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कैसे चुनते हैं आप अपना म्युचुअल फंड?

बाजार में हजारों म्युचुअल फंड की स्‍कीम्स चल रही हैं और सभी की सभी दावा करती हैं कि वो सबसे अलग हैं. यही कारण होता है कि आप, एक निवेशक की तरह बिना सोचे समझे म्युचुअल फंड का चयन कर लेते हैं, जो कि आगे चलकर आपके लिए समस्‍या बन जाता है.

आज हम आपकी इस समस्‍या का हल लेकर आए हैं. आप सिर्फ कुछ नियमों का पालन करके अच्‍छे म्युचुअल फंड्स का चुनाव कर, उनमें निवेश कर सकते हैं. म्युचुअल फंड्स के चयन में इन चार बातों को ध्‍यान में रखना बेहद जरुरी होता है –

1. परफॉर्मेंस : आप सेब और संतरे की तुलना नहीं कर सकते, दोनों ही फल हैं. ठीक इसी प्रकार दो म्युचुअल फंड्स की तुलना करना आसान नहीं होता है. आप कभी भी इक्विटी फंड की तुलना डेब्‍ट फंड से या इनकम फंड की ग्रोथ फंड से नहीं कर सकते हैं. लिहाजा किसी भी म्युचुअल फंड की तुलना करने से पहले उनके प्रारूप को ध्‍यान से देख लें.

समान प्रारूप वाले फंड्स की ही तुलना की जा सकती है. अलग-अलग कंपनियों के समान प्रारूप के म्युचुअल फंड्स की तुलना करते वक्‍त बाजार में उनकी परफॉर्मेंस देखें. जो बाजार में अच्‍छा चल रहा हो, उसी का चुनाव करें. लेकिन, हां यहां भी आंख मूंद कर फैसला न करें. इसके रिस्‍क फैक्‍टर्स को भी ध्‍यान से पढ़ लें.

2. रिस्‍क : लोगों के बीच यह धारणा है कि म्युचुअल फंड एक ऐसा निवेश होता है, जिसमें जितना रिस्‍क लेंगे उतना ज्‍यादा रिटर्न या धन आपको मिलेगा. यह धारणा बिलकुल गलत है. कोई भी म्युचुअल फंड इस पद्धति पर काम नहीं करता है. बेहतर होगा यदि आप कम रिस्‍क वाले ही म्युचुअल फंड लें, ताकि धीरे-धीरे अच्‍छी मात्रा में रिटर्न मिल सके.

इसका आंकलन करने के लिए समान श्रेणी के दो म्युचुअल फंड्स की तुलना करें वो भी उस समय में जब बाजार में तेजी से उछाल आया हो या गिरावट आयी हो. इससे आप आसानी से दोनों में से बेहतर को चुन सकते हैं. दोनों के रिटर्न की तुलना करके आप म्युचुअल फंड को चुन सकते हैं.

3. मैनेजमेंट : म्युचुअल फंड बाजार जैसे कि शॉर्ट टर्म, इनकम फंड, इंडेक्‍स फंड, आदि, इनमें कई तो ऐसे होते हैं जो मैनेजर पर निर्भर नहीं करते. सभी के परिणाम लगभग समान ही होते हैं. हां, इक्विटी फंड में, फंड मैनेजमेंट काफी महत्‍वपूर्ण होता है. आपकी जरा सी चूक आपको घाटा पहुंचा सकती है. इस फंड में तभी पैसा लगाये, जब आप इसके अच्‍छे जानकार हों. रिस्‍क लेने से पैसा डूब सकता है.

4. कॉस्‍ट : अंतिम तथ्‍य होता है कॉस्‍ट यानि कि कीमत. इस बात को हमेशा ध्‍यान रखें कि म्युचुअल फंड कोई नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन या चैरिटी नहीं है. हर कंपनी अपना नफा-नुकसान सोच कर ही यहां आगे बढ़ती है.

म्युचुअल फंड में निवेश करते वक्‍त आपको तमाम तरह के हिडेन चार्ज देने होते हैं. उनके बारे में पता लगाने के लिए फंड की टर्म एंड कंडीशन जरूर पढ़ें. म्युचुअल फंड में निवेश करने वाला मूल धन, ब्‍याज के साथ एक निश्चित समय-अंतराल पर बढ़ता या घटता है. उस समय अंतराल और घटने-बढ़ने वाली दरों का हमेशा हिसाब अपनी डायरी में रखें.

ट्विटर पर ये क्या लिख दिया डॉक्टर मशहूर गुलाटी ने

आजकल कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर के झगड़े के बारे में सुन-सुनकर बस एक ही गाना बार-बार मन में आता है. "दोस्त-दोस्त ना रहा, प्यार-प्यार ना रहा. ए जिंदगी मुझे तेरा ऐतबार ना रहा.."  हम लोगों के साथ ऐसा नहीं होता क्या, कि जब हमारा किसी दोस्त से झगड़ा हो जाता है तो हम उससे बात नहीं करते, पर इशारों-इशारों में उसे पराया होने का अहसास दिलाते रहते हैं.

कुछ दिन पहले फ्लाइट में हुई उस फाइट के बाद से ही कपिल और सुनील भी ट्वीटर के जरिए ट्वीट कर-कर के इनडायरेक्टली एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं. अभी कुछ दिन पहले की ही बात है. कीकू शारदा उर्फ़ 'बम्पर नर्स' ने ट्वीटर पर एक ट्वीट किया था, जिसका सुनील ने जवाब भी दिया. लेकिन इन दोनों के ट्वीट्स को देखकर यही लगा कि अगर कपिल शर्मा ने इसे देख लिया तो वो कही रो न पड़े. 

लेकिन इनके ट्वीट्स में आखिर ऐसा क्या था. आइए जानते हैं.  लोग हमेशा कपिल और सुनील की जोड़ी की बात तो करते हैं, लेकिन अगर गौर किया जाए तो गुत्थी-पलक से लेकर रिंकू भाभी-संतोस ननद तक कीकू और सुनील अधिकतर जोड़ी में ही नजर आए हैं. सुनील और कीकू ने कुछ दिन पहले ही दिल्ली में लाइव शो किया था, जिसे दर्शकों का काफी अच्छा रिस्पॉन्स भी मिला था. यहां भी सुनील ने चुटीले अंदाज में कपिल से झगड़े पर टिप्पणी की थी.

कीकू अभी अपने परिवार के साथ हॉलिडे पर गए हुए हैं. यहां उन्होनें अपनी ऑन-स्क्रीन फैमिली को बहुत मिस किया. सुनील ने भी अपने करीबी दोस्त के ट्वीट का रिप्लाई करते हुए 'अपने तो अपने होते हैं' लिखा.

अब आप सोच रहे होंगे कि ये तो आप भी पढ़ सकते हैं. आगे क्या? अरे आप ध्यान से देखों इन ट्वीट्स में कुछ मिसिंग है. कुछ समझ आया आपको? अगर आप गौर से देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि इन दोनों ने ही अली असगर और चंदन प्रभाकर के साथ कुछ अन्य लोगों को भी टैग किया है पर कपिल शर्मा को टैग नहीं किया है.

सुनील ग्रोवर और कीकू शारदा की ट्वीट्स से साफ़ हो गया है कि अब वो कपिल को अपना परिवार नहीं मानते और उनके हिसाब से कपिल अब उनके अपने नहीं रहें. अब ऐसे में तो किसी की भी आंखों में आंसू आ जाएंगे.

कपिल और सुनील के इस झगड़े में दो अलग धड़े बन गए हैं. कुछ लोग कपिल के साथ तो कुछ सुनील के. हम तो यही चाहते हैं कि यह झगड़ा खत्म हो जाए और ये लोग भी पहले की तरह एक हो जाएं.

किसी फोटो से कॉपी करना चाहते है उसका टेक्स्ट?

किसी फोटो से टेक्स्ट निकलना और कॉपी करना, हमेशा बड़े ही झमेले वाला काम लगता है. कहीं डिजाइनर्स की तरह काम करने वाले लोगों को तो इस झमेले जैसी परेशानी से रोज गुजरना पड़ता है, लेकिन हमारी बात मानिए यह उतना मुश्किल भी नहीं जितना आप अभी तक समझते हैं.

इंटरनेट पर कई बार हमें ऐसी तस्वीरें मिलती हैं जिनमें काफी शानदार कोटेशन्श या अच्छी बातें आदि लिखी होती हैं और कई बार किसी का अर्थ तो कभी उनके फॉन्ट्स हमें पसंद आ जाते हैं और आप उन्हें अपने पास रखना चाहते हैं, तो ऐसे में हम उन्हें कॉपी कर लेना ही बेहतर समझते है.

यदि आप एंड्रायड यूजर्स हैं, तो आज हम आपको एक ऐसी आसान सी ट्रिक बताने जा रहे हैं जो आपकी इस काम में मदद करेगी.

किसी फोटो से केवल टेक्स्ट को अपने पास कॉपी करने के लिए फॉलो करें ये आसान से स्टेप्स –

1. सबसे पहले आपको अपने एंड्रायड डिवाइस में टेक्स फैरी Text Fairy या ओसीआर टेक्स्ट स्कैनर एंड्रायड एप डाउनलोड करनी होगी.

2. एप डाउनलोड करने के बाद इसे अपने फोन में लॉन्च करना होगा और अब इस एप को फोटो, मीडिया और फाइल आदि को एक्सेस करने की अनुमति दीजिए.

3. यहां आपके पास दो ऑप्शन्स होंगे, जिसमें फोटो क्लिक कर स्कैन करना या फिर गैलरी में से फोटो चुनकर स्कैन करना शामिल होते हैं. अपनी जरुरत के अनुसार ऑप्शन का चुनाव करें और इसके बाद अब आप भाषा का चुनाव करें.

4. अब आपके पास टेक्स्ट के साथ इमेज मौजूद है. अब आप स्टार्ट टेक्स्ट रिकग्निशन पर क्लिक करें और ये एप, आपकी फोटो से टेक्स्ट को स्कैन करना शुरू कर देगा. थोड़ा इंतजार करने के बाद आपका टेक्स्ट आपके सामने प्लेन टेक्स्ट के रूप में आ जाएगा.

5. अब टेक्स्ट देखने के बाद ऐप आपको शेयर, कॉपी और सेव एस पीडीएफ (Save as PDF) का ऑप्शन देगा. यहां आप अपनी जरुरत के अनुसार ऑप्शन चुन सकते हैं और टेक्स्ट को सेव कर सकते हैं.

पीएफ के साथ ये लापरवाही पड़ेंगी मंहगी

प्रॉविडेंट फंड यानी पीएफ रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को पूरा करने के लिए होता है. लेकिन अक्‍सर करियर के शुरूआती दौर और उम्र के मध्य में प्रॉविडेंट फंड को लेकर ऐसी गलतियां करते हैं जिससे उनकी पूरी रिटायरमेंट प्‍लानिंग बरबाद हो जाती है. बाद में समय कम होने के कारण इस नुकसान की भरपाई संभव नहीं हो पाती है. हम आपको पीएफ से जुड़ी 5 गलतियों के बारे में बता रहे हैं जो बाद में आपको नुकसान पहुचा सकती हैं.

नौकरी बदलने पर पीएफ निकालना

अक्‍सर कैरियर के शुरूआती दौर में लोग जल्‍दी जल्‍दी नौकरियां बदलते हैं. सोच यह होती है कि जिम्‍मेदारियां बढ़ने से पहले करियर में बेहतर पैकेज और ग्रोथ हासिल कर ली जाए. इस प्रक्रिया में अक्‍सर युवा या मध्यम उम्र के लोग अपना पीएफ निकाल लेते हैं. इस गलती का अहसास बाद में होता है. क्‍योंकि रिटायरमेंट प्‍लानिंग में इसकी भरपाई मुश्किल होती है.

समय से पीएफ ट्रांसफर न कराना

नौकरी बदलने पर कर्मचारियों के पास पीएफ अकाउंट ट्रांसफर कराने का विकल्‍प होता है लेकिन अक्‍सर लोग समय पर पीएफ अकाउंट ट्रांसफर कराने में लापरवाही करते हैं. ऐसे में नई कंपनी उनका नया पीएफ अकाउंट खुलवा देती है. कई पीएफ अकाउंट हो जाने से कर्मचारी को पीएफ रकम पर कंपाउंडिंग का फायदा उस तरह से नहीं मिल पाता है जिस तरह से एक ही पीएफ अकाउंट रहने पर मिलता.

घर और दूसरी जरूरतों के लिए पीएफ का यूज

ईपीएफओ अपने मेंबर्स को घर खरीदने और मेडिकल इमरजेंसी जैसी जरूरतों के लिए पीएफ का एक हिस्‍सा निकालने की अनुमति देता है. आप इस सुविधा का यूज कर अभी की जरूरतें तो पूरी कर सकते हैं लेकिन इससे आपका प्रॉविडेंट फंड रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को पूरा करने के लायक नहीं होगा.

बेरोजगारी में पीएफ का यूज

इन दिनों निजी क्षेत्र में नौकरी को लेकर अनिश्चितता काफी बढ़ गई है. ईपीएफओ अपने मेंबर्स को 60 दिन से अधिक बेरोजगार रहने पर पीएफ निकालने की अनुमति देता है. ऐसे में लोग बेरोजगारी के दौरान पीएफ निकाल कर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. बेरोजगारी में पीएफ का यूज करने से आप को रिटायरमेंट प्‍लानिंग फिर से 0 से शुरू करनी होगी और आपको आर्थिक तौर पर बड़ा नुकसान होगा. कीमती समय बीत जाने से आप इसकी भरपाई भी नहीं कर पाएंगे भले ही आप ज्‍यादा पैसों की सेविंग और निवेश करें.

भाजपा को झटका है अटेर में अटकना

9 अप्रेल को 8 राज्यों की 10 विधान सीटों पर हुये मतदान के नतीजों में चौंका देने वाले 2 नतीजों में से पहला है दिल्ली की राजोरी गार्डन सीट से भाजपा की जीत जहां सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हरजीत सिंह को केवल 10,243 वोट मिले जबकि कांग्रेस की मीनाक्षी चंदेला को मिले 25,950 मतों के मुकाबले भाजपा-शिअद के विजयी प्रत्याशी मनजिंदर सिंह सिरसा ने 40,502 वोट हासिल कर दिल्ली में भाजपा की दोबारा आमद दर्ज करा दी है.

आप का उतरता जादू मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए खतरे की घंटी है, जो किसी न किसी विवाद से घिरे रहते हैं. भाजपा भले ही 10 में से 5 सीटें जीत गई हो पर मध्य प्रदेश की भिंड जिले की अटेर सीट से उसके उम्मीदवार अरविंद सिंह भदोरिया की हार उसे सालने वाली है.  यहां से कांग्रेस के हेमंत कटारे ने महज 857 वोटों से जीत दर्ज कर भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को करारा झटका दे दिया है. अटेर का मुकाबला दरअसल में शिवराज सिंह बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया हो गया था, क्योंकि इन दोनों ही दिग्गजों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था.

चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज सिंह ने एक तरह से सिंधिया राजघराने को गद्दार करार दे दिया था, जिससे सिंधिया बेहद तिलमिलाए हुये थे. ग्वालियर–चम्बल संभागों से सिंधिया राज परिवार का प्रभाव अभी खत्म नहीं हुआ है और सिंधिया अगर अपनी पर आ जाएं तो शिवराज सिंह को भी धूल चटा सकते हैं, यह उन्होंने साबित भी कर दिया. अगर वे कटारे को नहीं जितवा पाते तो जरूर यह मान लिया जाता कि अब सिंधिया के दिन लद गए हैं. इस प्रतिष्ठित सीट को बनाए रखने ज्योतिरादित्य ने दिन रात एक कर दिया था और दलितों के घर जाकर अपने हाथ से रोटियां सेंककर न केवल  खुद खाईं थी बल्कि दलितों को भी खिलाई थी.

श्रीमंत के खिताब से पुकारे जाने बाले सिंधिया का यह चलताऊ टोटका कारगर साबित हुआ, उलट इसके उनसे भी ज्यादा पसीना बहाने वाले शिवराज सिंह को सोचने मुकम्मल वक्त है कि वे अपनी अजेय होने की गलतफहमी दूर कर लें. अटेर में ईवीएम मशीन भी विवादों से घिरीं थीं, जब मशीन ट्रायल में कोई भी बटन दबाने पर वोट कमल के फूल पर जाते साफ साफ दिख रहे थे. ये मशीनें हालिया उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में इस्तेमाल हुईं थी. इस जीत से उत्साहित कांग्रेस को अब खुलकर यह आरोप लगाने का मौका मिल गया है कि अगर वह सजग नहीं रहती तो भाजपा यहां भी हेर फेर करती और जीत जाती.

गौरतलब है कि हेमंत कटारे वोटों की गिनती होने तक ईवीएम मशीनों के इर्द गिर्द मंडराते रहे थे. उन्हे शक था कि भाजपा मौका पाते ही प्रशासन की मदद से मशीनों में कमल का फूल खिला लेती. मशीनों में हेराफेरी का मुद्दा अब उम्मीद से ज्यादा तूल पकड़ रहा है और सभी गैर भाजपाई दल बड़े पैमाने पर इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं. अटेर की जीत से कांग्रेस को 2018 में वापसी की आस बंधी है और कहा यह भी जाने लगा है कि कांग्रेसी वाकई एकजुट हो जाएं और सिंधिया को सीएम प्रोजेक्ट कर दिया जाये, तो बात बन भी सकती है, क्योंकि भाजपा और शिवराज सिंह का तिलस्म अब आंशिक रूप से टूटने लगा है पर मतदाता के सामने कोई सशक्त विकल्प न होने से वे बैठे बिठाये इसका फायदा उठा रहे थे.

लेकिन कांग्रेस की राह उतनी आसान है नहीं जितनी वे अटेर की जीत के जोश में समझ रहे हैं. कांग्रेस को एक फायदा इस इलाके के दिग्गज नेता सत्यदेव कटारे के नाम का भी मिला है, जिनकी मौत से यह सीट खाली हुई थी. यहां उनके बेटे को कांग्रेस ने सहानुभूति हासिल करने भी टिकट दिया था, जो मिली भी. मध्य प्रदेश में दूसरा मुकाबला उमरिया जिले की बांधवगढ़ सीट पर था, जहां दूसरे कांग्रेसी दिग्गज छिंदवाड़ा के सांसद कमलनाथ ने पूरी ताकत झोंक दी थी, पर वे अपनी उम्मीदवार सावित्री सिंह को भाजपा के शिवनारायण सिंह के हाथों हारने से बचा नहीं पाये. कांग्रेस को यहां 25,476 के बड़े अंतर से करारी शिकस्त झेलना पड़ी जिससे साबित हुआ कि कमलनाथ अपना प्रभाव खो रहे हैं. भाजपा की इस जीत से लगा कि शिवराज सिंह एकदम खारिज नहीं हुये हैं और कमलनाथ महाकौशल इलाके में पहले से दमदार नहीं रह गए हैं तो मुमकिन है कांग्रेस अब बजाय उनके ज्योतिरादित्य सिंधिया पर दांव खेलना पसंद करे.

खोया – पाया

एक दूसरे प्रतिष्ठित मुकाबले में भाजपा अपनी नाक बचाए रखने में कामयाब रही. राजस्थान की धौलपुर सीट से उसकी प्रत्याशी शोभा रानी कुशवाह ने कांग्रेस के बनवारी लाल शर्मा को 38,648 मतों से पराजित किया. इस सीट पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने पूरी ताकत लगा रखी थी धौलपुर उनकी ससुराल है इसलिए भी यह सीट अहम हो गई थी. वसुंधरा को इस जीत से राहत और ताकत दोनों मिले हैं.  हर कभी उनकी कुर्सी खतरे में पड़ती नजर आती है, दूसरे महारानी होने की ठसक भी कभी कभी उन्हे भारी पड़ जाती है, अलावा इसके  दिग्गज भाजपाई नेता ओम प्रकाश माथुर की भी महत्वाकांक्षाएं भी जब तब सर उठाती रहती हैं.

भाजपा शासित दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरह वसुंधरा बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं. इसलिए धौलपुर की जीत उन्हें टॉनिक ही साबित हुई है, उन्होंने कोई परहेज इस बात से नहीं किया कि शोभारानी के पति बी एल कुशवाह हत्या के आरोप में जेल काट रहे हैं और बसपा के हैं. हिमाचल प्रदेश की भोरंज सीट भाजपा अपने खाते में रखने में सफल रही, जो दिग्गज भाजपाई नेता ईश्वर दास धीमान के निधन से खाली हुई थी. यहां उसने ईश्वर दास के बेटे अनिल धीमान को लड़ाया था जिन्हे इस सीट से 6 दफा विधायक रहे अपने पिता के नाम और काम का पूरा फायदा मिला.  यहां कांग्रेस उम्मीदवार प्रमिला देवी 8,290 वोटों से हारीं जो बहुत बड़ा नहीं कहा जा सकता.

पूर्वोत्तर राज्यों में पांव पसार रही भाजपा को एक उल्लेखनीय कामयाबी असम की धेमाजी सीट पर मिली, जहां उसके उम्मीदवार रानोज पेगु ने कांग्रेस के बाबुल सोनोवाल को 9,285 वोटों से हराया. यहां के भाजपा विधायक प्रधान बरुआ के लखीमपुर सीट से लोकसभा में चुने जाने के कारण यह सीट रिक्त हुई थी. ये तो वे सीटें थीं जिन पर भाजपा का दबदबा साफ दिख रहा था पर कर्नाटक की 2 सीटों नंजनगुंड और गुंदलपेट में वह कांग्रेस से हार गई .  पश्चिम बंगाल की कांथी साउथ सीट पर तृणमूल कांग्रेस की चंद्रिमा भट्टाचार्य भाजपा के सौरिंद्र मोहन से 42,000 वोटों से जीतीं. यानि ममता बनर्जी ने अपने सूबे में भाजपा को सेंधमारी नहीं करने दी है, पर आरएसएस की सक्रियता के चलते इस सीट पर भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा है. भाजपा का छलांग मारकर दूसरे नंबर पर आ जाना पश्चिम बंगाल में एक वैचारिक लड़ाई की शुरुआत मानी जा सकती है.

भाजपा को एक और बड़ा झटका झारखंड की लिट्टीपाड़ा सीट पर लगा जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के साइमन मराण्डी ने उसके उम्मीदवार हेमलाल मुर्मु को 12,743 वोटों से शिकस्त दी. अपनी पार्टी को जिताने मुख्यमंत्री रघुवर दास यहां तीन दिन डेरा डाले रहे थे. ये उपचुनाव किसी मुद्दे पर नहीं लड़े गए थे, इसलिए इन्हें मोदी मेजिक कहना एक कहने भर की बात है. स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशियों की छवि हार जीत में अहम रही, पर अटेर की हार जता गई कि भाजपा का जादू भी मुहावरा बन कर रह गया है. अपने गढ़ में मामूली मतों से ही सही मिली हार भाजपा को एक सबक है कि अब हालात उसके लिए पहले जैसे आसान नहीं रह गए हैं.

बेगम जान : विद्या बालन का दमदार अभिनय

2015 में प्रदर्शित व राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत फिल्मकार श्रीजित मुखर्जी की बंगला फिल्म ‘‘राजकहिनी’’ का हिंदी रीमेक है – बेगम जान. जिसका लेखन व निर्देशन श्रीजित मुखर्जी ने ही किया है. मगर हिंदी फिल्म ‘‘बेगम जान’’ के मुकाबले बंगला फिल्म ‘‘राज कहिनी’’ कई गुनाअच्छी फिल्म कही जाएगी. कड़वा सच यह है कि श्रीजित मुखर्जी ने अपनी ही बेहतरीन बंगला फिल्म का हिंदी रीमेक करते समय फिल्म के निर्माताद्वय महेश भट्ट व मुकेश भट्ट की सलाह पर चलते हुए फिल्म का सत्यानाश कर डाला.

यह फिल्म बंटवारे के दर्द की बनिस्बत भट्ट कैंप के अपने एजेंडे वाली फिल्म बन गयी है. भारत व पाकिस्तान के प्रादुर्भाव के वक्त के इतिहास की अनगिनत कथाएं हैं, जिनसे हर देशवासी वाकिफ नहीं है, मगर उन कहानियों को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करना भी फिल्मकार के लिए बड़ी चुनौती होती है. कम से कम ‘बेगम जान’ तो इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती है. फिल्म का मुद्दा तो इतिहास के पन्ने को सामने लाने के साथ ही बंटवारे की पीड़ा सिर्फ आम इंसान ही नहीं बल्कि कोठे वालियों को भी हुई थी, को रेखांकित करना होना चाहिए था, पर यह बात उभरकर नहीं आ पाती है. एक सशक्त कथानक शक्तिशाली रूपक बनने की बजाय बहुत ही ज्यादा सतही कहानी बन जाती है.

यदि श्रीजित मुखर्जी अपनी बंगला फिल्म की ही पटकथा पर अडिग रहते तो ‘‘बेगम जान’’ भी एक यादगार फिल्म बनती. मर्दों की दुनिया में औरत अपने दम पर जीना व मरना जानती है, यह बात भी उतनी प्रमुखता से उभर नहीं पाती, जितनी प्रमुखता के साथ उभरनी चाहिए थी. फिल्म में औरत के अस्तित्व को लेकर कुछ अच्छे सवाल जरुर उठाए गए हैं.

फिल्म शुरू होती है वर्तमान से. दिल्ली के कनाट पैलेस क्षेत्र से रात के वक्त गुजर रही बस में एक प्रेमी जोड़ा बैठा हुआ है. कुछ दूर चलने पर कई युवा लड़के बस में चढ़ते हैं और लड़की से झेड़झाड़ करने लगते हैं. बस बीच सड़क पर रुक जाती है. लड़की बस से उतर कर भागती है. कुछ लड़के उस लड़की के पीछे भागते हैं, आगे उन लड़कों के सामने एक बुढ़िया खड़ी हो जाती है, जिसके पीछे वह लड़की है. बुढ़िया उन लड़कोंके सामने अपने वस्त्र निकालती है. लड़के भाग जाते हैं.

उसके बाद फिल्म शुरू होती है 1947 की पृष्ठभूमि में. पंजाब के एक गांव से बाहर बने बेगम जान (विद्या बालन) के कोठे से. बेगम जान पर वहां के राजा (नसिरूद्दीन शाह) का वरदहस्त है. बेगम जान किसी से नहीं डरती. उनका अपना कानून है. स्थानीय पुलिस प्रशासन व स्थानीय पुलिस दरोगा श्याम (राजेश शर्मा) भी उससे कांपते हैं. बेगम जान के कोठे पर एक बूढ़ी अम्मा (इला अरूण) के अलावा रूबीना (गौहर खान),गुलाबो (पल्लवी  शारदा), जमीला (प्रियंका सेटिया), अंबा (रिद्धिमा तिवारी), मैना (फ्लोरा सैनी), लता (रवीजा चौहाण), रानी (पूनम राजपूत), शबनम (मिष्टी), लाड़ली (ग्रेसी गोस्वामी) लड़कियां कोठेवाली के रूप में रहती हैं. बेगम जान का दीवाना एक मास्टर हर शुक्रवार को कोठे पर उपहार लेकर आता है. उसने बेगम जान को बता रखा है कि वह एक राजनैतिक पार्टी से जुड़ा हुआ है और समाज सेवक है.

बेगम जान को लगता है कि मास्टर, गुलाबो पर लट्टू है और गुलाबो भी यही समझती है. कोठे पर सुरक्षा की जिम्मेदारी सलीम मिर्जा (सुमित निझवान) पर है, जो कि कभी पुलिस विभाग में था. इन कोठेवालियों का दल्ला सुजीत (पितोबाश त्रिपाठी) है.

अचानक एक दिन अंग्रेज शासक भारत को आजादी देने के साथ ही देशके बंटवारे का ऐलान कर देते हैं. यह आजादी इन कोठेवालियों के लिए भी त्रासदी बनकर आती है. फिल्म में आजादी व हिंदू मुस्लिम आदि पर व्यंग कसते हुए बेगम जान कहती हैं-‘‘एक तवायफ के लिए क्या आजादी…..लाइट बंद सब एक बराबर…’’. मुस्लिम लीग से जुड़े इलियास (रजित कपूर) और भारतीय कांग्रेस से जुड़े श्रीवास्तव (आशीष विद्यार्थी) को भारत पाक सीमा पर तार लगवाने की जिम्मेदारी दी जाती है. पता चलता है कि दो देशों की सीमा रेखा बेगम जान के कोठे के बीच से जाती है. इलियास व श्रीवास्तव पुलिस बल के साथ सरकारी फरमान लेकर बेगम जान के पास पहुंचते हैं कि वह इस जगह को खाली कर दें, बेगम जान कोठा खाली करने से मना कर देती है.

इलियास उन्हे एक माह का समय देकर वापस आ जाते हैं. बेगम जान पहले मास्टर से मदद मांगती है. मास्टर कहता है कि वह पार्टी आलाकमान से बात करेगा. पर एक दिन मास्टर बता देता है कि बेगम जान को कोठा खाली करना पड़ेगा. वह बेगम जान के सामने अपने साथ चलकर घर बसाने का प्रस्ताव रखता है. पर बेगम जान उसे झिड़क देतीहैं, तो मास्टर, गुलाबो को बेगम जान के खिलाफ यह कह कर कर देता है कि बेगम जान उनकी शादी के खिलाफ हैं. इधर बेगम जान, राजा जी से मदद मांगती हैं, पर वह भी मदद करने में खुद को असमर्थ पाते हैं.

उधर श्रीवास्तव, इलियास की इच्छा के विपरीत एक गुंडे कबीर (चंकी पांडे) से मदद मांगता है. पता चलता है कि मास्टर भी उससे मिला हुआ है. कबीर अपने गैंग के लड़कों से बेगम जान को खत्म कराने के लिए गंदी हरकत शुरू करता है. मास्टर, गुलाबो को शादी का झांसा देकर कोठे पर से भगाता है, पर कुछ दूर जाकर उसे दूसरों के हवाले यह कह कर देता है कि कोठे वाली का शौहर नहीं सिर्फ खरीददार होता है. गुलाबो कोपश्चाताप होता है, वह बाद में मास्टर की हत्या कर देती हैं. उधर बेगम जान दस वर्ष की लाड़ली को उसकी मां के साथ भागने पर मजबूर करती है. रास्ते में दरोगा श्याम मिल जाता है, तो लाड़ली उसके सामने अपने कपड़े उतार देती है, दरोगा को अपनी दस वर्ष की बेटी याद आती है और वह उन्हे बाइज्जत जाने के लिए राह देता है. इधर कोठे की कुछ लड़कियां कबीर के लड़कों से लड़ते हुए मारी जाती हैं. बेगम जान व चार लड़कियां, अम्मा के साथ ही जलते हुए कोठे के अंदर खुद को बंद कर जल जाती हैं.

फिल्म में कभी रजिया सुल्तान, तो कभी मीरा की प्रेम कहानी सुनाने वाली अम्मा अंत में पद्मावती के जौहर की कहानी सुनाती हैं. बेगम जान व उसके कोठे की लड़कियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार होता है,उससे इलियास परेशान हो जाता है, पर श्रीवास्तव खुश है.

फिल्म ‘‘बेगम जान’’ में सभी बेहतरीन कलाकार हैं. बेगम जान के किरदार में विद्या बालन ने बेहतरीन परफार्मेंस देने की कोशिश की है,यदि लेखक व पटकथा लेखक ने उनके किरदार को और अधिक दमदार बनाया होता, तो विद्या बालन उसे ज्यादा बेहतर ढंग से अंजाम दे पाती. फिल्म में नसिरूद्दीन शाह की प्रतिभा को जाया किया गया है. यह बात समझ से परे है कि नसिरूद्दीन शाह ने यह फिल्म क्या सोचकर की. कबीर के किरदार को चंकी पांडे ने जिस तरह से निभाया है, वह लंबे समय तक याद किया जाएगा. रजित कपूर के अलावा कोठे वाली के किरदार में हर अभिनेत्री ने अच्छा अभिनय किया है.

फिल्म की पटकथा की अपनी कुछ कमियां हैं. आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर के बीच जो संवाद है, वह महज दो धर्म ही नहीं बल्कि इंसानों में विभाजन को चौड़ा करने की ही बात करते हैं. फिल्मकार ने सारा दोष हिंदूओं पर मढ़ने का प्रयास किया है, अब यह जानबूझकर किया गया है या उस वक्त के इतिहास में इसका कोई साक्ष्य मौजूद है,इसका जवाब तो श्रीजित मुखर्जी और महेश भट्ट ही दे सकते हैं. जहां तक इतिहास की बात है, तो 1947 में देश का बंटवारा पश्चिमी पाकिस्तान,भारत और पूर्वी पाकिस्तान के रूप में हुआ था, फिल्म में इस बात का जिक्र नहीं है, फिल्म में भारत व पाकिस्तान की बात की गयी है.

फिल्म के क्लायमेक्स को देखकरयह बात दिमाग में आती है कि यदि फिल्मकार व पटकथा लेखक ने समझदारी से इस विषय को उठाया होता, तो फिल्म में यह बात बेहतर ढंग से उभरकर आ सकती थी कि आप लोगों को अपने जोखिम के साथ विभाजित कर सकते हैं, पर इससे आपको कोई स्थायी लाभ नहीं मिलने वाला. मगर यहां भी फिल्मकार पूर्णरूपेण असफल ही रहते हैं.

फिल्म के संवाद महज दमदार ही नही हैं, बल्कि समाज पर तमाचा भी जड़ते हैं. फिल्म कहीं कहीं श्याम बेनेगल की फिल्म ‘‘मंडी’’ की याद दिलाती है. फिल्म के कैमरामैन बधाई के पात्र हैं. फिल्म का गीत संगीत फिल्म के कथानक के साथ चलता है.

दो घंटे 15 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बेगम जान’’ का निर्माण‘‘विशेष फिल्मस’’ और ‘प्ले इंटरटेनमेंट’ ने किया है. लेखक व निर्देशक श्रीजित मुखर्जी, संवाद लेखक कौसर मुनीर, संगीतकार अनु मलिक व खय्याम, कैमरामैन गोपी भगत तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- विद्या बालन, नसिरूद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी, रजित कपूर, गौहर खान, रिद्धिमा तिवारी, इला अरूण, पल्लवी शारदा,प्रियंका सेटिया, फ्लोरा सैनी, रवीजा चौहाण, पूनम राजपूत, मिष्टी, ग्रेसी गोस्वामी, पितोबास त्रिपाठी, सुमित निझवान, चंकी पांडे, विवेक मुश्रान, राजेश शर्मा व अन्य.

सावधान : सुरक्षित नहीं बच्चे

देशभर में जिस समस्या को ले कर आएदिन चर्चा होती रहती है और चिंता जताई जाती है उसे ले कर भोपाल के अभिभावक लंबे वक्त तक दहशत से उबर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा. मार्च के महीने में एक के बाद एक 3 बड़े हादसे हुए जिन में मासूम बच्चियों को पुरुषों ने अपनी हवस का शिकार बनाया. ऐसे में शहर में हाहाकार मचना स्वाभाविक था. हालत यह थी कि मांएं अपनी बच्चियों को बारबार बेवजह अपने सीने से भींच रही थीं तो पिता उन्हें सख्ती से पकड़े थे. समानता बस इतनी थी कि मांबाप देनों किसी पर भरोसा नहीं कर रहे थे. चिडि़यों की तरह चहकने वाली बच्चियों को समझ ही नहीं आ रहा था कि क्यों मम्मीपापा एकाएक इतना लाड़प्यार जताते उन की निगरानी कर रहे हैं.

समस्या देशव्यापी है. कहीं कोई चिडि़या किसी गिद्ध का शिकार बनती है तो स्वभाविक तौर पर सभी का ध्यान सब से पहले अपनी बच्ची पर जाता है और लोग तरहतरह की आशंकाओं से घिर जाते हैं. बच्चियों के प्रति दुष्कर्म एक ऐसा अपराध है जिस से बचने का कोई तरीका कारगर नहीं होता है. कैसे सुलझेगी और क्या है समस्या, इसे समझने के लिए भोपाल के हालिया मामलों पर गौर करना जरूरी है कि वे किन हालात में और कैसे हुए.

किडजी स्कूल

भोपाल के कोलार इलाके का प्रतिष्ठित स्कूल है किडजी. किडजी में अपने बच्चों को दाखिला दिला कर मांबाप उन के भविष्य और सुरक्षा के प्रति निश्ंिचत हो जाते हैं. उस प्ले स्कूल की संचालिका हेमनी सिंह हैं. एक छोटी बच्ची के मांबाप ने उस का नर्सरी में 8 फरवरी को ही ऐडमिशन कराया था. इस बच्ची का बदला नाम परी है. परी जब स्कूल यूनिफौर्म पहन पहली दफा स्कूल गई तो मांबाप दोनों ने उसे लाड़ से निहारा. पर परी पर बुरी नजर लग गई थी हेमनी सिंह के पति अनुतोष प्रताप सिंह की, जो खुद एक ऐसी ही छोटी बच्ची का पिता है. 24 फरवरी को परी के पिता ने कोलार थाने में अनुतोष के खिलाफ परी के साथ दुष्कर्म किए जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई. परी के भविष्य, मांबाप की प्रतिष्ठा और कानूनी निर्देशों के चलते यहां पूरा विवरण नहीं दिया जा सकता पर परी के पिता की मानें तो परी दर्द होने की शिकायत कर रही थी.

परी एक पढ़ेलिखे और खुद को सभ्य समाज का नुमाइंदा व हिस्सा कहने वाले की हैवानियत का शिकार हुई है. अनुतोष प्रताप सिंह ने अपने रसूख और पहुंच के दम पर मामले को रफादफा करने और करवाने की कोशिश की. उस के एक आईपीएस अधिकारी से पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए पुलिस ने फौरन कोई कार्यवाही नहीं की. उलटे, थाने में उसे राजकीय अतिथियों जैसा ट्रीटमैंट दिया. इस कांड पर हल्ला मचा और अखबारबाजी हुई, तब कहीं जा कर पुलिस हरकत में आई. उसे ससम्मान हिरासत में लिया गया. शुरुआत में पुलिस यह कह कर आरोपी को बचाने की कोशिश करती रही कि जांच चल रही है, मैडिकल परीक्षण हो गया है, सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं लेकिन चूंकि आरोप साबित नहीं हुआ है, इसलिए आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की गई है. जब परी की मैडिकल जांच में दुष्कर्म की आधिकारिक पुष्टि हुई तो 28 फरवरी को पहली दफा पुलिस ने इस वहशी को यौनशोषण का आरोपी माना और उसे कोलार क्षेत्र के गिरधर परिसर स्थित किडजी प्ले स्कूल से गिरफ्तार किया.

परी के नाना ने मीडिया को बताया कि उन की नातिन के गुनहगार को महज इसलिए गिरफ्तार नहीं किया गया क्योंकि वह कोलार थाना प्रभारी गौरव सिंह बुंदेला का अच्छा दोस्त है. दबाव बढ़ता देख पुलिस विभाग को इस थाना प्रभारी को लाइन अटैच करना पड़ा. आरोपी को अदालत में संदेह का लाभ मिले, इस बात के भी पूरे इंतजाम पुलिस वालों ने किए. मसलन, एफआईआर में आरोपी की पहचान व्हाट्सऐप के जरिए करवाई गई. 3 साल की एक बच्ची मुमकिन है घबराहट या डर के चलते पहचान में गड़बड़ा जाए और दुष्कर्मी को कानूनी शिकंजे से बचने का मौका मिल जाए, इस के लिए पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी जिसे ले कर पुलिस विभाग और सरकार आम लोगों के निशाने पर हैं.

अवधपुरी स्कूल

भोपाल के ही अवधपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल का 56 वर्षीय शिक्षक मोहन सिंह पिछले 4 महीनों से एक 11 वर्षीय छात्रा बबली (बदला नाम) का शारीरिक शोषण कर रहा था. इस का खुलासा 15 मार्च को हुआ. बकौल बबली, उस के सर (मोहन सिंह) उसे बुलाते थे, फिर कान उमेठते थे और पीठ पर मारते थे. बबली ने यह बात मां को बताई थी पर उन्होंने यह कहते उस की बात पर ध्यान नहीं दिया कि वह पढ़ाई से जी चुराती होगी, इसलिए सर ऐसा करते हैं. बबली की मां मोहन सिंह के यहां नौकरानी थी, इसलिए उस ने कोई बात उन से नहीं की.

एक दिन सर ने बबली को अपने कमरे में झाड़ू लगाने के लिए बुलाया तो वह हैरान हुई कि जब इस काम के लिए मां हैं तो सर उसे क्यों बुला रहे हैं. वह तो पहले से ही उन्हें ले कर दहशत में थी. चूंकि मजबूरी थी, इसलिए वह डरतेडरते मोहन सिंह के कमरे में गई. पर साथ में एक सहेली को भी ले गई. लेकिन मोहन सिंह ने उस सहेली को भगा दिया. सहेली चली गई तो मोहन सिंह ने अपना वहशी रंग दिखाते हुए कमरा अंदर से बंद कर लिया और जबरदस्ती बबली के कपड़े उतार दिए. इस के पहले वह अपने कपड़े उतार चुका था. इस के बाद उस ने बबली को अपनी तरफ खींच लिया. इसी दौरान किसी ने दरवाजा खटखटाया तो मोहन सिंह ने बबली को धमकी दी कि किसी को कुछ बताया तो स्कूल से निकाल दूंगा. डरीसहमी बबली खामोश रही क्योंकि वह पढ़ना चाहती थी.

मां ने बात नहीं सुनी तो बबली ने बूआ को सारी बात बताई. उन्होंने भाभी को समझाया तो दोनों बबली को ले कर मोहन सिंह के घर गईं जो भांप चुका था कि पोल खुल चुकी है, इसलिए इन्हें देखते ही भाग गया. जब मामला उजागर हुआ तो पुलिस ने मोहन सिंह के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 376 और 342 के तहत मामला दर्ज कर लिया. 5 बच्चों के पिता मोहन सिंह की बड़ी बेटी की उम्र 30 साल है. अवधपुरी के प्राइमरी स्कूल में 15 बच्चियां पढ़ती हैं और 10 लड़के हैं. मोहन सिंह स्कूल का सर्वेसर्वा था. यह स्कूल 2 साल पहले शुरू हुआ है जिस में पढ़ने वाले छात्र गरीब घरों के हैं. बबली के पिता की मौत हो चुकी है और 7 भाईबहनों में यह छठे नंबर की है. मोहन सिंह का मैडिकल देररात हुआ जबकि बबली और उस की मां, बूआ दोपहर साढ़े 4 बजे से देररात तक अवधपुरी थाने में भूखीप्यासी बैठी रहीं. यानी पुलिस ने इस मामले में कोई गंभीरता नहीं दिखाई तो उस की मंशा पर सवालिया निशान लगना स्वभाविक है. दूसरी कक्षा में पढ़ रही छात्रा के साथ उस का शिक्षक अश्लील हरकतें करता था और दुष्कर्म भी किया, यह बात भी संवेदनशील पुलिस की निगाह में कतई नहीं थी.

शातिर दुष्कर्मी

15 मार्च के दिन एक और मासूम बच्ची, नाम आफिया, उम्र 6 वर्ष, ने फांसीं लगा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. आफिया की 3 बड़ी बहनों के मुताबिक, हादसे की शाम मम्मी सब्जी लेने बाजार गई थीं तब उस ने ऊपर कमरे में जा कर फांसी लगा ली. भोपाल के लालघाटी इलाके के नजदीक के गांव बरेला निवासी अफजल खान मंगलवारा इलाके में चिकन शौप चलते हैं. घर में उन की पत्नी और 4 बेटियां रहती हैं. एक 6 साल की बच्ची फांसी लगा कर जान दे सकती है, यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं थी. मौके पर पुलिस पहुंची तो कमरे में बहुत से कपड़े बिखरे पड़े थे. लोगों का यह शक सच निकला कि परी और बबली की तरह आफिया भी दुष्कर्म की शिकार हुई है और जुर्म छिपाने की गरज से उस की हत्या कर दी गई है.

शौर्ट पीएम रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट में जख्म हैं और उस के साथ प्राकृतिक व अप्राकृतिक कृत्य हुआ है. जाहिर है उस की मौत को खुदकुशी का रंग देने की कोशिश की गई थी जबकि 6 साल की बच्ची फांसी के फंदे की उतनी मजबूत गांठ नहीं लगा सकती जितनी की लगी हुई थी और दरवाजा खोल कर खुदकुशी नहीं करती. आफिया के मामले में भी पुलिस की कार्यप्रणाली लापरवाहीभरी और शक के दायरे में रही. 15 मार्च को पुलिस की तरफ से कहा गया कि संभवतया उस के साथ बलात्कार नहीं हुआ है क्योंकि उस के प्राइवेट पार्ट पर कोई जख्म नहीं था. 4 दिनों में रिपोर्ट बदल गई तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि मासूमों के असुरक्षित होने की बहुत सी वजहों में से एक, पुलिस की भूमिका भी है. 22 मार्च को पुलिस वालों ने साबित भी कर दिखाया कि इस अबोध ने खुदकुशी की थी. उस की हत्या नहीं की गई थी. और न ही किसी तरह का दुष्कर्म उस के साथ हुआ था.

इन तीनों मामलों से उजागर यह भी हुआ कि लड़कियां कहीं सुरक्षित नहीं हैं, किसी ब्रैंडेड स्कूल में भी नहीं, न ही सरकारी स्कूल में और उस जगह भी जो सुरक्षा की गारंटी माना जाता है यानी घर में. अबोध लड़कियां मुजरिमों के लिए सौफ्ट टारगेट होती हैं और हैरत की बात है कि अधिकांश दुष्कर्मी अधेड़ होते हैं और बच्ची अकसर इन के नजदीक होती हैं. इन्हें जरूरत एक अदद मौके की होती है जिस के लिए वे किसी इमारत को ज्यादा महफूज मानते हैं. खुले पार्क, सुनसान या फिर हाइवे पर बच्चियों के साथ दुष्कर्म के हादसे अपेक्षाकृत कम होते हैं. एकांत इस तरह के हादसों में एक बड़ा फैक्टर है तो जाहिर है भेडि़ए की तरह घात लगाए ये दुष्कर्मी काफी पहले अपने दिमाग में बलात्कार का नक्शा खींच चुके होते हैं.

जब भी एकांत मिलता है तब वे अपनी हवस पूरी कर डालते हैं. साफ यह भी दिख रहा है कि अबोध लड़कियों के दुष्कर्मियों को किसी श्रेणी में रखा जा सकता. वे सूटेडबूटेड सभ्य से ले कर गंवारजाहिल कहे और माने जाने वाले तक होते हैं. कुत्सित मानसिकता के स्तर पर इन में कोई फर्क नहीं किया जा सकता.

क्या करें

भोपाल के हादसों से स्पष्ट हुआ कि मांबाप ने सावधानियां भी रखीं और लापरवाहियां भी की. परी और बबली के उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि अगर बच्ची किसी शिक्षक या दूसरे पुरुष के बाबत शिकायत कर रही है तो उसे किसी भी शर्त पर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. भोपाल में मार्च के पूरे महीने इन मामलों की चर्चा रही पर कोई हल नहीं निकला. सारी बहस पुलिस की कार्यप्रणाली और दुष्कर्मियों की मानसिकता के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई. एक गृहिणी वंदना दवे की मानें तो वे 2 बेटियों की मां हैं और इन हादसों के बाद से व्यथित हैं. पर उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा. क्या सरकार सभी बच्चियों की हिफाजत की गारंटी ले सकती है, इस सवाल का जवाब भी शीशे की तरह साफ है कि नहीं ले सकती. इस मसले पर सरकार के भरोसे रहना व्यावहारिक नहीं है.

एक व्यवसायी रितु कालरा का कहना है कि बलात्कारियों को तुरंत फांसी पर चढ़ाया जाना जरूरी है जिस से दूसरे लोगों में खौफ पैदा हो और वे दुष्कृत्य करने से डरें. लेखिका विनीता राहुरकर इस बात से सहमति जताते कानूनी सख्ती पर जोर देती यूएई की मिसाल देती हैं कि वहां इस तरह के मामले न के बराबर होते हैं जबकि हमारे देश क्या, शहर में ही, यह आएदिन की बात हो चली है. कुछ महिलाओं ने पौर्न साइट्स के बढ़ते चलन को इस की वजह माना तो कइयों ने पुरुषों के कामुक स्वभाव को इस के लिए जिम्मेदार ठहराया. एक कठिनाई यह है कि अब एकल परिवारों के चलते कामकाजी मांबाप हमेशा चौबीसों घंटे बच्चों से चिपके नहीं रह सकते. इसी बात का फायदा दुष्कर्मी उठाते हैं. उन में और घात लगाए बैठे हिंसक शिकारियों में वाकई कोई फर्क नहीं होता, इसलिए रितु और विनीता की बात में दम है.

अगर अनुतोष प्रताप सिंह को अपराध साबित होने के 72 घंटों के अंदर फांसी दे दी गई होती तो क्या मोहन सिंह की हिम्मत बबली के  साथ दुष्कर्म करने की होती. हालांकि निर्णायक तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता पर संभावना इस बात की ज्यादा है कि हां, वह हिचकता. 3 साल की परी को क्यों अदालत ला कर बयान देना पड़े, यह बात भी विचारणीय है कि दुष्कर्म के ऐसे मामलों में मां के बयान ही काफी हों. क्या यह सभ्य समाज की निशानी है कि 3 साल की एक मासूम बच्ची, जो दुष्कर्म जैसे घृणित अपराध का शिकार हुई, को ही मुजरिमों की तरह अदालत में जाना पड़ा जहां वह दीनदुनिया से बेखबर, कागज की नाव से खेलते प्रतीकात्मक तौर पर यह बताती रही कि औरत की जिंदगी तो दुनिया में आने के बाद से ही कागज की नाव सरीखी होती है. पुरुष की कुत्सित मानसिकता का जरा सा प्रवाह ही उसे डुबो देने के लिए काफी है.

अपराधी को अपनी बात कहने, बचाव करने या सफाई का मौका ही न देना मुमकिन है कानूनन और मानव अधिकारों के तहत ज्यादती लगे पर यह हर्ज की बात नहीं. एकाध बेगुनाह फांसी चढ़ भी जाए तो बात ‘कोई बात नहीं’ की तर्ज पर हुई मानी जानी चाहिए. बजाय इस के कि बच्ची का बलात्कार होने के बाद ‘ऐसा तो होता रहता है’ कह कर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी हुई मान ली जाए. एक मासूम के प्रति यह विचार नहीं रखना चाहिए कि वह किसी बदले, प्रतिशोध या किसी तरह के लालच के लिए पुरुष को फंसाने की बात सोच पाएगी.

कमजोरी, धर्म और महिलाएं

लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं, इस का सीधा सा मतलब यह शाश्वत सत्य है कि औरतें शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर कमजोर हैं. भोपाल की महिलाएं मानने को तैयार नहीं और देश की अधिसंख्य महिलाएं भी इस बात से सहमत नहीं होंगी कि महिलाओं के प्रति असम्मान और अपमान की शाश्वत मानसिकता में धर्म का बड़ा हाथ है. औरतों को तरहतरह से बेइज्जत करने के मर्द के डीएनए धर्म की देन हैं. धर्म कहता है, स्त्री भोग्या है, पांव की जूती है, शूद्र है. फिर यही धर्म नारीपूजा का ढोंग करने लगता है. उसे देवी बताने लगता है. बात छोटी बच्चियों की करें तो नवरात्र के दिनों में घरघर में उन का पूजन होता है. उन्हें हलवापूरी खिलाया जाता है और उपहार व नकदी भी दी जाती है.

यह विरोधाभास देख लगता है कि बलि का बकरा तैयार किया जा रहा है. भोपाल के दुष्कर्म के मामलों के संदर्भ में यही धर्मशोषित महिलाएं चाहती हैं कि कृपया धर्म को बीच में न घसीटें, क्योंकि यह आस्था का विषय है. पारिवारिक, सामजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक वजहों से परे महिलाओं को अपनी दुर्दशा को धर्म के मद्देनजर भी देखना होगा, तभी बच्चियों की सुरक्षा को ले कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है. आस्था की दुहाई देने वाली महिलाएं खुद दोयम दरजे की जिंदगी जी रही हैं तो क्या खाक  वे बच्चियों की सुरक्षा पर ठोस कुछ बोल पाएंगी. असल दोष पुरुष की मानसिकता का है जो कानून या राजनीति से नहीं, बल्कि धर्म से होते हुए समाज में आई है.लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था और अब तकनीक होने के चलते कोख में ही उन की कब्र बना दी जाती है. इन बातों की धर्म के मद्देनजर खूब आलोचना हुई कि लोग लड़का इसलिए चाहते हैं कि वह तारता है. अब बारी यह सोचने की  है कि अब कहीं ऐसा इसलिए तो नहीं किया जा रहा कि मांबाप में यह डर बैठ गया हो कि जब वे बच्ची को सुरक्षित नहीं रख सकते तो उसे दुनिया में क्यों लाएं.

औरतें शिक्षित तो हुई हैं पर पर्याप्त जागरूक नहीं हो पाई हैं. अपने अधिकारों की उन की लड़ाई 8 मार्च के दिन ही शबाब पर होती है. वह भी शोपीस जैसी ही. न तो वे स्वाभिमानी हो पाई हैं और न ही आत्मनिर्भर हो गई हैं. भोपाल के हादसों को ले कर कोई धरनाप्रदर्शन नहीं हुआ. खुद को मुख्यधारा में मानने वाली महिलाएं क्लबों और किटी पार्टी में व्यस्त रहीं. ऐसे में इन से क्या उम्मीद की जाए, सिवा इस के कि उन्हें इस समस्या से कोई सरोकार नहीं. बच्चियां इस सांचे में इस लिहाज से फिट बैठती हैं कि उन्हें हिफाजत देने वाला पुरुष खुद बागड़ बन कर खेत को खा रहा है और कानून के नाम पर हायहाय मचाई जाती है जो आंशिक तौर पर सच भी है. पुरुष की सामंती और उद्दंड मानसिकता का धर्म के आगे नतमस्तक होना, मासूम बच्चियों को वासना की खाई में ढकेलने जैसी ही बात है.

कैसे हो हिफाजत

क्या मासूमों को हवस के इन शिकारियों से बचाया जा सकता है, यह सवाल बेहद गंभीर है जिस का जवाब यह निकलता है कि नहीं, आप कुछ भी कर लें, पूरे तौर पर बच्चियों को इन से बचाया नहीं जा सकता. यह निष्कर्ष जाहिर है बेहद निराशाजनक है. पर ऐसे हादसों की संख्या कम की जा सकती है, इस के लिए इन टिप्स को ध्यान में रखना चाहिए :

–       बच्ची को अकेला कभी न छोड़ें.

–       किसी परिचित या अपरिचित पर कतई भरोसा न करें.

–       स्कूल में वक्तवक्त पर जा कर बच्ची की निगरानी करें.

–       बच्ची भयभीत या गुमसुम दिखे तो तुरंत उसे भरोसे में ले कर प्यार से उसे टटोलने की कोशिश करें कि माजरा क्या है. ऐसी हालत में उस के प्राइवेट पार्ट देखे जाना भी हर्ज की बात नहीं.

–       चाचा ने भतीजी से या मामा ने किया भांजी का बलात्कार, जैसी हिला देने वाली खबरें अब बेहद आम हैं. जिन के चलते नजदीकी रिश्तेदारों पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है कि कहीं उन की निगाह बच्ची पर तो नहीं. उन की बौडी लैंग्वेज और हरकतें देख अंदाजा लगाया जा सकता है कि कहीं इस तरह का कोई कीड़ा उन के दिमाग में तो नहीं कुलबुला रहा.

–       उसे अकेला न खेलने दें, निगरानी करते रहें, अंधेरा होने के बाद घर से बाहर न जाने दें, जैसी सावधानियों के साथ अहम बात यह है कि स्कूल में उस की 6-8 घंटे की जिंदगी है. इसलिए स्कूल चाहे प्राइवेट हो या सरकारी, यह जरूर सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वहां महिला कर्मचारियों की संख्या ज्यादा हो और इमारत में हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हों.

–       स्कूल बस के कंडक्टर और ड्राइवरों की इस लिहाज से निगरानी करते रहना चाहिए कि इन्हें लड़कियों के प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ करने का पूरा मौका मिलता है. अब जरूरत महसूस होने लगी है कि लड़कियां जिस वाहन में जाएं उस में एक महिला कर्मचारी की नियुक्ति अनिवार्य हो.

–       लड़की को अगर होस्टल या झूलाघर में छोड़ना पड़े, तो उस की सतत निगरानी जरूरी है. बीते दिनों एक वीडियो वायरल हुआ था जिस में होस्टल या अनाथाश्रम में एक महिला एक छोटी बच्ची को जानवरों की तरह पीट रही थी. यह किस देश की घटना है, वीडियो से स्पष्ट नहीं है पर महिला बेहद व्याभिचारी भी है, यह भी दिखता है कि परपीड़न में उसे सुख मिलता है.

इन का कहना है

आज इस बात की जरूरत महसूस होने लगी है कि कम आयुवर्ग की बालिकाओं के साथ किए गए दुष्कर्म के आरोपी को फांसी की सजा दे कर भयोपरक सिद्धांत (डिटरैंस थ्योरी औफ पनिशमैंट) द्वारा भविष्य की घटनाओं को रोका जाए, जिस से मासूम बच्चियों की रक्षा की जा सके.

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 बलात्कार (कुकर्म) को परिभाषित करती है व विभिन्न धाराएं दोषी के कृत्य के अनुसार सजा का प्रावधान करती हैं. 15 वर्ष से कम उम्र की स्त्री के साथ पति द्वारा लैंगिक संबंध को भी दंडनीय अपराध माना गया है. पर कल्पना से परे विकसित हो रही सभ्यता में ऐसे दानव भी होंगे जो अबोध व मासूम बच्चियों के साथ ऐसा कुकर्म करेंगे जिस से समूची मानवता ही शर्मसार हो जाए. इन्हें फांसी की सजा दिया जाना ही उचित है.

डा. मयूरशिखा अग्रवाल, वरिष्ठ प्राध्यापक (विधि), भोपाल

छोटे बच्चों से सैक्स की इच्छा रखना एक मानसिक विकृति है. ऐसे लोगों को मनोविज्ञान की भाषा में पैडोफिल कहा जाता है. इन विकृत लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है और वे सैक्स की अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाते तो बच्चों को निशाना बनाते हैं. ये नजदीकी भी हो सकते हैं, जिन की पहचान करना अभिभावकों को आसान नहीं होता. अभिभावकों को बच्चों को बताना चाहिए कि गुड और बैड टच में फर्क क्या है. जिस से वे आरोपी की मंशा समझ सकें. अलावा इस के, सैक्स एजुकेशन बच्चों को दी जानी बेहद जरूरी है. इस काम को मांबाप ही बेहतर तरीके से कर सकते हैं.

डा. विनय मिश्रा, मनोचिकित्सक, भोपाल

हमारी संस्था में बच्चों से दुष्कृत्य के औसतन 6 मामले हर महीने आते हैं. इन में से भी अधिकतर वे होते हैं जो पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखाते. ऐसी लड़कियों की काउंसलिंग कर उन के मन में बैठी दहशत दूर करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है. अधिकांश मामलों में आरोपी कोई नजदीकी रिश्तेदार ही होता है. जिस पर सपने में भी बच्ची के अभिभावक शक नहीं कर पाते हैं.

आमतौर पर मध्यवर्गीय लोग ही अपनी प्रतिष्ठा की खातिर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते. प्रताडि़त और पीडि़त लड़कियां बेहद डरी हुई रहती हैं. हम अभिभावकों को चाइल्ड केयर से संबंधित मनोवैज्ञानिक पहलू के अलावा कानूनी जानकारी भी देते हैं. ऐसी लड़कियों को सदमे से उबरने में सालोंसाल भी लग सकते हैं. अब तो हैरानी की बात है कि छोटे लड़कों के भी यौनशोषण के मामले सामने आने लगे हैं.

डा. प्रीति माथुर, मनोविशेषज्ञ

योगी का मिशन

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गृहप्रवेश करते समय उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री निवास में शुद्धिकरण हवन कराया और वास्तुदोष निकलवाए. देश की जनता के बड़े हिस्से को, पिछले 50 सालों में, जम कर वास्तुशास्त्र बेचा गया है और इस में वैज्ञानिकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों तक को नहीं छोड़ा गया, आम धार्मिक कर्मकांडों के बीच पलेबड़े लोगों का तो कहना ही क्या. धर्म का धंधा अब जम कर फूलेफलेगा, इस में संदेह नहीं है.

लेकिन, इस बारे में शिकायत करने की बड़ी गुंजाइश नहीं है. धर्मों ने दुनियाभर में एक बार फिर मानसिक लड़ाई जीत ली है. मुसलिम देश तो ‘घर फूंक तमाशा देख’ कर खुश हो रहे हैं. उन के लिए धर्म बंदूकों की गोलियों और बमों के धमाकों से ही स्थापित होता है. मुसलिम अरब देशों के लाखों घरों में मुसलमान ही मौत का संदेश पहुंचा चुके हैं. और साथसाथ वे यूरोप व अमेरिका में घुसपैठ भी कर रहे हैं.

अमेरिका और यूरोप में धर्म की फौज का मुकाबला करने के लिए जो जनमत तैयार हो रहा है, उस का नेतृत्व ईसाई चर्च कर रहा है. तार्किकता, व्यावहारिकता, दूरगामी सोच छोड़ कर धर्म की सत्ता को नमन पूरे यूरोप और अमेरिका में किया जा रहा है तो भारत कैसे पीछे रह सकता है जहां धर्मजनित वर्र्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, रीतिरिवाज, अनुष्ठान, हवन, पूजापाठ, उत्सव, आयुर्वेद आदि जिंदगी का हिस्सा हमेशा ही बने रहे हैं. भारत के जिन राज्यों में कम्युनिस्टों ने लंबे समय तक सरकारें चलाईं वहां भी धर्म का प्रचारप्रसार कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही है.

उत्तर प्रदेश में पहले मुख्यमंत्री भी ऐसा कर चुके हैं. फर्क इतना है कि वे सफेद खादी पहनते थे. धर्म के बारे में उन की भी मानसिक गुलामी इसी तरह की थी. विकास की बातें तो हमेशा ही दूसरे दरजे पर रही हैं. लोगों को सुख न राम या शिव मंदिर बनाने से मिलता है, न अंबेडकर स्मारक. लोगों को जिस से सुख मिलता है वह कुछ और ही है और चाहे सरकारें वैज्ञानिक अधार्मिक सोच से पैदा हुई तकनीक के कारण उस को उपलब्ध करा भी देती हों, लेकिन फिर भी वे ढिंढोरा अपने धार्मिक क्रियाकलापों का करती रही हैं.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर जो लोग आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि इस देश के अधिकांश मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री इसी मिट्टी के बने हैं. उत्तर प्रदेश का कुछ बनेगा या बिगड़ेगा, तो यहां के लोगों की मेहनत से ही. इस का तो पहले के मुख्यमंत्री भी कोई रास्ता तैयार नहीं कर रहे थे. नए करें या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता.

देश की जनता को अपने लिखे भाग्य पर इतना अंधा भरोसा है कि वह किसी भी नेता को दोष देने को तैयार ही नहीं हैं. तभी तो हारे हुए नेता पार्टियों पर कब्जा जमाए रखते हैं और जिन की उम्मीद नहीं होती, वे मंत्री, मुख्यमंत्री बन जाते हैं.

 

इन्हें भी आजमाइए

– ट्रेन की लंबी यात्रा कर रहे हैं तो मौका मिले तो ट्रेन में ही कुछ समय आसपास टहल कर अपने पैरों की कसरत जरूर कर लें, इस से शरीर का रक्तप्रवाह संतुलित रहेगा. यदि सीट से उठ नहीं पाते तो बैठेबैठे थोड़ेथोड़े समय बाद पैरों को आगेपीछे हिलाते रहें ताकि पैर सक्रिय रहें. ऐसे में जब आप काफी देर बाद उठेंगे तो आप को ज्यादा तकलीफ नहीं होगी.

– हवाईजहाज में सफर करते समय अनकुक्ड फूड, जिन में सलाद, कटे फल, मेयोनीज आदि पदार्थ होते हैं तथा जिन से फूड पौइजनिंग या इंफैक्शन हो सकता है, से परहेज करें. थोड़ीथोड़ी देर में ताजे पके भोजन की थोड़ीथोड़ी मात्रा लेते रहें.

– ट्रेन यात्रा करते समय अपने साथ छुट्टे पैसे जरूर रखें. आप को सफर में बहुत सारे सामान, जैसे चाय, कौफी, समोसा, नमकीन   आदि बेचने वाले मिलेंगे, अगर आप छुट्टे पैसे रखेंगे तो सामान खरीदने में आसानी होगी.

– अगर आप मानसून में किसी दूसरे शहर घूमने जा रहे हैं तो कुछ विशेष चीजें जैसे उस शहर का मानचित्र, बरसाती, छतरी, टौर्च, कुछ दवाइयां जैसे पेट, सिरदर्द आदि की अपने पास जरूर रखें.

– यात्रा के दौरान मिनरल वाटर ही पीएं. तरल पदार्थ कम ही लें. भुनी हुई नमकीन या भेलपूरी जैसे ड्राई फूड ही लें तो अच्छा.

ऐसा भी होता है

मेरी कालोनी में घरों के बाहर सड़क पर झाड़ू लगाने और नाली साफ करने के लिए एक महिला व उस का पति आता था. कभीकभी उन के साथ 2 बच्चे भी आते थे. एक दिन दोपहर को मेरे घर की घंटी बजी. देखा, दोनों बच्चे खड़े थे, ‘‘आंटी, कुछ खाना दे दीजिए.’’ मैं ने उन्हें मना कर दिया, तभी पड़ोस की महिला निकली और उन्हें बुला कर खाने का सामान दिया. मैं ने उन्हें मना किया कि इस तरह से खाने का सामान दे कर इन की आदत मत खराब कीजिए. पर उन पर तो दानधर्म का भूत सवार था, वे मानी नहीं. अन्य परिवार वाले भी देखादेखी खाना दे देते थे. एक दिन दोपहर को बड़ा होहल्ला मचा. उन बच्चों के मातापिता बाहर खड़े खूब चिल्ला रहे थे कि हमारे बच्चों को आप लोगों ने कल कैसा खाना दिया कि कल से दोनों को खून के उलटीदस्त लगे हुए हैं, अस्पताल में पड़े हैं दोनों. उन के चिल्लाने से सब घबरा गए.

वे लोग बच्चों के इलाज के लिए पैसा मांग रहे थे. आखिरकार, उन परिवारों ने एक हजार रुपए एकत्रित कर के उन्हें दिए वरना वे पुलिस के पास जाने की धमकी दे रहे थे.

उन के जाने के बाद सब पड़ोस की महिलाएं मेरे पास आईं और बोलीं, ‘‘हम लोगों ने तो उन्हें कुछ भी ऐसा खाने को नहीं दिया था जो बासी हो या खराब हो, हम सच कहते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं ने आप को चेताया था, पता नहीं बच्चे बीमार भी थे या नहीं? किसे पता? क्या पता वे झूठ बोल रहे हों? उन को तो पैसे ऐंठने थे, पैसे ले कर चले गए.’’ उस दिन के बाद वे बच्चे और वे पतिपत्नी कालोनी में कहीं नहीं दिखे.

अनीता सक्सेना

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रिश्ते में मेरी एक जेठानी हैं जो काफी रईस परिवार से हैं. उन्होंने कान में सौलिटियर (महंगे हीरे) के टौप्स पहन रखे थे. एक बार वे वाशबेसिन पर मुंह धो रही थीं कि एक कान का टौप्स निकल कर वाशबेसिन में गिर गया और नाली में चला गया. जब उन्होंने अपने पति को बताया तो वे मानने को तैयार ही नहीं थे कि बेसिन के छोटे छेद से टौप्स अंदर चला गया. मगर जेठानीजी अपनी बात पर अड़ी हुई थीं. आखिर में वे अपने पति को वाशबेसिन के पास ले गईं और दूसरा टौप्स भी गिरा दिया कि देखो, ऐसे बेसिन में चला गया. यह हरकत देख उन के पति हक्काबक्का रह गए.     

मंजू ‘रमा’

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