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मार्च से देश भर में बंद हो सकता है मोबाइल वौलेट, जानें वजह

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अगर आप मोबाइल वौलेट का प्रयोग करते हैं तो हो सकता है कि मार्च से देश भर में चल रहे कई मोबाइल वौलेट को बंदकर दिया जाए. इस बारे में रिजर्व बैंक औफ इंडिया जल्द फैसला लेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि मोबाइल वौलेट कंपनियों ने रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए एक अहम आदेश को पूरा नहीं किया है.

आइये जानें ऐसा करने के पीछे क्या वजह है –

केवाईसी नौर्म्स को करना था पूरा

आरबीआई ने देश में लाइसेंस प्राप्त सभी मोबाइल वौलेट कंपनियों को अपने ग्राहकों का केवाईसी नौर्म्स पूरा करने के लिए फरवरी 2018 तक का वक्त दिया था. खबरे हैं कि ज्यादातर कंपनियां आरबीआई के इस आदेश को पूरा नहीं कर पाई हैं. अगर फरवरी तक यह पूरा नहीं हुआ तो देश भर में कई कंपनियों के मोबाइल वौलेट बंद किये जा सकते हैं.

ज्यादातर कस्टमर्स ने नहीं दिया है अपना केवाईसी

अभी पूरे देश में 9 फीसदी से कम मोबाइल वौलेट उपभोक्ताओं ने अपने केवाईसी कंपनियों को दिया है. ऐसे में देश में 91 फीसदी से अधिक मोबाइल वौलेट अकाउंट बिना केवाईसी के चल रहे हैं. ऐसे में इन 91 फीसदी उपभोक्ताओं के अकाउंट के बंद होने की आशंका जताई जा रही है.

जल्द करा लें केवाईसी पूरा

एयरटेल मनी, पेटीएम आदि मोबाइल वौलेट सेवा प्रदाता कंपनियां ग्राहकों को समय-समय पर केवाईसी पूरा करने के लिए सूचित कर रही है. ग्राहकों को अपने मोबाइल वौलेट को आधार कार्ड और पैन कार्ड से लिंक कराना होगा, इस तरह से केवाईसी पूरा हो जाएगा. इसके बाद आपका मोबाइल वौलेट सुरक्षित हो जाएगा.

अगर आप चाहते हैं कि आपका मोबाइल वौलेट बंद ना हो तो जल्द से जल्द आपको केवाईसी पूरा करने की जरूरत है. आरबीआई के इस आदेश को 1 मार्च तक पूरा करना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आपका मोबाइल वौलेट अकाउंट बंद कर दिया जाएगा.

कैप्टन कूल को इतने गुस्से में पहले कभी नहीं देखा होगा आपने

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कप्तान जीन पौल डुमिनी (नाबाद 64) और हेनरिक क्लासेन (69) की शानदार बल्लेबाजी के दम पर दक्षिण अफ्रीका ने बुधवार को खेले गए दूसरे टी-20 मैच में भारत को छह विकेट से हरा दिया. सुपरस्पोर्ट पार्क में खेले गए इस मैच में जीत हासिल करने के साथ ही दक्षिण अफ्रीका ने तीन टी-20 मैचों की सीरीज को 1-1 से बराबर कर दिया है. पहले बल्लेबाजी करते हुए भारतीय क्रिकेट टीम ने मेजबान को 189 रनों का लक्ष्य दिया था, जिसे दक्षिण अफ्रीका की टीम ने चार विकेट के नुकसान पर 18.4 ओवरों में ही हासिल कर लिया.

इस मैच में टौस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम ने मनीष पांडे (नाबाद 79) और महेंद्र सिंह धोनी (नाबाद 52) की अर्धशतकीय पारियों के दम पर निर्धारित 20 ओवरों में चार विकेट के नुकसान पर 188 रन बनाए. सेंचुरियन के मैदान पर काफी दिनों बाद धोनी का विस्फोटक अंदाज देखने को मिला है. धोनी ने अपनी इस अर्धशतकीय पारी में खूब चौके-छक्के बरसाए.

टीम इंडिया ने 45 के स्कोर पर अपने तीन विकेट (रोहित शर्मा, शिखर धवन और विराट कोहली) गंवा दिए थे. ऐसे में पांडे उम्मीद की किरण बनकर मैदान पर उतरे. उन्होंने मंझी हुई बल्लेबाजी के दम पर रैना के साथ चौथे विकेट के लिए 45 रनों की साझेदारी की और टीम को 90 के स्कोर तक पहुंचाया. हालांकि, यहां अपनी लय तलाश रहे सुरेशा रैना को अंदिले फेहुलकवायो ने 90 के स्कोर पर ही एलबीडब्ल्यू आउट कर भारत का चौथा विकेट भी गिरा दिया. पांडे ने इस बीच, 15वें ओवर की आखिरी गेंद पर एक रन लेने के साथ ही अपने टी-20 करियर का दूसरा अर्धशतक लगाया.

मनीष पांडे ने इसके बाद धौनी के साथ यहां से टीम की पारी को संभाला 98 रनों की शानदार साझेदारी कर निर्धारित 20 ओवरों में टीम का स्कोर 188 तक पहुंचाया. इसके साथ ही भारतीय टीम की पारी समाप्त हो गई. धोनी और पांडे नाबाद रहे. इस पारी में पांडे ने 48 गेंदों में छह चौके और तीन छक्के लगाए, वहीं धोनी ने भी अपने टी-20 करियर दूसरा अर्धशतक पूरा किया. उन्होंने 28 गेंदों में चार चौके और तीन छक्के लगाए.

इस मैच में धोनी की आक्रामक बल्लेबाजी के साथ-साथ आखिरी ओवर में उनका गुस्सा भी देखने को मिला. आमतौर पर जब धोनी मैदान पर होते हैं तो वह काफी कूल रहते हैं. उनकी इसी कूलनेस की वजह से उन्हें ‘कैप्टन कूल’ का तमगा मिल चुका है, लेकिन सेंचुरियन में मैच के आखिरी पलों में धोनी का एक अलग ही रूप देखने को मिला.

दरअसल, मैच के आखिरी ओवर में जब धोनी स्ट्राइक पर थे तो उन्होंने नाराजगी जताते हुए स्कोरबोर्ड की ओर देख रहे मनीष पांडे को जमकर डांट भी लगाई. धोनी ने इस दौरान मनीष पांडे से कहा- ‘ओए, वहां क्या देख रहा है, इधर देख ले, आवाज नहीं आएगी, इशारा देखना’.  इस वक्त धोनी काफी गुस्से में नजर आ रहे थे.

धोनी के इस वीडियो के कई स्क्रीनग्रैब लिए गए और फैन्स ने इसे सोशल मीडिया पर वायरल किया. सोशल मीडिया पर लोगों ने इस वीडियो को अलग-अलग कैप्शन के साथ शेयर किया है. किसी ने इसे ‘माही वे’ कहा है तो किसी ने लिखा है- कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मैच के हाइएस्ट स्कोरर हैं, लेकिन अगर आप धोनी की दो रनों की कौल पर भरोसा नहीं करते हैं, तो आप इसी के लायक हैं.

बता दें कि काफी वक्त बाद महेंद्र सिंह धोनी की ऐसी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी देखकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह था और मैदान पर सिर्फ धोनी-धोनी की आवाज गूंज रही थी. ऐसे में धोनी ने मनीष पांडे से कहा कि वो उनके इशारों को समझें क्योंकि शोर की वजह से आवाज वहां तक नहीं पहुंच पाएगी.

भारत-दक्षिण अफ्रीका के बीच सीरीज का तीसरा और निर्णायक मैच कैपटाउन में 24 फरवरी को खेला जाएगा.

अभिनेत्री ही नहीं कवयित्री भी हैं दीपिका पादुकोण

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बौलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण की एक्टिंग का हर कोई दिवाना है. फिल्म ‘पद्मावत’ के बाद दीपिका की पौपुलैरिटी देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी देखने को मिली है. अब दीपिका ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपनी लिखी हुई एक कविता शेयर की है. कविता का शीर्षक ‘आई एम’ है. उनकी यह कविता सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही है. दरअसल, यह कविता दीपिका ने सातवीं क्लास में लिखी थी उन्होंने अपनी इस कविता को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए इसके कैप्शन में लिखा, सातवीं कक्षा में मैंने कवि बनने की कोशिश की थी.

उनकी कविता की शुरुआती चार लाइनों में लिखा है, ‘आई एम अ चाइल्ड विद लव एंड केयर, आई वंडर हाओ फार द स्टार्स रीच, आई हियर का रश औफ द वेव्स, आई सी द डीप ब्लू सी…’ उनकी इस पोस्ट पर कई लोगों ने कमेंट्स किए हैं. किसी ने लेखिका बोला, तो किसी ने उनकी कोशिश की सरहाना की है. उनके इस पोस्ट पर यूजर्स ने लिखा कि वाव मैम, यह काफी प्रेरणात्मक कविता है. वहीं एक ने लिखा कि यह बहुत क्यूट है दीपू.

गौरतलब है कि दीपिका जल्द ही विशाल भारद्वाज की फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाली हैं. उनकी इस फिल्म की कहानी सपना दीदी पर आधारित हैं और सपना दीदी बीते वक्त में मुंबई की एक माफिया थीं. इस फिल्म में दीपिका के साथ इरफान खान भी अहम भूमिका में नजर आएंगे. फिल्म का नाम ‘रानी’ रखा गया है और फिल्म के लिए दीपिका जम कर तैयारी कर रही हैं. दीपिका और इरफान की यह एक साथ दूसरी फिल्म है. दोनों इससे पहले फिल्म पीकू में नजर आए थे.

सुपर 30 : सड़क पर पापड़ बेचते हुए दिखाई दिए ऋतिक रोशन

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बौलीवुड एक्टर ऋतिक रोशन हमेशा अपनी एक्टिंग में कुछ न कुछ नयापन लाने की कोशिश में रहते हैं और अपने किरदार में हर तरह से खुद को ढालने की कोशिश करते हैं. ऋतिक जल्द ही फिल्म ‘सुपर 30’ में नजर आने वाले हैं और उन्होंने अपनी इस फिल्म की शूटिंग भी शुरू कर दी है. इसी बीच उनकी कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही हैं. इन तस्वीरों में ऋतिक सड़कों पर पापड़ बेचते हुए नजर आ रहे हैं और उनको देख पहचान पाना भी थोड़ मुश्किल हो रहा है.

बता दें, इस फिल्म में वह ‘सुपर 30’ के आनंद कुमार की भूमिका निभाने वाले हैं और उन्होंने आनंद जैसा लुक पाने के लिए काफी मेहनत की है. इन तस्वीरों में भी यह साफ हो रहा है कि उन्होंने आनंद जैसा दिखने के लिए खुद पर काफी काम किया है. ऋतिक की इन तस्वीरों से यह तो साफ हो गया है कि वह आनंद कुमार के किरदार में पूरी तरह से घुस चुके हैं.

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आपको बता दें कि इस फिल्म की शूटिंग शुरू होने से कुछ वक्त पहले ही आनंद ने ऋतिक के लुक को देखा था और वह उनके लुक को देख कर काफी हैरान रह गए थे. इसके बाद उन्होंने अपनी पोस्ट में भी लिखा था, ‘विकास बहल ने फिल्म शुरू करने बस कुछ समय पहले मुझे ऋतिक रोशन का लुक दिखाया था, जिसे देखने के बाद मैं पूरी तरह से दंग रह गया था.’

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बता दें, इस फिल्म की कहानी जाने-माने गणितज्ञ आनन्द कुमार के जीवन पर आधारित है. आनन्द कुमार ने गरीब बच्चों के लिए आईआईटी की तैयारी करने के लिए सुविधा मुहैया कराई है. आनन्द कुमार को अपनी बायोपिक फिल्म के लिए ऋतिक रोशन ही सबसे बेहतरीन कलाकार लगते हैं. इस फिल्म में ऋतिक के साथ छोटे पर्दे की एक्ट्रेस मृणल ठाकुर नजर आएंगी.

खत्म होने जा रहा है इस टेलीकौम कंपनी का वजूद

टेलीकौम कंपनी एयरसेल दिवालिया होने की कगार पर है. ऐसे में इस कंपनी का वजूद कभी भी खत्म हो सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लौ ट्रिब्यूनल) जल्द ही कंपनी को दिवालिया घोषित कर सकता है. ऐसे में कंपनी बंद होने के साथ ही सभी सर्किल्स में इसकी सेवाएं भी बंद हो जाएंगी. बता दें कि मलेशिया की कंपनी मैक्सिस ने कुछ समय पहले एयरसेल को आर्थिक मदद देने का प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन अब इस कंपनी ने भी अपने कदम पीछे खींच लिये हैं.

कंपनी के ऊपर 15,500 करोड़ रुपये का कर्ज है. करदाताओं ने कंपनी से पैसे मांगने शुरू कर दिये हैं, लेकिन कंपनी के पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं. एयरसेल सितंबर के महीने से कर्जदाताओं से इस मामले में बातचीत कर रही है, लेकिन कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है. गौरतलब है कि वर्ष 2016 में जियो की लांचिंग के बाद से ही एयरसेल को नुकसान होना शुरू हो गया और अब हालात इतने बिगड़ गये हैं. इस सब के बीच कंपनी के ग्राहक परेशान हैं.

इस कंपनी के ग्राहकों को एयरसेल के नंबर को पोर्ट कराने में दिक्कत हो रही है. इसका कारण एक साथ बहुत पोर्टिंग रिक्वेस्ट आना बताया जा रहा है. बिहार-झारखंड में सोमवार से मोबाइल के नेटवर्क और डेटा सर्विस में भी दिक्कत आ रही है.

इन्हें होगा नुकसान

एयरसेल के ऊपर आये इस संकट से इसके यूजर्स तो प्रभावित होंगे ही, जिनके सिम कार्ड जल्द ही रद्दी हो जायेंगे. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान इस कंपनी के लगभग 5000 कर्मचारियों को होगा. इसके साथ ही टावर औपरेटर्स जीटीएल इन्फ्रा, भारती इन्फ्राटेल, इंडस टावर और एटीसी को भी नुकसान होगा. इनके अलावा, एरिक्सन, नोकिया और जेडटीई जैसे नेटवर्क मैनेजमेंट वेंडर्स को भी एयरसेल के दिवालिया घोषित किये जाने से काफी प्रभाव पड़ेगा.

बंद होगा कर्मचारियों का वेतन

एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, कंपनी ने अपना बोर्ड भंग करते हुए एनसीएलटी के सामने दिवालिया घोषित किये जाने की अर्जी दाखिल कर दी है. बताया जाता है कि कंपनी के पास अब बिजनेस को चालू रखने के लिए पैसे नहीं हैं. कहा यह भी जा रहा है कि इस हफ्ते के अंत तक कंपनी अपने कर्मचारियों को वेतन देना भी बंद कर देगी. वहीं, अगर कंपनी दिवालिया घोषित कर दी जाती है तो लगभग 5000 कर्मचारी बेरोजगार हो जायेंगे.

इन 6 सर्किल्स में पहले ही बंद हो चुकी है सेवाएं

बता दें कि एयरसेल ने पिछले सितंबर के बाद से बैंकों की कर्ज की किस्त तक नहीं चुकाई है, जिस वजह से कंपनी का कर्ज रिस्ट्रक्चर नहीं हो पाया. रिजर्व बैंक के सभी डेट रीस्ट्रक्चरिंग स्कीम पर पाबंदी लगाने की वजह से एयरसेल को यह फैसला करना पड़ा.

कर्जदाताओं के ग्रुप का नेतृत्व कर रहा SBI

बताते चलें कि करदाताओं के समूहों का नेतृत्व स्टेट बैंक औफ इंडिया कर रहा है. इस मामले में बैंक ने कुछ भी कहने से मना कर दिया है. वहीं, इस मामले में एयरसेल ने भी आधिकारिक तौर पर कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया है.

अब मार्केट में बचे सिर्फ ये खिलाड़ी

एयरसेल के दिवालिया घोषित होने के बाद कंपनी के तौर पर उसका वजूद खत्म हो जायेगा. इसके बाद बाजार में जियो, एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया ही बाकी रह जायेंगे. इनके अलावा, दो सरकारी कंपनी एमटीएनएल और बीएसएनएल होंगी. वहीं, आइडिया-वोडाफोन का मर्जर पूरा होने पर टेलीकौम मार्केट में सिर्फ तीन खिलाड़ी रह जायेंगे.

अपने स्मार्टफोन की स्पीड बढ़ाने के लिए करें ये काम

एंड्रायड स्मार्टफोन्स के धीमे होने की कई वजहें होती हैं. शुरुआती कुछ महीनों में तो फोन ठीक-ठाक चलता है, पर धीरे-धीरे यह स्लो होने लगता है. अगर आप भी अपने स्मार्टफोन के स्पीड को लेकर परेशान हैं, तो ये खबर इस परेशानी से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित हो सकता है. जो भी यूजर्स अपने स्मार्टफोन्स के स्लो होने से परेशान हैं, वो नीचे दिए गए टिप्स का इस्तेमाल कर सकते हैं.

थर्ड-पार्टी ऐप लौन्चर इंस्टौल करें

ज्यादातर एंड्रायड स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां अपने डिवाइस पर औपरेटिंग सिस्टम को कस्टमाइज कर लेती हैं. औपरेटिंग सिस्टम के फीचर्स के अलावा कंपनी के यूजर इंटरफेस में नए विजेट, लेआउट और अन्य फीचर दिया जाता है. वैसे तो कुछ यूजर्स इन कस्टमाइजेशन और फीचर्स को उपयोगी मानते हैं, पर इनमें आपके स्मार्टफोन को स्लो करने की भी क्षमता है. इससे निजात पाने का सबसे बेहतरीन तरीका है, थर्ड-पार्टी लौन्चर. ये ज्यादातर कस्टम फीचर को हटा देगा, साथ में आपको पर्सनलाइजेशन का विकल्प भी देगा. Google Play स्टोर उपलब्ध सबसे बेहतरीन लौन्चर में ‘Nova Launcher’, ‘GO Launcher EX’ और ‘Apex Launcher’ शामिल हैं.

बेकार ऐप्स को हटाएं

अगर यूजर ने अपने फोन पर काफी संख्या में ऐप्स इंस्टौल कर रखा है, तो इससे उनका स्मार्टफोन स्लो हो सकता है. जिन ऐप्स को इंस्टौल किया है, उनमें से जिस ऐप को आप इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं उसे फोन से हटा दें. कुछ ऐप्स को अनइंस्टौल नहीं किया जा सकता, खासकर स्मार्टफोन मैनिफैक्चरर द्वारा दिए गए ऐप्स. ऐसे में उन्हें डिसेबल कर देना सही होगा.

कुछ ऐप्स फोन के स्टार्ट होते ही काम करने लगते हैं. वहीं, कुछ निरंतर ही औनलाइन सर्विसेज के साथ सिंक होते रहते हैं. दोनों किस्म के ऐप नाटकीय तौर से स्मार्टफोन को धीमा कर सकते हैं. यह जानने के लिए कि कौन से ऐप बैकग्राउंड में चल रहे हैं, यूजर को सेटिंग्स में ऐप्स सेक्शन में जाना चाहिए. इसके बाद ‘Running’ टेब पर स्वाइप करें. अगर ऐसे ऐप्स हैं, जो बैकग्राउंड में चल रहे हैं और उनका इस्तेमाल नहीं है, तो ऐसे ऐप्स को अनइंस्टौल कर देना चाहिए.

इसके अलावा स्मार्टफोन यूजर को Advanced Task Killer को जरूर इंस्टौल करना चाहिए. यह ऐप उन सभी ऐप्स को बंद कर देता है, जो बहुत ज्यादा मैमोरी का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर किसी और कारण से डिवाइस को धीमा कर रहे हैं.

ऐप का cache क्लियर करें

जिन ऐप्स का इस्तेमाल बार-बार होता है, उनके cache तैयार होने लगते हैं जो किसी भी एंड्रायड स्मार्टफोन को धीमा कर सकता है और यूजर्स इस्तेमाल में लाए गए हर ऐप के cache को निरंतर डिलीट करके अपने डिवाइस की स्पीड बढ़ा सकते हैं. हर ऐप का cache डिलीट करने के लिए यूजर्स को Settings>Apps में जाने की जरूरत है. जरूरी ऐप को चुनकर ‘Clear cache’ बटन पर क्लिक करना होगा.

एनिमेशन्स डिसेबल करें

एनिमेशन्स मुख्य तौर पर मेन्यू, ऐप ड्राअर्स और अन्य इंटरफेस लोकेशन्स में ग्राफिकल ट्राजिशन के बीच काम करते हैं. ये सिस्टम रिसोर्स का इस्तेमाल करते हैं और स्मार्टफोन के इस्तेमाल के दौरान रेगुलर एक्टिव रहते हैं. स्मार्टफोन इस्तेमाल करने के अनुभव को बेहतर बनाने के अलावा ये किसी काम के नहीं हैं. अगर यूजर्स को लगता है कि उनका डिवाइस धीमा हो रहा है, तो वे एनिमेशन्स को टर्न औफ कर सकते हैं.

एनिमेशन्स को टर्न औफ करने का विकल्प अक्सर ‘Developers options’ सेक्शन में छिपा रहता है. ‘Developers options’ एक्सेस करने के लिए यूजर्स को Settings>System>About Phone में जाने की जरूरत है. यहां पर वे फोन का ‘Build number’ देख सकते हैं. ‘Build number’ पर सात बार टैप करने के बाद यूजर्स को सिस्टम मेन्यू में ‘Developer options’ दिखने लगेगा.  यहां पर सभी किस्म के एनिमेशन को बंद कर सकते हैं. यूजर्स को एक बात का ध्यान जरूर रखना होगा कि वह इस सेक्शन के किसी और विकल्प के साथ छेड़छाड़ न करें.

बिल्ट-इन स्टोरेज को क्लीन करें

अगर आपके स्मार्टफोन का बिल्ट-इन स्टोरेज लगभग फुल हो गया है, तो आपका स्मार्टफोन बहुत ज्यादा धीमा हो सकता है. फोन को धीमा होने से बचाने के लिए फोन के टोटल बिल्ट-इन स्टोरेज का 10 से 20 फीसदी के बीच उपलब्ध या फ्री होना चाहिए. आसान तरीका यह है कि आप उन सभी ऐप्स को डिलीट कर दें जिन्हें इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.

माइक्रोएसडी कार्ड स्टोरेज बढ़ाने का विकल्प

अगर यूजर के स्मार्टफोन में माइक्रोएसडी कार्ड स्टोरेज बढ़ाने का विकल्प है, तो उन्हें अपने सारे फोटो, म्यूजिक और वीडियो को इस पर मूव कर देना चाहिए. ऐप्स को भी इंटरनल स्टोरेज से एसडी कार्ड में मूव किया जा सकता है. इसके लिए ऐप की सेटिंग्स में जाना होगा. Settings>App में जाने के बाद हर ऐप में नेविगेट करना होगा. Android के कुछ पुराने वर्जन इस फीचर को सपोर्ट नहीं करते हैं और इसके लिए यूजर को Google Play स्टोर से ‘Apps to SD card’ ऐप डाउनलोड करना होगा.

फर्मवेयर अपडेट करें

वैसे कुछ अपडेट्स आपके फोन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, पर सामान्य तौर पर स्मार्टफोन के फर्मवेयर अपडेट होने से कई तरह के सुधार होते हैं. इसमें मुख्यतः परफौर्मेंस औप्टिमाइजेशन शामिल हैं. जिन यूजर्स को स्मार्टफोन को लेकर शिकायत है, उन्हें जांच लेना चाहिए कि क्या मैनिफेक्चरर ने फोन के लिए फर्मवेयर अपडेट रिलीज किया है. इसके लिए, यूजर को Settings>System>About>Software Updates में जाकर चेक करना चाहिए.

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सरकारी नौकरी का मोह और देश में बेरोजगार युवाओं की तादाद

‘‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम,’’ संत दास मलूक की यह पंक्ति आज के वक्त में बिलकुल ठीक बैठती है. खासकर बात जब सरकारी नौकरी की हो. देश में लाखों लोग सरकारी नौकरी में लगे हुए हैं जिन में कई लाख केंद्र सरकार में नौकरी कर रहे हैं और बाकी लोग विभिन्न राज्यों में. केंद्र और राज्य सरकारें इन कर्मचारियों पर अरबों रुपए हर माह खर्च करती हैं, लेकिन सरकार के खर्च के अनुरूप सरकारी मुलाजिम काम नहीं करते.

21वीं सदी में भारत जैसे विकासशील देश में हर युवा की यही ख्वाहिश होती है कि पढ़लिख कर किसी भी तरीके से उसे सरकारी नौकरी का तमगा मिल जाए. दुनिया में जहां विकसित देश के युवाओं का रुझान प्राइवेट जौब की तरफ है, वहीं हमारे देश में सरकारी नौकरी का मोह हर किसी को है. सरकारी नौकरी आज के दौर में भारत के नौजवानों की पहली पसंद बनी होने की कई वजहें हैं.

बेरोजगारी का आलम

आज के युवाओं की सीधी सी सोच है कि किसी भी तरह 12वीं पास या ज्यादा से ज्यादा ग्रेजुएशन कर के सरकारी नौकरी की तलाश में लग जाएं. देश में बेरोजगारी बहुत ज्यादा है और नौकरियां काफी कम. पहले तो सरकारी नौकरियां निकलती नहीं, अगर निकलती भी हैं तो पदों की संख्या काफी कम रहती है जबकि आवेदक काफी होते हैं.

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देश में बेरोजगारी का आलम यह है कि पिछले साल उत्तर प्रदेश में क्लर्क की वैकेंसी में 250 से अधिक आवेदन पीएचडीधारकों ने भेजे थे. इस बात से साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए वे किस कदर बेचैन हैं.

सरकारी नौकरी में सिर्फ एक ही पेंच है और वह है आप को किसी भी तरह एक बार नौकरी मिल जाए, फिर तो आप राजा बन गए. जो लोग सरकार की तरफ से सारी सुखसुविधाओं का भोग करते हैं, उन में से ज्यादातर लोग कामचोरी करते हैं. काम करने का भी उन का अलग अंदाज होता है. हर काम के लिए चढ़ावा (रिश्वत) लेते हैं. चढ़ावा भी काम के हिसाब से रहता है. अगर  छोटा काम तो कम पैसों में बात बन जाती है, वरना मोटी रकम अदा करनी पड़ती है. यह हाल देश के लगभग सभी विभागों का है.

बात चाहे लाइसैंस बनवाने की हो, वोटर आईडी कार्ड की हो, पैंशन की हो या किसी भी प्रकार की, हर जगह कुछ ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो बिना रिश्वत के आप की फाइल को आगे नहीं बढ़ाते. सरकारी नौकरी का सब से ज्यादा सुख प्राथमिक स्कूल के शिक्षक भोग रहे हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के स्कूलों का सब से बुरा हाल है. वहां के स्कूलों में शिक्षक कम हैं और जो हैं भी, वे पढ़ाते नहीं.

उत्तर प्रदेश में तो शिक्षक कईकई दिनों तक स्कूलों की शक्ल भी नहीं देखते. सरकार ने तमाम तरीके अपना लिए हैं, लेकिन शिक्षकों की कामचोरी पर अभी तक लगाम नहीं लग पाई. सरकारी नौकरी क्यों लोगों की पहली पसंद बनी हुई है? आखिर क्या कारण है कि लाखों रुपए के पैकेज को छोड़ कर सरकारी नौकरी करने की चाहत आज भी कम नहीं हो पा रही? इस के एक नहीं, बल्कि कई कारण हैं, जिन के चलते युवा सरकारी नौकरी पाने के पीछे कई साल लगा देते हैं.

सरकारी बनाम प्राइवेट जौब

  • प्राइवेट नौकरी में आप को अपने बौस के सीट से उठने का इंतजार होता है और देररात तक औफिस में रुक कर बौस के मेलमैसेज आने का इंतजार करना पड़ता है. मेल नहीं तो कभी किसी और जरूरी काम से रुकना पड़ता है. वहीं, सरकारी नौकरी में ऐसा कोई चक्कर ही नहीं है. यहां आप सिर्फ 8 घंटे के कर्मचारी हैं. उस के बाद तो कुरसी से उठ कर बेहतरीन सी अंगड़ाई लीजिए और घर जा कर परिवार के साथ मस्त शाम बिताइए.
  • प्राइवेट नौकरी में तरक्की और सैलरी पैकेज आप की परफौर्मेंस पर निर्भर करते हैं. आप अगर औफिस में बौस के मुताबिक अच्छा परफौर्म नहीं कर पाए तो सालों तक एक ही पद पर और एक ही सैलरी स्केल पर काम करना पड़ सकता है. वहीं, सरकारी नौकरी में अगर सैंट्रल गवर्नमैंट ने पे-कमीशन लागू कर दिया तो आप भले ही कामचोर या निकम्मे कर्मचारी हों, आप की तनख्वाह बढ़नी तय है.
  • प्राइवेट नौकरी में तो अकसर ओवरटाइम के नाम पर औफिस के पैंडिंग कामों को पूरा करने के लिए संडे को भी बुला लिया जाता है. अब बेचारे क्या करें, बौस का आदेश है. नौकरी करनी है तो परिवार के साथ एंजौयमैंट को भूलना ही पड़ेगा. वहीं, सरकारी मुलाजिम की तो हर हफ्ते छुट्टियां तय हैं. संडे तो संडे, हर शनिवार भी औफिस का गोला लग ही जाता है.
  • अगर आप प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं और आप का ऐक्सिडैंट हो जाता है तो आप को जितने दिनों की छुट्टियां चाहिए, उतने दिनों की पगार कटवानी होगी. इस के विपरीत सरकारी मुलाजिमों को मैडिकल लीव मिलती है और उस पर पूरे महीने की पगार भी मिलती है. सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए मैडिकल की सुविधा दे रखी है. इलाज के लिए सरकार की तरफ से मैडिकल अलाउंस यानी चिकित्सा भत्ता मिलता है. इस भत्ते से पीडि़त का पूरा इलाज भी होता है. यही नहीं, किसी भी सरकारी अस्पताल में पूरी तरह से फ्रीचैकअप की भी सुविधा मिलती है.
  • सरकारी कर्मचारियों को अपने पदों के अनुसार घरकिराया भत्ता भी मिलता है. इस के अलावा उच्च पदों वाले सरकारी कर्मचारियों को तो वेलमेंटेंड आवासीय भत्ता दिया जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को तो बड़े घरों की सुविधा मिलती है, जिस में लौन और आंगन जरूर होता है. एक आईएएस औफिसर को बड़े सरकारी घर के साथ घर में काम करने वाले नौकर व सिक्योरिटी गार्ड तक मिलते हैं. इस के अलावा सरकारी कर्मचारियों को दूसरी सहूलियतें भी मिलती हैं.
  • आज के दौर में कंपीटिशन इतना ज्यादा बढ़ गया है कि प्राइवेट संस्थान आप को तभी पगार देगा जब आप अपनी पगार से कई गुना ज्यादा संस्थान को कमा कर दें. मंदी के समय प्राइवेट संस्थान में काम करने वालों को दिनरात टैंशन में काम करना पड़ता है. हर वक्त नौकरी जाने का खतरा सताता रहता है. अगर एक बार आप की नौकरी गई तो सेविंग्स के अलावा आप के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं होगा. वहीं, सरकारी नौकरी लग गई तो जीवनभर की फुरसत. नौकरी से रिटायर होने के बाद भी आप को तनख्वाह के तौर पर घर बैठे पैंशन व अन्य लाभ मिलते रहेंगे.
  • प्राइवेट नौकरी पर रहते हुए अगर आप किसी काम के लिए बैंक में लोन के लिए अप्लाई करते हैं, तो आप को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. इस का कारण यह है कि आप की जौब कभी भी जा सकती है. इस के अलावा उस पर जुड़ने वाला इंट्रैस्ट रेट हर महीने आप को डराता है. सरकारी मुलाजिमों को सरकारी नौकरी के आधार पर आसानी से लोन भी मिल जाता है और उस पर ब्याज की दर भी कम पड़ेगी.

सुरक्षित भविष्य का मोह

उपरोक्त तमाम बातों से साफ है कि आज के आधुनिक युग में भी हमारे देश के युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी करना है. सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर कोचिंग संस्थान अरबों रुपए का बिजनैस कर रहे हैं. सिविल सर्विसेज परीक्षा में हर साल लाखों परीक्षार्थी बैठते हैं, जिन में से बामुश्किल कुछ सौ परीक्षार्थियों को नौकरी मिल पाती है. इतना सब होने के बाद भी सरकारी नौकरी से युवाओं का मोह भंग नहीं हो रहा है.

अगर आप किसी विभाग में बड़े ओहदे पर पहुंच गए तो आप की अफसरशाही अलग ही रहेगी. कुल मिला कर सरकारी नौकरी मिलने से भविष्य सुरक्षित हो जाता है और यह सुकून रहता है कि जिंदगी की गाड़ी अगर बहुत तेज भी न चली, तो इस बात पर शक नहीं है कि आराम से चलती रहेगी.

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निजी स्कूलों की मनमानी और खाली होती अभिभावकों की जेबें

पढ़ाई के नाम पर कमाई की दुकान का दूसरा नाम बन चुके प्राइवेट स्कूलों को न तो बच्चों की पढ़ाई की चिंता है न उन की सुरक्षा की, उन्हें चिंता है तो बस अपने हित साधने की. क्लासरूम में बच्चों के लिए भले ही सहूलियतें न हों पर वे फीस समय पर वसूलते हैं. आनेजाने की नियमित सुविधा दें या न दें पर बस का किराया पूरा व समय पर लेते हैं.

शिक्षा के नाम पर किताबकौपियां, बस किराया, वरदी, जूते आदि से ले कर बिल्डिंग फंड के नाम पर भी अभिभावकों से लाखों वसूले जाते हैं.

दिल्ली के एक निजी स्कूल को उदाहरणस्वरूप लेते हैं, जिस में 11वीं कक्षा की 3 महीने की फीस का लेखाजोखा कुछ इस तरह है :

ट्यूशन फीस के नाम पर पेरैंट्स पर दोहरी मार पड़ती है क्योंकि वे स्कूल में भी ट्यूशन फीस देते हैं और बाहर कोचिंग की भी. हर 3 महीने में डैवलपमैंट फीस लेने का क्या औचित्य है? फीस में ऐक्टिविटी चार्जेज तो जोड़ दिए जाते हैं लेकिन अधिकांश स्कूलों में अलग से भी इस की वसूली की जाती है.

स्कूल हर साल बिना किसी रोक के फीस बढ़ा देते हैं, भले ही अभिभावक लाखों धरनाप्रदर्शन करें. सरकार कैसे भी कड़े नियम बनाए, इन की दुकानदारी न तो रुकती है और न ही इन पर कोई बंदिश लगती है. फीस बढ़ाने का कोई न कोई बहाना स्कूल ढूंढ़ ही लेते हैं.

हाल में निजी स्कूलों ने 7वें वेतन आयोग को लागू करने के नाम पर फीस में भारी वृद्धि की है. उन का कहना है कि स्कूली खर्च व 7वें वेतन आयोग के एरियर को देने के लिए फीस वृद्धि जरूरी है. 7वें वेतन आयोग के अनुसार शिक्षकों का वेतन बढ़ाया गया है पर इस की असल मार तो अभिभावक ही सह रहे हैं. जो शिक्षक कम वेतन पर काम करने को तैयार थे और उसी लायक थे, उन्हें वेतन में भारी वृद्धि, बिना कुछ किए मिल गई.

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लूट का खेल

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि निजी स्कूल सेवा देने के बजाय लूट रहे हैं. सच ही है कि कभी फीस के नाम पर तो कभी ऐडमिशन के लिए लाखों के डोनेशंस लिए जाते हैं. पिछले साल ईस्ट दिल्ली के एक निजी स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करवाने के लिए एक मां को काफी परेशान होना पड़ा.

असल में पूरा माजरा यह था कि उस का अपने पति से किसी बात को ले कर विवाद चल रहा था जिस कारण वह अपने मायके में रह रही थी. वहां रह कर जब वह अपने बच्चे का ऐडमिशन करवाने एक निजी स्कूल में गई तो उस से मातापिता दोनों की उपस्थिति को जरूरी बताया गया. जब उस ने स्कूल प्रशासन को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया तो स्कूल ने उस के बच्चे को ऐडमिशन देने से मना कर दिया.

बच्चे की मां रिक्वैस्ट करने लगी तो प्रिंसिपल ने साफ शब्दों में कहा, ‘‘हम आप के बच्चे को ऐडमिशन सिर्फ एक ही शर्त पर देंगे जब आप हमें डोनेशन देंगी.’’ उस बेचारी मां, जिस की कोई गलती भी नहीं थी, को अपने बच्चे के ऐडमिशन की खातिर लाखों रुपए देने पड़े.

यही नहीं, जो काम सस्ती किताबों से चल सकता है उस की आड़ में भी कमीशन कमाने के चक्कर में पेरैंट्स पर जबरदस्ती स्कूल से ही किताबकौपियां, यूनीफौर्म तक खरीदने का दबाव डाला जाता है. छोटे बच्चों की जो किताबें बाहर से 2,000-2,500 रुपए में आसानी से मिल जाती हैं उन्हें स्कूल वाले पब्लिशर्स से सांठगांठ कर महंगे दामों पर बेच कर अपनी जेबें भरते हैं.

आज शिक्षक कक्षा में जाते जरूर हैं लेकिन वे सीमित पाठ्यक्रम पढ़ाने में ही विश्वास रखते हैं वरना उन का निजी ट्यूशन पढ़ाने वाला बिजनैस पिट जाएगा. शिक्षक बच्चों को अच्छे मार्क्स दिलाने का भरोसा दिलवा कर उन्हें बाहर ट्यूशन पढ़ने पर मजबूर करते हैं. 7वें वेतन आयोग में बढ़ी पगार के साथ ट्यूशन की दरें भी बढ़ा दी गई हैं.

स्कूल में पढ़ाने में ज्यादा मेहनत न करने के बावजूद टीचरों को पूरी पगार मिल रही होती है, वहीं ट्यूशन का बिजनैस भी जोरों से चल रहा होता है.

असुरक्षा का बोलबाला

स्कूल को बच्चों का दूसरा घर कहा जाता है. पेरैंट्स अपने बच्चों के लिए ऐसे स्कूलों का चयन करते हैं जो उन के बच्चों को ऐडवांस स्टडीज देने के साथसाथ उन की सुरक्षा की भी पूरी गारंटी दें.

यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐडमिशन देने के वक्त सुरक्षा के लाख दावे किए जाते हैं, लेकिन एक बार ऐडमिशन होने के बाद ऐसे सारे दावे खोखले साबित होते हैं. आएदिन स्कूल बस ड्राइवर की गलती से कोई न कोई बच्चा ऐक्सिडैंट और शिक्षकों की हवस का शिकार होता है.

इन सब के बावजूद उन के खिलाफ कोई खास कार्यवाही नहीं होती. हाल ही में दिल्ली के निकट गुरुग्राम के एक स्कूल में दूसरी शिक्षा में पढ़ने वाले छात्र की स्कूल के वाशरूम से बौडी मिली. इस हादसे के बाद पेरैंट्स के मन में एक डर बना रहता है जब तक कि उन का बच्चा स्कूल से सहीसलामत घर वापस नहीं लौट आता.

सरकारी बनाम निजी स्कूल

हर जगह निजी स्कूलों का ही शोर है. यहां तक कि पेरैंट्स भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि एक तो यह स्टेटस सिंबल बन चुका है और दूसरा उन्हें लगता है कि उन का बच्चा प्राइवेट स्कूल में ही अच्छी पढ़ाई कर पाएगा. माना तो यह भी जाता है कि निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचर्स ज्यादा क्वालीफाइड होते हैं.

हालांकि, यह सोच गलत है. सरकारी स्कूलों के टीचर्स ज्यादा क्वालीफाइड होते हैं क्योंकि वे कई परीक्षाएं पास कर नौकरी हासिल करते हैं, जबकि निजी स्कूलों में कम सैलरी लेने वाले शिक्षक को प्रमुखता दे कर रखा जाता है.

हमारे देश में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता. पेरैंट्स भी अपने बच्चों को ऐसे बच्चों से बात करने से मना करते हैं. ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म में भी यही दर्शाया गया.

विदेशों की तरह भारत में भी समान शिक्षा के अधिकार कानून पर सख्ती से पालन किया जाना चाहिए ताकि सब को सामान शिक्षा मिले और निजी स्कूलों का लूट का गोरखधंधा रुक सके.

सरकारी स्कूलों के प्रति बेरुखी का एक कारण यह भी है कि इन में हर जाति, धर्म, वर्ग व गरीब के घरों से बच्चे आ रहे हैं और ऊंची जातियों के मातापिता नहीं चाहते कि उन के बच्चे नीची जातियों के घरों के बच्चों के साथ पढ़ें चाहे उन का घरेलू आर्थिक स्तर कैसा भी क्यों न हो.

आप को बता दें कि इन सब के लिए कहीं न कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वे फुली स्मार्ट क्लासेज, स्कूल की शानदार बिल्डिंग को देख कर अपने बच्चों का ऐडमिशन ऐसे स्कूलों में करवा देते हैं. ऐसा वे अपने स्टेटस के लिए करते हैं. भले ही उस स्कूल की फैकल्टी अच्छी हो या न हो. अगर अभिभावक इस चकाचौंध से बाहर निकलें तो निजी स्कूलों की मनमानी बहुत जल्द रुक जाएगी और पेरैंट्स खुद को लुटने से बचा पाएंगे.

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जातीय अहंकार के सहारे पौराणिक परंपराएं कायम रखने का प्रयास

भारत अपने 69वें गणतंत्र की सालगिरह का जश्न मना रहा है और 10 आसियान देशों को आमंत्रित कर जंबूद्वीपे भरत खंडे की बात की जा रही है लेकिन वहीं, देश में अलगअलग जातियों की ताकत और अहंकार सिर चढ़ कर बोल रहा है और हर गली में दसियों गुट बनवाए जा रहे हैं. जातीय सेनाएं अपनीअपनी अस्मिता की हुंकार भर रही हैं. सरकारें, राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन भी छोटीबड़ी जातियों के साथ खड़े हैं. जातियां अपनी बात को जातीय अस्मिता से जोड़ने में कामयाब दिखाई दे रही हैं. ताकत के बल पर लोकतंत्र पर धर्मतंत्र हावी हो रहा है.

‘पद्मावत’ फिल्म को ले कर राजपूत समुदाय के विरोध डरावने हालात की ओर इशारा कर रहे हैं. यह झूठे, खोखले जातीय अहंकार के बल पर पुरानी परंपराएं फिर थोपने की कोशिश है. फिल्म को रोकने के लिए जिस तरह से विरोध और उपद्रव प्रायोजित किया गया, उस से देश को जातीय ताकत के पुनर्जन्म का एहसास हुआ है.

राजपूत संगठनों के विरोध के बीच फिल्म ‘पद्मावत’ करीब 7 हजार सिनेमाघरों में रिलीज हुई. पर 8 राज्यों में उग्र प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी और चक्काजाम हुए. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, जम्मूकश्मीर, उत्तर प्रदेश में उपद्रव किए गए. हरियाणा के गुरुग्राम में उपद्रवी भीड़ ने तो एक स्कूली बस ही फूंक दी.

फिल्म पर पाबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2 बार आए आदेशों के बावजूद ‘पद्मावत’ राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और गोवा में रिलीज नहीं हुई. सिनेमाघर मालिकों के संगठन मल्टीप्लैक्स एसोसिएशन औफ इंडिया ने तोड़फोड़ के डर से इन राज्यों में फिल्म नहीं दिखाने का ऐलान किया था.

करणी सेना ने धमकियां देनी शुरू कर दीं. मध्य प्रदेश में सैकड़ों राजपूत स्त्रियों से जौहर करने की गीदड़ भभकी दिलवा दी. क्षत्रिय महिला संघ की सैकड़ों महिलाओं ने जयपुर में सिरसी रोड पर प्रदर्शन किया. 30 नवंबर, 2017 को राजस्थान बंद रखा गया. कोटा के एक सिनेमाहौल में तोड़फोड़ की गई.

4 राज्यों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई. याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में लगातार हिंसा हो रही है. राज्य सरकारें पूरी तरह इन घटनाओं को रोकने में नाकाम रही हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्यों की जिम्मेदारी है.

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फिल्म का विरोध

शुरू में ही जनवरी 2017 में जयपुर में फिल्म की शूटिंग के दौरान राजपूत करणी सेना के कुछ सदस्यों ने फिल्म का विरोध किया था और जयगढ़ किले में फिल्म की शूटिंग के सैट पर तोड़फोड़ की. उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है. फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दिलाया कि फिल्म में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. इस के बावजूद शूटिंग नहीं होने दी तो निर्मातानिर्देशक संजय लीला भंसाली फिल्म की शूटिंग करने के लिए महाराष्ट्र चले गए.

मार्च 2017 में फिर कोल्हापुर में फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई जिस से प्रोडक्शन सैट, वेशभूषा और गहने आदि जल गए. फिल्म का प्रोडक्शन बजट 160 करोड़ से बढ़ कर 200 करोड़ रुपए पहुंच गया. जयगढ़ किले में फिल्म की शूटिंग के दौरान श्रीराजपूत करणी सेना ने सैट पर तोड़फोड़ करने के अतिरिक्त संजय लीला भंसाली के साथ बदसुलूकी की थी. रणवीर सिंह के अलाउद्दीन खिलजी और दीपिका पादुकोण के रानी पद्मावती के किरदार के बीच ड्रीम सीक्वैंस फिल्माए जाने की खबर पर हंगामा हुआ था.

हरियाणा भाजपा के मुख्य मीडिया समन्वयक सूरजपाल अमु ने फिल्म में रानी पद्मावती की भूमिका निभा रहीं दीपिका पादुकोण और निर्माता संजय लीला भंसाली का सिर काट कर लाने वाले को 10 करोड़ रुपए का इनाम देने का ऐलान किया था. ऐसे किसी ऐलान करने वाले को राष्ट्रद्रोह के झूठे आरोप में नहीं पकड़ा गया जो आज फैशन बना हुआ है.

क्या थीं आपत्तियां

फिल्म को ले कर मुख्यतया 2 आपत्तियां थीं. कहा गया कि फिल्म में पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच एक रोमांटिक सपने वाला दृश्य फिल्माया गया है. दूसरी आपत्ति पद्मावती को दरबार में नाचते हुए दिखाए जाने पर है. करणी सेना द्वारा कहा गया कि राजपूत रानी नृत्य कैसे कर सकती है और बिना घूंघट के कैसे दिख सकती है, यह राजपूत संस्कृति और गर्व के खिलाफ है.

विवाद बढ़ा तो सैंसर बोर्ड ने फिल्म ‘पद्मावती’ का नाम बदल कर ‘पद्मावत’ कर दिया, पर विरोध कर रही करणी सेना के सामने सरकार से ले कर विपक्ष तक सभी बेबस नजर आए. यह जातीय दबदबा है कि इस के पीछे सुनियोजित धार्मिक, राजनीतिक व सामाजिक गणित है.

करणी सेना की करनी

राजस्थान में करणी सेना का 2006 में गठन हुआ था. इस के लगभग 10 लाख सदस्य होने का दावा किया जाता है. ‘पद्मावत’ के विरोध के बहाने सेना ने दूसरे राज्यों में भी अपनी पहुंच बना ली. पिछले 12 सालों के दौरान करणी सेना कई मौकों पर इस तरह की गतिविधियों में शामिल रही है पर पहली बार इस का असर इतना व्यापक देखा गया. भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पद्मावत’ को रिलीज करने के लिए सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए हों पर न तो सरकार और न ही विपक्ष करणी सेना के खिलाफ रुख जाहिर करने का साहस दिखा पा रहे हैं. अंदरूनी तौर पर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के नेता फिल्म के विरोध का समर्थन कर रहे हैं.

अभी लोकेंद्र सिंह कालवी के गुट वाला श्रीराजपूत करणी सेना और अजीत सिंह ममदोली के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना समिति सब से मुख्य विरोधी संगठन हैं. इन राजपूत संगठनों ने सब से पहला सार्वजनिक आंदोलन ‘जोधाअकबर’ फिल्म के विरोध में किया जिस में इन्हें सफलता मिली.

पिछले साल राजस्थान में गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की पुलिस एनकांउटर में मौत के बाद करणी सेना के आंदोलन के सामने राज्य सरकार को झुकना पड़ा था. राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के समर्थन में राजपूत संगठन आ जुटे और मौत की सीबीआई जांच की मांग की गई. इस पर राज्य सरकार ने पहले तो सीबीआई जांच से साफ इनकार कर दिया पर बाद में इस जाति के बढ़ते दबाव के चलते उसे सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा.

इसी तरह दूसरी छोटीबड़ी जातियां भी आजकल अपनीअपनी ताकत के सहारे अपनी बातें मनवाने में कामयाब हो रही हैं. मजे की बात यह है कि हर जाति व्यापक कट्टर हिंदू अस्मिता से खुद को जोड़ने में सफल हो रही है.

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पद्मावत और जौहर

फिल्म ‘पद्मावत’ सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ रचना पर आधारित है. पद्मावत 1540 ई. की रचना है जबकि इतिहास के अनुसार, चित्तौड़ पर खिलजी के हमले की घटना 1303 ई. की है. पद्मावत में चित्तौड़ की प्रसिद्ध रानी पद्मावती का वर्णन किया गया है जो रावल रतन सिंह की पत्नी थी. पद्मावत रचना के अनुसार, चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का कारण रानी पद्मावती के अनुपम सौंदर्य के प्रति उस का आकर्षण था. आखिर खिलजी चित्तौड़ के किले पर अधिकार करने में कामयाब हो गया. राणा रतन सिंह युद्ध में मारे गए और उन की पत्नी पद्मनी अन्य स्त्रियों के साथ जलती आग में कूद कर भस्म हो गई जिसे ‘जौहर’ नाम दिया गया.

बिना फिल्म देखे ‘पद्मावत’ फिल्म के बारे में यह धारणा बना दी गईर् कि इस में राजपूतों के शौर्य, साहस और बलिदान को कम कर के दिखाया गया है. रानी पद्मावती के ऐतिहासिक किरदार के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया. राज्यों में जारी हिंसा से केंद्र सरकार ने खुद को अलग कर लिया था.

पिछले कुछ समय से अलगअलग जातियां अपनीअपनी अस्मिता के प्रचार में कामयाब होती नजर आई हैं. फिल्म का विरोध कर रही करणी सेना राजपूतों की प्रतिष्ठा की हुंकार भर कर खुद को कट्टर हिंदू भावना से जोड़ने में सफल दिखाई दे रही है. ‘पद्मावत’ के विरोध के दौरान उस के सदस्यों को राजपूतों के साथ हिंदुओं के भी सम्मान के रूप में पेश किया गया है.

जातीय अस्थिरता के बहाने

राजपूत समुदाय द्वारा ‘पद्मावत’ का विरोध पौराणिक पाखंडी जातीय मानसिकता की मजबूती का संदेश है. इस समुदाय के साथ जिस तरह से कट्टर हिंदू संगठन और भाजपा सरकारें खड़ी दिखाई दे रही हैं, वह जताता है कि ताकत के बल पर जातीय अहंकार को भुना कर पौराणिक चढ़ावा संस्कृति की पुनर्स्थापना की जाएगी. ‘पद्मावत’ को ले कर विरोध पर उतरी राजपूत जाति ही नहीं, पिछले कुछ समय से अपनीअपनी मांगों के लिए आंदोलनरत जातियां जिस तरह अपनी आन, बान व अस्मिता को कायम रखने में कामयाब दिखाई दे रही हैं वह सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था की कमजोर पड़ रही परंपराओं को फिर से मजबूत करने का संकेत ही है.

कुछ समय से मनुस्मृति और गीता का महिमागान बढ़ गया है. गीता को पाठ्यक्रम में लागू करने की मांग की जा रही है. इन ग्रंथों में वर्णव्यवस्था की पैरवी की गई है और जाति को ईश्वर की देन माना गया है.

असल में पिछले कुछ समय से देश में जातीय अहंकार उबल रहा है. जाट पिछड़ा आरक्षण की मांग को ले कर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आंदोलनरत हैं. वे आएदिन ट्रेन, बस, सड़क रास्ता जाम, तोड़फोड़ और हिंसा पर उतारू दिखाई दे रहे हैं. वे अपनी ताकत के बल पर सरकारों को झुकाने में सफल दिखते हैं. सरकारें और राजनीतिक  दल जाटों की आरक्षण की मांग के समर्थन में खड़े हैं. कोई विरोध की हिम्मत नहीं दिखा पाता है.

गुजरात और मध्य प्रदेश में पटेल, पाटीदार अपनी जातीय अस्मिता की बात कर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं. उन के आगे शासन, प्रशासन पंगु बना दिखता है.

राजस्थान में गुर्जर जनजाति में आरक्षण के लिए सरकार और राजनीतिक दलों को अपनी ताकत का लोहा मनवा चुके हैं. गुर्जरों की ताकत के आगे कोई राजनीतिक दल विरोध की स्थिति में नहीं है.

उधर, महाराष्ट्र में मराठा जातियां पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की कवायद में अपनी शक्ति का एहसास कराने में पीछे नहीं हैं.

दलितों का दमन

इस दौर में बराबरी की मांग करने वाले दलितों का दमन चरम पर है. अभिव्यक्ति की आजादी का हनन जारी है. दलितों को अलगथलग रखने के लिए उन पर हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा हिंसात्मक वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है. सदियों से रह रहे दलितों को संदेश दिया जा रहा है कि तुम दलित हो. सदियों से रह रहे दलित की तरह रहो. मूंछें रख कर ठाकुर बनने की कोशिश मत करो. परंपरा में तुम्हारे लिए मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध है. मंदिर में प्रवेश कर तुम ब्राह्मण मत बनो. पढ़ाईलिखाई मत करो. बराबरी और हक  की आवाज मत उठाओ वरना कुचल दिए जाओगे. छुआछूत के पैरोकारों द्वारा जातीय, धार्मिक मतभेदों को हवा दी जा रही है. आतंक पैदा किया जा रहा है.

इसी तरह मुसलमानों को दोयम दर्जे का मान लिया गया है. उन्हें पाकिस्तानी बताया जा रहा है. लवजिहाद के नाम पर मुसलिम युवाओं को प्रताडि़त किया जाता है. मवेशियों, मीट के व्यापार को प्रतिबंधित किया जा रहा है.

इन की श्रेणी में स्त्रियों को भी शामिल कर लिया गया है. औरतों के साथ यौन हिंसा की बढ़ती वारदातें बताती हैं कि स्त्री केवल भोग की वस्तु है. मर्द जब चाहे, जहां चाहे उसे उपभोग कर सकता है. स्त्री पाप की गठरी है. मर्द की चेरी है. उसे बराबरी का अधिकार नहीं है. शास्त्रों के अनुसार उस की मुक्ति पुरुष के चरणों में है. साधुसंतों, गुरुओं की सेवा करना ही उस का धर्म है. छोटी लड़कियों को आश्रमों में दान में दे दिया जाता है. यह प्राचीन परंपरा है, इस का पालन करना होगा.

तमाम नए कानूनों और कानूनों में संशोधनों के बावजूद स्त्रियों पर बढ़ती यौनशोषण की घटनाओं के पीछे धार्मिक संकीर्ण सोच ही है जो औैरतों को बराबर मानने से रोकती है. स्त्री को ले कर दोयम दर्जे की सामाजिक सोच हमारी सदियों पुरानी परंपरा में शामिल है.

हालांकि इन कट्टर जातियों का परस्पर टकराव फिलहाल अधिक दिखाई नहीं दे रहा पर इस में देर नहीं लगेगी. ‘पद्मावत’ को ले कर राजपूत समुदाय किसी दूसरी जाति से नहीं लड़ रहे. जाट, पाटीदार, गुर्जर, मराठा जातियां भी अन्य जातियों से टकराती नहीं नजर आ रहीं पर विभाजन स्पष्ट दिखता है. जातियां अपनेअपने अस्तित्व, अपनीअपनी अस्मिता का झंडा उठाए घूम रही हैं.

ताकत के सहारे जातियों का यह अपनाअपना अलग राग 69वें गणतंत्र को अंगूठा दिखा रहा. इतने सालों के बावजूद जाति व्यवस्था के उन्मूलन के बजाय इसे कायम रखने व ज्यादा मजबूत करने की कोशिशें की जा रही हैं और सरकार का पूरा खुला व छिपा समर्थन साथ है. कट्टर होते समाज की भय उत्पन्न करने वाली स्थिति है. राजनीतिक दलों ने जातियों को ताकतवर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शिक्षा, नौकरियों में आरक्षण, चुनावी टिकट वितरण जैसे कामों में राजनीतिक दल सत्ता के लिए जातियों को बढ़ावा देते रहे हैं.

संविधान बनाम पौराणिक परंपराएं

‘मनुस्मृति’ और ‘गीता’ को वास्तव में भारतीय संविधान से ऊपर मानने वाले कम नहीं हैं. हिंदूराष्ट्र के नारे बुलंद किए जा रहे हैं. भाजपा के कई नेताओं द्वारा भेदभाव वाली वर्णव्यवस्था की पैरवी करने वाले ग्रंथ ‘गीता’ को राष्ट्रीय किताब और उसे पाठ्यक्रमों में लागू करने की बातें उठाई जाती रही हैं. हिंदुओं  के साधुसंत, गुरु और शंकराचार्य तक जातिव्यवस्था स्थापित करने वाले हिंदू धर्मग्रंथों की परंपराओं को चलाने का आह्वान करते सुने जा सकते हैं. राष्ट्रवाद को, देशभक्ति को, हिंदू से जोड़ दिया गया है. भारत का अर्थ हिंदू पौराणिक देश बना दिया गया है.

जातिव्यवस्था स्थापित करने वाले हिंदू ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एम एस गोलवरकर जैसे कट्टरपंथियों ने महिमामंडन किया. संघ के नेताओं ने 1947 में ही भारतीय संविधान का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास ‘मनुस्मृति’ के रूप में एक अद्भुत संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की जरूरत क्या है.

हिंदू नेता आचार्य धर्मेंद्र ने भी कहा था कि हिंदुस्तान में हिंदूद्रोह निसंदेह देशद्रोह है. केंद्र सरकार को फिल्म ‘पद्मावत’ पर प्रतिबंध लगा कर फिल्मकार पर मुकदमा दर्ज करना चाहिए.

हिंदू नेता गाहेबगाहे धर्म की परंपराओं की स्थापना पर बल देते रहे हैं. गीता को मनुस्मृति का छोटा संस्करण माना गया है. वहीं, भाजपा सरकार गीता का प्रचारप्रसार करने में जुटी हुईर् है. इस के नेताओं द्वारा गीता की प्रतियां बांटी जा रही हैं.

करणी सेना, शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, भीम सेना, राम सेना, दलित सेना, गुर्जर सेना, भीम आर्मी, जाट महासभा, राजपूत महासभा, क्षत्रिय महासभा, दुर्गा वाहिनी, हिंंदू वाहिनी, केसरिया वाहिनी, हनुमान दल, बजरंग दल जैसे अनगिनत जातीय, वर्र्ग आधारित संगठन बने हुए हैं. यह बंटे हुए समाज की सब से बड़ी मिसाल है. ये सब जाति व्यवस्था को ही मजबूत कर रहे हैं और सोच यह है कि जातियां मजबूत होंगी तो हिंदू धर्म खुद ही मजबूत होगा, जबकि होगा उलटा ही. आपसी फूट सदा देश को गुलाम बनाती रही है और जातियों का गणित ऐसा है कि न स्थिर सरकार रहेगी न सुशासन.

इन जातियों के अलगअलग देवीदेवता हैं. जातियों ने अपनेअपने ऊंचे, नीचे अवतारों को भी बांट लिया है. सब से ऊंची जाति वालों के लिए विष्णु, उस से नीचे वाले शूद्रों के लिए शिव, हनुमान, शनि, साईंबाबा. इसी तरह जातियों के आधार पर इन के गुरु भी बना दिए गए जो सवर्ण, पिछड़ों और दलितों में बंटे हुए हैं और अपनीअपनी दुकानें सफलतापूर्वक चला रहे हैं.

भारतभूमि में लोग तपश्चर्या करते थे, यज्ञ, हवन करते थे, परलोक के लिए आदरपूर्वक दान देते थे. पुरोहित कथावाचन करते थे. यजमान कथा सुनते थे, कर्मकांड कराते थे. सब वर्णव्यवस्था के अनुसार अपनाअपना कर्म करते थे.

हिंदू राष्ट्रवाद के पैरोकार देश में फिर से इस परंपरा की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं जिस में हिंदू धर्मग्रंथों के मूल्यों और चढ़ावों का बोलबाला हो. वह उन वैदिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहते हैं जिन का एक लोकतांत्रिक, आधुनिक वैज्ञानिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता.

चढ़ावा संस्कृति की वापसी

इस देश में राजामहाराजाओं के समय धर्म के हुक्म पर चलने की परंपरा रही है. राजाओं के दरबार में पुरोहित धार्मिक सलाहकार होते थे. राजा उन्हीं के सलाहमशवरे पर पूरा राजपाट चलाते थे. राजाओं को इतना आशंकित कर के रखा जाता था कि पुरोहित की सलाह के बिना वे कोई भी फैसला नहीं करते थे. राजा दशरथ से ले कर मराठों की अष्टप्रधान व्यवस्था तक ऐसा ही माहौल था.

चित्तौड़ के रावल रतन सिंह समेत तब के राजाओं के दरबार में भी पुरोहित नियुक्त थे. उन्हीं की सलाह पर रानियों को जलती चिताओं पर चढ़ा दिया जाता था.

इतिहास के अनुसार, महमूद गजनवी के समय से राजस्थान और गुजरात में जौहर की परंपरा शुरू हुई थी. हालांकि तब तक भारत के ताजातरीन इतिहास की उम्र डेढ़ हजार साल हो चुकी थी और इसलाम के आने के पहले एक हजार साल के दौरान हिंदू राजाओं के बीच सैकड़ों बार तलवारें खनक चुकी थीं. उत्तर भारत में हर्षवर्द्धन व महमूद गजनवी के बीच के करीब 500 साल तक राजामहाराजा एकदूसरे से ईंट से ईंट बजाते रहे.

महमूद गजनवी जब हिंदूकुश में अनंगपाल को परास्त कर के पंजाब होता हुआ राजस्थान में घुसा तो उस के खिलाफ मोरचे खुले, पर राजस्थान में उसे कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ना पड़ा. राजा खुद को और अपनी प्रजा को किले के अंदर कर दरवाजा बंद कर लेता. कुछ दिन घेरेबंदी चलती, कुछ झड़पें होतीं और एक समय ऐसा आता कि बाहर से कोई मदद न मिलने के कारण दुश्मन की घेराबंदी किले के अंदर मौत का साया बन जाती. तब विवशतावश राजा को अपनी सेना के साथ किले से बाहर आ कर लड़ना पड़ता, जिस से सिर्फ मौत मिलती. किले के अंदर राजा की दोचार सौ रानियां, राजकुमारियां बचतीं और बचते कुछ लाचार बुजुर्ग और उन के बीच कुल ब्राह्मण होता था जो सब औरतों की चिताएं तैयार करवाता, उन्हें जलवाता. तब उन चिताओं पर डेढ़ साल से ले कर 90 साल तक की बुढि़या जौहर करतीं.

राजपूत समाज सती परंपरा का पोषक रहा है. 1987 में राजस्थान के सीकर जिले में देवराला में हुए रूपकंवर सती कांड ने देश को झकझोर दिया था. तब यही समुदाय रूपकंवर की चिता पर तलवारों के साथ पहरा देता रहा. चिता की परिक्रमा में जुटा रहा और सती का खूब महिमामंडन किया गया. अब  ‘पद्मावती’  के नाम पर भी राजपूत समाज जातीय अस्मिता की बात कर रहा है. यह कैसी आन, बान, शान है?

समाज में सामंती अहंकार, भेदभाव, नफरत, हिंसा के उन्मादी लोगों की भुजाएं सियासी और सामाजिक ताकत  पाती रही हैं. यह सब हिंदुत्व के नाम पर हो रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चाहता है जातिव्यवस्था बनी रहे और धर्म में चढ़ावे की परंपरा और मजबूत हो. चढ़ावे के समर्थक हिंदू संगठन इस काम में सफल होते दिख रहे हैं.

प्राचीन परंपराओं को जिंदा कौन रखना चाहता है, चढ़ावा पाने वाले. हिंदुत्व के पहरेदार धर्म की दुकानदारी में मंदी नहीं आने देना चाहते. अब जब देश में हिंदू राष्ट्रवादियों की सरकार है तो पुरानी परंपराएं न सिर्फ जिंदा की जाएंगी, उन को कायम रखने का प्रयास भी किया जाएगा. ‘पद्मावत’  के विरोध में उतरे राजपूत समुदाय के साथ हिंदू संगठन सतीप्रथा का महिमामंडन चाहते हैं.

धर्म के ठेकेदार चाहते हैं कि सती के मंदिर बनें और वहां भरपूर चढ़ावा आए ताकि पुरोहितों के लिए हलवापूरी का इंतजाम कायम रहे. यह चढ़ावा संस्कृति दलितों को भी बेच दी गई है और वे अपने अनैतिक अपौराणिक देवीदेवताओं को पूजने व उन पर पैसा बरसाने को तैयार हो गए हैं.

भाजपा राज्य सरकारें इसीलिए विरोधियों के पक्ष में खामोश हैं. हिंदू संगठन करणी सेना के साथ हैं क्योंकि चढ़ावा को बढ़ावा देना है. आखिर हिंदुत्व की खोई हुई पहचान लौटानी है. चढ़ावा रहेगा, तभी हिंदुत्व बचेगा. चढ़ावा से ही हिंदुत्व चलेगा.

यह स्थिति भारत में ही नहीं है, विश्वभर में इतिहास में पीछे जाने की सनक बढ़ रही है. असहमति के खिलाफ हिंसक मोरचे पनप गए हैं. संवैधानिक विचारधारा और समाज की सोच में अंतराल बढ़ रहा है. यह अंतराल किसी क्रांतिकारी बदलाव का नहीं है, यह कट्टरता और उदारता का है. हमारा संविधान उदारता की गुंजाइश देता है और यह तभी लागू हो सकता है जब उस के मानने वाले उदार हों. दुख की बात है कि देश में सामाजिक, धार्मिक ही नहीं, राजनीतिक उदारता भी  दम तोड़ रही है.

फिल्मकार, चित्रकार, बुद्धिजीवी वर्ग को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए केवल संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा करने के बजाय गैरसरकारी संगठनों का भी सहारा लेना पड़ रहा है. जातीय, धार्मिक संगठन हैं कि वे फिल्मकारों को धमका रहे हैं और परोक्ष चेतावनी भी दे रहे हैं.

धर्म, जाति के नाम पर इस तरह की गैरसंवैधानिक हिंसक हरकतें भारत की कैसी सभ्यता का दर्शन करा रही है, रचना और विचारों का जवाब श्रेष्ठ विचार और रचना से दिया जा सकता है, लेकिन उपद्रव, हिंसा, प्रतिबंध की जिद पर अड़ा समाज कैसी सभ्यता स्थापित कर रहा है?

आज विज्ञान के दौर में, गणतंत्र लागू होने के लगभग 7 दशकों बाद भी, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता एवं एकता की मूल अवधारणा वाले भारतीय संविधान के ऊपर धर्म की व्यवस्था चाहने वाले हावी दिखाई दे रहे हैं. चढ़ावा चाहने वाले अपनी ताकत सिद्ध करते हुए धर्म की अमानवीय, असमानता और बर्बर परंपराओं की पुनर्स्थापना करने के प्रयासों में सफल होते दिखाई दे रहे हैं तो यह इस देश के लोकतांत्रिक संविधान की नहीं, समाज की कमजोरी है.

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चीड़ से चाटुकारिता तक

चीड़ का पेड़ बहुतायत में हिमालय की पहाडि़यों में 7 हजार फुट की ऊंचाई तक पाया जाता है. इस पेड़ में पाया जाने वाला एक तत्त्व एलीकोकेम अपने आसपास किसी और पेड़ को नहीं पनपने  देता. चीड़ के पेड़ का तना 3 मीटर तक मोटा होता है.

चीड़ के पेड़ के ये गुणधर्म काफी हद तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिजाज से मेल खाते हैं. शायद इसीलिए अपने स्टाइलिश प्रधानमंत्री के लिए केंद्रीय कपड़ा मंत्री अजय टमटा चीड़ की लकड़ी के रेशे से बनी हुई जैकेट तोहफे में देंगे जिस का नाम, लौंचिंग से पहले ही, नमो वस्त्र रखा गया है. आदमी जब जंगल में रहता था तब पेड़ की पत्तियों और छाल से ही तन ढकता था. अब आधुनिक मानव के लिए यह फैशन हो गया है. यों चीड़ के पेड़ की यह चीरफाड़ यानी शोध काफी दिनों से चल रहा था पर अब वैज्ञानिकों ने इस के रेशे से कपड़ा बनने की पुष्टि कर दी है तो सब से पहले नमो जैकेट बनाई जाएगी. नरेंद्र मोदी से इस शोध का मतलब न पूछें. यह चाटुकारिता का नायाब नमूना है.

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