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श्रीदेवी : चार शिफ्ट में चार फिल्में और चारों हिट

जन्म और मृत्यु शाश्वत सत्य है. जो इस संसार में आया है, उसका जाना भी तय है. मगर कुछ लोग इस संसार से विदा लेने के बाद भी अपने कर्मों से ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. ऐसे ही लोगों में चार दशक तक बौलीवुड में राज करने वाली अदाकारा व एकमात्र महिला सुपर स्टार श्रीदेवी भी हैं, जो कि सदैव अपने प्रशंसकों के दिलों में जीवित रहेंगी.

श्रीदेवी महज एक अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन नृत्यांगना और बेहतरीन पेंटर भी थीं. वर्तमान समय के कलाकार फिल्म में और अपने अभिनय में परफैक्शन की बात कर हर साल सिर्फ एक ही फिल्म में अभिनय करते हैं. इसके बावजूद इनकी फिल्में बौक्स औफिस पर फ्लौप हो जाती हैं.

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जबकि श्रीदेवी ने अपने समय में एक साथ चार शिफ्टों में काम करते हुए चार चार फिल्मों की एक साथ शूटिंग की थी और उनकी यह चारों फिल्में सुपर हिट रही थी. खुद इस बात को श्रीदेवी ने कबूल करते हुए हमसे कहा था – ‘‘आज की तारीख में जिस ढंग से काम होता है, उस तरह का काम करने में इंज्वौयमेंट ज्यादा है. परफैक्शन की जो भूख है, उससे कलाकार को भी काम करने में इंज्वौयमेंट आता है.

जब मैं फिल्म ‘नगीना’ कर रही थी, उस वक्त मैंने एक साथ तीन नहीं बल्कि चार शिफ्टों में काम किया है. अब उस तरह से कोई कलाकार काम नही कर सकता. यह अच्छी बात है. मैंने ‘नगीना’ के साथ साथ ‘मिस्टर इंडिया’ के अलावा दो और फिल्मों की एक साथ शूटिंग की थी और यह सभी फिल्म सुपरहिट हुई थीं.’’

श्रीदेवी के बचपन का यह सपना रह गया अधूरा

हर इंसान के अपने कुछ सपने होते हैं, जिन्हें वह चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता है. श्रीदेवी अपने समय की मशहूर अदाकारा थीं. उनके पास सुख सुविधा व हर तरह के साधन मौजूद थें, पर 54 साल की उम्र में मौत को गले लगा लेने के साथ ही उनका यह सपना अधूरा रह गया.

अपने इस अधूरे सपने को लेकर लगभग आठ माह पहले श्रीदेवी ने हमसे कहा था -‘‘बचपन से मुझे पेंटिंग्स का शौक रहा है. मैं हमेशा पेंटिंग्स करना चाहती थी. पेंटिंग्स मेरा पैशन भी रहा है. लेकिन कुछ वजहों से मैंने पेंटिंग्स करना छोड़ दिया था.

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लेकिन शादी के बाद जब मैंने अपने बच्चों का होमवर्क करवाना शुरु किया, तो उनके लिए मैं ड्रौइंग बनाती थी. मेरी बेटियों ने कहा कि मम्मा आप तो बहुत अच्छी ड्रौइंग कर लेती हैं. आपको तो पेटिंग बनानी चाहिए.

तब मैंने फिर से पेटिंग्स बनाना शुरू किया. मेरी एक पेंटिंग अमरीका के न्यूयौर्क शहर की एक आर्ट गैलरी में खरीद कर रखी गई है. मैंने बहुत पेंटिंग्स बनाई हैं. लेकिन कुछ साल बाद मैंने फिर पेंटिग बनाना छोड़ दिया. तो यह मेरा एक सपना है, जिसे मैं पूरा करना चाहती हूं. मैं चाहती हूं कि नए सिरे से अच्छी पेंटिंग बनाना शुरू करूं.

मैं अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी भी लगाना चाहती हूं. पेंटिंग्स के बिकने से जो पैसा मिले, उससे चैरिटी करना चाहती हूं. मैंने जो भी पेंटिंग बनायी हैं, वह सारी मूड पर हैं. कुछ पेंटिंग्स मेडीटेशन को लेकर हैं. कुछ पेंटिंग शाम के मूड पर हैं.’’

सवासवाई का जंजाल, पाखंडी हो रहे मालामाल

राहुल को इस इंटरव्यू कौल का बेसब्री से इंतजार था. करीब 2 सालों की मेहनत… पहले प्री फिर मेन ऐग्जाम और अब अंतिम सीढ़ी यानी इंटरव्यू. 15 दिनों से राहुल इस इंटरव्यू की तैयारी में जुटा था.

सुबहसुबह तैयार हो कर राहुल इंटरव्यू के लिए निकलने को हुआ तो दादी ने टोक दिया, ‘‘10 मिनट रुक जा. घर से सवा 8 बजे निकलना. तेरा काम सवाया होगा.’’

‘‘मगर दादी बस तो सवा 8 बजे तक निकल जाएगी,’’ राहुल को दादी का टोकना अच्छा नहीं लगा.

‘‘कोई बात नहीं, तू टैक्सी कर लेना,’’ दादी जिद पर अड़ गईं तो हार कर राहुल को सवा 8 बजे ही निकलना पड़ा. टैक्सी से निकला तो रास्ते में टैक्सी खराब हो गई और साथ ही उस का मूड भी. दूसरी टैक्सी लेने के चक्कर में लेट हो गया और अंत में हुआ यह कि उस का आत्मविश्वास कमजोर हो गया. इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवालों के सही जवाब आते हुए भी नहीं दे पाने के कारण उस का इंटरव्यू खराब हो गया. जिस नौकरी के लिए वह इतनी मेहनत से तैयारी कर रहा था वह उसे हाथ से निकलती लगी.

घर लौटते ही राहुल के लटके चेहरे ने सारी कहानी बिना कहे ही सुना दी. मगर दादी अब भी कहां हार मानने वाले थी. तुरंत बोलीं, ‘‘तू फिक्र मत कर. मैं ने बालाजी की सवामनी बोल दी है, देखना यह नौकरी तुझे ही मिलेगी और तेरी पहली तनख्वाह से मैं पैदल जा कर बालाजी को भोग लगा कर आऊंगी.’’

राहुल झुंझला गया. बोला, ‘‘दादी, अगर सवामनी से ही नौकरियां मिलने लगें तो लोग कोचिंग में महंगी फीस देने के बजाय मंदिरों में सवामनी ही करने लगें.’’

हम यहां पाठकों को बताना चाहेंगे कि मारवाड़ी समाज में सवामनी एक बहुत ही प्रचलित शब्द है, जिस का तात्पर्य है, मन्नत पूरी होने पर अपने ईष्ट देव को सवा मन (लगभग 50 किलोग्राम) मिष्ठान्न का भोग लगाना.

यह तो सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है सवाई पर अंधविश्वास का. अकसर कहते हैं कि काम होने पर सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाऊंगा. अकसर शुभकार्यों में शगुन का लिफाफा देते हुए भी नोटबंदी से पहले तक 51, 101, 501 आदि का चलन था. इस तरह के लिफाफे बनाने वाली कई कंपनियां तो लिफाफे  के ऊपर ही क्व1 का सिक्का तक चिपका देती हैं.

सावन के महीने में अकसर विभिन्न स्थानीय समाचारपत्रों में शिवभक्तों द्वारा सवा लाख शिवलिंगों के अभिषेक के समाचार पढ़ने में आते हैं.

मेरे एक परिचित की बेटी को लड़के वाले देखने आए थे. जैसे ही लड़के की मां ने कहा कि लड़की को ले आएं तो उन के साथ आए पंडितजी ने कहा कि बिटिया को आधे घंटे बाद लाना, अभी पौने 11 बजे हैं, सवा 11 बजने दो. अगर यह रिश्ता जुड़ेगा तो देखना इस रिश्ते में खुशियां सवाई होंगी. तब तक हम चायनाश्ता कर लेते हैं.

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सवा और सवाई की धारणा

यों तो सवा का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी माप का 25% या एकचौथाई अधिक, मगर आम धारणा या मान्यता में इसे माप से जरा सा अधिक माना जाता है. उस का वास्तविक तोल या माप से कोई सीधा संबंध नहीं है. ‘सेर को सवा सेर’ कहावत तो हम सभी ने सुनी है. इस का अर्थ भी यही है कि किसी काबिल व्यक्ति को उस से अधिक या बेहतर व्यक्ति का मिलना. कहने का तात्पर्य है कि जैसे यह कहावत सदियों पुरानी है वैसे ही सवा और सवाई की धारणा भी सदियों पुरानी है.

राजस्थान में ऐसे राजाओं को जो अपने समकालीन योद्धाओं से सवाए यानी अधिक वीर और बुद्घिमान थे और जिन्होंने राज्य और राजघरानों की शान, यश और कीर्ति को बढ़ाने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उन्हें सवाई की उपाधि से नवाजा जाता था जैसे सवाई जय सिंह, सवाई मान सिंह, सवाई माधो सिंह आदि. सब से पहले आमेर के राजा जय सिंह द्वितीय को औरंगजेब द्वारा सवाई की मौखिक उपाधि से नवाजा गया था, जिन्होंने सवाई जयनगर नामक शहर बसाया जो आज राजस्थान की राजधानी जयपुर के नाम से जाना जाता है.

मान्यताओं के पीछे की असलियत

यही नहीं ऐसे अनेक उदाहरण हमारे समाज में मिल जाएंगे, जिन पर शायद कभी हम ने खुद भी गौर नहीं किया होगा कि इन मान्यताओं के पीछे की असलियत क्या है. हम अकसर बड़ेबुजुर्गों को सवाई तरक्की करो का आशीर्वाद देते हुए देखते हैं. हमारे देश में अनेक ऐसे समाज हैं, जिन में बच्चे का नामकरण उस के जन्म के सवा महीने बाद किया जाता है. राजस्थान, पंजाब, गुजरात सहित कई अन्य प्रदेशों में भी लड़की के लिए शादी का चूड़ा शादी के सवा महीने बाद तक पहनना अनिवार्य होता है.

अगर हम अपने आसपास नजर डालें तो पाएंगे कि गलीमहल्ले का छोटा खुदरा दुकानदार या फलसब्जी का ठेला लगाने वाला अथवा खुला दूधदही बेचने वाला व्यापारी भी अपने ग्राहकों को सामान तोलते समय सामान रखे जाने वाला पलड़ा वास्तविक माप से थोड़ा सा झुका रखता है यानी सवाया तोलता है. वह ऐसा क्यों करता है शायद वह खुद भी नहीं जानता होगा, मगर उस ने अपने बड़ों को ऐसा ही करते देखा होगा और बस उसी पुरानी परिपाटी को निभाए जा रहा है.

मुझे याद है बचपन में मां मुझे चाय बनाना सिखा रही थीं. उन्होंने अनुमान के अनुसार प्रति कप 1 चम्मच चीनी और चौथाई चम्मच चायपत्ती का हिसाब मुझे बताया. मगर मैं ने देखा कि चायपत्ती और चीनी डालने के बाद उन्होंने दोनों ही सामग्री चुटकी भर के खौलते हुए पानी में और डाल दी. जब मैं ने कहा कि अरे, आप ने तो ज्यादा डाल दी तो मां मुसकराई और फिर बोलीं कि इतने से कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि चाय का स्वाद सवाया हो जाता है.

कुल मिला कर कहना यह है कि यह सवा और सवाई वाली धारणा या अंधविश्वास इतना प्रचलित हो चला है कि अंधविश्वास न हो कर आम जीवन का आवश्यक नियम सा लगने लगा है और इसे मानने वालों में पढ़ेलिखे अधिकारी, लेखक, राजनेता, अभिनेता और जानेमाने साहित्यकार तक शामिल हैं.

पिछले दिनों एक वरिष्ठ साहित्यकार की किताब के लोकार्पण समारोह का निमंत्रण मिला. लोकार्पण का समय शाम सवा 5 बजे का था, इस के पीछे भी यही सोच रहती है कि लोकार्पित किताब के माध्यम से साहित्यकार की शोहरत सवाई हो. अनायास एक मुसकान तैर गई होंठों पर. अगर समाज की दिशा और दशा बदलने का दावा करने वाले ये बुद्घिजीवी खुद इस जाल में फंसे हुए हैं, तो आम आदमी की क्या मजाल जो इस सवा के महत्त्व को नकार सके.

सरासर तर्कहीन

मैं ने अपनी एक मित्र जोकि एक राजपत्रित अधिकारी भी है और इस धारणा पर बेहद विश्वास करती है, से सवाई के पीछे के सच के बारे में बात की तो उस ने बड़ा ही हास्यास्पद सा जवाब दिया. उस ने कहा कि इस से कुछ अच्छा होता है या नहीं यह तो पता नहीं, मगर इतना जरूर है कि जब भी वह ऐसा करती है तो उस का आत्मविश्वास आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाता है और उस के मन में स्वत: ही ये विचार आने लगते हैं कि जब जो होगा वह बेहतर ही होगा. इसे यों भी कह सकते हैं कि वह परिणाम को ईश्वर पर छोड़ कर निश्चिंत हो जाती है कि अब जो कुछ भी होगा वह ऊपर वाले की इच्छा होगी. इस पर मैं ने हंस कर चुटकी ली कि तो फिर तुम औफिस साढ़े 9 के बजाय सवा 9 क्यों नहीं आती और 6 के बजाय सवा 6 बजे तक क्यों नहीं रुकती? तुम भी सरकार का काम कुछ सवाया कर दो. उस के भी अच्छे दिन आने दो.

दोस्त खिसिया कर कहने लगी कि ये सब रोजमर्रा की जिंदगी में लागू नहीं होता. यानी सिर्फ खास मौकों पर ही कोई चीज सवाई होती है. यह तो सरासर तर्कहीन है.

तथ्यहीन मान्यताएं

दरअसल, कुछ बातें हमारे दिलोदिमाग में इस कदर घर कर चुकी हैं कि हम खुद भी नहीं जानते कि हम ऐसा क्यों कर रहे हैं. बस यंत्रचालित से किए चले जाते हैं. इस का अमीरीगरीबी, शिक्षाअशिक्षा, गांवशहर के परिवेश आदि से कोई संबंध नहीं है. इसे यों भी समझा जा सकता है कि जब हमें सही रास्ता न मालूम हो तो अकसर हम वह रास्ता चुनते हैं जिस पर अधिकांश लोग जा रहे हों. फिर वही रास्ता आम रास्ता बन जाता है और धीरेधीरे सभी उस पर चल पड़ते हैं. इसी तरह पुरानी मान्यताएं भी पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती हैं.

यह हमारे धर्मभीरु मन का डर भी है कि हम चाह कर भी पीढि़यों से चली आ रही इन तथ्यहीन मान्यताओं से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं या यों कहें कि अपनेआप को अतिआधुनिक कहने वाले हम खुद भी नहीं जानते कि हम भी इस के शिकार हैं. ऐसा लगता है जैसे यह एक स्वचालित प्रक्रिया है, जो मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होती है.

शुभ अशुभ का डर

एक शुभ संकेत यह है कि हमारी आने वाली कंप्यूटर जैनरेशन के पास इन बकवास ढकोसलों के लिए वक्त ही नहीं है. उस का दिन कैलेंडर की तारीखों और घड़ी की सूइयों के अनुसार चलता है न कि चांद के घटनेबढ़ने से. मगर फिर भी हम कहां मानते हैं. जबतब उन्हें कुछ अशुभ होने का डर दिखा कर इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं और अपना मनचाहा करने के लिए बाध्य करते हैं.

हम ऐसा क्यों करें उन के इस तर्क के सामने हमारे पास वितर्क नहीं, बल्कि कुतर्क होते हैं. हम इस बात के पक्ष में कोई तर्क नहीं दे पाते कि उन्हें ऐसा क्यों करना चाहिए. हम कुतर्क देते हैं कि ऐसा करने में आखिर नुकसान ही क्या है? कुछ और न सही हमारा मन रखने के लिए ही कर लो.

नई पीढ़ी को यह भी डर है कि ये नई पौध अगर पूरी तरह से वैज्ञानिक हो गई तो निरंकुश हो कर अपने मनमाफिक जीने लगेगी और उस जीवन में धर्म, आस्थाओं और मान्यताओं का कोई स्थान नहीं होगा और अगर ऐसा हुआ तो ईश्वर के प्रकोप से प्रलय आ जाएगी.

हालांकि अब तो काफी हद तक पुरानी पीढ़ी भी इस बात को मानने और समझने लगी है कि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी इन की जड़ें इतने गहरे तक मन में गड़ी हैं कि उन से छुटकारा पाना अगर नामुमकिन नहीं है तो मुमकिन भी नहीं है.

पुरानी पीढ़ी को चाहिए कि वह अगर अपनेआप को नहीं बदल सकती तो बेशक जिए अपनी पुरानी मान्यताओं के साथ मगर कम से कम आने वाली पीढ़ी को तो ये ढकोसले मानने को बाध्य न करे. इस प्रकार धीरेधीरे ये सड़ीगीली मान्यताएं पोषण के अभाव में खुदबखुद नष्ट हो जाएंगी. मगर तब तक सवा और सवाई के सवालों को झेलना ही होगा.

बेलगाम गौरक्षकों की गुंडई और उग्र हिंदुत्व का उभार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही देशप्रदेश में भारत की धर्मनिरपेक्ष इमेज की मार्केटिंग करते फिर रहे हों और अपने देश के सामाजिक माहौल को अच्छा करार दे रहे हों, लेकिन देश में कट्टर और हिंसक सांप्रदायिक ताकतों के हमले उन के इस दावे की कलई खोल देते हैं.

हाल के दिनों में देश के जिन राज्यों में उग्र हिंदुत्व का उभार दिखा है, उन में से एक राजस्थान में पिछले दिनों गौरक्षकों ने एक और शख्स की हत्या कर दी. तथाकथित गौरक्षकों ने अलवर जिले के गोपालगढ़ गांव के 35 साला उमर खान को पीटपीट कर मार डाला और उस के साथ ताहिर खान व जावेद को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया.

तकरीबन 6-7 महीने पहले भी राजस्थान में इसी तरह गौरक्षकों ने अपने साथ गाय ले जा रहे पहलू खान की हत्या कर दी थी और उन के बेटों को बुरी तरह घायल कर दिया था.

उमर खान की हत्या मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मेवात दौरे के ठीक एक दिन बाद हुई. इस मामले में गोविंदगढ़ थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर के मुताबिक, उमर खान और ताहिर खान ड्राइवर जावेद के साथ एक पिकअप वैन में 6 गाएं और बछड़े ले कर गहेनकर गांव से आ रहे थे. लेकिन रास्ते में गोपालगढ़ के पास उन्हें 8 लोगों ने घेर लिया और उन पर बंदूकों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया.

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हमले में उमर खान की तुरंत मौत हो गई जबकि ताहिर और जावेद को हरियाणा के एक अस्पताल में गंभीर हालत में इलाज के लिए भरती कराया गया. हमलावरों ने उमर खान की लाश 12 किलोमीटर दूर रेलवे ट्रैक पर फेंक दी थी.

पहलू खान की हत्या की पूरे देश में हुई फजीहत के बाद ऐसा लगा था कि यह सिलसिला थमेगा, ऐसी वारदातें कम होंगी. बीचबीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की अच्छी इमेज पेश करने के लिए गौरक्षकों की बुराई भी करते रहे. उन के रुख से ऐसा लगा था कि गौरक्षक बन कर उग्र भीड़ के तौर पर हमले रुकेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री हिंसा रोकने की दिखावटी अपील कर रहे थे. उन की मंसा गौरक्षा के नाम पर हिंसा रोकने की नहीं है. उलटे भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ साल 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए कट्टर हिंदुत्व की इमेज को और भी धारदार बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं.

केंद्र और वसुंधरा सरकार दोनों ही इस तरह की वारदातों के लिए जिम्मेदार हैं. अल्पसंख्यकों की हिफाजत में नाकाम रहने के घातक नतीजे भी हो सकते हैं. सरकार इस के गंभीर खतरों को जानते हुए भी चुप्पी साधे हुए है और गौरक्षकों का हिंसक खेल जारी है.

खुलेआम घूम रहे हत्यारे

गौरक्षकों के हमले के शिकार पहलू खान ने मरते वक्त जिन 6 लोगों के नाम लिए थे, उन्हें राजस्थान पुलिस ने क्लीन चिट दे दी है.

मामले की जानकारी के मुताबिक, राजस्थान पुलिस ने दूध का कारोबार करने वाले गौरक्षकों के शिकार किसान पहलू खान द्वारा जिन 6 लोगों के नाम बताए गए थे, उस से संबंधित जांच को बंद कर दिया गया है, क्योंकि इन 6 आरोपियों में से 3 का संबंध हिंदू संगठन से है.

जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस वालों समेत गवाहों ने कहा कि आरोपियों में से कोई भी घटना के समय मौजूद नहीं था.

मालूम हो कि लोगों की भीड़ ने पहलू खान पर हमला किया था जिस से उस की मौत हो गई थी.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे आरोप सामने आए हैं कि संदिग्ध गौरक्षकों को बचाने के लिए सरकार का अफसरों पर दबाव है. गौशाला के मुलाजिम के बयान और मोबाइल फोन के रिकौर्ड के आधार पर पुलिस ने आरोपियों को क्लीन चिट दी है.

गौशाला के कर्मचारी के बयान के मुताबिक, आरोपी नवीन शर्मा, राहुल सैनी, ओम यादव, हुकुम चंद यादव, सुधीर यादव और जगमल यादव उस की गौशाला में थे, जो वारदात वाली जगह से तकरीबन 6 किलोमीटर दूर है.

मालूम हो कि 6-7 महीने पहले पहलू खान जयपुर के हटवाड़ा पशु बाजार से कुछ गायों को हरियाणा के नूह इलाके में ले जा रहा था. इसी दौरान अलवर के नजदीक गौरक्षकों ने पहलू खान पर हमला कर दिया जिस से उस की मौत हो गई.

पहलू खान के पास गाय को ले जाने के दस्तावेज भी थे, फिर भी गौरक्षकों ने उस पर हमला कर दिया.

इस मामले की जांच कर रही अपराध शाखा ने पहलू खान की हत्या की जांच रिपोर्ट अलवर पुलिस को भेज दी है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हत्याकांड के मामले में आरोपियों की लिस्ट में से 6 लोगों के नाम हटाए जाएं. इस के बाद अलवर पुलिस ने  6 आरोपियों को पकड़ने के लिए किए गए इनाम को भी रद्द कर दिया.

6 लोगों के नाम हटाए जाने पर पहलू खान के परिवार वालों में बेहद नाराजगी है. उन का कहना है कि वारदात के समय जब आरोपियों का नाम ले कर बुलाया जा रहा था, तो फिर आखिर कैसे उन के नाम हटा दिए गए?

इरशाद के बेटे ने इस मसले पर कहा, ‘‘मैं ने हमले के समय ओम, हुकुम, सुधीर और राहुल का नाम पुकारते सुना था. पुलिस दबाव में

ऐसा कह रही है. लेकिन हमारी लड़ाई यहां खत्म नहीं होगी. हम आगे भी लड़ेंगे और उन 6 लोगों को कुसूरवार साबित करेंगे.’’

दलित भी हैं गौरक्षकों के शिकार

गाय के नाम पर अब तक तो ज्यादातर मुसलमानों के साथ ही मारपीट होती रही है, लेकिन अब राजस्थान के आदिवासी व दलित समुदाय के लोग भी गौरक्षकों की गुंडागर्दी के शिकार बनने लगे हैं.

डूंगरपुर से तकरीबन 45 किलोमीटर दूर जिले के नारेडा गांव में एक दलित नानूराम की कहानी भी काफी दुखद है. यहां एक हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने नानूराम पर गाय का गोश्त बेचने के आरोप में उसे बुरी तरह पीट दिया जबकि नानूराम एक मजदूर है.

नानूराम बताता है कि वह मजदूरों को जागरूक करता है. गांव के कुछ दबंग लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी. उसे तरहतरह से धमकी दी जाने लगी. 28 नवंबर को गांव में हिंदू संगठन के लोगों ने उस के घर को घेर लिया. उस के साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी गई.

उन्होंने नानूराम पर झूठा आरोप लगाया कि वह गाय का गोश्त बेचता है. उस ने जब इस बारे में पुलिस थाने में शिकायत की तो थानेदार ने उलटा उसे ही धमका दिया.

नानूराम का आरोप है कि इस हिंदू संगठन के लोग चाहते हैं कि मजदूर गांव छोड़ दें ताकि वे उन की जमीनों पर कब्जा कर सकें.

ऐसे निभाएं 2 बीवियों के साथ

यकीन नहीं होता कि यह वही बबलू है जिस ने तकरीबन 14 साल पहले अपनी माशूका पार्वती (बदला हुआ नाम) और उस के घर वालों को खुलेतौर पर धौंस दी थी कि अगर उस की शादी पार्वती से न हुई तो वह खुदकुशी कर लेगा.

बबलू पर मरमिटने वाली पार्वती को तो अपने आशिक की यह अदा पसंद आई थी. साथ ही, उस के घर वाले भी बबलू का जुनून देख कर झुक गए थे और उन्होंने इन दोनों की शादी के बाबत ज्यादा नानुकर नहीं की.

तब बबलू भोपाल के बरखेड़ा में शराब की एक दुकान पर काम करता था और बांका जवान था. पार्वती के घर वालों को इसी बात पर एतराज था कि शराब की दुकान पर काम करने वाला मुलाजिम अच्छा आदमी नहीं हो सकता. वह कोई और गलत काम करे न करे, पर खुद तो जरूर शराबी होगा.

लेकिन बबलू उम्मीद से परे औरों से बेहतर शौहर साबित हुआ. अपनी बीवी का वह पूरा खयाल रखता था और अपने भीतर के आशिक को उस ने मरने नहीं दिया था.

पार्वती भी खुद को खुशकिस्मत समझती थी जो उसे इतना प्यार करने वाला शौहर मिला. दोनों खुश थे. यह खुशी उस वक्त और दोगुनी हो गई जब उन के यहां शादी के 3 साल बाद बेटा और फिर उस के भी 2 साल बाद एक प्यारी सी बेटी हुई.

शादी के बाद ही बबलू को भोपाल के नजदीक बैरसिया की एक शराब की दुकान में काम मिल गया था जिसे शराब बनाने वाली एक नामी कंपनी चलाती थी. बबलू चूंकि मेहनती और ईमानदार सेल्समैन था इसलिए उस की खासी पूछपरख थी. कंपनी के अफसरों की निगाह में वह जल्द ही चढ़ गया था. लिहाजा उसे तरक्की भी मिलने लगी थी और तनख्वाह बढ़ने के साथसाथ दूसरी सहूलियतें भी मिलने लगी थीं.

शादी के बाद

14 साल कब कैसे पंख लगा कर उड़ गए, इस का एहसास पार्वती को नहीं हुआ. हां, बच्चे हो जाने के बाद उस में कुछ बदलाव जरूर आए थे लेकिन बबलू के प्यार के आगे वे बेमानी थे.

काम में लगन और मेहनत के चलते तकरीबन 4 साल पहले कंपनी ने बबलू को मैनेजर बना कर दमोह भेजा तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. मैनेजरी अपनेआप में एक रुतबे वाली पोस्ट होती है जिसे हासिल करना बबलू का सपना भी था.

बच्चों की पढ़ाई के चलते बबलू अकेला ही दमोह चला गया था और वहां किराए का मकान ले कर रहने लगा था. पार्वती भी पति की तरक्की से खुश थी.

जब सच सामने आया

बीती 29 नवंबर, 2017 को भोपाल के महिला आयोग में खड़ी पार्वती ने अपनी शिकायत में बताया था कि बबलू ने दमोह जा कर रचना (बदला हुआ नाम) नाम की लड़की से शादी कर ली है और अब बबलू उस से और बच्चों से कोई वास्ता नहीं रखता.

पार्वती की मानें तो वह खुद हकीकत जानने के लिए दमोह गई थी. वहां उस ने देखा कि बबलू और रचना साथसाथ रहते हैं और उन्होंने शादी भी कर ली है.

इस पर पार्वती ने एतराज जताया तो बजाय शर्मिंदा होने के बबलू ने उसे खूब मारापीटा और यह कहते हुए भगा दिया कि जो करना है सो कर ले.

रचना ने भी पार्वती को दुत्कारते हुए कहा कि अब बबलू उस का शौहर है.

इस पर पार्वती ने कानूनी कार्यवाही करने की बात कही तो रचना भी शेरनी की तरह दहाड़ते हुए बोली, ‘‘जा, पहले हम दोनों की शादी के सुबूत तो हासिल कर ले, फिर कानूनी ज्ञान बघारना.’’

इस पर घबराई और सकपकाई पार्वती ने अपने सासससुर से गुहार लगाई तो उन्होंने भी साफसाफ कह दिया कि अब रचना ही उन की बहू है क्योंकि बेटा उसी को अपनी बीवी मानता है. वे इस में कुछ नहीं कर सकते. पार्वती से नाता तोड़ चुके सासससुर भी अब रचना और बबलू के साथ रहने लगे थे.

इंसाफ के लिए महिला आयोग के दफ्तर में पार्वती आई तो वहां मौजूद अफसरों ने उस की दरख्वास्त यह कहते हुए रख ली कि वे उस के साथ हुई इस ज्यादती पर कार्यवाही करेंगे और जल्द ही पुलिस के जरीए बबलू को भोपाल बुलवाएंगे जिस से पूरी बात का खुलासा हो सके.

खुलासे को बचा क्या

बबलू ने दूसरी शादी कर ली है या फिर बगैर शादी किए ही रचना के साथ शौहर की तरह रह रहा है, इन दोनों बातों में फर्क इतना भर है कि अगर पार्वती अपने शौहर की दूसरी शादी होना साबित कर देती है तो उसे कानूनन सजा हो सकती है और अगर नहीं कर पाती है जिस की कि उम्मीद ज्यादा है तो बबलू का कुछ नहीं बिगड़ना.

यह बात ऐसे मामलों को देखते हुए कतई चर्चा या बहस की नहीं है कि पहली बीवी के रहते कोई मर्द या शौहर दूसरी शादी क्यों करता है. वजह, ऐसा पहले भी इफरात से होता था लेकिन अब उजागर ज्यादा होने लगा है.

दूसरी शादी की वजहें कुछ भी हों पर यह भी साफ है कि मर्द अकसर दूसरी शादी छिपाने में गच्चा खा जाते हैं और दोनों बीवियों को एकसाथ खुश नहीं रख पाते.

दिलचस्प बात यह है कि दूसरी बीवी पहली को अपने शौहर की बीवी नहीं मानती तो दूसरी के बारे में तो यह कहावत लागू होती है कि सौत तो पुतले की भी नहीं सुहाती, फिर जीतीजागती सौतन कैसे कोई बीवी बरदाश्त कर लेगी.

ऐसे में आफत शौहर की आती है जो पहली और दूसरी दोनों के होने के चक्कर में किसी एक को छोड़ने पर मजबूर हो जाता है और वह अकसर पहली ही होती है. इस का यह मतलब नहीं है कि हर मामले में पहली में ही कोई खोट हो, लेकिन इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पहली या तो लापरवाह हो जाती है, पहले सी खूबसूरत और जवान नहीं रह जाती या फिर शौहर के जज्बातों की कद्र नहीं कर पाती.

क्या करें ऐसे शौहर

अगर साबित न हो तो दूसरी शादी कतई गुनाह नहीं लेकिन बबलू जैसे शौहर अगर थोड़ी अक्ल और समझदारी से काम लें तो बेवजह के हंगामे और पुलिस व कोर्टकचहरी के पचड़े से बच सकते हैं.

जब ऐसी नौबत आ ही जाए कि पहली बीवी के रहते दूसरी औरत से शादी करनी पड़े तो शौहर की हालत सांपछछूंदर सरीखी हो जाती है. इस से बचने के लिए बेहतर है कि वह दोनों बीवियों समेत बच्चों के बीच ऐसा तालमेल बिठाए कि सांप भी न मरे और लाठी भी न टूटे.

दूसरी शादी के बाद अगर पहली बीवी को सबकुछ सचसच बता दिया जाए तो क्या बात बन सकती है? जाहिर है कि इस सवाल का जवाब हर कोई न में ही देगा. इसी न के डर से शौहर पहली बीवी को सच बताने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते.

यहां बेहतर मिसाल मशहूर फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र की ली जा सकती है जिन्होंने पहली बीवी प्रकाश कौर के रहते दूसरी शादी फिल्म हीरोइन हेमामालिनी से कर ली थी. हालांकि कहा जाता है कि इस बाबत धर्मेंद्र ने इसलाम धर्म कबूल कर लिया था पर आज उन की दोनों बीवियां अपनीअपनी जगह खुश हैं.

अपने दोनों बेटों सनी देओल और बाबी देओल का कैरियर संवारने में धर्मेंद्र ने कोई कसर नहीं छोड़ी तो हेमामालिनी से पैदा हुई बेटियां ईशा और आहना पर भी प्यार लुटाया और उन की जिम्मेदारी से भागे नहीं.

पत्नी और बच्चों को सच बता कर और भरोसे में ले कर बात बन सकती है. आमतौर पर दूसरी शादी पहली शादी के 10-12 साल बाद ही शौहर करते हैं, तब तक पहली पत्नी से हुए बच्चे बड़े होने लगते हैं. उन का हक न मारा जाए, इस बाबत शौहर को चाहिए कि जितना मुमकिन हो दूसरी शादी का राज छिपा कर रखे.

बबलू अगर एहतियात से काम लेता तो शायद पार्वती को इतना गुस्सा नहीं आता. कोई भी औरत धोखा खाने से ज्यादा तिलमलाती है, उलट उस का शौहर अगर खुद अपनी मजबूरी गिड़गिड़ाते हुए उसे बताता है तो वह पसीज कर समझौता करने को तैयार भी हो जाती है.

इस बात को ऋषि कपूर, फराह और राधिका की साल 1986 में आई फिल्म ‘नसीब अपनाअपना’ में बेहतर ढंग से दिखाया गया था. ऋषि कपूर निपट गंवार और बेढंगी रहने वाली राधिका को छोड़ शहर में आ कर तेजतर्रार और स्मार्ट फराह से शादी कर लेता है. जब राधिका शहर आती है तो वह उसी के घर में नौकरानी बन कर रहने लगती है. सिर्फ इसलिए कि पति हरदम उस की आंखों के सामने रहे. शौहर की मजबूरी समझते हुए वह उस की दूसरी शादी पर कोई एतराज नहीं जताती, उलटे उसे बचाने की कोशिश में लगी रहती है.

फिल्म की बात और थी. सच में ऐसी बीवियां मिलना नामुमकिन है, पर ऐसी तो अब भी मिल ही जाती हैं जिन्हें यह समझ आ जाता है कि लड़ाईझगड़े से एक उम्र और हद के बाद कुछ हासिल नहीं होना. शौहर अभी जितना उन के हिस्से में है उस के बाद तो उतना भी नहीं रह पाएगा. पार्वती और बबलू के मामले में यही होने की उम्मीद ज्यादा लग रही है.

बबलू अगर दमोह में रचना के साथ संभल कर रहता तो झगड़े की नौबत ही नहीं आ पाती. एकाध बच्चा दूसरी बीवी से हो जाए तो भी पहली बीवी के तेवर ज्यादा तीखे नहीं रह जाते.

ऐसे में शौहर को चाहिए कि वह पहली बीवी की तरफ से एकदम लापरवाह न हो बल्कि वक्त निकालते हुए उस के साथ भी रहे और खर्च भी बराबर उठाता रहे. कोई ऐसी हरकत उसे नहीं करनी चाहिए जिस से पहली बीवी को उस पर शक हो.

यह हालांकि मुश्किल काम है पर हजारोंलाखों शौहर इसे कामयाबी से कर रहे हैं. भोपाल के नजदीक मंडीदीप की एक फैक्टरी में काम करने वाले देव कुमार (बदला हुआ नाम) की पहली बीवी और उस से हुए बच्चे विदिशा के एक गांव में रहते हैं जबकि दूसरी बीवी भोपाल में उस के साथ रहती है.

तकरीबन 34 साला देव कुमार हर शनिवार और रविवार को गांव जा कर अपनी पहली बीवी के साथ रहते हैं जो उन के मांबाप का खयाल रखती है.

तीजत्योहार पर भी देव कुमार बराबरी से दोनों बीवियों के साथ मनाते हैं. इस साल करवाचौथ पर फोन पर उन्होंने पहली बीवी को बता दिया था कि छुट्टी न मिलने से नहीं आ पाएंगे पर दीवाली की छुट्टी ले रखी है. बाद में दीवाली उन्होंने गांव जा कर मनाई तो किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की.

ऐसा कब तक चलेगा? इस सवाल पर देव कुमार का कहना है, ‘‘पता नहीं कब तक, पर मेरी कोशिश यही रहती है कि सबकुछ ऐसे ही चलता रहे.

इस बाबत ऐक्टिंग भी करनी पड़ती है और खर्च भी ज्यादा होता है. पर खुद को जानपहचान वाले लोगों और नातेरिश्तेदारों से छिपाए और बचाए रखना इस से भी बड़ी चुनौती है. इस पर अब तक तो मैं खरा उतरता रहा हूं.’’

देव कुमार नहीं चाहते कि राज खुले और पहली बीवी को दुख हो क्योंकि वे उसे भी चाहते हैं. राज खुलने पर भी वह खास कुछ नहीं कर पाएगी, यह अंदाजा भी उन्हें है. लेकिन अपनी तरफ से वे एहतियात बरतते हैं तो यह उन की खूबी ही कही जाएगी.

पहली बीवी के रहते दूसरी बीवी से निभाना कोई मुश्किल काम नहीं है. इस के लिए 2 जरूरी बातें हैं कि दूसरी खुशीखुशी साथ दे और दोनों के बीच की दूरी ज्यादा से ज्यादा हो.

फंदा न बन जाए दूसरी बीवी

शौहरों को दूसरी शादी करते वक्त यह देखना और जरूरी है कि कहीं दूसरी वाली किसी खुदगर्जी या लालच के चलते तो उस के साथ शादी नहीं कर रही है. इस के अलावा उस का मिजाज समझना भी जरूरी है.

ऐसा इसलिए कि ऐसे मामले भी आएदिन उजागर होते रहते हैं जिन से दूसरी बीवी से भी शौहरों की पटरी ज्यादा नहीं बैठी.

पेशे से भोपाल के वीडियोग्राफर सुरेंद्र सिंह ने 1 अक्तूबर, 2017 को फांसी के फंदे से लटक कर जान दे दी थी. इस की वजह दूसरी बीवी का 2 साल से मायके में रहना था जो बारबार बुलाने पर भी घर नहीं आ रही थी. पहली बीवी की अनदेखी कर के अगर दूसरी के चक्कर में यों बेवक्त जान देनी पड़े तो शादी घाटे का सौदा ही साबित होती है, इसलिए बतौर एहतियात इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए:

* दूसरी शादी जल्दबाजी और हड़बड़ाहट में नहीं करनी चाहिए.

* दूसरी होने वाली बीवी के गुजरे कल के बारे में जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए.

* यह देख लें कि दूसरी औरत किसी लालच के चलते तो आप से शादी नहीं कर रही. यह भी देख लें कि कहीं आप भी किसी खुदगर्जी या लालच के चलते तो उस से शादी नहीं कर रहे. ऐसे रिश्तों की उम्र ज्यादा नहीं होती.

* दूसरी शादी में भी उम्र का अंतर काफी माने रखता है. उम्र में ज्यादा छोटी और ज्यादा बड़ी बीवी से निभा पाना मुश्किल काम होता है.

* वह सच्चा प्यार करती है या नहीं, इसे मापने का कोई पैमाना नहीं है, फिर भी हर लैवल पर उसे परखना जरूरी है.

* ज्यादा खर्चीली, गुस्सैल या बिगड़ैल औरत से शादी करने से कोई फायदा नहीं होता. महज खूबसूरती और जिस्म का लगाव हो तो दूसरी शादी कामयाब नहीं होती.

* यह जरूरी है कि दोनों बीवियों में से किसी एक को सचाई बता दी जाए जिस से झगड़ा होने पर कोई तो आप के साथ खड़ी हो.

* अगर पहली को नहीं छोड़ सकते तो दूसरी के सामने यह बात साफ कर देनी चाहिए और अपनी आमदनी, जायदाद व पैसों के बाबत भी साफसाफ बता देना चाहिए कि आप किस को कितना हिस्सा देंगे.

जिंदगी के प्रति आप के नजरिए को बदल देती है प्रैगनैंसी

गर्भावस्था महिलाओं के लिए वह समय होता है जब वे शिशु की सुरक्षा के लिए अपने खानेपीने और स्वास्थ्य का हर संभव ध्यान रखती हैं. गर्भवती महिलाएं हमेशा खुश रहने और अपना ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखने की कोशिश करती हैं.

कुछ महिलाओं के लिए गर्भावस्था तकलीफदेह हो सकती है जैसे उन्हें मौर्निंग सिकनैस, पैरों में सूजन, चक्कर और मितली आना आदि परेशानियां हो सकती हैं. मगर आमतौर पर गर्भावस्था हमेशा महिलाओं में सकारात्मक बदलाव ले कर आती है. इस से उन के शरीर और दिमाग दोनों में संपूर्ण रूप से सकारात्मक बदलाव आते हैं.

शरीर पर गर्भावस्था के सकारात्मक प्रभाव

– गर्भावस्था का अर्थ है कम मासिकस्राव, जिस से ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरौन हारमोन का संपर्क सीमित हो जाता है. ये हारमोंस स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि ये कोशिकाओं की वृद्धि को प्रेरित करते हैं और महिलाओं के स्तन कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. साथ ही गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान ब्रैस्ट सैल्स में जिस तरह के बदलाव होते हैं, वे उन्हें कैंसर कोशिकाओं में बदलने के प्रति अधिक प्रतिरोधक बना देते हैं.

– गर्भावस्था के दौरान पेल्विक क्षेत्र में रक्तसंचार बढ़ जाता है, प्रसव और डिलिवरी से गुजरने के बाद महिलाओं को खुद में एक नई ताकत महसूस होती है.

दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव

– बच्चा होने से औटोइम्यून डिसऔर्डस जैसे मल्टीपल स्केल्रोसिस के होने का खतरा कम हो जाता है.

– गर्भावस्था सकारात्मक व्यवहार ले कर आती है और महिला को मजबूत बनाती है. इस से जीवन में आने वाले बदलावों से लड़ने में आसानी हो जाती है, साथ ही नकारात्मक सोच व चिंता से भी बचाव होता है.

शिशु के जन्म के बाद सकारात्मक प्रभाव

– अधिकांश महिलाओं ने पाया है कि पहले बच्चे के जन्म के बाद उन की मासिकस्राव से जुड़ी तकलीफें काफी कम हो गई हैं.

– प्रसव के बाद अधिकांश महिलाओं के स्वास्थ्य में सकारात्मक बदलाव आते हैं और वे शराब, धूम्रपान जैसी बुरी लतें छोड़ देती हैं.

– एक मां अपने आसपास खुशियों का खजाना देख कर खुशी और उत्साह से भर जाती है. जब भी मां अपने बच्चे को गोद में लेती या उसे स्तनपान कराती है तो औक्सीटोसिन हारमोन इस गहरे रिश्ते को जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है. यह बहुत ही ताकतवर होता है, जिस की वजह से कोई भी कुछ घंटों के लिए और कई बार कुछ दिनों के लिए भी चिंता को भूल सकता है.

– शिशु के जन्म के बाद त्वचा चमकदार और बाल चमकीले हो जाते हैं, साथ ही कीलमुंहासों की समस्या से भी मुक्ति मिल जाती है.

कुछ इस तरह प्यार से संभाले रिश्तों की डोर

भारत में तलाक के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है. 10 साल पहले जहां भारत में 1 हजार लोगों में 1 व्यक्ति तलाक लेता था, वहीं अब यह संख्या 1,000 पर 13 से ज्यादा हो गई है. तलाक याचिकाएं पहले से दोगुनी मात्रा में जमा हो रही हैं. खासकर मुंबई, बैंगलुरु, कोलकाता, लखनऊ जैसे बड़े शहरों में यह ट्रैंड ज्यादा देखने को मिल रहा है. इन शहरों में मात्र 5 सालों में तलाक फाइल करने के मामलों में करीब 3 गुना वृद्धि दर्ज की गई है.

2014 में मुंबई में तलाक के 11,667 केस फाइल किए गए जबकि 2010 में यह संख्या 5,248 थी. इसी तरह 2014 में लखनऊ और दिल्ली में क्रमश: 8,347 और 2000 केस फाइल किए गए जबकि 2010 में यह संख्या क्रमश: 2,388 और 900 थी.

तलाक के मामलों में इस बढ़ोतरी और दंपती के बीच बढ़ते मतभेदों की वजह क्या है? क्यों रिश्ते टिक नहीं पाते? ऐसे क्या कारण हैं जो रिश्तों की जिंदगी छोटी कर देते हैं?

इस संदर्भ में अमेरिका के मनोवैज्ञानिक और मैरिज ऐक्सपर्ट जौन गौटमैन ने 40 सालों के अध्ययन और अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि मुख्य रूप से 4 ऐसे कारक हैं, जिन की वजह से दंपती के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा होने लगती है. इस स्थिति के 6 सालों के अंदर उन का तलाक हो जाता है.

आलोचनात्मक रवैया : वैसे तो कभी न कभी सभी एकदूसरे की आलोचना करते हैं पर पतिपत्नी के बीच यह आम बात है. समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना करने का तरीका इतना बुरा होता है कि चोट सीधे सामने वाले के दिल पर लगती है. किसी भी हाल में एक जना दूसरे को गलत साबित करने के प्रयास में लग जाता है. उस पर इलजामों की बौछार करने लगता है. ऐसे में कई दफा पतिपत्नी एकदूसरे से इतनी दूर चले जाते हैं कि फिर लौटना कठिन हो जाता है.

घृणा : जब आप के मन में जीवनसाथी के लिए घृणा और तिरस्कार के भाव उभरने लगें तो समझ जाएं कि अब रिश्ता ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं. घृणा प्रदर्शन के तहत ताने देना, नकल उतारना, नाम से पुकारना जैसी कितनी ही हरकतें शामिल होती हैं, जो सामने वाले को महत्त्वहीन महसूस कराती हैं. इस तरह का व्यवहार रिश्तों की जड़ों पर चोट करता है.

बचाव करने की आदत : जीवनसाथी पर इलजाम लगा कर खुद को बचाने का रवैया जल्द ही रिश्तों के अंत की वजह बनता है. पतिपत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वे हर स्थिति में एकदूसरे का सहयोग करें. मगर जब वे एकदूसरे के ही विरोध में खड़े होने लगें तो उन का रिश्ता कोई नहीं बचा सकता.

संवादहीनता : जब व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति उदासीनता की चादर ओढ़ लेता है, संवाद खत्म कर देता है और उस की बातों को नजरअंदाज करने लगता है, तो दोनों के बीच आई यह दीवार रिश्ते में मौजूद रहीसही जिंदगी भी खत्म कर देती है.

कुछ और कारण

क्वालिटी टाइम: इंस्टिट्यूट फौर सोशल ऐंड इकोनौमिक चेंज, बैंगलुरु द्वारा की गई एक रिसर्च के अनुसार पतिपत्नी के अलगाव का सब से प्रमुख कारण ड्युअल कैरियर कपल (पतिपत्नी दोनों का कामकाजी होना) की लगातार बढ़ती संख्या है. इस रिसर्च में यह बात सामने आई है कि 53% महिलाएं अपने पति से झगड़ती हैं, क्योंकि उन के पति उन के साथ क्वालिटी टाइम नहीं बिताते, वहीं 31.7% पुरुषों को अपनी कामकाजी पत्नियों से शिकायत है कि उन के पास परिवार के लिए समय नहीं है.

सोशल मीडिया: हाल ही में अमेरिका में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि सोशल मीडिया में अधिक समय देने की प्रवृत्ति और तलाक दर में पारस्परिक संबंध है.

जितना ज्यादा व्यक्ति सोशल मीडिया में ऐक्टिव होता है, परिवार टूटने का खतरा उतना ही ज्यादा होता है.

इस की मुख्य रूप से 2 वजहें हो सकती हैं. पहली यह कि सोशल मीडिया में लिप्त रहने वाला व्यक्ति पत्नी को कम समय देता है. वह सारा समय नए दोस्त बनाने व लाइक्स और कमैंट्स पाने के चक्कर में लगा रहता है. दूसरी यह कि ऐसे व्यक्ति के ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स होने के चांसेज बढ़ जाते हैं. सोशल मीडिया पर फ्रैंडशिप ऐक्सैप्ट करना और उसे आगे बढ़ाना बहुत आसान होता है.

धर्म का असर रिश्तों पर

सामान्यतया रिश्तों में कभी खटास और कभी मिठास का दौर चलता ही रहता है. मगर इस का मतलब यह नहीं कि आप अपनी गलतियों पर ध्यान न दें और समाधान के लिए पंडेपुजारियों के पास दौड़ें. पंडेपुजारी पतिपत्नी के रिश्ते को 7 जन्मों का बंधन बताते हैं. रिश्तों को बचाने के लिए वे सदा स्त्री को ही शिक्षा देते हैं कि वह दब कर रहे, आवाज न उठाए.

दरअसल, धर्मगुरुओं की तो मंशा ही होती है कि व्यक्ति 7 जन्मों के चक्कर में फंसा रहे और गृहकलेषों से बचने के लिए तरहतरह के धार्मिक अनुष्ठानों व क्रियाकलापों में पानी की तरह पैसा बहाता रहे.

स्त्रियां ज्यादा भावुक होती हैं. जपतप, दानपुण्य में विश्वास करती हैं. इसी का फायदा उठा कर धर्मगुरु उन से ये सब करवाते रहते हैं ताकि उन्हें चढ़ावे का फायदा मिलता रहे.

हाल ही में एक परिवार इसलिए बरबाद हो गया क्योंकि गृहक्लेष से बचने के लिए घर की स्त्री ने तांत्रिक का दरवाजा खटखटाया.

गत 25 मई को दिल्ली के पालम इलाके में एक बेटे ने अपनी मां की चाकू घोंप कर बेरहमी से हत्या कर दी. 63 साल की मां यानी प्रेमलता अपने बेटेबहू के साथ रहती थी. हर छोटीबड़ी समस्या के समाधान के लिए वह तांत्रिकों और ज्योतिषियों के पास जाती. घर में आएदिन होने वाले झगड़ों के निबटारे के लिए भी वह तांत्रिक के पास गई और फिर उस के बताए उपायों को घर पर आ कर आजमाने लगी. यह सब देख कर बहू को लगा कि वह जाटूटोना कर रही है अत: उस ने यह बात पति को बताई. फिर इसी बात को ले घर में खूब झगड़ा हुआ और बेटे ने सब्जी काटने वाले चाकू से मां पर हमला कर दिया.

मजबूत बनाएं रिश्ता

रिश्ते बनाना बहुत सहज है पर उन्हें निभाना कठिन. जौन गौटमैन के मुताबिक रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए कपल्स को इन बातों का खयाल रखना चाहिए:

लव मैप का फंडा : लव मैप मानव मस्तिष्क का वह हिस्सा है जहां व्यक्ति अपने जीवनसाथी से जुड़ी हर तरह की सूचना जैसे उस की परेशानियों, उम्मीदों, सपनों समेत दूसरे महत्त्वपूर्ण तथ्यों व भावनाओं को इकट्ठा रखता है. गौटमैन के मुताबिक दंपती लव मैप का प्रयोग एकदूसरे के प्रति अपनी समझ, लगाव और प्रेम प्रदर्शित करने में कर सकते हैं.

साथ दें सदा : जीवनसाथी के जीवन से जुड़े हर छोटेबड़े मौके पर उस के साथ खड़े रहें. पूरे उत्साह और प्रेम के साथ उस के हर दुखसुख के भागीदार बनें.

महत्त्व स्वीकारें : किसी भी तरह का फैसला लेते वक्त या कोई भी महत्त्वपूर्ण काम करते समय जीवनसाथी को भूलें नहीं. उस की सहमति अवश्य लें.

तनाव करें दूर : पतिपत्नी के बीच तनाव लंबे समय तक कायम नहीं रहना चाहिए, जीवनसाथी आप की किसी बात से आहत है तो मीठे शब्दों का लेप जरूर लगाएं. एकदूसरे के साथ सामंजस्य बनाए रखें. कंप्रोमाइज करना सीखें.

दूरी न दें बढ़ने : कई दफा पतिपत्नी के बीच का विवाद इतना गहरा हो जाता है कि पास आने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. साथी स्वयं को अस्वीकृत महसूस करता है. दोनों इस बारे में बात तो करते हैं पर कोई सकारात्मक समाधान नहीं निकाल पाते. हर वादविवाद के बाद वे और ज्यादा कुंठित महसूस करते हैं.

गौटमैन कहते हैं कि कभी ऐसा मौका न आने दें. पतिपत्नी के बीच विवाद इसलिए बढ़ता है क्योंकि उन की बातचीत में मधुरता, उत्साह और लगाव का अभाव होता है. वे समझौता नहीं करना चाहते. इसी वजह से भावनात्मक रूप से भी एकदूसरे से दूर हो जाते हैं. यह दूरी कितनी भी बढ़ जाए पर एक कपल को यह जरूर पता लगाना चाहिए कि विवाद के मूल में क्या है और उसे कैसे दूर किया जाए.

पार्टनर को अच्छा महसूस कराएं : पतिपत्नी को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि उस के जीवनसाथी को क्या पसंद है, वह किस बात से खुश होता है. समयसमय पर जीवनसाथी के साथ बीते खुशनुमा लमहों का जिक्र करें ताकि वही प्यार आप फिर से महसूस कर सकें.

श्रीदेवी का अभिनेत्री बनना महज एक इत्तफाक

अपने दमदार अभिनय से लगभग चार दशक तक बौलीवुड में अपना एकाधिकार जमाए रखने वाली और महिला सुपरस्टार से सम्मानित श्रीदेवी का 54 वर्ष की उम्र में दुबई में हृदय गति रूक जाने से निधन हो गया. श्रीदेवी अपने पारिवारिक सदस्य मोहित मारवाह की शादी के समारोह में शामिल होने के लिए अपने पति बोनी कपूर व बेटी खुशी के साथ दुबई गई थीं और आज ही वापस लौटने वाली थीं. लेकिन अचानक उनकी तबियत खराब हुई और अस्पताल ले जाने पर पता चला कि हृदय गति रूक जाने से उनका निधन हो गया. श्रीदेवी का पार्थिव शरीर मुंबई लाया जा रहा है. उनका अंतिम संस्कार मुंबई में ही संपन्न होगा.

13 साल की उम्र में तमिल फिल्म में वयस्क किरदार निभाने के बाद श्रीदेवी ने हिंदी, तमिल, तेलगू की 300 फिल्में की. उनकी करियर की 300 वीं फिल्म 7 जुलाई 2017 को प्रदर्शित हुई थी. ‘‘सोलहवां सावन’’, ‘हिम्मतवाला’’, ‘‘सदमा’’, ‘‘तोहफा’’, ‘ ‘नगीना’’, ‘‘चालबाज’’, ‘‘लम्हे’’, ‘खुदा गवाह’ उनकी कुछ अति चर्चित फिल्में रही हैं. श्रीदेवी एकमात्र ऐसी अदाकारा रही हैं, जिन्हें बौलीवुड में सुपरस्टार का दर्जा मिला था. श्रीदेवी से पहले और श्रीदेवी के बाद आई किसी भी अभिनेत्री को यह तमगा नसीब नहीं हुआ. इतना ही नही यह उनके दमदार अभिनय का ही कमाल था कि उन्हे 2013 में “पद्मश्री’’ से नवाजा गया था.

सिवाकाशी, तमिलनाड़ु में 13 अगस्त 1963 में जन्मी श्रीदेवी के अभिनय से जुड़ने की बड़ी अजीबोगरीब कहानी रही. उन्होंने सबसे पहले चार साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी, पर तब उन्हें अहसास नहीं था कि वह अभिनय को करियर बनाएंगी. लेकिन जब वह तेरह साल की उम्र में मदुराई से चेन्नई आईं, तो उनकी किस्मत बदल गई.

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खुद श्रीदेवी ने मुझसे अपने अभिनेत्री बनने की बात को इत्तफाक की संज्ञा देते हुए बताया था- ‘‘मेरा फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ना भी एक इत्तफाक/एक्सीडेंट था. क्योंकि मेरे माता पिता फिल्मों से नहीं हैं. हमारा परिवार बहुत दकियानूसी व रूढ़िवादी परिवार रहा है. मेरी मां गृहिणी थी, मेरे पिता वकील, ऐसे में फिल्म तो बहुत दूर की बात थी. लेकिन मेरी डेस्टिनी मुझे फिल्मों में ले आई. अन्यथा मैं चेन्नई या मदुराई में पड़ी होती. वास्तव में पढ़ाई करने के लिए मैं मदुराई से चेन्नई आई थी. यहां मेरे पिताजी वकालत कर रहे थें. मेरे अंकल एमएलए थें. एक दिन मेरे अंकल को एक समारोह में जाना था, पर वह जा नहीं पा रहे थे. तो उन्होंने मेरे पिता से कहा कि वह चले जाएं. मैं अपने पिता के बहुत करीब थी. तो मैंने उनसे कहा कि मैं भी चलूंगी. उन्होंने कहा चलो. उस समारोह में एक अति लोकप्रिय व नामचीन गीतकार मिल गएं. उन्होंने मेरे पिता से पूछा कि क्या आप अपनी बेटी को एक फिल्म में अभिनय करवाना पसंद करेंगे? मेरे पिता ने मेरी तरफ देखा और फिर गीतकार से कहा कि मैं घर जाकर इस बारे में सोचूंगा, अभी मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता. दूसरे दिन सुबह मेरे पिता ने मम्मी से रातवाली बात बताई. उनकी बात पूरी होते होते हमारे घर के दरवाजे पर एक गाड़ी आकर रूकी, जो कि मुझे फिल्म के सेट पर ले जाने के लिए आई थी. मेरी मम्मी उत्साहित व खुश हो गईं. उन्होंने कहा जा बेटी जा, उस वक्त मेरे पिताजी भी कुछ बोल नहीं पाए और मैं सेट पर चली गई. जबकि मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं पढ़ लिखकर उन्हीं की तरह मशहूर वकील बनूं. उस दिन मैं अभिेनेत्री बन गई थी, और मेरी पहली तमिल फिल्म 1976 में “मूंद्रू मुदीचू’’ आयी थी. उस वक्त मैं सिर्फ तेरह वर्ष की थी और युवा किरदार निभाया था.’’

यह भी रहा अजीब इत्तफाक

मशहूर अभिनेता बोनी कपूर से श्रीदेवी ने 1996 में विवाह रचाया था. उस वक्त बोनी कपूर शादीशुदा थें. उनकी पहली पत्नी मोना शोरी कपूर जिंदा थीं और उनके बेटे अर्जुन कपूर भी थें, जो कि आज एक सफल अभिनेता माने जाते हैं. पर बोनी कपूर और श्रीदेवी के बीच ऐसा प्यार पनपा था कि उन्होंने कई तरह के विराधों के बावजूद 1996 में शादी कर ली थी.

बोनी कपूर की पहली पत्नी और अभिनेता अर्जुन कपूर की मां मोना शोरी कपूर का 25 मार्च 2012 को निधन हुआ था. उस वक्त तक अभिनेता अर्जुन कपूर अपने करियर की पहली फिल्म ‘‘इश्कजादे’’ की शूटिंग खत्म कर चुके थे और उन्हें अपनी फिल्म के प्रदर्शित होने का इंतजार था. मगर मोना शोरी कपूर अपने बेटे अर्जुन कपूर की पहली फिल्म के पर्दे पर आने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो गई थीं. फिल्म ‘इश्कजादे’ लगभग डेढ़़ माह बाद 11 मई 2012 को सिनेमाघरों में पहुंची थी.

और अब बोनी कपूर की दूसरी पत्नी श्रीदेवी का निधन 24 फरवरी 2018 को हुआ है, जबकि उनकी बेटी जान्हवी कपूर के करियर की पहली फिल्म ‘‘धड़क’’ की शूटिंग अभी पूरी हुई है. यह फिल्म 20 जुलाई 2018 को प्रदर्शित होनी है. यानी कि श्रीदेवी भी अपनी बेटी के करियर की पहली फिल्म के सिनेमाघर में आने से पहले ही इस संसार से चली गईं.

श्रीदेवी ने अनिच्छा से जान्हवी को अभिनेत्री बनने की इजाजत दी थी

श्रीदेवी की बड़ी बेटी जान्हवी कपूर की पहली फिल्म ‘‘धड़क’’ की शूटिंग लगभग पूरी हो चुकी है और वह अभिनेत्री बन चुकी हैं. मगर हर किसी को पता है कि श्रीदेवी कभी नहीं चाहती थीं कि उनकी बेटी जान्हवी कपूर फिल्मों से जुड़े या अभिनेत्री बने. खुद श्रीदेवी ने हमसे हुई बातचीत में कहा था – ‘‘यह सच है कि जब मेरी बेटी ने कहा कि उसे फिल्मों में हीरोइन बनना है, तो मैं थोड़ी सी घबराई हुई थी. उसे इजाजत देने को लेकर मेरे अंदर एक हिचक थी. जबकि मैं समझती हूं कि आज मैं जो कुछ हूं, वह फिल्म इंडस्ट्री की वजह से हूं. फिल्म इंडस्ट्री की वजह से ही मैंने नाम कमाया है. लेकिन समय का अंतराल बहुत कुछ मायने रखता है. जब मैं हीरोईन बनी थी, उस वक्त हम घोड़े की तरह काम कर रहे थे. आपको पता होगा कि घोड़ो की दोनों आंखों के बगल में पट्टियां बांधी जाती हैं, जिससे घोड़ा एकदम सीधा देखते हुए सरपट दौड़ता रहे. तो हम भी एक ढर्रे पर काम कर रहे थे. आज की तरह शूटिंग, डबिंग, पार्टियां, मस्ती करना, यह सब नहीं होता था. बल्कि उस वक्त हमारे उपर बंदिश होती थी कि हमें जो काम करना है, उसे पूरी तरह ईमानदारी से करना है.’’

श्रीदेवी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा था- ‘‘दूसरी बात मेरी मां मुझे बहुत प्रोटेक्ट करती थी. उसी तरह मैं भी अपनी बेटियों को बहुत प्रोटेक्ट करती हूं. आप यकीन नहीं करेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि मैंने 300 फिल्मों में अभिनय कर लिया. मगर मैंने अपनी बेटियों को बहुत कम फिल्में दिखायी हैं. छह साल की उम्र तक तो उन्हें यही नही पता चला कि मैं अभिनेत्री हूं. 6 साल की उम्र के बाद जब वह मेरे साथ एयरपोर्ट पर पहुंची और लोगों ने मुझसे औटोग्राफ मांगा, तब मुझे उन्हें बताना पड़ा कि मैं फिल्मों में अभिनय करती हूं. लेकिन मैंने उनसे कह दिया था कि मैं उन्हें अपनी कोई फिल्म नही दिखाउंगी. ’’

तृष्णा : भाग 2

एक शाम चाय पीते हुए इरा ने कहा, ‘‘सुनो, विमलेशजी कह रही थीं कि इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ फिजिकल एजुकेशन से 2-3 लोग आए हैं, वे सुबह 1 घंटे ऐक्सरसाइज करना सिखाएंगे और उन के लैक्चर भी होंगे. मुझे लगता है, शायद मेरे कई प्रश्नों का उत्तर मुझे वहां जा कर मिल जाएगा. अगर कहो तो मैं भी चली जाया करूं, 15-20 दिनों की ही तो बात है.’’

उदय ने चाहा कि कहे, ‘तुम कहां विमलेश के चक्कर में पड़ रही हो. वह तो सारा दिन पूजापाठ, व्रतउपवास में लगी रहती है. यहां तक कि उसे इस का भी होश नहीं रहता कि उस के पति व बच्चों ने खाना खाया कि नहीं?’ लेकिन वह चुप रहा.

थोड़ी देर बाद उस ने कहा, ‘‘ठीक है, सोच लो, तुम्हें ही समय निकालना पड़ेगा. ऐसा करो, 15-20 दिन तुम मेरे साथ औफिस न चलो.’’

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है, मैं कर लूंगी,’’ इरा उत्साहित थी.

इरा अब ऐक्सरसाइज सीखने जाने लगी. सुबह जल्दी उठ कर वह उदय और चंदन के लिए नाश्ता बना कर चली जाती. उदय चंदन को ले कर टहलने निकल जाता और लौटते समय इरा को साथ ले कर वापस आ जाता. फिर दिनभर औफिस में दोनों काम करते.

शाम को घर लौटने पर कभी उदय कहता, ‘‘आज तुम थक गई होगी, औफिस में भी काम ज्यादा था और तुम सुबह 4 बजे से उठी हुई हो. आज बाहर खाना खा लेते हैं.’’

लेकिन वह न मानती.

अब वह ऐक्सरसाइज करना सीख चुकी थी. सुबह जब सब सोते रहते तो वह उठ कर ऐक्सरसाइज करती. फिर दिन का सारा काम करने के बाद रात में चैन से सोती.

एक दिन इरा ने उदय से कहा, ‘‘ऐक्सरसाइज से मुझे बहुत शांति मिलती है. पहले मुझे छोटीछोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था, लेकिन अब नहीं आता. कभी तुम भी कर के देखो, बहुत अच्छा लगेगा.’’

उदय ने हंस कर कहा, ‘‘भावनाओं को नियंत्रित नहीं करना चाहिए. सोचने के ढंग में परिवर्तन लाने से सबकुछ सहज हो सकता है.’’

चंदन की गरमी की छुट्टियां हुईं. सब ने नेपाल घूमने का कार्यक्रम बनाया. जैसे ही वे रेलवेस्टेशन पहुंचे, छोटेछोटे भिखारी बच्चों ने उन्हें घेर लिया, ‘माई, भूख लगी है, माई, तुम्हारे बच्चे जीएं. बाबू 10 रुपए दे दो, सुबह से कुछ खाया नहीं है.’ लेकिन यह सब कहते हुए उन के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, तोते की तरह रटे हुए वे बोले चले जा रहे थे. इस से पहले कि उदय पर्स निकाल कर उन्हें पैसे दे पाता, इरा ने 20-25 रुपए निकाले और उन्हें दे कर कहा, ‘‘आपस में बराबरबराबर बांट लेना.’’

काठमांडू पहुंच कर वहां की सुंदर छटा देख कर सब मुग्ध रह गए. इरा सवेरे उठ कर खिड़की से पहाड़ों पर पड़ती धूप के बदलते रंग देख कर स्वयं को भी भूल जाती.

एक रात उस ने उदय से कहा, ‘‘मुझे आजकल सपने में भूख से बिलखते, सर्दी से ठिठुरते बच्चे दिखाई देते हैं. फिर मुझे अपने इस तरह घूमनेफिरने पर पैसा बरबाद करने के लिए ग्लानि सी होने लगती है. जब हमारे चारों तरफ इतनी गरीबी, भुखमरी फैली हुई है, हमें इस तरह का जीवन जीने का अधिकार नहीं है.’’

उदय ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘तुम सच कहती हो, लेकिन स्वयं को धिक्कारने से समस्या खत्म तो नहीं हो सकती. हमें अपने सामर्थ्य के अनुसार ऐसे लोगों की सहायता करनी चाहिए, लेकिन भीख दे कर नहीं. हो सके तो इन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करना चाहिए. अगर हम ने अपनी जिंदगी में ऐसे 4-6 घरों के कुछ बच्चों को पढ़नेलिखने में आर्थिक या अन्य सहायता दे कर अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका दिया तो वह कम नहीं है. तुम इस में मेरी मदद करोगी तो मुझे अच्छा लगेगा.’’

इरा प्रशंसाभरी नजरों से उदय को देख रही थी. उस ने कहा, ‘‘लेकिन दुनिया तो बहुत बड़ी है. 2-4 घरों को सुधारने से क्या होगा?’’

नेपाल से लौटने के बाद इरा ने शहर की समाजसेवी संस्थाओं के बारे में पता लगाना शुरू किया. कई जगहों पर वह स्वयं जाती और शाम को लौट कर अपनी रिपोर्ट उदय को विस्तार से सुनाती.

कभीकभी उदय झुंझला जाता, ‘‘तुम किस चक्कर में उलझ रही हो. ये संस्थाएं काम कम, दिखावा ज्यादा करती हैं. सच्चे मन से तुम जो कुछ कर सको, वही ठीक है.’’

लेकिन इरा उस से सहमत नहीं थी. आखिर एक संस्था उसे पसंद आ गई. अनीता कुमारी उस संस्था की अध्यक्ष थीं. वे एक बहुत बड़े उद्योगपति की पत्नी थीं. इरा उन के भाषण से बहुत प्रभावित हुई थी. उन की संस्था एक छोटा सा स्कूल चलाती थी, जिस में बच्चों को निशुल्क पढ़ाया जाता था. गांव की ही कुछ औरतों व लड़कियों को इस कार्य में लगाया गया था. इन शिक्षिकाओं को संस्था की ओर से वेतन दिया जाता था.

समाज द्वारा सताई गई औरतों, विधवाओं, एकाकी वृद्धवृद्धाओं के लिए भी संस्था काफी कार्य कर रही थी.

इरा सोचती थी कि ये लोग कितने महान हैं, जो वर्षों निस्वार्थ भाव से समाजसेवा कर रहे हैं. धीरेधीरे अपनी मेहनत और लगन की वजह से वह अनीता का दाहिना हाथ बन गई. वे गांवों में जातीं, वहां के लोगों के साथ घुलमिल कर उन की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करतीं.

इरा को कभीकभी महसूस होता कि वह उदय और चंदन के साथ अन्याय कर रही है. एक दिन यही बात उस ने अनीता से कह दी. वे थोड़ी देर उस की तरफ देखती रहीं, फिर धीरे से बोलीं, ‘‘तुम सच कह रही हो…तुम्हारे बच्चे और तुम्हारे पति का तुम पर पहला अधिकार है. तुम्हें घर और समाज दोनों में सामंजस्य रखना चाहिए.’’

इरा चौंक गई, ‘‘लेकिन आप तो सुबह आंख खुलने से ले कर रात देर तक समाजसेवा में लगी रहती हैं और मुझे ऐसी सलाह दे रही हैं?’’

‘‘मेरी कहानी तुम से अलग है, इरा. मेरी शादी एक बहुत धनी खानदान में हुई. शादी के बाद कुछ सालों तक मैं समझ न सकी कि मेरा जीवन किस ओर जा रहा है? मेरे पति बहुत बड़े उद्योगपति हैं. आएदिन या तो मेरे या दूसरों के यहां पार्टियां होती हैं. मेरा काम सिर्फ सजसंवर कर उन पार्टियों में जाना था. ऐसा नहीं था कि मेरे पति मुझे या मेरी भावनाओं को समझते नहीं थे, लेकिन वे मुझे अपने कीमती समय के अलावा सबकुछ दे सकते थे.

‘‘फिर मेरे जीवन में हंसताखेलता एक राजकुमार आया. मुझे लगा, मेरा जीवन खुशियों से भर गया. लेकिन अभी उस का तुतलाना खत्म भी नहीं हुआ था कि मेरे खानदान की परंपरा के अनुसार उसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया. अब मेरे पास कुछ नहीं था. पति को अकसर काम के सिलसिले में देशविदेश घूमना पड़ता और मैं बिलकुल अकेली रह जाती. जब कभी उन से इस बात की शिकायत करती तो वे मुझे सहेलियों से मिलनेजुलने की सलाह देते.

‘‘धीरेधीरे मैं ने घर में काम करने वाले नौकरों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. शुरू में तो मेरे पति थोड़ा परेशान हुए, फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा. वहां से यहां तक मैं उन के सहयोग के बिना नहीं पहुंच सकती थी. उन्हें मालूम हो गया था कि अगर मैं व्यस्त नहीं रहूंगी तो बीमार हो जाऊंगी.’’

इरा जैसे सोते से जागी, उस ने कुछ न कहा और चुपचाप घर चली आई. उसे जल्दी लौटा देख कर उदय चौंक पड़ा. चंदन दौड़ कर उस से लिपट गया.

उदय और चंदन खाना खाने जा रहे थे. उदय ने अपने ही हाथों से कुछ बना लिया था. चंदन को होटल का खाना अच्छा नहीं लगता था. मेज पर रखी प्लेट में टेढ़ीमेढ़ी रोटियां और आलू की सूखी सब्जी देख कर इरा का दिल भर आया.

चंदन बोला, ‘‘मां, आज मैं आप के साथ खाना खाऊंगा. पिताजी भी ठीक से खाना नहीं खाते हैं.’’

इरा ने उदय की ओर देखा और उस की गोद में सिर रख कर फफक कर रो पड़ी, ‘‘मैं तुम दोनों को बहुत दुख देती हूं. तुम मुझे रोकते क्यों नहीं?’’

उदय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं ने तुम से प्यार किया है और पति होने का अधिकार मैं जबरदस्ती तुम से नहीं लूंगा, यह तुम जानती हो. जीवन के अनुभव प्राप्त करने में कोई बुराई तो नहीं, लेकिन बात क्या है तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

इरा उसे अनीताजी के बारे में बताने लगी, ‘‘जिन को आदर्श मान कर मैं अपनी गृहस्थी को अनदेखा कर चली थी, उन के लिए तो समाजसेवा सूने जीवन को भरने का साधन मात्र थी. लेकिन मेरा जीवन तो सूना नहीं. अनीता के पास करने के लिए कुछ नहीं था, न पति पास था, न संतान और न ही उन्हें अपनी जीविका के लिए संघर्ष करना था. लेकिन मेरे पास तो पति भी है, संतान भी, जिन की देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है, जिन के साथ इस समाज में अपनी जगह बनाने के लिए मुझे संघर्ष करना है. यह सब ईमानदारी से करते हुए समाज के लिए अगर कुछ कर सकूं, वही मेरे जीवन का उद्देश्य होगा और यही जीवन का सत्य भी…’’

अब हिंदी में बोलेगा गूगल असिस्टेंट

क्या आपको पता हैं कि गूगल एक नया फिचर लेकर आ रहा है, इस नये फिचर की वजह से इस साल के अंत तक गूगल हिंदी में बोलने लगेगा, गूगल ने खुद इस बात जानकारी दी है कि गूगल का डिजिटल असिस्टेंट सौफ्टवेअर इस साल के अंत तक 30 से ज्यादा भाषाओं में उपलब्ध होगा. गूगल ने इस बाबत जानकारी अपनी एक ब्लौग पोस्ट में दी है.

क्या है गूगल असिस्टेंट सौफ्टवेअर

गूगल असिस्टेंट एक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस पर आधारित सौफ्टवेअर है जो डिवाइस के स्पीकर्स से कनेक्ट रहता है. खबरों के मुताबिक अब इस सौफ्टवेअर में कई भाषाओं को सपौर्ट करने की क्षमता जोड़ी जाएगी. इसके बाद अंग्रेजी के अलावा कोई और भाषा बोलने वाले लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकेंगे.

गूगल के वाइस प्रेजिडेंट निक फौक्स ने अपनी ब्लौग पोस्ट में बताया गया है, ‘इस साल के अंत तक गूगल असिस्टेंट 30 से ज्यादा भाषाओं में उपलब्ध होगा. इसके बाद इसकी पहुंच 95 पर्सेंट ऐंड्रायड यूजर्स तक होगी. अगले कुछ महीनों में हम ऐंड्रायड और आईफोन्स के लिए गूगल असिस्टेंट को डैनिश, डच, हिंदी, इंडोनेशियन, नौर्वियन, स्वीडिश और थाई लाने जा रहे हैं. इसके बाद इस साल में अन्य भाषाओं में भी गूगल असिस्टेंट लाया जाएगा.’

फौक्स ने बताया है कि पहले इसमें मल्टीलिंगुअल औप्शन केवल इंग्लिश, फ्रेंच और जर्मन में उपलब्ध होगा. इसके बाद समय के साथ यह अन्य भाषाओं को भी सपौर्ट करने लगेगा. अभी गूगल को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के मामले में ऐमजौन, माइक्रोसौफ्ट, ऐपल, सैमसंग और अन्य कंपनियों से तगड़ा कौम्पिटिशन मिल रहा है. ऐमाजौन ने ऐलेक्सा पावर्ड स्पीकर्स के जरिए इस मामले में बढ़त ले ली है. इसलिए गूगल ने यह कदम ऐमाजौन के ऐलेक्सा पावर्ड हार्डवेअर से मुकाबला करने के लिए उठाया है. ऐलेक्सा अभी तक केवल इंग्लिश में काम करता है जबकि गूगल असिस्टेंट अभी तक 8 भाषाओं को सपौर्ट कर रहा है और अब इसमें इजाफा हो जाएगा.

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