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आपको भी मिल सकता है इनकम टैक्स का नोटिस

करदाताओं के लिए आयकर नोटिस एक बुरे सपने के समान होता है, खासकर उन लोगों के लिए जो आयकर की गणना में ब्याज की आय को शामिल करना भूल गए हों. हाल ही में आयकर विभाग ने 7 लाख पत्र उन लोगों को जारी किए हैं जिन्होंने बिना पैन दिए अधिक मूल्य के लेन-देन किए थे.

क्या आप जानते हैं कि किन कारणों से आयकर विभाग आपके खिलाफ नोटिस जारी कर सकती है? आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि वे कौन से कारण हैं जिनके चलते, आपके खिलाफ आयकर विभाग का नोटिस जारी हो सकता है.

आयकर फाइल न करना

कोई व्यक्ति जिसकी आय 2,50,000 से अधिक है उसे निर्धारित समय से पूर्व अपने रिटर्न दाखिल करना चाहिए. ध्यान रहे कि यदि नियोक्ता या बैंक द्वारा स्रोत पर ही आयकर काट लिया गया हो तो भी व्यक्ति को आयकर रिटर्न भरना ही चाहिए. अगर आपकी आय कर योग्य रही है और हाल के वर्षों में वे आप आयकर रिटर्न भरना भूल गए हैं, तो आपको आयकर विभाग से सूचना जारी हो सकती है. आयकर रिटर्न तब भी भरना चाहिए जबकि आपकी कर योग्य आय न भी हो क्योंकि यह लोन लेते समय या वीजा के लिए आवश्यक होता है.

स्रोत पर काटे आयकर से मिलान न होना

अगर स्रोत पर काटे आयकर तथा जमा आयकर मेल नहीं खाते तो भी आपको इस कारण से आयकर विभाग से नोटिस मिल सकती है. टैक्स रिटर्न दाखिल करने से पूर्व करदाता को 26एएस फॉर्म को जाँच लेना चाहिए जिसमें सभी स्रोत पर काटे आयकर उद्धत रहते हैं.

रिटर्न में गड़बड़ी

अगर आपके रिटर्न में कोई गड़बड़ी मिलती है तो इस कारण से भी आपको आयकर विभाग का नोटिस मिल सकता है. गड़बड़ियाँ तब हो सकती हैं जब कि

–       कुछ आय जैसे कि एफडी की आय को न दर्शाया जाए.

–       किसी गलत सेक्शन के तहत छूट प्राप्त करना और

–       दी गई जानकारी पूरी न होना.

त्रुटिपूर्ण आयकर रिटर्न

अगर आपके आयकर रिटर्न में कोई त्रुटि होती है तो आयकर विभाग त्रुटिपूर्ण रिटर्न की सूचना आपको भेजता है. आयकर रिटर्न को त्रुटिपूर्ण तब माना जाता है जब रिटर्न या किसी भाग की जानकारी अधूरी या तर्कसंगत न हो या अन्य किसी कारण से भी.

परिवार के नाम पर निवेश

कई निवेशक पारिवारिक सदस्यों जैसे कि पत्नी, बच्चों या माता-पिता के नाम पर संपत्ति खरीदते हैं और इस प्रकार के निवेश को आय में घोषित करना भूल जाते हैं. इस प्रकार के निवेशों से होने वाली आय को आयकर रिटर्न भरते समय अवश्य घोषित करना चाहिए अथवा आयकर विभाग का नोटिस मिल सकता है.

उच्च मूल्य के लेन-देन

तय सीमा से अधिक किसी भी प्रकार के उच्च मूल्य के लेन-देन और नकद प्राप्ति को नियमानुसार आयकर विभाग को सूचित किया जाता है. लेन-देन में नकद प्राप्ति या निकासी, शेयर की खरीददारी, अचल संपत्ति, सावधि जमा, म्यूचुअल फण्ड और विदेशी मुद्रा की बिक्री शामिल है.

दस्तावेज रखना

समय-समय पर आयकर विभाग आपको आयकर रिटर्न से सम्बन्धित दस्तावोज़ों को दाखिल करने के लिए कह सकता है. अगर आपने निवेश पर अधिक अधिक दर से छूट हासिल की है तो आयकर विभाग आपसे दस्तावेज और निवेश के सबूत मांग सकता है.

अब हैकर्स नहीं पहुंच सकेंगे आपके फोन तक

अब रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्‍सा बन चुका है. आज इन फोन्‍स का उपयोग शॉपिंग, फूड ऑर्डर करने, कैब बुक करने, मूवी टिकट खरीदने आदि कई बहुत जरूरी कामों और पेमेंट्स करने में करते हैं. यही वजह है कि अब आपके स्‍मार्टफोन में क्रेडिट कार्ड डिटेल और पासवर्ड्स जैसी कई महत्‍वपूर्ण सूचनाएं रहती हैं.

ये बात तो आपको बताने की जरुरत नहीं है कि बहुत सी आवश्‍यक सूचनाएं फोन में होने की वजह से इसकी सुरक्षा काफी जरूरी होती है. हालांकि फोन में सिक्‍योरिटी के लिए कई इन‍-बिल्‍ट फीचर्स होते हैं, लेकिन फिर भी आपका फोन पूरी तरह से हैक प्रूफ नहीं होता है.

आज हम आपको बताएंगें कुछ ऐसे सिक्‍योरिटी टिप्‍स, जिनसे आप अपने फोन को हैकर्स से काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं.

फोन की स्‍क्रीन को पिन या पासवर्ड से सुरक्षित रखें

अपने फोन को हमेशा पिन या पासवर्ड से सुरक्षित रखें. यह काफी ज्‍यादा सुरक्षात्‍मक तरीका होता है. अगर आपको पासवर्ड याद रखने में मुश्किल होती है तो आप पैटर्न लॉक का उपयोग भी कर सकते हैं.

लॉक ऐप्‍स का उपयोग करें

केवल पासवर्ड का उपयोग करना ही काफी नहीं होता है. आपको कुछ खास ऐप्‍स को भी लॉक करना चाहिए. मसलन मोबाइल वॉलेट्स और ऑनलाइन शॉपिंग ऐप्‍स को हमेशा लॉक करके रखना चाहिए. कई स्‍मार्टफोन्‍स में बिल्‍ट-इन लॉक सिस्‍टम भी होता है. गूगल प्‍ले स्‍टोर पर भी आपको इस प्रकार के ऐप लॉकर डाउनलोड करने के लिए मिल जाएंगे.

हमेशा ट्रस्‍टेड सोर्स से ऐप्‍स डाउनलोड करें

अपने फोन के लिए हमेशा भरोसेमंद सोर्स, जिसे ट्रस्‍टेड सोर्स भी कहते हैं, से ही ऐप्‍स डाउनलोड करना चाहिए. लेकिन किसी भी ऐप को डाउनलोड करने के पहले रिव्‍यू और प्राइवेसी पॉलिसी जरूर पढ़ि‍ए.

ऐप डाउनलोड करने से पहले परमिशन पढ़ि‍ए

इस बात का हमेशा ध्‍यान रखिए कि गूगल प्‍ले स्‍टोर से किसी भी ऐप को डाउनलोड करने से पहले उसके बारे में सारी जानकारी हासिल कर लें. मसलन कोई ऐप आपके फोन के किन्हीं भी फंक्‍शंस और जानकारी को एक्‍सेस करेगा. इसे उदाहरण से भी समझा जा सकता है. अगर आप कोई पेमेंट ऐप डाउनलोड करेंगे तो वह आपके फोन का कैमरा, एड्रेस बुक, एसएमएस और मोबाइल डेटा को एक्‍सेस करने की परमिशन मांगेगा.

एंड्रॉयड डिवाइस मैनेजर डाउनलोड करें

एंड्रॉयड डिवाइस मैनेजर, गूगल का काफी उपयोगी ऐप है. अगर कभी दुर्भाग्‍यवश आपका फोन खो जाता है तो आप इस ऐप के जरिए उसकी लोकेशन के बारे में पता कर सकते हैं. यदि किसी कारणवश आपका फोन वापस हासिल नहीं किया जा सकता है तो आप अपने कम्‍प्‍यूटर पर बैठै-बैठे ही उसे फैक्‍टरी मोड पर रीसेट कर सकते हैं.

गूगल अथेंटिकेटर होना चाहिए

फोन की एक्‍स्‍ट्रा सुरक्षा के लिए आपके पास गूगल अथेंटिकेटर होना चाहिए. गूगल का यह ऐप आपको टू-फैक्‍टर अथेंटिकेशन की सुविधा उपलब्‍ध कराता है. खास बात यह है कि ये ऐप नॉन-गूगल सर्विस तथा ऑफलाइन भी काम करता है.

एंटीवायरस ऐप्स

अपने फोन पर एंटीवायरस ऐप जरूर डाउनलोड करिए. यह आपके फोन और उसमें मौजूद डेटा की सुरक्षा के लिए अतिआवश्‍यक है.

पब्लिक वाईफाई का उपयोग करने से बचें

जहां तक हो सके, आपको सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क का उपयोग करने से बचना चाहिए. ऐसे नेटवर्क कभी भी शत प्रतिशत सुरक्षित नहीं होते हैं. यह भी सुनिश्चित करें कि आपका फोन किसी भी वाईफाई नेटवर्क पर खुद ब खुद कनेक्‍ट न हो जाए. इसलिए आवश्‍यकता न होने पर अपने फोन के वाईफाई का स्विच बंद ही रखें.

फेसबुक पर इन अनजान लड़कियों से रहें सावधान

फेसबुक पर अक्सर यूजर्स को कभी न कभी अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट आती ही रहती हैं. ऐसे में आमतौर पर लड़के खूबसूरत लड़कियों की फ्रेंड रिक्वेस्ट तुरंत ही एक्सेप्ट कर लेते हैं. पर यह जल्दबाजी उन्हें भारी मुश्किल में डाल सकती है. जी हां, आप यह जानकर और भी चौंक जाएंगे कि इसके तार अफ्रीका के छोटे से देश मोरक्को से जुड़े हुए हैं. गौरतलब है, कि मोरक्को में रहने वाली एक दो नहीं, बल्कि कई ऐसी गैंग सक्रिय हैं, जो फेसबुक के जरिए अब तक हजारों लोगों को ब्लैकमेल कर चुकी हैं.

वैसे आपको बता दे कि ब्रिटिश बेस्ड मीडिया के मुताबिक मोरक्को की ओएड जेम सिटी की लगभग एक तिहाई आबादी इस काम में सक्रिय है. यहां तक कि इसके लिए बकायदा यहां की लड़कियां यूट्यूब से अंग्रेजी भी सीख रही हैं, ताकि वे लड़कों से बात कर सकें. वही ब्रिटिश न्यूजपेपर द सन के, एक रिपोर्टर ने यहां आकर रिपोर्टिंग की और पूरे मामले का खुलासा किया. गौरतलब है, कि रिपोर्टर ने इसके लिए कई ब्लैकमेलर्स से भी बात की. तब उन्हें पता चला कि अब तक सैकड़ों लड़कें इस जाल में फंस चुके हैं. इसके इलावा धोखाधड़ी का सबसे ज्यादा शिकार होने वाले लड़के ब्रिटेन के हैं, जो खूबसूरत लड़कियों के चक्कर में आसानी से फंस गए.

वैसे इसके साथ ही आपको बता दे कि इस ब्लैकमेलिंग की पूरी प्रक्रिया शुरू कैसे होती है. इसमें सबसे पहले अमीर लड़कों या शादीशुदा पुरुषों की प्रोफाइल चेक की जाती है. फिर पूरी डिटेल बहुत अच्छे तरीके से खंगालने के बाद खूबसूरत लड़की उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजती है. अब फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के बाद लड़की उससे इमोशनल बातें करनी शुरू कर देती है. बस ये सिलसिला कई दिनों तक चलता है, जिससे लड़के को यकीन हो जाए कि लड़की उससे सच्चा प्यार करने लगी है.

बस इस तरह बात वेबकैम तक पहुंच जाती है. ऐसे में वेबकैम के जरिए ऑनलाइन सेक्स यानि अपने न्यूड शरीर दिखाने की प्रोसेस भी शुरू हो जाती है. इतना ही नहीं इसके इलावा अक्सर पुरुष लड़कियों पर पैसे भी खर्च करने लगते हैं. यहां तक कि उससे मिलने भी आ पहुंचते हैं. इसके बाद वैबकैम के सेक्स वीडियो के इलावा फिजिकल रिलेशन बनाने तक के सारे वीडियो कलेक्ट कर लिए जाते हैं. गौरतलब है, कि आमतौर पर इसके लिए शादी शुदा और बुजुर्ग पुरुष ही चुने जाते हैं. जो अपनी शादी टूटने या बदनामी के डर से ब्लैकमेलर्स के चक्कर में फंस जाते हैं.

इसके साथ ही रिपोर्टर को यह जानकारी भी मिली है, कि ब्रिटेन में एक शादी शुदा व्यक्ति ने तो ब्लैकमेलिंग से तंग आकर फांसी तक लगा ली थी. मोरक्को की ओऐड जेम सिटी की आबादी करीब 90 हजार है. इनमें से तकरीबन 3 हजार ब्लैकमेलर्स हैं. जिनमें लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है. पिछले साल यहां ब्लैकमेलिंग के आरोप में 360 लोगों को अरेस्ट किया गया था. जिनमें से कईयों के खिलाफ तो आरोप साबित भी हो चुके हैं. जब रिपोर्टर ने एक ब्लैकमेलर से बात की, तो पता चला कि पहले गल्फ कंट्री के लोगों को टार्गेट बनाया जाता था.

वो इसलिए क्योंकि शौकीन अमीर शेख जल्द ही इनके चंगुल में फंस जाते थे. मगर ब्लैकमेलिंग का खुलासा होने के बाद ब्लैकमेलर्स ने ब्रिटिश और अमेरिकन युवकों को टार्गेट करना शुरू कर दिया. इसके लिए यहां लड़कियों को इंग्लिश कोचिंग के लिए भी भेजा जाता है. जिससे वे आसानी से युवकों से बात कर सकें. वैसे आपको जानकार हैरानी होगी कि कुछ ब्लैकमेलर्स लड़कियों के इंग्लिश सीखने का खर्च भी खुद उठाते हैं. इसके साथ ही 19 साल के हम्जा डांजर (बदला हुआ नाम) नाम के एक ब्लैकमेलर ने बताया कि उसकी गैंग में चार लड़के और उनकी गर्लफ्रेंड्स हैं.

ऐसे में बैठे बिठाए पैसा कमाने का यह आइडिया उन्हें बहुत पसंद आया. यहां तक कि पिछले दो सालों से वे अब तक कई लोगों को ब्लैकमेल करके लाखों रुपए कमा चुके हैं. हम्जा ने बताया कि कई युवक तो लड़कियों से मिलने मोरक्को भी आ पहुंचे थे. इसके बाद इनके सेक्स वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया गया. वहीं कई युवक तो वेबकैम में न्यूड बॉडी दिखाने से ही ब्लैकमेलर्स के चक्कर में फंस चुके हैं. हम्जा ने पहले सायबर कैफे शुरू किया. इसके लिए करीब दो लाख रुपए की कम्प्यूटर किट खरीदी.

हम्जा ने सबसे पहले पोर्नस्टार डायना पीरेज सोसा के हॉट फोटोग्राफ्स का यूज करके एक फेक फेसबुक आईडी बनाई थी. फिर इस पर धड़ाधड़ फ्रेंड रिक्वेस्ट आने और रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के बाद हम्जा ने पूरी गैंग ही बना ली. वही रिपोर्टर के मुताबिक, गैंग पहले ऐसे यंगस्टर्स को ही तलाशती है, जो रिच हैं और फेसबुक पर फैमिली मेंबर्स के साथ जुड़े हुए हैं. फिर फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के बाद उन्हें स्काइपी वीडियो चेटिंग सेशन के लिए इन्वाइट किया जाता है.

इसके बाद ब्लैकमेलर ने बताया कि बिना पैसे की डिमांड पर ही व्यक्ति को पहले किसी न किसी पोर्न स्टार के सिंगल लाइव वीडियो दिखाए जाते थे. जिससे सामने वाला व्यक्ति फैंटेसी में पहुंच जाता था. इसके बाद लड़की बने ब्लैकमेलर की तरफ से कहा जाता है, कि तुम भी कुछ ऐसा करो, जिससे मैं एक्साइट हो जाऊं. इसी दौरान कई युवक वेबकैम में न्यूड होकर अश्लील हरकतें करने लगते और इसी दौरान उनका वीडियो सेव कर लिया जाता.

इसके बाद युवक को वह वीडियो पर्सनली उसके मेल पर सेंड कर दिया जाता. इसके बदले में व्यक्ति से तकरीबन 1 हजार मोरक्को दिरहम यानि करीब 66 हजार रु. की डिमांड की जाती. इसके इलावा ब्लैकमेलर यह भी धमकी देते थे कि अगर उनकी डिमांड नहीं मानी गई तो वह ये वीडियो उसके फेसबुक के जरिए उसके फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स को भेज देंगे. ब्लैकमेलर ने यह भी बताया कि ऐसा करने में 10 में से कम से कम चार व्यक्ति तो आसानी से फंस जाते हैं. इस तरह उसकी गैंग पिछले दो सालों में ही तकरीबन 50 लाख रुपए कमा चुकी है.

इसके इलावा रिपोर्टर के मुताबिक, वर्ष 2005 में ओएड जेम सिटी में सिर्फ 4 मनी एक्सचेंज बैंक थीं, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़कर 40 हो चुकी है. इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यहां की गैंग किस तरह लोगों को अपना शिकार बना रही हैं. वैसे रिपोर्टर के मुताबिक, द नेशनल क्राइम एजेंसी के अनुसार 2016 में 1245 लोगों ने ब्लैकमेलिंग की शिकायत दर्ज करवाई थी. यानि ब्लैकमेलिंग का शिकार होने वाले लोगों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है कि सैकड़ों लोगों ने तो बदनामी के डर से पुलिस में शिकायत भी दर्ज नहीं कराई होगी.

मैं एबीवीपी पर यकीन नहीं करती : स्वरा भास्कर

दक्षिण भारत के तेलुगूभाषी नौसेना औफिसर व रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर और ईरा भास्कर की बेटी स्वरा भास्कर ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की है. उन की मां ईरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफैसर हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में एमए करने वाली स्वरा भास्कर एक बेहतरीन अदाकारा हैं. उन्होंने शिक्षा के महत्त्व पर बात करने वाली फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में अभिनय कर काफी पुरस्कार बटोरे. फिलहाल उन की फिल्म ‘अनारकली औफ आरा’ प्रदर्शित हुई है और अपने सामाजिक व बोल्ड कथानक के चलते चर्चा में हैं.

स्वरा की प्रदर्शित फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ के प्रदर्शन से पहले जेएनयू में कन्हैया कुमार व उमर खालिद का मुद्दा गरमाया था. तब स्वरा भास्कर ने उमर खालिद के पक्ष में खुलापत्र लिखा था. उस समय स्वरा भास्कर ने भाजपा सरकार व भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के खिलाफ मोरचा खोला था. अब जबकि उन की फिल्म ‘अनारकली औफ आरा’ रिलीज हुई है, तो दिल्ली विश्वविद्यालय फिर से सुर्खियों में है.

एक बार फिर स्वरा भास्कर ने छात्र संगठन एबीवीपी के खिलाफ और छात्र संगठन आइसा के पक्ष में मुहिम चला रखी है. जेएनयू की छात्रा रही स्वरा भास्कर के दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि जेएनयू से जुड़ा कोई भी शख्स या छात्र गलत बात नहीं कह सकता. वे छात्र संगठन आइसा को सब से ज्यादा ईमानदार व संस्कारी मानती हैं. जबकि उन की नजर में एबीवीपी छात्र राजनीति के नाम पर महज गुंडई करता है. हाल ही में स्वरा भास्कर से मुलाकात हुई. पेश हैं उन से हुई बातचीत के अंश:

शिक्षा पर आधारित फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ के प्रदर्शन के बाद आप को किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं?

बौक्स औफिस के साथसाथ लोगों की तरफ से भी बहुत अच्छा रिस्पौंस मिला. फिल्म हिट रही. फिल्म 10 सप्ताह चली, लोगों ने कल्पना नहीं की थी कि लोगों के घरों में काम करने वाली बाई और शिक्षा को ले कर इस तरह की फिल्म भी बन सकती है. यह मां व बेटी की कहानी लोगों के दिल में बसने के साथ ही एक मिसाल बन गई है. कुछ लोगों ने पत्र लिख कर कहा कि फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ देखने के बाद उन की बेटी ने आईएएस बनने के लिए इंटरनैट से लोक सेवा आयोग का फौर्म निकाल कर भरा और परीक्षा की तैयारी कर रही है. इस तरह के कम से कम 2 पत्र तो मुझे याद हैं. अभी कुछ दिन पहले मैं दिल्ली हाट बाजार में खरीदारी कर रही थी, तब एक पिता ने अपनी बेटी से मिलवाते हुए बताया कि मेरी फिल्म देख कर उन की बेटी आईएएस बनने के लिए पढ़ाई कर रही है. जब हम छोटे थे, तब मेरे घर में काम करने आती थीं चंद्रा, अब वे काम नहीं करती हैं, मैं ने दिल्ली में दूसरी महिलाओं के साथ उन्हें भी बुला कर अपनी यह फिल्म दिखाई. फिल्म देखने के बाद 5 मिनट तक मुझ से चिपक कर वे रोईं. इन दिनों दिल्ली में मेरे घर पर गीता दीदी काम करती हैं. उन्होंने मुझ से कहा कि उन्हें यह बात अच्छी लगी कि हम ने उन की कहानी को फिल्म में दिखाया.

फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ शिक्षा और अपने को कुछ बनाने के सपनों की बात करती है. इन दिनों जो कुछ विश्वविद्यालयों में हो रहा है, क्या उस से लोगों के सपने पूरे होंगे, क्या यही सही शिक्षा है?

मुझे लगता है कि विश्वविद्यालयों में लोगों का आपस में वादविवाद होना, उन का आपस में राजनीतिक मतभेद होना बुरी बात नहीं है. विश्वविद्यालय इसी के लिए बनते हैं मगर हिंसा का होना बहुत बुरी बात है. एक खास गुट का दूसरे छात्रों पर अपनी सोच, अपने एजेंडे को लागू करना, अपनी विचारधारा को थोपना ठीक नहीं है. मैं एबीवीपी की बात कर रही हूं. एबीवीपी संगठन हमेशा गलत ढंग से लोगों को बरगलाता और धमकाता है. इस मसले पर दिल्ली पुलिस का मूकदर्शक बने रहना गलत है.

सरकार का इस पर प्रतिक्रिया न देना और जो पिट रहे हैं, उन्हीं पर आरोप लगाना भी गलत है. मैं तो एबीवीपी की कही हुई किसी भी बात पर यकीन नहीं करती. मेरी राय में एबीवीपी के लोग सिर्फ झूठ बोलते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि जब से इन की सरकार आई है, तभी से सारे भारतविरोधी नारे लग गए. इस सरकार से पहले भी वामपंथी, कांग्रेसी, कश्मीरी लोग जेएनयू में पढ़ते रहे हैं.

पर हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में जो कुछ हुआ, उस में एबीवीपी और आइसा दोनों ने एकदूसरे पर लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करने को ले कर कई तरह के आरोप लगाए हैं?

मैं एबीवीपी की किसी भी बात पर यकीन नहीं करती हूं. उस संगठन से जुडे़ छात्र जहां भी जाते हैं, मारपीट ही करते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि जहांजहां भारत के खिलाफ नारे लग रहे हैं, वहां एबीवीपी कैसे पहुंच जाता है. यह आश्चर्यजनक बात है. जहांजहां हिंसा शुरू होती है, वहां भी एबीवीपी पहुंच जाता है. ऐसा कैसे संभव है? आइसा की तरफ से हैदराबाद में कार्यक्रम कराया गया, वहां भी एबीवीपी की वजह से पुलिस को हाथ उठाना पड़ा.

मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि किसी भी पक्ष को लड़कियों के साथ छेड़खानी करने की जरूरत क्यों पड़ जाती है?

यह एबीवीपी की मानसिकता है. 2 साल में एबीवीपी की तरफ से यह चौथा घटनाक्रम है. इस से पहले दिल्ली में महिलाएं एक आंदोलन चला रही थीं, जिस में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राएं नुक्कड़नाटक कर रही थी, उन पर भी एबीवीपी ने ही हमला किया था. हमारे देश में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है, तब से तमाम छोटेछोटे गुट उभर कर आ गए हैं. फिर चाहे वह बजरंगदल हो या गोरक्षक संगठन हो या संजय लीला भंसाली की पिटाई करने वाली राजपूत करणी सेना हो.

मेरा सवाल है कि आइसा छात्र संगठन हो या एबीवीपी क्या विश्वविद्यालय के अंदर हिंसा करना या लड़कियों के साथ छेड़खानी करना जायज है?

मैं ने कब कहा कि जायज है. अगर दिल्ली पुलिस एबीवीपी के खिलाफ एफआईआर लिखने से मना कर दे तो क्या करें. हो यह रहा है कि जो लोग गुंडागर्दी कर रहे हैं, आप उन्हें जाने दे रहे हो. उस के बाद आप लोग गुरमेहर सहित दूसरे मुद्दों पर सोशल मीडिया व टीवी चैनलों पर बहस छेड़ते हैं, जिस का इस घटनाक्रम से कोई लेनादेना नहीं है.

मजेदार बात यह है कि बहस में कौन किस का पिता था, किस ने क्या किया, जैसी चर्चाएं शुरू कर दीं और जिस ने गुंडागर्दी की उस के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की. इस से आप क्या संदेश दे रहे हैं. आप खुद हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं. दिल्ली पुलिस उन्हें पूरी छूट देते हुए कह रही है कि आओ, आप को जो कुछ करना हो, करो, आप की सरकार है. हम दिल्ली पुलिस के लोग चुपचाप खड़े रहेंगे. इस से आप विश्वविद्यालय में किस तरह की शिक्षा को बढ़ावा देंगे?

आप भूल जाते हैं, जेएनयू का 3 माह से नजीब नामक छात्र गायब है. उसे एबीवीपी के लोगों ने मारा. आज तक मिला नहीं. इस का जवाब दिल्ली पुलिस या दिल्ली की सरकार के पास नहीं है. एबीवीपी के लोग ‘भारतमाता की जय’ चिल्लाने के अलावा कोई जवाब नहीं दे सकते.

यह बहुत चिंताजनक स्थिति है. यदि आप को लगता है कि मैं जानबूझ कर किसी खास पक्ष की बात कर रही हूं, तो आप सोचते रहिए, मुझे फर्क नहीं पड़ता.

नजीब को ढूंढ़ने के लिए जेएनयू के छात्र लगातार आंदोलन व मुहिम चला रहे हैं. लेकिन हमारे देश का मीडिया भी इस मुहिम की चर्चा नहीं कर रहा है. यह छात्र सोशल मीडिया पर नजीब की तलाश की मुहिम चला रहे हैं. पर छात्रों के पास इतना धन नहीं होता कि वह कुछ कर सकें . उन के पास मीडिया की तरह कलम की ताकत नहीं है. जिस ढंग की शक्ति एबीवीपी के पास है, वैसी शक्ति भी उन के पास नहीं है. पर वह सब जगह सवाल कर रहे हैं.

मेरा सीधा सवाल यह है कि विश्वविद्यालयों में क्या हो रहा है?

मैं यह कहूंगी कि यदि आप विश्वविद्यालयों में सवाल पूछने की आजादी खत्म कर देंगे, तो शिक्षा अपनेआप बंद हो जाएगी.

आखिर क्या वजह है कि छात्र आंदोलन व हिंसा की घटनाएं जेएनयू व दिल्ली विश्वविद्यालय में ही होती हैं. मुंबई विश्वविद्यालय में इस ढंग की घटनाएं क्यों नहीं सुनाई देतीं?

आप जेएनयू को दोष न दें. हैदराबाद विश्वविद्यालय में बहुत बड़ा कांड हुआ. एक छात्र ने आत्महत्या कर ली. जिस को ले कर बवाल भी हुआ पर कोई परिणाम नहीं निकला. मुझे मुंबई विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी नहीं है. शायद मुंबई में बौलीवुड, मीडिया व कौर्पारेट हावी हैं. दूसरी बात मुंबई विश्वविद्यालय में लिबरल आर्ट के बजाय सब से ज्यादा कौमर्स पढ़ाया जाता है, फिर विज्ञान पढ़ाया जाता है. जबकि दिल्ली विश्वविद्यालय व जेएनयू लिबरल आर्ट के केंद्र हैं. यहां इतिहास, समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान पढ़ाया जाता है. हैदराबाद व इलाहाबाद में भी यही विषय ज्यादा पढ़ाएं जाते हैं. इलाहाबाद में भी बड़ेबड़े कांड हुए हैं पर जेएनयू बदनाम है.

तो आप भारतविरोधी नारों को जायज ठहराती हैं?

मेरी नजर में जब भारतविरोधी नारे लगते हैं, तो उस से बातचीत शुरू होती है, जिस से नई बातें सामने आती हैं. जब वार्त्तालाप होगा, बहस होगी, तभी समाज व देश प्रगति करता है. गांधीजी ने बात करकर के देश को आजाद कराया था. गांधीजी को हिंसा का रास्ता अपनाने की जरूरत नहीं पड़ी. देखिए, उस जमाने में भगतसिंह जैसे हिंसावादी नेता भी थे पर सफलता तो अहिंसावादी बातचीत करने वाले गांधीजी ने ही दिलाई.

आप को नहीं लगता कि एबीवीपी को उन लोगों से समस्या है, जो आम जगहों यानी कि पब्लिक प्लेस पर द्विअर्थी गाने गाते हैं या अश्लील बातें करते हैं?

क्या समाजसुधार का ठेका एबीवीपी को मिला है? आप समाज के ठेकेदार नहीं हैं. देश कानून व संविधान से चलता है. देश के कानून ने ही तय किया है कि पब्लिक प्लेस में क्याक्या किया जा सकता है. कानून में कहीं नहीं लिखा है कि 2 लोग हाथ पकड़ कर पब्लिक प्लेस में साथ में नहीं चल सकते. यदि आप को किसी के किसी काम से समस्या है, तो आप उस के खिलाफ कानून का सहारा लीजिए.

उमर खालिद के पक्ष में आप ने खुलापत्र लिखा था. इस बार आप ने कोई पत्र नहीं लिखा?

पिछली बार मेरे खुलेपत्र को ले कर बहुत बवाल हो गया था. इस बार भी लिखना चाहती थी पर समय नहीं मिला. मैं फिल्म के प्रमोशन में व्यस्त रही.   

फलफूल रही विरासत की राजनीति

भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में राजनीति अब पुश्तैनी पेशा बन गई है. जो भी राजनीति में एक बार सफल हो जाता है वह अपने बच्चों को अन्य व्यवसाय में भेजने के बजाय राजनीति में ही भेजना पंसद करता है. भारत में गांधी परिवार, सिंधिया परिवार, मुलायम परिवार, लालू यादव परिवार, हेमवती नंदन बहुगुणा परिवार, बाल ठाकरे परिवार, देवीलाल परिवार, बादल परिवार और करुणानिधि परिवार जैसे बहुत सारे उदाहरण भरे पड़े हैं. विश्वस्तर पर देखें तो अमेरिका, श्रीलंका, क्यूबा, उत्तर कोरिया, सिंगापुर, बंगलादेश और पाकिस्तान तक तमाम देशों में राजनीति अब विरासत की बात हो गई है. इस के अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं.

भारत में नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना कर राजनीति की शुरुआत करने वाले दल खुद भी परिवारवाद में डूब गए. भाजपा जैसे दल, जो परिवारवाद की आलोचना करते थे, अब वे भी परिवारवाद के शिकार हो गए हैं. विदेशों में भी विरासत की सियासत बहुत पुरानी है. अमेरिका में बहुत पहले ही जस्टिन और एडम्स के परिवार राजनीति में एक के बाद एक कर के आगे बढ़े. इस के बाद वहां पर ही कैनेडी और क्ंिलटन परिवार इस विरासत को आगे बढ़ाने में लग गए. ये परिवार तो ऐसे हैं जिन के लोग राजनीति में आगे बढ़े और सब से बड़े पदों पर बैठे नजर आते हैं.

अमेरिका में बहुत सारे ऐसे परिवार भी हैं जिन के बच्चे सीनेट तक पहुंचे हैं. अमेरिका का एक सर्वे बताता है कि एक सामान्य बच्चे के मुकाबले नेताओं के बच्चों में सीनेटर बनने की संभावना 6,000 गुना अधिक होती है. अमेरिका के अलावा दूसरे देशों में भी हालत वैसी ही है. यही वजह है कि नेताओं के बच्चे तेजी से इस दिशा में अपना कैरियर बनाने में लगे हैं. पाकिस्तान में नवाज शरीफ परिवार और भुट्टो परिवार लोकतंत्र के समर्थक जरूर रहे हैं पर वहां भी लोकतंत्र की आड़ में परिवारवाद खूब फलफूल रहा है. भारत के पड़ोसी मुल्क बंगलादेश और श्रीलंका में भी विरासत की सियासत का रंग देखने को मिलता है. शेख हसीना और खालिदा जिया ने बंगलादेश में परिवारवाद को बढ़ावा दिया. श्रीलंका में भंडरनायके, रणतुंगा परिवार राजनीति की मुख्यधारा में हैं. पूरी दुनिया में ऐसे देशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जहां लोकतंत्र में परिवारवाद पनप रहा है. इस की अपनी कुछ मूल वजहें भी हैं. आज के समय में चुनाव लड़ना सरल नहीं है. एक बार जो नेता अपने को स्थापित कर लेता है वह ब्रैंड बन जाता है. उस के ब्रैंड के सहारे पूरा परिवार आगे बढ़ता है. ऐसे परिवार में पैदा होने वाले लोगों को जनता स्वत: राजा मान लेती है. उन के पास पैसा और चुनाव लड़ने की समझ होती है. इस के प्रभाव को ले कर पूरी दुनिया में अलगअलग तरह के विचार हैं. कुछ लोग इस को लोकतंत्र के लिए सही मानते हैं, कुछ लोग इस को खतरा मानते हैं. दोनों विचारधाराओं के बीच परिवारवाद पूरी तरह से आगे बढ़ रहा है.

परिवारवाद की नई पौधशाला

देश में नेहरूगांधी और मुलायम परिवार की परिपाटी अब हर नेता के लिए नजीर का काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की सदस्य अपर्णा यादव और अनुराग यादव राजधानी लखनऊ से चुनाव मैदान में उतरे. मुलायम परिवार पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने मजबूत गढ़ से बाहर निकल कर चुनाव मैदान में उतरा पर हार का सामना करना पड़ा. चुनाव दर चुनाव राजनीति में परिवारवाद बढ़ता जा रहा है. परिवारवाद की यह बीमारी किसी एक दल की बीमारी नहीं रह गई है. हर दल इस हमाम में एक ही हालत में है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में परिवारवाद के उदाहरण दिखे.सब से बड़ी बात यह है कि 30 साल से नीचे के करीब आधा दर्जन युवा परिवारवाद के सहारे चुनाव मैदान में रहे.

परिवारवाद का विरोध करने वाली भाजपा के तमाम लोग चुनाव जीते. आजम खां-अब्दुल्ला खां, मुख्तार अंसारी-अब्बास अंसारी और स्वामी प्रसाद मौर्य-उत्कृष्ट मौर्य के रूप में 3 जोडि़यां ऐसी हैं जिन में पितापुत्र दोनों ने एकसाथ अलगअलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा. परिवारवाद के रूप में ज्यादातर नेताओं ने अपने बेटों को अपना उत्तराधिकारी बनाया है. जहां बेटे नहीं, वहां बेटियों को आगे लाया जा रहा है. अब तक परिवारवाद के नाम पर भाईभतीजे ही चुनाव लड़ते थे. अब यह दायरा भी सिमटता जा रहा है. नेताओं को अब अपने परिवार के लोग नहीं, बल्कि करीबी लोग उत्तराधिकार के लिए चाहिए. इस में पत्नी, बेटा और बेटी सब से बड़ी चाहत बन गई हैं. पहले यह परेशानी ऊंची जातियों के लोगों में दिखती थी. अब दलित और पिछड़ी जातियों में भी यही बीमारी पनपने लगी है. बड़ी संख्या में दलित और पिछड़े नेता अपने लोगों को राजनीति में ला रहे हैं.

युवाओं ने संभाली कमान

रायबरेली जिले की रहने वाली अदिति सिंह ने अपने पिता अखिलेश सिंह की पारंपरिक सीट रायबरेली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. अदिति ने अमेरिका से एमबीए की डिगरी हासिल की है. पिता की बीमारी के बाद वे उन की विरासत को संभालने का काम कर रही हैं. राजनीति में उतरने से पहले वे लंदन के एक फैशन हाउस में काम कर रही थीं. उन्होंने अपना जौब छोड़ कांग्रेस के टिकट पर रायबरेली की सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. अदिति रायबरेली जिले के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए काम करना चाहती हैं. जिस चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता चुनाव हारे उस चुनाव में अदिति ने जीत कर दिखा दिया कि युवाओं में कितना दम है. अब्दुल्ला खान सपा के नेता आजम खान के बेटे हैं. वे रामपुर की स्वार-टांडा विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर विधायक बने. आजम खान रामपुर से विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत हासिल की. पितापुत्र की जोड़ी ने एकसाथ चुनाव मैदान में जीत हासिल की.

अब्दुल्ला के पास एमटेक की डिगरी है. 27 साल के अब्दुल्ला अपने पिता द्वारा बनाई गई जौहर यूनिवर्सिटी के सीईओ हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब चुनाव आयोग ने आजम के चुनावप्रचार करने पर बैन लगा दिया था तब अब्दुल्ला ने अकेले ही चुनावप्रचार किया था. अब्बास अंसारी बाहुबली मुख्तार अंसारी के बेटे हैं. वे नैशनल स्तर के शूटर हैं. घोसी विधानसभा सीट से वे चुनाव लड़े और हार गए. प्रतीक भूषण सिंह गोंडा सदर सीट से चुनाव मैदान में थे और जीत हासिल की. वे बलरामपुर से सांसद बृजभूषण के बेटे हैं. प्रतीक ने मेलबर्न से एमबीए किया है. वे रेसलर बनना चाहते थे, लेकिन घर का माहौल पौलीटिकल था. उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने पिता बृजभूषण के लिए प्रचार किया था.

नितिन अग्रवाल हरदोई से सपा के नेता नरेश अग्रवाल के बेटे हैं. 34 साल के नितिन ने 2004 में पुणे से एमबीए की डिगरी हासिल की. 2012 से वे राजनीति में सक्रिय हैं. 2012 में वे पहली बार विधायक बने. नितिन ने पुणे के सिंबोएसिस इंस्टिट्यूट से एमबीए किया है. अखिलेश सरकार में नितिन मंत्री रहे. पंकज सिंह भाजपा के प्रमुख नेता व केंद्रीय गृहमंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे हैं. 30 साल के पंकज ने एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है. पंकज 2002 से राजनीति में सक्रिय हैं. पार्टी में वे अलगअलग पदों पर रहे हैं. पहली बार वे विधायक बने, उन्होंने नोएडा विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल की. भाजपा के दूसरे प्रमुख नेता उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह भी पहली बार चुनाव जीत कर विधायक बने. संदीप के पिता राजवीर सिंह एटा से सांसद हैं. संदीप ने लंदन की लीड्स बैकेट यूनिवर्सिटी से एमए किया है. वे अपने दादा कल्याण की पारंपरिक सीट से चुनाव लड़े. 26 साल के संदीप कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में वे मंत्री बने. तनुज पुनिया कांग्रेस के सांसद पी एल पुनिया के बेटे हैं. वे बाराबंकी की जैदपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गए. तनुज ने आईआईटी रुड़की से कैमिकल इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल की है. 32 साल के तनुज का सपना आईएएस बनने का था. लेकिन तनुज के पिता पी एल पुनिया चाहते थे कि वह राजनीति में आए, इस कारण वे राजनीति में आ गए.

उत्कृष्ट मौर्य ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़े और हार गए. वे बसपा के नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे हैं जो अब भाजपा में हैं. 31 साल के उत्कृष्ट ने कानपुर के छत्रपति साहूजी महाराज विश्वविद्यालय से 2016 में बीए किया है.

सकते में कर्मठ कार्यकर्ता

जिस तरह से बड़ी संख्या में नेता अपने परिवार के लोगों को राजनीति में ला रहे हैं, वह कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. अपने परिवार के लोगों को स्थापित करने के लिए नेताओं को अपनी विचारधारा को छोड़ने में भी कोई एतराज नहीं रह गया है. अब परिवार के लोगों को मनचाहा टिकट न मिलने से नेता अपने दल को छोड़ कर दूसरे दल में शामिल हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलबदल कोई मुद्दा नहीं रह गया. हर दल ने दूसरे दलों के लोगों को बखूबी टिकट दिया. जनता के लिए भी दलबदल और परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं रह गया. अभी भी चुनाव का मुख्य मुद्दा जाति और धर्म ही है. जनता को जातिधर्म में उलझा कर नेता राजनीति को कुछ परिवारों तक समेट कर रख देने के पक्ष में लामबंद हैं. बड़े नेता अपने परिवार के लोगों को संसद और विधानसभा ले जाने के प्रयास में रहते हैं, छोटे कार्यकर्ताओं के परिवार को पंचायत और पार्षद चुनावों में मौके दे कर उन की जबान को बंद कर दिया जाता है.

सफल है विरासत की राजनीति

असल में राजनीति अब पहले की तरह सरल नहीं रह गई है. यहां धनबल और बाहुबल दोनों जरूरी हो गया है. दूसरे कैरियर के मुकाबले यहां उतारचढ़ाव थोड़ा ज्यादा हो सकता है पर मुनाफा दूसरे कैरियर के मुकाबले बहुत ज्यादा है. नेता हार कर भी नेता बना रहता है. अगर कोई किसी घोटाले या अपराध में फंस भी जाए तो भी राजनीति नेताओं के बच्चों को मरने नहीं देती. उन को सहारा दे कर मुख्यधारा में ले आती है. नेताओं के बच्चों को छोटेमोटे पद हर दल की सरकार में मिल जाते हैं. पूरे देश की विधानसभाओं में ऐसी बहुत सारी कमेटियां बनी हैं जिन में ये सदस्य बन जाते हैं, बैंकों में चेयरमैन बन जाते हैं, सार्वजनिक उपक्रमों में चेयरमैन हो जाते हैं. हजारों रास्ते ऐसे हैं जहां मुख्यधारा से कम लाभ नहीं है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में मुलायम परिवार की बात करें तो गांव के प्रधान से ले कर मुख्यमंत्री तक उन के परिवार के लोग कहीं न कहीं किसी न किसी पद पर बैठे हैं हालांकि मुख्यमंत्री पद अब इस परिवार के पास नहीं है. विरोधी दल के नेता भी नेताओं के परिवार पर मेहरबान होते हैं. क्योंकि उन का आपस में मिलनाजुलना होता है. उन की दुश्मनी केवल वोट मांगने के समय होती है. तमाम ऐसे नेता हैं जिन के काम विरोधी नेताओं के समय में भी असरदार तरीके से होते हैं.

राजनीति को सेवा की परिभाषा से अलग करने की जरूरत है. यह अब एक तरह का पेशा बन गया है. पार्टी चलाने के लिए पैसे की जरूरत उसी तरह से होती है जिस तरह से फैक्टरी चलाने के लिए होती है. यह भूल जाना चाहिए कि बिना पैसा लिए कोई जनता के लिए काम करेगा. केवल पार्टी की ही बात नहीं है, अगर कोई स्वयंसेवी संस्था भी चलाता है तो उस को भी संचालक से ले कर चपरासी तक का खर्च उठाना ही पड़ता है. पार्टियां भी अपने काम करने वालों को वेतन देती हैं. ऐसे में हर नेता को अच्छाखासा पैसा चाहिए. पार्टी के साथ कुछ पैसा नेता अपने व परिवार के लिए भी बचा कर रखना चाहता है, जिस से खराब समय में, जब वह सत्ता में न रहे, उस को भूखों न मरना पड़े. पूरी दुनिया में राजनीति अब एक कैरियर की तरह हो गई है. यह सच है कि नेताओं के बच्चों के सफल होने की संभावना हजारगुना अधिक होती है पर कई बार मेहनत करने वाले और अवसर का लाभ उठाने वाले दूसरे लोग भी सफल हो जाते हैं.

यह कैरियर उसी तरह से मुश्किलभरा है जैसे एमबीए, डाक्टर या इंजीनियर बनना. इस में बुद्धि के साथ शरीर का बल भी ज्यादा चाहिए. सैकड़ों लोगों से मिलना, उन को याद रखना, उन की खशी के लिए उन के जैसा व्यवहार करना सीखना सरल नहीं होता है. इस के अलावा झगड़े कराने से ले कर निबटाने की कला, वाकपटु होना, भाषण देना आना चाहिए. राजनीति नेता के परिवार के लोग करें या आम परिवारों के, ध्यान रखने वाली बात यह है कि समाज को सही दिशा देने का काम करें. सही नेता ही समाज को नई दिशा देते हैं, सही नेता ही सरकार को मनमानी करने से रोकते हैं, तो कभी वे सरकार भी चलाते हैं.    

तेलंगाना का बेतुका फरमान

तेलंगाना के सोशल वैलफेयर रैजिडैंशियल कालेजों में अब केवल अविवाहित महिलाएं ही पढ़ाई कर सकती हैं. तेलंगाना सरकार द्वारा यह नियम करीब 1 साल पहले लागू किया गया था. इस की मुख्य वजह विवाहित स्त्रियों के पतियों का बारबार कालेज आना बताई गई है. इस से दूसरी लड़कियों का ध्यान भटकता है. इन कालेजों द्वारा वर्ष 2017 के एंट्रैंस के लिए जारी किए गए प्रौस्पैक्टस में स्पष्ट लिखा गया है कि सिर्फ अविवाहित महिलाएं ही आवेदन कर सकती हैं.

इस तरह के नियम यदि बालविवाह जैसी कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास हैं तो वहीं ऐसी अनगिनत महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण भी हैं जो शादी के बाद भी पढ़लिख कर आत्मनिर्भर बनने का जज्बा रखती हैं.

औनलाइन उम्र छिपाते हैं सैक्स प्रीडेटर्स

अकसरऔनलाइन यौन उत्कंठा में डूबे अधेड़ अपराधी टीनएजर्स को अपने जाल में फंसाने के लिए अपने औनलाइन प्रोफाइल में अपनी उम्र को ले कर झूठ बोलते हैं. साल 2007 में आस्ट्रेलिया में 14 साल की कार्ली रयान नाम की लड़की को एक ऐसे ही अधेड़ पुरुष ने खुद को कम उम्र का म्यूजीशियन बता कर फंसा लिया था. कार्ली को लगा कि उसे ड्रीम लवर मिल गया है लेकिन कार्ली को कहां पता था कि वह एक सैक्स प्रीडेटर्स है, जो उस की हत्या कर देगा. उस घटनाके 10 वर्षों बाद अब आस्ट्रेलियन सरकार कार्ली जैसी पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के लिए कार्ली ला ले कर आई.  इस कानून के चलते ऐसे सैक्स औफैंडर्स को पुलिस अपराध करने से पहले ही दबोच लेगी और 10 साल के लिए जेल की हवा भी खिला पाएगी.

महात्मा गांधी की हत्या की साजिश पर फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स : डेप्थ्स आफ डार्कनेस’’

महात्मा गांधी यानी कि मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने अहिंसा आंदोलन के बल पर ब्रिटिश शासकों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी दिलायी थी. लेकिन 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने उन्हे गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया था. पर देश आजाद है और लोकतंत्र  बलवान होता जा रहा है.

महात्मा गांधी के जीवन व कृतित्व को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं. मगर महात्मा गांधी की हत्या की साजिश पर केंद्रित फिल्म नहीं बनी. पर अब मूलतः भारतीय मगर दुबई में बसे लोगों द्वारा दुबई में स्थापित फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ‘‘नुगेन मीडिया’’ ने कई पुरस्कार जीत चुके श्रीलंकन फिल्मकार चंद्रन रत्नम के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स : डेप्थ्स आफ डार्कनेस’’ का निर्माण किया है. 21 अगस्त 2017 को अमेरिका सहित पश्चिमी देशों प्रदर्शित होने वाली इस फिल्म की अवधि दो घंटे 18 मिनट है, मगर भारतीय दर्शकों के लिए फिल्म में पांच गाने जुड़ जाएंगे. हिंदी में इस फिल्म का नाम ‘‘सूर्यग्रहण’’ होगा.

यह फिल्म गहन अशांति के बाद भारतीय लोकतंत्र के जन्म का कलात्मक चित्रण है. इसमें आजादी से पहले और बाद के भारत का जिक्र है. फिल्म की कहानी देश के बंटवारे से पहले और बाद के नौ माह की है. ‘सोलार इक्लिप्स’, मुंबई, पुणे, दिल्ली में कार्यरत तीन अति बुद्धिमान पुलिस अफसरों की कहानी है. जिन्हे महात्मा गांधी की हत्या किए जाने की योजना का पता चलता है. फिल्म में कुछ काल्पनिक घटनाक्रम व पात्र हैं, मगर कहानी में वास्तविक किरदारों व घटनाक्रम की बहुतायत है.

इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह फिल्म महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन की हत्या की समानता की बात करती है. किस तरह इनकी हिंसात्मक मौतों ने अपने संबंधित देशों के एकीकरण और भयावह हिंसा के चेहरे में एक धर्मनिरपेक्ष और स्थिर लोकतंत्र की स्थापना और प्रत्याशित धार्मिक या नस्लीय विभाजन का नेतृत्व किया.

महात्मा गांधी की हत्या के पीछे की साजिश पर बनी एक्शन प्रधान व रोमांचक फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स : डेप्थ्स आफ डार्कनेस’’ के निर्देशक मशहूर व पुरस्कृत  अल्जेरियन फिल्मकार करीम ट्रायडिया हैं. 1991 से फिल्में निर्देशित करते आ रहे करीम ट्रायडिया अब तक 15 फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. जिनमें से उनकी कई फिल्में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत हुई हैं. फिल्म की पटकथा पंकज सहगल ने लिखी है. पंकज सहगल इस फिल्म के सह निर्देशक हैं, गीत लिखे हैं और अभिनय भी किया है.

फिल्म के निर्देशक करीम का दावा है कि उन्होंने इस फिल्म को महज एक वर्ष का समय दिया, मगर निर्माताओं ने इस फिल्म पर चार साल तक काम किया है. यह फिल्म निर्माताओं की अति महत्वाकांक्षी फिल्म है. करीम ट्रायडिया को यकीन है कि यह फिल्म सिनेमा में जादू जगाएगी.

फिल्म के निर्देशक करीम ट्रायडिया के अनुसार फिल्म में जून 1946 से अप्रैल 1949 के बीच ब्रिटिश भारत के उस ऐतिहासिक साजिश की बात करती है, जिसने भारत की अपनी धर्म निरपेक्षता और धार्मिक सहिष्णुता की नीति को स्याह पक्ष में ढकेल दिया. फिल्म में महात्मा गांधी की हत्या एक छोटा सा हिस्सा है, मूल कहानी किसने महात्मा गांधी की हत्या को जन्म दिया और साजिश की है.

श्रीलंका में दो यूनिट द्वारा सौ दिन में फिल्मायी गयी इस फिल्म में ओम पुरी, नसिरूद्दीन शाह, विकास श्रीवास्तव, अनंत महादेवन, राजपाल यादव जैसे भारतीय कलाकारों के अलावा कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने अभिनय किया है. जी हां! इस फिल्म में हॉलीवुड फिल्म ‘‘अवतार’’ में अभिनय कर चुके अभिनेता स्टीफन लांग, ब्रिटिश कलाकार बैड ब्वाय जोंस, कई भारतीय कलाकारों के साथ ही महात्मा गांधी के किरदार में स्पैनिश कलाकार जेसुस सने हैं. इस फिल्म में नाथूराम गोड़से का किरदार भारतीय कलाकार विकास श्रीवास्तव ने निभाया है.

फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स’’ का पहला टीजर दिसंबर 2016 में ‘दुबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ के वक्त बाजार में आया था. उस वक्त फिल्म के सह निर्देशक पंकज सहगल ने इस फिल्म के संबंध में कहा-‘‘यह फिल्म 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के आसपास के राजनीतिक साजिश की ऐतिहासिक गाथा है.’’ फिल्म के सह निर्देशक पंकज सहगल कहते हैं-‘‘हमारी फिल्म सही मायनों में अंतरराष्ट्रीय फिल्म है. यह एक दुबई की कंपनी ही कल्पना कर सकती है. हमारी फिल्म के कलाकारों व तकनीशियनों में 35 देश की प्रतिभाएं हैं.

फिल्म को श्रीलंका में फिल्माए जाने पर पंकज सहगल ने कहा है-‘‘श्रीलंका और भारत में काफी समानताए हैं. दोनो देशों का ब्रिटिश उपनिवेशवाद का इतिहास है. दोनों ही देशों में ब्रिटिश वास्तुकला मौजूद है. इसलिए हमें श्रीलंका में हमारी इस फिल्म का फिल्मांकन करना काफी आसान रहा. क्योंकि श्रीलंका में फिल्म के फिल्मांकन के लिए इजाजत पाने में भारत के मुकाबले कम लालफीताशाही को झेलना पड़ा.’’

फिल्म के कैमरामैन मशहूर कैमरामैन विंसेंट के बेटे अजायान विंसेट, नृत्य निर्देशक सरोज खान व संगीतकार प्रशांत पिल्लैय हैं. लेखक रलित्जा इवानोवा हैं. इस फिल्म के निर्माण में एक दो नहीं बल्कि 35 देशों की प्रतिभाओं का योगदान है.

फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स : डेप्थ्स आफ डार्कनेस’’ के साथ जुड़े व सहनिर्माता चंद्रन रत्नम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. श्रीलंकन फिल्मकार चंद्रन रत्नम निर्माता, निर्देशक व लेखक होने के साथ ‘‘इंडियाना जोंस’’ सहित तमाम हौलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए श्रीलंका और मलेशिया में लोकेशन भी उपलब्ध कराते हैं. चंद्रन रत्नम ने 1989 में फिल्म ‘‘घोष्ट कौन नाट डु इट’’ का सह निर्माण किया था, जिसमें अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अभिनय किया था. इस फिल्म के निर्देशक जान डेरेक थे. इस फिल्म के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने ‘ट्रंप टावर’ में शूटिंग की थी, मगर नगेटिब खराब हो जाने पर डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार भी इस फिल्म के लिए शूटिंग की थी. यह अलग बात है कि इस फिल्म को नकारात्मक समीक्षाएं मिली थीं. हौलीवुड फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग उन्हे अपना खास दोस्त मानते हैं. चंद्रन रत्नम की फिल्म लोकेशन सेवा के चलते हालीवुड फिल्मकारों के लिए श्रीलंका फिल्म शूटिंग की बेहतरीन लोकेशन बनी हुई है.

जबकि फिल्म की मुख्य निर्माण कंपनी ‘‘नुगेन मीडिया’’ दुबई स्थित प्रोडक्शन कपंनी है. जहां वीएफएक्स सहित हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं. यह कंपनी एनीमेटेड फिल्में भी बनाती है. यह कंपनी ‘‘सोलार इक्लिप्स’’ यानी कि ‘‘सूर्यग्रहण’’ के अलावा ‘‘कामराज’’, ‘‘कलगीः द लिटिल मोली फिश’’, ‘‘पी वी सी मेजर सैतान सिंह’’, ‘‘एम ई एस ट्वेंटी फाइव’’आदि फिल्में भी बना रही है.

भारत में बैन है महात्मा गांधी की हत्या की साजिश पर बनी एक फिल्म

महात्मा गांधी की हत्या की साजिश पर बनी फिल्म ‘‘सोलार इक्लिप्स : डेप्थ्स आफ  डार्कनेस’’ अगस्त माह में भारत सहित पूरे देश में प्रदर्शित होने वाली है. मगर इसी तरह के कथानक वाली एक फिल्म 1963 में भारत में प्रदर्शित नहीं हो पायी थी.

जी हां! 1963 में ब्रिटिश फिल्मकार मार्क राब्सन निर्देशित फिल्म ‘‘नाइन आवर्स टू रामा’’ को भारत सरकार ने बैन कर दिया था. यह फिल्म 1962 में प्रकाशित स्टेनली वोलपार्ट के इसी नाम की किताब पर आधारित है. यह फिल्म इंगलैंड के अलावा भारत के कुछ हिस्सों में फिल्मायी गयी थी. इस फिल्म में होस्र्ट बुच्चोल्ज, डायने बकर, जोस फेरारे, राबर्ट मोर्ले ने अभिनय किया था.

यह फिल्म महात्मा गांधी (जे एस कास्यप) की हत्या करने वाले नाथूराम गोड़से (होसर्ट बुच्चोल्ज) की जिंदगी की उन नौ घंटों की काल्पनिक कहानी है, जब वह गांधी की हत्या करने गया. इसमें नाथूराम गोड़से द्वारा गांधी के घर पर हत्या की तैयारी करना, गोड़से की मुसलमानों के प्रति दुश्मनी, एक हिंदू संगठन द्वारा गांधी की हत्या की योजना पर काम करना, गोड़से के एक विवाहित महिला रानी (वैलेरी गियरन) और एक वेश्या शीला (डायने बेकर) से संबंध का जिक्र है. एक पुलिस इंस्पेक्टर गोपाल दास (जोस फेरर) हत्यारे की तलाश में है, पर इंस्पेक्टर गोपाल दास हत्यारे तक पहुंचते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. 

क्या रवीना टंडन की फिल्म ‘‘मातृ’’ प्रदर्शित होगी..??

पूरे दो साल के बाद बौलीवुड में वापसी कर रही रवीना टंडन के सितारे गर्दिश में हैं या यूं कहें कि उनकी फिल्म ‘‘मातृ’’ के निर्माता अंजुम रिजवी के सितारे गर्दिश में हैं, यह तो वही जाने..मगर फिल्म ‘‘मातृ’’ के 21 अप्रैल को प्रदर्शित होने पर सवालिया निशान लग गया है.

बौलीवुड के सूत्रों के अनुसार ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ यानि कि ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सरटिफिकेशन’ ने रवीना अंडन के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘मातृ’’ को बैन कर दिया है. सूत्रों के अनुसार 15 अप्रैल शनिवार को ‘‘केद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ की परीक्षण समिति ने कई गाइडलाइन्स के उल्लंघन पर फिल्म ‘मातृ’ को बैन कर दिया यानि कि अब यह फिल्म प्रदर्शित नहीं की जा सकती. इससे पहले भी ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ की परीक्षण समित ने फिल्म ‘‘मातृ’’ को देखा था, मगर उस वक्त दस मिनट के बाद ही परीक्षण समिति ने इस फिल्म को देखने से इंकार कर दिया था, क्योंकि परीक्षण समिति के सदस्यों को फिल्म की जो पटकथा दी गयी थी, उसमें और वे जो फिल्म देख रहे थे, उसमें बहुत बड़ा अंतर था.

“केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ से जुड़े एक सदस्य ने कहा कि फिल्म ‘‘मातृ’’ में तमाम गालियां, बलात्कार के अश्लील व अति हिंसात्मक दृश्य व गाली गलौज हैं. सूत्रों के अनुसार फिल्म के निर्माता को पहले कहा गया था कि वे फिल्म में गाली गलौज कम कर दें, पर निर्माता ने कोई बदलाव नहीं किया.

इस मसले पर एक वेब साइट से “केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के चेअरमैन पहलाज निहलानी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है – ‘‘हमने अपनी तरफ से इस फिल्म की जरुरत को पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास किया. हमने शनिवार के दिन छुट्टी होते हुए भी फिल्म ‘मातृ’ का परीक्षण करने के लिए ऑफिस खोला.’’ मगर फिल्म के निर्माता अंजुम रिजवी का दावा है कि सब बकवास है. अंजुम रिजवी कहते हैं – ‘‘हमारी फिल्म ‘मातृ’ बैन नहीं हुई है, बल्कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की परीक्षण समिति इस फिल्म को सोमवार,17 अप्रैल को देखेगी.”

मगर फिल्म ‘‘मातृ’’ से जुड़े सूत्र इस खबर की पुष्टि करते हुए स्वीकार कर रहे हैं कि फिल्म ‘मातृ’ बैन कर दी गयी है. वहीं फिल्म से जुड़े एक सूत्र ने कहा – ‘‘यह सच है कि फिल्म बैन हो गयी है. शनिवार को परीक्षण समिति ने फिल्म देखने के बाद इसे प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया है. हमें बताया गया है कि फिल्म सेंसर बोर्ड की गाइडलाइन्स के खिलाफ है, मगर सोमवार को पुनः एक परीक्षण समिति इस फिल्म को देखकर यह तय करेगी कि फिल्म से किन दृश्यों को हटाने पर ‘ए प्रमाण पत्र’ मिल सकता है.”

उधर रवीना टंडन चुप हैं. मगर निर्माता अंजुम रिजवी ने फिल्म ट्ब्यिूनल में जाने का मन बना लिया है. एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक फिल्म ‘मातृ’ को बैन किए जाने की खबर गलत है. इस अखबार के अनुसार ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के सीईओ अनुराग श्रीवास्तव ने कहा – ‘‘फिल्म को प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया जारी है. शनिवार को परीक्षण समिति ने फिल्म को देखा था, मगर बैन किए जाने की खबर गलत है. सच एक दो दिन में सामने आएगा.’’

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेअरमैन और सीईओ के अलग अलग बयान कई तरह की शंकाएं पैदा करते हैं. मजेदार बात यह है कि सीईओ अनुराग श्रीवास्तव ने भी माना है कि परीक्षण समिति ने शनिवार को फिल्म देखी तो फिर परिणाम एक दो दिन बाद क्यों? जबकि अमूमन परीक्षण समिति फिल्म देखकर उसी वक्त अपना निर्णय दे देती है.

उधर फिल्म के निर्माता अंजुम रिजवी दावा कर रहे हैं कि सेंसर बोर्ड सोमवार को फिल्म देखेगी, तो वहीं फिल्म से जुड़े सूत्र मान रहे हैं कि फिल्म बैन हो गयी है. अब हकीकत क्या है?…इस पर रवीना टंडन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है.

बदले की भावना पर आधारित रोमांचक फिल्म ‘‘मातृ’’ में रवीना टंडन ने एक ऐसी मां की भूमिका निभायी है, जो कि अपनी बेटी के साथ हुए बलात्कार के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ती है.

दांव पर दिग्गज

अब विपक्ष एकजुट हो कर 2019 नहीं, बल्कि 2024 के बारे में सोचे, यह दार्शनिकों जैसा विश्लेषण जम्मूकश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का है जो घाटी में भाजपा और पीडीपी के बेमेल गठबंधन को अभी तक कामयाबी से चलते देख हैरान हैं. उमर को एहसास है कि इस युति ने अपनी मियाद पूरी कर ली तो उन्हें जरूर जल्द दिल्ली आ कर होटलिंग के अपने पुराने कारोबार में दिलचस्पी लेनी पड़ सकती है.

इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि उन का व कांग्रेस का गठबंधन कश्मीर और अनंतनाग लोकसभा उपचुनाव जीते. कश्मीर जीतने के लिए तो उन्होंने अपने पिता फारूख अब्दुल्ला को दांव पर लगा दिया है पर अनंतनाग में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सईद ने तसद्दुक हुसैन सैय्यद को खड़ा कर उन की राह में बैरियर लगा दिया है. इन दिनों नरेंद्र मोदी के नाम पर सियासत कर रहीं महबूबा को भाजपा का साथ उस की ही शर्तों पर पसंद आने लगा है तो वहीं अखिलेश यादव का हश्र देख उमर चिंतित हैं, इसलिए हिंदू बाहुल्य जोखिमभरी सीट उन्होंने कांग्रेस को दे दी है. मुसलिम बाहुल्य सीट कश्मीर पर अब्दुल्ला परिवार की साख और फारूख का रुतबा किसी सुबूत का मुहताज नहीं. पर उमर का यह डर भी जायज है कि आजकल वोटर के मिजाज का ठिकाना नहीं कि वह कब, क्या कर दे. 

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