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प्रेम को बंधन समझें

ब्रेकअप के बाद रिवाल्वर रानी बन जाओ और बौयफ्रैंड की ऐसीतैसी कर दो. कानपुर की एक युवती ने ऐन शादी के दिन अपने बौयफ्रैंड की शादी के मंडप में रिवाल्वर हाथ में ले कर धावा बोल दिया कि उन दोनों का लंबा प्रेम व सैक्स संबंध रहा है और वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. कोई गोली तो नहीं चली पर बौयफ्रैंड की शादी होतेहोते रह गई और दुलहन के मातापिता पैसा, कपड़ेलत्ते ले कर मुंह लटका कर बुराभला कहते चले गए.

प्रेम और ब्रेकअप आंखें और दिमाग खोल कर करना चाहिए. जैसे प्रेम एकतरफा न हो, ब्रेकअप भी एकतरफा नहीं हो सकता. प्रेम करने या उस का इजहार करने से पहले युवकयुवती को 100 बातें सोच लेनी चाहिए. केवल मजे के लिए प्रेम हो रहा है और उसी प्रेम में सैक्स संबंध भी बन रहे हैं तो यह नंगे बिजली के तार से खुद को बांधने के बराबर है. अगर तारों में बिजली न हो तो ठीक पर कहीं कड़कसे बिजली आ गई तो बड़े झटके लगेंगे ही.

युवतियों को प्रेम की कीमत भी देनी पड़ती है और ब्रेकअप की भी पर युवक यों ही छूट जाएं ऐसा भी नहीं. उन्हें भी मानसिक तनाव, अकेलापन, गिल्ट कौंप्लैक्स और कई बार मारपीट का सामना करना पड़ता है. युवतियों पर तो चालू होने तक का ठप्पा लग जाता है. अगर कहीं गर्भ ठहर गया तो ऐबौर्शन की मुसीबत सहने, सैक्स के दौरान पकड़े जाने का डर भी बना रहता है.

प्रेम हो जाता है, किया नहीं जाता, यह बचकानी बात है. प्रेम करने की फुरसत है, दिल, दिमाग और शरीर मांग कर रहा है और साथी उपलब्ध है तो ही प्रेम की जडं़े फूटती हैं, बिना बीज, खाद, पानी, सही जमीन के प्रेम यों ही नहीं हो जाता. इसलिए प्रेम करते हुए सोच कर चलें कि प्रेमिका रिवाल्वर रानी तो नहीं बन जाएगी, प्रेमी ब्लैकमेलर तो नहीं बन जाएगा. प्रेम के दौरान भी आंख खोल कर चलना चाहिए.

प्रेम को अंतिम परवान तक चलाने के लिए सारी ऊंचनीच देख लें. एकदूसरे के प्रति समर्पण की भावना है या नहीं, दोनों परिवार एकदूसरे को चाहते हैं या नहीं, दोनों का आर्थिक स्तर विवाह का बोझ उठाने लायक है या नहीं. प्रेम टाइमपास नहीं है और अगर गंभीर नहीं है तो दोस्ती को प्रेम का बाना कभी न पहनाएं. दूसरे से लगाव, उस के प्रति खिंचाव एक के रहते पनपने न दें. प्रेम का विवाह के अनुबंध से कोई मतलब नहीं है इसलिए प्रेम को भी बंधन समझें वरना सिर्फ जानपहचान या अच्छी दोस्ती तक रखें वरना रिवाल्वरों की तैयारी कर के चलें.

जन्मदिन पर खुद को एक खास तोहफा देना चाहती हैं शिल्पा

बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी का आज जन्मदिन है. आजकल शिल्पा भले ही फिल्मों में नजर ना आएं, लेकिन वे हमेशा चर्चा में बनी रहती हैं. 40 साल पार करने के बाद, इस उम्र में भी शिल्पा आजकल की कई नयी हिरोइन्स को मात देती हैं. आज वे 42 साल की हो गई हैं.

शिल्पा शेट्टी अपने फिटनेस के लिए जानी जाती हैं. शिल्पा 42 की हो गई लेकिन उनका मानना है कि उम्र उनके लिए मायने नहीं रखती. शिल्पा का कहना है, ‘’मैं हमेशा अपने आपको ग्रेसफुल रखने की कोशिश करती हूं. आप अपनी उम्र को नहीं रोक सकते हैं, लेकिन आप ये फैसला कर सकते हैं कि आप किसी भी उम्र में खूबसूरत और हेल्दी कैसे रह सकते हैं.’’

खबरों की मानें तो शिल्पा इस बार अपने जन्मदिन पर, खुद को एक खास तोहफा देना चाहती हैं. अपने जन्मदिन पर शिल्पा अपने बिजी शेड्यूल में से 1 सप्ताह निकालकर खुद को वक्त देंगी और स्पा के लिए जाएंगी.

आज उनके जन्मदिन पर हम आपको बता रहे हैं शिल्पा की जिंदगी के बारे में कुछ खास बातें.

– ये बात शायद आप जानते होंगे कि शिल्पा शेट्टी ने अपना फिल्मी करियर शाहरुख खान और काजोल के साथ फिल्म 'बाजीगर' से शुरू किया था, पहली फिल्म में ही शिल्पा की अदाकारी देखकर लग गया था कि वो आने वाले दिनों में बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा देंगी. लोगों ने उन्हें बहुत पसंद किया था.

– अगर शिल्पा शेट्टी के फिल्मी सफर पर नजर डालें तो, उनके करियर हमेशा विवादों से जुड़ा रहा है. कई बार शिल्पा कॉन्ट्रोवर्सीज की शिकार बनीं. साल 2006 में एक तमिल अखबार में अश्लील फोटो की वजह से शिल्पा के खिलाफ गैरजमानती नोटिस भी जारी हो चुका है.

– साल 2003 में शिल्‍पा का परिवार उस वक्त विवादों में घिर गया था, जब उनके परिवार के अंडरवर्ल्‍ड के साथ कथित रिश्‍तों की खबर आई. शिल्पा की मां प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर सभी आरोपों से इनकार किया और कहा था कि ये केवल उनकी बेटी की छवि खराब करने की साजिश है.

– आपको याद होगा साल 2007 में एड्स के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेर ने शिल्‍पा को सबके सामने किस कर लिया था, जिसके बाद, वे एक बार फिर विवादों में घिर गई थीं.

– अक्षय कुमार के साथ रिश्ते को लेकर भी शिल्पा का नाम अक्सर मीडिया में सुर्खियां बटोरता रहा. कहा तो ये भी जाता है, कि शिल्पा और अक्षय की शादी होने वाली थी, लेकिन ऐन वक्त पर अक्षय ने शिल्पा की सबसे अच्छी सहेली ट्विंकल से शादी कर ली.

– इंग्लैंड के रिएलिटी शो बिग ब्रदर के दौरान शिल्‍पा पर, जेड गुडी ने कथित रूप से नस्‍लीय टिप्‍पणी की थी, जिससे दुनिया भर में जेड गुडी की आलोचना हुई. इसके बाद शिल्‍पा ने वो रियलिटी शो जीत लिया.

शिल्पा की मानें तो उनके फैंस उनके लिए बहुत मायने रखते हैं, वे हर बार ढेरों मेल, इंस्टाग्राम पोस्ट, ट्विटर पोस्ट और फेसबुक के जरिए खूब सारी दुआएं भेजते हैं और वे बहुत खुश होती हैं. हमारी तरफ से भी शिल्पा शेट्टी को जन्मदिन की शुभकामनाएं.

योग के जरिये ‘सत्ता संतुलन’ बनाते बाबा रामदेव

योग गुरू बाबा रामदेव के कारोबारी साम्राराज्य स्थापित करने की राह में उनके सत्ता संतुलन का प्रमुख योगदान है. जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थें तब बाबा रामदेव उनको सत्ता में बने रहने का आर्शिवाद देते रहते थें. अखिलेश यादव के सबसे करीबी लोगों में बाबा रामदेव का नाम आता था. अखिलेश सरकार ने बाबा रामदेव की संस्था पंतजलि के लिये उत्तर प्रदेश में उद्योग लगाने की सुविधायें भी दी थी.

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री पद से हटते ही बाबा रामदेव ने उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को योग सिखाना शुरू कर दिया. अखिलेश सरकार में राजभवन से दूरी बनाये रखने वाले बाबा रामदेव ने राजभवन में पहली बार योग किया. इस योग में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल राम नाइक सहित मंत्रिमंडल के लोग भी शामिल हुये.

इस मौके पर बाबा रामदेव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुये कहा कि मुख्यमंत्री योग संतुलन बनाने में दूसरों से बेहतर हैं. असल में जिस समय बाबा रामदेव योग करा रहे थें कुछ नेता सही तरह से उनके आसन को कर नहीं पा रहे थें. ऐसे में बाबा रामदेव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा.

बाबा रामदेव ने योग के जरिये सत्ता संतुलन साधने का पहली बार प्रयास नहीं किया है. बिहार में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में नहीं थें तब बाबा रामदेव के साथ उनकी दूरी थी पर बिहार की सत्ता में आते ही बाबा रामदेव और लालू प्रसाद यादव के बीच दोस्ती खुलकर दिखाई दी. कांग्रेस सरकार के समय बाबा रामदेव 500 और 1000 रूपये की नोट को कालेधन का साधन मानते थें. जब मोदी सरकार ने 2000 और 500 की नोट जारी की तो बाबा ने बड़े नोट को कालेधन का जरीया नहीं माना.

जिस तरह से कम समय में बाबा रामदेव ने अपनी कंपनी पंतजलि के कारोबार को तेजी से आगे बढाया है उसमें सत्ता संतुलन का अपना योगदान है. अखिलेश सरकार के समय बाबा रामदेव अखिलेश से अपनी नजदीकी दिखाने का काम करते थें अब सत्ता में भाजपा है तो वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीब होने का प्रयास कर रहे है. बाबा रामदेव अपनी कंपनी को उत्तर प्रदेश में विस्तार देना चाहते हैं.

सत्ता के साथ संबंध बनाने से यह काम सरल हो जाता है. ऐसे में बाबा रामदेव अखिलेश के बाद अब योगी आदित्यनाथ को योग सिखाने में लग गये हैं.

“पूरी पाक टीम के बदले हमें विराट दे दो”

भारतीय कप्तान विराट कोहली के चाहने वाले पूरी दुनिया में मौजूद हैं. अब पाकिस्तान के खिलाफ खेली गई उनकी पारी ने पाकिस्तानी समर्थकों को भी उनका दीवाना बना दिया है.

एक पाकिस्तानी महिला पत्रकार ने भी टीम इंडिया और कप्तान विराट कोहली की जमकर तारीफ की है. पत्रकार नजराना गफ्फार ने भारत के खिलाफ मैच के बाद ट्वीट किया कि भारतीय लोग पाकिस्तान की पूरी टीम ले सकते हैं, और उसके बदले हमें 1 साल के लिए विराट कोहली को दे सकते हैं. नजराना के इस बयान के बाद ट्विटर पर लोगों ने उन्हें काफी ट्रोल भी किया.

आपको बता दें कि चैंपियंस ट्रॉफी के चौथे मैच में भारत ने पाकिस्तान को 124 रन से हरा दिया. 289 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पाकिस्तान की टीम 33.4 ओवर में 164 रन ही बना सकी. आखिरी बैट्समैन खेलने ही नहीं आया. जिसके बाद भारत ने ये मैच जीत लिया.

कोहली ने पाकिस्‍तान के खिलाफ मैच में नाबाद 81 रनों की पारी खेलकर टीम को जीत दिलाई थी. मैच के बाद कोहली ने कहा था,  “40 रनों तक मैं अपनी लय हासिल करने में लगा हुआ था और एक-दो रन ले रहा था. मैं बड़े शॉट नहीं लगा सकता था क्योंकि वह जोखिम भरा होता. हम मैदान से बाहर चार बार गए इसलिए उस खिलाड़ी के लिए जो अंत तक खेलना चाहता हो उसके लिए ऐसा करना मुश्किल हो जाता है.”

किसान आंदोलन पर घिरे शिवराज सिंह चौहान

अभी कुछ दिन पहले तक मध्य प्रदेश में सब ठीक ठाक था और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुट्ठी में सत्ता और संगठन भी था. महज पांच दिन में सब कुछ उलट सा गया है. किसान पुत्र और किसान ऋषि की उपाधियों से नवाज दिये गए शिवराज सिंह चौहान बेबसी से हाथ मलते कह रहे हैं कि किसान आंदोलन में हुई हिंसा में कांग्रेसियों और असामाजिक तत्वों का हाथ है.

हिंसक होते किसान आंदोलन का सच जानने से पहले कांग्रेस का यह सच या राज्य में उसकी हैसियत जान लेना जरूरी और अहम है कि उसके पास शो बाजी करने वाले नेता ही बचे हैं और किसी भी जलसे में उसे तिहाई की संख्या में भी कार्यकर्ता जुटाने में पसीने छूट जाते हैं. किसान आंदोलन अगर कांग्रेस की पहल पर हो रहा है तो फिर वाकई अगले साल होने जा रहे विधान सभा चुनाव में भाजपा को कम से कम शिवराज सिंह की अगुवाई में तो सत्ता की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए.

दरअसल में यह आंदोलन एक तरह से स्वप्रेरित है जिसमें कोई अन्ना हजारे, जयप्रकाश नारायण, महेंद्र सिंह टिकैत या चौधरी चरण सिंह नहीं है. है तो मजबूर और हैरान परेशान किसानों का हुजूम जो उपज की वाजिब दाम का अपना हक मांग रहा है. लगातार पांच बार केंद्र सरकार का कृषि कर्मण पुरुस्कार जीत चुके इस अहिंसक और शांति प्रिय सूबे के मंदसौर में पुलिस फायरिंग में हुई छह किसानो की मौत ने आम लोगों को भी हिलाकर रख दिया है और पहली दफा लोग सोच रहे हैं कि क्या अब शिवराज सिंह चौहान से राज काज संभल नहीं रहा?

अभी अभी चर्चित नमामि देवी नर्मदे यात्रा से निपटे शिवराज सिंह ढंग से सुस्ता भी नहीं पाये थे कि एकाएक ही किसान मरने मारने की हद तक उतारू हो आए. यह किसान आंदोलन को हल्के में लेने की गलती थी और सूबे के खुफिया तंत्र की पोल भी इससे खुली कि मालवा और निमाड अंचलों के किसानो की परेशानी और बैचेनी सी एम तक पहुंची ही नहीं और अगर पहुंची भी होगी तो वक्त रहते स्थिति क्यों नहीं संभाली गई, मंदसौर हादसे का इंतजार क्यों किया गया और किसान मौतों का जिम्मेदार आतंकियो या कांग्रेस को ठहराने से क्या हासिल होगा यह बात सिरे से किसी को नहीं समझ आ रही.

दरअसल में किसानों में असंतोष मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या दूसरे किसी राज्य में ही नहीं पूरे देश भर में है जिसकी जिम्मेदार केंद्र सरकार भी है. चुनावों के वक्त भाजपा ने किसानों को भी सब्जबाग दिखाये थे, ये वादे पूरे न होते तो किसान शायद हमेशा की तरह खामोश रहता पर इन्हें लगातार इस तरह बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया कि किसान सोचने और सड़क पर आने को मजबूर हो गया कि कौन सा हमें दलालों, बिचौलियों, साहूकारों और सरकारी महकमों की मनमानियों से छुटकारा मिल गया. केंद्र और राज्य दोनों की भाजपा सरकारें मुद्दत से खेती किसानी को लाभ का धंधा बनाने का राग अलाप रही है और यहां खेत खलिहानों में पैदावार या तो सड़ाना पड़ रही है या फिर मवेशियों को खिलाना पड़ रहा है.

इधर सूबे झुलस रहा था और उधर 7 जून के अखबार खेती किसानी वाले सरकारी इश्तहारों से 5 पेज में भरे पड़े थे, क्यों, यह किसी को समझ नहीं आ रहा और जिन्हें आ रहा है वे कहने से नहीं चूक रहे कि किसानो की लाशों पर तो मीडिया मैनेज करने से सरकार को बाज आना चाहिए. 

झूठे प्रचार और बेतुकी बड़ी बड़ी बातों से आजिज आ किसान जब सड़क पर आया तो एवज में मिली पुलिस की लठियां और गोलियां जिसकी उम्मीद एक संवेदनशील मानी जाने वाली सरकार से किसी को नहीं थी. अब हालत यह है कि सरकार गोली चलाने की न्यायिक जांच की बात कर रही है लेकिन मृतक किसानों के परिजनो को 1-1 करोड़ रुपये और सरकारी नौकरी की भी घोषणा कर चुकी है.

इस दोहरेपन पर शिवराज सिंह अब कांग्रेस या किसी और से नहीं बल्कि आम लोगों के सवालों से घिर रहे हैं कि अगर मरने वाले जैसा कि उन्होंने कहा था कि असामाजिक तत्व थें तो उन्हें इतना भारी भरकम मुआवजा क्यों और अगर किसान थे तो गोलियां क्यों?

जब आप करें अकेले सफर आपके साथ होंगी ये ऐप्स

हम में से कई लोग कई बार अकेले सफर करते हैं. आपने भी कभी न कभी किया ही होगा और करते भी रहेंगे. बिल्कुल अंजान जगह जाने पर हमें कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. खासकर की अगर आप महिला हैं, तो आपकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं. अगर आप भी अक्सर अकेली सफर करती हैं, या जल्द ही अलोन ट्रेवल करने का प्लान कर रही हैं, तो हम आपको कुछ ऐप्स बताने जा रहे हैं. इन ऐप्स की मदद से आपकी यात्रा से जुड़ी परेशानियां खत्म हो जाएंगी और आप अपने सफर का मजा ले पाएंगी.

गूगल ऐप – अगर आप किसी नई जगह गई हैं और रास्ता भटक जाएं या कंफ्यूज हो जाएं, तो आपके सफर का सारा मजा खत्म हो जाएगा. गूगल ऐप आपको मेप के अलावा भी बहुत कुछ देता है. आप रियल टाइम जीपीएस नैवीगेशन, ट्रैफिक, ट्रांजिट और लाखों जगहों के बारे में जानकारी के लिए इस ऐप पर निर्भर कर सकती हैं.

रियल टाइम, नैवीगेशन, ईटीए के साथ यात्रा को आसान बनाएं. इस से आप के समय की भी बचत होगी और साथ ही यह आप को सही दिशा भी बताएगा. इस ऐप्लिकेशन की मदद से यात्रा के स्थानों को तलाश कर सकती हैं. इसमें रिव्यू और रेटिंग और इंटीरियर के फोटो के जरिए उचित स्थानों के बारे में निर्णय ले सकती हैं. आप जिन स्थानों पर बारबार जाना चाहते हों, उन्हें आप सेव भी कर सकते हैं और किसी कंप्यूटर या डिवाइस से बाद में उन्हें तुरंत तलाश सकती हैं.

ट्रैवलयारी – ट्रैवलयारी एक ऐसा ऑनलाइन बस बुकिंग प्लेटफॉर्म है, जो बस टिकटिंग प्रोसेस को आप के लिए आसान बनाता है. ट्रैवलयारी एंड्रॉयड ऐप मैंटीज का कस्टमर रिजर्वेशन सिस्टम (सीआरएस) भारत में 55% से ज्यादा बस सेवा देने वाले इंवेन्ट्री मैनेजमेंट को मजबूत बनाने वाला एक प्रमुख टेक्निकल प्लेटफॉर्म है.

इस एक ऐप के जरिए आप बस, होटल, टूअर पैकेज का आसान भुगतान कर सकते हैं.

ओयो रूम्स – ओयो ऐप के साथ होटल में कमरे की तलाश आसान हो जाती है और सुरक्षित भी, खासकर जब आप अकेली हों. इस ऐप की मदद से कुछ ही देर में आप अपने लिए कमरा बुक कर सकती हैं. इस ऐप में इंडियाभर के 150 शहरों के 50 हजार से अधिक कमरों में से आप अपनी पसंद के कमरे का चयन कर सकते हैं. यह ऐप आप को कमरा बुक करने, खानापीना ऑर्डर करने, कैब बुक करने और पेमेंट देने का भी ऑप्शन देता है.

जुगनू – जुगनू इंडिया के 40 से अधिक शहरों में किफायती रेट पर उपलब्ध हो जाएंगे. इनमें सफर करना सुरक्षित है और सुविधाजनक भी. जुगनू कैब की तरह ही काम करते हैं, यानी आपके बुक करने के कुछ ही मिनटों बाद ये पिकअप लोकेशन पर पहुंच जाएंगे.

जोमेटो – जब आप किसी नई जगह पर होते हैं, तो होटल या रेस्टोरेंट के बारे में कोई आईडिया नहीं होता है. इस ऐप के जरिए आप रेस्टोरेंट खोज सकते हैं. जोमेटो ऐप सफर में आपके खानेपीने की हर परेशानी को दूर कर देगा. जोमेटो में आप रेस्टोरेंट मेनू, फोटो, यूजर रिव्यू और रेटिंग भी देख सकते हैं, जो आपको डिसीजन आसान कर देगा कि आप वहां जाना चाहते हैं या नहीं.

योगी को वाल्मिक छाप साबुन

नवसर्जन अहमदाबाद की एक एन जी ओ है जिसके कर्ता धर्ता कीर्ति राठौर और कांतिलाल परमार डॉक्टर अंबेडकर वचन प्रतिबद्धता समिति से भी जुड़े हैं. इन दोनों ने 16 फुट का एक साबुन तैयार करवाया है जिसे 9 जून को अहमदाबाद में डिस्प्ले किया जाएगा. यह खास साबुन एक खास मकसद से एक खास हस्ती उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए खासतौर से वाल्मिक समाज की एक आम महिला से बनवाया गया है. कांतिलाल और कीर्ति की मंशा है कि आदित्यनाथ इस साबुन से नहाकर अपनी शुद्धि कर लें.

यह पहला मामला है जिसमें एक महंत को ही अशुद्ध करार दिया जा रहा है. आमतौर पर मुख्यमंत्रियों को फूल, गुलदस्ते, शॉल, श्रीफल वगैरह भेंट किए जाते हैं पर गुजरात का दलित समुदाय योगी को यह अनूठा साबुन इसलिए देगा कि कुछ दिन पहले ही जब वे कुशीनगर इलाके की दलित मुसहर बस्ती में दौरे पर गए थे तब उनकी तरफ से प्रशासन ने मुसहर दलितों को साबुन, शैम्पू और आजकल का इत्र यानि डियो बांटते यह नसीहत भी मुफ्त दी थी कि वे लोग मुख्यमंत्री के सामने इन खुशबूदार आइटमों को लगाकर ही जाएं. आदित्य नाथ को बदबू से परहेज है या दलितों से यह अफसरों ने नहीं बताया.

बात गुजरात के दलितों को बेइज्जती वाली लगी सो अपनी इज्जत और स्वाभिमान दिखाने उन्होंने 16 फुट के भीमकाय साबुन वाला फैसला ले लिया जिस पर योगी और उनकी सरकार की खासी छीछालेदार हो रही है कि वे भी दलित विरोधी टाइप के हैं. (यह किसी ने न पूछा न सोचा कि वे या कोई और दलित हितैषी थे ही कब)

मुद्दे की बात यह है कि यू पी में दलितों की सामाजिक हैसियत और योगी का रसूख है जो दो ऐसी समान्तर रेखाएं हैं जो कहीं जाकर नहीं मिलतीं. दलित साफ सफाई से नहीं रहते या फिर जन्मना अशुद्ध होते हैं इस पर जरूर हमेशा की तरह एक बार फिर बहस की पूरी गुंजाइश है.  कुशीनगर प्रशासन अगर यह सोचता है कि साबुन से नहाने से दलित पूरी तरह सवर्ण नहीं तो कुछ सवर्णों जैसे हो जाएंगे तो यह तरीका पूरे देश भर में स्व्च्छ भारत अभियान की तरह स्व्च्छ और साफ दलित अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए जिससे दलितों को पता चले कि कुछ और भले ही न हुआ हो पर शुद्धि बड़ी सस्ती हो गई है.

धर्मग्रंथों में जो लिखा है वह एक मानवीय त्रुटि है जिसे अब यूं सुधारा जा रहा है. अब यह गुजरात के होनहार और उत्साहित दलितों की जिम्मेदारी है कि वे यह साबित करें कि कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय महंत किस बिना पर अशुद्ध होता है इस बाबत वे चाहें तो वेद, पुराण, संहिताएं, उपनिषद और स्मृतियां वगैरह पढ़ सकते हैं और इसके लिए उनके कानों में पिघला शीशा नहीं डाला जाएगा.

जीएसटी के समर्थन में उतरे सलमान खान

एक जुलाई से जीएसटी लागू होने जा रहा है. जीएसटी लागू होते ही फिल्मों पर 28 प्रतिशत टैक्स लगेगा. परिणामतः सिनेमाघर में फिल्म देखने के लिए टिकट के लिए दर्शकों  को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी. इस बात से हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है.

कमल हासन ने कहा है कि इससे सिनेमा को बहुत नुकसान होगा. उन्होंने तो सिनेमा छोड़ने की धमकी तक दे डाली है. फिल्म निर्माता बोनी कपूर ने भी जीएसटी के खिलाफ आवाज उठाते हुए 28 प्रतिशत के टेक्स को घटाने की मांग की है. उधर ‘फिल्म सेंसर बोर्ड’ के चेअरमैन पहलाज निहलानी ने फिल्म निर्माताओं संगठन से जुड़े लोगों के साथ महाराष्ट् के मुख्यंमत्री देवेंद्र फड़नवीस से मुलाकात कर जीएसटी को 28 प्रतिशत से घटाने की मांग की है. यानि कि हर कई यही कह रहा है कि 28 प्रतिशत टैक्स लगने से सिनेमा को नुकसान होगा.

मगर ‘‘सरिता’’ पत्रिका से खास बातचीत करते हुए सुपरस्टार सलमान खान ने जीएसटी की वकालत करते हुए कहा कि – ‘‘जीएसटी का सिनेमा पर क्या असर होगा, ये तो मैं नहीं जानता, पर टिकट के दाम बढ़ेंगे, तो सरकार को उतना अधिक टैक्स जाएगा. सरकार वो पैसा सही जगह लगाएगी, तो देश की उन्नति होगी और हमारी फिल्म इंडस्ट्री भी बेहतर हो जाएगी.’’

अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाना है : विवेक ओबेराय

2002 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘‘कंपनी’’ से अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले विवेक ओबेराय ने साथिया’, ‘ओमकारा’, ‘शूटआउट ऐट लोखंडवाला’, ‘युवा’, ‘मस्ती’ सहित कई फिल्में कर चुके हैं. उनके करियर पर गौर किया जाए, तो उन्होंने गैंगस्टर, लवर ब्वॉय के साथ कॉमेडी कर हर तरह के रंग अपने अभिनय से परदे पर दिखाए हैं. फिलहाल उनकी नई फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ 16 जून को प्रदर्शित होने वाली है.

विवेक ओबेराय महज अभिनेता नहीं हैं. वह बिजनेसमैन व समाज सेवक भी हैं. वह ‘एंटी टोबैको’ के ब्रांड एम्बेसेडर भी हैं. वह भवन निर्माता भी हैं. उन्होंने हाल ही में सैनिकों के परिवारों को 25 फ्लैट उपहार में दिए हैं.

आप बहुत कम फिल्में करने लगे हैं?

जी हां. 2013 से पहले मैं हर साल कम से कम पांच फिल्में कर रहा था. यह वह वक्त था, जब मैं फिल्म की शूटिंग करता था और बीच बीच में बिजनेस व चैरिटी की मीटिंग करता था. बहुत तनाव हो रहा था. परिवार व अपने नवजात बेटे विवान को भी समय नहीं दे पा रहा था. इसलिए फिर निर्णय लिया कि हमें कैसे क्या करना है. समय के साथ इंसान को खुद विश्लेषण करना चाहिए कि हमें क्या चाहिए, कितना चाहिए. देखिए, इंसानी चाहत की कोई सीमा नहीं पर जरुरत तो तय कर सकते हैं. तब हमने तय किया कि हर साल कम मगर बेहतरीन फिल्में की जाएं.

फिल्म ‘‘बैंक चोर’’ को लेकर क्या कहेंगे?

‘‘वाय एफ’’ के बैनर तले बनी बेहतरीन ह्यूमर वाली फिल्म है, जिसमें मैं एक पुलिस अफसर अमजद खान के किरदार में हूं. फिल्म की कहानी के केंद्र में बैंक चोरी है. चंपक नामक मराठी युवक दो लड़कों लेकर बैंक के अंदर चोरी करने जाता है, क्योंकि उसे अपनी मां के इलाज के लिए पैसे की सख्त जरुरत है. यह लार्जर दैन लाइफ फिल्म है. पूरी तरह से मध्यम वर्गीय फिल्म है. एक अच्छी फिल्म और अपने दोस्त रितेश देशमुख के साथ काम करने का अवसर था, इसलिए मैंने की है. फिल्म बनी भी अच्छी है.

क्या आप मुद्दों पर आधारित गंभीर फिल्म में अभिनय करना पसंद करेंगे?

क्यों नहीं. यदि सशक्त फिल्म का ऑफर मिले तो जरुर करुंगा. मेरी राय में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक संदेश पहुंचाने और सामाजिक बदलाव लाने में सिनेमा की अहम भूमिका हो सकती है.

तो अब आप अपने बेटे को समय देते हैं?

2013 के बाद मैंने तय कर लिया कि शाम सात बजे तक घर पहुंच जाना है. फिर सुबह नौ बजे तक के लिए मोबाइल फोन बंद कर देता हूं. जब मैं शाम सात बजे घर पहुंचता हूं, तो मैं अपनी बेटी अमेया निर्वाणा व बेटे विवान दोनों को नहलाता हूं. उन्हें खाना खिलाता हूं. फिर हम छत पर जाते हैं. खुले आसमान के नीचे खड़े होकर उनके साथ चंदा मामा और सितारों से बातें करते हैं. उसके बाद उन्हें बिस्तर पर लिटाकर कहानी सुनाते हुए सुलाता भी हूं. मैं अपने बच्चों को अच्छा इंसान बनाना चाहता हूं.

आपका बेटा विवान आपसे सवाल भी करता होगा?

जी हां. वह चार साल का हो गया है. नर्सरी में पढ़ने जाने लगा है. कई बार उसके सवालों के जवाब दे पाना मेरे लिए मुश्किल भी हो जाता है. अनोखे सवाल होते हैं. कई बार मुझे लगता है कि वह मुझे सिखा रहा है. एक दिन मैं उससे धरती के बारे में बात कर रहा था. शायद उसी दिन वह धरती के बारे में स्कूल से कुछ सीख कर आया था. तो उसने अंग्रेजी में कहा कि आप ‘मम्मा अर्थ’ की बात कर रहे हैं. मैने पूछा कि ‘मम्मा अर्थ’ क्या हुआ? तो उसने कहा, ‘जैसे मेरी मम्मा है. वह मुझे खाना देती है. पानी देती है. मैं उससे जो मांगता हूं, वह सब वह देती है. अर्थ हम सबको सब कुछ देती है, इसलिए वह हम सबकी मम्मा हो गयी.’’

उसकी बातें सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया. उसे प्रकृति से बहुत प्यार है. उसके दादाजी यानी कि मेरे पिता श्री सुरेश ओबेराय उससे पेड़ों के बारे में बातें करते हैं. हम मुंबई में जहां रह रहे हैं, वहां 1985 से रह रहे हैं. तो उस पूरी गली में मेरे पिता जी ने पेड़ लगाए हैं. वह अपने जन्मदिन व अपनी शादी की सालगिरह पर कम से कम एक पेड लगाते आ रहे हैं. कुछ पेड़ बीस व तीस वर्ष के हो गए हैं. वह सारे पेड़ इतने बड़े व घने हो गए हैं कि हमारे घर के सामने वाली पूरी गली में हरियाली ही नजर आती है. सड़क पर खड़े होकर आप सूर्य नहीं देख सकते. अब मेरे पिता जी वही काम अपने पोते व पोती से कराते रहते हैं. बीज बोना, पानी देना, पेड़ को सहलाना वगैरह.

आपने वृंदावन में अपनी मां के नाम लड़कियों के लिए जो स्कूल चला रखे हैं, उसकी प्रेरणा कहां से मिली थी?

करीबन आठ नौ वर्ष पहले मैं वृंदावन गया था. वहां पर मुझे पता चला कि देश के विभिन्न हिस्से से लड़कियों को लाकर बाल यौन शोषण के लिए बेचा जाता है. पहले मुझे लगा कि वृंदावन जैसी भगवान कृष्ण की नगरी में यह संभव नही है. यह तो देश की राजधानी दिल्ली से 150 किलोमीटर दूर है. पर जब उस बाजार में मैं गया तो सब कुछ अपनी आंखों से देखकर स्तब्ध रह गया.

दुःख तब ज्यादा हुआ, जब मैंने पाया कि वहां पर सबसे बड़ी उम्र की लड़की 13 साल की और सबसे छोटी पांच साल की है. मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर इंसान इतना बड़ा जानवर या हैवान या हवशी हो गया है कि वह पांच साल की लड़की को भी नहीं छोड़ेगा. तब मैंने वहां के कुछ स्थानीय लोगों और श्रीकृष्ण आंदोलन से जुड़े लोगों को लेकर उस बाजार से लड़कियों को मुक्त कराने का काम शुरू किया.

हमने उन्हें रहना, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा सब कुछ मुफ्त में देना शुरू किया. हमने कोशिश की कि मुक्त करायी गयी लड़कियों को उनके माता पिता तक पहुंचाया जाए. कुछ में सफलता मिली, पर ज्यादातर लोगों ने अपनी बेटियों को स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया. तब ऐसी लड़कियों के लिए हमने सर्व सुविधायुक्त आवासीय स्कूल शुरू किया. हमने आस पास के 14 गांवों का दौरा किया, तो पाया कि वहां पर तेरह चैदह साल की उम्र की लड़कियों की शादी 35 से 40 साल की उम्र के पुरूषों के संग पैसे लेकर करायी जा रही है. यानी कि लड़की के पिता सामने वाले से लड़की देने के नाम पर दहेज ले रहे थें. यह डरावनी तस्वीर देख व सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. हमने इन लड़कियों को अपने स्कूल में शिक्षा देना शुरू किया. हमने उनके माता पिता बनकर उनकी देखभाल करना शुरू किया. हमने उनका मानसिक इलाज भी करवाया.

गांव के सरपंच वगैरह की मदद से लड़की के माता पिता पर दबाव डलवाया. अब इन चैदह गांवों में सौ प्रतिशत बाल विवाह बंद हो चुका है. हमने गांव के लोगों की मानसिकता को बदला. उन्होंने भी देखा कि उनकी बेटियां पढ़ रही हैं. कुछ हूनर सीख रही हैं. इन लड़कियों को भोजन, कपड़े, किताबें, कॉपी, कम्प्यूटर सब कुछ दे रहे हैं. इनमें से कुछ लड़कियों का अब करियर बन रहा है. कुछ आईटी का काम सीखकर अपनी दुकान खोल रही हैं. कुछ ने मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोली है. यह सब देखकर अब गांवों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले माता पिता भी खुश हैं. अब हम चौथा स्कूल गोवर्धन में खोलने जा रहे हैं.

कैंसर पीड़ित बच्चों की मदद के लिए भी सहयोग दे रहे हैं?

यह काम हमने 15 वर्ष पहले शुरू किया था. उस वक्त हमने देखा था कि गांवों रहने वाले किसान अपने बच्चे की इस बीमारी का इलाज कराने के लिए अपनी खेती साहूकार के पास गिरवी रखकर तीन से चार प्रतिशत ब्याज पर पैसे ले रहे हैं और बेचारे बर्बाद हो रहे हैं. मैं ऐसे परिवारों से मुंबई में ‘टाटा मेमोरियल अस्पताल’ में मिला, तो मुझे लगा कि इनके लिए कुछ किया जाना चाहिए. तो हमने ‘टाटा मेमारियल कैंसर अस्पताल’ के साथ मिलकर एक मुहीम चलायी और अब तक हमने ढाई लाख बच्चों का इलाज करवाया है. मैं यह नहीं कह रहा कि यह सारा पैसा मैंने अपनी जेब से दिया है, बल्कि हमें इस नेक काम को करने में कई छोटे बड़े उद्योगपतियों और विदेशी संगठनों से भी मदद मिली है. हमने करीबन 40 पत्रकारों की मदद की है. गरीब इंसान को कैंसर है, तो हम उसकी भी मदद करते हैं. हम ज्यादा से ज्यादा मदद करते हैं.

आप यह सारा काम अपना एनजीओ बनाकर कर रहे हैं?

जी हां. हमारा एनजीओ है ‘‘वन फाउंडेशन’’ लेकिन हमने कोई ऑफिस नहीं बनाया है. वास्तव में जब हमने इसकी शुरूआत की, तो लोगों ने बताया कि हमें ऑफिस खोलना चाहिए, कुछ स्टाफ रखना होगा, जिन्हें सैलरी देनी होगी. फिर बिजली वगैरह का बिल भरना है. तो मैंने कहा कि हमें लोगों से दान के रूप में 100 रूपए मिलेंगें और हम उसमें से 70 रूपए ऑफिस पर खर्च करेंगे तो जरुरत मंद बच्चों तक क्या सिर्फ 30 रूपए पहुंचेंगे. इसलिए हमने पहले से ही मौजूद एनजीओ मसलन ‘कैंसर पेशेंट एसोसिएशन’ के साथ हाथ मिलाया और काम कर रहे हैं. मेरी संस्था का खर्च जीरो है. जब हम अपने एनजीओ की तरफ से प्रमोशनल इंवेंट करते हैं, तभी खर्च आता है.

इस तरह के काम को अपना कितना समय देते हैं?

समय बहुत देना पड़ता है. इसलिए हमने तय किया है कि कितना समय समाज सेवा के कार्यों को, कितना समय बिजनेस को और कितना समय फिल्मों में अभिनय करने के लिए देना है. कितना समय अपने परिवार केा दूंगा. यानी कि हर चीज के बीच समय का एक संतुलन बनाकर चल रहा हूं. चाणक्य नीति में बहुत सुंदर तरीके से लिखा है इंसान को जिंदगी में चार नियमों विवेक, विचार, नीति व वैराग्य का पालन करना चाहिए.

विवेक, जो कि हमें बताता है कि मेरी अपनी जिंदगी की जरुरत क्या है. विचार, विवेक ने जो कहा उसे विचार करना कि क्या यह सही है या नहीं. हमारी वास्तविक जरुरत कितनी है. सिर्फ बैंक में रकम के आगे जीरो बढ़ाने का कोई मतलब नहीं.

नीति के तहत हमें तय करना है कि हमें क्या चाहिए. आखिर हम घर के सामने दस गाड़ी क्यों खड़ी रखें. जिंदगी की सबसे बड़ी जरुरत है उसे साधारण बनाए रखना. जिंदगी को जटिल बनाने वाले काम न करें, ऐसे साधन जुटाएं, जो कि चिंता न बढ़ाएं. दस गाड़ी होने पर उतने ड्रायवर और उसी तरह की समस्याएं होगी. वार्डरोब में ज्यादा कपड़े क्यों रखें. बच्चों को भी यही सिखा रहा हूं.

देखिए, हकीकत में वैराग्य सन्यास नहीं है. वैराग्य तो बहुत उंचा दिमागी स्तर है, जिसमें आप अपनी जिंदगी के कार्यों में मगन या लीन हैं तो वह काम बेहतर होगा. यदि आप अभिनय कर रहे हैं, तो उसमें डूब जाएं. काम करते हुए इंज्वॉय करें.

आप अपने बिजनेस को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

सच यह है कि अभिनेता बनने से पहले मैं बिजनेस मैन बना था. 19 साल की उम्र में मैंने बिजनेस शुरू किया था. फिर कुछ समय बाद अपना शेयर बेचकर विदेश पढ़ाई करने चला गया. 2002 से अभिनय कर रहा हूं. 2009 में मैंने तकनीकी कंपनी में इंवेस्टमेंट किया. 2012 से भवन निर्माण के क्षेत्र में हूं. हमने ‘कर्म इंफ्रास्ट्रक्चर’ के तहत 19000 परिवारों को सस्ते मकान दिलाए. हम ‘रघुलीला इंफ्रास्ट्रक्चर’ से भी जुड़े हुए हैं.

बचत का रास्ता है निवेश!

हमेशा हमें बचत करने के नये नये रास्ते दिखाये जाते हैं और हर कोई अपनी आय से बचत करने के बारे में सोचता भी है, ताकि उसके वित्तीय लक्ष्य पूरे हो सकें. आम तौर पर बचत और निवेश को एक ही समझा जाता है लेकिन इनमें बहुत अंतर होता है.

क्या है बचत का मतलब

बचत का मतलब है उन वित्तीय साधनों में पैसे डालना जिनमें कम रिस्क है और रिटर्न गारंटिड है और एक आदमी जो पैसा बचा रहा है वह अल्प अवधि में अपना पैसा जो बचत के लिए डाल रहा था उसे निकाल सके. बचत करते वक्त एक आदमी अपनी पूंजी की सुरक्षा पर रिटर्न से ज्यादा ध्यान देता है.

निवेश के बारे में कितना जानते हैं आप?

निवेश का मतलब है उन वित्तीय साधनों में पैसे डालना जिनमें रिस्क अधिक है और रिटर्न गारंटिड नहीं है! आप अपने पैसे को लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं जिससे आप अपने वित्तीय लक्ष्य प्राप्त कर सकें! निवेश का मूल मंतरा है लंबी अवधि में धन सृजन.

तो रखें इन बातों का ध्यान..

अपने वित्तीय लक्ष्यों को निर्धारित करें : एक निवेश योजना बनाओ जिसमें आपके वित्तीय लक्ष्यों की सूची हो और आपके पास कितना समय है उन तक पहुंचने के लिए है.

अपने खर्च सुनिश्चित करें : निवेश से पहले अपने खर्च की 3 से 6 माह की पर्याप्त राशि को सुनिश्चित कर अपने बचत खाते में बचा कर रखें ताकि आप आराम से अपनी छोटी अवधि की जरूरत को पूरा कर सकें और अपने भुगतान कर सकें.

निवेश पर जोखिम पर विचार करें : आप अपने निवेश पर कितना जोखिम उठा सकते हैं, उसे निर्धारित करें.

पोर्टफोलियो विविधीकरण : अपने वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निवेश विविधीकरण पर ध्यान दें.

अपनी निवेश की राशि तय करें: आप कितने पैसे अपनी आय में से निवेश कर सकते हैं और कितनी देर के लिए ताकि आपका वित्तीय लक्ष्य प्राप्त हो सके.

वित्तीय लक्ष्य प्राप्त करने में म्यूचुअल फंड्स कैसे मददगार हैं?

दीर्घकालिक पूंजी : दीर्घकालिक पूंजी निर्माण के लिए, इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर अपने निवेश को 5 से 10 वर्ष का समय दें. इक्विटी म्यूचुअल फंड्स लंबी अवधि में उन निवेशकों के लिए बहुत बेहतर विकल्प है, जो अपने पैसे पर थोड़ा रिस्क उठा सकते हैं और जो अपने निवेश को समय दे सकते हैं.

लघु अवधि : के वित्तीय लक्ष्यों के लिए निवेश डेट फंड्स में 1 से 3 वर्ष तक निवेश करें जिसे उसे अपने निवेश पर बैंक बचत खाते और बैंक एफ.डी. से बेहतर रिटर्न कम रिस्क ले कर मिलेगी.

टैक्स सेविंग्स : टैक्स सेविंग्स के लिए म्यूचुअल फंड्स की ई.एल.एस.एस. स्कीम में पैसे निवेश करें. इससे एक तो आपको टैक्स में छूट मिलेगी दूसरा आपका निवेश बाकी सब सेविंग विकल्पों से बेहतर रिटर्न देगा और अहम बात इन स्कीमों में सबसे छोटा लॉक इन पीरियड है.

आपातकाल : आपातकालीन इस्तेमाल  के लिए पैसा म्यूचुअल फंड्स के लिक्विड फंड्स में निवेश करें जिससे आपको आपके बचत खाते से बेहतर रिटर्न मिलेगी और आप आपका पैसा तुरंत निकाल भी सकते हैं.

मिड रिस्क्स : मध्यम रिस्क से रिटर्न के लिए म्यूचुअल फंड्स की बैलेंस फंड्स में पैसे निवेश करें. ये फंड्स इक्विटी और डेट फंड्स का एक मिश्रण रहते हैं जो आपको मध्यम रिस्क में बेहतर रिटर्न देते हैं.

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