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न्यूड मेकअप लुक के 11 ट्रिक्स

कम से कम मेकअप प्रोडक्ट्स के साथ ही मेकअप के लाइट शेड्स से बहुत कम समय में आप न्यूड मेकअप लुक पा सकती हैं. यह काफी क्लासी और सौफिस्टिकेटेड नजर आता है. खास मौकों के साथ ही औफिशियल मीटिंग्स और रैग्युलर डेज में भी न्यूड मेकअप लुक कैरी किया जा सकता है. जानते हैं न्यूड मेकअप लुक के कुछ खास ट्रिक्स:

जरूरी है डेली स्किन केयर रूटीन

चूंकि न्यूड मेकअप लुक के लिए मेकअप के डार्क शेड्स का इस्तेमाल न के बराबर होता है, इसलिए चेहरे की नैचुरल ब्यूटी उभर कर दिखती है. ऐसे में जरूरी है कि त्वचा अंदर से स्वस्थ, बाहर से बेदाग और कोमल हो. लेकिन यह तभी मुमकिन है जब आप नियमित रूप से क्लींजिंग, टोनिंग, मौइश्चराइजिंग और स्क्रबिंग करेंगी. इस से त्वचा स्वस्थ रहेगी और न्यूड मेकअप लुक उभर कर दिखेगा.

टिंट मौइश्चराइजर

सब से पहले फेसवाश से चेहरा धो कर पोंछ लें. फिर मौइश्चराइजर लगाएं. इस के लिए लाइट या फिर टिंट मौइश्चराइजर चुनें. इसे पूरे चेहरे पर लगा कर हलके हाथों से त्वचा को मौइश्चराइज करें. अब आंखों के पास आई क्रीम लगाएं. इसे सैट होने के लिए थोड़ी देर के लिए यों ही छोड़ दें.

लाइट फाउंडेशन

न्यूड मेकअप लुक के लिए शियर या लाइट यलो शेड का फाउंडेशन चुनें. यह नैचुरल लुक देता है. इसे ब्रश की सहायता से पूरे चेहरे पर लगा कर मेकअप का बेस तैयार कर लें. कोशिश करें कि पहले कोट में ही फाउंडेशन पूरे चेहरे पर अच्छी तरह लग जाए, दूसरा कोट न लगाना पड़े वरना बेस मेकअप हैवी नजर आएगा और उस के सामने मेकअप का लाइट शेड फीका दिखेगा.

ट्रांसल्यूसैंट पाउडर

अगर आप चाहती हैं कि आप का मेकअप लंबे समय तक टिका रहे, तो मौइश्चराइजर और फाउंडेशन के बाद पूरे चेहरे और गले पर स्पंज की सहायता से हलका सा ट्रांसल्यूसैंट पाउडर लगाएं. इस से बेस मेकअप को स्मूद टच मिलेगा और मेकअप नैचुरल नजर आएगा. अगर पाउडर की मात्रा ज्यादा हो जाए, तो उसे कम करने के लिए दोबारा मौइश्चराइजर लगा लें.

ब्रोंजर स्प्रे

बेस मेकअप को फाइनल टच देने के लिए ब्रोंजर स्प्रे यूज करना न भूलें. नैचुरल लुक के लिए पीच, लाइट पिंक या रोजी पिंक शेड का ब्रोंजर खरीदें. इसे फोरहैड, नोज, चीक, चिन और नैक एरिया पर स्प्रे कर के ब्रश की सहायता से अच्छी तरह फैला दें. इस से स्किन नैचुरल ग्लो करेगी और मेकअप भी लंबे समय तक टिका रहेगा.

लाइट आईशैडो

जब बेस मेकअप अच्छी तरह सैट हो जाए तब आई मेकअप शुरू करें. शुरुआत आईशैडो से करें. इस के लिए आईशैडो का न्यूड शेड चुनें

जैसे गे्र, पीच, आइवरी, शैंपेन, बेबी पिंक, बेज, कौपर आदि. आईशैडो को पूरी पलकों पर अच्छी तरह लगाएं.

थिन आईलाइनर

कलरफुल आईलाइनर के बजाय ब्राउन शेड के आईलाइनर का चयन करें. पतली लाइन ड्रा करते हुए आईलाइनर का सिंगल कोट लगाएं. आंखों के आगे के छोर से लाइनर लगाना शुरू करें और इसे आईकौर्नर पर ला कर जोड़ दें. इसे ऊपर या नीचे की तरफ न मोड़ें और न ही फिशकट जैसा कोई स्टाइल दें.

ब्राउन मसकारा

अपने आई मेकअप को कंप्लीट और लैश लाइन को डिफाइन करने के लिए ब्राउन शेड की आईपैंसिल का इस्तेमाल करें या फिर आईलैशेज को हाईलाइट करने के लिए ब्राउन मसकारे का सिंगल कोट लगाएं. डबल कोट या कलरफुल मसकारा लगाने की गलती न करें.

डिफाइन आईब्रोज

न्यूड मेकअप के दौरान अपनी आईब्रोज को नजरअंदाज करने की गलती न करें. इन्हें डिफाइन करने के लिए आईब्रोज के शेड का आईशैडो ब्रो ब्रश की मदद से आईब्रोज पर लगाएं. अब आईब्रोज बोन को हाईलाइट करने के लिए क्रीम कलर का आईशैडो लगाएं. इस से आप की आईब्रोज उभरी दिखेंगी.

शेड्स औफ लिपस्टिक

मेकअप के दौरान ज्यादातर लिप लाइनर के बाद लिपस्टिक लगाई जाती है, लेकिन न्यूड मेकअप कर रही हैं, तो पहले लिपस्टिक लगाएं. उस के बाद लिपलाइनर से लिप्स को परफैक्ट डिफाइन करें. आखिर में लाइट शेड का लिपग्लौस लगा कर लिप मेकअप को कंप्लीट करें. अगर आप गोरी हैं, तो पिंक या बैज, सांवली हैं तो ब्रोंज, गेहुएं रंग की हैं, तो मोव लिप कलर्स चुनें. डार्क शेड लिपस्टिक के साथ ही बहुत ज्यादा ड्राई या ग्लौसी लिपस्टिक न लगाएं. न्यूड लुक के लिए क्रीमी लिपस्टिक चुनें.

ब्लशऔन

जब आंखों और होंठों का मेकअप अच्छी तरह सैट हो जाए तब ब्लशऔन से चीकबोन को हाईलाइट करें. इस के लिए न्यूट्रल शेड का जैल बेस्ड चीक टिंट या फिर पाउडर ब्लशर चुनें ताकि आप का मेकअप नैचुरल नजर आए. चाहें तो पेस्टल शेड्स के ब्लशर का चुनाव भी कर सकती हैं. ब्लशऔन को ब्रश की मदद से गालों के आगे से शुरू करते हुए हेयरलाइन तक ले जाएं. इस से आप को परफैक्ट लुक मिलेगा.          

समधी समधिन नहीं बनें प्यारे दोस्त

रमाकांतजी और उन की पत्नी खाना खा कर उठे ही थे कि  फोन घनघना उठा. फोन उन के इंदौर शहर में ही रहने वाले समधीजी का था. वे बड़े घबराए स्वर में कह रहे थे, ‘‘भाई साहब नमिता को पेट में बहुत दर्द हो रहा है. मैं अपोलो हौस्पिटल ले कर जा रहा हूं.’’

रमाकांतजी ने झट गाड़ी निकाली और सपत्नीक हौस्पिटल पहुंच गए. उन्हें देख कर उन के समधी गुप्ताजी की जान में जान आई.

‘‘नमिताजी को हर्निया का दर्द है. तुरंत औपरेशन करना पड़ेगा,’’ डाक्टर ने जब गुप्ताजी को बताया तो वे घबरा गए, परंतु समधी रमाकांत और उन की पत्नी ने उन्हें हिम्मत दी, तो वे थोड़ा संभले और फिर औपरेशन करवाने के लिए तुरंत तैयार हो गए. 3 दिन हौस्पिटल में रहने के दौरान रमाकांत दंपती ने नमिता की जीजान से सेवा की. 3 दिन बाद हौस्पिटल से डिस्चार्ज हो कर घर आते समय रमाकांत ने गाड़ी अपने घर की ओर मोड़ दी.

नमिताजी ने जब समधी के घर जाने से मना किया तो रमाकांतजी की पत्नी बोलीं, ‘‘बहनजी, इसे समधियाना नहीं अपनी बेटी का घर कहिए. आप की बेटी और दामाद मुंबई में हैं. उन्हें आने में वक्त लगेगा. आप मेरी बहू की मां हैं, इसलिए जब तक आप ठीक नहीं हो जातीं आप और भाई साहब यहीं रहेंगे.’’

रमाकांत दंपती के अनुरोध पर गुप्ता दंपती कुछ न कह सके. 2 दिन बाद उन की बेटी और दामाद भी आ गए. फिर भी सभी एकसाथ एक ही घर में रहे. 15 दिन तक अपनी बेटी के ससुराल में सब के साथ रहने के बाद वे जबरदस्ती अपने घर गईं. परंतु इस दौरान समधी के यहां मिले प्यार, सम्मान और देखभाल की प्रशंसा करते गुप्ता दंपती आज भी नहीं थकते हैं.

सभी सम्मान के हकदार

भारतीय समाज पुरुषप्रधान है. अत: पुरातनकाल से ही लड़की के मातापिता को लड़के के मातापिता की अपेक्षा कमतर माना जाता रहा है, पर अब मान्यताएं बदल रही हैं. लड़कियों का पालनपोषण भी मातापिता लड़कों की ही तरह कर रहे हैं और आजबेटियां समाज में अनेक उच्च पदों पर आसीन हैं. अपने पति के बराबर और कई बार उस से भी अधिक वेतन पाने वाली लड़की किसी भी कीमत में अपने मातापिता को कमतर नहीं देखना चाहती.

आज अधिकतर दंपतियों की 1 या 2 संतानें होती हैं. बेटों की तरह आज बेटियां भी ताउम्र अपने मातापिता की जिम्मेदारी उठाना चाहती हैं. आत्मनिर्भर होने के बाद उन के लिए भी कुछ करना चाहती हैं. बेटी या बेटे के विवाह के समय हमें नए रिश्तेदार मिलते हैं, जो वास्तव में हमारे समान ही सम्मान के हकदार होते हैं. यह हमारा दायित्व है कि अहंकारी, नकचढ़े और स्वार्थी समधीसमधिन बनने के बजाय हम अपने इस नए रिश्ते को प्यार और मित्रतारूपी भाव से सींच कर प्रिय मित्र और सुलझे रिश्तेदार बनें. फिर देखिए कैसे यह रिश्ता आप के लिए खुशनुमा और बेशकीमती बनता है.

जिन परिवारों में बहू के मातापिता को उचित सम्मान प्राप्त नहीं होता, वहां बहू भी अपने सासससुर को समुचित मान नहीं दे पाती. रश्मि की मां जब भी अपनी बेटी से मिलने जाती हैं, तो उस की सास पूरे घर का काम छोड़ कर आराम करने लगती हैं या घूमने चल देती हैं. मांबेटी पूरा दिन घर के काम समाप्त करने में ही लगी रहती हैं. आचारव्यवहार में भी उस की सास यही जताती हैं कि मानो बेटी की मां हो कर रश्मि की मां ने कोई गुनाह किया है जबकि उन की बेटी रश्मि ही अपनी ससुराल का सारा काम संभालती है. इसलिए जब उस की ननदें अपने मायके आती हैं, तो रश्मि भी बीमार हो जाती है. वह भी घर का पूरा काम छोड़ कर बिस्तर पकड़ लेती है.

रश्मि कहती है, ‘‘जब मेरी मां को मेरे घर आ कर काम करना पड़ता है, तो फिर इन की बेटियां क्यों आराम से रहें?’’ आमतौर पर लड़के वाले स्वयं को लड़की के मातापिता से श्रेष्ठ समझते हैं, परंतु कई बार इस के उलट भी देखने में आता है. दीप्ति की बेटी की सास ग्रामीण परिवेश की कम पढ़ीलिखी महिला हैं. इसलिए जब पहली बार उन की समधिन अपनी बहू के मायके आईं, तो दीप्ति ने उन्हें हर बात में यह जताने की कोशिश की कि वे उन से अधिक स्टैंडर्ड, मौडर्न और शिक्षित हैं.

समधिन की पारखी नजरें सब समझ रही थीं, पर वे शांत रहीं. 2 दिन बाद जब वे जाने लगीं तो बोलीं, ‘‘बहनजी, मैं भले कम पढ़ीलिखी और गांव की हूं पर मैं ने अपने बेटे को इस लायक बनाया कि आप ने उसे अपनी बेटी दे कर दामाद के रूप में स्वीकार किया है.’’ दीप्ति खिसिया कर रह गईं. इस प्रकार का व्यवहार हमेशा के लिए मन में कटुता भर देता है और गाहेबगाहे आप की बेटी को ही इस का खमियाजा भुगतना पड़ता है. इसलिए आप की बेटी या बेटे के ससुराल वाले कैसे भी हों, हैं तो आप के दामाद या बहू के ही मातापिता, तो फिर उन के प्रति सदैव आदर का भाव रखें और संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाने की कोशिश करें.

जब भी आप के समधी घर आएं आप उन्हें वही मान दें, जो आप को उन के घर जाने पर मिलता है. कभी भी किसी भी अवसर पर उन्हें कमतर दिखाने की कोशिश न करें. सदैव याद रखें कि  बहू के मातापिता के प्रति किया गया आप का व्यवहार अपरोक्ष रूप से आप की बहू को प्रभावित करेगा. मेरी सहेली कांता जब भी अपने लिए कुछ खरीदती हैं, तो अपनी समधिन के लिए भी खरीदती हैं. इस से बहू गरिमा के मन में अपनी सास के लिए इज्जत और अधिक बढ़ जाती है. गरिमा कहती है, ‘‘मेरी सास मेरी मां के साथ बिलकुल वैसा ही व्यवहार करती हैं जैसा एक बड़ी बहन अपनी छोटी बहन के साथ करती है. उन के व्यवहार में कभी बड़प्पन या अहंकार नहीं झलकता. भला ऐसी सास को कौन प्यार नहीं करेगा.’’

उपहार लें तो दें भी

भारतीय समाज में अनेक रस्में और रिवाज ऐसे हैं, जिन में लड़की वाले को देना ही होता है. मसलन, विवाह बाद साल भर तक समस्त त्योहार चलाने की रस्म, गर्भावस्था के 7वें माह गोद भराई, संतानोत्पत्ति पर मुंडन संस्कार में वस्त्र व अन्य सामान आदि देने जैसी अनेक परंपराएं हैं. आप केवल लेने का भाव ही न रख कर उन के लिए भी उतना ही देने का भाव रखें. इस से कभी संबंधों में कटुता नहीं आ सकती.

अमिता के सासससुर बेहद सुलझे हुए हैं. जब उस के बेटे के मुंडन संस्कार में उस के मायके से ससुराल के हर व्यक्ति के लिए कपड़े और मिठाई आई, तो उस की सास ने भी उस के मायके के प्रत्येक सदस्य के लिए कपड़े और मिठाई भिजवाई, साथ ही यह भी कहा कि हमारे यहां भी तो नाती हुआ है. यह आप के लिए हमारी खुशी और प्यार है, जिसे आप को स्वीकारना ही होगा,’’ अमिता अपनी सास के इस कदम का गुणगान करते नहीं थकती. मेरी सहेली अंजू जब अपने बेटेबहू के साथ सिंगापुर घूमने गईं, तो जबरदस्ती अपने समधीसमधिन को भी ले गईं. अपने सासससुर के साथसाथ अपने मातापिता को भी विदेश घुमा कर बहू कृतिका अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी.

अंजू कहती हैं, ‘‘समधियों के साथ रहने से हमें एक अच्छी कंपनी तो मिलती ही है, साथ ही बहू को भी अपने मातापिता के लिए कुछ कर पाने का संतोष रहता है. मेरे बेटे की तरह उस ने भी तो अपने मातापिता के लिए कुछ सपने बुने होंगे. मेरा बेटा यदि हमारे लिए करना चाहता है, तो बहू भी अपने मातापिता के लिए क्यों न करे. उस के मातापिता ने भी तो उसे बनाने में हमारी तरह ही पैसा और परिश्रम खर्च किया है. ऐसे में अपनी बहू की इच्छाओं का मान रखना हमारा प्रथम दायित्व बनता है.’’ आजकल पतिपत्नी दोनों कामकाजी होते हैं. ऐसे में सब से कठिन होता है बच्चों का पालनपोषण. गरिमा कहती है, ‘‘मेरे ससुर और पापा यानी 2 समधियों ने मिल कर इस समस्या का बेहतरीन हल निकाला. जब मेरी बेटी हुई तो मम्मीजी ने उसे क्रैच भेजने से साफ मना कर दिया कि मेरे होते हुए मेरी पोती नौकरों के भरोसे नहीं पलेगी. वे और पापाजी हमारे पास आ गए. जब उन्हें किसी काम से जाना होता था, तो उस अवधि में मेरे मम्मीपापा आ जाते थे. मेरी बेटी आज 5 साल की है पर दादीदादा, नानानानी के प्यार के तले उस ने जो परवरिश पाई है वह मैं कभी भी नहीं दे सकती थी. चारों ने मिल कर हमारी समस्या को चुटकियों में सुलझा दिया.’’

बेटी के मातापिता का भी यह दायित्व बनता है कि वे अपनी बेटी को पति के साथसाथ ससुराल के सभी सदस्यों को साथ ले कर चलना सिखाएं. बेटी को कोई भी शिक्षा देते समय ध्यान रखें कि आप के घर में भी बहू है और वह भी किसी की बेटी है. श्रुति जब अपनी बेटी के विवाह के बाद पहली बार अपनी समधिन से मिलीं तो बोलीं, ‘‘भाभीजी, आप शुरू से ही बच्चों के पास रहने जाती रहिएगा ताकि इन्हें आप के साथ रहने की आदत रहे. अकसर लोग शुरू में तो बच्चों के पास जाते नहीं और फिर जब भविष्य में उन के पास जा कर कुछ दिन रहना चाहते हैं, तो बच्चों को अकेले रहने की आदत हो चुकी होती है, फिर वे मातापिता को अपने साथ ऐडजस्ट नहीं कर पाते.’’

श्रुति की समधिन आज भी कहती हैं, ‘‘मैं ने ऐसी पहली मां देखीं जिन्होंने अपनी बेटी को इतनी अच्छी सीख दी.’’ आप को अपने समधी की विवशता को भी समझना चाहिए. जैसाकि श्रीप्रकाशजी के साथ हुआ. वे जब आगरा अपने कुछ दोस्तों के साथ घूमने गए, तो अपने बेटे की ससुराल भी पहुंच गए. ससुराल में बहू के वृद्ध मातापिता ही थे. उन से जो बन पड़ा उन्होंने किया, परंतु श्रीप्रकाशजी की अपेक्षाओं पर वे खरे नहीं उतर पाए. उन्होंने घर जा कर बहू के मातापिता को खूब भलाबुरा कहा, ‘‘मैं अपने 4 दोस्तों को बड़े शौक से ले कर गया था. न ढंग का नाश्ता, न खातिरदारी, बस चायबिस्कुट में टरका दिया.’’

जबकि वे अचानक बिना पूर्व सूचना के पहुंच गए थे. ऐसे में उन के समधीसमधिन यथासंभव जो कर सके किया. आप को अपने रिश्तेदारों की विवशता को समझना चाहिए. ऐसे में जब भी आप उन के घर जाएं अपने साथ ही नाश्ता आदि का इंतजाम कर के ले जाएं ताकि आप के जाने से परेशानी की जगह उन्हें मदद हो. आप को उन की इज्जत अपनी इज्जत समझनी चाहिए.

ध्यान रखने योग्य बातें

– समधी चाहे दूर रहते हों या एक ही शहर में, कभी आप उन्हें बुलाएं और कभी आप उन के यहां जाएं. आपस में मिलतेजुलते रहने से प्रेम और सौहार्द बना रहता है.

– उन के आने पर उचित मानसम्मान और विनम्र व्यवहार करें ताकि वे दोबारा भी आने का साहस कर सकें.

– उन के आने पर बहू या दामाद की कमियों या बुराइयों का ही गुणगान न करें, बल्कि जितना हो सके उतनी तारीफ ही करें ताकि बच्चे के मातापिता आश्वस्त हो सकें.

– बहू के मातापिता के आने पर बहू को उन के साथ वक्त बिताने का अवसर दें. रीमा जब विदेश से अपने देवर की शादी में 1 सप्ताह के लिए आई, तो उस की सास ने उस के मातापिता को उस के कमरे में ही ठहराया ताकि वह अपने मातापिता के साथ वक्त बिता सके.

– जब भी आप जाएं अपने बजट के अनुसार छोटामोटा तोहफा अवश्य ले जाएं.

– यदि आप के समधी अकेले रहते हैं, तो उन के काम में हाथ बंटाएं और भोजन आदि में अनावश्यक तीमारदारी न करवाएं.

– मिलने पर भूत में हुई किसी अप्रिय घटना का जिक्र कर के ताना न मारें और न ही विवाह में हुई भूलचूक को दोहराएं. 

जैसा फेस वैसा हेयर कट

जहां आप का परफैक्ट हेयर कट आप की खूबसूरती को निखार सकता है वहीं बेतरतीब बिखरे बाल आप को आलसी महिलाओं की श्रेणी में ला सकते हैं. मगर हेयर कट करवाते समय यह ध्यान रखें कि कटिंग आप के चेहरे, गरदन, शोल्डर के आकार, बालों की बनावट तथा आप के व्यक्तित्व के अनुरूप हो.

चेहरे का आकार: परफैक्ट हेयर कट के लिए यह जानना जरूरी है कि आप के फेस की शेप क्या है ताकि आप जान सकें कि कौन सा हेयर कट आप की खूबसूरती निखार सकता है. इस के  लिए आप आईने के सामने खड़ी हो कर बालों को इकट्ठा कर के पोनीटेल कर लें. फिर चेहरे को आईने के पास ले जा कर स्कैचपैन की मदद से आईने पर अपने चेहरे के आसपास एक रूपरेखा बना लें. आप देखेंगी कि आप का प्रतिबिंब आप के चेहरे की शेप बता रहा है.

लंबे चेहरे के लिए: लंबे चेहरे पर छोटे व मीडियम आकार के बाल ज्यादा अच्छे लगते हैं, जिस में उन की फोरहैड पर लेयर हो, जो माथे को थोड़ा छोटा दिखाएं. बैंग के साथ शोल्डर लैंथ व चिन के पास लेयर के साथ हेयर कट ज्यादा चेहरे पर फबता है. इस के अलावा बेबी व कर्ली टैक्स्चर वाले स्टाइल स्ट्रेट बालों की जगह ज्यादा अच्छे लगते हैं.

ओवल फेस शेप: अगर आप का फेस ओवल शेप है, तो उस पर लगभग हर हेयर कट अच्छा लगता है. फिर चाहे आप शौर्ट, लौंग, लेयर या बौब कट करवाएं. बस आप को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि फेस कट ऐसा हो, जो आप के फेस के फीचर को हाईलाइट करे न कि कवर करे. रेजर, वर्टिकल लेयर और फैदरटच आदि बेहतर विकल्प हैं.

डायमंड फेस कट: डायमंड शेप उन की होती है, जिन का फोरहैड और जौ लाइन चीकबोंस की तुलना में कम उभार वाली होती है, इसलिए ऐसी फेस शेप वाली महिलाओं को हेयर कट ऐसा चुनना चाहिए जोकि उन की चीकबोंस को थोड़ा कवर करते हुए पूरे चेहरे की लंबाई को थोड़ा कम दिखाए. बालों को स्ट्रेट न रखते हुए थोड़ा सा उन में टैक्स्चर क्रिएट करें. मल्टीपल लेयर, फौक्स पिरामिड और बैंग विद मीडियम फैदर में से आप कोई सा भी कट चुन सकती हैं.

ट्राइऐंग्यूलर फेस कट: इस फेस कट वालों की जौ लाइन फोरहैड और चीकबोंस की तुलना में काफी उभरी होती है. लेयर वाले हेयर कट जौ लाइन को बैलेंस कर के खूबसूरत लुक देते हैं. लंबे बालों की तुलना में शौर्ट लैंथ हेयर कट इन महिलाओं को अपनी उम्र से कम व खूबसूरत दिखाता है, इसलिए वे ट्राई करें शौर्ट लेयर, जिगजैग क्रौस लेयर और सौफ्ट बेबी विद बैंग.

राउंड फेस कट: गोलाकार चेहरे वाली महिलाओं को हेयर कट ऐसा चुनना चाहिए, जो उन के चेहरे को थोड़ा लंबा दिखाए. राउंड फेस वाली महिलाएं चिन से नीचे वाले हेयर कट चुनें, जो उन के चेहरे को पतला व लंबा होने का आभास दें जैसे राउंड शेप हेयर कट, ब्लंट (शार्प), लेयर और पौट शेप कट.

हार्ट शेप फेस कट: हार्ट शेप फेस वाली महिलाओं पर कोई भी हेयर कट आसानी से नहीं फबता है, क्योंकि उन का फोरहैड काफी चौड़ा व चिन एरिया काफी नैरो होता है, इसलिए उन्हें हेयर कट ऐसा चुनना चाहिए, जो उन के फेस को प्रौपर बैलैंस कर सके. उन्हें फोरहैड पर बैंग्स व चिन एरिया के आसपास वौल्यूम की जरूरत होती है. उन के लिए स्टे्रटबौब विद फ्रिंज, वौल्यूम लेयर और बाउंसिंग वौल्यूम वेव आदि बेहतर औप्शन हैं.

स्क्वेयर शेप फेस कट: इन महिलाओं पर छोटे व लंबे दोनों टाइप के हेयर कट अच्छे लगते हैं. अगर आप के फेस की लंबाईचौड़ाई करीब बराबर है, तो आप का फेस स्क्वेयर शेप का है. आप के लिए ऐंगल बौब, ग्रैजुएट लेयर व वौल्यूमनाइज बौब बेहतर विकल्प हैं.

हेयर कट के प्रकार

हेयर कट 2 प्रकार के होते हैं- हौरिजैंटल और वर्टिकल. हौरिजैंटल में स्ट्रेट, यू, वी, ब्लंट व शार्प ब्लंट कट मुख्य रूप से आते हैं, तो वर्टिकल में स्टैप व बाय, लेयर कट. इस के अलावा फैदर्स, पौट शेप, इनवेटिव वौल्यूम लेयर, ग्रैजुएट लेयर, ऐंगल बौब आदि इन्हीं के नए रूप हैं.

हेयर कट की तकनीक

पार्टिंग: कटिंग को सुचारू रूप से करने के लिए सैक्शन में से जो भाग लिया जाता है उसे पार्टिंग कहते हैं.

ग्रैजुएटेड: इस में बालों को बाहरी तरफ कम से कम मीडियम ऐलिवेशन में काटा जाता है.

गाइड: बालों की कटिंग करते समय यह भाग ही बालों की लंबाई निर्धारित करता है. इसी गाइडलाइन को आधार बना कर कटिंग की जाती है.

सैक्शन: कटिंग से पहले बालों को अलगअलग सैक्शन में बांटा जाता है. कम ऐलिवेशन में बालों की कटिंग के लिए 4 सैक्शन व ज्यादा ऐलिवेशन में बालों की कटिंग के लिए उन्हें 5 सैक्शन में बांटा जाता है.

ऐलिवेशन: वह कोण (डिग्री) जिस पर बालों को सिर से उठा कर काटा जाता है. इस के अलावा नोचिंग, थिनिंग, पौइंट कट, टैंशन, वेट लाइन, स्लाइसिंग, फ्लाइंग, जिगजैग, टैक्स्चराइजिंग आदि तकनीकों से बालों में टैक्स्चर क्रिएट किया जाता है.

औल टाइम फेवरेट हेयर कट

पिक्सी कट: जिन महिलाओं को छोटे बाल पसंद हैं उन के लिए हौट ऐंड सैक्सी पिक्सी हेयर कट परफैक्ट है. ज्यादा फैबुलस लुक के लिए टैक्स्चराइजिंग हेयर स्पे्र कर के फ्लैट ब्रश की मदद से ब्लो ड्राई करें.

ब्लंड बैंग: अगर आप का फोरहैड काफी चौड़ा है, तो ट्राई करें ब्लंड बैंग. यह आप को गौर्जियस लुक देगा. कंप्लीट लुक के लिए स्ट्रेट टैक्स्चर का सहारा लें.

वोल्यूमाइजिंग वैब: वौल्यूमाइजिंग स्प्रे व ब्लो ड्रायर की मदद से बालों में लाइट वैब क्रिएट करें. चाहें तो ज्यादा ग्लैमरस व बोल्ड लुक के लिए बालों में हाईलाइटिंग भी करवा सकती हैं.

बाउंसिंग लेयर: अगर आप को बालों से खेलना पसंद है और आप के बाल लंबे हैं, तो वौल्यूम स्प्रे और टोंग की मदद से अपनी लेयर कट को कंप्लीट लुक दे कर पाएं लौंग बाउंसिंग वैब्स लेयर.

अल्ट्रा स्मूद स्ट्रेट: अगर आप को स्ट्रैट हेयर पसंद हैं, तो फ्रिंज कंट्रोल स्प्रे और स्ट्रेटनिंग मशीन की मदद से बालों को अल्ट्रा स्मूद स्ट्रेट लुक दें.

सैक्सी बेबी कर्ल: ब्लंड बैंग व मीडियम लैंथ के बालों को सैक्सी लुक देने के लिए हौट कर्ल रोड का इस्तेमाल करें और पाएं सैक्सी बेबी कर्ल लुक.

स्टाइलिश बौब: पीछे से बालों को शौर्ट कर के ग्रैजुएटेड बौब को दीजिए हौट लुक. बालों में और ज्यादा वौल्यूम ऐड करने के लिए छोटे ब्रश की मदद से ब्लो ड्राई कर के ज्यादा शाइनी और आकर्षक लुक के लिए हेयर ग्लौस स्प्रे करें. 

कुछ जरूरी बातें

यदि हेयर कट आप के चेहरे के अनुरूप हो, तो वह आप की खूबसूरती को बहुत ज्यादा बढ़ा सकता है, इसलिए ध्यान रखें इन जरूरी बातों का:

– कटिंग से पहले बालों में अच्छी तरह शैंपू करें ताकि ऐक्स्ट्रा औयल से बालों की कटिंग को नुकसान न हो.

– हेयर कट के बाद बालों  को शाइनी और सौफ्ट बनाने के लिए हेयर सीरम का प्रयोग करें.

– हेयर कट के बाद बालों को सैट करने के लिए ब्लो ड्रायर, टोंग, कर्लिंग रोड या स्ट्रेटनिंग मशीन का उपयोग करने से पहले हीट प्रोटैक्टर स्प्रे का इस्तेमाल करें. इस के प्रयोग से बाल गरमी सहने लायक हो कर नुकसान से बच जाएंगे.

– हेयर कटिंग के तुरंत बाद हेयर कलर या अन्य कैमिकल ट्रीटमैंट न लें.

– अगर हेयर कट के बाद बाल बेजान व फ्रिजी दिखते हैं, तो शाइन ब्लिस्टर्स का प्रयोग करें.

– हेयर कट कोई भी हो उसे संवारने के लिए रैग्युलर बालों की हौट औयल से मसाज जरूर करें.

– हेयर कटिंग के समय सिर की स्थिति एकसमान रखें ताकि परफैक्ट हेयर कट मिल सके.

– प्रौपर ब्लड सर्कुलेशन के लिए बालों को कौंब करते समय पीछे के सारे बाल चेहरे पर ला कर बैककौंबिंग भी करे.

इन ऐप्स से आसानी से स्मार्टफोन हो सकते हैं हैक

आजकल एंड्रायड हैंकिंग के मामले काफी बढ़ गए हैं. हैकर्स कई तरह से आपके निजी डाटा को हैक करने की कोशिश करते हैं. इसमें स्मार्टफोन के जरिये जानकारी को हैक करना सबसे आसान होता है क्योंकि आप स्मार्टफोन से हर समय कनेक्टेड रहते हैं. ऐसे में यह बेहद जरुरी है कि आपको सिक्योरिटी के मद्देनजर हैकर्स के हैकिंग टूल्स के बारे में पता हो.

यही नहीं, इन टूल्स के जरिए आप किसी का भी स्मार्टफोन हैक कर सकते हैं. ऐसे ही एंड्रायड ऐप्स और टूल्स जो आपके फोन को हैकिंग मशीन बना सकती हैं.

Hackode-

यह उन लोगों के लिए सबसे अच्छी ऐप है, जो किसी की डिवाइस को हैक करना चाहते हैं. ये टूलबॉक्स penetration tester, Ethical hackers, IT administrator और Cyber security professional के लिए बनाया गया है. इसके जरिये गूगल हैकिंग, जासूसी समेत कई काम किए जा सकते हैं

AndroRAT-

यह एक एंड्रायड रिमोट एडमिनिस्ट्रेटर टूल है. इस ऐप से बिना सिस्टम को हाथ लगाए कंट्रोल किया जा सकता है. यह एक क्लाइंट/सर्वर ऐप है.

SpoofApp-

इसे मनोरंजन के लिए ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. इसके जरिये किसी को बिना अपना नंबर बताए कॉल की जा सकता है. हैकर्स इसका इस्तेमाल किसी को कॉल कर उसकी निजी जानकारी को चुराने के लिए करते हैं. आप इसके जरिये अपनी वॉयस को बदल सकते हैं. साथ ही पूरी बातचीत को रिकॉर्ड भी कर सकते हैं. इसके लिए आपको SpoofCards खरीदने पड़ते हैं.

WhatsApp Sniffer-

यह ऐप व्हाट्सऐप के साथ मिल कर काम करती है. इसके जरिये जो लोग वाई-फाई हॉटस्पॉट इस्तेमाल करते हैं, उनकी व्हाट्सऐप की प्राइवेट चैट, फोटो, ऑडियो और वीडियो हैक की जा सकती है. ये एंटीवायरस द्वारा डिटेक्ट की जाती है. ऐसे में इसे इस्तेमाल करते समय फोन से एंटीवायरस ऐप को डिसेबल करना पड़ता है.

APK Inspector-

इसके जरिये आप किसी भी एंड्रायड ऐप का सोर्स कोड लेकर उसे एडिट कर सकते हैं. साथ ही उसके लाइसेंस और क्रेडिट डिलीट कर सकते हैं.

सरकार 3 : अपरिपक्व पटकथा और अपरिपक्व निर्देशन

‘‘वंशवाद’’ ही सर्वश्रेष्ठ है. इस बात को रेखांकित करने वाली फिल्म का नाम है-‘‘सरकार 3’’. जो कि राम गोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म ‘‘सरकार’’ का यह तीसरा सिक्वअल है. फिल्म के शुरू होते ही निर्देशक ने सुभाष नागरे उर्फ सरकार को चीकू के पेड़ को पानी देते हुए दिखाया है. और यह सीन फिल्म में कई बार आता है. इसी से यह बात साफ हो जाती है कि सरकार नाटक कर रहे हैं, असल में तो वह अपने पोते शिवाजी नागरे उर्फ चीकू को तैयार कर रहे हैं.

कहानी के केंद्र में सुभाष नागरे उर्फ सरकार (अमिताभ बच्चन) ही हैं. इस वक्त वह कई दुश्मनों से घिरे हुए हैं. उनके धुर विरोधी माइकल वाल्या (जैकी श्राफ) और राजनीतिज्ञ गोविंद देशपांडे (मनोज बाजपेयी) एक उद्योगपति गांधी को आगे कर सुभाष नागरे का प्रभुत्व खत्म करना चाहते हैं. इनके साथ अनु करकरे (यामी गौतम) है. गांधी को लगता है कि अनु करकरे अपने पिता की मौत के लिए सुभाष नागरे को ही जिम्मेदार मानती है और वह अपने पिता की मौत का बदला उनसे लेना चाहती है. तो दूसरी तरफ सुभाष नागरे का अपना पोता शिवाजी नागरे उर्फ चीकू (अमित साध) है. राजनीतिक उठापटक भी तेज गति से चल रही है. इससे सुभाष  नागरे उर्फ सरकार को अपना प्रभुत्व डगमगाता नजर आ रहा है. पर वह डरते नहीं हैं. लोगों की नजर में एक दिन सुभाष नागरे अपनी बीमार पत्नी पुष्पा (सुप्रिया पाठक) के कहने पर पोते शिवाजी नागरे उर्फ चीकू को अपने साथ आकर रहने की इजाजत दे देते हैं. इससे सरकार के अति निकटतम सहयोगी गोकुल साटम (रोनित राय) को असुरक्षा सताने लगती है. गोकुल साटम के चलते नेता गोविंद देशपांडे मारे जाते हैं. उधर गोकुल साटम इसका आरोप चीकू पर लगाता है, तो दूसरी तरफ वह सरकार को खत्म करने में गांधी की मदद करने का आश्वासन दे देता है. इसकी भनक सरकार को लग जाती है. पर सरकार, गोकुल कीबात पर यकीन करने का नाटक कर चीकू को घर से बाहर कर देते हैं.

चीकू घर से बाहर निकलते ही सरकार के सभी विरोधियों को अपने साथ एकजुट करता है. और सारी सच्चाई जुटाकर अपने दादा यानी कि सरकार तक पहुंचाता रहता है. जिसकी भनक किसी को नहीं लगती है. एक दिन वह आता है जब सरकार खुद ही गोकुल की हत्या कर देते हैं और इसके लिए चीकू को दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि अब वह 35 साल बाद अपने हाथ से चीकू की हत्या करेंगे. पर जैसे ही माइकल वाल्या, सरकार के घर पहुंचते हैं. वैसे ही सरकार सारा सच बता देते हैं. उधर अनु खुद गांधी को गोली मार देती है. चीकू अपने दादा के घर वापस आ जाता है. अंत में सरकार कहते हैं कि राजनीति का खेल आसान नहीं है. राजनीति करने के लिए पहले इंसान को अपने घर की राजनीति को समझना व सीखना पड़ेगा. क्योंकि क्लेश सबसे बड़ादुश्मन है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म में यामी गौतम को जाया किया गया है. यामी के हिस्से करने के लिए कुछ है ही नहीं. सिर्फ बीच बीच में वह अपना खूबसूरत चेहरा दिखा जाती हैं, पर उस चेहरे पर भी कोई भाव नजर नहीं आते. अमित साध ने निराश किया है. फिल्म में अति महत्वपूर्ण किरदार निभाने का अवसर उन्हे मिला है, पर वह पूरी तरह से सफल नहीं रहे. यदि यह कहा जाए कि वह इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाए, तो गलत नहीं होगा. कलाकार को इस तरह के मौके बार बार नहीं मिलते. पर अमित साध अपनी प्रतिभा को साबित करने में विफल नजर आते हैं. मनोज बाजपेयी ने छोटे से किरदार में भी जान डाल दी है. रोनित राय ने ठीक ठाक अभिनय किया है. अमिताभ बच्चन ने फिर साबित किया कि वह महान कलाकार हैं.                                

फिल्म ‘‘सरकार 3’’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका कहानी विहीन होना है. टीवी सीरियल की तरह कुछ घटनाक्रमों के बल पर पूरी फिल्म बनायी गयी है. फिल्म में न तो कोई रोमांच है और न ही कोई प्रेम कहानी है. फिल्म में कहानी का कोई ठोस प्लाट ही नहीं है. निर्देशक व लेखक पूरी तरह से कन्फ्यूज्ड नजर आते हैं. टीवी सीरियल की तरह किसी सीन में एक पात्र हावी हो जाता है, तो किसी सीन में दूसरा पात्र. इसी तरह फिल्म के खलनायक भी सीन के साथ बदलते रहते हैं. वास्तव में पटकथा की कमजोरी के चलते एक भी किरदार उभर नहीं पाता. हर किरदार को लंबे लंबे संवाद दे दिए गए हैं. फिल्म को बेवजह सीरियल की ही तरह लंबा खींचा गया है. एक भी सीन रोचक नहीं बन पाया. कई दृश्यों में दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाता. क्योंकि उसकी समझ में नहीं आता कि आखिर हो क्या रहा है? कुल मिलाकर फिल्म ‘‘सरकार’’ देखने का अर्थ सरदर्द मोल लेना है.

‘सरकार’ के सिक्वअल ‘सरकार राज’ के बाद फिल्मकार राम गोपाल वर्मा कोई अच्छी फिल्म नहीं बना पाए. राम गोपाल वर्मा ने कैमरे के साथ प्रयोग करते हुए फिल्म को बिगाड़ने का ही काम किया है.

दो घंटे 20 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘सरकार 3’’ का निर्माण ‘ए बी कार्प लिमिटेड’, ‘वेव सिनेमा,अलुम्ब्रा इंटरटेनमेंट ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक राम गोपाल वर्मा, लेखक द्वय पी जय कुमार और राम कुमार सिंह, पटकथा लेखक राम गोपाल वर्मा, कहानी निलेश गिरकर और राम गोपाल वर्मा, संगीतकार रवि शंकर, कैमरामैन अमोल राठौड़ तथा कलाकार हैं – अमिताभ बच्चन, जैकी श्राफ, मनोज बाजपेयी, अमित साध, यामी गौतम, रोनित राय, रोहिणी हट्टंगड़ी, पराग त्यागी, शिव शर्मा व अन्य.

अपनी ही दुश्मन: भाग 2

बड़े लोगों से संपर्क बने तो वह पार्टियों में भी जाने लगी. मोनू की वजह से उसे नाइट पार्टियों में जाने में परेशानी होती थी, इसलिए उसे संभालने के लिए उस ने एक नौकर रख लिया.

कविता का सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उस की जिंदगी में खलल तब पड़ा, जब सुरेश एक दिन दोपहर में आ गया. दरअसल उस दिन मंगलवार था और लखनऊ में उसे एक दोस्त की शादी में शामिल होना था. वैसे भी उस दिन कोई छुट्टी नहीं थी. उस ने सोचा था कि अचानक पहुंच कर कविता को सरप्राइज देगा. लेकिन दांव उलटा पड़ गया. ड्राइंगरूम में खुलने वाला दरवाजा खुला हुआ था. ड्राइंगरूम में खिलौने बिखरे पड़े थे. उन्हें देख कर लग रहा था कि मोनू खेल से बोर हो कर कहीं बाहर चला गया है. यह भी संभव हो कि वह मां के पास अंदर हो.

अंदर बैडरूम का दरवाजा वैसे ही भिड़ा हुआ था. अंदर से हंसनेखिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं. सुरेश ने दरवाजे को थोड़ा सा खोल कर अंदर झांका. भीतर का दृश्य देख कर वह सन्न रह गया. बेशर्मी, बेहयाई और बेवफाई की मूरत बनी नग्न कविता परपुरुष की बांहों में अमरबेल की तरह लिपटी हुई पड़ी थी. पत्नी को इस हाल में देख कर सुरेश की आंखों में खून उतर आया. उस का मन कर रहा था कि वहीं पड़ा बैट उठा कर दोनों के सिर फोड़ दे.

‘‘पापा, पापा आ गए.’’ बाहर से आती मोनू की आवाज उस के कानों में पड़ी. कुछ नहीं सूझा तो उस ने झट से बैडरूम का दरवाजा बंद कर दिया. उसी वक्त अंदर से कुंडी लगाने की आवाज आई. यह काम शायद कविता ने किया होगा. सुरेश धीरे से बड़बड़ाया, ‘‘कमबख्त को बच्चे का भी लिहाज नहीं.’’

‘‘पापा, खेलने चलें.’’ मोनू ने सुरेश के पैर पकड़ कर इस तरह खींचते हुए कहा, जैसे उसे मम्मी से कोई मतलब ही न हो.

अब सुरेश की समझ में आ रहा था कि कविता उसे बौड़म क्यों कहती थी. सब कुछ उस की नाक के नीचे चलता रहा और वह उस पर विश्वास किए बैठा रहा. सचमुच बौड़म ही था वह. किराए का ही सही, महंगा घर, शानदार परदे, उच्च क्वालिटी की क्रौकरी, ब्रांडेड कपड़े, मोनू का महंगा स्कूल. सब कुछ कैसे मैनेज करती होगी कविता, उस ने कभी सोचा ही नहीं. यहां तक कि अभी अंदर आते वक्त उस ने दीवार के साथ खड़ी लाल रंग की आलीशान कार देखी थी, उस पर भी ध्यान नहीं दिया था उस ने. सुरेश सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

‘‘पापा, पापा खेलने चलें.’’ कहते हुए मोनू ने उस की टांगें हिलाईं. लेकिन वह जड़वत बैठा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे. अब तो उस के मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि वह मोनू का पिता है या नहीं?

‘‘तुम खेलने जाओ, मैं अभी आता हूं.’’ दुखी मन से कहते हुए उस ने मोनू को बाहर भेज दिया.

सुरेश ने घड़ी देखी तो शाम के 4 बज रहे थे. सोचविचार कर उस ने कविता को उस के हाल पर छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया. उस ने 4 लाइनों का पत्र लिखा, ‘मैं ने तुम्हारा असली चेहरा देख लिया है. तुम्हारे खून से हाथ रंग कर मुझे क्या मिलेगा? मुझे यह भी नहीं पता कि मोनू मेरा बेटा है या किसी और का? लेकिन तुम्हें अब कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. क्योंकि मैं तुम्हें अपनी जिंदगी से निकाल कर खुली हवा में सांस लेना चाहता हूं’

सुरेश ने अपना बैग उठाया और वापस लौट गया. कभी वापस न लौटने के लिए. उस दिन से सुरेश कविता की जिंदगी से निकल गया और उस की जगह दरजनों मर्द आ गए. कविता को सुरेश के जाने का कोई गम नहीं हुआ. उस ने चैन की सांस ली. अब वह आजाद पंछी की तरह थी.

आजकल वह जिस आखिलेंद्र से पेंच लड़ा रही थी, वह व्यवसायी था और उस का पूरा परिवार लंदन में रहता था. वहां भी उन का बड़ा बिजनैस था. परिवार के कुछ लोग जरूर लखनऊ में पुश्तैनी घर में रहते थे. अखिलेंद्र उन से चोरीछिपे कविता के पास जाता था. उस के रहते उसे सुरेश की कोई चिंता नहीं थी.

धीरेधीरे कविता ने गोमतीनगर जैसे महंगे इलाके में घर ले लिया और कार भी. उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. अखिलेंद्र चूंकि कभीकभी ही आता था और उस का लंदन आनाजाना भी लगा रहता था, इसलिए कविता ने कुछ और चाहने वाले ढूंढ लिए थे. स्कूल में वह प्रधानाध्यापक नवलकिशोर के सामने अपने सिंगल पैरेंट्स होने का रोना रोती रहती थी. कितनी ही बार वह आधे दिन की छुट्टी ले कर स्कूल से निकल जाती थी. तब तक मोनू 10 साल का हो गया था.

उस दिन कविता ने बेटे की बीमारी का रोना रो कर नवलकिशोर को 2 दिनों की आकस्मिक छुट्टी की अरजी दी थी. लेकिन अचानक ही उन्होंने उस के बेटे को देखने की इच्छा जाहिर करते हुए उस के घर चलने की इच्छा जाहिर कर दी. कविता किस मुंह से मना करती. उस ने हां कर दी. नवलकिशोर की नजर काफी दिनों से कविता पर जमी थी. वह उन्मुक्त पक्षी जैसी लगती थी, इसीलिए वह उस की हकीकत जानने को उत्सुक थे.

नवलकिशोर कविता के घर पहुंचे तो मोनू स्कूल से आ कर जूते बस्ता और बोतल इधरउधर फेंक कर टीवी पर कार्टून नेटवर्क देख रहा था. मां के साथ एक अजनबी को आया देख कर वह चौंका. कविता ने जल्दबाजी में सामान समेटा और उसे खिलापिला कर खेलने के लिए बाहर भेज दिया. अब कमरे में कविता और नवलकिशोर ही रह गए थे.

कविता उठ कर गई और फ्रिज से कोल्डड्रिंक की बोतलें और स्नैक्स ले आई. नवलकिशोर यह सब देख कर हैरान रह गए. बहरहाल दोनों साथसाथ खानेपीने लगे. जल्दी ही यह स्थिति आ गई कि दोनों ने ड्राइंगरूम की पूरी दूरी नाप ली. एक बार शुरुआत हुई तो सिलसिला चल निकला. स्कूल में भी कविता की पदवी बढ़ गई.

यह सब करीब एक साल तक चला. किसी तरह इस बात की भनक नवलकिशोर की पत्नी सुनीता को लग गई. वह तेज औरत थी. शोरशराबा मचाने के बजाए उस ने चोरीछिपे पति पर नजर रखनी शुरू कर दी. नतीजा यह निकला कि एक दिन वह सीधे कविता के घर जा पहुंची और दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया.

उस दिन जो कहासुनी हुई, उस में कविता की पड़ोसन ने कविता का साथ दिया. उस का कहना था कि कविता शरीफ औरत है. नवलकिशोर उस के अकेलेपन का फायदा उठाने के लिए वहां आता था.

इस का नतीजा यह निकला कि उस दिन के बाद नवलकिशोर का कविता के घर आनाजाना बंद हो गया. कविता और उस की पड़ोसन एक ही थैली के चट्टेबट्टे थे. जल्द ही दोनों ने मिल कर नया अड्डा ढूंढ लिया. सीतापुर रोड पर एक फार्महाउस था. दोनों अपने खास लोगों के साथ बारीबारी से वहां जाने लगीं. एक जाती तो दूसरी दोनों के बच्चों को संभालती.

कालोनी में कोई भी दोनों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था. समय गुजरता गया. गुजरते समय के साथ मोनू यानी मुकुल 20 साल का हो गया. कविता भी अब 40 पार कर चुकी थी. मुकुल का मन पढ़ाई में कम और कालेज की नेतागिरी में ज्यादा लगता था. धीरेधीरे उस का उठनाबैठना बड़े नेताओं के चमचों के साथ होने लगा. उन लोगों ने उसे उकसाया, ‘‘तुम कालेज का चुनाव जीत कर दिखा दो, हम तुम्हें पार्टी में कोई न कोई जिम्मेदारी दिला देंगे. फिर बैठेबैठे चांदी काटना.’’

तिरंगा फहराना आसान, रखरखाव मुश्किल

अटारीवाघा बौर्डर की चैक पोस्ट के नजदीक मार्च, 2017 को लगाए गए 360 फुट ऊंचे तिरंगे झंडे की अपनी अहमियत है. लेकिन इस के फट जाने और बारबार बदले जाने के चलते हो रहे लाखों रुपए के खर्च की खबरें सुर्खियों में रही हैं. इस तिरंगे झंडे की खूबी यह है कि यह दुनिया का 10वां सब से ऊंचा झंडा भी है, पर लंबे समय तक इस के नहीं दिखने के बीच कहा जाने लगा कि अफसरों ने तिरंगा लगाने से पहले तकनीकी चीजों का खयाल नहीं रखा.

इस मामले में लापरवाही बरतने का एक आरोप भी अमृतसर इंप्रूवमैंट ट्रस्ट (एआईटी) ने लगाया और सरकार से गुजारिश की है कि वह इस मामले में जांच करे कि आखिर एक महीने में ही यह झंडा 3 बार कैसे फट गया, जबकि झंडे को 3 बार बदलाभी गया? याद रहे कि अटारी के तिरंगे से पहले देश के सब से ऊंचे तिरंगे के रूप में झारखंड की राजधानी रांची के पहाड़ी मंदिर पर 293 मीटर ऊंचे तिरंगे का नाम दर्ज था.

तिरंगे को एक खस आदर से देखा जाता है, लेकिन इधर कुछ अरसे में देश के अलगअलग हिस्सों में ऊंचा तिरंगा फहराने के सिलसिले में तिरंगे के फटने या झुकने की घटनाएं हुई हैं, उस से यह सवाल पैदा हो गया है कि देशभक्ति दिखाने के चक्कर में ऐसी घटनाएं कहीं इस राष्ट्रीय प्रतीक के असम्मान की वजह तो नहीं बन गई हैं? देश में हर नागरिक को अब अपनी मनचाही जगह पर तिरंगा फहराने और उस के प्रति सम्मान जाहिर करने की आजादी मिली है. अब यह जरूरी नहीं रहा है कि तिरंगा सिर्फ सरकारी इमारतों पर फहराया जाए और किसी खास मौके पर यानी 26 जनवरी व 15 अगस्त को ही इसे लहरानेफहराने की छूट मिले.

यह आजादी देते समय निर्देशित किया गया था कि तिरंगे को फहराते वक्त कोई ऐसी घटना न घटे, जिस से कि उस का अपमान हो. अगर कहीं ऐसा होता है, तो सरकार के मंत्रियोंअफसरों तक को इस के लिए भलाबुरा कहा जाता है. पर कई बार तिरंगे के प्रति देशभक्ति दिखाने के चक्कर में ऐसा भी हुआ है, जब तिरंगे के असम्मान होने का खतरा पैदा हो गया. जैसे, पिछले साल तेलंगाना सरकार ने नया राज्य बनने की दूसरी वर्षगांठ पर देश का दूसरा सब से ऊंचा तिरंगा झंडा हैदराबाद के हुसैन सागर नामक झील में बने संजीवैया पार्क में फहराया, तो वह 2 दिन बाद फट गया.

इस घटना के बाद वहां नया तिरंगा फहराने की कोशिश की गई, लेकिन वह भी तेज हवाओं के बीच टिक न सका. इस तिरंगे की देखरेख का जिम्मा ग्रेटर हैदराबाद नगरनिगम को दिया गया था, लेकिन हर तेज हवाओं के साथ हर बार फट जाने वाले तिरंगे को बदलना उसे भारी पड़ रहा है. ऐसा विशालकाय तिरंगा बनाने में एक लाख, 35 हजार रुपए का खर्च आ रहा है, जिसे उठाना नगरनिगम के लिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है. वैसे तो ऊंची जगह पर फहराए जाने वाले तिरंगे पौलिएस्टर से बनाए जाते हैं, ताकि तेज हवा में वे जल्दी फटे नहीं और बारिश में जल्दी गल न जाएं, लेकिन तेलंगाना वाले मामले में साबित हो रहा है कि वहां यह काम बिना रिसर्च के कर लिया गया था. गौरतलब है कि दिल्ली में भी बेहद ऊंचे खंभे पर तिरंगा फहराया गया है.

दिल्ली में कनाट प्लेस के बीचोंबीच ऐसा तिरंगा आम लोगों को अपनी देशभक्ति दिखाने का मौका देता है. यहां तिरंगे के इतनी जल्दी फट जाने की खबर नहीं मिली है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि यहां ऊंचाई पर तिरंगा फहराने से पहले बाकायदा रिसर्च की गई थी. कनाट प्लेस में इमारतों से घिरे इलाके में तिरंगा फहराया गया, जहां हवा सीधे नहीं आती है. ऐसे बंद इलाकों में तेज हवाएं तिरंगे को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाती हैं, लेकिन इस की तुलना में हैदराबाद का हुसैन सागर इलाका काफी खुला हुआ है. वहां सागर से उठने वाली तेज हवाएं बड़ी आसानी से तिरंगे को चिथड़े में बदल डालती हैं. तिरंगे के ऐसे अपमान की कुछ घटनाएं देश के दूसरे इलाकों में भी हुई हैं. झारखंड की राजधानी रांची में पहाड़ी मंदिर पर लगा तिरंगा आधा झुका हुआ पाया गया था, जिस से राज्य सरकार की किरकिरी हुई थी.

रांची में पहाड़ी मंदिर में लगे तिरंगे की ऊंचाई 66 फुट और चौड़ाई 99 फुट है. इस का वजन 60 किलोग्राम है और यह 293 मीटर ऊंचे खंभे पर फहराया जाता है. गौरतलब है कि 23 जनवरी, 2016 के बाद जब झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास की मौजूदगी में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने इसे देश के सब से बड़े तिरंगे के तौर पर फहराया था, लेकिन अप्रैल महीने में तिरंगे को खंभे के ऊपर ले जाने वाली पुली खराब हो गई, जिस के चलते तिरंगा आधा झुक गया. रांची जिला प्रशासन ने पुली ठीक करने के लिए भारतीय सेना से मदद मांगी.

ध्यान रहे कि आधा झुका झंडा शोक का प्रतीक है, ऐसे में रांची के मामले को तिरंगे के मानकों के उल्लंघन का मामला भी माना गया था. तेलंगाना और झारखंड जैसी घटना पिछले साल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी हो चुकी है. रायपुर के मरीन ड्राइव इलाके में देश का सब से ऊंचा तिरंगा फहराने का दावा 30 अप्रैल में किया गया था. लेकिन फहराए जाने के 20-22 दिन बाद यह फट गया और तब से चुपचाप उतार कर रख लिया गया. एक दिन जब लोगों ने इस तिरंगे को खंभे से नदारद पाया, तो उन्होंने सोशल मीडिया पर तमाम सवाल उठाए.

सरकार को तिरंगे के रखरखाव में हो रही अनदेखी की घटनाओं को भी गंभीरता से लेना चाहिए. यह कहना सही नहीं कि मौसम की वजह से तिरंगा 2 दिन में ही फट गया, तो प्रशासन इस के लिए क्या कर सकता है.मसला यह भी है कि अगर जनता समेत प्रशासन तिरंगा फहरा कर अपनी देशभक्ति का परिचय देना चाहता है, तो जरूरी है कि वे सब तिरंगे का सम्मान बनाए रखने के लिए उस के रखरखाव से जुड़े नियमकायदों का सख्ती से पालन भी करें.  देशभक्ति का मतलब तिरंगा फहरा देना या तिरंगा यात्रा कर लेना मात्र नहीं है, बल्कि उस की पूरी देखभाल भी जरूरी है.साफ है कि जिस तरह से हमें देश के सम्मान का खयाल है, उसी तरह तिरंगे के सम्मान की भी चिंता होनी चाहिए.

सिक्की घास से सुधारी जिंदगी

सिक्की घास से भी जिंदगी में मुकाम पाया जा सकता है. सुनने और पढ़ने में यह भले ही अजीब लग सकता है, लेकिन सच है. सिक्की घास से बिहार के गांवदेहात के इलाके की बहुत सी औरतें अपनी कला का आकर्षक नमूना तो पेश कर ही रही हैं, साथ ही वे अपना व अपने परिवार का पेट भी पाल रही हैं. सालों पुरानी गांव की इस परंपरा के दम पर मधुबनी की औरतें दूसरों को भी अपने पैरों पर खड़ा होने का संदेश दे रही हैं.

मुन्ना देवी की पहल

सिक्की घास से बनी कलाकृतियों को गांव से निकल कर शहर में पहुंचाने में मुन्नी देवी का अनोखा रोल है. इस कला की शुरुआत कैसे हुई? सवाल पूछने पर मुन्नी देवी बताती हैं, ‘‘यह तकरीबन 18 साल पहले की बात है. शादी के बाद जब मैं ससुराल आई, तब मैं ने देखा कि वहां सिक्की घास की कई तरह की कलाकृतियां बनाई जा रही हैं.

‘‘मन में थोड़ी उत्सुकता हुई कि घास से कैसे कोई सामान बनाया जा सकता है? मेरे मायके में इस तरह की कोई चीज नहीं होती थी. घर में सास, ननद सभी इस काम को कर रही थीं. उत्सुकता में आ कर मैं ने भी इसे सीखना शुरू किया. धीरेधीरे शुरू हुआ यह काम अब रफ्तार पकड़ चुका है.’’

इस कला में अपना एक अलग मुकाम बना चुकी मुन्नी देवी बताती हैं कि सिक्की घास से कई तरह के सामान बनते हैं. जैसे चंगेरी, रोटी का डब्बा, कछुआ, चाबी रिंग, कलम सैट, चेन, चिडि़या, गले का हार, चूड़ी, पायल, कान की बाली वगैरह.

मुन्नी देवी बताती हैं, ‘‘इन में से कुछ सामान तो हमेशा बनते रहते हैं, लेकिन कुछ सामान के आर्डर मिलने पर बनाया जाता है. सामान के दाम भी अलगअलग होते हैं.

‘‘वैसे तो यह काम पहले भी होता रहा है, लेकिन कोई पूरी तरह सिक्की का काम नहीं करता था. जिस के घर में अगर यह काम हो रहा था, तो वह इसे बाजार तक लाने के लिए नहीं सोचता था. गुजरते वक्त के साथ जब सिक्की के बने सामान की धूम गांव से बाहर निकल कर मैट्रो शहर तक पहुंची, तब लोगों में जागरूकता आई.

‘‘आज सिक्की की कला में 37 औरतें जुड़ी हुई हैं. इस में 27 औरतें और 10 लड़कियां हैं. उन्होंने इस काम में खुद को ढाल लिया है. लड़कियां पढ़ाई करने के बाद सिक्की के सामान बनाने में हाथ बंटाती हैं.

‘‘इन औरतों ने सिक्की के काम में इस्तेमाल होने वाले सारे सामान की खरीदारी से ले कर इस की मार्केटिंग और सप्लाई सब अपने हाथ में ले रखी है. अपने बलबूते वे इस काम को करती हैं. घर के मर्द भी अब इन कामों में थोड़ाबहुत हाथ बंटाते हैं, लेकिन सारे जरूरी काम औरतें खुद ही करती हैं.’’

मुन्नी देवी आगे बताती हैं कि दिल्ली के एक कारोबारी राजीव सेठी ने जब उन के काम को देखा और खुद ही इन से माल बनाने का आर्डर दिया, तब इन की कला को बाहर के लोगों ने पहचाना.

विदेशों में मिली पहचान

मुन्नी देवी बताती हैं कि इस कला के कद्रदान बड़े शहरों और विदेशों में बहुत हैं. जो सामान यहां औनेपौने दाम पर बिकता था, वही सामान बड़े शहरों और विदेशों में हजारोंलाखों रुपए में बिकता है. वैसे तो इस की कीमत 50 रुपए से ले कर 2 हजार रुपए तक होती है, लेकिन इसी सिक्की की बनी कुछ कृतियां हैं, जो बड़े शहरों में 60 हजार रुपए और विदेशों में ढाई लाख रुपए तक में बिकती हैं. बिक्री के लिहाज से बिहार में गया और देश में दिल्ली सब से अच्छा बाजार है.

कई इनाम भी मिले

सिक्की जैसी कला के क्षेत्र में अलग पहचान बनाने वाली मुन्नी देवी बताती हैं कि देश के कई बड़े शहरों जैसे दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई के अलावा बिहार के पटना, गया, राजगीर जैसी जगहों पर इन के स्टौल लग चुके हैं. वे सिक्की कला में इनाम भी ले चुकी हैं. बिहार सरकार ने मुन्नी देवी को सिक्की कला में 22 हजार रुपए दे कर ‘प्रथम पुरस्कार’ से नवाजा था.

सिक्की कला में अपना लोहा मनवाने के बाद ये औरतें अब अपनी माली जरूरतों को पूरा करने के लिए बचत पर ध्यान दे रही हैं. इन्होंने ‘मिथिला कला संघ’ के नाम से एक संस्था भी बनाई है. इस संस्था से जुड़ी हर सदस्य 10 रुपए की बचत करती है. इन पैसों का उपयोग घरेलू कामों के साथसाथ दूसरी जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है. इन औरतों ने अब कंप्यूटर की ट्रेनिंग लेना भी शुरू कर दिया है.

मुन्नी देवी बताती हैं कि उन के जैसी कई औरतों का रास्ता तब और आसान हो गया, जब दिल्ली के एक कारोबारी की नजर उन के काम पर पड़ी.

वे कहती हैं कि उन लोगों के द्वारा किए जा रहे काम की जानकारी किसी के जरीए दिल्ली के कारोबारी राजीव सेठी तक पहुंची. उन्होंने अपने ट्रेनर और डिजाइनर को गांव में भेजा. उन लोगों ने गांव के लोगों के काम को देखा. उस के बाद कागज पर एक डिजाइन को ड्राइंग कर के सिक्की घास का काम करने वाली इन औरतों को दिया. उन्होंने उस डिजाइन को 3 भाग में कर के सिक्की के ढांचे में डाल दिया. बस, तभी से कामयाबी का रास्ता खुल गया. आज राजीव सेठी हर लैवल पर इन औरतों की मदद करते हैं.            

मौज में मौत की छाया

13 जनवरी, 2016 की दोपहर के यही कोई साढ़े 3 बजे बंगलुरु के थाना सोलादेवनहल्ली पुलिस को सप्तगिरि अस्पताल से सूचना मिली कि कुछ देर पहले श्रुति गौड़ा नाम की एक महिला शहर के जानेमाने एडवोकेट अमित मूर्ति को अस्पताल में इलाज के लिए लाई थी. उन की छाती में गोलियां लगी थीं. डाक्टरों ने उन्हें बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह बच नहीं सके. उन्हें लाने वाली श्रुति पैसों और खून का इंतजाम करने गई थी लेकिन लौट कर नहीं आई.

सूचना के अनुसार, मामला आपराधिक यानी हत्या का लग रहा था, इसलिए थाना पुलिस ने तुरंत मामले की डायरी तैयार की. पुलिस अस्पताल जाने की तैयारी कर ही रही थी कि तभी 2 लोग थाने में दाखिल हुए. उन में एक नौजवान था और दूसरा बुजुर्ग. नौजवान बुजुर्ग के हाथों से रिवौल्वर छीनने की कोशिश कर रहा था. वह रिवौल्वर छीन पाता, उस के पहले ही बुजुर्ग ने रिवौल्वर थानाप्रभारी की मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘सर, आप मुझे गिरफ्तार कर लीजिए. मैं ने इस रिवौल्वर से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की है.’’

‘‘नहीं सर, यह सच नहीं है. एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या इन्होंने नहीं, मैं ने की है.’’ नौजवान ने कहा.

थानाप्रभारी बुजुर्ग को भी जानते थे और युवक को भी. बुजुर्ग का नाम गोपालकृष्ण गौड़ा था. नौजवान उन का बेटा राजेश गौड़ा था. गोपालकृष्ण को इलाके में कौन नहीं जानता था. वह समाजसेवक तो थे ही, एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. इसलिए थानाप्रभारी को एकबारगी विश्वास नहीं हुआ कि बापबेटे जिस हत्या की बात कर रहे हैं, ऐसा सचमुच कर सकते हैं.

लेकिन थोड़ी ही देर पहले ही उन्हें सप्तगिरि अस्पताल से एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या की सूचना मिल चुकी थी, इसलिए उन्होंने सवालिया नजरों से गोपालकृष्ण की ओर देखा तो उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘‘सर, मेरा बेटा झूठ बोल कर मुझे बचाना चाहता है. उस की हत्या मैं ने ही की है.’’

इस के बाद राजेश ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘सर, मेरे पिता निर्दोष हैं. एडवोकेट अमित मूर्ति को मैं ने ही गोलियां मारी हैं, क्योंकि वह निहायत ही गिरा हुआ आदमी था. उस के मेरी पत्नी श्रुति गौड़ा से अवैध संबंध थे.’’

राजेश के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या था और एडवोकेट अमित मूर्ति की हत्या किस ने की है. फिर भी सच्चाई सामने लाने के लिए उन्होंने एक परीक्षा ली. उन्होंने कहा, ‘‘गुनहगार तो आप दोनों ही हैं, लेकिन असली गुनहगार कौन है, यह अभी साफ हो जाएगा.’’

अपनी बात कह कर उन्होंने मेज पर रखा रिवौल्वर गोपालकृष्ण गौड़ा के हाथों में देते हुए थोड़ी दूर पर रखी किसी चीज पर निशाना लगाने को कहा. जब वह उस चीज पर निशाना नहीं लगा सके तो साफ हो गया कि हत्या उन्होंने नहीं, उन के बेटे राजेश गौड़ा ने की थी. वह बेटे को बचाने के लिए झूठ बोल रहे थे. थानाप्रभारी ने दोनों को हिरासत में ले लिया और आगे की जांच के लिए सप्तगिरि अस्पताल जा पहुंचे.

अस्पताल में थानाप्रभारी ने डाक्टरों का बयान ले कर मृतक अमित मूर्ति की लाश कब्जे में लेने की काररवाई पूरी की. तभी उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि हिसार घाट स्थित तीनसितारा होटल राजबिस्टा की तीसरी मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 301 में एक महिला ने आत्महत्या कर ली है.

थानाप्रभारी हत्या के एक मामले की जांच कर ही रहे थे, ऐसे में आत्महत्या की इस दूसरी घटना की सूचना पा कर वह थोड़ा खीझ से उठे. लेकिन वह कर ही क्या सकते थे. अपनी ड्यूटी तो उन्हें निभानी ही थी. उन्होंने फोन द्वारा इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ क्राइम टीम को भी बता दिया और तत्काल वहां की काररवाई निपटा कर होटल राजबिस्टा जा पहुंचे.

थानाप्रभारी के पहुंचने तक पुलिस अधिकारियों के साथ क्राइम टीम भी वहां पहुंच चुकी थी. रिसैप्शन पर पूछताछ में पता चला कि रजिस्टर में आत्महत्या करने वाली महिला का नाम श्रुति गौड़ा लिखा है. थानाप्रभारी श्रुति का नाम सुबह से कई बार सुन चुके थे, इसलिए उन्हें मृतका की शिनाख्त की जरूरत नहीं पड़ी.

वह समझ गए कि आत्महत्या करने वाली श्रुति गौड़ा कोई और नहीं, थोड़ी देर पहले हिरासत में लिए गए गोपालकृष्ण गौड़ा की बहू यानी राजेश गौड़ा की पत्नी है, जिस ने मृतक एडवोकेट अमित मूर्ति को सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया था.

थानाप्रभारी ने अधिकारियों की उपस्थिति में ही घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने आ गए. अब तक मिली जानकारी से स्पष्ट हो गया था कि मामला प्रेमत्रिकोण का है. इस प्रेमत्रिकोण में क्या और कैसे हुआ, इस बात की जानकारी राजेश गौड़ा से पूछताछ के बाद ही पता चल सकता थी. थाने में राजेश गौड़ा से की गई पूछताछ में इस मामले में जो सच्चाई सामने आई, वह इस प्रकार थी—

 

बंगलुरु-कोयंबटूर नेशनल हाईवे के किनारे स्थित कगलीपुर गांव के रहने वाले थे 78 वर्षीय गोपालकृष्ण गौड़ा. सुखी और संपन्न होने के साथसाथ वह समाजसेवी भी थे. साथ ही वह एक राजनीतिक पार्टी से भी जुड़े थे. यही वजह थी इलाके में उन्हें हर कोई जानता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एक ही बेटा था राजेश गौड़ा.

राजेश गौड़ा स्वस्थसुंदर और पढ़ालिखा युवक था. पढ़ाई पूरी होते ही उसे एक जानीमानी रियल एस्टेट कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी. सम्मानित परिवार का होने और बढि़या नौकरी मिलने के बाद राजेश के लिए तमाम रिश्ते आने लगे थे. आखिरकार गोपालकृष्ण ने रामनगर रामोहल्ली के रहने वाले एक कारोबारी की बेटी श्रुति को पसंद कर राजेश से उस की शादी कर दी थी.

श्रुति भी राजेश से किसी मामले में कम नहीं थी. वह सुंदर तो थी ही, उस की नौकरी भी राजेश से अच्छी थी. वह सरकारी नौकरी में थी. उस का पद था पंचायत डेवलपमेंट अफसर का. उसे सरकारी गाड़ी और मकान मिला हुआ था. साथ ही घर का काम करने के लिए सरकारी नौकर भी. श्रुति जैसी पढ़ीलिखी और कमाऊ पत्नी पा कर राजेश खुश ही नहीं था, बल्कि गर्व भी महसूस कर रहा था.

राजेश की तरह उस के मांबाप भी श्रुति को बहुत मानते थे. धीरेधीरे 4 साल बीत गए. इस बीच श्रुति 2 बच्चों की मां बन गई. लेकिन यह भी सच है कि समय कभी किसी का नहीं हुआ. कब किस का समय बदल जाए, कोई नहीं जानता.

पंचायत डेवलपमेंट अफसर होने की वजह से श्रुति को कभीकभी क्षेत्र के लोगों के कामों के लिए पुलिस और वकीलों से भी मिलना होता था. उन्हीं वकीलों में एक अमित मूर्ति भी था. उसी से मिलतेमिलाते श्रुति के कदम बहक गए.

अमित के रौबदार चेहरे, स्वस्थ व सुंदर कदकाठी और व्यवहार ने श्रुति को काफी प्रभावित किया था. यही हाल एडवोकेट अमित मूर्ति का भी था. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद श्रुति की सुंदरता पर वह मर मिटा था. इस में उस का दोष भी नहीं था, खूबसूरत श्रुति की बातचीत करने की अदा ही कुछ ऐसी थी कि किसी को भी मन भा जाए.

अमित के पिता बंगलुरु के जानेमाने वकील तो थे ही, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे. अमित उन का एकलौता बेटा था. उस की शादी ही नहीं हो चुकी थी, बल्कि वह 3 साल के एक बेटे का पिता भी था. अमित पिता के साथ ही वकालत कर रहा था. पिता उसे अपनी ही तरह अच्छा वकील बनाना चाहते थे, शायद इसीलिए उन्होंने उसे पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा था.

अमित और श्रुति दोनों के ही मनों में एकदूसरे के लिए चाहत पैदा हो चुकी थी, इसलिए वे अपनीअपनी गरिमा भूल कर एकदूसरे से मिलनेजुलने लगे थे. श्रुति को मोटरसाइकिल की सवारी बहुत पसंद थी, इसलिए अकसर वह अमित के साथ मोटरसाइकिल से लंबी ड्राइव पर निकल पड़ती थी. चोरीचोरी दोनों ही जिंदगी का लुत्फ उठा रहे थे.

लेकिन यह भी सच है कि कोई भी काम कितना ही छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन वह लोगों की नजरों में आ ही जाता है. राजेश गौड़ा को भी पत्नी की इस हरकत का पता चल गया. श्रुति की हकीकत जान कर राजेश के होश उड़ गए. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक सभ्य परिवार की शिक्षित बहू, जो 2 बच्चों की मां भी थी, इस तरह की हरकत कर सकती है.

चूंकि राजेश का परिवार समाज में प्रतिष्ठित था, इसलिए उस ने पत्नी को समझाना चाहा तों श्रुति ने लापरवाही से हंसते हुए कहा कि जैसा वह सोच रहा है, ऐसा कुछ भी नहीं है. अमित से सिर्फ उस की दोस्ती है और वह उस से काम के सिलसिले में मिलतीजुलती रहती है.

श्रुति ने भले ही सफाई दे दी थी, लेकिन राजेश को पत्नी की इस सफाई पर विश्वास नहीं हुआ था. इसलिए वह श्रुति पर नजर रखने लगा था. इस का नतीजा यह निकला कि एक दिन उस ने श्रुति को अमित मूर्ति के साथ एक होटल में बैठी पकड़ लिया. राजेश ने उसे जलील करते हुए कहा, ‘‘अगर तुम्हें अमित इतना ही पसंद है तो तुम इस के साथ चली क्यों नहीं जाती.’’

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं तुम्हें तलाक दिए देती हूं.’’ श्रुति ने कहा और अमित के साथ होटल से बाहर निकल गई.

श्रुति की यह बात सुन कर राजेश तिलमिला उठा. उसे श्रुति से ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी. यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो सभी परेशान हो उठे. जब इस का पता श्रुति के मातापिता को चला तो उन्होंने उस से बात की और अमित से संबंध खत्म करने का दबाव डाला. आखिर मांबाप के दबाव में श्रुति ने अपने मोबाइल से अमित का नंबर डिलीट करते हुए वादा किया कि अब वह अमित से कोई संबंध नहीं रखेगी.

मांबाप के दबाव में श्रुति ने अमित से न मिलने का वादा तो कर लिया, लेकिन वह मांबाप से किया वादा निभा नहीं सकी. किसी को संदेह न हो, इस के मद्देनजर श्रुति ने अमित मूर्ति से मिलनेजुलने का स्थान और समय बदल दिया. अब वे ऐसी जगह मिलते थे, जहां कोई नहीं जाता था. शहर से दूर निर्जन स्थानों पर जा कर दोनों निश्चिंत हो जाते थे.

लेकिन राजेश निश्चिंत नहीं था. वह श्रुति पर नजरें जमाए था. श्रुति अकसर घर से जल्दी निकल जाती थी तो देर से लौट कर आती थी. पूछा जाता तो वह कह देती कि औफिस में काम ज्यादा था, इसलिए देर हो गई.

इसी बीच राजेश ने श्रुति के मोबाइल पर अमित का कोई संदेश पढ़ लिया. उस ने जब श्रुति से उस संदेश के बारे में पूछा तो उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी कि अमित ने उसे परेशान करने के लिए संदेश भेजा है.

चूंकि राजेश को श्रुति की बातों पर विश्वास नहीं था, इसलिए उस ने उस पर नजर रखने के लिए जनवरी, 2017 के पहले सप्ताह में उस की कार में चुपके से जीपीएस लगवा कर उसे अपने मोबाइल से कनेक्ट करवा लिया.

13 जनवरी, 2017 को श्रुति 1 बजे के करीब राजेश से यह कह कर घर से निकली कि वह एक जरूरी मीटिंग के लिए औफिस जा रही है, वापस आने में देर हो सकती है.

श्रुति के जाने के बाद राजेश ने मोबाइल में उस की लोकेशन देखी तो पता चला कि उस की कार औफिस की ओर जाने के बजाय रिंग रोड की ओर जा रही है. इस से राजेश का खून खौल उठा. उस ने अपने ड्राइवर कुमार से कार निकलवाई और श्रुति का खेल खत्म करने के लिए जाने लगा. उस के पिता गोपालकृष्ण गौड़ा भी यह कहते हुए कार में बैठ गए कि उन्हें बाजार से मकर संक्रांति की पूजा के लिए कुछ सामान खरीदना है.

श्रुति की कार की लोकेशन आचार्य पीयूष कालेज के करीब मिली थी, इसलिए राजेश ने ड्राइवर से कार पीयूष कालेज की ओर ले चलने को कहा. राजेश की कार कालेज के करीब पहुंची तो उसे सुनसान जगह पर श्रुति की कार खड़ी दिखाई दे गई. राजेश ने अपनी कार रुकवाई और श्रुति की कार की ओर चल पड़ा.

कार से निकलते ही उस ने रिवौल्वर निकाल ली थी, जिसे गोपालकृष्ण गौड़ा ने देख लिया था. उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई, इसलिए वह ड्राइवर कुमार के साथ राजेश की ओर दौड़े. उन के पहुंचने से पहले ही राजेश श्रुति की कार के पास पहुंच गया था. कार में श्रुति के साथ अमित को देख कर वह आपा खो बैठा और अमित के सीने को निशाना बना कर 2 गोलियां दाग दीं.

वह श्रुति पर भी गोली चलाना चाहता था, लेकिन गोपालकृष्ण और ड्राइवर ने उसे पकड़ लिया. पिता ने उस के हाथ से रिवौल्वर छीन कर श्रुति से कहा कि वह घायल अमित को तुरंत अस्पताल ले जाए. इस के बाद उन्होंने ड्राइवर से थाने चलने को कहा.

यह संयोग ही था कि श्रुति राजेश के हाथों से मरतेमरते बच गई थी. लेकिन दुर्भाग्य ने उस का पीछा नहीं छोड़ा. डरीसहमी श्रुति ने घायल अमित को साथ ले जा कर सप्तगिरि अस्पताल में भरती कराया. अस्पताल से वह बाहर निकली तो उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? क्योंकि अब वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रह गई थी.

आखिर उस ने एक खतरनाक फैसला ले लिया और अपने मातापिता को इस घटना की सूचना दे कर वह होटल राजबिस्टा पहुंची. वहां अपना पैनकार्ड दिखा कर उस ने कमरा बुक कराया, जिस में जा कर उस ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली. इस तरह एक प्रेमकहानी का अंत हो गया.

14 जनवरी, 2017 को सोलादेवनहल्ली पुलिस ने गोपालकृष्ण गौड़ा और राजेश गौड़ा को अदालत में पेश किया, जहां से गोपालकृष्ण गौड़ा को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जबकि सबूत जुटाने के लिए पुलिस ने राजेश गौड़ा को 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर राजेश को दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.  

भाषा थोपना गलत

उतर प्रदेश की भाजपा सरकार नर्सरी से सभी सरकारी स्कूलों में अंगरेजी पढ़ाएगी तो केरल की वामपंथी सरकार निजी व सरकारी सभी स्कूलों में 10वीं तक मलयालम अनिवार्य कर रही है. अपनीअपनी खप्ती सोच पर जो नियम लागू किए जा रहे हैं उन का मातापिता या बच्चों पर क्या प्र्रभाव पड़ेगा, यह दोनों सरकारें जानने की भी इच्छुक नहीं हैं.

अंगरेजी काम की भाषा है पर यह तो पक्का कर लें कि आखिर कितने लोग सही अंगरेजी पढ़, बोल और लिख पाते हैं? देश के प्राइवेट स्कूलों से निकले ज्यादातर बच्चे भी अंगरेजी में फिसड्डी रहते हैं, क्योंकि उन्हें अंगरेजी का ज्ञान कम ही होता है और रोजमर्रा की भाषा में चूंकि हिंदी व्याकरण का इस्तेमाल होता है, अंगरेजी के शब्दों या छोटे वाक्यों से काम चलाया जाता है.

अंगरेजी पढ़ कर देश का विकास हो जाएगा यह ऐसी ही मूर्खता है जैसे कहना कि संस्कृत पढ़ने से संस्कार सुधर जाएंगे. अमेरिका के अश्वेत, ब्लैक, लैटिनो अंगरेजी पढ़ते और बोलते हैं पर उन का आर्थिक स्तर बहुत कम है. वे अमेरिका की प्रगति का लाभ भी सिर्फ अंगरेजी जान कर न उठा पाए. अंगरेजी का ज्ञान होना विश्व के कितने ही और देशों में काफी फैला है पर विकास वहां न के बराबर है, क्योंकि उन के लिए अंगरेजी ऐसी ही है जैसे उत्तर भारतीयों के लिए हिंदी.

अंगरेजी के अल्फाबेट आना और छोटे वाक्यों का समझ आ जाना गलत नहीं है और अंगरेजी पढ़ाना इस दृष्टि से गलत नहीं है क्योंकि कंप्यूटर की भाषा अंगरेजी ही है और अब इसे कोई हटा नहीं सकता, पर अंगरेजी लिखनेपढ़ने या ज्ञान प्राप्त करने का सहारा नहीं बन सकती.

अगर सरकारें भाषा थोपेंगी तो यह गलत होगा. भाषा के मामले में सरकार को उदार होना चाहिए. हां, भाषा वर्ण या वर्ग व्यवस्था का जरिया न बने, कम से कम सरकार को यह खयाल रखना चाहिए. आज सरकार अधिकांश आदेश अंगरेजी या संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जारी करती है जो ज्यादातर के पल्ले नहीं पड़ते. सरकार अंगरेजी विज्ञापनों पर ज्यादा महत्त्व देती है. हिंदी को जो स्थान मिला है वह उत्तर प्रदेश में न तो अंगरेजी पढ़ाने से कम होगा और न ही केरल में मलयालम पढ़ाने से मलयालम का स्थान और ऊंचा हो जाएगा. भाषा विचार और भाव प्रकट करने के लिए होती है और किसी भी एक या 2 भाषाओं पर महारत अच्छी है पर यह फैसला सरकारें न करें.   

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