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परीक्षाओं का मखौल

बिहार के वैशाली जिले के विशुन रौय इंटर कालेज की रूबी राय के पिछले वर्ष 89 परसैंट नंबर लाने पर जो भंडाफोड़ हुआ था, उस का नतीजा है कि इस साल बिहार बोर्ड ने सही कदम सख्ती से उठाए और पास होने वाले 12.40 लाख में से सिर्फ 5 लाख रह गए. अब बिहार में परीक्षाएं मखौल बन गई हैं. वहां नकल, पेपर लीक होना, आंसर शीटों को बदलना और आखिरी सूची में नंबर बढ़वाना लाखों रुपयों में नहीं, बल्कि सैकड़ों में ही हो जाता है, क्योंकि नंबर बढ़वाने में इतने ज्यादा लोग लगे रहते हैं कि थोड़ेथोड़े भी दें, तो बहुत जमा हो जाते हैं.

आमतौर पर इस के लिए दोष छात्रों पर मढ़ा जाता है कि वे नकल करते हैं. असल में गुनाहगार वे पढ़ाने वाले हैं जो सरकार से वेतन पूरा लेते हैं, पर पढ़ाने के नाम पर जीरो हैं. माना कि बिहार के गांवकसबों में पढ़ने की इच्छा कम है, पर वह कम इसलिए है कि जाति की ऊंचनीच, गुंडागर्दी, बेईमानी, पाखंड, निकम्मापन, निठल्लापन बिहार की रगरग में भरा है. वही बिहारी जो बाहर जा कर हजारों कमाता है, बिहार के घुटन से भरे भ्रष्ट माहौल में न काम करना चाहता है, न पढ़नालिखना.

बिहार बोर्ड ने सख्ती कर के अच्छा किया है, पर यह सख्ती केवल छात्र ही क्यों सहें? हर फेल छात्र पर उस के मास्टरों पर 5 सौ रुपए से एक हजार रुपए का फाइन लगना चाहिए. वे मजे में पूरा वेतन लेते रहें और 12वीं की सीधीसादी पढ़ाई भी न करा सकें, तो उन का क्या फायदा? बिहार में पढ़ाई पर ही नहीं, बल्कि हाथ के काम पर भी जोर देना जरूरी है. वहां की पढ़ाई फिलहाल केवल अधकचरे पंडे तैयार कर रही है, जो रट्टा मार कर कुछ नंबर ऐसे पाते हैं, जैसे मंत्र रट लिए हों.

छात्रों को पढ़ाई के साथसाथ हुनरमंद भी बनाना जरूरी है, ताकि 12वीं के बाद अगर वे चाहें तो कोई कामधंधा कर सकें. और स्कूलों में लगे अरबों रुपयों का क्या फायदा, अगर वे इतना सा भी न सिखा सकें. स्कूलों में ‘जय माता’ की जगह ‘जय टै्रक्टर देवा’ सिखाया जाए, तो 12वीं की पढ़ाई ज्यादा कारगर होगी.

शासन को इस बुरे नतीजे के लिए फाइन भी करना चाहिए और जहांजहां 10-15 प्रतिशत बच्चे पास हुए हैं, वहांवहां सारे मास्टरों को नौकरी से 3 साल की छुट्टी बिना वेतन की देनी चाहिए. छात्र को ही नहीं, बल्कि मंत्री से ले कर स्कूल चपरासी तक को इस बुरे नतीजे का फल भुगतना चाहिए.

 

फैशन का पहनावा है हर उम्र की चाहत

एक जमाना था जब महिलाओं के सजनेसंवरने पर कोई पाबंदी नहीं होती थी. अपने सौंदर्य को बेहतरीन दिखाने के लिए वे अपने मन की करती थीं. पर फिर समय के साथ समाज उन से सब कुछ छीनता चला गया. उन की चाहतें चारदीवारी में दफन होने लगीं. मगर अब फिर जमाना एक सीमा तक बदल गया है और महिलाएं अपने मन की करने लगी हैं.

नई सोच के साथसाथ समाज को भी अपना नजरिया बदलने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है. फैशन ने हर उम्र की दहलीज पर एक बड़ी क्रांति ला दी है. सड़ीगली मानसिकता के साथ 7 परदों में तन को ढक कर रखने की प्रथा को तोड़ने के लिए महिलाएं तत्पर हो गई हैं. कोई क्या सोचेगा, क्या कहेगा इन बातों की अब उन्हें परवाह नहीं है.

आज आकर्षक पहनावा आकर्षक व्यक्तित्व और आकर्षक सोच का पर्याय बन गया है. ‘जीवन मेरा, तनमन मेरा तो फिर इसे फैशन के बदलते मौसम के अनुसार क्यों न सजाऊं.’ आज हर महिला की जबान पर यही उद्गार है. धर्म, समाज, परिवार, मुल्लेमौलवी चाहे जितने फतवे जारी कर लें, कोई परवाह नहीं. आज के भागमभाग वाले दौर में कोई भला 9 गज की साड़ी क्यों पहनना चाहे? हलकेफुलके कपड़ों में ही अनेकानेक जिम्मेदारियों को निभाया जा सकता है.

जब हर क्षेत्र में लड़कियों ने, महिलाओं ने अपना आकाश ढूंढ़ लिया है, अपने हिस्से की धूप तलाश कर ली है तो मन का पहनावा तो बहुत मामूली बात है. अवसर के अनुसार पहनावा पहनने में रोकटोक करने का कोई औचित्य नहीं है. जींस, टौप, स्कर्ट, छोटी फ्रौक, शर्ट में सजे तन न जाने उम्र के कितने साल चुरा कर मन को युवा होने की अनुभूति देते हैं.

घरबाहर की दोहरी जिम्मेदारियों को निभाने में पहनावे का बहुत महत्त्व रहता है. वाहन संचालन पर आधिपत्य रखने वाली लड़कियां हों या युवतियां, अधेड़ावस्था की हों या वृद्ध पहनावे को आधुनिकता के सांचे में ढालना ही पड़ता है. शादीविवाह और त्योहारों के मौसम में जरी, मोतियों और सितारों से सजी साडि़यां, लांचा, लहंगे के साथ भारी जेवरात पहनने के अंदाज गजब ढाने के साथ बड़े लुभावने भी लगते हैं. लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में इन्हें पहनना आसान नहीं है.

आज 60 क्या 70 से ज्यादा उम्र की भी भारतीय महिलाएं विदेशों में ही नहीं, बल्कि अपने देश में भी जींस, पैंट, स्कर्ट, टौप जैसी पोशाकों में नजर आती हैं, तो आंखों को बड़ा सुकून मिलता है. प्राचीन और आधुनिक फैशन की पोशाकों की सम्मिलित डिजाइनें नयनाभिराम होने के साथसाथ बजट के अंदर भी आती हैं. एक से बढ़ कर एक डिजाइनर ड्रैसेज फैशन की दुनिया में शोहरत बटोर रही हैं. इन डिजाइनर कपड़ों के प्रचार के लिए फैशन परेडों का आयोजन भी किया जाता है. अब तो औनलाइन भी खूब बिक्री हो रही है. सब धड़ल्ले से खरीदारी कर रहे हैं.

फैशन पर लड़कियों एवं महिलाओं के विचार

24 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर दिव्या दत्ता कहती हैं कि सलवारकमीज से ज्यादा अच्छा उन्हें जींस, पैंट, फुल स्कर्ट, टौप, शर्ट पहनना लगता है. इन ड्रैसेज में चुस्तदुरुस्त स्मार्ट तो लगती ही हैं, हलकाफुलका होने के एहसास के साथसाथ हर वर्ग के साथ काम करने में भी सहजता महसूस होती है.

अनारकली पहनावे की दीवानी बैंक में कार्यरत 28 वर्षीय पूजा सभी आधुनिक परिधान पहनती हैं पर सलीके से. पहनावे के साथ वे स्थान और मिलने वालों को भी अहमियत देती हैं. भारी बदन की महिलाओं को तंग परिधानों के बजाय ढीलेढाले परिधानों में देखना पसंद करती हैं. वे कहती हैं कि फैशन के साथ शालीनता भी होनी चाहिए.

37 वर्षीय डैंटिस्ट सृजा ने भी दिव्या की ही बातें दोहराईं. पर उन्हें विशेष अवसरों पर पारंपरिक और आधुनिक फ्यूजन के परिधान बहुत भाते हैं. घरबाहर कैपरी पहनना उन्हें आरामदायक लगता है.

कालेज में पढ़ने वाली छात्राएं रश्मि, सपना, मेघा, नमिता ने बताया कि उन्हें नए फैशन के कपड़े सुंदर, टिकाऊ होने के साथसाथ आरामदायक भी लगते हैं. कपड़ों का मैटीरियल इतना अच्छा होता है कि घर पर ही धो लेती हैं. ड्राई वाश की कोई जरूरत नहीं होती है. रखरखाव में भी कोई झंझट नहीं होता है. फिर आकर्षक डिजाइनर ड्रैसों की औनलाइन शौपिंग भी कर लेती हैं.

45 वर्षीय अंजू लाल खास मौके पर ही बनारसी डिजाइनर साड़ी पहनती हैं. उन्हें आधुनिक और पारंपरिक सलवारकमीज ही पहनना ज्यादा अच्छा लगता है.

पटना वूमंस कालेज में अंगरेजी की व्याख्याता, 50 वर्षीय स्तुति प्रसाद का कहना है कि उन्हें सलवारकमीज पहनना बहुत अच्छा लगता है. चूंकि वे एक व्याख्याता हैं, इसलिए पहनावे की शालीनता का ध्यान रखना पड़ता है.

60 वर्षीय गृहिणी सुनीता जब से लंदन आनेजाने लगी हैं हमेशा जींस, टौप, शर्ट ही पहनती हैं. आकर्षक साड़ी किसी विशेष अवसर पर ही पहनती हैं.

75 वर्षीय मीनाजी को रंगबिरंगा गाउन पहनना बहुत अच्छा लगता है. जब भी वे अमेरिका जाती हैं वहां के मौल्स से एक से बढ़ कर एक फैशन के परिधान खरीद लाती हैं.

वास्तव में अपनी मनपसंद के परिधानों के साथ जीने का अंदाज ही निराला होता है. मन सदा उत्साहउमंग से भरा रहता है. थकान, अवसाद जीवन में नहीं झांकते.         

लगातार 7 बार डक आउट हुआ था यह भारतीय खिलाड़ी

कहते हैं रिकॉर्ड टूटने के लिए ही बनते हैं. क्रिकेट जगत में ये बात बिल्कुल सटीक बैठती है. क्रिकेट में अकसर ही रिकॉर्ड बनते हैं और टूटते हैं. अपने क्रिकेट करियर में कोई ना कोई रिकॉर्ड बनाना हर खिलाड़ी का सपना होता है. लेकिन कुछ खिलाड़ियों के नाम ऐसे रिकॉर्ड दर्ज हैं जिन्हें कोई तोड़ना नहीं चाहेगा. कुछ ऐसा ही ना चाहने वाला रिकॉर्ड एक भारतीय खिलाड़ी के नाम दर्ज है.

भारतीय क्रिकेट इतिहास में एक खिलाड़ी ऐसा भी है, जो लगातार 7 बार शून्य पर आउट हुआ था. इनमें से 4 बार वह पहली ही गेंद पर पवेलियन लौट गया था. वह खिलाड़ी कोई और नहीं बल्कि पूर्व भारतीय गेंदबाज अजीत अगरकर हैं.

1999-2000 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर एडिलेट ओवल में उन्होंने पहली पारी में 19 रन बनाए थे, लेकिन दूसरी पारी में शून्य पर आउट हो गए. इसके बाद मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंट की दोनों पारियों में बिना खाता खोले पवेलियन लौट गए. इसके बाद सिडनी क्रिकेट ग्राउंड (एससीजी) में की पहली पारी में भी शून्य पर आउट हो गए.

एससीजी में वह पहली गेंद जैसे तैसे खेल गए, लेकिन दूसरी गेंद पर फिर गोल्डन डक पर आउट हो गए. हालांकि अगले टेस्ट मैच में उन्होंने एक रन बना लिया और इसके बाद उन्होंने बल्ला उठाकर इसकी खुशी भी जताई थी. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी फिर भी उनका मजाक उड़ाते रहे थे. साल 2000-01 में जब ऑस्ट्रेलिया से वानखेड़े स्टेडियम में मुकाबला हुआ तो अगर फिर दोनों पारियों में गोल्डन डक पर आउट हो गएं.

अजीत ने 1 अप्रैल 1998 को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे क्रिकेट में डेब्यू किया था. अगरकर के नाम कई रिकॉर्ड्स भी दर्ज है. भारत की ओर से वह अनिल कुंबले (337) और जवागल श्रीनाथ (315) के बाद तीसरे सबसे ज्यादा विकेट (288) लेने वाले गेंदबाज हैं. 

उन्होंने कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से तीन बार आईपीएल भी खेला है. वह उन खिलाड़ियों में से हैं, जिन्होंने लॉर्ड्स के मैदान पर टेस्ट शतक लगाया हो. साल 2002 में इंग्लैंड के खिलाफ इस ऐतिहासिक मैदान पर 109 रन बनाए थे. हालांकि भारत यह मैच हार गया था, लेकिन उनकी बल्लेबाजी ने सबका ध्यान खींचा था.

चौकलेट फेशियल छिपाए बढ़ती उम्र

बढ़ती उम्र में भी खूबसूरती को बनाए रखना महिलाओं के लिए चुनौती भरा काम होता है. खासतौर पर उम्र के 30वें पड़ाव पर पहुंच चुकी महिलाएं अपनी त्वचा में होने वाले ढीलेपन और झुर्रियों से काफी परेशान रहती हैं. दरअसल, 30 की उम्र के बाद त्वचा में प्राकृतिक मौइश्चराइजर बनना बंद हो जाता है, जिस की वजह से त्वचा में वह कसाव नहीं रहता है जो 30 की उम्र से पहले रहता है. चौकलेट फेशियल उम्र के 30वें पड़ाव पर पहुंच चुकी ही महिलाओं को लाभ पहुंचने के लिए ही है.

गृहशोभा फेब मीटिंग में फेशियल पर हुए स्पैशल सैशन में ब्यूटी ऐक्सपर्ट, मीनू अरोड़ा भी इस बात पर अपनी सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘‘चौकलेट में ऐंटीऔक्सीडैंट और ऐंटीएजिंग प्रौपर्टीज होती हैं, जो लिंफैटिक ड्रैनेज के साथ त्वचा पर चढ़ी डैड सैल्स की परत को निकाल देती हैं और त्वचा पर कसाव के साथसाथ निखार और चमक भी लाती हैं.’’

चौकलेट फेशियल कराता है रिलैक्स फील

वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि चौकलेट की सुगंध और स्वाद दोनों से ही मानव शरीर में हैप्पी हारमोन रिलीज होते हैं, जो मानसिक तनाव को कम करते हैं और खुशी का अनुभव कराते हैं. चौकलेट फेशियल का काम भी कुछ ऐसा ही है, क्योंकि यह फेशियल रक्त में मौजूद सैरोटेनिन यौगिक को बढ़ा देता है, जो तनाव को कम करने में मदद करता है.

सही स्क्रबिंग देती है सही इफैक्ट

चौकलेट फेशियल की शुरुआत दूध से चेहरे की क्लींजिंग करने से होती है. इस के बाद चेहरे को ओटमील, डिस्प्रिन की टैबलेट, शुगर फ्री चौकलेट के पिघले टुकड़े, 1 चम्मच कौफी पाउडर और शहद से स्क्रब किया जाता है. स्क्रबिंग का सही तरीका बताते हुए मीनू कहती हैं, ‘‘कभी भी स्क्रब लगाते हुए चेहरे को रगड़ना नहीं चाहिए, बल्कि कुछ देर चेहरे पर स्क्रब लगा रहने देना चाहिए. फिर धीरेधीरे उंगलियों को सरकुलेशन मोशन में घुमाते हुए स्क्रबिंग करनी चाहिए. इस से रक्त संचार सुचारु हो जाता है और त्वचा के डैड सैल्स निकल जाते हैं.’’

कोल्ड कंप्रैशर भी जरूरी

स्क्रबिंग के बाद त्वचा को हौट कंप्रैशर देने के लिए स्टीम की जगह पानी में बोरिक ऐसिड मिला कर इस मिश्रण में रूमाल भिगो कर चेहरे पर कुछ देर रखा जाता है. हौट कंप्रैशर त्वचा के पोर्स खोल देता है और उन के आकार को बड़ा कर देता है. बड़े पोर्स बेहद भद्दे लगते हैं, इसलिए हौट कंप्रैशर के तुरंत बाद कोल्ड कंप्रैशर देना जरूरी होता है. इस के लिए ठंडे पानी या बर्फ का इस्तेमाल किया जाता है.

मसाज का महत्त्व

त्वचा को पैनीट्रेट करने के लिए चौकलेट के पिघले टुकड़ों को ऐलोवेरा जैल में मिला कर त्वचा पर लगाया जाता है और नारियल पानी के साथ अल्ट्रासोनिक मसाज दी जाती है. यदि त्वचा औयली है, तो जैल की सामग्री में चुटकी भर सी साल्ट डाल कर त्वचा को मसाज दी जाती है. दरअसल, सीसाल्ट अतिरिक्त तेल को त्वचा से खींच लेता है.

ऐंटीएजिंग फेशियल का सब से प्रमुख हिस्सा होता है स्किन टाइटनिंग क्रीम से चेहरे को दी गई मसाज. इस से त्वचा में कसाव और चमक दोनों आ जाती हैं. मीनू बताती हैं कि इस मसाज में चेहरे के खास प्रैशर पौइंट्स को दबाया जाता है, इस से रक्त संचार बढ़ता है और बहुत ही रिलैक्स महसूस होता है.

फेशियल का आखिरी चरण

सब से आखिर में ग्लो पैक में पिघली चौकलेट को डाल कर 5 मिनट के लिए चेहरे पर लगाया जाता है. इस के बाद एक बार फिर चेहरे को हौट कंप्रैशर और कोल्ड कंप्रैशर दिया जाता है.

चौकलेट फेशियल के बाद चेहरे को साफ पानी से जरूर साफ कर लें, क्योंकि चेहरे पर चौकलेट की चिपचिपाहट रह जाती है.

बिना एसपीएफ क्रीम लगाए धूप में न निकलें, क्योंकि फेशियल के बाद त्वचा में पतलापन आ जाता है और तेज धूप से पतली त्वचा झुलस सकती है.                    

चौकलेट फेशियल के फायदे

– चौकलेट फेशियल किसी भी प्रकार के स्किन टाइप पर किया जा सकता है.

– चौकलेट में मौजूद ऐंटीऔक्सीडैंट्स त्वचा को फ्री रैडिकल डैमेज से भी बचाते हैं.

– चौकलेट में त्वचा को टैनिंग से बचाने की क्षमता भी होती है.

– यह स्किन को हाइड्रेट भी करता है, जिस से त्वचा की कोमलता बरकरार रहती है.

– चौकलेट फेशियल त्वचा में तेजी से कोलोजन बनाता है, जिस से त्वचा की इलास्टिसिटी बनी रहती है.

फेशियल से पहले ध्यान रखें

– फेशियल से पहले ब्लीच न कराएं, क्योंकि ब्लीच त्वचा पर कैमिकल की एक परत चढ़ा देती है, जिस से फेशियल का असर त्वचा पर कम दिखता है.

– फेशियल से 2 घंटे पहले कुछ भी न खाएं, क्योंकि शरीर एक समय एक ही कार्य कर सकता है यानी या तो खाना पचा सकता है या फिर मानसिक थकावट को कम कर रक्त संचार बढ़ा सकता है.

– यदि चेहरे पर पिंपल्स हैं या पके दाने हैं, तो पहले उन का ट्रीटमैंट करें. फेशियल कराने के हफ्ता भर पहले कच्चे दूध में लौंग भिगो कर मिश्रण को दानों पर लगाएं. 3 दिन में दाने सूख जाएंगे.

– हर 25 दिन में ही फेशियल कराएं. यदि इस से पहले कराएंगी तो त्वचा के डैड सैल्स के साथ ऐक्टिव सैल्स भी निकल जाते हैं, जो त्वचा के लिए हानिकारक है.

सटीक रणनीति से मिलेगी सफलता

देश में डाक्टरी, इंजीनियरिंग व मैनेजमैंट की धमक के बावजूद कम्बाइंड ग्रैजुएट लैवल ऐग्जाम (सीजीएल) के आकर्षण का आलम यह है कि इस में हर साल छात्रों की भारी भीड़ उमड़ती है. इस परीक्षा के जरिए असिस्टैंट इंस्पैक्टर, डिवीजनल अकाउंटैंट और कंपाइलर आदि पदों पर नियुक्ति की जाती है. सामान्यत: मार्च के अंत या अप्रैल के शुरुआती दिनों में इस का नोटिफिकेशन जारी किया जाता है. इस के बाद तैयारियों व परीक्षा का दौर शुरू हो जाता है. इस में आवेदन प्रक्रिया औनलाइन होती है. रजिस्ट्रेशन 2 चरणों में होता है.

स्नातक के बाद मिलता है अवसर

सीजीएल परीक्षा में वही अभ्यर्थी बैठ सकते हैं जिन्होंने किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय या महाविद्यालय से स्नातक किया हो. अर्थशास्त्र, सांख्यिकी या गणित विषय के साथ स्नातक करने वाले छात्रों को प्रमुखता दी जाती है. इस में आयु सीमा का भी प्रावधान है. अभ्यर्थी की आयु 18 से 30 वर्ष के बीच होनी चाहिए. उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे पदवार योग्यता और उम्र सीमा जांच लें.

सावधानीपूर्वक करें रजिस्ट्रेशन

इस में आवेदन प्रक्रिया औनलाइन होने के कारण अभ्यर्थियों को रजिस्ट्रेशन में सावधानी बरतनी होगी. सब से पहले उन्हें अपना फोटो, हस्ताक्षर व अन्य जरूरी प्रमाणपत्र स्कैन करने होंगे. यह ध्यान रखें कि इस स्कैन फाइल का साइज कम ही रहे. साथ ही उन्हें आवेदन करते समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कोई गलत विवरण न दिया जाए अन्यथा एक बार सबमिट हो जाने के बाद उसे ठीक करना संभव नहीं होगा.

4 चरणों पर दारोमदार

यह परीक्षा 4 चरणों में संपन्न होती है. अभ्यर्थी को पहले चरण में सफल होने के बाद दूसरे चरण में बैठने की अनुमति मिलती है. इस में परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड टैस्ट (सीबीटी) के रूप में होती है. सीजीएल की लिखित परीक्षा 200 अंकों की होती है तथा इस के 4 चरण होते हैं. प्रत्येक सैक्शन में 25-25 प्रश्न (कुल 100 प्रश्न) पूछे जाते हैं तथा इन के लिए सवा घंटे का समय निर्धारित रहता है. प्रश्न औब्जैक्टिव टाइप के होते हैं तथा इन का माध्यम हिंदी व अंगरेजी होता है.

ये हैं 4 सैक्शन :

–  जनरल इंटैलीजैंस व रीजनिंग.

–  जनरल अवेयरनैस.

–  क्वांटिटेटिव ऐप्टिट्यूड.

–  इंगलिश लैंग्वेज व कौंप्रीहैंशन.

प्रजैंस औफ माइंड जरूरी

सीजीएल में जनरल इंटैलीजैंस ऐंड रीजनिंग के सैक्शन में प्रश्न वर्बल व नौन वर्बल टाइप के होते हैं. इस के अलावा ज्यादातर प्रश्न एनोलौगीज, सिमिलरीज, डिफरैंसेज, प्रौब्लम सौल्विंग, एनालिसिस कौंसैप्ट, औब्जर्वेशन, अर्थमैटिक रीजनिंग, कोडिंग व डीकोडिंग तथा नौन वर्बल सीरीज पर आते हैं. इन प्रश्नों का उत्तर आप तभी दे पाएंगे जब आप का प्रैजैंस औफ माइंड मजबूत होगा अन्यथा प्रश्नों को ले कर उलझते रहेंगे.

डायरी पर नोट करते जाएं

सामान्य जागरूकता के अंतर्गत उम्मीदवारों से आसपास के वातावरण तथा समाज के संदर्भ में जागरूकता संबंधी परीक्षण, प्रतिदिन घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं, करैंट अफेयर्स, भारत और पड़ोसियों से संबंध के अलावा इतिहास, भूगोल, कला संस्कृति, आर्थिक परिदृश्य आदि पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं. जो कुछ महत्त्वपूर्ण लगे उसे एक जगह नोट करते जाएं.

अंगरेजी पर मजबूत पकड़ बनाएं

इंगलिश कौंप्रीहैंशन के सैक्शन में उम्मीदवारों से अंगरेजी भाषा की पकड़ जानने की कोशिश की जाती है. साथ ही लिखनेपढ़ने की योग्यता के अलावा व्याकरण, निबंध लेखन, अनुच्छेद लेखन से जुड़े प्रश्न आते हैं.

मैथ्स के फौर्मूले आएंगे काम

क्वांटिटेटिव ऐप्टिट्यूड में गणित के प्रश्न पूछे जाते हैं. ये मुख्य रूप से 10वीं व 12वीं स्तर के होते हैं. यह पूरी तरह से फौर्मूलों पर आधारित होते हैं. इस के लिए नियमित रूप से मैथ्स के फौर्मूले के साथ उन के सवालों की प्रैक्टिस करनी जरूरी होती है. ये सवाल मुख्य रूप से नंबर सिस्टम, दो नंबरों के बीच में संबंध, लाभहानि, प्रतिशतता, टेबल व ग्राफ का अनुप्रयोग, मैंशुरेशन, समयदूरी तथा औसत दूरी के होते हैं.

नैगेटिव मार्किंग का प्रावधान

इस परीक्षा में गलत उत्तर दिए जाने पर नैगेटिव मार्किंग का भी प्रावधान है. एक गलत उत्तर देने पर 0.50 अंक काट लिए जाते हैं. इसलिए उम्मीदवार सावधानीपूर्वक प्रश्नों का उत्तर लिखें. जिन प्रश्नों को ले कर संदेह की स्थिति है, उन्हें छोड़ कर आगे बढ़ जाएं. बाद में समय मिलने पर इन्हें एक बार जरूर देख लें.

मानसिक क्षमता मजबूत रखें

इस परीक्षा में छात्रों की भारी भीड़ उमड़ती है. सफलता उन्हीं को मिलती है जिन की तैयारी उच्च स्तर की होती है. ऐसे में उम्मीदवार अपनी तैयारी एक खास रणनीति के सहारे आगे बढ़ाएं. हो सकता है कि तैयारी के दबाव के चलते उन के मनमस्तिष्क पर तनाव हावी हो जाए. ऐसे में उन्हें तनाव दूर भगाने के लिए योग, व्यायाम अथवा टहलने की आदत डालनी चाहिए.                          

पहले सलेबस समझें, फिर शुरू करें तैयारी

सीजीएल परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थियों को अपनी तैयारी शुरू करने से पहले सलैबस को भलीभांति समझना जरूरी होता है, क्योंकि यह काफी विस्तृत होता है. उस के बाद सलैबस को समय के हिसाब से बांट लेना चाहिए. इस में यह ध्यान देना होता है कि 2 कठिन विषयों के बीच में एक आसान विषय पढ़ने से बोरियत नहीं होने पाएगी. जहां कठिनाई लगे वहां किसी ऐक्सपर्ट की मदद लें या ग्रुप स्टडी के सहारे इसे दूर करने की कोशिश करें. जिस विषय में खुद को कमजोर समझ रहे हों उस पर अपेक्षाकृत समय बढ़ा लें. उम्मीदवार यह ध्यान रखें कि अंतिम दिनों में कोई नया टौपिक न ले कर सिर्फ रिवीजन पर जोर देना होगा, क्योंकि अंतिम दिनों में यदि कोई नया टौपिक ले कर उलझेंगे तो रिवीजन नहीं हो पाएगा. अंतिम 10 दिन सिर्फ मौक टैस्ट के लिए आरक्षित रखें.    

     सत्येंद्र कुमार, डायरैक्टर तारा इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली  

औन डिमांड गाड़ियां चुराने वाला हाईटेक गैंग

पहली अप्रैल, 2017 की बात है. दिल्ली पुलिस के दक्षिणीपूर्वी जिले के इंचार्ज राजेंद्र कुमार अपने औफिस में सबइंसपेक्टर प्रवेश कसाना और अजय कटेवा से एक केस के बारे में विचारविमर्श कर रहे थे, तभी एक पुराना मुखबिर उन के पास आ पहुंचा. वह उन का विश्वसनीय मुखबिर था. वह जब भी आता था, कोई न कोई नई जानकारी लाता था. इसलिए उसे देखते ही इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने उसे कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहिए, क्या नई खबर है?’’

‘‘सर, खबर इतनी दमदार है कि आप भी खुश हो जाएंगे.’’ उस ने कहा.

इतना सुनते ही इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार और दोनों सबइंसपेक्टर उस के चेहरे की तरफ देखने लगे. इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने कहा, ‘‘अब पहेलियां मत बुझाओ, जो भी हो सीधे बता दो.’’

‘‘ठीक है सर, बताता हूं.’’ कह कर उस ने बताना शुरू किया, ‘‘सर, सूचना ऐसे कार चोर गैंग की है, जो केवल औन डिमांड कारों को चुराता है. इस के अलावा इस गैंग की एक खास बात यह है कि वह कंप्यूटर, लेटेस्ट सौफ्टवेयर व अन्य हाईटेक उपकरणों से मिनटों में ही कार को ले उड़ता है. गैंग के सदस्य आज शाम 4-5 बजे के बीच सफेद रंग की वेरना कार से न्यू फ्रैंड्स कालोनी में आएंगे. उन का इरादा एस्कार्ट्स अस्पताल के आसपास से किसी कार पर हाथ साफ करना है.’’

उस ने उन की वेरना कार का नंबर भी बता दिया. सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने एसीपी औपरेशन के.पी. सिंह और डीसीपी रोमिल बानिया को फोन से यह खबर दे दी. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में लग्जरी कारों की चोरी की वारदातें बढ़ती जा रही थीं. दक्षिणपूर्वी दिल्ली में ही कई लग्जरी कारें चोरी हो चुकी थीं, लेकिन उन का खुलासा नहीं हो पा रहा था.

29 मार्च, 2017 को ही न्यू फ्रैंड्स कालोनी से योगेश कुमार आनंद की फार्च्युनर कार नंबर डीएल3सीबी डी-5094 चोरी हो गई थी, जिस की उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करा रखी थी. इस के अलावा जिले में इस से पहले भी कई गाडि़यां चोरी हो चुकी थीं.

पुलिस को चोरों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. डीसीपी रोमिल बानिया ने एसीपी (औपरेशन) के.पी. सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार, एसआई प्रवेश कसाना, अजय कटेवा, एएसआई हरेंद्र सिंह, फूल सिंह, दलीप सिंह, हैडकांस्टेबल विनोद कुमार, नरेश कुमार, अनिल, कांस्टेबल विशाल, विनीत, राहुल, दिनेश आदि को शामिल किया गया. डीसीपी ने टीम को निर्देश दिया कि वह मुखबिर द्वारा बताई गई जगह पर पहुंच कर जरूरी काररवाई करे.

निर्धारित समय से पहले ही पुलिस टीम न्यू फ्रैंड्स कालोनी पहुंच गई. टीम ने मीराबाई पौलिटेक्निक के पास बैरिकेड्स लगा कर रिंगरोड की तरफ से आने वाली कारों की जांच शुरू कर दी. पुलिस की नजर तो वेरना कार पर थी. उधर से जो भी वेरना कार आती हुई दिखती, पुलिस उस कार के कागजात बड़ी ही गंभीरता से चैक करती. यह काम करतेकरते पुलिस को करीब एक घंटा बीत गया, पर मुखबिर द्वारा बताए गए नंबर की वेरना कार नहीं आई.

ऐसे में पुलिस को यह आशंका होने लगी कि कहीं उन कार चोरों को पुलिस चैकिंग की भनक तो नहीं लग गई. जिस के बाद उन्होंने अपनी योजना बदल दी हो. इंसपेक्टर राजेंद्र कुमार ने इस संबंध में एसीपी से बात की तो उन्होंने कहा कि वह शाम 6 बजे तक अपनी काररवाई जारी रखें. लिहाजा वाहनों की चैकिंग की काररवाई जारी रही.

शाम करीब सवा 5 बजे सफेद रंग की वेरना कार नंबर डीएल8सी एए-9035 आती दिखी. यह वही नंबर था, जो मुखबिर ने बताया था. जैसे ही वह कार नजदीक आई, पुलिस ने उसे रोक लिया. उस कार में पिछली सीट पर 2 युवक बैठे थे, जबकि आगे की सीट पर ड्राइवर के बराबर में एक युवक था. पुलिस ने उन से कार के पेपर दिखाने को कहा तो वे इधरउधर की बातें करने लगे.

पुलिस ने कार का चैसिस व इंजन नंबर नोट कर के जिपनेट पर चैक किया तो वह कार चोरी की निकली. पता चला कि वह 12 मार्च, 2017 को दिल्ली के नौर्थ रोहिणी से चुराई गई थी, जिस की चोरी की रिपोर्ट दर्ज थी. पुलिस ने कार को अपने कब्जे में ले कर उन चारों युवकों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ में उन्होंने अपने नाम क्रमश: शोएब खान (32 साल) निवासी अनूपशहर रोड अलीगढ़, आमिर उर्फ अमन (27 साल) निवासी गांव किलोली, बुलंदशहर, सफर उर्फ सफरुद्दीन (28 साल) निवासी नंदनगरी दिल्ली और सगीर (32 साल) गांव इसलामपुर, जिला बदायूं, उत्तर प्रदेश बताए.

स्पैशल स्टाफ औफिस ले जा कर जब उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने इस वेरना कार के अलावा हाल ही में कई कारें और चुराई थीं, जो दिल्ली की अलगअलग जगहों की पार्किंग में खड़ी हैं. पुलिस टीम सब से पहले उन्हें ओखला के बटला हाउस ले गई. वहां शोएब की निशानदेही पर पब्लिक पार्किंग से सफेद रंग की होंडा सिटी कार, एक आई20 कार बरामद की. उस ने बताया कि होंडा सिटी कार 12 जून, 2016 को दिल्ली के रानीबाग से और आई20 कार इसी साल दिल्ली के गाजीपुर से चुराई गई थी.

एसआई प्रवेश कसाना अभियुक्त सगीर को ओखला के अबुल फजल एनक्लेव ले गए. उस की निशानदेही पर वहां की पार्किंग से सफेद रंग की 3 स्विफ्ट डिजायर कारें और एक हलके नीले रंग की सैंट्रो कार बरामद की गई. उस ने बताया कि स्विफ्ट डिजायर कारें उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर दिल्ली के पश्चिम विहार, जहांगीरपुरी और विजय विहार, रोहिणी से तथा सैंट्रो कार ग्रेटर कैलाश से चुराई थी.

पुलिस ने सभी कारें अपने कब्जे में ले लीं. पुलिस को लगा कि ये अभियुक्त अभी भी कुछ छिपा रहे हैं. इसलिए इन से फिर सख्ती की गई. इस का नतीजा यह निकला कि उन की निशानदेही पर पुलिस ने दिल्ली की अलगअलग पार्किंग से 2 हुंडई क्रेटा, एक स्विफ्ट डिजायर, एक फार्च्युनर और एक मारुति ईको कार और बरामद कर ली. फार्च्युनर कार उन्होंने 29 मार्च, 2017 को न्यू फ्रैंड्स कालोनी क्षेत्र से, मारुति ईको अमर कालोनी से और हुंडई क्रेटा दिल्ली के रूपनगर से और नोएडा से चुराई थीं. पुलिस ने ये कारें भी कब्जे में ले लीं.

इन से पूछताछ में जो बात पता चली, वह यह थी कि यह कोई आम कार चोर नहीं थे, बल्कि हाईप्रोफाइल थे. कार चुराने में सहयोग करने वाले महंगे उपकरणों से लैस यह गैंग खाली समय में यूट्यूब पर कार चुराने वाले वीडियो देखता था. ऐसा भी नहीं था कि जिस कार को चुराने का मौका मिलता था, उसे ले जाते थे, बल्कि हकीकत यह थी कि जिन लोगों को यह चुराई हुई कारें बेचते थे, वहां से इन के पास डिमांड आती थी. जिस कंपनी की कार की इन के पास डिमांड आती थी, उसी कार को यह चुराने की कोशिश करते थे.

आसपास की रैकी करने के बाद ये अपने लैपटौप में मौजूद सौफ्टवेयर से सब से पहले यह पता लगाते थे कि उस कार में कौनकौन से सेफ्टी डिवाइस लगे हैं. अपने पास मौजूद उपकरण से वे यह भी पता लगा लेते थे कि उस कार में जीपीएस सिस्टम है या नहीं. जिस कार में जीपीएस लगा होता था, वे उसे चुराने से बचते थे.

कुछ कारों में सेंसर अलार्म लगा होता है, जो गाड़ी के टच करने पर बज जाता है. अपने पास मौजूद कंप्यूटर सौफ्टवेयर से वे इस का पता लगा लेते थे. फिर किसी तरह उस का बोनट खोल कर अलार्म सिस्टम के तार काट देते थे.

टारगेट की गई कार का लौक वे मास्टर की से खोलने की कोशिश करते थे. यदि लौक नहीं खुलता तो स्कैनर की सहायता लेते थे. इस तरह चंद मिनटों में वे कार ले कर उड़नछू हो जाते थे. चुराई हुई कारों को वे कुछ दिनों तक कहीं फ्री पार्किंग में खड़ी करते, फिर आगे सप्लाई कर देते थे.

गैंग के सदस्य आमिर और सफर अच्छे मोटर मैकेनिक थे. इस के बावजूद भी वे कार चोर कैसे बन गए और किस तरह वे गैंग बना कर चोरी की वारदातों को अंजाम देने लगे, इस की कहानी बड़ी दिलचस्प है.

आमिर उर्फ अमन उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गांव किलोली के रहने वाले नसरुद्दीन का बेटा था. 9 भाईबहनों में वह दूसरे नंबर का था. पिता की कोशिश के बाद भी वह 7वीं जमात से आगे नहीं पढ़ सका. तब पिता ने उसे एक मोटरसाइकिल मैकेनिक के पास लगा दिया. वहां करीब 5 साल काम सीखने के बाद आमिर एक अच्छा मैकेनिक बन गया. उस ने कुछ दिनों तक नोएडा की एक कंपनी में नौकरी की. पर नौकरी में उस का मन नहीं लगा.

तब उस ने नोएडा में एक वर्कशौप खोल ली. उस का काम चलने लगा. इसी दौरान आमिर की मुलाकात सफर उर्फ सफरुद्दीन से हुई, जो बदायूं के इसलामपुर गांव का रहने वाला था. इस के भी 7 भाई थे. 12वीं पास करने के बाद इस ने अपने पिता के साथ चूडि़यां बेचनी शुरू कर दीं. बाद में इस ने मोटरसाइकिल मैकेनिक का काम सीख लिया.

सफर की मुलाकात राजू नाम के एक युवक से हुई, जो वाहन चोर था. राजू ने लालच दिया तो वह उस के साथ काम करने को तैयार हो गया. राजू ने उसे सगीर अहमद से मिलवाया. सगीर उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं का रहने वाला था. सगीर ने उसे अपने अन्य दोस्तों से मिलवाया. तभी उन सब की मुलाकात आमिर से हुई.

इन सब ने मिल कर दिल्ली से एक कार चुराई. कार चुरा कर ये दिल्ली से गाजियाबाद लौट रहे थे, तभी गाजियाबाद पुलिस ने उन से गाड़ी के कागज मांगे. इन के पास कागज थे नहीं, सो उन्होंने सच्चाई बता दी. तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर डासना जेल भेज दिया. उस समय उनके साथ सुलेमान, सगीर भी थे.

डासना जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद सफर मोटर मैकेनिक का काम करने लगा. उसी दौरान सफर की मुलाकात नांगलोई के चरनप्रीत से हुई. चरनप्रीत एक कार चोर था. सफर ने चरनप्रीत के साथ कारों की चोरी शुरू कर दी. सन 2015 में वह दिल्ली क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ गया. उस के गिरफ्तार होने पर चोरी की 15 वारदातों का खुलासा हुआ.

जेल में ही उस की मुलाकात सगीर उर्फ सत्ता से हुई, जो उत्तर प्रदेश के जिला संभल का रहने वाला था. सगीर चोरी की कारें खरीद कर उन्हें पूर्वोत्तर के राज्यों में सप्लाई करता था. एक मामले में वह दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद सगीर, सफर उर्फ सफरुद्दीन, आमिर ने अपना अलग गैंग बनाया. गैंग में उन्होंने अलीगढ़ के शोएब को भी मिला लिया. फिर चारों ने दिल्ली और एनसीआर से कारों की चोरी शुरू कर दी. चुराई गई कारें वह संभल, दीपा सराय के रहने वाले सगीर उर्फ सत्ता को बेच देते थे. सत्ता चोरी की कारें सस्ते दाम पर खरीद कर उन्हें असम, गुवाहाटी, दार्जिलिंग आदि जगहों पर भेज देता था. कुछ कारें वह मेरठ के असरार, परवेज और गुलफाम को भी बेचता था, जो कारों को काट कर कबाड़ में बेच देते थे.

शोएब, सफर, आमिर और सगीर की जब मोटी कमाई होने लगी तो उन्होंने भी बनठन कर रहना शुरू कर दिया. सत्ता के पास जैसे ही लग्जरी कारों की डिमांड आती, वह इन लोगों से लग्जरी कारों की मांग करता.

लग्जरी कारों की सुरक्षा लोग तरहतरह के लौकिंग सिस्टम लगवा लेते हैं. वे लौकिंग सिस्टम कैसे खोले जाएं, इस के लिए इन लोगों ने यूट्यूब पर वीडियो देखनी शुरू कर दी.

बदलते समय के साथ इन्होंने खुद को भी मोडिफाइ कर लिया. लैपटौप ले कर इन्होंने उस में ऐसे सौफ्टवेयर लोड कराए, जिन की सहायता से कार के अंदर से लौकिंग सिस्टम की जानकारी मिल सके. लौकिंग प्रणाली जानने के लिए इन्होंने एक स्कैनर भी खरीद रखा था. महंगे उपकरण खरीदने के बाद इन्हें कार चुराना आसान हो गया. उन की सहायता से ये मिनटों में ही कार को उड़ा लेते थे.

पुलिस ने बताया कि औन डिमांड कार चुराने वाला यह गिरोह पिछले 2 सालों से राजधानी और आसपास से करीब 500 कारें चुरा चुका है.

गिरोह के सदस्य शोएब का काम टारगेट निश्चित करना था. जो कार चुरानी होती थी, शोएब अपने मोबाइल से उस के फोटो खींच कर अपने साथियों को वाट्सऐप करता था. रैकी करने के बाद उस कार को चुरा कर दिल्ली में ही कहीं पार्किंग में खड़ी कर देते थे. फिर कुछ दिनों बाद उसे संभल में सत्ता के पास पहुंचा देते. फिर सत्ता उन्हें पूर्वोत्तर के राज्यों में या मेरठ में गुलफाम, परवेज, असरार के पास पहुंचा देता था. 29 मार्च, 2017 को दिल्ली के न्यू फ्रैंड्स कालोनी इलाके से योगेश कुमार आनंद की जो फार्च्युनर कार चोरी हुई थी, वह भी इसी गैंग ने चुराई थी.

पुलिस ने इन चारों कार चोरों की निशानदेही पर संभल से सत्ता और मेरठ से परवेज, असरार व गुलफाम के ठिकानों पर दबिशें दीं, लेकिन वे सभी फरार मिले. इन रिसीवरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को बड़ी कामयाबी मिल सकती थी.

बहरहाल, पुलिस ने सगीर, सफर, आमिर और शोएब को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया है. इन के कब्जे से पुलिस ने चोरी में प्रयोग होने वाले कई उपकरण भी बरामद किए हैं. मामले की तफ्तीश सबइंसपेक्टर प्रवेश कसाना कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

पेड़ों के लिए दी जान

25 मार्च, 2017 की बात है. राजस्थान के जोधपुर जिले में बिलाड़ा उपखंड के गांव हरियाढाणा में सड़क चौड़ी की जा रही थी. इस काम में कुछ पेड़ बीच में आ रहे थे, जिन्हें हटाया जाना जरूरी था. वे पेड़ काफी पुराने थे, जो ललिता के खेत की मेड़ के पास थे. उन पुराने पेड़ों को ललिता किसी भी सूरत में बचाना चाहती थी. वहां गांव के तमाम लोग खड़े थे, जो ललिता की जिद का विरोध कर रहे थे. ललिता के भाई विद्याधर और किशन तथा बहन सुमन भी वहां थी. ये सभी ललिता का साथ दे रहे थे.

उसी समय रहस्यमय परिस्थितियों में ललिता के शरीर से आग की लपटें उठने लगीं. उस के शरीर पर आग पैट्रोल डाल कर लगाई गई थी. आग की लपटें उठते ही कुछ लोग वहां से भाग गए तो कुछ तमाशबीन बने नजारा देखते रहे. कुछ तो अपने फोन से उस की वीडियो बनाने लगे थे. ललिता के भाई और बहन मदद के लिए चिल्लाते रहे, लेकिन किसी का भी दिल नहीं पसीजा.

घर वालों ने किसी तहर ललिता के शरीर की आग बुझाई. तब तक वह काफी झुलस चुकी थी. उसे कोरूंदा के सरकारी अस्पताल ले जाया गया. पर हालत सीरियस होने की वजह से प्राथमिक उपचार के बाद उसे जोधपुर के महात्मा गांधी चिकित्सालय के लिए रैफर कर दिया गया. वहां के डाक्टर उसे बचाने में जुट गए. पर काफी कोशिश के बाद भी वे उसे बचा नहीं सके. अगले दिन ललिता की मौत हो गई. पुलिस उस का बयान भी नहीं ले सकी.

ललिता के भाई विद्याधर ने पुलिस को बताया कि उस की बहन ललिता सड़क बनने के दौरान पेड़ काटने का विरोध कर रही थी. तभी गांव के सरपंच रणवीर सिंह चांपावत, पटवारी ओमप्रकाश, भैंरूबख्श, बाबू चौकीदार, सुरेश चौकीदार, मदन सिंह, हिम्मत सिंह आदि के साथ आए और जेसीबी से पेड़ उखाड़ने लगे.

इस पर उस के भाई किशन, बहन ललिता और सुमन ने विरोध किया तो वे मारपीट करने लगे. उसी बीच बाबू चौकीदार ने श्रवण सिंह से कहा कि पैट्रोल ला, आज सारी समस्या ही खत्म कर देते हैं. जब श्रवण पैट्रोल ले कर आया तो किशन, ललिता और सुमन जान बचाने के लिए भागने लगे लेकिन सरपंच और उस के आदमियों ने उन्हें पकड़ लिया.

बाबू चौकीदार ने ललिता को पकड़ कर नीचे गिरा दिया. किशन और सुमन उसे बचाने लगे तो हिम्मत सिंह, मदन सिंह और भैंरूबख्श ने दोनों को पकड लिया. इस के बाद बाबू चौकीदार, श्रवण सिंह, सुरेश आदि ने ललिता पर पैट्रोल डाल कर जला दिया और भाग गए. विद्याधर की तहरीर पर पुलिस ने 26 मार्च को उक्त लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 147, 149, 323 व 447 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. इस के अलावा पुलिस ने ललिता के शव को मैडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करवाने के बाद परिजनों को सौंप दिया.

ललिता की मौत पर गांव के कुछ लोगों में आक्रोश था. गांव की शांति व्यवस्था भंग न हो जाए, इस के लिए तनाव को देखते हुए एसपी ने बिलाड़ा, पीपाड़, भोलागढ़ सहित कई थानों की पुलिस को गांव में तैनात कर दिया. 27 मार्च को पुलिस व्यवस्था के बीच ललिता का अंतिम संस्कार उसी जगह किया गया, जहां वह जली थी.

पूरा गांव पुलिस छावनी बन चुका था. उसी दिन पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) हरेंद्र कुमार महावर के नेतृत्व में 6 पुलिस टीमें गठित की गईं. इन टीमों ने घटनास्थल के आसपास के 10 किलोमीटर के इलाके में तफ्तीश की. विधि विज्ञान प्रयोगशाला की टीम ने मौके से वह बोतल जब्त की, जिस में पैट्रोल लाया गया था. इस के अलावा टीम ने अन्य सबूत भी जुटाए. पुलिस ने पूछताछ के लिए कुछ लोगों को हिरासत में लिया. इस में जेसीबी का चालक भी शामिल था.

जिस समय ललिता के जीवित जलने की लोमहर्षक घटना घटी थी, उस समय जयपुर में विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था. ललिता की मौत के मामले को खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल ने 27 मार्च को विधानसभा में पौइंट इनफौर्मेशन के तहत उठाया. उन्होंने इस घटना को बहुत गंभीर बताया.

इस पर गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने जवाब में कहा कि जब यह घटना घटी थी, उस दौरान पटवारी, सरपंच और गांव के अन्य लोग वहां मौजूद थे. इतने लोगों की मौजूदगी में ललिता स्वयं जली या उसे जलाया गया, यह जांच का विषय है.

ग्रामीणों ने बताया कि गांव हरियाढाणा से गोड़ावट तक 6 किलोमीटर लंबी कटाणी रोड बननी थी. इस के दोनों ओर सीमा पर लोगों ने अतिक्रमण कर पेड़ लगा रखे हैं. पेड़ों के बीच झाडि़यां लगने से मिट्टी की पाल (मेड़) बन गई. यह पाल इतनी बड़ी हो गई कि इस के पीछे चलने पर छोटा वाहन भी नजर नहीं आता है.

पिछले सालों में जो भी सरपंच चुने गए, उन्होंने विवाद के चलते ही वहां सड़क बनाने में रुचि नहीं दिखाई. मौजूदा सरपंच ने अतिक्रमण हटाने के लिए कलेक्टर से ले कर अन्य जगहों पर शिकायत की थी. इस के बाद राजस्व विभाग ने रणसी गांव के पटवारी पृथ्वीदान, खेजड़ला पटवारी हापूराम व हरियाढाणा पटवारी के नेतृत्व में अतिक्रमण चिन्हित करने के लिए आदेश दिए थे. यह सब होने के बाद ही यह 6 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का फैसला लिया था. इस में से केवल 2 किलोमीटर सड़क ही बन सकी थी कि यह जानलेवा घटना हो गई.

इस 6 किलोमीटर के रास्ते में आने वाले अधिकांश खेतों में रास्ता क्लीयर नहीं था. कुछ खेतों तक तो सड़क बना दी गई थी. 25 मार्च, 2017 को खसरा नंबर 948 के पास यह घटना हो गई. जेसीबी से खसरा नंबर 924 व 926 से अतिक्रमण हटाया जा रहा था, तब यह घटना हुई.

जहां पर यह रोड बनाई जाने वाली थी, वहां पर कब्जे इस कदर हैं कि लोगों ने पक्के गेट लगा रखे हैं. कुछ ग्रामीणों ने बताया कि पंचायत ने उन गेट वालों को छेड़ा तक नहीं. जबकि इस से काफी दूर ललिता के परिवार के दोनों खसरों में वे सभी अतिक्रमण हटाने पहुंच गए.

विद्याधर का कहना था कि वे लोग हमारी जमीन सड़क में ज्यादा ले रहे थे. इस का मैं और बहन विरोध कर रहे थे. इन लोगों ने 22 मार्च को जेसीबी से उन के दूसरे खेत के पेड़ उखाड़ दिए थे. बरसों पहले की दीवार भी तोड़ दी थी. इस के बाद ये लोग 25 मार्च को फिर जेसीबी ला कर पेड़ उखाड़ने लगे. हम ने इसी का विरोध किया था.

ललिता की बहन सुमन का कहना था कि घटना के वक्त सरपंच, पटवारी सहित कई कर्मचारी वहां मौजूद थे, साथ ही अतिक्रमण का विवादास्पद मामला होने के कारण सौ से ज्यादा लोग उपस्थित थे, लेकिन किसी ने ललिता को बचाया नहीं. हम चिल्लाते रहे, लेकिन ललिता हमारी आंखों के सामने जल गई. अगर समय रहते आग बुझा देते तो उस की जान बच सकती थी.

घटना की सच्चाई जानने के लिए 28 मार्च को एसपी ने गांव में कैंप किया. जिलाधिकारी भी पूरे दिन गांव में रहे. दोनों ने घटना का क्राइम सीन क्रिएट किया तो देखा कि घटना के चश्मदीद, पीडि़त का परिवार और जेसीबी चलाने वाले कोशिश करते तो शायद ललिता को बचाया जा सकता था.

अधिकारियों ने क्राइम सीन क्रिएट करते हुए 3 बिंदुओं पर जांच की. पहला यह कि ललिता जली या जलाई गई थी. इस के तहत एसपी (देहात) हरेंद्र कुमार महावर ने पेड़ों के पास 2 जेसीबी खड़ी कीं. खेजड़ी के पेड़ के नीचे ग्रामीणों को बैठाया और खुद घटनास्थल पर रहे. जेसीबी चालकों के साथ डीएसपी भी बैठे. घटनास्थल से आवाज आते ही डीएसपी मौके की ओर भागे, जैसे ललिता का भाई विद्याधर दौड़ा था. वीडियो का एंगल भी देखा गया, जिस में ग्रामीण दूर खड़े दिख रहे हैं.

जांच का दूसरा बिंदु यह था कि ललिता को जलाने का कारण क्या रहा? पुलिस ने ललिता के जलनेजलाने का विश्लेषण किया. इस के तहत आरोपियों की कौल डिटेल्स व लोकेशन की जानकारी ली गई. तीसरा बिंदु यह रखा गया था कि इस घटना के लिए जिम्मेदार कौनकौन लोग रहे?

पुलिस के लिए यह जिम्मेदारी तय करना चुनौती बन गया. यदि ललिता खुद जली थी, पैट्रोल की बोतल अपनी ढाणी से लाई थी तो जिम्मेदारी उस के परिवार की भी तय हो सकती थी. पर जो लोग दूर खड़े देख रहे थे, उन्होंने भी उसे बचाने का प्रयास नहीं किया तो जिम्मेदार वे लोग भी होंगे.

  सरपंच, पटवारी की जिम्मेदारी इस से तय की जानी थी कि उन्होंने रास्ता खोलने के लिए पूरे परिवार की सहमति क्यों नहीं ली? और विवाद था तो पुलिस को साथ क्यों नहीं रखा?

घटना के चश्मदीद ग्रामीणों ने बताया कि 3 खेतों के बीच ललिता की ढाणी है. जहां ललिता जली और जहां जेसीबी पेड़ उखाड़ रहे थे, उन दोनों के बीच 500 फुट का फासला था. उस से 100 फुट दूरी पर ही खेजड़ी के पेड़ की छांव में 50-60 लोग बैठे थे. इन में सरपंच, पटवारी भी शामिल थे.

अचानक ललिता का भाई विद्याधर चिल्लाया. उस की आवाज सुन कर लोग खड़े हो गए. तब उन्हें मेड़ के पार ललिता जलती हुई दिखाई दी. विद्याधर ललिता की तरफ दौड़ा. लोगों के बीच खड़े श्रवण ने कहा कि उसे बचाओ, लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ा. वह तारों की बाड़ कूद कर दौड़ा और मिट्टी डाल कर आग बुझाने की कोशिश की, मगर आग बुझी नहीं.

अपने पेड़ों को काटने से बचाने के लिए जान गंवाने वाली ललिता के मामले में माननीय उच्च न्यायालय के जज एवं हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति के अध्यक्ष माननीय गोपालकृष्ण व्यास ने 28 मार्च को संज्ञान लिया. उन्होंने ललिता के परिवार के सदस्यों को विधिक सहायता दिलाने के लिए निर्देश भी दिए. विधिक सेवा प्राधिकरण की आकस्मिक बैठक आयोजित कर पीडि़त परिवार को ढाई लाख रुपए अंतरिम राहत के रूप में देने का फैसला लिया गया.

इस घटना को ले कर आरोपी सामने तो नहीं आए, लेकिन सरपंच रणवीर सिंह ने सोशल मीडिया पर वीडियो के माध्यम से बताया, ‘‘ललिता की जलने से हुई मौत के मामले में मुझ पर और पटवारी पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे निराधार हैं. ललिता घटनास्थल से बहुत दूर जली थी. घटना पर मैं ने ही बोरूंदा पुलिस को फोन किया था और ऐंबुलेंस भी बुलवाई थी.’’

मामले की जांच के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग के सदस्य आलोक रावत 29 मार्च को जोधपुर पहुंचे. पीडि़त परिवार से बात करने के अलावा उन्होंने पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों से बात की.

29 मार्च को ही वन विभाग व सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने भी घटनास्थल का दौरा कर मौका रिपोर्ट बनाई. सार्वजनिक निर्माण विभाग पीपाड़ शहर के सहायक अभिंयता मदनलाल परिहार की टीम ने मौकामुआयना कर पुरानी पाइप लाइन की हौदियों को तोड़ने से हुए करीब सवा लाख रुपए के नुकसान का आकलन किया.

वहीं बिलाड़ा वन विभाग के अधिकारी हीराराम के साथ 4 सदस्यों की टीम ने भी निरीक्षण कर एक दरजन पेड़ काटने की रिपोर्ट तैयार की. बिलाड़ा के तहसीलदार और विकास अधिकारी ने निरीक्षण कर अलगअलग रिपोर्ट तैयार कीं.

एएसपी नरपत सिंह, बिलाड़ा के सीओ सेठाराम सहित अन्य थानों के पुलिस अधिकारी दिन भर जांच में जुटे रहे. पुलिस ने 2 दरजन से अधिक लोगों से पूछताछ की.

सभी रिपोर्टों का अध्ययन करने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने 31 मार्च को अपनी रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. इस में खुलासा हुआ कि जो सड़क वहां बनाई जा रही थी, उस की स्वीकृति संबंधित विभाग से नहीं ली गई थी और न ही अतिक्रमण हटाने का कोई आदेश किसी अधिकारी ने दिया था. पटवारी और सरपंच जो सड़क बनाने के लिए वहां गए थे, उस की अनुमति नहीं दी गई थी. इस का मतलब तो यही हुआ कि यह सब सरपंच ही अपने प्रभाव से करा रहा था.

एसपी (देहात) हरेंद्र कुमार महावर ने एक सप्ताह की जांचपड़ताल के बाद पहली अप्रैल को आधिकारिक रूप से कहा कि ललिता ने आत्महत्या की थी, मगर उसे यह सब करने के लिए इन आरोपियों ने मजबूर किया था. आरोपियों ने उस के खेत की मेड़ तोड़ी व पेड़ काटे थे. पुलिस की जांच में सामने आया कि अपने खेत की मेड़ व पेड़ बचाने के लिए जिंदा जली ललिता सरपंच व उस के दबंगों के आगे लाचार हो गई थी. कटाण का रास्ता निकालने के लिए उस का ही खेत टारगेट किया गया था और घटना से 3 दिनों पहले इन्हीं दबंगों ने रात 10 बजे उस की आधी मेड़ तोड़ दी थी.

मेड़ तोड़ने के बाद पूरा परिवार गांव के हर जिम्मेदार और प्रतिष्ठित आदमी से मिला, मगर किसी ने मदद नहीं की. बल्कि 25 मार्च को सरपंच व पटवारी खेत की बची मेड़ तोड़ने और पेड़ों को उखाड़ने के लिए जेसीबी ले कर पहुंच गए. चारों ओर से हताश हो कर ललिता ने पैट्रोल से भरी पूरी बोतल अपने ऊपर उड़ेल कर आग लगा ली थी. पुलिस ने जांच में सभी आरोपियों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का दोषी माना.

पुलिस ने 4 आरोपियों मदन सिंह, रतन सिंह, जीवन सिंह और गजेंद्र सिंह को पहली अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया. अपनी जांच में पुलिस ने यह भी पाया कि ललिता ने पैसा खर्च कर के वन विभाग से मेड़बंदी करवा रखी थी. उस दिन जेसीबी से पूरी मेड़ तोड़ दी जाती तो इस परिवार को करीब 15 लाख रुपए का नुकसान होता, जिस की क्षतिपूर्ति इस परिवार के लिए मुश्किल थी. इसलिए जब रात में दबंगों ने कहर ढाया तो 2 दिनों तक पूरा परिवार रोता रहा.

मेड़ टूटने की खबर पा कर ललिता की मां की हालत खराब हो गई थी. तब उस का भाई मां को जोधपुर में मामा के घर छोड़ आया. भाई को भी दबंगों ने मजबूर कर रखा था और धमका कर उसे अतिक्रमण हटाने के दौरान वहां खड़ा रखा.

यह बरसों पुराना विवाद था, मगर सरपंच रणवीर सिंह की जिद थी कि इसे अभी हटाना है. उस ने ललिता के खेत की जमीन ज्यादा अतिक्रमित मानी, दूसरों की बहुत कम. दूसरे खातेदारों की थोड़ी जमीन ली और उन की दीवार, मेड़ और पेड़ नहीं हटाए. सड़क बनाने के लिए विधिक प्रशासनिक मंजूरी भी नहीं ली गई थी.

दोषियों की गिरफ्तारी की मांग को ले कर एक अप्रैल को राजस्थान ब्राह्मण महासभा ने जोधपुर में कैंडल मार्च निकाला. इतना ही नहीं, 3 अप्रैल को ग्रामीणों के साथ ब्राह्मण समाज के लोगों ने जोधपुर जिला कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया और दधीचि पार्क पर धरना दे कर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा.

ज्ञापन में मांग की गई कि पेड़ों की रक्षा के लिए जली ललिता को शहीद का दर्जा दिलाया जाए और पीडि़त परिवार को पर्याप्त आर्थिक सहायता दी जाए. लोगों ने मांगें पूरी नहीं होने तक धरना देने व अनशन करने की चेतावनी दी.

दूसरी ओर पटवार संघ की ओर से जिलाधिकारी को ज्ञापन दे कर मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई. संघ के अध्यक्ष के.पी. सिंह व महासंघ जिलाध्यक्ष शंभू सिंह मेड़तिया ने कहा कि पटवारी को दोषी ठहराया गया तो संघ आंदोलन करेगा. इस पर जिलाधिकारी ने कहा कि रेवेन्यू मामले की जांच मानाराम पटेल करेंगे और कहा कि यदि पुलिस जांच में पटवारी दोषी पाया जाता है तो उस में वह कोई मदद नहीं करेंगे.

कथा लिखे जाने तक कुल 7 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका था, जबकि नामजद सरपंच और पटवारी सहित कुछ अन्य आरोपी फरार थे.

शिल्पा शिंदे : टीवी की दुनिया का डूबा सितारा

टीवी इंडस्ट्री फिल्मों से भी आगे निकल गई है. साल भर में भारत में जितनी फिल्में बनती हैं, उस से कहीं ज्यादा टीवी शो बनते हैं, जिन में रियल्टी शो भी शामिल हैं. टीआरपी के खेल के चलते ऐसे में गलाकाट प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है. हर निर्मातानिर्देशक चाहता है कि उस के शो की टीआरपी सब से ऊपर रहे. ऐसा हो नहीं पाता, यह अलग बात है.

अगर टीआरपी की बात करें तो इस के लिए सब से पहले कहानी का दमदार होना जरूरी है, दूसरे शो में काम करने वाले कलाकारों का अभिनय भी मायने रखता है. चूंकि एकएक शो को बनाने और चैनल पर लाने में करोड़ों रुपया लगता है, इसलिए यह काम छोटे निर्माताओं के वश में नहीं रहा, भले ही वह कितनी ही अच्छी कहानी और कलाकारों के साथ छोटे परदे पर आना चाहते हों.

टीवी इंडस्ट्री की इसी गलाकाट प्रतियोगिता के बीच ऐंड टीवी चैनल पर 2 मार्च, 2015 को एक शो शुरू हुआ था ‘भाबीजी घर पर हैं’. इस के निर्माता हैं संजय कोहली और बिनायफर कोहली. इस शो की खास बात यह है कि इस में 2-3 एपीसोड में कहानी बदल जाती है. हलकेफुलके हास्यव्यंग्य वाले इस शो की हर कहानी केवल 4 कैरेक्टरों के इर्दगिर्द घूमती है. मतलब यूसुफ शेख यानी विभूति नारायण मिश्रा, सौम्य टंडन यानी अनीता मिश्रा, रोहिताश गौड़ यानी मनमोहन तिवारी और शिल्पा शिंदे (अब शुभांगी अत्रे) यानी अंगूरी भाभी.

कुछ अलग फ्लेवर वाले इस शो ने जब शोहरत पाई, तब यह यूसुफ शेख, रोहिताश गौड़, सौम्या टंडन और शिल्पा शिंदे के ही कंधों पर ही टिका था. मासूम और बौड़म सी दिखने वाली अंगूरी (शिल्पा शिंदे) के चालढाल और खास डायलौग ‘सही पकड़े हैं’ ने इसे और ज्यादा रोचक और मशहूर बना दिया था. कहानी में तड़का लगाने का काम किया योगेश त्रिपाठी यानी दारोगा हप्पू सिंह और सानंद वर्मा यानी अनोखेलाल सक्सेना के किरदारों ने.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के लोकप्रिय होने के कई कारण थे, जिन में मुख्य थे आंचलिक भाषा और कलाकारों के अच्छे अभिनय के साथसाथ हर दूसरेतीसरे दिन कहानी का बदल जाना. बहरहाल, इस शो की सफलता को देख कर कई चैनलों ने इसी तरह के शो लाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी शो कामयाब नहीं हो पाया. बहरहाल, लोगों ने ‘भाबीजी घर पर हैं’ को पसंद भी किया, सराहा भी.

जब इस शो की टीआरपी अच्छीभली ऊंचाई पर थी, तभी अचानक शो से शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी भाभी गायब हो गईं. शो में बताया गया कि अंगूरी अपने मायके गई हुई हैं, कुछ एपीसोड बिना शिल्पा शिंदे के ही बनाए और प्रसारित किए गए. धीरेधीरे खबरें आईं कि फीस न बढ़ाए जाने की वजह से शिल्पा शिंदे शो छोड़ रही हैं.

शिल्पा और सीरियल के निर्माताओं के बीच कुछ बातों को ले कर मतभेद की भी बातें सुनने को मिलीं. जो भी रहा हो, इस से शो के दर्शकों को काफी बड़ा झटका लगा. महसूस किया गया कि बिना शिल्पा शिंदे के शो बंद हो जाएगा, क्योंकि इस स्तर की अंगूरी को ढूंढना आसान नहीं होगा.

दूसरी ओर निर्माताओं ने शिल्पा के इस तरह हट जाने से उन्हें कानूनी नोटिस थमा दिया, साथ ही फिल्म और टीवी कलाकारों की एसोसिएशन में भी शिल्पा की शिकायत की गई, क्योंकि शिल्पा ने एग्रीमेंट की शर्तों को पूरा नहीं किया था. शिल्पा शिंदे भी अपने हिसाब से जवाब दे रही थीं.

इधर यह सब चल रहा था और दूसरी ओर निर्माता शुभांगी अत्रे को शो में ले कर अंगूरी के कैरेक्टर के लिए तैयार कर रहे थे. बहरहाल, पूरी तरह तैयार हो कर अंगूरी के रूप में शुभांगी परदे पर आईं. उन के आने से शुरूशुरू में दर्शकों को अजीब लगा, लेकिन अपनी मेहनत के बूते पर जल्दी ही शुभांगी अत्रे अंगूरी के किरदार में ढल गईं.

एक साल बीततेबीतते दर्शकों ने शिल्पा शिंदे को भुला कर शुभांगी को पूरी तरह अंगूरी के रूप में स्वीकार कर लिया. दूसरी ओर सिनटा ने शिल्पा शिंदे पर सिनेमा और टेलीविजन इंडस्ट्री में काम करने पर पाबंदी लगा दी थी, जिस से उन्हें काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया.

शो छोड़ने के अब एक साल बाद शिल्पा शिंदे ने सीरियल के निर्माता संजय कोहली पर आरोप लगाते हुए पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है कि संजय ने उन का पैसा देना तो दूर, उन का सैक्सुअल हैरेसमेंट किया था. शिल्पा ने बताया कि शूटिंग के दौरान संजय कोहली कई बार उन के स्तन और कमर पर हाथ लगाते थे, जो उन्हें बहुत बुरा लगता था. जब वह इस सब का विरोध करती थीं तो वह सौरी बोल देते थे. इंडस्ट्री में चूंकि ऐसी बातें कौमन होती हैं, इसलिए वह इसे गंभीरता से नहीं लेती थीं.

शिल्पा के अनुसार, संजय उन्हें हौट और सैक्सी बताते थे. चूंकि उन्हें शो में काम करना था, इसलिए वह इस सब को इग्नोर कर देती थीं. लेकिन हद तो तब हो गई, जब संजय ने उन से सैक्स की डिमांड शुरू कर दी. इस का जिक्र उन्होंने शो के अपने सहकलाकारों से भी किया, लेकिन किसी ने भी उन का साथ नहीं दिया. वजह यह कि उन्हें शो में संजय के साथ काम करना था.

शिल्पा शिंदे के अनुसार, उन का संजय पर 3 महीने के काम का मेहनताना बाकी था, इसलिए वह शो छोड़ना नहीं चाहती थीं, लेकिन उन का इस तरह मानसिक उत्पीड़न किया गया कि उन्हें शो छोड़ कर घर बैठना पड़ा. सिनटा ने भी उन के काम करने पर पाबंदी लगा दी.

बहरहाल, शो के प्रोड्यूसर संजय कोहली और बिनायफर ने अब उन पर 12 करोड़ रुपए का दावा किया है, साथ ही उन्होंने शिल्पा के आरोपों को भी झूठ बताया है. बहरहाल, पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिल्पा ने सैक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायत एक साल बाद क्यों की?

वैसे ग्लैमर की दुनिया में इस तरह की शिकायतें मिलती रहती हैं, क्योंकि कलाकार एग्रीमेंट के हिसाब से एक तरह से बंधक बन कर रह जाता है. समस्या यह है कि उसे काम करना होता है, इसलिए वह कहीं पर शिकायत भी नहीं कर सकता.

बहरहाल, अभी तक लोग इस मामले में पूरी तरह शिल्पा शिंदे को ही घमंडी मान कर दोषी समझ रहे थे. लेकिन अब जबकि एक और एक्ट्रैस समीक्षा ने शिल्पा शिंदे के पक्ष में खड़े हो कर संजय कोहली और बिनायफर कोहली के खिलाफ आवाज उठाई है तो शिल्पा के पक्ष में वजन नजर आने लगा है.

तमिल, तेलुगू और पंजाबी की कई फिल्मों में काम कर चुकी समीक्षा ने अपना टीवी डेब्यू बिनायफर के प्रोडक्शन हाउस के शो ‘जारा’ से किया था. उस शो में जारा का किरदार निभाने वाली समीक्षा बताती हैं कि संजय और बिनायफर के साथ अपना पहला टीवी शो करते समय उन के साथ बिलकुल वैसी ही परिस्थितियां आई थीं, जैसी शिल्पा शिंदे के सामने आईं. लेकिन मैं चाह कर भी तब कुछ नहीं कर सकी थी. अब जब मैं ने शिल्पा शिंदे का इंटरव्यू देखा तो मुझे लगा कि मुझे उन के पक्ष में खड़ा होना चाहिए. इस से उन्हें इंसाफ मिलने में मदद मिल सकती है, वरना ये प्रोड्यूसर एक के बाद एक एक्टर का शोषण करते रहेंगे.

समीक्षा के अनुसार, बिनायफर के सेट पर बहुत खराब माहौल होता है. ऐसे तो लोग फैक्ट्री के मजदूरों से भी काम नहीं कराते होंगे, जैसे बिनायफर के एडिट टू प्रोडक्शन के लोग एक्टर्स से काम कराते हैं. लोग सेट पर बहुत ही गंदी भाषा बोलते हैं. बिनायफर से शिकायत करो तो वह एक्टर्स को ही उलटा बोलने लगती हैं.

यहां तक कि वह 3-4 दिनों में ही हमारे क्लोजअप शूट कर लेती थीं और फिर 5-6 दिन के लिए घर बैठा देती थीं, ऊपर से कहती थीं कि समीक्षा डेट नहीं दे रही है. जबकि मैं घर बैठी अपने बुलावे का इंतजार करती रहती थी. कुछ कहो तो बिनायफर कहती थीं कि यहां तो ऐसा ही होता है. हम यहां सीरियल छापने आए हैं. हमें कोई क्वालिटी नहीं चाहिए, क्योंकि हमें टाइम पर एपीसोड देना होता है. ज्यादा एक्टिंग का कीड़ा काट रहा है तो जा कर आर्ट मूवी करो.

समीक्षा बताती हैं कि मैं ने वहां डेढ़ साल काम किया और बहुत मेंटल टौर्चर सहा. तब हमारे डायरेक्टर पवन साहू थे, जो बहुत गालीगलौज करते थे. लड़कियों के साथ भी गलत बिहैव करते थे और कहते थे कि हमारे बिहार में तो लड़कियों को जूती की तरह रखा जाता है, इसलिए यह सब हमारी आदत में शामिल है.

ऐसी बातें हमें बहुत बुरी लगती थीं. लगातार शूटिंग के चलते हमें रातरात भर जाग कर काम करना होता था, सो तक नहीं पाते थे, ऊपर से ऐसा माहौल. बिनायफर से शिकायत करो तो कहतीं, ‘टीवी में ऐसे ही काम होता है.’ जारा मेरा पहला टीवी शो था. पहले ही अनुभव ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं ने टीवी के लिए ज्यादा काम नहीं किया.

बिनायफर के खिलाफ समीक्षा ने सिनटा में फीस न दिए जाने की भी शिकायत दर्ज कराई थी. समीक्षा के अनुसार, काम खत्म हो जाने के बाद बिनायफर ने उन की 5 महीने की फीस भी नहीं दी. वह सब के साथ ऐसा ही करती हैं और खुलेआम कहती हैं कि जितना मिल रहा है ले लो, वरना वह भी नहीं मिलेगा.

तमाम एक्टर्स ऐसे हैं, जो काम न मिलने के डर से चुप रह जाते हैं. कुछ बोलो तो इमेज खराब करने की धमकी दी जाती है. फिर भी मैं ने सिनटा में केस किया. जवाब में मुझ पर लीगल केस लगा दिया गया. मैं एक साल तक लड़ी, लेकिन लाइफ में आगे बढ़ने की चाह थी, इसलिए हार कर बैठ गई.

संजय कोहली की छेड़छाड़ और फ्लर्ट करने की बात समीक्षा ने भी कबूली. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा, ‘हम ऐसी इंडस्ट्री में हैं, जहां लोग फ्लर्ट करते हैं. कमेंट पास करना तो आम बात है. इस सब को हम तब तक अपने तरीके से हैंडल करते हैं, जब तक कोई जीना हराम न कर दे. मेरे लिए इस से भी बड़ा इश्यू था सैट का माहौल.’

प्रोड्यूसर और एक्टर्स के बीच विवाद होना आम बात है. इस में कई बार प्रोड्यूसर डायरेक्टर गलत होते हैं तो कभी एक्टर. ऐसे विवादों को निपटाने के लिए सिने एंड टेलीविजन आर्टिस्ट एसोसिएशन बनाई गई है. पिछले 2 सालों में सिनटा के पास 200 केस आए, जिन में ज्यादातर फीस न मिलने को ले कर थे.

स्टारप्लस के शो ‘दीया और बाती हम’ की संध्या यानी दीपिका सिंह को इस सीरियल की वजह से काफी पसंद किया गया था. लेकिन सीरियल खत्म होने के बाद निर्माता पर उन के 1.14 करोड़ रुपए रह गए. अपनी इस बकाया फीस के लिए उन्हें सिनटा के पास जाना पड़ा. दीपिका की तरह ही जी टीवी का शो ‘जमाई राजा’ जब खत्म होने को आया तो इस के एक्टर्स मौली, शाइनी, नीलू कोहली और संजय स्वराज को अपनी 5 महीने की फीस के लिए सिनटा की शरण में जाना पड़ा. सिनटा के हस्तक्षेप के बाद ही उन्हें उन की फीस मिली.

निर्माता और एक्टर्स के बीच जो साझा सहमतिपत्र साइन होता है, उस के हिसाब से शो टेलीकास्ट होने के 90 दिनों के बाद एक्टर्स को पेमेंट कर दिया जाना चाहिए. लेकिन तमाम प्रोड्यूसर्स इस नियम का पालन नहीं करते और थोड़ीबहुत रकम दे कर एक्टर से काम कराते रहते हैं. एक्टर्स को चूंकि काम न मिलने या प्रोड्यूसर द्वारा बदनाम करने का डर सताता रहता है, इसलिए चुप रहना उन की मजबूरी बन जाता है.

बहरहाल, शिल्पा शिंदे को उन के घमंड की वजह से ‘भाबीजी घर पर हैं’ शो से निकाला गया या उन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, जैसा समीक्षा के साथ हुआ था, कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन इस में कोई दोराय नहीं कि सफलतापूर्वक चल रहे शो को कोई एक्टर यूं ही नहीं छोड़ेगा. कहीं तो कुछ गड़बड़ रही होगी.

लेकिन यह सच है कि शुभांगी अत्रे ने भले ही अंगूरी के किरदार को सफलतापूर्वक निभा लिया हो, पर शिल्पा शिंदे के जाने के बाद इस शो की टीआरपी गिरी. वैसे भी इस शो में अब पहले वाली बात नहीं रही. दूसरी बात यह भी है कि इस विवाद में शिल्पा शिंदे का कैरियर तो एक तरह से खत्म ही हो गया.

भारत में लॉन्च हुआ Samsung Galaxy On Max

सैमसंग ने शुक्रवार को अपना Galaxy On Max स्मार्टफोन भारत में लौंच कर दिया है. इस दमदार स्मार्टफोन की कीमत 16,900 रुपये है और यह एक्सक्लूसिव तौर पर 10 जुलाई से फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध होगा. फ्लिपकार्ट इसके साथ एक ऑफर भी दे रहा है जिसके तहत स्टैंडर्ड चार्टेड बैंक के डेबिट या क्रेडिट कार्ट से इस स्मार्टफोन को खरीदने पर आपको 2000 रुपये का डिस्काउंट मिलेगा.

जानें Galaxy On Max के स्पेसिफिकेशंस

गैलक्सी ऑन मैक्स में 5.7 इंच का फुल एचडी डिस्प्ले लगा है. 1.69 गीगाहर्ट्ज ऑक्टा-कोर मीडियाटेक प्रोसेसर के साथ 4जीबी रैम दी गई है. 32जीबी इंटरनल मेमोरी है जिसे माइक्रोएसडी कार्ड के जरिए 256 जीबी तक बढ़ाया जा सकता है. यह स्मार्टफोन ऐंड्रॉयड 7.0 नॉगट पर रन करता है.

कैमरे पर फोकस

फोटोग्राफी के लिए सैमसंग Galaxy On Max में एफ/1.7 अपर्चर वाला 13 मेगापिक्सल का रियर कैमरा दिया गया है. वहीं, विडियो कॉलिंग और सेल्फी के लिए इस स्मार्टफोन के फ्रंट पैनल पर एफ/1.9 अपर्चर वाला 13 मेगापिक्सल का ही सेंसर दिया गया है. स्मार्टफोन में 3,300 mAh की बैटरी दी गई है. यह ब्लैक और गोल्ड कलर में उपलब्ध है.

जन्मदिन विशेष : मैदान में कुछ ऐसी थी दादा की दादागिरी

टीम इंडिया के क्रिकेट इतिहास में वैसे तो कई महान क्रिकेटर हुए हैं, लेकिन उनमें सौरव गांगुली का एक अलग ही स्थान है. टीम इंडिया बुलंदियों तक पहुंचाने वाले सौरव गांगुली यानी कि दादा का आज जन्मदिन है.

बाएं हाथ के इस कलात्मक बल्लेबाज ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की शुरुआत तो 1992 में वनडे से की, लेकिन उन्हें पहचान 1996 के इंग्लैंड दौरे से मिली. गांगुली की कप्तानी और बल्लेबाजी स्टाइल को आज भी याद किया जाता है. भारतीय क्रिकेट को नई पहचान दिलाने में गांगुली की अहम भूमिका है.

प्रिंस ऑफ कोलकाता और बंगाल टाइगर के नाम से मशहूर सौरभ गांगुली ने अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल कीं. आज उनके जन्मदिन के खास मौके पर पढ़िए उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें.

1996 में खेले गए मैच से मिली पहचान

सौरव गांगुली को पहली बार 1992 में भारतीय टीम में शामिल किया गया था, लेकिन वे तुरंत ही टीम से निकाल दिए गए. वजह यह थी कि उनका व्‍यवहार कुछ लोगों को रास नहीं आया और उन्‍होंने टीम मैनेजमेंट से उनकी शिकायत कर दी.

हालांकि, सौरव ने हिम्‍मत नहीं हारी और लगातार मैदान पर पसीना बहाते रहे. 1996 में लॉड्स में अपने ही पहले ही मैच में सौरव ने शतक जड़ा. सौरव को यह मौका भी नवजोत सिंह सिद्धू की वजह से मिला था, जिनकी उस समय तत्‍कालीन कप्‍तान अजहरुद्दीन से अनबन हो गई थी और उन्‍होंने खेलने से इनकार किया था.

लाजवाब रिकॉर्ड

दादा के नाम से मशहूर सौरव गांगुली ने 113 टेस्ट मैचों में 7,212 रन बनाए हैं, जबकी 311 वनडे मैचों में उन्होंने 22 सेंचुरी की मदद से 11,363 रन बनाए. वनडे मैचों में रन बनाने में गांगुली की गिनती दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों में हुई.

मुख्य रूप से दाएं हाथ के बल्लेबाज

गांगुली मुख्य रूप से दाएं हाथ के बल्लेबाज हैं लेकिन वह बाएं हाथ के बल्लेबाज इसलिए बनें ताकि अपने भाई का क्रिकेट का सामान इस्तेमाल कर सकें.

शर्ट लहराना कर मनाया जीत की खुशी

2002 का नेटवेस्ट फाइनल भला कौन भूल सकता है. भारतीय टीम ने 146 रनों पर 5 विकेट गंवाने के बाद इंग्लैंड के स्कोर 325 को पार किया था. भारत की इस जीत में युवा चेहरे मोहम्मद कैफ और युवराज सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसके बाद गांगुली का लॉर्ड्स की बालकनी में शर्ट उतारकर लहराना तो क्रिकेटप्रेमी शायद ही कभी भूल पाएंगे.

वर्ल्ड कप फाइनल में पहुंची टीम

2003 में गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंची थी. 1983 के बाद पहली बार भारतीय टीम वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंची थी. फाइनल में उसके सामने अजेय समझे जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम थी. फाइनल में भारत को 125 रनों से हार का सामना करना पड़ा था.

2008 में खेला अपना आखिरी टेस्ट मैच

2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपने घरेलू मैदान ईडन गार्डेन पर उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच खेला. फिलहाल गांगुली क्रिकेट असोसिएशन ऑफ बंगाल (सीएबी) के अध्यक्ष हैं.

एशिया के बाहर सेंचुरी

गांगुली ने वनडे में कुल 22 शतक लगाए जिसमें से 18 उन्होंने भारत के बाहर लगाए.

गांगुली की कप्तानी में कामयाबी

साल 2000 में मैच फिक्सिंग प्रकरण के बाद जब भारतीय क्रिकेट संकट में था तब गांगुली ने टीम की कमान संभाली और टीम को संभाला. जब वह कप्तान बने भारत की टेस्ट रैंकिंग 8 थी. जब वह कप्तानी से रिटायर हुए तो भारत दूसरे पायदान की टीम था.

पाकिस्तान के खिलाफ लगाया दोहरा शतक

गांगुली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी के बाद सन 2007 में पाकिस्तान के खिलाफ 239 रन बनाए. बैंगलोर में खेली गयी यह पारी उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का एकमात्र दोहरा शतका है.

ब्रायन लारा हैं पसंदीदा कप्तान

साल 2000 से 2005 के बीच सौरव की कप्‍तानी में भारत ने 21 टेस्‍ट मैचों में जीत हासिल की थी. गांगुली के पसंदीदा कप्तान वेस्‍टइंडीज के धाकड़ बल्‍लेबाज ब्रायन लारा हैं.

फुटबॉल के फैन

सौरव गांगुली फुटबॉल के बड़े फैन रहे हैं और उनका पहला प्‍यार भी. एक बार स्‍कूल की 10 दिनों की छुट्टी में उनके पिता ने सौरव को क्रिकेट एकेडमी में दाखिला दिला दिया जिसके बाद उनको क्रिकेट से प्यार हो गया और क्रिकेट का बड़ा सितारा बन गएं.

गांगुली के नाम की सड़क

पश्चिम बंगाल के उत्‍तरी 24 परगना जिले में सौरव के नाम पर डेढ़ किलोमीटर लंबी सड़क है.

सबसे ज्यादा बार मैन ऑफ द मैच बनने वाले दूसरे खिलाड़ी

वनडे में सबसे ज्यादा मैन ऑफ द मैच रहने के मामले में सौरव गांगुली सचिन तेंदुलकर के बाद दूसरे भारतीय क्रिकेटर हैं. सचिन तेंदुलकर 62 बार मैन ऑफ द मैच बन चुके हैं जबकि गांगुली को 31 बार मैन ऑफ द मैच चुना गया है.

फिल्मी लव स्टोरी

गांगुली की पत्नी डोना मशहूर ओडिशी नृत्यांगना हैं. गांगुली और डोना पड़ोसी थे और दोनों ने घरवालों की मर्जी को बिना बताए शादी की थी. बाद में परिवार ने इस रिश्ते को मंजूर कर लिया.

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