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ऋषि और नीतू के प्यार की ये है दास्तां

एक्ट्रेस नीतू सिंह का आज 59वां जन्मदिन है. नीतू ने साल 1980 में एक्टर ऋषि कपूर से शादी की थी. 14 साल की उम्र में नीतू और ऋषि कपूर का अफेयर शुरू हुआ था. उस समय ऋषि कपूर इंडस्ट्री का जाना माना नाम बन चुके थे और नीतू अपने कैरियर की शुरुआती पड़ाव पर थीं.

पहली बार दोनों ने साल 1974 में 'जहरीला इंसान' फिल्म में साथ काम किया था. हालांकि दोनों के लिए ये लव एट फर्स्ट साइट नहीं था. सेट पर ऋषि, नीतू को बहुत परेशान करते थे. जब नीतू मेकअप कर के बाहर निकलती थीं, तब ऋषि उनके चेहरे पर काजल लगा देते थे. लेकिन फिल्मों की तरह नीतू को भी उनसे प्यार हुआ जो उन्हें सबसे ज्यादा परेशान करता था.

दोनों की बढ़ती नजदीकियों से नीतू की मम्मी रज्जी खुश नहीं थीं. वो नहीं चाहती थीं कि इंडस्ट्री के लोग उनकी बेटी के बारे में तरह-तरह की बातें करें. इसलिए जब दोनों डेट पर जाते थे तब मां कजिन को नीतू के साथ भेजती थीं.

जब ऋषि ने नीतू को शादी के लिए प्रपोज किया तो रज्जी बहुत खुश हुईं. लेकिन नीतू अपने घर की अकेली कमाने वाली थीं. वो अपनी मां को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थीं. जब ऋषि कपूर को इस बात का पता चला तो उन्होंने नीतू की मां को अपने घर में रहने के लिए कहा.

एक्साइटिंग एंगेजमेंट

दोनों की एंगेजमेंट की कहानी भी काफी एक्साइटिंग है. दरअसल ऋषि कपूर के घर किसी की शादी थी. कपूर फैमिली ने सोचा कि यही सही समय है ऋषि और नीतू के एंगेजमेंट की अनाउंसमेंट का. जब इसकी अनाउंसमेंट हुई तब नीतू एकदम हैरान रह गईं. इसके तुरंत बाद दोनों ने शादी कर ली.

कपूर खानदान की परम्परा का पालन

शादी के बाद उनकी कहानी में बहुत से ट्विस्ट एंड टर्न्स आए. कपूर खानदान की परंपरा रही है कि उनकी घर की बहुएं काम नहीं करती हैं. नीतू ने भी खुशी-खुशी फिल्मों के साइनिंग अमाउंट लौटा दिए. उस समय खबरें आई कि नीतू पर इंडस्ट्री छोड़ने के लिए दबाव डाला गया है. लेकिन नीतू ने साफ किया कि उन्होंने अपनी मर्जी से इंडस्ट्री छोड़ी है और ऋषि बहुत सपोर्टिंग हसबैंड हैं.

जब मझधार में फंसी कश्ती

90 के दशक में खबरें आई कि ऋषि कपूर को शराब की लत लग गई है. रिपोर्ट्स तो यहां तक थी कि नीतू ने पुलिस में घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवाया है और वो घर छोड़कर चली गई हैं. लेकिन कुछ समय बाद ही नीतू अपने परिवार के पास वापस आ गईं. नीतू ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि हर कपल की जिंदगी में मुश्किल समय आता है. हमारी जिंदगी में भी आया था. अच्छा है कि हमने मिलकर कश्ती को मझधार से निकालकर साहिल तक ले आएं हमाने सारी समस्यायें सुलझा ली आज सब कुछ सही है, यही जिंदगी का अफसाना है.

फोन में बिना नेटवर्क के भी होती है बात

साल 2017 में बीएसएनएल ने सैटेलाइट फोन सर्विस लॉन्च की है. इसी साल, मई के महीने में इसकी शुरुआत कर दी गई थी. यह सुविधी खास कर के उन इलाकों में काम करेगी, जहां मोबाइल सिग्नल नहीं हैं. यह सर्विस सैटेलाइट टेलीकम्युनिकेशन कंपनी INMARSAT की मदद से दी जाएगी, जिसके 14 सैटेलाइट हैं. अभी शुरुआत में इसे केवल सरकारी एजेंसियों के लिए उपलब्ध करवाया गया है.

फिलहाल टेलीकॉम मिनिस्टर मनोज सिन्हा के मुताबिक, इसे शुरु करने के बाद, इसके सबसे शुरुआती चरण में देश की आपदा नियंत्रण एजेंसियां, राज्य पुलिस, रेलवे, बॉर्डर सिक्युरिटी फोर्स और अन्य सरकारी एजेंसियों को ये फोन दिए जाएंगे. हम आपको बता देना चाहते हैं कि बाद में फ्लाइट और शिप में सफर कर रहे लोग भी इसे इस्तेमाल कर पाएंगे.

अब तक टीसीएल दे रहा था सर्विस : भारत में अब तक टाटा कम्युनिकेशंस (टीसीएल) द्वारा सैटेलाइट फोन सर्विस दी जा रही थी. पर टीसीएल (टाटा कम्युनिकेशंस लिमिटेड) की ये सर्विसेज 30 जून, 2017 से खत्म हो चुकी हैं. भारत में फिलहाल 1,532 अधिकृत सैटेलाइट फोन कनेक्शंस हैं, जिनमें से ज्यादातर सिक्युरिटी फोर्सेज इस्तेमाल कर रही हैं. टीसीएल ने शिप पर इस्तेमाल के लिए मैरीटाइम कम्युनिटी को भी 4,143 परमिट इश्यू किए थे.

बरसात के दौर में इन बीमा पर दें खास ध्यान

इस मॉनसून में स्वयं को न सिर्फ बरसाती और छातों से खुद को सुरक्षित बचाए रखने की कोशिश करें बल्कि कुछ खास बीमा कवर और एड-ऑन राइडर के चयन पर भी खास ध्यान दें. याद रखिए कि ये महज अतिरिक्त सुरक्षा वाले कवर हैं और आपको अपने लिए नियमित स्वास्थ्य और समग्र मोटर बीमा पॉलिसी लेनी चाहिए.

स्वास्थ्य बीमा

डेंगू का डर असली है और इससे संबंधित दावे  बढ़ते जा रहे हैं. एसबीआई जनरल इंश्योरेंस ने डेंगू कवर के लिए निपटान मामलों में तेजी दर्ज की है. जहां 2013-14 में डेंगू से संबंधित दावों की संख्या 34 थी वहीं 2016-17 में यह बढ़कर 943 हो गई. कंपनी में प्रोडक्ट डेवलपमेंट के प्रमुख पुनीत साहनी कहते हैं, 'संक्रमित बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य जटिलता इस उद्योग में सर्वाधिक है, चाहे मलेरिया हो, डेंगू हो या कोई अन्य संक्रमण.'

रेग्युलर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी : इसके तहत तभी मलेरिया या डेंगू के लिए कवर मिलेगा जब पॉलिसीधारक कम से कम 24-घंटे अस्पताल में भर्ती रहे. कई मामलों में दवाओं के जरिये ही उपचार किया जा सकता है. ऐसी सूरत में स्टैंडर्ड पॉलिसी में उपचार के लिए भुगतान नहीं कराया जाएगा.

'यदि आपकी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) कवरेज शामिल है तो इसमें ऐसे उपचार को शामिल किया जाएगा जिसमें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत न हो. अस्पताल में भर्ती होने की सूरत में भी इस पर विचार किया जाएगा कि किसी खास बीमारी पर क्लेम के संबंध में कोई सीमा तो नहीं है.'

हेल्थ इंश्योरेंस बिजनेस यूनिट के संयुक्त प्रमुख वैद्यनाथन रमानी ने कहा, 'डेंगू के लिए टेस्ट का खर्च 3,500-4,000 रुपये आता है और इससे संबंधित उपचार में खास दवा लेने की सलाह दी जाती है. यदि आपके स्वास्थ्य बीमा में ओपीडी कवरेज शामिल नहीं है तो ये खर्च शामिल नहीं होंगे. ऐसे में खास बीमारी से संबंधित कवर उपयोगी साबित हो सकता है.' ओपीडी कवर वाले स्टैंडर्ड स्वास्थ्य बीमा के लिए प्रीमियम इसके बगैर बीमा की तुलना में 15-20 फीसदी अधिक होगा. हालांकि मलेरिया के लिए कोई खास कवर नहीं है, लेकिन डेंगू के लिए दो कवर मौजूद हैं. ये डेंगू के उपचार से संबंधित खर्च के लिए ही क्लेम की सुविधा मुहैया कराते हैं और इसकी प्रतीक्षा अवधि 15 दिन है.

डेंगू की चिकित्सा : कई अस्पतालों में डेंगू केयर कवर अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में 50,000 रुपये तक का खर्च मुहैया कराता है, जबकि ओपीडी खर्च की सीमा 10,000 रुपये है. इसका सालाना प्रीमियम करीब 444 रुपये है और पॉलिसीधारक की उम्र या अन्य कारणों से यह घटता-बढ़ता नहीं है. इसमें स्वास्थ्य जांच, परामर्श खर्च, घर पर चिकित्सा और दवाइयों का खर्च शामिल है. यह गैर-चिकित्सीय खर्च के लिए भी कवर प्रदान करता है, बशर्ते कि आपने नेटवर्क में शामिल अस्पताल में भर्ती होने के दौरान शेयर्ड एकोमोडेशन (यानी अन्य मरीजों के साथ मिलकर ठहरने की सुविधा) का विकल्प चुना हो. यह प्लान 1 लाख रुपये की बीमित रकम वाले वैरिएंट में करीब 578 रुपये के प्रीमियम पर उपलब्ध है. अपोलो म्यूनिख हेल्थ इंश्योरेंस के मुख्य कार्याधिकारी एंटनी जैकब कहते हैं, 'सुनिश्चित करें कि खास बीमारियों से जुड़ी पॉलिसी उसमें शामिल बीमारियों के लिए समग्र कवरेज प्रदान करती हो.'

डेंगू शील्ड : एक खास पॉलिसी, डीएचएफएल प्रामेरिका लाइफ इंश्योरेंस की डेंगू शील्ड पॉलिसी डेंगू बुखार की जांच में एक वित्तीय मदद प्रदान करती है, हालांकि इसमें शर्त शामिल है.

ये शर्त हैं : प्लेटलेट का स्तर घटकर 100,000 से नीचे पहुंच जाना, हेमोटोक्रिट अपने उच्चतम स्तर से 20 फीसदी से अधिक बढ़ जाना, इम्यूनोग्लोबलिंस/ पीसीआर टेस्ट, डेंगू बुखार या डेंगू शॉक सिंड्रोम की जांच के लिए चिकित्सक की जरूरत साबित करना और न्यूनतम 48 घंटे तक अस्पताल में भर्ती होना.

यदि ऑनलाइन खरीद रहे हैं तो इसका खर्च 25,000 रुपये के किसी कवर के लिए करीब 365 रुपये सालाना आएगा. डीएचएफएल प्रामेरिका लाइफ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी अनूप पब्बी कहते हैं, 'विशेष बीमा कवर सस्ते और खरीदारी में आसान होने चाहिए. इनमें क्लेम की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए और क्लेम की अनावश्यक शर्तों से बचा जाना चाहिए.'

वाहन बीमा

मॉनसून मोटर वाहनों के लिए भी कई तरह की समस्याएं लेकर आता है. मुख्य समस्या जल भराव की होती है जो आपकी कार के इंजन को नुकसान पहुंचा सकती है. 'हमें आम तौर पर पेड़ गिरने से कार के आगे का मुख्य शीशा बदलने, या किसी अन्य वाहन की टक्कर (संभवत: कम दृश्यता की वजह से) से पिछले हिस्से की बॉडी क्षतिग्रस्त होने, कभी कभी तो इंजन और उसके कलपुर्जे क्षतिग्रस्त होने से जुड़े क्लेम भी मिलते हैं.'

'यदि कार बाढ़ वाले इलाके में फंस गई है तो इग्नीशन पर दबाव न डालें. इससे इंजन का हाइड्रोस्टेटिक लॉक हो सकता है जिससे इसे पूरा बदलने की जरूरत पड़ सकती है, जो काफी महंगा साबित होगा. बीमा कंपनियां आम तौर पर इस तरह के क्लेम को नकार देती हैं, क्योंकि इसे स्वाभाविक नुकसान माना जाता है.'

इंजन की सुरक्षा

इससे पानी भर जाने से इंजन या उसके कलपुर्जों की खराबी को कवर करने में मदद मिल सकती है. इंजन के लिए नुकसान से संबंधित खर्च काफी महंगा हो सकता है. इसे हाइड्रोस्टेटिक लॉक कवर या इंजन और गियर बॉक्स प्रोटेक्शन भी कहा जाता है. अगर वाहन को ठीक करना मुमकिन ही नहीं है तो इसे टोटल लॉस यानी पूरी तरह क्षतिग्रस्त कहा जाता है. ऐसी सूरत में खरीद के वक्त की वास्तविक कीमत के रुप में भुगतान किया जाता है. यह सुविधा रिटर्न टू इनवॉयस बीमा के जरिए हासिल की जा सकती है.

रोडसाइड असिस्टेंस

यह कवर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो अक्सर लंबी दूरी की यात्रा करते हैं. इस कवर के तहत बीमा कंपनी किसी भी मैकेनिकल ब्रेकडाउन की जगह पर सहायक सेवा मुहैया कराएगी. इसमें ऑन-साइट बैटरी जम्पस्टार्ट, टायर रीप्लेसमेंट, ईंधन भरना और टोविंग सर्विस शामिल हैं. कुछ कवर में वैकल्पिक वाहन या होटल में ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है. इंजन प्रोटेक्ट के लिए शुल्क वाहन की कुल कीमत का लगभग 0.2 से 1 फीसदी तक है. वैसे यह शुल्क अलग अलग ब्रांड और कार के मॉडल पर निर्भर करता है. यह आपके कुल प्रीमियम का 5 से 10 प्रतिशत के आसपास होगा. कुछ बीमा कंपनियां संपूर्ण पॉलिसी के साथ रोडसाइड असिस्टेंस मुफ्त में देती हैं जबकि कुछ इसके लिए निश्चित शुल्क वसूलती हैं.

जम्मू-कश्मीर बना ‘वन नेशन वन टैक्स’ नीति का हिस्सा

जम्मू-कश्मीर भी अन्य राज्यों की तरह एक देश, एक टैक्स का हिस्सा बन गया है. रियासत में शुक्रवार की आधी रात से जीएसटी लागू करने की तैयारी पूरी हो गई है. विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद पहले विधानसभा और विधान परिषद ने इस बाबत प्रस्ताव पारित किया और बाद में राष्ट्रपति के आदेश से संबंधित नए विधेयक को भी मंजूरी दे दी.

गवर्नर के हस्ताक्षर के साथ ही नया कानून तैयार हो गया है. राष्ट्रपति के आदेश में अनुच्छेद 370 के तहत रियासत के विशेष दर्जे और जम्मू कश्मीर के संविधान के तहत टैक्स लगाने के अधिकार को अक्षुण्ण रखा गया है. जम्मू कश्मीर विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित होने के बाद उस पर इस्राइल में मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मंजूरी ली गई और उसी रात राष्ट्रपति ने भी आदेश जारी कर दिया.

शुक्रवार को विपक्ष की गैरमौजूदगी में विधानसभा और विधान परिषद द्वारा नए बिल को पारित किए जाने के साथ ही जीएसटी लागू होने का रास्ता साफ हो गया. जम्मू-कश्मीर के वस्तु और सेवा कर (जेकेजीएसटी) विधेयक 2017 को शुक्रवार को दोनों सदनों ने ध्वनिमत से पारित कर दिया. विधेयक को वित्त मंत्री डा. हसीब द्राबू ने अलग-अलग सत्रों के दौरान दोनों सदनों में पेश किया.

राज्य के वित्तमंत्री हसीब द्राबू

डा. द्राबू ने कहा कि विधेयक को राष्ट्रपति का अनुमोदन प्राप्त हुआ है. राज्य संविधान की धारा-5 और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को राष्ट्रपति के आदेश में अक्षुण्ण रखा गया है. विधेयक पर चर्चा के दौरान कुछ सदस्यों ने रियासत की वित्तीय स्वायत्तता को लेकर आशंका व्यक्त की. द्राबू ने कहा कि हालांकि सदन में राष्ट्रपति के आदेश को सदन में रखने की परंपरा नहीं रही है, लेकिन हम राष्ट्रपति के आदेश को सदन के पटल पर रख कर राज्य की लोकतंत्र में एक नई परंपरा शुरू कर रहे हैं.

राष्ट्रपति के आदेश का नियम-3 स्पष्ट रूप से बताता है कि जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा-5 के अनुसार राज्य की शक्तियां बरकरार रहेंगी. राज्य के विधानमंडल को राज्य द्वारा लगाए गए सामानों और सेवाओं के संबंध में कानून बनाने की शक्तियां होंगी.

राज्य की विशेष स्थिति और विशेष कराधान अधिकारों से संबंधित राष्ट्रपति के आदेश के अंशों को पढ़ते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 5 के माध्यम से विधायिका को कर लगाने संबंधी कानून बनाने की विशेष शक्तियां होंगी. राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार नए प्रावधानों से संबंधित फैसले पर जीएसटी परिषद में जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधि की सहमति अनिवार्य होगी और अनुच्छेद 370 के तहत प्रदान की गई प्रक्रिया का पालन किया जाएगा. अनुच्छेद 246 ए के तहत राज्य द्वारा लगाए गए कर की राशि भारत के समेकित निधि का हिस्सा नहीं बनेगी.

'जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति की रक्षा के संकल्प को निभाया'

राज्य के वित्तमंत्री हसीब द्राबू

डा. द्राबू ने कहा कि राष्ट्रपति के आदेश में संवैधानिक सुरक्षा उपायों का समावेश कराकर इस सरकार पर जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति की रक्षा के संकल्प को निभाया है. विपक्ष ने दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर की वित्तीय स्वायत्तता से समझौता किया जाएगा और भारतीय संविधान के तहत राज्य की विशेष स्थिति कम हो जाएगी.

राष्ट्रपति के आदेश ने हमारे संवैधानिक, आर्थिक और प्रशासनिक शक्तियों की सुरक्षा के द्वारा जम्मू और कश्मीर विधानसभा की पवित्रता का सम्मान किया है. निर्दलीय विधायक पवन गुप्ता के लखनपुर में टोल कर और प्रवेश कर के उन्मूलन के संबंध में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि माल पर कोई प्रवेश कर नहीं होगा, लेकिन टोल टैक्स का मुद्दा राज्य सरकार का विषय है और कुछ समय में ही राज्य मंत्रिमंडल इस पर फैसला करेगा. सरकार द्वारा जीएसटी शासन में वादा किए गए वित्तीय और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय कुछ समय में आ जाएंगे.

शशि कपूर ने 40 साल पहले समझा दिया था GST का गणित

देशभर में जीएसटी लागू हो गया है, अब देश में एक टैक्स-एक देश-एक मार्केट का सपना लागू हो रहा है. हालांकि इसके लागू होने के बावजूद भी लोगों के मन में कई तरह के कन्फ्यूजन हैं. कुछ लोग जीएसटी आने के बाद से ही सामानों के घटते-बढ़ते दाम से परेशान हैं तो कई लोगों को अभी भी टैक्स के सिस्टम में क्या बदलाव हुआ है ये समझ नहीं आया है. लेकिन 1974 में फिल्म अभिनेता शशिकपूर ने देश के सिस्टम में टैक्स का क्या अहम किरदार होता है, वो अपने एक डायलॉग से समझा दिया था.

जी, 1974 में आई फिल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के एक डायलॉग में शशिकपूर यह कह रहे हैं कि अगर हमें देश के लिए कुछ करना है तो टैक्स देना ही होगा. उन्होंने कहा कि ये देश का कानून है और हमें इसका पालन करना ही होगा. हमें ये नहीं देखना चाहिए कि देश हमें क्या दे रहा है बल्कि ये देखना चाहिए हम देश को क्या देख रहे हैं.

नजर डालते हैं जीएसटी से जुड़े 10 तथ्यों पर…

1. जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स की शुरुआत के साथ ही भारत दुनिया के उन कुछ गिने चुने देशों में शामिल हो गया है जिनमें राष्ट्रीय स्तर पर एक बिक्री कर लागू है.

2. जीएसटी के लागू होने के साथ ही देश में केन्द्र और राज्यों के स्तर पर लगने वाले एक दर्जन से अधिक कर समाप्त हो गए हैं. अब उनके स्थान पर केवल जीएसटी लगेगा.

3. जीएसटी की चार दरें 5, 12, 18 और 28% हैं. अनाज समेत कई सामानों पर जीएसटी 0 फीसदी रहेगा यानी टैक्स मुक्त कर दी गई हैं.

4. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जीएसटी से एक कर, एक बाजार और एक राष्ट्र का सपना पूरा हुआ. जेटली ने कहा कि भारत में अब केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर साझी समृद्धि के लिये काम करेंगे.

5. जीएसटी को आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा कर सुधार माना जा रहा है. इसे आर्थिक क्रांति का नाम दिया जा रहा है.

6. जीएसटी से देश की 2,000 अरब की अर्थव्यवस्था और 1.3 अरब लोग सभी एक साथ जुड़ जायेंगे और पूरा देश एक साझा बाजार बन जायेगा.

7. जीएसटी के आइडिया के सामने आने के बाद इस समूची प्रक्रिया को पूरा होने में 17 सालों का लंबा समय लगा.

8. जीएसटी से वर्तमान बहुस्तरीय कर व्यवस्था समाप्त होगी और कर के उपर कर लगने से माल की लागत पर बढ़ने वाला बोझ भी समाप्त होगा.

9. जीएसटी लागू होने के साथ ही राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश एक साथ जुड़ गए. टोल नाकाओं पर लंबी कतारें भी समाप्त हो गईं.

10. पीएम मोदी ने कहा कि जीएसटी एक पारदर्शी और साफ-सुथरी प्रणाली है जो कालेधन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगी और एक कार्य संस्कृति को आगे बढ़ाएगी. वहीं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूत करने वाली प्रक्रिया बताई.

गेस्ट इन लंदन : महज पैसे की बर्बादी

लेखक व निर्देशक अश्विनी धीर अपनी 2010 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘अतिथि तुम कब जाओगे’’ का सिक्वअल ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ लेकर आए हैं, मगर ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ देखकर इस बात का अहसास होता है कि अश्विनी धीर ने किन्ही मजबूरी के तहत जबरन इस फिल्म को बनाया है. फिल्म में कहानी, ह्यूमर, निर्देशन सहित हर चीज का घोर अभाव है.

फिल्म ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ की कहानी लंदन में रह रहे आर्यन ग्रोवर (कार्तिक आर्यन) और अनाया पटेल (कृति खरबंदा) के घर की कहानी है. जिनके चाचा (परेश रावल) और चाची (तनवी आजमी) उनके यहां रहने आते हैं. उसके बाद कहानी में कई मोड़ आते हैं. हास्य के कुछ क्षण पैदा होते हैं. पश्चिमी व पूर्वी संस्कृति व रहन सहन से लेकर कई अजीबोगरीब मसलों पर बहस व जोक्स होते हैं.

अति घटिया कहानी व घटिया संवादों वाली इस फिल्म का एक भी चरित्र उभर नहीं पाता है. फिल्म के गाने भी फिल्म को बेहतर नहीं बनाते हैं. फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके लिए दर्शक अपनी गाढ़ी कमाई लगाकर देखना चाहेगा. परेश रावल व तनवी आजमी के अलावा किसी भी कलाकार की परफार्मेंस प्रभावित नहीं करती.

दो घंटे 18 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘गेस्ट इन लंदन’’ के निर्माता कुमार मंगत पाइक, निर्देशक अश्विनी धीर, लेखक अश्विनी धीर और राबिन भट्ट, कैमरामैन सुधीर के चौधरी, कलाकार हैं – परेश रावल, तनवी आजमी, कार्तिक आर्यन, कृति खरबंदा, संजय मिश्रा आदि.

विकेट ले गेंदबाज ने किया ऐसा डांस कि खिलाड़ी रोक नहीं पाए अपनी हंसी

क्रिकेट मैदान पर कई बार खिलाड़ी भावनाओं में बह कर ऐसा कुछ कर जाते हैं जिन पर यकीन कर पाना मुश्किल होता है या यूं कहें की हैरानी होती है. क्रिकेट में आपने कई फनी और इमोशनल मोमेंट देखे हंगे. लेकिन उन्हीं मोमेंट में से कुछ ऐसे मोमेंट होते हैं जिन्हें आप भूल नहीं पाते हैं. ऐसा ही एक एक फनी वीडियो आज हम आपको दिखाने जा रहे हैं. आपने शायद ही इस वीडियो से ज्यादा मजाकिया वाकया कभी देखा होगा.

विकेट लेने के बाद तो हर गेंदबाज जश्न मनाता है लेकिन इस गेंदबाज ने कुछ ऐसी हरकत कर दी की टीम के साथी खिलाड़ी भी उन्हें देख अपनी हंसी नहीं रोक पाएं.

ये वीडियो काउंटी क्रिकेट का है, जिसमें मैट कोल्स की गेंद पर बल्लेबाज स्लिप पर कैच आउट हो गया. बस फिर क्या था कोल्स मैदान पर लेट गए और रेंगने वाले जीव की तरह हरकत करने लगें. उन्हें ऐसा करते देख साथी खिलाड़ी पेट पकड़कर हंसने लगे. इस डांस को लोगों ने कोल्स स्नेल डांस नाम तक दे डाला गया.

इस वीडियो को शेयर किया है इंग्लैंड के बल्लेबाज सैम बिलिंग्स ने. आप भी देखें ये वीडियो.

बता दें कि ऐसा ही कुछ देखने को मिला था पाकिस्तान और भारत के बीच खेले जा रहे वनडे मैच में. उस दौरान पाकिस्तान 10.5 ओवर में बिना विकेट खोकर 61 रन बना चुका था. क्रीज पर कामरान अकमल 24, जबकि इमरान फरहत 24 रन बनाकर खेल रहे थे.

फरहत ने श्रीसंत की 128.4 किमी प्रतिघंटा की गति से फेंकी गेंद पर एक काफी ऊंचा शॉट खेल दिया, जिसे खुद श्रीसंत ने लपक लिया. बस फिर क्या था, इस गेंदबाज ने मैदान पर ही फनी डांस करना शुरू कर दिया. इस डांस का मैच देख रहे दर्शकों ने भी जमकर लुत्फ उठाया. खुद साथी खिलाड़ी इस युवा गेंदबाज की हरकत को देखकर अपनी हंसी रोक नहीं सके थें.

आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से बेहतर है ये योजना

भारत के गरीब व वंचित तबके को ध्यान में रखते हुए कार्यशील सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क बनाने के उद्देश्य के साथ प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा की शुरुआत की गई जिसके लिए आम बजट 2015-16 में घोषणा की गई थी. कम प्रीमियम में बेहतर आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से यह एक बेहतर योजना है. हम अपनी इस खबर के माध्यम से आपको इस योजना से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात बताने की कोशिश करेंगे. जानिए इस योजना से जुड़ी हर अहम बात….

शुरुआत : सरकार की यह अहम योजना 9 मई 2015 को शुरु हुई थी. इस योजना का लाभ उठाने के लिए बैंक जाकर फॉर्म भरना होगा. कुछ बैंकों में महज एसएमएस भेजकर इस योजना का लाभ लेने की व्यवस्था की गई है.

योजना का मकसद : यह बीमा मृत्यु के मामले में आश्रितों को लाभ देने के लिए है. अगर आप कम प्रीमियम में ज्यादा आर्थिक सुरक्षा पाना चाहते हैं तो आप इसे चुन सकते हैं.

योजना के फायदे

– अगर खाताधारक की किसी वजह से मृत्यु हो जाती है तो उसके आश्रितों को 2 लाख रुपए की बीमा राशि मिलती है.

– यह योजना सामान्य तौर पर बैंक खाता रखने वाले 18 से 50 साल तक के लोगों के लिए है. 50 साल की उम्र पूरा करने से पहले इस योजना में शामिल लोगों को 330 रुपए का सालाना प्रीमियम देना पड़ता है.

– कोई भी इस योजना को एक साल या उससे ज्यादा वक्त के लिए चुन सकता है. वहीं लंबी अवधि के विकल्प के मामले में बैंक हर साल प्रीमियम की रकम को ऑटो डेबिट कर देगा.

पॉलिसी कब खत्म कर दी जाएगी?

पॉलिसीधारक की उम्र 55 वर्ष पूरी होने पर पॉलिसी खत्म हो जाएगी. हालांकि, इसे प्रभावी रखने के लिए पॉलिसीधारक को समय-समय पर इसका नवीनीकरण कराना होगा. यदि खाताधारक बीमा पॉलिसी को सक्रिय रखने लायक न्यूनतम बेलेंस भी अपने बैंक खाते में नहीं रख पा रहा है और उस बैंक का खाता ही खत्म कराना पड़ता है, जहां से पॉलिसी ले रखी है तो बीमा पॉलिसी भी खत्म हो जाएगी. यदि संबंधित व्यक्ति के एक से ज्यादा खाते हैं और वह अनजाने में एक से ज्यादा बीमा पॉलिसी ले लेता है तो भी वह प्रीमियम जब्त हो जाएगी.

टीका, मलखान और कुमार विश्वास

भाभी जी घर पर हैं, टीवी धारावाहिक कथित रूप से अश्लील और फूहड़ माना जाने के बाद भी दर्शकों की पसंद है क्योंकि इस की कामेडी में समाज का सच बौद्धिक रूप से परोसा जाता है. इस धारावाहिक के दो पात्र टीका और मलखान निट्ठले और आवारा हैं जो गुप्ता टी स्टाल पर बैठे बैठे आती जाती लड़कियां छेड़ा करते हैं. ये दोनों कविता नहीं कर पाते, इसलिए फिल्मी गाने गाया करते हैं. दोनों लड़कियों को देवी या माते नहीं कहते, बल्कि उन्हें आइटम, पटाखा या माल जैसे चलताऊ संबोधनों से नवाजते अपनी कुंठा व्यक्त करते रहते हैं, जिस पर दर्शक खूब हंसते हैं.

अब मंचीय कवि और आप नेता कुमार विश्वास ने तो टीका और मलखान के मुकाबले लड़कियों या महिलाओं को कुछ बख्शते सामान ही कहा है, जिस पर बेवजह का हंगामा कुछ नारीवादी पुरुष खड़ा कर रहे हैं. जिस समाज और धर्म में औरत की हैसियत पांव की जूती और शूद्रों सरीखी बताई गई हो, उसमें उन्हें सामान कहकर कुमार विश्वास ने जो उदारता और सज्जनता दिखाई है, उसके लिए वे आलोचना, निंदा या धिक्कार के नहीं बल्कि साधुवाद के पात्र हैं. हर कोई नहीं समझ सकता कि मंच से कविताओं के जरिये लोगों को हंसा पाना कितना मुश्किल काम है, इसके लिए औरतों को जलील करना ही पड़ता है तभी दर्शक हंसता है.

कपिल शर्मा के कामेडी शो जिसमे कुमार विश्वास ने महिलाओं को सामान कहा में उनके साथ भारी भरकम शायर राहत इंदोरी भी थे, जिनके सामने विश्वास जैसे कवि का बराबरी से स्टुडियो साझा करना ही किसी उपलब्धि या पुरस्कार से कमतर बात नहीं होती. जब आप किसी बड़े आदमी के साथ होते हैं, तो हीनता किसी न किसी रूप में प्रगट हो ही जाती है, ऐसा आप नेता के साथ हो गया, तो कोई अनहोनी नहीं हो गई न ही कोई पहाड़ टूट पड़ा. कुमार विश्वास को यह कहने का पूरा हक है कि औरत का यूं मजाक बनाना या उसे इस तरह बेइज्जत करना कोई दुर्भावना नहीं, बल्कि कविता की मांग होती है, इसके पहले भी वे दक्षिण भारतीय नर्सों के रंग पर कथित भद्दी टिप्पणी कर यह मांग पूरी कर चुके हैं.

कुमार विश्वास को यह भी हक है कि वे हो रहे विरोध को भगवा खेमे द्वारा प्रायोजित बताएं और नेताओं द्वारा हर कभी महिलाओं पर की गई अभद्र टिप्पणियों का हवाला दें, खासतौर से कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिंह के उस उद्गार को वे उद्घृत कर सकते हैं, जिसमे उन्होंने नीमच की सांसद मीनाक्षी नटराजन को मंच से ही माल कहा था वह भी सौ टंच का. दूसरों के गिनाने से खुद के गुनाहों का रंग हल्का पड़ता है.

लेकिन अब कुमार विश्वास खेद व्यक्त करने का आसान रास्ता चुनेंगे, क्योंकि उनके खिलाफ दिल्ली के डाबरी थाने में एक जागरुक नागरिक ने एफआईआर दर्ज करा दी है. शिकायतकर्ता  ने अपनी शिकायत में कहा है कि कुमार विश्वास द्वारा महिलाओं को सामान कहने के बाद उसकी बिटिया ने अपनी मां से सवाल किया था कि क्या वह भी शादी के बाद सामान हो जाएगी. बेटी के इस सवाल पर शिकायतकर्ता थाने जाने की हद तक व्यथित हो उठा. इसे उक्त व्यथित व्यक्ति की साजिश भी कुमार विश्वास कह सकते हैं जिसकी मंशा उन्हें परेशान कर कुछ माल झटकने की हो सकती है. अव्वल तो पहली गलती उसने ही परिवार के साथ कपिल शर्मा का कामेडी शो देखने की, की थी. कविता और कवि कभी फूहड़ नहीं होते फूहड़ तो वह फेशनेबुल जागरुकता है जो टीका, मलखान पर तो खामोश रहती है, पर कोई मंचीय कवि महिलाओं को सामान कहे तो तिलमिला उठती है. 

डिजिटल समाज पर भी लागू एससी एसटी एक्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर अनुसूचित जाति और जनजाति यानि क्रमश: दलित और आदिवासी समुदायों के खिलाफ की गई किसी भी पोस्ट या जातिगत टिप्पणी पर सजा हो सकती है. ऐसी कोई भी टिप्पणी ऑनलाइन अब्यूज में शामिल की जाएगी. कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इस बात का सजा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि पोस्ट कर्ता ने अपनी प्राइवेसी सेटिंग को पब्लिक या प्राइवेट कर रखा है, अगर किसी की गैर मौजूदगी में भी किसी जाति विशेष का अपमान किया गया है तो इस पर भी एससी एसटी एक्ट लागू होगा.

किसी भी तरह की जातिगत टिप्पणी एससी एसटी एक्ट 1989 के तहत आती है. हालांकि यह फैसला फेसबुक वाल के संदर्भ में दिया गया है लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला उन वेबसाइटस पर भी लागू होता है जिन पर प्राइवेसी सेटिंग होती है या जो कुछ लोगों के ग्रुप तक ही शामिल होता है. यानि व्हाट्सएप पर भी यह फैसला प्रभावी होगा.

जाहिर है अब सोशल मीडिया पर दलित आदिवासियों का अपमान करना महंगा पड़ेगा, जाहिर यह भी है कि चूंकि सोशल मीडिया इन समुदायों की बेइज्जती का एक बड़ा अड्डा बन गया है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट को यह फैसला लेना पड़ा. एक वर्ग विशेष के स्वाभिमान के मद्देनजर यह फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन विचारणीय बात यह है कि क्या इससे जातिगत मानसिकता या पूर्वाग्रह खत्म हो जाएंगे. इस सवाल का जबाब बेहद निराशाजनक है कि नहीं होंगे, उल्टे सोशल मीडिया के जरिये जातिगत और धार्मिक जहर बहुत तेजी और आसानी से फैलने लगा है.

कल तक जो बातें चाय की गुमठियों और चौराहों पर होती थीं, वे अब सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से होने लगी हैं, दलित आदिवासियों का अपमान इनमे से एक है. समाज का ढांचा जरूर थोड़ा बदला है, लेकिन उसकी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है. व्हाट्सएप पर जातियों के ग्रुप बन गए हैं जितनी जातियां देश में हैं, उनसे लाख गुना ज्यादा उनके ग्रुप हैं. इन ग्रुपों में तुक या मुद्दे की बातें कम होती हैं दूसरी जाति वालों को कोसने की शाश्वत परम्परा का निर्वाह ज्यादा होता है. स्थिति यह है कि ऊंची जाति वाले ग्रुप नीची जाति वालों को कोसा करते हैं तो नीची जाति वाले ग्रुप ऊंची जाति वालों के पूर्व में किए और वर्तमान में किए जा रहे अत्याचारों का रोना रोते रहते हैं.

तकनीक का जातिगत दुरुपयोग हमारे महान देश में ही होना मुमकिन है जो दरअसल में हमारी जातिगत मानसिकता का आईना है. इसका इलाज कोई अदालत नहीं कर सकी, न कर सकती है क्योंकि जातिगत या जातिवादी व्यवस्था धर्म की देन है, अब भला किसकी मजाल कि वह धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म को ही खत्म करने की बात करे या फिर उसके समाज पर पड़ते दुष्प्रभावों की व्याख्या करे, उल्टे सोशल मीडिया या डिजिटल समाज की सुबह ही विभिन्न देवी देवताओं की तस्वीर और उनके पुण्य स्मरण से होती है.  ऐसे जड़ और धर्मान्ध लोगों से क्या खाकर यह उम्मीद की जाये कि वे जातिगत टिप्पणियां करने से खुद को रोक पाएंगे.

धार्मिक निर्देशों के अनुयायी मनुवादी और पौराणिक वादी जातिगत व्यवस्था और समाज तोड़ने के हिमायती कभी कहीं से नहीं रहे तो अब दलित आदिवासी भी इसी को बनाए रखने में अपना भला देखने लगे हैं, उनका बड़ा और स्वाभाविक डर आरक्षण छिन जाने का है, जो एनडीए के सत्तानशीं होने के बाद से लगातार बढ़ ही रहा है. हालात ज्यों के त्यों यानि अट्ठाहरवी सदी जैसे हैं, तो जाहिर है जाति की जड़ किसी के उखाड़े से नहीं उखड़ रही, बल्कि और गहराती जा रही है. अदालतें एससी एसटी एक्ट सोशल मीडिया भी पर लागू कर दें इससे इस जड़ और जड़ता पर कोई फर्क पड़ेगा ऐसा लग नहीं रहा. लोगों की मानसिकता और जातिगत पूर्वाग्रह सिर्फ और सिर्फ जागरुकता से दूर हो सकते हैं, जिसके रास्ते में धर्म सबसे बड़ा रोड़ा है, शायद इसीलिए भीमराव अंबेडकर ने धर्म ग्रन्थों को जला देने की बात कही थी.  

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