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बड़ा सवाल : शिक्षा पर धर्म का कब्जा आखिर क्यों

विश्वभर में शिक्षा पर धर्म का नियंत्रण बढ़ रहा है. हर जगह धार्मिक शिक्षा का बोलबाला है. कहने को लोकतांत्रिक सरकारें शिक्षा को धर्म से मुक्त रखने की बातें करती रही हैं पर परोक्षअपरोक्ष रूप में धार्मिक शिक्षा की घुसपैठ कराई जा रही है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी शिक्षा क्षेत्र में व्यापक बदलाव ला रही हैं  लेकिन धार्मिक शिक्षा पर भी उन का जोर है. धर्म के नाले शिक्षा की पवित्र सरिता में मिल कर निर्बाध रूप से बह रहे हैं. शुद्धीकरण के नाम पर दूषित जहर डाला जा रहा है.

मध्य प्रदेश के भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकारी स्कूलों में भगवदगीता की पढ़ाई की योजना का ऐलान किया तो 2014 में हार चुके राजनीतिक दल या विपक्षी सरकारों ने कोई एतराज नहीं किया. विरोध हुआ तो दूसरे धर्मों के नेताओं की ओर से हुआ पर दबा हुआ. ईसाई और मुसलिम नेताओं ने हल्ला मचाया कि केवल हिंदू धर्मग्रंथ की पढ़ाई ही क्यों, दूसरे धर्मों की पुस्तकों को भी समानरूप से पढ़ाया जाना चाहिए, यानी कट्टरपंथी फैलाओ पर बराबरी के साथ.

भाजपा तो खुल कर हिंदुत्व की शिक्षा लागू करने की पूरी कोशिश करती रही है. देश में वंदेमातरम, सूर्य नमस्कार, योग तथा पौराणिक व ऐतिहासिक पात्रों की पढ़ाई को ले कर विवाद उग्र हो रहे हैं. सरकार में चाहे कांग्रेस रही हो या भाजपा, दोनों ही अपनेअपने स्वार्थ के लिए शिक्षा में धर्म का इस्तेमाल करती आई हैं. धार्मिक शिक्षा पर मोटा खर्च किया जा रहा है.

केंद्र के तहत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी और राज्य सरकारों के पाठ्यक्रमों पर विवाद उठते रहे हैं. ये विवाद सरकारों के बदलने पर पाठ्यक्रमों को अपने मुताबिक परिवर्तित करने पर उठते रहे हैं.

धर्म का नशा

जरमन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने कहा था, ‘‘मुझे टैक्स्टबुक्स पर नियंत्रण करने दो, और मैं जरमनी को कब्जे में कर लूंगा.’’ (लेट मी कंट्रोल द टैक्स्टबुक्स ऐंड आई विल कंट्रोल जरमनी).

धर्म तानाशाही चाहता है और शिक्षा में धर्म की अफीम का नशा किसी भी समाज पर नियंत्रण करने का सब से कारगर हथियार है. हमारे देश में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही बड़े दलों में धर्म के ठेकेदार घुसे बैठे हैं जो शिक्षा क्षेत्र के जरिए समाज को अपने मनमुताबिक हांकना चाहते हैं.

भारत के राज्यों में शिक्षा के अपनेअपने पाठ्यक्रम हैं. पाठ्यक्रमों में हर धर्म की शिक्षा जारी है, स्कूल से ले कर कालेज स्तर तक. मुसलमानों के लगभग 50 हजार मदरसे हैं जो इसलाम की शिक्षा दे रहे हैं. उन्हें आज भी सरकारी संरक्षण प्राप्त है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस अरसे से हिंदुत्व की शिक्षा दे रहा है. आरएसएस जमीनी स्तर तक शिक्षा का हिंदूकरण करना चाहता है. इस उद्देश्य के लिए संघ ने वनवासी कल्याण परिषद, सेवा भारती, विद्या भारती, विवेकानंद केंद्र तथा अन्य समूहों की स्थापना हिंदू राष्ट्रवादी धार्मिक एजेंडा लागू करने के लिए की.

संघ आदिवासी क्षेत्रों में 9,300 एकल स्कूल चला रहा है. 1978 में इस ने विद्या भारती, अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान का नैतिक शिक्षा के नाम पर विस्तृत नैटवर्क स्थापित किया. विद्या भारतीय पद्धति देशभर में 18 हजार से अधिक स्कूलों, 10 लाख, 80 हजार छात्रों और 80 हजार अध्यापकों को चला रही है.

विद्या भारती 60 से ज्यादा ग्रेजुएट संस्थानों को संचालित कर रही है. अब इन की संख्या बढ़ रही है.

विश्वभर में धार्मिक शिक्षा का बोलबाला है. 135 से अधिक देशों में अकेले चर्च शिक्षा पद्धति द्वारा धर्म की शिक्षा प्रदान की जा रही है. चर्च के अलावा एक दर्जन से अधिक धर्मों, पंथों के विषय स्कूलों, कालेजों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं.

धर्म कहीं नैतिक शिक्षा के नाम पर, तो कहीं साहित्य, संस्कृति, इतिहास या अतीत के नायकों की चरित्रगाथा के रूप में पढ़ाया जा रहा है.

सरकारें और जनता सोचती हैं कि धर्म छात्रों को जिम्मेदार, नैतिक, ईमानदार, सच्चा और मजबूत आध्यात्मिक वयस्क इंसान बनाता है, उन्हें मानवीय बनाने के लिए प्रेरित करता है. ईसाई और यहूदी धर्म मानवधर्म के नाम पर स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है.

अमेरिका में पब्लिक हाईस्कूलों (वहां सरकारी स्कूलों को पब्लिक स्कूल कहते हैं) में बाइबिल कोर्स ‘द बाइबिल एज हिस्ट्री ऐंड लिटरेचर’ के रूप में चल रहा है. इंगलैंड में भी पाठ्यक्रम में धर्म के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन जारी है. इस में धर्म की आस्था, रिवाज, धार्मिक सिद्धांत, दर्शन, परंपराएं, रीतियां, धार्मिक कानून, व्यक्ति की भूमिका प्रमुख तौर पर शामिल हैं.

इस्लामी देशों में सरकार द्वारा संचालित स्कूलों, जिन्हें मदरसा इसलामिया कहते हैं, में इसलाम की शिक्षा दी जाती है.

यहां परंपरागत मुसलिम शिक्षा में बच्चों को कुरआन के सूरा यानी पाठ याद कराए जाते हैं. इसलामिक देशों में गैर इसलामिक शिक्षा देना कानूनन मना है.

बौद्ध देशों में बौद्ध शिक्षा का बोलबाला है. थाईलैंड, म्यांमार और अन्य देशों में बौद्ध धर्म पढ़ाया जाता है. जापान में सार्वजनिक, सरकारी समारोहों में धार्मिक गतिविधियां संचालित की जाती हैं. जापान में कई क्रिश्चियन स्कूल भी हैं.

भारत में तो राष्ट्रवाद के नाम पर भी हिंदुत्व की घुसपैठ है. राष्ट्रभक्ति नहीं, पाखंडभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है.

इसराईल में बच्चे परंपरागत यहूदी शिक्षा में बाइबिल और तोरा के इब्रानी प्रमुख अंश (बाइबिल की पहली 5 पुस्तकें) तथा धर्मग्रंथ की व्याख्या पढ़ते हैं. इस धार्मिक शिक्षा के पीछे आमतौर पर यह धारणा है कि इसे पढ़ने से छात्र अपनी संस्कृति के इतिहास को और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से स्मरणीय बना कर रख पाएंगे.

सरकार समर्थित धर्म

कुछ यूरोपीय देशों और उन की पूर्व कालोनियों में सरकार समर्थित धर्म संचालित हो रहा है. वहां सरकारी स्कूलों में रोमन, कैथोलिक और और्थोडौक्स क्रिश्चियनिटी को विशेष क्लासों के माध्यम से पढ़ाया जाता है.

इंगलैंड कैथोलिक चर्च और यहूदी स्कूल  लंबे समय से सरकारी पद्धति के दूसरे स्कूलों को अनिवार्य तौर पर धार्मिक शिक्षा प्रदान करने में मदद कर रहे हैं. हालांकि यहां धार्मिक शिक्षा की सलाहकार परिषद द्वारा मान्यता मिली होती है. इस परिषद में विभिन्न धार्मिक समूह, टीचर्स और स्थानीय काउंसलर शामिल होते हैं.

मध्यपूर्व में भी कई कैथोलिक स्कूल हैं. ये फ्रैंच नियंत्रित हैं. वहां अंगरेजी, अरबी और फ्रैंच पढ़ाई जाती है. यद्यपि वहां सरकारी पाठ्यक्रम है, फिर भी मध्यपूर्व में कैथोलिक स्कूल के विद्यार्थी धर्मशास्त्र और चर्च की पढ़ाई भी पढ़ते हैं.

कनाडा में धार्मिक शिक्षा का परिवर्ती (घटताबढ़ता) स्वरूप है. सरकारी खजाने से संचालित कैथोलिक शिक्षा कंस्टीट्यूट ऐक्ट 1867 के विभिन्न सैक्शनों द्वारा स्वीकृत है. हाल ही में वहां खासतौर से ओंटारियो में बहुसंस्कृतिवाद के बढ़ते स्तर के कारण सरकारी कोष से एक समूह को धर्म की शिक्षा देने की इजाजत पर बहस छिड़ी हुई है. बहुसंस्कृति के चलते क्यूबेक ने शिक्षा ऐक्ट 1998 के तहत धार्मिक शिक्षा समाप्त कर दी थी, न्यूफाइलैंड ने 1995 में कैथोलिक कोष हटा लिया था. क्यूबेक ने धार्मिक लाइन से हट कर स्कूलों को पुनर्व्यवस्थित किया.

अमेरिका में धार्मिक शिक्षा आमतौर पर पूरकरूप से ‘सनडे स्कूल’, ‘इब्रानी स्कूल’, ‘धार्मिक प्रश्नोत्तरी क्लासेज’ आदि के माध्यम से दी जाती है.

अमेरिका में 1954 से ‘वन नैशन अंडर गौड’ के रूप में पब्लिक स्कूलों में धार्मिक शिक्षा मान्य थी. वह अब तटस्थ शैक्षणिक संदर्भ के तहत निषेध कर दी गई है. पर फिर भी इन स्कूलों में पीछे के रास्ते से धर्म सिखाया जा रहा है.

फ्रांस में हालांकि धर्म को कोई मान्यता प्राप्त नहीं है और न ही धार्मिक शिक्षा के लिए फंड है, लेकिन सरकार निजी शिक्षण संस्थानों को सब्सिडी जरूर देती है, जिस में धार्मिक शिक्षा भी शामिल है, मगर इस शर्त के साथ कि किसी भी छात्र पर धर्म की पढ़ाई के लिए भेदभाव और जबरदस्ती न थोपी जाए.

आस्ट्रेलिया का इतिहास एक बहुराष्ट्रीय साम्राज्य के तौर पर रहा है जिस में इसलामिक बोस्निपा, सुन्नी इसलाम, रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टैंट और सनातनी ईसाई शामिल रहे हैं. इन धर्मों की क्लासें चलती हैं. वहां बौद्ध व यहूदी धर्म भी पढ़ाए जाते हैं.

संघ राज्य जरमनी का पुराना इतिहास जहां रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट के बीच विभाजित रहा है, वहां धार्मिक संस्थान अब भी कैथोलिक, प्रोटेस्टैंट और यहूदी धर्म शिक्षकों के प्रशिक्षण का काम देखते हैं. वहां पब्लिक स्कूलों में धर्म पढ़ाने वाले अध्यापकों को सरकार द्वारा पैसा मिलता है पर पढ़ाई की विषयवस्तु चर्च द्वारा तय होती है.

वहां सरकार धार्मिक स्कूलों को 90 प्रतिशत तक सब्सिडी भी देती है. जरमनी में इसलामी शिक्षा शुरू करने पर विवाद छिड़ा हुआ है जबकि वहां करीब 30 लाख मुसलमान हैं जो तुर्की मूल के हैं. हाल के आतंकवादी हमलों के बाद सरकारें असमंजस में हैं कि धर्मग्रंथ की शिक्षा को छूट दें या न दें.

ग्रीक और्थोडौक्स स्कूलों में बेसिक और और्थोडौक्स फेथ पढ़ाया जाता है. चीन गणराज्य में लोगों को औपचारिक धार्मिक शिक्षा देने पर रोक है लेकिन अनुमतिप्राप्त धर्मविज्ञान स्कूल, जो कालेज स्तर या ऊपर के हैं, वहां धर्म पढ़ाया जाता है. ये स्कूल सरकारी मदद प्राप्त हैं. ये स्कूल बहुत छोटे व सीमित छात्रों और छोटे बजट वाले हैं. वहां निर्धारित सत्र में निजी तौर पर

(घरों में) भी धार्मिक शिक्षा दी जाती है. धार्मिक अध्यापक सप्ताह या महीने के क्रम में आते हैं और वे निजी घरों में मेहमान के तौर पर ठहरते हैं.

धर्म के शिकंजे में शिक्षा

दुनियाभर में शिक्षा धर्म के शिकंजे में है. धार्मिक शिक्षा से समाज आगे नहीं, पीछे की ओर ही जा रहा है. दुनियाभर में अधिकतर समस्याओं की जड़ धार्मिक शिक्षा है. धार्मिक शिक्षा के चलते सामाजिक व राजनीतिक विद्वेष बढ़ रहा है. यह शिक्षा हमें एकदूसरे से भेदभाव सिखाती है, दूर ले जाती है, बैरवैमनस्य कराती है. कई देश घरेलू हिंसा की चपेट में हैं. वहां अंदरूनी धार्मिक, पंथिक, वर्गीय संघर्ष होते रहते हैं. इस से उन्हें आर्थिक व सामाजिक नुकसान झेलना पड़ रहा है.

धार्मिक शिक्षा समाज में प्रेम, शांति, अहिंसा, इंसानियत की गारंटी नहीं है तो फिर क्यों न ऐसी शिक्षा से दूर रहा जाए. इस शिक्षा से अगर किन्हीं को फायदा है तो वे हैं पंडेपुरोहित, पादरी, मुल्लामौलवी. यह छोटा सा वर्ग ही धार्मिक शिक्षा को कायम रखने में जुटा है. यह परजीवी वर्ग है. लिहाजा, धार्मिक शिक्षा और इसे चलाने वालों से दूर रहना ही बेहतर है.

 

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महिला किसानों के साथ भेदभाव क्यों?

भारत कृषि प्रधान देश है. यहां तकरीबन 65 फीसदी आबादी कृषि कार्यों में लगी है. देश के सभी राज्यों में किसानों की स्थिति काफी दयनीय है, जबकि किसान खेतों में रातदिन काम करते हैं. फिर चाहे सर्दियों की ठिठुरन भरी रात हो या मईजून की तपती धूप, हर मौसम में किसान कड़ी मेहनत करते हैं. देश के ज्यादातर हिस्सों में पुरुष किसानों के साथ ही महिलाएं भी बढ़चढ़ कर खेती के कामों में अपना योगदान दे रही हैं.

एक तरफ जहां पुरुष किसानों को खेतों में काम करने के बदले ज्यादा मजदूरी मिलती है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं को उन से काफी कम रुपयों में काम करना पड़ता है.

आज भी देश की महिला मजदूरों को अपनी मेहनत की वाजिब मजदूरी नहीं मिल पाती. आज 21वीं सदी में भी पुरुष और महिला में इतना बड़ा भेद है. इस के लिए हमारी पुरुषवादी सोच जिम्मेदार है. हम इस के आगे सोच नहीं पा रहे हैं.

आप देश के किसी कोने में खेतों में जा कर देखेंगे तो चाहे झुलसा देने वाली गरमी हो या फिर बदन को कंपकंपा देने वाली ठंड, हर मौसम में अपनी सेहत की परवाह किए बिना घंटों खेतों में काम करती औरतें मिल जाएंगी. देश की मौजूदा स्थिति यह है कि घरों के बाहर काम करने वाली तकरीबन 80 फीसदी महिलाएं खेतीबारी से जुड़े कामों में लगी हैं, इन सब के बावजूद जब भी किसानों की बात आती है, तो हम सब के जेहन

में जो तसवीर उभरती है, वह पुरुष किसानों की होती है. ऐसा नहीं है कि देश के कुछ राज्यों में ही यह स्थिति हो, सभी जगह ऐसा ही है. आप सब से ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश को देख लें, वहां भी महिला किसानों की यही दुर्दशा है.

इस के अलावा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, असम व ओडिशा आदि राज्यों में कमोबेश एकजैसे हालात हैं. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में सर्दियों के मौसम में महिलाएं गन्ने के खेतों में गन्ने की कटाई करने के लिए हंसिया या चापड़ हाथों में लिए देखी जा सकती हैं.

इस के अलावा धान की रोपाई, खेतों से खरपतवार निकालना, फसलों की कटाई और मड़ाई तक सभी काम महिलाएं आसानी से कर लेती हैं. देश के चुनिंदा इलाकों में हल से खेतों की जुताई करते हुए भी महिलाएं दिख जाएंगी. इतना सब होने के बाद भी उन के हक की वाजिब कीमत कोई देने को तैयार नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं का श्रम पुरुषों की तुलना में दोगुना है. इस के बावजूद महिलाओं को किसान का दर्जा देने में आज तक आनाकानी हो रही है, जबकि यह महिलाओं के हक की बात है.

मेहनत की बात करें तो महिलाएं घर के कामों के साथसाथ खेतों की भी जिम्मेदारी संभालती हैं. इतना ही नहीं, वे अपने दुधमुंहे बच्चे को खेतों में ले जा कर काम करती हैं, साथ ही अपने बच्चों का भी खयाल रखती हैं.

महिला किसानों का यह श्रम यहीं खत्म नहीं होता है, वे पशुपालन का काम भी करती हैं. कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहां किसानों की हालत दयनीय है और यदि बात महिला किसानों की करें तो उन की हालत पुरुष किसानों से भी बदतर है.

देश में 60 से 80 फीसदी महिलाएं खेती के काम में लगी रहती हैं. अगर जमीन के मालिकाना हक की बात करें तो सिर्फ 13 फीसदी महिलाओं के पास ही हक है. महिलाओं को जब मर्दों के समान काम करने के बावजूद बराबर का मेहनताना नहीं मिल पाता, तो इस हालत में उन को मालिकाना हक देने की बात दूर की कौड़ी है. जब तक समाज में महिलाओं को ले कर लोगों का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक उन्हें उन का हक नहीं मिल पाएगा.

अगर समाज को प्रगतिशील बनाना है तो महिलाओं को प्रोत्साहित करना होगा. इस के लिए हमें सोच बदलनी पड़ेगी. जब सोच बदलेगी तो समानता आ ही जाएगी.

घटती खेती बढ़ता कर्ज

हमारे देश में किसानों को अन्नदाता व देश की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन यह सच नहीं है. फिर भी आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा खेतीकिसानी से जुड़ा है.

किसानों को राहत व खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारों ने बहुत सी स्कीमें चलाईं व उन में पानी की तरह पैसा बहाया. खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्यों में मंत्रालय, महकमे, बहुत से रिसर्च सैंटर, कृषि विश्वविद्यालय व निगम आदि चल रहे हैं. इन के जरीए खर्च करने के लिए भारीभरकम बजट और अफसरों व मुलाजिमों की फौज है. इस के बावजूद हैरत की बात तो यह है कि देश में खेती का कुल रकबा, खास फसलों की पैदावार व औसत उपज लगातार घट रही है. आखिरकार यह कैसी तरक्की है

कहां है तरक्की

इश्तिहारों में तरक्की के ढोल पीटे जाते हैं. ओहदेदार अपनी पीठ ठोंक कर गाल बजाते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के अधीन किसान कल्याण मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट असल हालात का खुलासा करती है. साल 2016-17 के सरकारी आंकड़े हमें चौंकाते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 से 2017 के दौरान बीते 3 सालों में धान का रकबा 7 लाख, 48 हजार हेक्टेयर, गेहूं का रकबा 2 लाख, 46 हजार हेक्टेयर, दलहन का रकबा 57 हजार हेक्टेयर व तिलहन का 19 लाख 16 हजार हेक्टेयर कम हुआ है. आबादी व मांग में इजाफे के बावजूद यह गिरावट ठीक नहीं है.

बीते 3 सालों में मुख्य फसलों का रकबा घटने के अलावा कुल पैदावार भी गिरी है. धान की पैदावार में 233 लाख टन, गेहूं की पैदावार में 235 लाख टन, दलहन की पैदावार में 322 लाख टन व तिलहन की पैदावार में 744 लाख टन की कमी आई है.

हालांकि कम जमीन में ज्यादा पैदावार लेने की गरज से खेती महकमे किसानों को प्रति हेक्टेयर औसत उपज बढ़ाने की सलाह व सहूलियतें देते हैं, लेकिन अपने देश में ये सारी कोशिशें बेअसर साबित हो रही हैं.

राज करने वाले नेताअफसर रकबे, पैदावार व उपज की घटत से बेपरवाह, बेखबर व बेफिक्र दिखते हैं. खेती का रकबा घटने की अहम वजह यह है कि ज्यादातर किसानों के बच्चे खेती में दिलचस्पी नहीं लेते हैं. वे किसानी के काम से अपना मुंह मोड़ कर शहरों का रुख कर रहे हैं. दरअसल, उन्हें रोजगार के दूसरे जरीए में ज्यादा गुंजाइश नजर आती है.

खेती में लगातार घाटा

मखदूमपुर, मेरठ में बसे किसान परिवार के राजेश कुमार ने इस बारे में खुलासा किया कि लगातार बढ़ती लागत व सही दाम न मिलने से खेती अब घाटे का सौदा बन गई है. गुजारा करना भी अब टेढ़ी खीर है. लिहाजा माली मुश्किलों का सामना करने के लिए अब खेती के दायरे से बाहर निकल कर दूसरा काम करना जरूरी हो गया है.

जाहिर है कि खेती में कारगर बदलाव व सुधार करने जरूरी हैं. उधर शहरों का दायरा बहुत तेजी से बढ़ रहा है. कारखानों, सड़कों, पुलों व रेल लाइनों वगैरह में खेती की भी काफी जमीनें जा रही हैं, लिहाजा खेती का रकबा व उत्पादन लगातार घट रहा है.

इस मसले से निबटने के लिए अमीर मुल्कों की तरह अपने देश में भी प्रति हेक्टेयर औसत उपज बढ़ा कर कम जमीन में ज्यादा उपज लेना जरूरी हो गया है.

खेती के महकमों के ज्यादातर मुलाजिम भ्रष्ट, निकम्मे व जनता पर बोझ हैं. मोटा वेतन लेने के बावजूद वे अपना फर्ज पूरा नहीं करते और अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते हैं. लिहाजा ज्यादातर किसानों को सरकारी स्कीमों का पता नहीं चलता. खासकर छोटे किसानों को उन के फायदे की बहुत सी जरूरी बातों की कानोंकान खबर तक नहीं होती.

बेहिसाब मुश्किलें

अकसर किसानों को बाजार में उन की उपज की वाजिब कीमत वक्त पर नहीं मिलती. इस के अलावा उन्हें पूरी सहूलियतें भी मयस्सर नहीं होतीं. रिसर्च सैंटरों से निकले नई किस्मों के बीज, नई खोजबीन व तकनीक आदि की पूरी जानकारी भी उन्हें नहीं हो पाती. नतीजतन, प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ने की जगह कम हो रही .

बीते 3 सालों में धान की औसत उपज प्रति हेक्टेयर 12 किलोग्राम, गेहूं की 52 किलोग्राम, दलहन की 112 किलोग्राम व तिलहन की 200 किलोग्राम कम हुई है.

किसानों के लिए सब से ज्यादा तकलीफदेह बात यह है कि खेती में प्रति हेक्टेयर लागत में लगातार इजाफा हो रहा है. कई बार हालात इतने ज्यादा खराब हो जाते हैं कि खेती में मुनाफा मिलना तो दूर फसल की लागत निकालना भी नामुमकिन होता है. नतीजतन, किसानों को जिंदा रहने, खाने व फसल उगाने आदि के लिए भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है और उन्हें अकसर कर्ज के जंजाल में फंस कर खुदकुशी करने पर मजबूर होना पड़ता है.

किसानों की दिक्कतें कम होने का नाम ही नहीं लेतीं. उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती. उन के गाढ़े पसीने से उपजी फसल अकसर मिट्टी के मोल चली जाती है. चीनी मिलों के मालिक हर साल गन्ना किसानों के करोड़ोंअरबों रुपए दबा कर बैठ जाते हैं. ऐसे में किसानों को समझ ही नहीं आता कि वे कहां जाएं किस से गुहार करें

जब किसानों को अपनी मेहनत की कमाई बरबाद होती हुई दिखती है तो वे सरकार से खफा हो कर सड़कों पर उतर जाते हैं. मजबूर हो कर धरनाप्रदर्शन करते हैं, लेकिन उस के बदले में लाठियां, गोलियां व कोरे वादों के अलावा कुछ नहीं मिलता.

कर्ज का जाल

किसानों को कर्ज देने वालों की कमी नहीं है, क्योंकि बहुत सारी सरकारी, सहकारी व गैरसरकारी एजेंसियां काम कर रही हैं. इस के अलावा किसान क्रेडिट कार्ड की स्कीम भी चल रही है, लेकिन गड़बड़ी खूब होती है. दरअसल, 60 करोड़ किसान सूदखोरों के लिए बहुत मोटी कमाई का जरीया हैं. देश में 5 लाख से भी ज्यादा सहकारी समितियां हैं. इन के अलावा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भूमि विकास बैंक व कामर्शियल बैंक शाखाओं की भी भरमार है.

ज्यादातर किसान कम पढ़ेलिखे हैं. उन में जागरूकता नहीं है. सरकारी संस्थाओं से कर्ज लेने के लिए दस्तावेजों की खानापूरी कर पाना आसान व हर किसी के बस की बात नहीं होती. लिहाजा ज्यादातर छोटे व गरीब किसान आज भी सेठसाहूकारों व महाजनों से मोटे ब्याज पर कर्ज लेने को मजबूर होते हैं. कर्ज के जाल में फंस कर वे उस से फिर उबर नहीं पाते.

उत्तर प्रदेश में हर न्याय पंचायत में खेती के लिए कर्ज देने वाली 8 हजार कोआपरेटिव सोसायटी व जिलों में 55 सहकारी बैंक चल रहे हैं, लेकिन ज्यादातर पर अगड़ों का कब्जा है. इन में साल दर साल पुराना कर्ज नया करने का गोरखधंधा होता है. घपलेबाजी का हाल यह है अब बहुत से समझदार किसान इन से बच कर दूर भागते हैं.

इस के बावजूद किसानों को दिए जाने वाले कुल कर्ज की रकम साल दर साल बढ़ रही है. भारत सरकार ने साल 2015-16 में साढ़े 8 लाख करोड़ रुपए के कर्ज किसानों को देने का लक्ष्य तय किया था, लेकिन इस से ज्यादा यानी 8 लाख, 77 हजार, 527 करोड़ रुपए कर्ज दिया गया.

इसी दौरान किसानों की साझा जिम्मेदारी वाले 18,23,507 ग्रुपों को अरबों रुपए के कर्ज दिए गए. साल 2016-17 में किसानों को दिए जाने वाले कर्ज की रकम में इजाफा होगा व तकरीबन 9 लाख करोड़ रुपए के कर्ज दिए जाएंगे.

हालांकि किसानों को राहत पहुंचाने के नाम पर अकसर कर्जमाफी व उन की आमदनी दोगुनी करने का ऐलान किया जाता है, लेकिन ये सिर्फ शिगूफे व ललचाऊ जुमले साबित हुए हैं. यदि कर्ज माफ करने से ही किसानों के मसले सुलझ जाते, तो देश आजाद होने के 70 सालों बाद आज सारे किसान अमीर व खुशहाल होते. खेती के मौजूदा हालात तरक्की की निशानी नहीं है.

कुल मिला कर देखें तो किसानों के मसले सुलझाने के सवाल बेहद अहम हैं. खेती के रकबे, पैदावार व प्रति हेक्टेयर औसत उपज में लगातार घटत व किसानों को दिए जाने वाले कर्ज की रकम में बढ़त का सिलसिला आगे भी यही बना रहने की उम्मीद है. आखिर यह अजीबोगरीब रुख किसानों को आगे कहां ले जाएगा

खाली हाथ किसान

भारत गांवों का देश है और उस का आधार स्तंभ खेती है. खेती की तरक्की के बिना देश की तरक्की मुमकिन नहीं है. यह कड़वा सच है कि स्वतंत्र भारत के 7 दशक बीत जाने के बाद भी देश में ऐसी कोई भी दीर्घकालीन योजना सामने नहीं आई है जो अन्नदाता के लिए खुशहाली की गारंटी हो.

नए भारत के सुनहरे सपनों में अन्नदाता कहीं नजर नहीं आता, वह बदहाल है और अब नाउम्मीद भी हो चला है. मोदी सरकार के इस कार्यकाल का आखिरी बजट भी किसानों की उम्मीदों को लहूलुहान करने वाला रहा. कहने को तो कृषि क्षेत्र के लिए बजट घोषणा में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है जो कुल बजट वृद्धि के बराबर है, लेकिन उस में कर्जमाफी नदारद है.

वैसे, किसानों को बजट में बढ़ोतरी का लाभ कैसे और किस प्रकार मिलेगा, यह भी बड़ा सवाल है.

किसानों को उन की उपज की लागत का ड़ेढ गुना दाम दिलाने का ऐलान तो किया गया है, पर लागत की गणना का फार्मूला नहीं बदला गया है. इस समय कृषि विकास की दर निम्नतम स्थिति और केंद्र सरकार की नीतियां खेतीकिसानी के लिए संकट पैदा करने वाली हैं. खेती को मुनाफे की राह पर ले जाने वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा अब बेदम हो गया है.

इस साल कृषि पर कर्ज 10 फीसदी देने का ऐलान किया गया है और किसानों की आय को दोगुना करने की बात की जा रही है. कड़ी मेहनत से अच्छी फसल पैदा करने वाला किसान मार्केटिंग के मोरचे पर लाचार है.

खरीफ फसल में न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना ज्यादा देने का वादा किया गया है. यह फसल अक्तूबर माह तक आएगी और उस के ठीक बाद लोकसभा चुनाव है. जाहिर है, इस में किसानों के हितों की चिंता कम लोकलुभावन झांसा देने की कोशिश ज्यादा नजर आती है.

कृषि विकास के बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने की कोई फौरी योजना नहीं है, जबकि राहत की उम्मीदें साल 2022 के सपनों में हैं. पानी, बिजली, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और अच्छी क्वालिटी वाले बीजों की उपलब्धता के बिना किसानों की आय दोगुनी कैसे होगी, इस का किसी को पता नहीं, लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि जब हम  साल 2022 में स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ मना रहे होंगे, तब हमारे किसानों की आय दोगुनी होनी चाहिए.

भारत के गांवों में एक कहावत प्रचलित है कि किसान कर्ज में ही जन्म लेता है और कर्ज चुकातेचुकाते ही मर जाता है. जाहिर है, सपने आसमान पर हैं, लेकिन हकीकत में किसान जमीन के नीचे दबता चला जा रहा है.

किसान क्रेडिट कार्ड मछुआरों और पशुपालकों को देने की घोषणा तो की गई है, लेकिन बिना पुख्ता इंतजाम किए किसानों की क्रेडिट बढ़ेगी कैसे, यह सवाल मुंहबाएं खड़ा है. वहीं दूसरी ओर तमाम दावों के बीच देश का किसान ‘न्यू इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘समर्थ भारत’ के बीच पिस रहा है.

भारत की आधी आबादी की जीवनरेखा खेती है, जो देश के कुल कार्यबल का 48.9 फीसदी है. सपनों के ‘न्यू इंडिया’ और सचाई के भारत के बीच यह किसान खड़ा है, जो देश के कुल कार्यबल के 55 फीसदी का योगदान देने वाली खेती के दम पर जीता है.

बाजार के उछाल और ठहराव के लिए सरकारें ज्यादा संजीदा रही हैं, लेकिन पैदावार में आई तेजी के बाद कीमतों के धड़ाम से गिरने को ले कर किसानों के लिए अब तक कोई ठोस योजना नहीं बन पाई है.

भारत के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह कहते हैं कि खेती और किसानों के हित में सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं. फसल बीमा योजना और राष्ट्रीय कृषि बाजार के दम पर फसलों की वाजिब कीमत मिलने के साथ ही किसानों को साल 2022 तक दोगुनी आमदनी हासिल करने का लक्ष्य तय किया गया है और इसीलिए देश में 14 अप्रैल, 2016 को राष्ट्रीय कृषि बाजार की शुरुआत की गई थी.

यह इंटरनैट आधारित पोर्टल है. इस पोर्टल पर किसानों को फसलों के भंडारण, सुरक्षा की तमाम सुविधाएं और माली मुद्दे के दावे किए गए हैं, लेकिन सचाई इस के उलट है.

महाराष्ट्र राज्य में भी फलसब्जियों की वाजिब कीमत न मिलने से नाराज किसानों ने सड़क पर उन्हें फेंक दिया. यहां तक कि सड़कों पर दूध भी बहाया गया, वहीं छत्तीसगढ़ में टमाटर की बंपर पैदावार के बाद कोई खरीदार नहीं मिला और महज 50 पैसे प्रति किलोग्राम टमाटर मिलने से नाराज किसानों ने सैकड़ों टन टमाटर सड़कों पर फेंक दिया. तेलंगाना के किसानों ने भी मिर्च की फसल को जला डाला.

दरअसल, तेलंगाना में साल 2010 में मिर्च का भाव प्रति क्विंटल 12,000 रुपए मिल रहा था, जो साल 2017 में घट कर प्रति क्विंटल 2000 रुपए तक पहुंच गया. ऐसा मिर्च की अच्छी फसल हो जाने से हुआ.

साल 2016 में प्रधानमंत्री फसल योजना को लागू किया गया और यह बताया गया कि यह कम प्रीमियम पर किसानों के लिए मुहैया है. इसी तरह परंपरागत कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, ब्याज रियायत योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन जैसी योजनाओं के सहारे किसानों को राहत देने के दावे अब हांफते नजर आ रहे हैं.

साल 2022 तक सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने की बात कह रही है. इस के लिए जरूरी है कि अगले 5 साल तक खेती की सालाना वृद्धि दर 14 फीसदी हो. जो इस समय अच्छे मानसून के बाद भी मुश्किल से 4.1 फीसदी पर पहुंच सकी है. नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में है और इस का असर किसानों पर भी देखने को मिला.

साल 2014 में इस सरकार ने अपने पहले बजट में सब से ज्यादा प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में कृषि को शामिल कर इस से होने वाली आमदनी को दोगुना करने की बात कही थी. लेकिन किसानों की समस्याएं बदस्तूर जारी हैं.

सरकार ग्रामीण कृषि विकास को कारपोरेट की तर्ज पर बढ़ावा देने का दावा करती है, जिस से आम किसान कदमताल मिलाने को ले कर आशंकित है.

जाहिर है, सरकार की योजनाओं में ग्रामोदय से भारत उदय के बीच में कहीं वैश्विक संस्कृति है, जिस में कल्पना का एक छोर भले ही देश के किसानों के हाथों में हो, लेकिन दूसरा छोर खुले बाजार की पूंजीवादी दुनिया में खत्म होता है.

परंपरागत खेती को कृषि उपकरणों से जोड़ कर किसानों के फायदे की बात कही जाती रही है. भारत के 38 फीसदी बड़े किसान, 18 फीसदी मझले किसान और महज 1 फीसदी सीमांत या छोटे किसान कृषि मशीनरी या ट्रैक्टर का इस्तेमाल करते हैं.

खेती के काम में बेहतर उपकरणों के इस्तेमाल से न केवल कड़ी मेहनत से बचा जा सकता है, बल्कि मेहनत की लागत कम कर के फसलों का बचत मूल्य बढ़ाया जा सकता है.

देश में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसानों को बड़े पैमाने पर कृषि उपकरण और ट्रेनिंग दिए जाने की जरूरत है. साथ ही, फसल लोन देने पर तो सरकार सोचती है, लेकिन कृषि औजार खरीदना बेहद महंगा होता जा रहा है. बैंक भी ट्रैक्टरों जैसी लंबी अवधि पर जरूरत के हिसाब से 12 फीसदी ब्याज वसूलते हैं.

देश में ‘राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन’ भारतीय खेती को पर्यावरण में हुए बदलाव से होने वाले नुकसान और बुरे असर से बचाने के लिए काम कर रहा है. यह मिशन जैविक खेती और फसलों की नई किस्मों, खासतौर से ताप प्रतिरोधक कूवत वाली फसलों को खोजना और वैकल्पिक खेती को बढ़ावा देने का काम कर रहा है.

पिछले 18 सालों में हर दिन 2052 किसान रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं. इस की खास वजह खेती की लागत बढ़ने और फसलों के नुकसान से डरना है. वहीं भारत में अमूमन हर आधा घंटे में एक किसान अपनी जान देता है. किसानों की बेहतर स्थिति को ले कर कोई भी राज्य आश्वस्त नजर नहीं आता.

भारत की कुल अधिकतम सिंचाई कूवत 140 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर है. इसे बढ़ाने के लिए देश की नदियों को जोड़ना होगा, पहाड़ी इलाकों में बरसात के पानी को जमा करने के लिए तालाब बनाने और गांवों में ज्यादा से ज्यादा पोखर बनाने पर जोर देना होगा.

बड़े लैवल पर आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन बनाए रखने को ले कर कोई ठोस योजना ही नहीं है. फसल कटाई के तुरंत बाद कीमतें तेजी से गिर जाती हैं, ऐसे में निराश किसान खुदकुशी जैसे कदम उठाने को मजबूर है.

देश में आपूर्ति का समुचित इंतजाम और भंडारण के साथ ही उत्पादन व खपत के क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाले परिवहन की सुविधा की कमी हमेशा देखी गई है. वहीं दूसरी ओर फूड प्रोसेसिंग के जरीए भी उपज को लंबे समय तक खराब होने से बचाया जा सकता है. लेकिन जरूरी संसाधन जुटाने का जिम्मा जिन का है, वे किसानों की समस्याओं को तत्कालीन राहत देने के नाम पर योजनाओं की आड़ ले लेते हैं. इस तरह से देशभर के किसानों की हालत और भी बुरी होती जा रही है.

स्वतंत्र भारत में किसान कल्याण के लिए हरित क्रांति संजीवनी की तरह थी, जिस ने उन की जिंदगी को मजबूत बनाया. इस के बावजूद देश में कर्जमाफी के लोकलुभावन नारे तो दिए गए, लेकिन खेती कैसे फायदे का धंधा बने, इस की कोई पुख्ता नीति नहीं बनाई गई.

यदि बीजों की उन्नत प्रजातियां, मिट्टी की जांच और जैविक खादों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया होता तो खेती में इतनी दिक्कतें न आतीं. साथ ही, परिवहन, भंडारण और दूरसंचार की सुविधाओं की कमी, जमीन की कमी, माहिरों की कमी, राजनीतिक दांवपेंचों का खतरा और माली मदद की कमी कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन्होंने खेती को निरंतर प्रभावित किया है.

दरअसल, किसानों की आमदनी भी न के बराबर है और इस के सुधार के अल्पकालीन तरीके जानलेवा साबित हो रहे हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य को ले कर अभी भी नीति साफ नहीं है. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें जस की तस लागू होने से अन्नदाता को राहत मिल सकती थी, लेकिन वह महज चुनावी जुमला बन कर रह गया है.

डा. ब्रह्मदीप अलूने

असिटैंट प्रोफेसर, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन

 

टाइगर श्रौफ में यह कैसा बदलाव

क्या टाइगर श्रौफ अपने आपको सुपर स्टार समझने लगे हैं कि अब उन्हे अपने प्रशंसकों को धोखा देने में भी कोई हिचक नहीं हो रही है? जी हां, इस तरह के सवाल टाइगर श्रौफ के तमाम प्रशंसक उनसे पूछ रहे हैं. वास्तव में जब फिल्म ‘‘बागी 2’’ की शुरूआत हुई थी, उसी वक्त टाइगर श्रौफ एक प्रोडक्ट को इंडोर्स कर रहे थे.

उस प्रोडक्ट का निर्माण करने वाली कंपनी ने फेसबुक के माध्यम से एक प्रतियोगिता की घोषणा की थी और विजेताओं को टाइगर श्रौफ के साथ दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर घुमाने ले जाने का वादा किया था. इस कंपनी ने फेसबुक पर यह भी लिखा था कि प्रशंसक यह भी बता सकते हैं कि वह केप टाउन शहर में क्या क्या करना चाहेंगे, उनकी वह इच्छाएं भी पूरी होंगी.

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सूत्र बताते हैं कि टाइगर श्रौफ के तमाम प्रशंसकों ने बढ़चढ़कर इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. लेकिन अब टाइगर श्रौफ ने केप टाउन जाने से मना कर दिया है. सूत्रों की माने तो अंडरविअर बनाने वाली कंपनी ने एक वर्ष पहले टाइगर श्रौफ की सहमति लेकर यह प्रतियोगिता शुरू की थी. सूत्र यह भी बताते हैं कि जनवरी 2018 में जब आयोजकों ने टाइगर श्रौफ से बात की, तब भी टाइगर श्रौफ केप टाउन जाने को तैयार थे और उस वक्त उनका मकसद केपटाउन में अपनी फिल्म ‘‘बागी 2’’ को प्रमोट करना भी था.

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मगर सूत्रों का दावा है कि जब मार्च के पहले सप्ताह में आयोजकों ने टाइगर श्रौफ से मिलकर केप टाउन जाने की तारीख तय करनी चाही,तो टाइगर श्रौफ ने शर्त रखी कि उनके साथ छह लोगों की टीम भी जाएगी, जिसका सारा खर्च आयोजक उठाएं. आयोजकों ने टाइगर श्रौफ के साथ एक व्यक्ति को ले जाने की टिकट व अन्य खर्च देने को तैयार थे. मगर टाइगर श्रौफ ने कह दिया कि जब तक आयोजक उन्हें छह लोगों की टीम का खर्च नहीं उठाएगी, तब तक वह केप टाउन नहीं जाएंगे. अंततः अब कंपनी ने फेसबुक पर लिखा है – ‘‘विजेता केप टाउन जाएंगे, लेकिन टाइगर श्रौफ के साथ मेल मिलाप मुंबई में ही होगा.’’

पर इससे टाइगर श्रौफ के प्रशंसक जरुर निराश हुए हैं.

क्या सच में 5 दिनों के लिये बंद हो रहे हैं बैक, पढ़ें पूरी खबर

क्या आपको भी बैंक में कुछ जरूरी काम है? क्या आपको भी डीडी बनवाना है या बैंक अकाउंट खुलवाना है, तो आपको बता दें कि अगले हफ्ते बैंक के काम करवाने में आपको कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पहले कहा जा रहा था कि बैंक 29 मार्च से 2 अप्रैल तक लगातार पांच दिन के लिए बंद रहेंगे. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इससे संबंधित पोस्ट किए और लोगों को चेतावनी दी कि अगर उन्हें बैंक से जुड़ा कोई काम करना है तो जल्दी कर लें. अगर आप भी इस तरह की खबरों पर विश्वास कर रहे हैं तो आपको बता दें कि बैंक लगातार पांच दिनों के लिए बंद नहीं होंगे. इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी गई है.

29 मार्च को महावीर जयंती है, इसलिए बैंक बंद रहेंगे. 30 मार्च को गुड फ्राइडे है, इसलिए बैंकों की छुट्टी रहेगी, लेकिन 30 मार्च को महीने का पांचवां शनिवार पड़ रहा है, इसलिए बैंक बंद नहीं रहेंगे. वहीं 1 अप्रैल को रविवार है और दो अप्रैल को 2 अप्रैल को वार्षिक लेखाबंदी के लिए बैंक बंद रहेंगे.

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औल इंडिया बैंक औफिसर्स कन्फेडरेशन के महासचिव डी थौमस फ्रांको राजेंद्र देव ने इस बात की जानकारी दी. उन्होंने कहा, ‘बैंकों में 31 मार्च (शनिवार) को कामकाज होगा और सोशल मीडिया में जारी संदेशों के अनुसार कोई लगातार छुट्टियां नहीं हैं.’ सोशल मीडिया पर यह खबर छाई हुई है कि 31 मार्च को भी शनिवार होने के कारण बैंक की छुट्टी होगी, लेकिन अब इस बात का आधिकारिक तौर पर खंडन कर दिया गया है.

देव ने जानकारी दी है कि बैंक गुरुवार (29 मार्च) को महावीर जयंती, शुक्रवार (30 मार्च) गुड फ्राइडे के कारण बंद रहेंगे, लेकिन 31 मार्च को खुलेंगे. उन्होंने कहा, ‘बैंक केवल महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं. वहीं 2 अप्रैल को वार्षिक लेखाबंदी के कारण बैंक बंद रहेंगे.’ इसके अलावा एटीएम में कैश की कमी होने का सवाल है तो आपको बता दें कि बहुत से बैंकों ने अब एटीएम में कैश डालने की जिम्मेदारी थर्ड पार्टी को सौंप दी है.

इसलिए, अब एटीएम में कैश होने की जिम्मेदारी बैंक की नहीं है, बैंक भले ही लगातार पांच दिन बंद नहीं रहेंगे, लेकिन फिर भी अगर आप बैंक से संबंधित कोई काम करने की योजना बना रहे हैं तो आप उसे जल्दी निपटा लीजिएगा, क्योंकि जाहिर सी बात है कि शनिवार (31 मार्च) के दिन बैंक में काफी भीड़ रहेगी, ऐसे में आपका काम लेट भी हो सकता है.

बौल टैंपरिंग विवाद : डेविड वार्नर को हटाने के मूड में नहीं है हैदराबाद

इंडियन प्रीमियर लीग में डेविड वार्नर की भागीदारी को लेकर चल रहे संशय पर सनराइजर्स हैदराबाद के मेंटर वीवीएस लक्ष्मण का कहना कि फ्रेंचाइजी क्रिकेट औस्ट्रेलिया के इस खिलाड़ी पर फैसले का इंतजार करेगी जो गेंद छेड़छाड़ विवाद में फंसा हुआ है. स्टीव स्मिथ और वार्नर केपटाउन में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तीसरे टेस्ट के तीसरे दिन गेंद छेड़छाड़ में शामिल होने के कारण औस्ट्रेलिया के बाकी बचे दिनों के लिए क्रमश: कप्तानी और उप कप्तानी से हट गये थे.

लक्ष्मण ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘केपटाउन टेस्ट में जो हुआ वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. जहां तक सनराइजर्स का संबंध है तो इस पर टिप्पणी करना बहुत जल्दबाजी होगी. क्योंकि यह सबकुछ परसों ही हुआ है. हम इसपर औस्ट्रेलिया के फैसले का इंतजार करेंगे.’’

गेंद से छेड़छाड़ पर कड़ी आलोचनायें झेल रहे स्मिथ ने आज राजस्थान रायल्स की कप्तानी छोड़ दी और वार्नर के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है. वार्नर के खिलाफ किसी तरह की कड़ी कार्रवाई के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि सनराइजर्स हैदराबाद इस समय इस बारे में नहीं सोच रही है. लक्ष्मण ने कहा, ‘‘ अभी जो सूचना उपलब्ध है, वह काफी सीमित है. इसलिए हमें और सूचना का इंतजार करना होगा. अगर जरूरत पड़ी तो हम इसके बारे में चर्चा करेंगे. जहां तक वार्नर का संबंध हैं तो वह सनराइजर्स टीम के लिए बेहतरीन नेतृत्वकर्ता रहे हैं.’’

वहीं औस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीवन स्मिथ ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की टीम राजस्थान रायल्स की कप्तानी से हटने का फैसला कर लिया स्मिथ के इस फैसले को बाद फ्रेंचाइजी ने अंजिक्य रहाणे को टीम का कप्तान बनाया है. फ्रेंचाइजी ने सोमवार को एक बयान जारी कर इस बात की जानकारी दी.

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फ्रेंचाइजी द्वारा जारी किए गए बयान में टीम के हेड औफ क्रिकेट जुबीन भरूचा ने कहा, “हम स्मिथ से लगातार संपर्क बनाए हुए हैं. स्मिथ का मानना है कि मौजूदा परिस्थति में राजस्थान रायल्स के लिए सही यही होगा की वह कप्तानी छोड़ दें ताकि टीम बिना किसी परेशानी के आईपीएल की तैयारी शुरू कर सके. उन्होंने बीसीसीआई के अधिकारियों और अपने प्रशंसकों का उनका समर्थन करने के लिए शुक्रिया अदा किया है.”

यह है पूरा मामला

दक्षिण अफ्रीका और औस्ट्रेलिया के बीच केपटाउन में तीसरे टेस्ट मैच के तीसरे दिन जब अफ्रीकी पारी का 43वां ओवर चल रहा था और मार्करम व एबी डिविलियर्स खेल रहे थे, उसी समय औस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बेनक्रौफ्ट एक चिप जैसी चीज के साथ कैमरे पर पकड़े गए. कहा गया कि ये गेंद की चमक उड़ाने वाली चिप है. इसे उन्होंने गेंद पर घिसा. हालांकि मैदानी अंपायरों ने इस बारे में उनसे बातचीत की. अंपायरों के पास जाने से पहले बैनक्राफ्ट को अपने अंत:वस्त्र में छोटी सी पीली चीज रखते हुए देखा गया. जब अंपायर उनसे बात करने के लिये पहुंचे तो उन्होंने पैंट की जेब में हाथ डालकर दिखाया और यह भिन्न वस्तु थे. वह धूप के चश्मे को साफ करने के लिये मुलायम कपड़े जैसा लग रहा था.

इसके बाद कप्तान स्टीव स्मिथ और बेनक्राफ्ट ने इस पूरे मामले में अपनी गलती मान ली. तीसरे दिन का जब खेल खत्म हुआ तो उसके बाद प्रेस कौन्फ्रेंस में औस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ ने इस बात को स्वीकार कर लिया. वहीं बैनक्राफ्ट ने स्वीकार किया कि वह टेप से गेंद की शक्ल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे. औस्‍ट्रेलिया सरकार ने औस्‍ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड को स्टीव स्मिथ को कप्तानी से हटाने का आदेश दिया. औस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मेल्कोन टर्नबुल ने इस पूरी घटना को शर्मनाक बताया. उन्होंने कहा ये भरोसा करना मुश्किल है, कि औस्ट्रेलियाई टीम ने ये कृत्य किया.

इसके बाद लगातार हो रही आलोचनाओं के बाद स्टीव स्मिथ ने टीम की कप्तानी और  डेविड वार्नर ने तीसरे टेस्ट के लिए उपकप्तानी छोड़ दी. तब क्रिकेट औस्ट्रेलिया के सीईओ जेम्स सदरलैंड ने कहा, “हमने स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर से इस पूरे मामले पर बातचीत की. दोनों इस टेस्ट के लिए अपने अपने पद छोड़ने को तैयार हो गए. हालांकि अभी ये सिर्फ तीसरे टेस्ट के लिए है. मैच की अंतरिम जांच क्रिकेट आस्ट्रेलिया भी कर रहा है. तीसरे मैच के बाद इस पूरे मामले पर फैसला होगा.”

आईसीसी ने ये दी सजा

इस मामले में सजा का ऐलान करते हुए स्टीव स्मिथ पर एक मैच का प्रतिबंध लगा दिया. इसके अलावा उनकी 100 फीसदी मैच फीस का जुर्माना लगाया गया. बौल टैंपरिंग करने वाले बेनक्रौफ्ट को आईसीसी कोड औफ कंडक्ट के तहत लेवल 2 का दोषी माना गया. इसके लिए उनके खाते में 3 डिमेरिट प्वाइंट जोड़ दिए गए. ये प्वाइंट एक साल तक मान्य रहते हैं. इसके अलावा बेनक्राफ्ट पर 75 फीसदी मैच फीस का जुर्माना भी लगाया गया.

गौरतलब है कि पूरे क्रिकेट जगत में इस घटना की कड़ी निंदा की जा रही है. सारी टीम के दिग्गज खिलाड़ी एक स्वर में इस कांड की आलोचना कर रहे है इसमें औस्ट्रेलिया के भी पूर्व दिग्गज क्रिकेटर्स शामिल हैं.

नया सिम लेते समय रखें इन बातों का ध्यान, होगा फायदा

आज के समय में ड्यूल और ट्रिपल सिम स्मार्टफोन बाजार में उपलब्ध हैं. इसी के साथ हर टेलिकौम कंपनी के अपने-अपने खास प्लान भी मौजूद हैं. ऐसे में एक से ज्यादा सिम होना अब आम हो गया है. लेकिन नई सिम लेने से पहले कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखना जरुरी है. ध्यान ना रखने पर कई बार हमें परेशानियों से भी जूझना पड़ता है. सिम लेने के बाद किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े इसके लिए इन बातों का ख्याल जरूर रखें.

सिम डौक्यूइमेंट पर पर्पज लिखकर करें साइन : सिम खरीदते समय आईडी और एड्रेस प्रूफ की फोटोकौपी दुकानदार या एजेंट को ऐसे ही न दें, बल्कि उस पर (केवल सिम खरीदने के लिए) लिखकर नीचे साइन कर दें. इससे आपके दस्तावेज का कभी भी मिसयूज नहीं हो पाएगा. क्योंकि उसकी दूसरी फोटोकौपी कराके कोई उस पर दूसरा सिम नहीं ले पाएगा.

ना लें सिम कार्ड का खुला पैकेट : अगर सिमकार्ड का पैकेट पहले से खुला हो, तो ऐसा सिम कभी न खरीदें, क्योंकि ऐसा सिम पहले से एक्टीवेट किया हुआ हो सकता है. हमेशा अपने सामने ही सील्ड पैक खुलवाकर सिम खरीदें.

बिना वेरिफिकेशन के ना लें सिम : अगर दुकानदार या एजेंट कह रहा हो कि आप वो सिम तुरंत ही यूज कर पाएंगे यानि कि आपको वेरीफिकेशन के लिए कस्टमर केयर को कौल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. तो जान लीजिए कि कुछ न कुछ गड़बड़ है और सिम पहले से किसी और के नाम पर एक्टीवेट किया हुआ है.

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फोटो पर करें क्रौस साइन : सिम खरीदने के लिए दिए गए दस्तावेज के अलावा अपनी फोटो पर भी परमानेंट मार्कर से साइन कर दें, वर्ना आपके दस्तावेज का रीयूज या कहें कि मिसयूज होने की पूरी संभावना रहेगी.

ओरिजिनल डाक्यूमेंट्स छोड़कर ना जाएं : सिम खरीदने के लिए अपने ओरिजिनल दस्तावेज की फोटोकौपी कराते समय कोई भी कौपी दुकान पर मत छोड़ें. कई बार कोई फोटोकौपी साफ या अच्छी न आने पर लोग उसे वहीं छोड़कर चले जाते हैं. ऐसा न करें वर्ना कोई और उसका मिसयूज कर सकता है.

सिर्फ एक बार दें थम्ब इम्प्रैशन : आजकल जियो के अलावा कई मोबाइल कंपनियों के सिम बायोमेट्रिक्स स्कैन के बाद ही मिलते हैं. ऐसा करते समय बार बार थंब इंप्रेशन न दें. थंब इंप्रेशन का प्रोसेस सिर्फ एक बार किया जाता है.

बायोमेट्रिक्स डिटेल्स देते समय रखें ध्यान : पिछले कुछ दिनों में ऐसे केस भी पुलिस के पास आ चुके हैं जिनमें सिम वेंडर ने ग्राहक को बिना बताए उससे थंब इम्प्रैशन कई बार लगवाए और उससे कई फर्जी लोगों के सिम एक्टीवेट कर दिए.

सिम एक्टिवेट ना होने पर दूसरे वेंडर के पास ना जाएं : सिम खरीदने के लिए सभी जरूरी दस्तावेज देने या थंब इंप्रेशन देने के बाद भी अगर आपका नया सिम एक्टीवेट न हो तो किसी नए वेंडर के पास जाकर दोबारा प्रक्रिया न दोहराएं. बल्कि आप उसी दुकानदार या एजेंट को मिलें और अगर वो कुछ गोलमाल जवाब दे, तो पुलिस कंप्लेंट करने से भी ना हिचकें. हो सकता है कि दुकानदार आपकी आईडी का मिसयूज कर रहा हो.

अधिकृत सेंटर से लें सिम : नया मोबाइल सिम हमेशा अधिकृत सिमकार्ड विक्रेता या औफीशियल सेंटर से खरीदें. कहीं से भी सिम कार्ड लेने पर दस्तावेज मिसयूज या फ्रौड की संभावना ज्यादा होती है.

किसी और के लिए अपनी आईडी का ना करें इस्तेमाल : घर के खास मेंबर्स को छोड़कर अपनी आईडी / थंब इंप्रेशन से किसी दोस्तो या अन्य रिश्तेदार के लिए सिम न खरीदें. अगर भविष्य में वो कोई क्राइम करता है या आपकी आईडी वाले मोबाइल नबंर से कोई रौन्ग कौल कर देता है तो आप पुलिस के चक्कर में फंस सकते हैं.

ट्रिपल तलाक विशेष : बिना तलाक के तलाकशुदा

उत्तर प्रदेश के जिला एटा की शबाना का अलग ही मामला है. उस के पति ने उसे तलाक नहीं दिया है, फिर भी इद्दत के दौरान भरणपोषण की रकम दे कर उस से छुटकारा पा लिया है. जबकि इद्दत 2 स्थितियों में होता है. एक औरत विधवा हो जाए, दूसरा उस का तलाक हो जाए. लेकिन शबाना के साथ इन दोनों स्थितियों में एक भी नहीं है.

एटा शहर के किदवईनगर में समरुद्दीन पत्नी रजिया, 2 बेटियों शबाना, शमा तथा 2 बेटों सरताज और नूर आलम के साथ रहते थे. उन का खातापीता परिवार था. बेटियों में शबाना शादी लायक हुई तो वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगे.

एटा में ही उन के एक रिश्तेदार अलीदराज रहते थे. बाद में वह काम की तलाश में दिल्ली चले गए और वहां दक्षिणपूर्वी दिल्ली जिले के संगम विहार में रहने लगे. उन्होंने वहीं स्टील फरनीचर का अपना कारखाना लगा लिया, जो ठीकठाक चल पड़ा.

अलीदराज के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और 1 बेटी थी. वह बेटी की शादी कर चुके थे. बड़े बेटे आसिफ की शादी के लिए उन्होंने समरुद्दीन के पास प्रस्ताव भेजा. क्योंकि शबाना उन्हें पसंद थी. आसिफ पिता के स्टील फरनीचर के धंधे में हाथ बंटा रहा था. लड़का ठीकठाक था, इसलिए समरुद्दीन ने हामी भर दी. इस के बाद आसिफ और शबाना का निकाह हो गया.

शादी के बाद शबाना दिल्ली आ गई. वह समझदार लड़की थी, इसलिए रजिया को पूरा विश्वास था कि बेटी अपने बातव्यवहार से ससुराल वालों का दिल जीत लेगी और खुशहाल जीवन जिएगी. हुआ भी ऐसा ही. शबाना के दांपत्य के शुरुआती दिन काफी खुशहाल थे. मांबाप ने शादी में 4-5 लाख रुपए खर्च किए थे.

आसिफ का भी काम ठीक चल रहा था. सासससुर, पति, देवर सभी उसे प्यार करते थे. इसलिए शबाना भविष्य को ले कर निश्ंिचत थी. शादी के साल भर बाद शबाना को एक बेटी पैदा हुई, जिस का नाम अलीशा रखा गया. अलीशा घर की पहली संतान थी, इसलिए उसे ले कर सभी खुश थे. सब कुछ बढि़या चल रहा था, लेकिन अचानक शबाना के सुख के दिन दुखों में बदल गए.

एक दिन आसिफ शराब पी कर घर आया तो शबाना को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘यह क्या कर के आए हो तुम? यह नया शौक कब से पाल लिया? पीने वाले मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं हैं. तुम्हें तो पता ही है कि मेरे मायके में शराब की छोड़ो, कोई बीड़ीसिगरेट तक नहीं पीता.’’

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पत्नी की नसीहत सुन कर उसे अमल में लाने के बजाय आसिफ ने शबाना के गाल पर तमाचा जड़ते हुए कहा, ‘‘क्या मैं तेरे बाप के पैसों से पी कर आया हूं, जो तू मुझे समझा रही है? तू कौन होती है मुझे रोकने वाली?’’

शौहर के इस व्यवहार से शबाना हैरान रह गई. उस ने कहा, ‘‘भले तुम मेरे बाप के पैसों की नहीं पी रहे हो, पर शराब पीना अच्छा तो नहीं है.’’

‘‘तू ठीक कह रही है. तू ही कौन सी अच्छी है. मेरे दोस्त मुझ पर हंसते हैं, वे कहते हैं कि कहां मोटी के चक्कर में फंस गया.’’

कह कर आसिफ कमरे में चला गया. उस की इस बात पर शबाना हैरान थी. उस ने तो उसे पसंद कर के निकाह किया था. अब यह क्या कह रहा है? शबाना डर गई. उस ने मन को समझाया कि आसिफ ने नशे में यह बात कह दी होगी.

लेकिन सुबह भी आसिफ का व्यवहार जस का तस रहा तो शबाना सहम उठी. क्योंकि इस से उस का दांपत्य सुखी नहीं हो सकता था. शबाना ने शौहर को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘देखो, अब मैं जैसी भी हूं, तुम्हारी बीवी हूं. अब पूरा जीवन तुम्हें मेरे साथ ही बिताना होगा.’’

आसिफ ने उस की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह खापी कर फैक्ट्री चला गया.  शबाना को परेशान देख कर सास अफसरी ने पूछा, ‘‘क्या बात है बहू, तुम कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘अम्मी आप ही बताइए कि अगर मैं मोटी हूं, तो इस में मेरा क्या दोष है?’’ शबाना ने कहा.

‘‘नहीं, इस में तुम्हारा दोष नहीं, हमारा दोष है.’’ अफसरी बेगम ने व्यंग्य किया.

उसी बीच सामूहिक विवाह समारोह में शबाना के देवर असद की शादी दिल्ली की कमरुन्निसा के साथ हो गई थी. कमरुन्निसा छरहरे बदन की काफी खूबसूरत लड़की थी. भाई की दुलहन देख कर आसिफ को लगा कि मांबाप ने उस के निकाह में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दी थी, वरना उस का निकाह भी किसी खूबसूरत लड़की के साथ हुआ होता.

यह बात मन में आते ही आसिफ को भाई से ईर्ष्या होने लगी. पर मन की बात बाहर नहीं आने दी. बेटी के पहले जन्मदिन पर आसिफ के कुछ दोस्त घर आए तो उन्होंने कहा, ‘‘भाई आसिफ, असद की बीवी तो बहुत सुंदर है.’’

दोस्तों की इस बात से आसिफ ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उसे लगा कि शबाना से निकाह कर के उस ने बहुत बड़ी गलती की थी. उस दिन के बाद से आसिफ शबाना से उखड़ाउखड़ा रहने लगा. उसे शबाना में हजार कमियां नजर आने लगीं. बातबात में वह उस की पिटाई करने लगा. उस की इस पिटाई से शबाना का 2 बार गर्भपात हो गया.

शबाना परेशान थी कि इस तरह पिटते हुए जिंदगी कैसे बीतेगी? पति का व्यवहार काफी तकलीफ देने वाला था. परेशान हो कर उस ने पिता को फोन कर दिया कि दिल्ली आ कर वह उसे ले चलें. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और शबाना को एटा ले गए. घर पहुंच कर शबाना ने मांबाप को पति द्वारा प्रताडि़त करने की सारी बात बता दी.

अब तक समरुद्दीन को कहीं से पता चल चुका था कि शादी से पहले आसिफ किसी शादीशुदा औरत को भगा ले गया था. पुलिस ने उसे चंडीगढ़ में गिरफ्तार किया था. लेकिन आसिफ के नाना इसलाम ने किसी तरह से उसे जेल जाने से बचा लिया था. उस के बाद आननफानन में शबाना से उस का निकाह करा दिया गया था. इस से समरुद्दीन को लगा कि उस के साथ धोखा हुआ है.

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आसिफ मोटी बीवी शबाना से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. कुछ दिनों बाद वह शबाना को ले आया. शबाना एक बार फिर गर्भवती हो गई. घर वाले बेटा होने की उम्मीद कर रहे थे. शबाना को लगा कि अगर बेटा न हुआ तो उस पर होने वाले अत्याचार बढ़ जाएंगे. समय पर शबाना को बेटा ही हुआ, लेकिन वह दिव्यांग था. उस का नाम आतिश रखा गया.

दिव्यांग बेटा पैदा होने की वजह से शबाना पर होने वाले अत्याचार बढ़ गए थे. सास ने कह दिया था कि दिव्यांग बच्चे पैदा करने वाली बहू के साथ उस के बेटे का कोई भविष्य नहीं है. अब वह अपने बेटे के लिए चांद सी बहू लाएगी.

‘‘तो फिर मेरा क्या होगा अम्मी?’’ शबाना ने पूछा तो अफसरी ने कहा, ‘‘तुझे तलाक दे देगा और क्या होगा. मेरा बेटा मर्द है, जवान है, 4-4 शादियां कर सकता है.’’

‘‘नहीं, यह गलत है.’’ शबाना ने कहा तो अफसरी ने आसिफ से कहा, ‘‘तोड़ दे इस के हाथपैर. अब यह हमें बताएगी कि क्या गलत है और क्या सही है.’’

आसिफ जानवरों की तरह शबाना पर टूट पड़ा. इस के बाद बातबात पर उस की पिटाई होने लगी. शबाना समझ नहीं पा रही थी कि वह अब क्या करे? दिव्यांग बेटा पैदा होने के बाद आसिफ बेलगाम हो गया था. अलीदराज और अफसरी अकसर फैक्ट्री में रहते थे. ऐसे में आसिफ बाजारू लड़कियों को घर ला कर शबाना के सामने ही कमरे में बंद हो जाता था. विरोध करने पर उस की पिटाई करता और उसे घर से निकाल देने की धमकी देता.

आसिफ शबाना को इतना परेशान कर देना चाहता था कि वह खुद ही घर छोड़ कर चली जाए. क्योंकि उस के लिए दूसरी बीवी की तलाश शुरू हो गई थी.

आसिफ अपने दोस्तों को घर बुला कर उन के साथ शराब पीता. उस के दोस्तों ने नशे में एक दो बार शबाना से छेड़छाड़ भी की. शबाना ने इस बात की शिकायत आसिफ से की तो उस ने कहा, ‘‘अगर तू मेरे दोस्तों के साथ सो जाएगी तो तेरा क्या बिगड़ जाएगा.’’

पति इतना गिर सकता है, शबाना ने सोचा भी नहीं था. शौहर की हरकतें बरदाश्त से बाहर होती जा रही थीं. शबाना समझ गई कि आसिफ उस से छुटकारा पाना चाहता है. वह बुरी तरह फंसी हुई थी. वह कुछ कर भी नहीं सकती थी. संयोग से उसी बीच वह गर्भवती हो गई. इस की जानकारी होते ही आसिफ ने कहा, ‘‘तुझे यह बच्चा गिरवाना होगा, वरना तू फिर से दिव्यांग बच्चे को जन्म देगी. हमें तो स्वस्थ बेटा चाहिए.’’

शबाना ने पति को बहुत समझाया, पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा. शबाना पिता को बुला कर उन के साथ मायके चली गई. वह ससुराल के बजाय मायके में ही बच्चे को जन्म देना चाहती थी. लेकिन अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि वह इस बच्चे को पैदा नहीं होने देंगे. उसी बीच आसिफ के लिए बरेली की एक लड़की तलाश कर ली गई थी. फरवरी, 2016 में आसिफ ससुराल पहुंचा और ससुर समरुद्दीन से कहा कि वह शबाना को ले जाना चाहता है.

लेकिन समरुद्दीन ने शबाना को विदा करने के बजाय कहा कि वह उन लोगों के खिलाफ अदालत में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज कराएंगे. ससुर के तेवर से आसिफ डर गया. उस ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘मुझ से जो गलती हुई, उसे माफ कर दें. अब मैं शबाना को कुछ नहीं कहूंगा.’’

आखिर समरुद्दीन ने कुछ लोगों को बुलाया तो उन के सामने आसिफ ने आश्वासन दिया कि अब वह शबाना को अच्छी तरह रखेगा. इस के बाद समरुद्दीन ने शबाना को विदा कर दिया.

शबाना ससुराल आ गई. ससुराल में 10-15 दिन तो ठीक से गुजरे, लेकिन उस के बाद उसे फिर से प्रताडि़त किया जाने लगा. शबाना के 3 माह के गर्भ को अफसरी गिराने में जुट गई. वह उसे तरहतरह की दवाएं खिलाने लगी. आसिफ भी उस के साथ मारपीट करने लगा.

परेशान हो कर शबाना ने पिता को फोन कर के सारी बात बता दी. समरुद्दीन दिल्ली पहुंचे और थाना संगम विहार में शिकायत दर्ज करा दी. शिकायत की एक प्रति उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग को भी भेज दी. यह मामला साकेत स्थित महिला सेल में पहुंचा. वहां सुनवाई भी हुई, पर कोई फैसला नहीं हुआ.

अफसरी और आसिफ ने तय कर लिया था कि उन्हें शबाना से छुटकारा पाना है. अब उसे उस के पिता समरुद्दीन से भी मिलने नहीं दिया जाता था. चूंकि शबाना गर्भवती थी, इसलिए आसिफ उसे तलाक भी नहीं दे सकता था. क्योंकि इसलाम में गर्भवती महिला को तलाक नहीं दिया जा सकता. उन्होंने मौलवियों से मशविरा कर के एक योजना बनाई और उसी योजना के तहत समरुद्दीन से कहा कि वह 11 जून, 2016 को पंचायत में आ कर अपनी बात कहें.

11 जून, 2016 को अलीदराज की फैक्ट्री में पंचायत बैठी. समरुद्दीन भी उस पंचायत में पहुंचे. शबाना भी अपने बच्चों के साथ पंचायत में आई. पंचों के पूछने पर शबाना ने कहा कि वह आसिफ के साथ रहना चाहती है, पर वह उस के साथ मारपीट न करे. परंतु आसिफ ने कहा कि अब वह उसे तलाक देना चाहता है. इस पर पंचों ने कहा कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता.

शबाना और समरुद्दीन परेशान थे. आखिर एक सादे कागज पर दोनों से जबरदस्ती दस्तखत करा लिए गए. फिर उसी कागज पर अलगअलग रहने का समझौता तैयार किया गया. उस में जो लिखा गया, उस के अनुसार मनमुटाव की वजह से शबाना और आसिफ एक साथ नहीं रहना चाहते. अत: दहेज का 30 हजार रुपए का चैक शबाना को दिया जाता है. इस के अलावा 5 हजार रुपए इद्दत के दौरान का खर्च भी दिया जाता है.

समझौते में यह भी लिखा गया था कि दोनों बच्चे अलीशा और आतिश आसिफ के पास रहेंगे. पंचायत में आसिफ ने शबाना से कह दिया कि वह समझ ले कि उस का तलाक हो चुका है. उस के दोनों बच्चे उस के पास ही रहेंगे. शबाना कहती रही कि उस के बच्चे उसे दे दिए जाएं, लेकिन किसी ने उस की एक नहीं सुनी और बापबेटी को जबरन बाहर निकाल दिया गया.

शबाना पिता के साथ एटा आ गई. मां रजिया को जब पता चला कि बेटी को उस के पति ने छोड़ दिया है तो उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. गर्भवती बेटी की हालत भी खराब थी. आखिर रजिया ने अपने आंसू पोंछ कर बेटी को संभाला.

पंचायत ने आसिफ से कहा था कि वह गर्भवती पत्नी को तलाक नहीं दे सकता, लेकिन बच्चा पैदा होने के बाद वह फोन कर के 3 तलाक कह सकता है. यही योजना बना कर इद्दत के दौरान दिया जाने वाला भरणपोषण का खर्च आसिफ ने 5 हजार रुपए पहले ही दे दिए थे.

इस के बाद आसिफ ने समझ लिया कि उस का तलाक हो चुका है. बस कहना भर बाकी है. लेकिन शबाना और उस के मांबाप आसिफ और उस के घर वालों को सबक सिखाना चाहते थे.

इस संबंध में समरुद्दीन एडवोकेट मोहम्मद इरफान से मिले. समझौता देख कर उन्होंने कहा कि किसी भी दृष्टि से शबाना और आसिफ का तलाक नहीं हुआ है. इसलिए शबाना को अपने पति से बच्चे और भरणपोषण का खर्च पाने का पूरा हक है.

एडवोकेट मोहम्मद इरफान ने 24 नवंबर, 2016 को शबाना की तरफ से मुकदमा दायर करा दिया. शबाना ने 4 दिसंबर, 2016 को एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अहमद रखा गया. वह पूरी तरह से स्वस्थ है. जुलाई, 2017 में आसिफ ने बरेली की किसी लड़की से निकाह कर लिया. शादी की बात सुन कर शबाना काफी दुखी हुई. मांबाप के समझाने पर शबाना ने खुद को संभाला और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस ली.

शबाना आसिफ से अपने बच्चों की वापसी का और भरणपोषण का मुकदमा लड़ रही है. उस का कहना है कि सौतेली मां उस के बच्चों को कभी खुश नहीं रख सकेगी. 9 अगस्त, 2017 को उस ने परिवार न्यायालय एटा में सैक्शन 10 के अंतर्गत गार्जियन ऐंड वार्ड्स एक्ट का केस दायर कर दिया है.

22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. शबाना खुश है कि अब आसिफ उसे कम से कम 3 तलाक तो नहीं दे सकता. वह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ कर उस से अपने बच्चे और गुजाराभत्ता ले लेगी. वह एक चरित्रहीन शौहर के पास जाने के बजाय अकेली रह कर स्वाभिमान के साथ जीने का प्रण कर चुकी है.

शराब के लिए पैसे नहीं दिए तो दे दिया तलाक

बिहार के जिला बेगूसराय के थाना वीरपुर की पश्चिमी पंचायत क्षेत्र में मोहम्मद शकील अपनी पत्नी रूबेदा खातून के साथ रहता था. दोनों का विवाह 22 साल पहले हुआ था और घर में 6 बच्चे थे.

शकील शराब का लती था, मजबूरी में रूबेदा ही जैसेतैसे परिवार का भरणपोषण करती थी. बिहार में नीतीश सरकार ने शराब पर पाबंदी लगाई तो शराबियों को दिन में तारे नजर आने लगे.

लेकिन शराब ऐसी चीज है, जो पाबंदी के बावजूद भी बंद नहीं होती. लोग बेचनेखरीदने के नएनए रास्ते खोज लेते हैं. गुजरात की तरह बिहार का भी हाल है. मोहम्मद शकील ने भी शराब मिलने का अड्डा तो खोज लिया, पर उसे ज्यादा पैसों की जरूरत पड़ने लगी. एक दिन जब शकील ने रूबेदा से पैसे मांगे तो उस ने पैसे देने से इनकार कर दिया.

इस से शकील आपे से बाहर हो गया और गुस्से में रूबेदा को 3 बार तलाक बोल कर उस से रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दिया. घबरा कर रूबेदा ने पासपड़ोस के लोगों को हकीकत बताई. वे लोग जानते थे कि शकील आए दिन रूबेदा के साथ मारपीट करता है.

वे रूबेदा का साथ देने के वादे के साथ उसे थाना वीरपुर ले गए. जहां रूबेदा ने पूरी बात थानाप्रभारी बाबूलाल को बताई. थानाप्रभारी ने 15 अगस्त, 2017 को रूबेदा की ओर से शकील के खिलाफ उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया. लेकिन तलाक के मामले में वह भी कुछ नहीं कर सकते थे. बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद रूबेदा और उस के 6 बच्चों का भविष्य अंधकारमय होने से बच गया.

आला हजरत के खानदान की बहू भी 3 तलाक के फेर में

कोई सोच भी नहीं सकता कि 3 तलाक के चक्कर में बरेली के आला हजरत खानदान की बहू रही निदा खान मौत के आगोाश में जाने से बामुश्किल बच पाई है. 5 मई, 2017 को निदा जब अपने वालिद के घर थी, तभी करीब दर्जन भर गुंडों ने घर में घुस कर तोड़फोड़ की. निदा को कमरे में बंद कर के ताला लगा दिया गया था, इसलिए वह बच गई. बाकी घर वालों के साथ गुंडों ने मारपीट की.

बदमाश जातेजाते धमकी दे कर गए कि निदा बच नहीं पाएगी. निदा को उस के पति ने 3 तलाक कह कर घर से निकाल दिया था. इस मामले को ले कर निदा अदालत गई. उस का केस तो दर्ज हो गया, लेकिन बदले में दुश्मनी भी मिली.

निदा के भाई मोइन खान का कहना है कि जब एक दिन वह और निदा अदालत से घर लौट रहे थे तो रास्ते में कुछ बाइक सवारों ने उन के साथ बदसलूकी की और केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी. इस के बाद उन के घर पर गुंडे आए थे. निदा अपनी लड़ाई तो लड़ ही रही है, साथ ही अपने जैसी महिलाओं की मदद भी करती है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से निदा खुश है. उसे न्याय मिल सकेगा या नहीं, यह तो वक्त ही बताएगा.

तलाक के डर से बच्चे की बलि

9 जुलाई, 2017 की शाम 6 बजे के करीब घर के बाहर गली में बच्चों के साथ खेल रहा सुनील का 3 साल का बेटा यश अचानक लापता हो गया. सुनील मध्य प्रदेश के जिला इंदौर के थाना गौतमपुरा के गांव गढ़ी बिल्लौदा का रहने वाला था. बेटे के गायब होने का पता चलते ही वह गांव वालों की मदद से उस की तलाश में लग गया.

काफी खोजबीन के बाद भी जब बेटे का कुछ पता नहीं चला तो सुनील ने गांव के कुछ लोगों के साथ थाना गौतमपुरा जा कर बेटे की गुमशुदगी दर्ज करवा दी थी. सुनील बेटे की गुमशुदगी भले ही दर्ज करवा आया था, लेकिन घर लौट कर उस से रहा नहीं गया. वह पूरी रात बेटे की तलाश में इधरउधर भटकता रहा. जहां भी संभव हो सका, उस ने बेटे को खोजा.

लेकिन सुनील की सारी मेहनत तब बेकार गई, जब सुबह मुंहअंधेरे सुनील के पड़ोसी दिलीप बागरी ने शोर मचाया कि सुनील का बेटा यश उस के आंगन में बेहोश पड़ा है.

दिलीप के शोर मचाते ही पूरा गांव उस के आंगन में जमा हो गया. गांव वालों ने यश को टटोला तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की सूचना थाना गौतमपुरा पुलिस को दी गई.

सूचना मिलते ही थाना गौतमपुरा के थानाप्रभारी हीरेंद्र सिंह राठौर पुलिस बल के साथ गांव गढ़ी बिल्लौदा पहुंच गए. उन्होंने यश को गौर से देखा तो उन्हें भी लगा कि बच्चा मर चुका है. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया तो उसे देख कर ही लग रहा था कि बच्चे के पूरे शरीर में सुई चुभोई गई है. उस के पूरे शरीर से खून रिस रहा था.

बच्चे के मुंह पर भी अंगुलियों के निशान थे, जिस से अंदाजा लगाया गया कि बच्चे का मुंह भी दबाया गया था. संभवत: मुंह दबाने से ही दम घुटने के कारण बच्चे की मौत हुई थी. सुई चुभोने से पुलिस को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि तंत्रमंत्र में बच्चे की हत्या की गई थी. इस के बाद घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर हीरेंद्र सिंह राठौर ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

यह साफसाफ तंत्रमंत्र में हत्या का मामला था, इसलिए हीरेंद्र सिंह इस बात पर विचार करने लगे कि आखिर बच्चे की हत्या किस ने की है? तंत्रमंत्र के अलावा हत्या की कोई दूसरी वजह भी नहीं दिखाई दे रही थी. क्योंकि सुनील इतना पैसे वाला आदमी नहीं था कि कोई फिरौती के लिए उस के बेटे का अपहरण करता. उस का कोई ऐसा दुश्मन भी नहीं था कि दुश्मनी में उस के बेटे का कत्ल किया गया हो.

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इस के अलावा थानाप्रभारी ने यह भी पता कराया कि सुनील का किसी अन्य औरत से चक्कर तो नहीं था? जिस की वजह से उस ने पत्नी और बेटे से छुटकारा पाने के लिए ऐसा किया हो.

जिस दिलीप बागरी के आंगन में यश का शव मिला था, उस से भी पूछताछ की गई. उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं मासूम बच्चे की हत्या क्यों करूंगा? मैं तो उसे अपने बच्चे की तरह प्यार करता था. रात 12 बजे तक तो मैं सुनील के साथ ही था. उस के बाद घर आ कर सो गया था. बच्चे की चिंता में मैं ने रात में खाना भी नहीं खाया था.’’

दिलीप बागरी ने जिस तरह गिड़गिड़ाते हुए सफाई दी थी, उस से हीरेंद्र सिंह राठौर को लगा कि शयद किसी अन्य ने बच्चे की हत्या कर के इसे फंसाने के लिए लाश इस के आंगन में फेंक दी है. यही सोच कर वह थाने लौट आए. थाने आ कर उन्होंने यश की गुमशुदगी की जगह उस की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की खुद ही जांच शुरू कर दी.

कई दिनों तक वह इस मामले की विवचेना करते रहे, पर हत्यारे तक पहुंचने की कौन कहे, वह यह तक पता नहीं कर सके कि मासूम यश की हत्या क्यों की गई थी?

जब हीरेंद्र सिंह राठौर इस मामले में कुछ नहीं कर सके तो आईजी हरिनारायण चारी ने उन का तबादला कर उन की जगह पर गौतमपुरा का नया थानाप्रभारी अनिल वर्मा को बनाया.

अनिल वर्मा थोड़ा तेजतर्रार अधिकारी थे. अब तक की गई हीरेंद्र सिंह की जांच का अध्ययन कर के पूरी बात उन्होंने डीआईजी हरिनारायण चारी, एडिशनल एसपी पंकज कुमावत तथा एसडीओपी अमित सिंह राठौर को बताई तो सभी अधिकारियों ने एक बार फिर दिलीप बागरी से थोड़ा सख्ती से पूछताछ करने का आदेश दिया.

क्योंकि दिलीप बागरी ने भले ही अपनी सफाई में बहुत कुछ कहा था, पर सभी को उसी पर शक था. अनिल वर्मा ने दिलीप से पूछताछ करने से पहले मुखबिरों से उस के बारे में पत कराया. मुखबिरों से उन्हें पता चला कि दिलीप इधर बेटे की चाह में तंत्रमंत्र के चक्कर में पड़ा था. बेटे के लिए ही वह एक के बाद एक कर के 3 शादियां कर चुका है.

बेटे के ही चक्कर में उस की पहली पत्नी की मौत हुई थी. यह जानकारी मिलने के बाद अनिल वर्मा ने दिलीप और उस की दोनों पत्नियों पुष्पा और संतोष कुमारी को थाने बुलवा लिया. थाने में दिलीप और उस की पत्नियों से अलगअलग पूछताछ की जाने लगी तो तीनों के बयानों में काफी विरोधाभास पाया गया.

इस से अनिल वर्मा का संदेह गहराया तो उन्होने दिलीप बागरी से सख्ती से पूछताछ शुरू की. पुलिस की सख्ती के आगे दिलीप टूट गया और उस ने अपनी दोनों पत्नियों संतोष कुमारी और पुष्पा के साथ मिल कर यश की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने यश की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

दिलीप की पहली शादी 17 साल की उम्र मे गौतमपुरा के नजदीक के गांव इंगोरिया की रहने वाली सज्जनबाई से हुई थी. सज्जनबाई नाम से ही नहीं, स्वभाव से भी सज्जन थी. उस ने दिलीप की घरगृहस्थी तो संभाल ही ली थी, समय पर 2 बेटियों को जन्म दे कर उस का घरआंगन महका दिया था.

2 बेटियां पैदा होने के बाद सज्जनबाई और बच्चे नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने दिलीप से औपरेशन कराने को कहा. लेकिन दिलीप इतने से संतुष्ट नहीं था. उसे तो बेटा चाहिए था, इसलिए औपरेशन कराने से मना करते हुए उस ने कहा, ‘‘बिना बेटे के इस संसार से मुक्ति नहीं मिलती, इसलिए जब तक बेटा पैदा नहीं हो जाता, तुम औपरेशन के बारे में सोचना भी मत.’’

पति के आदेश की अवहेलना करना सज्जनबाई के वश में नहीं था. क्योंकि दिलीप ने साफ कह दिया था कि उसे एक बेटा चाहिए ही चाहिए. अगर वह उस का कहना नहीं मानेगी तो वह उसे तलाक दे कर दूसरी शादी कर लेगा. दिलीप ऐसा कर भी सकता था, क्योंकि उस की जाति में यह कोई मुश्किल काम नहीं था.

इसलिए सज्जनबाई चुप रह गई. कुछ दिनों बाद सज्जनबाई तीसरी बार गर्भवती हुई. जबकि उस की उम्र तो अभी शादी लायक भी नहीं थी और वह तीसरे बच्चे की मां बनने जा रही थी. दुर्भाग्य से दिलीप का बेटे का बाप बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. क्योंकि बच्चे को जन्म देते समय सज्जनबाई ही नहीं, उस के बच्चे की भी मौत हो गई थी.

संयोग से पैदा होने वाला बच्चा बेटा ही था. दिलीप को पत्नी और बेटे की मौत का दुख तो हुआ, लेकिन चूंकि ज्यादा दिनों तक वह अकेला नहीं रह सकता था, फिर उसे बेटा भी चाहिए था, जो दूसरी पत्नी लाने के बाद ही पैदा हो सकता था. इसलिए उस ने उज्जैन के नागदा के नजदीक के गांव उन्हेल की रहने वाली पुष्पा से दूसरी शादी कर ली. पुष्पा के घर आते ही वह बेटा पैदा करने की कोशिश में जुट गया.

साल भर बाद ही पुष्पा ने बेटे को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्य से वह 3 महीने का हो कर गुजर गया.

इस तरह से एक बार फिर दिलीप की आशाओं पर पानी फिर गया. बेटे की मौत से वह काफी दुखी था. लेकिन उसे इस बात का अहसास हो गया था कि पुष्पा से उसे बेटा हो सकता है, इसलिए वह इस दुख को भुला कर एक बार फिर बेटा पैदा करने की कोशिश में लग गया. पुष्पा गर्भवती तो हुई, लेकिन कुछ महीने बाद उस का गर्भपात हो गया.

इस से दिलीप को वहम होने लगा कि जरूर कोई ऐसी बात है, जो उसे बेटे का बाप बनने में बाधा डाल रही है. वह पड़ोस के गांव में रहने वाले तांत्रिक बलवंत से जा कर मिला. पूरी बात सुनने के बाद तांत्रिक बलवंत ने कहा, ‘‘तुझे बेटा कहां से होगा, तेरी पत्नी की कोख में तो डायन बैठी है. वही उस की संतान को खा जाती है.’’

उपाय के नाम पर पुष्पा की झाड़फूंक शुरू हो गई. दिलीप कोई खतरा नहीं उठाना चाहता था, इसलिए उस ने संतोष कुमारी से एक और शादी कर ली. उस का सोचना था कि पुष्पा से बेटा नहीं होगा तो संतोष कुमारी से तो हो ही जाएगा. लेकिन शायद उस की किस्मत ही खराब थी. संतोष कुमारी को बेटा होने की कौन कहे, गर्भ ही नहीं ठहरा.

बेटे के लिए दिलीप तो परेशान था ही, उस की दोनों पत्नियां पुष्पा और संतोष कुमार भी परेशान रहने लगी थीं, उन की परेशानी की वजह यह थी कि बेटे के चक्कर में कहीं दिलीप उन्हें तलाक दे कर चौथी शादी न कर ले. क्योंकि उन्हें पता था कि बेटे के लिए दिलीप कुछ भी कर सकता है.

दिलीप चौथी ही नहीं, बेटे के लिए पांचवीं शादी भी कर सकता था. तलाक के बारे में सोच कर पुष्पा और संतोष परेशान रहती थीं. अपनी परेशानी पुष्पा ने पिता मनोहर सिंह को बताई तो वह भी परेशान हो उठे. क्योंकि वह भी दामाद की सोच को अच्छी तरह जानते थे. दामाद को न वह रोक सकते थे, न उन की बात उस की समझ में आ सकती थी.

इसलिए बेटी का भविष्य खराब न हो, यह सोच कर वह पुष्पा को नागदा के पास स्थित गांव उमरनी के रहने वाले तांत्रिक अंबाराम आगरी के पास ले गए. पुष्पा की पूरी बात सुनने के बाद अंबाराम ने कहा, ‘‘तुम्हारी कोख में जो डायन बैठी है, वह मासूम बच्चे की बलि मांग रही है. जिस बच्चे की बलि दी जाए, वह मांबाप की पहली संतान हो. बलि के बाद तुम्हें जो गर्भ ठहरेगा, वह बेटा ही होगा और जीवित भी रहेगा.’’

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तांत्रिक अंबाराम ने जो उपाय बताया था, ससुराल आ कर पुष्पा ने उसे पति दिलीप बागरी और सौत संतोष कुमारी को बताया. दिलीप तो थोड़ा कसमसाया, पर पति के तलाक के डर से संतोष कुमारी राजी हो गई. लेकिन समस्या थी मासूम बच्चे की, जो मांबाप की पहली संतान हो.

लेकिन तीनों ने जब इस विषय पर गहराई से विचार किया तो उन्हें पड़ोस में रहने वाले सुनील का 3 साल का बेटा यश याद आ गया. वह मांबाप की पहली संतान था और पड़ोसी होने के नाते दिलीप के घर आताजाता रहता था.

इस के बाद दिलीप और उस की पत्नियों ने यश की बलि देने का मन बना लिया. मासूम बच्चा मिल गया तो दिलीप ने अंबाराम से मिल कर पूछा कि बलि कब और कैसे देनी है? इस तरह अपने घर का चिराग रोशन करने के लिए दिलीप ने पड़ोसी सुनील के घर का चिराग बुझाने का मन बना लिया. अंबाराम ने बलि देने के लिए अमावस्या या पूर्णिमा का दिन बताया था.

9 जून को पूर्णिमा थी, इसलिए 8 जून को पुष्पा, दिलीप और संतोष कुमारी ने अगले दिन बलि देने की तैयारी कर के यश को अगवा करने की योजना बना डाली. इस के बाद दिलीप रोज की तरह सट्टा खेलने बड़नगर चला गया. शाम को जैसे ही यश दिलीप के घर आया, संतोष कुमारी और पुष्पा ने उसे कमरे में बंद कर के दिलीप को फोन कर के काम हो जाने की सूचना दे दी.

दिलीप उत्साह से गांव के लिए चल पड़ा. जब वह गांव पहुंचा, यश के गायब होने का हल्ला मच चुका था. पूरा गांव मासूम यश की तलाश में लगा था. दिलीप भी गांव वालों के साथ यश की तलाश का नाटक करने लगा. रात एक बजे तक वह गांव वालों के साथ यश की तलाश में लगा रहा.

जब सभी अपनेअपने घर चले गए तो दिलीप भी अपने घर आ गया. इस के बाद दोनों पत्नियों के साथ मिल कर जिस तरह तांत्रिक अंबाराम ने बलि देने की बात बताई थी, उसी तरह सभी बलि देने की तैयारी करने लगे. यश पड़ोसियों की खतरनाक योजना से बेखबर गहरी नींद में सो रहा था. अंबाराम के बताए अनुसार, दिलीप उसे उठा कर कमरे के अंदर ले गया और वहां बिछी रेत पर लिटा कर तांत्रिक के बताए अनुसार, मासूम यश के शरीर में पिनें चुभोने लगा. पीड़ा से बिलबिला कर मासूम यश रोने लगा तो संतोष और पुष्पा ने उस का मुंह दबा दिया.

दिलीप लगातार यश के होंठों, गर्दन और कंधे पर पिन चुभोता रहा. जहां पिन चुभती, वहां से खून रिसने लगता, जो बह कर रेत में समा जा रहा था. इसी तरह करीब 3 घंटे तक दिलीप यश के शरीर में पिन चुभोता रहा, क्योंकि उसे तब तक यह करना था, जब तक उस मासूम की मौत न हो जाए.

लगभग 3 घंटे बाद जब यश की मौत हुई, तब तक करीब साढ़े 3 बज चुके थे. इस के बाद यश की लाश को ला कर आंगन में रख दिया गया, जिस जगह उस मासूम का खून गिरा था, उसी के ऊपर बिना बिस्तर बिछाए दिलीप ने अपनी दोनों पत्नियों पुष्पा और संतोष कुमारी के साथ शारीरिक संबंध बनाए.

क्योंकि तांत्रिक अंबाराम ने दिलीप से कहा था कि मासूम की बलि देने पर जो खून निकलेगा, उस के सूखने से पहले ही उस के ऊपर जितनी भी औरतों से वह शारीरिक संबंध बनाएगा, सभी को 9 महीने बाद बेटा पैदा होगा और वे जीवित भी रहेंगे. इस तरह बेटा पाने की खुशी में दिलीप, पुष्पा और संतोष कुमारी ने जश्न मनाया.

दिलीप, पुष्पा और संतोष कुमारी को तांत्रिक अंबाराम पर इतना भरोसा था कि यश की लाश उन के आंगन में भले मिलेगी, फिर भी पुलिस उन तीनों पर जरा भी संदेह नहीं करेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

दिलीप और उस की पत्नियों से पूछताछ के बाद अनिल वर्मा ने उज्जैन के रेलवे स्टेशन से तांत्रिक अंबाराम को भी गिरफ्तार कर लिया था. उसे थाने ला कर पूछताछ की गई तो उस का कहना था कि उस की नीयत दिलीप की दोनों पत्नियों पर खराब हो गई थी.

उस का सोचना था कि बच्चे की हत्या के आरोप में दिलीप जेल चला जाएगा तो बाद में उस की दोनों पत्नियां संतोष और पुष्पा आसानी से उस के कब्जे में आ जाएंगी. इसीलिए उस ने बलि देने के बाद बच्चे की लाश को घर के आंगन में रखने के लिए कहा था, ताकि दिलीप आसानी से कानून के शिकंजे में फंस जाए.

पूछताछ के बाद अनिल वर्मा ने दिलीप, पुष्पा, संतोष कुमारी और तांत्रिक अंबाराम को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. बेटे की चाहत में दिलीप ने अपना घर तो बरबाद किया ही, पड़ोसी के मासूम बेटे की जान ले कर उस के घर का भी चिराग बुझा दिया.

इस में सब से ज्यादा दोषी तो तांत्रिक अंबाराम है, जिस ने अपनी कुंठित भावना को पूरी करने के लिए 2 घर बरबाद कर दिए.

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