Download App

बौल टैंपरिंग मामले में हरभजन ने कसा तंज, कहा वाह आईसीसी

भारतीय स्पिनर हरभजन सिंह ने आस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज कैमरन बेनक्रोफ्ट पर मैच फीस का सिर्फ 75 प्रतिशत जुर्माना और प्रतिबंध नहीं लगाने के आईसीसी के फैसले की निंदा की. हरभजन ने 2001 के दक्षिण अफ्रीका टेस्ट का जिक्र किया जब पांच भारतीयों सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, सौरव गांगुली, शिवसुंदर दास, दीपदास गुप्ता और उन पर मैच रैफरी माइक डेनिस ने विभिन्न अपराधों में कम से कम एक टेस्ट का प्रतिबंध लगाया था.

उन्होंने 2008 के सिडनी टेस्ट का भी हवाला दिया जब एंड्रयू साइमंडस के खिलाफ कथित नस्लीय टिप्पणी के कारण उन पर तीन टेस्ट का प्रतिबंध लगाया गया था. हरभजन ने ट्वीट किया ,‘‘वाह आईसीसी वाह. फेयरप्ले. बेनक्रोफ्ट पर कोई प्रतिबंध नहीं जबकि सारे सबूत थे. वहीं 2001 में दक्षिण अफ्रीका में जोरदार अपील करने के कारण हम छह पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और वह भी बिना सबूत के. और सिडनी 2008 तो याद होगा. दोषी साबित नहीं होने पर भी तीन टेस्ट का प्रतिबंध. अलग अलग लोग अलग अलग नियम.’’

दक्षिण अफ्रीका और औस्ट्रेलिया के बीच तीसरे टेस्ट मैच के तीसरे दिन हुई बौल टैंपरिंग की घटना के बाद मचे बवंडर में अब आईसीसी ने अपना फैसला सुनाया था. इस कृत्य को अंजाम देने वाले आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज केमरन बेनक्रौफ्ट और टीम के कप्तान स्टीव स्मिथ की सजा का ऐलान किया था. इस घटना में स्टीव स्मिथ ने प्रेस कौन्फ्रेंस कर अपनी गलती पहले ही मान ली थी. मैच के चौथे दिन स्मिथ ने टीम की कप्तानी छोड़ दी.

गौरतलब है कि इस घटना ने पूरे क्रिकेट जगत में हलचल मचा दी है. चारों तरफ आस्ट्रेलिया टीम की जमकर आलोचना की जा रही है. यहां तक कि आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री तक ने इस घटना की निंदा की है.

बिशन सिंह बेदी ने भी की कड़ी आलोचना

भारत के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी ने आस्ट्रेलिया के शीर्ष क्रिकेटरों से जुड़े गेंद से छेड़खानी विवाद को आधुनिक क्रिकेट की बड़ी त्रासदियों में से एक बताते हुए खिलाड़ियों को खेल को संकट में डालने के लिये कसूरवार ठहराया. बेदी ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं कि गलती हुई है और इसके लिये खिलाड़ी जिम्मेदार हैं. कप्तान ने इसे स्वीकार कर लिया है और शीर्ष प्रबंधन ने भी. यह एक या दो खिलाड़ियों का काम नहीं है. मेरे ख्याल से यह आधुनिक क्रिकेट की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है.’

बेदी ने कहा कि युवाओं को सही संदेश देने की जरूरत है. उन्होंने कहा, ‘कड़ी सजा की कोई सीमा नहीं होनी चाहिये. हम युवाओ को गुमराह करते हैं. हर कीमत पर जीतने का रवैया गलत है. जीतना अहम है, लेकिन सही तरीके से जीतने का संदेश देना चाहिये.’ भारत के पूर्व क्रिकेटर अजय जडेजा ने कहा कि आईसीसी को देखना है कि खेल किस दिशा में जा रहा है. उन्होंने कहा, ‘यदि कोई गेंद को चकता रहा है तो उसमें बदलाव भी कर रहा है. अभी देखना होगा कि नियम क्या कहते हैं क्योंकि मैने घटना देखी नहीं है.’

पूर्व आस्ट्रेलियाई कप्तान क्लार्क ने कहा, धोखा – कह दो, यह बुरा सपना है पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क ने कहा कि गेंद छेड़छाड़ प्रकरण आस्ट्रेलियाई टीम के लिये‘ बुरा सपना’ है और पूर्व क्रिकेटरों ने इसमें लिप्त खिलाड़ियों की निंदा की. आस्ट्रेलियाई टीम के पूर्व कप्तान क्लार्क ने ट्वीट किया, ‘‘ यह क्या है…. क्या मैं अभी सोकर उठा हूं. कृपया मुझे बताईये कि यह बुरा सपना है.’

नासिर हुसैन, शेन वार्न ने भी की निंदा

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन ने भी इस प्रकरण में अपनी प्रतिक्रिया नहीं छुपायी, उन्होंने कहा, ‘आस्ट्रेलियाई टीम की यह धोखाधड़ी करने की पूर्व नियोजित योजना थी.’ आस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर शेन वार्न ने कहा कि जिसने भी बैनक्रोफ्ट को धोखाधड़ी करने को कहा, उसकी पहचान की जानी चाहिए. पूर्व लेग स्पिनर वार्न ने कहा, मुझे कैमरन बैनक्रोफ्ट के लिये सहानुभूति है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि उसने यह खुद किया होगा और यह अपनी जेब मे डाला होगा.’

उन्होंने कहा, ‘किसने उसे ऐसा करने के लिये कहा? यह ढूंढना अहम है. मुझे लगता है कि हमें इसकी तह तक जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ और ऐसी क्या वजह थी.’ वार्न ने कहा, ‘आपको जिम्मेदारी लेनी होगी. आप पकड़े गये हो और आपको जिम्मेदारी लेनी होगी कि आप क्या छुपा रहे थे. आप मैच में ऐसा नहीं कर सकते.’ इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वान ने कहा कि पूरी आस्ट्रेलियाई टीम और कोच हमेशा धोखेबाज के रूप में याद रखे जायेंगे. वान ने कहा ,‘‘एक मैच का प्रतिबंध और मैच फीस का शत प्रतिशत जुर्माना स्मिथ के लिये. बेनक्रोफ्ट पर 75 प्रतिशत जुर्माना और डिमेरिट अंक. यह समय मिसाल कायम करने का था और यह कैसी सजा सुनाई है.’’

वान ने ट्विटर पर लिखा, ‘स्टीव स्मिथ, उनकी टीम और सारे प्रबंधन को स्वीकार करना होगा कि उनके करियर को जो कुछ भी हो, उन्हें खेल में धोखाधड़ी करने की कोशिश के लिये याद रखा जाएगा.’  इंग्लैंड के पूर्व बल्लेबाज केविन पीटरसन को इस बात का यकीन नहीं था कि कोच डेरेन लीमैन को इस घटना की जानकारी नहीं थी. इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वान ने कहा, ‘‘एक मैच का प्रतिबंध और मैच फीस का शत प्रतिशत जुर्माना स्मिथ के लिये. बेनक्रोफ्ट पर 75 प्रतिशत जुर्माना और डिमेरिट अंक. यह समय मिसाल कायम करने का था और यह कैसी सजा सुनाई है.’’

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

मां की बरसी पर भावुक हुए अर्जुन कपूर, शेयर की तस्वीर

बौलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस श्रीदेवी के निधन के बाद अर्जुन कपूर अपनी सौतेली बहन जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर का ध्यान रख रहे हैं. अर्जुन की बहन अंशुला कपूर भी अपनी बहनों के साथ खड़ी नजर आईं. अर्जुन कपूर ने इसी बीच अपनी मां मोना कपूर को याद करते हुए एक तस्वीर शेयर की है. तस्वीर के साथ ही अर्जुन ने एक भावुक कर देने वाला खत भी लिखा है. दरअसल बोनी कपूर की पहली पत्नी और अर्जुन कपूर की मां मोना कपूर ने 25 मार्च 2012 को दुनिया को अलविदा कहा था. अर्जुन ने यह तस्वीर मां की बरसी पर 25 मार्च यानी रविवार को शेयर की है.

अर्जुन ने मां की बरसी में इमोशनल मैसेज में लिखा, मैं आज पटियाला में शूटिंग कर रहा हूं, काश मैं आपको फोटो भेज पाता यह दिखाने के लिए की यह लोकेशन कितनी खूबसूरत है. मां आप मेरी फिल्मों को देखने के लिए आप मेरे साथ रेड कारपेट पर नहीं चल सकीं. यकीन नहीं होता कि 6 साल हो गए. पिछले छह सालों में आप हमेशा मेरे साथ रहीं और मेरी 9 फिल्मों की साथी हैं. अर्जुन ने अपनी बहन का जिक्र करते हुए लिखा, हमें नहीं पता हम लाइफ में कितना अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन आपने हमें जो सिखाया है हम उसी रास्ते में चल रहे हैं. मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं.

As I was shooting by a canal today in Patiala wishing I could send u a picture of how nice the location was Mom I realised I never quite got to walk the red carpet with u to show u one of my films but I’m certain in the last 6 years u have walked every step of the way with me thru these 9 films Along with mine & Anshula s personal journeys…wish u were here Mom so much has transpired so much where I would have looked at u for answers and looked at u to draw strength…I don’t know if I’m doing a decent job at it but I’m taking one day at a time and making each moment count trying to be a truthful reflection of u n ur teachings…can’t believe it’s been 6 years to the day but I have thought of u every breath I have taken pls smile spread ur warmth n positivity wherever u are cause god knows the world me and Anshula need it…love u forever and beyond…

A post shared by Arjun Kapoor (@arjunkapoor) on

मोना शौरी कपूर उस समय अर्जुन को हमेशा के लिए अकेला छोड़ गई थी जब उनकी डेब्यू फिल्म ‘इशकजादे’ रिलीज होने वाली थी. मोना शौरी कपूर एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती थी. साल 1983 में मोना और बोनी की अरेंज मैरिज हुई थी. शादी के वक्त मोना की उम्र 19 साल थी जबकि बोनी कपूर उनसे 10 साल बड़े थे. बोनी और मोना की शादी 13 साल तक ही चल सकी, इसके बाद बोनी की श्रीदेवी से नजदीकियां बढ़ने लगी जिसके कारण मोना ने बोनी कपूर से तलाक ले लिया था. बोनी और मोना कपूर के दो बच्चे अर्जुन कपूर और अंशुला कपूर हैं.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

औस्कर को अमेरिका तक सीमित क्यों मानती हैं रिचा चड्ढा

बौलीवुड अभिनेत्री रिचा चड्ढा ‘‘गैंग आफ वासेपुर’’, ‘‘मसान’’, “फुकरे रिटर्न’’ सहित कई बेहतरीन फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुकी हैं. वह अपनी फिल्मों की ही वजह से तीन बार ‘कान फिल्म फेस्टिवल’ जा चुकी हैं.

bollywood

कुछ दिन पहले ही रिचा चड्ढा अपने प्रेमी व अभिनेता अली फजल का मनोबल बढ़ाने के लिए उनके साथ अमेरिका गयी थीं. वहां औस्कर अवार्ड में अली फजल की अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’’ मेकअप व कास्ट्यूम के लिए नोमीनेट हुई थी. औस्कर अवार्ड की समाप्ति के बाद अब रिचा चड्ढा अमेरिका से वापस लौटी हैं.

bollywood

तीन बार कान फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा रहने के बाद और ‘औस्कर’ अवार्ड को बाहर से समझने के बाद रिचा चड्ढा मानती हैं कि दोनों में जमीन आसमान का अंतर है.

bollywood

हमसे एक्सक्लूसिव बात करते हुए रिचा चड्ढा ने कहा- ‘‘कान फिल्म फेस्टिवल में यूरोपीय सिनेमा के साथ साथ पूरे विश्व के सिनेमा को महत्व दिया जाता है. मगर औस्कर में ज्यादातर अमेरिकन फिल्मों को ही महत्व दिया जाता है. औस्कर में विश्व सिनेमा को लेकर एक छोटी सी कैटेगरी है, जिसे ‘फारेन लैंगवेज’ की कैटेगरी नाम दिया गया है. औ

औस्कर में ब्रिटिश व अमेरिकन फिल्मों का ही महत्व होता है. यूरोपीय सिनेमा को भी कम महत्व मिलता है. पर ‘कान’ में पूरे विश्व को महत्व मिलता है. इसी वजह से ‘कान’ में ‘गैंग्स औफ वासेपुर’, ‘मसान’ सहित कई भारतीय फिल्में जा चुकी हैं. वहां ब्राजील की फिल्में भी आती हैं. इनकी एक शर्त होती है कि यदि आपके देश की कोई फिल्म ‘कान फिल्म फेस्टिवल’ का हिस्सा बनना चाहती है, तो उस फिल्म को उनके देश में दो हफ्ते दिखाया जाना चाहिए. मुझे यह जायज लगता है.’’

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

इन तरीकों को अपनाकर अपने स्मार्टफोन को बनाएं और भी सुरक्षित

कंप्यूटर की ही तरह स्मार्टफोन में भी सुरक्षा से सम्बंधित कई परेशानियां आती हैं. अब तक एंड्रौयड पर वायरस के कई हमले भी हो चुके हैं. ऐसा माना जाता है की एंड्रौयड स्मार्टफोन्स के मुकाबले ऐप्पल का आईओएस कहीं अधिक सुरक्षित है. लेकिन हर स्मार्टफोन में यह खतरा होता ही है. पिछले साल सितंबर में आई एक रिपोर्ट के अनुसार एंड्रौयड प्लेटफार्म पर 30 प्रतिशत से ज्यादा रैनसमवेयर पाए गएं. इसी के साथ 10 मिलियन एंड्रौयड ऐप्स को सस्पीशियस की कैटेगरी में डाला गया.

अब, जब मोबाइल मालवेयर बढ़ रहे हैं, यूजर्स को यह सुनिश्चित करना जरुरी है की उनका फोन सुरक्षित हो. इन तरीकों को अपनाकर आप अपने मोबाइल को सुरक्षित रख सकते हैं.

फोन को रखें लौक : फोन लौक लगाने से सिर्फ डिवाइस सुरक्षित नहीं रहती बल्कि इससे दूसरे लोग आपके फोन के जरुरी डाटा को एक्सेस भी नहीं कर पाते. कुछ सालों पहले डिवाइस को लौक करना थोड़ा मुश्किल या लम्बा काम लगता था. लेकिन अब फिंगरप्रिंट सेंसर और फेस अनलौक जैसी टेक्नोलौजी के चलते फोन को सुरक्षित रखना और भी आसान हो गया है. इसी के साथ फोन के रीस्टार्ट होने पर भी पहले पिन लौक जरुर डाल के रखें.

technology

औपरेटिंग सिस्टम को रखें अपडेट : एंड्रौयड यूजर्स में औपरेटिंग सिस्टम को अपडेट ना रखने की आदत है. एंड्रौयड का सबसे आम औपरेटिंग सिस्टम नौगट 7 का फरवरी 2018 तक मात्र 28.5 फीसद मार्किट शेयर रहा है. ऐप्पल यूजर्स के मामले में यह परिस्थिति थोड़ी बेहतर है. आईओएस के लेटेस्ट वर्जन 11.2 का मार्किट शेयर 70 फीसद है.

कई एंड्रौयड यूजर्स को उनके हैंडसेट पर लेटेस्ट अपडेट्स ना मिलने की भी शिकायत रहती है. इससे यूजर्स के फोन्स आसानी से वायरस की चपेट में आ सकते हैं. इस स्थिति में अगर आपके मोबाइल पर लम्बे समय से अपडेट नहीं आ रहे हैं तो या तो आप कस्टमर केयर सेंटर जा के इसका कुछ निवारण निकालें या अपना हैंडसेट बदलने की योजना बनाएं. इसी के साथ नया स्मार्टफोन खरीदते समय ऐसा हैंडसेट खरीदें जिस पर अपडेट्स मिलती हों.

असुरक्षित ब्रैंड्स के फोन लेने से बचें : कुछ फोन्स समय-समय पर अपडेट्स मिलने के लिए मशहूर होते हैं. इनमें गूगल पिक्सल, ऐप्पल आईफोन आदि सम्मिलित हैं. बजट स्मार्टफोन्स में भी कई विकल्प मौजूद हैं. कुछ ऐसी कंपनियां भी हैं जिन्हें डाटा सुरक्षा के मामले में सही नहीं माना जाता. ऐसे ब्रैंड्स के स्मार्टफोन लेने से बचें.

एन्क्रिप्शन : अपनी फोन स्टोरेज को एन्क्रिप्ट कर के रखें. आपके स्मार्टफोन में ईमेल, कौंटैक्ट्स, फाइनेंशियल ऐप्स आदि जरुरी डाटा होता है. अगर आपका फोन गुम जाए या चोरी हो जाए तो आप नहीं चाहेंगे की आपकी जरुरी जानकारी किसी गलत हाथ में पड़े. इसलिए अपने फोन की स्टोरेज को एन्क्रिप्ट कर के रखें. इससे अगर किसी और के हाथों में आपका फोन जाता भी है तो आपका डाटा सुरक्षित रहेगा.

वायरस के लिए करें स्कैन : मोबाइल डिवाइसेज में आजकल आसानी से वायरस आ जाते हैं. इससे बचने के लिए समय-समय पर अपने फोन को स्कैन करते रहें. गूगल प्ले के ऐप्स में भी कई बार वायरस आ जाते हैं. इससे बचने के लिए किसी भी ऐप को किसी भी सोर्स से डाउनलोड करने से पहले स्कैन कर लें.

फोन को जेलब्रेक ना करें : आईफोन यूजर्स अक्सर अपनी डिवाइसेज को जेलब्रेक करते हैं. ऐसा करने से डिवाइसेज सुरक्षित नहीं रहती. इसी तरह, एंड्रौयड यूजर्स अपने फोन को रुट करते हैं. इन दोनों ही प्रक्रियाओं में यूजर का फोन सुरक्षित नहीं रहता इसलिए ऐसा करने से बचें.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

पीएनबी पर मंडरा रहा है डिफाल्टर होने का खतरा

भारतीय बैंकिंग जगत में देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक यानि पंजाब नेशनल बैंक पर डिफाल्टर होने का खतरा मंडरा रहा है. भारतीय बैकिंग के इतिहास में इस अभूतपूर्व घटना से बचने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक औफ इंडिया को दखल देना पड़ सकता है. बता दें कि पंजाब नैशनल बैंक की ओर से जारी लेटर औफ अंडरटेकिंग्स (एलओयू) के आधार पर यूनियन बैंक औफ इंडिया ने करीब 1000 करोड़ रुपये के लोन दिए थे, जिनकी अदायगी उसे अगले कुछ ही दिनों में करनी होगी, यानी कि अगर पीएनबी 31 मार्च तक वह रकम नहीं लौटाता है तो यूनियन बैंक औफ इंडिया उसे डिफाल्टर घोषित कर देगा. यही नहीं यूनियन बैंक के अनुसार पंजाब नेशनल बैंक को दिए लोन को एनपीए भी घोषित किया जा सकता है.

जानकारों के मुताबिक अगर सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा इस मामलें में जल्द हस्तक्षेप कर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो बैकिंग इतिहास में यह पहला मामला होगा जब कोई एक बैंक देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक को डिफाल्टर की सूची में डालेगा.

यूनियन बैंक के एमडी राजकिरण राय ने कहा, ‘हमारे लिए तो यह पीएनबी के सपौर्ट वाले डौक्युमेंट्स पर वैध दावा है. यह हमारे बही-खाते में फ्रौड नहीं है. हम औडिटर्स से राय लेंगे. हालांकि हम नहीं चाहते हैं कि पीएनबी को डिफाल्टर के रूप में लिस्ट किया जाए. हमें सरकार या आरबीआई की ओर से दखल दिए जाने की उम्मीद है क्योंकि 31 मार्च तक रिजौल्यूशन होना है.’

लेटर औफ अंडरटेकिंग्स (एलओयू)

एलओयू आमतौर पर व्यापार के लिए आसान और सस्ता साधन माना जाता है. कुछ बैंकों ने आरबीआई के अधिकारियों के साथ इस पर चर्चा भी की है. हाल में एलओयू से धोखाधड़ी के मामलों का खुलासा होने के बाद रिजर्व बैंक ने इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. एक बैंकर के मुताबिक इंडस्ट्री को जल्द एलओयू का विकल्प मिलेगा. बता दें कि एलओयू के जरिए 20 से 40 बिलियन डालर का व्यापार होता रहा है. अमेरिकी फेडरर की आसान मनी पौलिसी से डालर की तरलता के बीच इसमें पिछले सात से आठ वर्षों में बढ़ोत्तरी हुई थी.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल

किस तरह मध्य प्रदेश के एक शहर जबलपुर का दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक अपनी भोगविलास की सांसारिक अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए अपने ज्ञान व तर्कशक्ति के बल पर शब्दों का ऐसा चक्रव्यूह रचने में कामयाब रहा जिस में दुनियाभर के धुरंधर विद्वान भी बिना फंसे नहीं रह सके और किस तरह लोग उस के एक इशारे पर लाखों डौलर लुटाने के लिए तैयार हो जाते थे. किस तरह मामूली चप्पल, घड़ी व सूती पोशाक पहनने वाला व्यक्ति, हीरे जड़ी स्विस घडि़यां, महंगी राजसी पोशाक और महंगे गुच्ची चश्मे लगा कर दुनिया की सब से कीमती कार रौल्स रौयस में घूमने लगा. किस तरह प्राध्यापक से आचार्य रजनीश, फिर भगवान रजनीश और आखिर में ओशो नाम धारण करने वाला यह ढोंगी, लालची व कामुक इंसान भारत से ले कर अमेरिका तक में करोड़ोंअरबों रुपए की संपत्ति खड़ी करने में कामयाब रहा.

इस की एक ऐसी अजीबोगरीब दास्तान है जिस में किसी सस्ते सैक्स उपन्यासों जैसा रस तो है ही, साथ ही धर्म का घिनौना स्वरूप भी देखने को मिलता है. पूरी दास्तान का दिलचस्प विवरण रजनीश की एक पूर्व प्रेमिका आनंद शीला ने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘डौंट किल हिम’ में पेश किया है.

शीला ने खुद यह स्वीकार किया है कि उस की दिलचस्पी रजनीश के आध्यात्मिक ज्ञान में नहीं थी, वह तो उन से प्यार करने लगी थी. रजनीश से अपनी पहली मुलाकात का विवरण इस गुजराती महिला ने कुछ इन शब्दों में दिया है :

‘‘मुंबई में हम अपने जिस चचेरे भाई के यहां ठहरा करते थे उस के सामने के ही बंगले में रजनीश रह रहे थे. सो, मेरी उन से मिलने की इच्छा जल्दी ही पूरी हो गई. यह मुलाकात मेरे जीवन की एक नई शुरुआत में बदल गई. उन की सचिव योग लक्ष्मी ने हमारा स्वागत किया. कुछ क्षण बाद ही मैं अपने पिता के साथ रजनीश के कमरे में जा पहुंची. उन्होंने मुसकराते हुए अपने हाथ फैला कर मेरा स्वागत किया. मैं आनंदविभोर हो कर सीधे उन के आलिंगन में समा गई थी, कुछ क्षण बाद उन्होंने अपना आलिंगन ढीला कर दिया, लेकिन मेरा हाथ फिर भी पकड़े रखा. मैं ने पूरे आत्मसमर्पण के भाव से अपना सिर उन की गोद में रखा हुआ था और अचानक मुझे लगा कि मैं उन के बिना एक पल भी नहीं रह सकती.’’

रजनीश ने शीला को अगले दिन दोपहर के ढाई बजे फिर मिलने के लिए बुलाया. शीला दूसरी मुलाकात के लिए बहुत बेचैन और उस ने बड़ी मुश्किल से रात बिस्तर पर करवटें बदलते हुए काटी. दूसरी मुलाकात में शीला ने रजनीश को बताया कि उस के लिए रात काटना मुश्किल हो गया था. इस पर रजनीश का उत्तर था, ‘‘शीला, यह बिलकुल सीधी बात है, तुम मेरे से प्यार करने लगी हो और मैं भी तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

यह शायद रजनीश का शीला जैसी अल्हड़ जवान लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाने का एक हथकंडा था, जो वे अपने पास आने वाली हरेक जवान लड़की पर आजमाते रहे होंगे. और इस प्रकार रजनीश के प्रेम में पागल शीला सबकुछ छोड़छाड़ कर रजनीश की शिष्या बन गई थी. भगवा वस्त्र, गले में रजनीश के फोटो वाला लौकेट और रजनीश द्वारा दिया गया उस का नया नाम, ‘मां आनंद शीला’.

रजनीश के निकट पहुंचने के बाद शीला ने महसूस किया कि सैक्स के प्रति उन की किसी तरह की कोई वर्जना नहीं थी. इतना ही नहीं वे एक कुशल व्यापारी भी थे और आदमी की मूलभूत कमजोरियों का लाभ उठाना जानते थे. वे जल्दी ही मुंबई छोड़ कर पूना जा पहुंचे जहां उन्होंने अपने विदेशी शिष्यों के पैसे से कुछ ही समय में एक भव्य आश्रम खड़ा कर लिया. वे अपनी सभी योजनाओं के महत्त्व, उन के बाजार और उन की मांग से वाकिफ थे. पूना आश्रम कुछ इस तरह चलता था कि वहां आने वाले हरेक व्यक्ति को आश्रम की हरेक गतिविधि में भाग लेने के लिए एक निर्धारित फीस देनी पड़ती थी, यहां तक कि उन का प्रवचन सुनने के लिए भी टिकट खरीदना पड़ता था.

उन्होंने विदेशी मनोचिकित्सक को बुला कर थैरेपी के अलगअलग कोर्स शुरू कर दिए थे. हर व्यक्ति अपनी इच्छा या जरूरत के मुताबिक कोई भी कोर्स चुन सकता था. भारत के लिए इस तरह के कोर्स एक नई बात थी. इन कोर्स में सब से लोकप्रिय कोर्स था सामूहिक सैक्स वाला, जिस में लोग चीखनेचिल्लाने के अलावा सामूहिक रूप से यौन क्रीड़ा में लिप्त हो जाते थे.

इस कोर्स का केवल एक ही नियम था कि बिना एकदूसरे की सहमति के यौन क्रीड़ा में लिप्त नहीं हुआ जा सकता. कई बार इस कोर्स में भाग लेने वाले व्यक्ति चीखतेचिल्लाते थे और अकसर यौन क्रीड़ाएं हिंसक रूप धारण कर लेती थीं. सैक्स को रजनीश अनेक दुखों का कारण मानते थे और अपने शिष्यों के मन से सैक्स संबंधी सभी वर्जनाएं समाप्त कर के उन्हें खुली छूट दे देते थे.

आश्रम में सैक्स से जुड़ी सारी नैतिक मान्यताओं को खंडित कर दिया गया था और हरेक आश्रमवासी को किसी भी स्त्री के साथ सोने की खुली छूट थी बशर्ते वह स्त्री भी उस पुरुष के साथ सोने के लिए तैयार हो. यह एक तरह का हिप्पियों जैसा कल्चर था, जिस में सैक्स के साथसाथ मादक पदार्थों का सेवन भी जुड़ गया था. लेकिन, आश्रम में किसी लड़की का गर्भवती होना ठीक नहीं माना जाता था. अगर कोई स्त्री गर्भवती हो जाती थी तो रजनीश उसे गर्भपात करवाने की सलाह देते थे.

खुले यौनाचार का नतीजा यह हुआ कि 70 से 80 प्रतिशत आश्रमवासी यौन रोगों से पीडि़त हो गए, जिस के कारण बाद में कंडोम के इस्तेमाल पर बल दिया जाने लगा. अब रजनीश दुनियाभर में सैक्स गुरु के रूप में मशहूर हो गए थे और पूरी दुनिया से लोग कुछ समय के लिए अपने मानसिक तनाव दूर करने व एक व्यस्त जिंदगी से कुछ दिनों की नजात पाने के लिए रजनीश के पूना स्थित आश्रम में आने लगे थे. अब आश्रम में पैसे की कोई कमी नहीं रही थी और आसपास के सारे बंगले महंगे दामों पर खरीद कर उन्हें भी आश्रम में ही शामिल कर लिया गया था. इस के बावजूद आश्रम में रजनीश के शिष्यों की भीड़ इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि इन तथाकथित संन्यासियों को बारीबारी से अलगअलग पारियों में सुलाना पड़ता था.

दिनबदिन अनुयायियों की बढ़ती भीड़ के कारण आश्रम में गंदगी बढ़ती जा रही थी और लोग बीमार पड़ने लगे थे. हालांकि आश्रम के भीतर ही गर्भपात व दूसरे इलाजों के लिए एक अस्पताल बना दिया गया था, लेकिन यह अस्पताल भी बीमारों की बढ़ती भीड़ के कारण छोटा पड़ने लगा था.

नौबत यहां तक आ पहुंची थी कि स्वयं रजनीश भी अकसर बीमार रहने लगे. दमा, मधुमेह, कमर का दर्द और रोज मिलने वाली मौत की धमकियों के कारण वे अब अपने कमरे तक ही सीमित रहने लगे थे. इन बीमारियों के कारण उन्हें अपने दैनिक प्रवचन बंद करने पड़े. उन के सभी करीबी शिष्य इस बात की कोशिश में पूरी तरह जुट गए कि किसी तरह उन्हें स्वस्थ रखा जा सके. परफ्यूम व सैंट की खुशबू से उन का दमा भड़क जाता था, इसलिए उन से मिलने वाले हरेक व्यक्ति पर कड़ी नजर रखी जाने लगी और अगर उन में से किसी ने परफ्यूम या सैंट लगाया होता था तो उसे रजनीश से मिलने की इजाजत नहीं दी जाती थी.

उक्त खुले यौनाचार के बारे में शीला ने अपनी पुस्तक में बड़ा दिलचस्प वर्णन किया है. उस ने जब एक संन्यासी से इस विषय में बात की तो उस ने बताया कि सुबह नाश्ते के बाद उसे एक लड़की भा गई थी, उस के बाद दोपहर के भोजन के बाद एक अन्य सुंदरी उस के पास चली आई, जबकि रात को वह एक तीसरी लड़की के साथ सोया था. इस पर शीला ने उस से व्यंग्य में कहा था, ‘तो हरेक खाने के बाद तुम्हें डैजर्ट (कुछ मीठा व्यंजन) खाने की आदत पड़ गई है.’

अब तक शीला रजनीश के कुछ गिनेचुने अंतरंग लोगों में शामिल हो गई थी और रजनीश ने आश्रम के संचालन की बहुत सारी जिम्मेदारियां भी उसे सौंप दी थीं. तभी ‘भगवान’ ने शीला के समक्ष अपना एक अनोखा कम्यून बनाने का सपना विस्तार से रखा, जिसे वे अमेरिका में स्थापित करना चाहते थे. शीला ने उत्तरपश्चिमी अमेरिका के औरेगौन नामक स्थान पर 65 हजार एकड़ में फैली एक निर्जन जगह खरीद कर उन के इस सपने को साकार कर दिखाया.

रजनीश शीला के इस काम से बहुत प्रभावित हुए थे और उसे इस कम्यून का सर्वेसर्वा बना दिया था. कम्यून के सभी कार्यक्रम ठीक ढंग से चलने लगे थे. रजनीश के सपने के आखिरी अध्याय की शुरुआत हो चुकी थी. रजनीश अकादमी और एक भव्य पुस्तकालय का काम भी शुरू हो चुका था. रजनीश के प्रवचनों की पुस्तकें यथासमय प्रकाशित होने लगी थीं, अलगअलग उत्सवों का आयोजन भी नियमित रूप से होने लगा था.

रजनीश दुनियाभर में सब से ज्यादा विवादास्पद व विलक्षण व्यक्ति के रूप में उभर कर सामने आ चुके थे. इन सब के साथ ही यूरोप में फैले रजनीश के विभिन्न केंद्र भी बहुत सुचारु रूप से चल रहे थे और आएदिन आमदनी के नएनए स्रोत खुलते जा रहे थे. लेकिन रजनीश अब उदास रहने लगे थे. वे अपने जीवन में एक नए रोमांच की तलाश में थे और इसीलिए एक दिन उन्होंने शीला को अपने पास बुला कर आदेश दिया कि वह

30 दिन के भीतर उन के व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए 30 नई रौल्स रौयस कारें खरीद ले. दुनियाभर के सामने अपनेआप को भगवान स्थापित करने वाला तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति अचानक एक ऐसे नन्हे बालक में तबदील हो गया था जिसे अपने मनोरंजन के लिए हर दिन एक नए खिलौने की तलाश होती थी.

इन 30 महंगी कारों को खरीदने के लिए तब 40 लाख डौलर की जरूरत थी और इतना नकद पैसा कम्यून के पास नहीं था. तब तक करोड़ों डौलर उस बयाबान में रजनीश का स्वप्नलोक बनाने में खर्च हो चुके थे. इस के अलावा कम्यून के रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए भी हर महीने एक बड़ी रकम की जरूरत पड़ती थी. लेकिन इन सब समस्याओं के बावजूद रजनीश को नाराज नहीं किया जा सकता था, इसलिए शीला ने किसी तरह कुछ नई जुगाड़ें बैठा कर उन के लिए इन कारों का बंदोबस्त कर दिया था.

एक दिन भारी बारिश के कारण कम्यून के पास स्थित बांध टूट गया था और चारों तरफ बाढ़ जैसी परिस्थितियां बन गई थीं. इस बाढ़ ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया था, मानो वह पूरे कम्यून को ही निगल जाएगी. उस दिन रजनीश बहुत बुरे मूड में थे. उन का विवेक से झगड़ा हो गया था.

विवेक लंदन की वह औरत थी जो रजनीश के साथ इस तरह से रहती थी मानो वह उन की पत्नी ही हो. अकसर रजनीश दूसरी औरतों के साथ भी शारीरिक संबंध स्थापित करते थे और विवेक उस दिन उन के इसी व्यवहार के कारण भड़क गई थी. वह उन से झगड़ते समय उन्हें धमकी देती रहती थी कि वह उन्हें छोड़ कर चली जाएगी और सारी दुनिया को उन की सचाई बता कर उन्हें बरबाद कर देगी.

इस से पहले 1978 में पूना में भी वह किसी बात पर रजनीश से नाराज हो चुकी थी और अपनी स्त्रीसुलभ जलन के कारण उस ने उन से बदला लेने के लिए एक योजना बनाई थी. उस दिन वह बिना किसी कंडोम के उन के साथ सो गई और इस की वजह से वह गर्भवती हो गई. यह एक धर्मगुरु के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति थी, जो दुनिया की आंखों में रजनीश की प्रतिष्ठा को हमेशा के लिए धूल में मिला सकती थी. रजनीश को जब विवेक के गर्भवती होने की बात पता चली तो उन्होंने किसी तरह उस का गर्भपात करवा कर अपनेआप को इस स्थिति से बाहर निकाल लिया था.

उस भीषण बाढ़ वाले दिन कम्यून में भी किसी दूसरी औरत को ले कर रजनीश और विवेक का झगड़ा काफी बढ़ चुका था, इसलिए उन्होंने रेडियो पर संदेश भेज कर शीला को तुरंत अपने पास आने का आदेश दे डाला, क्योंकि वही उन्हें इस स्थिति से बाहर निकाल सकती थी. बाढ़ के कारण घोड़े के अलावा रजनीश के पास पहुंचने का और कोई साधन नहीं था.

जब शीला रजनीश के पास पहुंची तो उन्होंने उस से कहा कि वे विवेक से तंग आ चुके हैं और उस से छुटकारा पाना चाहते हैं. उन्होंने शीला को आदेश देते हुए कहा, ‘‘इस का लंदन का टिकट कटवा कर इसे तुरंत यहां से रवाना कर दो. अब मैं इसे एक मिनट के लिए भी बरदाश्त नहीं कर सकता.’’

शीला यह कह कर वापस अपने निवास पर लौट आई कि वह जल्दी से जल्दी उन के आदेश का पालन करेगी, लेकिन अपने निवास पर पहुंचते ही उसे रजनीश का यह संदेश मिला कि विवेक ने अपने दुर्व्यवहार के लिए माफी मांग ली है और वे उसे एक मौका और देना चाहते हैं.

शीला ने अपनी पुस्तक में इस किस्से का वर्णन करते हुए लिखा है : ‘‘इस हादसे से मुझे कई सीख मिलीं. पहली तो यह कि रजनीश भी सामान्य लोगों जैसी भावनाओं व कमजोरियों वाले व्यक्ति हैं और दूसरी यह कि एक तथाकथित ब्रह्मज्ञानी पुरुष भी सैक्स के बिना नहीं रह सकता.’’

शीला और रजनीश का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सका. एक दिन वह रजनीश को छोड़ कर स्विट्जरलैंड चली गई और उस के जाते ही कम्यून न सिर्फ विवादों में घिरता गया, बल्कि धीरेधीरे उस का अस्तित्व ही समाप्त हो गया. रजनीश ने शीला पर आरोप लगाया कि वह कम्यून के साढ़े 5 करोड़ डौलर ले कर भाग गई थी, इस के विपरीत शीला का कहना था कि कम्यून तो कर्जे में दबा हुआ था और उस के पास इतना पैसा कभी रहा ही नहीं.

शीला के अनुसार, वह रजनीश के पागलपन की मांगें पूरी करतेकरते तंग आ गई थी और इसीलिए उसे व उस के कई निकट साथियों को कम्यून छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. लेकिन कम्यून छोड़ने से ही शीला को इस मामले से मुक्ति नहीं मिली. उस पर व आश्रम के अन्य लोगों पर अपने विरोधियों को जहर दे कर मारने, अमेरिका का वीजा हासिल करने के इरादे से रजनीश के दुनियाभर के अनुयायियों की फर्जी शादी का षड्यंत्र रचने जैसे कई आरोप लगाए गए. इतना ही नहीं, औरेगौन के सभी स्थानीय लोग सैक्स व ड्रग्स का केंद्र बने रजनीश के कम्यून के घोर विरोधी बन गए और वे उसे तुरंत बंद करने की मांग करने लगे.

उक्त सभी मामलों में शीला, रजनीश व उस के अन्य कई अनुयायियों के खिलाफ मुकदमा शुरू हो गया. शीला ने आखिरकार उस इलाके के सलाद पार्लर के खाने में जहर मिलाने, रजनीश के व्यक्तिगत डाक्टर व औरेगौन के एक जज की हत्या का प्रयास करने के आरोपों को स्वीकार कर लिया. इस के फलस्वरूप उसे 30 महीने की जेल काटनी पड़ी.

शीला का अपने बचाव में कहना है कि अमेरिका में मुकदमा लड़ने के लिए 20 लाख डौलर की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. इस के अलावा कम्यून के सभी लोग रजनीश के कहने पर उस के खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार हो गए थे, जिस की वजह से उसे सजा मिलनी निश्चित थी. ऐसे में उस के सामने अपराध स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था.

रजनीश को भी अपराधी मानते हुए अदालत ने 4 लाख डौलर के जुर्माने व 10 साल की जेल की सजा सुनाई. बाद में उन्हें अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया. रजनीश ने अमेरिका से अपने निजी हवाई जहाज में बैठ कर कई देशों में प्रवेश करने की कोशिश की लेकिन कोई भी देश उन्हें अपने यहां रखने के लिए तैयार नहीं हुआ. आखिर उन्हें मजबूर हो कर पुणे स्थित अपने आश्रम में ही लौटना पड़ा. भारत लौटने के कुछ समय बाद ही 1990 में उन का देहांत हो गया.

क्रिस्टोफर काल्डर, जो किसी समय रजनीश के पक्के भक्त थे, आज उन के सब से कट्टर विरोधी बन गए हैं. उन का कहना है, ‘‘आप अपनेआप से ही पूछिए कि आखिर रजनीश क्या चाहते थे और उन्हें क्या मिलता था? इस का एक ही उत्तर है, वे हमेशा अपने भक्तों से करोड़ों डौलर वसूल करने की फिराक में रहते थे. इस के अलावा उन की अन्य आवश्यकताओं में सर्वोच्च सत्ता, सुंदर लड़कियों का हरम व ड्रग्स की निरंतर सप्लाई शामिल है, रजनीश अपने चारों ओर दैविक रहस्यों का आडंबर खड़ा कर के अपने असीमित ज्ञान के बल पर लोगों को बेवकूफ बना रहे थे और किसी माफिया बौस की तरह की जिंदगी जी रहे थे. वे सीधे आप की आंखों में देख कर बिना पलक झपकाए किसी असत्य को सत्य साबित करने की क्षमता रखते थे और शायद इसी वजह से वे आर्थिक रूप से एक सफल गुरु बन सके.’’

काल्डर की ही तरह पश्चिमी आस्ट्रेलिया की जेन स्टौर्क 9 साल तक रजनीश की शिष्या रही और इस दौरान वह अपना नाम व पोशाक बदल कर मां शांति भद्र बन गई. वह रजनीश के पीछे इतनी पागल थी कि वह उन्हें खुश करने के लिए उन के कहने पर किसी की हत्या समेत कुछ भी कर सकती थी. अपनी नई पुस्तक ‘ब्रेकिंग द स्पैल’ में उस ने अपने रजनीश के साथ बिताए इन सालों का पूरा विवरण दिया है. उस ने लिखा है कि किस प्रकार वह इस कल्ट द्वारा निगल ली गई थी और जब उसे रजनीश के डाक्टर की हत्या की कोशिश करने के जुर्म में लंबी जेल की सजा सुनाई गई, तभी उस का यह मोह भंग हुआ.

जेन स्टौर्क ने गौर किया कि आश्रम के 87 प्रतिशत तथाकथित संन्यासी यौन रोगों से पीडि़त थे और जिन औरतों को गर्भ ठहर जाता था उन का रजनीश तुरंत गर्भपात करवा देते थे.

अमेरिका में अपना कम्यून बनाने के बाद रजनीश ने अपार संपत्ति एकत्र कर ली थी, जिसे उन्होंने सोने की घडि़यों, आभूषणों व 90 रौल्स रौयस पर बिना कुछ सोचेसमझे बरबाद कर दिया. जेन के शब्दों में, ‘‘रजनीश ने अमेरिका पहुंच कर वहां के तौरतरीके अपना लिए थे और वे संन्यासी से एक स्टार शोमैन में तबदील हो गए थे.’’

1985 में जब जेन की बेटी काइली का बलात्कार किया गया तो शुरू में उस ने सोचा कि लोग शायद रजनीश को बदनाम करने के लिए इस तरह की बातें कर रहे हैं, लेकिन फिर आखिरकार उसे हकीकत को स्वीकार करना पड़ा और एक दिन वह भी शीला की तरह कम्यून से भाग कर जरमनी चली गई. कम्यून छोड़ने के बाद उसे भी शीला की ही तरह गिरफ्तार कर लिया गया और आखिर हत्या करने की कोशिश के अपराध में जेल भेज दिया गया.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

महिलाओं में धुंआ उड़ाने की बढ़ती हसरत

बदलती जीवनशैली और पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही आज की महिलाओं में पुरुषों की कई खराब आदतें भी तेजी से जगह बनाने लगी हैं. युवकों और युवतियों की कई आदतें और हरकतें एक जैसी होती जा रही हैं. यह बात युवकों और युवतियों में धूम्रपान की आदत पड़ने के सिलसिले में भी देखी जा सकती है.

जिस तरह धूम्रपान का चलन लड़कों में होता है यानी वह एकदूसरे की देखादेखी धूम्रपान शुरू करते हैं लगभग उसी तरह युवतियों में भी एकदूसरे का साथ देने के तौर पर यह आदत पड़ जाती है. लड़कों में धूम्रपान को जवां होने के प्रतीक के रूप में भी लिया जाता है तो लड़कियां इसे आधुनिकता के प्रतीक के तौर पर लेती हैं. उन में भी दूसरों की देखादेखी इस की शुरुआत हो जाती है.

जो महिलाएं तंबाकू का सेवन युवावस्था में ही कर लेती हैं उन में कई प्रकार के कैंसर होने के खतरे बढ़ जाते हैं. तंबाकू के धुएं में लगभग 2,500 रसायन होते हैं जो एक कार के एक्जौस्ट द्वारा छोड़े गए धुएं से कई गुना ज्यादा जहरीले होते हैं.

महिलाओं में होने वाले सभी कैंसरों में से 29 प्रतिशत का कारण धूम्रपान होता है. यही नहीं, गर्भाशय, ग्रीवा के कैंसर के मामलों में से 30 प्रतिशत में सिगरेट के धुएं में व्याप्त रसायनों का होना एक बड़ा कारण होता है. यही नहीं 55-65 वर्ष की महिलाओं में हृदयाघात एवं मस्तिष्काघात के मामलों में से 55 प्रतिशत में धूम्रपान एक बड़ा कारण होता है.

यदि कोई महिला 15 साल की उम्र के आसपास धूम्रपान शुरू कर देती है तो इस की वजह से शरीर में कैल्शियम की कमी होने लगती है. नतीजतन, 35-45 साल की उम्र में ही उस की हड्डियों के टूटने का खतरा पैदा हो जाता है.

धूम्रपान करने से न सिर्फ दांत खराब हो जाते हैं बल्कि सांस से बदबू भी आने लगती है. आंखों में एवं होंठों के पास की रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. उन में सलवटें पड़ने लगती हैं. यदि धूम्रपान के साथसाथ कोई महिला सन बाथिंग भी करती है तो त्वचा के कैंसर का खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है.

गर्भधारण का खतरा

आजकल कई कारणों से महिलाएं गर्भधारण नहीं करना चाहतीं. इस के लिए उन्हें गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिन्हें प्रतिदिन लेना पड़ता है. यदि कोई महिला गर्भनिरोधक गोली का इस्तेमाल करती हो और धूम्रपान भी करती हो, खासकर 35 साल की आयु के बाद, तो तंबाकू के अंदर के रसायन गोली के क्रियाशील तत्त्व एस्ट्रोजेन के स्तर को कम करते हैं और उसे निष्क्रिय भी कर देते हैं यानी गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल के बावजूद गर्भधारण का खतरा पैदा हो जाता है.

महिलाओं में तरहतरह के योनिगत संक्रमण होते हैं. इन में से जीवाणु वेजिनासिस (बीवी) आम होता है. लगभग 25 प्रतिशत महिलाएं इस से पीडि़त होती हैं. कई अन्य वजहों के साथसाथ धूम्रपान भी इस के पीछे एक मुख्य कारण होता है. जीवाणु वेजिनासिस (बीवी) से पीडि़त आधी महिलाओं को इस के लक्षण ही नहीं मालूम होते हैं. गर्भावस्था एक खास अवस्था मानी जाती है. इसलिए उसे सुरक्षित बनाने हेतु सतर्क रहना जरूरी हो जाता है.

गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान एक खतरनाक बेवकूफी है. इस से गर्भस्थ शिशु में ‘जहर’ प्रविष्ट तो होता ही है गर्भपात का भी खतरा पैदा हो जाता है. गर्भावस्था के दौरान 10 सिगरेट पीने वाली महिलाओं में गर्भस्राव का खतरा होता है. यही स्थिति तब भी बनने की आशंका रहती है जब उन के पति, दोस्त, साथी आदि धूम्रपान करते हों जिन के निकट गर्भवती महिला रहती है. यदि कोई गर्भवती महिला धूम्रपान के साथसाथ मद्यपान भी करती है तो बारबार गर्भपात या गर्भस्राव का खतरा बना रहता है.

बुढ़ापा जल्दी

धूम्रपान की वजह से महिलाओं में हड्डियों के छीजने में वृद्धि हो जाती है एवं कैल्शियम की कमी होने लगती है. फलस्वरूप हड्डियों की उम्र में 10 साल की वृद्धि हो जाती है जिस के चलते कूल्हे की हड्डी के टूटने के खतरे में 45 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है. धूम्रपान करते रहने से यह खतरा 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. धूम्रपान करने वाली महिलाओं में बुढ़ापा जल्दी आ जाता है क्योंकि उन की रीढ़ की हड्डी में झुकाव होने लगता है. ध्यान रहे हड्डियों पर धूम्रपान का असर स्थायी होता है.

जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं और गर्भनिरोधकों का भी इस्तेमाल करती हैं उन में मस्तिष्काघात होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसलिए जरूरी हो जाता है कि धूम्रपान करने वाली महिलाएं 35 साल के बाद गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल बंद कर दें. धूम्रपान का दृष्टि पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. मोतियाबिंद के लगभग 20 प्रतिशत मामलों में धूम्रपान एक कारण होता है. मुंह से छोड़ा गया धुआं सब से पहले आंखों के ही संपर्क में आता है. यह आंखों की कई बीमारियों का कारण बनता है. यहां तक कि धुएं से महिला अंधी भी हो सकती है.

विभिन्न अंगों के कैंसरों का खतरा

धूम्रपान से न सिर्फ थायराइड की बीमारी का खतरा बढ़ता है बल्कि विभिन्न अंगों के कैंसरों की आशंका भी बढ़ जाती है. कुछ महिलाओं में (जीनिक विशिष्टता के चलते) धूम्रपान के कारण स्तन कैंसर के मामले अपेक्षाकृत अधिक होते हैं.

गर्भधारण में स्त्री की डिंबग्रंथि यानी ओवरी की बड़ी भूमिका होती है. क्योंकि यही डिंब ओवम यानी अंडे को पैदा करती है. इस में पुटी बन जाती है. कुछ में ऐसा होना एक प्रकार की प्रवृत्ति बन जाती है. दूसरों के मुकाबले धूम्रपान करने वाली महिलाओं में कार्यकारी डिंब के विकसित होने का खतरा दोगुना होता है.

डेनमार्क में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक धूम्रपान न करने वाली स्त्रियों के मुकाबले धूम्रपान करने वाली महिलाओं में स्तन कैंसर का खतरा 8 साल पहले होता है. अध्ययनों से पता चला है कि 20 प्रतिशत एशियाई, 35 प्रतिशत अफ्रीकी-अमेरिकी एवं मध्य पूर्व की

50 प्रतिशत महिलाओं में एक खास जीन का अभाव होता है. यह जीन तंबाकू में निहित जहरीले रसायनों के दुष्प्रभाव को कम करता है. केवल इतना ही नहीं धूम्रपान करने से फेफड़ों का कैंसर भी होता है. ऐसा नहीं है कि धूम्रपान न करने वाली महिलाओं को फेफड़ों का कैंसर नहीं हो सकता है परंतु ऐसा ‘पोजेसिव स्मोकिंग’ के कारण होता है. इस प्रकार का धूम्रपान लगभग 17 प्रतिशत मामलों में फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है.

दिल के रोग बढ़ते जा रहे हैं और महिलाएं भी इस की गिरफ्त में आती जा रही हैं. इतना कि सभी प्रकार के कैंसरों वाली महिलाओं से दोगुनी महिलाएं अकेले हृदय रोग एवं हृदयाघात से मरती हैं. स्त्रियों में अचानक मृत्यु के 60 प्रतिशत मामलों के पीछे हृदय पर हमला होता है. धूम्रपान हृदय रोगों से पीडि़त होने के खतरे को बढ़ा देता है. एक दिन में एक डब्बी सिगरेट इस खतरे में 5 गुना वृद्धि कर देती है. मात्र 1-5 सिगरेट प्रतिदिन हृदय वाहिनी रोगों के खतरे को दोगुना कर देती है. हां, धूम्रपान बंद कर देने के 4-6 वर्ष बाद हृदयाघात का खतरा धूम्रपान न करने वाली महिलाओं जैसा ही हो जाता है.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

तमाशबीन नहीं जागरूक बने जनता

देश की समस्याएं हर रोज और ज्यादा उलझती लग रही हैं और ऐसा लगता नहीं कि देश की व्यवस्था जिन राजनीतिबाजों और नौकरशाहों के हाथों में है वे इन्हें सुलझाना जानते हैं या चाहते हैं. देश अगर सोचे कि सर्वोच्च न्यायालय, सीएजी (महालेखा परीक्षक), चुनाव आयुक्त, स्वतंत्र प्रैस जैसी संस्थाएं कुछ कर सकती हैं तो वह गलत है. ये संस्थाएं सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए हैं, समस्याओं को हल करने में सरकार को सहयोग देने के लिए नहीं.

देश की अधिकांश समस्याओं के बारे में आम जनता की बढ़ती उदासीनता इन समस्याओं के विकराल रूप लेने की जड़ है. आम जनता अब तमाशबीन बनती जा रही है. वह समस्याओं के बारे में केवल उतना जानतीसमझती है जितना उसे सीधेसीधे महसूस होता है. आज प्याज के दाम बढ़ गए हैं, सड़कें टूट गई हैं, पार्किंग की जगह नहीं मिल रही है जैसी समस्याओं के बारे में जनता भुक्तभोगी तो होती है पर उस पर किया क्या जाए, यह न वह समझती है न समझने में रुचि रखती है.

नेता और अफसर, जो इस जनता, जो खुद अर्धशिक्षित, अर्धसूचित होती है, में से निकलते हैं या इस से वास्ता पड़ता है, उन अंधों की तरह होते हैं जो जानवरों की भीड़ में हाथी, घोड़े, जेबरा, सांप को पहचानने की कोशिश कर रहे लगते हैं.न उन्हें कोई बताने वाला है, न कोई रोकने वाला.

अति शक्तिशाली माना जाने वाला मीडिया केवल इन विकराल समस्याओं के अंश भर को छूता है. मीडिया को लगने लगा है कि जनता की खुद की इन समस्याओं में कोई रुचि नहीं है. आज मीडिया के रूप में जो दिख रहे हैं वे सैंसेशनलिज्म या तमाशबीनी को ही जनता की रुचि समझते हैं और नतीजा यह है कि वे इन समस्याओं को सतही तौर पर लेते हैं.

आम जनता जब तक भेड़ों की तरह हांके जाने में संतुष्ट रहे या भेडि़यों को गड़रिए के रूप में देख कर खुद को सुरक्षित समझेगी, वह निश्चित ही लुटेगी और परेशान होगी. देश के नीति निर्धारकों को अगर सही निर्णय लेने को बाध्य करना है तो जनता में कुछ को तो कम से कम समस्याओं की गहराई में जाने, समझने, पढ़ने, लिखने और उस पर बहस करने की आदत डालनी ही होगी.

जनता को समस्याओं की आंधी के सामने रेत में मुंह नहीं छिपाना चाहिए, उस का डट कर मुकाबला करने की योग्यता अपनानी होगी. अन्ना हजारे या दिसंबर रेप कांड में जिस तरह लोग घर से बाहर निकले, ऐसा हर रोज करना होगा. दिल्ली के जंतरमंतर पर जमा होने का फर्ज केवल कुछ ही अदा करें, यह नहीं चलेगा. जनता को हर समस्या को, जितनी गहराई में संभव हो, जानने का प्रयास करना होगा, केवल ट्विटर या फेसबुक पर लिख कर छोड़ना बंद करना होगा. जनता को अपनी राय, अपने सुझाव, सही व सुलझी भाषा में देना सीखना होगा वरना इस देश का पाकिस्तान, नेपाल या सोमालिया बनना निश्चित है.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

नपुंसकता तन से नहीं मन से उपजा रोग

चिकित्सा की भाषा में नपुंसकता यानी इंपोटैंस उस स्थिति को कहते हैं जिस में व्यक्ति मानसिक या शारीरिक रूप से यौन क्रिया का आनंद नहीं ले पाता है. जरूरी नहीं कि यह बीमारी अधिक उम्र के पुरुष में ही हो, बल्कि कुछ नौजवान भी इस के शिकार हो जाते हैं. यह बीमारी प्रजननहीनता यानी इंफर्टिलिटी से अलग है जिस में व्यक्ति के वीर्य में या तो शुक्राणु नहीं होते या बहुत ही कम मात्रा में होते हैं जिस के कारण वह व्यक्ति यौन क्रिया तो सफलतापूर्वक कर लेता है लेकिन संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होता है.

दरअसल, इस के पीछे शारीरिक व मानसिक दोनों कारण होते हैं. नए शोधों से पता चला है कि मधुमेह व हार्मोन के असंतुलन से नपुंसकता हो सकती है. शरीर में किसी प्रकार के संक्रमण के कारण व्यक्ति नपुंसकता का शिकार हो सकता है या फिर शरीर में चोट लगना, उच्च रक्तचाप, धूम्रपान व मदिरापान जैसे अन्य शारीरिक कारण भी हो सकते हैं.

हमारे जीवन में हार्मोंस का बहुत महत्त्व है या कहें कि हमारी दिनचर्या इन हार्मोंस के कारण ही संभव है. यदि किसी पुरुष में टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य हो तो उस के नपुंसक होने की संभावना काफी कम हो जाती है. दरअसल, सैक्स की इच्छा के लिए हार्मोन का शरीर में उचित अनुपात में बने रहना जरूरी है. आधुनिक अध्ययनों से साबित हो गया है कि नपुंसकता के 80 प्रतिशत मरीजों के पीछे मानसिक कारण होते हैं जबकि 20 प्रतिशत मरीज शारीरिक कारणों से जुड़े होते हैं. सही तरीके से खानपान व रहनसहन न होने से भी व्यक्ति नपुंसकता का शिकार हो सकता है.

आज की भागतीदौड़ती जिंदगी, बढ़ते तनाव, प्रदूषण और कई बुरी आदतों के साथ असमय खानपान व रहनसहन ने स्वास्थ्य की कई परेशानियों व बीमारियों को जन्म दिया है. इन में नपुंसकता भी है. हालांकि, यह कोई नई बीमारी नहीं है लेकिन आज यह आंकड़ा चौंकाने वाला है कि भारत में हर 10वां व्यक्ति यौनक्रिया में अक्षम है. मधुमेह जैसी कुछ बीमारियां भी नपुंसकता पैदा कर सकती हैं. चूंकि मधुमेह से तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है इसलिए अगर व्यक्ति मधुमेह को नियंत्रित नहीं रखता तो उस में 5-10 साल बाद नपुंसकता आ सकती है. लिंग में रक्त बहाव में अंतर आने या लिंग में चोट आ जाने से भी नपुंसकता आ जाती है.

इस के अलावा वीर्य का पतला या गाढ़ा होना निरंतर वीर्य स्खलन पर आधारित होता है और यह देखा जा सकता है कि कितने दिनों के बाद वीर्य स्खलित हुआ है. शीघ्रपतन में वीर्य स्खलन अगर स्त्री के चरमानंद के पूर्व या संभोग से पूर्व ही हो जाता है, तो यह यौन शक्ति की कमी का लक्षण है. जो लोग सहवास के समय अत्यधिक उत्तेजित हो जाते हैं और स्खलन को नियमित नहीं कर पाते हैं, इस समस्या से ग्रसित हो जाते हैं. इस समस्या के मुख्य कारण संभोग के समय अत्यधिक घबराहट, जल्दबाजी में यौन संबंध स्थापित करना है, लेकिन इस का नपुंसकता से कोई ताल्लुक नहीं है.

विभिन्न जांचों द्वारा थायराइड हार्मोन, प्रोलैक्टिन हार्मोन तथा टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर का पता लगाया जाता है. सैक्सोलौजिस्ट सब से पहले यह पता लगाते हैं कि शरीर में किस हार्मोन की कमी है. उस के बाद उस हार्मोन को पूरा करने के लिए मरीज को हार्मोन दिए जाते हैं. मधुमेह के कुछ रोगियों या मानसिक रोगियों पर दवाएं प्रभावित नहीं होती हैं तो ऐसे मरीजों में सर्जरी की मदद से कभीकभी पेनाइल प्रोस्थेटिक डिवाइस के प्रत्यारोपण की सलाह दी जाती है. कुछ दवाएं भी इलाज के लिए सहायक होती हैं.

यह मरीज पर निर्भर करता है कि वह कितना जल्दी अपनेआप को मानसिक तौर पर तैयार कर लेता है. आजकल थोड़ी सी जागरूकता समाज में आई है, लेकिन लोग कई बार नीमहकीम के चक्कर में पड़ जाते हैं और अपनी जिंदगी से काफी हताश हो चुके होते हैं, इलाज करने पर वे ठीक हो जाते हैं. लेकिन रोग जितना पुराना हो जाता  है या मरीज स्वयं को जितना हताश कर लेता है, डाक्टर को रोग ठीक करने में उतनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. जब भी किसी व्यक्ति को नपुंसकता की संभावना लगे, तुरंत किसी सैक्सोलौजिस्ट से उचित सलाह ले लेनी चाहिए.

संसार में धूम मचा देने वाली वियाग्रा को ले कर भी कई विरोधाभास हैं. वियाग्रा के सकारात्मक परिणाम कम नकारात्मक परिणाम ज्यादा आ रहे हैं क्योंकि जिस व्यक्ति की आयु 40 से कम है और नपुंसकता का शिकार है उसी व्यक्ति को वियाग्रा की गोली डाक्टर की सलाह पर लेनी चाहिए. लेकिन आज 60 वर्ष से ऊपर के वृद्ध भी इस दवा को ले रहे हैं, चूंकि 60 वर्ष के बाद अकसर कामवासना क्षीण हो जाती है. ऐसे में अपनी सेहत के साथ जबरदस्ती करने से निश्चित तौर पर इस के दुष्परिणाम ही होंगे.

वैसे भी आजकल बाजार में नपुंसकता को ठीक करने के लिए ढेर सारी दवाएं मिल रही हैं. अगर व्यक्ति की समझ ठीक है तो दवा की कोई जरूरत नहीं है. यदि किसी व्यक्ति को कोई शंका हो तो डाक्टर की सलाह के बाद ही उसे किसी दवा का इस्तेमाल करना चाहिए.

आधुनिक लाइफस्टाइल के कारण?भी युवा पीढ़ी में नपुंसकता की समस्या बढ़ती जा रही है. युवा पीढ़ी में नपुंसकता होने का मूल कारण है सही जानकारी का न होना. मातापिता तथा बच्चों में सही तालमेल की कमी.

आजकल इलैक्ट्रौनिक मीडिया तरहतरह की तसवीरें दिखा कर नवयुवकों को उत्तेजित करता है. जहां तक यौन शिक्षा का प्रश्न है, इसे पाठ्यक्रम में जरूर शामिल करना चाहिए क्योंकि किशोरावस्था में शारीरिक विकास के साथसाथ मानसिक विकास भी होता है. युवाओं में जानकारी प्राप्त करने की जो इच्छा है वह सही रूप से, सही जगह से, सही तरीके से मिले.

आने वाली पीढ़ी को नपुंसकता की भयानक त्रासदी से बचाने के लिए बच्चों को सही जानकारी की शुरुआत मांबाप के द्वारा ही की जानी चाहिए. अगर बच्चा कोई गलत हरकत करता है तो मांबाप को उसे समझाना चाहिए. उसे यौन शिक्षा के बारे में जानकारी देनी चाहिए.

साथ ही स्कूल के अध्यापकों को यौन शिक्षा के बारे में बच्चों को बताना चाहिए. मीडिया अपना जितना समय सैक्स संबंधी प्रचार करने में बरबाद कर रहा है उस की जगह यदि अच्छी सेहत या स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम दिखाए तो लोगों में जागरूकता आ सकती है क्योंकि जनजागृति इस रोग का अहम निदान है.

प्रस्तुति : मनोज श्रीवास्तव 

(यह लेख यौनरोग विशेषज्ञ डा. प्रेमाबाली  से बातचीत पर आधारित है.)

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

कच्ची उम्र में ही जरूरत से ज्यादा मैच्योर होते जा रहे हैं बच्चे

आजकल कच्ची उम्र में ही बच्चे जरूरत से ज्यादा मैच्योर होते जा रहे हैं. वे मनमानी करते हैं और जिद को पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. अगर उन्हें कभी मातापिता ने किसी बात पर डांट दिया तो वे उसे मन पर लगा लेते हैं. ऐसे में मातापिता सोचने लगते हैं कि बच्चे बिगड़ रहे हैं.

घर में टैलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सावधान इंडिया, सीआईडी, क्राइम पैट्रोल, गुमराह जैसी क्राइम थीम वाले धारावाहिक पूरा परिवार साथ बैठ कर देखता है. धारावाहिक में अपराध से जुड़े कई पहलुओं को बढ़ाचढ़ा कर ग्लैमरस अंदाज में दिखाया जाता है. इन सब का गहरा असर बच्चों के मासूम व कोमल मन पर पड़ता है.

महानगरों में ज्यादातर मातापिता नौकरी करते हैं. लिहाजा, बच्चे ज्यादातर घर में अकेले ही होते हैं. चूंकि मातापिता के अलावा घर में बुजुर्ग यानी दादादादी या नानानानी भी नहीं होते, जो बच्चों के मन की बात को समझें और विचारों को बांटें. लिहाजा, अकेलेपन में कई मासूम अपनी ही काल्पनिक दुनिया में खोए रहते हैं. कभीकभी तो ये बच्चे कुंठा के शिकार भी हो जाते हैं.

बच्चों के लिए समय निकालें

मातापिता बच्चों को भौतिक सुविधाएं तो दे देते हैं पर समय बिलकुल भी नहीं देते, जिस की उन्हें बहुत जरूरत होती है. और फिर इसी कारण बच्चे जानेअनजाने मातापिता से मन ही मन एक दूरी बना लेते हैं. उन से अपने मन की बात शेयर करना बंद कर देते हैं. ऐसी स्थिति में मातापिता को समझाने के तौर पर छोटी सी डांट भी उन के लिए बहुत बड़ी बात बन जाती है.

कई बार देखने को मिलता है कि मातापिता का गुस्सा मासूम बच्चों के कोमल मन में भय पैदा कर देता है. उन्हें मातापिता से केवल प्यार की ही उम्मीद होती है, जबकि मातापिता आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में अपने बच्चों को सब से आगे देखना चाहते हैं. वे भूल जाते हैं कि उन का प्यार बच्चे को आगे बढ़ने में मदद करेगा, न कि उन की डांट. बच्चा अगर परीक्षा में अच्छे अंकों से भी पास होता है तो उसे मातापिता ‘इस से ज्यादा अंक लाने चाहिए’, ‘पूरा दिन खेलते रहते हो’, ‘अब से पढ़ाई पर ध्यान दो’ वगैरह कह कर उस के कोमल मन पर प्रहार करते हैं. बच्चे तो सिर्फ शाबाशी के दो बोल की उम्मीद रखते हैं. लेकिन बदले में उन्हें मिलती है डांटफटकार.

इस डर से बच्चा मानसिक तौर पर विचारहीन हो जाता है और बाद में आत्महत्या जैसा क्रूर कदम उठाने पर मजबूर हो जाता है.

गुजरात के कई शहरों में आएदिन ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं. किसी बच्चे ने रिजल्ट के डर से आत्महत्या कर ली तो किसी ने डांट की वजह से. कई मामलों में तो बच्चों के आत्महत्या करने की वजह खुद मातापिता ही नहीं समझ पाए हैं.

चिंताजनक बातें

ऐसी ही कुछ घटनाएं भावनगर और अहमदाबाद में हुईं, जिन में मातापिता बच्चों की आत्महत्या करने की वजह समझ ही नहीं पाए. भावनगर के मालणका गांव में कक्षा 7 में पढ़ने वाले 13 वर्षीय श्रयेश भरतभाई चौहान ने किसी कारण से अपने घर में ही गले में फंदा डाल कर आत्महत्या कर ली. वहीं अहमदाबाद में कक्षा 5 की छात्रा चांदनी प्रजापति (उम्र 12 साल) ने भी घर की छत के हुक में दुपट्टा डाल कर आत्महत्या कर ली.

चांदनी के घर वालों की मानें तो परीक्षा के डर की वजह से उस ने यह कदम उठाया. जबकि स्कूल से जुड़े शिक्षकों व कर्मचारियों का कहना था कि चांदनी अपनी क्लास की सब से होशियार छात्रा थी. ऐसे में परीक्षा के डर से आत्महत्या की बात गले नहीं उतरती. दोनों पक्षों की अलगअलग बातों से तय नहीं हो पाया कि आखिर चांदनी ने आत्महत्या क्यों की?

अहमदाबाद के नरोड़ा विस्तार में रहने वाली 12वीं की छात्रा खुशबू अशोकभाई पटेल ने बोर्ड की परीक्षा दी थी. कैमिस्ट्री के पेपर में 15 नंबर के प्रश्नों के उत्तर छूट जाने की वजह से घर वालों ने उसे खूब डांटा. खुशबू के मन पर इस डांट का ऐसा घातक असर पड़ा कि उस ने घर की छत से ही छलांग लगा दी.

ऐसा ही कुछ कविता के साथ भी हुआ. अहमदाबाद के अमराईवाड़ी विस्तार में रहने वाले कैलाशभाई गवाणे की 2 बेटियां करिश्मा (उम्र 19 वर्ष) और कविता (उम्र 17 वर्ष) थीं. कैलाशभाई चाहते थे कि उन की बेटी कविता परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हो. इस बात को ले कर बापबेटी में बहस हुई, जिस का अंजाम यह हुआ कि पिता की डांट से आहत कविता ने शहर के नेहरू ब्रिज से छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली.

अहमदाबाद के मेघाणीनगर निवासी संपतभाई पाटिल के घर में उन का 14 वर्षीय बेटा प्रशांत अपनी मां के साथ किसी शादी में जाना चाहता था लेकिन उस की मां उसे साथ नहीं ले गईं. जब वे शाम को घर वापस आईं तो उन्होंने प्रशांत की लाश घर के झूले से लटकती देखी.

ऐसे ही कई और मामले अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं जिन में मांबाप के गैरजिम्मेदाराना रवैए, डांट और जरूरत से ज्यादा प्रैशर के चलते बच्चे अ?ात्महत्या करने पर विवश हो जाते हैं.

ज्यादा बोझ न डालें

इन मामलों से सबक ले कर मातापिता को अपने बच्चों को, उन की मनोस्थिति को समझना चाहिए. तभी इस समस्या को सुलझाया जा सकता है. बच्चों पर पढ़ाई बोझ बनती जा रही है, ऊपर से मातापिता का अच्छे अंक लाने का प्रैशर, इस बोझ में और इजाफा कर देता है.

मनोचिकित्सक हिमांशु देसाई कहते हैं, ‘‘संयुक्त कुटुंब छूटते जा रहे हैं, मातापिता 1 या 2 बच्चे के साथ रहते हैं. ऐसे में वे अपनी इच्छाएं अपने बच्चों के द्वारा ही पूरी करना चाहते हैं. कई बार यह बच्चे की सहनशीलता की हद से बाहर की बात हो जाती है. परिणामस्वरूप, जब बच्चा मांबाप की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता तब वह डर जाता है और आत्महत्या करने का फैसला कर बैठता है.’’

बदलते दौर में बच्चों की बदलती प्रवृत्ति के मद्देनजर अब यह जरूरी हो गया है कि मातापिता बच्चों की बातों, इच्छाओं को न सिर्फ सम्मान दें बल्कि अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में से उन के लिए समय भी निकालें ताकि कोई और मासूम मौत को गले न लगाए.

VIDEO : लिप्स मेकअप का ये है आसान तरीका

ऐसे ही वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक कर SUBSCRIBE करें गृहशोभा का YouTube चैनल.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें