Download App

रेप के बाद की ये 8 तस्वीरें देखिए, और फिर सोचिए…

हम उस समाज का हिस्सा हैं जहां बलात्कार हो जाए तो कहा जाता है कि 'लड़कों से गलतियां हो जाती हैं', 'फास्टफूड खाने से ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं', 'महिला होते हुए इतना साहसी भी नहीं होना चाहिए', 'रात में बाहर निकलेंगी तो यही तो होगा',  'जरूर छोटे कपड़े पहने होंगे', 'लड़कों के साथ घूमती होगी' और न जाने क्या-क्या. हमारे ही समाज का एक हिस्सा रेप के लिए महिला को ही दोषी मानता है.

समाज की इसी सोच पर चोट करने के लिए फोटोग्राफर याना मजरकेविच (Yana Mazurkevich) ने यौन उत्पीड़न पर एक फोटो सीरीज शूट की है. जिसे हर जगह सराहना मिल रही है. याना ने अपनी तस्वीरों में पीड़िताओं को दिखाया है जो रेप के लिए खुद को जिम्मेदार बताती दिखाई गई हैं.

इस सीरीज में कुल 8 तस्वीरें हैं. जिसमें दिखाया गया है कि पुरुष के हाथों द्वारा  महिलाओं को पीछे से जकड़ा गया है, और महिलाएं उनपर हुए रेप के लिए वही बातें कहती दिख रही हैं, जो समाज उनसे कहता है. समाच का सच दिखाती ये सशक्त तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं.

1. मुझे पता होना चाहिए था कि खुद को कैसे बचाना चाहिए

क्या हम उस समाज में रह रहे हैं जहां लड़कियों को सिर्फ ये सिखाया जाता है कि बलात्कार से खुद को कैसे बचाना है?

2. मुझे अकेले नहीं घूमना चाहिए था

समाज में सभी को निडर होकर चलने के पूरी आजादी होनी चाहिए.

3. मैं शायद ज्यादा फ्रेंडली हो गई थी

हंसकर बातें करने का मतलब ये जरा भी नहीं कि इसमें लड़की की रजामंदी है.

4. मेरी गलती थी, मैंने शराब पी थी

शराब पीने का ये मतलब नहीं कि किसी और को बलात्कार करने के लिए छूट मिल गई हो. इसके लिए जिम्मेदार रेप करने वाले हैं.

5. मैं अपने बॉयफ्रेंड को ना नहीं कह सकती

हां कहने का ये मतलब नहीं कि उसे रेप करने की आजादी मिल गई.

6. मेरी स्कर्ट बहुत छोटी थी

छोटे कपड़े रेप को आमंत्रण नहीं देते. रेप तो उनका भी होता है जो पूरा शरीर ढककर रखते हैं.

7. मुझे अपनी ड्रिंक नीचे नहीं रखनी चाहिए थी

अगर कोई तुम्हारे पेय में कुछ मिलाता है तो इसके लिए तुम जिम्मेदार नहीं हो.

8. मुझे पता होना चाहिए था कि ऐसा कुछ हो सकता है

तुम्हें सोचना भी क्यों चाहिए कि तुम्हारा रेप हो जाएगा?

इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए जुटाएं ये दस्तावेज

फाइनेंशियल ईयर 2016-17 का इनकम टैक्‍स रिटर्न (ITR) फाइल करने की अंतिम तारीख 31 जुलाई है. ऐसे में आपको ITR फाइल करने के लिए जरूरी तैयारी कर लेनी चाहिए. ऐसे में ITR फाइल करने के लिए कौन से बेसिक डाक्‍युमेंट्स की जरूरत पड़ेगी.

ऑनलाइन फाइल करना होगा ITR

ज्‍यादातर लोगों को इनकम टैक्‍स रिटर्न ऑनलाइन ही फाइल करना होगा. नए नियमों के तहत अब सिर्फ 80 साल से अधिक उम्र के लोग ही ऑफलाइन रिटर्न फाइल कर सकते हैं. इसके अलावा 5 लाख रुपए तक की इनकम वाले इंडीविजुअल जिनका कोई रिफंड न हो ऐसे लोग ही ऑफलाइन रिटर्न फाइल कर सकते हैं. वहीं ITR फॉर्म 1 ITR और 2 को छोड़ कर बाकी सभी फॉर्म ऑनलाइन ही फाइल किए जा सकते हैं.

वेतनभोगी इंडीविजुअल के लिए जरूरी डाक्‍युमेंट

वेतनभोगी इंडीविजुअल को ITR फाइल करने के लिए फॉर्म 16 की जरूरत पड़ेगी. ऐसे में उन्‍हें अपने संस्‍थान से फॉर्म 16 ले लेना चाहिए. इसके अलावा उनको फॉर्म 26 एएस, बैंक स्‍टेटमेंट, पैन कार्ड, आधार कार्ड या आधार कार्ड के लिए आवेदन करने पर मिलने वाली एनरोलमेंट रेसिप्‍ट की जरूरत पड़ेगी.

1 जुलाई के बाद ITR फाइलिंग में आधार जरूरी

अगर किसी के पास आधार नहीं है तो आधार के लिए अप्‍लाई जरूर कर दें. नए नियमों के तहत 1 जुलाई के बाद से आधार के बिना ITR फाइल नहीं किया जा सकेगा. हालांकि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट एक याचिका की सुनवाई कर रहा है. देखना होगा कि इस पर सुप्रीम कोर्ट क्‍या फैसला देता है.

सेल्‍फ एम्‍प्‍लॉयड के लिए जरूरी डाक्‍युमेंट

सेल्‍फ एम्‍प्‍लॉयड इंडीविजुअल को ITR फाइल करने के लिए बैंक स्‍टेटमेंट, साल भर में किए गए खर्च की रसीद, पैन कार्ड और आधार कार्ड की जरूरत पड़ेगी. इसके अलावा फॉर्म 26 एएस की जरूरत भी पड़ेगी.

ITR फाइल करने में देरी पर पेनल्‍टी

आम तौर पर ITR फाइल करने की लास्‍ट डेट 31 जुलाई होती है. कई बार सरकार इस डेट को आगे भी बढ़ाती है. हालांकि इस बार सरकार ने ITR फाइल करने के नियमों को सख्‍त कर दिया है. अब देरी से ITR  फाइल करने वाले लोगों को 10,000 रुपए तक पेनल्‍टी देनी होगी.

..तो भारत-पाक के बीच होगा चैंपियंस ट्रॉफी का फाइनल मैच

आप भी क्रिकेट के प्रशंसक हैं तो भारत-पाकिस्तान के बीच मुकाबले का इंतजार आपको भी रहता होगा. दोनों टीमों के बीच चैंपियंस ट्रॉफी में खेला गया पिछला मुकाबला तो भारत ने आसानी से जीत लिया था. अब जबकि दोनों ही टीमें सेमीफाइनल में पहुंच चुकी हैं तो दोनों टीमों के प्रशंसकों को एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के मुकाबले की उम्मीद जग गई है.

चैंपियंस ट्रॉफी में अब सबकी निगाहें 14 और 15 जून को होने वाले मुकाबलों पर रहेगी, जिनसे फाइनल में पहुंचने वाली टीमों का फैसला होगा. यदि सबकुछ अनुमान के मुताबिक हुआ, तो भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर हाई वोल्टेज मुकाबला देखने को मिल सकता है.

सेमीफाइनल में 14 जून को पाकिस्तान का मुकाबला मेजबान इंग्लैंड से है. इस मुकाबले में अगर पाकिस्तान ने इंग्लैंड को हरा दिया तो पाकिस्तान की टीम फाइनल में होगी.

वहीं 15 जून को टीम इंडिया की भिडंत बांग्लादेश से होगी. बांग्लादेश की टीम भारत के मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर नजर आती है, लेकिन इस टीम को कमजोर समझने की गलती भारी भी पड़ सकती है. यदि टीम इंडिया इस मुकाबले में बांग्लादेश को हरा देती है, तो फिर 18 जून को भारत और पाकिस्तान का रोमांचक खिताबी मुकाबला देखने को मिलेगा.

आपको बताते चलें कि आईसीसी विश्व कप और टी20 को छोड़ दें तो पाकिस्तान का इस चैंपियंस ट्रॉफी में भारत के खिलाफ रिकॉर्ड बराबरी का हो गया है. इस टूर्नामेंट के इतिहास में दोनों ही टीमें कुल 4 बार भिड़ी हैं, जिनमें से दो बार पाकिस्तान को जीत मिली है और दो ही बार भारत ने उसको हराया है.

सबसे पहले साल 2004 की चैंपियंस ट्रॉफी में इंग्लैंड के बर्मिंघम में खेल गए मैच में पाक ने टीम इंडिया को तीन विकेट से हराया था. इसके बाद साल 2009 में पाकिस्तान ने भारत को सेंचुरियन में खेले गए मैच में 54 रन से हराया था.

हालांकि टीम इंडिया ने साल 2013 की चैंपियंस ट्रॉफी में और फिर इस बार के टूर्नामेंट में हाल ही में 4 जून को पाक को हराया है. मतलब चैंपियंस ट्रॉफी में दोनों के बीच जीत-हार का रिकॉर्ड 2-2 है.

पब्लिसिटी के लिए कुछ भी

पब्लिसिटी के लिए आज निर्माता, निर्देशक से लेकर कलाकार तक सब कुछ भी कहने और करने से कतराते नहीं है. पब्लिसिटी के नये-नये तरीके हर रोज खोजे जाते हैं. इसका एक उदहारण पिछले दिनों एक धारावाहिक के प्रमोशन में कई जगह दिखाई पड़ा. प्रमोशन कि लिए सबको सफेद ड्रेस में बुलाया गया, क्योंकि बताया गया कि वो किसी के चरित्र की मृत्यु की शोक सभा थी. इतना ही नहीं, हर किसी को उस सभा में दु:खी और उदास चेहरा लिए उपस्थित होना था. वहां पर ये समझ पाना मुश्किल था कि ये सब किसलिए और क्यों किया जा रहा है.

वहीं रणबीर कपूर ने अपनी फिल्म की प्रमोशन के दौरान ये कह डाला कि अगर उन्होंने कोई मिस्टेक अपने लाइफ में की है तो वो है सड़क पर लघुशंका करना. अजीब ही सही पर उन्होंने जो कहा, उसे ही हर जगह पढ़ा और देखा गया.

इसके आगे और भी उदाहरण हैं, रितेश देशमुख अपनी फिल्म ‘बैंक चोर’ के लिए पहले तो कुछ लोगों के द्वारा ‘रोस्ट’ हुए, फिर किसी मॉल में चोरी करते देखे गए. जब इस बारें में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये फिल्म निर्माता की मर्जी है, उनकी नहीं. वे कहते हैं कि उन्होंने फिल्म साईन की है, तो उनके हिसाब से काम भी करना पड़ेगा. ये भी तो पब्लिसिटी का ही अंग है.

पब्लिसिटी के अलग-अलग तरीके अपनाने का अर्थ है कि लोग उस फिल्म की तरफ आकर्षित हों और उनकी फिल्म दर्शकों तक पहुंच सकें. इस बारे में इरफान खान कहते हैं कि पब्लिसिटी जरुरी है, पर उसे सही तरह से ही किया जाना चाहिए, ताकि दर्शकों के मन में उस फिल्म के बारे में उत्सुकता जागृत हो और वे सिनेमाहॉल तक फिल्म देखने आयें. फिल्म की कहानी अगर अच्छी न हो तो कितनी भी पब्लिसिटी कर ली जाए, फिल्म नहीं चलती.

वहीं परिणिति चोपड़ा मानती हैं कि फिल्म प्रमोशन जरुरी है, लेकिन कई बार ऐसी-ऐसी कहानियां पढ़ने या सुनने को मिलती है जो मैंने कभी कही ही नहीं हैं. ऐसे में हर बात सोच समझकर कहनी पड़ती है.

फिल्म के को-स्टार के साथ लव अफेयर को फैलाना तो बहुत ही आम प्रमोशन का तरीका है. ‘राब्ता’ फिल्म के प्रमोशन के समय कृति सेनन से जब उनके और सुशांत के बीच लव अफेयर की बात पूछी गयी तो उन्होंने ये कहकर सिरे से नकार दिया कि उसका सुशांत के साथ कुछ नहीं चल रहा है. वे सिर्फ उनके को स्टार हैं.

इतना ही नहीं ‘रईस’ फिल्म के प्रमोशन के लिए शाहरुख खान मुंबई से दिल्ली ट्रेन से गए और वहां उन्हें देखने के लिए स्टेशन पर इतनी भीड़ जमा हो गयी कि पुलिस को भी इस भीड़ पर कंट्रोल करना भारी पड़ा. इसके अलावा मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान अपनी फिल्म ‘गजनी’ के प्रमोशन के लिए एक स्कूल के पूरे बच्चों के बाल गजनी स्टाइल में कटवा डाले.

वरिष्ट पत्रकार इन्द्रमोहन कहते हैं कि पहले जब पब्लिसिटी के इतने माध्यम नहीं थे, तब भी फिल्में चलती थी और हिट भी हुआ करती थी, क्योंकि तब लोगों में फिल्म को देखने की उत्सुकता शुरू से रहती थी. अभी कई बार पब्लिसिटी उम्दा करने के चक्कर में लोग ऐसा कुछ कर जाते हैं जो फिल्म से मेल नहीं खाता और दर्शक फिल्म को समझने में असमर्थ समझते हैं और फिल्म फ्लॉप हो जाती है. इसलिए फिल्म की कहानी से मेल खाता हुआ प्रमोशन ही सही होता है.

दरअसल आजकल कॉर्पोरेट सेक्टर के फिल्म इंडस्ट्री में आने की वजह से, फिल्मों को हर रोज कुछ नये और उम्दा पब्लिसिटी की तलाश होती है, जिसके लिए आजकल के निर्माता निर्देशक कुछ न कुछ अलग करने के चक्कर में, गलती कर जाते है और इसका खामियाजा फिल्म को भुगतना पड़ता है.

टॉप 5 वी आर गेम्स

भारतीय स्मार्टफोन बाजार में आज ज्यादातर एंड्रायड फोन्स की डिमांड है. मोबाइल कंपनियां एंड्रायड स्मार्टफोन्स को कम कीमत में शानदार फीचर्स के साथ उपलब्ध करा रही हैं. एंड्रायड स्मार्टफोन को और खास बनाता है उसका प्रोसेसर और जिसके कारण फोन की परफोर्मेंस अच्छी होती है. जिसमें हम हैवी गेम्स को भी आसानी के साथ खेल सकते हैं. इसके अलावा फोन का शानदार हार्डवेयर और डिस्प्ले गेम्स को और खास बनाता देता है.

आजकल एंड्रायड फोन और टेबलेट में खेले जाने वाले हजारों गेम्स गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है. जिनकी यूजर्स के बीच में काफी डिमांड्स है. एंड्रायड फोन में 2D गेम्स की शुरुआत साल 2000 से हुई थी. वहीं, अब 2017 तक एंड्रायड फोन्स में VR गेम्स ने एंट्री ले ली है. कुछ ऐसे गेम्स जो इस समय काफी ट्रेंड में है.

गार्डियन्स ऑफ द गैलेक्सी (Guardians of the Galaxy:Episode 1)

Telltale Games का एक और रोमांचक गेम ‘गार्डियन्स ऑफ द गैलेक्सी’ है. इसे अलग-अलग एपिसोड में बनाया जा रहा है. यह गेम एक अलग तरह की कहानी पर आधारित है. इसे एंड्राइड यूजर्स के लिए हाल ही में उपलब्ध कराया गया है. इस गेम को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.

लुमिनो सिटी (Lumino City)

यह सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला गेम है जिसका यूजर्स को एंड्राइड स्मार्टफोन्स पर काफी दिनों से इंतजार था. यह गेम अभी तक iOS पर ही उपलब्ध था. लेकिन अब मई से इसे एंड्रायड फोन पर भी उपलब्ध करा दिया गया है. इस गेम में एक सुन्दर छोटा सा शहर है. जिसमें लुमी नाम की एक लड़की होती है जिसके दादाजी को किडनैप कर लिया जाता है और लुमी उन्हें खोजने में लगी होती है. इस गेम को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता हैं.

इनजस्टिस 2 (Injustice 2)

इनजस्टिस 2, जो लोकप्रिय गेम मोर्टल कॉम्बैट पर बना है, मई 2017 में अपने कंसोल और पीसी वर्जन के साथ रिलीज हुआ था. इसमें अलग-अलग रोल पर 28 कैरेक्टर शामिल है जो एक विलेन और हीरो पर आधारित कॉमिक सीरिज है. इस गेम को मई 2017 में डेस्कटॉप के लिए जारी किया है. इसमें शानदार ग्रफिक्स का प्रयोग किया गया है. जो आपको गेमिंग का अलग अनुभव देगा. इस गेम को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.

सुपर मारियो रन (Super Mario Run)

सुपर मारियो गेम की यूजर्स में काफी डिमांड है. कंपनी ने इस गेम को अभी तक iOS पर ही उपलब्ध कराया था. लेकिन अब इस गेम को अप्रैल 2017 से एंड्रायड फोन में उपलब्ध करा दिया गया है. इस गेम में मारियो नाम से एक कैरक्टर दिया गया है जो दौड़ता रहता है और खुद को मुश्किल से बचाता है. इस गेम को खेलने के लिए इसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता हैं.

टॉम्ब रेडर (tomb Raider)
फिलहाल यह गेम सिर्फ NVIDIA शील्ड एंड्रायड टीवी यूजर्स के लिए उपलब्ध है. अगर यूजर के पास यह सुविधा उपलब्ध नही है तो वो इस गेम का मजा नहीं ले सकते.

चुप न बैठो हिम्मत करो

केरल की उस युवती की वाहवाही हो रही है जिस ने यौन शोषण करने वाले गंगेसनंथा तीर्थापाडेर उर्फ स्वामी हरि स्वामी का 8 साल संबंध बनाने के बाद छुरी से लिंग ही काट डाला. इस युवती के परिवार के लोग जिन में मां, बीमार पिता, भाई शामिल हैं कोल्लम के पनमना छतांबिल स्वामिकल आश्रम के भक्त हैं और यह युवती स्वामी की सेवा में तभी झोंक दी गईर् थी जब वह महज 15 साल की थी.

यानी असल दोषी वे मातापिता हैं, जो इस अबोध को स्वामी के आश्रम के हवाले कर आए. वह समाज अपराधी है जो आश्रमों को बनने देता है, वह कानून दोषी है, जो आश्रमों की रक्षा करता है और वह धर्म गुनहगार है, जो कहता है कि तनमनधन से गुरुओं व स्वामियों की सेवा करो. स्वामी तो उस सारे पाप भंडार का छोटा सा मुहरा है.

हिंदू धर्म में ही नहीं अधिकांश धर्मों में इस तरह का यौन शोषण आम है. कैथोलिक पोप को हर साल सैकड़ों अबोध बच्चों के यौन शोषण के मामले सुनने पड़ते हैं. पोप सदियों से अपने पुजारियों की यौनपिपासा को नजरअंदाज करते आए हैं. वहां भी हर मामले में बच्चों को मातापिता ही खुद पादरियों के हवाले करते हैं जैसे कोल्लम के इस पिता ने किया.

शायद इस स्वामी पर मुकदमा चल जाए, क्योंकि आजकल गुरुभक्तों की हिम्मत नहीं रह गईर् कि वे अदालतों और पुलिस को यौन आचरण पर आरोपी स्वामी को बचा सकें पर फिर भी असल दोषी तो यहां भी छूट जाते हैं.

असल दोषी इस मामले में मातापिता हैं, जिन्होंने अंधभक्ति में अपनी किशोर बेटी को स्वामी के हाथों सौंप दिया कि वही उद्धार करेंगे. हिंदू धर्मग्रंथ ऐसे किस्सों से भरे पड़े हैं और हर प्रमुख देवीदेवता पर यौनाचार की कहानियां मौजूद ही नहीं, जरा सा इंटरनैट खंगालने पर पढ़ी भी जा सकती हैं. संस्कृत या अन्य भाषाओं से इन के अनुवाद धड़ल्ले से हो रहे हैं और भक्त लोग देवीदेवताओं के यौनाचार को देवकार्य मानते हुए शान से दोहराते हैं. हां, अगर कोई उंगली दिखाने लगे तो धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं और यही अस्त्र इन स्वामियों का सब से बड़ा कवच है.

अगर हरि स्वामी पर इस युवती के यौन शोषण का मुकदमा चले तो मातापिता को भी अभियुक्त बनाया जाए व पूरा आश्रम पुलिस कब्जे में आ जाए, तभी न्याय मिलेगा. पर आज यह संभव नहीं है. जहां एक तरफ इसलामी कट्टरपन फैल रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका तक में प्रोटैस्टैंट ईसाई भी कट्टर कैथोलिक से बन रहे हैं तो भारत में भगवा ब्रिगेड के होते भला कैसे स्वामी के दुराचार के लिए धार्मिक व्यवस्था को दोषी ठहराया जा सकता है? किस में हिम्मत है?

गौडफादर होना जरूरी : सना खान

मौडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली हीरोइन सना खान मुंबई की रहने वाली हैं. उन्होंने कई इश्तिहारों, फीचर फिल्मों और टैलीविजन के रिऐलिटी शो में काम किया है. 17 साल की उम्र में उन्होंने पहली ऐड फिल्म की थी, जिस को बहुत तारीफ मिली थी. ऐड से ही उन्हें फिल्मों के औफर मिलने शुरू हुए.

पेश हैं, सना खान से हुई बातचीत के खास अंश:

आप अपने बारे में कुछ बताएं?

कोई भी चीज आप को कभी भी आसानी से नहीं मिलती. हर काम में मेहनत होती है. मैं ने मौडलिंग के साथसाथ रिऐलिटी शो से अपना कैरियर शुरू किया और फिल्मों की तरफ आई. मैं दक्षिण भारतीय फिल्में भी कर चुकी हूं. अगर वहां कुछ अच्छा काम मिलेगा, तो मैं फिर करना चाहूंगी.

गौडफादर न होने से फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलना कितना मुश्किल होता है?

इंडस्ट्री के बाहर के लोगों को काम मिलना बहुत ही मुश्किल होता है, फिल्मी सितारों के बच्चों के काम को दर्शक देखना चाहते हैं. उन की पहली या दूसरी फिल्म फ्लौप हो भी जाए, तो भी उन्हें एक मौका फिर से मिलता है, जो बाहर वालों को नहीं मिलता.

आप को फिल्म इंडस्ट्री में किस तरह की जद्दोजेहद करनी पड़ी?

पहले तो यहां काम मिलना मुश्किल होता है, फिर अच्छे रोल की चाहत होती है. कई बार ऐसे में जो भी काम मिलता है, उसी में संतुष्ट होना पड़ता है, क्योंकि परदे पर आना, दिखना भी तो जरूरी है. एक काम से ही दूसरा काम मिलता है.

क्या आप का फिल्मों में आना इत्तिफाक था या बचपन से इच्छा थी?

इत्तिफाक ही था. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं फिल्मों में काम करूंगी. मैं तो पढ़लिख कर एक अच्छी नौकरी कर सैटल होना चाहती थी.

मैं ने कालेज के दौरान टाइमपास के लिए मौडलिंग शुरू की थी और कब यह मेरा जुनून बन गया, पता भी नहीं चला. अब मैं यही करना चाहती हूं.

आप आगे कौन सी फिल्में कर रही हैं?

अभी एक कौमेडी फिल्म ‘टौम डिक ऐंड हैरी’ कर रही हूं, जिस की शूटिंग शुरू हो चुकी है. वह अगले साल रिलीज होगी.

आप को किस तरह की फिल्मों में काम करना पसंद है?

मुझे रोमांटिक, ऐक्शन और थ्रिलर फिल्में बहुत पसंद हैं. लेकिन फिल्म साइन करते समय सब से पहले मैं बैनर देखती हूं, उस के बाद फिल्म के डायरैक्टर, स्क्रिप्ट, फिर स्टार कास्ट को देखती हूं.

आप के यहां तक पहुंचने में परिवार का कितना सहयोग रहा?

परिवार में मेरी मां का सब से ज्यादा सहयोग रहा. मैं अपनी मां के साथ रहती हूं.  जब मैं परेशान रहती थी, तो उन का सहयोग हमेशा मिलता था.

फिल्मों में प्यारमुहब्बत के सीन करने में आप कितना सहज रहती हैं?

मैं तो कभी भी सहज नहीं रहती हूं और चाहती हूं कि ऐसे सीन हों भी नहीं. लेकिन आज इंडस्ट्री बदल रही है. दर्शकों की पसंद बदल रही है.

फिल्म की स्क्रिप्ट अगर अच्छी है, तो थोड़ाबहुत ऐसे सीन की वजह से मैं उसे छोड़ नहीं सकती, क्योंकि मैं एक कलाकार हूं और मुझे हर तरह के सीन करने हैं.

आप कितनी फैशनेबल हैं और क्या मेकअप पसंद करती हैं?

मुझे फैशन करना पसंद है. मेकअप करना भी अच्छा लगता है. मैं खुद ही अपना मेकअप और हेयर स्टाइल करती हूं.

आप को कभी ‘कास्टिंग काउच’ का सामना करना पड़ा?

यकीनन करना पड़ा और इंडस्ट्री में सभी को करना पड़ता है. मैं मुंबई से हूं, पर शुरुआत में बहुत संघर्ष रहा, क्योंकि तब आप को कुछ पता नहीं होता है, जिस का फायदा लोग उठाना चाहते हैं.

मेरे सामने ऐसे कई लोग आए, जिन्होंने फिल्म में काम करने के लिए अजीब शर्त रखी. मैं सोचती हूं कि क्या उन्होंने अपना चेहरा आईने में नहीं देखा? आसपास गंदे लोग बहुत हैं. पर जिन्हें काम देना होता है, वे ऐसी घटिया बातें नहीं करते. 

रिश्तों को कलंकित करने वाला प्यार

कानपुर का एक कस्बा है सिकंदरा. उसी से सटा एक गांव है सहजपुर. जिस में श्याम सिंह का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी बेगवती के अलावा 2 बेटियां कमला, विमला और एक बेटा निर्मल था. श्याम सिंह खेती करते थे. उसी की आय से ही परिवार का भरणपोषण होता था.

श्याम सिंह खुद पढ़ेलिखे इंसान थे, इसलिए बच्चों को भी पढ़ायालिखाया था. कमला की शादी उन्होंने औरेया जिले के फरीदपुर गांव में नाथू सिंह के साथ की थी तो विमला की शादी कानपुर (देहात) के थाना सिकंदरा के जाटियापुर गांव के शिवनाथ सिंह के साथ, बेटा पढ़लिख कर फौज में भरती हो गया था.

श्याम सिंह की मौत हो गई तो घरपरिवार की जिम्मेदारी बेगवती ने संभाल ली थी. विमला के 3 बच्चों में अनुपम सब से छोटी थी. दसवीं पास कर के उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. उस की मौसी का बेटा गौरव इंटरमीडिएट पास कर चुका था. वह अध्यापक बनना चाहता था. इसलिए सीमित आय के बावजूद पिता उसे किसी चीज की कमी नहीं होने दे रहे थे.

गौरव अकसर मौसी के घर आता रहता था. 17 साल की अनुपम से गौरव की खूब पटती थी. लेकिन गौरव को अनुपम की खूबसूरती कुछ अलग ही नजरिए से सुहाती थी. वह उसे चाहत भरी ललचाई नजरों से देखता था. लेकिन रिश्ते की याद आते ही वह अनुपम पर से नजरें हटा लेता था. जबकि उस का दिल ऐसा करने की इजाजत नहीं देता था. गौरव ने बहुत कोशिश की कि वह रिश्ते की मर्यादा बनाए रखे, लेकिन दिल के मामले में उस का वश नहीं चला.

गौरव को लगा कि वह अनुपम को चाहने लगा है. उस के दीदार से उस के दिल को सुकून मिलता था. अनुपम जब उस के पास नहीं होती तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगता था. उस के बिना जीने की कल्पना करना भी बेईमानी लगती थी. लेकिन अनुपम का साथ पाने के लिए इच्छा तभी पूरी हो सकती थी, जब वह भी उसे प्यार करती.

उन्हीं दिनों ननिहाल में पारिवारिक शादी समारोह में दोनों का मिलना हुआ. शादी समारोह में सजीधजी अनुपम बेहद खूबसूरत लग रही थी. वह जीवन के 17 बसंत पार कर चुकी थी.

मजबूत कदकाठी का 18 साल का गौरव भी बहुत हैंडसम लग रहा था. अनुपम की गौरव के प्रति दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. चूंकि वे मौसेरे भाईबहन थे, इसलिए दोनों के साथसाथ रहने पर किसी को कोई शक नहीं होता था.

शादी के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर जाने के बाद अनुपम के मन में उथलपुथल मची थी. शादी में गौरव के साथ की गई मस्ती के पल उस के दिमाग मे घूमते रहते थे. मोसेरा भाई होने के बावजूद अनुपम का झुकाव उस की तरफ हो गया था. दोनों के पास एकदूसरे के फोन नंबर थे. समय मिलने पर वे दोनों फोन पर बातें करते और एसएमएस भी करते.

गौरव और अनुपम एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे थे. लेकिन भाईबहन का रिश्ता होने की वजह से वे प्यार का इजहार नहीं कर पा रहे थे. काफी सोचविचार कर आखिर गौरव ने फैसला किया कि वह अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. इस के लिए भले ही अनुपम नाराज हो जाए या फिर उस का प्यार ठुकरा दे.

एक दिन अनुपम अपने कमरे में बैठी गौरव को बारबार फोन कर रही थी, लेकिन उस का फोन लग ही नहीं रहा था. झुंझला कर उस ने मोबाइल फोन स्विच औफ कर दिया तभी गौरव आ गया. वह मन ही मन ठान कर आया था कि आज अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. आते ही उस ने कहा, ‘‘अनु आज मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हो बोलो?’’ अनुपम ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मुझे डर लगता है कि तुम मेरी बात सुन कर नाराज तो नहीं हो जाओगी?’’

‘‘पता तो चले, ऐसी कौन सी बात है, जिसे कहने से तुम इतना डर रहे हो?’’

‘‘अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. क्या तुम मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’ गौरव ने अनुपम का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.

‘‘क्या…?’’ अनुपम चौंकी. एकाएक अपने कानों पर उसे भरोसा नहीं हुआ.

‘‘हां अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और तुम मेरे दिल में रचबस गई हो.’’ ‘‘यह कैसी बात कह रहे हो तुम? तुम अच्छी तरह जानते हो कि हम भाईबहन हैं.’’

‘‘अनु मैं ने कभी भी तुम्हें बहन की नजर से नहीं देखा. मुझे अपने प्यार की भीख दे दो. मैं तुम्हारे लिए सारे जहां से लड़ जाऊंगा.’’

‘‘हम दोनों रिश्ते में भाईबहन हैं. यह बेरहम समाज हमारे प्यार के रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा. जब लोगों को पता चलेगा तो वे हमें कभी एक नहीं होने देंगे. तुम किसकिस से लड़ोगे?’’

‘‘मुझे किसी की फिक्र नहीं है. बस तुम एक बार हां कर दो.’’

‘‘ठीक है, तुम इतना कह रहे हो तो मैं सोच कर जवाब दूंगी.’’ अनुपम ने कहा.

‘‘आज तो मैं घर जा रहा हूं. एक सप्ताह बाद लौट कर आऊंगा. तब तक तुम खूब सोच लेना.’’ कह कर गौरव चला गया.

रात का खाना खा कर अनुपम सोने के लिए बिस्तर पर लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उस के कानों में गौरव के शब्द गूंज रहे थे. उस ने अपने दिल में झांकने की कोशिश की तो उसे लगा कि वह भी गौरव से प्यार करती थी, लेकिन रिश्ते की वजह से इजहार नहीं कर पा रही थी.

अब गौरव प्यार की बात कर रहा है तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए. जिंदगी में सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिलता. ऐसे में उसे गौरव के प्यार को टुकराना नहीं चाहिए. काफी सोचविचार कर उस ने फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है.

 

अगले दिन की सुबह अनुपम के लिए कुछ अलग ही थी, गौरव के प्यार में डूबी हुई वह खोईखोई सी थी, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी कि उस के मन में क्या चल रहा है. अनुपम को अब बेसब्री से गौरव का इंतजार था. लगभग एक सप्ताह बाद गौरव मौसी के घर आया. घर के लोगों से मिल कर वह अनुपम के कमरे में चला गया. उस ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु जल्दी बताओ, तुम ने क्या फैसला लिया?’’

‘‘गौरव, मैं ने सोचविचार कर तुम्हारे हक में फैसला लिया है.’’

गौरव ने खुशी से अनुपम को बांहों में भर लिया. खुद को छुड़ाते हुए अनुपम बोली, ‘‘अपने ऊपर काबू रखो. अगर किसी ने इस तरह देख लिया तो कयामत आ जाएगी. हमारा प्यार शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘क्या करूं अनु, तुम्हारा फैसला सुन कर मैं जो पागल हो गया था.’’

‘‘ठीक है, लेकिन लोगों की नजरों में हमें भाईबहन ही रहना है. वैसे यह एक तरह से अच्छा है, इस से हम पर कोई जल्दी शक नहीं करेगा.’’

उस दिन से दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के बीच फोन पर भी प्यार भरी बातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों के बीच दूरियां भी मिट गईं.

कहते हैं, प्यार को चाहे कितना छिपा कर किया जाए, वह छिप नहीं पाता. लेकिन अनुपम और गौरव के संबंधों पर घर वालों को जल्दी इसलिए शक नहीं हुआ, क्योंकि वे भाईबहन थे. लेकिन एक दिन विमला ने अनुपम और गौरव को एकदूसरे से अश्लील हरकत करते देख लिया.

पहले तो वह सन्न रह गई, उस के बाद दोनों को लताड़ा भी और समझाया भी. उस ने यह बात बड़ी बहन कमला को बताई तो वह भी सन्न रह गई. उस ने भी गौरव को समझाया कि वे दोनों भाईबहन हैं. इसलिए उन का प्यार किसी भी तरह उचित नहीं है.

घर वालों ने भले ही दोनों को समझाया, रिश्ते की दुहाई दी, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे. इस की जानकारी घर वालों को हुई तो उन्होंने दोनों पर सख्ती करनी शुरू कर दी. इस के बाद दोनों का मिलना बंद हो गया. अब दोनों की बातें फोन पर ही हो पाती थीं. विमला जब कभी अनुपम को फोन पर बातें करते देख लेती तो उसे डांटती और फोन छीन कर अपने पास रख लेती थी.

गौरव और अनुपम के मिलन में बाधा पड़ने लगी तो दोनों बेचैन रहने लगे. आखिर जब उन से नहीं रहा गया तो अनुपम ने मिलने का एक नया तरीका निकाल लिया. उस की नानी बेगवती का घर उस के घर से एक किलोमीटर दूर था. अनुपम किसी न किसी बहाने नानी के घर जाती और रात में वहां रुक जाती. घर से निकलते ही वह गौरव को फोन कर के नानी के घर जाने की जानकारी दे देती थी. गौरव भी नानी के घर पहुंच जाता. वहां आराम से दोनों का मिलन हो जाता.

एक दिन ऐसे ही गौरव ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु, कब तक हम इस तरह छिपछिप कर मिलते रहेंगे. अब तुम्हारी दूरी मुझ से बरदाश्त नहीं होती. मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं.’’

‘‘यह संभव नहीं है, गौरव. हमारे रिश्ते को न तो घर वाले मंजूरी देंगे और न ही समाज.’’ अनु मायूस हो कर बोली.

‘‘कोई तो रास्ता होगा अनु.’’

‘‘हां एक रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ गौरव ने पूछा.

‘‘हम इस जनम में तो मिल नहीं पाएंगे, इसलिए जान दे कर दूसरे जनम में मिल सकते हैं.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहती हो.’’ गौरव ने सहमति जताई.

22 जनवरी, 2016 की दोपहर अनुपम ने गौरव से फोन कर के कहा कि वह नानी के घर जा रही है. वह भी आ जाए. शायद यह उन की आखिरी मुलाकात होगी. गौरव शाम 5 बजे नानी के घर पहुंच गया. देर शाम अनुपम ने खाना बनाया और दोनों ने नानी के साथ खाना खाया.

खाना खाने के बाद अनुपम नानी के साथ चारपाई पर लेट गई तो गौरव दूसरे कमरे में पड़ी चारपाई पर लेट गया. नानी के सो जाने के बद अनुपम गौरव के कमरे में पहुंच गई. दोनों ने प्यार की अकल्पनीय बातें करते हुए साथसाथ मरने का निश्चय किया.

गौरव और अनुपम ने बरामदे में छत के कुंडे में रस्सी के 2 अलगअलग फंदे बना कर कंधे और एकएक हाथ आपस में कलावा से बांधा और अपने गले में फंदा डाल कर फांसी पर झूल गए.

सुबह बेगवती की आंखें खुलीं तो अनुपम चारपाई पर नहीं थी. उन्होंने आवाज लगाई. जब जवाब नहीं मिला तो कमरे से बरामदे में आई. बरामदे का दृश्य देख कर वह अवाक रह गई. बरामदे में नाती और नातिन फंदे से झूल रहे थे.

वह चीखतीचिल्लाती घर के बाहर आईं और पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी. इस के बाद तो गांव में कोहराम मच गया. जिस ने सुना, वही बेगवती के घर की ओर दौड़ पड़ा. देखते ही देखते वहां भीड़ लग गई.

 

बेगवती ने पड़ोसियों की मदद से घटना की जानकारी अपनी बेटियों कमला और विमला तथा बेटे निर्मल को मोबाइल फोन से दी थी. सूचना पाते ही विमला पति शिवनाथ सिंह तथा गौरव की मां कमला व पिता नाथू सिंह आ गए. शव देख कर सभी फफक कर रो पड़े. इसी बीच शिवनाथ सिंह ने घटना की जानकारी थाना सिकंदरा पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी विकास राय पुलिस फोर्स के साथ आ गए थे.

थानाप्रभारी विकास राय ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और दोनों शवों को उतरवा कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. जानकारी पा कर एसपी प्रभाकर चौधरी, एएसपी मनोज सोनकर तथा सीओ आलोक कुमार जायसवल घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतकों के घर वालों से पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि मृतक आपस में मौसेरे भाईबहन थे. दोनों के बीच अमर्यादित प्रेम था, जिस की वजह से दोनों ने आत्महत्या कर ली थी.

चूंकि मृतकों के परिजनों ने पुलिस को लिख कर दे दिया था कि वे कोई काररवाई नहीं चाहते हैं. इसलिए पुलिस ने दोनों शवों को पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए माती भिजवा दिया गया. फिर पोस्टमार्टम के बाद लाशें घर वालों को सौंप दी गईं. उस के बाद घर वालों ने एक ही चिता पर दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने इस केस की फाइल बंद कर दी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पटवारी की दुधारी तलवार

“साहब, मैं कभी पाकिस्तान तो क्या, प्रदेश के किसी दूसरे जिले में भी नहीं गया. जैसेतैसे कर के मैं अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं.’’ हाथ बांधे सुलेमान बाड़मेर के तत्कालीन एसडीएम की अदालत में गिड़गिड़ा रहा था. यह सन 1975 के शुरुआती दिनों की बात है.

  ‘‘सुलेमान, तुम्हारे इलाके के पटवारी ने रिपोर्ट दी है कि तुम कुछ दिनों पहले अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान भाग गए थे. इसलिए तुम्हारी पुश्तैनी कृषि भूमि को राजस्थान टीनेंसी एक्ट के तहत जब्त किए जाने की काररवाई विचाराधीन है.’’ उपखंड अधिकारी ने कहा.

सुलेमान फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, पाकिस्तान भाग जाने का आरोप झूठा है. हां, उन दिनों मैं रोजीरोटी के लिए परिवार के साथ कहीं दूसरी जगह जरूर चला गया था. पटवारीजी ने मेरे बारे में झूठी रिपोर्ट दी है. गरीब होने के कारण मैं उन की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए उन्होंने नाराज हो कर झूठ लिख दिया है.’’

एसडीएम सुलेमान की फाइल फिर से पलटने लगे. तहसीलदार के निर्णय के खिलाफ सुलेमान ने एसडीएम की अदालत में अपील की थी. आखिरकार एसडीएम ने सुलेमान की गैरहाजिरी में उस की 24 बीघा कृषि भूमि को जब्त कर सरकारी घोषित कर दिया था. तारीख पेशी की जानकारी नहीं होने के कारण सुलेमान उस दिन अदालत में नहीं था.

 

सुलेमान को जब यह जानकारी मिली तो उसे बड़ा धक्का लगा. उस ने अपनी व्यथा अपने पड़ोसी चौथमल को बताई. चौथमल उस के साथ हुई नाइंसाफी से द्रवित हो उठा. उस ने सुलेमान को राजस्थान हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. इतना ही नहीं, वह सुलेमान के साथ जोधपुर स्थित हाईकोर्ट गया और एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में अपील दायर कर दी. वहां भी कई सालों तक केस चला.

अंत में वहां का फैसला भी सुलेमान के पक्ष में नहीं आया. इस के बाद चौथमल ने हाईकोर्ट की ही डबल बेंच में अपील दाखिल करा दी.

पिछले महीने खंडपीठ के माननीय न्यायाधीश गोविंद माथुर और एस.पी. शर्मा ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी नागरिक के देश में किसी अन्य क्षेत्र में चले जाने से उस के खिलाफ टीनेंसी एक्ट की काररवाई अनुचित है. आदेश सुनते ही सुलेमान की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

 

राजस्व विभाग के अंतिम छोर के प्यादे ‘पटवारी’ की गलत रिपोर्ट के कारण गरीब सुलेमान 40 सालों तक अदालतों के धक्के खाता रहा. यह तो पटवारी के क्रियाकलापों की बानगी मात्र है, लेकिन राजस्थान के ही हनुमानगढ़ के पटवारी ने अधिकारियों व अन्य लोगों से सांठगांठ कर के फरजीवाड़े का जो खेल खेला, सुन कर आप जरूर चौंक जाएंगे.

देहातों में आज भी बरसों पुरानी एक लोकोक्ति प्रचलित है, ‘ऊपर करतार, नीचे पटवार’. यहां पटवार का मतलब पटवारी यानी लेखपाल से है. लेखपाल राजस्व महकमे का प्यादा होता है. ब्रिटिश हुकूमत काल में कृषि संबंधी लेखाजोखा व लगान वसूली अमीन करता था, जो पटवारी का ही पर्याय होता था. तहसील के मामलों में पटवारी की जांच आख्या को महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अपने स्वार्थ की वजह से कुछ पटवारी अपनी कलम से स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने से नहीं चूकते.

 

राजस्थान प्रदेश का एक जिला है हनुमानगढ़. इसी जिले की पीलीबंगा तहसील का गांव है पड़ोपल बारानी. 10-12 हजार की आबादी वाले इस गांव की कृषि भूमि किलाबंदी के अभाव में आज भी खसरों में समाहित है. इस क्षेत्र में कभी घग्घर नदी का बहाव था, जिस से क्षेत्र की लाल व दोमट मिट्टी बारानी होने के बावजूद बहुत उपजाऊ है. इसी कारण यहां की कृषि भूमि जिले के और क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ महंगी है.

सन 2012 के आसपास का वाकया है. इस क्षेत्र में पटवारी संजीव मलिक की नियुक्ति हुई. कहा जाता है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले संजीव की पहुंच राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी के आला पदाधिकारियों तक थी. शातिरदिमाग संजीव मलिक की ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं थीं. अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि खाली देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह भूमि उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी नजर आ रही थी.

पर वह सोने के अंडे देने वाली मुरगी उसे उच्चाधिकारियों के सहयोग के बिना मिलनी असंभव थी. इस बेशकीमती कृषि भूमि के सहारे उस ने करोड़पति बनने का सपना संजो लिया था. इस के लिए उस ने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

अधिकारियों से संबंध बनाने के लिए उस ने अपने घर पर एक पार्टी का आयोजन किया, जिस में कानूनगो से ले कर एसडीएम तक को आमंत्रित किया. कुल मिला कर 15 मेहमान जुटे.

भोज छोटा था, पर मकसद बहुत ऊंचा था. शाही दावत के रूप में आयोजित इस भोज में संजीव ने शराब और कबाब की भी व्यवस्था की थी. सभी मेहमानों ने इस भोज की जी खोल कर प्रशंसा की.

 

दावत खाने के बाद विदा होते समय एक अधिकारी ने संजीव का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘भई मान गए संजीव, तुम्हारी जिंदादिली को. तुम्हारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. सचमुच मजा आ गया.’’

‘‘साहब, यह आप की ही कृपा का फल है और उम्मीद है कि इस नाचीज पर भविष्य में भी आप की कृपा बनी रहेगी.’’ उचित अवसर देख कर संजीव ने साहब का हाथ दबाते हुए दिल की मंशा जाहिर कर दी.

‘‘हां..हां… क्यों नहीं, कल सुबह औफिस में आ जाना. बैठ कर बातें करेंगे.’’ अधिकारी ने कहा.

संजीव का फेंका गया दूसरा पांसा भी सटीक पड़ा था. अगले दिन संजीव अपने अधिकारी के औफिस चला गया. दोनों में आधे घंटे तक गुफ्तगू होती रही. संजीव ने अपनी सोच जाहिर की तो साहब ने उस पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी. पटवारी संजीव की भावी योजना में साहब की सीधे कोई भूमिका नहीं थी. केवल उन्हें चुप रहते हुए अपनी आंखें बंद रखनी थीं.

इस के बाद पटवारी संजीव ने अधिकारियों से सांठगांठ कर फरजी तरीके से भू आवंटन करना शुरू कर दिया. जो कोई उस का विरोध करता, वह मोटे गिफ्ट दे कर उस का मुंह बंद कर देता.

राजस्व विभाग में कामयाबी मिलने के बाद संजीव मलिक ने अगला कदम बैंकिंग प्रबंधन में पैठ बढ़ाने के लिए उठाया. शातिर संजीव ने एकदो व्यापारी मित्रों के सहयोग से इलाके के बैंक मैनेजरों को पटा लिया. वर्तमान में देश के सभी राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंक किसानों को उन की जोत वाली कृषि भूमि पर ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं. हर बैंक का कृषक ऋण का कोटा निश्चित होता है. इसी का फायदा संजीव ने उठाया.

संजीव की सांठगांठ से बैंककर्मियों को दोहरा लाभ हो रहा था. एक तो उन का ऋण आवंटन का कोटा सहजता से पूरा हो रहा था, ऊपर से जेब भी गरम हो रही थी. जिस खेती की जमीन पर बैंक लोन देती थी, बैंककर्मी उस का सत्यापन बैंक में बैठेबैठे ही पूरा कर के रिपोर्ट लगा देते थे.

संजीव मलिक ने शुरू में अपने खासमखास छुटभैया नेता ओमप्रकाश व उस के भाई के सहयोग से भरोसेमंद ग्राहकों को फांसा. बाद में उस के नेटवर्क में अन्य क्षेत्रीय राजनेता भी जुड़ गए. संजीव ने ओमप्रकाश व उस के भाई के नाम 56 बीघा कृषि भूमि इंद्राज कर के उन्हें खातेदार घोषित किया. इतना ही नहीं, दोनों ही भाइयों के नाम से 10 लाख 29 हजार रुपए व साढ़े 8 लाख रुपए का कृषि ऋण भी एक बैंक से दिला दिया.

इसी प्रकार खसरा नंबर 1236 में मात्र 2 बिस्वा (1 बीघा का दसवां हिस्सा) रकबा राजकीय दर्ज था. पर लेखपाल से मिलीभगत कर इस खसरा में 40 बीघा रकबा दर्ज दिखा कर दोनों भाइयों के नाम 20-20 बीघा खातेदारी घोषित कर दी गई.

राजस्थान में प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की सहायता से समयसमय पर जायज भूमिहीन कृषकों को भूमि आवंटन व निर्धारित दर से भूमि विक्रय करती है. भू आवंटन हेतु एसडीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी भू आवंटन करती है. क्षेत्र के भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो), हलका पटवारी से संबंधित भूमि व कृषक की रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर एसडीएम किसान को भू आवंटन करता है.

इस आवंटन का इंद्राज पटवार परत व सरकार परत में इंतकाल के रूप में दर्ज किया जाता है. इंतकाल की प्रक्रिया पूरी होने के साथ किसान भूमि का मालिकाना हक पा जाता है. पटवार परत जिसे आम बोलचाल में बही कहते हैं, वह पटवारी के पास तहसील कार्यालय में रहती है.

 

पटवारी के चोले में छिपा संजीव मलिक अब भू माफिया बन चुका था. अपेक्षित स्तर पर मिल रहे सहयोग के बल पर वह फरजी भू आवंटन से बेशुमार दौलत कमा रहा था. सन 2015 के अगस्त माह का वाकया है. क्षेत्र का एक किसान हेतराम संजीव मलिक से मिला. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पटवारीजी, गरीब आदमी हूं. मुझे भी एक मुरब्बा खातेदारी अलाट करवा दो.’’

‘‘देखो हेतराम, एक मुरब्बा का रेट 7 लाख है. तुम गरीब आदमी हो, इसलिए तुम्हारे 5 लाख लगेंगे. पैसे ले आओ, तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

‘‘साहब, 5 लाख तो दूर, मेरे पास तो एक लाख भी नहीं हैं.’’

‘‘देखो हेतराम, पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं. तुम जैसे भी हो, पैसों की व्यवस्था कर लो. बाद में तुम्हें बैंक से केसीसी दिला दूंगा. इस से तुम्हारी जेब में 2-3 लाख ज्यादा आ जाएंगे.’’ संजीव ने कहा.

हेतराम ने जैसेतैसे कर मोटे ब्याज पर रुपए ले कर पटवारी को सौंप दिए. एक पखवाड़े में ही हेतराम एक मुरब्बा कृषि भूमि का मालिक बन गया. पटवारी संजीव मलिक ने हेतराम को उसी जमीन पर 8 लाख रुपए का लोन भी दिलवा दिया था. उस में से उस ने अपने हिस्से के 5 लाख रुपए ले लिए.

समय गुजरता रहा और पटवारी के ग्राहकों की संख्या बढ़ती रही. सूची में क्षेत्र के लोगों के अलावा एकचौथाई कृषक खातेदारी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे कृषकों को बैंकों के कृषि लोन या अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था.

 

जब उन लोगों को पता चला कि पटवारी संजीव जरूरतमंद व्यक्तियों के बजाए अन्य लोगों को लाभ पहुंचा रहा है तो उन्होंने खातेदारी अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. अप्रैल, 2016 के दूसरे पखवाड़े में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने खातेदारी के साथसाथ पटवारी संजीव के कारनामे की जांच व तबादले की मांग भी जोड़ दी.

आंदोलन उग्र होता, इस से पहले ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया. तत्कालीन जिलाधिकारी रामनिवास ने इस पूरे मामले की जांच मोहर के एडीएम सुखवीर सिंह चौधरी को सौंप दी. एडीएम ने व्यापक स्तर पर हुए भू घोटाले की जांच हेतु 2 जांच टीमें गठित कीं. पहली टीम में इंसपेक्टर राम सिंह मंद्रा के साथ पटवारी जसवंत सिंह, विनोद कुमार तथा दूसरी में इंसपेक्टर देवीलाल धिंपा के साथ हंसराज व राजकुमार को शामिल किया गया.

जांच टीमों ने सन 2005 से ले कर 2015 तक के तमाम खातों व जमा बंदियों की जांच की. जांच के दौरान पता चला कि आवंटित खसरों में अनुचित रूप से कांटछांट कर अन्य किसानों के नाम जोड़ दिए गए थे. फरजी स्तर पर खातेदारी अधिकार रेवडि़यों की तरह बांटे गए थे.

एडीएम सुखवीर सिंह ने बारीकी से जांच कर 40 पेज की रिपोर्ट तैयार कर के जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत की. रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी व अन्य ने अनधिकृत रूप से 41 खाते जोड़े थे. कंप्यूटराइज जमा बंदियों में संविदाकर्मी उमाराम व संजीव मलिक के फरजीवाड़े को इंसपेक्टर उमाराम द्वारा आंखें मूंद कर तसदीक किए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सन 1998 से ले कर 2001 तक की पटवार परत/सरकार परत कार्यालय में नहीं मिली. रकबा उपलब्ध नहीं होने के बावजूद फरजी ढंग से पटवार परत में कांटछांट व ओवरराइटिंग कर के किसानों को भू आवंटन किया गया.

 

जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार पीलीबंगा को 9 कर्मचारियों व 67 लाभान्वितों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश दिए. इन में 5 महिलाएं भी थीं. इस जांच रिपोर्ट में पीलीबंगा के तत्कालीन उपखंड अधिकारी व तहसीलदार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

पीलीबंगा के तत्कालीन तहसीलदार बसंत सिंह ने 23 अप्रैल, 2016 को थाने में भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो) बनवारीलाल, जगदीश बैन, बृजलाल शर्मा, मदनलाल, उमाराम व 4 पटवारियों संजीव, वेदप्रकाश, रामचंद्र व ओमप्रकाश ताखर सहित 76 लोगों के विरुद्ध भांदंवि की धारा 420, 409, 467, 468, 471, 167 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

एक आरोपी महिला कृषक चंद्रावली जाट जो एक क्षेत्रीय नेताजी की मां है, को 8 खसरों में लगभग 65 बीघा रकबा आवंटित किया गया था. इस रकबे पर लाखों रुपए का कृषि लोन भी लिया गया था.

 

मुकदमा दर्ज होते ही राजस्व विभाग ने पटवारी संजीव मलिक को अपदस्थ कर दिया था. पर संजीव मलिक राजस्थान उच्च न्यायालय में राजनीतिक द्वेष का हवाला दे कर राहत पाने में सफल हो गया. मुकदमा दर्ज होते ही नामजद लोगों की नींद उड़ गई. संजीव मलिक के कृत्य से आहत किसानों ने अप्रैल में ही उच्च न्यायालय की शरण ली.

माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद अक्तूबर, 2016 में जांच अधिकारी सीओ पीलीबंगा को तलब कर लिया. उच्च न्यायालय के दखल के बाद धीमी गति से चल रही पुलिस जांच में तेजी आ गई. सीओ विजय मीणा के निर्देश पर एएसआई हंसराज, हैडकांस्टेबल लिघमन, सुरेंद्र, अमीलाल व बलतेज सिंह ने नामजद पटवारी संजीव मलिक व उमाराम गिरदावर को उन के निवास स्थान से 3 दिसंबर, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

10 दिसंबर को इसी टीम ने पटवारी के सहायक श्रीचंद मेघवाल व संविदाकर्मी उदाराम को भी गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों से व्यापक पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

 

पटवारी संजीव मलिक ने जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित पौश इलाके ड्रीमलैंड सोसाइटी में एक भव्य बंगला बनवाया था. कहा जाता है कि उस के बंगले पर लग्जरी गाडि़यों का आनाजाना लगा रहता था. यह भी कहा जाता है कि बीसियों लाख रुपयों से बने उस के बाथरूम तक में एसी लगे हुए थे. कृषि भूमि आवंटन के फ्रौड में करोड़ों बनाने वाला साईं भक्त संजीव मलिक अपने 3 साथियों के साथ जेल में बंद है.

हजारों बीघा कृषि भूमि के फरजी आवंटन के इस सिलसिले में कमाए गए लाखों रुपयों की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई है. कई राजनेताओं पर भी आरोप लग रहे हैं. पूर्व में जिलाधिकारी हनुमानगढ़ ने सभी आवंटन रद्द करने के आदेश जारी किए थे.

पुलिस जांच मात्र राजस्व विभाग के निचले पायदान के कार्मिकों व नामजद किसानों के इर्दगिर्द घूम रही है. विभाग के आला अधिकारी अभी भी जांच से कोसों दूर हैं. जांच उन बैंककर्मियों की भी होनी चाहिए, जिन्होंने फरजी कागजातों के आधार पर खुले हाथों से लाखों के कृषि लोन मंजूर कर बंदरबांट की. पीडि़त किसानों ने राज्य सरकार से इस महाघोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.

– कथा राजस्व व पुलिस सूत्रों के आधार पर

– नंदकिशोर गोयल

नारी पर भारी, व्रत त्योहार की खुमारी

अंजलि की शादी को 6 महीने ही हुए थे कि वह कुम्हलाई सी दिखने लगी. उस के चेहरे की रौनक और हंसी कहां गायब हो गई उसे स्वयं पता न चला. ऐसा होना ही था. दरअसल, जब से वह ब्याह कर आई थी उस की स्वतंत्रता पर अंकुश सा लगा दिया गया था. वह जैसी उन्मुक्त थी उसे वैसा नहीं रहने दिया गया. उस के बोलनेहंसने, चलने पर ससुराल की तरफ से बंदिशें लगने लगी थीं.

अंजलि का विवाह हुआ तो 1 महीने तक तो सब ठीक रहा हनीमून, रिश्तेनातों में आनाजाना, मगर उस के बाद शुरू हुआ बंदिशों का दौर, जिस ने उसे तोड़ दिया. आज इस देव का व्रत है तो आज उस का, पति की दीर्घायु के लिए व्रत तो आज स्त्रीमर्यादा का त्योहार. हर दूसरे दिन कोई न कोई व्रतत्योहार, रीतिरिवाज उस की स्वतंत्रता में बाधक बनते गए. उस पर यह पाबंदी कि जींस न पहनो क्योंकि अब तुम शादीशुदा हो. मांग भरो, साड़ी पहनो, सिर ढक कर रखो जैसी बंदिशों से अंजलि जैसे खुले आसमान तले घुट कर रह गई.

दरअसल, व्रतत्योहार, रीतिरिवाज, मर्यादा, संस्कार आदि सब औरत पर शिकंजा कसने के लिए ही बने हैं. इन के जाल में उलझ कर उस की स्वतंत्रता खो जाती है. विवाह होते ही 10 दिन, फिर 1 महीना और उस के बाद 1 साल पूरा होने पर कोई न कोई व्रतत्योहार करवा कर औरत की आजादी को कैदी सी जीवनशैली में बदल दिया जाता है.

बंदिशों में महिलाएं

इन सब से औरत के बोलनेचालने, हंसनेबतियाने, उठनेबैठने, खानेपीने तक अंकुश लगाए जाते हैं और उसे ऐसे नियंत्रित किया जाता है मानो उस का अपना तो वजूद है ही नहीं. औरत को अपनी पसंद के कपड़े पहनने तक की आजादी नहीं रहती है. बहुत से परिवारों में औरत को साड़ी पहनने के लिए मजबूर किया जाता है. इस सब के चलते औरत की अपनी सारी रुचियां और प्रतिभा लुप्त सी हो जाती हैं. बंधेबंधाए ढर्रे पर जीवन चलने लगता है. इन सब बंदिशों को झेलते हुए औरत इन की इतनी आदी हो जाती है कि फिर उसे कुछ करने को तैयार करना कठिन लगने लगता है.

हिंदू समाज भी शुरू से ही पुरुषप्रधान रहा है. किसी न किसी कारण पुरुष परंपराओं, रीतिरिवाजों, रूढि़यों से खुद को बचाते रहे हैं. एक समय था जब पुरुष भी धोतीकुरता पहनते थे. आज सभी पैंटशर्ट पहनते हैं. इस की वजह पुरुष प्रधान समाज पुरुषों का घर से बाहर जा कर पैसा कमाने को बताता है. उन के अनुसार पहली स्वतंत्रता बाहर निकल कर पैसा कमाने से मिलती है, जो आज पुरुषों को तो मिलती है पर औरत को इस का हकदार नहीं माना जाता है.

इसी क्रम से जुड़ते हुए धीरेधीरे सभी क्षेत्रों में पुरुषों की स्वतंत्रता का दायरा बढ़ता जाता है जबकि औरत को शादी के बाद आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने के लिए घर से नहीं निकलने दिया जाता है. उसे घर के काम करने, बच्चों और बड़ों की देखभाल का जिम्मा दिया जाता है. रातदिन घर में रहने के बावजूद उसे बेरोजगारों  की श्रेणी में गिना जाता है. इसी मानसिकता के चलते आज भी ज्यादातर औरतों की प्राथमिकता घर संभालना ही बन गई है.

योग्यता की कद्र नहीं

कमाने और घर चलाने के लिए हाथ में पैसा रहने के कारण पुरुष अपनी मरजी के काम करने को आजाद रहते हैं, लेकिन औरत को सभी कामों के लिए पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है. पुरुषों पर निर्भरता ही उसे कमजोर करती है. पुरुषवादी सोच को औरत पर थोपने का पुरुषों का यह एक बहुत अच्छा तरीका है.

घर में औरत की योग्यता उस के द्वारा बनाए गए खाने, नाश्ते और घर की साफसफाई से आंकी जाती है. उस में भी कहीं कोई चूक नहीं होनी चाहिए वरना वह औरत ही क्या जो ये सब न कर सके जैसे ताने दिए जाते हैं.

सुरभि की शादी हुई तो वह ग्रैजुएशन कर चुकी थी, साथ ही उस ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स भी किया था. मगर शादी के बाद न तो उस की पढ़ाई का मोल रहा और न ही वह बुटीक खोलने की अपनी चाह को पूरा कर पाई, क्योंकि उस के पति ने इस पर बंदिश लगा दी कि क्या करोगी बुटीक खोल कर. पैसा कमाना है तो वह तो हम कमा ही रहे हैं. हमारे परिवारों में औरतें काम नहीं करतीं.

दरअसल, पुरुषवादी दंभ तले दबे भारतीय समाज में स्त्री की किसी योग्यता की कोईर् कद्र नहीं. उस ने अपने जीवन में अन्य क्षेत्रों में अभी तक क्या हासिल किया है या वह आगे क्या करना चाहती है इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं होता है. पुरुष केवल बातें कर के वाहवाही लूट लेता है, पैसा दे कर अपने दायित्व का निर्वाह समझ लेता है.

शादी से पहले हंसतीखेलती, मौजमस्ती करती लड़की जब ब्याह दी जाती है तो उस की दिनचर्या भी बदल जाती है. यह दिनचर्या ऐसी होती है कि उसे चैन से नहीं बैठने देती है. रोज के व्रतत्योहार और तरहतरह के रीतिरिवाज उस का जीना हराम कर देते हैं. कभी नौदुर्गा के 9 व्रत या पड़वा, कभी अष्टमी, कभी एकादशी, तो कभी गौरीपूजा के नाम पर औरत को भूखे रह कर दिन गुजारना पड़ता है.

व्रत के नाम पर प्रताड़ना

नेहा 3 महीने से प्रैगनैंट थी. एक दिन उस की जेठानी ने उस से कहा, ‘‘नेहा, 2 दिन बाद करवाचौथ का व्रत आ रहा है. पूरा दिन व्रत रखना है. पानी तक नहीं पीना है. यह व्रत अपने पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है.’’

यह सुनते ही नेहा बोली, ‘‘दीदी, यह भी कोई लौजिक हुआ? आप पढ़ीलिखी हो कर भी ऐसी बातें करती हैं?’’

मगर परिवार के दबाव पर नेहा को व्रत रखना पड़ा, जिस का परिणाम यह निकला कि शाम होतेहोते नेहा की तबीयत ऐसी बिगड़ी कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ा.

अब जन्माष्टमी के व्रत को ही लें. इसे कृष्ण के जन्म लेने पर रखा जाता है, जबकि किसी के पैदा होने पर भला व्रत रखने का क्या औचित्य है? यदि व्रत घर के सभी सदस्य रखते हैं तो घर में एक उत्सव का सा माहौल बन जाता है. लेकिन उस का खामियाजा भी एक औरत को ही भुगतना पड़ता है. उसे अपने व्रत का निर्वहन करने के साथसाथ खास तरह का खाना भी तैयार करना पड़ता है. इस से उस का काम बढ़ता है.

इसी तरह हरतालिका या तीज का व्रत अत्यंत कठिन होता है. इस व्रत के पहले तो औरतों को घबराहट होने लगती है. वे सोचती हैं कि किसी तरह यह व्रत अच्छी तरह निकल जाए.

इस व्रत का महत्त्व भी पुरुष के लिए है. औरतें इसे अपने सुहाग की सलामती के लिए रखती हैं. इसे एक बार रख लिया तो फिर जीवन भर रखना अनिवार्य हो जाता है. भूखीप्यासी रहने के कारण शाम होतेहोते ज्यादातर औरतें सिरदर्द और कमजोरी के कारण बिस्तर पकड़ लेती हैं. तब भी उन्हें घर के कार्यों के लिए जबरन उठना पड़ता है.

दोहरी जिम्मेदारी

इसी तरह त्योहारों पर कुछ खास व्यंजन बनाने अनिवार्य कर दिए जाते हैं. उन के बनाए बिना त्योहार की पूर्णता नहीं मानी जाती है. होली पर गुझिया, जन्माष्टमी पर पाग, संकट चौथ पर तिल के लड्डू, गणेश चौथ पर बेसन के लड्डू, रक्षाबंधन पर सेंवइयों की खीर यानी अलगअलग त्योहार पर अलगअलग व्यंजन बनाने में औरतों को ही खटना पड़ता.

इस सब के अलावा प्रत्येक अवसर पर घर की साफसफाई का जिम्मा भी औरतों पर ही होता है. घर में रहते सब हैं पर उसे व्यवस्थित रखने में औरतों को ही खटना पड़ता है, क्योंकि अतिथि खासकर पुरुषप्रधान समाज के नुमाइंदे औरत की खातिरदारी को परखने के साथसाथ घर की साजसज्जा के आधार पर भी उसे आंकते हैं.

सामाजिक मकड़जाल

व्रतत्योहारों के अलावा औरतों को श्राद्घ पक्ष या पितृ पक्ष के समय भी सांस लेने की फुरसत नहीं होती है. यहां भी औरत को ब्राह्मणों को खिलाने के लिए तरहतरह का खाना बनाना पड़ता है और भी न जाने कितने रिश्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है.

वैसे किसी की मृत्यु पर तेरहवीं, बरसी या चौबरसी पर हलवाई खाना बनाता है पर श्राद्घों में बाजार से कुछ मंगवाने पर आपत्ति जताई जाती है यानी यहां औरतों को ही पिसना पड़ता है. बीमार होने पर भी औरत को खाना बनाना पड़ता है. पुरुष कतई मदद नहीं करते हैं, क्योंकि उन्होंने ये काम तो औरतों के लिए ही तय किए हैं.

औरत के जीवन का यही सच है. स्वतंत्रता न होने के कारण पुरुषप्रधान समाज के बुने गए इन जालों में उलझे हुए ही वह अपना जीवन बिता देती हैं. 

– अमिता चतुर्वेदी

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें