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अपने स्मार्टफोन में पाईये ज्यादा स्टोरेज स्पेस

स्मार्टफोन तो अब हर कोई इस्तेमाल करता है. आप भी अपने फोन में अपनी निजी फाइल्स, फोटो, वीडियो और डॉक्यूमेंट्स को सेव करके रखते हैं. इसके लिए उन्हें फोन में ज्यादा स्पेस की आवश्यकता होती है. कई उपयोगकर्ता. अपने फोन में कम मैमोरी की प्रॉब्लम का सामना करते हैं क्योंकि उनके फोन में एसडी कार्ड नहीं होता. इस परेशानी के चलते आप एप्स इंस्टॉल करने में भी असमर्थ रहते हैं.

हालांकि, अगर आप चाहें तो ‘लो-मेमोरी’ की इस प्रॉब्लम को खूद सॉल्व कर सकते हैं. कैसे? तो चलिए हम आपको बता देते हैं इसका तरीका.

क्लियर कैश और डाटा : फोन में स्पेस खाली करने का सबसे अच्छा तरीका कैश को क्लियर करना है. इसके लिए आपको सेटिंग्स में जाना होगा. फिर स्टोरेज में जाकर एप्स पर टैप करना होगा. इसके बाद हर एप को ओपन कर, Clear Data और Clear Cache के ऑप्शन पर क्लिक कर दें. इसके अलावा फोन की इंटरनल मैमोरी के कैश को भी क्लियर करना आवश्यक होता है. इसके लिए सेटिंग्स पर जाकर स्टोरेज पर जाना होगा. फिर इंटरनल स्टोरेज पर जाकर Cached data पर टैप कर दें.

गूगल फोटोज का इस्तेमाल : अगर आपके फोन में एसडी कार्ड का ऑप्शन नहीं है तो आप अपनी फोटोज को गूगल फोटोज में मूव कर सकते हैं. गूगल आप को 15 जीबी का फ्री क्लाउड स्पेस देती है. इसमें 16 एमपी साइज वाली फोटोज और एचडी वीडियो को सेव कर सकते हैं.

लाइट एप्स का इस्तेमाल : सभी के फोन में फेसबुक, मैसेंजर और यूट्यूब समेत कई एप्स मौजूद होती हैं. इन एप्स और इनके अपडेट्स से फोन की मैमोरी काफी हद तक भर जाती है. आपको बता दें कि इन सभी एप्स का प्ले स्टोर पर लाइट वर्जन भी मौजूद है. लाइट वर्जन फोन की इंटरनल मैमोरी में कम स्पेस लेते हैं.

क्लाउड स्टोरेज का यूज : अगर आपके फोन की इंटरनल मैमोरी भर जाती है तो आप क्लाउड स्टोरेज देने वाले एप्स जैसे Dropbox, OneDrive और Google Drive में अपना डाटा सेव कर सकते हैं. यहां डाटा बिल्कुल सुरक्षित रहता है. यहां पर डॉक्यूमेंट्स को अलग-अलग फोल्डर बनाकर अरेंज किया जा सकता है.

पुराना डाटा डिलीट करना : कई बार हम फोटोज या वीडियो डाउनलोड करके भूल जाते हैं. ये डाटा फोन की मैमोरी लगातार भरता रहता है. ऐसे में इन्हें डिलीट करना एक बेहतर ऑप्शन है. इससे आपके फोन की मैमोरी में स्पेस बन जाएगा.

एप्स को एसडी कार्ड में करें ट्रांसफर : अगर आपके पास एसडी कार्ड है तो आप फोन में मौजूद एप्स को उसमें मूव कर सकते हैं. क्योंकि ये सभी फोन की इंटरनल मैमोरी में सेव होती हैं. इसके लिए सेटिंग्स में जाकर स्टोरेज में जाएं और फिर एप्स पर टैप करें. इसके बाद Move to card पर टैप कर दें. आपको बता दें कि जो एप्स में प्री-इंस्टॉल्ड होती हैं या रजिस्टर्ड होती हैं उन्हें मूव नहीं किया जा सकता है.

शहाबुद्दीन को तिहाड़, लालू का मुसलिम वोट उजाड़

सिवान के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब कहती हैं कि साल 2005 में जब नीतीश कुमार की 7 दिनों की सरकार बनी थी, तब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राष्ट्रीय जनता दल का साथ दिया था. उसी बात से बौखलाए नीतीश कुमार ने अगली बार सरकार बनते ही शहाबुद्दीन की जमानत रद्द कर दी थी और उन्हें जेल में ठूंस दिया था. लालू प्रसाद यादव ने भी कुछ नहीं कहा. पिछले साल जमानत पर छूटने के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव को अपना नेता बताया था और नीतीश कुमार के बारे में कहा था कि वे हालात की वजह से मुख्यमंत्री बन गए.

अब मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थक नीतीश कुमार के साथसाथ लालू प्रसाद यादव से भी नाराज हैं. उन का आरोप है कि लालू प्रसाद यादव ने उन के नेता का इस्तेमाल कर उसे दरकिनार कर दिया है.मोहम्मद शहाबुद्दीन की बीवी हिना शहाब और उन के समर्थकों को इस बात का भी मलाल है कि साजिश के तहत उन्हें सिवान से भागलपुर जेल और उस के बाद तिहाड़ जेल भेज दिया गया है. उन की ताकत और राजनीति को मटियामेट करने की साजिश रची गई है. हिना शहाब और मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थक इस बात से भी नाराज हैं कि लालू प्रसाद यादव इस मसले पर चुप क्यों हैं? यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि शहाबुद्दीन के कंधे पर बंदूक रख कर ही लालू प्रसाद यादव पिछले 20 सालों से राज्य के मुसलिम वोटरों को साधने में कामयाब होते रहे हैं.

राष्ट्रीय जनता दल के सूत्रों की मानें, तो लालू प्रसाद यादव भाजपा को रोकने के लिए मोहम्मद शहाबुद्दीन का जम कर इस्तेमाल करते रहे हैं. अल्पसंख्यक वोटरों के मन में यह बात गहराई तक बैठ चुकी थी कि शहाबुद्दीन ही भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. सिवान ही नहीं, बल्कि छपरा, गोपालगंज, किशनगंज, कटिहार वगैरह मुसलिम बहुल इलाकों में मोहम्मद शहाबुद्दीन मुसलिम वोटरों को राजद के पक्ष में गोलबंद करते थे. इन जिलों की 38 विधानसभा सीटों पर मुसलिम वोट किसी का भी पलड़ा भारी करने की कूवत रखते हैं. साल 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार की बड़ी वजहों में से एक मोहम्मद शहाबुद्दीन का जेल में बंद रहना भी माना जाता है.

गोपालगंज जिले में मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थकों ने ‘शहाबुद्दीन मुक्ति आंदोलन फ्रंट’ बना लिया है. उन का मानना है कि नीतीश कुमार ने पहले मोहम्मद शहाबुद्दीन को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया और अब लालू प्रसाद यादव ने उन्हें बिहार से बाहर तिहाड़ जेल भेज दिया है. अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को इस का खमियाजा भुगतना पड़ेगा. सिवान की राजद इकाई ने तो अपने पार्टी आलाकमान के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया है.

गौरतलब है कि पिछले 20 सालों से मोहम्मद शहाबुद्दीन ही सिवान के सियासत की धुरी रहे हैं. सिवान की कुल आबादी 27 लाख, 14 हजार, 349 है, जिस में से 4 लाख, 94 हजार, 176 मुसलिम आबादी है. सिवान जिले में 8 विधानसभा सीटें आती हैं और सभी उम्मीदवारों के नाम वही तय करते रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में तो उन्होंने भाजपा के टिकट पर रघुनाथपुर सीट से अपने शूटर मनोज कुमार को मैदान में उतरवा दिया था. सिवान जिले के तहत जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हडि़या, महराजगंज, गोरियाकोठी और सिवान विधानसभा क्षेत्र पड़ते हैं. साल 2004 में मोहम्मद शहाबुद्दीन को जेल में ठूंस दिया गया था, पर जेल से ही वे अपना राजपाट चलाते रहे. साल 2009 में उन्हें चुनाव लड़ने के लिए नाकाबिल ठहरा दिया था. उस के बाद से ही उन के पतन की कहानी शुरू हो गई. उन्होंने अपनी बीवी हिना शहाब को लोकसभा के चुनाव में उतारा, पर उन्हें भी जितवा न सके. एक आम स्टूडैंट से बाहुबली और उस के बाद नेता बनने तक मोहम्मद शहाबुद्दीन की जिंदगी भी काफी उतारचढ़ाव से भरी रही है.

10 मई, 1967 को सिवान जिले के हुसैनगंज ब्लौक के प्रतापपुर गांव में जनमे शहाबुद्दीन ने कालेज में पढ़ाई के दौरान ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था. साल 1986 में हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन पर पहला केस दर्ज हुआ था. सिवान की राजनीति पिछले 25 सालों से उन के ही इर्दगिर्द घूमती रही है. लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, नगरपालिका चुनाव से ले कर पंचायत चुनाव में उन की ही तूती बोलती थी. साल 1990 में सिवान के डीएवी कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन राजनीति में उतरे और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माले) से टक्कर लेते रहे. साल 1990 में जीरादेई विधानसभा सीट से पहली बार निर्दलीय विधायक बनने के बाद वे लालू प्रसाद यादव की पार्टी में शामिल हो गए. साल 1995 में दोबारा जीरादेई सीट से विधानसभा का चुनाव जीता.

साल 1996 में जनता दल की टिकट पर सिवान लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद पहुंच गए. उस के बाद 1998, 1999 और 2004 में भी वे सिवान सीट से सांसद बने. सिवान की विधानसभा सीटों, विधानपरिषद की सीट, नगरपरिषद से ले कर जिला परिषद तक के चुनावों में भी मोहम्मद शहाबुद्दीन का ही दबदबा रहता था. पिछले तकरीबन 20 सालों से वे सिवान में समानांतर सरकार चला रहे थे. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर अकसर यह आरोप लगता रहा है कि वे मोहम्मद शहाबुद्दीन को समर्थन और संरक्षण देते रहे हैं. सिवान में उन की अदालत लगती थी. चाहे जमीन का झगड़ा हो या पारिवारिक मामला, सभी मामलों का निबटारा शहाबुद्दीन की अदालत में ही होता था. इतना ही नहीं, सिवान के डाक्टरों की फीस भी वही तय किया करते थे.

15 मार्च, 2001 में राजद के पूर्व जिला अध्यक्ष मनोज कुमार को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम दूसरे दिन जब दारोगा राय कालेज पहुंची, तो मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पुलिस अफसर संजीव कुमार को थप्पड़ जड़ दिया था और उन के गुरगों ने पुलिस वालों की भी जम कर पिटाई कर डाली थी. उस के बाद शहाबुद्दीन को पकड़ने के लिए जब उस समय सिवान के एसपी रहे बच्चू सिंह मीणा की अगुआई में पुलिस ने उन के प्रतापपुर गांव वाले घर पर छापा मारा, तो पुलिस और शहाबुद्दीन के समर्थकों के बीच तकरीबन 4 घंटे तक गोलीबारी हुई, जिस में 8 बेकुसूर गांव वाले मारे गए और पुलिस को खाली हाथ ही लौटना पड़ा. सियासी हलकों में उस समय यह चर्चा गरम थी कि लालू प्रसाद यादव ने शहाबुद्दीन को औकात बताने के लिए छापा मरवाया. शहाबुद्दीन उस समय तो पुलिस को झांसा दे कर भाग निकले, पर उन्होंने एसपी बच्चू सिंह मीणा को धमकी दी थी कि उन्हें राजस्थान तक खदेड़ के मारेंगे.

सल 2003 में जब डीपी ओझा बिहार के डीजीपी बने, तो उन्होंने मोहम्मद शहाबुद्दीन पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू किया था. उन्होंने शहाबुद्दीन के पुराने मामलों को दोबारा खोल कर उन के खिलाफ सुबूत जुटाए. माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या के मामले में उन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और अदालत में शहाबुद्दीन को आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस से समूचे राज्य में सियासी बवाल मच गया और राजद को अपने मुसलिम वोटों के खिसकने का खतरा महसूस होने लगा.मोहम्मद शहाबुद्दीन की मुसलिम वोटरों पर खासी पकड़ थी. तब की राबड़ी सरकार ने डीजीपी डीपी ओझा को आननफानन हटा दिया, तो गुस्साए ओझा ने वीआरएस ले ली. साल 2005 में राष्ट्रपति शासन के दौरान सिवान के एसपी संजय रत्न ने 24 अप्रैल, 2005 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में छापा मारा और भारी तादाद में हथियार, गोलाबारूद, चोरी की गाडि़यां और विदेशी पैसे बरामद किए. लंबे समय तक फरार रहने के बाद 6 नवंबर, 2005 को पुलिस ने शहाबुद्दीन को दिल्ली में उन के घर पर दबोच लिया. उस के बाद से आज तक वे न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं.

सिवान जिले में ‘साहेब’ के नाम से मशहूर बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन पिछले 13 सालों से जेल में बंद हैं और उन के सिर पर दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज हैं. पटना हाईकोर्ट ने पिछले साल उन्हें 2004 के सिवान तेजाब कांड का मुजरिम करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है. कोर्ट ने माना है कि शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आ कर हत्याकांड की साजिश रची थी. गौरतलब है कि 13 साल पहले सिवान के यादव मार्केट में रहने वाले कारोबारी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के 2 बेटों का अपहरण कर लिया गया था और 2 लाख रुपए की फिरौती की मांग की. फिरौती नहीं देने पर दोनों की तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी. 16 अगस्त, 2004 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर उन के गुरगों ने दोनों भाइयों की हत्या की थी. गिरीश राज उर्फ निक्कू (24 साल) और सतीश राज उर्फ सोनू (18 साल) को अलगअलग जगहों से अगवा कर लिया गया और फिरौती नहीं मिलने पर हुसैनगंज थाने के प्रतापपुर गांव में मोहम्मद शहाबुद्दीन और उन के गुरगे ने तेजाब से नहला कर दोनों भाइयों को मार डाला था.

इस मामले में मृतकों की मां कलावती देवी के बयान पर आईपीसी की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34, के तहत मुफस्सिल थाने में कांड संख्या 131/2004 दर्ज कराया गया था, जिस में राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू मियां उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन को नामजद किया गया था. मामले की जांच के दौरान तब के राजद सांसद रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन  पर हत्या की साजिश रचने का खुलासा हुआ था. इस मुकदमे में स्पैशल कोर्ट ने 4 जून, 2010 को आईपीसी की धारा 120 (बी), 364 (ए) के तहत साजिश रचने और अपहरण का आरोप लगाया. बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर

1 मई, 2014 को आईपीसी की धारा 302, 201, 120 (बी) के तहत आरोप तय किया गया. न्यायिक प्रक्रिया के बीच में ही दोनों मृतकों के भाई और घटना के चश्मदीद गवाह राजीव रोशन की भी 16 जून, 2014 में हत्या हो गई. इस मामले में शहाबुद्दीन और उस के बेटे ओसामा को भी आरोपी बनाया गया है. ओसामा फिलहाल फरार है. इस समूचे मामले की शुरुआत सिवान के गोशाला रोड में चंदा बाबू के मकान के बाहरी हिस्से को ले कर झगड़े से हुई थी. उन की जमीन पर अराजक लोगों की नजरें गड़ी हुई थीं और वे उसे हड़पने की कोशिशों में लगे हुए थे.

16 अगस्त, 2004 की सुबह जमीन को ले कर पंचायत हो रही थी, उसी समय कुछ लोग आ धमके और जमीन पर कब्जा करने लगे. मारपीट की नौबत आ गई. कुछ बदमाशों ने गालीगलौज करते हुए मारपीट शुरू कर दी, तो चंदा बाबू और उन के घर वालों ने घर में रखे तेजाब को बदमाशों पर फेंक कर उन्हें भागने के लिए मजबूर कर दिया. तेजाब से कई लोग जख्मी हो गए थे. इस के कुछ देर बाद ही चंदा बाबू के बड़हडि़या रोड पर बनी दुकान से उन के बड़े बेटे गिरीश राज का अपहरण कर लिया गया. उस के कुछ देर बाद ही चिउड़ा हट्टा बाजार से छोटे बेटे सतीश राज को भी उठा लिया गया. इस घटना के 7 सालों के बाद तेजाब हत्याकांड के चश्मदीद गवाह के रूप में गिरीश और सतीश का बड़ा भाई राजीव रोशन सामने आया. उस ने 6 जून, 2011 को अपना बयान दर्ज कराया. उस ने अपने बयान में कहा कि उस के दोनों भाइयों के साथ उस का भी अपहरण किया गया था.

तीनों भाइयों को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले जाया गया, जहां उस की आंखों के सामने शहाबुद्दीन के कहने पर गिरीश और सतीश को तेजाब से नहला कर मार डाला गया. उसी बीच राजीव वहां से भागने में कामयाब रहा. राजीव की गवाही पर कई सवाल खड़े हुए थे और तब के सिवान कोर्ट के स्पैशल सैशन जज एके पांडे की अदालत ने सुनवाई के दौरान मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ मामला चलाने से इनकार कर दिया था. उस के बाद पटना हाईकोर्ट के आदेश पर शहाबुद्दीन के खिलाफ सुनवाई शुरू हो सकी थी.

राजीव रोशन ने कोर्ट को बताया था कि 2 भाइयों की हत्या के बाद वह जान बचाने के लिए गोरखपुर भाग गया था और वहीं छिप कर रहने लगा था. शहाबुद्दीन के जेल जाने और बिहार में सरकार बदलने के बाद वह वापस लौटा और गवाही देने की हिम्मत जुटाई. पटना हाईकोर्ट ने 1 मई, 2014 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया और 16 जून, 2014 को राजीव की सिवान के डीएवी मोड़ के पास गोली मार कर हत्या कर दी गई. तेजाब कांड के चश्मदीद गवाह को भी रास्ते से हटा दिया गया था. छोटी सी जमीन के टुकड़े के विवाद ने चंदा बाबू के तीनों बेटों की बलि ले ली. चंदा बाबू की बीवी कलावती कहती हैं कि मोहम्मद शहाबुद्दीन को सजा सुनाए जाने के बाद उन के लिए खतरा और ज्यादा बढ़ गया है.

वे रोते हुए कहती हैं कि उन के तीनों बेटों की हत्या कर दी गई है और अब उन की और उन के पति की भी हत्या हो सकती है. चंदा बाबू ने बेटों के हत्यारे को सजा दिलाने की ठानी थी, वह पूरा हुआ है. मोहम्मद शहाबुद्दीन को कई मामलों में सजा सुनाए जाने और 18 फरवरी, 2017 को दिल्ली के तिहाड़ जेल भेजने पर उन की बीवी हिना शहाब बारबार यही रट लगा रही हैं कि उन के शौहर को साजिश के तहत फंसाया गया है. उन के समर्थक अब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को अगले चुनाव में औकात बताने की हुंकार भर रहे हैं.

7 जून का क्रिकेट इतिहास जानते हैं आप!

आज फटाफट क्रिकेट के दौर में 50 ओवर का वनडे मैच उबाऊ लगने लगा है लेकिन एक दौर वो भी था, जब वनडे मैच 60 ओवर का हुआ करता था. क्रिकेट में काफी कुछ बदल चुका है. बल्लेबाजों का अंदाज कुछ इस कदर बदला कि विरोधी गेंदबाजों की आए दिन धुनाई होने लगी है लेकिन एक ऐसा समय भी था जब ऐसा नहीं हुआ करता था.

आज की तारीख ऐसे दो मौकों के लिए याद की जाती है जब भारतीय क्रिकेट का सिर दो बार शर्म से झुक गया था. एक बार टेस्ट में तो दूसरी बार वनडे क्रिकेट में.

7 जून 1952

1952 की ये तारीख आज भी टेस्ट क्रिकेट में सबसे खराब शुरुआत के लिए जाना जाता है. ये वो दिन था जब इंग्लैंड के हेडिंग्ले मैदान पर भारत और इंग्लैंड की टीमें आमने-सामने थीं. इस टेस्ट में भारतीय टीम ने पहली पारी में 293 रन बनाए थे. जवाब में इंग्लैंड ने अपनी पहली पारी में 334 रन बनाए लेकिन दूसरी पारी में जो हुआ वो शर्मनाक था.

7 जून को दूसरी पारी में भारतीय टीम ने 0 के स्कोर पर अपने 4 विकेट गंवा दिए. इसका श्रेय गया इंग्लैंड के धुरंधर गेंदबाज फ्रेड ट्रूमन को जिन्होंने इन चार में से तीन विकेट अपने नाम किए. भारतीय टीम के दोनों ओपनर (पंकज रॉय और दत्ता गायकवाड़) शून्य पर आउट हुए, उसके बाद एमके मंत्री और विजय मांजरेकर भी शून्य पर पवेलियन लौट गए.

भारतीय टीम इस पारी में 165 रन पर ऑलआउट हो गई और इंग्लैंड को कुल 125 रन का लक्ष्य मिला जो उन्होंने आसानी से 3 विकेट के नुकसान पर हासिल कर लिया.

7 जून 1975, (पहला क्रिकेट वर्ल्ड कप, पहला मैच) भारत बनाम इंग्लैंड

एक बार फिर वही तारीख आई. फर्क इतना तय था कि इस बार टेस्ट क्रिकेट नहीं बल्कि वनडे क्रिकेट की बारी थी. ये मौका था पहले विश्व कप का. टूर्नामेंट के पहले ही मैच में लॉर्ड्स के प्रतिष्ठित मैदान पर भारत और मेजबान इंग्लैंड आमने-सामने थे.

इंग्लैंड ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी करते हुए 4 विकेट के नुकसान पर 334 रन बना डाले. उनकी तरफ से ओपनर डेनिस अमिस ने 137 रनों की लाजवाब पारी खेली लेकिन हैरानी तब हुई जब भारत की पूरी टीम मिलकर भी 60 ओवर में इतने रन नहीं बना सकी जितने अकेले डेनिस ने बनाए थे.

भारतीय टीम 60 ओवर में 3 विकेट के नुकसान पर 132 रन ही बना पाई. अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतने विकेट बाकी रहने और पूरे ओवर के खेलने के बावजूद इतने कम रन क्यों बने, तो इसका जवाब ये है कि टीम के धुरंधर ओपनर सुनील गावस्कर से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा ली गई थीं.

गावस्कर ने इस वनडे मुकाबले में 174 गेंदों पर नाबाद 36 रन बनाए और पूरे ओवर खेलकर बिना आउट हुए पवेलियन लौट आए. उन्होंने अपनी उस पारी में कुल 1 चौका जड़ा था.

दर्शक ने मैदान पर गिरा दिया था अपना खाना

गावस्कर की उस पारी से एक फैन से न सिर्फ टीम के कप्तान वेंकटराघवन बेहद नाराज हो गए थे बल्कि दर्शकों का गुस्सा तो सातवें आसमान पर जा पहुंचा था. एक दर्शक इतना ज्यादा नाराज हो गया कि वो मैदान पर दौड़ा चला आया और अपने लंच को मैदान पर बिखेर दिया. 

धर्म की आड़ में पशुओं पर कहर

हमारे देश के लोग आज भी पंडेपुजारियों के जाल में ऐसे फंसे हैं कि वे चाह कर भी उस से निकल नहीं पाते हैं. धर्म के नाम पर यहां बड़ी आसानी से लोगों को लूटा जाता है. पंडेपुजारी मंदिरों में श्रद्धालुओं की जेब हलकी करवाना अपना जन्मजात हक समझते हैं, जबकि भारत में 30 फीसदी ऐसे लोग हैं, जो जानवरों को कैद कर के उन को नचा कर या दिखा कर अपनी ऐश की जिंदगी बसर कर रहे हैं.

3 साल पहले हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में बसस्टैंड के नजदीक बहुत ज्यादा भीड़ लगी हुई थी. वहां एक हट्टाकट्टा मर्द व एक औरत ट्रैक्टरनुमा गाड़ी के दाएंबाएं बैठे हुए थे, जबकि बीच में एक गाय खड़ी थी. गाय के गले में फूलमालाओं व उस के मुंह पर चंदन वगैरह का लेप उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे. गेरुआ कपड़े पहने वह औरत व मर्द इस बात को प्रचारित कर रहे थे कि 5 पैरों वाली यह गाय लक्ष्मी देवी का अवतार है. अंधभक्तों की भीड़ उस गाय के पैर छूने व पुण्य लाभ कमाने की गरज से खूब रुपए चढ़ा रही थी. लोग वहां से ऐसे खुश हो कर लौट रहे थे, मानो उन्होंने स्वर्ग के लिए अपनी सीट एडवांस में बुक करा दी.

5 पैरों वाली उस गाय ने उस निकम्मे जोड़े को मालामाल कर दिया था. पर सारा दिन उसे खड़ा रहने की सजा भुगतनी पड़ रही थी. शहर की ही कुछ निठल्ली अंधभक्त औरतें उस जोड़े को सुबह के नाश्ते से ले कर रात का भोजन कराती थीं. उन औरतों को यह भरम था कि ‘गऊ मैया’ के ये संरक्षक उन की जीवन नैया पार लगा देंगे. धर्मभीरु लोगों को कौन समझाए कि 5 पैरों वाली गाय पैदा हो सकती है, पर कोई अवतार नहीं है. यह तो महज धर्म के नाम पर लोगों को छलने के लिए, उस गाय को उस पाखंडी जोड़े ने अपना हथियार बना कर लोगों की भावनाओं को भुनाने का अच्छा तरीका अपनाया है.

इसी शहर में हर साल गरमियों में 10-12 लोग गेरुए कपड़े पहन कर, माथे पर बड़ा सा तिलक लगा कर और कानों में बड़ेबड़े कुंडल डाल कर एक हथिनी को ले कर आते हैं और पूरे शहर का चक्कर लगा कर उस बूढ़ी, लाचार जख्मी हथिनी के नाम पर लोगों से खूब पैसे बटोरते हैं. उस हथिनी के जरीए शाही भोजन का जुगाड़ करने वाले ये लोग सालों पहले किसी जंगल से हथिनी के बच्चे को खरीद कर या पकड़ कर ले आए होंगे और फिर उसे पालपोस कर अपनी आमदनी का जरीया बना लिया.

वे लोग हथिनी को ले कर गांवकबों से ले कर शहरशहर में घूमते हैं और लोगों से कहते हैं कि उस हथिनी के नीचे से गुजर कर या लेट कर जो भी निकल जाता है, उस के सारे पाप मिट जाते हैं. इस बात को सच मान कर लोग खुले दिल से नोटों की बौछार करने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. कोई इन ठगों से पूछे कि किसी हथिनी के नीचे से गुजर जाने से अगर सारे पाप मिट जाते होते, तो वे खुद पाप मुक्त क्यों नहीं हुए, जिन्होंने किसी बेजबान जानवर की आजादी छीन कर उस के परिवार से उसे अलग कर सब से बड़ा पाप किया है?

मुंह में पान का बीड़ा डाले हुए ये सभी लोग अपनेआप तो ‘ऐश’ करते हैं, पर उस बूढ़ी हथिनी को ले कर उन में तनिक भी चिंता नहीं है, जिस के शरीर में जगहजगह जख्म हो गए हैं. धर्म के कुछ ठेकेदार अच्छी नस्ल के बैलों को सजा कर के गांवों में जा कर लोगों को धर्म का पाठ पढ़ा कर उन से न केवल अनाज व कपड़ेलत्ते लेते हैं, बल्कि देशी घी, लस्सी के साथ छक कर मुफ्त का माल डकारते हैं. बेचारे उन भोलेभाले गांव वालों को कौन समझाए कि उन बैलों को छूने से या उन की पूंछ पकड़ कर वे अपनेआप को छलावा दे रहे हैं कि उन की जीवनरूपी नैया भवसागर के पार लग जाएगी. समाजसेवी हुसैन अली का कहना है, ‘‘धर्म की आड़ में पशुओं पर कहर ढाने पर तभी लगाम लगाई जा सकती है, जब सभी लोग जागरूक हों और इस तथाकथित पाखंड के विरोध में एकजुट हो कर काम करें.’’ कारोबारी संदीप नड्डा का इस बारे में कहना है, ‘‘लोग किसी की बातों में न आ कर अपनी ऊर्जा व पैसे को बरबाद न करें. मेहनत से पैसे कमाना ही सब से बड़ा कर्म है.’’

डियारा सैक्टर में रहने वाले सतीश गुप्ता का कहना है, ‘‘भले ही ‘पेटा’ कानून लागू है, पर हमें मूक प्राणियों के प्रति हमदर्दी रखनी चाहिए, क्योंकि इन बेबस, बेसहारा पशुओं को भी हमारी मदद व प्यार की जरूरत होती है.’’

कश्मीर के बहाने

जम्मूकश्मीर में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. 5 लाख से ज्यादा की फौज भी वहां के बाशिंदों को पूरी तरह कंट्रोल में नहीं कर पा रही और अलगाववादी खुलेआम सेना और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी कर रहे हैं. 60 सालों में दुनिया का स्वर्ग कहलाया जाने वाला कश्मीर अब एक नरक सा बन गया है, जहां न बाहरी जना सेफ है, न कश्मीरी.

उम्मीद थी कि भारतीय जनता पार्टी और महबूबा मुफ्ती की सरकार मिल कर, कंधे से कंधा मिला कर चल कर कश्मीरियों को एक नया रास्ता दिखाएगी. कश्मीरी जवान भी और जगहों की तरह अच्छी नौकरियों, अपने मकान, खुशियों भरे माहौल के लिए तड़प रहा है, पर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों के बीच बुरी तरह पिस रहा है. श्रीनगर में आजादी के नारे चाहे दीवारों पर लगे फीके पड़ते दिख जाएं, पर कोचिंग क्लासों के बोर्ड जगमग कर रहे हैं. कश्मीरी समझ तो गए हैं कि अगर खुशहाली लानी है तो पढ़ना होगा, अपने पैरों पर खड़ा होना होगा, क्योंकि अगर भारत या पाकिस्तान ने कुछ दिया भी तो वह ऊपर के अफसर व नेता हड़प जाएंगे. अपना कल सुधारना है तो मेहनत करनी होगी. कश्मीरी मेहनती हैं, पर धर्म के मामले में कमजोर भी. उन के दिमाग में कीड़ा घुसा है कि शायद भारत से अलग वे ज्यादा अच्छे रहेंगे.

असलियत यह है कि दोनों देशों की सरकारों के लिए कश्मीर तो बहाना है बाकी जनता को फुसलाने और बहलाने के लिए. कश्मीर के नाम पर भारत में इलैक्शन जीते जाते हैं, तो पाकिस्तान में सेना को मनमानी करने का हक मिल जाता है. अगर कश्मीर का मुद्दा न हो तो पाकिस्तान शायद 2-3 मुल्कों में बंट तक जाए.

अफसोस यह है कि जैसे जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में सही फैसले न ले कर कश्मीर को आफत की पुडि़या बना दिया था, वैसे ही आज इस की हर रोज नई पुडि़या बनाई जा रही है. सेना के एक ज्यादा दबंग अफसर ने एक जीप पर एक कश्मीरी आदमी को बांध कर पत्थर फेंकने वालों से बचाव का नायाब तरीका तो ढूंढ़ा, पर इस की बड़ी कीमत भारत को दुनियाभर की मेजों पर देनी होगी, जब दूसरे देश इस अत्याचार की सफाई मांगेंगे. समझदार, ईमानदार सरकार से उम्मीद थी कि वह ऐसा हल निकालेगी कि कश्मीर की जनता को लगेगा कि भारत के साथ उस को लाभ ही लाभ है, पर लगता है कि चुने जाने से पहले के वादों और हकीकत में बहुत फर्क होता है. भाजपा सरकार कश्मीर की हिंसा के सामने कांग्रेस सरकारों की तरह बेबस नजर आ रही है.

सरकार की यह कमजोरी देश के लिए गलत संदेश दे रही है. लोगों को जिस प्रैक्टिकल सरकार की उम्मीद थी, वह कश्मीर में तो दिख नहीं रही.

आदमी का कुत्तापन

जब से पता चला है कि प्रदेश में कुत्तों की बढ़ती तादाद से परेशान हो कर नगरपालिका और नगरनिगमों द्वारा आवारा कुत्तों की नसबंदी कर दी जाएगी, तब से शहर में 4 टांग वाले कुत्तों के साथसाथ 2 टांग वाले आवारा कुत्ते भी गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए हैं. पिछली बार जब मैं शहर गया था, तो एक पान की दुकान पर मेरा ध्यान गया. उस दुकान में पिछली बार की तुलना में बहुत कम लोग पान खाने आ रहे थे.

मैं ने पान वाले से उत्सुकतावश पूछा, ‘‘क्यों भाई, आजकल तुम्हारी दुकान पर भीड़भाड़ कम क्यों हो गई है? आखिर चक्कर क्या है?’’

पान वाला बोला, ‘‘भाई साहब, जब से शहर में कुत्तों की नसबंदी की बात सुनी है, तब से मेरी दुकान कम चलने लगी है. लोग अब यहां आने से डरने लगे हैं. उन्हें शायद यह लगता है कि कहीं उन्हें भी पकड़ कर उन की नसबंदी न कर दी जाए.’’

हम ने भी सोचा कि हम भी जल्दी ही यहां से खिसक लें. क्या पता, हम भी गेहूं के घुन की तरह पिस जाएं यानी लपेटे में आ जाएं. टांग और पूंछ के लिहाज से कुत्तों की भी कई किस्में होती हैं, जैसे 4 टांग वाले पूरी पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ कटे कुत्ते और सब से खतरनाक बिना पूंछ के 2 टांग वाले कुत्ते. कुत्तों को भारतीय सभ्यता में एक खास जगह दी गई है. कुछ इनसानों ने कुत्तों के साथ रहतेरहते उन के एक गुण को छोड़ कर बाकी बहुत सी आदतें सीख ली हैं.

पूंछ वाले कुत्तों से बिना पूंछ वाले कुत्तों ने केवल एक ही गुण नहीं सीखा है, वह गुण है वफादारी का. बाकी सभी गुण तो उन में पूरी तरह से आ गए हैं, इसलिए आम घरों में या पड़ोसियों से होने वाली लड़ाइयों में सब से पहले कुत्ते की ही जम कर गाली दी जाती है.

इस में कोई शक नहीं है कि कुत्ते की यह गाली भारत में गाली नं. 1 पर है. हो सकता है कि ‘आंटी नं. 1’, ‘बीवी नं. 1’, ‘हीरो नं. 1’ की तर्ज पर ‘गाली नं. 1’ फिल्म भी बन जाए, जिस में 4 टांग वाले पूंछदार कुत्ते को हीरो और 2 टांग वाले बिना पूंछ के कुत्ते को विलेन के रूप में दिखाया जाए.

वैसे, कुत्ते अगर आपस में गाली देते होंगे, तो उन की गाली नं. 1 आदमी को ले कर ही होती होगी. वैसे, कुत्ता ही एकलौता ऐसा जानवर है, जिसे गाली और तारीफ दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इस बात पर पूंछ वाले कुत्ते अपनेआप पर बेहद फख्र महसूस करते हैं. वे सोचते हैं कि जिस तरह पुराने जमाने में लोग खुद की तुलना किसी महापुरुष से करते थे, उसी तरह आज के दौर में उन से करते हैं.

लेकिन आजकल बिना पूंछ वाले कुत्तों की भी बहुत पूछ है. वैसे पूंछ के न होने से उन्हें अपनी वफादारी दिखाने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं.

बहुत पहले इनसान की भी पूंछ हुआ करती थी, लेकिन इनसानों द्वारा उस का गलत इस्तेमाल करने पर कुदरत ने उसे छीन लिया.

अब जब भी ये बिना पूंछ वाले कुत्ते अपनी उस गुम दुम को किसी खास आदमी के सामने हिलाते हैं, तो उन की हरकतों से पता चल जाता है कि वे अपनी वफादारी दिखा रहे हैं.

देखने वाले भी यही कहते हैं कि यह फलां का कुत्ता है, इस से बच कर रहना. बहुत तेज है, इस का काटा तो इंजैक्शन भी नहीं मांगता.

पूंछ वाले कुत्तों के काटने की तरह बिना पूंछ वाले कुत्ते के काटने पर रेबीज नहीं होता, बल्कि ‘फटीज’ नामक खतरनाक रोग होता है यानी इन के काटे से लोग फटीचर हो जाते हैं. ये लोग अपने मालिक के इशारे पर जिस को भी काटते हैं, वह फटीचर बन जाता है.

कुछ लोग दोनों तरह के कुत्ते पालते हैं. ये कुत्ते उन की बीवियों के काम के होते हैं, जिस से इन कुत्तों की भी चांदी रहती है.

जहां एक तरफ पूंछ वाले कुत्ते उन की बीवियों के साथ गाडि़यों में सैर करते हैं, अच्छा खाना खाते हैं और उन के साथ सोते तक हैं, वहीं दूसरी तरफ बिना पूंछ वाले कुत्ते उन का घरेलू काम काफी  अच्छी तरह से करते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों पर तो कुछ खर्च भी होता है, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मुफ्त में अपनी सेवाएं देते हैं. दरअसल, अपने मालिक की आड़ में वे भी अच्छा शिकार कर लेते हैं.

ऐसे कुत्ते मालिक पर भार नहीं होते, इसलिए इन्हें कोई रोक भी नहीं पाता, खुद अफसर भी नहीं. समय आने पर ये अपनी औकात भी दिखा देते हैं. ये जितने ज्यादा हों, उतना ही अच्छा.

आजकल लोगों के स्टेटस की पहचान इसी से होती है कि उस के पास कितने पूंछ वाले और कितने बिना पूंछ वाले कुत्ते हैं.

पुराने जमाने में लोग अपनी जान और माल की हिफाजत के लिए पूंछ वाले कुत्ते ही रखा करते थे, लेकिन अब जमाना तेजी से बदल रहा है. इन कुत्तों के साथसाथ बिना पूंछ वाले कुत्ते भी रखे जाने लगे हैं. जिन के पास ऐसे कुत्ते बड़ी तादाद में होते हैं, उन की उतनी ही ज्यादा वैल्यू होती है.

भले ही बिना पूंछ वाले कुत्ते 3-4 साल तक पड़ेपड़े मुफ्त में ही रोटी तोड़ते रहें, लेकिन चुनाव आने पर अपना वजूद जरूर साबित कर देते हैं और भूंकभूंक कर अपने मालिक के पक्ष में माहौल बनाने में जुट जाते हैं.

पूंछ वाले कुत्तों की वफादारी खरीदी नहीं जा सकती, पर बिना पूंछ वाले कुत्ते मौका मिलने पर खुद को बेच देते हैं. मालिक बदलते उन्हें जरा भी देर नहीं लगती. कई बार तो वे खाते किसी और का हैं और निभाते दूसरे का हैं. ऐसों से हमें सावधान रहने की जरूरत है.

जैसे पूंछ वाले कुत्तों की तादाद बढ़ाने के लिए खास मौसम होता है, ठीक उसी तरह बिना पूंछ वाले कुत्तों का भी अपना खास मौसम ‘चुनाव’ होता है. इस में वे बड़ी लगन और मेहनत से अपनी तादाद को बढ़ाते हैं.

शायद इसी बढ़ती हुई तादाद को देख कर शहरों में कुत्तों की नसबंदी करने का प्रोग्राम बनाया जा रहा है खासतौर पर हमारे प्रदेश की राजधानी में.

दूसरे शहरों के मुकाबले पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों की तादाद ज्यादा होना लाजिम है. बिना पूंछ वाले कुछ कुत्ते तो राजधानी के परमानैंट बाशिंदे बन जाते हैं और बाकी आतेजाते रहते हैं.

पूंछ वाले और बिना पूंछ वाले कुत्तों में हमेशा कड़ा मुकाबला रहता है. कई बार तो यह फैसला करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है कि कौन कितनी तेजी से पूंछ हिला रहा है. दोनों ही अपनीअपनी वैल्यू साबित करने में लगे रहते हैं. वे अपने मालिक को हमेशा खुश करना चाहते हैं.

मालिक जितना खुश होगा, कुत्तापन उतना ही कामयाब माना जाएगा. इन दोनों में फर्क सिर्फ गले में पड़े पट्टे के दिखाई देने और न दिखाई देने का है. पूंछ वाले कुत्ते के गले में पट्टा दिखता है, जबकि बिना पूंछ वाले कुत्ते का पट्टा नजर नहीं आता.

बिना पूंछ वाले कुत्ते तो अपने मालिक के पूंछ वाले कुत्ते के सामने भी अपनी नजर न आने वाली पूंछ हिलाने से नहीं चूकते. कई बार तो ऐसा लगता है कि ये बिना पूंछ वाले कुत्ते, पूंछ वाले कुत्तों के भी कुत्ते हैं.

खैर, कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं, चाहे वे पूंछ वाले हों या बिना पूंछ वाले. हमें इन से बच कर रहना चाहिए, क्योंकि काटना इन की फितरत है. एक के काटने पर कीमती इंजैक्शन लगवाने पड़ते हैं और जिंदगी की कोई गारंटी नहीं होती, जबकि दूसरे के काटने पर कैरियर तबाह हो सकता है, जमाजमाया धंधा चौपट हो सकता है.

मैं नहीं चाहता कि महंगाई के इस दौर में इन कुत्तों के द्वारा काटा जाऊं, इसलिए मैं इन्हें दूर से ही देख कर सलाम कर लेता हूं. आप को भी नेक सलाह दे रहा हूं कि आप भी इन बिना पूंछ वाले कुत्तों से दूर ही रहें, इसी में आप की भलाई है.                 

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भरोसा जीतने में असफल योगी आदित्यनाथ

प्रदेश की जनता का ही नहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी नौकरशाही और मंत्रिमंडल का भी भरोसा जीतने में सफल नहीं हो पा रहे है. यही वजह है कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद जिस तरह से हालात बदलने चाहिये थे वह नहीं हो पा रहा है.

ऐसे में योगी आदित्यनाथ मीडिया के ऐसे समूह के बीच भी फंस गये है जो समाजवादी पार्टी की सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चमक दमक दिखा रही थी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों पर भरोसा नहीं कर पा रहे है. मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल सहयोगियों के बीच तालमेल का पूरा अभाव दिखता है. केवल मंत्रिमंडल ही नहीं नौकरशाही भी समझ नहीं पा रही कि वह किस तरह से काम करे.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी संभालने के बाद बहुत हद तक सरकारी व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिये तबादले कर दिये हैं. इसके बाद भी शासनतंत्र पर उनकी पकड़ मजबूती से नहीं दिख रही है. अपराध के हालात खराब हुये तो मुख्यमंत्री के सलाहकारों को लगा कि मीडिया मैनेज कर के नाकारात्मक प्रभाव को रोका जा सकता है. यही काम कभी अखिलेश यादव ने किया था.

सहारनपुर की घटना का प्रभाव पूरे प्रदेश में है. जातीय संतुलन में सरकार ही नहीं भाजपा भी फेल हो गई है. जानकार कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ को जिस तरह से भाजपा के कार्यकर्ताओं का समर्थन मिलना चाहिये वह नहीं मिला.

योगी आदित्यनाथ भले ही जाति से खुद को दूर रखते हों पर उनके खिलाफ काम करने वाले लोगों ने उनको जातियता फैलाने का आरोप लगाकर प्रचारित कर दिया. इसके साथ ही साथ यह बात भी फैलाई गई कि योगी आदित्यनाथ की हिन्दु युवा वाहिनी प्रदेश में लोकल स्तर पर समान्तर सरकार चला रही है. इस तरह के प्रचार का प्रभाव योगी की छवि को धूमिल कर रहा है. जिसकी वजह से सरकार सही तरह से अपना काम नहीं कर पा रही है. जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री के साथ 2 उप मुख्यमंत्री बनाने से तकनीकि रूप से परेशानियां सामने आ रही है.

जनता के हित के तमाम फैसले इस वजह से ही अमली जामा नहीं पहन पा रहे हैं. प्रदेश सरकार खनन नीति बनाने में सफल नहीं हो रही. जिससे लोगों को घर बनाने के लिये मौरंग नहीं मिल रही. मौरंग का भाव आसमान में पहुंच गया है. कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री सरकारी अमले से अधिक अपने नेटवर्क पर भरोसा करते हैं जिसके कारण सरकारी अमला पूरी तरह से सक्रिय हो कर काम नहीं कर रहा है.

जिस बदलाव के लिये प्रदेश की जनता ने भाजपा को वोट दिया था वह धराशाही होता दिख रहा है. गाय को लेकर जो सरकार ने माहौल तैयार किया है उससे सड़कों से लेकर गांवों तक गाय और गौ वंश का प्रकोप बढ गया है.

सरकार के नियम कानून बनने से प्रदेश में इंसपेक्टर राज की वापसी हो गई है. किसान ही नहीं कारोबारी भी बहुत परेशान हैं. पेट्रोल पंप पर छापे डालने से लेकर तमाम ऐसे आरोप है जिससे लोग परेशान हैं.

आरोप यह है कि भाजपा अब प्रदेश में इंसपेक्टर राज को बढावा दे रही है. प्रदेश सरकार इंसपेक्टर राज को बढावा देकर प्रदेश कर जनता का भला नहीं कर पा रही है. ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि प्रभावित हो रही है वह भरोसा जीतने में असफल हो रहे हैं.

किशोरों की नवचेतना की हत्या

जहां चीन 50 देशों को मिला कर एशिया, अफ्रीका और यूरोप को वन बैल्ट वन रोड को बनवा कर जोड़ने की मेहनती व कठिन डगर पर चल रहा है वहीं भारत को अपने पौराणिक काल को पुनर्जीवित करने की लगी हुई है. चीन सिल्क रोड को नया रूप दे रहा है, हम नई तकनीक का इस्तेमाल यज्ञों, हवनों, स्नानों, कुंभों, पूजाओं, मंदिरों में कर रहे हैं. आज का किशोर जब बड़ा होगा तो अगर चीन का हुआ तो बीजिंग से लंदन तक बाइक पर जा सकेगा, भारत का हुआ तो पाकिस्तान व बंगलादेश में भी घुसेगा तो उस पर देशद्रोही का ठप्पा लग जाएगा.

हमारे देश में स्कूली किताबों में पुरातन का गुणगान करने के लिए कड़ी मेहनत की जा रही है. चीन में पहाड़ों, नदियों, रेगिस्तानों को पार करने में पैसा और शक्ति लग रही है. हम अपने किशोरों को धर्म भक्त बना रहे हैं ताकि वे मोबाइलों व कंप्यूटरों की पूजा करें. चीन में वे नए रास्तों को खोज रहे हैं.

किशोरों के दिमाग के साथ खेलने के लिए देश में बहुत से संस्थान उग आए हैं जिन की नशीली दवाएं महान संस्कृति, संस्कारों का गुणगान करना सिखा रही हैं. विकास के नाम पर जो कल का महान भारत हम बनाने चले थे वह तो लगता है पिछले कल का है, जो हमारे लिए आदर्श है. हमारे नेताओं का चोला बदल गया है, सोच बदल गई है.

आज के किशोर के पास बहुत कम समय है कि वह बिगड़ती हालत को सुधार सके. किशोर के पास 5-7 साल होते हैं जब उस में समझ तो होती है पर जिम्मेदारियां नहीं होतीं और अगर इन दिनों उसे पुरातन की दवा दे दी गई तो वह नवीनता को सदासदा के लिए भूल जाएगा. उसे फलनेफूलने और प्रयोग करने की जो छूट चाहिए वह हमारा तंत्र बंद कर रहा है. हम भारत को महान बनाने में लगे हैं, हमारे जैसा चीन एशिया और यूरोप को मिला कर विशाल बाजार बनाने में लगा है. जो काम हमारी सरकार कर रही है वह किशोरों को भक्ति की गुलामी करने को मजबूर कर देगी.

किशोरों को आगे बढ़ने के सपने देखने की आदत होनी चाहिए. वे आसमान को पार करें, जंगलों को लांघें, समुद्रों के उस पार जाएं. उन्हें असंभव को संभव करने का पाठ पढ़ाया जाए. उन को प्रयोग करने की छूट हो. वे कानूनों व रिवाजों में न उलझें. कुछ नया करें, नया सोचें. उन के लिए विश्व बिना बंधनों, बिना सीमाओं का हो.

यह अक्खड़पन से नहीं संभव है. हम ही सही हैं और हम हमेशा सही रहे हैं, यह गलतफहमी न रहे. अगर देश वयस्कों को नया सोचने की इजाजत न दे तो कम से कम कोई नुकसान न करने लायक किशोरों को तो छोड़ दे. यहां तो चीन को देखते हुए भी हम पुरातन की ओर भाग रहे हैं, यह किशोरों की नवचेतना की हत्या है.

छुट्टियां : मस्ती नहीं निखार का समय

गरमी की छुट्टियों को अकसर किशोर घूमनेफिरने या फिर घर में ही टीवी देख कर, मोबाइल, इंटरनैट पर गेम खेल कर या सोने और खेलने में बिताते हैं जबकि छुट्टियां मौजमस्ती का नहीं बल्कि खुद में निखार लाने का समय है अत: छुट्टियों का लुत्फ उठाएं, मौजमस्ती करें, लेकिन अपने संपूर्ण निखार को नजरअंदाज न करें वरना छुट्टियां बीतने पर पछतावा महसूस होगा.

पर्सनैलिटी निखारें :  छुट्टियों में किशोर अपनी पर्सनैलिटी निखार सकते हैं. किसी से हुई पहली मुलाकात आप के व्यक्तित्व को दर्शाती है. अत: छुट्टियों में कोशिश कर पर्सनैलिटी निखारें. नैगेटिव थिंकिंग छोड़ें पौजिटिव थिंकिंग रखें. अपने बात करने के तरीके, पहनने व खानेपीने की आदत में सुधार लाएं. इस से आप की पर्सनैलिटी में निखार आएगा. अगर खुद इन बातों पर अमल न कर सकें तो घर के आसपास पर्सनैलिटी डैवलपमैंट की क्लासेज भी जौइन कर सकते हैं.

हौबी निखारें :  छुट्टियों के दौरान न तो पढ़ाई का बोझ होता है और न मम्मीपापा रोकटोक करते हैं. अत: इस समय आप अपनी हौबी को निखारें. अगर आप को पेंटिंग का शौक है तो पेंटिंग बनाएं. म्यूजिक का शौक है तो म्यूजिक सीखें, बागबानी, कुकिंग, स्विमिंग, क्राफ्ट, डैकोरेशन आदि के शौक पूरे करने के लिए छुट्टियों का समय बहुत अनुकूल और कारगर है.

अंगरेजी सुधारें :  हिंदी माध्यम के छात्रों के साथ अकसर अंगरेजी की समस्या आती है, क्योंकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा, इंटरव्यू, जौब में अंगरेजी का ज्ञान एक अनिवार्य आवश्यकता है. अत: हिंदी माध्यम के छात्र फ्लुएंट अंगरेजी न बोल पाने के कारण पिछड़ जाते हैं, अत: छुट्टियों का समय आप अपनी अंगरेजी सुधारने में लगा सकते हैं. रोज अंगरेजी अखबार पढ़ें. अपने दोस्तों, मातापिता व भाईबहन से अंगरेजी में बात करने की कोशिश करें. इस से आप को अंगरेजी बोलने में परेशानी नहीं होगी व आप अपनी कमी सुधार सकेंगे. जो शब्द समझ न आएं या जिन का मतलब मालूम न हो उन्हें शब्दकोश में देखें. इस प्रकार छुट्टियों का सदुपयोग भी होगा और आप की अंगरेजी में सुधार भी. चाहें तो इंगलिश लर्निंग की क्लासेज जौइन कर सकते हैं.

कमजोर विषय को आसान बनाएं : कभीकभी कुछ किशोर यह कहते पाए जाते हैं कि मेरा फलां विषय कमजोरहै या मेरे पल्ले ही नहीं पड़ता. मैथ्स से तो मुझे डर लगता है. तो ऐसे किशोरों के लिए छुट्टियों का समय पूर्णतया अनुकूल है. वे चाहें तो पढ़ाई, होमवर्क करने के साथसाथ कमजोर विषय पर ध्यान दे सकते हैं. जिस विषय में आप को जो समझ नहीं आता दोस्तों से पूछें, टीचर्स से पूछें, किसी होशियार छात्र के घर जा कर उस से समझें. नोट्स बनाएं. बारबार पढ़ने, समझने से आप को वह विषय भी आसान लगने लगेगा और छुट्टियों के बाद उस विषय की बाजी क्लास में आप केहाथ लगेगी.

सेहत निखारें : पढ़ाई के बोझ तले दबे किशोर कैरियर, पढ़ाई, किताबों के अलावा कुछ सोच ही नहीं पाते. अच्छे अंक लाने का दबाव उन्हें तनाव में ला देता है, जिस का उन की सेहत पर बुरा असर पड़ता है. छुट्टियां मस्ती के साथसाथ सेहत बनाने का भी अच्छा समय है. छुट्टियों में खानपान अच्छा खाएं, व्यायाम करें, चाहें तो जिम जौइन कर लें.

दिनचर्या सुधारें : अकसर किशोरों की पढ़ाई स्कूल के टाइम घर आने, पढ़ने, खेलने के समय में अनियमितता पाई जाती है. स्कूल के समय की बात अलग है, अब आप खाली हैं अत: छुट्टियों में टाइमटेबल बनाएं जो सारे दिन के कामों के साथसाथ आप को मस्ती का समय भी दे. सुबह उठने की आदत डालें. सैर, जौगिंग करने जाएं, आ कर नहाने धोने के बाद पढ़ाई के घंटे, मस्ती, टीवी देखने का समय आदि टाइमटेबल में लिखें व उसी के अनुरूप दिनचर्या ढालें.

घर के कामों में भागीदार बनें : अभी तक तो आप स्कूल जा रहे थे इसलिए मम्मी उठ कर नाश्ता देतीं और आप खाते फिर स्कूल जाते और घर वापस आने के बाद खापी कर पसर जाते थे, लेकिन अब इस रूटीन को बदलें. मम्मी के साथ घर के कामों में हाथ बंटाएं. मशीन में कपड़े धुलवाएं, मां झाड़ूपोंछा करें तो आप फर्नीचर की डस्टिंग कर दें. इसी तरह पापा के औफिस जाने पर उन के बैंक के काम निबटाना, पौस्टऔफिस के काम या फिर रद्दी बेचने, घर में लगे पौधों की देखरेख जैसे काम, बिजली के काम, घर के खराब उपकरण ठीक कराने की जिम्मेदारी भी निभा सकते हैं.

कुकिंग सीखें : खाना बनाना सिर्फ लड़कियों को ही नहीं लड़कों को भी आना चाहिए. छुट्टियों की मस्ती केसाथसाथ आप किचन में मां की सहायता कर सकते हैं. यही नहीं अपनी पसंद के व्यंजन नैट पर देख कर मां की सहायता से बना भी सकते हैं.

पार्टटाइम जौब करें : अगर आप छुट्टियों का पूरा मजा लेना चाहते हैं तो मस्ती के साथसाथ पार्टटाइम जौब भी कर सकते हैं. इस से न केवल घर की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी बल्कि आप को अनुभव भी हासिल होगा साथ ही आप आत्मनिर्भर भीबनेंगे. इस प्रकार किशोर घर में सिर्फ मौजमस्ती कर छुट्टियां बिताने के बजाय अपने निखार में इस समय को लगाएं तो न केवल छुट्टियों का सदुपयोग होगा बल्कि किशोर एक उत्कृष्ट जीवन की नींव रख पाएंगे. छुट्टियों के बाद आप के हाथ में हुनर, कौंफिडैंस, आत्मनिर्भरता व अनुभव भी होगा और आप जीवन में आगे बढ़ने की रहा प्रशस्त कर पाएंगे. तो हो जाएं तैयार, मस्ती संग निखार हेतु.

अब बढ़ेगी प्रियंका व दीपिका के बीच तकरार

हौलीवुड में मात खाने के बाद अब प्रियंका चोपड़ा पुनः बौलीवुड में अपने करियर को संवारने पर ध्यान देना चाहती हैं. इसी के चलते प्रियंका चोपड़ा ने एक रणनीति के तेहत काम करना शुरू किया है और उन्होंने पहला प्रहार दीपिका पादुकोण पर ही किया है, जिन्होंने दो दिन पहले ही दावा किया था कि उनकी हौलीवुड फिल्म ने प्रियंका की फिल्म से बेहतर काम कर साबित कर दिया कि है दीपिका ही स्वीकार्य अंतरराष्ट्रीय कलाकार हैं.

अब सूत्रों के अनुसार प्रियंका चोपड़ा ने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ से दीपिका पादुकोण का पत्ता साफ करा दिया है. सूत्रों के अनुसार अमृता प्रीतम व साहिर लुधियानवी की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ में संजय लीला भंसाली ने इरफान खान के साथ दीपिका पादुकोण को जोड़ा था, पर अब सूत्र दावा कर रहे हैं कि संजय लीला भंसाली ने ‘‘गुस्ताखियां’’ से दीपिका पादुकोण की छुट्टी कर प्रियंका चोपड़ा को हीरोईन बना दिया है. इतना ही नहीं सूत्र दावा कर रहे हैं कि अब ‘गुस्ताखियां’ में प्रियंका चोपड़ा के संग इरफान खान नहीं बल्कि शाहरुख खान होंगे.

वैसे इस खबर को सुनकर हमें आश्चर्य नहीं हो रहा है, क्योंकि ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने करीबन एक वर्ष पहले ही बता दिया था कि दीपिका पादुकोण व प्रियंका चोपड़ा के बीच शीतयुद्ध में शाहरुख खान ने प्रियंका चोपड़ा के साथ हाथ मिलाते हुए संजय लीला भंसाली के साथ काम करना स्वीकार किया है. ‘सरिता’ पत्रिका ने ही सबसे पहले अपने पाठकों को बताया था कि संजय लीला भंसाली के निर्देशन में प्रियंका चोपड़ा व शाहरुख खान एक नहीं, बल्कि दो फिल्में करने वाले हैं.

बहरहाल, बौलीवुड के कुछ सूत्र तो ये भी दावा कर रहे हैं कि यदि प्रियंका चोपड़ा हौलीवुड में व्यस्त न रही होती, तो ‘पद्मावती’ में भी दीपिका की जगह वही हो सकती थीं…पर इस प्रकरण पर संजय लीला भंसाली ने चुप्पी साधी हुई है.

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