Download App

क्रौसफिट : फिटनैस का नया फंडा और युवाओं की बढ़ती दिलचस्पी

साल 1989 में आई फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया सुपरस्टार सलमान खान दिया था. सलमान खान ने फिल्म इंडस्ट्री को दिया फिट रहने का मंत्र. फिल्म ‘सूर्यवंशी’ में उन के सिक्स पैक ऐब्स ने लोगों को दीवाना बना दिया था.

इस के बाद तो फिल्म हो या टैलीविजन, हर जगह ऐसे मेल कलाकारों की डिमांड ज्यादा बढ़ गई, जिन का बदन गठीला होता था. बड़ा या छोटा परदा ही क्यों, शहरकसबों तक में जिम खुलने लगे थे, जहां नई उम्र के लड़के बौडी बनाने की मानो होड़ सी करने लगे थे. अब समय बदला है तो कसरत करने के तरीके भी बदलने लगे हैं. भारत में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के बढ़ते चलन और खिलाडि़यों की फिटनैस पर नौजवान नजर रखते हैं, उन के अपनाए गए तरीकों से ही वे खुद को फिट बनाए रखना चाहते हैं. इन्हीं तरीकों में से एक है क्रौसफिट तकनीक.

lifestyle

बात साल 2000 की है. अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सांताक्रूज में ग्रैग ग्लासमैन और लौरेन जेनई ने क्रौसफिट नाम से एक फिटनैस ब्रांड की शुरुआत की थी. इसे ट्रेनिंग करने का मौडर्न वर्जन भी कह सकते हैं.

क्रौसफिट की खासीयत यह है कि इस तकनीक में लोगों को कुदरत से जोड़ कर ट्रेनिंग दी जाती है यानी सभी ऐक्सरसाइज खुले आसमान के नीचे की जाती हैं. साथ ही, लोगों को ‘सेहतमंद खाएं और अच्छा खाएं’ की सलाह दी जाती है. इस के अलावा उन्हें किसी तरह का सप्लीमैंट फूड लेने से भी मना किया जाता है.

lifestyle

क्रौसफिट तरीके से ऐक्सरसाइज करने से लोग कम समय में अपनी बौडी को फिट रख सकते हैं. इस से मसल्स, स्टैमिना, शरीर की अंदरूनी ताकत यानी बौडी पावर को बढ़ाने में अच्छी मदद मिलती है. चूंकि ये ऐक्सरसाइज खुले आसमान के नीचे कराई जाती हैं, इसलिए लोगों को ताजा हवा और औक्सिजन भरपूर मात्रा में मिलती है.

क्रौसफिट तकनीक में लोगों को कार्डियो, वेट ट्रेनिंग, बौडी बैलैंस के साथ रनिंग और जंपिंग भी सिखाई जाती है. कुछ फिटनैस ऐक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर 30 मिनट तक क्रौसफिट तरीके से ऐक्सरसाइज कर ली जाए, तो इस से 5 सौ कैलोरी आसानी से कम की जा सकती है. क्रौसफिट तकनीक से आदमी तन से ही फिट नहीं रहता है, बल्कि मन से भी हिट रहता है.

lifestyle

इस तरह की कसरत के बारे में फरीदाबाद में ‘फिटकेयर इंडिया’ के कोच और स्टेट लैवल तक मुक्केबाजी मुकाबलों में हिस्सा ले चुके संजय कुमार ने बताया, ‘‘क्रौसफिट वर्कआउट में आमतौर पर हाई लैवल की ऐक्सरसाइज कराई जाती हैं, जो प्रोफैशनल वेटलिफ्टरों, जिमनास्ट या दूसरे खेलों के खिलाडि़यों को ट्रेनिंग देने में काम आती हैं.

‘‘लेकिन इस के भी कई लैवल हो सकते हैं, जिन में नए सीखने वालों को बौडी की ताकत, उम्र वगैरह को ध्यान में रख कर उन्हें कसरत कराई जाती है. जहां तक इस को सीखने की उम्र का सवाल है, तो यह कसरत करने वाले की फिटनैस पर निर्भर करता है. हां, 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चे इस को शुरू कर सकते हैं.

‘‘क्रौसफिट तकनीक से कसरत करने का तरीका जिम में कसरत करने से अलग होता है. इस में महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती है और चूंकि यह खुले मैदान में कराई जाती है, इसलिए कसरत करने वाले को कुदरती औक्सिजन भी मिलती रहती है.’’

lifestyle

क्रौसफिट तकनीक से कसरत करने में खानपान का भी खासा खयाल रखा जाता है. संतुलित भोजन करना बहुत जरूरी होता है, जिस से शरीर को सही ऊर्जा भी मिलती रहे.

मुंबई में ‘आइडियल बौडी फिटनैस’ नाम से जिम चला रही फिटनैस कोच अंजू गुप्ता ने बताया, ‘‘सिर्फ कसरत करने से कुछ नहीं होता. कसरत तो 20 फीसदी काम करती है, जबकि 80 फीसदी खानपान पर निर्भर करता है. सब से पहले तो यह तय करना होता है कि आप का टारगेट क्या है. उसी के मुताबिक खानपान के बारे में बताया जाता है.

lifestyle

‘‘बहुत से लोग पतला होने के लिए या शरीर को छरहरा बनाने के लिए खानापीना छोड़ देते हैं, जो गलत है. हमारे परिवारों में एक दिक्कत यह है कि लोग दिनभर काम करते हैं और रात को जब इकट्ठा होते हैं, तो पूरा परिवार एकसाथ खाना खाता है, जो पूरा मील होता है, जबकि रात के खाने को दिन के खाने के हिसाब से कम करना चाहिए, क्योंकि रात को हम आराम ज्यादा करते हैं.‘‘आमतौर पर बिस्तर पर जाने से 4 घंटे पहले हमें खाना खा लेना चाहिए. उस में भी प्रोटीन की मात्रा सही हो तो बेहतर है. खाने में सलाद का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा हो. दही खाने के बजाय दूध पी लें. दही दिन के खाने में ही लें.

‘‘एक बार में ज्यादा खाने से बेहतर है कि धीरेधीरे थोड़ेथोड़े अंतराल पर कम खाना खाएं. दिन में अगर 3 बार में खाना खाते हैं तो उसी मील को आप 6 बार कर दें.’’

चूंकि क्रौसफिट में कराई जाने वाली कसरतें ज्यादा ताकत मांगती हैं और थोड़ी मुश्किल होती हैं, इसलिए इन्हें शुरू करने से पहले अगर माहिर डाक्टर की सलाह ले ली जाए तो अच्छा होता है. अगर किसी को कोई बड़ी बीमारी है तो उसे उसी तरीके से ट्रेनिंग दी जाती है और खानेपीने का खयाल भी रखा जाता है.

मेहमान बनते वक्त इन बातों का हमेशा खयाल रखना चाहिए

अपने किसी जानपहचान वाले या सगेसंबंधी के यहां छुट्टियां मनाने जाना एक सुखद अनुभव है. भागदौड़ भरी जिंदगी में वहां कई ऐसे पल मिल जाते हैं, जब हमें चैन की सांसें मिलती हैं. आबोहवा बदलने से बहुत सी परेशानियां तो अपनेआप ही चली जाती हैं. चाहे कोई भी उम्र हो, सब के लिए कुछ न कुछ जरूर होता है. हम खुद को तरोताजा महसूस करने लगते हैं.

आसान शब्दों में कहें तो हमारा तनमन आने वाले समय के लिए रीचार्ज हो जाता है, इसलिए हमारा भी यह फर्ज है कि जिन लोगों के चलते हम को इतना सब मिला, उन के लिए हम भी थोड़ा सोचें.

चलिए, जिक्र करते हैं उन बातों की, जिन का हमें मेहमान बनते वक्त हमेशा खयाल रखना चाहिए:

* अगर हमारा कार्यक्रम लंबा है यानी 15-20 दिन या महीनेभर का है, तो कोशिश की जानी चाहिए कि उसी शहर में जाएं, जहां एक से ज्यादा रिश्तेदार हों. 2-2, 3-3 दिन तक बारीबारी से सब के यहां रुकते रहने से किसी पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा और सभी से मुलाकात भी हो जाएगी.

* छुट्टियों में किसी खास के पास जाने की आदत नहीं बनानी चाहिए. इस से उस के मन में आप के लिए नयापन लगातार कम होता जाता है, भले ही वह आप का मायका या पुश्तैनी घर ही क्यों न हो. समय के साथ लोगों की पसंद और प्राथमिकताएं लगातार बदलती हैं.

* बहुत से लोगों की आदत होती है कि किसी के भी घर पहुंच जाते हैं. लोग भले ही ऊपर से कुछ न कहें, लेकिन आज की गलाकाट प्रतियोगिता के जमाने में हर कोई इतना फ्री नहीं होता कि उस को बारबार किसी की खातिरदारी करने में दिलचस्पी हो, वह भी दूर के जानपहचान वालों की. खुद को किसी के सिर पर थोपने की लत अपनी इज्जत के लिए भी खतरा है.

* हम अपने घर में तो बच्चों को खूब रोकटोक करते हैं, लेकिन किसी के घर मेहमान बन कर जाते ही उन पर से ध्यान हटा लेते हैं. ऊपर से उन के सामने ही यह बोल कर कि ‘यह तो बहुत शरारती है’ एक तरह से उन को खुली छूट दे देते हैं.

मेजबान खुद आप को संभालने में जुटा हुआ है, ऐसे में अगर आप के बच्चे उस के घर में धमाचौकड़ी, तोड़फोड़ करते रहेंगे, तो झिझक के मारे वह उन को तो कुछ नहीं कहेगा, लेकिन आप के अगली बार न आने की बात मन में जरूर सोचने लगेगा.

* अकसर देखा गया है कि अपने से कम पैसे वाले मेजबान को मेहमान अपना रोब दिखाने का ‘सौफ्ट टारगेट’ समझ लेते हैं. आप कितने महंगे कपड़े पहनते हैं, कितने का खाते हैं. इस का गैरजरूरी हिसाब देना मेजबान के मन में आप के लिए नेगेटिव भाव पैदा करता है.

* मेजबान के बच्चों की तुलना ज्यादा नंबर लाने वाले अपने बच्चे से मत कीजिए. इस से वे बच्चे आप से कन्नी काटने लगेंगे. बच्चों को असहज देख उन के मांबाप भी असहज हो जाएंगे.

अगर आप मेजबान के बच्चों का सचमुच भला चाहते हैं, तो उन्हें कभीकभार दोस्त की तरह सलाह दे दें. अपने बच्चों के सामने इशारोंइशारों में छोटा कतई न दिखाएं.

* हर किसी का अपना स्वभाव होता है. हो सकता है कि किसी को ज्यादा लोगों से मिलनाजुलना पसंद न हो या वह आप से न मिलना चाहे. घर में जिन से आप की अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, उन तक ही सीमित रहिए. इस से आप को भरपूर स्वागत का अनुभव होगा.

* जिस मेजबान की जो हैसियत है, उसे उस की जरूरत के हिसाब से उपहार दें. सभी जगह आधा किलो मिठाई का डब्बा ले कर चलने की आदत सही नहीं है. हर कोई आप से प्यार किसी न किसी उम्मीद के साथ ही करता है, इस सच को स्वीकार करना सीखें.

* मेजबान से बहुत ज्यादा प्यार जताना वह भी केवल शब्दों के जरीए, उन के मन में आप की इमेज पर बुरा असर डालेगा. सच्चा प्यार है तो उस को अपने काम से दिखलाइए, वरना बदलाव सामान्य रखिए. खोखली बातें कुछ दिनों तक ही अच्छी लगती हैं.

इन बातों का ध्यान रखें और देखें कि हर मेजबान खुद ही कहेगा, ‘‘आप का हमारे घर में स्वागत है.’’

जनता के मुद्दों पर आखिर सरकार कब देगी जवाब

धीरेधीरे ही सही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंजे हुए नेता बनते जा रहे हैं. इस में उन की सियासी काबिलीयत का कितना योगदान है, इस पर बात करना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन जब से हालिया केंद्र सरकार के 2 सियासी दांवों नोटबंदी और जीएसटी ने बैकफायर किया है, तब से वे बड़े विपक्षी नेता के रूप में बड़ी तेजी से उभरे हैं.

यह सब हुआ है गुजरात के विधानसभा चुनावों की वजह से जहां वर्तमान सरकार से नाराज जनता सड़कों व गलियों में उतर कर केंद्र सरकार तक की चूलें हिला रही है.

राहुल गांधी ने जनता की इस नब्ज को सही पकड़ा है. बेरोजगारी के मुद्दे पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर हमला करते हुए कहा, ‘‘चीन में हर रोज 50000 नौकरियां पैदा होती हैं और भारत में केवल 450. ‘मेक इन इंडिया’ के बावजूद ये हालात हैं. किसान और गरीब को पानी नहीं मिलता, पूरा पानी चंद अमीरों को दिया जा रहा है.’’

एसोसिएशन फौर डैमोक्रेटिक रिफौर्म्स के एक सर्वे के मुताबिक गुजरात के वोटरों ने रोजगार, सार्वजनिक परिवहन सेवा, महिला सशक्तीकरण और सुरक्षा को ऊपर रखा है.

poltics

गांवदेहात के वोटरों ने भी रोजगार, फसलों की सही कीमत, खेती के लिए बिजली और सिंचाई सुविधा को बेहतर करने की मांग रखी.

केवल गुजरात की बात की जाए तो इस बार पाटीदार आरक्षण का मुद्दा बहुत बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है. हार्दिक पटेल समेत पाटीदार समाज के कई नेता भारतीय जनता पार्टी से खासा नाराज हैं.

लेकिन राहुल गांधी ने गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी के नुकसान को ले कर उन मुद्दों को हवा दी जो ज्यादातर जनता के गले की फांस बन चुके हैं.

इस के अलावा राहुल गांधी यह भी साबित करना चाहते हैं कि कांग्रेस उन वंचितों के साथ खड़ी है, जिसे ‘गुजरात मौडल’ की तथाकथित कामयाबी के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ है.

लेकिन इस बार गुजरात चुनावी घमासान के दौरान कुछ खास भी हुआ है, जो है जनता की एकजुटता.

केंद्र सरकार की तानाशाही नीतियों के चलते एक बात जो सामने आई है वह यह है कि जनता सरकारों के खुद पर थोपे गए मुद्दों से परेशान हो गई है. उसे मंदिरमसजिद, हिंदूमुसलिम, गौरक्षा, पाकिस्तान, कश्मीर वगैरह से कोई मतलब नहीं है, बल्कि वह तो केंद्र सरकार के ऊलजलूल फैसलों नोटबंदी और जीएसटी के कहर से एकजुट हो कर तिलमिलाई सी अपने सवालों के जवाब नरेंद्र मोदी और उन के सिपहसालारों से मांग रही है. कम से कम राहुल गांधी, हार्दिक पटेल आदि की सभाओं से तो ऐसा लगा.

पहले नोटबंदी पर बात करते हैं. भारत के 500 और 1000 रुपए के नोटों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को रात के 8 बजे अचानक चलन में नहीं रहने का ऐलान किया था. मीडिया ने जनता को समझाने के लिए इसे आसान भाषा में ‘नोटबंदी’ शब्द दिया था.

इस नोटबंदी का मकसद न केवल काले धन पर काबू पाना था, बल्कि देशभर में चल रहे जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था. लेकिन क्या नोटबंदी से सरकार के ये दोनों मकसद पूरे हो पाए

नोटबंदी होते ही जनता में अफरातफरी मच गई. बैंकों, डाकखानों के आगे नोट बदलवाने की लंबीलंबी लाइनें लग गईं. घंटों सड़कों पर खड़े रहने के बावजूद नोट बदलने की कोई गारंटी नहीं होती थी.

इतना ही नहीं, 18 नवंबर, 2016 को कारोबार चलाने के लिए पैसे नहीं होने की बात कहते हुए मणिपुर राज्य में अखबारों ने अपने दफ्तर बंद कर दिए थे.

इस सब के बावजूद भक्तों ने नरेंद्र मोदी के इस कड़े फैसले की तारीफ की थी, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों की परेशानी के बाद देश में रामराज्य आ जाएगा.

नोटबंदी के जरीए सरकार को भी पूरी उम्मीद थी कि नोटबंदी से बैंकों में जो पैसा आएगा वह सफेद होगा और जो बचा रहेगा यानी जमा न होगा उसे काला धन मान लिया जाएगा.

लेकिन ऐसा न हो पाया. सब से बड़ा नुकसान लोगों को लेनदेन के रूप में देखने को मिला. छोटेबड़े कारोबारी इस वजह से किसी तरह का लेनदेन नहीं कर पाए. जो कारोबारी नकद पर कारोबार करते थे, जब वे बेरोजगार हो गए, तो उन के यहां काम करने वाले लोग भी काम से हाथ धो बैठे.

यही हाल किसानों का भी हुआ. वे तो सरकार के इस फैसले के खिलाफ धरनेप्रदर्शन करते नजर आए.

सरकार के सामने जनता द्वारा पूछा गया लाख टके का सवाल यह था कि नोटबंदी के एक साल बाद भी क्या काला धन वापस लौटा  बैंकों में कितना पैसा आया  सरकार ऐसे सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं देना चाह रही और इस संबंध में ठोस आंकड़े नहीं दिखा रही है.

इस का नतीजा यह हुआ कि सभी विपक्षी दल पूरी एकजुटता से सरकार के नोटबंदी के फैसले को नाकाम और देश को पीछे धकेलने वाला साबित करने की कोशिश में लग गए.

सरकार को नोटबंदी के फैसले से कोई फायदा होता तो नहीं दिखा, पर उस ने फिर भी दूसरा दांव गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स का खेलना शुरू कर दिया जिस का छोटा नाम है जीएसटी.

1 जुलाई, 2017 को यह टैक्स लागू होते ही देश में अलगअलग जगहों पर लगने वाले 18 टैक्स खत्म कर दिए गए. मतलब 1 जुलाई, 2017 से पहले हम किसी भी सामान को खरीदते या सेवा को लेते समय अलगअलग तरह के टैक्स सरकार को देते थे जैसे कि सेल्स टैक्स, औक्ट्रौय सर्विस टैक्स वगैरह. 1 जुलाई, 2017 के बाद सिर्फ जीएसटी ही रहा. पर यह जितना आसान दिख रहा था उतना था नहीं.

वजह, यह एक भ्रामक शब्द था. एक टैक्सेशन के नाम पर 2 तरह का टैक्स लगा. एक सैंट्रल टैक्स और दूसरा स्टेट टैक्स.

इतना ही नहीं, भारत जैसे देश में जहां हर जगह कंप्यूटर मुहैया नहीं हैं, वहां जीएसटी जैसी कंप्यूटरीकृत व्यवस्था लागू कर डाली गई. बहुत से छोटे कारोबारियों को कंप्यूटर की एबीसी भी नहीं मालूम थी. वे तो सिर धुनते दिख रहे हैं.

किसानों के लिए यह नुकसान का सौदा रहा. कहने को तो खाद्यान्न चीजों पर जीएसटी लागू नहीं किया गया, लेकिन इन को उगाने में इस्तेमाल किए जाने वाले हर कैमिकल व कीटनाशक जैसी चीजों पर यह टैक्स जम कर लगा, जिस से खेतीबारी में आने वाला खर्च बढ़ गया.

poltics

जीएसटी का गड़बड़झाला धीरेधीरे इस कदर बढ़ता गया कि राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स का नया नाम दे दिया. गब्बर सिंह हिंदी फिल्म ‘शोले’ का वह दुर्दांत डाकू था जो अपने और खुद के गुरगों को पालने के लिए आसपास के गांवों से डाकू टैक्स वसूलता था.

उस का कहना था कि वह उन सब का रखवाला है और इस के लिए अगर वह गांव वालों से खानेपीने का सामान लेता है तो इस में गलत क्या है  मतलब जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ की सफाई. ऐसे मेहनती लोगों, जिन में छोटे कारोबारी, किसान, मजदूर और सब्जी बेचने वाले थे, को लूट कर गब्बर सिंह खुद को उन का मसीहा कहता था.

नोटबंदी और जीएसटी से वर्तमान सरकार की इमेज उस गब्बर सिंह जैसी हो गई है, जो भारत की जनता की गाढ़ी कमाई बैंकों में भर रही है जबकि लोगों को रोजमर्रा की चीजें खरीदने में परेशानी हो रही है. उसे अपना ही पैसा मांगने के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़ रहा है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव होने के मद्देनजर सरकार ने पेचीदा जीएसटी में नवंबर में काफी बदलाव किए हैं, लेकिन इस का फायदा होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि राहुल गांधी ने गुजरात के चुनावों को नया मोड़ दे दिया है.

उन्होंने इसे देशभर के कारोबारियों, किसानों, मजदूरों, कारखानेदारों की मुसीबतों का चुनाव साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पहली बार जनता सरकार की नाकामी पर उस से सवाल कर रही है.

अब तक के हुए 16 लोकसभा चुनावों की बात की जाए तो इन में ‘गरीबी हटाओ’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘रिजर्वेशन’, ‘राममंदिर’, ‘गौरक्षा’, ‘पाकिस्तान’, ‘कश्मीर’, ‘मुसलिम’ वगैरह बेबुनियादी मसलों पर चुनाव लड़े जाते रहे. जनता को समझ में ही नहीं आता था कि उस की तरक्की की बात कब की जाएगी.

लेकिन नरेंद्र मोदी के नोटबंदी और जीएसटी वाले बेतुके फैसलों ने जनता को एकजुट कर दिया है. कारोबारी हों या मजदूर अब सब समझ गए हैं कि वे एकदूसरे के पूरक हैं. अगर वे एकजुट हो जाएं तो देश में बेरोजगारी की समस्या खुदबखुद खत्म हो जाएगी.

वे सभी सरकार से सवाल कर रहे हैं कि उन की गाढ़ी कमाई की सरकार छीनाझपटी क्यों कर रही है  लोग अपना पैसा घर में नहीं रख सकते. क्यों  सरकार ने तो जैसे हर पैसे वाले को कालाबाजारी साबित कर दिया है.

जनता का यह गुस्सा अगले लोकसभा चुनावों में नया रंग ला सकता है. अगर कारोबारी, किसान, मजदूर, कारखानेदार एक हो गए तो नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, उन्हें फालतू के हवाहवाई मुद्दों में नहीं उलझा पाएंगे.

भले ही गुजरात के विधानसभा चुनाव लोकसभा जितने बड़े नहीं हैं, लेकिन वहां की जनता ने सरकार से जो सवाल पूछे हैं, उन के जवाब भारत का हर वह नागरिक जानना चाहता है, जो 18 साल से ऊपर का हो गया है और सही उम्मीदवार को वोट दे कर देश का भविष्य बदल सकता है.

15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ था. अगर चुनावों खासकर लोकसभा चुनावों की बात करें तो अब तक देश में 16 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. इन सभी चुनावों में नेताओं द्वारा जानबूझ कर ऐसे मुद्दे हवा में उछाले जाते थे, ताकि लोग उन के भ्रामक नारोंवादों में उलझ कर अपनी समस्याओं के बारे में जबान ही न खोल पाएं.

साल 1952 और 1957 में हुए पहले व दूसरे लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अच्छी इमेज के चलते आसानी से जीत लिए थे. पाकिस्तान बनने के बाद भारत खुद संभल रहा था. जनता अंगरेजों से मिले जख्मों पर मरहम ही लगा रही थी.

लेकिन साल 1962 में हुए तीसरे लोकसभा चुनावों से पहले जवाहरलाल नेहरू ने विकास के क्षेत्रों में देश के एक नए रूप की कल्पना की थी.

पंचवर्षीय योजना का उदय भी इसी समय हुआ था, जिस का मसकद कुदरती संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल कर के लोगों की जिंदगी में सुधार लाना था.

जनता ने भी जवाहरलाल नेहरू की शख्सीयत से ऊपर उठ कर मुद्दों को तरजीह दी थी. आजादी की लड़ाई की खुमारी अब उतर चुकी थी.

उस समय भारत के पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध नहीं थे. अक्तूबर, 1962 में भारत और चीन की लड़ाई भी एक नए मुद्दे के रूप में उभरी थी. इस से कांग्रेस की साख को नुकसान हुआ था.

poltics

साल 1966 में इंदिरा गांधी को जब देश का प्रधानमंत्री बनाया गया, तब कांग्रेस में भीतरी कलह बहुत ज्यादा थी. चीन और पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाइयों से भारत की अर्थव्यवस्था भी हिली हुई थी. इस से कुछ नए मुद्दे सामने आए थे, जिन में मिजो आदिवासी बगावत, अकाल, श्रमिक अशांति खास थे. रुपए में गिरावट के चलते भारत में गरीबी का आलम था. पंजाब में धार्मिक अलगाववाद के लिए भी आंदोलन चल रहा था.

5वीं लोकसभा के चुनाव कई माने में अहम थे. वे अपने समय से एक साल पहले 1971 में हो गए थे. इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ नारा दे कर चुनाव प्रचार किया था और 352 सीटों पर जीत हासिल की थी.

1971 में भारत पाकिस्तान की लड़ाई हुई थी और पाकिस्तान के 2 टुकडे़ हो कर बंगलादेश नया देश बन गया था. 12 जून, 1975 को चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1971 के चुनाव को गैरकानूनी करार दिया था.

‘गूंगी गुडि़या’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि उन्होंने देश में इमर्जैंसी लगा कर पूरे विपक्ष को ही जेल में डाल दिया था.

इस का नतीजा साल 1977 में हुए छठे लोकसभा चुनावों में देखने को मिला. कांग्रेस की इमर्जैंसी इन चुनावों में मुख्य मुद्दा थी. 4 विपक्षी दलों कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल और समाजवादी पार्टी ने जनता पार्टी के रूप में मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला किया था.

जनता को इमर्जैंसी में की गई ज्यादतियों की याद दिलाई गई थी. ‘गरीबी हटाओ’ के बजाय ‘इंदिरा हटाओ’ के नारे लगाए गए. विपक्ष की एकजुटता रंग लाई और कांग्रेस को पहली बार हार का सामना करना पड़ा.

जनता पार्टी ने यह चुनाव तो जीत लिया था, पर उस की सत्ता पर पकड़ अच्छी नहीं थी. इस से कांगे्रस दोबारा मजबूत होने लगी थी. वह इंदिरा की इमेज को दोबारा बनाने में जुट गई.

चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने महंगाई, सामाजिक समस्या और कानून व्यवस्था को तरजीह दी. उस का नारा ‘काम करने वाली सरकार को चुनिए’ काम कर गया और 1980 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव में उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं.

31 अक्तूबर, 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी. इस से कांग्रेस के पक्ष में हमदर्दी की लहर बन गई थी. जब चुनाव हुए तो राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने रिकौर्ड 404 लोकसभा सीटें जीतीं और राजीव गांधी की ‘मिस्टर क्लीन’ नेता की इमेज बनी. पर वे जल्दी ही बोफोर्स कांड, पंजाब के आतंकवाद, लिट्टे और श्रीलंका सरकार के बीच गृहयुद्ध जैसी समस्याओं से जूझने लगे.

90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद के मुद्दे पर रथयात्रा शुरू की गई.

10वीं लोकसभा में 1991 के चुनाव मध्यावधि चुनाव थे. इस के 2 खास मुद्दे मंडल आयोग की सिफारिशों का लागू करना और राम जन्मभूमि व बाबरी मसजिद विवाद थे. इन चुनावों को ‘मंडलमंदिर’ चुनाव भी कहा गया.

मंडल और राम मंदिर मुद्दे पर देश में एक तरह से दंगे हो गए थे. वोटरों का जाति और धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण किया गया था.

1996 के 11वें लोकसभा चुनावों तक हर्षद मेहता घोटाला, राजनीति के अपराधीकरण पर वोहरा की रिपोर्ट, जैन हवाला कांड और ‘तंदूर कांड’ मामलों ने पीवी नरसिंह राव सरकार की किरकिरी कर दी थी. कांग्रेस ने आर्थिक सुधारों की बात की, तो भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व व राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर वोटरों को रिझाया.

साल 1998 में 12वीं लोकसभा के चुनाव हुए. पिछले लोकसभा चुनावों के महज डेढ़ साल बाद. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.

कारगिल की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में सकारात्मक हवा बना रही थी. अटल बिहारी वाजपेयी 13 अक्तूबर को फिर प्रधानमंत्री बने. इस के बाद भारत में ‘फील गुड फैक्टर’ की लहर बनाई गई. ‘भातर उदय’ का नारा जोर पकड़ रहा था.

भारतीय जनता पार्टी को लग रहा था कि वह साल 2004 के लोकसभा चुनावों में दोबारा सत्ता पा लेगी. यह टकराव सीधा अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के बीच था. वैसे, जनता अपने आसपास के मुद्दों जैसे पानी की कमी, सूखे वगैरह के बारे में ज्यादा चिंतित दिख रही थी.

कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों की मदद और सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में 543 में से 335 सदस्यों का बहुमत हासिल किया. चुनाव के बाद इस गठबंधन को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का नाम दिया गया. सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया और वित्त मंत्री रह चुके डाक्टर मनमोहन सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई.

साल 2009 में 15वीं लोकसभा के हुए चुनावों में कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को दोबारा सरकार बनाने का मौका मिला. डाक्टर मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आपसी विरोधों के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बना कर चुनाव लड़ने की ठानी. उस ने कांग्रेस के राज में हुए भ्रष्टाचार को सब से बड़ा मुद्दा बनाया. ‘अच्छे दिन आएंगे’ का नारा दिया.

भारतीय जनता पार्टी की यह रणनीति काम कर गई. 330 सीटों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सब से बड़ा घटक और 282 सीटों के साथ भारतीय जनता पार्टी सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. इस सरकार के पिछले 3 सालों के काम और फैसले सब के सामने हैं.

शर्मनाक : जनता की कमाई, कुछ इस तरह ओहदेदारों ने उड़ाई

धर्म के ठेकेदार, भ्रष्ट नेता व घूसखोर अफसर भले ही हर दिन अंधी कमाई करते हों, लेकिन मेहनतकश व ईमानदार लोग गुजारे लायक पैसा भी कड़ी मशक्कत कर के कमा पाते हैं. इस के बावजूद बहुत से कौए, गिद्ध, चील, घुन व दीमक जैसे लोग गाढ़े पसीने की उन की कमाई नोचने में लग जाते हैं. मसलन, धर्म की आड़ में दाढ़ीचोटी वाले, रिश्वत के नाम पर सरकारी अफसर और मुलाजिम व सहूलियतों के नाम पर सरकारें जनता की जेबें हलकी करती रहती हैं.

हालांकि टैक्स के रूप में वसूले गए जनता के पैसे का पूरा व सही इस्तेमाल बेशक जनता को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए होना चाहिए, लेकिन अफसोस यह है कि ऐसा नहीं होता.

कुरसी पर काबिज नेता व अफसर जनता के पैसे को अपना समझते हैं व मनमाने तरीकों से खूब अनापशनाप खर्च करते हैं. दौरों व बैठकों की आड़ में सैरसपाटे, मौजमस्ती करने का चलन कोई नया नहीं है, लेकिन सरकारी फुजूलखर्ची रोकना जरूरी है.

society

माले मुफ्त दिले बेरहम

जनता का पैसा सरकारी दफ्तरों और महंगी गाडि़यों वगैरह पर बड़ी बेरहमी से खर्च किया जाता है. सरकारी इमारतों को आलीशान बनाया जाता है. सरकारी महकमे व उन के दफ्तर जनता को काबू करने, उन्हें सहूलियतें देने, नियमकानून चलाने के लिए हैं. उन्हें कामचलाऊ किफायती व सादा होना चाहिए, लेकिन वे सरकारी मंदिर बन रहे हैं. जनता की पीठ पर बेहिसाब बोझ डाल कर मजे लूटना कहां की अक्लमंदी है?

जनता के पैसे से तो जनता को ही सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसलिए पैसे की कमी से वक्त पर काम नहीं होता. टूटी सड़कें व पुरानी रेल पटरियां चटकी पड़ी रहती हैं. नदियों व रेलवे स्टेशनों पर पुराने, छोटे व कमजोर पुलों पर अकसर जानलेवा हादसे होते रहते हैं.

पैसे की कमी से एक ओर जनता के फायदे की बहुत सी सरकारी स्कीमें आधीअधूरी रह जाती हैं, वहीं दूसरी ओर जनसेवकों के लिए सरकारी इमारतों में कीमती फर्नीचर, कालीन, परदे वगैरह लगा कर उन्हें सजाया जाता है. इस तरह के खर्चे करना सरकारी खजाने को लुटाना है.

उत्तर प्रदेश की एक मुख्यमंत्री ने अपने विवेकाधीन कोष से 80 करोड़ रुपए बांटे, तो उस से अगले मुख्यमंत्री ने 5 सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा की रकम अपने चहेतों को बांट दी.

अपने राजनीतिक फायदे के लिए जनता के पैसों से धार्मिक यात्राएं कराई जाती हैं. धार्मिक आयोजनों के इश्तिहार दिए जाते हैं. लैपटौप व साइकिलें बांटी जाती हैं. ओहदेदारों की शानोशौकत में कहीं कोई कमी न आए, इस के लिए सरकारी घर व दफ्तर जनता के पैसों से महलों की तरह सजेधजे रहते हैं.

society

कोई लगाम नहीं

सरकारी कामकाज के नाम पर होने वाले भारीभरकम खर्च को घटाने पर कहीं कोई सख्ती होती नहीं दिखती. उस पर नकेल कसने के उपाय भी सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं, इसलिए वे कारगर होते नहीं दिखते. नतीजतन, जनता से वसूल की गई टैक्स की रकम का एक बड़ा हिस्सा गैरजरूरी खर्चों व भ्रष्टाचार की नदी में बह कर ओहदेदारों के पाले में चला जाता है.

सरकारी अंधेरगर्दी का बड़ा अजब हाल है. बहुत से सरकारी दफ्तर व स्कूल वगैरह खंडहरनुमा इमारतों में चलते हुए दिखते हैं. बरसों तक उन की मरम्मत के लिए रकम मंजूर नहीं होती. सालाना बजट में रखी गई तयशुदा रकम को खर्च करने की गरज से कई बार सरकारी संस्थाओं की अच्छीखासी मजबूत इमारतों को तोड़ कर नए सिरे से बना दिया जाता है. नैनीताल के एक सरकारी ट्रेनिंग सैंटर में यही हुआ था.

सरकारी दफ्तरों में रखरखाव व साजसज्जा के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, जबकि जनता की मांग वाले बहुत से जरूरी काम पैसे की कमी के चलते रुके रहते हैं. सरकारी महकमों में खरीदबिक्री व काम कराने में कमीशनखोरी आम है. इस में भी हेराफेरी की जाती है. कई काम सिर्फ कागजों पर ही होते हैं.

भ्रष्टाचार के चलते जनता अपने हक से बेदखल है. बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा व सेहत की बुनियादी सहूलियतें बस नाम की हैं.

बीते दिनों उत्तर प्रदेश में यही हुआ. गोरखपुर के मैडिकल कालेज में भुगतान रुकने से औक्सिजन सप्लाई रुकी और दर्जनों बच्चे मर गए थे, वहीं दूसरी तरफ बीते दिनों ऐलान हुआ था कि अयोध्या में राम की मूर्ति लगेगी. इस के अलावा इलाहाबाद के कुंभ मेले में 5 अरब रुपए खर्च होंगे.

ऐसे खर्चों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. करोड़ों रुपए की लागत से महाराष्ट्र में शिवाजी व गुजरात में सरदार पटेल की ऊंची व महंगी मूर्तियां लगेंगी. सवाल इस बात का है कि खर्च की फेहरिस्त में तरजीह किसे दी जाए? तरक्की व खुशहाली के लिए आखिर क्या जरूरी है और क्या गैरजरूरी है?

भाग्य, भगवान, धार्मिक अंधविश्वास व रूढि़यों में जकड़े ज्यादातर लोग यही गलती करते हैं. वे तालीम, सफाई व सेहत वगैरह की अनदेखी कर के मुंडन, तेरहवीं, कथा, कीर्तन व तीर्थयात्राओं के लिए कर्ज लेने में भी नहीं हिचकते, इसलिए देश में गरीबी, गंदगी जैसी समस्याएं मौजूद हैं.

यह है उपाय

कम पढ़ेलिखे लोग जागरूकता की कमी से बेवजह के कामों में पैसा खर्च करें, तो बात समझ में आती है, लेकिन अगर सरकारें भी उसी राह पर चलें, तो हैरत व अफसोस होना लाजिम है.

सरकार चाहे तो क्या काम नहीं हो सकता? मसलन, मोदी सरकार ने पुराने व बेअसर हो चुके बहुत से कानून खत्म कर के अच्छा काम किया है. बहुत से सरकारी महकमों में तो कोई खास काम ही नहीं होता. इसलिए अब वक्त आ गया है कि बेवजह चल रहे बहुत से सरकारी महकमे बंद किए जाएं, ताकि सरकारी खर्च व जनता की पीठ पर लदा टैक्स का बोझ घट सके.

अंधविश्वास : डायन के नाम पर हत्याएं और दर्द की 9 सच्ची घटनाएं

राजस्थान में डायन के नाम पर गांवदेहात की औरतों की लगातार हो रही दर्दभरी हत्याओं से अंधविश्वास पर लगाम लगाने में पुलिस प्रशासन की नाकामी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

प्रदेश में अंधविश्वास व अंधश्रद्धा के नाम पर हर साल दर्जनों जानें चली जाती हैं, पर सरकार चुप है. हाईकोर्ट के दखल से पुलिस प्रशासन में फौरी तौर पर ही थोड़ी हरकत दिखाई दी है.

दर्द की 9 सच्ची घटनाएं

उदलपुरा, भीलवाड़ा. करेड़ा तहसील के उदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिवार वालों ने छीन ली. पति के कम दिमाग होने के चलते वह घर और खेती का सारा काम संभाल रही थी, जो शायद उस की जेठानी को पसंद नहीं आया.

गीता पर डायन होने का आरोप लगा कर वह उसे घनोप माता ले गई. यहां नवरात्र में उसे 11 दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया.

गीता कुएं पर पानी पीने गई तो उसे धक्का दे कर कुएं में धकेल दिया गया. उस सूखे कुएं में एक पेड़ पर उस की लाश 10 दिनों तक अटकी पड़ी रही.

जेठानी ने गांव पहुंच कर गीता बलाई को चरित्रहीन बताते हुए यह कह दिया कि वह तो कहीं भाग गई है. गीता के भाई बालू ने उस की गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की.

जेठानी ने पंचायत में उसे मारने की बात कबूल ली, लेकिन पुलिस के सामने वह मुकर गई. पुलिस उस के खिलाफ कोई सुबूत नहीं जुटा पाई.

society

बालवास, भीलवाड़ा. यह घटना भी भीलवाड़ा जिले के बालवास गांव की है. नंदू देवी का परिवार पिछले 5 साल से गांव के बाहर जंगल में रहने को मजबूर है. पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, एक ओझा जिसे जादूटोने से मुक्ति दिलाने का देवता माना जाता है, ने इस का इलजाम गरीब नंदू देवी के सिर रख दिया. उस के बाद तो पूरे गांव ने उसे बुरी तरह पीटा.

अपने 3 बेटों के साथ अगर नंदू देवी किसी तरह जंगल में भाग कर नहीं जाती, तो शायद उसे मौत के घाट उतार दिया जाता.

जब भी नंदू देवी किसी अजनबी को देखती है तो हाथ जोड़ कर बस एक ही सवाल करती है, ‘‘मैं डायन होती तो क्या आज मेरा खुद का परिवार जिंदा रहता?’’

पुर रोड, भीलवाड़ा. भीलवाड़ा शहर के पुर रोड पर भोली 12 साल से अकेली रह रही थी. समाज के कुछ लोगों ने डायन बता कर उसे सताना शुरू किया. उस के परिवार ने 5 बार पंचायत बुलाई लेकिन 3 लाख रुपए खर्च करने के बाद भी पंच पटेलों ने उसे डायन की बदनामी से आजाद नहीं किया.

गांव की 5 औरतें भोली का साथ देने आईं, तो उन्हें भी डायन बता दिया गया. पढ़ीलिखी बहू हेमलता ने साथ दिया तो मायके वालों ने भी उस से नाता तोड़ लिया.

आज भोली अपने पति प्याराचंद के साथ अलग मकान में रहती है. पुलिस इस मामले में चुप्पी साधे हुए है.

बोरड़ागांव, भीलवाड़ा. बोरड़ागांव की 96 साल की गुलाबीबाई की दास्तां बहुत ही दर्दनाक है. पति की मौत के बाद उस के परिवार वालों ने उसे डायन बता कर दरबदर कर दिया.

गुलाबीबाई को डायन बताने वाले लोगों ने उस की 6 बीघा जमीन और पुश्तैनी मकान पर भी कब्जा कर लिया. 11 साल पहले गुलाबीबाई के भतीजों ने उसे पीटपीट कर गांव से बाहर निकाल दिया.

गुलाबीबाई के लिए कानूनी कार्यवाही में मदद कर रहे दूर के एक रिश्तदार बंसी का पुश्तैनी मकान बिक चुका है. मामला दर्ज होने के बावजूद पुलिस प्रशासन ने कभी भी गुलाबीबाई की हालत जानने की कोशिश नहीं की.

सेमलाट, भीलवाड़ा. ससुराल वालों के जोरजुल्म की शिकार पारसी पिछले 2 साल से पिता के घर में रह रही है. उस की शादी रायपुर के तिलेश्वर गांव के मुकेश से हुई थी. घर में 2 बकरियां क्या मरीं कि पारसी को डायन बना दिया गया. पीटपीट कर रात में ही उसे घर से बाहर निकाल दिया गया. परिवार ने थाने में मामला दर्ज कराया, पर पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की.

अगरपुरा, भीलवाड़ा. भीलवाड़ा जिले की सुहाणा तहसील के अगरपुरा गांव की विधवा रामगणी के परिवार पर डायन के नाम पर काफी जोरजुल्म हुआ. रामगणी के पति और 2 बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन हथियाने के लिए पड़ोसियों ने उस के साथ पूरे परिवार की औरतों को डायन ऐलान कर दिया.

रामगणी के बेटे उदयलाल ने थाने में मामला दर्ज कराया, लेकिन आरोपियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई. दबंग लोगों ने उस के पूरे परिवार को गांव से अलगथलग कर दिया.

टाणका गांव, राजसमंद. डायन करार दे दी गई नोजीबाई के जले हाथ आज भी उस पर हुए जुल्म की कहानी बयां करते हैं. डायन बता कर गांव के दबंगों ने उसे गरम सलाखों से दागा, जिस के निशान आज भी मौजूद हैं.

गांव के एक दबंग परिवार में एक मौत हुई और आरोप नोजीबाई पर लगा दिया गया. फिर जोरजुल्म का सिलसिला चल पड़ा. उस के हाथों को अंगारों से जलाया गया. पुलिस में शिकायत की गई, पर कार्यवाही जीरो रही.

थाली का तलागांव, राजसमंद. राजसमंद जिले के थाली का तलागांव की केशीबाई ने 3 साल से खुद को घर में ही कैद कर रखा है. 8 नवंबर, 2014 को पूरे गांव ने उसे डायन बता कर नंगा कर के गधे पर बिठा कर 3 गांवों में घुमाया था. वह रोतीगिड़गिड़ाती रही, लेकिन वहशी भीड़ उस का दर्द सुनने की जगह उस पर पत्थर बरसाती रही. उसे मरा हुआ समझ कर भीड़ रास्ते में ही फेंक गई. बाद में किसी ने अस्पताल पहुंचाया.

केशीबाई की जिंदगी तो बच गई, लेकिन उस घटना का सदमा दिल पर ऐसा लगा कि 3 साल में उस ने घर से बाहर कदम नहीं रखा. गांव में किसी आदमी ने फांसी लगा ली, तो उसे डायन बता दिया गया था. पुलिस तमाशबीन बनी रही.

देवलगांव, डूगंरपुर. एक भोपे के आदेश पर डूंगरपुर जिले के देवलगांव में 4 औरतों को डायन करार दे दिया गया. मार्च, 2016 में गांव की काली, कमला, बसंती और मीरा को उन के ही परिवार के लोगों ने डायन बता कर सताया. पंचायत और पुलिस तमाशबीन बनी रही.

भोपों के आदेश पर दर्जनों औरतों को डायन बता कर सताया जाता है. इन्हीं भोपों ने फरमान सुना कर भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ व राजसमंद जिलों में पिछले कुछ सालों में 105 से ज्यादा औरतों को डायन बना दिया. 22 औरतों को गांव से बाहर निकाल दिया और 8 औरतों को पीटपीट कर मार डाला गया.

उधर बवाल बढ़ने पर राजस्थान हाईकोर्ट और महिला आयोग ने संज्ञान लिया. कोर्ट ने भोपों के खिलाफ कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी है. साथ ही, निर्देश दिए कि भोपें किसी को डायन न बताएं.

इस आदेश व जांचपड़ताल का पलीता तब लगा जब पिछले दिनों उदयपुर जिले के बिचला फुला गांव में 70 साला चंपा को डायन बता कर पीटपीट कर उस की हत्या कर दी. भोपों इस चंपा के पड़ोसी शंकर लाल मीणा के परिवार ने इस काम को अंजाम दिया. यह आदमी अपने बीमार बेटे को ठीक करना चाहता था. पुलिस ने हर मामले की तरह इस की भी जांच शुरू कर दी.

क्या है कानून

society

राजस्थान डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 6(1) के अनुसार, खुद को भोपों या किसी अलौकिक या जादुई शक्ति का स्वामी बताना अपराध है. इस के लिए 3 साल की सजा देने का कानून है.

डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 6(3) के मुताबिक, कोई भी शख्स किसी को डायन के कहर से छुड़ाने के लिए कोई पूजापाठ करता है, तो उसे 3 से 7 साल की सजा देने का कानून है. डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 7 के मुताबिक, डायन के नाम पर जोरजुल्म करने से मौत होने पर इस से जुड़े हर शख्स को 7 साल से ताउम्र कैद की सजा देने का कानून है.

डायन के नाम पर किसी को सताने के खिलाफ कानून बने 2 साल हो गए हैं, मगर अब तक 50 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. इस के बावजूद न तो भोपों के खिलाफ कोई कार्यवाही हो रही है और न ही डायन के नाम पर जोरजुल्म कर चुके अपराधियों के खिलाफ. कानून को ठेंगा दिखा कर पूरे समाज में अंधविश्वास का जाल फैलाया जा रहा है. इस के बावजूद पूरा प्रशासन, पुलिस, राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन खामोश हैं.

मंदिरों के भरम में दलित और पूजापाठ में बढ़ती दलितों की दिलचस्पी

यह धर्म ही बताता है कि किसी भी जने का ऊंची या नीची जाति में पैदा होना उस के पिछले जन्म में किए गए पुण्य या पाप का नतीजा होता है. समाज में सब से निचले पायदान पर दलित हैं. सब से ऊपर ब्राह्मण, जिसे समाज का दिमाग कहा गया, इसी तरह से क्षत्रिय को छाती, बनिए को पेट या उदर और शूद्र को सब से नीचे पैरों का हिस्सा बताया गया. शूद्र वे हैं, जिन्हें आज बैकवर्ड कहा जाता है.

धार्मिक कहानियों के जरीए बारबार इस बात को बताया गया कि मंदिरों में पूजापाठ, धर्मकर्म करना अपने आने वाले जन्म को बेहतर बनाने के काम आता है. दलितों को 5वीं जाति यानी अछूत या जाति के बाहर के लोग कहा जाता था. उन को इस बात का बारबार एहसास कराया गया कि मंदिरों में पूजापाठ करना या धार्मिक ग्रंथ पढ़ना, यह सब उन के लिए नहीं है.

आज भी देश में तमाम मंदिर ऐसे हैं, जहां दलितों के लिए पूजापाठ करना मना है. कई बार ऐसे मंदिरों में प्रवेश को ले कर लड़ाईझगड़ा तक होता रहता है. मंदिरों में पुजारी के रूप में कहीं भी दलित नहीं हैं. धर्म के इसी भेदभाव का शिकार हो कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था.

आजादी के समय देश में धार्मिक लैवल पर भेदभाव और छुआछूत बड़े पैमाने पर था. यही वजह है कि दलित समाज को बराबरी का दर्जा देने के लिए सरकारी नौकरियों और चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक हलकों में रिजर्वेशन दिया गया. इस वजह से दलित समाज का एक बड़ा तबका माली और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गया.

society

लेकिन इस तबके ने दलित समाज की सामाजिक भलाई के लिए किसी तरह का कोई सहयोग नहीं किया. यह तबका पूरी तरह से इस कोशिश में लग गया कि वह सामाजिक रूप से दलित की पहचान से छूट जाए. साथ ही, इस तबके ने दलित तबके से अपना रिश्ता वहीं तक रखा, जहां उसे रिजर्वेशन की जरूरत पड़ी.

अपने नाम के आगे दलित जाति से अलग ‘सरनेम’ रख लिया. यही नहीं, यह तबका मंदिरों में जा कर पूजापाठ करने लगा. अपने घर में ही मंदिर बना लिया. यह तबका दलित समाज के कमजोर और गरीब तबके को यह समझाने लगा कि पूजापाठ का ही नतीजा है कि वह आज ऊंच तबके के बराबर खड़ा है.

दलितों का मंदिरों से कोई भला नहीं होगा, यह इस बात से समझा जा सकता है कि कारसेवा करने वाले दलित तो हैं, पर उन के साथ जब गैरदलित हों तो घर वाले उन का शुद्धीकरण कराते हैं. जब वे घर लौटते हैं, तो उन्हें गाय छूने को कहा जाता है और उन पर गंगाजल छिड़का जाता है.

अहमदाबाद के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर राजन प्रियदर्शी कहते हैं, ‘‘दलितों को गैरदलित पड़ोसी तक बनाने को तैयार नहीं हैं. गुजरात में कोई दलित अपनी मनपसंद जगह नहीं रह सकता. 98.1 फीसदी गांवों में दलितों को पूजापाठ करने के बावजूद गैरदलितों के यहां मकान किराए पर नहीं मिल सकता. मुझे खुद मजबूरन दलित बहुल इलाके में ही रहना पड़ा है.’’

2014 में पिलखुवा, उत्तर प्रदेश के शुकलान महल्ले में चंडी मंदिर में पूजा करने गए एक दंपती को पुजारी ने पूजा नहीं करने दी और अंजू वाल्मीकि व प्रमोद वाल्मीकि को रोक दिया. ये वहां करने ही क्या गए थे?

चंदौली, उत्तर प्रदेश के एक स्कूल से इसी अक्तूबर महीने में एक छात्रा को निकाल दिया गया, क्योंकि वह दलित जाति की थी. जब स्कूलों में उन्हें स्वीकारा नहीं जा रहा, जो सरकारी पैसों पर चल रहे हैं, जहां पूजापाठ नहीं हो रहा, तो मंदिरों में क्या स्वीकार होंगे और वहां दलितों को मिलेगा क्या?

कांग्रेस की नेता कुमारी शैलजा 2013 में जब द्वारका गईं, तो उन से पुजारी ने उन की जाति पूछी. पूर्व मंत्री कुमारी शैलजा कांग्रेस की दलित नेता

हैं, फिर भी उन्हें इस अपमान से मुक्ति नहीं मिली. अफसोस यह है कि कुमारी शैलजा मंदिर देखने नहीं गईं, वहां मत्था टेकने गईं और यही गलत है.

कुछ साल पहले नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया था, पर मधुबनी जिले में एक मंदिर में बतौर मुख्यमंत्री जाने के बावजूद उसे धोया गया और उस बिहार में उसी जीतनराम मांझी के संरक्षक रहे नीतीश कुमार आज उसी भाजपा के पैरों पर गिरे पड़े हैं, जो दलितों को अपनी औकात में रखना चाहती है और मंदिर उस की साजिश की धुरी हैं.

दलितों में बढ़ रहा पाखंड

धर्म के नाम पर चल रहे तमाम पाखंड चढ़ावा चढ़ाने के लिए होते हैं. दलित तबके के ‘नवहिंदुत्व’ में शामिल हुए लोग चढ़ावा चढ़ाने में सवर्णों से भी आगे होने लगे हैं. वे अपने घर पर पूजापाठ करने के लिए पुजारियों कोे बुलाने लगे हैं.

गरीब दलित के यहां जाने से आनाकानी करने वाले पुजारी यहां पूजा कराने आने लगे. इस की वजह यह नहीं थी कि पुजारी के मन से छुआछूत की भावना मिट गई थी. इस की वजह यह थी कि यहां मुंहमांगा चढ़ावा मिलने लगा था.

एक पुजारी ने बताया, ‘‘नवरात्र के दिनों में मैं एक ऐसे ही परिवार के यहां रोज पूजापाठ और हवन करने जाता था. उन लोगों ने हर दिन के लिए नए कपड़े दिए और कहा कि आप को रोज नए कपड़े पहन कर ही हवन करना है.

‘‘उन्होंने हमारी सोच से ज्यादा चढ़ावा दिया. नवरात्र के खत्म होने पर मुझे दक्षिणा दे कर विदा किया. हमें वहां इतना चढ़ावा मिला, जितना 5 सवर्ण परिवार मिल कर भी नहीं देते थे.’’

आजादी के कुछ सालों तक दलितों के तमाम संगठन ऐसे थे, जो यह बताते थे कि दलितों की हालत के लिए जिम्मेदार धार्मिक कुरीतियां, रूढि़वाद और छुआछूत है. जब तक यह है, तब तक दलितों को समाज में बराबरी का हक नहीं मिलने वाला.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद उत्तर प्रदेश में कांशीराम ने दलितों को जागरूक करने का काम किया. उन्हें यह लगता था कि राजनीतिक सत्ता हासिल कर के ही दलितों की तरक्की की जा सकती है.

कांशीराम के बाद बसपा की नेता मायावती को अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के बाद लगा कि जो सवर्ण मंच पर उन के पैर छू रहे हैं, उस से दलितों के हालात बदल जाएंगे, जबकि अगड़ों का मायावती के पैर छूना एक राजनीतिक मजबूरी थी. इस का सामाजिक बराबरी से कोई लेनादेना नहीं था.

पूजापाठ में दिलचस्पी

दलितों की ताकत समझ चुके अगड़ों को समझ आ गया था कि जातिवाद के सहारे ताकत हासिल करना मुश्किल है. ऐसे में दलितों को धार्मिक पाखंड से जोड़ा जाने लगा. जिन मंदिरों में कभी दलितों को घुसने नहीं दिया जाता था, वहां उन को प्रवेश दिया जाने लगा.

अब बहुत ही कम ऐसे मंदिर बचे हैं, जहां दलितों को प्रवेश न मिलता हो. दलितों को इस बात के लिए दिमागी रूप से तैयार किया जाने लगा कि वे अपने मंदिर खुद बना लें.

अब दलितों की नौजवान पीढ़ी इस धार्मिक पूजापाठ में ज्यादा दिलचस्पी रखने लगी है. यह पीढ़ी ऐसी है, जो थोड़ीबहुत पढ़ीलिखी है. वह किताबें

पढ़ लेती है. बड़े घरों को देख कर अपने घर में धार्मिक कहानियों की किताबें पढ़ने लगी है. किताबों में लिखी विधि के हिसाब से पूजापाठ करने लगी है.

गणेश, दुर्गा और सरस्वती की पूजा कर के उन की मूर्तियों के विसर्जित करते समय देखा जाता है कि बहुत सी दलित बस्तियों में यह शुरू हो चुका है.

पहले यह रिवाज शहरों में था, पर अब गांव और कसबों में भी दिखने लगा है. रातरातभर आरकेस्ट्रा पर फिल्मी गानों की धुनों पर भजन बजते हैं.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘हैरानी की बात तो यह है कि दलित और पिछड़े तबके के ये नौजवान पढ़ेलिखे होने के बाद भी धर्म की कहानियों में लिखी बातों को समझने की कोशिश नहीं करते. जिन चौपाइयों और कहानियों में दलित तबके की बुराई की गई है, उस लाइन को भी वह जोरशोर से पढ़ते हैं. वे यह भी नहीं सोचते हैं कि इन लाइनों में दलित तबके को ही गलत बताया गया है.

‘‘असल में इन नौजवानों का कुसूर भी नहीं है. पहले दलितों के लिए काम करने वाले संगठन बताते थे कि किनकिन धर्मग्रंथों में धार्मिक कहानियों के जरीए दलितों की बुराई की गई है. उस समय बहुत सारे दलित होलीदीवाली नहीं मनाते थे. ये त्योहार धार्मिक रूप

से हिंदुओं की अगड़ी जातियों के त्योहार माने जाते थे. राम की आलोचना होती थी. ये बातें आज की नौजवान पीढ़ी को नहीं पता. धर्म का प्रचार करने वाले धर्म की सचाई बताने वालों से अधिक संगठित हो गए हैं.’’

बढ़ रहे हैं धार्मिक मेले

दलित परिवारों में धार्मिक मेलों की अहमियत बढ़ रही है. आज भी गांवकसबों की औरतों को घूमनेफिरने की बहुत आजादी नहीं है. ऐसे में जब कोई उन के आसपास मेला लगता है, तो उन का वहां जाना आसान हो जाता है. ऐसे मेले किसी मंदिर या फिर धार्मिक जगह पर होते हैं.

यहां जाने वालों को 2 तरह का फायदा हो जाता है. वे मेला भी घूम लेते हैं और घरों की जरूरत का सामान भी खरीद लेते हैं. बीमारी से ले कर बाकी जरूरतों के लिए ये लोग मंदिरों, बाबाओं और ओझाओं की शरण में जाने से नहीं चूकते हैं. दलित औरतें पहले से ही धर्म को ले कर बहुत डरी रहती हैं. ऐसे में वे बाबाओं की हर बात मान लेती हैं.

लखनऊ के पास बाराबंकी जिले में एक बाबा की सीडी सामने आई, जिस में वे तमाम औरतों का बांझपन दूर करने का उपाय करते थे. कई सीडी में वे सैक्स करते भी दिखे. इन औरतों में बड़ी तादाद दलित औरतों की थी.

जागरूकता की कमी

धार्मिक मेलों में भगदड़ के समय मरने वालों में अगर देखें, तो उन में इन गरीब लोगों की तादाद सब से ज्यादा होती है. धार्मिक भरोसे के मामले में दलित सब से अधिक धर्मभीरु बनते जा रहे हैं. उन के धर्म से प्रभावित होने की वजह गरीबी है.

गरीब को लगता है कि यह सब उस के पिछले जन्म के किए गए बुरे कामों का नतीजा है. ऐसे में वे इस जन्म में अपने काम के प्रति धार्मिक हो जाते हैं.

अब दलित तबके के पास भी पैसा है. वह रोज न सही, पर 2-4 महीने में किसी न किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होता है. मीडिया भी ऐसी खबरों को प्रमुखता से दिखाता है.

कुंभ के मौके पर दलितों के लिए नहाने का अलग से इंतजाम होता है. यह बात इस तरह से सामने रखी गई, जिस से कुंभ में नहाने के बाद दलितों की सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. केवल पूजापाठ ही नहीं, अब दलित भी परिवार में किसी के मरने के बाद तेरहवीं जैसे भोज करने लगे हैं.

इस बारे में रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘छुआछूत और गैरबराबरी की बात धर्म की ही देन है. इस के बाद भी धर्म पर भरोसा बढ़ता जा रहा है. आज कई दलित इस बात के लिए आंदोलन करते हैं कि उन को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता.

‘‘सोचने वाली बात यह है कि जिस मंदिर में उन को बराबरी का हक नहीं दिया जाता, वहां जा कर वे क्या हासिल कर लेंगे? इस के बाद भी वे ऐसे मंदिरों में जाने की जिद करने लगते हैं.

‘‘असल में आजादी के बाद दलितों में जिस तरह से मंदिर का भरम कम हुआ था, वह अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के बाद फिर से उभर आया है.

‘‘अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के समय समाज दलितपिछड़ों और अगड़ों की जमात में खड़ा था, पर अब जातिवाद पर धर्म हावी हो गया है.’’

दलित नेता बने मार्गदर्शक

पहले दलितों के नेता अपने लोगों को जागरूक करते थे और खुद भी ऐसे आंडबरों से दूर रहते थे. डाक्टर भीमराव अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने अपनी निजी जिंदगी में पाखंड को कभी अहमियत नहीं दी. बाद में आने वाले नेताओं में पाखंड बढ़ने लगा. ये लोग न केवल मंदिर जाने लगे, बल्कि  खुद भी पूजापाठ, हाथ में अंगूठी, कलावा बांधने लगे. अपने पद को बचाए रखने के लिए हवन और जाप कराने लगे. इन को देख कर इन के समर्थक और अनुयायी भी उसी दिशा में बढ़ने लगे.

शहरों में बस चुके दलित केवल रिजर्वेशन का फायदा लेते समय ही दलित होने का प्रमाणपत्र दाखिल करते हैं. उस के बाद वे खुद को सवर्ण समझ लेते हैं. धर्म के कामों में लग कर वे ऊंची जातियों की बराबरी का सपना देखने लगते हैं.

दलितों को यह समझ नहीं आता कि मंदिरों में पूजापाठ करने से समाज में उसे बराबरी का दर्जा हासिल नहीं होगा. समाज में बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए उसे कुरीतियों से मुकाबला करना होगा. वे कुरीतियां धर्म के पाखंड के चलते ही समाज में फैली हुई हैं.

दलितों को समाज से छुआछूत और भेदभाव को दूर करना है, तो मंदिरों के भरम से उसे बाहर निकलना होगा. जब तक वह पापपुण्य, पिछला जन्म भूल कर  पढ़लिख नहीं जाएगा, तब तक समाज में गैरबराबरी का शिकार होता रहेगा.

कोई अपना : भाग 2

‘‘कोई बात नहीं, शालिनी, तुम एक कान से सुनो, दूसरे से निकाल दो. आजकल हर तीसरा इंसान बिकाऊ है. शायद वह सोचता होगा, तुम से बात कर के उस का काम आसान हो जाएगा.’’

मैं रो पड़ी थी. फिर कितने दिन सामान्य नहीं हो पाई थी. इसी बीच फिर खाने का दावतनामा मिला तो मैं ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘उन लोगों ने हम दोनों को खासतौर पर बुलाया है. छोटा सा काम शुरू किया है, उसी खुशी में.’’

‘‘मुझे किसी के काम से क्या लेनादेना है, आप ही चले जाइए.’’

‘‘ऐसा नहीं सोचते, शालिनी, वे हमारा इतना मान करते हैं, सभी एकजैसे नहीं होते.’’

पति ने बहुत जिद की थी, मगर मैं टस से मस न हुई. वे अकेले ही चले गए. जब पति 2 घंटे बाद लौटे तो कोई साथ था.

‘‘नमस्ते, भाभीजी,’’ एक नारी स्वर कानों में पड़ा, सामने एक युवा जोड़ा खड़ा था. ऐसा लगा, इस से पहले कहीं इन से मिल चुकी हूं.

‘‘आप हमारे घर नहीं आईं, इसलिए सोचा, हम ही आप से मिल आएं,’’ महिला ने कहा.

‘‘बैठिए,’’ मैं ने सोफे की तरफ इशारा किया.

उस के हाथ में रंगदार कागज में कुछ लिपटा था, जिसे बढ़ कर मेरे हाथ में देने लगी. मुझे लगा, बिच्छू है उस में, जो मुझे डस ही जाएगा. मैं ने जरा तीखी आवाज में कहा, ‘‘नहींनहीं, यह सब हमारे यहां…’’

‘‘यह मेरे बुटीक की पहली पोशाक है. हमारे मांबाप ने तो हमें दुत्कार ही दिया था. लेकिन सुनील भाईसाहब की कृपा से हमें कर्ज मिला और छोटा सा काम खोला. हमें आप लोगों का बहुत सहारा है, आप ही अब हमारे मांबाप हैं. कृपया मेरी यह भेंट स्वीकार करें,’’ कहतेकहते वह रो पड़ी.

मैं भौचक्की सी रह गई कि पत्थरों के इस शहर में कोई रो भी रहा है. वह कड़वाहट जिसे मैं पिछले कई सालों से ढो रही थी, क्षणभर में ही न जाने कहां लुप्त हो गई.

‘‘भाभीजी, आप इसे स्वीकार कर लें, वरना इस का दिल टूट जाएगा,’’ इस बार उस के पति ने बात संभाली. मैं ने उस के हाथ से पैकेट ले कर खोला, उस में गुलाबी रंग की कढ़ाई की हुई सफेद साड़ी थी.

‘‘आप घर नहीं आईं, इसलिए हम स्वयं ही देने चले आए. आप इसे पहनेंगी न?’’

‘‘हांहां, जरूर पहनूंगी, मगर इस की कीमत कितनी है?’’

‘‘वह तो हम ने लगाई ही नहीं, आप पहन लेंगी तो कीमत अपनेआप मिल जाएगी.’’

‘‘नहींनहीं, भला ऐसा कैसे होगा,’’ फिर मेरा स्वर कड़वा होने लगा था. मैं कुछ और भी कहती, इस से पहले मेरे पति ने ही वह साड़ी ले कर मेज पर रख दी, ‘‘हमें यह साड़ी पसंद है, शालिनी इसे अवश्य पहनेगी. और गुलाबी रंग तो इसे बहुत प्रिय है.’’

उन के जाने के बाद मेरा क्रोध पति पर उतरा, ‘‘आप ही बांध लेना इसे, मुझे नहीं पहनना इसे.’’

‘‘अरे बाबा, 2-3 सौ रुपए की साड़ी होगी, किसी बहाने कीमत चुका देंगे. तुम तो बिना वजह अड़ ही जाती हो. इतने प्यार से कोई कुछ दे तो दिल नहीं तोड़ना चाहिए.’’

‘‘यह प्यारव्यार सब दिखावा है. आप से कर्ज लिया है न उन्होंने, उसी का बदला उतार रहे होंगे.’’

‘‘50 हजार रुपए में न बिकने वाला क्या 2-3 सौ रुपए की साड़ी में बिक जाएगा? पगली, मैं ने दुनिया देखी है, प्यार की खुशबू की मुझे पहचान है.’’

मैं निरुत्तर हो गई. परंतु मन में दबा अविश्वास मुझे इस भाव में उबार नहीं पाया कि वास्तव में कोई बिना मतलब भी हम से मिल सकता है. वह साड़ी अटैची में कहीं नीचे रख दी, ताकि न वह मुझे दिखाई दे और न ही मेरा जी जले.

समय बीतता रहा और इसी बीच ढेर सारे कड़वे सत्य मेरे स्वभाव पर हावी होते रहे. बेरुखी और सभी को अविश्वास से देखना कभी मेरी प्रकृति में शामिल नहीं था. मगर मेरे आसपास जो घट रहा था, उस से एक तल्खी सी हर समय मेरी जबान पर रहने लगी. मेरे भीतर और बाहर शीतयुद्ध सा चलता रहता. भीतर का संवेदनशील मन बाहर के संवेदनहीन थपेड़ों से सदा ही हार जाता. धीरेधीरे मैं बीमार सी भी रहने लगी, वैसे कोई रोग नहीं था, मगर कुछ तो था, जो दीमक की तरह चेतना को कचोट और चाट रहा था.

एक सुबह जब मेरी आंख अस्पताल में खुली तो हैरान रह गई. घबराए  से पति पास बैठे थे. मैं हड़बड़ा कर उठने लगी, मगर शरीर ने साथ ही नहीं दिया.

‘‘शालिनी,’’ पति ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया, ‘‘अब कैसी हो?’’

मुझे ग्लूकोज चढ़ाया जा रहा था. पति की बढ़ी दाढ़ी बता रही थी कि उन्होंने 2-3 दिनों से हजामत नहीं बनाई.

‘‘शालिनी, तुम्हें क्या हो गया था?’’ पति ने हौले से पूछा.

मैं खुद हैरान थी कि मुझे क्या हो गया है? बाद में पता चला कि 2 दिन पहले सुबह उठी थी, लेकिन उष्ण रक्तचाप से चकरा कर गिर पड़ी थी.

‘‘बच्चों को तो नहीं बुला लिया?’’ मैं ने पति से पूछा.

‘‘नहीं, उन के इम्तिहान हैं न.’’

‘‘अच्छा किया.’’

‘‘सुनीलजी, अब आप घर जा कर नहाधो लीजिए, हम भाभीजी के पास बैठेंगे. आप चिंता मत कीजिए, अब खतरे की कोई बात…’’ किसी का स्वर कानों में पड़ा तो मेरी आंखें खुलीं.

‘‘अरे, भाभीजी को होश आ गया,’’ स्वर में एक उल्लास भर आया था, ‘‘भाईसाहब, मैं अभी उर्मि को फोन कर के आता हूं.’’ वह युवक बाहर निकल गया, पर मैं उसे पहचान न सकी.

‘‘तुम ने तो मुझे डरा ही दिया था. ऐसा लग रहा था, इतने बड़े संसार में अकेला हो गया हूं. बच्चों के इम्तिहान चल रहे हैं, उन्हें बुला नहीं सकता था और इस अजनबी शहर में ऐसा कौन था जिस पर भरोसा करता,’’ पति ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

मेरी आंखों के कोर भीग गए थे. ऐसा लगा मेरा अहं किसी कोने से जरा सा संतुष्ट हो गया है. सोचती थी, पति की जिंदगी में मेरी जरूरत ही नहीं रही. जब उन्हें रोते देखा तो लगा, मेरा अस्तित्व इतना भी महत्त्वहीन नहीं है. मैं 2 दिन और अस्पताल में रही. इस बीच वह युवक लगातार मेरे पति की सहायता को आता रहा.

जब अस्पताल से लौटी तो कल्पना के विपरीत मेरा घर साफसुथरा था. शरीर में कमजोरी थी, मगर मन स्वस्थ था, जिस का सहारा ले कर मैं ने पति से ठिठोली की, ‘‘मुझे नहीं पता था, तुम घर की देखभाल भी कर सकते हो.’’

‘‘यह सब उर्मि ने किया है. सचमुच अगर वे लोग सहारा न देते तो पता नहीं क्या होता.’’

‘‘उर्मि कौन?’’

‘‘वही पतिपत्नी जो तुम्हें एक बार साड़ी उपहार में दे गए थे…’’

‘‘क्या?’’ मैं अवाक रह गई.

‘‘पता नहीं, किस ने उन्हें बताया कि तुम अस्पताल में हो. दोनों सीधे वहीं पहुंच गए. तुम्हें खून चढ़ाने की नौबत आ गई थी, उर्मि ने ही अपना खून दिया. मैं उस का ऋण जीवन में कभी नहीं चुका सकता.

‘‘वही हमारे घर को भी संभाले रही. आज सुबह ही अपने घर वापस गई है. शायद, दोपहर को फिर आएगी.’’

‘‘और उस का बुटीक?’’

‘‘वह तो कब का बंद हो चुका है. उस के ससुर उन दोनों को अपने घर ले गए हैं. बैंक का कर्ज तो उन्होंने कब का वापस दे दिया. वे तो बस प्यार के मारे हमारा हालचाल पूछने आए थे. और हमें हमेशा के लिए अपना ऋणी बना गए.’’

अनायास मैं रो पड़ी और सोचने लगी कि मेरे पति ठीक ही कहते थे कि हमें तो बस अपना काम ईमानदारी से करना है. अच्छे लोग मिलें या बुरे, ईमानदार हों या बेईमान, बस, उन का हमारे चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. कुछ लोग हमें खरीदना चाहते हैं तो कुछ आदर दे कर मांबाप का दरजा भी तो देते हैं. इस संसार में हर तरह के लोग हैं, फिर हम उन की वजह से अपना स्वभाव क्यों बिगाड़ें, क्यों अपना मन भारी करें?

‘‘तुम्हारे कपड़े निकाल देता हूं, नहाओगी न?’’ पति के प्रश्न ने चौंका दिया. मैं वास्तव में नहाधो कर तरोताजा होना चाहती थी.

मैं ने अटैची से वही गुलाबी साड़ी निकाली, जिसे पहले खोल कर भी नहीं देखा था.  दोपहर को उर्मि हमारा दोपहर का भोजन ले कर आई. मैं समझ नहीं पा रही थी कि कैसे उस का स्वागत करूं.

‘‘अरे, आप कितनी सुंदर लग रही हैं,’’ उस ने समीप आ कर कहा. फिर थोड़ा रुक गई, संभवतया मेरा रूखा व्यवहार उसे याद आ गया होगा.

मैं समझ नहीं पाई कि क्यों रो पड़ी. उस प्यारी सी युवती को मैं ने बांह से पकड़ कर पास खींचा और गले से लगा लिया.

‘‘आप को दीदी कह सकती हूं न?’’ उस ने हौले से पूछा.

‘‘अवश्य, अब तो खून का रिश्ता भी है न,’’ मेरे मन से एक भारी बोझ उतर गया था. ऐसा लगा, वास्तव में कोई अपना मिल गया है. सस्नेह मैं ने उस का माथा चूम लिया. फिर उस ने मुझे और मेरे पति को खाना परोसा.

‘‘तुम्हारी ससुराल वाले कैसे हैं?’’ मैं ने धीरे से पूछा तो वह उदास सी हो गई.

‘‘संसार में सब को सबकुछ तो नहीं मिल जाता न, दीदी. सासससुर तो बहुत अच्छे हैं, परंतु मेरे मांबाप आज तक नाराज हैं. मैं तरस जाती हूं किसी ऐसे घर के लिए जिसे अपना मायका कह सकूं.’’

‘‘मैं…मैं हूं न, इसी घर को अपना मायका मान लो, मुझे बहुत प्रसन्नता होगी.’’

सहसा उर्मि मेरी गोद में सिर रख कर रो पड़ी. मेरे पति पास खड़े मुसकरा रहे थे.

उस के बाद उर्मि हमारी अपनी हो गई. उस घटना को 8 साल बीत गए हैं. हमारा स्थानांतरण 2 जगह और हुआ. फिर से अच्छेबुरे लोगों से पाला पड़ा, परंतु मेरा मन किसी से बंधा नहीं. उर्मि आज भी मेरी है, मेरी अपनी है. मैं अकसर यह सोच कर स्नेह और प्रसन्नता से सराबोर हो जाती हूं कि निकट संबंधियों के अलावा इस संसार में मेरा कोई अपना भी है.

वाई-फाई का पासवर्ड भूल गए हैं…तो ऐसे करें रिकवर

ज्यादातर लोग वाई-फाई नेटवर्क सेटअप करते वक्त अपने डिवाइस पर पासवर्ड डालते हैं और उसके बारे में भूल जाते हैं. लेकिन जब आप नया फोन खरीदते हैं, या फिर आपके घर आया हुआ कोई मेहमान अपने स्मार्टफोन से नेटवर्क एक्सेस करना चाहता है, तब आपको वाई-फाई पासवर्ड याद नहीं आता और फिर आप अपने वायरलेस राउटर को रीसेट करने पर मजबूर हो जाते हैं. लेकिन अब आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम यहां ऐसी टिप्स बता रहे हैं जिसके जरिए आप वाई-फाई का पासवर्ड रिकवर कर सकते हैं.

नीचे दिए सुझावों के जरिए आप तभी अपना वाई-फाई पासवर्ड रिकवर कर सकते हैं, जब आपका एक डिवाइस उस नेटवर्क से कनेक्टेड हो. एक बात ध्यान रखें कि यह तरीका तभी काम करेगा जब सिक्योरिटी, पर्सनल पर सेट किया हुआ हो. अगर आप किसी एंटरप्राइज नेटवर्क से कनेक्टेड हैं, या फिर औफिस वाई-फाई का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आप पासवर्ड नहीं जान पाएंगे.

अगर आप अपने वाई-फाई नेटवर्क का पासवर्ड भूल गए हैं तो इन सुझावों का इस्तेमाल करें.

विंडोज (Windows)

ऐसे तो आपको इंटरनेट पर कई ऐप्स मिलेंगे, जो दावा करते हैं कि उनकी मदद से आप वाई-फाई पासवर्ड रिकवर कर सकते हैं, पर Windows कंप्यूटर के लिए किसी ऐप की जरूरत नहीं पड़ती. अगर आपके पास पीसी का एडमिनिस्ट्रेटर एक्सेस ना हो, तो भी इन सुझावों का पालन करके वाई-फाई पासवर्ड जान सकते हैं.

वाई-फाई पासवर्ड रिकवर करने के लिए वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्टेड कंप्यूटर लें. फिर Start > Control Panel > Network and Sharing Centre मे जाएं.

Windows 8 कंप्यूटर पर आप Windows key + C टैप कर सकते हैं, इसके बाद सर्च पर क्लिक करें और Network and Sharing Center पर जाएं.

फिर लेफ्ट साइड बार में चेंज एडप्टर सेटिंग्स पर क्लिक करें.

आप जिस वाई-फाई नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं उस पर राइट-क्लिक करें. फिर स्टेटस पर जाएं.

वायरलेस प्रौपर्टीज पर क्लिक करें.

सिक्योरिटी टैब पर क्लिक करें.

अब आप वाई-फाई नेटवर्क का नाम और छिपा हुआ पासवर्ड देख पाएंगे. शो कैरेक्टर्स पर चेक करने से आपका सेव किया हुआ पासवर्ड दिखने लगेगा.

मेक (Mac)

आप Mac पर सेव किए हुए वाई-फाई पासवर्ड को Keychain Access ऐप के जरिए ढूंढ सकते हैं.

इसके लिए Applications/Utilities में जाएं.

Keychain Access खोलें. बायीं तरफ सबसे ऊपर की तरफ में Keychains के अंदर लिस्टिड System keychain में जाएं.

फिर दायीं तरफ टौप कौर्नर में बने सर्च बौक्स में नेटवर्क (SSID) का नाम टाइप करके वाई-फाई नेटवर्क को खोजें, जिसका पासवर्ड जानने की कोशिश कर रहे हैं.

सर्च रिजल्ट आने के बाद नेटवर्क के नाम पर डबल क्लिक करें. इसके बाद शो पासवर्ड के विकल्प पर क्लिक करें.

राउटर के जरिए

अगर आपके पास कोई Windows या Mac कंप्यूटर नहीं है जिसमें Wi-Fi के पासवर्ड सेव हो, या फिर आप अपने फोन या टैबलेट के जरिए पासवर्ड जानने की कोशिश कर रहे हैं तो आप राउटर के जरिए सेव किए हुए पासवार्ड को खोज सकते हैं. याद रखिए कि टैबलेट और मोबाइल फोन जब तक वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट नहीं होंगे आप पासवर्ड नहीं जान पाएंगे.

सबसे पहले ब्राउजर खोलें और राउटर के लोकल एड्रेस पर जाएं. सामान्य तौर पर यह http://192.168.1.1 होता है, हालांकि राउटर के ब्रांड पर भी URL निर्भर करता है, इसलिए सही एड्रेस जानने के लिए मैनुअली जाच लें या फिर आधिकारिक वेबसाइट पर देख लें.

यूजरनेम और पासवर्ड डालें. और यह भी अलग-अलग कंपनियों के लिए अलग-अलग होगा. हालांकि, डिफौल्ट के तौर पर MTNL और Airtel द्वारा दिए जाने वाले राउटर में यूजरनेम और पासवर्ड admin होता है. वहीं, अन्य राउटर्स में डिफौल्ट पासवर्ड password होता है. अगर यह कौम्बिनेशन काम नहीं करता तो आपको अपने राउटर की निर्माता कंपनी या इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से संपर्क करना होगा.

पहले इंटरनेट पर क्लिक करें, फिर वायरलेस पर. इस सेक्शन में आप सिक्योरिटी टाइप (WEP, WPA) और Key देख पाएंगे.

key फील्ड के बगल वाले बौक्स में वाई-फाई नेटवर्क का पासवर्ड उपलब्ध रहता है. और कई राउटर पर यह प्लेन टैक्सट में उपलब्ध रहता है.

अगर सारे उपाय काम ना करें…

अगर कोई भी उपाय काम नहीं करता तो आपको राउटर रीसेट करना पड़ सकता है. ऐसा तब तक नहीं करें जब तक आप किसी भी डिवाइस को नेटवर्क से कनेक्ट नहीं कर पा रहे हों. राउटर को रीसेट करना आखिरी उपाय है, क्योंकि इसके बाद आपको इंटरनेट कनेक्शन रीस्टोर करने के लिए पूरे नेटवर्क को फिर से सेटअप करना होगा.

यह तूफानी बल्लेबाज अब बैसाखियों के सहारे चलने पर हुआ मजबूर

अपनी तूफानी बल्लेबाजी से गेंदबाजों के दिलों में खौफ पैदा करने वाले पूर्व श्रीलंकाई क्रिकेटर सनथ जयसूर्या आज इतने लाचार हैं कि बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल पा रहे हैं. जयसूर्या को इन दिनों चलने के लिए बैसाखी की जरूरत पड़ रही है. अपने समय के धाकड़ बल्लेबाज और उपयोगी स्पिनर जयसूर्या के घुटने में दिक्कत हो गई, जिसके चलते उन्हें बैसाखी का सहारा लेना पड़ रहा है.

बैसाखी के साथ चलते हुए उनकी फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है.

sports

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘जयसूर्या अपने घुटनों के इलाज के लिए 2 जनवरी को मेलबर्न गए हैं. करीब एक महीने वहां रहकर वो घुटने की सर्जरी कराएंगे.’ सर्जरी के बाद उन्हें इसकी जटिलताओं से बचाने के लिए देखरेख में रखा जाएगा और यह भी देखा जाएगा कि सर्जरी के बाद फिर से पैरों पर खड़े होकर चल पाते हैं या नहीं.

क्रिकेट से संन्यास ले चुके जयसूर्या दो बार श्रीलंका क्रिकेट की चयन समिति के चेयरमैन रहे. 2017 में दक्षिण अफ्रीका और घर में भारत के हाथों श्रीलंकी की हार के बाद पद से इस्तीफा दे दिया था.

बता दें कि 48 वर्षीय जयसूर्या 2011 में रिटायर होने से पहले श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के मजबूत स्तंभ माने जाते थे. उनका खौफ गेंदबाजों में ऐसा था कि अच्छे-अच्छे गेंदबाजों की लाइन लेंथ बिगड़ जाती थी. इनके क्रिकेट करियर की बात करें तो इन्होंने 110 टेस्ट मैच 6973 रन बनाए, जिसमें 14 शतक और 3 दोहरा शतक शामिल है और 445 वनडे मैच में 13430 रन बनाए, जिसमें 28 शतक शामिल हैं. उन्होंने 31 टी 20 मैच खेले जिसमें 629 रन बनाए. वहीं जयसूर्या ने आईपीएल में भी हाथ अजमाया था, जिसमें इन्होंने 30 मैचों में 768 रन बनाए.

एसबीआई में है अकाउंट, तो मिल सकती है यह बड़ी छूट

भारतीय स्टेट बैंक ने नये साल की शुरुआत अपने ग्राहकों को ब्याज दरों में कटौती का तोहफा देकर की थी. लेकिन तोहफे मिलने का दौर अभी यहीं खत्म नहीं हुआ है. एसबीआई अब आपको एक और बड़ा तोहफा दे सकता है. इसकी बदौलत आप न सिर्फ बैंक में कम पैसे रख पाएंगे, बल्क‍ि चार्ज देने से भी बच जाएंगे.

मिनिमम बैलेंस चार्ज को लेकर एकबार फिर एसबीआई की आलोचना शुरू हो गई है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से भी उस पर दबाव बढ़ने लगा है. ऐसे में एसबीआई आपको मिनिमम बैलेंस रखने के साथ एक और बड़ी राहत दे सकता है.

सूत्रों के हवाले से पता चला है कि एसबीआई मिनिमम बैलेंस की सीमा 3000 से घटाकर 1000 रुपये करने की तैयारी कर रहा है. अगर ऐसा होता है, तो आपको शहरी भाग में 3000 रुपये मिनिमम बैलेंस रखने की शर्त को पूरा करना नहीं पड़ेगा. इसके बाद कम से कम 1000 रुपये आपके खाते में होने जरूरी होंगे.

इसके साथ ही एसबीआई एक और राहत अपने ग्राहकों को देने की तैयारी कर रहा है. इसमें बैंक मिनिमम बैलेंस को मासिक स्तर पर नहीं, बल्क‍ि त्रैमासिक स्तर पर रखने का नियम तय कर सकता है. मासिक की बजाय तिमाही बैलेंस के नियम से उन लोगों को फायदा होगा जिनके अकाउंट में किसी महीने कैश की कमी हो जाती है, लेकिन अगले महीने वह कैश जमा भी कर देते हैं.

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक एसबीआई ने अप्रैल और नवंबर 2017 के बीच मिनिमम बैलेंस मेनटेन नहीं करने की वजह से ग्राहकों से 1,772 करोड़ रुपये जुर्मना वसूला. चार्जेज की ये रकम बैंक की एक तिमाही के नेट प्रोफिट से भी ज्यादा थी. ये एक तरह का घोटाला था जिसे मद्देनजर रखते हुए एसबीआई यह बड़ा कदम उठा सकती है.

बता दें कि SBI ने जून में मिनिमम बैलेंस को बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया था. हालांकि, विरोध के बाद मिनिमम बैलेंस सीमा को मेट्रो शहरों में घटाकर 3000, सेमी-अर्बन में 2000 और ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 रुपये किया गया था. तब नाबालिग और पेंशनर्स के लिए भी इस सीमा को कम कर दिया गया था. पेनल्टी को 25-100 रुपये से घटाकर 20-50 रुपये के रेंज में लाया गया था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें