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विज्ञान के क्षेत्र में किशोरियों का लगाव कम क्यों

किशोरियां भावनात्मक रूप से लड़कों की अपेक्षा ज्यादा मजबूत होती हैं, किंतु फिर भी वे आधुनिक तकनीकी व विज्ञान के विषयों की अपेक्षा परंपरागत विषयों, जैसे कला समूह, संगीत व साहित्य की ओर ज्यादा आकर्षित होती हैं. लड़के मानसिक रूप से एकांगी होते हैं जबकि किशोरियां बहुआयामी होती हैं. इस के बाद भी वे विज्ञान के क्षेत्र में अल्पसंख्यक हैं. समस्या प्रारंभिक शिक्षा से शुरू होती है. समाज में यह रूढि़वादी धारणा व्याप्त है कि कुछ विषय सिर्फ पुरुष ही पढ़ सकते हैं. भारतीय समाज में यह धारणा अभी भी बहुत प्रबल है कि लड़कियां विज्ञान व गणित पढ़ने के लिए उपयुक्त नहीं हैं. बचपन से उन के अवचेतन मन में यह बात बिठा दी जाती है कि गणित व विज्ञान उन के लिए कठिन व अनुपयुक्त विषय हैं. सो, उन का झुकाव गणित व विज्ञान विषयों से हट जाता है.

मातापिता व शिक्षकों की ओर से किशोरियों को विज्ञान पढ़ने के लिए उपयुक्त व पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है. सो, उन के मन में यह हीनभावना घर कर जाती है कि भौतिकी और गणित जैसे विषय में वे लड़कों से अच्छा नहीं कर सकती हैं. वे सांस्कृतिक व सामाजिक रूढि़वादिता से प्रभावित हो कर परंपरागत विषयों की ओर उन्मुख होती हैं. लड़के हमेशा लड़कियों की विशिष्टता को चुनौती देते हैं विशेषकर विज्ञान के क्षेत्र में. लड़कियों की योग्यता को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता है. किशोरियों को कक्षा में शिक्षकों से सही उत्तर नहीं मिलते हैं.

विज्ञान के क्षेत्र मे कैरियर व व्यवसाय में भी लड़कियों को लिंगभेद का सामना करना पड़ता है. उन्हें पुरुषसाथी की अपेक्षा कम वेतन, भत्ता, रहवासी सुविधाएं, औफिस में जगह एवं अवार्ड इत्यादि मे कमतर स्थितियां प्राप्त होती हैं.

रोल मौडलों की कमी

किशोरियों के अवचेतन मन में यह बात बिठा दी जाती है कि शादी के बाद परिवार संभालना प्रमुख कार्य है, इसलिए विज्ञान की अपेक्षा समाजशास्त्र से जुड़े विषयों का अध्ययन उन के लिए श्रेयस्कर है. भारत में लड़कियों के लिए रोल मौडलों की कमी है. जब किशोरियां अपने परिवार में मां, चाची, बूआ, दीदी किसी को भी विज्ञान पढ़ते नहीं देखतीं, तो स्वाभाविक तौर पर उन की रुचि विज्ञान में नहीं होती है. मिडिल स्कूलों में 74 फीसदी किशोरियों का झुकाव विज्ञान की तरफ रहता है जो हायर सैकंडरी स्तर पर 45 फीसदी एवं उच्च शिक्षा में 23 फीसदी ही रह जाता है. 60 फीसदी किशोरियां विज्ञान के क्षेत्र में अपना कैरियर नहीं बनाना चाहती हैं.

पक्षपातपूर्ण रवैया

जो लड़कियां विज्ञान पढ़ती हैं वे अपनी उन सहेलियों, जो दूसरा विषय ले कर पढ़ती हैं, से 26 फीसदी ज्यादा कमाई करती हैं. जो किशोरियां विज्ञान विषय लेती हैं उन की तार्किक क्षमता एवं कठिन परिस्थितियों से निबटने की क्षमता अन्य किशोरियों की अपेक्षा ज्यादा अच्छी होती है. अपने परिवार, समाज व देश के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता विज्ञान पढ़ने वाली किशोरियों में ही होती है. लड़कियों में बचपन से ही विज्ञान व गणित के प्रति उत्साहपूर्ण वातावरण तैयार कर उन के अवचेतन मन में यह बात डालनी होगी कि विज्ञान जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण विषय है. विद्यालय एवं सामाजिक परिवेश में विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन कर विज्ञान, इंजीनियरिंग, तकनीकी, कंप्यूटर, फार्मेसी या विज्ञान के अन्य विषयों में अग्रणी स्थानीय महिलाओं को आमंत्रित कर संबोधन करवाना चाहिए. इस से किशोरियों के सामने उन के रोल मौडल्स होंगे. उन से प्रभावित हो कर विज्ञान के विषयों में उन की रुचि बढ़ेगी.

विद्यालयीन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार से प्रारूपित करना चाहिए कि जिस से किशोरियों को विज्ञान विषय में सहभागिता के अवसर अधिक मिलें. शिक्षक छात्र एवं शिक्षा के बीच की बहुत महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं. विज्ञान के क्षेत्र में नवाचार से परिचित कराने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों को किशोरियों की विज्ञान के प्रति अभिरुचि बढ़ाने की तकनीकों से परिचित करवाया जाना चाहिए. प्राथमिक स्तर पर साइंस कंपीटिशन, साइंस फेयर, विज्ञान प्रश्नोत्तरी आदि को पाठ्यक्रम में अनिवार्य घोषित किया जाना चाहिए ताकि बच्चियों की अभिरुचि विज्ञान के प्रति बढ़ सके, साथ ही प्रोत्साहन के लिए उन को पुरस्कार, प्रमाणपत्र एवं अवार्ड देने चाहिए.

लड़कियों के सामने रसायन के अनेक चमत्कारों का विश्लेषण करना चाहिए. रासायनिक अभिक्रियाओं के जादू देख कर उन के मन में विज्ञान के प्रति अभिरुचि जाग्रत होगी. सरल प्रोजैक्ट, जैसे ‘मिश्रण को अलग करना’, ‘बिजली के मेंढक का फुदकना’, ‘रोबोट का संचालन’, ‘दूध का प्लास्टिक बनना.’ आदि का प्रदर्शन निश्चित ही उन के मन में विज्ञान के प्रति अभिरुचि पैदा करेगा. विज्ञान से संबंधित आसपास के कलकारखाने, बांध, बिजली बनाने वाली इकाइयां, पवन चक्कियां व फैक्टरियों का भ्रमण उन्हें कराना चाहिए ताकि वे विज्ञान के रहस्य एवं उस की उपयोगिता को समझ सकें. इन जगहों पर काम करने वाली महिलाओं से भी उन की मुलाकात करवानी चाहिए जिस से उन के मन में विश्वास बन सके कि वे भी इन क्षेत्रों में अपनी सहभागिता दे कर कैरियर बना सकती हैं. वैश्वीकरण के इस दौर में समाज, परिवार और तंत्र की मानसिकता में बदलाव आए हैं व पहले की अपेक्षा अधिक संख्या में किशोरियां जागरूक हुई हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अभी भी बहुत असंतुलन है. शिक्षा तक पहुंच ही इस का हल नहीं है. इस के लिए बहुआयामी योजनाओं के बनाने की व धरातल पर उन के क्रियान्वयन की आवश्यकता है. मातापिता को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा, उन्हें परिवार में किशोरियों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार बंद करना होगा और इस में शिक्षकों, समाज व तंत्र को सहयोग करना होगा ताकि अधिक से अधिक किशोरियों को इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.

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ज्यादा सैलरी चाहते हैं तो छोड़ दें ये 5 आदत

ये बात सच है कि सैलरी चाहे जितनी भी क्यों न मिले, हमेशा कम ही लगती है. लेकिन अगर आपको यह वाकई लगता है कि आपकी प्रोडक्ट‍िविटी कम होने के कारण आपकी सैलरी नहीं बढ़ पा रही है तो हम यहां आपको बता रहे हैं कि किस तरह आप अपनी कुछ आदतों से तौबा कर अपनी प्रोडक्ट‍िविटी बढ़ा सकते हैं और अच्छा सैलरी पैकेज पा सकते हैं.

बुरी आदतों पर ‘सेल्फ कंट्रोल’ होना बहुत जरूरी है वरना वो आपकी ‘क्रीएटिविटी’ को खत्म कर देती है और साथ ही आपके परफार्मेंस को दबा देती है.

छोड़ दीजिए ये 5 बुरी आदतें

मुश्किल कामों को टालना

जब आप सुबह उठते हैं तो आपका दिमाग फ्रेश रहता है. उस वक्त आपको दिन का सबसे कठिन काम कर लेना चाहिए. क्योंकि सुबह आप एनर्जी से भरे होते हैं. अगर आप उस काम को शाम तक के लिए टालते रहेंगे तो आप उसे अच्छी तरह नहीं कर पाएंगे, क्योंकि तब तक आप थक चुके होंगे.

बेड पर फोन, टैबलेट या लैपटाप इस्तेमाल करना

रात में सोते समय बेड पर फोन या लैपटाप का इस्तेमाल करना आपके लिए बहुत हानिकारक साबित हो सकता है. फोन या लैपटाप से निकलने वाले ‘वेवलेंग्थ ब्लुलाईट’ नींद, मूड, और एनर्जी को काफी नुकसान पहुचाते हैं, जो आपकी उत्पादकता को सीधे-सीधे प्रभावित करती हैं.

मल्टीटास्किंगहोना हानिकारक

‘मल्टीटास्किंग’ होना आपकी प्रोडक्टिविटी को पूरी तरह से खत्म कर देता है. एक अध्ययन के मुताबिक जो लोग ‘मल्टीटास्किंग’ होते हैं वो कम ‘प्रोडक्टिव’ होते हैं. एक समय पर एक ही काम करने वाले लोग ज्यादा प्रोडक्ट‍िव होते हैं. इसलिए एक समय में एक ही काम करें. काम का बोझ ज्यादा हो या कम, एक-एक कर पूरा करें.

इंटरनेट सर्फिंग

किसी भी काम में एकाग्रता बनाने के लिए हमें लगभग 15 मिनट लगते हैं. लेकिन जब हम ये एकाग्रता बना लेते हैं तो हमारा दिमाग ‘फोकस’ करने कि क्षमता को हासिल कर लेता है. लेकिन लगातार ‘नेट-सर्फिंग’ हमारे इस एकाग्रता को अस्तव्यस्त करता है और दिमाग को अशांत कर देता है.

अलार्म को स्नूजन करें

जब आप रात में अलार्म लगा कर सोते हैं, तो कहीं न कहीं आपका दिमाग खुद को पहले से ही तैयार लेता है कि आपको सुबह कितने बजे उठना है. इसलिए आप कभी-कभी अलार्म बजने के ठीक पहले उठ जाते हैं. लेकिन जब आप ‘स्नूज’ बटन दबा के दोबारा सो जाते हैं और देर से थके और मदहोश से उठते हैं, तब तक आपके दिमाग की सजगता खो जाती है.

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आखिर क्यों हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को जर्मनी के साथ जुड़ने को कहा

हौकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का खेल जिसने भी देखा वह उनके खेल का कायल हो गया. ध्यानचंद को चाहने वाले उन्हे ‘दद्दा’ भी कहकर पुकारा करते थे. दद्दा के खेल का जादू ऐसा था जिसने जर्मन तानाशाह हिटलर तक को अपना दीवाना बना दिया था. मेजर का खेल देखने बाद हिटलर ने उनको जर्मन सेना में पद औफर करते हुए उनकी तरफ से खेलने का औफर दिया था जिसे भारत के इस सपूत ने ठुकरा दिया था.

ध्यानचंद के जन्मदिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. ध्यानचंद कितने मशहूर थे अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बर्लिन ओलंपिक के 36 सालों बाद जब उनके बेटे अशोक कुमार जर्मनी में हौकी खेलने पहुंचे तो एक शख्स स्ट्रेचर पर उनसे मिलने आया था.

29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में जन्मे ध्यानचंद ने भारतीय हौकी को दुनियाभर में पहचान दिलाई. उनको हौकी के सर्वकालिक महानतम खिलाड़ियों में शामिल किया जाता है. जो क्रिकेट के डौन ब्रैडमैन, फुटबौल के पेले और मुक्केबाजी में मोहम्मद अली को स्थान प्राप्त है वही मुकाम मेजर ध्यानचंद का है.

ध्यानचंद ने 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लौस एंजेलिस और 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हौकी टीम का नेतृत्व किया और भारत को स्वर्ण पदक दिलाया.

यूं तो उनके बारे में कई रोचक बातें मशहूर हैं, लेकिन 1936 में बर्लिन ओलंपिक खेलों के दौरान जर्मनी के तानाशाह हिटलर का औफर ठुकराने के लिए उन्हें खास तौर पर याद किया जाता है.

* मेजर ध्यानचंद का जादुई खेल देखकर जर्मन तानाशाह हिटलर इतने प्रभावित हुए थे कि उनको सेना में ऊंचा पद औफर किया था. हिटलर के औफर को मेजर साहब ने बड़ी ही विनम्रता से यह कहकर ठुकरा दिया कि ”मैंने भारत का नमक खाया है, मैं भारतीय हूं और भारत के लिए ही खेलूंगा.” उस समय ध्यानचंद लांस नायक थे.

* ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार भी भारत के लिए ओलंपिक खेलने वाली हौकी टीम का हिस्सा रहे हैं. साल 1975 में अशोक के आखिरी समय में किए गोल से भारत ने पाकिस्तान को हराकर विश्व कप का खिताब जीता था.

* अशोक कुमार कहते हैं कि साल 1972 में एक बार जब भारतीय हौकी टीम जर्मनी दौरे पर अभ्यास कर रही थी, तभी कुछ लोग एक शख्स को स्ट्रेचर पर लेकर आए. उन्होंने 1936 के अखबारों की कटिंग दिखाते हुए कहा कि ऐसे थे आपके पिता.

* ध्यानचंद ब्रिटिश आर्मी में लांस नायक थे. उनके बेहतरीन खेल प्रदर्शन को देखते हुए ब्रिटिश गवर्मेंट ने उन्हें मेजर बनाया था. उस वक्त यहां ब्रिटिश राज था और भारत एक गुलाम देश था.

* कई बार खेल के दौरान ध्यानचंद की हौकी स्टिक को ये कहकर बदलवाया गया कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगी है.

* डौन ब्रैडमैन ने ध्यानचंद के खेल को देखकर उनसे कहा था, “आप तो क्रिकेट के रन की तरह गोल बनाते हैं.”

तीन दिसंबर 1979 को हौकी के जादूगर दिल्ली में दुनिया को अलविदा कह गए. मरणोपरांत 1956 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. अब उनको भारत रत्न देने की मांग जोर पकड़ रही है.

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अब टूटने पर खुद ही रिपेयर हो जाएगी आपके फोन की स्क्रीन

फोन की स्क्रीन को लेकर हम सभी बड़े सतर्क रहते हैं, लेकिन अब आपको इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. जल्द ही आपके हाथ में एक ऐसा स्मार्टफोन आने वाला है, जिसकी स्क्रीन टूटने के बाद अपने-आप जुड़ जाएगी. मोटोरोला अपने स्मार्टफोन में ऐसी तकनीक लाने जा रहा है. अगर ऐसा होता है तो मोटोरोला इस तकनीक के साथ फोन लाने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन जाएगी.

यह स्क्रीन एक खास तरह की प्लास्टिक से बनी होगी, जिसे ‘शेप मेमरी पौलिमर’ नाम से जाना जाता है. इसके जरिए हीट करके फोन की स्क्रीन को रिपेयर किया जा सकता है.

मोटोरोला ने बताया है कि एक ऐप के जरिये यूजर स्क्रीन का वह हिस्सा मार्क कर पाएंगे जो डैमेज हुआ है, फिर वह हैंडसेट उतनी जगह को अपनी पावर से हीट करेगा. वैकल्पिक रूप से फोन को एक हीलिंग डौक पर रातभर रखना होगा या लोहे जैसे किसी मटीरियल को फोन की सतह पर लगाना होगा. यह हीलिंग प्रक्रिया छोटे-मोटे स्क्रैच या चटख पर ही काम कर पाएगी.

इस कान्सेप्ट को हकीकत में बदलने से पहले कम्पनी को कुछ मुश्किलों का हल ढूंढना होगा. मसलन, उसे यह देखना होगा कि पौलिमर की स्क्रीन यूजर के शरीर की गर्मी से पिघल तो नहीं रही है.

हालांकि इस हीट रिएक्शन के जरिए सभी तरह के डैमज ठीक नहीं होंगे, लेकिन अगर फोन में हल्का-फुल्का स्क्रैच आता है तो उसे ठीक किया जा सकेगा. वहीं मोटोरोला ने इस बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं दी है. ऐसे में यह साफ नहीं है इस तकनीक से साथ स्मार्टफोन बाजार में कब आएंगे.

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डिजास्टर मैनेजमैंट : कैरियर की असीम संभावनाएं

प्राकृतिक आपदाएं अकसर आती रहती हैं. इन आपदाओं के कारण दुनियाभर में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. आंकड़ों के मुताबिक विश्व के कई देश प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं. दुनियाभर के देशों में कभी भूकंप, कभी समुद्री तूफान, कभी भूस्खलन तो कभी बर्फ की चट्टानें खिसकने जैसी आपदाओं से जानमाल की भारी तबाही होती है. इस संदर्भ में भारत भी काफी संवेदनशील है. यहां बहुत से क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिए अति संवेदनशील हैं. देश के ज्यादातर हिस्सों में बाढ़, भूकंप और सूखे जैसी आपदाएं आती रहती हैं. देश की लगभग 70% भूमि सूखे की आशंका की जद में है. बाढ़ और तूफानी चक्रवात यहां अकसर आते रहते हैं. ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते पैमाने ने आपदा प्रबंधन से जुड़े लोगों की जरूरत को बढ़ा दिया है.

आपदा प्रबंधन एक ऐसा कार्यक्षेत्र है, जो हमें प्राकृतिक विपदाओं का सामना करने के लिए सक्षम बनाता है. साथ ही प्राकृतिक विपदाओं के प्रभावों, उन के नियंत्रण और प्रबंधन को समझाता है. आपदा प्रबंधन ने पिछले कुछ सालों में काफी लोकप्रियता हासिल की है. यह मानव सेवा से सीधे जुड़ा हुआ कैरियर क्षेत्र है. अब बड़ी संख्या में युवाओं का रुझान इस क्षेत्र की ओर हो रहा है. लेकिन अभी भी बहुत से युवा ऐसे हैं जिन्हें इस क्षेत्र के बारे में बहुत कुछ नहीं मालूम. वे तो सिर्फ इंजीनियरिंग, मैडिकल, एमबीए जैसे व्यावसायिक कोर्सों के बारे में ही जानते हैं और उन में ही अपना कैरियर बनाना चाहते हैं. इस क्षेत्र में कैरियर की क्या संभावनाएं हैं यह जानने के लिए हमें डिजास्टर मैनेजमैंट क्या होता है, जानना जरूरी है.

क्या है डिजास्टर मैनेजमैंट

डिजास्टर मैनेजमैंट प्राकृतिक विपदाओं से नजात दिलाने का एक ऐसा प्रबंधन क्षेत्र है, जो मानव सेवा के साथसाथ प्राकृतिक आपदाओं से भी बचाता है और सचेत करता है. विश्व में हो रही प्राकृतिक विपदाओं ने इस कार्यक्षेत्र को अति महत्त्वपूर्ण बना दिया है. आपदा प्रबंधन का मुख्य कार्य आपदाग्रस्त क्षेत्र में होने वाली क्षति का आकलन करना है. आपदा प्रबंधन से जुड़े पेशेवर आपदाग्रस्त क्षेत्रों की भौगोलिक एवं आर्थिक स्थितियों का जायजा ले कर यह अनुमान लगाते हैं कि भविष्य में इस तरह की स्थितियों से कैसे निबटा जाए और प्राकृतिक विपदाओं का पूर्वानुमान कैसे लगाया जाए?

प्राकृतिक आपदा एक बड़ी समस्या है, जिस से पार पाना बहुत जरूरी है. इस समस्या से कुछ हद तक हमें आपदा प्रबंधक नजात दिला सकते हैं. डिजास्टर मैनेजमैंट के जरिए हम प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान तो नहीं लगा सकते, पर कम से कम इन समस्याओं से बचने के उपाय तो ढूंढ़ ही सकते हैं.

कोर्स

देश के कई प्रबंधन संस्थान सर्टिफिकेट से ले कर स्नातकोत्तर स्तर के कोर्स कराते हैं. देश के कई विश्वविद्यालय डिजास्टर मैनेजमैंट का डिग्री लैवल कोर्स करा रहे हैं. कई निजी शैक्षणिक संस्थानों में भी डिजास्टर मैनेजमैंट का कोर्स कराया जाता है. वह कोर्स आप रैगुलर या डिस्टैंस लर्निंग माध्यम से भी कर सकते हैं. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने डिजास्टर मैनेजमैंट का सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया है. साथ ही आपदा प्रबंधन में आपदाओं की गहनता में वृद्धि तथा अंतराल में होने वाली कमी को ध्यान में रख कर 6 माह का अल्पकालिक पाठ्यक्रम भी शुरू कर दिया है. भारतीय परिस्थितिकी एवं पर्यावरण संस्थान, नई दिल्ली भी आपदा प्रबंधन में 2 वर्ष का स्नातकोत्तर स्तर का दूरवर्ती शिक्षा कार्यक्रम चला रहा है. भोपाल गैस त्रासदी के बाद सरकार ने सभी स्तरों पर प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन से संबंधित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू किए हैं. भारत सरकार ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण पहल की है. डिजास्टर मैनेजमैंट को स्कूल और प्रोफैशनल ऐजुकेशन में शामिल किया है.

योग्यता

सर्टिफिकेट कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं पास है, जबकि डिग्री स्तर के कोर्सों के लिए स्नातक होना अनिवार्य है. इस कोर्स में भौगोलिक विषयों की जानकारी रखने वाले छात्रों को प्राथमिकता दी जाती है. इस कोर्स में प्रवेश लेने वालों के अंदर परिस्थितियों से निबटने का जज्बा होना चाहिए. साइंस, कैमिस्ट्री, भूगोल और आर्किटैक्चर की जानकारी भी आवश्यक है. आपदा प्रबंधन में जोखिम, आपदा प्रबंधन, प्रिवेन्टिव थौट, आपदा नियंत्रण, आपदा तैयारी, आपदा संचार, आपदा कम करने के उपाय, बचाव आदि की जानकारी रखने वाले युवा इस क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य बना सकते हैं. कौशलता के साथ आगे बढ़ने वालों की इस कोर्स में खासी डिमांड है. आपदा प्रबंधन में दक्ष लोगों की सरकारी व निजी संस्थानों में काफी मांग है.

रोजगार की संभावनाएं

आपदा प्रबंधन क्षेत्र ने युवाओं के लिए रोजगार के शतप्रतिशत द्वार खोल दिए हैं. डिजास्टर मैनेजमैंट कोर्स करने के बाद इस कार्यक्षेत्र में जौब आसानी से मिल जाती है. सरकारी और निजी संस्थानों में आपदा विशेषज्ञों की खासी जरूरत होती है. कौरपोरेट जगत भी अपने यहां पेशेवर आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों को काम पर रख रहा है. इस के अलावा आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित युवा अपनी डिजास्टर मैनेजमैंट कंसल्टैंसी भी खोल सकते हैं. इस के लिए केंद्र व राज्य सरकारें उन्हें आवश्यक धन उपलब्ध कराती हैं. प्राइवेट सैक्टर में भी इस क्षेत्र में जौब की अपार संभावनाएं हैं. कैमिकल, साइजिंग, पैट्रोलियम जैसी इंडस्ट्रीज में आपदा विशेषज्ञों की नितांत आवश्यकता होती है. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी अपने यहां अनुभवी आपदा विशेषज्ञ रखती हैं.

प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान

– टाटा इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंस, मुंबई.

– इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली.

– देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर, मध्य प्रदेश.

– सैंटर फौर डिजास्टर मैनेजमैंट, पुणे, महाराष्ट्र.

– सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी औफ हैल्थ, मैडिकल ऐंड टैक्नोलौजिकल साइंसेज, गंगटोक, सिक्किम.

– गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली.

– ऐन्वायरन्मैंट प्रोटैक्शन टे्रनिंग ऐंड रिसर्च इंस्टिट्यूट, हैदराबाद.

– यूनिवर्सिटी औफ नौर्थ बंगाल, दार्जिलिंग.

– इंटरनैशनल सैंटर औफ मद्रास यूनिवर्सिटी, चेन्नई.

– नैशनल सैंटर फौर डिजास्टर मैनेजमैंट, इंद्रप्रस्थ एस्टेट, रिंग रोड, नई दिल्ली.

– एमिटी इंस्टिट्यूट औफ डिजास्टर मैनेजमैंट, नोएडा.

– सैंटर फौर सिविल डिफैंस कालेज, नागपुर.

– औल इंडिया डिजास्टर मिटिगेशन इंस्टिट्यूट,  अहमदाबाद.

– नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी, पटना.

– नैशनल इंस्टिट्यूट औफ डिजास्टर मैनेजमैंट

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अगर पैटर्न लौक भूल जाएं तो आजमाएं ये तरीके

आजकल हम सभी अपने-अपने फोन में लॉक लगाकर रखते हैं. वह इसलिए ताकि हमारी कोई भी पर्सनल चीज, चाहे वह चैट हो या पिक्चर्स कोई और न देख ले. लेकिन तब क्या हो अगर हम अपने फोन का पासवर्ड या एंड्रायड डिवाइस का लॉक कोड भूल जाएं.

अगर आप पासवर्ड या पैटर्न लॉक भूल गए हैं तो आपको नहीं पता होगा की आप अपना फोन अब कैसे अनलॉक करेंगे. यहां हम आपको 3 आसान से तरीकों के बारे में बताने वाले हैं, जिससे आपको अपने एंड्रायड डिवाइस या मोबाइल का पैटर्न लॉक खोलने में मदद मिलेगी.

1. फैक्ट्री रिसेट के जरिये अपने एंड्रायड को करें अनलॉक

यह आपके एंड्रायड डिवाइस को अनलॉक करने की सबसे आसान ट्रिक है. कोई भी इसे मात्र 1 मिनट में कर सकता है. लेकिन इस ट्रिक के साथ एक प्रॉब्लम है. वो यह की इससे आपके मोबाइल का सारा डाटा डिलीट हो जाएगा. आपके मोबाइल में मौजूद कॉन्टेक्ट डिटेल्स, एसएमएस, एप्स, म्यूजिक (जो फोन मैमोरी में सेव हों) आदि सब डिलीट हो जाएगा. अगर आपको डाटा का चिंता नहीं है तो आप इस ट्रिक का इस्तेमाल कर सकते हैं. अगर आपके मोबाइल में कुछ जरुरी डाटा है जो आप खोना नहीं चाहते, तो आप ट्रिक नंबर 2 का इस्तेमाल करें.

एंड्रायड डिवाइस को फैक्ट्री रिसेट से अनलॉक करने के लिए इन स्टेप्स को करें फॉलो :

– सबसे पहले उस एंड्रायड स्मार्टफोन को लें, जिसे अनलॉक करना है.

– इसके बाद फोन को स्विच ऑफ कर दें.

– अब कम से कम एक मिनट तक रुकें.

– अब + वॉल्यूम बटन और पावर बटन को एक-साथ दबाएं.

– आपकी डिवाइस रिकवरी मोड में ओपन हो जाएगी. इसमें से फैक्ट्री रिसेट बटन पर टैप करें.

– डाटा क्लीन करने के लिए wipe Cache पार्टीशन पर टैप करें.

– अब दोबारा 1 मिनट तक रुकें और अपना एंड्रायड डिवाइस स्टार्ट करें.

– अब आपका एंड्रायड डिवाइस अनलॉक हो चुका होगा.

2. एंड्रायड डिवाइस पैटर्न को एंड्रायड डिवाइस मैनेजर के जरिये करें अनलॉक

आप अपने एंड्रायड डिवाइस पासवर्ड या पैटर्न लॉक को एंड्रायड डिवाइस मैनेजर वेबसाइट के जरिये भी अनलॉक कर सकते हैं. यह वेबसाइट आपको बिना डिवाइस को इस्तेमाल किये आपको फोन कंट्रोल करने की पावर देती है. आप अपने मोबाइल फोन की लोकेशन भी ट्रेस कर सकते हैं. यह फीचर तब भी काम आ सकता है जब आपका फोन खो जाए या चोरी हो जाए. आइये जाने की इसके इस्तेमाल से आप अपना फोन अनलॉक कैसे कर सकते हैं.

यहां दिए गए लिंक से एंड्रायड डिवाइस मैनेजर साईट पर जाएं : https://www.google.com/android/find

अपना जीमेल आईडी एंटर करें, जो आपने अपने लॉक्ड एंड्रायड डिवाइस में इस्तेमाल किया था.

– अब लॉक के विकल्प पर क्लिक करें.

– डिवाइस पैटर्न लॉक को एंड्रायड डिवाइस मैनेजर के जरिये अनलॉक कर लें.

– नया पासवर्ड डालें और एक बार फिर अपना नया पासवर्ड कन्फर्म करें. बाकि बॉक्सेस को खाली छोड़ दें और दोबारा लॉक पर क्लिक करें.

– अब अपने एंड्रायड स्मार्टफोन को रिबूट करें.

– अब नया पासवर्ड एंटर करें जो आपने एंड्रायड डिवाइस मैनेजर से सेट किया था.

3. पैटर्न लॉक को अपनी डिवाइस से बाईपास करें

यह ट्रिक तभी काम करेगी जब आपके पास लॉक्ड मोबाइल डिवाइस में एक्टिव डाटा कनेक्शन होगा. अगर आपका डाटा कनेक्शन ऑन है तो आप आसानी से अपने स्मार्टफोन को अनलॉक कर सकते हैं.

इन स्टेप्स को करें फॉलो…

– अपने स्मार्टफोन को लें और उसमें 5 बार गलत पैटर्न लॉक ड्रा करें. अब आपको एक नोटिफिकेशन दिखाई देगी, जिसमें लिखा होगा की 30 सेकंड बाद ट्राय करें.

– अब उसमें फॉरगेट पासवर्ड का एक विकल्प मौजूद होगा.

– इसमें अपना जीमेल आईडी और पासवर्ड डालें, जो आपने लॉक्ड डिवाइस में डाला था. बस, अब आप नया पैटर्न लॉक सेट कर सकते हैं.

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परमानेंट मेकअप : ब्यूटी प्रौब्लम्स का सौल्शयून

खूबसूरत दिखना हर महिला की ख्वाहिश होती है. मगर इस के लिए रोज मेकअप में काफी सारा वक्त लगा पाना हर किसी के लिए संभव नहीं.

परमानेंट मेकअप सौंदर्य संबंधी सभी समस्याओं का स्थायी निदान है. यह सिर्फ मेकअप तकनीक ही नहीं, एक प्रकार से उपचार भी है. इसे आप टैटू आर्ट के समान मान सकते हैं. इस प्रक्रिया में नीडल के जरिए स्किन की अपर लेयर में पिग्मेंट पहुंचाया जाता है.

परमानेंट मेकअप में कई तरह के विकल्प मौजूद हैं. इस की जानकारी विस्तार से दी है, परमानेंट मेकअप एक्सपर्ट और आल्प्स ब्यूटी क्लिनिक्स की एक्जक्यूटिव डायरेक्टर, गुंजन गौर,

परमानेंट मेकअप के प्रकार

परमानेंट आईब्रोज

आईब्रोज का कलर लाइट हो या आईब्रो पतली हो या फिर बचपन की किसी चोट के चलते आईब्रो में कट हो जाने पर हमें डेलीडेली अपनी आईब्रोज की शेप को इंप्रूव करने के लिए आईब्रो पेंसिल का इस्तेमाल करना पड़ता है. लेकिन परमानेंट आईब्रोज बनवा कर आप इस समस्या से छुटकारा पा सकती हैं. इस के जरिए मशीन द्वारा एक बार आईब्रो को खूबसूरत शेप व मनचाहे रंग से बना दिया जाता है जो पसीने या नहाने से खराब नहीं होती है.

परमानेंट लाइनर व कोल

लेंस व चश्मे का इस्तेमाल करने वालों के लिए रोजरोज लाइनर व काजल लगाना दिक्कत का विषय हो जाता है. परमानेंट आईलाइनर और काजल से आप की ये समस्या सुलझ सकती है.

परमानेंट लिपलाइनर व लिपकलर

लिप्स को शेप देने के लिए परमानेंट लिपलाइनर लगवाया जा सकता है. ये लिपलाइनर आप के मनचाहे शेप के अनुसार लगाया जाता है और लगभग 4 से 10 वर्षों तक बरकार रहता है. पेल लिप्स को कलरफुल करने के लिए परमानेंट लिपस्टिक एक वरदान है. इस से होंठ तकरीबन 3-4 महीने तक गुलाबी व सुंदर बने रहेंगे.

परमानेंट ब्यूटी स्पोट

हुस्न में सेक्स अपील जोड़ने के लिए परमानेंट ब्यूटी स्पौट बनवा सकती हैं.

परमानेंट कलरिंग

यदि आप सफेद दाग या ल्यूकोडर्मा पैचेस की शिकार हैं तो परमानेंट कलरिंग की तकनीक आप के लिए किसी रामबाण से कम नहीं. इस के अंतर्गत स्किन से मैच करते कलर को त्वचा की डर्मिस लेयर तक पहुंचाया जाता है जिस से दाग छुप जाते हैं. परमानेंट कलरिंग का असर 2 साल से ले कर 15 साल तक बना रह सकता है.

कितने समय तक ठहरता है परमानेंट मेकअप

आमतौर पर सभी परमानेंट मेकअप लगभग 15 सालों तक टिके रहते हैं लेकिन लिप कलर केवल 3 से 4 महीने तक ही रहता है और परमानेंट कलरिंग का असर केस टू केस निर्भर करता है.

ट्रेंड में

मेकअप एक्सपर्ट की हमेशा कोशिश होती है कि वो महिला को उस से भी अच्छे से जान सके और उस की कमियों को पूरा कर सके. वैसे इन दिनों तो परमानेंट आईब्रो बनवाने को ले कर महिलाओं में काफी क्रेज देखा जा रहा है, ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि आईब्रो की सही शेप हमारे चेहरे को बेहतर फ्रेम प्रदान करती हैं और आप के लुक में खूबसूरत चेंज लाती है.

किन के लिए जरूरी

हर पल सुंदर दिखने की इच्छा रखने वाले तो परमानेंट मेकअप करवाना पसंद करते ही हैं. कैंसर के मरीज जो कीमोथेरैपी के दौरान अपनी आईब्रोज के बाल खो चुके होते हैं या फिर अक्सर तलाकशुदा लोग भी खुद को गम से उबारने के लिए अपने अंदर चेंज लाना चाहते हैं और इस कारण वो भी परमानेंट मेकअप को अपने लिए चुनते हैं. परमानेंट मेकअप की रेगुलर युवतियों की रुचि इस में निरंतर बनी रहती है.

जर्मन कलर्स और नीडल्स के द्वारा परमानेंट मेकअप किया जाता है. परमानेंट मेकअप का कोई साईड इफैक्ट नहीं है, बस इस प्रौसैस को करने के बाद हल्की सी रेडनेस नजर आती है जो 15 से 20 मिनट में चली जाती है. परमानेंट आईब्रो और परमानेंट आईलैश जौइनर जदातर वही करवाते हैं जिन की आईब्रो का कलर लाइट है व शेप किसी कारण खराब है. इस के अंतर्गत क्लाइंट की लैश लाइन के ऊपर स्किन और हेयर टोन से मैच करती एक ब्लैक लाइन बना दी जाती है जिस से लैशिज घनी व डार्क नजर आती है.

करियर वूमैन हो या हाउसवाइफ, हर स्त्री काम की अधिकता और समय की कमी से जूझ रही है. ऐेस में मेकअप करने के लिए उस के पास वक्त नहीं होता, परमानेंट मेकअप इस समस्या का बेहतरीन सौल्यूशन है.

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सनस्क्रीन लगाने का सही तरीका जानती हैं आप

चिलचिलाती गरमी के मौसम में टैनिंग की समस्या से बचने के लिए जाहिर है आप त्वचा को सुरक्षा कवच देने के लिए सनस्क्रीन का प्रयोग कर रही होंगी. लेकिन हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि सनस्क्रीन का सही तरीके से इस्तेमाल करना तो दूर आप को इस बात की भी जानकारी नहीं होगी कि त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए आप ने सुरक्षाकवच सही तरह से पहना भी है या नहीं. सनस्क्रीन कितने भी अच्छे ब्रैंड का क्यों न हो, अगर आप को उसे इस्तेमाल करने का सही तरीका पता नहीं है, तो वह आप की त्वचा पर बेअसर ही साबित होगा.

ऐसे में यदि अपनी त्वचा को सूर्य की नुकसानदायक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाना है तो इन टिप्स पर जरूर गौर फरमाएं:

चुनें सही सनस्क्रीन: बाजार में सनस्क्रीन कई रूपों में उपलब्ध है. मसलन, पाउडर, जैल, क्रीम आदि. सभी तरह का सनस्क्रीन बाजार में आसानी से तरहतरह के ब्रैंडों में उपलब्ध है. लेकिन सनस्क्रीन खरीदने से पहले खुद की स्किनटोन को पहचानना अनिवार्य है.

दरअसल, बाजार में मौजूद कुछ सनस्क्रीन चौकी इफैक्ट देने वाले भी होते हैं. यह सनस्क्रीन फेयर कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं के लिए तो ठीक है, लेकिन डस्की स्किन पर यह ग्रेइश इफैक्ट देता है, जो बड़ा ही भद्दा लगता है. इसलिए यदि आप की त्वचा सांवली है, तो आप माइक्रोनाइज्ड फौर्मूले वाले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. इस में सनस्क्रीन इफैक्ट कम होता है और त्वचा पर इस की परत दिखाई नहीं देती. लेकिन यह अल्ट्रावायलेट किरणों से त्वचा को पूरी तरह सुरक्षित रखता है. ऐसी त्वचा की ऊपरी परत पर पानी की बेहद कमी भी होती है. ऐसे में इस त्वचा पर ज्यादा मौइश्चराइजर फौर्मूला वाली क्रीम मददगार साबित होती है.

सही क्रम है जरूरी: अकसर सनस्क्रीन को महिलाएं कोरी त्वचा पर ही लगा लेती हैं, जो सही नहीं होता है. सब से पहले त्वचा पर मौइश्चराइजर लगाएं. उस के 20-30 मिनट बाद सनस्क्रीन लगाएं ताकि त्वचा पहले मौइश्चराइजर को अच्छी तरह सोख ले.

यदि आप चेहरे पर मेकअप लगाती हैं, तो सनस्क्रीन लगाने के बाद ही मेकअप का इस्तेमाल करें. यदि मेकअप नहीं लगाती हैं तो सनस्क्रीन ही आप के चेहरे पर लगने वाला आखिरी उत्पाद होना चाहिए.

दरअसल, सनस्क्रीन त्वचा पर एक सुरक्षा की परत होती है. यदि इस के ऊपर मेकअप के अलावा कुछ और लगाया जाए तो त्वचा पर इस का प्रभाव कम हो जाता है. इसी तरह यदि कोरी त्वचा पर सनस्क्रीन लगाया जाए तो भी सनस्क्रीन त्वचा पर उतना प्रभावशाली सुरक्षाकवच साबित नहीं हो पाता और त्वचा को सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों से पूरी तरह बचा पाने में भी नाकाम रहता है.

कुछ महिलाएं अपने मौइश्चराइजर में सनस्क्रीन को मिक्स कर के लगाती हैं. यह तरीका भी सही नहीं होता, क्योंकि इस से सनस्क्रीन का सारा प्रभाव खत्म हो जाता है.

सनस्क्रीन लगाएं और रुकें: यदि आप कैमिकल बेस्ड सनस्क्रीन का इस्तेमाल कर रही हैं, तो उसे लगाने के बाद 20-30 मिनट रुक कर ही धूप में जाएं ताकि क्रीम में मिले यूवी फिल्टर्स त्वचा अच्छी तरह सोख ले और उस पर एक सुरक्षाकवच बना दे.

इस्तेमाल में न करें कंजूसी: ज्यादातर महिलाएं थोड़ा सा सनस्क्रीन ले कर पूरे मुंह पर मल लेती हैं. ऐसा करने पर सनस्क्रीन का कोई फायदा त्वचा को नहीं मिलता. इस तरह सनस्क्रीन लगाना व्यर्थ है. सनस्क्रीन लगाने का सही तरीका यह है कि लगभग 1/4 छोटा चम्मच सनस्क्रीन ले कर पूरे चेहरे और गले के हिस्से को कवर किया जाए. यदि आप का सनस्क्रीन काफी थिक है, तो मात्रा घट सकती है.

यदि आप पूरी बौडी पर सनस्क्रीन लगाती हैं, तो लगभग 2 बड़े चम्मच सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. जाहिर है यह आप को बहुत ज्यादा लग रहा होगा, लेकिन आप सनस्क्रीन की जब तक मोटी परत त्वचा पर नहीं चढ़ाएंगी तब तक उस का कोई फायदा आप को नहीं मिलेगा.

लगाने का तरीका: सनस्क्रीन को त्वचा पर लगाने का तरीका आम क्रीम को लगाने के तरीके से अलग होता है. कभी सनस्क्रीन को त्वचा पर रगड़ कर न लगाएं, बल्कि हथेली में ले कर धीरेधीरे थपथपाएं. इस से त्वचा पर इरिटेशन महसूस नहीं होती और इस तरह सनस्क्रीन लगाने से त्वचा पर बराबर हिस्से में क्रीम लग जाती है, क्योंकि यह जरूरी है कि यदि आप सनस्क्रीन का इस्तेमाल कर रही हैं तो इस बात का भी ध्यान रखें कि वह चेहरे के हर हिस्से पर बराबर मात्रा में लगा हो. ऐसा न हो कि कोई हिस्सा छूट जाए. थपथपा कर सनस्क्रीन लगाने से यह आसानी से लग जाता है. यदि इसे रगड़ कर लगाया जाए तो यह त्वचा पर नहीं लगता, त्वचा से परत बन निकल जाता है.

कई बार लगाएं: कई महिलाएं सुबह घर से निकलने से पहले सनस्क्रीन लगाती हैं और फिर पूरा दिन उसी में बिता देती हैं, जबकि यह सही नहीं है. सनस्क्रीन हर 2 घंटे बाद लगाएं खासतौर पर तब जब आप का काम बाहर आनेजाने का ज्यादा हो और आप को बहुत पसीना आता हो.

व्यायाम और स्विमिंग करने से पहले भी सनस्क्रीन जरूर लगाएं. इस के अतिरिक्त यदि आप वेट टिशू का इस्तेमाल करती हैं तो उस के बाद भी सनस्क्रीन जरूर लगाएं, क्योंकि इस से त्वचा पर लगा सनस्क्रीन हट जाता है और सूर्य के संपर्क में आने से त्वचा डैमेज हो सकती है.

यदि आप धूप में ज्यादा नहीं निकलतीं या फिर दिन भर घर में ही रहती हैं तो दिन भर में 2-3 बार भी सनस्क्रीन लगाएंगी तब भी आप की त्वचा सुरक्षित रहेगी.

-तिशा कपूर खुराना ब्यूटी ऐक्सपर्ट, ऐग्जीक्यूटिव डायरैक्टर, बोटेगा द लुंगाविता

 

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भोजपुरी सिनेमा : न भोजपुर का, न मुंबई का

भोजपुरी सिनेमा ने भले ही 5 दशक से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है लेकिन उसके खाते में 10-12 बेहतरीन फिल्में भी नहीं है. हर साल 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्में बन रही हैं लेकिन हिन्दी फिल्मों की अंधी नकल की वजह से वह न तो प्योर भोजपुरी रह पाती है और न ही पूरी तरह से मुंबईया फिल्में ही बन पाती हैं. हिंदी फिल्मों की घटिया नकल कर भोजपुरी फिल्मकारों ने भोजपुरी फिल्मों का यह हाल कर दिया है कि उसमें भोजपुरी बोली के अलावा कुछ भी भोजपुरी नहीं रह गया है. इसे भोजपुरी फिल्मकारों का दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा कि वे भोजपुरी फिल्मों का नाम तक हिंदी में ही रखने लगे हैं.

पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ थी, जो 5 फरवरी 1962 में रीलीज हुई थी. 5 लाख रूपए में बनी उस फिल्म ने 75 लाख रूपए की कमाई की थी. विश्वनाथ प्रसाद शहाबादी की बनाई उस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया और धड़ाधड़ एक के बाद एक भोजपुरी फिल्में बनने लगीं. “संईया से भइल मिलनवा”, “तुलसी सोहे तोहार अंगना”, “सोलहो सिंगार करे दुलहनिया”, “बिदेसिया”, “पान खाए सैंया हमार”, “लागी नहीं छूटे राम” जैसी कई फिल्में सामने आई और भोजपुरी सिनेमा को नई ताकत मिली. बाद में यह हाल हुआ कि भोजपुरी सिनेमा माई, गंगा, भौजी, संईया, देवर आदि के नामों और किरदारों में उलझ कर रह गई. इससे आगे की सोच न होने की वजह से 1970 के आते-आते भोजपुरी सिनेमा की गाड़ी पूरी तरह से लड़खड़ा गई.

साल 1977 में हिन्दी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और वैंप एवं छोटे-मोटे रोल करने वाली प्रेमा नारायण भोजपुरी फिल्म “दंगल” में हीरो-हीरोइन बन कर आए. ‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी. ‘दंगल’ के गाना ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिल हिल जाए..’ ने तो धमाल ही मचा दिया. उस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने आवाज दी थी.

उसके बाद राकेश पांडे और पदमा खन्ना की जोड़ी ‘बलम परदेसिया’ लेकर आई, जिसने कामयाबी के झंडे गाड़ डाले. उसके बाद “धरती मैया”, “दूल्हा गंगा पार के”, “दगाबाज बलमा”, “संईया मगन पहलवानी में”, “हमार दूल्हा” जैसी बीसियों भोजपुरी फिल्में बनीं पर कोई खास धमाल नहीं पैदा कर सकीं. उसके बाद एक बार फिर भोजपुरी फिल्म इंडस्ड्री ‘कोमा’ में चली गई.

‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ साल 2003 में आई और उसने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर जान डाल दी. बिहार के भोजपुरी गायक मनोज तिवारी और रानी चटर्जी की इस फिल्म को मिली कामयाबी ने भोजपुरी सिनेमा के पर्दे को फिर से चमकदार बना दिया. उसके बाद तो एक बार फिर भोजपुरी फिल्मों की झड़ी लग गई. फिल्म वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि भोजुपरी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता का ही नतीजा था कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जैकी श्रापफ, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, रति अग्निहोत्री, नगमा, भाग्यश्री, भूमिका चावला जैसे बॉलीवुड के कलाकारों ने इसमें काम किया. इतना ही नहीं भोजपुरी सिनेमा ने कुणाल सिंह, राकेश पांडे, मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, सुदीप पांडे, पवन सिंह, राकेश मिश्रा, खेसारीलाल, पाखी हेगड़े, रानी चटर्जी, मोनालिसा, श्वेता तिवारी, दिव्या देसाई, रिंकू घोष जैसे कई कलाकारों ने खूब दौलत और शोहरत कमाई.

भोजपुरी फिल्मों के वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि हिंदी सिनेमा की कोरी नकल, फूहड़ डायलॉग और गीतों ने भोजपुरी सिनेमा का बहुत कबाड़ा किया है. इस वजह से ज्यादातर लोग परिवार के साथ फिल्म देखने से कतराते हैं. भोजपुरी फिल्में बनाने और उससे जुड़े लोगों का वहीं घिसा-पिटा तर्क है कि जो दर्शक देखना चाहता है, वही वे परोसते हैं. हीरो रवि किशन कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा के पॉजिटिव चीजों को देखा जाना चाहिए.

लोग अपनी सोच और बाजार के हिसाब से फिल्में बनाते हैं. एक बार जो चीज चल गई उसे ही कामयाबी की गारंटी मान लेना फिल्मकारों की बहुत पुरानी बीमारी है. जो करोड़ों रूपए खर्च कर फिल्म बनाएगा वह कमाई का ख्याल तो रखेगा ही. पब्लिक की पसंद के हिसाब से फिल्में बनती है. भोजपुरी फिल्मों की वजह से ही बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के सैंकड़ों सिनेमा हॉल बंद होने से बच गए.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग भले ही कुछ भी दावे कर लें पर यह सच है कि भोजपुरी सिनेमा को वह दर्जा नहीं मिल सका है, जो तमिल, तेलगू, मलयाली, बंगला, कन्नड़, मराठी फिल्मों को हासिल हो चुका है.

भोजपुरी फिल्मों के नामी विलेन उदय श्रीवास्तव कहते हैं कि इस इंडस्ट्री में बाहरी लोगों के घुसने से भोजपुरी फिल्मों की पहचान खत्म हो गई है. साउथ के लोग इसलिए भोजपुरी फिल्म बनाने लगे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे काफी ज्यादा कमाई है. वैसे लोगों को भोजपुरी की माटी की खूबी, उसकी संस्कृति और पहचान आदि से कोई लेना देना नहीं होता है. वह यही समझते हैं कि केवल भोजपुरी बोली में फिल्म बना देने से वह भोजपुरी फिल्म हो जाती है. आज के भोजपुरी फिल्मों में हिंसा और खून-खराबा की भरमार होने से औरतें ऐसी फिल्मों से कट चुकी हैं, जिससे फिल्में चल नहीं पाती हैं.

भारत समेत मॉरीसश, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिनाड आदि देशों में करीब 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलने-समझने वाले हैं. देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सबसे ज्यादा है. महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, गुजरात आदि राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं क्योंकि बिहार और उत्तरप्रदेश के हजारो-लाखों लोग वहां के कल-कारखानों में काम करते हैं. भोजपुरी सिनेमा के हीरो राजीव मिश्रा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खूबी जैसा आनंद लेते हैं. इसी वजह से दूसरे राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं. वहीं मिटटी की खूबी आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है और उसकी जगह पूरी तरह से मुंबईया फिल्मों के स्टाइल ने ले ली है.

हिंदी वाले भी अंग्रेजी टाइटल क्यों रखते हैं : राकेश मिश्रा

भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार राकेश मिश्रा भोजपुरी फिल्मों के हिन्दी टाइटल रखने के चलन के बारे में कहते हैं कि इसमें कोई खराबी नहीं है. साउथ के कई हिट फिल्में हिन्दी में बन रही है और ढेरों मुंबईया फिल्मों के नाम अंग्रजी में रखे जाते हैं. फिल्म बनाने वाला और फायनेंसर यही चाहता है कि किसी भी तरह से उसकी फिल्में हिट हो और उन्हें मुनाफा मिल सके. इसके लिए वह हर हथकंडा अपनाता है. राकेश का दावा है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने खूब तरक्की की है और आज भी उसकी कामयाबी का सफर जारी है. कई फिल्मों के ओवर बजट होने की वजह से इंडस्ट्री को थोड़ा झटका लगा था पर अब सब कुछ पटरी पर लौट आया है. हर इंडस्ट्री में कामयाबी के बाद उठा-पटक और बदलाव का दौर आता है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री नई तकनीक और पुरानी परंपरा के बीच छटपटा रही है और जल्द ही इसमें भी बदलाव दिखाई देगा.

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जेल अपराधों का स्कूल

जेल अपराधों का इलाज नहीं है, यह 3 मामलों ने और साफ  किया है. दिल्ली में 25 साला एक विवाहित औरत की एक पड़ोसी ने दिनदहाड़े सड़क पर हत्या कर खुद भी आत्महत्या कर ली. पड़ोसी देखते रहे पर कोई कुछ बोला नहीं. यह औरत हत्यारे की शिकायत कर चुकी थी और उसे 2 माह पहले जेल भी भेजा गया था पर जमानत पर बाहर आया था. 6 साल से वह इस औरत को तंग कर रहा था. उत्तर प्रदेश के रामपुर में एक युवक को हिरासत में लिया गया है, क्योंकि उस ने 10 साल की लड़की का बलात्कार किया था. उस ने 2012 में 8 साल की लड़की का भी बलात्कार किया था और 4 साल  जेल में भी रह चुका था. एक अन्य मामले में 34 साल के एक आदमी ने 21 साल की लड़की की सड़क पर खुलेआम 24 बार कैंची घोंपघोंप कर हत्या कर दी और देखने वाले उसे न रोक पाए. लड़का लड़की का कई सालों से पीछा कर रहा था.

अपराध विशेषज्ञ हमेशा से इस बात पर बहस करते रहे हैं कि क्या जेल में सुधार होता है या सिर्फ अपराधी को समाज से दूर किया जाता है? अपराध विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि जेल में जीवन चाहे कितना ही कठिन हो पर यह अपराधों का स्कूल भी है, जहां अपराध कैसे किए जाएं सिखाया जाता है. अपराधों पर नियंत्रण असल में जेलों से कम शिक्षा से ज्यादा आता है. जब पता चलने लगता है कि ईमानदारी से ज्यादा कमाई हो सकती है तो लोग अपराध कम करते हैं.  पर यह दावा भी अधूरा है, क्योंकि सभ्य देशों में अमेरिका में जनसंख्या के अनुपात में सब से ज्यादा अपराध होते हैं और वहां की जेलें कैदियों से ठसाठस भरी हैं. जेल चलाना वहां एक बड़ा व्यवसाय हो गया है और कई राज्यों ने यह काम ठेकों पर दे दिया है, जो जजों को प्रभावित कर के ग्राहक यानी कैदियों की संख्या बढ़वाने में लग गए हैं.

अमेरिका अमीर होते हुए भी सुरक्षित नहीं है और शहरी हों या गैरशहरी इलाके, अपराधियों से भरे हैं. इसीलिए वहां गन कंट्रोल चल नहीं पा रहा जबकि सिरफिरों ने कितने ही निहत्थे, निर्दोषों की अकारण हत्याएं कर डाली हैं. भारत में बलात्कार, औरतों पर जुल्म, दहेज हत्या आदि पर एकदम जेल में ठूंसने या फांसी पर चढ़ाने की जो बात होने लगती है वह बेमतलब की है. अदालतों को हर अपराधी को समय देना होगा कि वह खुद का बचाव कर सके साथ ही पैरोल और जमानत की सुविधाएं भी देनी ही होंगी. जेल समाज की सुरक्षा का रास्ता नहीं है. नैतिकता का पाठ पढ़ाना भी आसान नहीं है. अपराध सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं में मौतों की तरह हैं जो होते रहेंगे. समाज को इन दुखों को कैसे झेलें, यह सीखना और सिखाना होगा.

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