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अनूठे जायके अचार के

आम का हींग वाला अचार

सामग्री

500 ग्राम आम, 50 ग्राम नमक, 1 बड़ा चम्मच हलदी पाउडर, 1/4 बड़ा चम्मच हींग पाउडर, 11/2 बड़े चम्मच लालमिर्च पाउडर, 1/4 बड़ा चम्मच फौर्च्यून कच्ची घानी शुद्ध सरसों का तेल.

विधि

आमों को धो कर छील लें. फिर छोटेछोटे टुकड़ों में काट लें. एक कटोरे में आम के टुकड़ों में हल्दी पाउडर व नमक मिला कर कांच के जार में बंद कर 3-4 दिनों के लिए धूप में रखें. फिर इसे बाउल में निकाल कर मिर्च पाउडर, हींग व तेल (तेल को गरम कर ठंडा कर के मिलाएं) मिला कर वापस फिर जार में भर कर बंद कर 4-5 दिन धूप में रखें. आम का अचार तैयार हो जाएगा.

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बेबीकौर्न अचार

सामग्री

1 कप बेबीकौर्न, 2-3 हरीमिर्चें, 1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर, 1/4 छोटा चम्मच गरममसाला, 2 कलियां लहसुन कटी हुईं, 1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच नीबू का रस, 1/4 छोटा चम्मच राई पाउडर, 1/4 कप फौर्च्यून कच्ची घानी शुद्ध सरसों का तेल, नमक स्वादानुसार.

विधि

बेबीकौर्न धो कर 1 सैंटीमीटर के टुकड़ों में काट कर 1-2 मिनट तक पानी में उबाल लें. तेल गरम करें व बारीक कटा लहसुन, हरीमिर्चें व बाकी मसाले मिलाएं. अब इस में बेबीकौर्न व नीबू का रस मिलाएं. ठंडा कर जार में भर लें.

 

व्यंजन सहयोग : अनुपमा गुप्ता

फिल्म के ट्रेलर ने दिखाए फिल्म के दमदार डायलॉग्स

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर अभिनीत फिल्म 'टॉयलेट – एक प्रेम कथा' का ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है.

शुरुआत में तो ट्रेलर मजेदार है लेकिन बाद में ये सीरियस मोड़ ले लेता है. अक्षय कुमार की कुंडली में दोष और मांगलिक होने की वजह से पहले तो अक्षय की शादी एक भैंस से दिखाई गई है और बाद में जब उनकी शादी भूमि से होती है तो टॉयलेट बनवाने के लिए उनकी मुहिम भी शुरू हो जाती है. बहू जब शादी के बाद ससुराल आती है तो टॉयलेट न होने के कारण वह विरोध करती है और मायके लौट जाती है. ऐसे में अक्षय कुमार टॉयलेट बनवाने और अपनी पत्नी को घर वापस लाने का निश्चय करते हैं. ट्रेलर देखकर ही पता चलता है कि फिल्म के डायलॉग्स दमदार हैं.

इससे पहले अक्षय कुमार फिल्म के कई पोस्टर रिलीज कर चुके हैं. इन सभी पोस्टर्स में वो फिल्म से जुड़ा मैसेज शेयर करते नजर आए हैं.

ये फिल्म स्वच्छ भारत अभियान पर आधारित है. इसे श्री नरायण सिंह ने डायरेक्ट किया है. फिल्म में भूमि पेडनेकर अक्षय कुमार की पत्नी के रोल में नजर आएंगी.

रिलीज से पहले ही फिल्म काफी चर्चा में हैं. अक्षय कुमार ने फिल्म के सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. सेंसर बोर्ड के सदस्यों को भी फिल्म का ट्रेलर काफी पसंद आया है उन्होंने इसे टैक्स फ्री करने तक की डिमांड कर डाली. ये फिल्म 11 अगस्त को रिलीज हो रही है.

अब इन सबका भी बीमा करा सकते हैं आप…

आप ने सुना होगा कि लोगों ने अपने घर, कार और बाइक का इंश्‍यारेंस करवाया है. पर क्‍या आपने ऐसी सम्‍पत्ति का इंश्‍यारेंस करवाते हुए सुना है जो कि हमारे शरीर का ही कोई हिस्‍सा हो. मान लीजिए आप एक सिंगर हैं और आप ने अपनी आवाज ही खो दी तो ऐसे में आप क्‍या करेंगे?

कई ऐसे सेलिब्रिटी हैं जो कि अपने शरीर के कुछ अमूल्‍य हिस्‍से का इंश्‍योरेंस करवा चुके हैं. तो वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जिन्‍होंने अपनी प्रिय वस्‍तु का भी बीमा करवाया है. आपको यहां पर बताएंगे आप किस-किस अमूल्‍य वस्‍तु का इंश्‍योरेंस करवा सकते हैं :

शरीर के हिस्‍से का बीमा

कई बड़ी हस्तियां ऐसी हैं जिन्‍होंने अपने शरीर के अलग-अलग हिस्‍सों का इंश्‍यारेंस करवा रखा है. जिसमें बेट्टी डेविस की कमर और जूलिया रॉबर्ट्स की मुस्‍कान भी इसमें शामिल है. यहां तक कि कई ऐसे भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्‍होंने अपने शरीर के किसी हिस्‍से का बीमा करा रखा है. उदाहरण के तौर पर टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा और बॉक्‍सर विजेंद्र सिंह ने अपने हांथों का बीमा करवा के रखा है.

आवाज का बीमा

ऐसे कई लोग हैं जो संगीत को माता सरस्‍वती की देन समझते हैं. लता मंगेशकर उनमें से एक हैं. जैसे कि आप सब जानते हैं कि वह भारत की बहुत बड़ी गायिका हैं. इन्‍होंने अपनी आवाज का इंश्‍योरेंस करवाया है. तो वहीं साउथ के सुपरस्‍टार रजनीकांत ने भी अपनी आवाज का बीमा कराया हुआ है.

पालतू जानवरों का बीमा

ऐसे कई लोग हैं जो घर के पालतू जानवरों को इंसानो जैसे प्‍यार और सम्‍मान देते हैं. पेट्स के खोने, बीमार होने जो दवाइयों के खर्चे होते हैं उन सबके लिए बीमा होता है. तो वहीं अगर आपका डॉग किसी को काट लिया है तो भी उसके दवाई के लिए आपको इंश्‍योरेंस पॉलिसी मिलती है. तो अगर आपके पास कोई पालतू जानवर है तो आप उसका इंश्‍योरेंस अवश्‍य करवाएं.

शादी का बीमा

शादियों के दौरान होने वाले खर्चे, कोई अनिश्चित घटना, चोरी, एक्‍सीडेंट या कोई प्राकृतिक आपदा आने पर आपको इस गम से उबारने के लिए भी इंश्‍योरेंस पॉलिसी ली जा सकती है. भारत में शादी करना सबसे मंहगा कार्य होता है लेकिन किसी कारण से शादी कैंसिल हो जाए तो वर और वधु दोनों पक्षों में एक आर्थिक परेशानी आ जाती है जिसे कवर करने के लिए लोग आजकल इंश्‍यारेंस करवाते हैं.

कौन बनेगा करोड़पति इंश्‍योरेंस

सोनी चैनल पर आने वाले प्रोग्राम कौन बनेगा करोड़पति से हर कोई वाकिफ है. पर आप में से एक दो लोग ही यह जानते होंगे कि इस लाइव शो का भी इंश्‍योरेंस है. इसकी जो प्राइज मनी होती है वह इंश्‍योरेंस के ही अंतर्गत आती है. जब कोई प्रतिभागी इस शो को जीतता है तब बीमा एजेंसियों द्वारा शो के प्रोड्यूसर को पैसे देने होते हैं. इसलिए जब कभी भी आपको यह लगे कि आपके लिए कोई एक चीज बहुत महत्‍वपूर्ण और कीमती है तो आपको इस चीज का बीमा अवश्‍य करा लेना चाहिए.

लाल बजरी के बादशाह की बादशाहत बरकरार

लाल बजरी के बादशाह राफेल नडाल ने रोलां गैरां पर अपनी ख्याति के अनुरूप प्रदर्शन करते हुए स्विटजरलैंड के स्टैन वावरिंका को एकतरफा फाइनल में आसानी से हराकर रिकॉर्ड बनाया. राफेल नडाल ने दसवीं बार फ्रेंच ओपन टेनिस टूनार्मेंट का पुरूष एकल खिताब जीता.

स्पेनिश खिलाड़ी नडाल ने वावरिंका को 6-2, 6-3, 6-1 से हराया और इस तरह से दुनिया के पहले पुरुष खिलाड़ी बने जिन्होंने एक ही टूनार्मेंट को रिकॉर्ड दस बार जीता हो. अपना 22वां ग्रैंडस्लैम फाइनल खेल रहे नडाल ने फ्रेंच ओपन में तीसरी बार बिना सेट गंवाए खिताब जीता. उन्होंने केवल 35 गेम गंवाए और इनमें फाइनल के केवल छह गेम शामिल हैं.

फाइनल में 31 साल के नडाल और 33 साल के वावरिंका आमने सामने थे लेकिन स्पेनिश खिलाड़ी ने शुरू से अपना दबदबा बनाये रखा और आखिर तक उसे बरकरार रखा. 1969 के बाद पहली बार फाइनल में 30 साल से अधिक उम्र खिलाड़ी खेले

यह 1969 के बाद पहला अवसर था जबकि फाइनल में 30 साल से अधिक उम्र के दो खिलाड़ी खेल रहे थे. वावरिंका को पहले सेट के तीसरे गेम में बे्रक प्वाइंट का मौका मिला था लेकिन इसके बाद नडाल ने पूरे मैच में उन्हें आगे ऐसा कोई अवसर मुहैया नहीं कराया. 

वावरिंका ने शुरू में नडाल को टक्कर देने की कोशिश की. उन्होंने चौथे गेम में चार ब्रेक प्वाइंट बचाये और स्कोर 2-2 से बराबर किया. नडाल ने हालांकि इसके बाद आसानी से अपनी सर्विस पर अंक बनाया और फिर वावरिंका की सर्विस तोड़कर 4-2 से बढ़त हासिल कर ली. वावरिंका ने अपनी सर्विस पर फोरहैंड बाहर मारकर 17वीं बार अपनी गलती से अंक गंवाया. इससे नडाल ने 44 मिनट में यह सेट अपने नाम किया.

नडाल ने दूसरे सेट की शानदार शुरुआत की. उन्होंने अपने करारे फोरहैंड से वावरिंका को चौका दिया और तब उनके पास तीन ब्रेक प्वाइंट थे. वावरिंका ने इसके बाद अपना फोरहैंड नेट पर मार दिया जिससे नडाल ने 2-0 की बढ़त हासिल कर ली. नडाल ने इसके बाद भी अपनी सर्विस में कोई गलती नहीं की और आसानी से दूसरा सेट भी जीता. वावरिंका की खीक्ष साफ दिख रही थी और उन्होंने इस मैच अपना रैकेट भी नीचे पटका.

तीसरे सेट के पहले गेम में नडाल ने फिर से 2015 के चैंपियन वावरिंका की सर्विस तोड़ी. इसके तुरंत बाद नडाल के पास दो ब्रेक प्वाइंट थे जिससे उन्होंने स्कोर 4-1 कर दिया. इसके बाद उन्होंने अपनी सर्विस बचाये रखी और जब स्विस खिलाड़ी ने अपना बैकहैंड नेट पर मारा तो नडाल ने इतिहास रच दिया.

इस बीच महिला युगल के फाइनल में अमेरिका की बेथानी माटेक सैंडस और चेक गणराज्य की लूसी सैफरोवा की शीर्ष वरीयता प्राप्त जोड़ी ने एशलीग बाटीर् और कैसे डेलेक्वा की गैर वरीय आस्ट्रेलियाई जोड़ी को 6-2, 6-1 से हराकर खिताब जीता.

क्या ये बॉलीवुड सितारे नहीं जानते ‘डरना मना है’

पर्दे पर बोल्ड नजर आने वाले हमारे बॉलीवुड स्टार्स का कॉन्फिडेन्स देख कर लगता ही नहीं कि वे किसी चीज़ से डरते भी होंगे, लेकिन वे भी हमारी तरह हैं तो इंसान ही. डर तो उन्हें भी लगता ही होगा. उनमें से कुछ तो किसी-किसी चीज से इतना डरते हैं कि उन्हें उन चीजो का फोबिया तक हो गया है.

आज हम आपको कुछ बॉलीवुड सितारों के ऐसे फोबियाज बता रहे हैं, जिनके नाम से ही उनका शरीर डर के मारे कांपने लगता है.

अभिषेक बच्चन को है फलों का फोबिया

कहते हैं कि बॉलीवुड में लोग हमेशा जवां और अच्छा दिखने के लिए फल खूब फल खाया करते हैं, लेकिन आपको जान कर हैरानी होगी कि अभिषेक बच्चन ने बचपन से ले कर आज तक कभी कोई फल नहीं खाया, क्योंकि उन्हें फलों का फोबिया है. अब ये कैसा फोबिया हुआ.

रणबीर कपूर कॉकरोच से डरते हैं

वैसे तो कॉकरोच से डरने के लिए लड़कियां ही पहले नंबर पर आती हैं, पर बॉलीवुड में एक क्यूट हीरो ऐसे भी हैं, जिसकी कॉकरोच देखते ही चीख निकल जाती है और वे उसे देखकर भाग खड़े होते हैं. वो नाम है रणबीर कपूर.

क्या रणबीर, अब आपकी इतनी सारी प्रशंसक लड़कियों को कॉकरोच से कौन बचाएगा, जब आप ही पहले उन्हें देखकर निकल लेंगे तो?

सांप का नाम सुन कर ही डर जाती हैं अभिनेत्री दीपिका पादुकोण

सांपों से तो हर कोई डरता है, लेकिन दीपिका पादुकोण को इसका इतना फोबिया है कि उनके सामने तो सांप का नाम लेना भी खतरनाक हो सकता है.

शाहरुख खान घोड़ों से डरते हैं

शाहरुख खान घोड़ों से इतना डरते हैं कि अपने इस फोबिया की वजह से फिल्मों में घोड़ों के साथ सीन करने से बचते हैं.

आलिया भट्ट को डरा देता है अंधेरा

बहुत-से लोगों की तरह ही बॉलीवुड की क्यूट अभिनेत्री आलिया भट्ट को भी अंधेरे का फोबिया है. रात में बिना हल्की रोशनी और थोड़ा-सा दरवाजा खोले बिना वे सो नहीं पातीं हैं. वैसे आलिया, आपका ये डर भी आपकी ही तरह बेहद क्यूट है.

कभी हाथ से खाना नहीं खाते अजय देवगन

कोई रोटी या पूड़ी भी हाथ की जगह फोक (चम्मच) से खाए, तो कितना अजीब लगेगा! अजय देवगन तो कुछ ऐसा ही करते हैं, क्योंकि उन्हें हाथ में खाना लगने से डर लगता है. अजय आप अपना ये डर हम सभी को समझा पाएं तो मेहरबानी होगी.

लिफ्ट से डरती हैं सोनम कपूर

सोनम कपूर कितनी भी ऊंची मंजिल की सीढ़ियां चढ़ जाएंगी, लेकिन कभी भी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करतीं.

अब ये क्या, पंखे से डरते हैं अर्जुन कपूर

अर्जुन कपूर सीलिंग फैन से इतना डरते हैं कि उनके घर की छत से कहीं पंखा लटका ही नहीं मिलेगा. घर से बाहर भी वे पूरी कोशिश करते हैं कि उन्हें पंखे के नीचे न सोना पड़े. अर्जुन, क्या पंखा आपकी जान ले लेगा ?

अपनी ही हंसी से डर जाती हैं बिपाशा

चलिए बाकी सारे फोबियाज तो समझ आते हैं, पर ये क्या है. अपनी ही हंसी से कौन डरता है? बोल्ड और खूबसूरत बिपाशा बासु अपनी ही हंसी से डर जाती हैं.

हर फिल्म में पोलीटिकल एंगल डालता हूं : कबीर खान

डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाते हुए जबरदस्त शोहरत बटोरने के बाद ‘काबुल एक्सप्रेस’ व ‘न्यूयार्क’, ‘एक था टाइगर’, ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी फिल्मों से फीचर फिल्मों के निर्देशन में उतरने वाले कबीर खान लगातर सफलता की ओर अग्रसर हैं. ‘एक था टाइगर’ के बाद सलमान खान के साथ उनकी दूसरी फिल्म ‘‘बजरंगी भाईजान’’ को मिली अभूतपूर्व सफलता से उत्साहित कबीर खान अब सलमान खान के साथ ‘‘ट्यूब लाइट’’ लेकर आ रहे हैं. मजेदार बात यह है कि कबीर खान का दावा है कि वह बाक्स आफिस के आंकड़ों को ध्यान में रखकर फिल्में नहीं बनाते हैं.

आपकी हर फिल्म में पोलीटिकल एंगल होता है. आखिर आपकी राजनीति की समझ क्या है?

– इसकी कई वजहें हैं. मेरे पिता दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फाउंडर पोलीटिकल साइंस प्रोफेसर रहे हैं. वह 12 साल तक राज्य सभा के नोमीनेटेड सदस्य रहे. यानी कि राजनीति के माहौल में ही पला बढ़ा हूं. हमारे घर के डायनिंग रूम में राजनीति पर ही चर्चा होती रहती थी. पिता के दोस्त व उनके आस पास के सभी लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय लोग थे. जब हम खाने पर बैठते थे, तो हमारी बातचीत फिल्मों के बारे में नहीं होती थी. बल्कि मुल्क व पूरे विश्व में क्या हो रहा है, उस पर चर्चा हुआ करती थी. इसलिए पोलीटिकल प्रस्पेक्टिव मेरे दिमाग में आ गया. हर चीज, हर बात को पोलीटिकली देखने का एक नजरिया बन गया. फिर जब मैंने डाक्यूमेंट्री बनानी शुरू की, तो कई पत्रकारों के साथ काम किया. मुझ पर सईद नकवी ने बहुत यकीन किया. सईद नकवी के साथ मैंने साठ सत्तर मुल्क घूमे हैं. उनके साथ मैने कई पोलीटिकल फीचर किए. इसकी वजह से मेरा एक होराइजन बढ़ गया. इसी के चलते मुझे विश्व राजनीति की समझ हो गई.

हम लोग विश्व की राजनीति को ‘बीबीसी’ और ‘सीएनएन’ देखकर उसी को सच मानकर चलते हैं. पर जब आप जमीनी सतह पर पहुंचकर देखते हैं, तो कुछ और ही सच पाते हैं. तब आपकी समझ में आता है कि हर चीज का एक प्रस्पेक्टिव होता है. हर चैनल का अपना एक प्वाइंट आफ व्यू होता है. ‘अल जजीरा’ का अपना प्वाइंट आफ व्यू है. जबकि एक जमाना वह था, जब ‘बीबीसी’ ने जो कह दिया, वही अटल सच माना जाता था. तो विश्व में घूमते हुए मुझे समझ में आया कि जो बीबीसी या सीएनएन बोलता है, वही सच नहीं होता है. फिर मेरे दिमाग में आया कि ज्यादा से ज्यादा इवेंट पर जाया जाए, जमीनी सच्चाई अपनी नजरों से देखी व समझी जाए. तो जो कुछ चैनलों पर बताया जाता है और जो कुछ हकीकत में हो रहा होता है, उसमें ‘गैप’ होता है. मेरी फिल्मों में उस ‘गैप’ की कहानी होती है. कौन सी कहानी कही जाए और कौन सी नहीं, के बीच के गैप की कहानी को मैने अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया. उस गैप की कहानी ‘काबुल एक्सप्रेस’ है. उस गैप की ही कहानी ‘न्यूयार्क’ है. ‘एक था टाइगर’, ‘फैंटम’ सहित मेरी हर फिल्म है. यही मूल वजह है कि मेरी हर फिल्म में पोलीटिकल कंटेंट होता है.      

पोलीटिकल माहौल में परवरिश होने के बावजूद आपने सिनेमा में करियर बनाने की बात क्यों सोची?

– मेरी राय में हम सभी पोलीटिकल इंसान हैं. हर इंसान की एक आइडियोलाजी होनी चाहिए. मैंने कभी भी सक्रिय राजनीति के बारे में नही सोचा. पर हम चाहे जो काम करें, उसमें एक पोलीटिकल नजरिया आएगा ही आएगा. मैं पहले डाक्यूमेंटरी बना रहा था. पर एक दिन मैने महसूस किया कि इसे कोई देखता नहीं है. डाक्यूमेंट्री फिल्मों का कोई दर्शक नहीं है. मेरी बात जिन तक पहुंचती है, वह वही हजार पांच सौ लोग हैं, जो मेरी बात से सहमत हैं. तो फिर इनके लिए डाक्यूमेंट्री क्यों बनायी जाए?

मैं चाहता था कि ऐसा सशक्त माध्यम हो, जिसके द्वारा आप कोई बात कहें, तो पूरे विश्व तक पहुंच जाए, तब मुझे सिनेमा ही एकमात्र माध्यम नजर आया, इसलिए मैं सिनेमा से जुड़ा. मुझे लगता है कि यदि हम किसी बात पर सशक्त रूप से यकीन करते हैं, तो उसके बारे में बात की जानी चाहिए. हम वह बात सिनेमा में कर सकते हैं. हो सकता है कि कुछ लोगों को हमारी बात पसंद आए या कुछ लोगों को न आए. हर फिल्म में फिल्मकार को अपना नजरिया डालना चाहिए. जिन चीजों से आपको दिक्कत है, उनके बारे में सिनेमा में बात करनी चाहिए.

आपने फिल्मों में पोलीटिकल एंगल पिरोने की बात क्यों सोची?

– पहले जब मैं फिल्में देखता था, तो मुझे दिक्कत होती थी कि अरे इसमें कुछ पोलीटिकल कंटेट क्यों नहीं डाल दिया. जब मैने मणि रत्नम की फिल्में देखीं, तो उनमें कंटेंट पाया. मणि रत्नम की फिल्मों में पोलीटिकल पृष्ठभूमि के साथ अच्छी कहानी होती है. तो जब मुझे मेनस्ट्रीम सिनेमा करने का अवसर मिला, तो मैंने हर फिल्म में पोलीटिकल कंटेंट पिरोया. मैं अपनी फिल्म में राजनीति इस तरह से पिरोता हूं कि फिल्म राजनीति के बारे में नहीं किरदारों के बारे में होती है. जिन दर्शकों को राजनीति के बारे में कुछ नहीं पता होता है, वह फिल्म के किरदारों को फालो करते हैं. मेरी ज्यादातर फिल्में कमर्शियली सफल रही हैं, इसके मायने हैं कि यह सब दर्शकों को अच्छा लगता है.

इस वक्त की देश की राजनीति को लेकर आपकी अपनी क्या सोच है?

– सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हमारे देश में क्या हो रहा है? मेरी फिल्म ‘‘बजरंगी भाईजान’’ के संदर्भ में लोग कहते हैं कि यह फिल्म भारत व पाक की बार्डर/सीमा के बारे में है. जबकि हकीकत में मेरी फिल्म ‘‘बजरंगी भाईजान’’ हमारे अंदर क्या हो रहा है, उसकी बात करती है. यदि आप इंटरवल के पहले देखें, तो यह कहानी भारत के अंदर बनी सीमाओं के बारे में है. भारत व पाक के बीच तो एक अंतरराष्ट्रीय सीमा है. जबकि हमने खुद अपने मुल्क में कई सीमाएं पैदा कर रखी हैं. एक दूसरे की कम्यूनिटी के बीच में, वह मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. दुर्भाग्य की बात यह है कि मैं आजकल देख रहा हूं कि देश के अंदर बार्डर बढ़ते जा रहे हैं. हर चीज में सीमा हो गयी है. पहले धर्म को लेकर सीमा थी. अब तो तुम खाते क्या हो, उसको लेकर भी सीमा/बार्डर खींचा गया है. तुम यह नारा बोलते हो या नहीं, उस पर एक बार्डर हो गया है. हर चीज में कैसे बार्डर हो सकता है. जिस मुल्क में मैं बड़ा हुआ हूं, और अब जिस तरह का मुल्क है, वह देखकर काफी दिक्कत होती है. मेरे जेहन में सवाल उठते हैं कि यह कैसे हुआ? कब हुआ?

आप जो कुछ कह रहे हैं, उसकी वजहें सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ है या कुछ और?

– सब पोलीटिकल है. आम लोगों में ऐसा नहीं है. राजनीतिक रूप से यह सब क्रिएट किया जाता है. उसकी वजह से फिर लोगों के अंदर असुरक्षा की भावना आती है. नकारात्मक भाव आते हैं. मसलन-‘जयश्री राम’ को लें. हमने बचपन में ‘जय श्री राम’ को धर्म के रूप में देखा ही नहीं. यह तो अभिवादन का एक प्रतीक हुआ करता था. मैं तो दिल्ली की रामलीलाओं में हनुमान का किरदार निभाया करता था. उस वक्त हर लड़का हनुमान बनना चाहता था, राम कोई नहीं बनना चाहता था. जब मैंने अपनी पिछली फिल्म का नाम ‘‘बजरंगी भाईजान’’ रखा, तो कइयों ने टोका था कि यह नगेटिव भाव है. लोगों ने गुजरात का संदर्भ याद दिलाया. मैंने उनसे कहा कि जो हो गया, सो हो गया. मेरे लिए ‘बजरंगी’ पाजीटिव हैं. क्योंकि हनुमान तो लायलिटी और बड़े दिल के साथ खड़े रहते हैं.

‘बजरंगी भाईजान’ के रिलीज के बाद लोगों ने क्या कहा?

– इस फिल्म में हमने जो कुछ कहा वह बात कुछ लोगों तक पहुंची. कुछ लोगों तक नहीं पहुंची. एक ही तरह का संदेश हर इंसान को खुश नहीं कर सकता. मुझे खुशी है कि इस फिल्म को बड़ा प्यार मिला. मैं यह मानकर चलता हूं कि एक फिल्म समाज में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं ला सकती. फिल्म कुछ समय के लिए कुछ लोगों को सोचने पर मजबूर कर सकती है. कुछ पाकिस्तानियों ने मुझसे कहा था कि फिल्म देखने के बाद उनकी सोच बदली है. अब कोई भारतीय मिलेगा तो वह उसके गले लगेंगे. अब यह सोच उनकी कितनी देर रही, उसका दावा तो नहीं कर सकता. वास्तव में आज के जमाने में हमारे न्यूज चैनल बहुत लाउड व अग्रेसिव हो गए हैं. ऐसे में सिनेमा ही सबसे बड़ी ताकत बचती है, जिसके माध्यम से हम कुछ कह सकते हैं. बालीवुड में हमें काउंटर प्वाइंट देना चाहिए. वैसे यही हालत पाकिस्तानी न्यूज चैनलों की भी है. वह वहां भोंकते रहते हैं और हमारे चैनल यहां भोंकते रहते हैं.

न्यूज चैनलों की इस हालत की वजह क्या है? आप तो पहले काम कर चुके हैं?

– टीआरपी का फंडा. दर्शक जुटाने का मसला. यदि आप लाउड हैं या सेंसेनल हैं, तो दर्शक ज्यादा मिल जाते हैं. मैं इन्हे न्यूज चैनल नहीं बल्कि ‘लो कास्ट रियालिटी मनोरंजक चैनल’ मानता हूं. वह मनोरंजन ही करते हैं. न्यूज चैनलों पर जो बहस होती है, उसे आप सुन नहीं सकते.

आपकी नई फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ क्या है?

– यह अंग्रेजी फिल्म ‘‘लिटिल ब्वाय’’ का भारतीय करण हैं. जिसमें दो भाईयों लक्ष्मण व भरत की कहानी है.

अंग्रेजी फिल्म ‘‘लिटिल ब्वाय’’ देखकर किस बात से प्रभावित हुए कि आपने उसे हिंदी में ‘‘ट्यूबलाइट’’ के नाम से बनाने की बात सोची?

– यह बहुत ही अद्भुत बात है. 2-3 हालीवुड स्टूडियो मेरे साथ काम करना चाहते थे. उन्होंने मेरे सामने सारी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का लंबा चौड़ा कैटलाग रखते हुए कहा कि मैं इसमें कोई भी फिल्म चुन सकता हूं. 15-20 दिन तक मैंने कुछ फिल्मों के नाम, उनकी कहानी वगैरह पढ़ी. अंत में मैंने कहा कि मुझे कोई भी पसंद नहीं है. क्योंकि मुझे लगा कि यह फिल्में भारतीय परिवेश में ढाली नहीं जा सकती. इन फिल्मों में ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जिससे भारतीय रिलेट करें.

अचानक मुझे एक छोटी सी फिल्म ‘लिटिल ब्वाय’ का ट्रेलर देखने का मौका मिला, जो कि बाइबल के बारे में हैं. मैं धर्म को लेकर बहुत ज्यादा नहीं सोचता. फिर एक दिन मेरे सहायक ने ‘लिटिल ब्वाय’ देखने के लिए दे दी. यह फिल्म एक छोटे बच्चे और बाइबल के बारे में है. फिल्म देखकर मुझे लगा कि इसे भारतीय परिवेश में बदला जा सकता है. कुछ चरित्र बदले जाएंगे. फिर इस फिल्म के अधिकार खरीदकर उसे हमने अपनी कहानी बनायी. अब हमने जो फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ बनायी है, वह हमारे लिए आज के माहौल में बहुत रिलीवेंट है.

पर फिल्म की कहानी तो 1962 भारत चीन की पृष्ठभूमि में है?

– जी हां! लेकिन मुद्दे आज के हैं. मैं फिल्म की कहानी बताना नहीं चाहता. पर उस वक्त कुछ चीजें हुई थीं, जो आज भी ज्यों की त्यों हैं. 1962 में जंग की वजह से लोगों की पहचान पर सवाल खडे किए गए थे. उनकी लायलिटी पर सवाल किए गए थे. आज के माहौल में भी वही हो रहा है. आज हमसे हमारी भारतीयता को साबित करने को कहा जा रहा है. सवाल किया जा रहा है कि हम हिंदुस्तानी क्यों हैं? मेरी राय में यदि मैं अपने आपको हिंदुस्तानी समझता हूं, तो किसी को इस बात से क्या मतलब है कि मैं क्या खाता हूं? क्या पहनता हूं? या मैं किस जबान में बात करता हूं. मैं खुद को दिल से हिंदुस्तानी मानता हूं. ऐसे में आपको हिंदुस्तानी हूं या नहीं, यह सवाल करने का हक नही बनता है. यह बहुत बड़ा मुद्दा है. एक देश की महानता यह होती है कि उस देश के नागरिक देश में जो कुछ हो रहा है, उस पर सवाल कर सकें? यदि हम ऐसा नही करते हैं? तो फिर हममें और उत्तर कोरिया में क्या फर्क रहा? मेरी राय में कोई भी सरकार एक देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती है. हमारा मुल्क 6000 साल पुराना है. हर सरकार पांच साल के लिए आती है. इसलिए कोई भी सरकार इंडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती. वह उस वक्त की रूलिंग पार्टी हो सकती है.

सरकार हिंदुस्तान का प्रतिनिधित्व नहीं करती है. यह बात फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ में किस तरह से है?

– इसके लिए मुझे फिल्म की कहानी बतानी पड़ेगी, जो कि फिलहाल उचित नहीं होगा. फिल्म में कुछ संवाद, कुछ सीन हैं, जहां यह सारी बातें आएंगी. मैं अपनी हर फिल्म में पालीटिक्स को कई लेयर में लेकर आता हूं. आखिर हमारी फिल्म मेनस्ट्रीम की फिल्म है.

फिल्म में युद्ध बंदियों को लेकर कोई बात कही गयी है?

– फिल्म की पृष्ठभूमि में युद्ध जरूर है, पर फिल्म में युद्ध नहीं है. युद्ध की वजह से हमारे समाज में क्या होता है? उसकी कहानी है. हमारी फिल्म ‘ट्यूब लाइट’ जवानों/सैनिकों के परिवारों को समर्पित है. देखिए, जवान या सैनिक सीमा पर युद्ध लड़ने जाता है, उसी वक्त उसका पूरा परिवार भी युद्ध लड़ता है. सैनिक के जाने के बाद उसके खानदान को किस तरह का युद्ध लड़ना पड़ता है, उसकी कहानी है हमारी फिल्म ‘ट्यूब लाइट’.

आप डाक्यूमेंट्री फिल्ममेकर के रूप में संतुष्ट थे या फीचर फिल्ममेकर के रूप में?

– मैं दोनों जगह संतुष्ट हूं. डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के रूप में अलग रोमांच है. मैं अफगानिस्तान में कई माह रहा हूं. छिपछिपकर शूटिंग करता था. हम कैमरा खोलते थे, पर हमें पता नहीं होता था कि हमारे साथ क्या होने वाला है. तो उसका अलग रोमांच था. फीचर फिल्मों में तो सब कुछ सुनियोजित तरीके से होता है. तो दोनों जगह अलग रोमांच है. अलग क्रिएशन है. डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के रूप में मैं 70 देश घूमा हूं. डाक्यूमेंट्री फिल्मकार के रूप में मुझे ढेर सारा रॉ मैटेरियल मिला, ढेर सारी कहानियां मिली. अब वही रॉ मैटेरियल मेरी फिल्मों की कहानी का हिस्सा होती हैं.

आपने सुभाष चंद्र बोस की आर्मी ‘आजाद हिंद फौज’ पर एक डाक्यूमेंट्री बनायी थी. अब आप उसी पर वेब सीरीज बना रहे हैं?

– बीस वर्ष पहले जब मैं डाक्यूमेंट्री बना रहा था, तो मैंने ऐसी कहानी देखी कि वह कहानी मेरे जेहन से आज तक नहीं उतरी. तो मैंने सोचा कि अब इस पर वेब सीरीज बनायी जाए. मैंने रीयल बैकड्राप पर कुछ किरदार रचे हैं. यह बहुत ही फैसिनेटिंग कहानी है. यह ऐसी कहानी है, जिसे हम लोग जानते नहीं हैं. उनकी आर्मी में जंग लड़ने वाले 55000 पुरुष और औरतें कौन थी? जो कि आजादी के लिए ब्रिटिश सैनिकों के खिलाफ युद्ध के मैदान में कूद गए? झांसी की रानी रेजीमेंट की वह औरतें कौन थी, जिन्होंने भारत नहीं देखा था. वह तो सिंगापुर, मलेशिया, बर्मा की थीं. आज तक किसी भी सेना में महिला इंफीनिटी नहीं रही है. तो यह वेब सीरीज हाई रोमांच पैशन रोमांस की कहानी है. यह कहानी आजाद हिंद फौज के सैनिकों की हैं, पर कहीं न कहीं सुभाष चंद्र बोस की भी मौजूदगी रहेगी.

सिनेमा के बदलाव को किस तरह से देखते हैं?

– बहुत अच्छा बदलाव है. उसी बदलाव का नतीजा है फिल्म ‘बाहुबली’. ‘बाहुबली’ हिंदी में डब फिल्म है. बाहुबली के स्टार इसके निर्देशक एस एस राजमौली हैं. लोग निर्देशक के विजन को नमस्कार कर रहे हैं. मैं इसे सकारात्मक विकास मानता हूं. अब कंटेंट आधारित छोटे बजट की फिल्में चलने लगी हैं. ‘दंगल’ जैसी फिल्म चीन में भी कमा रही हैं. जब ‘बजरंगी भाईजान’ बन रही थी, तो लोगों ने कहा था कि सलमान खान हैं, तो उनसे एक्शन करवाना चाहिए. सलमान खान को शर्ट उतारना चाहिए. पर हमने अपनी फिल्म में ऐसा नहीं दिखाया. अब तक ‘बजरंगी भाईजान’ सलमान खान की सबसे ज्यादा सफल फिल्म है. सच यह है कि अब दर्शक कहानी को महत्व देने लगा है.

एक ही क्रीज पर पहुंच गए दोनों बल्लेबाज और फिर..

आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान दक्षिण अफ्रीकी पारी के दौरान ऐसा मौका आया जब दोनों बल्‍लेबाज एक ही छोर पर पहुंच गए. यह घटनाक्रम कुछ इस तरह हुआ कि मैदान पर मौजूद दर्शकों के चेहरे पर भी हंसी छूट गई.

टीम इंडिया ने इस दौरान रनआउट की अपील की तो अम्‍पायर को भी यह फैसला करने में कुछ वक्‍त लग गया कि आखिरकार एक ही एंड पर पहुंचे बल्‍लेबाजों में से कौन रनआउट हुआ है. दोनों अम्‍पायरों ने विचारविमर्श के बाद दक्षिण अफ्रीकी बल्‍लेबाज डेविड मिलर को रन आउट घोषित किया. मिलर केवल एक रन बना सके.

दक्षिण अफ्रीका की बल्‍लेबाजी के दौरान यह वाकया पारी के 25वें ओवर में हुआ. ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन की गेंद को फॉफ डुप्लेसिस ने शॉर्ट थर्डमैन की तरफ खेला. वे पहले तो रन के लिए दौड़े, लेकिन बुमराह को तेजी से गेंद पर झपटते देख उन्होंने अपना इरादा बदल लिया. इस बीच नॉन स्ट्राइकर छोर से मिलर आधी पिच तक पहुंच चुके थे. उनके पास पलटने का कोई मौका नहीं था इसलिए वे सामने की तरफ दौड़ते रहे.

इस बीच फॉफ डुप्लेसिस भी पलटे और अपनी क्रीज में वापस लौटने के लिए दौड़े. इस मामले में डुप्लेसिस भाग्यशाली रहे कि वे समय रहते मिलर से पहले क्रीज मे पहुंच गए थे, इसलिए मिलर को रन आउट होकर पेवेलियन वापस लौटना पड़ा.

भारतीय टीम ने रोमांचक मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को हरा कर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली है. साउथ अफ्रीका ने टीम इंडिया को जीत के लिए 192 रनों का लक्ष्य दिया था. जिसके जवाब में टारगेट का पीछा करते हुए भारत ने 38 ओवर में ही 193 रन बना लिए और ये मैच 8 विकेट से अपने नाम कर लिया.

डेविड मिलर और फॉफ डू प्लेसिस के एक ही 'छोर' पर पहुंचने की वजह से इंजमाम के रन आउट होने से जुड़ी यादें एक बार फिर ताजा हो गई.

इंजमाम वनडे करियर में 40 बार रन आउट हुए हैं, तो कई बार उन्होंने अपने पार्टनर को 'रन आउट' होकर पैवेलियन लौटने पर मजबूर किया. जोंटी रोड्स का 1992 वर्ल्ड कप ऐतिहासिक रन आउट क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में हमेशा रहता है, तो कई ऐसे फनी मोमेंट भी आए, जब इंजमाम का रन आउट होना क्रिकेट मैदान पर 'कॉमेडी सर्कस' जैसा नजारा बन गया.

जब बिना गिल्लियों के खेला गया अंतरराष्ट्रीय मैच

क्रिकेट के मैदान में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता है. ऐसा ही वाक्या सामने आया जब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में मैच बिना गिल्लियों के खेला गया.

गली क्रिकेट में गिल्लियां ना हो या स्टंप ही ना हो तो कोई खास बात नहीं होगी. लेकिन हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मैच खेला गया जिसमें स्टंप के ऊपर गिल्लियों यानि बेल्स ही नहीं रखी गईं.

दरअसल, यह मुकाबला 9 जून 2017 को वेस्टइंडीज और अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम के बीच खेला गया. इस मुकाबले में एक समय में जोरों से हवा चल रही थी जिसके कारण गिल्लियों का स्टंप पर टिकना मुमकिन ही नहीं हो पाया था. इसके चलते स्टंप से गिल्लियों को हटा दिया गया और बिना गिल्लियों के ही मैच खेला गया.

इस मैच में वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज अलजारी जोसेफ 20वां ओवर फेंक रहे थें. तभी तेज हवा चली और विकेट की गिल्लियां गिर गईं. इसके बाद अंपायर ने बिना गिल्लियों के ही मैच को जारी रखने को कहा. तब 20वें ओवर की दूसरी गेंद से दोनों तरफ के विकेट पर गिल्लियां मौजूद नहीं थी.

बता दें कि नियमों के मुताबिक तेज हवा के चलने पर बिना बेल्स के मैच खेला जा सकता है. अगर अंपायर्स बिना बेल्स के मैच जारी रखने का फैसला लेते हैं तो ऐसी स्थिति में रन आउट या स्टंपिंग होने पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी अंपायर की ही होती है.

बता दें कि नियमों के मुताबिक तेज हवा के चलने पर बिना बेल्स के मैच खेला जा सकता है. अगर अंपायर्स बिना बेल्स के मैच जारी रखने का फैसला लेते हैं तो ऐसी स्थिति में रन आउट या स्टंपिंग होने पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी अंपायर की ही होती है.

मैच में अफगानिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 50 ओवर में 6 विकेट खोकर 212 रन बनाए. जावेद अहमदी ने 102 गेंदों में 8 चौके और 2 छक्कों की मदद से 81 रन की पारी खेली. उनके अलावा मोहम्मद नबी ने 27 और शमिउल्ला शेनवारी ने 22 रन बनाए.

वहीं मेजबान टीम की ओर से शाई होप ने 63 गेंदों में 35 रन की पारी खेली उनके अलावा जोसेफ ने 27 रन बनाए मगर ये टीम को जीत नहीं दिला सके. वेस्टइंडीज 44.4 ओवर में महज 149 रन पर ही सिमट गई. अफगानिस्तान की ओर से राशिद खान ने 18 रन देकर सबसे अधिक 7 विकेट झटके. मेजबान टीम विंडीज इस मैच को 63 रन से हार गई.

कहीं आपके फोन का डेटा भी तो नहीं हो रहा चोरी?

अगर आप अपने फोन में जरूरी डेटा सेव करके रखते हैं तो उसमें नंबर लॉक लगा कर रखें ताकि कोई भी अंजान व्‍यक्ति आपकी पर्सनल फोटो और डेटा को देख न सके. एक बात का ध्यान आपको हमेशा रखना चाहिए कि जरूरत न पड़ने पर फोन की सेटिंग को ऑफ रखें जैसे ब्‍लूटूथ, वाईफाई आदि. कई फोन हैकर्स ऐसे लोगों को अपना शिकार बनाते हैं, जिनके फोन में वे आसानी से घुस सकें.

अगर आप अपने फोन में ब्‍लूटूथ, वाईफाई का प्रयोग नहीं करते हैं तो ये सभी फीचर ऑफ रखें क्‍योंकि इन्‍हीं सर्विसेज की मदद से हैकर आपके फोन का डेटा चुराते हैं.

हर एप्‍लीकेशन डाउनलोड न करें

किसी के भी कह देने पर अपने फोन में ऐसी वैसी कोई एप्‍लीकेशन न डाउनलोड कर लें, क्‍योंकि हो सकता है वो एप्‍लीकेशन आपके फोन को हैक करके उसमें सेव साराडेटा किसी दूसरे नंबर पर भेज दें.

लॉक स्क्रीन सिक्योरिटी सेट करें

हर फोन की सेटिंग में नंबर लॉक लगाने का फीचर होता है, चाहें वो फीचर फोन हो या फिर स्‍मार्टफोन, अगर आप अपने फोन में जरूरी डेटा सेव करके रखते हैं तो उसमें नंबर लॉक लगा कर रखें ताकि कोई भी अंजान व्‍यक्ति आपकी पर्सनल फोटो और डेटा को देख न सके.

स्मार्टफोन की सुरक्षा पर ध्यान दें, खोने से बचें

अपने स्‍मार्टफोन का ध्‍यान रखें. उसे कहीं भी ऐसे ही न छोड़ दें और न ही किसी अंजान व्‍यक्ति को दें, क्‍योंकि हो सकता है वो व्‍यक्ति आपके फोन में सेव डेटा को अपने फोन में ट्रांसफर कर लें या फिर उसमें कोई भी सॉफ्टवेयर इंस्‍टॉल कर उसे हैक कर लें. अगर ऐसा हुआ तो ऐसे में आप अपने खोए हुए फोन को ट्रैक भी नहीं कर सकते.

गड़बड़ ऐप्स और लिंक्स से सावधान रहें

कई साइट्स में कुछ ऐसे ऐड आते हैं जो क्लिक करने के लिए उकसाते हैं. जब भी फोन में नेट सर्फिंग करें तो साइट के ऐसे बेकार के ऐडवरटाइजमेंट्स पर बिल्कुल क्लिक न करें.

आपकी वित्तीय स्थिति को बिगाड़ सकते हैं ये मोबाइल ऐप

इस बात में कोई शक नहीं की मोबाइल आपकी दुनिया बदल रहा है. पर अगर आप गौर करें तो क्या सही में मोबाइल ऐप हमारी दुनिया को सरल बना रहे हैं. क्या ये सुविधा हमें मुफ्त में मिलती है या इसके पीछे कोई छिपी हुई लागत होती है. छोटी-छोटी चीजें किस तरह से जीवन पर असर डालती हैं.

टैक्सी ऐप

एसी वाली टैक्सी में यात्रा करना आपको थोड़ी देर का आराम दे सकता है पर ये आपकी वित्तीय हालत को बिगाड़ सकता है. छोटी दूरी के लिए आप पैदल चल सकते हैं. ये आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होगा. आप जितना पैसा बचाएंगे उतना ही कमाएंगे.

खाने के ऐप

खाने के ऐप से भी बड़ी चपत लगती है. वीकेंड पर अपने दोस्तों के साथ किसी फैंसी रेस्टोरेंट में खाना-पीना तो चलता है लेकिन वित्तीय सेहत पर भी असर पड़ता है. बाहर खाने से जो बचत होगी उससे म्युचुअल फंड के एसआईपी में निवेश करना बेहतर है. इससे लंबे समय में बचत करने की आदत भी हो जाएगी और पैसा भी बच रहा है. इसके लिए फ्लैक्सी एसआईपी की सुविधा भी उपलब्ध है. इसके जरिए हर महीने के खर्च के हिसाब से एसआईपी में निवेश किया जा सकता है. फोन में ऐप का सही इस्तेमाल जरूरी है.

शॉपिंग ऐप

निवेशक वारेन बफेट के मुताबिक अगर आप वो चीजें खरीद रहे हैं जिनकी आपको जरूरत नहीं तो आपको अपनी जरूरत की चीजें बेचनी पड़ेगी. अगर आप शॉपिंग पर जा रहे हैं तो हमेशा लिस्ट बनाएं. सिर्फ वहीं चीजें खरीदें जिनकी आपको जरूरत है वो नहीं जिनकी आपको चाहत है. जरूरत तो पूरी हो सकती है पर चाहत अनंत होती है. इसलिए बेफिजूल की चीजें न खरीदें वहीं खरीदें जिनकी आपको जरूरत है और जो आप खरीद सकते हैं.

आज ऑनलाइन शॉपिंग ऐप के जरिए आप मोबाइल पर कुछ बटन दबाकर कुछ भी खरीद सकते हैं. इन पर आपको ढेरों डिस्काउंट मिलते हैं. ये डिस्काउंट और सेल पूरे साल भर चलते रहते हैं. इस कारण आप बिना जरूरत की चीजें खरीद लेते हैं.

मनोरंजन ऐप

आजकल मोबाइल पर कई वीडियो ऐप आ गए हैं. सबसे ज्यादा डेटा खर्च वीडियो ऐप में ही होता है. यहां पर आप खर्च में कटौती कर सकते हैं. आप जो चैनल नहीं देखते उसको हटाकर आप अपने केबल का खर्च घटा सकते हैं. आपने अपने केबल ऑपरेटर और डीटीएच ऑपरेटर से जो एचडी चैनल लिए हैं उनकी लिस्ट में भी बदलाव कर सकते हैं. जरा सोंचे क्या आप हर महीने पूरे 500 चैनल देखते हैं. बिल्कुल नहीं. इसलिए आप डीटीएच का पैक बदल सकते हैं.

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