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इस तरीके को अपनाकर अपने कंप्यूटर को रखें सुरक्षित

मौर्डन पीसी और इंटरनेट एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं. यानी कि अगर आपके पीसी या कंप्यूटर में इंटरनेट कनेक्शन नहीं है तो आपका कंप्यूटर सिर्फ एक डिब्बा बनकर रह जाता है. ऐसे में इंटरनेट जितना आपके लिए लाभदायक साबित होता है उतना ही खतरनाक भी है.

हम औनलाइन सर्फिंग के दौरान कई ऐसी वेबसाइट को एक्सेस करते हैं जो हमारे पीसी के लिए खतरनाक है. ऐसे में कंप्यूटर में सिक्योरिटी का न होना आपके कंप्यूटर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. यहां अपनी इस खबर में आपको कंप्यूटर को सुरक्षित रखने के कुछ आसान तरीके बताने जा रहे हैं.

Windows Defender को ठीक से चेक कर लें

विंडोज-10 में विंडोज डिफेंडर सिक्योरिटी सेंटर एप को शामिल किया गया है जो आपके सिस्टम को वायरस से बचाता है. इसमें एंटीवायरस और फायरवौल मौजूद होता है जो आपकी पीसी को मालवेयर जैसे वायरस से सुरक्षित रखता है. ऐसे में यह चेक कर लें कि आपके कंप्यूटर में Windows Defender ठीक से काम कर रहा है या नहीं.

पीसी को रखें अपडेट

विंडोज 10 में आने वाले अपडेट्स अक्सर नए सिक्योरिटी पैच के साथ आते हैं. यह सिक्योरिटी पैच आपके सिस्टम या पीसी के सभी फीचर्स पर नजर रखता है कि यह सही से काम कर रहा है या नहीं. अगर आपके पीसी का सौफ्टवेयर कई महीनों पुराना हो चुका है तो इसमें वायरस का खतरा भी ज्यादा है. इसके लिए जरुरी है कि अपने सिस्टम के सौफ्टवेयर अपडेट की जांच कर लें. अगर आपके सिस्टम में कोई नया सौफ्टवेयर अपडेट आया है तो इसे तुरंत अपडेट कर लें.

जरुरी फाइल का रखें बैकअप

साइबर अटैक में सबसे पहले आपके सिस्टम में रखे डाटा को हैक किया जाता है. ऐसे में जरुरी है कि आप अपने डाटा की बैकअप फाइल बनाकर रखें. इस डाटा को अपने किसी सुरक्षित पेन ड्राइव, सीडी या हार्ड ड्राइव में सेव करके रखे. अगर किसी तरह का वायरस आपके सिस्टषम में आता है तो आपके डाटा को हैक नहीं कर सकता.

संदिग्ध ईमेल को न खोलें

वायरस कई तरह के होते हैं. अक्सर आपके ईमेल आईडी में कई तरह की लिंक आते हैं जो आमतौर पर सुरक्षित नहीं होते हैं. ऐसे में हैकर्स हैकर्स किसी न किसी लिंक या मेल के जरिए आपके कंप्यूटर में वायरस डाल देते हैं. इन सबसे बचने के लिए किसी भी संदिग्ध ईमेल या लिंक को खोलने से पहले सोच ले.

फाइल डाउनलोड करने के लिए सोर्स का रखें ध्यान

अपने सिस्टम या कंप्यूटर में किसी भी चीज को डाउनलोड करने से पहले उस वेबसाइट को जांच लें. कई बार किसी वेबसाइट से फाइल को डाउनलोड करने के साथ ही कुछ वायरस या मैलवेयर भी आ जाते हैं. ऐसे में किसी भी फाइल को डाउनलोड करने के लिए सोर्स का ध्यान रखें.

मुझ में हमबिस्तरी करने की कूवत नहीं है, क्योंकि लगातार हस्तमैथुन करने से मेरा अंग छोटा व पतला हो गया है. क्या करूं.

सवाल
मैं 26 साल का हूं. मेरी शादी हो चुकी है, पर मुझे लगता है कि मुझ में हमबिस्तरी करने की कूवत नहीं है, क्योंकि लगातार हस्तमैथुन करने से मेरा अंग छोटा व पतला हो गया है. क्या करूं?

जवाब
हस्तमैथुन से हमबिस्तरी करने की कूवत कम नहीं होती. छोटेपतले अंग से भी इस काम में फर्क नहीं पड़ता. हमबिस्तरी से पहले बीवी के अंगों को सहला कर उसे तैयार करें, फिर दिमाग में कोई वहम लाए बगैर हमबिस्तरी करें.

टी 20 क्रिकेट में धोनी की जगह ले सकते हैं ये पांच खिलाड़ी

न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे टी 20 मुकाबले में भारतीय क्रिकेट टीम को एक हाई स्कोर मैच में हार मिली. हार के पीछे कप्तान विराट कोहली ने बल्लेबाजों को जिम्मेदार ठहराया.

कोहली के बयान देने के बाद पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के औसत प्रदर्शन को लेकर दिग्गज क्रिकेटरों ने उन्हें अपने निशाने पर रखा. पूर्व क्रिकेटर वीवीएस लक्ष्मण और अजीत अगरकर ने कहा कि अब भारतीय टीम और खुद धोनी को नये खिलाड़ियों को खेलने का मौका देना चाहिये.

धोनी ने न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे टी 20 मुकाबले में 49 रन बनाए लेकिन जिस तरह से उन्होंने बल्लेबाजी की उस पर सवाल उठने लगे हैं. कई दिग्गज उन्हें बाहर करने की मांग करने लगे हैं.

इस बात में कोई शक नहीं कि विश्व क्रिकेट में विकेट के पीछे धोनी जैसा कोई नहीं लेकिन विकेट के आगे धोनी की जगह लेने के लिए कई स्टार बाहर बैठे हैं. खास तौर पर बात अगर टी 20 की करें तो कई ऐसे युवा और अनुभवी खिलाड़ी है जो धोनी की जगह ले सकते हैं. आइए नजर डालते हैं उन विकेटकीपर बल्लेबाजों पर जो आने वाले समय में धोनी की जगह ले सकते हैं और आपको टी 20 क्रिकेट में खेलते दिख सकते हैं.

दिनेश कार्तिक

एक समय आईपीएल के दूसरे सबसे मंहगे खिलाड़ी रहे कार्तिक धोनी की जगह लेने में सबसे आगे हैं. भारत के पहले टी 20 मुकाबले में जीत कार्तिक के बल्ले से ही निकली थी. धोनी के डेब्यू करने से पहले से ही दिनेश कार्तिक भारत के लिए मैच खेलते आ रहे हैं, लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि कार्तिक की जगह धोनी ने ले ली. पिछले कुछ समय से कार्तिक ने अपना खेल मे काफी सुधार किया जिसके कारण उन्हें टीम में जगह मिलने लगी. आज कार्तिक में रक्षात्मक शाट के साथ-साथ आक्रामक बल्लेबाजी के भी गुण भी देखने को मिल रहे हैं. 10 टी 20 में इनका औसत 21 और स्ट्राइक रेट 126 का रहा है लेकिन अन्य टी 20 में 20 अर्द्धशतक ये दर्शाते हैं कि इनके पास लंबी पारी खेलने का भी काफी अनुभव है.

ऋद्धिमान साहा

33 साल के साहा के नाम आईपीएल फाइनल में शतक लगाने का रिकार्ड है. टेस्ट क्रिकेट में धोनी की जगह लेने वाले साहा को कभी भारत के लिए टी 20 खेलने का मौका नहीं मिला. लेकिन आईपीएल में इनके तूफानी खेल से सभी वाकिफ हैं. अब देखना होगा कि क्या साहा का अंतरराष्ट्रीय टी 20 डेब्यू हो पाता है या नहीं.

ऋषभ पंत

महज 20 साल की उम्र में ऋषभ पंत ने अपने खेल की बदौलत काफी नाम कमाया है. आईपीएल में उनका प्रदर्शन शानदार रहा जिसके कारण उन्हें टीम में भी जगह मिली. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभी अपनी चमक नहीं दिखा पाए हैं, पर उनके प्रदर्शन को देख कर यह जरूर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में पंत भारत के नियमित खिलाड़ी बन सकते हैं.

के एल राहुल

भारत के लिए तीनों फार्मेट में शतक लगा चुके के एल राहुल धोनी की जगह सबसे बेहतरीन उम्मीदवार के रूप में दिखते हैं. देखा जाए तो राहुल पार्ट टाइम विकेटकीपर के सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं. तेज गति से रन बनाने के साथ-साथ राहुल स्ट्राइक भी रोटेट करने में सक्षम हैं. इतना ही नहीं राहुल मध्यक्रम में अपनी बल्लेबाजी से एक मजबूत स्तंभ बन सकते हैं. अभी तक खेले अपने 9 अंतरराष्ट्रीय टी 20 में राहुल ने एक शतक और एक अर्द्धशतक लगाया है. उनका औसत 50 का और स्ट्राइक रेट 150 के करीब है.

केदार जाधव

8 साल टी 20 खेलने के बाद 2015 में केदार जाधव ने भारत के लिए डेब्यू किया. इसके बाद से केदार जाधव को भारत का एक उभरता हुआ बेहतरीन बल्लेबाज माना गया. आईपीएल के दौरान केदार जाधव ने रायल चैलेंजर्स बैंगलुरु के लिए विकेटकीपर की भूमिका निभाई. उनकी इस भूमिका ने आरसीबी के खेल को काफी बदला. अंतरराष्ट्रीय टी 20 में उनके नाम 1 अर्द्धशतक दर्ज है तो टी 20 क्रिकेट में उन्होंने 8 अर्द्धशतक लगाए हैं. अगर उनके इन मैचो को देखा जाए तो केदार टी 20 में धोनी की जगह लेने की योग्यता रखते हैं.

हिमेश रेशमिया ने शुरू की दूसरी शादी की तैयारियां

लगभग 22 वर्ष के वैवाहिक जीवन के बाद अपनी पहली पत्नी को तलाक देकर अपनी प्रेमिका व टीवी अभिनेत्री सोनिया कपूर के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे अभिनेता, गायक व संगीतकार हिमेश रेशमिया अब अपनी दूसरी शादी की तैयारी शुरू कर चुके हैं.

यूं तो जब भी हिमेश से मीडिया उनकी दूसरी शादी को लेकर सवाल करती है, तो वह मीडिया पर ही विफर पड़ते हैं. मगर हिमेश के अति नजदीकी सूत्रों का दावा है कि उन्होंने और सोनिया कपूर ने 2018 की शुरूआत में शादी करने के लिए अभी से तैयारियां कर दी है.

सूत्र तो यह भी दावा कर रहे हैं कि हिमेश रेशमिया का बेटा स्वयं भी सोनिया कपूर के साथ अक्सर नजर आता है. सोनिया कपूर भी हिमेश के साथ जोंक की तरह हर जगह चिपकी नजर आती हैं. हिमेश रेशमिया के स्टूडियों में भी सोनिया कपूर को देखा जा सकता है.

मगर हिमेश रेशमिया की तरफ से अभी भी दूसरी शादी को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा है.

प्रधानमंत्री के लिए है गलती स्वीकारने का समय : मनमोहन सिंह

आठ नवंबर, 2016 का प्रधानमंत्री का 500 और 1,000 के नोटों को रातोंरात चलन से बाहर करने का फैसला राह से भटका हुआ कदम था, जिसने न सिर्फ सबको हैरान किया, बल्कि उसका असर एक-एक भारतीय पर पड़ा. वह एक व्यर्थ आर्थिक नीतिगत फैसला था. अगर यह मान भी लिया जाए कि इसका मकसद काला धन समाप्त करना या डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देना था, तब भी इन लक्ष्यों को हासिल करने की मुफीद राह मनमानी नोटबंदी (विमुद्रीकरण) नहीं थी.

धारणा के उलट यह कोई ‘अच्छी नीति, बुरा अमल’ का मामला भी नहीं था. यह तो बुनियादी तौर ही एक दोषपूर्ण विचार था. आज एक साल बाद यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि इस लापरवाही भरे फैसले से कितना नुकसान हुआ है. न सिर्फ आर्थिक तौर पर, बल्कि सामाजिक, सांस्थानिक और साख को पहुंची चोट के स्तर पर भी.

नोटबंदी का आर्थिक असर विकास दर की धीमी पड़ी रफ्तार में साफ-साफ दिखता है, साथ ही दूसरे आर्थिक संकेतकों में भी ह्रास दिख रहा है. आर्थिक उत्पादन पर नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव का ठीक-ठीक परिणाम मापा नहीं जा सकता और यह महत्वहीन भी है. अहम बात यह है कि मौजूदा आर्थिक सुस्ती नकदी के नुकसान से पैदा हुई है और इसके पीछे वजह नोटबंदी है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी और जो पूरी तरह से आत्मघाती थी. ऐसे झटके अपनी प्रकृति में भले ही फौरी दिखें, मगर हमारे समाज और औद्योगिक क्षेत्र के कमजोर तबकों पर इनका असर लंबे वक्त तक कायम रहता है.

नगदी का संकट अक्सर कमजोरों की कर्ज भरने के संकट में तब्दील हो जाती है. गरीब परिवारों व छोटे कारोबारियों से जुड़ी खबरों के रूप में यह संकट सामने है कि वे नोटबंदी की वजह से अपनी आजीविका को पहुंचे नुकसान से उबरने को किस कदर संघर्ष कर रहे हैं.कहा जाता है कि पैसा आपमें आत्मविश्वास पैदा करता है. अगर आपसे अचानक वह धन ले लिया जाए, तो इस भरोसे को ध्वस्त कर सकता है. अनेक सर्वेक्षणों ने कारोबारी भरोसे के तेजी से गिरने की पुष्टि भी की है. स्थिरता और निश्चितता एक गतिशील मैक्रोइकोनॉमी के जरूरी घटक हैं. नोटबंदी ने इन दोनों को ही चोटिल किया है.

एक ऐसे समय में, जब व्यक्तिगत और क्षेत्रीय आर्थिक विषमता हमारे देश में तेजी से बढ़ रही है, नोटबंदी जैसे कदम ऐसी असमानताओं को केवल विस्तार ही देंगे. हमारे लाखों नौजवान आर्थिक विकास से वंचित रह जा रहे हैं, क्योंकि नौकरियां सीमित संख्या में हैं. गैर-कृषि रोजगार के तीन-चौथाई अवसर छोटे और मध्यम उद्योगों से आते हैं. सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस के विभागीय आंकड़े यह दिखा रहे हैं कि निर्माण व छोटे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को नोटबंदी से गहरा झटका लगा है.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमें यह नसीहत दी थी कि जब भी कोई नीतिगत फैसला करना, तब समाज के ‘सबसे गरीब और हाशिये पर जी रहे इंसान का चेहरा जरूर याद करना’. जाहिर है, देश की मुद्रा को निर्थक बनाने का फैसला करते समय बापू की इस नसीहत को भुला दिया गया. इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे समाज के सबसे कमजोर तबकों को नोटबंदी ने काफी तकलीफें पहुंचाई हैं और अब यह अच्छी तरह से साबित हो गया है कि यह एक मनमानी भरा विचार था. इसलिए मुनासिब यही है कि प्रधानमंत्री अब शालीनता से इस बड़ी भूल को स्वीकार करें और देश व हमारे नौजवानों के व्यापक हित में हमारी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में सबसे सहयोग मांगें.

यह बिल्कुल संभव है कि जीडीपी आंकड़ों में मापे जाने वाले आर्थिक विकास के मौजूदा गिरावट वाले स्तर में कुछ सुधार आए, लेकिन सुधार की यह प्रकृति असमानता भरी व बीमारू हो सकती है. और आर्थिक सुधार की कोई भी खबर उस स्थायी नुकसान को नहीं दिखा पाएगी, जो नुकसान अनौपचारिक क्षेत्र को पहुंचा है. हमारा देश आज नौकरी विहिन और समानता भरे विकास की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है. यह जरूरी है कि हम इन चुनौतियों से विचलित न हों. नोटबंदी के फैसले को जायज ठहराने वाले मुखौटों की तलाश का असली जोखिम यह है कि उसमें देश के लिए गलत प्राथमिकताओं का पीछा किया जाएगा. मेरी चिंता यह है कि एक निर्थक कदम को सही ठहराने के लिए ‘न्यूनतम नगदी वाली अर्थव्यवस्था’ की दिखावटी कोशिश में हमारी अर्थव्यवस्था की दोनों बड़ी चुनौतियां नजरअंदाज हो रही हैं.

यह बहुत जरूरी है कि हम अब नोटबंदी का गुणगान और उस पर राजनीति करने से आगे बढ़ें और बेरोजगारी व असमानता की चुनौतियों के हल तलाशने के लिए एक साथ आएं. लेकिन नोटबंदी के आर्थिक नुकसान को तरफ कर दें, तो मैं संस्थाओं और उनकी साख के क्षरण को लेकर बेहद चिंतित हूं.सन 1947 में जब एक आजाद देश के तौर पर भारत ने स्वशासन और राष्ट्र निर्माण का अपना सफर शुरू किया था, तब तक उसे दरिद्र मानवों का एक भोगोलिक समूह भर बना दिया गया था. आज सात दशक बाद हम एक गौरवपूर्ण, सुसंगत राष्ट्र हैं, जो विश्व शक्ति की सीढ़ियां तेजी से चढ़ता जा रहा है. हमारे देश को यह असाधारण कामयाबी उन मजबूत संस्थाओं बदौलत मिली है, जिसकी बुनियाद हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने रखी थी, और फिर उन्होंने व उनके बाद के नेताओं ने उनका भरपूर पोषण किया. उन्होंने लोकसभा और विधानसभा जैसी विधायी संस्थाओं के अलावा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी न्यायिक संस्थाएं खड़ी कीं, तो मीडिया, चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक, सेंट्रल स्टैस्टिटिक्स ऑफिस, सेबी और अनेक सांस्कृतिक संगठनों को भी खड़ा किया. विश्व मंचों पर भारत की मजबूती के ये आधार रहे हैं.

इन संस्थाओं ने नियम बनाए और उन्हें निरंतरता के साथ लागू किया, भले ही सत्ता में कोई भी रहा हो. भारत की ठोस तरक्की और विकास में इन संस्थाओं की स्वायत्तता, साख और भरोसा का भारी महत्व है. यही वे संस्थाएं हैं, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किसी व्यक्ति से बड़ा देश है. इन संस्थाओं की स्वायत्तता और साख पर कोई भी हमला देश के प्रत्येक नागरिक पर सीधा हमला है. इतिहास ऐसे सबकों से भरा हुआ है कि किसी भी समाज की दीर्घकालिक तरक्की उसकी संस्थाओं की प्राणशक्ति से संचालित होती है. पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका की जबर्दस्त सफलता के संदर्भ में अनेक अर्थशास्त्रियों व इतिहासकारों ने काफी तफसील से उनकी संस्थाओं की भूमिका को दर्ज किया है. इन संस्थाओं ने न सिर्फ न्याय और आजादी की स्थापना की, बल्कि उनका बखूबी संरक्षण भी किया है.

भारत की नोटबंदी की कहानी भी हमारी संस्थाओं और हमारे समाज में उनके महत्व की दास्तान है. भारतीय रिजर्व बैंक एक ऐसी संस्था है, जिसे भारी महत्व दिया गया है और यह महत्व उसे काफी सावधानी से सौंपी गई स्वायत्तता व विश्वसनीयता से पोषित है. नोटबंदी का फैसला आरबीआई की सांस्थानिक स्वायत्तता को गंभीर चोट पहुंचाने वाला कदम था. इस बात की पूरी संभावना है कि आरबीआई को नोटों को रद्द किए जाने के फैसले पर विचार करने या अपनी राय रखने का मौका नहीं दिया गया था. मैं इसके लिए उसे दोषी नहीं ठहरा रहा, बस इस बात को रेखांकित कर रहा हूं कि उसे कार्यपालिका की शक्तियों को नियंत्रित व संतुलित करने का अधिकार सौंपा गया है. मेरा आरबीआई के गवर्नर में पूरा यकीन है और मैं पूरी गंभीरता के साथ यह मानता हूं कि अपने शेष कार्यकाल में वह संस्थान की प्रतिबद्धता, विश्वास और साख को बनाए रखेंगे.

हाल में गुजरात विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा में चुनाव आयोग ने जैसी देरी की, वह भी देश की संस्थाओं की मजबूती को लेकर चिंता बढ़ाने वाली रही. अपनी समृद्ध विरासत के साथ चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं हमारे गणराज्य की बुनियाद रही हैं. ऐसी संस्थाओं की आजादी को कमतर करने की कोई भी कोशिश हमारे देश के लिए खतरनाक होगी.

मीडिया, जांच एजेंसियों, शैक्षिक व सांस्कृतिक संगठनों की स्वायत्तता और प्रतिबद्धता आज भारी दबाव में हैं. देश के प्रमुख संस्थानों के नेतृत्व के कंधों पर आज एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे देश के भविष्य के लिए अपनी पूरी ताकत से अपने संस्थानों की रक्षा करें. हरेक राजनेता में यह लोभ होता है कि तेजी और दक्षता के लिए वह सांस्थानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी कर दे. राजनीतिक बहुमत प्राप्त राजनेताओं में तो अपने लोभों को पूरा करने की क्षमता भी होती है. लेकिन ऐसे लोभ के वशीभूत होकर कदम उठाना अपने उन स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र-निर्माताओं से विश्वासघात करना होगा, जिन्होंने इस संप्रभु भारत की नींव रखी है.

मैं यही उम्मीद करता हूं कि नोटबंदी एक बड़ी भूल थी. संस्थाओं की अनेदखी, सर्वसम्मति को महत्व न देना और उतावलेपन ने नोटबंदी के फैसले को संभव बनाया. इसमें शासन और राष्ट्र-निर्माण के गहरे सबक हैं. एक सच्च उदार समाज वह है, जो एक भी बेकसूर इंसान को गैर-मुनासिब सजा से बचाने के लिए संघर्ष करता है. इस बात को सुनिश्चित करने में संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है. वास्तव में, यह समय नोटबंदी से आगे बढ़ने का है, लेकिन हमारी संस्थाओं, उनकी कार्य-पद्धति और प्रक्रिया को अक्षुण्ण रखने का भी.

साभार : हिन्दुस्तान

हर ब्वायफ्रेंड से मेरा ब्रेकअप हो जाता है : कृति खरबंदा

हर इंसान की चाहत होती है कि उसे उपहार मिले. मगर उपहार देने के बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं. जबकि दक्षिण भारत में शोहरत बटोरने के बाद बौलीवुड में व्यस्त अदाकारा कृति खरबंदा का शौक ही है, लोगों को उपहार देना.

खुद कृति खरबंदा कहती हैं, ‘‘मुझे लोगों को उपहार देने का बड़ा शौक है. पर आज तक मुझे मेरे जैसे लोग नहीं मिले. जब मेरे दोस्त मेरे जन्मदिन पर सवाल करते हैं कि मुझे उपहार में क्या चाहिए तब मैं उनसे कहती हूं, बेशर्मों मुझे इतने वर्षों से जानते हो, पर तुम्हे यह नहीं पता कि मुझे क्या चाहिए जबकि मैं तुम लोगों का कितना ध्यान रखती हूं. इसी वजह से हर ब्वायफ्रेंड से मेरा ब्रेकअप हो जाता है क्योंकि लोग दूसरों को कुछ भी देना नहीं जानते. यहां लोग सिर्फ लेना चाहते हैं.’’

किस तरह के उपहार आप देना पसंद करती हैं?

यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि दोस्त कौन है, उसकी पसंद नापसंद क्या है और अवसर क्या है.

आपको किसी को भी उपहार आदि देना अच्छा क्यों लगता है?

मुझे देना इसलिए अच्छा लगता है, क्योंकि एक वक्त वह भी था, जब मेरी इच्छाएं थी, मेरा मन होता था कि इस शख्स को यह चीज दी जाए, मगर तब मैं खुद इतना आर्थिक संकट से जूझ रही थी, कि कुछ नहीं कर पा रही थी. उस वक्त मुझे अपने आप पर, अपने हालात पर कोफ्त होती थी.

यह कब की बात है?

जब मैं स्कूल में थी, तब भी ऐसा हुआ और जब मैं अभिनेत्री बन गयी, तब भी ऐसा हुआ. जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ती थी, उन दिनों मेरी मम्मी मुझे जेब खर्च के लिए बीस रूपए दिया करती थी. तब अगर कभी ऐसा हुआ कि मेरी किसी दोस्त को भूख लगी है, तो मैं हमेशा उसके साथ होती थी. कई बार मैं पूरे बीस रूपए अपने दोस्त को दिए हैं. पैसा ऐसी चीज है, जिसे मैंने कभी पकड़ा नहीं. जबकि मुझे कमाने का बहुत शौक है. मैं पैसा सिर्फ अपने लिए नहीं कमाना चाहती. बल्कि लोगों की मदद के लिए कमाना चाहती थी और आज भी कमाना चाहती हूं. इसलिए जब मुझे मौका मिला, तो मैने लोगों की मदद करनी शुरू की. दूसरों की मदद कर मुझे काफी अच्छा लगता है. उस वक्त मुझे जो सुख मिलता है, उसे तो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती.

मैं इसलिए भी हीरोईन बनना चाहती थी, जिससे पैसे कमाकर मैं लोगों की मदद कर सकूं, चैरिटी कर सकूं पर मैं सड़क पर भीख मांग रहे लोगों की मदद नहीं करती. मेरा मानना है कि यदि आपके हाथ पैर सलामत हैं, आप स्वस्थ हैं, तो फिर आपको कुछ न कुछ काम करने का प्रयास करना चाहिए. भीख मांगना गलत है. पर यदि कोई इंसान मेहनत करते हुए नजर आता है, भले ही वह एक छोटी सी दुकान चला रहा हो, ऐसे में यदि उसे तकलीफ है, तो मैं उसकी मदद करना पसंद करुंगी. मानव मनोविज्ञान भी यही कहता है, ‘आप जिस तरह के इंसान हो, उसी तरह के लोग आपको मिलते हैं. मेरा मानना है कि चाहे दोस्त हो या ब्वायफ्रेंड हो, यदि उसके अंदर देने की आदत नहीं है, तो वह मेरा दोस्त हो ही नहीं सकता. मुझे कंजूस दोस्त नही पसंद.

आपने कभी किसी की मदद की हो या किसी को कुछ दिया हो, जिससे सामने वाले इंसान की जिंदगी बदल गयी हो?

इस सवाल का जवाब देकर मैं खुद को महान और सामने वाले को तुच्छ नहीं साबित करना चाहती. मेरी नजर में हर इंसान का आत्मसम्मान होता है, उसकी अपनी हैसियत भी होती है. वक्त कई बार इंसान को मदद लेने के लिए विवष करता है. दूसरी बात मैंने अब तक ऐसा कुछ महान चैरिटी वाला काम नहीं किया है कि उसका प्रचार करुं. मेरी कमाई अभी बहुत कम है.

इसके अलावा लोगों को सलाह देकर भी उनकी जिंदगी बदली जा सकती है. मैंने दो तीन दोस्तों की मदद कर उनकी जिंदगी बदली है, पर यह मेरे दोस्तों का निजी मसला है, इसलिए बता नहीं सकती. मसलन, मेरी एक दोस्त ऐसी है, जो एक समय बहुत बुरे दौर से गुजर रही थी. मेरी मदद से उसकी जिंदगी बदली भी है. वैसे मुझे यह भी लगता है कि इंसान के कर्म बहुत महत्वपूर्ण हैं.

मदद तो भावनात्मक सहारे या पैसे से की जाती है. आप इसमें से किसे ज्यादा अहमियत देती हैं?

मेरे लिए दोनों महत्वपूर्ण है. जहां भावनात्मक मदद की जरुरत होती है, वहां पैसा काम नहीं आता और जहां पैसे की जरुरत हो, वहां भावना काम नहीं आती है. पर मैं पैसे को ग्रांटेड मानकर नहीं चलती.

सिद्धार्थ मल्होत्रा का नुकसान, आयुष्मान खुराना का फायदा

बौलीवुड में हमेशा सफलता की ही पूजा होती है. इसके बावजूद कुछ कलाकार एक फिल्म के सफल होते ही अहम के शिकार हो जाते हैं और स्टार की तरह व्यवहार करने लगते हैं. परिणामतः बहुत जल्द उनके करियर पर सवालिया निशान लगने लगते हैं. ऐसे ही कलाकार हैं सिद्धार्थ मल्होत्रा.

2012 में करण जोहर की सफल फिल्म ‘‘स्टूडेंट आफ द ईअर’’ से अभिनय करियर शुरू करने वाले सिद्धार्थ मल्होत्रा की उसके बाद से लगातार ‘हंसी तो फंसी’,‘ब्रदर्स’,‘बार बार देखेा’,‘ए जेंटलमैन’आदि फिल्में बौक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल होती आयी हैं. अब जब उनकी नई फिल्म‘‘इत्तफाक’’ने भी बाक्स आफिस पर दम तोड़ दिया,तो फिल्मकारों का उनसे मोहभंग हो गया.

सूत्रों पर यकीन किया जाए, तो एक बड़े प्रोडक्शन हाउस ने अपनी हास्य फिल्म से सिद्धार्थ मल्होत्रा की छुट्टी कर उनकी जगह इस फिल्म में आयुष्मान खुराना को शामिल कर लिया है. इस तरह सिद्धार्थ मल्होत्रा का नुकसान और आयुष्मान खुराना का फायदा हो गया. अब सिद्धार्थ मल्होत्रा के पास ‘‘अय्यारी’’के अलावा कोई फिल्म नहीं बची है. इस मल्टीस्टारर फिल्म में  उनके साथ मनोज बाजपेयी, नसिरूद्दीन शाह,मो. जीशान अयूब सहित कई दूसरे कलाकार हैं.

सूत्रों की माने तो अब बौलीवुड में लोग खुलकर कहने लगे हैं कि यदि सिद्धार्थ मल्होत्रा ने रोमांस से ध्यान हटाकर अपने अभिनय करियर को संवारने पर ध्यान नहीं दिया, तो उनके करियर को चौपट होने से कोई नहीं बचा पाएगा.

नोटबंदी बेवजह उठाया गया एक कदम : सचिन पायलट

काले धन के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन ठीक एक साल पूर्व आठ नवंबर को जिस प्रकार केंद्र सरकार ने आनन-फानन में नोटबंदी की, वह एक बड़ी राजनीतिक भूल थी. जो उद्देश्य सरकार ने नोटबंदी के बताए थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं हुआ. जबकि अर्थव्यवस्था को सरकार के इस अपरिपक्व कदम की भारी कीमत चुकानी पड़ी. एक साल बाद भी देश इसके दुष्प्रभावों से उबर नहीं पाया है.

नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन बातें कही थीं. एक, इससे लोगों की तिजोरियों में छिपा काला धन खत्म हो जाएगा. दूसरी, आतंकियों और नक्सलियों को आर्थिक मदद मिलनी बंद हो जाएगी. तीसरी, नकली नोटों की समस्या दूर होगी. लेकिन ये तीनों समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं. जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, तो अटार्नी जनरल ने कहा था कि तीन लाख करोड़ का काला धन उजागर होगा. लेकिन यह बात सही नहीं निकली.

99 फीसदी रुपये तय समय के भीतर बैंकों में वापस आ गए, जबकि पिछले एक साल में आतंकी गतिविधियों में 33 फीसदी का इजाफा हुआ है. जहां तक जाली नोटों का प्रश्न है, तो सरकार बताए कि कितने जाली नोट कम हुए? सरकार के पास कोई जवाब नहीं है. नोटबंदी एक बेवजह उठाया गया कदम था. इसमें भारतीय रिजर्व बैंक की सहमति नहीं थी. यह एक सांस्थानिक कदम नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक कदम था. इसके लिए उचित तैयारी भी नहीं की गई.

पहले 31 मार्च तक पुराने नोट बदलने की तिथि रखी गई. फिर उसे 31 दिसंबर को खत्म कर दिया गया. कुप्रबंध कितना था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिजर्व बैंक को महज 50 दिनों के भीतर 74 नोटिफिकेशन निकालने पड़ गए. एटीएम मशीनों को भी नए नोट के लायक नहीं बनाया गया. नतीजा यह हुआ कि 140 लोग लाइनों में लगे-लगे मारे गए.

आरबीआई को नोट छापने में आठ हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. एक तरफ पांच सौ और एक हजार रुपये के बड़े नोटों को बंद किया गया, ताकि काले धन पर लगाम लगे, लेकिन दूसरी तरफ दो हजार रुपये के नोट शुरू कर दिए गए. यह पूरा अर्थशास्त्र समझ से परे है. सरकार को जब इसके नुकसान का एहसास होना शुरू हुआ, तो रुख बदलने की कोशिश की गई. आनन-फानन में नोटबंदी को डिजिटल भुगतान से जोड़ दिया गया. काले धन, आतंकी फंडिंग व नकली नोटों का मुद्दा गौण हो गया. मगर क्या डिजिटल भुगतान बढ़ा?

रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़े कहते हैं कि स्थिति अब फिर नोटबंदी के पहले वाले स्तर पर आ गई है. नोटबंदी के दौरान 99 फीसदी पैसा बैंकों में वापस चला गया, इसलिए अघोषित संपत्ति के खुलासे के जो मामले सामने आए, वे बेहद कम हैं. पिछले एक साल के दौरान कुल 29 हजार करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ी गई है, जबकि यूपीए शासन में 2013-14 के दौरान एक लाख एक हजार करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ी गई थी.

जाहिर है, नोटबंदी अघोषित आय का पता लगाने में भी असफल रही है. नोटबंदी को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अनुमान सही निकला. उन्होंने जीडीपी में दो फीसदी की गिरावट की बात कही थी, जो आज सही हो रही है. देश भारी मंदी की चपेट में है. किसानों, मजदूरों की बदहाली बढ़ी है. देश में असंगठित क्षेत्र में काम-धंधा चौपट हो गया है. करीब 33 फीसदी रोजगार घटे हैं. मध्यम व लघु उद्योगों के लाभ में 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. संगठित रोजगार भी घट रहा है. कंपनियों में छंटनी हुई है.

हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था नकदी आधारित है. डिजिटल भुगतान के लिए गांवों में न तो बुनियादी ढांचा है और न लोगों में इतनी जागरूकता और कौशल है. लोगों पर नोटबंदी और डिजिटल भुगतान थोपा गया. इससे ग्रामीण, किसान, छोटा-मोटा काम करने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए.सरकार की तरफ से कहा गया है कि नोटबंदी से आयकर देने वालों की संख्या में एक साल में 25 फीसदी का इजाफा हुआ. पिछले साल आयकर देने वाले 25 फीसदी बढ़े जरूर थे, लेकिन उससे पहले साल यह वृद्धि 27 फीसदी की हुई थी. वास्तव में आयकर देने वाले बढ़ने की बजाय घट गए.

साभार : हिन्दुस्तान

मैट्रो के साथ साथ बहुमंजिली सड़कें बनाना है जरूरी

शहरों की बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मैट्रो रेल सेवाओं का बड़ा जाल बिछाया जा रहा है. यह  ठीक है पर ट्रैफिक की समस्या को यह न तो नजात देगा न हरेक वर्ग के लिए, हर समय के लिए उपयुक्त है. अपना वाहन सदियों से मानव का सही सहारा रहा है और अपना घोड़ा, गधा या रथ अथवा घोड़ागाड़ी सदियों से सफल संपन्न लोगों की ताकत रहे हैं.

इस तरह के लोग अगर मैट्रो, बस, टैक्सी न लें तो इस के लिए उन्हें दोष देना गलत है. उन्हें उन की चाही सुविधा दें चाहे, उस की कीमत लें. मैट्रो के साथसाथ बहुमंजिली सड़कें बनाना भी अब जरूरी हो गया है. जैसेजैसे शहर ऊंचे हो रहे हैं यानी 20-30-50 मंजिले मकान बन रहे हैं, वैसे ही बहुमंजिली सड़कें 4-5-6 मंजिली बननी चाहिए. बहुत जगह बन रही हैं और 2-3 लैवल अब आम होने लगे हैं. अब सरकारों को 4-5 मंजिली लंबी सड़कों के बनाने पर विचार करना होगा.

जैसी बहुमंजिली पार्किंग बन रही हैं और ये शहरों के लिए विलासिता नहीं, आवश्यकता हो गई हैं, वैसी ही बहुमंजिली सड़कें भी बनानी होंगी.

ज्यादा गाडि़यां ज्यादा प्रदूषण जरूर फैला सकती हैं पर यदि ट्रैफिक के लिए रुकना न पड़े तो कम धुआं बरबाद कर के भी लंबी यात्रा की जा सकती है. ये सड़कें टोल सड़कें यानी जब इस्तेमाल करो तब पैसा दो के आधार पर भी बनाई जा सकती हैं और कर लगा कर पैसा वसूल करने के आधार पर भी.

मैट्रो पर भरोसा ठीक है पर कारें आज के आधुनिक समाज के लिए आवश्यक हैं. उन से बचा नहीं जा सकता.

सलाखों में पहुंचा हवस का भूखा हलाला ऐक्सपर्ट

24 अगस्त, 2017 को पुलिस की गिरफ्त में आए नीले रंग का लिबास पहने और सिर पर गोल टोपी लगाए उस शख्स की बातें वरदी वालों को हैरान कर रही थीं. उस का गुनाह इतना था कि वह सजायाफ्ता मुजरिम था और कई सालों से फरार था. उस ने न सिर्फ जादूटोना, तावीजगंडों के नाम पर अपने अंधविश्वासी मुरीदों को लूटा था, बल्कि वह औरतों की आबरू से भी खेलता था और इस काम के पैसे लेता था.

धर्म की आड़ में खुद को वह हलाला ऐक्सपर्ट मौलवी बताता था. अपने पाखंड के जाल व हलाला को उस ने मौजमस्ती व रोजीरोटी का जरीया बना लिया था.

हलाला को बनाया धंधा

दरअसल, पकड़ा गया मौलाना करीम खुद को धर्म का बहुत बड़ा जानकार और तंत्रमंत्र का माहिर बताता था. लोगों को भूतप्रेत व निजी परेशानियों को दूर करने के नाम पर वह तावीजगंडे बांटता था. उस के अंधभक्तों की खासी तादाद थी.

मौलाना करीम मुंबई, सूरत, अजमेर शरीफ, फर्रुखाबाद वगैरह जगहों पर जा कर रुकता था. चेलेचपाटे ही उस का प्रचारप्रसार किया करते थे. बदले में वह उन्हें छल से कमाई दौलत का कुछ हिस्सा देता था.

मौलाना करीम ने 20 साल से ले कर 50 साल तक की औरतों के हलाला किए. हलाला का काम वह कभी लोगों के घर जा कर, तो कभी होटलों में कर दिया करता था. जिस औरत पर उस का ज्यादा दिल आ जाता, उसे वह कई दिनों तक अपने पास रखता था और मन भर जाने पर उसे उस के परिवार वालों के हवाले कर देता था.

इतना ही नहीं, करीम खुद को धर्मगुरु बताता था. हलाला करने के पहले वह सामने वाले की माली हालत के हिसाब से पैसे लिया करता था. उस ने एकदो नहीं, बल्कि 38 से ज्यादा औरतों का हलाला किया था. चेले खुश रहें, इसलिए वह उन्हें भी औरतों से मजे कराता था.

करीम के चेले बहलाते थे कि जो कोई मौलाना से हलाला कराएगा, उस शख्स को जन्नत नसीब होगी. साथ ही, रिश्ते में कभी कड़वाहट पैदा नहीं होगी. करीम की सभी मुरादें बैठेबिठाए पूरी हो रही थीं. तंत्रमंत्र और हलाला उस के लिए धंधा था, जिस से होने वाली कमाई वह खुद भी रखता था और अपने चेलों में भी बांटता था.

पुराना अपराधी था पाखंडी

मौलाना करीम का असली नाम आफताब उर्फ नाटे था. न तो वह कोई पहुंचा हुआ धार्मिक गुरु था और न ही तंत्रमंत्र का जानकार, बल्कि वह सजायाफ्ता एक भगौड़ा अपराधी था.

पुलिस से बचने के लिए आफताब उर्फ नाटे ने धर्म का चोला पहना और धार्मिक जगहों को ठिकाना बना कर लोगों की आंखों में धूल झोंकने लगा.

दरअसल, आफताब उत्तर प्रदेश के इलाहाद जनपद के शाहगंज थाना इलाके का रहने वाला था. वह जवानी में दबंग व आपराधिक सोच का था.

साल 1981 में आफताब ने एक नौजवान मोहम्मद अजमत की गोली मार कर हत्या कर दी थी. हत्या के इस मामले में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

एक साल बाद जनपद कोर्ट से उसे हत्या का कुसूरवार पाते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी गई. उस के परिवार वालों ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, तो साल 1985 में उसे कुछ समय के लिए जमानत मिल गई.

आफताब जेल की जिंदगी से ऊब चुका था. बाहर आते ही वह हमेशा के लिए फरार हो गया. उस ने अपना नाम बदल कर मौलाना करीम रखा और यह धंधा आबाद करने लगा.

यों आया शिकंजे में आफताब भले ही धर्म की आड़ में मौज काट रहा था, लेकिन उस के परिवार वालों ने उस के कहने पर पहले तो उस से संबंध न होने की बात फैलाई, फिर कुछ साल बाद यह कहना शुरू कर दिया कि शायद आफताब किसी हादसे का शिकार हो कर मर चुका है. यह सब उस की सािजश का हिस्सा था. दरअसल, आफताब परिवार की खैरखबर रखता था. वह लगातार मोबाइल फोन के जरीए उन के संपर्क में रहने लगा.

आफताब शातिर था. कुछ ही महीनों में वह सिमकार्ड बदल दिया करता था. वह इलाहाबाद समेत आसपास के जिलों में होने वाले धार्मिक जलसों में पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर घूमता था. 4 साल पहले हाईकोर्ट ने आफताब की फरारी को संज्ञान में ले कर पुलिस से उसे कोर्ट में पेश करने को कहा, तो पता चला कि वह फरार है.

जब पुलिस उसे खोजने में नाकाम रही, तो हाईकोर्ट ने किसी तरह उसे 3 महीने में पेश करने को कहा. उस के बाद इलाहाबाद परिक्षेत्र के आईजी एसवी सावंत ने उसे तलाशने के निर्देश दिए और उस पर 12 हजार रुपए का इनाम भी ऐलान कर दिया.

पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ मीना ने इंस्पैक्टर अनिरुद्ध सिंह समेत पुलिस की टीमों को उस की खोज में लगाया. पुलिस को सूचना मिली कि आफताब कौशांबी के एक प्रोग्राम में आने वाला है. पुलिस ने घेराबंदी की, लेकिन वह चकमा दे कर भाग गया.

पुलिस ने आफताब के परिवार वालों के फोन नंबर सर्विलांस पर ले लिए, जिस से पता चला कि वह एक मजार में शरण लिए हुए है. इस के बाद इंस्पैक्टर अनिरुद्ध सिंह ने खुद को झाड़फूंक करवाने वाला मरीज बता कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ मीना ने बताया, ‘‘आफताब तंत्रमंत्र का ढोंग कर के लोगों से पैसा ऐंठता था. उस ने झांसा दे कर 38 से ज्यादा औरतों का हलाला करवाने की बात कबूल की है. उस की पहचान एक सिद्ध मौलाना के रूप में बन रही थी.’’

सामाजिक कार्यकर्ता ताहिरा हसन कहती हैं कि मुसलिम धर्म में प्रचलित हलाला को ले कर मौलानाओं पर तमाम आरोप लगते रहे हैं, लेकिन यह बड़ी हकीकत खुल कर उजागर हुई है कि हलाला के नाम पर धर्म की आड़ में पाखंडी क्याकुछ नहीं करते हैं.

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