ट्रेड यूनियन नेता रह चुके सनातन महाकुद ओडिशा की चांपुआ विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक हैं. पेशे से ट्रांसपोर्टर और माइनिंग कारोबारी सनातन की गिनती देश के शीर्ष रईस विधायकों में होती है. यह बात वैधानिक रूप से स्थापित भी हो गई जब उन के आधा दर्जन बैंक खातों से कोई 165 करोड़ रुपए जब्त किए गए. यह बात उजागर तब हुई जब एक बैंक मैनेजर उन की मांग पर महज 50 लाख रुपए उन्हें देने को उन के घर जा रहा था. बुरा हो मुखबिरी और पुलिस चैकिंग का जिस के चलते यह डील नाके पर ही पकड़ ली गई.
अब सनातन अपने सीज हो चुके खातों को खुलवाने के लिए कोर्टकचहरी करते रहेंगे. लेकिन इस से उन की अपनी खुद की जन समृद्ध पार्टी लौंच करने का सपना हालफिलहाल टूट गया है जो सभी 147 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली थी.
मुमकिन है रईसी उजागर हो जाने के बाद तमाम सियासी दल उन पर डोरे डालें.
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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आम लोगों को खुश रखने के लिए आनंद विभाग खोला ही था कि उधर दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी खासमखास आनंदी बेन को राज्यपाल बना कर भोपाल भेज दिया. अहमदाबाद से भोपाल तक का सफर आनंदी बेन ने चार्टर्ड बस से तय किया और रास्ते में उज्जैन के महाकाल मंदिर में अभिषेक कर ऐलान सा कर डाला कि वे पूजापाठ के मामले में शिवराज से उन्नीस नहीं हैं यानी कर्ज में गले तक डूबे इस सूबे में अब कुछ और हो न हो, भजनपूजनकीर्तन तबीयत से होंगे.
लेकिन शिवराज सिंह की असल दिक्कत पूजापाठी नहीं, बल्कि सत्ता में आनंदी बेन की दखलंदाजी है जिस के बाबत नई राज्यपाल को शायद ऊपर से ही निर्देश मिले हुए हैं कि उन्हें गवर्नरी कम, मुखबिरी ज्यादा करनी है. इस साल मध्य प्रदेश में चुनाव हैं जहां भाजपा को शिवराज सिंह का चेहरा आगे रख कर ही चुनाव लड़ने को मजबूर होना पड़ेगा. अब देखना दिलचस्प होगा कि राजकाज राजभवन से चलेगा या सीएम हाउस से.
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औल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन के मुखिया व कट्टर मुसलिम सांसद असुदुद्दीन ओवैसी पर दक्षिण मुंबई के नागपाड़ा इलाके में एक रैली के दैरान किसी ने जूता फेंक दिया. यह कोई नई या अनहोनी बात नहीं है. नेताओं पर जूते फिंकते रहते हैं जो एक तरह से उन के परिपक्व होने का प्रमाणपत्र होते हैं. इस रिवाज के लिहाज से ओवैसी को तो बजाय व्यथित होने के, खुश होना चाहिए.
नेता बनना कोई आसान काम भी नहीं. इस के लिए बेइज्जती बरदाश्त करना एक गुण है और जो नेता यह गुण खुद में विकसित कर लेते हैं वही बुलंदियां छू पाते हैं. हवा में सनसनाते जूते इस बात की गवाही भी देते हैं.
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राजनेता अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी प्रारंभिक दिनों को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की ही आंखों का कांटा बनी रही है. अब जब उस के 20 विधायकों को सरकार में लाभ का पद पाने के आरोप में विधानसभा की सदस्यता खोनी पड़ी तो इन दोनों पार्टियों को असीम सुख मिला.
लाभ का पद देने का विषय पेचीदा है और एक तरह से यह मंत्री का सा पद आम विधायक को देना है जहां सरकार से वेतन व सुविधाएं मिलती रहें. कानून के अनुसार, लाभ का पद कोई विधायक या सांसद नहीं ले सकता. यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि अफसरशाही अपने प्रतिनिधि विधानमंडलों में न भेज सकें.
तकनीकी तौर पर चाहे वह नियुक्ति गलत थी पर मोटेतौर पर भ्रष्टाचार नहीं है. नौसिखिया अरविंद केजरीवाल कानूनी बारीकियों को समझ नहीं पाए, सो फंस गए हैं. हो सकता है कि अब उन्हें 20 सीटों पर फिर चुनाव लड़ना पड़े और कुछ सीटें हार भी जाएं पर यह पक्का है कि अरविंद केजरीवाल को जो भारी बहुमत मिला था उस की वजह से वे, नगरनिगमों की हार के बावजूद, तब तक सत्ता में बने रहेंगे जब तक कोई उन की पार्टी को तुड़वा न दे. यह बहुत संभव भी है क्योंकि देश में तोड़फोड़ की राजनीति जम कर चल रही है.
अरविंद केजरीवाल की अब तक की सफलता का राज यह है कि वे और उन की पार्टी जाति व धर्म के ऊपर हैं. उन की पार्टी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप न के बराबर हैं. अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस की जगह लेनी चाही थी पर वे अपने व्यक्तित्व, महत्त्वाकांक्षाओं और जिद के चलते विवादों में ज्यादा घिरे रहे हैं.
भारत के तत्कालीन महालेखा नियंत्रक यानी सीएजी विनोद राय ने पिछले आम चुनावों से पहले कांग्रेस की छवि खराब की थी और उस का सुख भाजपा को मिला था. अब वैसा ही सुख भाजपा को चुनाव आयोग ने दिया है. राजनीतिक सफलता पर काला रंग पोतने में ये स्वतंत्र संस्थाएं आजकल राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए कि सत्ता सैकड़ों समीकरणों के सहारे मिलती है, केवल वादों व निष्ठा से नहीं.
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घरों के बाहर पार्किंग की समस्या का हल खोजने के बजाय दिल्ली नगर निगम उस पर शुल्क लगाने का विचार कर रहा है. आज अगर दिल्ली इस में सफल होती है तो कल दूसरे शहर भी ऐसा करेंगे. आज कारों पर शुल्क लगाया गया तो कल बाइकों और फिर साइकिलों पर भी लगेगा. सरकार छोटे टैक्स से शुरुआत करती है और फिर उसे भारीभरकम बनाती जाती है.
घर के बाहर की सड़क सार्वजनिक है और इस का उपयोग एक घर के लोग अपनी गाडि़यों के लिए करें, यह अटपटा लग सकता है पर वास्तविकता यह है कि जब शहर की कालोनियों के नक्शे बनते हैं तभी सड़कों के किनारे की जगह की कीमत अलौट की गई जमीन के दाम में जोड़ ली जाती है. 200 गज के प्लौट के सामने 3 फुट जगह सड़क के किनारे प्लौट मालिक की होती है उस के सार्वजनिक उपयोग के लिए.
घरों के आगे गाडि़यों की समस्याएं उग्र अगर हो रही हैं तो इसलिए कि सरकारों, निगमों ने सड़कों को दुहना तो शुरू कर दिया है पर, हिंदुओं की गायों की तरह, उन्हें संवारना उन का काम नहीं है. शहरभर में सड़कों के किनारे पटरियों पर जमे सीवर, मलबा, दुकानें, दुकानों का सामान, बिजली के आड़ेतिरछे खंभे, बोर्ड, होर्डिंग्स लगे रहते हैं. अगर इन्हीं को दुरुस्त कर दिया जाए तो दिल्ली जैसे शहर की पार्किंग की व्यवस्था सुधर जाए.
लोगों के लिए गाड़ी अब लक्जरी नहीं, निसेसिटी है. हर घर में हर गाड़ी पर 5 से 25 लाख रुपए तक खर्च यों ही दिखावे के लिए नहीं किया जाता. शहर बड़े हो गए हैं, कालोनियां भी बड़ी हो गई हैं. उन पर अकेले रातबिरात चलना सरकार सुरक्षित नहीं कर सकती. ऐसे में लोगों को गाड़ी की सुरक्षा का सहारा लेना पड़ता है.
हर गाड़ी पर और गाड़ी के लिए इस्तेमाल होने वाले हर लिटर पैट्रोल व डीजल पर सरकार टैक्स वसूल कर रही है. पार्किंग के नाम पर एक और टैक्स की वसूली किए जाने की योजना असल में तानाशाही है और यह तैमूरी टैक्स होगा. अफसोस यह है कि आज देश की जनता ने अपने अधिकारों के प्रति इस कदर बेरुखी अख्तियार कर ली है कि धर्म व जाति के नाम पर दिए गए अपने वोट के लिहाज में वह अपने सब दुखदर्द भुला रही है. वह हिंदू धर्म को बचाने के चक्कर में सरकार की हर मनमानी सह रही है जो उसे बुरी तरह निचोड़ रही है और उस से उस की हर आजादी-बोलने की आजादी, पैसा रखने की आजादी व गाड़ी रखने की आजादी छीन रही है.
पार्किंग शुल्क, खासतौर पर अपने घर के सामने खड़ी कार का, अन्याय की पराकाष्ठा है. इसे हरगिज सफल नहीं होने देना चाहिए. लोगों को सांसदों, विधायकों, पार्षदों और अफसरों को तुरंत ईमेल, व्हाट्सऐप, पत्र भेजने चाहिए कि उन के बचेखुचे हक छीने न जाएं.
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मेकअप और ब्यूटी दोनों को फ्रैश बनाए रखने के लिए मेकअप आर्टिस्ट को हमेशा कुछ न कुछ चुनौतीपूर्ण काम करते रहना पड़ता है, ताकि नयापन बना रहे. इस दिशा में आजकल ‘ओंब्रे मेकअप’ ट्रैंड में है. छोटीमोटी पार्टी हो या विवाह ओंब्रे मेकअप हर जगह अच्छा लगता है.
असल में मेकअप में ओंब्रे हेयर कलर से ही आया है, जिसे सभी ने खूब पसंद किया. यही वजह है कि इस तकनीक को लिप्स, चीक्स और आईज मेकअप में लाया गया है. इस में एक ही कलर टोन या कंट्रास्ट कलर के लाइट और डार्क शेड का प्रयोग कर मेकअप किया जाता है, जो सुंदर दिखने के साथसाथ आकर्षक भी लगता है.
फैशन में इन है
लैक्मे सैलून की क्रिएटिव डाइरैक्टर और मेकअप ऐक्सपर्ट सुषमा खान बताती हैं कि ओंब्रे मेकअप इस साल फैशन में खूब है. ओंब्रे एक तकनीक है, जिस में होंठों पर 2-3 कलर का प्रयोग कर फाइनल कलर दिया जाता है. इस में अधिकतर 3 रंग मिलाएं जाते हैं. ब्राइड में इस बार हौट औरेंज कलर बहुत अधिक प्रचलन में है. रैड कलर पहले से ही पौपुलर है. ब्राइड के लिए रैड क्लासिक कलर है. इंडियन वैडिंग में इस की खास जगह होती है. लाल रंग के बिना शादी अधूरी होती है. 80% महिलाएं लाल या मैरून कलर की पोशाक शादी में पहनती हैं. सारे ब्राइट कलर जैसे हौट औरेंज, फ्यूशिया कलर आदि सभी फैशन में हैं.
यह मेकअप करने से पहले निम्न बातों का ध्यान दें:
– सब से पहले ड्रैस क्या पहनने वाली हैं, उस पर ध्यान देना जरूरी होता है. ड्रैस को कौंप्लिमैंट करने वाला रंग आप ले सकती हैं. मसलन, अगर आप लाल रंग की ड्रैस पहनने वाली हैं तो रैड के साथ मैरून और पिंक को भी लिया जा सकता है.
– ओंब्रे का अर्थ है एक ही फैमिली के डार्क और लाइट शेड लेना जैसेकि अगर आप ने लाल रंग की लिपस्टिक ली हो तो, उस से मैचिंग रंगों का चयन करें.
– पहले बेस लिपस्टिक से 1 शेड डार्क आउटर लिपलाइनर लगाएं. लाइन को थोड़ा थिक रखें. इस के बाद बेस लिपस्टिक और अंत में लिप्स के अंदर लाइट शेड लगाएं. इस के ऊपर लिप ग्लौस लगा कर उसे फाइनल टच दें.
– घर पर भी इस मेकअप को कर सकती हैं. इस के लिए आप अपने पर्सनल मेकअप आर्टिस्ट या सैलून से मेकअप का सामान खरीदते वक्त वहां की ऐक्सपर्ट से इसे करने की तकनीक जान लें.
– इस के अलावा इस साल होलोग्राफी का भी चलन है. इस में चेहरे के किसी एक भाग को हाईलाइट किया जाता है. ऐक्स्ट्रा शाइनिंग दे कर उस भाग को उभारा जाता है. इस में गोल्डन या सिल्वर कलर अधिक पौपुलर है. इस बार आंखों के ऊपर उसे देने का ट्रैंड रहेगा. ब्राइड भी इसे लगा कर अलग लुक पा सकती है.
– यंग ब्राइड पौप कलर और ब्राइट कलर पहन सकती है. उसी के अनुसार ओंब्रे मेकअप करें.
– स्किन कलर के आधार पर ड्रैस का चयन करें ताकि मेकअप सही दिखे.
सुषमा कहती हैं कि ब्राइड बनने जा रही लड़की को शादी के कुछ महीने पहले से स्किन की देखभाल करते रहना चाहिए ताकि शादी के दिन मेकअप उस के चेहरे को सुंदर बनाए.
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हाल ही में दिल्ली में संपन्न हुए इंडिया रनवे फैशन वीक में जब पूर्वी रौय ने अपना कलैक्शन पेश किया तो सभी ने उसे खूब सराहा. पूर्वी ने महिलाओं के लिए कपड़ों की फौर्मल रेंज पेश की, जिस में औफिस और स्पैशल औफिशियल मीटिंग्स एवं पार्टी ड्रैसेज शामिल थीं. इस कलैक्शन ने कुछ बिंदुओं की ओर ध्यान भी खींचा जैसे क्या महिलाएं अपने औफिस वियर को ले कर जागरूक रहती हैं? औफिस में उन के लिए फौर्मल गैटअप कैरी करना कितना जरूरी है? क्या महिलाएं कैजुअल और फौर्मल ड्रैसेज में अंतर को ठीक से समझती हैं? क्या महिलाएं जितनी जागरूक अपनी कैजुअल ड्रैसेज को ले कर हैं उतना ही फौर्मल ड्रैसेज को ले कर भी हैं? क्या वे जानती हैं कि कौन से कलर और स्टाइल औफिस में अच्छे लगते हैं और कौन से नहीं? ऐसे तमाम सवाल जब सामने आए तो डिजाइनर पूर्वी रौय से ही इन के जवाब जानने चाहे.
पूर्वी ने इस विषय पर विस्तार से बात की और फौर्मल वियर को ले कर महत्त्वपूर्ण जानकारी भी दी. आइए, जानें क्या कहती हैं पूर्वी आप के फौर्मल आउटफिट के बारे में:
आत्मविश्वास और आप की ड्रैस
आमतौर पर लोगों को लगता है कि कपड़े बस शरीर ढकने और हमें सुंदर लुक देने के लिए होते हैं जबकि यह आधा सच है. बाकी का आधा सच यह है कि हमारे पहनावे का हमारे आत्मविश्वास और हमारी बोल्डनैस से गहरा संबंध है. आज के माहौल में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. ऐसे में उन का पहनावा किस प्रकार उन के व्यक्तित्व को बोल्ड एवं आत्मविश्वास से भरा दिखाने में उन की मदद कर सकता है, यह जानना और समझना बहुत जरूरी है.
कपड़ों के माध्यम से आप अपना आत्मविश्वास बढ़ा सकती हैं. उदाहरण के लिए अगर आप किसी मल्टीनैशनल कंपनी में काम करती हैं, तो वहां ज्यादातर कंपनियों में केवल फौर्मल ड्रैसेज ही पहनने को कहा जाता है. जब महिलाएं फौर्मल लुक कैरी करती हैं तो देखने वाले को भी लगता है कि हां इस महिला में कुछ बात है और वह खुद भी यह महसूस करती है कि उस में पहले से ज्यादा आत्मविश्वास आ गया है. उस के अंदर बोल्डनैस भी बढ़ी हुई होती है, जिस से किसी की हिम्मत नहीं होती कि कोई उस से फालतू बात कर सके.
अगर आप अपने औफिस में फौर्मल ड्रैसेज पहन कर नहीं जाती हैं तो एक बार ट्राई कीजिए. एक बार थ्री पीस फौर्मल वियर कैरी तो कीजिए. जब आप थ्री पीस पहनती हैं, कोट, पैंट और शर्ट के साथ टाई लगाती हैं तो खुद को आत्मविश्वास से भरा महसूस करती हैं, साथ ही औफिस में आप के साथ डील करने वालों का नजरिया भी आप के लिए बदल जाता है. वे आप को ज्यादा आदर दे कर आप से बात करते हैं. आप खुद महसूस करती हैं कि आप का व्यक्तित्त्व पहले से ज्यादा वजनदार हो गया है.
ऐसा इसलिए होता हैं, क्योंकि किसी भी ड्रैस का अपना रोब होता है. और जब आप उस ड्रैस को अपनाती हैं तो आप का व्यक्तित्व खिल उठता है. ड्रैस आप को आत्मविश्वास से भरी एक अलग पहचान देती है.
खुद को कैसे करें कैरी
बहुत सी महिलाओं को यह पता नहीं होता है कि अगर वे कौरपोरेट जगत में काम कर रही हैं तो उन्हें खुद को कैसे कैरी करना चाहिए. कई मामलों में वे दूसरों को कौपी करती हैं. ऐसे में महिलाओं को सलाह है कि-
– जब भी अपने औफिस के लिए ड्रैसेज खरीदें तो स्ट्रौंग कलर ही चुनें, क्योंकि जब आप कहीं जौब कर रही होती हैं तो आप अपने काम के प्रति जिम्मेदार व जवाबदेह भी होती हैं, इसलिए एक जिम्मेदार कर्मचारी की तरह दिखना भी जरूरी है. ऐसे में स्ट्रौंग कलर का चुनाव सही रहता है.
– कलर के साथसाथ इस बात का भी खयाल रखें कि आप की ड्रैस में कम से कम डिटेलिंग हो.
– आप जो भी ड्रैस अपने लिए चुन रही हैं उसे आत्मविश्वास के साथ पहनें. उस ड्रैस को पहन कर आप के अंदर किसी भी प्रकार का संकोच या झिझक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह संकोच आप के व्यक्तित्व को बहुत डाउन कर देता है.
– आप ने जो ड्रैस चुनी है वह सुविधाजनक होनी चाहिए. अगर थोड़ा भी लगता है कि इस ड्रैस को पहन कर आप खुद को सहज महसूस नहीं कर रही हैं तो मत पहनिए. दूसरा कोई विकल्प तलाशिए, क्योंकि अगर आप ने ऐसी ड्रैस पहन ली, जिस में आप सहज नहीं हैं तो दिन भर आप असहज महसूस करती रहेंगी और उस का बुरा असर आप के काम और व्यक्तित्व पर पड़ेगा.
– यदि आप औफिस में शर्ट पहन रही हैं तो उसे थोड़ा टक करिए और टक कर के थोड़ा सा बाहर निकालिए. शर्ट को इस तरह बाहर रखिए ताकि आप की बैल्ट लाइन न दिखे. यदि आप ट्राउजर और शर्ट पहन रही हैं तो आप की बैल्ट दिखनी नहीं चाहिए. अगर आप शर्ट को टक नहीं करना चाहती हैं और बाहर रखना चाहती हैं तो ध्यान रहे कि आप की शर्ट की लंबाई न तो बहुत छोटी हो और न ही ज्यादा लंबी, क्योंकि औफिस में खुली हुई ओवर साइज की शर्ट अच्छी नहीं लगती. इसलिए फिटिंग वाली शर्ट ही पहनिए.
– औफिसवियर स्कर्ट भी औफिस में पहनी जा सकती है, जिसे आप शर्ट या फौर्मल टौप के साथ पहन सकती हैं.
फौर्मल शर्ट्स के लिए बैस्ट कलर्स
फौर्मल शर्ट्स के लिए बैस्ट कलर है सफेद. आप के पास 1-2 सफेद शर्ट जरूर होनी चाहिए. इस के अलावा एक काली, एक ग्रे, एक नेवी ब्लू, एक औलिव ग्रीन कलर की शर्ट भी अपनी वाडरोब में जरूर रखें. आजकल पेस्टल शेड्स भी फौर्मल शर्ट में बहुत फैशन में हैं. आप उन्हें भी ट्राई कर सकती हैं.
औफिस में क्या न पहनें
टीशर्ट, फैंसी टौप, डैनिम या अन्य फैब्रिक्स की बनी छोटी स्कर्ट्स, मिनी ड्रैस आदि को औफिस में न पहनें, क्योंकि ये सभी ड्रैसेज आप को बहुत ही कैजुअल लुक देंगी. साथ ही औफिस में काम करने के लिए आरामदायक व सुविधाजनक भी नहीं होतीं. औफिस में आप का लुक फौर्मल ही होना चाहिए. कुछ औफिशियल मौकों पर आप वन पीस ड्रैस जोकि ट्यूनिक स्टाइल में हो, पहन सकती हैं.
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आपका मोबाइल नंबर जल्द ही बदलने वाला है. सरकार इसकी तैयारी कर रही है. अब मोबाइल नंबर 10 अंकों का नहीं बल्कि 13 अंकों के साथ आएंगे. 1 जुलाई 2018 के बाद नया नंबर लेने पर 13 अंकों को मोबाइल नंबर मिलेगा. केंद्रीय संचार मंत्रालय ने सभी राज्यों को इस संबध में निर्देश जारी कर दिए हैं. बीएसएनएल ने भी इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं. अधिकृत सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों दिल्ली में हुई बैठक में इस संबध में निर्णय लिया गया है.
इसलिए बंद होगी दस नंबरों की सीरीज
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में कहा गया कि 10 अंकों के लेवल में अब नए मोबाइल नंबरों की गुंजाइश नहीं बची है. इसी कारण 10 से अधिक अंकों की सीरीज शुरू की जाए और बाद में सभी मोबाइल नंबरों को 13 अंकों का कर दिया जाए.
सिस्टम अपडेट करने को कहा
मोबाइल नंबर की नई सीरीज आने से सभी सेवाप्रदाता कंपनियों को अपना सिस्टम अपडेट करना होगा. इस संबंध में सभी सर्कल की दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों को आदेश जारी कर दिया गया है. बीएसएनएल के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दिसंबर 2018 तक पुराने मोबाइल नंबर भी इसी प्रक्रिया के तहत अपडेट होंगे.
वर्तमान नंबर कैसे बदलेंगे, प्रक्रिया तय नहीं
सूत्रों के अनुसार वर्तमान में चल रहे 10 अंकों के मोबाइल नंबरों को अक्टूबर से 13 अंकों के अनुसार अपडेट करना शुरू किया जाएगा. यह काम 31 दिसंबर तक पूरा करना होगा. हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि वर्तमान में चल रहे मोबाइल नंबरों में बदलाव कैसे होगा. नंबरों में 3 डिजिट आगे की तरफ से जुड़ेंगे या अंत में.
मोबाइल के सौफ्टवेयर भी होंगे अपडेट
सूत्रों ने यह भी बताया कि इस संबध में मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने सौफ्टवेयर को भी 13 अंकों के मोबाइल नंबर के अनुसार अपडेट कर लें, ताकि उपभोक्ताओं को परेशानी न हो.
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भारत में अपने आप में स्वायत्त संस्थाएं कहलाने वाली संस्थाएं भी इस कदर अपने अपने मंत्रालयों के अधीन होती हैं, कि इन संस्थाओं से जुड़ने वाले शख्स चाहकर भी कोई अच्छा काम नही कर पाते हैं. ऐसा ही कुछ इन दिनों बड़ी तेजी से उभरकर आ रहा है. स्मृति ईरानी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद तथाकथित दो स्वायत्त संस्थाओं के चेयरमैन के जाने के बाद यह बात खुलकर सामने आ गयी है. स्मृति ईरानी के केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री बनते ही दो संस्थाओं के चेयरमैन हट गए.
सबसे पहले ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के चेयरमैन पहलाज निहलानी की छुट्टी हुई. सूचना प्रसारण मंत्रालय ने पहलाज निहलानी को उनके पद से बर्खास्त किया था. मगर‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी औफ इंडिया’ के चेयरमैन मुकेश खन्ना ने तो अपना कार्यकाल खत्म होने के दो माह पहले ही सूचना प्रसारण मंत्रालय व केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी की कार्यशैली के विरोध में त्यागपत्र दे दिया.
कई फिल्मों के अलावा कई सीरियलों में अभिनय कर चुके मुकेश खन्ना की पहचान ‘शक्तिमान’ के रूप में होती है. मुकेश खन्ना ने बच्चों के लिए ‘शक्तिमान’ नामक सीरियल का निर्माण और उसमें पहले भारतीय सुपर हीरो शक्तिमान का मुख्य किरदार भी निभाया था. यह सीरियल पूरे सात वर्ष तक प्रसारित हुआ. आज भी ‘शक्तिमान’ बच्चों का सबसे पसंदीदा सीरियल माना जाता है.
लगभग तीन वर्ष पहले जब मुकेश खन्ना को ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ का चेयरमैन बनाया गया था, तब उम्मीद जगी थी कि अब बच्चों के लिए कुछ बेहतरीन फिल्मों का निर्माण ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ करेगी. मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे. अब अपने पद से त्यागपत्र देने के बाद मुकेश खन्ना ने बताया कि उन्हे बच्चों के लिए बेहतर काम करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय और इस मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों से आपेक्षित सहयोग नहीं मिला. मुकेश खन्ना का दावा है कि उनके हर कदम का विरोध किया गया.
मुकेश खन्ना कहते हैं- ‘‘केंद्र में नई सरकार बनने के बाद मेरे पास ‘पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट’ और ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ में से किसी एक का चेयरमैन बनने का प्रस्ताव आया था. मैने बड़ी विनम्रता से इंकार कर दिया था. उसके बाद मेरे पास ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ का चेयरमैन बनने का प्रस्ताव आया. दो दिन मैने सोचा, तो मुझे लगा कि ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ से जुड़कर मैं बच्चों के लिए कुछ अच्छी फिल्मों का निर्माण कर सकता हूं.’’
मुकेश खन्ना आगे कहते हैं- ‘‘मगर मेरे अनुभव बहुत ही खराब व दुःखदायी रहे. ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ का चेयरमैन बनने के बाद मैने पाया कि हालात ऐसे हैं कि कोई भी चेयरमैन बच्चों के लिए कुछ कर ही नहीं सकता. मैने देखा कि ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ ने अब तक 260 फिल्मों का निर्माण किया है, पर सभी ‘कलात्मक सिनेमा’ और ‘फेस्टिवल’ वाली फिल्में है, जिन्हें बच्चें तो क्या बूढ़ा भी न देखना चाहे. मैने अपने तरीके से चीजों को सही करने का प्रयास किया. मैने सबसे पहले फिल्मों की पटकथा चयन करने वाली में बदलाव कर कुछ समझदार व अच्छे लोगों को जोडा. काफी मशक्कत के बाद करीबन 12 फिल्मों को स्वीकृति प्रदान की. इनमें से चार एनीमेशन फिल्में हैं. पर मसला बजट का अड़ गया. ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ को प्रति वर्ष फिल्मों का निर्माण करने के लिए दस करोड़ रूपए मिलते हैं. इनमें से एक करोड़ रूपए ‘उत्तरपूर्वी भारत’ की फिल्म के लिए होता है. अब आप बताएं कि इस युग में इतने कम पैसे में बेहतर सिनेमा कैसे बनेगा? खैर,हमने कुल चार फिल्मों का निर्माण किया. पर समस्या यह आ गयी कि इनका वितरण कैसे किया जाए. जब तक यह फिल्में सही ढंग से सिनेमा घरों में रिलीज नहीं होंगी, बच्चों को इन फिल्मों की जानकारी नहीं मिलेगी, बच्चे यह फिल्में नहीं देखेंगे, तब तक इनका निर्माण बेकार है. मगर फिल्म के प्रमोशन और उन्हे सिनेमाघर में रिलीज करने के लिए ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’के पास कोई बजट नही है.’’
मुकेश खन्ना आगे कहते हैं- ‘‘हमने इसका रास्ता निकालने के लिए प्रयास किए और बड़ी मशक्कत के बाद यह नियम बनवाया कि ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ की फिल्म को निजी निर्माता के साथ मिलकर सिनेमाघर में पहुंचाया जाए. पर इसमें भी मंत्रालय के अधिकारी कई तरह के रोड़े डालते रहते हैं.’’
मुकेश खन्ना आगे कहते हैं- ‘‘जब मैने ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’’ के चेयरमैन का पद संभाला, तो उस वक्त सूचना प्रसारण मंत्री अरूण जेटली थे. उनसे मेरा परिचय ‘शक्तिमान’ के निर्माण के दौरान से रहा है. तो उन्होने मेरी बातों को सुना और उस पर अमल करने का आश्वासन दिया. पर कुछ काम होता, उससे पहले उनके हाथ से मंत्रालय चला गया. फिर वेंकैया नायडू आए. उनसे भी पहचान रही है. उन्हे भी मेरे सुझाव पसंद आए. कुछ काम हुआ भी. पर बात आगे बढ़ती, उससे पहले ही वह उपराष्ट्रपति बन गए. अब सूचना प्रसारण मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी आ गयी. उनके आने के बाद तो मेरे लिए काम करना बहुत मुश्किल हो गया. अब तो सेक्रेटरी, ज्वाइंट सेक्रेटरी सहित सभी कई तरह के कानून का हवाला देकर मेरे हर कदम का विरोध करने लगे. कह दिया कि फिल्म को सिनेमाघर में प्रदर्शित करने के लिए पहले टेंडर मंगवाइए, वगैरह वगैरह. मैने सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी से मिलने का वक्त मांगा. मगर स्मृति जी ने मेरे पत्र को पाने की सूचना देना भी उचित नहीं समझा. पूरे चार माह तक इंतजार करने के बाद मैने ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ के चेयरमैन पद से त्यागपत्र देने का निर्णय लेते हुए अपना त्यागपत्र भेज दिया. पूरे सत्रह दिन तक मैं चुप रहा. सत्रह दिन बाद ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ के सीईओ के पास पत्र आया कि चेयरमैन के पद से मेरा त्यागपत्र मंजूर कर लिया गया है. दुःख की बात यह है कि मंत्री महोदया ने मेरा त्यागपत्र स्वीकार करने से पहले यह भी नही पूछा कि मुझे ऐसा करने की जरुरत क्यों पड़ी?
मुकेश खन्ना कहते हैं- ‘‘मैं महसूस कर रहा हूं कि यहां किसी की कोई सुनवायी नही है. जब ‘चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी’ के चेयरमैन को मिलने के लिए ‘सूचना प्रसारण मंत्री’ समय नहीं दे सकती, तो काम कैसे होगा? सब कुछ ठप्प सा हो गया है.’’
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वर्ष 2016 में आई फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी’ ने दर्शकों और समीक्षकों के बीच खूब वाहवाही लूटी थी. पिछले कुछ दिनों से इस फिल्म के सीक्वल को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है. अब खबरे आ रही हैं कि इसका सीक्वल ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ 24 अगस्त को सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली है.
इसके पहले भाग में भगौड़ी दुल्हन की भूमिका निभा चुकीं डायना पेंटी एक बार फिर से ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ में सोनाक्षी सिन्हा के साथ वापसी कर रही हैं. जिनका भी किरदार एक भगौड़ी दुल्हन का है.
डायना ने ट्वीट कर खुद इसकी जानकारी दी है. डायना ने हाल ही में इस फिल्म का टीजर शेयर करते हुए लिखा, अब पता चला कि अकेली मैं ही हैप्पी नहीं हूं. एक और है जो भाग खड़ी हुई है. जूते बांध लो सोनाक्षी सिन्हा. ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’. 24 अगस्त.
फिल्म के पहले भाग का निर्देशन कर चुके मुदस्सर अजीज इसके सीक्वल के भी निर्देशक हैं. यह गायक जस्सी गिल की पहली बौलीवुड फिल्म होगी.
फिल्म के पहले भाग का निर्देशन कर चुके मुदस्सर अजीज इसके सीक्वल के भी निर्देशक हैं. यह गायक जस्सी गिल की पहली बॉलीवुड फिल्म होगी. उन्होंने ट्वीट किया, इस खबर को आप लोगों से साझा करते हुए रोमांच और गर्व महसूस हो रहा है. यह मेरी पहली बौलीवुड फिल्म है, जो 24 अगस्त को रिलीज होगी. बता दें कि इस फिल्म में डायना पेंटी और सोनाक्षी सिन्हा को अलावा अभय देओल, अली फजल और जिम्मी शेरगिल प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे.
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