भर कर आते और दवाखानों के सामने उतरते थे. तब यही लगता था केंकड़े उतर रहे हैं. हम इन कुरसियों में ढेर हो गए. फिर धीरेधीरे किसी ने पानी पिया, मुंहहाथ धोया. चाय की चुसकियां लेने लगे. पता चला यहां की रबड़ी बहुत मशहूर है. सब ने रबड़ी का सेवन किया.

इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो पता चला, यह तो बहुत खूबसूरत स्थान है. ऊंचे पर्वतों के कदमों को छूती हुई एक खूबसूरत बलखाती सड़क चली गई है. बसें, कारें और ट्रक थोड़ीथोड़ी देर से गुजर रहे हैं. उन की लाल बत्तियां माहौल को खुशनुमा बना रही हैं. सैलानियों की गाडि़यां खड़ी हुई हैं. कोई सड़क पार कर के उस तरफ कुछ खरीद रहा है. इधर चाय की प्यालियों से भाप निकल रही है. सर्दी बहुत बढ़ गई है. हम अपने गरम कपड़े और शालें निकाल रहे हैं. होटल में लकडि़यों की बड़ी भट्ठी जल रही है. खुले आसमान के नीचे अलाव जल रहे हैं. हवाएं तूफानी रफ्तार से चलने लगी हैं. कमीज और पतलून गुब्बारे हुए जाते हैं. बालों की लटेें माथे पर गुदगुदी करने लगी हैं. आसमान पर तारे आज बहुत ज्यादा नजर आ रहे हैं. आसमान भी वह नहीं लगता जिसे हम रोजाना बिजली की रोशनी से भरे अपने इलाके में देखते हैं. आज वह दीवाना कर देने की हद तक खूबसूरत लग रहा है. कुल मिला कर यह खुली आंखों से दिखता स्वप्न मालूम होता है. दिन के नजारे अपनी जगह और रात की असीम सुंदरता अपनी जगह. दिन मेहनती नटखट लड़का है तो रात सुंदर, शांत लड़की है.

इधर हम 4-5 साथी सड़क पर पैदल निकल गए हैं. सब यही बातें कर रहे हैं, अच्छा हुआ हम लेट हो गए वरना इतनी खूबसूरत रात देखने को न मिलती. असद अली मुझे तलाश करते हुए तेजी से आ रहे हैं. सेमाडो हम ने रात साढ़े 8 बजे छोड़ दिया. रात 10 बजे के आसपास हम ने चिखलदरा में प्रवेश किया. गाड़ी किसी निवासस्थान की खोज में होटलों, बाजारों से हो कर गुजरी. बाहर की भागती रोशनियों को अंदर बैठे लोग आंखें मलते हुए देखने लगे.

वह खौफनाक रात

थोड़ी तलाश के बाद एक अच्छा होस्टल मिल गया. हर पलंग पर एक सूटकेस खुला हुआ है. कोई कपड़े बदल रहा है, कोई ब्रश कर रहा है. कोई दवाएं खा रहा है. कुछ लोग कोने में अलगथलग खामोशी से लेट गए हैं. शब्बर और नाजिम इस अंधेरे में भी रोड पर चहलकदमी कर रहे हैं. चलने का अंदाज ऐसा है मानो स्कूल में पीरिएड औफ है और ये स्कूल ग्राउंड से होते हुए कैंटीन की ओर जा रहे हैं. खाने के बाद ज्यादातर लोग सो गए लेकिन आरिफ की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं. सो गया सारा जमाना, नींद क्यों आती नहीं. नाइट ड्यूटी वाले चौहान की जम्हाइयों से परेशान हो कर आरिफ कौरिडोर में निकल आए. वहां हवा सचमुच सीटियां बजाती गुजर रही है. रात के अंधेरे, खामोशी और कहींकहीं बिजली के बल्ब से निकलने वाली रोशनी के टुकड़ों ने माहौल को अजूबा और मदहोश कर देने वाला बना दिया है. जिस का दिल चाहे इस से खुश हो वरना भयभीत करने के लिए काफी है. सीटियां बजाती हवा हमारी फिल्मों में खौफनाक माहौल को जाहिर करती है, जैसे कुछ होने वाला है लेकिन पता नहीं क्या.

आरिफ कौरिडोर में घूम रहे हैं, रात का डेढ़ बजा है. उन को धुआं दिखाई दिया, इस कड़कड़ाती ठंड में किसी ने अलाव जलाया होगा. पता करने वहां की कैंटीन तक आए. कोई नहीं. उन्होंने ध्यान से देखा, सफेद धुआं किसी अलाव का नहीं, बहुत सारा है. उस ने पूरे होस्टल को घेर लिया है और बढ़ता जा रहा है. वे कल रात एक डरावनी फिल्म देख रहे थे जिस में किसी के आने से पहले ऐसा ही धुआं चारों ओर फैल जाता है. कड़ाके की सर्दी में डर के मारे उन को पसीना महसूस हुआ. वे फुरती से कमरे के अंदर आ गए और दरवाजा मजबूती से बंद कर लिया.

यादगार सवेरा

मूसलाधार बारिश में मकानों की छतों और पथरीले फर्श पर आमतौर पर सफेद धुआं सा दिखाई देता है. चिखलदरा में ऐसा धुआं या पानी से भरे बादल धरती पर उड़ते फिरते हैं. पूरा इलाका धुएं की लपेट में होता है. यह दृश्य सूरज निकलने से पहले दर्शनीय होता है. चिखलदरा के लोग इसे धुंयारी कहते हैं. आज सुबह साढ़े 5 बजे के आसपास कुछ लोग जागे तो आंखों के सामने इसी धुंयारी के नजारे थे हर तरफ. सर्दी की तीव्रता स्वेटर और शाल से कम न हो रही थी, इसलिए रात को जिन कंबलों को ओढ़ कर सोए थे उन्हें भी लपेट कर हम लोग होस्टल के पूर्व में एक पौइंट पर चले आए हैं. सर्दी असहनीय है, कमरे से बाहर निकलने नहीं देती जबकि दिलफरेब दृश्यों की लज्जत, कमरे में ठहरने नहीं देती. हर कोई प्रशंसा किए जा रहा है. दांत किटकिटाते हैं. आवाजें कांपती हैं लेकिन किसी से चुप रहा नहीं जाता. इस धुएं को देख कर आरिफ मुसकराने लगे. कहा, ‘यही धुंध थी वह जिसे मैं रात कुछ और समझ बैठा था. सारे होस्टल में कंबल चक्कर लगा रहे हैं. कोई ब्रश कर रहा है. 2-3 कंबल हंसते हुए खड़े हैं. एक कंबल सर्दी से थरथर कांप रहा है. 2 कंबल चाय के लिए कैंटीन वाले को जगा रहे हैं. ’

सुबह होते ही चहलपहल हो गई. गाड़ी में सोए कंबल यानी ड्राइवर को जगाया गया कि भैया उठो, एक पौइंट देख कर आना है. सूरज के चढ़ आने के बाद उस जगह का मजा न रहेगा. इसी रूप में लोग गाड़ी में सवार हो कर गाविलगढ़ किले से जरा पहले उतर गए, जहां सड़क की सीधी तरफ एक मैदान सा नजर आता है. उस के किनारे पहुंचने पर गहरी घाटी नजर आती है, जिस में गहरे हरे रंग का घना जंगल, दूर बहुत नीचे बहती हुई नदी, एक गांव दिखाई देता है. हवा इतनी ताकत से चलती है कि हर वक्त खुद के उड़ जाने का डर लगा रहता है. हम बादलों के बीच घिरे जीवनभर के यादगार वक्तों में से एक वक्त गुजार रहे हैं. वे बादल, जिन को हम अपने इलाके में आकाश में उड़ते हुए देखते हैं, यहां हमारे पैरों में उड़ रहे हैं. हर कोई खुशी के मारे कुछ न कुछ बोल रहा है. इसी सिलसिले में मुतज्जिर ने वकार और नासिर को एक हिलती दीवार पर बिठा कर हिलने से मना कर रखा है. खुशियों से तमतमाते चेहरे लिए होस्टल पहुंचे. कल के सफर में कुछ कठिनाइयों के कारण सोने से पले बिस्तर पर पड़ेपड़े किसी ने सोचा होगा — अब किसी के बहकावे में नहीं आऊंगा. अब की बार घर पहुंच जाऊं, बस. इस के बाद इन के साथ प्रवास करने से कान पकड़ता हूं. लेकिन सवेरे से अब तक सिर्फ डेढ़ घंटे प्रकृति के नजारे देख कर सभी फिर से यहां आने के प्रोग्राम बुन रहे हैं, खामोश खड़े हुए असद अली से कह रहे हैं, ‘क्यों भई, क्या खयाल है. अगले महीने आते हैं न फिर चिखलदरा.'

हम तुम्हारे न होते

वो रस्में वो कसमें

वो मिलनामिलाना

कहां जा छिपा वो

मुकद्दस जमाना

यों छिपछिप के छत से

इशारे न होते

तुम्हारी कसम

हम तुम्हारे न होते

तुम्हें देख हम ने

बदली थीं राहें

मिला जो सहारा

वो तेरी थी बांहें

इस कदर जानलेवा

नजारे न होते

तुम्हारी कसम

हम तुम्हारे न होते

तेरे बिना अब तो

जीवन है सादा

रहना है संग तो

करो आज वादा

कदम दर कदम

सहारे न होते

तुम्हारी कसम

हम तुम्हारे न होते.

प्रमोशन चाहते हैं, तो करें सैक्स

औफिस में देर तक काम करने, टारगेट पूरा करने, छुट्टी नहीं लेने व बौस की हर बात मानने पर नौकरी में प्रमोशन के ज्यादा चांस नहीं होते. इस वजह से तो वे औफिस में देर तक रुक कर काम करते हैं और देररात घर जा कर बस सो जाते हैं ताकि अगले दिन सुबह टाइम पर औफिस पहुंच कर सब पर अपना इम्प्रैशन बना सकें. लेकिन इस से आप को प्रमोशन मिलने के बजाय स्ट्रैस होता है और पर्सनललाइफ में बोरियत आने लगती है.

ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए शोध के अनुसार, औफिस के काम से संबंधित चीजें घर लाने पर कर्मचारियों के यौन जीवन पर प्रभाव पड़ता है. जो लोग दिन में कम से कम एक बार पत्नी के साथ सोते हैं, वे अपनी नौकरी का आनंद लेते हैं, ज्यादा काम करते हैं व बेहतर तरीके से काम करते हैं और कैरियर की सीढ़ी में तेजी से आगे बढ़ते हैं.

इस स्टडी में 159 विवाहित कर्मचारियों का रवैया 2 सप्ताह तक देखा गया था. इस में यह भी पाया गया है कि पुरुष और महिला दोनों ही अच्छे से काम करते हैं और पौजिटिव मूड में रहते हैं अगर उन्होंने सैक्स किया हो तो. आप नौकरी में प्रमोशन पाना चाहते हैं तो घर पर औफिस का काम लाने और फिर फोन में बिजी रहने के बजाय पर्सनललाइफ को खुशहाल बनाने पर जोर दें.

मेरे पापा

मैं ने एमबीए में दाखिला लिया तो पिताजी ने मुझे मोबाइल फोन खरीद कर दिया. मैं बहुत खुश थी लेकिन कालेज के होस्टल में किसी ने मेरा मोबाइल चुरा लिया. मैं बहुत रोई. यह बात पिताजी को पता चली तो उन्होंने मुझ से कहा कि मैं चिंतामुक्त हो कर आगे की पढ़ाई करूं. पिताजी की बात मान कर मैं ने अपनी पढ़ाई पूरे मन से की और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुई. पढ़ाई पूरी कर के मुझे नामी कंपनी में नौकरी मिल गई. तब पिताजी ने फिर से मुझे एक मोबाइल दिया और कहा, ‘‘बीती बातों को भूल कर हमेशा तुम्हें अपने उज्जवल भविष्य के बारे में सोचना चाहिए.’’ पिताजी की बातें मेरे जीवनभर की पूंजी बन गईं.   

नीरू श्रीवास्तव

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मैं 12 वर्ष की थी, मेरा छोटा भाई 6 वर्ष का था. एक दिन हम पिताजी के साथ बाहर घूमने गए. हम सब ने होटल में खाना खाया और फिर फिल्म देखने चले गए. पिताजी ने टिकट खिड़की पर टिकट का मूल्य पूछा. टिकट वाले ने कहा, 5 वर्ष से नीचे की उम्र वालों के लिए फ्री और 5 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए 100 रुपए. पापा ने कहा कि 4 टिकट दे दीजिए, मेरे छोटे बेटे की आयु 6 वर्ष हैं. इस बात पर टिकट वाले ने कहा, ‘‘भाईसाहब, अगर आप मुझे आप के बेटे की आयु 5 वर्ष बताते तो भी मैं मान जाता, आप 100 रुपए बचा सकते थे.’’ इस पर पापा ने कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि आज शायद मैं ये 100 रुपए बचा लेता क्योंकि शायद आप नहीं जानते कि मेरे बेटे की आयु 6 वर्ष है लेकिन अगर आज मैं झूठ बोल कर ये पैसे बचाता तो शायद मेरे बच्चे भी भविष्य में यही करते.’’ पापा की बातें हमें आज भी सच के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है.              

सुकन्या

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7वीं कक्षा तक मैं ने गांव में ही रह कर पढ़ाई की. पापा हमेशा मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान देते थे. 7वीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने पर पापा ने शहर के एक अच्छे स्कूल में मेरा दाखिला कराया. मैं शहर में ही रहने लगा. शहर में नएनए मित्र और माहौल मुझे कुछ पढ़ाई से दूर करने लगे जिस से 8वीं तथा 9वीं में मेरे कम अंक आए.

तब पापा बोले, ‘‘तुम्हें अपने लिए नहीं पढ़ना हो तो मत पढ़ो. लेकिन तुम्हें मेरे लिए पढ़ना है.’’ उन की यह बात मुझे हमेशा पढ़ाई के लिए प्रेरित करती रही. आज मैं एक सफल खनन अभियंता सिर्फ अपने पापा के मार्गदर्शन से हूं.   

विजय कुमार

क्या…यह संजय दत्त नहीं रणबीर कपूर हैं, फोटो हुआ लीक

जिंदगी के उतार चढ़ाव और जेल देख चुके संजय दत्त की कहानी में इतने ट्विस्ट हैं की उन पर एक फिल्म बनने जा रही है, इस फिल्म में उनका खुद का किरदार रणबीर कपूर निभा रहे है. हालांकि इस फिल्म को लेकर काफी कयास लगाये जा रहे हैं की रणबीर कपूर के लिए संजय दत्त बनना काफी मुश्किल रहेगा, क्योंकी जहां एक तरफ संजय लम्बे चौड़े डीलडौल की पर्सनलिटी के मालिक हैं, वहीं रणबीर कपूर के शरीर में लचक नजर आती है.

सोशल मीडिया पर रणबीर कपूर का फर्स्ट लुक पहले ही आ चुका है. हालांकि फिल्म ‘भूमि‘ की शूटिंग शुरू हो चुकी है, लेकिन अब इस फिल्म में रणबीर का दूसरा लुक भी लीक हो गया है.

अपने पहले लुक में रणबीर संजय के जवानी के दिनों वाले अंदाज में नजर आए थे, लेकिन अब नई फोटोज में वह संजय के करंट लुक में नजर आ रहे हैं. पहली बार में फोटो को देखकर आप अंदाजा भी नहीं लगा पांएगे कि ये संजय दत्त नहीं रणबीर कपूर हैं.

वैसे इसमें दो राय नही है की रणबीर कपूर एक बेहद मंझे हुए कलाकार है जिन्होंने फिल्म रॉक-स्टार और बर्फी से अपने आलोचकों तक को अपनी तारीफ करने पर मजबूर कर दिया. रिपोर्ट के मुताबिक, रणबीर ने ऐसा करने के लिए 250 घंटे का संजय दत्त से जुड़ा फुटेज भी देखा है. इनमें फिल्म, वीडियो, इंटरव्यू वगैरह शामिल हैं. राजकुमार हिरानी पहले भी संजय दत्त से जुड़ी फिल्में बना चुके हैं, जिनमें मुन्नाभाई सीरीज की फिल्में शामिल हैं.

संजय दत्त की बायोपिक में संजय की पत्नी मान्यता दत्त के किरदार में दिया मिर्जा होंगी. जबकि ‘मसान’ फेम विकी कौशल संजय दत्त के दोस्त की भूमिका में होंगे.

इंटरनेट पर जॉब के नाम पर ठगी

इंटरनेट ने जॉब ढूंढने को बहुत आसान बना दिया है मगर इसके कुछ खतरे भी हैं. जालसाजों ने काम दिलाने के नाम पर इंटरनेट के जरिए लोगों को शिकार बनाना शुरू कर दिया है. अक्सर ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं कि किसी ने जॉब दिलाने के नाम पर ठग लिया तो किसी ने फिल्म या टीवी सीरियल में रोल दिलाने के नाम पर ठगी कर दी. इसलिए जब भी आप जॉब की तलाश ऑनलाइन कर रहे हों, कुछ बातों का ध्यान रखें वरना नुकसान उठाना पड़ सकता है.

1. नए फेसबुक फ्रेंड्स से सावधान

अगर आप किसी से ऑनलाइन फ्रेंडशिप करते हैं और वह जॉब या गिफ्ट वगैरह का ऑफर देता है तो सावधान रहें. अगर कोई नया फेसबुक फ्रेंड काम दिलाने के बदले किसी तरह फीस मांगता है तो समझ लें कि कुछ सही नहीं है. वह आपसे पैसे ले लेगा और फिर अकाउंट डिऐक्टिवेट करके गायब हो जाएगा. इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं.

2. ध्यान से पढ़ें ईमेल एड्रेस

अगर किसी रिक्रूटर या कंपनी की तरफ से आपको मेल आए और उनका अकाउंट याहू, लाइव, हॉटमेल और जीमेल जैसी फ्री ईमेल सर्विसेज पर बना हो तो सावधान रहें. संभव है कि वे स्कैमर होंगे. यह भी जान ले कि जॉब से संबंधित ईमेल कॉर्पोरेट ईमेल अकाउंट्स से ही आते हैं.

3. बिना आपको परखे कोई नहीं देगा जॉब

हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि प्रतिष्ठित कंपनियां और बॉलीवुड की कोई हस्ती आपका इंटरव्यू या स्क्रीन टेस्ट लिए बगैर रोल ऑफर नहीं करेगी. आपकी योग्यता और अनुभव वगैरह को देखने के बाद ही कोई भी आपको काम देगा. इसलिए अगर कोई डायरेक्ट जॉब दे रहा हो तो छानबीन कर लें.

4. बिना अप्लाई किए ऑफर मिले तो सावधान हो जाएं

अगर आपको अपने इनबॉक्स पर ऐसी जॉब का ऑफर मिलता है जिसके लिए आपने कभी अप्लाई ही न किया हो, वह फर्जी हो सकता है और उसके जरिए आपको ठगने की कोशिश की जा सकती है. अगर इसमें ऐसा ऑफर दे दिया गया हो जिस पर यकीन करना मुश्किल हो तो उस पर यकीन न करने में ही समझदारी है.

5. ध्यान से पढ़ें वेबसाइट का URL

​स्कैमर अक्सर फेक यूआरएल (URLs, वेब एड्रेस) इस्तेमाल करके किसी और की आइडेंटिडी अपनाकर लोगों को शिकार बनाते हैं. वे बड़ी कंपनियों की वेबसाइट्स की तरह दिखने वाली वेबसाइट्स बनाते हैं या उसी तरह के ईमेल्स बना लेते हैं. इसलिए किसी वेबसाइट पर जॉब आदि के लिए आवेदन करने से पहले वेबसाइट का यूआरएल जरूर चेक कर लें.

6. पर्सनल इन्फर्मेशन न करें शेयर

​अगर कोई जॉब दिलाने के नाम पर आपसे आपकी निजी जानकारी मांगे तो बिल्कुल शेयर न करें. आपके नाम, पिता के नाम और डेट ऑफ बर्थ आदि के आधार पर जालसाज आपके अन्य अकाउंट्स और यहां तक कि बैंक अकाउंट्स तक में सेंध लगाने की कोशिश कर सकते हैं.

जब मैच के बीच में ही कपड़े बदलने लगी यह खिलाड़ी

12वीं-13वीं सदी में फ्रांस से शुरू होने वाला खेल, ‘टेनिस’ आज एक विश्वप्रसिद्ध खेल है. मूलतः दो या चार खिलाड़ी के बीच खेला जाने वाला यह खेल एक शांत प्रिय खेल है.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज क्रिकेट और फुटबॉल जितना विश्वप्रसिद्ध है उतना टेनिस नहीं है. आप मानें या ना मानें टेनस का अपना ही रुतबा है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण सानिया मिर्जा हैं. भारत जैसे क्रिकेट प्रिय देश में सानिया मिर्जा अकसर ही सुर्खियों में रहती हैं.

हर खेल का अपना दर्शक होता है प्रशंशक होता है. और इन खेलों में अजीबोगरीब घटनाएं तो आम बात है फिर चाहे वह क्रिकेट हो या फुटबॉल. अन्य खेलों के तरह ही टेनिस जैसे खेल में भी कई अजीबोगरीब घटनाएं होती रहती हैं, जिन्हें जानकर आप दंग रह जाएंगे. चलिए आज हम आपको बता रहे हैं टेनिस मैच के दौरान हुई सबसे चौंकाने वाली घटनाओं के बारे में.

टेनिस प्लेयर को मारा चाकू

30 अप्रैल 1993 को खेल जगत के लिए एक बहुत ही शर्मनाक घटना घटी थी. तत्कालीन नंबर-1 खिलाड़ी यूगोस्लाविया की मोनिका सेलेस को एक मैच के दौरान एक सिरफिरे फैन ने हजारों दर्शकों के बीच मैदान पर ही चाकू घोंप दिया था. इस दिन को टेनिस इतिहास का काला दिन माना जाता है. मोनिका की इस हमले में जान जाते-जाते बची थी.

रोती हुई मां को देखकर नडाल ने रोका मैच

आमतौर पर एग्रेसिव समझे जाने वाले नडाल ने हाल ही में एक एग्जीबिशन में अपना अलग रूप दिखाया. मैच के दौरान एक दर्शक महिला की बेटी कहीं खो गई थी. महिला रोते हुए अपनी बेटी को ढूंढने लगी. मैच खेल रहे नडाल को जैसे ही ये दृश्य दिखा, उन्होंने मैच रोकने का इशारा किया. इसके बाद उस महिला को अपनी बेटी मिल गई.

जब तेज शॉट से फूट गई टेनिस बॉल

पूर्व टेनिस खिलाड़ी रॉडिक को सबसे तेज स्मैश मारने के लिए जाने जाते है. 2012 में यूएस ओपन के दौरान उन्होंने 249 किमी प्रति घंटे की स्पीड से बॉल सर्व की थी, जिससे टेनिस बॉल क्ले कोर्ट से टकराकर टुकड़ों में बिखर गई थी.

मैच के बीच में अंडरवियर बदली

2011 के फ्रेंच ओपन टूर्नामेंट में जेलीना जेनकोविक इतनी अनकम्फर्टेबल हो गई कि उन्होंने बीच मैच में ऑडियंस के सामने ही अंडरवियर बदल डाली थी. ये देखकर कुछ दर्शक हैरान रह गए तो कुछ हंसकर लोटपोट हो गए.

रैकेट में बाल फंसने के बाद भी नहीं रूका मैच

2014 के यूएस ओपन में ये मजेदार घटना हुई जब डेनमार्क की खूबसूरत टेनिस स्टार कैरोलिना वोजनियाकी के बाल उनके रैकेट में उलझ गए. इसके बाद भी मैच नहीं रुका और वे अपने फंसे हुए बालों के साथ खेलती रहीं.

सेल्फी लेने लिए फेडरर को पकड़ा

फ्रेंच ओपन 2015 में एक मैच जीतने बाद फेडरर का एक फैन कूद कर कोर्ट पर आ पहुंचा. फेडरर कोर्ट से जा रहे थे और उन्होंने फैन को सेल्फी के लिए मना किया. इस पर उस फैन ने फेडरर का हाथ पकड़कर सेल्फी ली. इससे फेडरर काफी नाराज हो गए थे.

जब गार्ड्स ने एक फैन को उठाकर बाहर फेंका

फ्रेंच ओपन में रोजर फेडर और रॉबिन सोडर्लिंग के बीच मैच में एक फैन टॉवल लेकर कूद पड़ा था. ये फैन फेडरर का पसीना पोछ कर उन्हें कैप पहनाना चाहता था. इस घटना से फेडरर काफी डर गए थे. बाद में सिक्युरिटी ने इस फैन को उठाकर बाहर फेंक दिया.

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