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पद्मावत : अमेरिका में रानी पद्मावती की तरह सज धज कर महिलाएं पहुंची थिएटर

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं. इस फिल्म ने शुरुआती दिनों से ही बौक्स औफिस पर अच्छा कलेक्शन करना शुरू कर दिया है. भारत में जहां इस फिल्म को करणी सेना और राजपूत संगठनों का विरोध झेलना पड़ा है, वहीं देश के बाहर इस फिल्म को लेकर दर्शकों का क्रेज बढ़ता नजर आ रहा है. इस फिल्म को देखने के लिए लोगों का एक्साइटमेंट बढ़ता जा रहा है. फिल्म को देखने के लिए लोग ना सिर्फ अपने पूरे परिवार के साथ पहुंच रहे हैं बल्कि फिल्म को देखने के लिए महिलाएं बकायदा सज धज कर थिएटर तक जा रही हैं.

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें औरतें सजी धजी सिनेमाघरों के बाहर घूमर गाने पर डांस करती दिख रही हैं. वायरल हो रहा यह वीडियो सैन फ्रांसिस्को का है जहां कैलीफोर्निया के एक थिएटर के बाहर औरतें रानी पद्मावती के लुक में नजर आ रही हैं. यहां फिल्म देखने के लिए एक ड्रैस कोड जारी किया गया है.

इसके मुताबिक फिल्म देखने आईं औरतों को पद्मावती के रूप में तैयार होकर आना होगा. वीडियो में एक आदमी ढोल बजाता भी दिख रहा है. वीडियो में सभी औरतें ना सिर्फ पद्मावती के पूरे गेटअप में हैं बल्कि वह फिल्म के फेमस गाने घूमर पर भी डांस करती नजर आ रही हैं. वीडियो 30 जनवरी को ट्विटर पर शेयर किया गया है. इस वीडियो को काफी पसंद किया जा रहा है. इसे अब तक करीब 12 हजार से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

बता दें संजय लीला भंसाली की यह फिल्म सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित है. फिल्म में दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर और रणवीर सिंह लीड रोल में हैं. इस फिल्म के विषय को लेकर शुरुआत से ही करणी सेना ने विरोध किया. फिल्म भारी विरोध के बावजूद 25 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज हुई. इस फिल्म ने मात्र छह दिनों में भारत में बौक्स औफिस पर 143 करोड़ रुपए की कमाई कर ली है.

रिलायंस जियो ने जियोकौईन को लेकर जारी की चेतावनी, जरूर पढ़े

रिलायंस जियो (Reliance Jio) ने क्रिप्टो करेंसी को लेकर उपभोक्ताओं के लिए जरूरी सूचना जारी की है. रिलायंस की तरफ से कहा गया है पिछले कुछ दिनों में मीडिया रिपोर्टस और कई वेबसाइट से पता चला है कि JioCoin ऐप लौन्च होने की खबर आ रही है. इसके माध्यम से लोगों से क्रिप्टोकरेंसी में इनवेस्ट करने के लिए कहा जा रहा है. अब Reliance Jio ने क्रिप्टो करेंसी JioCoin को लेकर ग्राहकों को सूचना दी है कि जियो ने इस तरह के किसी भी ऐप को डाउनलोड करने से ग्राहकों को मना किया है.

ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा

कंपनी ने यह भी जानकारी दी कि इस तरह का कोई भी ऐप रिलायंस जियो की ओर से लौन्च नहीं किया गया है. जियो की तरफ से कहा गया है कि JioCoin के नाम से आने वाला ऐसा कोई भी ऐप फर्जी है और लोगों को सलाह दी जाती है कि ऐसे किसी भी ऐप से दूर रहे. इस तरह के ऐप से ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है. जियो की तरफ से यह भी कहा गया कि जो लोगों को गुमराह कर रहे हैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए अधिकार सुरक्षित हैं.

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प्ले स्टोर पर 22 ऐप उपलब्ध

पिछले दिनों व्हाट्सऐप पर एक लिंक देकर यह भी दावा किया गया था कि 31 जनवरी 2018 से पहले रजिस्ट्रेशन कराने वाले को फ्री में जियोकौइन मिलेगा. आपको बता दें कि इस तरह की कई रिपोर्ट सामने आई थी कि JioCoin क्रिप्टो करेंसी के नाम पर करीब 22 ऐप प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं. जिनमें Jio Coin, Jio Coin Buy और Jio Coin Crypto Currency जैसे ऐप शामिल हैं. इन ऐप को 10 हजार से लेकर 50 हजार लोगों ने डाउनलोड दिया गया है.

सभी दावों को झूठा बताया

आपको बता दें कि पिछले दिनों खबर आई थी कि टेलीकौम इंडस्ट्री में धमाल मचाने के बाद रिलायंस जियो (Reliance Jio) अपनी क्रिप्टोकरेंसी लाने का प्लान कर रहा है. यह भी बताया गया था कि इस प्रोजेक्ट को मुकेश अंबानी के बेटे आकाश अंबानी लीड करेंगे. कुछ वायरल मैसेज में जियो कौइन के 100 रुपए में लौन्च होने का भी दावा किया गया था. अब इन सभी खबरों को जियो की तरफ से झूठा बताया गया है.

‘रेस 3’ में पोल डांस करती दिखेंगी जैकलिन फर्नांडीज

इन दिनों बौलीवुड की हौट एक्ट्रेस जैकलिन फर्नांडीज की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं. इनमें वह पोल डांस की प्रैक्टिस करती नजर आ रही हैं. दरअसल, जैकलिन की अगली फिल्म ‘रेस-3’ में उनका एक पोल डांस शामिल किया जाएगा. जैकलिन फर्नाडिस के पोल डांस कौशल से प्रभावित होकर निर्माताओं ने ये निर्णय लिया है.

सोशल मीडिया पर अपने पोल डांस प्रशिक्षण सत्र के कई वीडियो साझा कर चुकीं जैकलिन अब फिल्म में भी अपना पोल डांस कौशल दिखाने जा रही हैं.

‘रेस 3’ के निर्देशक रेमो डिसूजा ने एक बयान में कहा, जैकलिन बहुत मेहनती हैं. यह देखना अद्भुत है कि उन्होंने इतने कम समय में पोल डांस में इतनी महारत आखिर किस तरह से हासिल कर ली है. डिसूजा ने आगे बताया कि हम सभी उनके पोल डांस कौशल की झलकियां देख चुके हैं. इसलिए हमने इसे ‘रेस 3’ में शामिल करने और इसे अगले स्तर पर ले जाने का एक अहम निर्णय लिया.

आपको बता दें कि जैकलिन फर्नांडीज ने अपने पोल डांस को मजबूत करने के लिए कई महीनों का कठिन प्रशिक्षण लिया है. ‘रेस 3’ में एक बार फिर जैकलिन और सलमान खान साथ दिखेंगे. इससे पहले दोनों ‘किक 2’ में साथ नजर आ चुके हैं. ‘रेस’ फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म ‘टिप्स फिल्म्स’ के बैनर तले रमेश तौरानी और सलमान खान फिल्म्स द्वारा निर्मित है. यह फिल्म वर्ष 2018 में ईद पर रिलीज होगी.

जानें क्यों स्लो काम कर रहा है आपका वाई-फाई

वाई-वाई एक ऐसी जरुरत बन चुकी है जिसके बिना औफिस, कौलेज या घर पर काम करना काफी मुश्किल है. आपने कई बार देखा होगा कि वाई वाई कनेक्शन औन होने के बावजूद इंटरनेट काफी स्लो काम करता है. अगर आपके वाई-फाई के साथ भी ऐसी दिक्कतें आ रही है तो अब परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आज हम आपको उन तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप अपने वाई-फाई के स्लो होने की वजह जान सकेंगे और उस समस्या का समाधान कर वाई-फाई कनेक्शन को आसानी से तेज कर पाएंगे.

तो चलिए डालते हैं इन तरीकों पर एक नजर-

राउटर पोजीशन

वाई-फाई की स्पीड राउटर की पोजीशन पर काफी हद तक निर्भर करती है. ऐसे में राउटर कहां रखा गया हैं, इस बात का ध्यान देना बेहद जरूरी है. कई बार राउटर को जमीन पर रखने या उसके सामने किसी सामान को रखने से या कुछ मीटर का अंतर भी वाई फाई का सिग्नल आपके डिवाइस तक सही से नहीं पहुंच पाता. यहां ध्यान रखना जरूरी है कि आपका राउटर जितनी ऊंचाई पर रखा होगा उतना ही मजबूत सिग्नल आपके डिवाइस तक पहुंचेगा.

राउटर के सिग्नल में क्यों आ रही है रुकावट

वाई फाई सिग्नल के लिए कंक्रीट और मेटल दुश्मन की तरह है. वाई-फीई सिग्नल के लिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि राउटर के सामने किसी मेटल का सामान ना रखा हो. इसके साथ ही राउटर को बेसमेंट में लगाने से बचना चाहिए क्योंकि दीवारों को भेदना सिग्नल के लिए मुश्लिल होता है.

राउटर से डिवाइस की दूरी

राउटर से डिवाइस की दूरी जितनी बढ़ती जाएगी उतना ही वाई-फाई का सिग्नल कमजोर होता जाएगा. राउटर 360 डिग्री एंगल कवर करता है. आसान भाषा में कहें तो राउटर से हर दिशा में एक बराबर सिग्नल निकलते हैं, ऐसे में किसी एक दिशा में बैठने से कोई अंतर नहीं आएगा लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि जिस दिशा में आपका डिवाइस है वहां कोई रुकावट तो नहीं आ रही है.

रिपीटर

अगर आपका घर बड़ा है तो आपको इस बात का ध्यान रखने की जरुरत है कि आपका राउटर ज्यादा जगह कवर करें. ऐसे में रिपीटर एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है जिसकी मदद से सिग्नल को मजबूत किया जा सकता है.

लोगों की मौजूदगी से कमजोर होता है सिग्नल

मानव शरीर में 60 फीसदी से ज्यादा पानी होता है और पानी रेडियो सिग्नल को कमजोर करता है. हम ऐसा नहीं कह रहे हैं कि अपने घरों से लोगों को निकाले लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ज्यादा लोगों की मौजूदगी से सिग्नल कमजोर होता है.

जन्मदिन विशेष : एक हादसे ने बदल दी थी प्रीति जिंटा की पूरी जिंदगी

बौलीवुड में डिंपल गर्ल के नाम से फेमस एक्ट्रेस प्रीति जिंटा को उनकी बेहतरीन एक्टिंग के लिए जाना जाता है उन्होंने अपने करियर में ज्यादातर महिला प्रधान फिल्में कीं. मौडलिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रीति ने हिंदी के अलावा तेलुगु, तमिल, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में भी फिल्में कीं. उन्होंने बौलीवुड में क्या कहना, मिशन कश्मीर, कल हो ना हो, संघर्ष जैसी फिल्मों में काम किया. प्रीति का जन्म 31 जनवरी (1975) को शिमला में हुआ. प्रीति का जन्म एक आर्मी परिवार में हुआ था. इनके पिता की एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. उस समय प्रीति महज 13 साल की थीं.

इस हादसे से आहत उनकी मां दो साल तक बिस्तर पर ही रहीं. उस कार दुर्घटना ने प्रीति के जीवन को पूरी तरह बदलकर रख दिया. हंसती, खिलखिलाती, मौज करने वाली प्रीति के कंधों पर पूरे घर की जिम्मेदारी आ गई. उनके दो भाई भी हैं- दीपांकर और मनीष. दीपांकर प्रीति से बड़े हैं. वह भारतीय थलसेना में अधिकारी हैं, जबकि मनीष उनसे छोटे हैं और कैलिफोर्निया में रहते हैं. अभिनेत्री ने अपनी प्राथमिक शिक्षा शिमला के कौन्वेंट औफ जीजस एंड मेरी बोर्डिग स्कूल में पूरी की.

प्रीति ने अपने करियर की शुरुआत मौडलिंग से की थी. वह फिल्मों में आने से पहले पर्क चौकलेट और लिरिल साबुन के ऐड में भी दिखाई दीं थी. प्रीति ने 1997 में शेखर कपूर की फिल्म ‘तारा रम पम पम’ को साइन किया, इस फिल्म में उनके अपोजिट ऋतिक रोशन को साइन किया गया था, लेकिन कुछ वजह से यह फिल्म बन नहीं सकी.

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इसके बाद उन्होंने साल 1998 में मणिरत्नम की फिल्म दिल से बौलीवुड में डेब्यू किया. इस फिल्म में प्रीति बौलीवुड स्टार शाहरुख खान के साथ नजर आईं. फिल्म में प्रीति की एक्टिंग को काफी पसंद किया गया. फिल्म के लिए प्रीति को फिल्मफेयर का बेस्ट डेब्यू एक्ट्रेस अवौर्ड भी मिला. वह अपने करियर में सोल्जर, क्या कहना, चोरी चोरी चुपके चुपके, अरमान, कोई मिल गया, कल हो ना हो, वीर जारा जैसी सफल फिल्मों में काम कर चुकी हैं.

प्रीति जिंटा के बारे में कुछ बातें

  • प्रीति का असली नाम प्रीतम जिंटा है. उन्होंने फिल्मों में कदम रखने के दौरान अपना नाम बदल कर प्रीति जिंटा कर लिया था.
  • प्रीति ने साल 2016 में अपने बौयफ्रेंड जीन गुडइनफ से शादी की थी. इससे पहले प्रीति बिजनेसमैन नेस वाडिया के साथ रिलेशनशिप में थीं लेकिन कई साल डेट करने के बाद दोनों एक दूसरे से अलग हो गए थें.
  • प्रीति छोटे पर्दे पर भी काम कर चुकी हैं. वह कलर्स चैनल के रिएलिटी शो गिनीज वर्ल्ड रिकौर्ड-अब इंडिया तोड़ेगा में भी नजर आईं. प्रीति साल 2015 में डांस रिएलिटी शो नच बलिए में जज की भूमिका निभा चुकी हैं.
  • प्रीति जिंटा इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की क्रिकेट टीम किंग्स इलेविन पंजाब की सह-मालकिन हैं।

शर्मनाक : आसान नहीं थी उस मासूम की जिंदगी

वह एक आम लड़की थी. दूसरी लड़कियों की तरह वह भी मासूम थी, भोली थी. उस के मुखड़े पर मुसकराहट व आंखों में खूबसूरत सपने थे. वह भी गांवदेहात की दूसरी लड़कियों की तरह ही अपनी जिंदगी को भरपूर जी लेना चाहती थी. इस के लिए वह खूब मेहनत भी कर रही थी.

उस लड़की के मातापिता में बनती नहीं थी. लिहाजा, मां उसे अपने साथ नानी के घर ले गई थी. नानी उसे अपने पास नहीं रहने देना चाहती थीं. वे उस से आएदिन मारपीट करती थीं. अब वह मासूम कहां जाए?

8वीं जमात के बाद ही वह लड़की बालाघाट के आदिवासी छात्रावास में रहने लगी थी, जहां पंकज डहरवाल नामक एक कोचिंग टीचर उसे छेड़ने लगा था. उस लड़की ने सिटी कोतवाली में इस की रिपोर्ट भी की थी. उसे बाल संरक्षण समिति ने भोपाल के बालगृह भेज दिया था.

भोपाल के बालगृह से लड़की का पिता उसे इसी साल ले आया था. शायद पिता का स्नेह जाग गया था. उस लड़की की उम्र इतनी ही थी कि पिता का प्रेम उमड़ पड़ा था. लड़की पिता के पास रहते हुए बालाघाट में म्यूनिसिपल स्कूल में साइंस सैक्शन में दाखिला लेने वाली एकमात्र छात्रा थी.

वह होनहार थी, पर समय को कुछ और ही मंजूर था. उस की चढ़ती उम्र पर एक बार फिर पंकज डहरवाल की नजर पड़ी. और वह जाने कैसे उसी पंकज के जाल में जा फंसी, जिसे वह पहले पुलिस में छेड़छाड़ का आरोपी बना चुकी थी.

क्या किसी साजिश के तहत पंकज ने उसे अपने जाल में फांस लिया होगा? इस बात को सामान्य तौर पर देखने पर यही लगता है कि महज 17 साल की इस छात्रा पर जाने कितने लोगों की नजर रही होगी. वजह, वह ऐसे मातापिता की औलाद थी, जो साथ में नहीं रहते थे.

3 सितंबर की रात को वह लड़की कोचिंग टीचर पंकज डहरवाल के कमरे में फांसी के फंदे पर झूलती पाई गई. उसी रात पंकज से उस का झगड़ा हुआ था. लड़की ने कहा भी था कि वह खुदकुशी कर लेगी.

किस वजह से वह लड़की अकेली ही उस कोचिंग टीचर के कमरे में हफ्तेभर से रह रही थी? वहां उस के साथ क्या घट रहा था? ऐसे सवालों के जवाब देने को कोई तैयार नहीं है.

पुलिस ने घटना की रात के बाद पंकज को दिनभर कोतवाली में बिठाया. आगे क्या हुआ, अखबारों में कुछ भी नहीं आया. कभीकभार तो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट भी गलत होती है या मौत पर कुछ भी रोशनी नहीं डाली जाती है.

लड़की के पिता ने कहा कि लड़की को मारा गया है. इस पर पुलिस चुप है. पंकज पर क्या कार्यवाही हुई, इस पर अखबारों में कुछ भी नहीं छपा है. बालाघाट में कोई महिला संगठन सक्रिय नहीं है कि एक मासूम छात्रा के साथ क्या हुआ, इस पर सवाल उठाता.

बालाघाट एक बेहद पिछड़ा जिला है. जनता में किसी तरह की जागरूकता नहीं है. पत्रकारिता का लैवल भी यहां उतना तीखा नहीं है. अकसर लड़कियों की हत्या के बाद पुलिस मामले को रफादफा कर देती है. लड़की के घर वाले भी यह सोच कर चुप हो जाते हैं कि अब तो वह वापस आने से रही.

इन सब बातों का फायदा उठा कर अपराधी अपराध कर के बच जाते हैं. वैसे भी लड़कियों की तस्करी के मामले में छिंदवाड़ा व बालाघाट जिले आगे हैं. कोई इन मासूम लड़कियों पर हो रहे जुल्मों की खोजखबर लेने वाला नहीं है. निजी फायदे में गले तक डूबी राजनीति में नेताओं का माफियाराज अपने में मस्त है. मासूमों की जिंदगी सस्ती हो चुकी है. पुलिस महज खानापूरी कर रही है. ऐसे में कौन देगा ऐसी हत्याओं के सवालों के जवाब?

मदरसों में मौडर्न तालीम है वक्त की जरूरत

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार के एक फैसले ने सर्दी शुरू होने के पहले ही गरमाहट पैदा कर दी. योगी सरकार ने ऐलान किया है कि प्रदेश के मदरसों में भी मौडर्न तालीम दी जाएगी.

इसी कड़ी में सरकार की तरफ से एक फरमान जारी किया गया, जिस में साफ लफ्जों में कहा गया कि सरकार मदरसों में मौडर्न तालीम दे ताकि वहां के छात्र भी हिंदी, अंगरेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों से बराबरी कर सकें.

उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने ट्वीट किया कि मदरसों में एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ाई होगी.

मंत्री के ट्वीट के मुताबिक, आलिया (इंटरमीडिएट) लैवल पर गणित और विज्ञान को अनिवार्य किया जाएगा.

देश में मुसलिम आबादी की बात की जाए तो वह तकरीबन 15 करोड़ के आसपास है लेकिन उन की आबादी के हिसाब से स्कूल, कालेज या यूनिवर्सिटी में मुसलिमों की तादाद काफी कम है. आजादी के 70 साल बाद भी मुसलिमों के हालात बेहतर होने के बजाय लगातार खराब होते गए हैं.

केंद्र और राज्य में सरकारें आती रहीं, सभी ने वोटों के लिए मुसलिमों से लुभावने वादे किए, लेकिन जब सत्ता में आए तो बेगानों की तरह भुला दिए गए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में कहा कि हम मदरसों के बच्चों के एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में कंप्यूटर देखना चाहते हैं.

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आज के मौडर्न दौर में मुसलिम तरक्की के रास्ते में कैसे पीछे छूट गए, आखिर क्या वजह है इन के पिछड़ने की आप भोपाल स्टेशन उतरिए तो वहां आप को ज्यादातर आटोरिकशा ड्राइवर और कुली मुसलिम ही मिलेंगे, फर्नीचर की दुकानों में कारीगर मुसलिम, सब्जी बेचने वाले मुसलिम.

यह तसवीर सिर्फ भोपाल शहर की नहीं, बल्कि हमारे देश के ज्यादातर हिस्सों की है. इस की अहम वजह क्या है?

मुसलिम कौम दुनियावी जिंदगी से ज्यादा दीन पर अमल करती है, लेकिन दूसरे मुसलिम मुल्कों की तरह भारत के मुसलिम दीन और दुनिया में तालमेल नहीं बिठा पाए. साल 2011 की जनगणना ने मुसलिमों की सचाई को और भी ज्यादा उजागर कर दिया.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 42.72 फीसदी से ज्यादा मुसलिम अनपढ़ हैं. जैन समदुय में महज 13.57 फीसदी अनपढ़ हैं, जबकि दोनों ही समुदाय अल्पसंख्यक माने जाते हैं.

जैन समुदाय के 25.7 लोग ग्रेजुएट हैं, जबकि मुसलिमों में यह आंकड़ा सिर्फ 2.8 फीसदी है. ईसाइयों में 8.8 फीसदी और सिखों में 6.4 फीसदी लोग ग्रेजुएट हैं.

मुसलिम अपने बच्चों को आज भी पारंपरिक तौर पर मदरसों में ही पढ़ाना पसंद करते हैं या फिर यह उन की मजबूरी है.

देश में मुसलिमों की आबादी तकरीबन 15 करोड़ है, जिस में से 24.9 फीसदी लोग भीख मांग कर गुजारा करते हैं. सच्चर कमेटी ने काफी पहले ही अपनी रिपोर्ट में मुसलिमों की बदहाली के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि इन के हालात दलितों से भी ज्यादा बदतर हैं. जिस देश में, समाज में या किसी कौम में जब पढ़ाईलिखाई का लैवल नीचा रहता है, तो वहां की ज्यादातर आबादी भी गरीब होती है.

भारत में सब से कम पढ़ेलिखे लोग मुसलिम हैं. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा. कम पढ़ना या अपढ़ता भी गरीबी की एक अहम वजह हो सकती है, लेकिन सरकार तालीम के प्रसार के लिए तरहतरह की योजनाओं से सभी समुदाय के बच्चों को आगे बढ़ने का खुला मौका मुहैया करा रही है, इस के बावजूद यह तबका अनपढ़ है.

जानेमाने लेखक असगर वजाहत का कहना सही है कि उत्तर भारत का मुसलिम समाज कई धार्मिक मुद्दों पर बंटा हुआ है. यह बंटवारा इतना ज्यादा कर दिया गया है कि आपस में बातचीत तक बंद है.

ज्यादातर धर्मगुरु तालीम पर बल नहीं देते, क्योंकि पढ़ालिखा मुसलिम उन के चंगुल से आजाद हो जाता है और यही धर्मगुरु नहीं चाहते हैं.

कुछ लोग तो तालीम के प्रति सचेत करने व जागरूकता फैलाने के लिए कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन परेशानी इस बात की है कि कुछ समय बाद इस तरह के कार्यक्रम मजहबी चोला ओढ़ लेते हैं. जिस मकसद के लिए उन का संगठन बना था, वो धार्मिक कामों में ज्यादा ध्यान देने लगता है.

आज के दौर में जहां अंगरेजी मीडियम स्कूल के बच्चों को मौडल्स, तसवीर, प्रोजैक्टर वगैरह कई तरह की मौडर्न तकनीक का इस्तेमाल कर के पढ़ा रहे हैं, वहीं मदरसे में बच्चों को आज भी पुराने ढर्रे पर पढ़ाया जा रहा है. इस से पढ़ने वाले बच्चों को सही जानकारी नहीं मिल पाती है.

मदरसों में आज भी छोटी जमात के बच्चों को समझाने के बजाय पढ़ाई के नाम पर सिर्फ रटाया जाता है. उन का गणित, विज्ञान और कंप्यूटर से दूरदूर तक का कोई वास्ता नहीं होता है.

मदरसे में पढ़ कर किसी तरह की नौकरी का सपना संजोना सपना ही है, क्योंकि वहां ऐसी तालीम नहीं दी जाती जिस से रोजगार मिले.

भोपाल में तर्जुमा वाली मसजिद के छात्र मौलाना इरशाद और अब्दुल हसीब से जब यह पूछा गया कि क्या आप चाहते हैं कि मदरसों में भी मौडर्न तालीम के तहत तसवीर, मौडल्स या प्रोजैक्टर के जरीए पढ़ाया जाए तो इन छात्रों का कहना था कि ऐसा करना इसलाम के खिलाफ है और यह गुनाह का काम है, इसलिए इस के इस्तेमाल की जरूरत नहीं है.

वहीं बरअक्स कारी आजम का कहना था कि आज के हालात के मद्देनजर मदरसों में भी मौडर्न तालीम बहुत ही जरूरी है इसलिए अंगरेजी मीडियम स्कूलों की तरह यहां भी बच्चों को पढ़ाने और समझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए.

मौलाना यूसुफ नदवी कहते हैं कि मदरसों में मौडर्न पढ़ाईलिखाई जायज ही नहीं, बल्कि वक्त को देखते हुए बहुत जरूरी है. छोटी जमात के बच्चों को समझाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है, खासतौर से भाषा की पढ़ाई में.

कई बड़े मदरसों में अरबी, उर्दू के साथ ही साथ हिंदी, अंगरेजी, विज्ञान और कंप्यूटर की क्लासें भी चलती हैं, लेकिन सिर्फ बड़े मदरसों में पढ़ा कर ज्यादा फायदा नहीं होगा, इसलिए सभी मदरसों में ऐसी मौडर्न तालीम दी जाए.

मुसलिम भी बेडि़यों को तोड़ कर वक्त के साथ कदम से कदम मिला कर चलना ही नहीं, बल्कि तेजी से दौड़ लगाना चाहते हैं. इस के लिए पहल उन्हें ही करनी होगी तभी मुख्यधारा में आ सकते हैं.

पिछले कुछ सालों में मुसलिम तालीम के लिए कई संगठन ईमानदारी के साथ काम कर रहे हैं. उन की इस मुहिम को कामयाबी भी मिल रही है, लेकिन उतनी तेजी से नहीं, जितनी जरूरत है.

एक बात और है कि मुसलिम लड़कों के मुकाबले मुसलिम लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़ने से साफ हो जाता है कि मुसलिम के उन्हीं इलाकों में मदरसे ज्यादा हैं, जहां उन के लिए प्राइवेट या सरकारी स्कूल मौजूद नहीं हैं, इसलिए सरकार को चाहिए कि वह मुसलिम बहुल इलाकों में स्कूल खोले, जहां मुसलिम बच्चे भी स्कूल में पढ़ कर आगे बढ़ सकें.

मुसलिम समाज में पढ़ाई अधूरी छोड़ने वाले बहुत ज्यादा हैं और गंवई इलाकों में लड़कियों की तालीम छोड़ देने की दर लड़कों से ज्यादा है, जबकि शहरों में यह दर कम है.

साल 2015 में भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मुसलिमों की हालत में सुधार के लिए सरकारी और सामाजिक लैवल पर सकारात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत पर जोर दिया था.

रंगनाथ मिश्र कमेटी ने भी मुसलिमों को 10 फीसदी रिजर्वेशन देने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन इन सिफारिशों पर कभी अमल नहीं किया गया. यही वजह है कि मुसलिमों की हालत आज भी खराब चल रही है. सरकार वक्तवक्त पर मुसलिमों के लिए कई तरह के लुभावने वादे कर के उन्हें अपने लिए वोट बैंक समझ कर झुनझुना पकड़ा देती है.

गरीबी भी तालीम के प्रति अनदेखी की एक अहम वजह है, इसलिए सरकार को मुसलिमों के साथ मिल कर समाधान ढूंढ़ना चाहिए. इस के समाधान के बिना उन्हें मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जा सकता. गरीब मुसलिमों से जब उन के बच्चों के पढ़ाई छोड़ कर काम करने पर बात की जाती है तो उन का साफ कहना होता है, ‘‘नौकरी तो मिलने से रही, पर अगर बच्चों को वक्त पर काम नहीं सिखाया तो आवारा घूमेंगे…’’

एक बात एकदम साफ है कि सरकार ने मुसलिमों को इस तरह बना दिया है, अगर उन्हें प्यास लगती है तो सरकार के पास पानी के लिए आते हैं. सरकार उन्हें बारबार पानी पिलाती है, कभी वक्त पर तो कभी बेवक्त. लेकिन उन की प्यास बुझाने के लिए किसी भी सरकार ने आज तक कोई ऐसा ठोस काम नहीं किया, जिस से मुसलिमों को पानी पीने के लिए सरकार का चक्कर न काटना पड़े. वोटों के लिए ऐसी मंशा सभी सरकारों की रही है.

इस नए फैसले के पीछे योगी आदित्यनाथ की नीयत भी साफ नहीं है कि वे वाकई मदरसों में पढ़ाई कराना चाहते हैं या केवल दखलअंदाजी का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं.

जिस तरह का माहौल आज बना हुआ है, उस में सुधार के कदम को अगर शक की निगाहों से देखा जा रहा है तो कोई हैरत की बात नहीं है.

शर्मनाक : किसानों की बदहाली और गांवों की परेशानी

सरकार और राजनीतिबाजों के लाख वादों के बावजूद किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. किसान अपनी घटती आमदनी से गुस्से में हैं, वहीं उन्हें उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिल पा रही है.

सरकार जो न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है उस में भी नानुकर की जाती है. भ्रष्ट अफसर और नेता व मंडी के बिचौलिए मिल कर किसानों की जेब में उन की फसल की कीमत नहीं पहुंचने देते.

यहां तक कि फसल की उत्पादन लागत भी नहीं निकल पाती. यही वजह है कि आएदिन किसानों की खुदकुशी की घटनाएं हो रही हैं.

गुजरात के पटेल बहुल सौराष्ट्र में किसानों की हालत बहुत नाजुक है. यहां के पाटीदार किसान केवल आरक्षण को ले कर ही भारतीय जनता पार्टी की  सरकार से नाराज नहीं है, बल्कि फसल की वाजिब कीमत न मिल पाने से भी गुस्से में हैं.

प्रदेश में विधानसभा चुनावों के प्रचार में विकास का खूब शोरगुल हुआ पर 11 जिलों में फैले सौराष्ट्र के मूंगफली और कपास के किसान फसल की वाजिब कीमत न मिलने के चलते खासा नाराज हैं.

सौराष्ट्र में पटेल समुदाय के किसानों की काफी तादाद है. यहां पटेलों के पास सब से ज्यादा जमीन है. इन किसानों ने प्रदेश की भाजपा सरकार को चेतावनी दी है. इलाके के पटेल किसान शहरों में कारोबार करते हैं जबकि गांवों में इस समुदाय की मुख्य आमदनी खेती ही है. सरकारी नीतियों और वादाखिलाफी से गैरपटेल भी नाराज हैं.

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सौराष्ट्र में कपास और मूंगफली 2 प्रमुख फसलें होती हैं. किसान इन फसलों की लागत के मुकाबले में घटती आमदनी की शिकायतें कर रहे हैं. इन फसलों की बोआई में जितना खर्च आता है उतनी कीमत वापस नहीं मिल पा रही है. सरकार ने कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति 20 किलो का 900 रुपए तय किया है. मूंगफली किसानों के लिए भी यही मूल्य तय किया गया पर प्राइवेट बिचौलिए उन्हें प्रति 20 किलो के 500 से 600 रुपए ही देते हैं.

जूनागढ़ के अगरतेर गांव के मूंगफली किसान दिनेश पटेल कहते हैं, ‘‘मैं अक्तूबर महीने में सरकारी एजेंसियों को अपनी फसल बेचने गया था पर फसल उत्पादन की मूल लागत भी नहीं मिल पाई. भुगतान भी 20 से 50 दिन में मिलता है.’’

एक कपास व्यापारी प्रति 20 किलो कपास में 400 से 500 रुपए बचा सकता है. इस बार फसल अच्छी हुई है पर किसानों को भरोसा नहीं है कि उन्हें इस की अच्छी कीमत मिल पाएगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कपास पर 1500 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का वादा किया था. उधर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी कह रहे हैं कि उन की पार्टी सत्ता में आई तो न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को एडवांस में देंगे और किसानों का कर्ज माफ कर देंगे. पर किसानों को दोनों नेताओं के वादों पर भरोसा नहीं है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा विभिन्न उत्पादों पर तय किया जाता है. सरकार इन कृषि उत्पादों को खरीदती है तो किसानों को उसी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर भुगतान किया जाता है. पर यह सिर्फ दिखावा है. कृषि मंडियों में दलालों और भ्रष्ट अफसरों की मिलीभगत का बोलबाला है.

गुजरात के 57 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं और उन की आमदनी का मुख्य साधन खेती ही है. प्रदेश के तकरीबन 2 करोड़ मजदूर खेत मालिकों के ऊपर अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं. जब खेत मालिकों को ही फसल पर मुनाफा नहीं मिल पाएगा तो वे खेतों में काम करने वाले मजदूरों को मजदूरी कैसे चुका पाएंगे?

कपास किसानों के लिए पिछले 3 साल खराब गए हैं. साल 2015 में कम बारिश से फसल नहीं हुई. अगली बार कीड़े ने फसल बरबाद कर दी और इस बार बंपर फसल के बावजूद कम समर्थन मूल्य से किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है.

ये हालात केवल गुजरात में ही नहीं, तकरीबन हर प्रदेश में हैं. बुंदेलखंड, विदर्भ जैसे इलाकों के किसान भी इसी परेशानी से जूझ रहे हैं. ऐसे हालात के चलते न तो किसानों की तरक्की हो पा रही है, न गांवों की. इसी वजह से किसानों की खुदकुशी की घटनाओं में कमी नहीं हो पा रही है.

सरकार किसानों और गांवों की तरक्की चाहती है तो किसानों को अपनी फसल बेचने की आजादी देनी चाहिए. उन्हें मंडी के नियमकायदों के शिकंजे से मुक्त करा कर खुले में अपनी मरजी से फसल की वाजिब कीमत और मुनाफा वसूलने देना चाहिए.

किसान जब अपनी फसल खेत से ले कर चलता है तो उसे हर चौराहे पर दक्षिणा चढ़ानी पड़ती है. ट्रक का किराया, ट्रैफिक पुलिस को घूस, मंडी में बैठे बाबुओं और दलालों को भेंट चढ़ाने में ही किसान की जेब खाली हो जाती है. आखिर में उस के पल्ले कुछ नहीं बचता. सरकार क्या किसानों को मंडी और दलालों से मुक्त कराएगी?

किसानों की तरक्की में ही गांवों की तरक्की है. जब तक किसानों का विकास नहीं हो पाएगा तब तक गांव भी पिछड़ते रहेंगे.

पलायन और प्रदूषण के बीच के इस संबंध को भी समझिए

युवा कसबों और गांवों से बुरी तरह शहरों और मैट्रोज में आ रहे हैं जहां शिक्षा के अवसर और कमाई के रास्ते तो हैं ही, खुलापन भी है जो उन के गांवकसबे में बिलकुल नहीं है. धर्म, जाति, भाषा के बंधनों से दूर युवा शहरों में आ जाते हैं पर ज्यादातर को सस्ते इलाकों में रहना पड़ता है, क्योंकि शहर बेहद महंगे और औसत युवा के लिए गांवकसबे की कमाई या बचत के बाहर के होते हैं.

युवाओं और मजदूरों की भरमार के कारण इन शहरों पर बेहद दबाव बढ़ रहा है और शहर दिनबदिन बदबूदार व प्रदूषित होते जा रहे हैं. गांवों की साफ हवा के आदी युवा शहर की जहरीली हवा में बीमार हो जाते हैं और दवाइयों पर निर्भर हो जाते हैं.

एक तरह से दुष्चक्र चल रहा है. चूंकि शहरों में मजदूर सस्ते मिल जाते हैं और मालिकों को कारखाने और सर्विस सैंटर बनाने में आसानी होती है तो वे शहरों में ही नौकरियों के अवसर दे रहे हैं और चूंकि अवसर शहरों के ही हैं, युवाओं को शहर आ कर भविष्य का दांव अपनाना पड़ता है और फिर शहर गंदे होते जाते हैं. हर शहर में गंदे इलाके बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं.

शहरों में प्रदूषण आज इस कारण बढ़ रहा है कि सड़कों, सीवरों, सफाई का इंतजाम बढ़ती आबादी के अनुसार करना कठिन होता जा रहा है. शहरों में कुछ लोग अमीर हो जाते हैं, सरकार को ज्यादा आबादी के शहरों से आय अधिक होने लगती है लेकिन नगर निकायों की आमदनी का स्रोत न के बराबर बढ़ता है जिस का असर शहर की गंदगी से सीधा जुड़ा है.

हर शहर के खाली इलाकों, आसपास के खेतों, जंगलों और यहां तक कि नदीनालों पर भी रहने के कच्चेपक्के मकान बन गए हैं. जहां 1,000 लोग रहने चाहिए वहां 5,000 रहने लगे हैं तो प्रदूषण होगा ही. रोनेधोने से काम नहीं चलेगा क्योंकि न सरकार शहरों में किसी को आने से रोक सकती है न मांग के अनुसार सुविधाओं को तुरंत जुटा सकती है.

यह प्रदूषण तो अब जिंदगी का हिस्सा बन गया है और हमारी संस्थाएं चाहे जो मरजी हो कर लें, कुछ नहीं कर सकतीं. अब गांवों को सुधारने की तो बात करता भी कोई नहीं है क्योंकि वहां जो लोग बचे हैं वे निम्न जातियों के हैं और यह देश उन बहुमत वाली नीची जातियों के बारे में सोचने को तैयार तक नहीं. सो, शहरी प्रदूषण के लिए तैयार रहें, हरदम, फिट या अनफिट.

आज के टाइम में लड़की ही नहीं, लड़का भी हो संस्कारों वाला

दिनेश और उन की पत्नी उर्मिला अपनी बेटी सीमा के विवाह के 3 माह बाद उस की घरगृहस्थी देखने जयपुर जा रहे थे. पूरे रास्ते उन की बातचीत का विषय यही रहा कि उन की लाडली घरगृहस्थी कैसे संभालती होगी? शादी से पहले तो उसे पढ़नेलिखने से ही फुरसत नहीं थी. उन्होंने अपनी बेटी को सिखाया तो सब कुछ है, लेकिन जानने में और जिम्मेदारी उठाने में फर्क होता है और यही फर्क उन्हें परेशान कर रहा था कि पता नहीं वहां जा कर क्या देखने को मिले.

मगर उन की हैरानी का उस वक्त ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने सीमा का घर खूब सजाधजा और व्यवस्थित देखा. कारण बहुत जल्दी उन की समझ में आ गया. घर के कामकाज जितना सीमा जानती थी, उतना ही उन का दामाद रवि भी जानता था. जिम्मेदारी का अनुभव दोनों को ही था. अत: दोनों ही इस जिम्मेदारी का लुत्फ उठा रहे थे.

उर्मिला हैरान थीं कि उन की बेटी की गृहस्थी में दामाद बराबरी की भूमिका अदा कर रहा है. दोनों कभी अपनी अज्ञानता पर मिल कर ठहाके लगाते, तो कभी कुशलता पर एकदूसरे की पीठ ठोंकते. ‘फलां औरत वाले काम’, ‘फलां मर्दों वाले काम’ के पचड़े के बजाय जिसे जो काम आता करता और जो काम नहीं आता उसे करने की कोशिश दोनों ही करते. दिनेश हैरानी से बेटी को गाड़ी धोते, उस की सर्विसिंग करवाते और दामाद को झाड़ू लगाते, सब्जियां काटते देख रहे थे.

पति ही नहीं साथी

रवि शुरू से ही कभी तालीम की वजह से, तो कभी नौकरी की वजह से परिवार से दूर अकेला रहा, जहां उसे अपना हर काम खुद करना पड़ता था. बाहर का खाना पसंद न होने की वजह से वह खाना भी खुद ही बनाने लगा. सीमा से शादी के बाद अच्छी बात यह हुई कि वह खालिस पति बनने के बजाय सीमा का सही माने में साथी बन गया.

सीमा के मातापिता ने बेटीदामाद को ऐसे पतिपत्नी के रूप में देखने की कल्पना सपने में भी नहीं की होगी. उन्हें खुशहाल देख कर दिनेश सोचने पर मजबूर हो गए कि कभी यह बात उन की समझ में क्यों नहीं आई?

परिवर्तन समाज के सिर्फ ढांचे या स्वरूप में ही नहीं आता, बल्कि उस के सदस्यों की भूमिका में बदलाव की मांग भी करता है. अगर हम इस नई भूमिका के मुताबिक ढल जाएं, तो जीवन सरल, सहज, आसान हो जाता है.

lifestyle

पहले के जमाने में जो भी था, वर्तमान में जो भी है असंगत है. इस थ्योरी से अलग अगर सोचो, तो पाएंगे पहले परिवार में महिलाओं की संख्या इतनी ज्यादा होती थी कि उन्हें पुरुषों की मदद की आवश्यकता ही नहीं होती थी. घरेलू मामलों से उन्हें दूर ही रखा जाता था. छोटीबड़ी उलझनें वे सभी आपस में मिलजुल कर ही सुलझा लिया करती थीं. यहां तक कि कई बातें घर के पुरुष सदस्यों तक पहुंचती भी नहीं थी.

अपना काम खुद करने की आदत

इस के विपरीत आज पतिपत्नी के बीच में पूरी गृहस्थी का जंजाल है. न कोई मदद मिले, न कोई सलाह दे, ऐसे में पत्नी चाहती है कि पति मदद करे और पति झुंझला उठता है कि उसे क्या पता इन के बारे में.

कई बड़ेबुजुर्ग कहते हैं कि आज के नवविवाहितों को देखो, विवाह होते ही एकदूसरे से झगड़ने लगते हैं. हम ने तो विवाह के 10 साल बाद तक एकदूसरे से ऊंची आवाज में भी बात नहीं की थी.

अगर विवाह होते ही झगड़ने के कारणों पर गौर करें, तो पाएंगे कि वे निहायत छोटीछोटी बातें होती हैं जैसे ‘तुम सामान क्यों फैलाते हो?’, ‘तुम ने आज सिर्फ एक सब्जी क्यों बनाई?’, ‘तुम ने नल बंद नहीं किया?’, ‘तुम ने शर्ट प्रैस नहीं की?’, ‘तो क्या मैं प्याज छीलूं?’

यह ऐसी स्थिति होती है, जिस में महिला छोटीबड़ी जिम्मेदारियों से बेहाल है और पुरुष समझ नहीं पा रहा कि वह बेहाल है, तो क्यों? महिलाओं का यही तो काम है. उस की मां भी करती थी. फिर उस की पत्नी को ये सब करने में झल्लाहट क्यों? वह सिर्फ इतनी सी बात नहीं समझ पाता कि उस की मां अकेली ये सब नहीं करती थीं. उन के साथ चाची, दादी, भाभी सभी हुआ करती थीं और अगर जीवन में कभी किया भी, तो गृहस्थी जब कम से कम 10-15 साल पुरानी हो चुकी थी.

आज भी ज्यादातर लड़कियां घरगृहस्थी से संबंधित हाईटैक ज्ञान से लैस हो कर ही ससुराल आती हैं. बेटी को ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलाने के साथसाथ मातापिता उसे वह व्यावहारिक ज्ञान भी देते हैं, जिस में घरेलू कामकाज से ले कर ऊंचे संस्कार सब कुछ शामिल होता है.

व्यक्तित्व विकास पर ध्यान

मगर अपना काम खुद करना चाहिए, यही मामूली सा ज्ञान मातापिता अपने बेटे को नहीं दे पाते. उस की जरूरतें मां या बहनें सहज रूप से पूर्ण कर देती हैं. कपड़ों से ले कर जूतेमोजे तक विवाह से पहले मां, बहनें संभालती हैं, इस उम्मीद से कि विवाह के बाद ये सब काम उस की बहू करेगी.

परंपरागत सोच रेत की तरह होती है, जिस पर न केवल हम चलते हैं, बल्कि पीछे पद्चिह्न भी छोड़ जाते हैं. किसी भी महिला मंडली में बातचीत का यह आम विषय होता है कि अपने व्यवसाय में निपुण उन के पति घर के कामकाज में कितने अनाड़ी हैं.

आत्मनिर्भरता जरूरी

पत्नी कामकाजी हो या घरेलू, अगर पति सिर्फ अपनी देखभाल करना खुद सीख ले यानी कपड़े, जूतेमोजे, तौलिया वगैरहवगैरह के लिए पत्नी का मुंह ताकने के बजाय इन सब मामलों में आत्मनिर्भर बन जाए, तो कई समस्याओं का समाधान अपनेआप हो जाता है. इस से पुरुषों में जहां आत्मविश्वास आएगा, वहीं पत्नियां खुद के लिए भी वक्त निकाल पाएंगी. ‘मेरा क्या, मैं तो कुछ भी खा लूंगी, कुछ भी पहन लूंगी’ जैसी भावना से उबर कर वे भी व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देंगी.

इस संदर्भ में कावेरी का उदाहरण खास है. पतिपत्नी दोनों डाक्टर हैं. कहते हैं व्यवसाय एक होने से पतिपत्नी में सहज तालमेल की गुंजाइश ज्यादा होती है. पर डा. कावेरी के साथ ऐसा नहीं है. उन के पति डा. प्रभात अपनी हर छोटीबड़ी जरूरत के लिए कावेरी पर निर्भर हैं. सफाई पसंद हैं, इसलिए दरवाजों पर डस्ट नहीं देख सकते, पर खुद कभी डस्टर को हाथ नहीं लगाते.

‘कावेरी के हाथों से बने व्यंजनों की बात ही अलग है’ यह कह कर नौकरों को फटकने नहीं देते. दूसरी ओर कावेरी पति की इन ख्वाहिशों को पूरा करने में ऐसी जुटी कि डिस्पैंसरी उस के लिए सपना बन कर रह गई. एक दिन एक मित्र ने कहा कि कावेरी की मदद कर दिया कर तो सुन कर डा. साहब कहते हैं कि क्या करूं, मुझे कुछ आता ही नहीं. अगर डाक्टर अमन अपना काम खुद करना जानते और घरेलू दायित्वों को निभाने में जरा सा भी साथ देते, तो न केवल घर व्यवस्थित होता, कावेरी भी एक सफल डाक्टर होती.

अभिप्राय यह है कि अगर जरूरत हो तो किसी भी परंपरा की शुरुआत कभी भी की जा सकती है. नए जमाने की नई खुशबूदार मिट्टी में एक नई परंपरा के बीजारोपण का सही समय यही है. संतान बेटा हो या बेटी ऊंची शिक्षा, ऊंचे कैरियर के अलावा भावी पारिवारिक जीवन के लिए अब बेटी के समान ही बेटे को भी तैयार करना होगा.

जैसे संस्कारों से लैस बहू हमें चाहिए वैसे ही संस्कार बेटे में डालने का होमवर्क भी पहले ही कर लेना चाहिए. अगर हम सभी क्षेत्रों में बेटी को आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं, तो बेटे को क्यों नहीं? आज जब महिलाएं घर से ले कर बाहर तक सभी जगह अपनी सफल और मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं, तो घर का मोरचा पुरुषों के लिए वर्जित क्यों रहे? गृहस्थी से ले कर दफ्तर तक, आत्मनिर्भर तो दोनों को ही बनना होगा, फिर चाहे बेटा हो या बेटी.

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