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गरमी में करें खेत की गहरी जुताई

रबी और जायद की कटाई के बाद कुछ दिनों तक अधिकतर खेत खाली पड़े रहते  हैं. इन खाली दिनों में खेतों की गहरी जुताई का बेहद महत्त्व  है. गरमी की जुताई से अगली फसल को कई तरह के लाभ मिलते  हैं. इस से फसल पर कीटों और रोगों का हमला कम होता  है और उपज में इजाफा होता है.

गरमी की गहरी जुताई के फायदे

जीवांश खाद की प्राप्ति : गरमी के समय में रबी व जायद की फसल कट जाने के बाद खेत की जुताई करने से फसल के अवशेष डंठल व पत्तियां आदि भूमि में दब जाते  हैं, जो बारिश के मौसम में सड़ कर जमीन को जीवांश पदार्थ मुहैया कराते  हैं.

हानिकारक कीटों से बचाव  : गरमी की जुताई से रबी या जायद की फसलों पर लगे हुए हानिकारक कीटों के अंडे व लार्वा, जो जमीन की दरारों में छिपे होते  हैं, मईजून की तेज धूप से नष्ट हो जाते  हैं. इस से खेत कीटपतंगों से सुरक्षित हो जाता  है और अगली फसल में कीटों के हमले की संभावना कम हो जाती है.

मिट्टी रोगों से बचाव : गरमी की जुताई से खरपतवारों के बीज तेज गरमी से नष्ट हो जाते  हैं. बाकी बचे बीज ज्यादा गहराई में पहुंच जाने से उन का अंकुरण नहीं हो पाता. नतीजतन खेत को खरपतवार से नजात मिल जाती  है.

कीटनाशकों के प्रभाव से मुक्ति : रबी या खरीफ फसलों में इस्तेमाल किए गए कीटनाशकों व खरपतवारनाशकों का असर जमीन में गहराई तक हो जाता है. गरमी में जुताई कर देने से खेत में उन का प्रभाव खत्म हो जाता है. तेज धूप से ये जहरीले रसायन विघटित हो जाते  हैं और उन का खेत में असर नहीं रह जाता है.

रासायनिक उर्वरकों का विघटन  : खेत में इस्तेमाल किए गए रासायनिक उर्वरकों का 65 फीसदी हिस्सा अघुलनशील हालत में खेत में पड़ा रह जाता  है, जो धीरेधीरे खेत को बंजर बनाता है. गरमी की जुताई से सूर्य की तेज धूप से ये रसायन विघटित हो कर घुलनशील उर्वरकों में बदल जाते  हैं और अगली फसल को पोषण देते  हैं.

मिट्टी में वायु संचार : बारबार ट्रैक्टर जैसे  भारी वाहनों से जुताई व सिंचाई करने से मिट्टी के कणों के बीच का खाली स्थान कम हो जाता  है, यानी खेत की मिट्टी सख्त व कठोर हो जाती  है. इस से मिट्टी में हवा का आनाजाना रुक जाता है, जिस से उस की उर्वरता कम हो जाती  है. गरमी की जुताई से मिट्टी की नमी खत्म होने लगती  है और कणों के बीच का खाली स्थान बढ़ जाता है यानी पोली हो जाती  है. इस से उस में हवा का आनाजाना होने लगता  है, जो फसल की सेहत के लिए अच्छा होता  है.

जलधारण कूवत का विकास : गरमी की जुताई से खेत की नमी काफी गहराई तक सूख जाती है. मिट्टी के सूराख खुल जाने से बारिश का पानी जमीन द्वारा सोख लिया जाता है, जिस से मिट्टी की जलधारण कूवत बढ़ जाती  है व नमी काफी मात्रा में खेत में मौजूद रहती  है. यह नमी खरीफ की फसल के उत्पादन में काम आती  है.

कैसे करें गरमी की जुताई  : गरमी के समय में खेत की जुताई खेत के ढाल के विपरीत करें. इस से बारिश का पानी ज्यादा से ज्यादा खेत द्वारा सोखा जाएगा. इस से जमीन का कटाव रोकने में भी मदद मिलेगी. हलकी व रेतीली जमीन में ज्यादा जुताई न करें, क्योंकि इस से मिट्टी भुरभुरी हो जाती  है और हवा व बरसात से मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है.

डा. एलसी वर्मा, डा. एसके यादव, डा. आरपी सिंह
कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, कोटवा, आजमगढ़

फिरनी का स्वाद सदा रहेगा याद

फिरनी के फायदे

चावल में कार्बोहाइड्रेट होता  है, जो इंस्टेंट एनर्जी देता है. फिरनी में काजू डालते  हैं, जो शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है. काजू दिल के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद होता  है. काजू ब्लडप्रेशर को कम करने में मदद करता  है. काजू हमारी हड्डियों को मजबूत बनाता  है. काजू वजन कम करने में मदद करता  है. ऐसे में फिरनी खाने से शरीर को लाभ होता  है. यह दूसरी मिठाइयों की तरह नुकसान नहीं करती है. खास त्योहारों पर बनाई जाने वाली फिरनी अब खाने के बाद की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली मीठी डिश बन गई  है. छोटेबड़े सभी किस्म के होटलों और रेस्त्राओं में इस को बनाया जा रहा है.

फिरनी एक मीठा  व्यंजन है. इसे बहुत ही कम समय में बनाया जा सकता है. चावल की खीर की जगह यह खाने में बहुत अलग होती  है. फिरनी खाने में जितनी स्वादिष्ठ लगती  है, इसे बनाना उतना ही आसान है.बच्चों को  भी ये डिश बहुत पसंद आती  है. फिरनी पंजाबी लोग बहुत पसंद करते  हैं. अब यह धीरेधीरे हर जगह के लोगों को पसंद आने लगी  है. जिस समय नया चावल बाजार में आता  है, उस समय बहुत सारे लोग खुशी में फिरनी बनाते और खाते  हैं . अलगअलग स्वाद के लिए कभी पिस्ता फिरनी, तो कभी मैंगो फिरनी भी तैयार की जाती  है. इस से फिरनी के साथ मेवों और ताजा फलों के स्वाद का भी एहसास मिलता  है.

लखनऊ के गोमतीनगर इलाके में चल रहे करीम रेस्त्रां में फिरनी को बहुत ही अच्छी तरह से बनाया जाता  है. अनुराग सिंह और श्वेता सिंह बताते  हैं कि वैसे यहां आने वाले करीम के नानवेज व्यंजन सब से ज्यादा पसंद करते हैं. खाने के बाद मिठाई के रूप में फिरनी लोगों को खूब पसंद आती  है. फिरनी को मिट्टी की छोटी सी कटोरी में रख कर दिया जाता है. जो खाने के स्वाद को और भी बढ़ा देती है.

खाने से पहले इसे फ्रिज में रख कर ठंडा किया जाता  है. फिरनी में पड़े मेवे इसे और भी खास बना देते हैं. खोए की जगह इस में दूध का इस्तेमाल किया जाता  है. ऐसे में यह अलग किस्म का स्वाद देती है, जो ताजगी का एहसास कराता  है. फिरनी बनाने की सामग्री : फुल क्रीम दूध 1 लीटर, चावल 100 ग्राम, चीन 1 मध्यम कटोरी, काजू 50 ग्राम, बादाम 50 ग्राम किशमिश 25 ग्राम, छोटी इलायची 2, पिसा नारियल 20 से 30 ग्राम.

फिरनी बनाने के लिए सब से पहले चावल को 30 मिनट के लिए भिगो कर रख दें. दूध को उबाल कर थोड़ा गाढ़ा कर लें और उस में चीनी डाल कर धीरेधीरे मिलाएं. काजू, बादाम को छोटेछोटे टुकड़ों में काट लें. अब उबलते हुए दूध में काजू, बादाम, छोटी इलायची, किशमिश और पिसा नारियल डाल दें. इस में पिस्ता और केसर भी डाल सकते  हैं. सब कुछ डालने के बाद दूध को अच्छे से मिला लें और दूध को उबलने दें. अब जो चावल भिगो कर रखा था, उसे थोड़ा सा पानी डाल कर पीस लें. पिसे हुए चावल को दूध के मिक्सचर में धीरेधीरे डालें, ध्यान रखें कि इसे लगातार चलाते रहें, नहीं तो इस में गांठ पड़ जाएगी.

जब दूध गाढ़ा हो जाए, तो गैस की आंच बंद कर दें. ध्यान रखें, फिरनी सूखे नहीं. अब फिरनी को थोड़ा ठंडा होने दें. जब फिरनी ठंडी हो जाए, तो बाउल में डाल कर काजू, किशमिश, बादाम और पिसे गोले से सजा दें. अब इस बाउल को 5 से 10 मिनट के लिए फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें. जब फिरनी ठंडी हो जाए, तो सर्व करें. फिरनी को  ठंडा ही खाया जाता है. अगर फिरनी ज्यादा सूख जाए, तो इसे पतला करने के लिए ठंडा दूध डाल कर मिला लें.

गेंदा उगाएं अच्छी आमदनी पाएं

मशहूर फूल गेंदा की उत्पत्ति दक्षिण अमेरिका और मैक्सिको की मानी जाती है. गेंदे की खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु और मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है. गेंदे के पौधे में पुष्पन की अवधि अधिक होने के साथ ही साथ सुंदर पुष्प व इस के पुष्प का जीवनकाल अच्छा होने से पूरे विश्व में गेंदे के फूल की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. मुख्य तौर पर गेंदे की 3 प्रजातियों टैंजेटिस इरेक्टा (अफ्रीकन गेंदा), टैंजेटिस पेटुला (फ्रेंच गेंदा) और टैंजेटिस माइन्यूटा (जंगली गेंदा) का इस्तेमाल विभिन्न मकसदों के लिए किया जाता है. अफ्रीकन और फ्रेंच गेंदे के फूलों का इस्तेमाल माला बनाने, पार्टी या शादी के पंडाल को सजाने, शादी में गाड़ी की सजावट और धार्मिक जगहों में पूजा के लिए किया जाता है. इस के अलावा इसे गमलों और क्यारियों में लगा कर घर, पार्क वगैरह जगहों को सजाया जाता है.

अफ्रीकन गेंदे की कुछ प्रजातियां, जिन की पुष्प डंडी लंबी होती है, उन के पुष्पों को डंडी के साथ काट कर घर के अंदर गुलदस्तों में लगा कर सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पिछले कुछ सालों में दक्षिण भारत में अफ्रीकन गेंदे का क्षेत्रफल इस के फूलों की पंखुडि़यों से प्रसंस्करण विधि द्वारा कैरोटिनोएड्स निकालने के कारण बढ़ा है और कैरोटिनाएड्स का अधिकांश इस्तेमाल पोल्ट्री फीड (मुरगी के दाने) में किया जा रहा है. इस प्रकार का पोल्ट्री फीड मुरगी को खिलाने से उस के अंडे के योक और मांस का रंग पीला हो जाता है. ऐसे अंडों और मांस की मांग बाजार में ज्यादा है. दक्षिण भारत से कैरोटिनोएड्स को लगातार बाहर के तमाम देशों में  भेजा जा रहा है.

ज्गली गेंदे के पौधों से प्रसंस्करण विधि द्वारा सुगंधित तेल निकाला जाता है. जंगली गेंदा दक्षिणपश्चिमी हिमालय में 1000 से 2500 मीटर समुद्र तल की ऊंचाई तक हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड एवं जम्मूकश्मीर के विभिन्न भागों में जंगली तौर पर पाया जाता है और इस क्षेत्र के कुछ किसान कारोबारी फसल के तौर पर इस की खेती भी कर रहे हैं. फ्रांस, केनिया और आस्ट्रेलिया मुख्यतौर पर जंगली गेंदे से तेल निकालने का काम बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. गेंदे का प्रयोग इस की पंखुडि़यों के रस को आंख की बीमारी और अल्सर के उपचार के लिए भी किया जाता है. गेंदे की खेती करने से खेत में निमेटोड का प्रकोप बहुत कम हो जाता है.

अफ्रीकन और फ्रेंच गेंदे की खेती भारत के कई हिस्सों में की जाती है. निचले पहाड़ी इलाकों में गेंदे के फूलों का उत्पादन उस समय होता है, जब मैदानी इलाकों में (गरमी का मौसम) उत्पादन घट जाता है, लेकिन मांग बढ़ जाती है. साथ ही, गरमियों में मैदानी इलाकों में इस के पुष्प उत्पादन की लागत अधिक सिंचाई करने के कारण बढ़ जाती है.

जलवायु

अफ्रीकन और फ्रेंच गेंदा दूसरे मौसमी फूलों जैसा नहीं है, जो साल में 1 बार ही पुष्प उत्पादन करेगा, बल्कि यह विभिन्न समय पर पौध रोपण करने पर हर साल पुष्पोत्पादन करता रहता है. खुली जगह जहां पर सूर्य की रोशनी सुबह से शाम तक रहती हो, ऐसी जगह पर गेंदे की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है. छायादार जगहों पर इस के पुष्प उत्पादन की दर बहुत कम हो जाती है और क्वालिटी भी घट जाती है. शीतोष्ण जलवायु को छोड़ कर अन्य जलवायु में इस की खेती पूरे साल की जा सकती है. शीतोष्ण जलवायु में इस का पुष्पोत्पादन केवल गरमी के मौसम में किया जाता है.

प्रवर्धन

गेंदे का प्रवर्धन बीज और वानस्पतिक भाग शाखा से कलम विधि द्वारा किया जाता है. वानस्पतिक विधि द्वारा प्रवर्धन करने से पौधे पैतृक जैसे ही उत्पादित होते हैं. व्यावसायिक स्तर पर गेंदे का प्रवर्धन बीज द्वारा किया जाता है. गेंदे का बीज प्रति हेक्टेयर लगभग 800 ग्राम से 1000 ग्राम (1 किलोग्राम) की दर से लगता है. गेंदे का प्रवर्धन कलम विधि द्वारा करने के लिए 6 से 8 सेंटीमीटर लंबी कलम पौधे के ऊपरी भाग से लेते हैं. पौधे से कलम को अलग करने के बाद कलम के निचले हिस्से से 3 से 4 सेंटीमीटर तक सभी पत्तियों को ब्लेड से काट देते हैं और कलम के निचले भाग को तिरछा काटते हैं. इस के बाद कलम को बालू में 2 से 3 सेंटीमीटर गहराई पर लगा देते हैं. कलम को बालू में लगा देने के 20 से 25 दिनों के बाद कलम में जडें़ बन जाती हैं. इस तरह वानस्पतिक प्रवर्धन विधि से पौधा बन कर रोपण हेतु तैयार हो जाता है.

मिट्टी

गेंदे की खेती हर तरह की मिट्टी में की जा सकती है. बलुई दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो और जीवांश पदार्थ की प्रचुर मात्रा के साथसाथ पानी के निकलने का सही इंतजाम हो, अच्छी  मानी गई है.

क्यारी की तैयारी

क्यारी बनाने से पहले मिट्टी की लगभग 30 सेंटीमीटर गहरी खुदाई कर के भुरभुरी और खरपतवाररहित कर लेते हैं. रासायनिक उर्वरक और गोबर की सड़ी खाद जरूरत के मुताबिक मिट्टी में डाल कर 15 से 20 सेंटीमीटर गहराई तक अच्छी तरह मिला देते हैं. क्यारी की चौड़ाई और लंबाई सिंचाई के साधन व खेत के आकार पर निर्भर करती है. खेत समतल होने पर क्यारी लंबी और चौड़ी बनानी चाहिए, लेकिन खेत ऊंचेनीचे होने पर क्यारी का आकार छोटा रखना लाभदायक होता है. अच्छी तरह तैयार भुरभुरी मिट्टी में 2 से 3 मीटर चौड़ी और सुविधानुसार लंबी क्यारी बनानी चाहिए. 2 क्यारियों के बीच में 1 से डेढ़ फुट चौड़ी मेंड़ बनानी चाहिए.

नर्सरी की क्यारी की तैयारी और बीज की बोआई : गेंदे की पौध तैयार करने के लिए सामान्य तौर पर 1 मीटर चौड़ी और 15 से 20 सेंटीमीटर जमीन की सतह से ऊंची क्यारी बनाते हैं. 2 क्यारियों के बीज में 30 से 40 सेंटीमीटर का फासला छोड़ देते हैं, जिस से नर्सरी में सुगमतापूर्वक निराई हो सके और क्यारी से पौधों को रोपण हेतु निकाला जा सके. नर्सरी की क्यारी की मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी कर के उस में सड़ी हुई गोबर की खाद 10 से 12 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से मिला देते हैं. अगर बलुई दोमट मिट्टी न हो, तो क्यारी में आवश्यकतानुसार बालू की मात्रा भी मिला देते हैं. बीज की बोआई से पहले 2 ग्राम कैप्टान प्रति लीटर पानी में घोल कर सभी क्यारियों में छिड़क देना चाहिए, इस से नर्सरी में कवक का प्रकोप कम हो जाता है. बीज के अंकुरण के बाद पौधों की मृत्यु दर कम हो जाती है. क्यारी में बीज की बोआई 2 लाइनों के बीच में 6 से 8 सेंटीमीटर का फासला रखते हुए 1.5 से 2 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए. पंक्तियों में बीज पासपास नहीं रखने चाहिए, क्योंकि पासपास बीज की बोआई करने से पौध कमजोर हो जाती है. क्यारियों में गरमी के मौसम में सुबहशाम और सर्दी और बरसात के मौसम में सुबह पानी प्रतिदिन फुहारा विधि से देना चाहिए.

गरमी के मौसम का पुष्पोत्पादन करने के लिए फरवरी महीने के दूसरे हफ्ते और बारिश के मौसम में पुष्पोत्पादन के लिए जून के पहले हफ्ते में बीज की बोआई करनी चाहिए. सर्दी में पुष्पोत्पादन के लिए सितंबर महीने के दूसरे हफ्ते में बीज की बोआई करनी चाहिए.

पौध रोपण

नर्सरी में बीज की बोआई के 1 महीने बाद पौध रोपण के लिए तैयार हो जाती है. अफ्रीकन गेंदा 41×40 सेंटीमीटर और फ्रेंच 30×30 सेंटीमीटर पौध से पौध और लाइन से लाइन के फासले पर 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर लगाना चाहिए. पौध रोपण गरमी के मौसम में सांयकाल और सर्दी और बरसात में पूरे दिन किया जा सकता है. पौध रोपण के समय यदि पौध लंबा हो गया हो तो लगाने से पहले उस के ऊपरी हिस्से को काट देना चाहिए.

खाद और उर्वरक

गोबर की सड़ी खाद 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. इस के अलावा प्रति हेक्टेयर 200 किलोग्राम नाइट्रोजन और 80 किलोग्राम फास्फोरस और पोटाश देने से पुष्पोत्पादन बढ़ जाता है. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा के लिए सिंगल सुपरफास्फेट और म्यूरेट औफ पोटाश को क्यारी की तैयारी के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए. नाइट्रोजन की मात्रा को 3 बराबर भागों में बांट कर 1 भाग क्यारी की तैयारी के समय और 2 भाग पौध रोपते समय 30 और 60 दिनों पर यूरिया या कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट उर्वरक द्वारा देना चाहिए.

सिंचाई व जलनिकासी

गेंदे की खेती में पौधों की बढ़वार और पुष्पोत्पादन में सिंचाई का खास महत्त्व है. सिंचाई के पानी का पीएच मान 6.5 से 7.5 तक लाभकारी पाया गया है. पौध रोपने के बाद सिंचाई खुली नाली विधि से की जाती है. मिट्टी में अच्छी नमी होने से जड़ों की अच्छी बढ़वार होती है और पौधों को मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्व सही मात्रा में मिलते रहते हैं. शुष्क मौसम में सिंचाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए. गरमी में 5 से 6 दिनों और सर्दी में 8 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. क्यारियों में पानी जमा नहीं होना चाहिए. बरसात में पानी की निकासी के लिए नाली पहले से तैयार रखनी चाहिए. निराई कर निकालें खरपतवार :खरपतवार जब छोटे रहें, उसी समय खेत से बाहर निकाल देने चाहिए. पौधों की छोटी अवस्था में समय पर मिट्टी की गुड़ाई करनी चाहिए. ऐसा करने से मिट्टी भुरभुरी बनी रहती है और जड़ों की अच्छी बढ़वार होती है. मिट्टी की गुड़ाई बहुत गहरी नहीं करनी चाहिए.

यों करें शीर्षनोचन

ऐसा पौधों के फैलाव को बढ़ाने के लिए किया जाता है. शीर्षनोचन 2 बार करने से पुष्पोत्पादन बढ़ जाता है. अगर पौध रोपने में देरी हो रही हो, तो केवल पहला शीर्षनोचन करना चाहिए. पहला शीर्षनोचन : पौध रोपण के समय यदि पौधों का शीर्षनोचन न किया गया हो, तो पौध लगाने के 12 से 15 दिनों बाद उन हर पौधों का शीर्षनोचन हाथ से करना चाहिए, जिन की लंबाई जमीन की सतह से 15 सेंटीमीटर से ज्यादा हो गई हो.

शीर्षनोचन के समय यह ध्यान रखा जाता है कि शीर्षनोचन के बाद पौध पर 4 से 5 पूर्ण विकसित पत्तियां बनी रहें. ऐसा करने से एक पौध पर 3 से 5 तक मुख्य शाखाएं आ जाती हैं. शाखाओं की संख्या बढ़ने पर पुष्पोत्पादन बढ़ जाता है.

दूसरा शीर्षनोचन : पहला शीर्षनोचन जैसा ही दूसरा शीर्षनोचन करते हैं. इस में मुख्य शाखाएं जब 15 से 20 सेंटीमटर लंबी हो जाती हैं, उस समय हर शाखा पर 4 से 5 पूरी विकसित पत्तियां छोड़ कर शीर्षनोचन कर देते हैं.

पुष्पों की तोड़ाई और उपज : गरमी के मौसम की फसल मई के मध्य से शुरू हो कर बरसात के समय तक चलती है. लेकिन यह देखा गया है कि जून में सर्वाधिक पुष्प उत्पादन होता है.

बरसात के मौसम की फसल में फूलों का उत्पादन सितंबर मध्य से शुरू हो कर लगातार दिसंबर तक और सर्दी में फसल जनवरी मध्य से शुरू हो कर मार्च तक लगातार पुष्पोत्पादन होता रहता है.  पहाड़ी इलाकों में गरमी और बरसात की फसल सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है. पुष्पों को पौध से तब अलग करते हैं, जब पुष्प पूरी तरह से खिल जाएं. फूलों को तोड़ते समय यह ध्यान रखा जाता है कि फूल के नीचे लगभग 0.5 सेंटीमीटर तक लंबा हरा डंठल फूल से जुड़ा रहे. फूलों की तोड़ाई सुबह के समय करनी चाहिए और फूल किसी ठंडी जगह पर रखने चाहिए. अगर फूलों के ऊपर अतिरिक्त नमी या पानी की बूंदें हों, तो उन्हें छायादार जगह पर फैला देना चाहिए. नमी कम हो जाने के बाद फूलों को बांस की टोकरी में बाजार भेज दिया जाता है. फूलों को अतिरिक्त नमी के साथ पैक करने पर उन की पंखुडि़यां काली पड़ने लगती हैं. इसी कारण ऐसे फूलों की कीमत बाजार में बहुत कम मिलती है. यदि सही तरीके से फसल पर ध्यान दिया गया हो, तो अफ्रीकन गेंदे से 200 से 250 क्विंटल और फ्रेंच गेंदे से 100 से 125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर फूलों की उपज मिल जाती  है.

मुख्य कीट और रोकथाम

रेड स्पाइडर माइड : माइड गेंदे की पत्तियों का रस चूस लेते हैं, जिस से पत्तियां हरे रंग से भूरे रंग में बदलने लगती हैं और पौधों की बढ़वार बिलकुल रुक जाती है. इस का प्रकोप होने पर पुष्पोत्पादन भी नहीं हो पाता है. जो कलियां बनती भी हैं, वे खिल भी नहीं पाती हैं. इस की रोकथाम के लिए हिल्फोल 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

एफिड्स : एफिड्स रस चूसने वाला कीट है. इस का प्रकोप पत्तियों, टहनियों और पुष्प कलियों पर होता है. यह पौधे की बढ़वार को कम कर देता है. इस की रोकथाम के लिए मैलाथियान या इंडोसल्फान का छिड़काव 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर करना चाहिए.

लीफमाइनर : लीफमाइनर नर और मादा दोनों पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. गेंदे में इस का प्रकोप होने पर पत्तियों में सफेद धारियां बन जाती हैं और पौधों की बढ़वार कम हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए 1.5 से 2 मिलीलीटर इंडोसल्फान प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

कैटरपिलर : यह कीट हरे और भूरेकाले रंग का होता है. यह पत्तियों, टहनियों और कलियों को नुकसान पहुंचाता है. इस की रोकथाम के लिए 1.5 मिलीलीटर इंडोसल्फान या मैलाथियान 1 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

खास बीमारियां और रोकथाम

डैमपिंग आफ : यह बीमारी राइजोकटोनिया सोलेनाई कवक का प्रकोप होने पर नर्सरी में होती है. इस बीमारी का हमला होने पर नर्सरी में ही पौधे खत्म हो जाते  हैं. अधिकतर यह बीमारी नर्सरी में पौधों को बहुत ज्यादा पानी देने के कारण होती है. इस की रोकथाम के लिए क्यारी में बीज की बोआई करने से पहले कापर कवकनाशी कैप्टान के घोल (0.2 फीसदी सांद्रता) का छिड़काव करना चाहिए या मिट्टी को फार्मल्डीहाइड नामक कैमिकल के घोल (2 फीसदी सांद्रता) से संक्रमित कर देना चाहिए. इस बीमारी का प्रकोप होने के बाद निदान करना बहुत ही कठिन है.

फ्लावर बड राट : यह बीमारी अधिक आर्द्रता वाले इलाकों में देखी गई है. इस बीमारी में कलियों पर ब्राउन धब्बे पड़ जाते हैं. इस तरह की कलियां पूरी तरह से खिल नहीं पाती हैं. इस की रोकथाम के लिए डाइथेन एम 45 के 0.2 फीसदी सांद्रता के घोल का छिड़काव करें.

कालर राट, फूट राट और रूट राट : ये बीमारियां राइजोकाटोनिया सोलेनाई, फाइटोप्थेरा स्पेशीज, पीथियम स्पेशीज वगैरह कवकों के कारण होती हैं. कालर राट पौधे की किसी अवस्था में देखा जा सकता है. फूट राट एवं रूट राट अधिक आर्द्रता वाले इलाकों में और क्यारी में अधिक पानी होने के कारण भी पाई पाती है. इस की रोकथाम के लिए नर्सरी की मिट्टी को बीज की बोआई से पहले फार्मल्डीहाइड के घोल से साफ करें, रोगरहित बीज का प्रयोग करें, रोगग्रसित पौधों को उखाड़ दें, बहुत घनी नर्सरी या पौध रोपण न करें और बोआई से पहले कैप्टान से बीज को उपचारित करें.

लीफ स्पाट : यह बीमारी अल्टरनेरिया टैजेटिका कवक के प्रकोप होने पर गेंदे के पौधे पर देखी गई है. इस बीमारी से प्रभावित पौधों की पत्तियों के ऊपर भूरा गोल धब्बा दिखने लगता है. इस बीमारी की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 1 से 1.5 ग्राम पाउडर प्रति लीटर पानी में घोल कर पौधों पर छिड़काव करना चाहिए.

पाउडरी मिल्ड्यू : गेंदा के फूल में पाउडरी मिल्ड्यू ओडियम स्पेशीज और लेविल्लुला टैरिका कवकों के प्रकोप होने के कारण होता है. इस बीमारी में पौधों की पत्तियों के ऊपर सफेद पाउडर दिखने लगता है. इस बीमारी की रोकथाम के लिए कैराथेन 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर पौधों पर छिड़काव करना चाहिए.

विषाणु रोग : विषाणु पौधों की क्वालिटी को धीरेधीरे कम कर देते हैं. गेंदे में कुकुंबर मोजेक वायरस का हमला देखा गया है. इस विषाणु रोग से बचाव के लिए रोगग्रसित पौधों को समयसमय पर उखाड़ कर जमीन के अंदर दबा दें

मजदूर ही नहीं खेतिहर भी हैं महिला किसान

खेती जगत में भी महिलाएं अपना जलवा बिखेर रही हैं. वे किसी भी मामले में मर्द किसानों से कम नहीं  हैं. महिला किसानों को ले कर आमतौर पर यह सोचा जाता है कि वे केवल खेती में मजदूरी का ही काम करती हैं. असल में यह बात सच नहीं है. आज महिलाएं किसान भी हैं. वे खेत में काम कर के घर की आमदनी बढ़ा रही हैं. बैंक से लोन लेने के साथ ही साथ ट्रैक्टर चलाने, बीज रखने, जैविक खेती करने, खेत में खाद और पानी देने जैसे बहुत सारे काम करती हैं.

ऐसी महिला किसानों की अपनी सफल कहानी है, जिस से दूसरी महिला किसान भी प्रेरणा ले रही हैं. जरूरत इस बात की है कि हर गांव में ऐसी महिला किसानों की संख्या बढे़ और खेती की जमीन में उन को भी मर्दों के बराबर हक मिले. महिलाओं की सब से बड़ी परेशानी यह है कि खेती की जमीन में उन का नाम नहीं होता. इस वजह से बहुत सी सरकारी योजनाओं का लाभ महिला किसानों को नहीं मिल पाता है. खेती की जमीन में महिलाओं का नाम दर्ज कराने के लिए चले ‘आरोह’ अभियान से महिलाओं में एक जागरूकता आई है. आज वे बेहतर तरह सेअपना काम कर रही हैं. तमाम प्रगतिशील महिला किसानों से बात करने पर पता चलता है कि वे किस तरह से अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ीं.

मुन्नी देवी शाहजहांपुर की रहने वाली हैं. उन के परिवार में 2 बेटे व एक बेटी है. लेकिन घर के हालात कुछ ऐसे बदले कि मुन्नी देवी का परिवार तंगहाली में आ गया. घर में बंटवारा हुआ. पति के हिस्से में जो जमीन आई, उस से गुजारा करना मुश्किल था. मुन्नी देवी को आश्रम से जुड़ने का मौका मिला. हिम्मत जुटा कर उन्होंने पति से बात कर आश्रम में वर्मी कंपोस्ट बनाने का प्रशिक्षण ले कर बाद में खुद ही खाद बनाने का काम शुरू कर दिया. आर्थिक उन्नयन के लिए मुन्नी देवी फसलचक्र व फसल प्रबंधन को बेहद जरूरी मानती हैं. 3 बीघे खेत में सब्जी व 5 बीघे खेत में गेहूं 4 बीघे खेत में गन्ने की फसल उगा रही हैं. गन्ने के साथ मूंग, उड़द, मसूर, लहसुन, प्याज, आलू, सरसों वगैरह की सहफसली खेती करती हैं, जिस से परिवार की रसोई के लिए नमक के अलावा बाकी चीजों की जरूरत पूरी कर लेती हैं.

इसलावती देवी अंबेडकरनगर से हैं. उन्होंने कहा कि हम ने मायके में देखा था कि मिर्च की खेती किस तरह होती है और यह लाभप्रद भी है, उसी अनुभव से हम ने मिर्च की खेती शुरू की और आज हम अपने 7 बीघे खेत में सिर्फ सब्जी और मेंथा आयल की फसल उगाते हैं. मिर्च की खेती एक नकदी फसल है. दूसरी सब्जियां भी महंगे दामों में बिक जाती हैं. खेत में हमारा पूरा परिवार कड़ी मेहनत करता है. खेती कोई घाटे का काम नहीं है, अगर खुद किया जाए तो. मैं पिछले साल से अब तक 1 लाख रुपए का मेंथा आयल और 40000 रुपए की मिर्च बेच कर शुद्ध लाभ कमा चुकी हूं. जहां रोज 1000 रुपए की मिर्च, 200 रुपए का दूध बेच लेते हैं, वहीं मेंथा हमारा इमर्जेंसी कैश है. आरोह मंच से जुड़ने के बाद तो जैसे उन के स्वाभिमान में भी बढ़ोतरी हुई है.

कुंता देवी सहारनपुर की एक साहसी, जुझारू व संघर्षशील महिला किसान हैं. 1 दिन जब वे पशुओं के लिए मशीन में चारा काट रही थीं, तो उन का हाथ घास की गठरी के साथ मशीन में चला गया और पूरी बाजू ही कट गई. कुंता ने उसे ही अपना नसीब समझा और सबकुछ चुपचाप सह लिया. लेकिन यहीं कुंता के दुख का अंत नहीं था. उस के देवर व जेठ की बुरी नजर उस पर थी. कुंता का पति मानसिक रोगी था, जिस के कारण कुंता का देवर धर्म सिंह उस का फायदा उठाना चाहता था. वह कुंता पर लगातार दबाव डालने लगा कि पति के साथसाथ वह देवर के साथ भी रहे.

एक दिन जब कुंता पति के साथ अपने खेत में काम कर रही थी, तभी उस का जेठ जय सिंह वहां आया और उस के पति को जबरदस्ती पेड़ से बांध दिया और कुंता के साथ जबरदस्ती करने लगा. लेकिन कुंता बहुत हिम्मतवाली महिला है. उस ने खेत में ही डंडा निकाल कर अपने जेठ को पीटना शुरू कर दिया. उस का जेठ वहां से जान बचा कर भाग गया. मीरा देवी गोरखपुर की एक लघु सीमांत महिला किसान हैं. आरोह अभियान से पिछले 10 वर्षों से जुड़ी हैं. ग्राम जनकपुर की आरोह महिला मंच की अध्यक्ष भी हैं. आरोह अभियान से जुड़ने के बाद मीरा में जो साहस व हिम्मत आई है, वह एक मिसाल है.

8 साल ही विवाह के हुए थे कि पति की अचानक मौत हो गई. अब मीरा की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे खेती, परिवार व बच्चे कैसे संभाले इसी बीच आरोह मंच द्वारा गांव में काम शुरू किया गया, जिस से मीरा जुड़ी. स्वयं सहायता समूह बना, जिस में मीरा अध्यक्ष के रूप में चुनी गई. समूह की बैठक में भाग लेने से और अन्य गतिविधि जैसे किसान विद्यालय की बैठक, संघ की बैठक वगैरह में जाने के कारण मीरा को अपनी बात कहने का साहस आया. जगरानी देवी ललितपुर की एक महिला किसान हैं. उन की शहरी आदिवासी पट्टे की जमीन पर वर्षों से दंबगों का कब्जा था, जिस पर इन को कब्जा नहीं मिल रहा था. जब यह आरोह अभियान से जुड़ीं, उस के बाद आरोह अभियान द्वारा जनसुनवाई की गई, जिस में एसडीएम आए तब इन्होंने उन के सामने अपनी समस्या रखी. उस के बाद एसडीएम ने उन्हें कब्जा दिलाया. अब जगरानी देवी अपने खेत में सब्जी की खेती करती हैं और अपनी सब्जी को खुद ही बाजार में बेचती हैं.

मिले जमीन में कानूनी हक

गोरखपुर ऐनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप और उस की साथी संस्थाओं व आक्सफैम इंडिया के सहयोग से 1 दिवसीय महिला किसानों के विषय पर विमर्श कार्यशाला का आयोजन लीनेज होटल गोमती, लखनऊ में किया.  कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए वीएस चौबे पूर्व प्रमुख सचिव राजस्व ने कहा कि प्रदेश सरकार महिलाओं के लिए बहुत काम कर रही है. आज महिलाएं जमीन से ले कर आसमान तक पहुच चुकी हैं. कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां आज महिलाओं की पहुंच न हो. इस के साथ एक सच यह भी है कि महिला किसानों को जितने अधिकार चाहिए वे अभी तक नहीं मिल पाए हैं. महिला किसानों को और अधिकार मिलने चाहिए, जिस से वे खेती की जमीन को और उपयोगी बना कर काम कर सकें.  इस मौके पर ‘पानी संस्थान’ के अध्यक्ष भारत भूषण ने कहा कि देश के पूरे कृषि जगत का 81 फीसदी महिला किसानों द्वारा की जाने वाली खेती से ही है, जहां से 60 फीसदी उत्पादन मिलता है. खेती में खास भूमिकाओं के बावजूद महिला किसानों की पहचान किसान के रूप में नहीं है, न ही किसान अधिकारों की दावेदारी उन के नाम है. खेती का 70 से 80 फीसदी काम करने वाली महिला किसानों को सुननेसमझने वाला कोई नहीं. वे आज भी अपनी पहचान से दूर हैं. वे खेती करती हैं, पर किसान नहीं. आवश्यक आर्थिक संसाधन, कृषि प्रसार और तकनीक उन के मुताबिक नहीं है. वे जिस खेत पर काम कर रही हैं, वे उन के नहीं हैं.

आक्सफैम इंडिया के रीजनल मैनेजर नंद किशोर नेकहा कि महिला किसानों की सहखाती कानून को बनाने के लिए सरकार विचार करे और कुछ अलग से भी योजनाओं को लागू करें. सरकार ने हर साल 15 अक्तूबर को महिला किसान दिवस मनाने का फैसला लिया है. विनोब सेवा संस्थान के अध्यक्ष रमेश भैइया ने कहा कि जमींदारी उन्मूलन के 60 वर्षों के बाद भी महिला किसानों द्वारा बिना स्वामित्व की जमीन पर काम करना इस ऐक्ट की भावना का उल्लंघन जैसा है. भूस्वामित्व और किसानी के बीच का अंतर भारतीय कृषि संरचना का बुनियादी अवरोध है. इस के कारण सीमित संसाधनों का असक्षम उपयोग हो रहा है. भूमि, मकान, पशुधन और अन्य परिसंपत्तियों व कृषि संसाधनों पर अधिकार का अभाव महिला किसानों की कार्यकुशलता के रास्ते में एक बड़ा अवरोध है. महिला किसानों को न कर्ज मिल पाता है, न ही सिंचाई सुविधा.

‘आरोह’ अभियान की राज्य समन्वयक नीलम प्रभात ने कहा कि महिला किसान की भूमिका बीजों का संरक्षण, गृहवाटिका, जानवरों का पोषण, सिंचाई, वृक्षारोपण, मत्स्यपालन जैसी गतिविधियों में भी अग्रणी है. साथ ही, महिला किसान खाद्यान्न के साथसाथ देश को प्रत्यक्ष व अपत्यक्ष रूप से दूसरे आर्थिक क्षेत्रों के विकास और निर्यात के माध्यम से आर्थिक योगदान भी कर रही हैं. फिर भी वे आज भी अपनी पहचान से दूर हैं.

केज कल्चर मछलीपालन में क्रांति

केज कल्चर में पिंजरे की तरह दिखने वाले जाल का इस्तेमाल मछलीपालन में किया जाता है. कई देशों में काफी समय पहले से ही जलाशयों, नदियों और समुद्र में केज लगा कर मछलीपालन किया जाता है. आमतौर पर जीआई पाइप से केज के फ्रेम को बनाया जाता  है. इस के जरीए कम क्षेत्र में ज्यादा से  ज्यादा मछली की पैदावार की जा सकती है. मछलियां केज के  भीतर ही पलती और बढ़ती हैं और उस में उन्हें आसानी से भरपूर भोजन दिया जा सकता  है. कम बारिश वाले इलाकों के लिए तो केज कल्चर काफी मुफीद माना जा रहा  है. जलाशयों में जिस जगह केज को लगाया जाता  है, वहां कम से कम 5 मीटर गहरा पानी होना जरूरी  है.

मछलीपालन की दिशा में केज कल्चर ने काफी लंबी छलांग लगाई  है. इस से जहां देश के कई राज्यों में मछली की कमी को पूरा किया जा सकेगा, वहीं कई बेरोजगारों को रोजगार भी मिल सकेगा. सब से बड़ी बात यह है कि इस से सभी राज्य मछलीपालन के अपने सालाना लक्ष्य को आसानी से पूरा कर सकेंगे. झारखंड जैसे पहाड़ी राज्य में भी केज कल्चर का काफी बेहतर नतीजा सामने आया है. हैरत की बात यह है कि देश में  झारखंड ही पहला राज्य है, जहां मछलीपालन में केज कल्चर की शुरुआत की गई. कम बारिश वाले इलाकों और पहाड़ी इलाकों में केज कल्चर के जरीए मछलीपालन कर के मछली उत्पादन में काफी ज्यादा तरक्की की जा सकती  है.

यह केज कल्चर (जलाशयों में लोहे का पिंजरानुमा जाल लगा कर मछली संवर्धन) के इस्तेमाल का ही नतीजा है कि 5 सालों के दौरान राज्य में मछली उत्पादन का लक्ष्य तकरीबन पूरा होने लगा  है. रांची के मछलीपालक दीनदयाल के मुताबिक इस से पहले कभी भी मछली उत्पादन का सरकारी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता था, पर केज कल्चर के अपनाने के बाद लक्ष्य से ज्यादा पैदावार होने लगी  है. जलाशयों में ज्यादा से ज्यादा केज लगा कर मछली उत्पादन को कई गुना ज्यादा बढ़ाया जा सकता है. वहां के हटिया जलाशय, चांडिल डैम, तेनुघाट जलाशय में करीब 350 केज लगाए जा चुके हैं. देश में नेशनल मिशन फौर प्रोटीन सप्लीमेंट (एनएमपीएस) के तहत झारखंड में केज कल्चर की शुरुआत की गई. झारखंड में इसे कामयाबी मिलने के बाद बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, ओडिशा व तमिलनाडु में भी केज कल्चर की शुरुआत की जा चुकी  है.

बिहार के मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार सिंह के मुताबिक केज एक तरह का पिंजरे की शक्ल का जाल होत  है, जिस के भीतर मछलीपालन करने से केवल 120 दिनों में ही मछलियों का औसत वजन 400 ग्राम तक हो जाता  है. खुले तालाब में इतने समय में मछलियों का औसत वजन 200 से 300 ग्राम के बीच ही होता है. जलाशय में केज लगा कर प्रति केज 5 टन मछलियों का उत्पादन किया जा सकता  है. 1 केज को बनाने में करीब 80 हजार रुपए की लागत आती है और 5 टन मछली उत्पादन में करीब डेढ़ लाख रुपए का खर्च बैठता  है. केज में मछलीपालन करने से मछलियां इधरउधर भटक नहीं पाती  हैं और न ही बड़ी मछलियों का शिकार बन पाती हैं. इस का सब से  बड़ा फायदा यह है कि मछलियों को चोरीछिपे जाल या बंशी लगा कर निकाला नहीं जा सकता है, जिस से मछलीपालक को भरपूर फयदा मिल जाता है.

अगले आईपीएल में नहीं खेलेंगे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी!

क्रिकेट का एक प्रारुप आईपीएल अनिश्चिताओं से भरा है. इस खेल में कब क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता, जितती हुई टीम हार सकती है तो हारती हुई टीम जीत. सिर्फ इतना ही नहीं कब किस टीम का खिलाड़ी टूर्मामेंट छोड़ कर चला जाए यह भी अनिश्चित होता है. कुछ ऐसी ही खबर आ रही है ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम को ले कर.

दरअसल मीडिया में आ रहीं रिपोर्ट्स की मानें तो ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट बोर्ड यानी क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) ने अपने खिलाड़ियों को आईपीएल में खेलने से रोकने के लिए नया दांव खेला है. सीए ने अपने टॉप-5 खिलाड़ियों को आईपीएल में न खेलने के बदले में 3 वर्षीय कॉन्ट्रैक्ट की पेशकश की है. अभी इन खिलाड़ियों को 1 साल का ही कॉन्ट्रैक्ट मिलता है, जो हर साल रिन्यू होता है.

यह खबर उस वक्त सामने आई है जब बीसीसीआई फ्लोरिडा (अमेरिक) में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के साथ त्रिकोणीय श्रृंख्ला का आयोजन करने पर विचार कर रहा है. जिन पांच खिलाड़ियों से सीए निजी तौर पर बात कर रही है उनमें ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ, उपकप्तान डेविड वॉर्नर, तेज गेंदबाज पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क और जोश हेजलवुड शामिल हैं.

सिडनी के अखबार के अनुसार सीए के प्रदर्शन प्रबंधक पैट होवार्ड ने इन पांचो खिलाड़ियों से बात की और कहा कि यदि वो आईपीएल में न खेलें, तो उन्हें बोर्ड की तरफ से 3 वर्षीय कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा. इसका मतलब है कि आगामी तीन वर्षों तक इन खिलाड़ियों को ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय टीम से कोई बाहर नहीं कर सकता.

आईपीएल का उत्साह सिर्फ भारतीय ही नहीं विदेशी खिलाड़ियों के सिर चढ़ कर भी बोलता है. कुछ खिलाड़ी तो अपना घरेलू मैच छोड़कर आईपीएल का हिस्सा बनने आते हैं. अब देखना है कि यह सिलसिला चलता रहेगा या फिर…

जब आईपीएल 10 में सुपरमैन बनें मार्टिन गुप्टिल

आईपीएल 10 में खेले मुंबई इंडियंस और किंग्स XI पंजाब के मैच में मार्टिन गप्टिल ने एक शानदार कैच पकड़कर मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पर खलबनी मचा दी. मैच में गुप्टिल ने सुपरमैन अंदाज में कैच पकड़ा. ऐसा कैच जिसे देखकर यकीन करना मुश्किल होता है. मार्टिन ने ऐसी कैच लपकी जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया.

इस कैच के जरिए मार्टिन गप्टिल ने अपनी फिटनेस, फील्डिंग के दौरान बॉल पर फोकस और जंप की टाइमिंग का बेहतरीन उदाहरण पेश किया. इस कैच को रीप्ले में बार-बार देखकर सब हैरान हो रहे थे. मानों गप्टिल के इस कैच ने मुंबई के खेमे में खलबली मचा दी.

दरअसल मुंबई की टीम बल्लेबाजी कर रही थी. मुंबई के खिलाफ पारी का 10वां ओवर पंजाब के कप्तान ग्लेन मैक्सवेल करने आए. सलामी बल्लेबाज लेंडल सिमंस (59 रन) ने इस ओवर की तीसरी गेंद को बाउंड्री पार पहुंचाने के लिए बड़ा शॉट खेला. ऐसा लग रहा था कि सिमंस का ये शॉट आसानी से बाउंड्री के पार चलाए जाएगा. लेकिन बाउंड्री लाइन पर मौजूद गुप्टिल ने ऊंची छलांग लगाकर सुपरमैन अंदाज में कैच को अपने कब्जे में कर लिया. उनकी यह कैच आईपीएल 10 के सबसे बेहतरीन कैचों में शुमार हो गया.

रनों की बरसात के बीच हुए रोमांचक मुकाबले में किंग्स इलेवन पंजाब ने आईपीएल 10 के 51वें मैच में मुंबई इंडियंस को सात रनों से हराते हुए अपनी प्लेऑफ की उम्मीदों को जिंदा रखा है. पंजाब की टीम ने बल्लेबाजी के बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर निर्धारित 20 ओवरों में तीन विकेट खोकर 230 रन बनाते हुए मुंबई को जीत के लिए विशाल चुनौती दी. लेकिन मुंबई अपने घर में इस विशाल लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई और पूरे ओवर खेलने के बाद छह विकेट खोकर 223 रन ही बना सकी.

डांस से तनाव दूर भागता है : माधुरी दीक्षित

‘डांसिंग दिवा’ के रूप में जानी जाने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित ने फिल्म ‘अबोध’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत की थी. उन्होंने 3 साल की उम्र से कथक डांस सीखना शुरू किया था. हालांकि उसे बचपन से डाक्टर बनने की इच्छा थी, लेकिन नृत्य उनमें इतनी अच्छी तरह रच-बस गया था कि वह उसे छोड़ नहीं पायी, जिस भी मंच पर उन्होंने नृत्य किया, सभी ने उनकी तारीफे की. नृत्य की वजह से ही वह इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बना पायी. 80 और 90 के दशक की वह सबसे चहेती और धक्-धक् गर्ल बनी. “तेजाब”, “खलनायक”, “राम-लखन”, “किशन-कन्हैया”, “दिल”, “प्रहार” आदि सभी माधुरी की सफल फिल्में हैं. कामयाबी के शिखर पर पहुंचकर माधुरी ने अमेरिका में स्टाब्लिशड डॉ. श्रीराम नेने से शादी की और दो बच्चों की मां बनी. कुछ सालों बाद वह फिर से मुंबई आई और अपनी दूसरी पारी शुरू की. इस समय वह फिल्मों से अधिक डांस पर फोकस्ड है, जिसमें उनका साथ दे रहे हैं उनके डॉक्टर पति श्रीराम नेने.   

माधुरी ने कभी भी अपनी डांस और फिटनेस को खोने नहीं दिया आज भी वह उतनी ही फिट हैं और अपने इस डांस के हुनर को पूरे देश में फैलाने की कोशिश कर रही हैं. वीडियोकॉन डी2एच के शो ‘नचले’ ने ‘डांस विथ माधुरी’ के साथ साझेदारी की है. जिसमें भारतीय नृत्य शैली में कथक, भरतनाट्यम, से लेकर वेस्टर्न जैज, कंटेम्पररी, हिप-हॉप, सालसा आदि के साथ बॉलीवुड डांस भी होगा.

इस मौके पर माधुरी कहती है कि “मैंने डांस 3 साल की उम्र से सीखा है और आज मैं जो भी हूं, इस डांस की वजह से हूं. डांस की वजह से मैं फिल्मों में भी आई, क्योंकि मैंने बहुत सारे स्टेज शो और डांस परफॉर्म किये थे, डांस ने मुझे अपने मूड, फिटनेस, आत्मविश्वास आदि सबकुछ बनाये रखने की सीख दी. मेरे हिसाब से हर व्यक्ति को आज के वातावरण में डांस सीख लेना चाहिए. इससे तनाव दूर भागता है. मुझे जब भी तनाव होता है, मैं डांस कर लेती हूं. नृत्य करने से जो आनंद आता है, उसे व्यक्त कर पाना मुश्किल है. ये कला व्यक्ति में जन्म से ही आती है. डांस सिखने की कोई उम्र नहीं होती, अगर कही गाना बजता है तो 6 महीने का बच्चा भी नाचने लगता है”.

इसके आगे माधुरी कहती है कि “एक दिन मैंने अपने पति के साथ बैठकर इस बात पर चर्चा की. कैसे लोगों के घर तक नृत्य पहुचाया जाय, क्योंकि मैं हर माध्यम के साथ जुड़कर पूरे देश में इसे फैलाना चाहती हूं. इस काम के लिए मेरे साथ हर तरह के नृत्य में पारंगत गुरु शामिल है.

माधुरी आज की सबसे अच्छी डांसर प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, दीपिका पादुकोण आदि को कहती हैं. उनके हिसाब से सभी की डांस फॉर्म एक दूसरे से अलग और अच्छी है. शास्त्रीय नृत्य को डांस का फाउंडेशन कहा जाता है, इसके बावजूद लोग वेस्टर्न डांस पर अधिक जोर देते हैं. माधुरी आगे कहती हैं कि बेसिक ज्ञान नृत्य में होना चाहिए और इसके लिए शास्त्रीय नृत्य पहले सीखना जरुरी है. इसमें फुटवर्क, तत्काल, हाथ की मुद्राएं, बॉडी मूवमेंट, अभिनय आदि सब एक डांस में आ जाती हैं. बेसिक प्रशिक्षण के बाद आप कोई भी ‘डांस स्टाइल’, ‘पिकअप’ कर सकते हैं. बेसिक सेंस ऑफ रिदम, सेंस ऑफ डीसिप्लिन और सेंस ऑफ इमोशन, जो हमारे शरीर को चाहिए वह मिल जाता है. मुझे क्लासिकल डांस बहुत पसंद है. आज भी मैं रोज डांस का रियाज करती हूं. इससे मुझे खुशी मिलती है”.

पहली बार जब माधुरी अभिनय के लिए कैमरे के आगे आईं, तो कभी नर्वस नहीं हुईं, क्योंकि नृत्य में अभिनय पूरी तरह से समाया हुआ होता है. वह कहती हैं कि ‘डांस सीख लेने से आपके जीवन के अर्थ ही बदल जाते हैं. मुझे अच्छा लगता है कि मैंने इस क्षेत्र को ही अपना सबकुछ माना है’.

कॉल ड्रॉप पर सरकार की सख्ती, नहीं चलेगी कोई ट्रिक

सरकार ने कॉल ड्राप को लेकर एक बार फिर टेलीकॉम आपरेटरों को चेताया है. संचार मंत्री ने साफ-साफ कहा सरकार कॉल ड्रॉप के हर पहलू को देख रही है और इसमें किसी भी प्रकार की ट्रिक नहीं चलेगी.

हाल ही में डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम (डॉट) की आई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले तीन माह में कॉल ड्रॉप में करीब 7 फीसदी की गिरावट आई है.

रेडियो लिंक टॉइम आऊट तकनीक पर है नजर

टेलीकॉम कंपनियों की तरफ रेडियो लिंक टाइम आऊट तकनीक से कॉल ड्रॉप की समस्‍या को छिपाने के बारे में कहा कि डॉट के अलावा ट्राई भी इस पर हर तिमाही में रिपोर्ट जारी करता है. उन्‍होंने कहा कि पिछले करीब 8 माह में रिकॉर्ड टॉवर लगाए गए हैं. इससे भी समस्‍या कम हो सकती है, लेकिन फिर भी इस पर लगातार नजर रहती है. रेडियो लिंक टाइम आऊट तकनीक की मदद कॉल ड्रॉप होने पर भी यह तकनीकी रूप से कॉल ड्रॉप दर्ज नहीं होती है.

1 लाख से ज्‍यादा मोबाइल टॉवर और लगाए गए

टेलीकॉम ऑपरेटरों ने सरकार को जानकारी दी है कि उनकी तरफ से जून 2015 से दिसम्‍बर 2016 तक 1.6 लाख टॉवर लगाए गए हैं. वहीं ट्राई ने कहा है कि सभी टेलीकॉम आपरेटरों को जून से सितम्‍बर की तिमाही तक कॉल ड्रॉप को लेकर बनाए गए मानक पूरे करने होंगे. ट्राई के अनुसार अक्‍टूबर से दिसम्‍बर 2016 के दौरान एयरसेल का प्रदर्शन ज्‍यादातर सर्किलों में कॉल ड्रॉप के मामले में मानक से कम था.

डॉट ने शुरू की है आईवीआरएस व्‍यवस्‍था

डॉट ने आईवीआरएस व्‍यवस्‍था शुरू की है. इसके तहत ग्राहकों को कॉल कर कॉल ड्रॉप का स्‍टेटस जाना जाता है. सिन्‍हा ने बताया कि इससे सरकार को पता चल रहा है कि कहां पर सेवा का स्‍तर अच्‍छा नहीं है. इस व्‍यवस्‍था के तहत करीब 2600 कॉल रोज की जाती हैं. इससे जिस जगह पर कॉल ड्रॉप की समस्‍या की जगह का पता चलता है तो उसी समय संबंधित मोबाइल ऑपरेटरों को सू‍चित किया जाता है.

सरकार कनेक्टिविटी बढ़ाने पर जोर दे रही

सुत्रों के मुताबिक सरकार कनेक्टिविटी बढ़ाने पर लगातार जोर दे रही है. इसके तहत ऑप्टिकल फायबर बिछाने का काम तेजी से चल रहा है. अभी तक 91 हजार पंचायत को इससे जोड़ा जा चुका है. उम्‍मीद है कि अगले 15 से 20 दिनों में 1 लाख का आंकड़ा पर कर लिया जाएगा.

ज्यादा उम्मीद नहीं जगाती ‘मेरी प्यारी बिंदू’

रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ‘‘मेरी प्यारी बिंदू’’ का अंत आम बॉलीवुड मसाला फिल्मों से एकदम अलग है, इसके अलावा इस फिल्म में कुछ भी नवीनता नहीं है. यह फिल्म बचपन की दोस्ती व एकतरफा प्यार की बात करती है.

फिल्म का नायक, जो कि लेखक और आधुनिक देवदास है, वह एक ही बात का रोना रोता रहता है कि ‘‘प्यार करना सब सिखाते हैं. पर प्यार को भुलाएं कैसे यह कोई नहीं सिखाता.’’

फिल्म ‘‘मेरी प्यारी बिंदू’’ की कहानी लेखक अभिमन्यू (आयुष्मान खुराना)के इर्द गिर्द घूमती है. अभिमन्यू मुंबई में प्रतिष्ठित लेखक है. उसके कई उपन्यास काफी चर्चा बटोर चुके हैं, पर उसे लेखक के तौर पर व सम्मान नहीं मिला, जिसकी वह चाह रखता है. अब तक वह ‘चुड़ैल की चोली’ जैसे सी ग्रेड उपन्यास ही लिखता रहा है. पिछले दस वर्ष से वह कुछ भी अच्छा नही लिख पाया.

अब वह जिस उपन्यास को लिख रहा है, उससे प्रकाशक संतुष्ट नहीं है. इस बात को दस साल हो जाते हैं. इसलिए वह पुराने जमाने वाली प्रेम कहानी लिखना शुरू करता है. पर एक दिन उसके माता पिता उसे बहाने से कोलकाता घर पर बुलाते हैं. उनका मकसद अभिमन्यू की शादी करानी है, जो कि अपने पुराने प्यार को अब तक भूला नहीं है. लेकिन घर पर माता पिता द्वारा आयोजित पार्टी वगैरह से तंग आकर वह कोलकाता में ही होटल में रहने चला जाता है, जहां वह चैन से अपना नया उपन्यास लिख सके.

अभिमन्यू के इस उपन्यास की कड़ियां कहीं न कहीं उसकी अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी हुई हैं. अब कहानी अतीत व वर्तमान के बीच हिचकोले लेते हुए चलती रहती है. कहानी खुलती है कि कोलकाता में अभिमन्यू के मकान के पड़ोस वाले मकान में बिंदू रहती थी. दोनों बचपन के दोस्त हैं. उनकी यह दोस्ती काफी आगे बढ़ चुकी है. एक दिन एक कार दुर्घटना में बिंदू की मां की मौत हो जाती है, पर बिंदू के पिता बच जाते हैं. जबकि कार बिंदू के पिता ही चला रहे थे. इसी के चलते बिंदू अपने पिता को दोषी मानती है.

इधर बिंदू (परिणीति चोपड़ा) व अभिमन्यू (आयुष्मान खुराना) दिन भर साथ में घूमते रहते हैं. अभिमन्यू दिन भर का खर्च निकालने के लिए अपनी कार कुछ घंटों के लिए अपने दोस्तों को किराए पर देता रहता है. कार किराए पर लेकर उसके दोस्त अपनी प्रेमिका के साथ उसमें समय बिताते हैं. इस सच से अभिमन्यू के साथ साथ बिंदू भी वाकिफ है. अभिमन्यू, बिंदू से प्यार करता है, पर वह अपने दिल की बात बिंदू से कह नहीं पाता. जबकि बिंदू अपने हर नए रिश्ते के बारे में अभिमन्यू को बताती रहती है.

एक दिन कॉलेज में फुटबॉल मैच होता है. इस मैच के दौरान बिंदू, ध्रुव के खेल से प्रभावित होकर अभिमन्यू का साथ छोड़कर अभिमन्यू की ही कार में ध्रुव के साथ चली जाती है. कुछ समय बाद अभिमन्यू अपनी ही कार में ध्रुव व बिंदू को उन्हीं हालातों में देखता है, जिन हालातों में वह अपने दोस्तों को उनकी प्रेमिकाओं के साथ देख चुका है. अभिमन्यू समझ जाता है कि बिंदू और ध्रुव के बीच शारीरिक संबंध बन चुके हैं.

उसके बाद अभिमन्यू मुंबई चला आता है. कुछ दिन बाद अभिमन्यू केा पता चलता है कि बिंदू भी मुंबई गायक बनने आयी है. तो वह उसे अपने घर में रहने के लिए ले आता है. अभिमन्यू उसे सफल गायक बनाने के लिए सारे प्रयास करता है. अभिमन्यू व बिंदू का संगीत एलबम भी बाजार में आता है. एक दिन अभिमन्यू के माता पिता मुंबई पहुंच जाते हैं. तो उन्हें अभिमन्यू व बिंदू के प्यार में डूबे होने का एहसास होता है.

अभिमन्यू की मां बिंदू को बहू के रूप में स्वीकार करते हुए उसे उपहार देती है, इसी बात पर बिंदू कुछ अपशब्द कह देती है और मुंबई से आस्ट्रेलिया व पेरिस चली जाती है. अभिमन्यू बिंदू का पता लगा लेता है. अंत में जब अभिमन्यू की कोलकाता में पुनः बिंदू से मुलाकात होती है, तो पता चलता है कि बिंदू शादी कर चुकी है और उसकी एक बेटी भी है. वह अपनी जिंदगी में बहुत खुश है. तब अभिमन्यू एहसास करता है कि प्यार समय या जगह का मोहताज नहीं होता. बल्कि सही सुर के साथ सही इंसान के मिलने पर निर्भर करता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो परिणीति चोपड़ा व आयुष्मान खुराना के प्रशंसक बहुत ज्यादा खुश होने वाले नही हैं. लगता है दोनों अब अभिनय की बजाय सिंगल गाने बाजार में लाने पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. फिल्म में कहीं भी इन दोनों का अभिनय प्रभावित नहीं करता. वैसे कुछ दृश्यों में आयुष्मान खुराना ने अच्छा अभिनय किया है. मगर परिणीति चोपड़ा ने अपने आपको दोहराया है. परिणीति चोपड़ा के बिंदू के किरदार को देखकर यदि दर्शक को फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ की कंगना रनौत की याद आती है, तो यह लेखक व निर्देशक दोनों की ही कमजोरी है.

मगर लेखक के तौर पर आयुष्मान खुराना का किरदार अभिमन्यू रॉय पूरी फिल्म में पैजामा व कुर्ते में ही नजर आता हैं, जबकि ऐसा तो नहीं है. क्या निर्देशक के दिमाग में लेखक अभिमन्यू रॉय को जेनयू से जुड़ा हुआ बताना रहा है? इसके अलावा फिल्म 1980 से 2016 तक चलती है, मगर फिल्म का लेखक 2016 में भी कम्प्यूटर की बजाय टाइपराइटर पर ही काम करता है.

लेखक व निर्देशक दोनों ही अपनी अपनी जगह असफल रहे हैं. फिल्म में बेवजह कुछ अजीब से दृश्य डाले गए हैं. फिल्म के निर्देशक अक्षय रॉय फिल्मों के शौकीन नजर आते हैं, इसी वजह से कुछ नई व कुछ पुरानी फिल्मों के रिफ्रेंस बीच बीच में डाले गए हैं. कुछ पुरानी फिल्मों के गीत भी दस बीस मिनट के लिए आ जाते हैं. फिल्म में बेवजह जावेद व गुलजार सहित कई फिल्मी हस्तियों को घसीटा गया है. फिल्म के कई दृश्य जरुरत से ज्यादा बोर करते हैं और दर्शक सोचने लगता है कि फिल्म कब खत्म होगी.

फिल्म के कुछ दृश्य नब्बे के दशक की भी याद दिलाते हैं. मसलन-मुंबई आने का संघर्ष, बचपन की यादें, ऑडियो कैसेट, दोस्ती, स्कूल की परीक्षाओं में नकल, शोरगुल करने वाले पड़ोसी, मुंबई जैसे शहर में एक ही कमरे में एक साथ रहते रहते हो जाने वाली दोस्ती, रोमांटिक रिश्ते बनाना वगैरह. निर्देशक की इस बात के लिए तारीफ की जा सकती है कि उसने दोस्ती को अच्छे ढंग से दिखाया है. फिल्म में यह बात उभर कर आती है कि दोस्त हमेशा दोस्त रहता है, फिर चाहे उसमें या परिस्थितियों में बदलाव क्यों न आ जाए.

फिल्म ‘‘मेरी प्यारी बिंदू’’ का निर्माण ‘‘यशराज फिल्मस’’ के बैनर तले आदित्य चेापड़ा और मनीष शर्मा ने किया है. लेखक सुप्रतिम सेनगुप्ता, निर्देशक अक्षय रॉय, संगीतकार सचिन जिगर, कैमरामैन तुषार कांति रे तथा फिल्म के कलाकार हैं- आयुष्मान खुराना, परिणीति चोपड़ा, अपराजिता ऑड्डी, राजतभा दत्ता, अभिश मैथ्यू व अन्य.

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