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मसला तीन तलाक का

सरकार ने मुसलिम विवाह कानून तीन बार तलाक तलाक तलाक कह कर शादी को तोड़ने के मामले को इस तरह उछालने की जिद पकड़ ली है, मानो इस के खत्म होते ही औरतों, खासतौर पर मुसलिम औरतों को जहालत और जलालत से नजात मिल जाएगी. ट्रिपल तलाक उतना ही बुरा है, जितना हिंदुओं में कुंडली, व्रत, उपवास, दहेज, जातिउपजाति हैं. 50 सालों के कहने भर के सुधार के बावजूद हिंदू लड़कियों को शादी और शादी के बाद वैसी ही मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, जैसी ट्रिपल तलाक की शिकार मुसलिम औरतों को.

मुसलिम धर्म के दुकानदार इस मामले पर सकपकाए हुए हैं. कांग्रेसी राजों के दौरान उन के पास वोट की थोड़ीबहुत ताकत थी और उस के सहारे उन्होंने मुसलिम शादीब्याह के मामलों में कोई बदलाव न आने दिया और औरतों को गुलाम की सी जिंदगी जीने को मजबूर किया. कहने को मुसलिम शादी में मेहर तय होता है, पर आम गरीबों में यह मामूली रकम होती है और इसे वसूलने का कोई तरीका नहीं है.

हिंदू कानूनों में अब मजिस्ट्रेट गुजारा भत्ता दिला सकता है, पर उस के लिए मोटी रकम तो वकीलों और पेशियों पर ही खर्च हो जाती है. मुसलिम व हिंदू औरतों की तलाक के बाद एक सी बुरी हालत होती है, बजाय तलाक के बाद औरतों को कोई हक दिलाने के नरेंद्र मोदी मुसलिम तलाक के खिलाफ पिल पड़े हैं, मानो यही औरतों को आगे बढ़ने से रोक रहा है. गुजरात चुनावों में वे 5 के 25 की बातें भी जम कर करते थे जो मुसलिमों में एक से ज्यादा बीवियां रखने पर है. उन्होंने यह हिसाब करने की कतई कोशिश नहीं की कि अगर हर मर्द के पास 4 बीवियां हों, तो आबादी में औरतों को 4 गुना होना पड़ेगा. हिंदुओं की तरह मुसलिमों में औरतों की गिनती आदमियों से कम है और यह जनगणना से साफ है.

सरकार हर समय विकास के मुद्दे को छिपाने के लिए इधरउधर के शिगूफे ढूंढ़ती रहती है और ट्रिपल तलाक उन्हीं में से एक है. सरकार कभी स्वच्छ भारत, कभी नोटबंदी, कभी आधार कार्ड को कंपलसरी बनाने के मामले उछाल रही है. विकास के नाम पर उस के पास यही एक आंकड़ा है कि भारत की बढ़ने की स्पीड दुनिया में सब से तेज है. सच यह है कि जो स्पीड हमारी है, उस से हमें चीन की तरह खुशहाल होने में भी 125 साल लगेंगे. केवल बड़ा देश होने से खुशहाली का आंकड़ा नहीं पैदा हो जाता. एक लाख गरीबों के पास कुल पैसा एक करोड़पति से ज्यादा ही होगा, पर उस पर गुब्बारा तो फुलाया नहीं जा सकता.

ट्रिपल तलाक खराब है, तो बना डालो कानून. धर्म को आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन में आने का वैसे भी कोई हक नहीं. हिंदू कानूनों को भी खत्म कर दो, मुसलिम कानूनों को भी. लेनदेन के कानूनों की तरह शादी और तलाक के कानून हिंदुओं और मुसलमानों में एकजैसे हों. न पंडित शादी कराए, न काजीमुल्ला. शादी तो मजिस्ट्रेट ही कराए. हिम्मत है तो कर के दिखाएं. हां, इस मामले को हिंदुओं को भड़काने के लिए इस्तेमाल करना हो तो बात दूसरी.        

डांस सब से आसान होता है : सिमरन शेख

गरीब परिवार में जनमी सिमरन शेख ने 9 साल की कम उम्र में ही डांस करना शुरू किया था, ताकि स्टेज शो कर के घर की जरूरतों को पूरा किया  जा सके. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली सिमरन शेख का परिवार बाद में मुंबई में रहने लगा था. उन्होंने न केवल डांस के जरीए अपने घर की माली मदद की, बल्कि अपनी पढ़ाई भी जारी रखी.

19 साल की उम्र में सिमरन शेख ने भोजपुरी, हिंदी और मराठी फिल्मों में अपनी एक लग पहचान बना ली है. उन्होंने 2 भोजपुरी फिल्मों के साथ कई वीडियो अलबम और मराठी फिल्में भी की हैं. वे विदेशों में भी अपने डांस शो कर चुकी हैं. पेश हैं, सिमरन शेख के साथ की गई बातचीत के खास अंश:

आप के लिए 9 साल की कम उम्र में ही डांस शो करना क्यों जरूरी हो गया था?

परिवार में कुछ हालात ऐसे बन गए थे कि जिंदगी मुश्किल हो गई. गरीबी आ गई. ऐसा लगा कि पढ़ाई और जिंदगी दोनों रुक जाएंगी. स्टेज पर डांस करना ही सब से आसान काम दिखाई दे रहा था. इस में रोज पैसा मिल जाता था.मुंबई में ऐसे बहुत सारे स्टेज शो होते थे, जहां बच्चों को भी डांस करने को मिल जाता था. यहीं काम शुरू हो गया. इस के सहारे जिंदगी की मुश्किलें कम होने लगीं. डांस शो करना कैरियर बन गया. उम्र के साथ डांस बढ़ता गया. साथ ही साथ मैं ऐंकरिंग भी करने लगी. मेरी आवाज अच्छी है, तो गाने भी गाने लगी. डांस से ज्यादा पैसा ऐंकरिंग से मिलने लगा, तो इस काम को ज्यादा करने लगी.

डांसर के रूप में आप को कभी ऐसे हालात से रूबरू होना पड़ा, जो पसंद न आए हों?

मैं ने बचपन से डांस करना शुरू कर दिया था. मुझे देखने वाले की नजर से ही पता चल जाता था कि वह क्या सोच रहा है. ऐसे में मैं उस से दूरी बना लेती थी. हर जगह अच्छे लोग भी होते हैं. दर्शक कई बार ऐसे हालात बना देते हैं, जो डांसर को पसंद नहीं आते, पर वह उन हालात को संभाल लेता है.

ऐक्टिंग के क्षेत्र में आप ने कैसे कदम रखा?

जब मैं ने डांस के साथसाथ बतौर ऐंकर और सिंगर के रूप में काम करना शुरू किया, तो लोगों ने कहा कि मैं बहुत सारे काम कर सकती हूं. मुझे लगा कि ऐक्टिंग भी की जा सकती है. मेरे कुछ जानकार थे. उन की तरफ से फिल्मों में काम करने के औफर आए. वे सब भोजपुरी फिल्में थीं. मेरी अपनी बोली भोजपुरी है, इसलिए मैं ने फिल्में कीं और वीडियो अलबम भी किए. अब मैं मराठी फिल्म भी कर रही हूं.

आप किस क्षेत्र को ज्यादा अच्छा मानती हैं?

मुझे अच्छी ऐक्टिंग पसंद है. मैं ऐक्टर बनना चाहती हूं. पर मैं सभी काम करना पसंद करती हूं. सिंगर और परफौर्मर के रूप में मेरी अच्छी इमेज है. मैं ब्रिटेन, मलयेशिया, इंडोनेशिया, दुबई, मौरीशस और बैंकौक में शो कर चुकी हूं.मेरी 2 भोजपुरी फिल्में ‘नजरिया काहके लडावल’ और ‘सजनवा बड़ा दिलवाला’ लोगों को पसंद आईं. अभी कुछ और फिल्मों के साथ मराठी फिल्म भी शूट हो रही है.

आप की जिंदगी बहुत जद्दोजेहद से भरी रही है. आप रिश्तों को कैसे देखती हैं?

जिंदगी की भागदौड़ में रिश्ते कई बार बहुत पीछे छूट जाते हैं. परिवार के साथ अब दोस्तों के बीच भी रिश्ते बनते हैं. हर जगह अच्छे लोग भी होते हैं, जो सही सलाह देते हैं, मदद करते हैं. जिंदगी की जद्दोजेहद जीने की कला सिखा देती है. अच्छे रिश्तों को संभालने की जरूरत होती है.

आप को और क्याक्या पसंद है?

मुझे डांस और सिंगिग ही सब से ज्यादा पसंद हैं. मुझे खाने में सादा खाना बहुत अच्छा लगता है. अगर अपने हाथ से बना कर खाना हो, तो मैं दालचावल, भिंडी की सब्जी और चिकन खाना पसंद करती हूं. पहनने में मुझे आरामदायक पोशाक पसंद है.

उन खास दिनों में सफाई

मासिक धर्म या माहवारी कुदरत का दिया हुआ एक ऐसा तोहफा है, जो किसी लड़की या औरत के मां बनने का रास्ता पक्का करता है. इस की शुरुआत 10 साल से 12 साल की उम्र में हो जाती है, जो 45 साल से 50 साल तक बनी रहती है. इस के बाद औरतों में रजोनिवृत्ति हो जाती है.

इस दौरान उन्हें हर महीने माहवारी के दौर से गुजरना होता है. अगर वे अपने नाजुक अंग की समुचित साफसफाई न करें, तो तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ सकती हैं.

हमारे समाज में आज भी माहवारी के 4-5 दिनों तक लड़कियों व औरतों के साथ अछूत जैसा बरताव किया जाता है. यही नहीं, ज्यादातर लड़कियां और औरतें इस दौरान परंपरागत रूप से कपड़े का इस्तेमाल करती हैं और उसे धो कर ऐसी जगह सुखाती हैं, जहां किसी की नजर न पड़े.

सेहत के नजरिए से ये कपड़े दोबारा इस्तेमाल करने के लिए ठीक नहीं हैं. इस का विकल्प सैनिटरी नैपकिन हैं, लेकिन  महंगे होने की वजह से इन का इस्तेमाल केवल अमीर या पढ़ीलिखी औरतों तक ही सिमटा है.

आज भी देश के छोटेछोटे गांवों और कसबों की लड़कियां और औरतें सैनिटरी नैपकिन के बजाय घासफूस, रेत, राख, कागज या कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं.

एक सर्वे के मुताबिक, 80 फीसदी औरतें और स्कूली छात्राएं ऐसा ही करती हैं. इन में न सिर्फ अनपढ़, बल्कि कुछ कामकाजी पढ़ीलिखी औरतें भी शामिल हैं.

फिक्की लेडीज आर्गनाइजेशन की सदस्यों द्वारा किए गए सर्वे में ऐसी बातें सामने आई हैं. संस्था की महिला उद्यमियों ने गांवों और छोटे शहरों में स्कूली छात्राओं और महिला मजदूरों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सब्जी बेचने वाली औरतों से बात की. उन से पूछा गया कि वे सैनिटरी हाईजीन के बारे में क्या जानती हैं?

कसबों में स्कूली बच्चियों से पूछने पर यह बात सामने आई कि कई लड़कियां हर महीने इन खास दिनों में स्कूल ही नहीं जातीं. कई मामलों में तो लड़कियों ने 5वीं जमात के बाद इस वजह से पढ़ाई ही छोड़ दी.

गांवदेहात की 38 फीसदी लड़कियां माहवारी होने की वजह से 5वीं जमात के बाद स्कूल छोड़ देती हैं. 63 फीसदी लड़कियां इस दौरान स्कूल ही नहीं जातीं. 16 फीसदी स्कूली बच्चियों को सैनिटरी नैपकिन की जानकारी नहीं है. 93 फीसदी पढ़ीलिखी व कामकाजी औरतें भी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करतीं.

चूंकि यह निहायत निजी मामला है और स्कूली छात्राओं में झिझक ज्यादा होती है, इसलिए महिला और बाल विकास के कार्यकर्ताओं द्वारा इस संबंध में स्कूलों में जा कर इन खास दिनों में बरती जाने वाली साफसफाई के बारे में समझाना चाहिए.

फिक्की लेडीज आर्गनाइजेशन द्वारा अनेक स्कूलों में नैपकिन डिस्पैंसर मशीनें लगाई गई हैं. इन मशीनों से महज 2 रुपए में नैपकिन लिया जा सकता है.

मध्य प्रदेश के कई स्कूलों में भी एटीएम की तरह सैनिटरी नैपकिन की मशीनें लगाई गई हैं, जहां 5 रुपए का सिक्का डालने पर एक नैपकिन निकलता है. ये सभी वे स्कूल हैं, जहां केवल लड़कियां ही पढ़ती हैं.

अगर माहवारी के दिनों में पूरी साफसफाई पर ध्यान न दिया जाए, तो पेशाब संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. राख, भूसे जैसी चीजें इस्तेमाल करने के चलते औरतों को कटाव व घाव हो सकते हैं. लंबे समय तक ऐसा करने से बांझपन की समस्या भी हो सकती है.

सर्वे के दौरान कुछ ऐसे परिवार भी मिले, जहां एक से ज्यादा औरतें माहवारी से होती दिखाई दीं. सासबहू, मांबेटी, बहनबहन, ननदभाभी जब एकसाथ माहवारी से होती हैं और अपने अंगों पर लगाए गए कपड़ों को धो कर सुखाती हैं, तो बाद में यह पता लगाना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि कौन सा कपड़ा किस का इस्तेमाल किया हुआ था? ऐसे में अगर ठीक से कपड़ा नहीं धुला, तो दूसरी को इंफैक्शन हो सकता है.

माहवारी के दौरान गर्भाशय का मुंह खुला होता है. इन दिनों अगर साफसफाई का ध्यान नहीं रखा जाए, तो इंफैक्शन होने का खतरा रहता है.

माहवारी के दिनों में घरेलू कपड़े के पैड के बजाय बाजारी पैड का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि कपड़े के पैड की तुलना में बाजारी पैड नमी को ज्यादा देर तक सोखता है, घाव नहीं करता व दाग लगने के डर से बचाता है.

माहवारी के दिनों में नहाना बहुत जरूरी है, खासकर प्रजनन अंगों की साफसफाई का ध्यान रखना चाहिए. पैंटी को भी रोजाना बदलना चाहिए.

माहवारी के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले बाजारी पैड को कागज में लपेट कर कूड़ेदान में डालें. इन्हें पानी के साथ न बहाएं और न ही खुले में डालें.

इस में कोई शक नहीं है कि अच्छी या नामीगिरामी कंपनियों के सैनिटरी नैपकिन काफी महंगे आते हैं. एक दिन में 4-5 पैड लग जाते हैं. यह खर्च उन के बजट से बाहर है. इस के अलावा उन्हें दुकान पर जा कर इसे खरीदने में भी शर्म आती है.

लड़कियों और औरतों की सेहत की खातिर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली कंपनियों को अनुदान दे कर इस की लागत इतनी कम कर दें कि एक या 2 रुपए में वह मिलने लगे. यह औरतों और लड़कियों की भलाई की दिशा में एक अच्छा कदम होगा.             

आंसू बहाता आपरेशन स्माइल

पिछले साल 1 मई को पटना के पूर्वी इंदिरानगर महल्ले में रहने वाले बिमल कुमार के 9 साल के बेटे ऋषभ का अपहरण हुआ और बाद में अपराधियों ने उस की हत्या कर दी. पुलिस ने छानबीन की, तो पता चला कि ऋषभ का अपहरण उस के पड़ोस में रहने वाले बिट्टू नाम के नौजवान ने किया था. रातोंरात पैसा कमाने की चाह में बिट्टू ने ऋषभ का अपहरण कर लिया और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपए की मांग की. बच्चे को ज्यादा समय तक साथ रखने के खतरे को भांप कर बिट्टू ने कुएं में धकेल कर ऋषभ की हत्या कर दी. उस के बाद भी ऋषभ के पिता को फोन कर वह फिरौती की मांग करता रहा.

बिट्टू के मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर पुलिस ने उसे दबोच लिया, पर मासूम ऋषभ अपने पड़ोसी की सनक का शिकार बन चुका था. nपिछले कुछ समय से इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. ज्यादातर बच्चों को उन के  करीबी रिश्तेदार या पड़ोसी ही गायब करते रहे हैं.

भारतनेपाल सरहद पर मानव तस्करी की रोकथाम को ले कर काम कर रहे एक स्वयंसेवी संगठन ‘भूमिका विहार’ की डायरैक्टर शिल्पी सिंह बताती हैं कि मानव तस्करी के मामले में बिहार का सीमांचल इलाका ट्रांजिट पौइंट बनता जा रहा है.इस संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 5 सालों में 519 बच्चे गायब हुए, जिन में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं. शादी और नौकरी का लालच दे कर लड़कियों की तस्करी की जाती है. बच्चों खासकर लड़कियों को गायब करने के बाद उन्हें कोठों में पहुंचा कर देह धंधे में झोंक दिया जाता है.

पुलिस अफसर अशोक सिन्हा कहते हैं कि अपने आसपास खेलतेकूदते, स्कूल आतेजाते और छोटीमोटी चीज खरीदने के लिए महल्ले की दुकानों पर जाने वाले बच्चों को उठाना अपराधियों के लिए काफी आसान होता है.परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच और साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं, कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और वह किसी मासूम बच्चे को अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले. ऐसे में हर मांबाप को अपने बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत है.

पुलिस हैडक्वार्टर के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में पटना से लापता हुए 575 बच्चों में से 299 बच्चों का ही पता चल सका है. ऐंटीह्यूमन ट्रैफिकिंग सैल में दर्ज मामलों से यह खुलासा हुआ है. अगस्त, 2016 में सब से ज्यादा 73 बच्चे गायब हुए थे. उन में से 40 बच्चों को ही पुलिस बरामद कर सकी.सैल में दर्ज मामलों से पता चला है कि सब से ज्यादा बच्चे पटना के कदमकुआं और पटना सिटी इलाके से गायब हुए हैं. गायब हुए बच्चों की उम्र 2 से 10 साल के बीच की है.बच्चों की गुमशुदगी के बढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर साल 2014 में देशभर में ‘आपरेशन स्माइल’ शुरू किया गया. मार्च, 2017 में इस आपरेशन के तहत बिहार में 185 बच्चों को उन के घर पहुंचाया गया.

सीआईडी के एडीजी आलोक राज का दावा है कि ‘आपरेशन स्माइल’ के तहत एक महीने के अंदर 185 बच्चों को बरामद किया गया. पटना में 53, पूर्णिया में 46, किशनगंज में 28, औरंगाबाद में 21, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी में 8-8, लखीसराय में 7, गया और अरवल में 6-6 व बक्सर और बेगुसराय में1-1 बच्चे को बरामद किया गया.

सभी बच्चों की उम्र 10-11 साल की थी और उन में से ज्यादातर रेलवे स्टेशनों पर लावारिश जिंदगी जी रहे थे. बच्चों के गायब होने के मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है, बल्कि सनहा दर्ज कर के छोड़ देती है. सुप्रीम कोर्ट में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ द्वारा दायर पीआईएल पर राज्य सरकार को दिशानिर्देश जारी किया गया है कि बच्चों के गायब होने की सनहा को 24 घंटे के अंदर एफआईआर में बदल दिया जाए.अपहरण कर बच्चों के मांबाप से फिरौती वसूलने, बच्चों के गुरदे, लिवर, आंख वगैरह अंगों को बेचने, उन्हें गुलाम की तरह घर और फार्महाउस में काम कराने, शीशा, सीमेंट, कालीन जैसे कारखानों में मजदूर के रूप में इस्तेमाल करने के लिए गायब किया जाता रहा है.साथ ही, घर से भटके हुए बच्चों को दलाल बहलाफुसला कर मानव तस्करी करते हैं. इसी वजह से गायब हुए बच्चों का पता नहीं चल पाता है.

गायब किए गए बच्चों को मुंबई, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और जयपुर की चूड़ी फैक्टरियों में काम पर लगा दिया जाता है. इस के पीछे अपराधियों का बहुत बड़ा नैटवर्क काम करता है. बिहार के किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जिलों के जरीए नेपाल से मानव तस्करी का धंधा फलफूल रहा है. ज्यादातर बच्चे गरीब और अनपढ़ परिवार के ही गायब होते हैं और ऐसे बच्चों के मांबाप अपने बच्चे के गायब होने की शिकायत थानों में दर्ज करने से घबराते हैं. उधर पुलिस महकमा भी मानव तस्करी को ले कर लापरवाह बना हुआ है.

पुलिस हैडक्वार्टर ने सीमांचल के सभी जिलों के एसपी को निर्देश दिया था कि मानव तस्करी के शिकार हुए बच्चों के फोटो, नाम और पता समेत पूरी जानकारी को महकमे की वैबसाइट पर अपलोड किया जाए. इस निर्देश को दिए सालभर से ज्यादा का समय बीत गया है, पर वैबसाइट को अपडेट नहीं किया जाता है. वैबसाइट पर कटिहार जिले के 18 बच्चों के गायब होने की जानकारी दर्ज है, पर 74 बच्चे गायब हुए हैं.

मगध यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर अरुण कुमार प्रसाद कहते हैं कि बच्चों के स्कूल, कालेज या कोचिंग, खेलनेकूदने, बाजार वगैरह जाने पर हर समय, हर जगह उन के मांबाप का नजर रखना मुमकिन नहीं है. अकसर ऐसा होता है कि किसी बच्चे के पिता दफ्तर में हैं, तो मां बाजार में. इस बीच उन का बच्चा स्कूल से घर आ जाता है और पड़ोस के ही अंकल या आंटी के पास मजे में रहता है. वे ही बच्चे को खाना भी खिला देते हैं. इस सब के पीछे इनसानी भरोसा ही काम करता रहा है. अब कुछ खुराफाती सोच वाले लोगों की वजह से यह भरोसा ही कठघरे में खड़ा हो चुका है.

मासूमों को बचाने के लिए उन के मांबाप को खासतौर पर सावधान रहने की जरूरत है. वे अपने बच्चों को यह बताते और समझाते रहें कि उन्हें किस के साथ कहीं जाना है या नहीं जाना है. आंखें मूंद कर किसी पर भी यकीन नहीं करना है, चाहे आप का उस से कितना भी करीबी या गहरा रिश्ता हो.बच्चों को बताएं कि स्कूल आनेजाने के दौरान कोई आदमी अपने साथ चलने को कहे, तो न जाएं. बच्चों के दोस्तों और उन के मातापिता के मोबाइल फोन नंबर और घर के पते अपने पास जरूर रखें.परिवार या पड़ोस के ऐसे लोगों के पास बच्चों को न जाने दें, जिन का आपराधिक रिकौर्ड रहा हो. किसी अनहोनी का डर होने पर तुरंत पुलिस को सूचना दें.

मोदी के खिलाफ महागठबंधन

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत का असर बिहार की राजनीति पर दिखने लगा है. इस के अलावा 4 राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने बीच के तमाम विवादों को खत्म करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं.

दोनों नेता लगातार एकदूसरे से मिल रहे हैं और साथसाथ फोटो भी खिंचवा रहे हैं. इस बहाने दोनों धुरंधर यह संदेश देने की पुरजोर कवायद कर रहे हैं कि उन के  बीच सबकुछ ठीक है और हर हाल में दोनों साथसाथ हैं. ला लू प्रसाद यादव ने तो बातचीत में ईमानदारी से यह कबूल भी किया कि अगर अब भी गैरभाजपाई दल एकजुट नहीं हुए, तो उन के खत्म होने का पूरा खतरा है.

महागठबंधन में दरार, उठापटक और खटास की अटकलों पर पानी डालते हुए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने एक सुर में कहा है कि वे साथसाथ हैं और उन के बीच कोई विवाद या तनाव नहीं है. लालू प्रसाद यादव ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार की अगुआई में महागठबंधन की सरकार मजबूती से काम कर रही है और वह अपना कार्यकाल पूरा करेगी. वे और नीतीश कुमार मिल कर दिल्ली से भाजपा को खदेड़ेंगे. लू प्रसाद यादव कहते हैं, ‘‘कितनी मेहनत से महागठबंधन के पेड़ को खड़ा किया है और उसे खुद ही कालिदास बन कर काट देंगे क्या? संघ बिहार को तोड़ने की साजिश में लगा हुआ है, क्योंकि बिहार उस का डेंजर जोन है.’’ वहीं नीतीश कुमार भी लालू प्रसाद यादव के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि महागठबंधन को ले कर भरम और अफवाह फैलाने वालों की दाल बिहार में नहीं गलेगी. कुछ लोगों को बिहार और महागठबंधन को बदनाम करने की आदत पड़ चुकी है.

भाजपा के खिलाफ नैशनल लैवल पर महागठबंधन बनाने के लिए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने 3 अप्रैल, 2017 को लंबी बातचीत की. पिछले दिनों 5 राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद पहली बार दोनों नेताओं की मुलाकात हुई.

मुलाकात के बाद लालू प्रसाद यादव ने बताया कि देश को बचाने के लिए गैरभाजपाई दलों की गोलबंदी जरूरी हो गई है. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो धर्मनिरपेक्ष ताकतों का बोरियाबिस्तर गोल हो जाएगा. नीतीश कुमार ने कांग्रेस को इस पर पहल करने को कहा है, क्योंकि वह बड़ी और सब से पुरानी पार्टी है.लालू प्रसाद यादव ने भी यही कहा कि नीतीश कुमार के साथ वे भी सभी दलों के नेताओं से बात करेंगे और राष्ट्रीय महागठबंधन के लिए जमीन तैयार करेंगे.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावी नतीजों में भाजपा को मिली भारी जीत के बाद दोनों नेताओं ने सभी विपक्षी दलों से गुहार लगाई है कि वे आपसी तनाव और अहम को छोड़ कर एक मंच पर आ जाएं, तो इस मुहिम को जमीन पर उतारने में कोई दिक्कत नहीं होगी. उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे को गैरभाजपाई दलों को चेतावनी और चुनौती की तरह लेना होगा.

लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी राजद को राममनोहर लोहिया और मधु लिमये की नीति पर हर कार्यकर्ता को चलाने की रणनीति बनाई है. बिहार के पड़ोसी उत्तर प्रदेश में भगवा पार्टी की कामयाबी और समाजवादियों की करारी हार के बाद राजद ने बिहार में खुद को नए सिरे से खड़ा करने की तैयारी शुरू की है.लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि समाजवादियों की हार को उन्होंने चुनौती के रूप में लिया है. उन्हें इस बात का यकीन है कि बिहार ने हमेशा भगवा रथ को रोका है. सब से पहले लालकृष्ण आडवाणी के रथ को लालू प्रसाद यादव ने बिहार में रोक दिया था. उस के बाद पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार ने नरेंद्र मोदी की लहर को नाकाम कर दिया था. इन्हें भरोसा है कि वे अपने 30 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं के दम पर साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में हिंदुत्व के उभार को पटकनी दे सकते हैं.

लालू प्रसाद यादव के बेटे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं कि वे अपने कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देंगे कि किस तरह से महागठबंधन की सरकार के कामकाज को गांवगांव और जनजन तक पहुंचाया जाए. इस के लिए कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर लगाया जाएगा.

2 मई से 4 मई तक राजगीर में राजद के सभी नेताओं और ब्लौक लैवल के प्रमुख कार्यकर्ताओं को शिविर में बुलाया गया. राजद ने नया नारा बुलंद किया कि आबादी के हिसाब से देश में बजट बनाया जाए. समाजवादी विचारधारा को पंचायतों और वार्डों तक पहुंचा कर भगवा विचारधारा को हराया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव पिछले 30 सालों से समाजवाद और दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की राजनीति की धुरी रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली जीत के बाद के खतरे को उन्होंने तुरंत भांप लिया है. वे साफसाफ कहते हैं कि अब भी अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियां अपनाअपना अहम छोड़ कर एक मंच पर नहीं आएंगी, तो सांप्रदायिक ताकतें और भी मजबूत होती चली जाएंगी और हमारा वजूद खत्म हो जाएगा.ईगो प्रौब्लम की वजह से सभी विरोधी दल एकजुट नहीं हो पा रहे हैं, जबकि सभी गैरभाजपाई दलों की एक ही मंजिल है. सभी दल दिल्ली से भाजपा को उखाड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं.पिछले कुछ समय से लालू प्रसाद यादव ने केंद्र की भाजपा सरकार पर जम कर निशाना साधना शुरू कर दिया है. वे बारबार जोर दे कर अपने वोटरों से कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने अडानी का 2 हजार करोड़ रुपए का कर्ज माफकर दिया. रिलायंस कंपनी को फायदा पहुंचाया जा रहा है.मोदी सरकार को अमीरों की सरकार करार देते हुए वे कहते हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को जड़ से उखाड़ फेंकने की जरूरत है, नहीं तो गरीबों का जीना मुहाल हो जाएगा.

अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने पिछले सारे विवादों और तनावों को दूर करने की पहल की है, जो महागठबंधन के लिए सुकून की बात है.

उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव की अनदेखी कर अकेले ही वहां जा कर सभाएं कर रहे थे.महागठबंधन में बखेड़ा खड़ा करने से बचने के लिए लालू प्रसाद यादव चुप रह गए, पर राजद के थिंक टैक माने जाने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह ने यह कहने से परहेज नहीं किया कि अपने सियासी फायदे के लिए नीतीश कुमार महागठबंधन के साथियों की अनदेखी करते रहे हैं.

उन्होंने नीतीश कुमार से कई तल्ख सवाल भी पूछे थे. जैसे, नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार किस ने बना दिया? किस हैसियत से नीतीश कुमार मिशन, 2019 की बात कर रहे हैं? क्या अकेले घूम कर नीतीश कुमार सैकुलर ताकतों को कमजोर और सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत नहीं कर रहे हैं? दूसरे राज्यों में सभा करने से पहले नीतीश कुमार को क्या सहयोगी दलों से बात नहीं करनी चाहिए थी? क्या उन्हें भरोसे में नहीं लेना चाहिए था?इन सवालों पर नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे गए और लालू प्रसाद यादव ने भी कुछ नहीं कहा.

राजद सूत्रों के मुताबिक, लालू प्रसाद यादव इस बात से काफी नाराज हुए थे कि नीतीश कुमार ने उन से कोई सलाहमशवरा किए बगैर उत्तर प्रदेश के बनारस, कानपुर, नोएडा और लखनऊ में अकेले ही लगातार कई रैली कर डालीं. इस मामले में महागठबंधन को भरोसे में नहीं लिया गया.नीतीश कुमार के उत्तर प्रदेश में धुआंधार चुनाव प्रचार कर और अपना जनाधार बनानेबढ़ाने की जुगत से लालू प्रसाद यादव कतई खुश नहीं थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति की अच्छीखासी आबादी है और नीतीश कुमार की नजर उन पर गड़ी हुई थी.

लालू प्रसाद यादव ने कई दफा नीतीश कुमार को समझाने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री बनने के चक्कर में कहीं मुख्यमंत्री की कुरसी न गंवानी पड़ जाए? इस से जहां महागठबंधन का मकसद पूरा नहीं होगा, वहीं भाजपा को मजबूत होने का मौका भी मिल जाएगा.गौरतलब है कि 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन ने 178 सीटों पर कब्जा किया है. इस में राजद के खाते में 80, जद (यू) की झोली में 71 और कांग्रेस के हाथ में 27 सीटें हैं. राजग के खाते में 58 सीटें हैं.

लालू प्रसाद यादव को महागठबंधन में अपनी ताकत का एहसास है और इस के साथ उन्हें यह भी डर है कि महागठबंधन में विवाद होने से भाजपा उस का फायदा उठा सकती है.

लालू प्रसाद यादव की नाराजगी की वजह से ही नीतीश कुमार ने नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, थल सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के मामले में केंद्र सरकार का समर्थन कर अपने सहयोगी दलों के साथ समूचे विपक्षी दलों का सिर चकरा दिया था.लालू प्रसाद यादव भी हैरत में थे. इस से राजनीतिक हलकों में यह अफवाह जोरों से चलने लगी कि नीतीश कुमार दोबारा राजग में जाने का माहौल बना रहे हैं, जबकि नीतीश कुमार को करीब से जानने वाले बताते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीतिक चाल दूसरे नेताओं से अलग है.

साल 2012 में जब नीतीश कुमार भाजपा की मदद से बिहार में सरकार चला रहे थे, तो उस समय उन की पार्टी जद (यू) ने राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को वोट दिया था. उस के बाद जब कांग्रेस सरकार जीएसटी बिल लाई, तो नीतीश कुमार ने उस का भी समर्थन किया था, जबकि उन की सहयोगी भाजपा ने जीएसटी बिल को पास नहीं होने दिया था.नीतीश कुमार सियासत के चतुर और माहिर खिलाड़ी हैं. फिलहाल जहां वे लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस की मदद से बिहार में सरकार चला रहे हैं और साल 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर देने की कवायद में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर वे भाजपा से हाथ मिलाने का रास्ता भी बना कर रखे हुए हैं.

पिछले महीने 4 राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार का सियासी गणित कुछ गड़बड़ा सा गया है.  उन्हें लगने लगा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को मिली कामयाबी को नैशनल लैवल पर आजमाया जा सकता है. इस के अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं है. बातबेबात पर लालू प्रसाद यादव को नाराज और नजरअंदाज करने की रणनीति में बदलाव करते हुए नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के गले मिल कर फोटो खिंचवाया और जनता को बतानेजताने की कोशिश की कि महागठबंधन पर कोई विवाद नहीं है और लालू प्रसाद यादव से भी कोई खटास नहीं है.नीतीश कुमार के  बदलाव को देख कर लालू प्रसाद यादव भी खुश हैं, तभी तो वे कहने लगे हैं कि बिहार में भाजपा वालों के लिए कोई जगह नहीं है. यहां कोई वैकेंसी नहीं है. वे और नीतीश कुमार मिल कर दिल्ली से भाजपा को खदेड़ कर ही दम लेंगे.             

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संगीत मेरी रगों में है : अमित मिश्रा

पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में संगीत के क्षेत्र में कई नई प्रतिभाओं ने कदम रखा है और इनमें से कई सफल भी हैं. कुछ प्रतिभाओं ने तो ‘भाई भतीजावाद’ और ‘गैर फिल्मी’ अथवा ‘बाहरी होने’ का दंश झेलते हुए भी हिम्मत नहीं हारी. इसके पीछे इनकी सोच रही है कि बॉलीवुड में हर दिन हजारों प्रतिभांए आती हैं.

ऐसे में स्वाभाविक तौर पर हर किसी को संघर्ष करना पड़ता है. कुछ का संघर्ष रंग लाता है, तो कुछ का नहीं. ऐसा सिर्फ बॅालीवुड ही नहीं हर क्षेत्र में होता है. बॉलीवुड में ग्लैमर है, इसलिए हौव्वा कुछ ज्यादा ही बना हुआ है. ऐसी सोच के साथ निरंतर कुछ नया करने की चाह रखने वाले संगीतकार हैं, अमित मिश्रा.

पटना, बिहार में जन्में, वाराणसी में पले बढ़े और दिल्ली में फाइन आर्ट्स में गोल्ड मेडलिस्ट अमित मिश्रा बॉलीवुड के चर्चित संगीतकार हैं. कई टीवी सीरियल व फिल्मों को संगीत से संवारने के बाद इन दिनों वह परेश रावल, कार्तिक आर्यन, कृति खरबंदा व तनवी आजमी के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ को लेकर उत्साहित हैं. जिसमें उन्होंने शीर्ष गीत के अलावा एक सूफी गीत को संगीत से संवारा है. तथा नवेंदु त्रिपाठी लिखित गीत को नवेंदु त्रिपाठी और सुमित आनंद के साथ अमित मिश्रा ने स्वरबद्ध भी किया है.

हाल ही में उनसे लंबी बातचीत हुई, जो कि इस प्रकार रही.

आपने संगीत को ही करियर बनाने की बात कब सोची?

सच कहूं तो संगीत मुझे विरासत में मिला है. संगीत मेरी रगों में है. पर मैं पेंटर भी रहा हूं. दिल्ली विश्वविद्यालय से मैं फाइन आर्टस में गोल्ड मैडलिस्ट भी हूं.

इस पर विस्तार से रौशनी डालेंगे?

मेरी पैदाइश पटना, बिहार की है. पर मैं वाराणसी में रहा हूं. मेरे पिता जी शंभूनाथ मिश्रा पत्र सूचना कार्यालय में नौकरी करते थें. साहित्य व संगीत से उनका काफी लगाव था. मेरी दादी और मेरे पर दादा वगैरह संगीत से जुड़े रहे हैं. मेरी दादी कमला देवी बिहार रेडियो व बिहार टीवी पर गाती थीं. वह मशहूर मैथिली गायक थीं. क्लासिकल संगीत व फोक संगीत हमारे खानदान में रहा है, हमें बचपन से यह सब मिला है.

मेरे पिता शंभूनाथ मिश्रा, अब्दुल अलीम जाफर के शिष्य थें. उन्होंने संगीत पर किताब लिखी है. मेरे ससुर नेत्र सिंह रावत फिल्म आलोचक हैं. इनका भी कला व संगीत से जुड़े लोगों के संग मिलना जुलना रहा है. इसका असर मुझ पर भी रहा. जब घर पर संगीत से जुड़े लोग बैठते थें, तो मैं दूर से इन सभी का श्रोता हुआ करता था. पहले तो शाम को बैठकें लगती थीं. विचार विमर्ष होता रहता था. अब तो वह सब खत्म हो गया. संगीत, साहित्य व संस्कृति तो मेरे साथ बचपन से रही है.

बचपन से ही संगीत के वाद्ययंत्रो को बजाने की लालसा रही है. मैंने क्लासिकल संगीत, पश्चिमी संगीत और गिटार की ट्रेनिंग भी ली. राजस्थान घराने के संगीतज्ञ के पी मिश्रा से मैंने काफी ट्रेनिंग ली. दिल्ली स्कूल ऑफ म्यूजिक से मैंने पश्चिमी संगीत व गिटार बजाना सीखा. इसके अलावा अपने परिवार से बहुत कुछ सीखा.

संगीत का माहौल था, पर पेंटिंग, फाइन आर्टस का कोर्स वगैरह?

मैं मानता था कि किताबी कीड़ा मुझे नहीं बनना है. पर ऑब्जर्वेशन करना मेरे गुरूओं ने मुझे सिखाया था. ऑब्जर्वेशन के ही चलते हम दूसरों को ही नहीं अपने आपको भी ऑब्जर्व करना, अपने आप से बात करना शुरू करते हैं, तो फिर हमें पता चलता है कि मैं जो दिख रहा हूं, वह तो नहीं हूं. शुरू में संगीत मेरा प्रोफेशन नहीं था. मैंने पेंटर के तौर पर अपना करियर शुरू किया था. मेरी पेटिंग्स की काफी प्रदर्शनी लगीं. फाइन आर्टस में गोल्ड मेडलिस्ट हूं. पर साथ में संगीत के लाइव शो कर रहा था. अपने कुछ गानों की धुने भी बनायी.

संगीतकार के रूप में यात्रा कब शुरू हुई?

लगभग आठ वर्ष पहले. जब मैं दिल्ली में रह रहा था, तभी मुझे अश्विनी धीर के टीवी सीरियल ‘‘राम खेलावन सी एम एन फैमिली’’ में संगीत देने का ऑफर मिला था. मैंने इसका शीर्षक गीत को संगीत से संवारा था. इसी के समांनांतर मैं अपने लिए कुछ गीतों की धुन बना रहा था. कुछ लघु फिल्में कर रहा था. लाइव शो काफी कर रहा था. इस सीरियल में संगीत देने के बाद मुझे लगा कि एक राह खुल गयी है. मुंबई में किसी को मेरा काम पसंद आया है, तो अब मुंबई जाकर कुछ बेहतर रचनात्मक काम किया जाना चाहिए. यह वह दौर था, जब मैं कुछ अलग तरह का काम संगीत में कर रहा था. जिस तरह का संगीत फिल्मों में परोसा जा रहा था या जिस तरह के गीत बन रहे थें, वह सब मैं नहीं कर रहा था. अश्विनी धीर ने मुझे सबसे पहले फिल्म ‘‘अतिथि तुम कब जाओगे’’ भी दी थी. फिल्म ‘‘अतिथि तुम कब जाओगे’’ के शीर्ष गीत के साथ ही मैंने चार गाने लिखे, गाए और संगीत से संवारे थे.

आपने कहा कि आप अलग तरह का संगीत दे रहे हैं. इससे आपका मतलब?

संगीत में ही काम कर रहा था, पर कर्णप्रिय व अर्थपूर्ण संगीत बना रहा था. आप मेरी पिछली फिल्म ‘‘अतिथि तुम कब जाओगे’’ के गानों को देखें, तो वह सभी गानें फिल्म के कथानक से संबंधित थें. प्यार यानी रोमांटिक गाने नहीं थें. आइटम सॉन्ग नहीं था. और इन गीतों को सराहा गया था. तब मुझे लगा कि मैं जो कर रहा हूं, वह गलत तो नहीं कर रहा. फिर संगीत के क्षेत्र में कुछ अच्छा काम करने के लिए यही हमारे लिए मक्का मदीना है. यही वह जगह है, जहां आकर कुछ काम किया जाए. इसीलिए दिल्ली से मुंबई आ गया. उसके बाद कुछ सीरियल, लघु फिल्में व फीचर फिल्में मिली. फिर ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ मिली, वहां से जो सिलसिला शुरू हुआ, तो लगातार काम कर रहा हूं. मेरे काम को सराहना मिली, दूसरे लोगों से मुलाकातें हुई, प्रोत्साहन मिला और यात्रा सतत चलती आ रही है. यह यात्रा काफी मजेदार रही. हम हर दिन कुछ नया सीखते रहे. कुछ नए अनुभव हुए. अब मेरी एक फिल्म ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ प्रदर्शित होने वाली है. इस फिल्म से मुझे काफी उम्मीद है कि कुछ रोचक काम होगा.

क्या बॉलीवुड या मुंबई को लेकर आपके दिमाग में कोई ईमेज थी, जिसके चलते यहां काम करने पर आपको लगा कि आप कुछ भी गलत नहीं कर रहे हैं?

मेरे दिमाग में बॉलीवुड या संगीत जगत को लेकर कुछ भी गलत बात नहीं थी. मुझे यह था कि मैं अपना कुछ लेकर जा रहा हूं और मुझे अपना काम, अपने संगीत से बॉलीवुड को परिचित कराना है. ऐसा संगीत बनाना है, जिसमें मेरी अपनी पहचान होगी. मैं यहां आकर प्रीतम या ए आर रहमान की तरह का संगीत नहीं देना चाहता था. क्योंकि उसकी यहां पर जरुरत नहीं थी. मैं यहां अपना संगीत, अपना थॉट प्रोसेस लेकर आया था. पर यह सब कुछ पूरा का पूरा मैं किसी पर भी नहीं थोप सकता था. क्योंकि फिल्म मेकिंग एक टीम वर्क है. यदि मैं अपना सगीत बना रहा हूं, तो अलग बात है. पर यदि मैं किसी फिल्म के लिए संगीत बना रहा हूं, तो निर्माता, निर्देशक के वीजन व फिल्म के कथानक का भी ख्याल रखते हुए अपना रंग देना था. दाल को दाल की तरह बनाना होगा, पर उसमें तड़का आपका अपना होना चाहिए, तभी आप कहीं अलग खड़े हुए नजर आएंगे. मेरे अपने तरीके के कुछ विचार हैं, उन्हें लोग धीरे धीरे स्वीकार कर रहे हैं, इससे मैं खुश व उत्साहित हूं.

आप खुद को क्या मानते हैं?

मैं अपने आपको वोकलिस्ट मानता हूं. मुझे जहां मौका मिलता है, वहां अपनी आवाज देता हूं. मैं जब कोई संगीत की धुन बनाता हूं, तो उसका डेमो बनाकर देता हूं, जब लोगों को उस डेमो की आवाज पसंद आ जाती है, तो मैं गा भी देता हूं. हम दूसरे गायकों से भी गंवाते हैं. मेरी राय में हर गाना एक ही गायक गाने लगे, तो वह या मैं उसके साथ न्याय नहीं कर पाउंगा. जिस गाने को सुनकर पूरी टीम को लगता है कि मुझे ही गाना चाहिए, तो मैं गाता हूं. अन्यथा फिल्म के मूल भाव को समझ कर गाने की धुन बनाता हूं और जिस तरह की आवाज की जरुरत होती है, उस आवाज से गवाता हूं.

किसी भी फिल्म के गीत संगीत तैयार करने की आपकी कार्यशैली क्या होती है?

सबसे पहले निर्देशक के मुंह से सुनना पसंद करता हूं कि उनकी सोच क्या है, उन्हें किस तरह का गीत संगीत चाहिए. उसके बाद मैं पूरी फिल्म की पटकथा को सुनना पसंद करता हूं. मैं पेंटर भी रहा हूं तो जब पटकथा वगैरह सुनता हूं, तो मुझे गीत की आवाज के साथ ही विज्युअल्स भी दिखने लग जाते हैं और उस सिच्युएशन में पहुंच जाता हूं. मेरे अंदर यह ईश्वर प्रदत्त गुण है. जब मेरे पास किसी गाने का ऑफर आता है, तो मेरे हाथ पांव फूल जाते हैं, पर फिर एक बार मेरे दिमाग में बात बैठ जाती है, उसके बाद ईश्वर मुझसे अपने आप उस गीत के लिए संगीत तैयार करवा लेता है. जब तक वह काम पूरा न हो जाए, मुझे भूख प्यास कुछ नहीं लगती.

किसी प्रायवेट एलबम पर काम हो रहा है?

अब तक कोई एलबम नहीं निकाला. पर बहुत जल्द कुछ एलबम आने वाले हैं. हम अपना एक बड़ा एलबम 15 अगस्त के दिन लेकर आने वाले हैं. जिसे हम अपने सैनिकों, मदर नेचर को समर्पित कर रहे हैं. हमारे देश की कुछ संस्कृति लोगों के बीच है, तो कुछ विचार खत्म होते जा रहे हैं. संस्कृति के प्रति इज्जत खत्म होती जा रही है. आज की पीढ़ी तमाम अच्छी चीजों से थोड़ी दूर हो गयी है. अपने एलबम में उन्ही चीजों को लाने की कोशिश कर रहा हूं. इसमें फोक, शास्त्रीय संगीत, अच्छा साहित्य भी होगा. सिर्फ गाने नहीं होंगे. साहित्य को भी हम गाकर पेश करना चाहते हैं.

हम इसके वीडियो भी बना रहे हैं. इस पर मैं, नवेंदु त्रिपाठी और अश्विनी शंकर मिलकर काम कर रहे हैं. अश्विनी शंकर शहनाई के अच्छे घराने से हैं. कमाल के इंसान हैं. एलबम में शहनाई का भी उपयोग कर रहे हैं. यह एक लंबी सीरीज है. हमारा मकसद इससे पैसा कमाना नहीं है. हम जिस पर यकीन करते हैं, उसे हम इसके माध्यम से सामने रखना चाहते हैं. हम महज संगीत बनाने के लिए संगीत नहीं बना रहे हैं, बल्कि कुछ नया पेश करने का प्रयास है.

आखिर आज की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों से दूर क्यों होती जा रही है?

आज हमारी युवा पीढ़ी के पास फास्ट फूड ज्यादा है. अब हमारे यहां हर चीज फास्ट फूड हो गयी है. युवा पीढ़ी के पास धैर्य नहीं है. आज उनमें सुनने की शक्ति नहीं है. युवा पीढ़ी के पास समय नही है.

बॉलीवुड में आठ वर्ष के अंदर आपने ज्यादा फिल्में नहीं की?

कम लेकिन अच्छा काम कर रहा हूं. मैं जो भी काम करता हूं, उसमें मेरी सिग्नेचर होती है. उसमें आत्मा होती है.

शौक?

पहाड़ों पर यात्राएं करने का शौक. बुलेट उठाकर कभी भी चल देता हूं.

छत्तीसगढ़ के साहेब दास मानिकपुरी की लंबी उड़ान

कठिन मेहनत का कोई पर्याय नहीं होता, जो इंसान इस बात को समझ लेता है, उसे सफलता की सीढ़ियां चढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. इसी बात की जीती जागती मिसाल हैं, सहेब दास माणिकपुरी.

छत्तीसगढ़ राज्य के भाटापारा के करीब भैसा सकरी गांव निवासी साहेब दास मानिकपुरी जब कुछ वर्ष पहले मुंबई पहुंचे थे, उस वक्त वह शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते थें. एक मित्र की मदद से उन्हें ‘इस्कॉन’ मंदिर में ‘कंस वध’ नामक नाटक में अभिनय करने का मौका जरुर मिला, पर उनकी हिंदी को लेकर सवाल उठ रहे थे. ऐसे में हिम्मत हारने की बजाय साहेब दास ने उस वक्त के रंगकर्मी व अब सफल भोजपुरी अभिनेता संजय पांडे,  रंगकर्मी व लेखक राजेश दुबे तथा सशक्त रंगकर्मी स्व. पं. सत्यदेव दुबे की छत्रछाया में काम कर अपनी हिंदी पर इतनी मेहनत की आज वह शुद्ध व क्लिश्ट हिंदी बोलते हैं.

साहेब दास माणिकपुरी की मेहनत का नतीजा है कि वह अब तक ‘सीआईडी’, ‘एफआईआर’, ‘तोता वेड्स मैना’ और ‘भाभीजी घर पर हैं’ सहित दर्जन भर से अधिक सीरियलों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके हैं. वह ‘मर्दानी’, ‘हिस्स’, ‘हल्ला बोल’, ‘फैमिली’, ‘जयंता भाई की लव स्टोरी’, ‘फंस गए रे ओबामा’, ‘रमैया वस्तवैया’ सहित कुछ फिल्में कर चुके हैं. तो वहीं वह प्रदीप सरकार के निर्देशन में कई विज्ञापन फिल्मों में अमिताभ बच्चन, इरफान खान, रानी मुखर्जी, कंगना रानौट, ईशा कोपीकर,सचिन तेंदुलकर के साथ स्क्रीन शेयर किया है.

साहेगदास माणिकपुरी की मेहनत व लगन का ही परिणाम है कि इन दिनों वह ‘‘लाइफ ओ के’’ पर प्रसारित हो रहे हास्य सीरियल ‘‘मे आई कम इन मैडम’’ में वह खिलौनी के चरित्र में काफी पसंद किए जा रहे हैं.

अपनी सफलता की चर्चा करते हुए साहेब दास माणिकपुरी कहते हैं, ‘‘सब कुछ मेरे माता पिता व गुरूजनों का आशीर्वाद है. मैंने मुंबई में रंगमंच से जुड़कर रंगकर्मी पं. सत्यदेव दुबे, राजेश दुबे, संजय पांडे, दिलीप शाह और मनीष मिश्रा जी से अभिनय की बारीकियों सीखता गया. इनके मागदर्शन से मेरे अभिनय कौशल में निखार आता गया. संघर्ष के दौरान मेरे बड़े भाई कुमार मानिकपुरी का बहुत सपोर्ट मिला, जो एक लेखक हैं. अपनी माटी से जुडे़ मुंबई में रहते हुए उन्होंने छतीसगढ़ी में मानिक खंड लिखा है. और अब गीता भागवात लिख रहे हैं. इसके अलावा मशहूर फिल्म निर्देशक प्रदीप सरकार के प्रोत्साहन के चलते आज इस मुकाम पर पहुंचा हूं. निर्देशक शशांक बाली सर की सभी सीरियल करते आ रहा हूं. वह शांतभाव के बेहद कूल इंसान हैं. वह अपने कलाकार को नर्वस नहीं होने देते. पर अभी मुझे बहुत आगे जाना है.’’

परिश्रम के बिना कोई मुकाम नहीं मिलता में यकीन करने वाले साहेब दास माणिकपुरी ने हाल ही में इरफान खान के साथ फिल्म ‘‘रायता’’ की भी शूटिंग पूरी की है.

मर्दों को अपने जाल में फंसाती लड़कियां

एक दिन रात के 10 बजे एक डाक्टर जब अपना क्लिनिक बंद कर के घर लौट रहे थे, तो रास्ते में उन्होंने देखा कि एक लड़की के साथ कुछ लफंगे जबरदस्ती कर रहे थे. वह लड़की ‘बचाओबचाओ’ चिल्ला रही थी.

डाक्टर ने उस लड़की की मदद करने के मकसद से अपनी कार रोकी. कार के रुकते ही लफंगे भाग खड़े हुए.

डाक्टर ने उस लड़की की हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘कहां जाना है आप को? चलो, मैं छोड़ देता हूं.’’

वह लड़की तैयार हो गई. पर कुछ देर बाद ही उस लड़की ने शोर मचाना शुरू कर दिया. डाक्टर सकते में आ गए.

लड़की ने कहा, ‘‘आप मुझे 5 हजार रुपए दें, वरना मैं अपने कपड़े फाड़ लूंगी और आप पर इलजाम लगा दूंगी कि आप मुझे लिफ्ट देने के नाम पर मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे थे.’’

डाक्टर ने 5 हजार रुपए दे कर उस लड़की से अपना पीछा छुड़ाया.

*  ‘‘भाई साहब, जरा रुकिए…’’ अंधेरी रात में मोटरसाइकिल पर जा रहे एक नौजवान को जब किसी लड़की ने पुकारा, तो उस ने जोर से ब्रेक लगा कर अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और पूछा, ‘‘कहिए?’’

उस लड़की ने रोते हुए कहा, ‘‘मेरा भाई बहुत बीमार है. मुझे जल्दी घर पहुंचना है. मेरी मदद कीजिए. आप मुझे घर तक छोड़ देंगे, तो भगवान आप का भला करेगा.’’

यह सुन कर वह नौजवान पसीज गया और अपनी मोटरसाइकिल पर उसे लिफ्ट दे दी.

वह नौजवान जब रास्ते पर आगे बढ़ा, तो सुनसान इलाका आते ही एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 लड़के पीछे से आए और आगे आ कर उन का रास्ता रोक लिया.

उन दोनों लड़कों ने उस नौजवान की कनपटी पर पिस्तौल लगा कर कहा, ‘‘किधर ऐश करने जा रहा है?’’

वह लड़की मोटरसाइकिल से उतर कर कुछ दूरी पर चुपचाप खड़ी रही… उस के साथी लुटेरों ने पिस्तौल अड़ा कर उस नौजवान की जेब से सारे रुपएपैसे

व सोने की चेन व अंगूठी झपट ली और उस की मोटरसाइकिल की हवा निकाल दी.

उस गैंग में शामिल वह लड़की अपने साथियों की मोटरसाइकिल पर बैठ कर भाग गई.

* उस दिन घनघोर बादल छाए हुए थे और मूसलाधार बारिश हो रही थी. एक जौहरी अपनी दुकान बंद कर घर लौट रहे थे. रास्ते में उन्हें किसी का ऐक्सिडैंट होता दिखाई दिया. उन्होंने अपनी कार रोकी तो देखा कि एक लड़की बेहोश पड़ी थी.

वे जौहरी कार से उतरे और उस लड़की को अपनी कार में डाल कर अस्पताल ले जाने लगे.

थोड़ी दूर जाने के बाद ही वह लड़की ऐसे उठ बैठी, जैसे कुछ हुआ ही न हो. वह तो बेहोशी का नाटक कर रही थी.

उस लड़की ने जौहरी से कहा, ‘‘तुम्हारे पास जोकुछ रुपयापैसा, जेवर है, चुपचाप मेरे हवाले कर दो, वरना मैं शोर मचा दूंगी कि तुम ने मेरे साथ जबरदस्ती की है. फिर सारी जिंदगी जेल की चक्की पीसते रहना.’’

* एक लड़की ने एक पैसे वाले लड़के को फांस लिया. वैसे, उसे मालूम था कि उस लड़के की सगाई हो चुकी है और कुछ महीने बाद उस की शादी होने वाली है. लड़का भी उस लड़की के झांसे में आ गया.

लड़की ने लड़के को जिस्मानी संबंध बनाने के लिए उकसाया और मोबाइल फोन में उन पलों को कैद कर लिया. इस के बाद उस ने लड़के पर दबाव बनाया कि वह उसे 5 लाख रुपए दे, वरना वह यह वीडियो क्लिप उस की मंगेतर के पास भेज देगी. लड़के को मजबूर हो कर उसे पैसे देने पड़े.

आमतौर पर औरतों व लड़कियों को छलकपट से दूर ममतामयी माना जाता है, लेकिन इस की आड़ में कुछ शातिर औरतें व लड़कियां स्वांग रच कर मर्दों को अपने जाल में फांसती हैं.

किसी भी लड़की या औरत के माथे पर लिखा नहीं होता कि वह कैसी है. मर्द भावुक हो कर मदद का हाथ बढ़ाते हैं, बदले में मिलता है धोखा, इसलिए किसी भी अनजान लड़की या औरत को लिफ्ट देने या उस पर हद से ज्यादा यकीन करने से बचें. साथ ही, आप उस से चौकस रहें, वरना आप हवालात में होंगे और वह आप का तमाशा बनते देख मुसकरा रही होगी.                  

अब सबको एक होना पड़ेगा : लालू प्रसाद यादव

आप धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को एक प्लेटफार्म पर कैसे लाएंगे? पिछली बार मुलायम सिंह यादव को लाने में कामयाबी नहीं मिल सकी थी?

इस के लिए कोशिशें लगातार चल रही हैं और अब उस की स्पीड बढ़ा दी गई है. मैं और नीतीश कुमार इस के लिए सभी दलों से बात कर रहे हैं. बिहार में राजद, जद (यू) और कांग्रेस के महागठबंधन को मिली कामयाबी को अब नैशनल लैवल पर कामयाब कर के दिखाना है.

अगले साल 5 राज्यों में चुनाव होने हैं, इसलिए हम लोगों को तेजी से काम करना होगा. धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की ताकतों को उत्तर प्रदेश के चुनाव से सबक लेने की जरूरत है. वहां वोट के बंटवारे की वजह से भाजपा को फायदा मिल गया. आगे से ऐसा नहीं होने देना है.

आप को नहीं लगता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा को मजबूत किया है?

भाजपा की ताकत बढ़ी है और वोट भी बढ़े हैं, इस में कोई दोराय नहीं है. उन्हें कामयाबी अपनी ताकत की वजह से कम और समाजवाद और सामाजिक न्याय का झंडा उठाने वालों के बिखराव की वजह से ज्यादा मिली है. भाजपा ने तो दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में मिला कर ही तो जीत की राह आसान की.

आप को लगता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले सभी दल आसानी से एक मंच पर आ जाएंगे?

हम हार मानने वालों में नहीं हैं. समाजवादियों की सोच रही है कि वे आपस में लड़ते भी हैं और जब देश और समाज के हित की बात होती है, तो एकजुट भी हो जाते हैं. अब समय आ गया है कि विपक्ष एक मंच पर आ जाए, तभी भाजपा को धूल चटाई जा सकती है.

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