इस सप्ताह की शुरुआत में बौन सम्मेलन में सीरिया ने भी जलवायु परिवर्तन पर पेरिस घोषणापत्र का समर्थन कर दिया, जिससे तय हो गया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अलग राग से अमेरिका अकेला ऐसा देश बचेगा, जो इस इस वैश्विक मुद्दे पर अलग-थलग है. एक जून को रोज गार्डेन में जब ट्रंप ने इसके खिलाफ जाने की घोषणा की थी, तभी इसे बेईमानी की हद तक वादा खिलाफी माना गया था.

ऐसे में, बौन बैठक के देशों को यही कहा जा सकता है कि वे अपनी शपथ का सम्मान करें और उस ट्रंप को नजरअंदाज कर दें, जिन्हें समझा पाना संभव नहीं. उन्हें धरती को पर्यावरण संकट से बचाने वाले 2020 के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर विचार-विमर्श और ईमानदार प्रयास जारी रखने चाहिए. उम्मीद है कि विभिन्न देश, उनकी सरकारें और उनके संस्थान जैसा काम कर रहे हैं, उसमें स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में कल ट्रंप अलग-थलग दिखाई देंगे.

समझौते से बाहर रहने का ट्रंप का फैसला एक पहलू है. असली खतरा तो ऊर्जा संयंत्रों, ग्रीन हाउस गैसों, मीथेन उत्सर्जन, वाहनों की दक्षता क्षमता और कोयला संयंत्रों के सब्सिडी विस्तार पर उनके रुख से है, जो हालात को विपरीत दिशा में ले जाने वाले हैं. इस बीच जलवायु पर कुछ हास्यास्पद कदम भी सामने आए हैं.

सबसे ताजा व हास्यास्पद तो ट्रंप की वह पहल है, जिसमें टेक्सास की रेग्युलेटर कैथलीन हार्नेट को व्हाइट हाउस की पर्यावरण गुणवत्ता मानक कौंसिल का मुखिया बनाने की बात है. इस नियुक्ति पर अंतिम मुहर लगी, तो वह प्रशासन की वैसी नीति आगे बढ़ाती दिखेंगी, जो कार्बन-डाइऑक्साइड को इंसान के लिए हानिरहित और ‘संयंत्रों के लिए पौष्टिक’ बताती है.

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