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बड़ा सवाल : बच्चे हों या औरतें बलात्कार क्यों

8 सितंबर, 2017 की सुबह भोंडसी, गुड़गांव में श्याम कुंज इलाके की गली नंबर 2 में रहने वाले वरुण ठाकुर अपने बच्चों प्रद्युम्न और विधि को सुबह के 7 बज कर 50 मिनट पर रयान इंटरनैशनल स्कूल के गेट पर छोड़ गए थे. प्रद्युम्न दूसरी क्लास में पढ़ता था, जबकि विधि 5वीं क्लास में.

8 बजे स्कूल का एक माली दौड़ कर प्रद्युम्न की टीचर अंजू डुडेजा के पास गया और उन का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बोला, ‘‘देखो,?टौयलेट में क्या हो गया है…’’

अंजू डुडेजा जब वहां पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि टौयलेट के बाहर गैलरी की दीवार के पास प्रद्युम्न का स्कूल बैग पड़ा था और टौयलेट के भीतर वह लहूलुहान हालत में. 8 बज कर 10 मिनट पर?स्कूल मैनेजमैंट ने प्रद्युम्न के पिता को उस की तबीयत खराब होने की सूचना दी. इसी बीच प्रद्युम्न को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

इस हत्याकांड में बस कंडक्टर को जिम्मेदार ठहराया गया. उस ने बच्चे के साथ यौन शोषण करने की कोशिश की थी या किसी और को बचाने के लिए बस कंडक्टर को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, ऐसे सवालों के जवाब तो समय आने पर ही पता चलेंगे, लेकिन सब से अहम बात यह है कि एक परिवार ने अपने मासूम बच्चे को खो दिया, वह भी इस तरह से कि जीतेजी तो उन के दिलोदिमाग से प्रद्युम्न की यादें नहीं जा पाएंगी.

प्रद्युम्न के पिता ने इस हत्याकांड की तह तक पहुंचने के लिए कानून का सहारा लिया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए खुद सभी प्राइवेट स्कूलों में सिक्योरिटी की जांच करने का फैसला लिया. लेकिन सवाल उठता?है कि ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि कोई बालिग आदमी किसी बच्चे

को अपनी हवस का शिकार बनाता है, क्योंकि इस वारदात के तुरंत बाद दिल्ली के एक निजी स्कूल में 5 साल की एक बच्ची के साथ रेप की वारदात सामने आई थी.

गुड़गांव के ही एक पड़ोसी जिले फरीदाबाद में भी ऐसा ही शर्मनाक वाकिआ हो गया था. नैशनल हाईवे के पास सीकरी गांव के सरकारी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ने वाले एक बच्चे को 24 अगस्त, 2017 को सीकरी गांव का रहने वाला 19 साला सूरज अपने साथ स्कूल के पीछे उगी झाडि़यों में ले गया था. वह उस के साथ गलत काम करना चाहता था. बच्चे ने विरोध किया,

तो सूरज ने उस का गला दबाया और जबरदस्ती की. बाद में पहचान मिटाने के लिए पत्थर से वार कर के बच्चे का चेहरा कुचल दिया. हाल ही में मुंबई में अपने सौतेले पिता द्वारा कथित तौर पर बलात्कार किए जाने के बाद पेट से हुई 12 साल की एक लड़की ने एक सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया. आरोपी को इसी साल जुलाई महीने में गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने बताया कि लड़की के पेट से होने के बारे में बहुत देर से, तकरीबन 7 महीने बाद पता चला था. लड़की ने अपनी मां को बताया था कि उस के सौतेले पिता ने उस के साथ कथित तौर पर कई बार बलात्कार किया था.

बड़े दुख की बात है कि भारत में साल 2010 से साल 2015 तक यानी 5 साल में ही बच्चों के बलात्कार के मामलों में 151 फीसदी की शर्मनाक बढ़ोतरी हुई थी. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010 में दर्ज 5,484 मामलों से बढ़ कर यह तादाद साल 2014 में 13,366 हो गई थी.

इस के अलावा बाल यौन शोषण संरक्षण अधिनियम (पोक्सो ऐक्ट) के तहत देशभर में ऐसे 8,904 मामले दर्ज किए गए. साल 2013 की बात है. छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले में कन्या छात्रावास में प्राइमरी क्लास की 9 आदिवासी छात्राओं के साथ यौन शोषण का एक मामला सामने आया था. इस वारदात

की जानकारी मिलते ही पुलिस ने छात्रावास के चौकीदार दीनाराम और शिक्षाकर्मी मन्नूराम गोटर को गिरफ्तार कर लिया था.

तब छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व सांसद रमेश बैस ने सवाल उठाया था कि बराबरी या बड़े लोगों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन बच्चों के साथ ऐसा अपराध क्यों होता?है?

औरतें और बच्चे शिकार

सच तो यह है कि औरतों और बच्चों से बलात्कार करने का इतिहास बहुत पुराना है. जब कभी राजामहाराजा किसी पड़ोसी देश को लड़ाई में जीतते थे, तो हारे हुए राजा की जनता में से औरतों के साथ अपने सैनिकों को बलात्कार करने की छूट दे देते थे. वे सैनिक बच्चियों और औरतों में कोई फर्क नहीं करते थे. जो औरतें अपनी इज्जत बचाना चाहती थीं, उन्हें खुदकुशी करना सब से आसान रास्ता लगता था.

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में भी न जाने कितनी औरतों और बच्चियों ने अपनी इज्जत गंवाई थी. वैसे, जब हवस हावी होती है, तो फिर छोटे लड़के भी बलात्कारी के शिकार बन जाते हैं.

भारत में जिन राज्यों में सेना की चलती है, वहां की लोकल औरतों की सब से बड़ी समस्या यह रहती है कि उन की व उन के बच्चों की इज्जत सुरक्षित नहीं है. जम्मू व कश्मीर में बहुत से सैनिकों पर बलात्कार करने के आरोप लगते रहे?हैं.

फिलीपींस देश के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने तो एक चौंकाने वाला बयान दे डाला था. जब वे दक्षिणी फिलीपींस में मार्शल ला लगाने के 3 दिन बाद सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए वहां पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि सैनिकों को 3 औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत है.

ऐसी क्या वजह?है कि कोई राष्ट्रपति अपने ही देश की औरतों के साथ बलात्कार करने की इजाजत देता है? क्या कोई सैनिक जब उन के आदेश को मानेगा, तो वह सामने औरत है या बच्ची, इस बात का ध्यान रखेगा?

चलो, एक बालिग लड़की या औरत के साथ जबरदस्ती करने की बात समझ में आती?है, हालांकि यह भी गलत?है, लेकिन किसी बच्ची को लहूलुहान करने में किसी मर्द को कौन सा सुख हासिल होता है?

जब कोई मर्द किसी औरत या बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाता है, तब उस की सोच क्या रहती?है? भारत की बात करें, तो यहां ऐसा मर्दवादी समाज है, जहां मर्दों को अपना हुक्म चलाने की आदत होती है. वे चाहते हैं कि औरतें उन के पैरों की जूती बन कर रहें. जब कोई बाहरी औरत उन की बात नहीं मानती है, तो वे उस की इज्जत से खेल कर उस के अहम को चोट पहुंचाते?हैं. जब औरत हाथ नहीं आती, तो बच्ची ही सही.

क्या आप ने कभी सोचा है कि जितनी भी गालियां बनी हैं, उन में औरतों के नाजुक अंगों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है? इस में भी मर्दवादी सोच ही पहले नंबर पर रहती है. कुछ लोगों के दिमाग में 24 घंटे हवस सवार रहती है. वे जब अपनी जिस्मानी जरूरत घर में बीवी से पूरी नहीं कर पाते?हैं, तो आसपड़ोस में झांकते हैं. जब कभी कोई बड़ी औरत फंस जाए तो ठीक, नहीं तो कम उम्र की बच्ची को भी नहीं छोड़ते?हैं. फिर उन के लिए यह बात कोई माने नहीं रखती है कि मजा मिला या नहीं.

जब किसी बड़े संस्थान या मैट्रो शहर में ऐसे बलात्कार होते हैं, तो अपराध सामने आ जाते हैं, लेकिन छोटे इलाकों में तो पता भी नहीं चल पाता?है. समाज का डर दिखा कर घर वाले ही पीडि़त को चुप करा देते?हैं, जिस से बलात्कारी के हौसले बढ़ जाते हैं. लेकिन बलात्कारी खासकर छोटे बच्चों को शिकार बनाने वाले समाज में

खुले घूमने नहीं चाहिए? क्योंकि वे अपनी घिनौनी हरकत से पीडि़त बच्चे के दिलोदिमाग पर ऐसी काली छाप छोड़ देते हैं, जो उस के भविष्य पर बुरा असर डालती है.

ऐसा पीडि़त बच्चा बड़ा हो कर अपराधी बन सकता है. यह सभ्य समाज के लिए कतई सही नहीं. लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि बलात्कारी आतंकवादियों के ‘स्लीपर सैल’ की तरह समाज में ऐसे घुलेमिले होते?हैं कि जब तक वे पकड़ में न आएं, तब तक उन की पहचान करना मुश्किल होता है. इस के लिए कानून से ज्यादा लोगों की जागरूकता काम आती है.

सैक्स ऐजुकेशन जरूरी

बच्चों के हकों के प्रति लोगों को जागरूक करने वाले और नोबल अवार्ड विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि बच्चे सैक्स हिंसा का शिकार न बनें, इस के लिए पूरे समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा. साथ ही, स्कूलों में सैक्स ऐजुकेशन से बच्चों को इस जानकारी से रूबरू कराना चाहिए.

कैलाश सत्यार्थी की सब से बड़ी चिंता यह है कि बच्चों को उन के?घरों व स्कूलों में मर्यादा, इज्जत, परंपरा वगैरह की दुहाई दे कर इस तरह के बोल्ड मामलों पर बोलने ही नहीं दिया जाता है. अगर वे कुछ पूछना चाहते हैं, तो उन्हें ‘गंदी बात’ कह कर वहीं रोक दिया जाता है.

अगर कोई बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस के जिस्मानी घाव तो वक्त के साथ फिर भी भर जाते हैं, पर मन पर लगी चोट उम्रभर दर्द देती है.

हिंदी फिल्म ‘हाईवे’ की हीरोइन आलिया भट्ट के साथ बचपन में उन्हीं के परिवार के एक सदस्य ने यौन शोषण किया था, जिस की तकलीफ से वे पूरी फिल्म में जूझती दिखाई देती हैं.

जहां तक इस समस्या से जुड़े कानून की बात है, तो हमारे यहां बाल यौन शोषण को ले कर पोक्सो जैसे कानून हैं तो, पर उन का भी ठीक ढंग से पालन नहीं किया जाता है.

पिछले साल इस कानून के तहत तकरीबन 15 हजार केस दर्ज हुए थे, जिन में से महज 4 फीसदी मामलों में सजा हो पाई. 6 फीसदी आरोपी बरी हो गए और बाकी 90 फीसदी मामले अदालत में अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. ऐसी ही लचर चाल रही, तो उन का फैसला आने में कई साल लग जाएंगे.

बच्चों को करें होशियार

सच तो यह है कि जब कोई छोटा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है, तो उस में इतनी समझ नहीं होती कि उस के साथ हो क्या रहा है. अपराधी उन की इसी बालबुद्धि का फायदा उठाते हैं. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि बच्चों को उन की सिक्योरिटी के मद्देनजर जानकारी न दी जाए. कभीकभी कुछ टिप्स ऐसे होते हैं, जो मौके पर काम कर जाते हैं या फिर बच्चे को उस के साथ कोई अनहोनी होने का डर हो तो वह वक्त रहते किसी अपने को बता सकता है. कुछ जरूरी बातें इस तरह?हैं:

* मातापिता बच्चे को अपना दोस्त समझें, ताकि वह अपने मन की बात खुल कर कह सके.

* हालांकि बहुत बार जानकार आदमी भी बच्चे के साथ यौन शोषण कर सकता है, लेकिन फिर भी बच्चों को किसी के गलत तरीके से उन के बदन के खास हिस्सों को?छूने के प्रति आगाह कर देना चाहिए.

* अगर बच्चा डराडरा सा रहता है या चुप रहता है, तो खुल कर इस की वजह पूछें. आप की बात नहीं सुनता है, तो किसी काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है.

* स्कूल में टीचर का भी फर्ज बनता है कि वह अपने हर स्टूडैंट पर कड़ी नजर रखे. कुछ भी गलत होने की खबर लगे, तो फौरन मांबाप को इस की जानकारी दी जाए.

* अगर बच्चे के साथ कुछ गलत हो भी रहा है, तो वह शर्मिंदगी महसूस न करे, बल्कि अपने मातापिता को जानकारी दे.

बाढ़ के बाद आखिर कैसे हो जिंदगी आबाद

साल 2017. अगस्त का महीना. बिहार के 18 जिलों के   164 ब्लौक, 1842 पंचायतें, 6625 गांव और एक करोड़, 22 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए. 21 अगस्त, 2017 तक 202 लोगों को बाढ़ ने लील लिया था. अररिया, किशनगंज, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, शिवहर, मधुबनी, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधेपुरा, खगडि़या, दरभंगा, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जिलों में बाढ़ ने जम कर तांडव मचाया.

देश में हर 5 साल में 75 लाख हैक्टेयर जमीन बाढ़ खा जाती है और तकरीबन 16 सौ जानें लील लेती है. हर साल जून से ले कर अगस्त महीने के बीच बिहार और नेपाल की नदियां बिहार में कहर बरपाती रही हैं. हर साल बाढ़ की चपेट में फंस कर औसतन 5 सौ से ज्यादा इनसानी और 2 हजार से ज्यादा जानवरों की जानें जाती हैं. साथ ही, 2 लाख से ज्यादा घरों को बाढ़ बहा ले जाती है और 6 लाख हैक्टेयर जमीन में लगी फसलों को बरबाद कर डालती है.

कुलमिला कर नेपाली नदियों की उफान से हर साल बिहार को 3 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है. उत्तर बिहार की 75 फीसदी से ज्यादा आबादी बाढ़ के खतरे के बीच जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर है. राज्य की जमीन का 70 फीसदी से ज्यादा इलाका बाढ़ से प्रभावित होता है.

राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के आकलन के मुताबिक, साल 1980 से ले कर साल 2015 के बीच हर साल तकरीबन 10 लाख हैक्टेयर खेती के लायक जमीन बाढ़ के पानी में डूबती रही है, जिस वजह से 6 लाख हैक्टेयर में लगी खरीफ की फसल तो पूरी तरह से चौपट हो जाती है. बाढ़ से 17 लाख मवेशी भी प्रभावित होते हैं.

कोसी नदी की बाढ़ में हर साल तबाह होने वाले सहरसा जिले का किसान रामदेव महतो कहता है कि बाढ़ से घर के ढहने के बाद एक कच्चा घर बनाने में कम से कम 20 से 25 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. गरीब किसानों की मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो घर बनाने में ही चला जाता है.

सवाल यह उठता है कि हर साल बाढ़ राहत के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार अरबों रुपए बहाती हैं, लेकिन बाढ़ कंट्रोल के नाम पर सालभर हवाई किले ही बनाए जाते हैं. बाढ़ का पानी उतरने के बाद सरकार और प्रशासन अपने काम का खत्म होना मान लेता है, जबकि बाढ़ का पानी उतरने के बाद ही बाढ़ पीडि़तों की असली मुश्किलें शुरू होती हैं.

गौरतलब है कि उत्तर बिहार की तकरीबन 76 फीसदी आबादी बाढ़ की तबाही और खौफ के साए में जिंदगी गुजारती है. राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94 हजार, 160 वर्ग किलोमीटर है, जिस में से 73.06 फीसदी यानी

68 हजार, 8 सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हर साल बाढ़ में डूबता रहा है. समूचे भारत का कुल बाढ़ प्रभावित इलाका 4 सौ लाख हैक्टेयर है, जिस में से 17.2 फीसदी इलाका बिहार में है.

पिछले साल अगस्तसितंबर महीने में बिहार की नदियों में आई बाढ़ से तकरीबन 12 सौ करोड़ रुपए बरबाद हो गए थे. राज्य में तकरीबन 4 लाख हैक्टेयर खेती के लायक जमीन बाढ़ की चपेट में आई थी और उस में लगी फसलें पूरी तरह बरबाद हो गई थीं.

प्रति हैक्टेयर 30 क्विंटल धान की पैदावार का नुकसान माना जाए, तो इस लिहाज से एक करोड़, 20 लाख क्विंटल धान की फसल चौपट हो गई थी. धान की कीमत अगर 10 रुपए प्रति किलो भी मानी जाए, तो नुकसान की रकम 12 सौ करोड़ रुपए बैठती है. गौरतलब है कि बिहार में खरीफ के मौसम में 32 लाख हैक्टेयर जमीन में धान, 2 लाख हैक्टेयर जमीन में मक्का और 90 हजार हैक्टेयर जमीन में दलहन की फसलें लगाई जाती हैं.

कृषि वैज्ञानिक वेदनारायण सिंह कहते हैं कि बिहार के मैदानी इलाकों में नदियों का जाल बिछा हुआ है. गंगा, सोन, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला बलान, भूतही बलान, घाघरा, कोसी, बागमती, महानंदा, नून, लखदेई और अधवारा समूह की नदियां हर साल बरसात के मौसम में बिहार में कहर ढाती रही हैं. इन नदियों का तकरीबन 60 फीसदी जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और तिब्बत में व 35 फीसदी बिहार में पड़ता है.

नेपाल के 60 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जो पानी जमा होता है, उस के निकलने का रास्ता बिहार के निचले इलाकों के जरीए ही होता है. इस से बिहार के कई इलाकों में अचानक बाढ़ आ जाती है.

कटिहार जिले के कुरसैला इलाके का किसान लल्लू प्रसाद बताता है कि बाढ़ के बाद खेतों में अक्तूबरनवंबर महीने तक पानी भरा रह जाता है और किसान खेती नहीं कर पाते हैं. फसलें तो बरबाद हो ही जाती हैं, ऊपर से कर्ज के पैसे का ब्याज भी बढ़ता जाता है. किसान कर्ज चुकाएं तो कैसे चुकाएं? खेत बेच कर कर्ज चुकाने के सिवा उस के सामने कोई चारा ही नहीं रह जाता है. सरकार भी मदद के नाम पर कभी कर्जमाफी, कभी मुफ्त में बीज और कभी बिजली देने का ऐलान कर अपनी जवाबदेही का खत्म होना मान लेती है.

कृषि वैज्ञानिक डाक्टर सुरेंद्र नाथ कहते हैं कि हर साल भारी बारिश और नेपाल समेत पड़ोसी राज्यों से बड़े पैमाने पर पानी छोड़े जाने की वजह से बाढ़ आती रही है. सरकार के तमाम उपायों के बाद भी जानमाल का बहुत नुकसान हो जाता है.

जुलाई से सितंबर महीने के बीच ही बाढ़ का खतरा रहता है, ऐसे में गांव वालों को बाढ़ से निबटने के लिए अपने लैवल पर कुछ उपाय करने चाहिए. अगर वे पहले से तैयार रहें, तो बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. राशन, दवा, ईंधन, पशुचारे को जमा कर के रखना बहुत जरूरी है. गांव की ऊंची जगहों की पहचान कर वहां बाढ़ के दौरान लोगों और मवेशियों को महफूज रखा जा सकता है.

यह जरूर करें बाढ़ के बाद

* बाढ़ के बाद हुए नुकसान का आकलन करने के लिए आने वाली टीम को सही आंकड़ा दें.

* बाढ़ के गंदे पानी के असर को कम करने के लिए डाक्टर से पूरी जांच और इलाज कराएं.

* बच्चों का इलाज गंभीरता से कराएं.

* महामारी से बचाव के लिए मरे मवेशियों को गड्ढा खोद कर चूना डाल कर दफनाएं.

* मवेशियों की रहने वाली जगहों पर चूने का घोल और फिनाइल का छिड़काव करें.

* जलजमाव वाले इलाके से जलीय पौधों को निकाल दें, ताकि उन में घोंघे वगैरह न पनप सकें.

* गंदा और कई दिनों से जमा पानी मवेशियों को न पिलाएं.

* जब तक खेतों में पानी जमा है, तब तक उस में मछलियों का जीरा डाल कर मछली पैदा की जा सकती है.

* बाढ़ के बाद लत्तर वाली सब्जियों मसलन कद्दू, सेम, परवल वगैरह लगा कर उन की अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

हमसे जानिए कैसे करें टैक्स्चर के अनुरूप बालों की देखभाल

आप के बालों का आकार प्रकार न केवल आप की जीवनशैली को प्रदर्शित करता है, बल्कि आप की मनोस्थिति का भी आभास देता है. बालों का प्राकृतिक सौंदर्य बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन की बनावट को ध्यान में रख कर उन की देखभाल की जाए.

कैसे करें टैक्स्चर के अनुरूप बालों की केयर जानते हैं इशिका तनेजा से:

सामान्य बाल और उन की देखभाल

अगर आप को गरमी के मौसम में 2 दिन बाद और सर्दी के मौसम में 3 दिन बाद बाल धोने की जरूरत महसूस हो, तो समझें आप के बाल सामान्य हैं. जरूरत और समय के अनुसार बालों को वाश करती रहें.

हफ्ते में 1 बार रात को तिल और बादाम के तेल को मिक्स कर के बालों की मसाज कर सुबह शैंपू से धो लें.

बालों को ज्यादा टाइट बांध कर न सोएं और धोने के लिए कुनकुने पानी का प्रयोग करें.

सामान्य बालों को ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती. इन में बादाम, नारियल या आंवले का कोई भी तेल लगा सकती हैं.

औयली बाल और उन की देखभाल: अगर बाल धोने के बाद गरमी के मौसम में अगले दिन और सर्दियों के 2 दिन में ही चिपचिपे लगें और उन्हें दोबारा धोने की जरूरत महसूस हो, तो समझ जाएं कि बाल तैलीय हैं.

शैंपू करने से सिर की त्वचा एवं बालों से तेल की सफाई हो जाती है, रूसी, धूल इत्यादि दूर हो जाती है. इसलिए बालों को सप्ताह में कम से कम 1 बार शैंपू से धो लेना चाहिए. शैंपू से बालों का पीएच लैवल बना रहता है.

बाल फूलेफूले व खिले हुए रहें इस के लिए नीबू का प्रयोग कंडीशनर की तरह करें. 1 मग पानी में 1/2 नीबू डालें. बालों को वाश करने के बाद इस पानी से लास्ट रिंस करें.

औयली बाल बिना तेल लगाए ही तेल लगे बालों जैसे दिखते हैं, क्योंकि इस तरह के बाल पहले से ही नमीयुक्त होते हैं. इन बालों को अच्छी तरह साफ करने की जरूरत होती है, क्योंकि ये जल्दी गंदे हो जाते हैं. इन में जैतून या तिल के तेल का प्रयोग कर सकती हैं.

यदि बाल अत्यधिक तैलीय होने के कारण सिर में रूसी हो गई है, तो 1/2 कप पानी में 1 चम्मच त्रिफला डाल कर कुछ देर उबाल कर ठंडा होने दें. फिर छान लें. अब इस में 1 चम्मच सिरका मिला कर रात में बालों में लगाएं और फिर मसाज करें. सुबह बालों को शैंपू से धो लें.

ठंड में बालों में रूसी होने लगती है,

इसलिए मौइश्चराइजिंग यानी जिस में बादाम, औलिव औयल और शहद जैसी चीजें हों का इस्तेमाल करें.

डैंड्रफ  को हलके में न लें. वरना यह बालों तक न्यूट्रिशन नहीं पहुंचने देगा. इस के लिए नीम के कैप्सूल खा सकती हैं या उन्हीं कैप्सूलों को काट कर बालों में लगा सकती हैं. ऐक्सपर्ट की सलाह लेना बेहतर होगा.

ड्राई बाल और उन की देखभाल

शैंपू और कंडीशनर करने के बावजूद यदि बाल रूखेसूखे और सख्त दिखाई दें, तो समझ जाएं कि बालों का टैक्स्चर शुष्क है.

बाल धोने से पहले औलिव और कैस्टर औयल को मिक्स कर के सिर की मालिश करें.

घरेलू कंडीशनर के तौर पर अंडे में नीबू और औलिव औयल की कुछ बूंदें मिला कर बालों में लेप की तरह 1/2 घंटा लगाए रखें. फिर किसी कंडीशनरयुक्त शैंपू से सिर धो लें ताकि अंडे की गंध चली जाए.

रूखे बालों के लिए ऐसे तेल का चुनाव करें, जो उन्हें अंदरूनी तौर पर नमी प्रदान करे. इस के लिए नारियल, जैतून या सरसों का तेल बालों में लगा सकती हैं. बालों के अंदर तक तेल पहुंचाने के लिए बालों की तेल से मालिश करने के बाद गरम तौलिए की भाप लें. इस से तेल बालों की जड़ों तक आसानी से पहुंच जाएगा. यह बालों को अंदरूनी पोषण देने का काम करता है.

ठंड के दिनों में अर्निका ट्री औयल इस्तेमाल करें. यह वाटर बेस्ड होता है. पानी जैसा पतला होने के कारण स्कैल्प इसे तुरंत अजौर्ब कर लेती है. इस से हेयरफाल नहीं होगा और न ही स्कैल्प ड्राई होगी.

– इशिका तनेजा, ऐग्जीक्यूटिव डाइरैक्टर, एल्प्स कौस्मैटिक क्लीनिक

कैसे पड़ोसी हैं आप, आइए आप को इस के फायदे नुकसान बता दें

एक घटना ने शर्मसार कर दिया. पिछले दिनों मुंबई के एक घर में मिली एक वृद्ध महिला का कंकाल सभ्य समाज के गाल पर एक तमाचा है. दरअसल, जिस वृद्घ महिला की लाश मिली वह विधवा थी और अकेली ही रहती थी. बच्चे विदेश में रहते हैं और कभीकभार ही मुंबई अपनी मां से मिलने आते थे.

इस घटना ने हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम कितने सजग और संवेदनशील हैं. साथ ही यह भी संदेश दे गया कि भारत के शहरों में सामाजिक तानाबाना किस कदर बिखर गया है. यह वृद्घ महिला मर गई पर पड़ोसी तक को भनक नहीं मिली. अब सब चिल्लाचिल्ला कर इस बात की तसदीक करने में जुटे हैं कि लड़के को अपनी मां का ध्यान रखना चाहिए था. पर हजारों मील दूर रहने वाले बेटे से ज्यादा एक पड़ोसी की क्या कुछ जिम्मेवारी नहीं बनती थी? माना कि 2 मकानों के बीच उठी दीवारें हवा, पानी और आवाजें रोक सकती हैं पर रिश्ते से भीगे हृदय के स्पंदन को नहीं, जिसे एक पड़ोसी को समझना चाहिए था.

पड़ोसी के नजरिए से

मन को हताहत कर देने वाली इस घटना के बाद आज अनायास याद आ गए हमारे पड़ोसी गट्टू काका, जिन्होंने पूरी उम्र एक अच्छे पड़ोसी का आदर्श प्रस्तुत किया. मैं दीवाली के समय सपरिवार अपने घर गई थी और जब लौट कर आई तो देखा कि दरवाजे पर दीए रखे थे. मैं ने पूछा कि ये किस ने रखे हैं? पता चला कि मेरे 2 मकान के आगे एक बुजुर्ग दंपती जोकि कुछ महीने पहले ही आए थे उन्होंने रखे हैं. मेरा मन ये सब देख कर भर आया. मैं ने जा कर उन को धन्यवाद दिया.

वे बोले, ‘‘इस में धन्यवाद की क्या बात है, मैं ने सोचा कि इस खाली मकान के घोर अंधकार को भगाऊं तो मैं ने दीप जला दिए. दीवाली में तो केवल हमारे घर ही प्रकाश न हो, बल्कि इस प्रकाश में हमारे पड़ोसी की भी हिस्सेदारी हो.’’

हम आज के बदलते युग में पड़ोसी को सहयोगी नहीं, समस्या मान कर बुरा बरताव करने पर उतारू हैं. क्या हम आज मानते हैं कि पड़ोसी के सुखदुख हमारे सुखदुख हैं? सच तो यह है कि आज के युग में पड़ोसी का महत्त्व सगे भाईबहनों व रिश्तेदारों से ज्यादा है. ज्यादातर लोग नौकरीपेशा हैं और अपने मूल घरों या जन्म स्थान से अलग हैं. इस कारण भाईबांधवों और रिश्तेदारों से बहुत दूर रहना पड़ता है. ऐसे में अगर कोई संकट उत्पन्न हो, तो उस वक्त पड़ोसी ही हमारे काम आते हैं. आज गट्टू काका के दीए की रोशनी को विस्तार देने की जरूरत है, वे तो संकेत दे कर आज इस दुनिया से चले गए लेकिन पड़ोसी के दिल में दीए को रोशन कर गए.

सर्वप्रथम हरेक को ही यह सोचना होगा कि मैं कैसा पड़ोसी अथवा पड़ोसिन हूं? क्या मैं सिर्फ उन लोगों को ही अपना पड़ोसिन मानती हूं, जो मेरी जाति या देश के हैं? क्या मैं दूसरों की मदद करने से इसलिए पीछे हट जाती हूं, क्योंकि वे अलग जाति के हैं या दूसरी भाषा बोलते हैं?

कैसे बनें अच्छे पड़ोसी

अगर हमें लगता है कि हमें एक अच्छा पड़ोसी मिले तो पहले हमें उस को अच्छा पड़ोसी साबित करना होगा और इस की शुरुआत हमें अपने नजरिए से करनी होगी. दूसरों के साथ आदर, गरिमा और प्यार से पेश आने से पड़ोसियों को भी आप के साथ उसी तरह पेश आने का बढ़ावा मिलेगा.

यह सच है कि अधिकतर लोग पड़ोसियों से बात करने से कतराते हैं. उन से बात न करना और दूरी बनाए रखना आसान लग सकता है. कई लोग पड़ोस से मिली मदद और नेक इरादे से दिए गए तोहफों के लिए जरा भी आभार व्यक्त नहीं करते. यह देख कर देने वाला अपने दिल में यह सोच सकता है कि बस, अब ऐसा कभी नहीं करूंगा या करूंगी. हो सकता है कि कभीकभी दोस्ताना अंदाज में हैलोहाय करने या फिर हाथ लहराने पर आप के पड़ोसी ने अनमने भाव से जवाब दिया हो. मगर कई बार पड़ोसी असल में ऐसे भी नहीं होते. वे बस ऐसा नजर आते हैं. शायद वे ऐसी संस्कृति में पलेबढ़े हों जिन की वजह से वे खुल कर बात करने से झिझक या बेचैनी महसूस करते हों. वे शायद परवाह न दिखाएं या बेरुखा लगें. आप को उन का विश्वास जीतने की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए दोस्ती कायम करने में वक्त लगता है और धीरज की जरूरत होती है. लेकिन जो पड़ोसी न सिर्फ खुशीखुशी देने की कला सीखते हैं, बल्कि पाने पर एहसानमंद होते हैं, उन के होने से पड़ोस शांति और खुशियों का आशियाना बन जाता है.

दिल में बनाइए जगह

समय के संग सब कुछ बदल रहा है. अगर इस बदलाव के नतीजे को देखें तो आज पड़ोसी अपने पड़ोसी को नहीं पहचानता. आज के समय में समाचारपत्र और टीवी, हर जगह एक ही विषय पर चर्चा होती है कि आज यहां लूटमार, वहां हत्या, आत्महत्या, बलात्कार और अपहरण हुआ. इस तरह की घटनाएं हमारे सामाज में नासूर बन कर रह गई हैं. इस तरह के अपराध तो हर जगह होते हैं पर शहर में कुछ ज्यादा ही. और सब से बड़ी विडंबना यह है कि जो शहर रात भर जागता हो वहां पर तो कुछ ज्यादा ही इस तरह की घटनाएं घटित होती हैं. सब से आश्चर्य की बात तो आज यह है कि पड़ोस में घटित घटना की खबर हमें टीवी या अखबार से मालूम पड़ती है. आज हम अपने पड़ोस के बारे में कोई जानकारी न तो रखना चाहते हैं और न ही उस में दिलचस्पी दिखाते हैं. जिंदगी की इस आपाधापी में हम अपने परिवार तक सीमित हो कर रह गए हैं और पड़ोस खत्म सा हो गया है. आधुनिक तकनीक फोन या नैट द्वारा हम भले ही हजारों मील दूर बैठे अनजान मित्र की खुशी और दुख में शामिल रहते हैं. पर पड़ोस के दर्द और सुख से लाखों मील दूर हैं.

आज भी गांव और छोटे शहरों में पड़ोसियत बाकी है. आज भी वहां पर सब एकदूसरे के सुखदुख में शामिल होते हैं. आज भी किसी के घर जाने के लिए पूछने की जरूरत नहीं पड़ती. इन सब को देख कर लगता है कि बड़ेबड़े शहरों में रह रहे लोग पढ़लिख कर आत्मकेंद्रित हो गए हैं. बिल्ंिडग में रह रहे लोग पड़ोसी सभ्यता को भूल बैठे हैं. इसी कारण आज समाज में ऐसी घटनाएं हो रही हैं और हर पड़ोसी अपनेआप को असहज, असुरक्षित और अकेलेपन की जिंदगी जीने पर बाध्य है.

बन सकते हैं अच्छे पड़ोसी

अपने पड़ोसियों से अनजान बन कर न रहें. उन से बोलचाल रखें. आप के पड़ोसी आप को तभी जानेंगे, जब आप का उन से परिचय, बातचीत होती रहेगी.

अपने पड़ोसियों का यथोचित अभिवादन करें. बड़ों को नमस्कार, हम उम्र को नमस्ते और छोटों को स्नेह करें. यह शिष्टाचार आप को पड़ोसियों के बीच लोकप्रिय बनाएगा.

पड़ोसियों की मदद के लिए खुद आगे आएं. आप उन के काम आएंगे, तो वे भी जरूरत पड़ने पर आप के साथ होंगे.

पड़ोसियों के साथ न तो अकड़ में रहें न ही डींगें हांकें. यदि आप पड़ोसियों को छोटा जताने की कोशिश करेंगे, तो वे आप को कभी पसंद नहीं करेंगे.

पड़ोसियों को अपना कुछ समय दें जैसे हमउम्र लड़केलड़कियों के साथ किसी खेलकूद या ऐक्टिविटी में हिस्सा जरूर लें. यह आप के व्यक्तित्व विकास के लिए जरूरी तो है ही, साथ ही यह टीम भावना भी जगाता है.

घर से बाहर निकलते समय यह जरूर देख लें कि आप ने आधेअधूरे कपड़े तो नहीं पहन रखे हैं. इस से आप के पड़ोसियों को अटपटा लग सकता है. सलीके से कपड़े पहनने पर वे आप की तारीफ करेंगे और इस आदत से आप आगे भी सम्मान पाएंगे.

भूल कर भी पड़ोसियों के बारे में कोई बुरी बात न कहें.

पड़ोसियों के यहां से कोई निमंत्रण आए और आप व्यस्त न हों तो उस में अवश्य जाएं. अगर किसी वजह से न जा पाएं, तो उन से क्षमा मांग लें. आप ऐसा करेंगे, तो वे भी आप के निमंत्रण पर सहर्ष आना पसंद करेंगे.

पड़ोसी के यहां जाने पर बारबार घंटी न बजाएं और न ही जोरजोर से दरवाजा पीटें. ऐसा करने से पड़ोसी की नजर में आप की छवि खराब होगी.

नाग के साथ काम करना खतरनाक था : पूनम दुबे

भोजपुरी फिल्मों और मौडलिंग में एकसाथ अपनी पहचान बनाने वाली पूनम दुबे उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की रहने वाली हैं. साल 2009 में उन को ‘मिस इलाहाबाद’ चुना गया था. इस के बाद पूनम ने ऐक्टिंग में अपना कैरियर बनाने का मन बना लिया. उन की मां ने पूनम को पूरा सहयोग दिया.

साल 2013 में पूनम दुबे की पहली फिल्म ‘गरदा’ रिलीज हुई. इस के बाद ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘अदालत’, ‘बलमा बिहार वाला’, ‘कट्टा तनल दुपट्टा’, ‘बहूरानी’, ‘दीवाना-पार्ट 2’, ‘दिल तेरा आशिक’, ‘काट के रख देब’, ‘इंतकाम’, ‘रंगदारी टैक्स’, ‘इच्छाधारी नागिन’, ‘चना जोर गरम’ उन की खास फिल्में रहीं. आने वाली फिल्मों में ‘रंगीला’, ‘लुटेरे’, ‘घात’, ‘सनम’ और ‘सौगात’ रिलीज होने को तैयार हैं.

पूनम दुबे ने फिल्मों में आइटम डांस से ले कर लीड हीरोइन तक हर तरह के रोल किए हैं. भोजपुरी फिल्मों की दुनिया में उन को ‘हौट बेबी’ के नाम से जाना जाता है.

पेश हैं, पूनम दुबे के साथ हुई बातचीत के खास अंश:

आप ने 2 फिल्मों में नागिन का रोल किया है. कैसा अनुभव रहा?

नागिन का किरदार करना चुनौती भरा काम था. इस की वजह यह है कि नागिन का किरदार अलगअलग समय में बहुत बड़ीबड़ी हीरोइनें निभा चुकी हैं. मुझे अपने काम से यह साबित करना था कि नागिन का किरदार मैं भी कर सकती हूं.

फिल्म ‘इच्छाधारी नागिन’ में मेरे किरदार को पसंद किया गया. इस के बाद फिल्म ‘चना जोर गरम’ में भी वही किरदार मुझे करना पड़ा. इस में मुझे नाग के साथ कुछ सीन शूट करने थे. तब मैं ने सोचा कि क्यों न असली नाग लिया जाए. मेरी बात और लोगों की समझ में आई. असली नाग लाया गया. उस के साथ मैं ने बहुत डरतेडरते अपने सीन शूट किए. सीन शूट होने के बाद एक रोमांचक सा अनुभव हुआ.

भोजपुरी फिल्मों की ‘हौट बेबी’ टाइटल सुन कर कैसा लगता है?

यह सुन कर मुझे अच्छा लगता है. इस के लिए मैं अलग से कोशिश नहीं करती. मेरा बदन ही ऐसा है, जिस की वजह से मुझे ‘हौट बेबी’ कहा जाता है. मैं लंबी दिखती हूं, जिस से थोड़ा सा भी ऐक्सपोज करते ही हौट दिखने लगती हूं. कई हीरोइनें तो ऐसी हैं, जो मुझ से कम कपड़े पहनने के बाद भी मासूम दिखती हैं. मैं हर तरह के रोल करती हूं. मेरे आइटम डांस काफी मशहूर रहे हैं. आइटम डांस बेहूदा नहीं, बल्कि चटपटे होते हैं. जिस तरह से चटपटा खाना स्वाद को बढ़ा देता है, वैसे ही आइटम डांस भी दर्शकों को मनोरंजन से भर देते हैं.

क्या भोजपुरी फिल्मों में ज्यादा बदन दिखाना पड़ता है?

अब ऐसी बात नहीं है. भोजपुरी फिल्में भी सुधर रही हैं. अब वे पहले से ज्यादा साफसुथरी बनने लगी हैं, जिस से पूरा परिवार साथ बैठ कर इन फिल्मों को देखने लगा है. केवल बदन दिखा कर न तो कोई फिल्म चल सकती है और न ही हीरोइन.

भोजपुरी फिल्मों पर ही ऐसे आरोप क्यों लगते हैं?

बदन दिखाने से ज्यादा अहम यह होता है कि उस को कैसे दिखाया जाता है. कई फिल्मों में हीरोइन के बदन को बहुत ज्यादा दिखाया जाता है, पर उन के दिखाने का तरीका ऐसा होता है कि वह बुरा नहीं लगता.

अब भोजपुरी फिल्मों के कैमरामैन इतनी अच्छी तरह से फिल्म शूट करने लगे हैं कि बदन दिखाना कहानी का ही हिस्सा लगता है. भोजपुरी फिल्मों का दर्शक केवल मनोरंजन के लिए फिल्में देखता है. उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल, मुंबई और पंजाब में ये फिल्में खूब चलती हैं.

क्या आप ने अपने कैरियर में ज्यादा जद्दोजेहद नहीं की है?

ऐसा बिलकुल नहीं है. मुझे भी बहुत जद्दोजेहद करनी पड़ी. फिल्मों के पहले मैं ने विज्ञापन की शूटिंग की, जिस से मैं अपना खर्च चलाती थी. आज भी मैं फिल्मों से ज्यादा मौडलिंग करती हूं.  कुछ समय मैं मुंबई में अकेली रही. इस के बाद मैं ने अपनी मम्मी और भाई को यहां बुला लिया.

शुरुआत मैं ने फिल्मों में आइटम डांस और साइड रोल से की. अब मैं मेन लीड में काम कर रही हूं. मैं साल में 2 से 4 अच्छी फिल्में करना चाहती हूं. रोल पाने के लिए मैं किसी के पीछे नहीं भागती.

अपने फिगर को आप कैसे बनाए रखती हैं?

मैं शाकाहारी हूं और चावल मेरा पसंदीदा खाना है. इसे मैं हर रूप में खाना पसंद करती हूं. इस को खाने के लिए मैं ज्यादा ऐक्सरसाइज करती हूं. चाट, कुलफी और रबड़ी खाना भी मुझे बेहद पसंद है. दहीजलेबी जैसा स्वाद किसी और में नहीं मिलता है.

अपने खाने के शौक को पूरा करने के लिए मुझे ज्यादा से ज्यादा ऐक्सरसाइज करनी होती है, ताकि मेरा वजन न बढ़ जाए.

औनलाइन बेचे जा रहे हैं 500-1000 के पुराने नोट

पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी के बाद 500 और 1000 रुपए के नोट चलन से बाहर हो गए हैं. अब खबर आ रही है कि नोटबंदी के एक साल पूरे होने के बाद ये पुराने नोट आपको आनलाइन मिल सकते हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि जब ये पुराने नोट चलन से बाहर हो गये हैं तो कोई इसे क्यों खरीदेगा. तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पुराने नोटों का कलेक्शन रखने वाले शौकीन इन नोटों के खरीदार बनते हैं. बड़े स्तर पर इनकी बोली लगाई जाती है. खास नोटों की वैल्यू भी खास यानी कि बड़ी होती है.

तो अब पुराने नोटों का कलेक्शन रखने वाले शौकीन लोगों के लिए 500 और 1000 रुपए के नोट आनलाइन बिक्री करने वाली वेबसाइट ईबे पर बिक रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि इनकी बोली वास्तविक कीमत से कहीं ज्यादा है.

ई-बे पर लगती है बोली

ई-बे समय-समय पर भारतीय करेंसी के रेयर नोटों की की बोली लगाता है. इस बोली में कोई भी व्यक्ति वेबसाइट के माध्यम से भाग ले सकता है और पुराने नोट खरीद सकता है इतना ही नहीं यदि आपके पास कोई खास सीरीज का नोट है, तो आप भी कमाई कर सकते हैं. खासकर ‘786’ डिजिट वाले नोट की बोली एक से तीन लाख रुपए तक लगती है. ऐसी ही साइटों पर 500 और 1000 के पुराने नोट उपलब्ध हैं. हालांकि, ये कोई नई बात नहीं है ऐसा नोटबंदी से पहले भी होता था.

क्यों लगती है बोली

कुछ लोग पुरानी चीजो को संजोए रखना पसंद करते हैं. यह कुछ लोगों का बहुत पुराना शौक होता है. चलन से बाहर हुए नोटों को लोग अपने शौक के लिए इकट्ठा करते हैं. भारत में ही नहीं, विदेशों में भी ऐसा होता है. नोट जितना पुराना होता जाता है, उसकी कीमत उतनी ही बढ़ती जाती है.

कितनी कीमत पर और कौन कौन से नोट मिल रहे हैं

‘ईबे’ वेबसाइट पर 500 और 1000 के नोट आपको 299 से 10000 रुपए तक की कीमत में मिल जाएंगे. इनके अलावा 200 और 500 के नए नोट भी साइट पर नीलामी के लिए मौजूद हैं. नए 500 के नोट की कीमत 1200 रुपए तक है. वहीं, दांडी मार्च के दौरान वाले 500 के नोट की कीमत 7 लाख रुपए तक है.

इसके अलावा लकी माना जाने वाले नंबर 786 की सीरीज वाले नोटों की कीमत और ज्यादा है. 786 नंबर के 200 के नोट की कीमत 425 रुपए और 500 के नोट की कीमत 900 रुपए है. यहां 10 का पुराना नोट 120 रुपए, 1 रुपए का पुराना नोट 140 रुपए और 100 रुपए का नोट 275 रुपए की कीमत पर बिक रहा है. वहीं, पूर्ण चक्र वाले 20 रुपए के पुराने नोट की कीमत 1699 रुपए है.

यहां पर 2000 रुपए का नोट भी नीलामी के लिए उपलब्ध है. यह नोट 786 सीरियल नंबर सीरीज का है. जिसके एक नोट की किमत 1.50 लाख रुपए है. जिसकी किमत सुनकर लोगों के होश उड़ जा रहे हैं वहीं तमाम लोग ऐसे भी हैं जो इसे खरीदने के लिए इतने रुपए देने को तैयार है और उन लोगों द्वारा लगातार इसकी बोलियां लगाई  जा रही है.

आपको बता दें नोटबंदी के बाद पुराने नोट चलन में नहीं हैं. ऐसे में ज्यादा संख्या में इन्हें रखना दंडनीय अपराध है, लेकिन कलेक्शन के तौर पर कुछ नोट रखे जा सकते हैं. किसी के पास 500 और 1000 के पुराने नोट 10 से अधिक हैं तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.

ट्रेलर : जबरदस्त एक्शन के साथ वापस आ गया है टाइगर

‘शिकार तो सब करते हैं, लेकिन टाइगर से बेहतर शिकार कोई नहीं करता…’ यह है फिल्‍म ‘टाइगर जिंदा है’ का डायलाग और इसी डायलाग से साफ है कि टाइगर यानी सलमान खान इस फिल्‍म में अपने फैन्‍स के लिए क्‍या ला रहे हैं. सलमान के फैन्‍स लंबे समय से उनकी इस फिल्‍म के ट्रेलर का इंतजार कर रहे थे और आखिरकार यह सामने आ ही गया है.

फिल्म के ट्रेलर में जबरदस्त एक्शन और खूबसूरत लोकेशन्स आपको हैरान कर देंगी. वहीं फिल्म में सलमान का लुक और उनकी एक्टिंग को भी आप काफी पसंद करने वाले हैं.

इस ट्रेलर में सलमान खान धुआंधार एक्‍शन सीन करते नजर आ रहे हैं तो वहीं एक बार फिर पाकिस्‍तानी जासूस के किरदार में नजर आने वाली कटरीना कैफ भी जबरदस्‍त स्‍टंट और एक्‍शन सीन करती दिख रही हैं. ट्रेलर में ही साफ कर दिया है कि यह फिल्‍म सच्‍ची घटनाओं से प्रभावित है.

यहां देखें ट्रेलर.

‘टाइगर जिंदा है’ के ट्रेलर में दिखाया गया है कि इराक में दुनिया का सबसे खतरनाक आंतकवादी संगठन 25 हिंदुस्‍तानी नर्सों को किडनैप कर लेता है और जब इन्‍हें बचाने की बात आती है तो सब को याद आता है टाइगर यानी सलमान खान. इन नर्सों की जिंदगी बचाने के लिए कैंप में घुसने के बाद टाइगर के पास सिर्फ 2 दिन हैं और इन्‍हीं दो दिनों में यह हिंदुस्‍तानी जासूस इस कारनामें को अंजाम देता है. लेकिन इसमें वह अकेले नहीं हैं बल्कि उनका साथ दे रही हैं पाकिस्‍तानी जासूस जोया यानी कटरीना कैफ. एक्‍शन सीन और उड़ती हुई गाड़ियां सलमान के फैन्‍स को खासी पसंद आने वाली हैं.

बता दें, फिल्म की कहानी को देखते हुए इसकी शूटिंग आस्ट्रिया, मोरक्को, ग्रीस और आबु धाबी जैसी जगहों पर की गई है.

फिल्‍म ‘टाइगर जिंदा है’, साल 2012 में आई ‘एक था टाइगर’ की सीक्‍वल है जो सुपरहिट साबित हुई थी. सलमान की कथित एक्‍स गर्लफ्रेंड कटरीना के साथ उनकी जोड़ी को काफी पसंद किया गया था. अब एक बार फिर से उनके फैन्स को टाइगर और जोया की जोड़ी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं.

‘एक था टाइगर’ को कबीर खान ने निर्देशित किया था जबकि इस बार कमान ‘सुल्तान’ फेम डायरेक्टर अली अब्बास जफर ने संभाली है. फिल्म 22 दिसंबर, 2017 को रिलीज होगी.

हैप्पी बर्थडे कमल हसन : आखिर क्यों नहीं रखते शादी में विश्वास

अगर बहुमुखी प्रतिभा की बात की जाए तो भारतीय फिल्म संसार में उनके जैसे गिने-चुने ही अभिनेता मिलेंगे. जी हां, हम बात कर रहे हैं कमल हासन की. कमल हासन आज 63 साल के हो गये हैं. सात नवंबर 1954 को चेन्नई (तब मद्रास) में जन्मे कमल हासन ने महज छह साल की उम्र में 1960 में आई फिल्म कलातुर कलम्मा से अपना फिल्मी करियर शुरू किया था. पहली ही फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था.

एक दर्जन से ज्यादा फिल्म फेयर और रिकौर्ड तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके कमल हासन का निजी जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. भारतीय सिने इतिहास के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में शुमार किए जाने वाले कमल हासन ने दो बार शादी की और एक बार वो एक दशक से ज्यादा समय तक लिव-इन में रहे लेकिन आज वो अकेले हैं. एक इंटरव्यू में कमल हासन ने यहां तक कह दिया कि उन्हें शादी में यकीन नहीं है और जब दो लोगों में प्रेम होता है तो उन्हें शादी की जरूरत नहीं होती.

कमल हासन ने इंटरव्यू में कहा था, “मुझे कभी शादी में यकीन नहीं था. लोग अपने पास पड़ोस के लोगों के दबाव में शादी करते हैं लेकिन मैंने कभी भी भीड़ के साथ चलने में यकीन नहीं किया. मुझे शादी नहीं करना चाहिए थी. मैंने मेरे जीवन में आई महिलाओं की सुविधा के लिए शादी की थी. वाणी लिव-इन में नहीं रहती और मैं इतना मजबूत नहीं था कि अपने पैर पीछे खींच लूं. और हमारा समाज ऐसा है कि सारिका और मैं दो बच्चों के माता-पिता बनने के बावजूद होटल में एक ही कमरा नहीं ले सकते थे.”

कमल हासन की पहली पत्नी वाणी गणपति शास्त्रीय नृत्यांगना और कौस्ट्यूम डिजाइनर थीं. दोनों ने 1978 में शादी की. करीब 10 साल बाद 1988 में कमल हासन और वाणी गणपति के बीच तलाक हो गया. साल 1988 में ही कमल हासन ने अभिनेत्री सारिका से शादी की. कमल हासन की ये शादी काफी लम्बी चली लेकिन साल 2002 में अलग होने के बाद साल 2004 में दोनों ने आधिकारिक तौर पर तलाक ले लिया.

सारिका से अलग होने के बाद कमल हासन ने शादी नहीं की लेकिन अभिनेत्री गौतमी के साथ वो करीब एक दशक तक लिव-इन में रहे. कमल हासन और गौतमी ने साथ 2005 में साथ रहना शुरू किया. हालांकि दोनों करीब 11 साल तक साथ रहने के दौरान साल 2016 में अलग हो गये. कमल हासन ने जब एक इंटरव्यू में पूछा गया कि उनकी पूर्व पत्नी सारिका ने शादी को एक सुंदर ख्याल बताया है, इस पर कमल हासन ने कहा था कि वो ऐसा नहीं मानते. कमल हासन ने कहा था, “बिल्कुल नहीं, मेरे ख्याल से शादी एक पुराना ख्याल है.

ये एक कानूनी समझौता है जो आपको किसी के साथ रहने पर मजबूर करता है. मेरे ख्याल से जब आप किसी को सचमुच प्यार करते हैं तो आपको उसे प्रमाणित करने के लिए किसी कागज की जरूरत नहीं होती.”

पिछले साल एक इंटरव्यू में कमल हासन ने साफ कर दिया था कि वो अब शादी का इरादा नहीं रखते. कमल हासन तमिल, तेलुगु, मलायलम और हिन्दी इत्यादि भाषाओं की 200 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं. हिन्दी में उन्हें सदमा, सागर, एक दूजे के लिए, अप्पू राजा और हिन्दुस्तानी जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है. अभिनय में उनके लिए योगदान के लिए भारत सरकार उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित कर चुकी है. फ्रांस सरकार ने साल 2016 में उन्हें अपना सर्वोच्च कला सम्मान शेवलियर फ्रेंच अवार्ड दिया था. सारिका और कमल हासन की दो बेटियां हैं, श्रुति हासन और अक्षरा हासन. उनकी दोनों बेटियां अभिनय करती हैं.

अभिनय जगत में लम्बी पारी खेलने के बाद कमल हासन अब राजनीति में रुचि ले रहे हैं. इसी साल उन्होंने साफ कहा कि वो राजनीति में आएंगे. अभी तक वो किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े हैं लेकिन हाल ही में उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का पिछले साल स्वागत करने के लिए माफी मांगी. कमल हासन ने अपने 63वें जन्मदिन पर किसी तरह का उत्सव मनाने से इनकार कर दिया है. वो अपने जन्मदिन पर चेन्नई बाढ़ पीड़ितों से मिलेंगे.

HDFC में है आपका अकाउंट तो आपके लिए है ये खुशखबरी

अगर आपका एचडीएफसी बैंक में अकाउंट है और आप अपने पैसों का लेन-देन करने के लिए आरटीजीएस व एनईएफटी का इस्तेमाल करते हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है, क्योंकि आरटीजीएस व एनईएफटी के जरिए किए जाने वाले लेन-देन को एचडीएफसी बैंक ने अपने ग्राहको की सुविधा को ध्यान में रखते हुए एक नवंबर से नि:शुल्क कर दिया है.

वहीं बैंक ने चेक के जरिए लेन-देन के लिए विभिन्न शुल्कों को अगले महीने से बढ़ाने की घोषणा की है.

बैंक का कहना है कि “एनईएफएटी/आरटीजीएस आनलाइन शुल्कों में उक्त बदलाव सभी खुदरा बचतों, वेतनभोगी व अप्रवासी ग्राहकों के लिए एक नवंबर 2017 से लागू हो गया.” चेक बुक के बारे में बैंक ने कहा है कि ग्राहक को एक साल में 25 पन्नों की एक ही चेकबुक नि:शुल्क मिलेगी. अतिरिक्त चैकबुक 25 पन्ने के लिए 75 रुपये का शुल्क देना होगा.

मालूम हो कि पहले ग्राहकों को आरटीजीएस के जरिए 2-5 लाख रुपये तक के आनलाइन ट्रांजिक्शन पर 25 रुपये का शुल्क देना पड़ता था. वहीं, एनईएफटी के जरिए पांच लाख रुपये से अधिक पैसे भेजने पर 50 रुपये शुल्क लागू था. आनलाइन एनईएफटी पर लेन-देन पर 10,000 रुपये से कम राशि पर 2.5 रुपये, 10001 से एक लाख रुपये के लिए पांच रुपये व 1 लाख सो 2 लाख रुपये के आनलाइन लेनदेन पर 15 रुपये का शुल्क देय था.

नोटबंदी का एक साल : बदली देश की तस्वीर..!

8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था. नोटबंदी की घोषणा करते समय पीएम मोदी ने कहा था कि ये ऐलान इसलिए किया जा रहा है ताकि देश में भ्राष्टाचार और कालेधन पर लगाम लगाई जा सके. पीएम मोदी की घोषणा के बाद बड़े-बड़े मंत्रियों से लेकर आम जनता तक हैरान हो गई थी.

भले ही लोग परेशान थे और इसमें कोई दोराय नहीं की नोटबंदी के फैसले के बाद लोगों को परेशानियां उठानी पड़ीं लेकिन लोगों के दिल में एक उम्मीद भी थी की शायद इस फैसले के बाद देश की तस्वीर बदलेगी.

इस नोटबंदी ने भारत पर काफी गहरा असर डाला है. जानिए नोटबंदी ने भारत को कितना बदला है और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर रहा.

इसलिए लाई गई थी नोटबंदी

नोटबंदी लाने की मोदी सरकार ने कई वजहें बताई हैं. इसमें कालेधन का खात्मा करना, सर्कुलेशन में मौजूद नकली नोटों को खत्म करना, आतंकवाद और नक्सल गतिविधियों पर लगाम कसने समेत कैशलेस इकोनामी को बढ़ावा देने जैसे कई वजहें गिनाई गई हैं.

नोटबंदी के बाद लौटा इतना पैसा

नोटबंदी के बाद 1.48 लाख बैंक खातों में 1.48 लाख करोड़ रुपये जमा किए गए. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में इसकी जानकारी दी थी. उन्होंने बताया कि इनमें से हर खाते में कम से कम 80 लाख रुपये जमा किए गए थे. 1.48 लाख बैंक खातों में औसत डिपोजिट 3.3 करोड़ रुपये रही.

दो तिहाई बंद नोट वापस आए

छोटी डिपोजिट्स की बात करें, तो 2 लाख रुपये से लेकर 80 लाख रुपये तक इसमें शामिल किए गए हैं. लगभग 1.09 करोड़ बैंक खातों में इस दायरे में रकम जमा की गई. इन खातों में औसत डिपोजिट 5 लाख रुपये की थी. एक अनुमान के मुताबिक नोटबंदी के बाद बंद नोटों का दो तिहाई भाग वापस बैंकिंग सिस्टम में लौटा है.

फर्जी कंपनियों पर ताला

मोदी सरकार के मुताबिक नोटबंदी के बाद 3 लाख कंपनियों में से 5 हजार कंपनियों के बैंक खातों से 4000 करोड़ रुपये का लेन-देन होने का पता चला है. इसके साथ ही 56 बेंकों से मिली जानकारी के अनुसार 35000 कंपनियों के 58000 बैंक खातों में नोटबंदी के बाद 17 हजार करोड़ डिपोजिट हुए हैं और पैसे निकाले गए हैं.

नकली नोटों पर क्या रहा असर

अब तक मौजूदा रिकार्ड बताता है कि इस मोर्चे पर नोटबंदी सफल नहीं रही है. इस साल आई एक रिपोर्ट के मुताबिक 1000 रुपये के जितने बंद नोट वापस बैंकों में लौटे हैं, उसमें सिर्फ 0.0007 फीसदी ही नकली नोट थे. बंद 500 रुपये की नोट की बात करें, तो इसमें भी सिर्फ 0.002 फीसदी नकली नोट रहे. वहीं, राष्ट्रीय जांच एजेंसी के मुताबिक 2015 तक 400 करोड़ रुपये के नकली नोट सर्कुलेशन में थे. समीक्षकों का कहना है नोटबंदी नकली नोटों को बड़े स्तर पर पकड़ने में नाकामयाब रही है.

घटने लगे हैं कैशलेस ट्रांजैक्शन

पिछले साल नवंबर महीने में 67.149 करोड़ डि‍जिटल ट्रांजैक्शन हुए थे. दिसंबर महीने में य‍ह बढ़कर 95.750 करोड़ पर पहुंच गए. हालांकि इस साल जुलाई तक यह आंकड़ा घटकर 86.238 करोड़ पर आ गए. रिकार्ड्स के मुताबिक आरटीजीएस और एनईएफटी ट्रांसफर 2016-17 में क्रमश: 6 फीसदी और 20 फीसदी बढ़े हैं.

डिजिटलीकरण और नोटबंदी

नोटबंदी के बाद डिजिटल पेमेंट में बढ़ोत्तरी हुई है. पेमेंट्स काउंसिल औफ इंडिया के मुताबिक नोटबंदी के बाद कैशलेस लेनदेन की रफ्तार 40 से 70 फीसदी बढ़ी है. पहले यह रफ्तार 20 से 50 फीसदी पर थी. भले ही नोटबंदी के बाद कैशलेस लेनदेन में बढ़ोत्तरी देखने को मिली, लेकिन कुछ महीनों बाद ही इसमें कमी आने लगी और लोग फिर नगदी पर आ गए.

कैसा रहा जीडीपी का हाल

नोटबंदी की घोषणा के बाद की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्ध‍ि दर घटकर 6.1 फीसदी पर आ गई. पिछले साल इस दौरान यह 7.9 फीसदी पर थी. इसके बाद अप्रैल-जून तिमाही में वृद्धि दर और भी कम हुई और यह 5.7 फीसदी पर पहुंच गई. पिछले साल इस दौरान यह 7.1 फीसदी पर थी. हालांकि फिलहाल इसको लेकर स्थिति साफ नहीं है कि क्या वृद्धि दर घटने के पीछे नोटबंदी वजह है कि नहीं. इसके लिए जीएसटी को कुछ हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है.

नक्सल और आतंकवाद पर मार

नोटबंदी को लागू करने के दौरान यह भी कहा गया था कि इससे आतंकवाद और नक्सली गतिविधियों पर लगाम लगायी जाएगी. लेकिन एक साल बाद भी ऐसा कोई पुख्ता डाटा नहीं है, जो ये बता सके कि इन गतिविधियों पर कितनी रोक नोटबंदी की वजह से लगी हुई है.

6 महीनों के इंतजार से कुछ निकलेगा

नोटबंदी को लेकर जहां कुछ अर्थशास्त्र‍ी सकारात्मक रुख रखते हैं, तो कई का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी कहा है कि नोटबंदी की वजह से लघु अवधि में इकोनामी को नुकसान जरूर पहुंचा है, लेकिन लंबी अवधि में इसका फायदा नजर आएगा. सुरजीत भल्ला कहते हैं कि नोटबंदी का असर देखने के लिए 6 महीने और इंतजार कर लें. इस दौरान डाटा आ जाएगा और पता चल जाएगा कि नोटबंदी पास हुई या फेल.

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