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‘नवाबजादे’ में थिरकते नजर आएंगे श्रद्धा कपूर और वरुण धवन

गुरू रंधावा द्वारा स्वरबद्ध पंजाबी गीत ‘‘हाई रेटेड गबरू’’ को यूट्यूब पर 250 मिलियन दर्शक मिल चुके हैं. इसी बात से प्रेरित होकर फिल्म ‘‘नवाबजादे’’ का निर्माण कर रहे टीसीरीज के भूषण कुमार तथा रेमो डिसूजा ने इस गाने को नए सिरे से सफल फिल्म ‘‘एबीसीडी 2’’ की जोड़ी श्रद्धा कपूर और वरुण धवन पर फिल्माकर फिल्म का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया. इससे श्रद्धा कपूर और वरुण धवन भी काफी खुश हुए.

उसके बाद रेमो डिसूजा ने खुद ही गाने ‘‘हाई रेटेड गबरू’’ को  नए ढंग और नई कदम ताल के साथ फिल्मांकन के लिए गाने की पुनःरचना की और खुद ही नृत्य निर्देशन कर इसे मुंबई के स्टूडियों में फिल्माया. मजेदार बात यह है कि इस गाने में जहां श्रद्धा कपूर और वरुण धवन की हौट जोड़ी नजर आएगी, वहीं इस गाने में उनका साथ ‘एबीसीडी 2’ के दूसरे कलाकारों यानी कि धर्मेश येलेंडे, राघव जुयाल और पुनीत पाठक ने भी हिस्सा लिया.

इस गाने की चर्चा चलने पर वरुण धवन ने कहा-‘‘यह गाना करके बड़ा मजा आया. इस गाने में धर्मेश, पुनीत व राघव के साथ नृत्य  करके हमें समझ में आया कि वह हमसे भी ज्यादा प्रतिभाशाली हैं. जब हमने सुना कि रेमो डिसूजा और भूषण कुमार जी इन कलाकारों के साथ यह फिल्म कर रहे हैं, तो हमें लगा कि हमें भी इसका हिस्सा बनना चाहिए. इसलिए जैसे ही हमारे सामने इस गाने को करने का आफर आया, मैं ने व श्रद्धा ने तुरंत हामी भर दी. मेरे लिए तो इसी बहाने श्रद्धा कपूर के साथ दूसरी बार परदे पर आने का मौका मिल रहा था. इसके अलावा यह गाना सफल है, तो सोने पे सुहागा वाली बात रही. अब शूटिंग करने के बाद के अनुभवों को बयां करने के लिए तो शब्द ही नहीं हैं.’’

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इस गाने का हिस्सा बनकर वरुण धवन से भी कहीं ज्यादा श्रद्धा कपूर उत्साहित हैं. वह कहती हैं-‘‘ऐसा कौन सा कलाकार है, जो रेमो डिसूजा, भूषण कुमार व वरुण धवन के साथ काम नहीं करना चाहेगा? इसके अलावा मैं तो ‘हाई रेटेड गबरू’ गाने की फैन बन चुकी हूं, इसलिए जैसे ही इस गाने का हिस्सा बनने का आफर मिला, मैंने लपक लिया. इसके लिए शूटिंग करना तो मजेदार रहा.’’

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जयेष प्रधान निर्देषित फिल्म ‘‘नवाबजादे’’ में धर्मेश येलेंडे, राघव जुयाल और पुनीत पाठक की मुख्य भूमिका है.

आखिर क्यों नर्वस हैं रिचा चड्ढा..?

रिचा चड्ढा के करियर में काफी कुछ उनकी सोच के विपरीत होता रहा है. फिल्म ‘‘मसान’’ के लिए ‘‘कान फिल्म फेस्टिवल” में अवार्ड और शोहरत बटोरने के बाद बड़े उत्साह के साथ उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता उमंग कुमार के संग फिल्म ‘‘सरबजीत’’ की थी, पर इस फिल्म में उनके साथ ऐसा कुछ हुआ कि अब वह मानती हैं कि ‘सरबजीत’ करना उनकी गलती थी.

तो अब एक बार फिर उनके साथ कुछ ऐसा होने वाला है, जो नहीं होना चाहिए था. वास्तव में रिचा चड्ढा को ‘‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’’ के साथ काम करना अच्छा लगता है, इसी के चलते उन्होंने ‘फुकरे रिटर्न’ के बाद ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ की फिल्म ‘‘थ्री स्टोरी’’ की. इससे पहले वह सुधीर मिश्रा के निर्देशन में फिल्म ‘‘दास देव’’ कर चुकी थी.

रिचा चड्ढा का मानना है कि हर कलाकार को कम से कम एक बार सुधीर मिश्रा के साथ जरूर काम करना चाहिए. मगर ‘दास देव’ का प्रदर्शन कई वजहों से पिछले दो वर्ष से रुका रहा और अब रिचा चड्ढा की यह दोनों फिल्में यानी कि ‘थ्री स्टोरी’ और ‘दास देव’ एक ही दिन 9 फरवरी 2018 को सिनेमा घरों में पहुंचने वाली हैं. इसी से रिचा चड्ढा काफी नर्वस हैं. रिचा के करियर में ऐसा पहली बार हो रहा होगा जब अनचाहे ही उनकी दो फिल्में एक ही दिन आपस में टकराने के लिए सिनेमाघरों में पहुंचने वाली हैं.

खुद रिचा चड्ढा कहती हैं-‘‘मैं एक साथ नर्वस और उत्साहित हूं. ऐसा बहुत कम होता है, जब किसी कलाकार की एक ही दिन दो फिल्में प्रदर्शित हों. कम से कम मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी दो फिल्में एक ही दिन सिनेमाघरों में पहुंचेगी. पर मेरे उत्साह की वजह यह है कि मैने इन दोनों फिल्मों के साथ न्याय किया है. दोनों ही फिल्मों की विषयवस्तु अलग अलग है और दोनों से मुझे काफी उम्मीदे हैं.’’

पर बौलीवुड से जुड़े लोगों की राय में अलग अलग विषय की दोनो फिल्में होने के बावजूद हर कलाकार को कोशिश करनी चाहिए कि उनकी फिल्में आपस में न टकराएं. आखिर दर्शक एक ही समय में एक ही कलाकार की दो दो फिल्में कैसे पसंद करेगा? रिचा चड्ढा के लिए भी एक साथ अपनी दोनों फिल्मों को प्रमोट करना आसान नहीं होगा. उन्हे चाहिए था कि वह कोशिश करती कि उनकी यह फिल्में अलग अलग समय पर व कुछ अंतराल के बाद प्रदर्शित होती.

इस पर रिचा चड्ढा कहती हैं- ‘‘देखिए, एक कलाकार की हैसियत से फिल्म कब सिनेमाघरों में पहुंचेगी, इसका निर्णय मैं नहीं कर सकती. फिल्म को प्रदर्शित करने का अंतिम निर्णय तो निर्माता का ही होता है.’’

मुंबई हादसे में 200 लोगों की जान बचाने वाले ये थे दो बहादुर गार्ड

मुंबई के कमला मिल कंपाउंड के टेरेस रेस्तरां 1 अबोव रेस्तरां, लंदन टैक्सी बार और मोजो पब में 28 दिसंबर रात 12 बजकर 10 मिनट पर जब आग लगी, तो दृश्य बड़ा भयावह था. बांस और प्लास्टिक के छप्पर होने की वजह से चारों तरफ आग की लपटें इतनी जल्दी फैली, कि लोगों को उससे निकलने का मौका ही नहीं मिला और उसमें 15 लोगों की जानें चली गयी, जिसमें 12 महिलाएं और 3 पुरुष हैं. कुछ लोग अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं. इस हादसे में 20 से 25 साल की उम्र वाली महिलाएं ही अधिक थी, जो अपने दोस्त का जन्मदिन मनाने वहां आई थी. कुछ महिलाएं अधिक उम्र की भी थी.

किसे पता था कि ये दिन उनके जीवन का आखिरी दिन होगा, आखिर ऐसे हादसे होते क्यों है? इसके जिम्मेदार कौन है आदि कई सवाल हैं. अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार आखिर ऐसे रेस्तराओं को परमिशन कैसे देती है? हादसे होने के बाद कार्यवाही की जाती है, पहले क्यों नहीं? इसका जवाब किसी के पास नहीं है. हर बार ऐसे हादसे होने के बाद ही जांच समिति बैठाई जाती है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, पर होता कुछ नहीं.

जब ये हादसा कमला मिल कंपाउंड में हुआ और सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे और रेस्तरां के मालिक और कर्मचारी नदारद थे. केवल दो चौकीदार महेश पांडुरंग साबले और सूरज गिरी ने अपनी जान हथेली पर रखकर 200 से 250 लोगों की जानें बचाई. केवल 20 से 25 मिनट में उन्होंने सबको नीचे उतारा. हालांकि इसे करते हुए उन्हें चोटें आई, पर उन दोनों ने इसकी परवाह नहीं की, उन्हें ऐसे बेबस लोगों की जान बचानी थी.

महेश कहते हैं कि गुरुवार की रात को जब आग लगी, तो मैं नीचे की फ्लोर पर था. अचानक लोगों की चीख पुकार सुनकर ऊपर चढ़ा तो देखा कि लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं. तब तक दोनों लिफ्ट बंद हो गई थी. वहां अग्निशामक यंत्र भी नहीं था. मैंने पीछे की तरफ जाकर इमरजेंसी डोर हाथ से तोड़ दिया. फिर सभी लोग उस पतली सीढ़ी से नीचे उतरे, इसमें 10 से 12 लोग घायल थे. उन्हें किसी तरह मैं और सूरज एम्बुलेंस के नजदीक लाये. इतनी भगदड़ थी कि कोई गिर रहा था, तो किसी के कपड़े जल चुके थे, किसी के पांव में चप्पल नहीं थी, लोग बेतहाशा अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे.

Kamala Mills fire tragedy
महेश पांडुरंग साबले

25 वर्षीय महेश को ऐसा करते हुए एक बार भी अपने लिए डर नहीं लगा. दुःखी स्वर में वे कहते है कि मैं ‘बर्थ डे गर्ल’ खुशबू बंसल को भी बचा सकता था, जब तक मैं उसके सामने पहुंच पाता, मेरे सामने आग का एक बड़ा गोला ऊपर से उस पर गिरते हुए देखा, उसकी चीख अभी भी मेरे कानों में गूंज रही है. इसके अलावा मुझे पता नहीं चला था कि कुछ लोग वाशरूम में अटके हैं, नहीं तो मैं उधर पहुंचने की भी कोशिश करता. ये तब पता चला जब फायर ब्रिगेड के कर्मचारी ने आग बुझाने के बाद वाशरूम का दरवाजा खोला और देखा कि सारे लोग एक दूसरे पर मृत पड़े हुए थे. आज भी सबकी चीख और पुकार मुझे याद आती है.

वहीं काम करने वाला 21 वर्षीय गार्ड सूरज गिरी ने लोगों को बचाते हुए गैस सिलिंडरों को सुरक्षित स्थान पर ले गए, ताकि आग की लपटों को फैलने से बचाया जाये, आग से सिलिंडरों के फटने से और भी अधिक जान माल की क्षति हो सकती थी. वह कहता है कि जब में ऊपर चढ़ा, तो वहां से निकलने का कोई भी रास्ता लोगों को पता नहीं था. सीढ़ियां पूरी तरह से बंद थी, कहीं से भी बाहर निकलने का रास्ता नहीं था. आग की भनक लगते ही सारे होटल कर्मचारी भाग चुके थे. चारों तरफ धुंआ और आग भरी थी, जिसमें से लोगों की हा-हाकार सुनाई पड़ रही थी. अगर इस तरह के गलत काम करने वाले रेस्तराओं की सही जांच होती और सीढ़ियां होती, तो इतनी संख्या में जानें नहीं जाती.

Kamala Mills fire tragedy
सूरज गिरी

ये रेस्तरां एक पॉश एरिया में है, इसलिए यहां का खाना काफी महंगा है, लेकिन यहां के होटल मालिक सुरक्षा को ताक पर रखकर व्यवसाय कर रहे थे. इस बारे में मुंबई महानगरपालिका की जनसंपर्क अधिकारी विजय खबाले पाटिल का कहना है कि अभी तक फायर बिग्रेड की तरफ से रिपोर्ट नहीं आई है, लेकिन इतना सही है कि सुरक्षा के मानकों को सही तरह से पालन नहीं किया गया. वैसे तो हर साल अथॉरिटी ऑडिट करती है और कुछ गलत दिखाई देने पर रेस्टोरेंट मालिकों को निर्देश भी देती है, लेकिन उन्होंने कितना पालन किया है, उसकी जांच भी सही तरीके से होना जरूरी है. आगे वैसा ही किया जायेगा. इसके अलावा रेस्तरां चलाने वाले को वहां की प्लानिंग के बारे में जानकारी एंट्री पॉइंट पर पोस्टर के जरिये देने की जरुरत है और ग्राहक भी उसे देखकर ही अंदर जाएं.

फायर वुमन हर्शिनी कान्हेकर कहती हैं कि ऐसे सभी होटलों में अग्निशामक यंत्र रखने की जरुरत है, साथ ही यह भी जरुरत है कि साल में दो बार ऐसे होटल, रेस्तरां और बड़ी बिल्डिंगों की ऑडिट हो, ताकि कमियों को समय रहते ठीक किया जा सकें. इसके अलावा ऐसी किसी घटना में अधिकतर मौतें दम घुटने से होती है, इसलिए ऐसे में अगर व्यक्ति किसी कपड़े या रुमाल को गीला कर नाक और मुंह पर बांध ले, तो दम घुटने से बच सकता है.

बात कुछ भी हो लेकिन इतना सही है कि दो गार्ड ने जिस बहादुरी से इतने लोगों को बचाया, ये काबिले तारीफ है, नहीं तो मृतकों की संख्या और भी बढ़ सकती थी.

मरहम नहीं है महरम : सवाल यह कि हज पर जाएं ही क्यों मुस्लिम महिलाएं

तीन तलाक नाम की कुप्रथा को खत्म करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वह वाहवाही और बधाई मिली जिसके कि वे वाकई हकदार थे, लेकिन उम्मीद से कम वक्त में उन्होंने यह ऐलान कर अपने ही किए पर पानी फेर लिया है कि 45 की उम्र पार कर चुकी मुस्लिम महिलाएं अब बगैर महरम के हज पर जा सकती हैं. मन की बात के साल 2017 के आखिरी एपिसोड में की गई यह घोषणा कैसे एक कुरीति को बढ़ावा देती हुई है, उससे पहले यह समझ लेना जरूरी है कि यह महरम आखिर है क्या और क्यों नरेंद्र मोदी के मन में इस तरह खटका कि वे इसे खत्म करने पर उतारू हो आए.

इस्लाम में निर्देश हैं कि महिलाएं बिना किसी पुरुष अभिभावक या संरक्षक के हज यात्रा नहीं कर सकतीं, यानि हज करने के लिए महरम जरूरी है, इस्लाम के ही मुताबिक महरम वह पुरुष होता है जिससे मुस्लिम महिला शादी नहीं कर सकती मसलन पिता, बेटा, सगा भाई और नाति यानि नवासा. अभी तक मुस्लिम महिलाएं इनमें से किसी एक के साथ होने पर ही हज यात्रा कर सकतीं थीं, अब बक़ौल नरेंद्र मोदी यह ज्यादती खत्म की जा रही है और 45 पार कर चुकीं 4 या उससे ज्यादा मुस्लिम महिलाएं इकट्ठी होकर हज पर जा सकती हैं. इस बाबत मोदी की पहल पर इन महिलाओं को लाटरी सिस्टम से मुक्त रखा जाएगा.

मोदी जी यह जानकर हैरान थे कि अगर कोई मुस्लिम महिला हज करना चाहे तो वह बिना महरम के नहीं जा सकती थी और यह भेदभाव आजादी के 70 साल बाद भी कायम है, लिहाजा उन्होंने इस रिवाज को ही हटा दिया.

तीन तलाक के नतीजों से उत्साहित नरेंद्र मोदी अब इस्लाम में सीधे दखल देने पर उतारू हो आये हैं या फिर उन्हें वाकई मुस्लिम बहनों की चिंता है, इस पर भले ही बहस की गुंजाइशें मौजूद हों, पर यह बिना किसी लिहाज के दो टूक कहा जा सकता है कि हज उसी तरह किसी मुस्लिम के भले की बात नहीं जिस तरह हिंदुओं की तीर्थ यात्रा, इन दोनों का ही मकसद अपने अपने अनुयायियों को दिमागी तौर पर गुलाम बनाए रखने की साजिश है. पाप, पुण्य, मोक्ष, स्वर्ग, नर्क वगैरह पर सभी धर्म गुरु और धर्म ग्रंथ एक हैं, क्योंकि इन्हीं से उनकी दुकानदारी चलती है.

बिना महरम हज की आजादी धार्मिक अंधविश्वासों के पैमाने पर देखें तो मुस्लिम महिलाओं को मजहब और उसके ठेकेदारों के चंगुल में फंसाये रखने का टोटका है, जिससे मुसलमान औरतों को लगे कि अब उनका नरेंद्र मोदी से बड़ा हमदर्द और रहनुमा कोई नहीं, लेकिन इस फैसले ने एहसास करा दिया है कि मोदी चाहते यह हैं कि मुसलमान खासतौर से औरतें कहीं कठमुल्लाओं की पकड़ से आजाद न हो जाएं, इसलिए उन्हें अब धर्म के नाम पर बहकाया जाये और औरतों की आजादी बहाली के नाम पर एक बार फिर वाहवाही लूटी जाये.

हज या तीर्थ यात्रा से किसका क्या और कैसे भला होता है इसकी कोई तार्किक व्याख्या मोदी या फिर कोई दूसरा उदारवादी कर पाये तो बात समझ आए, लेकिन मोदी खुद विकट के धर्मभीरु और अंधविश्वासी हैं, जो बिना मंदिर में जाये चुनाव प्रचार भी शुरू नहीं करते और यही काम या बेवकूफी राहुल गांधी करने लगें, तो पूरा भगवा खेमा हाय हाय करने लगता है. हालिया गुजरात विधानसभा चुनाव इसके गवाह हैं कि वहां धर्म के नाम पर कैसे कैसे ड्रामे हुये थे, जिनमे विकास वगैरह की बातें गुम होकर रह गईं थीं.

वाकई मोदी महिलाओं का भला चाहते हैं तो उन्हें हज और तीर्थ यात्रा दोनों पर रोक लगाने का ऐलान करने की हिम्मत दिखानी चाहिए थी, वजह है धर्म, जो औरत जाति का सबसे बड़ा दुश्मन है, जिसके तहत वे पांव की जूती और भोग्या भर हैं. महिलाएं आजादी के 70 साल बाद भी क्यों सशक्त नहीं हो पा रहीं, यह बात प्रधानमंत्री के मन में आए और वे इस पर चिंतन मनन कर पाएं तो फिर उन्हें यह भी सोचने मजबूर होना पड़ेगा कि कैसे कैसे बाबाओं ने उनके कार्यकाल में भी महिलाओं की इज्जत से आश्रमों में ही खिलवाड़ किया. मथुरा, वृन्दावन की तरह खुद उनके लोकसभा क्षेत्र बनारस में भी लाखों विधवाएं पेट भरने के लिए भीख मांगने के अलावा दूसरे ऐसे काम करने मजबूर हैं जिनसे उनमें कोई गैरत नहीं रह जाती.

और इस बदहाली की वजह धर्म और उसके स्त्री विरोधी मूलभूत सिद्धान्त नहीं तो और क्या है. जिस दिन देश के सवा सौ नहीं तो सवा करोड़ लोग भी इस सवाल के जबाब में सड़कों पर आ खड़े होंगे उस दिन किसी महरम की जरूरत किसी हिंदुस्तानी औरत को नहीं रह जाएगी. औरत कैसे और किसके साथ काबा काशी जाये यह कोई मुद्दा ही नहीं, मुद्दा यह है कि आजाद भारत में कैसे महिला दिल्ली और भोपाल की सड़कों पर आधी रात को तफरीह करने की अपनी ख़्वाहिश पूरी कर पायें, इस बाबत मंत्रालयों को निर्देश दिये जाएं.

धर्म स्थलों पर जाने प्रोत्साहन और सहूलियतें देने से औरतों का कोई भला नहीं होने वाला, उनका असली भला तो स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में जाने से होगा, जाने कब किस प्रधानमंत्री के मन में यह बात आएगी. बात और मंशा चूंकि सियासी है, इसलिए किसी नेता को इस हकीकत पर अफसोस नहीं होता कि आजादी के 70 साल बाद भी एक फीसदी मुस्लिम लड़कियां भी कालेज का दरवाजा नहीं देख पातीं. बहुसंख्यक हिन्दू युवतियां भी उच्च शिक्षा से वंचित क्यों हैं, इस पर सभी खामोश रहते हैं, हां बात हज या तीर्थ की हो तो जो सरकारें खुद पुण्य कराने पानी की तरह पैसा बहाती हों, उनसे क्या खाकर महिलाओं के भले या हितों की उम्मीद की जाये.

सुनिधि चौहान को नये साल पर मिला बेशकीमती तोहफा

अपनी गायकी से लोगों के दिलों पर राज करनेवाली बौलीवुड की पौपुलर सिंगर सुनिधि चौहान के लिए नया साल सौगात लेकर आया है. उन्होंने एक जनवरी यानी नये साल के मौके पर मुंबई के सूर्या अस्पताल में शाम 5.20 बजे एक बेटे को जन्म दिया है.

सुनिधि की गायनोकोलोजिस्ट रंजना धानू के मुताबिक, “बेबी और मां दोनों स्वस्थ हैं. बता दें, सुनिधि पिछले पांच महीनों से लाइमलाइट से दूर थीं. सुनिधि आखिरी बार डब्लिन स्क्वैयर में एक शो के दौरान नजर आई थीं, उस वक्त वे प्रेगनेंसी के दूसरे ट्राइमेस्टर में थीं. इस लाइव परफौरमेंस में सुनिधि को देख औडियंस इतने प्रभावित हुए थे कि सभी ने उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन दिया था.

 

 

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बता दें कि दो साल तक एकदूसरे को डेट करने के बाद सुनिधि और म्‍यूजिक कंपोजर हीतेश सोनिक ने 24 अप्रैल 2012 को एक दूसरे से शादी कर ली थी. दोनों की शादी मुंबई में एक छोटे से इवेंट के दौरान हुई थी. 14 अगस्‍त 2017 को अपने 34वें बर्थडे के मौके पर सुनिधि ने अपने प्रेग्‍नेंसी की खुशखबरी दी थी.

बता दें कि सुनिधि चौहान की हीतेश से दूसरी शादी है. इससे पहले उन्‍होंने मात्र 18 साल की उम्र में उनकी शादी कोरियेाग्राफर और निर्देशक बौबी खान से की थी. बताया जाता है कि उनके घरवाले इस शादी के लिए बिल्कुल राजी नहीं थे इसलिए दोनों ने गुपचुप तरी‍के से शादी की थी और इस शादी में सिर्फ क्‍लोज फ्रेंड्स ही शामिल हुए थे. हालांकि, यह रिश्ता ज्यादा समय तक टिक न सका और 2003 में इन्होंने तलाक ले लिया. बौबी से तलाक लेने के 10 साल बाद उन्होंने दोबारा शादी की.

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सुनिधि ने अपने करियर की शुरुआत 4 साल की छोटी सी उम्र में की थी. उन्होंने कई सिंगिंग रियलिटी शोज में हिस्सा लिया, हालांकि उनके हुनर को टीवी एंकर तब्बसुम ने पहचाना. उन्होंने सुनिधि के माता-पिता को मुंबई आने के लिए कहा. इसके बाद सुनिधि ने दूरदर्शन के रियलिटी शो ‘मेरी आवाज सुनो’ में हिस्सा लिया जिसके बाद शो की विनर रहीं.

सुनिधि ने ‘रुकी रुकी’, ‘डांस पे चांस’, ‘कमली’, शीला की जवानी’, ‘इश्क सूफियाना’, ‘बीड़ी जलाइ ले’, ‘देसी गर्ल’, ‘भागे रे मन’ जैसे कई चर्चित गाने गाये हैं. हिंदी गानों के साथ-साथ मराठी, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, पंजाबी, बांग्ला, असमिया, नेपाली, उर्दू में भी गीत गा चुकी हैं. वह मशहूर पार्श्वगायिकाओं में शुमार हैं. सुनिधि जितना अच्छा गाती हैं, उतनी ही अच्छी दिखती हैं. वह फैशनिस्टा आइकौन भी हैं, उन्होंने साल 2013 में एशिया की ‘टौप 50 सेक्सिएस्ट लेडीज’ में भी अपनी जगह बनाई थी.

कौन सा होम लोन रहेगा आपके लिए बेहतर? यहां जानें

घर-जमीन की लगातार बढ़ती हुई कीमत की वजह से अब लोगों को घर या जमीन खरीदने के लिए होम लोन का सहारा लेना पड़ रहा है. अगर आपको भी घर खरीदने के लिए ऐसे ही किसी होम लोन की आवश्यकता है तो आपको अपने आर्थिक लक्ष्य के आधार पर एक सही लोन चुनना होगा. ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बैंको और फाइनेंस कंपनियों ने अलग-अलग तरह के लोन देना शुरू किया है. तो आइए आज हम बाजार में मौजूद तरह-तरह के होम लोन पर एक नजर डालते हैं.

पहले से मंजूर किए गए होम लोन

कुछ होम लोन, बैंक द्वारा पहले से ही मंजूर किए गए होते हैं. इस तरह के लोन आपके कर्ज चुकाने के इतिहास, आपकी आमदनी और आपके क्रेडिट स्कोर के आधार पर दिए जाते हैं. लेकिन इस तरह के लोन, एक निर्धारित समय में ही दिए जाते हैं. इस लोन की प्रक्रिया में आम तौर पर 48 घंटे लगते हैं. पहले से मंजूर किए गए लोन आमतौर पर कम ब्याज पर मिलते हैं, लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए कुछ फीस देनी पड़ती है.

निश्चित ब्याज दर वाले होम लोन

इस तरह के होम लोन में बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का कोई असर नहीं पड़ता और लोन चुकाने की सम्पूर्ण अवधि के दौरान ब्याज दर एक समान ही रहता है. इस पर हर महीने निश्चित परिमाण में लोन की ईएमआई चुकाने से बजट को ठीक रखने और आगे की प्लानिंग करने में मदद मिलती है. इस तरह के लोन से आर्थिक सुरक्षा भी मिलती है. लेकिन इसमें एक खराबी है, निश्चित ब्याज दर पर मिलने वाले होम लोन का ब्याज दर, अनिश्चित या अस्थायी ब्याज दर वाले होम लोन की तुलना में आम तौर पर काफी अधिक होता है.

अस्थायी ब्याज दर वाले होम लोन

अस्थायी ब्याज दर वाले होम लोन बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण बदलते ब्याज दरों के अधीन होते हैं. इसमें दो चीजें शामिल होती हैं, मूल ब्याज दर और अस्थायी घटक.  मूल दर में परिवर्तन होने पर अस्थायी दर में परिवर्तन होता है. यदि आप बढ़ते मुद्रास्फीति परिदृश्य में होम लोन लेना चाहते हैं तो आपको अस्थायी ब्याज दर वाले होम लोन से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि ब्याज दरों की अनिश्चितता, आपकी अन्य आर्थिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में बाधा बन सकती है.

संयुक्त होम लोन

यह एक ऐसा लोन है जिसे एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा अर्थात परिवार के किसी सदस्य के साथ मिलकर लिया जा सकता है. संयुक्त होम लोन में पति/पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन आदि शामिल हो सकते हैं. लोन का भुगतान दोनों के अकाउंट से होता है और लोन चुकाने में देरी होने या चूक हो जाने पर इसके लिए दोनों जिम्मेदार होते हैं. संयुक्त होम लोन देते समय, बैंक दोनों सदस्यों की आमदनी पर विचार करते हैं और लोन का टैक्स लाभ, लोन लेने वाले दोनों सदस्यों को मिलता है.

होम इम्प्रूवमेंट लोन

पर्सनल लोन की तुलना में कम प्रोसेसिंग फीस और कम ब्याज दर पर मिलने के कारण, होम इम्प्रूवमेंट लोन, घर की मरम्मत और रखरखाव करने के लिए पैसों की तंगी होने पर काफी मददगार साबित हो सकता है. इसलिए यदि आपको घर की मरम्मत कराने या उसका नवीकरण करने के लिए पैसों की जरूरत है तो आप होम इम्प्रूवमेंट लोन ले सकते हैं. एक साल तक समय पर लोन चुकाने वाला कोई भी व्यक्ति इस तरह का लोन ले सकता है, लेकिन इस लोन की रकम का इस्तेमाल सिर्फ घर की मरम्मत या नवीकरण के लिए ही करना होता है.

स्मार्टफोन खरीदने के बाद करना ना भूले ये काम

क्या आपने ने अभी अभी नया स्मार्टफोन खरीदा है. लेकिन अपने उसकी सिक्योरिटी के लिए कोई ऐप या कोई नया फीचर नहीं अपनाया है, तो हमारी ये खबर आपके बड़े काम आ सकती है. हम आपको कुछ ऐसे उपाय बताने जा रहे हैं जिसे हर किसी को नया फोन खरीदने के बाद अपनाना  चाहिए. तो आइये जाने कि फोन खरीदने के बाद  आपको कौन सा जरूरी काम करना है.

डिस्प्ले की सुरक्षा

अक्सर ऐसा होता है कि प्रीमियम स्मार्टफोन तक का डिस्प्ले टूट जाता है. अपने स्मार्टफोन की सुरक्षा के लिए उस पर अच्छी क्वालिटी का टेम्पर्ड ग्लास लगवाएं. सामान्य स्क्रीन गार्ड फोन की स्क्रीन को सिर्फ स्क्रैच आदि से बचाता है, लेकिन फोन गिर जाए तो उसकी स्क्रीन को टूटने से टेम्पर्ड ग्लास ही बचाता है.

स्मार्टफोन का बीमा कराएं

स्मार्टफोन का भी बीमा कराया जा सकता है. आजकल कई कंपनियां यूजर्स को स्मार्टफोन का बीमा औफर कर रही हैं. इसमें फिजिकल डैमेज, लिक्विड डैमेज और किसी मकैनिकल खराबी के लिए बीमा शामिल है. अगर कभी समार्टफोन में इस तरह की दिक्कतें आ जाएं तो इससे काफी फायदा होता है.

ऐपलौक (AppLock) करें इंस्टौल

आप कभी भी नहीं चाहेंगे कि कोई आपके निजी मेसेज, फोटो और दूसरे डेटा को देखें. इसके लिए आप ऐपलौक का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसे एंड्रौयड फोन के लिए गूगल प्लेस्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. मोबाइल में मौजूद जिस भी ऐप, फोटो गैलरी आदि को आप चाहेंगे, इस ऐप की मदद से लॉक कर सकेंगे.

एंटी-मालवेयर सौफ्टवेयर का इस्तेमाल

यह जरूरी है कि आप अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन की सुरक्षा की तरह ही उसके डेटा की सुरक्षा भी करें. नया फोन लेते ही सबसे पहले उसमें एंटी वायरस और डेटा सिक्योरिटी सौफ्टवेयर इंस्टौल करें जिससे मोबाइल के महत्वपूर्ण डेटा और दूसरे सौफ्टवेयरों से सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

बैक कवर का यूज

मोबाइल की सुरक्षा को लेकर कभी समझौता न करें. अपने स्मार्टफोन की बौडी को स्क्रैच, निशान और डेंट आदि से बचाने के लिए अच्छी क्वालिटी का बैक कवर खरीदें. आजकल बाजार में फैशनेबल और बढ़िया दिखने वाले कवर आसानी से उपलब्ध हैं. जरूरत के हिसाब से बैक कवर या फ्लिप वाले कवर चुन सकते हैं.

फोन चोरी होने पर पता लगाएं

स्मार्टफोन के चोरी होने या खोने पर काफी दिक्कत होती है. इस दिक्कत से बचने के लिए सुनिश्चित करें कि आपके एंड्रायड स्मार्टफोन पर एंड्रायड डिवाइस मैनेजर एक्टिवेट हो. इससे आपको स्मार्टफोन की लोकेशन पता लगाने में मदद मिलेगी.

इसके लिए अपने स्मार्टफोन की गूगल सेटिंग्स (Google Settings) में जाएं. स्क्रौल डाउन करें और आपको सिक्योरिटी (Security) का विकल्प नजर आएगा. इसे टैप करें और एंड्रायड डिवाइस मैनेजर (Android Device Manager) पर जाएं. रिमोटली लोकेट दिश डिवाइस (Remotely locate this device) और अलाव रिमोट लौक एंड इरेज औन और औफ (Allow remote lock and erase on or off) को टिक कर दें. इसमें यह भी ध्यान रखें की बात है कि लोकेशन (Location) की सेटिंग में जाकर एक्सेस टू माई लोकेशन (Access to my location) को भी औन करके रखना है. इसके अलावा फोन में गूगल साइन इन होना चाहिए.

 

चुनावों पर हावी धर्म : क्या धर्मजनित पार्टी ही है देश की प्राथमिकता

गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव जीत कर भारतीय जनता पार्टी ने साबित कर दिया है कि नोटबंदी और जीएसटी की चोटों के बावजूद देश को धर्मजनित पार्टी की ही प्राथमिकता है. 2014 में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी ने भगवा झंडे पर लेकिन भगवा रंग के बगैर विकास व स्वच्छ सरकार बनाने के नाम पर जिताया था. पर 2017 के आतेआते इन दोनों वादों की कलई धुल गई और असल कट्टरवादी भाजपा सामने आ गई जिस में मंदिर, पूजापाठ, वर्णव्यवस्था, मुसलिम विरोध पहली जरूरतें हैं. जनता ने ऐसी ही पार्टी को सिर पर रखा हुआ है.

लोकतंत्र हो या राजतंत्र, आखिरकार शासकों को जनता की सहमति तो चाहिए ही होती है. जनता को नाराज कर के कोई भी शासक लंबे समय तक राज नहीं कर पाता. तानाशाह भी कुछ न कुछ ऐसा करते रहे हैं जिस से जनता को लगता रहे कि शासक असल में उसी का भला सोच रहा है.

गुजरात विधानसभा के चुनावों में राहुल गांधी ने जम कर नोटबंदी और जीएसटी पर तीर चलाए थे. अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ने जातियों के साथ होने वाले भेदभाव व उन की आर्थिक दुर्दशा के सवाल उठाए थे. इन चारों को धर्म से लेनादेना न के बराबर था. पर इन की नहीं चली. भारतीय जनता पार्टी का धार्मिक तूफान सब को भगवाई रंग में भिगोता चला गया और वे चारों आज असहाय से खड़े हैं.

बस, आशा की किरण इस में है कि भगवाई भूकंप के गढ़ में 22 सालों बाद भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत टक्कर मिली है. इस से पहले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों में टोकनबाजी ही होती थी. कांग्रेस न के बराबर खड़ी होती थी, यह मान कर कि वह तो हारेगी ही. इस बार एकएक सीट के लिए भाजपा को लड़ना पड़ा है. जो 7 सीटों की बढ़त भाजपा को मिली है वह इतनी कम है कि चुनावी गिनती के समय कितनी ही सीटों पर ऐसा लगता था कि जनता ने कांग्रेस को ही वोट दिया है.

गुजरात का इलाका दशकों से कट्टर और कट्टर विरोधियों का गढ़ रहा है. एक तरफ यहां के ऊंची जातियों के लोग अपनेआप को धर्मश्रेष्ठ मनवाने की कोशिश करते हुए भक्ति रस में अपने को डुबोते रहे हैं तो दूसरी ओर वर्णव्यवस्था की बंदिशों को तोड़ने वाली कर्मठ जातियां धर्म के सहारे ही अपने वजूद को बचाने की कोशिश करती रही हैं. यहां के लोगों की अपनी जो भी समृद्धि है, उस के लिए वे कर्मठता को कम, पूजापाठ को ज्यादा श्रेय देते रहे हैं.

इसी को राजनीति में पहले रामधुन से भुनाया गया है और अब मंदिर वहीं बनाएंगे से. 2017 के चुनावों में राहुल गांधी समेत सभी नेताओं को राज्य के सभी मंदिरों में मत्थे टेकने पड़े. राज्य के बड़े कारखानों, व्यापारियों की मंडियों, बांधों, नहरों, बंदरगाहों की चर्चा कम रही. नरेंद्र मोदी ने खुद बुलेट ट्रेन की बात करनी बंद कर दी और राहुल गांधी कितने हिंदू हैं, इस पर चर्चा चलवा दी. यह गुजराती मानस के दिल को छूने वाली बात है जो दशकों से अपने से ऊंची जाति के पायदान पर खड़े होने के चक्कर में ज्यादा लगा रहता है बजाय सफल व्यापार को सरल बनवाने के.

यह व्यापारी वर्ग जम कर जीएसटी और नोटबंदी का विरोध कर रहा है पर वोट देते समय उसे फिर अपनी पहली प्राथमिकता नजर आ गई. नरेंद्र मोदी अपने राज्य में जीत गए, पर हां, 2012 के मुकाबले में 12 सीटों को हार कर, 2014 के लोकसभा चुनावों के आधार पर 65 विधानसभा क्षेत्रों में हार कर. पर जीत वे गए ही हैं और इसी के साथ जीएसटी व नोटबंदी भी जीत गई हैं.

इस जीतहार का अगले सालों पर असर पड़ेगा. राहुल गांधी अब टक्कर की पार्टी खड़ी कर सकेंगे. नरेंद्र मोदी को दूसरे राज्यों के चुनावों की खास तैयारी करनी होगी. अब विकास और स्वच्छ शासन की बातों का भरोसा कम रहेगा. चुनाव धर्म के नाम पर लड़े जाएंगे.

खाल उधेड़ते प्राइवेट अस्पताल : लूट का अड्डा बनता चिकित्सा जगत

1972 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिका के कैनेथ एरो ने 1963 में ही चेतावनी दे दी थी कि स्वास्थ्य सेवा को बाजार के हवाले कर देना आम लोगों के लिए घातक साबित होगा.

इस चेतावनी का दुनियाभर में जो भी असर हुआ हो लेकिन हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का स्वास्थ्य उद्योग में तबदील हो जाना क्या और कैसेकैसे गुल खिला रहा है, इस की ताजी बानगी बड़े वीभत्स, शर्मनाक और अमानवीय तरीके से बीती 1 दिसंबर को सामने आई.

दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में स्थित मैक्स सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल के डाक्टरों ने एक दंपती को उन के जुड़वा बच्चों को पोलिथीन में पैक कर यह कहते थमा दी थी कि ले जाइए, ये दोनों मर चुके हैं.

जानना और समझना जरूरी है कि मैक्स सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के डाक्टरों ने किस तरह की लापरवाही और अमानवीयता दिखाई थी जिस ने पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया था. हालांकि महंगे पांचसितारा प्राइवेट अस्पतालों में होती आएदिन की लूटखसोट का यह पहला या आखिरी मामला नहीं था जिस ने सहज ही कैनेथ एरो की चेतावनी याद दिला दी, बल्कि ऐसा हर समय देश में कहीं न कहीं हो रहा होता है. और डाक्टरों को लुटेरा व हत्यारा तक कहने में लोगों को कोई संकोच या ग्लानि महसूस नहीं होती.

जबकि जिंदा था बच्चा

 शिकायतकर्ता पति या पिता आशीष की मानें तो उस ने 6 महीने की गर्भवती पत्नी वर्षा को उक्त अस्पताल में भरती किया था. भरती करने के बाद मैक्स के डाक्टरों ने गर्भस्थ जुड़वा शिशुओं के जिंदा रहने यानी बचने की संभावना महज 10-15 फीसदी ही बताई थी. निम्न मध्यवर्गीय आशीष यह सुन कर मायूस और परेशान हो उठा.

डरा कर पैसे ऐंठने के भी विशेषज्ञ हो चले डाक्टरों का यह दांव खाली नहीं गया. उन्होंने पुचकारते हुए आशीष से कहा कि खतरा टल सकता है यदि वर्षा को 35-35 हजार रुपए की कीमत वाले 3 इंजैक्शन लगाए जाएं. लगभग 1 लाख रुपए की रकम आशीष के लिए मामूली और गैरमामूली दोनों नहीं थी. पत्नी और बच्चों की सलामती के लिए वह इस बाबत तैयार हो गया तो उक्त 3 इंजैक्शन वर्षा को लगा दिए गए.

ये इंजैक्शन लगने के बाद ही चमत्कारिक ढंग से बच्चों के बचने की संभावना डाक्टरों ने बताई तो आशीष को 1 लाख रुपए खर्च करने का कोई मलाल नहीं हुआ. पैसा हाथ का मैल है, आताजाता रहता है, यह प्रचलित बात आशीष को भी मालूम थी कि जान अगर एक दफा चली जाए तो फिर कुछ नहीं हो सकता.

मैक्स अस्पताल में जाने से पहले वर्षा का नियमित चैकअप पश्चिम विहार इलाके के अट्टम नर्सिंग होम में होता था. जब भी वर्षा यहां आई तब डाक्टरों ने जांच के बाद यही कहा था कि सबकुछ नौर्मल और ठीकठाक है.

इस पर आशीष और वर्षा खुशी से फूले नहीं समाते थे. पहली दफा मांबाप बनने जा रहे नवदंपतियों की तरह उन्होंने होने वाले बच्चों के लिए खिलौने खरीदने भी शुरू कर दिए थे और बैडरूम में बच्चों के हंसते, खिलखिलाते पोस्टर भी लगा लिए थे. वर्षा के मायके वाले भी खुशखबरी सुनने का इंतजार करते अपने रस्मोरिवाज निभाने की तैयारियों में जुटे थे. आशीष और वर्षा की शादी को अभी 3 साल ही हुए थे.

नवंबर के तीसरे हफ्ते में वर्षा फिर से अट्टम नर्सिंग होम गई तो वहां की लेडी डाक्टर स्मृति ने परिवारजनों को मैक्स अस्पताल ले जाने की सलाह दी. उन के मुताबिक, वर्षा के वाटर बेग से लीकेज होने लगी थी.

आशीष या उस के पिता इस चिकित्सकीय भाषा को नहीं समझते थे. उन्हें तो बस वर्षा और होने वाले बच्चों की सलामती से सरोकार था. लिहाजा, वे भागेभागे मैक्स अस्पताल गए और 1 लाख रुपए के इंजैक्शन फिर लगवा लिए. अब खतरा टल गया है, यह बात ये लोग मैक्स जैसे नामी अस्पताल के डाक्टरों के मुंह से सुन कर ही वापस जाना चाहते थे.

खतरा कितना था और था भी या नहीं, यह इन्हें नहीं मालूम था. अस्पताल प्रबंधन के लालच का अंदाजा भी उन्हें कतई नहीं था. पहली दफा महंगे स्टार अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले कम पैसे वालों के साथ ऐसा न हो, तो जरूर बात हैरत की होती.

पहले तो उषारानी नाम की डाक्टर ने इन्हें यह कहते डराया कि बच्चों को जन्म के बाद 12 हफ्तों तक उन्हें नर्सरी में रखना पड़ेगा. हैरानपरेशान आशीष और उस के पिता कैलाश मैक्स अस्पताल के चाइल्ड स्पैशलिस्ट डाक्टर ए सी मेहता से मिले तो उन्होंने उषारानी की बात की पुष्टि करते सधे और कारोबारी ढंग से बताया कि शुरू के 4 दिन बच्चों को नर्सरी में रखने के 1 लाख रुपए प्रतिदिन और बाद में 50 हजार रुपए प्रतिदिन लगेंगे.

इतनी बड़ी रकम इन लोगों के पास नहीं थी. फिर भी, उन्होंने सोचा कि कहीं न कहीं से इंतजाम कर लेंगे. 29 नवंबर को वर्षा की मैक्स में ही अल्ट्रासाउंड जांच हुई थी जिस में बच्चों के पूरी तरह स्वस्थ होने की बात कही गई थी. इस से आशीष और उस के परिवारजनों ने राहत की सांस ली थी.

30 नवंबर को सुबह 7.30 बजे वर्षा ने पहले एक बेटे और फिर 12 मिनट बाद एक बेटी को जन्म दिया. सुबह 8 बजे परिवारजनों को बच्चे देखने की अनुमति मिली पर यह बता दिया गया था कि बेटी मृत पैदा हुई है और बेटा जिंदा है.

इन लोगों ने यह सोचते तसल्ली कर ली कि चलो, एक तो बचा. लेकिन फिर साढ़े 12 बजे के लगभग अस्पताल प्रबंधन की तरफ से बेटे के भी मर जाने की बात कही गई. जल्द ही आशीष के हाथ में 2 पैकेट यह कहते थमा दिए गए कि ये रहे आप के बच्चे.

कल तक जो आशीष अपनी फैमिली कंप्लीट हो जाने की आस लगाए बैठा था, उस का दिल पार्सल बना कर दी गई बच्चों की लाशें देख हाहाकार कर रहा था. उस का तो सबकुछ एक झटके में लुट गया था पर इस वक्त तक उसे यह नहीं मालूम था कि यह बेरहम लुटेरा कोई न दिखने वाला भगवान नहीं, बल्कि वे डाक्टर हैं जिन्हें भगवान के बाद दूसरा दरजा हर कोई देता है.

पैकेटों में पैक अपने नवजात बच्चों की लाशें ले कर आशीष अपने ससुर प्रवीण के साथ टैक्सी में बैठ कर चंदर विहार श्मशान की तरफ चल पड़ा.

कैसे अपने सपनों को दफन किया जाता है, यह उस से बेहतर कोई भी नहीं बता सकता. बीच में रास्ते में मधुबन चौक के पास लाश वाला पैकेट हिला, तो प्रवीण ने कहा, ‘लगता है बच्चा जिंदा है.’

यह हैरतअंगेज बात इस लिहाज से थी कि जिस बच्चे को मैक्स के डाक्टर मरा बता चुके हों वह जिंदा कैसे हो सकता है. आशीष ने इसे वहम समझा और उसे लगा कि गाड़ी हिलने की वजह से पैकेट हिला होगा, इसलिए प्रवीण को ऐसा लगा.

लेकिन बात सच थी. प्रवीण के हाथों में रखा पैकेट वाकई हिल रहा था, लग ऐसा रहा था, मानो बच्चा पांव झटक रहा हो. दोनों ने वक्त न गंवाते पैकेट खोलना शुरू किया जिसे बांधने में कोई लापरवाही नहीं की गई थी. पैकेट 5 परतों में बांधा गया था जिसे खोलने में लगभग 3 मिनट लग गए.

बच्चा वाकई जिंदा था, उसे ले कर वे तुरंत नजदीक के पीतमपुरा स्थित अग्रवाल अस्पताल ले गए. वहां तुरंत बच्चे को भरती किया गया और तुरंत ही उस का इलाज भी शुरू हो गया. अग्रवाल अस्पताल में मौजूद डाक्टर संदीप अग्रवाल ने बच्चे के जिंदा होने की पुष्टि की, साथ ही, यह भी बताया कि इंफैक्शन के चलते उस के बचने की उम्मीद कम है.

6 दिन इलाज हुआ पर बेटा बचा नहीं. इस के बाद सामने आई मैक्स की लारवाही या हैवानियत, कुछ भी कह लें, एक ही बात है. संदीप उस के घर वाले और नातेरिश्तेदार धरनाप्रदर्शन करने लगे तो दिल्ली हिलने लगी. ये लोग इंसाफ के साथसाथ उन 2 डाक्टरों को सजा दिए जाने की मांग कर रहे थे जिन्होंने बच्चे को मृत बता कर उन्हें दफनाने के लिए दे दिया था. इस बाबत आशीष ने शालीमार बाग थाने में एफआईआर दर्ज कराई. पुलिस ने आईपीसी की धारा 308 के तहत मामला दर्ज किया.

मामले ने तूल पकड़ा तो दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने पत्रकारवार्त्ता बुला कर बताया कि इस मामले की गंभीरता से जांच की जाएगी. इस बाबत जांच कमेटी गठित कर दी गई है. उस की रिपोर्ट आते ही कार्यवाही हुई. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैक्स अस्पताल का लाइसैंस रद्द कर दिया. इस पर दिल्ली मैडिकल एसोसिएशन यानी डीएमए ने एतराज जताते, बल्कि सरकार को धमकी देते, कहा कि अगर मैक्स का लाइसैंस रद्द करने का फैसला वापस नहीं लिया गया तो डीएमए कामकाज ठप कर देगा और डाक्टर्स काम नहीं करेंगे.

मैक्स के हक में डीएमए ने तर्क दिए जिन के माने सिर्फ इतने भर थे कि हम चोरी भी करेंगे और फिर सीनाजोरी भी. बच्चा प्रीमैच्योर था और सरकार ने एक हजार परिवारों की रोजीरोटी पर संकट खड़ा कर दिया है, जैसी बातें आशीष के इस बयान के सामने कुछ भी नहीं थीं कि उस के बच्चे को 3 घंटे इलाज नहीं मिला, उसे किसी सामान की तरह पैक कर दिया गया था जबकि वह जिंदा था.

कानूनन डाक्टरों को काफी छूटें मिली हुई हैं, पर इस मामले में उन की करतूत छिपाए नहीं छिप रही है. न तो चिकित्सकीय दृष्टि से वे खुद को सच साबित कर पा रहे हैं और न ही कानूनी लिहाज से कोई राहत उन्हें मिलने की संभावना दिख रही.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैडिकल माफिया से एक आम परिवार के हक में सीधे टकराने की हिम्मत दिखाई. यह वाकई तारीफ की बात है जिस से देशभर के लोगों को उम्मीद बंधी कि अगर सभी राज्य सरकारें सख्त हो जाएं तो ऐसी नौबत ही क्यों आए. हालांकि, कुछ ही दिनों बाद मैक्स अस्पताल का लाइसैंस बहाल कर दिया गया.

इसी तरह गुरुग्राम स्थित फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से बच्ची की मौत और इलाज के लिए 16 लाख रुपए का बिल वसूलने के आरोप में वहां के एक डाक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई.

हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने कहा कि जांच पैनल की रिपोर्ट के आधार पर आपराधिक धाराएं जोड़ी जाएंगी.

उदाहरणों से भयावह आंकड़े

 ऐसी नौबत जबतब आती रहती है जिस में प्राइवेट अस्पतालों पर लूटखसोट करने का आरोप सच साबित होता है. मृत व्यक्ति को 7 दिन वैंटीलेटर पर रखा, जीवित को मृत बता दिया, जब तक बिल अदा नहीं किया तो शव नहीं दिया गया या फिर दिल्ली के नजदीक ही गुरुग्राम में डेंगू पीडि़त एक बच्ची के इलाज का बिल 15 लाख रुपए आया जैसी खबरें अब चौंकाती नहीं हैं बल्कि बताती हैं कि लोकतांत्रिक सरकारें राजशाही से ज्यादा खोखली हैं.

हालांकि यह मसला भी सोचनीय है कि जब हमें चिकित्सा सुविधा पास के सामान्य या सरकारी अस्पतालों में मिल जाती है तो फिर लोग उन मल्टी स्पेशिऐलिटी वाले अस्पताल का रुख करते ही क्यों हैं जहां के खर्चे व मैंटिनैंस चार्जेज इतने भारी होते हैं.

मैक्स सरीखे लग्जरी अस्पतालों में हर तरह की सर्जरी के अलावा बड़ेबड़े मर्ज का इलाज करने के लिए बहुमंजिला होटल जैसी सुविधाएं दी जाती हैं. लोग मामूली बुखार से ले कर बड़े मर्ज के इलाज के लिए यहां आ कर भीड़ बढ़ाते हैं जबकि 60 प्रतिशत बीमारियां तो आप के नजदीकी अस्पताल में कर्म खर्चे पर ही ठीक हो सकती हैं. या फिर ऐसे अस्पताल का रुख करें जहां सिर्फ उसी विशेष बीमारी का इलाज होता हो. इस से अतिरिक्त टैस्ट करवाने या पैसे ऐंठने के विकल्प ही खत्म हो जाएंगे और फिर ये अस्पताल भी अपनी मनमानी के बिल नहीं जोड़ेंगे.

लोग महंगे अस्पतालों में जा कर लुट रहे हैं तो कोई भी यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि आखिरकार लोग वहां इलाज के लिए जाते ही क्यों हैं. यह एक संवेदनशील बात है जो सच के करीब लगती है, लेकिन इस का सीधा संबंध सरकार से भी है जो शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह होती है.

लोग महंगे अस्पतालों में जाते ही क्यों हैं, इस की जगह अगर यह सवाल पूछा जाए कि अस्पताल इतने महंगे क्यों हैं, तो जवाब की तरफ बढ़ने में सहूलियत रहेगी.

पेंच इतना भर नहीं है कि बड़े अस्पतालों की लागत और खर्च भी ज्यादा होते हैं और वे सरकार को टैक्स भी ज्यादा देते हैं और तमाम बड़े नेता व अफसरों का लगभग मुफ्त के भाव इन में इलाज होता है. सच यह है कि सरकार के निकम्मेपन के चलते पिछले 20 सालों से ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला खूब फलफूल रही है जिन में निचुड़ता आखिरकार आम आदमी ही है.

साल 2017 की शुरुआत में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ब्रैंडेड अस्पताल संचालकों के कान उन के नाम के साथ करतूतें गिनाते खींचे थे. वह भी एक मीटिंग में, तो उन की घुड़की से अस्पताल संचालक सहमे थे.

पर हर जगह ऐसा नहीं होता. वजह, स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरों के हवाले करने की जिम्मेदार सरकार  लूटखसोट पर अंकुश लगाने के लिए कोई पहल नहीं करती. अस्पतालों में दवाओं के दाम अलगअलग हैं, सेवाओं की फीस अलगअलग हैं, और इस के बाद भी कोई मरीज अगर लापरवाही के चलते मर जाए तो प्राइवेट अस्पतालों को आमतौर पर कोई सजा क्यों नहीं होती, इन सवालों के जवाब आंकड़ों से गिनाए जाएं तो समझ आता है कि सरकार की नीतियां भी कम दोषी या जिम्मेदार नहीं.

बात कम हैरत की नहीं कि देश में कुल 19,817 सरकारी अस्पताल हैं जबकि प्राइवेट अस्पतालों की तादाद 80,671 है. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के मुताबिक, देशभर में रजिस्टर्ड एलोपैथिक डाक्टरों की संख्या 10,22,859  में से महज 1,13,328 डाक्टर ही सरकारी अस्पतालों में हैं यानी 90 फीसदी डाक्टर प्राइवेट सैक्टर में हैं.

देश की 75 फीसदी आबादी इस लिहाज से प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर कर दी गई है. यानी घोषित तौर पर स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हो चुका है जिस की चांदी कोई दर्जनभर ब्रैंडेड अस्पतालों की शृंखला, जिसे चेन कहा जाता है, काट रही है. सरकार स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति महीनेभर में 100 रुपए भी खर्च नहीं करती है.

जब बुनियादी सेवाएं बिकने लगती हैं तो वे पूरी तरह पूंजीपतियों की मुट्ठी में कैद हो कर रह जाती हैं. चूंकि कोई कुछ नहीं बोलता, उलटे, बतौर फैशन, यह कहा जाता है कि अगर जेब में पैसा है तो महंगे अस्पतालों में इलाज से हर्ज क्या.

हर्ज यह है कि फिर सरकार अपने बजट में कटौती करने लगती है. साल 2000 से ले कर 2017 तक स्वास्थ्य का सरकारी बजट 2,472 करोड़ से बढ़ कर 48,871 करोड़ रुपए हुआ लेकिन इन्हीं 17 सालों में प्राइवेट अस्पतालों का कारोबार साढ़े 6 लाख करोड़ का रिकौर्ड आंकड़ा छू रहा है जो साल 2000 में केवल 50 हजार करोड़ रुपए था.

यह पैसा कोई आसमान से नहीं बरस रहा, न ही प्राइवेट अस्पतालों के कारोबारी अपनी जेब से लगा रहे, बल्कि यह आशीष जैसे आम मेहनतकश लोगों की जेबकतरी का नतीजा है जिस पर कभीकभार कोई बड़ा हादसा होने पर ही हायहाय मचती है. मैक्स ग्रुप का सालाना टर्नओवर 17 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है, कैसे है, यह भी आशीष जैसे पीडि़त नहीं समझ पाते कि सरकारी अस्पतालों पर जानबूझ कर पसराई गई बदहाली इस की बड़ी जिम्मेदार होती है जो यह कहती है कि अगर अपने जिंदा बच्चे को जिंदा चाहिए तो 50 लाख रुपए जमा करो.

हर कोई जानता है कि सरकारी अस्पताल में जाने पर डाक्टर के मिलने की गारंटी नहीं, लेकिन प्राइवेट अस्पताल में है जहां हर विजिट के 500 रुपए से ले कर 1,500 रुपए डाक्टर को देने पड़ते हैं. यह डाक्टर सरकारी अस्पताल के ही सुविधाभोगी चैंबर में बैठा या तो टीवी देखता रहता है या फिर वीडियो गेम खेल रहा होता है पर इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि चंद कदमों की दूरी नापने के 500 रुपए क्यों. इसी एक डाक्टर से अस्पताल उस की 20 विजिट पर 10 हजार रुपए रोज कमाता है. ऐसे 10 डाक्टर हों तो यह आंकड़ा एक लाख रुपए रोजाना का होता है.

लूटखसोट के इस कारोबार में हर कोई हाथ धो रहा है. हर छोटे शहर में कई नर्सिंगहोम होने लगे हैं जो कुछ दिन मरीज की जेब कुतरने के बाद इलाज पूरा न हो पाने पर उसे नजदीक के बड़े शहर में भेज देते हैं. बोलचाल की भाषा में इसे रैफर करना कहा जाता है. बडे़ जेबकतरे अपनी शानोशौकत, चमकदमक और हैसियत के मुताबिक जरूरतमंद मरीजों की बचीखुची रकम लूट लेते हैं. मरीज ठीक हो जाए तो ठीक, वरना कहने को परंपरागत भारतीय जुमला ‘हरि इच्छा’ तो है ही.

लैबों की लूट

 पैथोलौजी की दरें बंधी हैं. मामूली बुखार में भी कई तरह की जांचें प्राइवेट अस्पताल में गंगाडुबकी की तरह अनिवार्य होती हैं. कमीशनखोरी पैथौलाजी में भी खूब चलती है. तरहतरह के माफिया देशभर में सक्रिय हैं-किडनी माफिया, हार्ट माफिया, कैंसर माफिया और अब तो पेंक्रियाज माफिया तक होने लगे हैं.

देशभर में सरकारी बसें अब गांवदेहातों की तरफ ही चलती दिखती हैं क्योंकि घाटे के चलते वहां कोई प्राइवेट ट्रांसपोर्टर जाने को तैयार नहीं होता. ठीक यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का है. सरकार ने अस्पताल खोलना कम कर दिया है और अस्पतालों की बदहाली बढ़ा दी है ताकि मरीज घबरा कर प्राइवेट अस्पतालों की तरफ भागें.

कहने का मतलब यह नहीं कि प्राइवेट अस्पताल न हो, वे हों, पर लूटखसोट करने का हक उन से छीना जाना चाहिए.

अस्पतालों की लूटखसोट अब भी कम होगी, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. प्राइवेट स्कूलों की तरह उन्हें फीस कम करने के लिए सरकार मजबूर नहीं कर सकती और करेगी भी तो वे हजार नए रास्ते ढूंढ़ लेंगे. इन को ठिकाने लगाने का इकलौता रास्ता सरकार के पास यह है कि ये अस्पताल रोज का हिसाब सार्वजनिक करें जैसा कि जीएसटी लागू होने के बाद हर छोटेबड़े व्यापारी को करना पड़ रहा है, तभी इन की पूरी पोल खुलेगी.

मरीज भी अपने कानूनी अधिकारों को जानें

निजी अस्पतालों में जिस तरह से मरीजों को ठगा जाता है, उन से बचने के लिए हमारी न्यायिक प्रणाली में कुछ कानून भी हैं जिन का उपयोग कर के आप अपने मरीज के खर्चे और अस्पताल द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी ले सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ऋचा पांडे ने मरीज के हित में बनाए गए कानूनों की व्याख्या की.

एमआरटीपी एक्ट 1969 : इस के तहत कोई भी अस्पताल चाहे वह सरकारी हो या प्राइवेट, किसी भी खास जगह या दुकान से दवाइयां खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. इस कानून के तहत दवा विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 : हमारे देश में पेशेंट राइट नाम का कोई कानून नहीं है जबकि कई देशों में मरीजों के हित के लिए कानून बनाए गए हैं और सजा का भी प्रावधान है. लेकिन हम यहां स्वास्थ्य सेवा के उपभोक्ता होने के नाते देश के उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) कानून के तहत अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकते हैं.

सूचना का अधिकार कानून 2005 : 2005 के बाद जो आम लोगों के हाथों में हथियार आया है वह है, सूचना का अधिकार. इस कानून के तहत सब से पहले हमें डाक्टर और अस्पताल से ये जानने का अधिकार है कि मरीज पर किस तरह का उपचार चल रहा है, जांच में क्या निकल कर आया और दवाइयों से कितना सुधार है. मरीज के परिजन और मरीज इस की जानकारी अस्पताल से मांग सकते हैं. सूचना के अधिकार का उपयोग कर के आप जो डाक्टर आप का इलाज कर रहा है उस की योग्यता, डिगरी की जानकारी की मांग भी कर सकते हैं.

क्लिनिकल इस्टैब्लिशमैंट एक्ट 2010 : इस कानून को देश के सभी राज्यों ने लागू नहीं किया है. इस अधिनियम के तहत हर अस्पताल, क्लिनिक या फिर नर्सिंग होम को रजिस्टर करना अनिवार्य होता है. साथ ही, एक गाइडलाइन के तहत हर बीमारी के इलाज और टैस्ट की प्रक्रिया निर्धारित है. और ऐसा न करने पर इस एक्ट में जुर्माने का प्रावधान भी है.

प्रोफैशनल कंडक्ट ऐंड ऐथिक्स एक्ट : आईएमए ने भी डाक्टरों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं जिस में अगर आप को इमरजैंसी में इलाज की जरूरत है तो कोई डाक्टर इस के लिए आप को मना नहीं कर सकता जब तक फर्स्ट एड दे कर मरीज की स्थिति खतरे से बाहर न कर लें.

इंडियन जर्नल औफ मैडिकल ऐथिक्स : कोई मरीज नहीं चाहता कि उस की बीमारी का पता परिवार वालों को चले तो डाक्टर कभी भी उस बीमारी की परिवारवालों से चर्चा नहीं करेंगे. साथ ही, अस्पताल में ऐडमिट मरीज अपनी बीमारी के बारे में सैकंड ओपिनियन या दूसरे डाक्टर की सलाह ले सकता है. ऐसा करने से कोई भी अस्पताल या डाक्टर रोक नहीं सकता. लेकिन अगर दूसरे डाक्टर की ओपेनियन पहले से अलग है तो किसी भी डाक्टर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

किसी भी मरीज की सर्जरी के पहले यह डाक्टर की जिम्मेदारी है कि वह औपरेशन, सर्जरी के पहले मरीज के परिजन को संभावित खतरों की पूरी सही जानकारी दे और एग्रीमैंट लैटर पर उन के साइन ले. मरीज को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने या डाक्टर बदलने के लिए अस्पताल को समय से रहते इस की सूचना मरीज के परिवारवालों को देनी चाहिए. मरीज के केस से जुड़ी पूरी प्रक्रिया सभी खर्चे के ब्योरे सहित अस्पताल से मरीज व उस के परिजन ले सकते हैं.

– साथ में दीपनारायण तिवारी

बड़ा सवाल : स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और सतर्कता भी जरूरी

7 साल का प्रद्युम्न ठाकुर गुड़गांव के ख्यातिप्राप्त रायन इंटरनैशनल स्कूल की कक्षा 2 का छात्र था. रोजाना की तरह गत 8 सितंबर को मां ने प्यार से तैयार कर उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेजा. पिता द्वारा प्रद्युम्न को स्कूल में पहुंचाने के आधे घंटे के अंदर घर पर फोन आ गया कि बच्चे के साथ हादसा हो गया है.

प्रद्युम्न को संदिग्ध परिस्थितियों में ग्राउंडफ्लोर पर मौजूद वाशरूम में खून से लथपथ मृत अवस्था में पाया गया. देखने से स्पष्ट था कि उस की हत्या की गई है. उस पर 2 बार चाकू से वार किए गए थे. अत्यधिक खून बहने से उस की मौत हो गई.

प्रारंभिक जांच में बस कंडक्टर को दोषी पाया गया मगर बाद की जांच में उसी स्कूल की 11वीं कक्षा के एक छात्र को हिरासत में लिया गया. आरोपी छात्र ने स्वीकार किया कि महज परीक्षा की तिथि और टीचर पेरैंट्स मीटिंग की तारीख आगे बढ़वाने के मकसद से उस ने, जानबूझ कर, इस घटना को अंजाम दिया.

वैसे, इस केस में स्कूल प्रशासन पर सुबूत छिपाने के इलजाम भी लगे और एक बार फिर स्कूलों में बच्चों की लचर सुरक्षा व्यवस्था की हकीकत सामने आ गई.

बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता ऐसा ही मामला द्वारका, दिल्ली के एक स्कूल का है. यहां 4 साल की बच्ची के साथ यौनशोषण की घटना सामने आई. आरोप बच्ची की ही कक्षा में पढ़ने वाले 4 साल के बच्चे पर लगा.

छोटी सी बच्ची से बलात्कार का एक मामला 14 नवंबर को दिल्ली के अमन विहार इलाके में भी सामने आया. यह नाबालिग बच्ची अपने मातापिता के साथ किराए के मकान में रहती थी. आरोपी युवक उसी मकान में पहली मंजिल पर रहता था.

दिल्ली के एक स्कूल में 5 साल की बच्ची के साथ स्कूल के चपरासी द्वारा बलात्कार की घटना ने भी सभी को स्तब्ध कर दिया.

इन घटनाओं ने स्कूल परिसरों में बच्चों की सुरक्षा को ले कर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं. स्कूल परिसरों में मासूम लड़कियां ही नहीं, लड़के भी यौनशोषण के शिकार हो रहे हैं.

इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों, स्कूल प्रशासनों और मातापिता को सतर्क होने की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न घट सकें.

स्कूल की जिम्मेदारियां

कोई भी मातापिता जब अपने बच्चे के लिए किसी स्कूल का चुनाव करते हैं तो स्कूल की आधारभूत संरचना और वहां की पढ़ाई के स्तर को जांचने के साथ ही उन का विश्वास भी होता है जो उन्हें किसी विशेष स्कूल को अपने बच्चे के लिए चुनने हेतु प्रेरित करता है. ऐसे में स्कूल प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी बनती है कि वह न सिर्फ बेहतरीन शिक्षा उपलब्ध कराए, बल्कि मातापिता के विश्वास पर भी खरा उतरे.

माता पिता की जिम्मेदारियां

हर मातापिता का कर्तव्य है कि वे घरबाहर अपने बच्चों की सुरक्षा को ले कर सतर्क रहें. घर के बाद बच्चे सब से अधिक समय स्कूल में बिताते हैं. ऐसे में स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है.

–       मातापिता को चाहिए कि जिस स्कूल में वे बच्चे को दाखिल कराने जा रहे हैं, वहां की सुरक्षा व्यवस्था की वे विस्तृत जानकारी लें.

–       हमेशा टीचरपेरैंट्स मीटिंग में जाएं और बच्चों की सुरक्षा से संबंधित कोई कमी नजर आए तो टीचर से उस की चर्चा जरूर करें.

–       बच्चों से स्कूल में उन के अनुभवों के बारे में खुल कर चर्चा करें. अगर अचानक बच्चा स्कूल जाने से घबराने लगे या उस के नंबर कम आने लगें तो इन संकेतों को गंभीरता से लें और इन का कारण जानने का प्रयास करें.

–       बच्चों को अच्छे और बुरे टच के बारे में समझाएं ताकि यदि कोई उन्हें गलत मकसद से छुए तो वे शोर मचा दें.

– बच्चों को यह भी समझाएं कि यदि कोई बच्चा उन्हें डराधमका रहा है तो वे टीचर या मम्मीपापा को सारी बात बताएं.

– बच्चों को मोबाइल और दूसरी कीमती चीजें स्कूल न ले जाने दें.

– अगर आप के बच्चे का व्यवहार कुछ दिनों से बदलाबदला नजर आ रहा है, वह आक्रामक होने लगा है या ज्यादा चुप रहने लगा है तो इस की वजह जानने का प्रयास करें.

– रोज स्कूल से आने के बाद बच्चे का बैग चैक करें. उस के होमवर्क, क्लासवर्क और ग्रेड्स पर नजर रखें. उस के दोस्तों के बारे में भी सारी जानकारी रखें.

–       छोटे बच्चे को बस में चढ़नाउतरना सिखाएं.

–       बसस्टौप पर कम से कम 5 मिनट पहले पहुंचें.

–       आप अपने बच्चों को सिखाएं कि किसी आपातकालीन स्थिति में किस तरह के सुरक्षात्मक कदम उठाए जा सकते हैं. हो सके तो बच्चों को सैल्फडिफैंस के गुर, जैसे मार्शल आर्ट व कराटे वगैरा सिखाएं.

मनोवैज्ञानिक पहलू

तुलसी हैल्थ केयर, नई दिल्ली के मनोचिकित्सक डा. गौरव गुप्ता बताते हैं कि गुड़गांव के प्रद्युम्न केस की बात हो या 4 साल की बच्ची का यौनशोषण, इस तरह की घटनाएं बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति व गलत कामों के प्रति आकर्षण को चिह्नित करती हैं.

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आज लोगों के पास वक्त कम है. हर कोई भागदौड़भरी जिंदगी में व्यस्त है. संयुक्त परिवारों की प्रथा खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है. नतीजा यह है कि बच्चों का लालनपालन एक मशीनी प्रक्रिया के तहत हो रहा है. परिवार वालों के साथ रह कर जीवन की वास्तविकताओं से अवगत होने और टीवी धारावाहिक व फिल्में देख कर जिंदगी को समझने में बहुत अंतर है.

एकाकीपन के माहौल में पल रहे बच्चों के मन की बातों और कुंठाओं को समझना जरूरी है. मांबाप द्वारा बच्चों के आगे झूठ बोलने, बेमतलब की कलह और विवादों में फंसने, छोटीछोटी बातों पर हिंसा करने पर उतारू हो जाने जैसी बातें ऐसी घटनाओं का सबब बनती हैं क्योंकि बच्चे बड़ों से ही सीखते हैं.

स्कूल भी पीछे कहां हैं? स्कूल आज शिक्षाग्रहण करने का स्थान कम, पैसा कमाने का जरिया अधिक बन गए हैं. स्कूल का जितना नाम, उतनी ही महंगी पढ़ाई. जरूरी है कि शिक्षा प्रणाली में बाल मनोविज्ञान का खास खयाल रखा जाए.

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. यदि हम सब आज भी अपनी आने वाली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें और उसे सही ढंग से निभाएं तो अवश्य ही हम उन्हें बेहतर भविष्य दे सकते हैं.

साइबर बुलिंग

बुलिंग का अर्थ है तंग करना. इतना तंग करना कि पीडि़त का मानसिक संतुलन बिगड़ जाए. बुलिंग व्यक्ति को भावनात्मक और दिमागी दोनों ही तौर पर प्रभावित करती है. बुलिंग जब इंटरनैट के जरिए होती है तो इसे साइबर बुलिंग कहते हैं.

साइबर बुलिंग के कहर से भी स्कूली बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. हाल ही में 174 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 17 फीसदी बच्चे बुलिंग के शिकार हैं. स्टडी में पाया गया कि 15 फीसदी बच्चे शारीरिक तौर पर भी बुलिंग के शिकार हो रहे हैं. इस में मारपीट की धमकी प्रमुख है. लड़कियों की तुलना में लड़के इस के ज्यादा शिकार होते हैं.

अपराध के बढ़ते मामले चिंताजनक

एनसीआरबी द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2015 और 2016 के बीच बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की संख्या में 11 फीसदी बढ़ोतरी हुई है.

क्राइ यानी चाइल्ड राइट्स ऐंड यू द्वारा किए गए विश्लेषण दर्शाते हैं कि पिछले एक दशक में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध तेजी से बढ़े हैं. 2006 में 18,967 से बढ़ कर 2016 में यह संख्या 1,06,958 हो गई. राज्यों के अनुसार बात करें तो 50 फीसदी से ज्यादा अपराध केवल 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए है. उत्तर प्रदेश 15 फीसदी अपराधों के साथ इस सूची में सब से ऊपर है. वहीं महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश क्रमश: 14 और 13 फीसदी अपराधों के साथ ज्यादा पीछे नहीं हैं.

अपराध की प्रवृत्ति और कैटिगरी की बात करें तो सूची में सब से ऊपर अपहरण रहा. 2016 में दर्ज किए गए कुल अपराधों में से लगभग आधे अपराध इसी प्रवृत्ति (48.9 फीसदी) के थे. इस के बाद अगली सब से बड़ी कैटिगरी बलात्कार की रही. बच्चों के खिलाफ दर्ज किए गए 18 फीसदी से ज्यादा अपराध इस श्रेणी में दर्ज किए गए.

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