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जीवन की मुसकान

मैं अपनी बेटी के पास अहमदाबाद गई थी. सुबह की सैर के बाद जब हम सब चाय पी रहे थे तो देखा मेरे बाएं हाथ में सोने का कड़ा नहीं था. कहां गिरा, कब गिरा, याद ही नहीं.

सोचा, जहां घूम रहे थे वहीं देखूं. शायद गिरा हो तो मिल जाए. सो, मैं और बेटी दोनों देखने निकले. इतनी देर में सड़क में झाड़ू भी लग चुकी थी. खैर, कचरे वाली से पूछा. उस ने कहा कि एक लड़की, जो औफिस जा रही थी, को  मिला तो था लेकिन वह तो औफिस गई.

अब क्या करें. खैर, उस के घर गए. उस की मम्मी से बात की. फिर उस लड़की से मोबाइल से बात की और बताया जो कड़ा उसे मिला था वह मेरा है. उस ने बोला कि लंचटाइम में वह घर आएगी तब मिल कर दे देगी. उस समय 10 बजे थे. 1 बजे अपनी मम्मी को ले कर हमारे घर आई व मेरा दूसरा कड़ा देख कर (जो मेरे हाथ में था) मेरा कड़ा मुझे लौटा दिया. कड़ा लेते ही मेरे होंठों पर मुसकान आ गई.   

मीना गर्ग

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मुझे पति के साथ हरिद्वार जाना था. अंबाला से हरिद्वार का 170 किलोमीटर का सफर हम ने स्कूटर पर तय करने का निर्णय लिया. हम 3 बजे अंबाला से चले और साढ़े 5 बजे सहारनपुर, पहुंचे. वर्षा होने लगी. जैसेतैसे हम छुटमलपुर पहुंचे ही थे कि हमारा स्कूटर खराब हो गया. हरिद्वार अभी  60 किलोमीटर दूर था. तभी दूध का एक टैंकर आया और उस ने हमें लिफ्ट दे दी.

हम जैसेतैसे रुड़की पहुंचे. हरिद्वार अभी 32 किलोमीटर दूर था और रात के 9 बज गए थे. तभी पास में ही चुंगी के निकट हमें एक सज्जन मिले. हम ने उन्हें अपनी समस्या से अवगत करा कर रात को ठहरने के लिए किसी होटल का पता पूछा. आसपास कोई होटल न था.

उन्होंने हमें अपने घर में ठहरने के पेशकश की. पहले तो हम डर रहे थे, लेकिन बाद में जब उन्होंने हमें अपने बच्चों जैसा बतलाया, तो हम उन के साथ चल पड़े. रात्रि 10 बजे उन के घर पहुंच कर हमें पारिवारिक वातावरण मिला.

अगले दिन सुबह उन्होंने हमें चायनाश्ता करवाया, स्कूटर ठीक करवाने की व्यवस्था की और हरिद्वार जाने का छोटा मार्ग भी बताया. इस व्यवहार के परिणामस्वरूप जब हम ने उन के पोते को कुछ रुपए देने चाहे, तो उन्होंने यह कह कर पैसे लेने से साफ इनकार कर दिया कि उन्होंने जो भी किया इंसानियत के नाते किया. आज भी जब मैं उन सज्जन के बारे में सोचती हूं, तो मन उन के प्रति सम्मान से भर जाता है. शशी बाला 

श्री लगवा कर ही मानीं

कहने वाले गलत नहीं कहते कि बेटों के मुकाबले बेटियां पिता को ज्यादा चाहती हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी अच्छी कथक नृत्यांगना हैं और कांग्रेस प्रवक्ता भी हैं. आमतौर पर शांत रहने वाली शर्मिष्ठा बीते दिनों  अपनी ही पार्टी पर भड़क उठीं जिस की मुकम्मल वजह भी थी, कि कांग्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी की एक फोटो साझा की थी जिस में राजीव गांधी के नाम के पहले तो श्री लगाया था पर प्रणब मुखर्जी के नाम के पहले श्री नहीं लगाया था. शर्मिष्ठा के एतराज पर कांग्रेस ने तुरंत अपनी गलती सुधारी और प्रणब मुखर्जी को भी श्री युक्त कर दिया. यानी अब वह दौर लद रहा है जिस में गांधीनेहरू परिवार के सदस्य ही श्री हुआ करते थे.

यह भी खूब रही

बापू के चश्मे के साथ सरकारी एजेंसियां स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देने में लगी हैं. वे लोगों को घर, महल्ले, नगर, पिकनिक स्पौट्स आदि की स्वच्छता का ध्यान रखने को प्रेरित कर रही हैं. लेकिन जिन विज्ञापनों पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, वे खासे नीरस हैं. वे लोगों का ध्यान बरबस आकृष्ट करने में समर्थ नहीं. ऐसे में पूर्वोत्तर रेलवे की एक पहल लीक से हट कर है जो ध्यान आकर्षित करती है. यह पहल हिंदी फिल्मों, जैसे ‘शोले’, ‘दिलवाले दुलहनियां ले जाएंगे’ के लोकप्रिय संवादों पर आधारित है. हावड़ा स्टेशन पर लगे एक पोस्टर पर नजर ‘‘अरे ओ सांभा, कितना जुर्माना रखे है सरकार गंदगी फैलाने पर?’’

आशा की जानी चाहिए कि इन लोकप्रिय संवादों की भांति यह अभियान लोगों के दिलों में जगह बना लेगा और भारत आचरण एवं परिवेश की स्वच्छता के मामले में सिंगापुर से टक्कर ले सकेगा.       

सत्यस्वरूप दत्त

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गरमी का समय था. हमारे पड़ोसी जांगीड साहब के यहां उन के साले का परिवार आने वाला था. बिजली बारबार आजा रही थी. उस दिन उमस कुछ ज्यादा ही थी. उन के साले जब भी आते थे तो कुछ न कुछ घर में आवश्यकता की चीज जरूर दिला कर जाते थे. यह बात हम सभी पड़ोसियों को मालूम थी. जांगीड साहब मना रहे थे कि बिजली नहीं जानी चाहिए. घर में इन्वर्टर नहीं है, मेहमानों को बड़ी दिक्कत हो जाएगी. यह परेशानी वे हम से भी कई बार शेयर कर चुके थे. मेरे पति बहुत ही हाजिरजवाब हैं. जांगीड साहब के परेशानी बयां करते ही बोले कि आज तो अवश्य ही लाइट जानी चाहिए, तभी तो साले साहब इन्वर्टर दिला कर जाएंगे. फिर कोई भी बिना हंसे नहीं रह सका. 

आशा शर्मा

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मुंबई में रहने वाला मेरा मित्र एक दिन जल्दबाजी में बिना टिकट लिए लोकल ट्रेन में चढ़ गया. उस ने सोचा कि कौन सी रोज चैकिंग होती है. तभी टिकटचैकर टिकट चैक करता हुआ वहां आया और मित्र से टिकट मांगा. मित्र ने इधरउधर हाथ मारते हुए अपना बैग खोला और पिछले दिनों की ढेर सारी टिकटें निकाल कर उन में से उस दिन की टिकट तलाशने का अभिनय करने लगा. टिकटचैकर ने इतनी सारी टिकटें देख कर ‘ठीक है’, ‘ठीक है’ कहा और आगे निकल गया.    

मुकेश जैन ‘पारस’

जय भीम जय भारत

भीमराव अंबेडकर की जयंती अब गाजेबाजे और नाचगाने के साथ इतने धूमधड़ाके से मनाई जाने लगी है कि वे जिंदा होते तो इस ड्रामेबाजी के पीछे छिपी साजिश को समझते हुए यही कहते कि जाओ मेरे दलित भाइयो, पढ़ोलिखो और सरकारी नौकरियां हासिल कर अपना जीवनस्तर सुधारो, उसी में तुम्हारी भलाई है. मुझे भगवान और देवताओं जैसे पूजने से तुम्हारा नुकसान है क्योंकि यह सब तुम नहीं कर रहे हो बल्कि उकसा कर तुम से करवाया जा रहा है.

पर दलित समुदाय अब कुछ समझने की हद पार कर चुका है. वजह, अंबेडकर पर अब आरएसएस और भाजपा ने भी दावेदारी जतानी शुरू कर दी है कि वे तो एक विचार थे. दरअसल, उन का असल मकसद अंबेडकर के मनुवाद विरोधी तेवरों को विसर्जित करना है और जाहिर है इस के लिए उन्हें पहले अंबेडकर को अपनाने का स्वांग तो करना ही पड़ेगा.

अपने अपने अंबेडकर

उत्तर प्रदेश में बाबा साहब अंबेडकर को लेकर राजनीति खेमेबंदी चरम पर पहुंच चुकी है. सभी दलों ने अलग अलग डॉक्टर भीम राव अंबेडकर की जयंती मनाई. लखनऊ में बने अंबेडकर पार्क में बसपा नेता मायावती ने अंबेडकर जयंती मनाई तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हजरतगंज चैराहे पर लगी बाबा साहब की मूर्ति पर फूल चढाकर जंयती मनाई. पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी कार्यालय में ही डॉक्टर अंबेडकर की फोटो पर फूल चढाये. अंबेडकर सभा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल राम नाइक को अपने कार्यालय बुलाकर डॉक्टर अंबेडकर जयंती मनाई. भाजपा ने केन्द्र से लेकर राज्य तक डॉक्टर अंबेडकर का महिमामंडन किया. केन्द्र सरकार ने भीम नाम का मोबाइल ऐप जारी किया तो राज्य सरकार ने अंबेडकर को नीले रंग की जगह केसरिया रंग में दिखाने की कोशिश की.

डॉक्टर अंबेडकर का योगदान पूरे समाज के लिये था. समय के साथ वोट बैंक की राजनीति ने उनको एक वर्ग का नेता बना दिया. इस वर्ग को खुश करने के लिये सभी ने डॉक्टर अंबेडकर की खेमेबंदी कर लोगों को रिझाना शुरू कर दिया. सबकी आस्था डॉक्टर अंबेडकर में है. उनको विचारों को पालन कोई नहीं करता. देश, धर्म, समाज और न्याय व्यवस्था को लेकर डॉक्टर अंबेडकर ने जो कुछ कहा उसको लोग भूल चुके हैं. सभी की कोशिश यह है कि वह अपने को अंबेडकर का करीबी बताकर उनसे जुड़े वर्ग के वोट हासिल कर सके.

भाजपा ने महापुरूषों के नाम पर हो रही राजनीति के प्रभाव को कम करने के लिये जातीय पर धर्म को हावी करने का काम किया. डॉक्टर अंबेडकर से पहले गांधी और पटेल को लेकर वह ऐसा कर चुकी थी. कांग्रेस से गांधी और पटेल की पहचान को छीन लिया. वोट के लिहाज से देखें तो अंबेडकर सबसे बड़े वर्ग का समर्थन हासिल करते हैं. अब भाजपा इस वर्ग को अपने निशाने पर रखकर काम कर रही है. काफी हद तक यह वर्ग अब अपने पुराने मुद्दों को छोड़कर भाजपा के सबका साथ सबका विकास से प्रभावित हो चुकी है.

बसपा नेता मायावती के लिये अच्छा मौका था कि वह समाज के लिये कुछ करे. अब वह चूक गई तो भाजपा ने धर्म के रास्ते उस समाज में भी सेंधमारी कर लिया है. इससे परेशान मायावती अब दूसरे दलों से तालमेल को तैयार दिखती है. जब तक मायावती और अखिलेश दोनों ही अपने अपने समाज और वर्ग को छुआछुत, आंडबर, रूढीवादिता से दूर नहीं करेंगे तब तक अब यह समाज वापस उनके पास नहीं आयेगा. जरूरी है कि दोनों की नेता ईमानदारी से समाज के लिये काम करे.

भाजपा के लोग अब अंबेडकर के हिन्दू विरोधी विचारों को दरकिनार कर वह अंबेडकर के हिन्दूवादी और राष्ट्रवादी विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं. एक तरह से अंबेडकर के विचारों को भगवा रंग में रंग कर पेश करने की तैयारी है. जिससे वह बाबा साहब से जुड़े लोगों को अपनी ओर मोड़ सकें.

टूटे सपने, उड़ी नींद

बातबात में कट्टर हिंदूवादियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बिफरती रहने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब अपेक्षाकृत शांत हैं. जो दिल्ली और बिहार में हुआ था वह उत्तर प्रदेश में नहीं दोहराया गया तो उन के सपनों में भी अब सब से बड़ी कुरसी का आना बंद हो गया है. उन्होंने अब सारा ध्यान मौजूदा कुरसी को बचाए रखने में लगा दिया है.

चिंता की नई बात आरएसएस का वह प्लान है जिस के तहत उस ने बंगाल के गांवगांव में जा कर लोगों को यह बताने का बीड़ा उठा लिया है कि वामपंथदामपंथ से कुछ नहीं होने वाला. अब वक्त आ गया है कि बंगाल के लोग, जो तिरंगे की आन, बान व शान को औरों से बेहतर समझते हैं, वैचारिक गुलामी से बाहर निकलें और राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करते वंदेमातरम को ढाका होते हुए इसलामाबाद तक पहुंचाएं. 

 

मखमल सी बांहों में…

शबनमशबनम बातें उस की

कलियोंकलियों किस्से हैं

कैसे बताऊं नाम मैं उस का

बागेबहारां जिस से है

देख कर उस का हुस्नेजमाल

सितारे प्रकृति से रूठे हैं

चांद भी उस से जलता है

यह फसाना क्या झूठा है

जुगनू सी चमके है वो

मेरी तनहातनहा रातों में

उस की मुहब्बत में जो गुजरा

दिन वह मेरा अच्छा है

उस की मखमल सी बांहों में

खो जाते हैं दिनरात हमारे

रहती दुनिया तक उस का ही हूं

इतना ही वादा उस से है.

– शमा खान

ये विघ्नकर्ता

जो संबंध संसद का वाकआउट से है, वह देव उठने का शादियों से है. देव उठे नहीं कि बैंड बजे नहीं. खबर सुन कर घोडि़यां हिनहिनाने लगती हैं, उस से ज्यादा भाईबंधु हिनहिनाने लगते हैं. शहनाई क्या बजती है, वरवधू के मांबाप के दिलों की धड़कनें बजने लगती हैं. और जब तक सारा जमाना उन धड़कनों को सुन न ले, किसी को चैन नहीं पड़ता.

शादी में वास्तविक समस्याएं कम होती हैं. जो होती हैं, उन का वास्तविकता से कोईर् संबंध नहीं होता. शादी में समस्याएं उत्पन्न की जाती हैं. विघ्न पड़ने के बाद ही कोई शादी निर्विघ्न संपन्न होती हैं. शादी वाले घरों में हर चेहरा तनाव से ढोलक की तरह तना हुआ होना चाहिए, वरना कई संशय खड़े हो जाते हैं. खासकर लड़की वालों के चेहरे जरा भी ढीले नहीं पड़ने चाहिए, ताकि लड़के वाले जब चाहे उन्हें बजा सकें और उस से उत्पन्न होने वाली गूंज से अपना उठा हुआ ईगो शांत कर सकें.

वैसे, समस्या की शुरुआत तभी हो जाती है जब पहली बार लड़के या लड़की वाले देखने आते हैं. आसपड़ोस, निकटस्थ लोगों के कान एंटीना की तरह 4 इंच लंबे हो कर घर की तरफ मुड़ जाते हैं, यह संकेत पकड़ने के लिए कि रिश्ता पक्का हुआ या नहीं. बिना सैटेलाइट ही ये सूक्ष्म संकेत सूत्र पकड़ लेते हैं कि क्याक्या खामियां निकाल गए हैं, डिमांड क्या रखी है. अलबत्ता तो इन की कृपा से रिश्ता पक्का होता नहीं, क्योंकि विवाह योग्य लड़केलड़की के घरों के पड़ोसियों के यहां पत्थर बहुतायात में पाए जाते हैं, जिन के निशाने अचूक होते हैं. होता हुआ रिश्ता पड़ोसियों के सीने पर सांप लोटने की तरह होता है.

अगर रिश्ता पक्का हो जाए, तो ये उसी दिन से कमर कस लेते हैं. कमर भी किस कदर कसते हैं, इस का राज तब खुलता है जब शादी की तारीख के लिए हलदी की गांठ खुलती है.

भाईबंधु हैं, तो यह उन का जन्मसिद्घ अधिकार है कि वे शादी को निर्विघ्न संपन्न न होने दें. विवाह की जो वेदी सजी है, उस में वे अपनी ओर से परेशानियों का घी डालते रहें ताकि उस से उठने वाला धुआं लड़केलड़की के मांबाप की आंखों में पानी ला दे.

यह पानी भाईबंधुओं के मन की शांति का तरल स्रोत है, जो उन के कलेजों पर ठंडे छीटों के रूप में पड़ता है. विघ्नहर्त्ता भले ही गणेश होंगे, लेकिन इन विघ्नकर्ताओं की मानमनुहार के बिना गणेशजी भी शादी संपन्न नहीं करवा सकते. अब तो इन के नखरे देख कर गणेशजी भी इन्हीं से आग्रह करते होंगे.

खैर, ज्योंज्यों शादी का दिन नजदीक आता है, इन भाईबंधुओं की एकाएक चालढाल बदल जाती है. रूठेरूठे से सरकार नजर आने लगते हैं. उन की उत्सुकता, जिज्ञासा इस बात को ले कर रहती है कि शादी में मनाने के लिए कब, कौन तशरीफ ला रहा है. उसे वहीं धोबीपछाड़ देने की पूरी तैयारी रहती है. जब शादी वाला इन्हें शादी की तारीख की खबर देता है, तो ये इस मुद्रा में आ जाते हैं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत व पाक के प्रधानमंत्री आमनेसामने पड़ गए हों.

इन की पहले से ऐंठी हुई गरदनें और ऐंठ जाती हैं, चेहरे पर न के दृढ़भाव उभर आते हैं, मुंह से बोल नहीं फूटते, गोया एकाएक भारत-पाक वार्त्ता अकारण बंद हो गईर् हो. समझदारों को दरअसल संकेत होते हैं कि ये अब शादी में बिना नाजनखरे उठाए, शादी वाले को बिना झुकाए, पगड़ी कदमों में रखवाए बिना आने से रहे. फिर न्योते के बदले में शादी में न आने की शिकायतों का लंबाचौड़ा डौजियर सौंप देते हैं, जिसे देख हतप्रभ शादी वाला सोचता है, न्योता दे कर गलती कर दी या शादी कर के.

खैर, ये बिना जैड प्लस के ही अतिविशिष्ठ की श्रेणी में आ जाते हैं. फिर अगले कुछ रोज तक शादी वाले घर के लोग मिल्खा बने सुबहशाम इन के यहां दौड़ लगाते रहते हैं. आज यह रस्म है, कल तिलक ले कर जाना है, परसों तिलक आएगा, शाम को तेलबान है, आज मेहंदी है, रात को लेडीज संगीत है, रसोई का सामान लाना है. उफ , बहुत काम बाकी हैं, कड़ाही चढ़नी है, टैंट तनना है, कार्ड बंटने हैं.

ज्योंज्यों रस्में निकट आती हैं, इन की मूंछें बढ़ते सैंसेक्स की तरह ऊपर खड़ी होने लगती हैं. वरवधू के मांबाप रुपए की तरह कमजोर और ये महाशय डौलर की तरह मजबूत हो लेते हैं. जरा सा झुकने को तैयार नहीं होते. इन के यहां इतनी हाजिरी देनी पड़ती हैं, जितनी तो सरकारी बाबू एक लाइसैंस के लिए भी नहीं लगवाते. गोया, उन से कोई संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी परिषद की सदस्यता पर मुहर लगाने का अनुरोध किया जा रहा हो.

अंत में वरवधू के मांबाप की घोर पराजय घोषणा के बाद ये शादी में तशरीफ ले भी आते हैं, मगर पूरी शादी के दौरान मुंह, पूरियों से ज्यादा, फूले रहते हैं. चाल में एहसान करने के भाव होते हैं, मानो नहीं आते तो लड़की कुंआरी बैठी रहती, इन्हें उपस्थित न पा कर बरात दरवाजे से लौट जाती, लड़के की ताउम्र शादी नहीं होती. बिना वजह की कटुता इतनी ज्यादा होती है कि शादी की रसदार मिठाइयां भी इन के मिजाज में मिठास नहीं घोल पातीं.

भाईबंधु, चाचाताऊ, देवरजेठ, देवरानीजेठानी इत्यादि यों तो निकटतम रिश्ते के नाम हैं, मगर शादीब्याह में इन से अधिकतम दूर भी कोई नहीं होता. गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो ये विघ्नकर्ता हैं. इन का एकमात्र उद्देश्य शादी निर्विघ्न, निरापद, आराम से निबटवाने में मदद करने के बजाय अड़चनें पैदा करना होता है. जिस दिन शादी निबटती है, लड़की के मांबाप का तो कारगिल फतह हो जाता है. इधर, ये सफलता के टाइगर हिल पर अपनी मूंछों का झंडा इस सार्वजनिक घोषणा के साथ गाड़ देते हैं कि गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो हम विघ्नकर्ता हैं.

खाकी वरदी आई काम

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मजनुओं को पकड़ने का अभियान यों तो सही है पर यह समाज की दुर्दशा बयां करता है. इस अभियान में हर पुलिस चौकी में 3-4 सिपाहियों की टीम बनाई गई है जो सड़क पर जमा छोकरों को छेड़खानी करते पकड़े जाने पर हिरासत में ले लेगी. टीम के लोग अविवाहित लगने वाले जोड़ों को भी फटकार लगाएंगे ताकि देश का चारित्रिक स्तर सुधरे.

इस का अर्थ साफ है कि सदियों के धर्मप्रचार, प्रवचनों, मंत्रों, हवनों, पूजापाठों, मूर्तिपूजाओं, आश्रमों, मठों की मौजूदगी के बावजूद धर्म अपने ही भक्तों व श्रद्घालुओं को आज तक सभ्यता का पहला पाठ, दूसरों की इज्जत करो और औरतों की सुरक्षा करो, नहीं सिखा पाया है. घंटों चलने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में भगवानों व देवताओं के चमत्कारों का विस्तृत विवरण होता है और प्रवचन करने वाले बारबार संतों की सेवा करने का आदेश तो देते हैं पर क्या वे भक्तों को सही व्यवहार करने का आदेश नहीं दे सकते. जो भगवान भक्तों के घर भर सकते हैं वे क्या भक्तों की औरतों को सुरक्षा नहीं दे सकते? क्या भगवान वाकई इतने कमजोर ही हैं कि वे सिर्फ महंतों, संतों, भगवाओं को सत्ता, धन, स्त्री, गौ सुख दे सकते हैं?

योगी आदित्यनाथ जिस धार्मिक जोश के सहारे मुख्यमंत्री बने हैं, उसे भगवा वरदी की जगह खाकी वरदी की जरूरत ही क्यों पड़ी?

असल में धर्म ने कहीं भी औरतों या कमजोरों को सुरक्षा नहीं दी. उस ने उन्हें हमेशा अपने सुखों के लिए इस्तेमाल किया. राजा धर्मों का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते रहे हैं और बदले में धर्मगुरु उन्हें भगवान के रूप में जनता में प्रचारित करते रहे हैं. धर्म ने आम आदमी की न तो प्रकृति से रक्षा की है, न  बाहरी दुश्मनों से और न ही स्थानीय गुंडों से. अब धार्मिक पुलिस बन रही है जो राजनीतिक दुश्मनी भी निकालेगी और दिखावे के लिए मजनुओं को ठीक करेगी. सड़कछाप लड़कों, लफंगों को ठीक करने के लिए पुलिस को तो हमेशा ही तैयार रहना चाहिए. जब इस आदेश पर धार्मिक मुलम्मा चढ़ा होगा तो इस का भरपूर दुरुपयोग होगा ही.

जैसे गौरक्षकों ने उत्पात मचाया है, वैसे ही अब चरित्ररक्षक बन जाएंगे और हर चौराहे पर भगवा अंगोछा पहने वसूली करने लगेंगे. यह लोकतंत्र के लिए कितना घातक है, आम आदमी समझ नहीं पाएगा. लोकतंत्र का शेर होता ही कागजी है क्योंकि वह कागजों पर लिखे आदेशों से चलता है. लठैतों की भीड़ उसे दबोच डाले तो आश्चर्य नहीं.

 

यह कैसी राजभक्ति?

खुद को धर्म, जाति विशेष या संस्कृति का अघोषित ठेकेदार समझने वाले स्थानीय संगठनों द्वारा कानून अपने हाथ में लेने का कुछ समय से देश में चलन सा हो गया है. करणी सेना की करतूत कुछ इसी तरह की है. राजपूत करणी सेना ने जयपुर में फिल्माई जा रही फिल्म ‘पद्मावती’ के सैट पर ऊधम मचाया और फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली से मारपीट की जबकि संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन हाउस ने करणी सेना को पत्र लिख कर स्पष्ट भी किया कि फिल्म में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच सपने में रोमांस किए जाने जैसा कोईर् सीन नहीं है.

इस बारे में उन्होंने सितंबर 2016 में राजपूत सभा को एक पत्र लिखा था. पत्र में उन्होंने कहा था कि फिल्म ऐतिहासिक तौर पर पूरी तरह सटीक होगी. बावजूद इस के 27 जनवरी को जयपुर में फिल्म के सैट पर करणी सेना द्वारा हंगामा और मारपीट की गई, जिसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता. बाद में 29 जनवरी को लिखे गए पत्र में संजयलीला भंसाली ने यह रिक्वैस्ट की कि वे अपने शूट को आगे बढ़ाने जा रहे हैं और उन के प्रोडक्शन के खिलाफ कोई कदम न उठाया जाए. गौर करने की बात यह थी कि हमले से पहले कथित करणी सेना के सदस्यों ने तो फिल्म का कोई टीजर, ट्रेलर या लीक्ड सीन भी नहीं देखा था. फिर भी फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की गई, शूटिंग का सामान तोड़ा गया और संजय लीला भंसाली को चांटे मारे गए. करणी सेना के लोगों का कहना था कि फिल्म में रानी पद्मावती से जुड़े इतिहास से छेड़छाड़ की गई है.

बौलीवुड के कई जानेमाने और फिल्म निर्माताओं, अभिनेताओं ने भंसाली पर हुए हमले की निंदा की. शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, ‘‘ये मूर्ख तत्त्व किसी भी हिंदू विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते. दुनिया का कोईर् भी धर्म किसी को हिंसा करने या कानून को अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं देता. मुझे नहीं पता कि वे किस की राजभक्ति करते हैं और किस चीज का विरोध कर रहे हैं. क्या उन्होंने भंसाली की फिल्म पद्मावती देखी है? क्या उन्हें पता है उस में क्या है? वे उस चीज का विरोध कैसे कर सकते हैं, जो हुआ ही नहीं है?’’

निर्देशक अनुराग कश्यप ने भी संजय लीला भंसाली के साथ जयपुर में हुई घटना का कड़ा विरोध किया. सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों पर अनुराग कश्यप ने फेसबुक पोस्ट करते हुए लिखा, ‘‘आप की यह भीड़ मुझे डरा नहीं सकती. मैं ने हमेशा सवाल करना सीखा है और मैं अपने सवाल करने के अधिकार का हमेशा इस्तेमाल करूंगा. मैं कई मुद्दों पर तब से आवाज उठा रहा हूं जब ये बिना चेहरे और आवाज के लोग सोशल मीडिया पर एक भीड़ बन कर नहीं होते थे. मुझे फर्क नहीं पड़ता आप क्या कहते या करते हैं. आप मुझ पर मौखिक या शारीरिक हमले कर सकते हैं. मैं हमेशा गलत विरोध में आवाज उठाऊंगा. ‘‘मैं ने हमेशा से सरकार चलाने वालों से सवाल किया है. जब मैं छात्र था, तब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे. तब मुझे सिखाया गया था कि प्रधानमंत्री देश का प्रमुख होता है, जिस से आप सवाल पूछ, जवाब मांग सकते हैं और बहस कर सकते हैं. उस से डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसे आप ने चुना है और वह आप के भले के लिए काम करता है.’’

अनुराग कश्यप के बाद सैंसर बोर्ड यानी सीबीएफसी के अध्यक्ष पहलाज निहलानी की प्रतिक्रिया भी बहुत कुछ कहती है. पहलाज निहलानी ने कहा, ‘‘फिल्मकार संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्मों के जरिए भारतीय पर्यटन को काफी बढ़ावा दिया है.’’ उन पर जयपुर में हुए हमले की निंदा करते हुए निहलानी ने कहा, ‘‘यह घटना राजस्थान पर्यटन के लिए झटका है.’’ उन्होंने इस हिंसा को शर्मनाक घटना बताते हुए कहा, ‘‘संजय लीला भंसाली ने सिनेमा को दुनिया के हर कोने में पहुंचाया है. वे दुनियाभर में जीनियस के रूप में जाने जाते हैं और उन्होंने भारत के पर्यटन के लिए बहुत कुछ किया भी है.’’ भंसाली की अन्य फिल्मों ‘खामोशी : द म्यूजिकल’ और ‘गुजारिश’ की शूटिंग्स गोवा में की गई थी और उन फिल्मों ने गोवा के तटीय सौंदर्य का प्रचार किया था. ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘गोलियों की रासलीला-रामलीला’ से गुजरात की संस्कृति का प्रचार हुआ था तो ‘बाजीराव मस्तानी’ ने दुनियाभर में मराठा योद्धाओं की कहानी का प्रचारप्रसार किया. और अब ‘पद्मावती’ राजस्थान की समृद्ध संस्कृति और विरासत का एक नया अध्याय खोलने जा रही थी. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या ये गुंडे तत्त्व भंसाली को राजस्थान में शूटिंग करने देंगे? क्या वे कभी वहां वापस जाएंगे? यह घटना राजस्थान पर्यटन के लिए बड़े घाटे का सबब बन सकती है.

राज्य सरकार की जिम्मेदारी

भंसाली को जयपुर में शूटिंग करने की अनुमति देने के बाद उन की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी, जो उस ने अच्छी तरह नहीं निभाई. जबकि मौरीशस और दक्षिण अफ्रीका में भारतीय फिल्मों को शूटिंग के लिए हर तरह की सुरक्षा व मदद उपलब्ध होती हैं. भारत में सहायता की बात तो दूर, शूट करने वाली टीम के सदस्यों और उपकरणों की सुरक्षा तक खतरे में होती है. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक संजय लीला भंसाली पर फिल्म में राजपूत महारानी पद्मावती के प्रेम में पड़े दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी से संबंधित इतिहास से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया गया है. संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ के कारण इस किरदार के होने और न होने पर खूब बहस हो रही है. जहां कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पद्मावती एक साहित्यिक किरदार है वहीं कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि साहित्य इतिहास से बिलकुल अलहदा नहीं होता. कहते हैं कि 1540 ईसवी में शेरशाह का जमाना था और उसी वक्त मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना की थी. तब शेरशाह उत्तर भारत में अफगानों का एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर रहे थे.

बाबर के बाद हुमायूं को खदेड़ते हुए ईरान की सीमा तक पहुंच कर शेरशाह ने अपने साम्राज्य की स्थापना की थी. जायसी चिश्ती सूफी थे. चिश्तियों ने हिंदुस्तान के लोगों को जोड़ने का काम किया था. उन्होंने ऐसी जबान में बोलना और लिखना शुरू किया था, जिसे आम लोग समझ सकते थे. जायसी ने पद्मावत ठेठ अवधि भाषा में लिखी थी. अवधि भाषा को उस जमाने के हिंदूमुसलमान दोनों समझते थे. कहते हैं कि पद्मावत में राजा रतनसेन और पद्मावती का जो प्रेमप्रसंग है, उसे जायसी ने सूफियों के तरीके से लिखा था. प्रकृति के लिए सबकुछ निछावर कर देना सूफियों की आदत में शुमार रहा है. पद्मावत में इसी कोशिश की झलक मिलती है. जबकि अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईसवी में चित्तौड़ को जीता था और जायसी ने पद्मावत में खिलजी को खलनायक की तरह दिखाया. जायसी ने इस में अलाउद्दीन खिलजी के साम्राज्य को दुनिया के रूप में दिखाया. वहीं रतनसेन और पद्मावती के बीच जो प्रेम है वह प्रकृति के लिए समर्पित है. दोनों एकदूसरे में मिल कर खत्म हो जाते हैं.

पद्मावत सूफियों के लिए प्रेमाख्यान है. इन्हीं प्रेमाख्यानों में एक ‘चंदायन’ है जिसे मुल्ला दाऊद ने लिखा था. इस के बाद ‘मधुमालती’ और ‘मृगावती’ जैसे आख्यान भी लिखे गए. इन सभी में पद्मावत की हैसियत सब से ज्यादा है. इस कहानी का जिक्र वाचिक परंपरा में रहा होगा. भारतीय परंपराओं में जो कहानियां अस्तित्व में थीं, उन्हें सूफियों ने अपने अंदाज में और अपनी जरूरत के हिसाब से लिखा है. यह सही है कि पद्मावती किसी एक मुकम्मल ऐतिहासिक किरदार के रूप में नहीं है. हमें ऐसा कहीं नहीं मिलेगा कि अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और तब पद्मावती बचने की कोशिश कर रही थी.

पद्मावती की कहानी जायसी से शुरू जरूर होती है लेकिन इस के बाद रुकती नहीं है. पद्मावती का जिक्र 15वीं से ले कर 16वीं, 18वीं शताब्दी तक में भी मिलता है. अलाउद्दीन और पद्मावती को ले कर लोगों की अलगअलग व्याख्या रही है और इस तरह यह कहानी हमारे इतिहास का हिस्सा बन जाती है. फलस्वरूप, पद्मावती के फिल्मांकन के विरोध को जायज नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे धार्मिक कट्टर संगठनों की मनमरजी के आगे प्रशासन, पुलिस क्यों घुटने टेक देती है, यह समझ से परे है. अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बन कर मंडरा रहे करणी सेना जैसे असामाजिक तत्त्वों पर लगाम कसनी जरूरी है.

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