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पढ़ाई के साथ साथ ऐसे सिखाएं बच्चों को तहजीब

चलती ट्रेन में ठीक मेरे सामने एक जोड़ा अपने 2 बच्चे के साथ बैठा था. बड़ी बेटी करीब 8-10 साल की और छोटा बेटा करीब 5-6 साल का. भावों व पहनावे से वे लोग बहुत पढ़ेलिखे व संभ्रांत दिख रहे थे. कुछ ही देर में बेटी और बेटे के बीच मोबाइल के लिए छीनाझपटी होने लगी. बहन ने भाई को एक थप्पड़ रसीद किया तो भाई ने बहन के बाल खींच लिए. यह देख मुझे भी अपना बचपन याद आ गया.

रिजर्वेशन वाला डब्बा था. उन के अलावा कंपार्टमैंट में सभी बड़े बैठे थे. अंत: मेरा पूरा ध्यान उन दोनों की लड़ाई पर ही केंद्रित था.

उन की मां कुछ इंग्लिश शब्दों का इस्तेमाल करती हुई उन्हें लड़ने से रोक रही थी, ‘‘नो बेटा, ऐसा नहीं करते. यू आर अ गुड बौय न.’’

‘‘नो मौम यू कांट से दैट. आई एम ए बैड बौय, यू नो,’’ बेटे ने बड़े स्टाइल से आंखें भटकाते हुए कहा.

‘‘बहुत शैतान है, कौन्वैंट में पढ़ता है न,’’ मां ने फिर उस की तारीफ की.

बेटी मोबाइल में बिजी हो गई थी.

‘‘यार मौम मोबाइल दिला दो वरना मैं इस की ऐसी की तैसी कर दूंगा.’’

‘‘ऐसे नहीं कहते बेटा, गंदी बात,’’ मौम ने जबरन मुसकराते हुए कहा.

‘‘प्लीज मौम डौंट टीच मी लाइक ए टीचर.’’

अब तक चुप्पी साधे बैठे पापा ने उसे समझाना चाहा, ‘‘मम्मा से ऐसे बात करते हैं-’’

‘‘यार पापा आप तो बीच में बोल कर मेरा दिमाग खराब न करो,’’ कह बेटे ने खाई हुई चौकलेट का रैपर डब्बे में फेंक दिया.

‘‘यह तुम्हारी परवरिश का असर है,’’ बच्चे द्वारा की गई बदतमीजी के लिए पापा ने मां को जिम्मेदार ठहराया.

‘‘झूठ क्यों बोलते हो. तुम्हीं ने इसे इतनी छूट दे रखी है, लड़का है कह कर.’’

अब तक वह बच्चा जो कर रहा था और ऐसा क्यों कर रहा था, इस का जवाब वहां बैठे सभी लोगों को मिल चुका था.

दरअसल, हम छोटे बच्चों के सामने बिना सोचेसमझे किसी भी मुद्दे पर कुछ भी बोलते चले जाते हैं, बगैर यह सोचे कि वह खेलखेल में ही हमारी बातों को सीख रहा है. हम तो बड़े हैं. दूसरों के सामने आते ही अपने चेहरे पर फौरन दूसरा मुखौटा लगा देते हैं, पर वे बच्चे हैं, उन के अंदरबाहर एक ही बात होती है. वे उतनी आसानी से अपने अंदर परिवर्तन नहीं ला पाते. लिहाजा उन बातों को भी बोल जाते हैं, जो हमारी शर्मिंदगी का कारण बनती हैं.

आज के इस व्यस्ततम दौर में अकसर बच्चों में बिहेवियर संबंधी यही समस्याएं देखने को मिलती हैं. जैसे मनमानी, क्रोध, जिद, शैतानी, अधिकतर पेरैंट्स की यह परेशानी है कि कैसे वे अपने बच्चों के बिहेवियर को नौर्मल करें ताकि सब के सामने उन्हें शर्मिंदा न होना पड़े. बच्चे का गलत बरताव देख कर हमारे मुंह से ज्यादातर यही निकलता है कि अभी उस का मूड सही नहीं है. परंतु साइकोलौजिस्ट और साइकोथेरैपिस्ट का कहना है कि यह मात्र उस का मूड नहीं, बल्कि अपने मनोवेग पर उस का नियंत्रण न रख पाना है.

इस बारे में बाल मनोविज्ञान के जानकार डा. स्वतंत्र जैन आरंभ से ही बच्चों को स्वविवेक की शिक्षा दिए जाने के पक्ष में हैं ताकि बच्चा अच्छेबुरे में फर्क करने योग्य बन सके. अपने विचारों को बच्चों पर थोपना भी एक तरह से बाल कू्ररता है और यह उन्हें उद्वेलित करती है.

क्या करें

– बच्चों के सामने आपस में संवाद करते वक्त बेहद सावधानी बरतें. आप का लहजा, शब्द बच्चे सभी कुछ आसानी से कौपी कर लेते हैं.

– बच्चों को किसी न किसी क्रिएटिव कार्य में उलझाए रखें. ताकि वे बोर भी न हों और उन में सीखने की जिज्ञासा भी बनी रहे.

– अपने बीच की बहस या झगड़े को उन के सामने टाल दें. बच्चों के सामने किसी भी बहस से बचें.

– बच्चों को खूब प्यार दें. मगर साथ ही जीवन के मूल्यों से भी उन का परिचय कराते चलें. खेलखेल में उन्हें अच्छी बातें छोटीछोटी कहानियों के माध्यम से सिखाई जा सकती हैं. इस काम में बच्चों के लिए कहानियां प्रकाशित होने वाली पत्रिका चंपक उन के लिए बेहद मनोरंजक व ज्ञानवर्धक साबित हो सकती है.

– रिश्तों के माने और महत्त्व जानना बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए उतना ही जरूरी है, जितना एक स्वस्थ पेड़ के लिए सही खादपानी का होना.

– समयसमय पर अपने बच्चों के साथ क्वालिटी वक्त बिताएं. इस से आप को उन के मन में क्या चल रहा है, यह पता चल सकेगा और समय पर उन की गलतियों को भी सुधारा जा सकेगा.

– बच्चों के हिंसक होने पर उन्हें मारनेपीटने के बजाय उन्हें उन की मनपसंद ऐक्टिविटी से दूर कर दें. जैसे आप उन्हें रोज की कहानियां सुनाना बंद कर सकते हैं. उन से उन का मनपसंद खिलौना ले कर कह सकते हैं कि अगर उन्होंने जिद की या गलत काम किए तो उन्हें खिलौना नहीं मिलेगा.

क्या न करें

– बच्चों को बच्चा समझने की भूल हरगिज न करें. माना कि आप की बातचीत के समय वे अपने खेल या पढ़ाई में व्यस्त हैं. पर इस दौरान भी वे आप की बातों पर गौर कर सकते हैं. समझने की जरूरत है कि बच्चों को दिमाग हम से अधिक शक्तिशाली व तेज होता है.

– बच्चों पर अपनी बात कभी न थोपें, क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें अच्छी बातें भी बोझ लगती हैं, लिहाजा बच्चे निराश हो सकते हैं. सकारात्मक पहल कर उन्हें किसी भी काम के फायदे व नुकसान से बड़े प्यार से अवगत कराएं.

– बच्चों की कही किसी भी बात को वक्त निकाल कर ध्यान से सुनें. उसे इग्नोर न करें.

– बच्चों की तुलना घर या बाहर के किसी दूसरे बच्चे से हरगिज न करें. ऐसा कर आप उन के मन में दूसरे के प्रति नफरत बो रहे हैं. याद रहे कि हर बच्चा अपनेआप में यूनीक और खास होता है.

– आज के अत्याधुनिक युग में हर मांबाप अपने बच्चों को स्मार्ट और इंटैलिजैंट देखना चाहते हैं. अत: बच्चों के बेहतर विकास के लिए उन्हें स्मार्ट अवश्य बनाएं. पर समय से पूर्व मैच्योर न होने दें.

– बच्चों को अपने सपने पूरा करने का जरीया न समझें, बल्कि उन्हें अपनी उड़ान उड़ने दें. मसलन, जिंदगी में आप क्या करना चाहते थे, क्या नहीं कर पाए. उस पर अपनी हसरतें न लादें, बल्कि उन्हें अपने सपने पूरा करने का अवसर व हौसला दें ताकि बिना किसी पूर्वाग्रह के वे अपनी पसंद चुनें और सफल हों.

– विशेषज्ञों की राय अनुसार बच्चों से बाबा, भूतप्रेत आदि का डर दिखा कर कोई काम करवाना बिलकुल सही नहीं है. ऐसा करने से बच्चे काल्पनिक परिस्थितियों से डरने लगते हैं. इस से उन का मानसिक विकास अवरुद्ध होता है और वे न चाहते हुए भी गलतियां करने लगते हैं.

उगते सूर्य पर भी जनता लगा चुकी है ग्रहण

पूर्वोत्तर राज्यों खासतौर से त्रिपुरा में भाजपा की अप्रत्याशित जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछकुछ ऋषिमुनियों के अंदाज में कहा था कि डूबते सूरज का रंग लाल और उगते का भगवा होता है. प्रतीकात्मक रूप में कसे गए इस ताने पर कम्युनिस्टों के पास खामोश रहने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था. यह उगता सूर्य धूप दे पाता, इस के पहले ही उत्तर प्रदेश और बिहार में उस पर ग्रहण लग गया.

राजनीति में हारजीत यों आम बात है. अच्छा यह है कि नरेंद्र मोदी को 2014 और 2018 में फर्क समझ आने लगा है और खुद मोदीमोदी चिल्लाने वाली जनता उन्हें हार की आदत डाल रही है. इस के बाद भी दिलचस्प बात यह है कि गोरखपुर और फूलपुर के नतीजों पर किसी ने मोदी को सारा दोष नहीं दिया.

बड़े कर्ज के लिए बैंक लेंगे पासपोर्ट का ब्योरा

बैंकों से बड़े कर्ज ले कर विदेश रवाना होना अब किसी के लिए आसान नहीं होगा. बड़े कर्जदारों पर बैंकों ने सख्ती शुरू कर दी है ताकि घोटाला कर के वे विजय माल्या तथा नीरव मोदी की तरह विदेशों में शरण नहीं ले सकें. फिलहाल बैंकों को कहा गया है कि वे 50 करोड़ रुपए से ज्यादा के सभी कर्जदारों की सूची तैयार करें और उस में उन के पासपोर्ट का विवरण रखें.

अब बैंकों से कोई भी व्यक्ति इस राशि से ज्यादा ऋण लेगा, तो उस के पासपोर्ट का विवरण बैंकों को अपने पास रखना होगा. यदि कर्जदार के पास पासपोर्ट नहीं है तो उसे एक घोषणापत्र देना होगा जिस में वह उल्लेख करेगा कि उस के पास पासपोर्ट नहीं है. इस के अलावा बैंकों को 250 करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्जदारों पर कड़ी नजर रखने को कहा गया है.

बैंकों को देखना होगा कि कर्जदार नियमों का उल्लंघन न करें और समय पर बैंकऋण की किस्त देते रहें. कर्जदार की गतिविधि संदेहास्पद होने की स्थिति से उस के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही के लिए कदम उठाए जाएंगे. बैंक यह भी देखेंगे कि एक कर्जदार एक से ज्यादा बैंकों से कर्ज ले रहा है तो उन्हें इस की सूचना भी रखनी होगी.

बैंकों में आम लोगों के पैसे की लूट पर रोक लगानी आवश्यक है. देश में सब से बड़ा बैंक घोटाला होने के बाद सरकार का इस तरह के कदम उठाना जरूरी भी है. नीरव मोदी बैंक घोटाले के बाद बैंक घोटालों को ले कर विपक्षी दल जो तथ्य सामने ला रहे हैं उन के अनुसार 3 साल के दौरान 70 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला हुआ है. नीरव मोदी घोटाला 11,700 करोड़ तथा विजय माल्या घोटाला 9,000 करोड़ रुपए का है.

भविष्य की तकनीक पर युवा रखें नजर

भारतीय जनता पार्टी ने देश पर एकछत्र राज तो स्थापित कर लिया है पर वह अभी भी युवाओं के मन में वह उत्साह पैदा नहीं कर पाई है जो आमतौर पर चुनाव पर चुनाव जीतने वाले नरेंद्र मोदी जैसे सफल नेता पैदा कर देते हैं. देश की युवा पीढ़ी हर रोज नए खतरों की आहट सुन रही है. जब दुनिया तकनीक व नए कुशल प्रबंधन के आयाम देख रही है, हमारी सुर्खियों में पेरियार व अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने, लवजिहाद के नाम पर हमले, पद्मावत जैसी फिल्मों पर विवाद, नीरव मोदी जैसे बेईमानों, गौरक्षा के नाम पर हत्याओं, मंदिर की जिद आदि की कनफोड़ आवाजें सुनाई देती हैं.

कल आज से बेहतर होगा ऐसा लगता ही नहीं है क्योंकि दुनिया की नई तकनीक पर हमारा भरोसा केवल इतना है कि हम उसे खरीद सकते हैं, बना नहीं सकते. विदेशी बाहर से आ कर कारखाने लगा लें, अपने मैनेजर ले आएं और मुगलों व अंगरेजों की तरह हमारे युवाओं को नौकर रख कर काम करा लें. इतना भर दिख रहा है.

भारतीय जनता पार्टी की लगातार चुनावी जीतों से साफ है कि देश के एक बड़े वर्ग की रुचि पिछले कल में है, अगले कल में नहीं. लोग पाखंड और झूठ के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें सच साबित करने के लिए न केवल झूठ का सहारा लेना पड़ रहा है, बल्कि वे झूठ पर आधारित सरकारों का अंधा समर्थन भी कर रहे हैं. अगर आज का युवा परीक्षाओं में नकल पर ज्यादा जोर दे रहा है तो इसलिए कि उसे मालूम है कि इस झूठ के बल पर मिली नौकरी में वह मजे में पूरी जिंदगी निकाल देगा. इस तरह वह झूठ पर झूठ बोल सकता है और निकम्मा रह कर भी कमाऊ बन सकता है. देश के खून में तो सदियों से झूठ के विषाणु रहे हैं पर आज जब उस का इलाज संभव है तब भी कोई, कहीं दवा की चिंता नहीं कर रहा है.

अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों की तरह भारत अनाचार और अत्याचार का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है. 10-15 वर्षों पहले जिस भारत ने बेंगलुरु के माध्यम से विदेशी गोरों को भयभीत कर दिया था, लेकिन अब वे ही किसी दिन इन्फोसिस और टाटा कंसल्टैंसी जैसी भारतीय कंपनियों को खरीद ही न लें, यह डर लगने लगा है.

देश के युवाओं को आज पुरातन का जो जबरन पाठ पढ़ाया जा रहा है, वह जो थोड़ीबहुत प्रगति हम ने देखी थी उसे लील जाएगा. देश का युवा आगे की न सोच कर, भगवा दुपट्टे के सहारे चौराहे पर खड़ा हो कर, पुराने को फिर से स्थापित करना चाह रहा है. क्या नई डिगरियां चोटी, तिलक के सहारे ही मिलेंगी? नए चुनावी परिणाम तो कुछ यही संकेत दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में भगवाई हार से कुछ ज्यादा फर्क न पड़ेगा क्योंकि यह पुरातनवादी सोच अंदर गहरे तक दब चुकी है.

खुशखबरी : Xiaomi लाई दो दिन की ‘एमआई फैन फेस्ट सेल’, जानें क्या है खास

अगर आप Xiaomi के फैन हैं और इसके प्रोडक्ट खरीदने की सोच रहे हैं, तो यही सही मौका है. आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों तो बता दें कि गुरुवार और शुक्रवार को Xiaomi अपने प्रशंसको के लिए Xiaomi एमआई फैन फेस्ट का आयोजन कर रही है. इसलिए आपके लिए ये दो दिन खुशखबरी भरे हो सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां पर आपको उसके उत्पाद छूट के साथ मिलेंगे. बता दें कि Xiaomi एमआई फैन फेस्ट बुधवार रात 12 बजे से शुरू हो चुकी है. Xiaomi की इस सेल में स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, एक्सेसरीज को छूट के साथ बिक्री के लिए उतारा गया है.

ग्राहकों को इस सेल में 7,500 या इससे ऊपर की खरीदारी पर 5 फीसदी की तत्काल छूट दी जाएगी. हालांकि यह छूट एसबीआई कार्ड धारकों के लिए होगी. इसी के साथ ही Xiaomi का रेडमी नोट 5 प्रो खरीदने पर एमआई इयरफोन मुफ्त में दिए जाएंगे. साथ ही रेडमी नोट 5 प्रो के साथ गोआईबीबो कूपन भी शामिल किए गए हैं.

यहां आपको Xiaomi का नया स्मार्टफोन एमआई मिक्स 2 एस जीतने का मौका भी मिलेगा. कंपनी ने 4 लाख कीमत के कूपन भी जारी किए हैं, जिसे जितने के साथ ही मी फैन सेल में Redmi 5A  जीतने का मौका भी आपको मिलेगा.

सबसे बड़ा डिस्काउंट Mi Mix 2 पर रखा गया है. यह स्मार्टफोन सेल में 29,999 रुपये में खरीदा जा सकता है. इसकी वास्तविक कीमत 32,999 रुपये है. दूसरी बड़ी छूट  Mi Max 2 पर है, जिसे सेल में 12,999 रुपये में खरीदने का मौका है. अगला स्मार्टफोन है Redmi 4, जिस पर 500 रुपये की छूट है. स्मार्टफोन की एक्सेसरीज पर भी यहां 100 रुपये की विशेष छूट दी जा रही है.

इन तमाम औफरो के साथ ही Xiaomi प्री-कनफिगर्ड कौम्बो औफर भी लेकर आई है. ट्रैवल स्पेशल, पावर कौम्बो औफर का लाभ भी यहां उठाया जा सकता है. ट्रैवल स्पेशल में मी ट्रैवल बैकपैक के साथ सेल्फी स्टिक शामिल है. पावर कौम्बो में मी यूएसबी केबल 80 सीएम के साथ 9 वोल्ट का इंडिया स्टैंडर्ड ऐडेप्टर रखा गया है. क्रेजी कौम्बो में 3 प्री-कनफिगर्ड कौम्बो हैं –

-Redmi 5A + Mi LED Smart TV 4A 32,

-Mi Band – HRX Edition + Mi Band Strap – HRX Edition

-Mi Bluetooth Speaker Basic 2 + Mi Earphones Basic.

क्रेजी कौम्बो का लाभ मी स्टोर ऐप पर आज गुरुवार सुबह 11 बजे से मिलना शुरू हो गया है.

जैसा कि हम पहले एसबीआई के 5 फीसदी वाले डिस्काउंट का जिक्र कर चुके हैं, इसमें यूजर को छूट उनके ईएमआई लेन-देन पर मिलेगी. ध्यान दें, यूजर को 14 फीसदी (छूट वाली कीमत के हिसाब से) ईएमआई कनवीनिएंस फीस चुकाना अनिवार्य होगा.

बिकने वाली है फ्लिपकार्ट, इन कंपनियों ने दिखाई दिलचस्पी

ई-कौमर्स सेगमेंट में भारत की सबसे बड़ी औनलाइन शौपिंग कंपनी फ्लिपकार्ट बिक सकती है. कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही फ्लिपकार्ट को खरीदने के लिए दो बड़ी कंपनियों ने औफर करने का मन भी बना लिया है. एक खबर के मुताबिक, फ्लिपकार्ट को खरीदने के लिए अमेरिकी कंपनी अमेजोन ने दिलचस्पी दिखाई है. अमेजोन जल्द ही इसके लिए औफर कर सकती है. उधर, दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी वौलमार्ट भी इस रेस में नजर आ रहा है.

बड़ी हिस्सेदारी खरीदना चाहती है वौलमार्ट

फ्लिपकार्ट को खरीदने में जहां अमेजोन औफर करने का मन बना रही है. वहीं, वौलमार्ट कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी खरीदना चाहती है. सूत्रों की माने तो वौलमार्ट 40 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए फ्लिपकार्ट से बातचीत कर रही है.

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अमेजोन ने खारिज की डील की खबर

फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी या उसे खरीदने की खबरों को अमेजोन ने खारिज किया है. उसके मुताबिक ऐसी किसी डील की संभावना नहीं है. उधर, फ्लिपकार्ट ने भी इस खबर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. वहीं, मीडिया में ऐसी खबरें है कि वौलमार्ट की फ्लिपकार्ट के साथ 40 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए बातचीत हो रही है.

अमेजोन और वौलमार्ट में रेस

फ्लिपकार्ट को खरीदने के लिए अमेजोन का औफर और वौलमार्ट की हिस्सेदारी में दिलचस्पी इस बात को साफ दिखाती है कि दोनों दिग्गजों का मुकाबला जबरदस्त है. सूत्रों के मुताबिक, वौलमार्ट प्राइमरी और सेकेंडरी शेयर खरीद के फ्लिपकार्ट में बड़ी हिस्सेदारी चाहती है.

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21 अरब डौलर की फ्लिपकार्ट

खबरों के मुतबाकि, फ्लिपकार्ट की कुल वैल्यू इस वक्त 21 अरब डौलर के आसपास आंकी गई है. वौलमार्ट के साथ डील होने से फ्लिपकार्ट और बड़ी कंपनी होगी. ऐसे में उसे अपने प्रतिद्वंदी अमेजोन से मुकाबले करने में मदद मिलेगी. इंडियन ई-कौमर्स बाजार में अमेजोन और फ्लिपकार्ट में हमेशा से टक्कर रही है.

अमेजोन की भारतीय बाजार पर नजर

अमेजोन की भारतीय बाजार पर नजर काफी पहले से है. वह अपने एक्सपेंशन प्लान को लेकर भी गंभीर है. उसने भारतीय बाजार में करीब 5 अरब डौलर के निवेश की योजना भी बना रखी है. ऐसे में अगर फ्लिपकार्ट के साथ डील होती है तो उसका करीब 70 फीसदी भारतीय बाजार पर कब्जा होगा. अभी फ्लिपकार्ट की भारतीय औनलाइन मार्केट में 40 फीसदी हिस्सेदारी है.

सेना की कुर्बानी की वजह से ही हम खुशी मना पाते हैं : धोनी

मुंबई में वर्ल्डकप 2011 के फाइनल में यादगार छक्का जड़कर भारत को खिताब दिलाने के ठीक सात साल बाद महेंद्र सिंह धोनी एक बार फिर सभी के आकर्षण का केंद्र बने, जब इस खिलाड़ी ने सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल की वर्दी में पद्म भूषण पुरस्कार स्वीकार किया. धोनी के लिए यह खुशनुमा संयोग रहा कि उन्हें यह प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान वर्ल्डकप जीत की 7वीं वर्षगांठ के मौके पर दिया गया. बता दें कि भारत ने 2 अप्रैल 2011 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में 28 साल बाद दूसरी बार वर्ल्ड कप जीता था.

बता दें कि महेंद्र सिंह धोनी को सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद उपाधि दी हुई है. धोनी के नेतृत्व में भारत के दूसरी बार 50 ओवर का विश्व कप जीतने के बाद भारतीय प्रादेशिक सेना ने एक नवंबर 2011 को उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल के मानद पद से सम्मानित किया था. कपिल देव के बाद धोनी भारत के दूसरे क्रिकेटर हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया गया. धोनी ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से यह पुरस्कार हासिल किया.

पद्म भूषण अवौर्ड लेने बाद महेंद्र सिंह धोनी ने अपने औफिशियल इंस्टाग्राम पर इस समारोह की कुछ तस्वीरें शेयर की. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि पद्म भूषण सम्मान मिलना एक बहुत बड़ी बात है और सेना की वर्दी में इस पुरस्कार को लेना खुशी को और भी बढ़ा देता है. धोनी इसी के साथ सेना के जवानों का शुक्रिया भी अदा किया.

धोनी ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा- जो भी महिला या पुरुष वर्दी में रहकर देश की सेवा कर रहे हैं और उनके परिवार भी जो कष्ट उठा रहे हैं उसके लिए उनका धन्यवाद. आपकी कुर्बानी की वजह से ही हम लोग खुशी मना पाते हैं और अपने अधिकारों को जी पाते हैं.

ये सम्मान भी पा चुके हैं धोनी

महेंद्र सिंह धोनी ने कई सम्मान भी हासिल किए हैं, जैसे 2008 में आईसीसी वनडे ‘प्लेयर औफ द ईयर अवौर्ड (प्रथम भारतीय खिलाड़ी जिन्हें यह सम्मान मिला), राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार और 2009  में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मश्री पुरस्कार साथ ही 2009 में विसडेन के सर्वप्रथम ड्रीम टेस्ट इलेवन टीम में धोनी को कप्तान का दर्जा दिया जा चुका है.

सच कौन बोल रहा है? संदीप सिंह या उनके खिलाफ दर्ज शिकायत

एक वेब पोर्टल के अनुसार ‘‘सरबजीत’’ और ‘‘भूमि’’ फिल्मों का सह निर्माण कर चुके संदीप सिंह पर मौरिशस के एक होटल में स्विट्जरलैंड से आए एक अवयस्क बालक के साथ यौन शोषण का मामला दर्ज किया गया है. संदीप सिंह, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक उमंग कुमार के बिजनेस पार्टनर भी हैं. ‘इंडियन लीगल स्टोरीज दैट काउंट’ के अनुसार स्विट्जरलैंड का यह अवयस्क बालक अपने परिवार के साथ मौरिशस छुट्टियां मनाने गया हुआ था. जबकि 37 वर्षीय भारतीय फिल्म निर्माता संदीप सिंह यानी कि संदीप विनोद कुमार सिंह अपनी नई फिल्म के लिए लोकेशन देखने मौरिशस गए हुए थे. दोनों एक ही होटल में रूके हुए थे.

संदीप 29 मार्च 2018 को होटल के बीच पर इस बालक से मिले और उसके साथ सिनेमा तथा संगीत पर लंबी चैड़ी बातें करते हुए उसके साथ दोस्ती कर ली. फिर संदीप विनोद कुमार सिंह उस बालक को लेकर अपने होटल के कमरे में गए, जहां उन्होंने उस बालक के साथ यौन शोषण का दुष्कर्म किया. किसी तरह वह बालक भागकर अपने पिता के पास गया और सारा सच उसने अपने पिता के सामने बयां कर दिया. उस बालक के पिता ने तुरंत होटल के सिक्यूरिटी से संपर्क साधा, पर कोई मिला नहीं. जब उस बालक के पिता का सिक्यूरिटी वालों से संर्पक हुआ, तो इस बारे में सिक्यूरिटी वाले ने कोई कारवाही करने में रूचि नहीं दिखायी. इसी बीच मौका पाकर संदीप विनोद कुमार सिंह 30 मार्च को वहां से वापस भारत लौट आए.

संदीप सिंह की सफाईः

मजेदार बात यह है कि 30 मार्च मुंबई वापस लौट आए संदीप सिंह अब तक चुप थे. मगर 4 अप्रैल को जब मीडिया में मौरिशस की घटना की चर्चा शुरू हुई, तो संदीप सिंह ने चार अप्रैल को देर शाम अपने पी आर के माध्यम से कुछ पत्रकारों को ईमेल पर अपना पक्ष भिजवाया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि मौरिशस में उनके साथ गलत हुआ. उनके साथ धोखा हुआ. इस बयान में संदीप सिंह ने कहा- ‘‘मैं अपनी आने वाली फिल्म की रेकी के लिए मौरिशस में था, तब मुझे एक अजनबी ने टोका. जब मैं उसकी मदद के लिए आगे बढ़ा, तो उसने मेरे साथ ही गड़बड़ी की. मुझे इस बात का डर लगा कि उसने मेरे पासपोर्ट की फोटो निकाल ली और मुझे धमकी भरे ईमेल लिखने लगा. मैं वहां के स्थानीय प्रशासन का शुक्रिया अदा करता हूं, जिन्होंने मुझे मेरा पासपोर्ट वापस दिलाने में मदद की.’’.

संदीप सिंह के प्रचारक ने अपने ईमेल में लिखा है- ‘‘घटना 29 मार्च की है. जब निर्माता संदीप सिंह अपनी फिल्म की रेकी के लिए मौरिशस में थे. उस दिन एक विदेशी ने उनके साथ झगड़ा किया और उनका पासपोर्ट, बटुआ, मोबाइल फोन सहित कई मूल्यवान चीजें चुरा ली. उसने न सिर्फ उनसे हाथापायी की, बल्कि उनके पासपोर्ट की फोटो निकाल ली. बाद में नकली ईमेल आई डी बनाकर  जबरन वसूली के ईमेल भेजने लगा. वह हर हाल में निर्माता से पैसे चाहता था. पर स्थानीय पुलिस ने नकली ईमेल का राज खोलकर इस तरह का हमला करने वाले को पकड़ा और निर्माता की सारी मूल्यवान चीजे वापस दिलायीं.

अब सच क्या है..यह तो मौरिशस पुलिस व प्रशासन ही बता सकता है.

महाकुंभ : पुण्य कमाने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं

सोमवती अमावस्या पर हरिद्वार में महाकुंभ स्नान की बात श्रीकर टाल नहीं पाया. पत्नी ने जो दलील दी वह कुछ इस तरह थी, ‘कुसुम कह रही हैं यह शाही स्नान 714 वर्षों बाद आ रहा है. यह जीवन तो संयोगों का मेला है. आप चल पड़ो तो ठीक है वरना हम तो जाने वाली हैं.’

सोमवती अमावस्या पर देशविदेश के शीर्ष महंतों, संतों, साधुओं के स्नान से पूर्व कुसुम चाहती हैं कि वे इस से पहले संक्रांति स्नान और अमावस्या के बाद पहला नवरात्र स्नान भी कर लें तो जीवन का महापुण्य कमा लेंगी. श्रीमती ने अपनी अगली बात भी श्रीकर से स्वीकार करवा ली.

संक्रांति से पूर्व वे हरिद्वार पहुंच गए. कनखल बाईपास में एक होटल बुक था. गंगा की हर की पौड़ी यहां से 4 किलोमीटर दूर थी. भीड़ को देखते हुए सुबह 5 बजे स्नान के लिए जाने का निर्णय लिया गया.

श्रीकर ने पत्नी से कहा, ‘‘भीड़ के रेले के रेले पूरी रात से आते देख रहा हूं. लगता है सीधे रास्ते से सुबह पुलिस जाने नहीं देगी. तुम कुसुम, उन की बहन व भाभी को बता देना कि सुबह रिकशा, आटो कुछ भी नहीं मिलने वाला. पैदल ही चलना पड़ेगा 8-10 किलोमीटर. होटल वाले बता रहे थे ट्रैफिक पुलिस ने कुछ इस तरह से भीड़ को बांटा है ताकि कोई अनहोनी न घटे.

सुबह जब चले तो 3 घंटे का सफर  तय करने पर भी हर की पौड़ी नजर नहीं आ रही थी. बाईपास की सड़क से कई क्रौस, कई घाट, कई पुल पार कर लिए, तब कहीं उन्हें लगा कि अब हर की पौड़ी के पास पहुंच गए हैं. लग रहा था कि पूरा हिंदुस्तान यहीं उमड़ पड़ा है महाकुंभ स्नान के लिए. शाही स्नान पर नहाना मिले या नहीं, सब आज के ही दिन संक्रांति का पुण्य कमा लेना चाह रहे थे.

बहुत देर तक गंगा में डुबकी लगाने का मौका नहीं मिल रहा था. सुरक्षाकर्मी जबरदस्ती दोचार डुबकियों के बाद लोगों को बाहर खींच रहे थे, ‘चलो, चलो, औरों को भी स्नान करना है.’

ट्रैफिक पुलिस आनेजाने वालों को उन की दिशाओं की ओर धकेल रही थी.

हमारा वापसी का सफर भी लंबा था. हम जिस रास्ते से आए थे उसी से वापस मुड़ना था. रास्ते में छोटेबड़े सब पूछते मिल रहे थे, ‘हर की पौड़ी अभी और कितनी दूर है?’

‘चलतेचलते, पहुंच ही जाओगे,’ इस उत्तर से दूरी स्वयं पता चल रही थी. श्रीकर से पत्नी ने कहा, ‘सुनते हो जी, कुसुम, उन की बहन, भाभी से पैदल चलना मुश्किल हो गया है.’

‘‘तो अब क्या करूं? आटो या रिकशा कहीं दिख रहा है तो बताओ. जहां से मिलेगा, बैठा दूंगा. अभी पैदल ही चलना पड़ेगा.’’ जब श्रीकर की नजर कुसुम, बहन व भाभी पर पड़ी तो देखा उन के मुंह तपते सूरज से सुर्ख हो गए थे. वे सब हांफ भी रही थीं. उस ने चुटकी ली, ‘‘कुंभ का पुण्य तो यों ही कमाया जाता है, क्यों भाभीजी? लो, रिकशा भी आ गया.’’ उस ने आवाज दी रिकशा वाले को, ‘‘रिकशा, कनखल बाईपास रोड, होटल जाह्नवी चलना है, चलोगे?’’

‘‘हां बाबूजी, 200 रुपया लगेगा. पहले ही बता देता हूं,’’ रिकशे वाला बोला, ‘‘बाबूजी, आप पीछे की तरफ बैठो और ये तीनों माताएं आगे की तरफ.’’

श्रीकर पीछे बैठ कर अपनेआप को एडजस्ट कर ही रहा था कि उस ने पीछे देखा तो रिकशे वाला 2 और औरतों से बात कर रहा था.

‘‘क्या हो गया? अभी तो आप ने खुद 200 रुपए कहे.’’

‘‘नहीं बाबूजी, मुझे 2 सवारियां 500 रुपया दे रही हैं. मुझे नहीं जाना है आप के साथ, मजबूर हूं.’’

‘‘यह तो बहुत गलत बात है,’’ श्रीकर ने कहा.

अब बोलने की बारी श्रीमती श्रीकर की थी, ‘‘ऐ रिकशे वाले, तेरा कोई ईमान है, जमीर भी बेच दिया क्या?’’

रिकशा वाला चुप था. कुसुम, बहन व भाभी एकसाथ लाल होती बोलीं, ‘‘मौका देख कर नीयत बदल गई रे. कुंभ स्नान पर छोकरे ऐसा कर रहा है.’’

‘‘मुझे भी तो कुंभ कमाना है, इतने बरसों बाद जो आया है.’’

‘‘महाकुंभ कमाना, महाकुंभ नहाना महापुण्य है, बेटा, पर यह तो पैसे की चमक है. पैसा फेंको और तमाशा देखो,’’ श्रीकर ने कहा और रिकशे पर बैठी सवारियां झेंप रही थीं.

अगले ही क्षण रिकशे वाला हवा हो गया.

 

विकास बनाम गरीबी : ऐसे ही खत्म नहीं होती देश की गरीबी

किसी देश की गरीबी कुछ सप्ताहों या महीनों में खत्म नहीं हो सकती. एक देश का विकास करने में वर्षों नहीं, दशकों लगते हैं. यूरोप, अमेरिका, चीन, सिंगापुर, मलयेशिया, थाईलैंड को लंबा समय लगा था गरीबी की चपेट में से निकलने के लिए. इसीलिए 2014 में विकास की आभा पर जब चुनाव लड़ा गया था तो बहुत सी उम्मीदें जगी थीं पर आज केंद्र सरकार के कार्यकाल के लगभग 4 साल पूरे होने पर भी विकास की कोई किरण नजर नहीं आ रही.

भारत अमेरिकी डौलर में 1890 के आसपास की प्रतिव्यक्ति आय का देश है, इसे प्रगति कर चीन के बराबर पहुंचने में भी दशकों लगेंगे और यदि चीन की उन्नति होती रही तो संभव है कि हम कभी उस स्तर पर पहुंच ही न पाएं. चीन की प्रतिव्यक्ति आय 8,000 डौलर है और अमेरिका व यूरोप में प्रतिव्यक्ति आय 30,000 से 60,000 डौलर है. चीन, यूरोप और अमेरिका की प्रगति की दर धीमी है पर 2 प्रतिशत की दर से भी वे हर साल 300 से 600 डौलर प्रतिव्यक्ति अमीर हो जाते हैं और भारत 6-7 प्रतिशत की दर से भी महज 100-125 डौलर अतिरिक्त कमा पाता है.

देश में हर तरफ बेकारी है, खाली बैठेठाले लोग सारे देश में दिखते हैं जो देश की सामाजिक संरचना की पोल ही खोलते हैं. यहां उत्पादकता बढ़ाने पर कोई काम हो नहीं रहा. बुलेट ट्रेनों या 8 लेन की सड़कों से गरीबी नहीं हटेगी क्योंकि ये कुछ अमीरों की विलासिता के लिए हैं. दूसरों को दिखाने के लिए गगनचुंबी इमारतें और विदेशी गाडि़यां ठीक हैं पर जब तक हर गरीब का कायाकल्प नहीं होगा, देश के विकसित होने का सवाल ही नहीं उठता.

विकास की राह में सब से बड़ा अड़ंगा सरकार की अकर्मण्यता और सामाजिक सोच है. आज सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक नीतियां सब एक विशेष विचारधारा वालों के हाथों में आ गई हैं और सामाजिक, धार्मिक परंपराएं हावी होने लगी हैं जिन में केवल ऊंचे अमीरों की सुनी जाती है, आम गरीब की नहीं. सरकार की हर दूसरी नीति ऐसी है जो चुने लोगों को विकास के नाम पर एक नया अनूठा एकाधिकार दे रही है जबकि आम लोगों को इस की कीमत चुकानी पड़ रही है.

मोबाइल आज हर हाथ में आ गया है पर इस के साथ कोई और ठोस उत्पादक प्रक्रिया क्या जुड़ी है? गप मारने, गाने सुनने, वीडियो देखने के अलावा क्या यह डिवाइस किसी काम की है? अगर पहले लोग 2 घंटे आपस में मिलबैठ कर बातें करते थे तो आज 6 घंटे मोबाइल पर लगे रहते हैं. यह विकास की नहीं, विनाश की राह है.

सरकार ने घंटेघडि़यालों का व्यापार मोबाइलों से चमकाया है. मोबाइलों से सरकार हर नागरिक पर नजर रख रही है पर वह हर नागरिक को ज्यादा मेहनत करने के मौके नहीं दे रही. मोबाइल पर आप के खर्च का ब्योरा तो मिलता है पर आय बढ़ाने के स्रोत नहीं. उलटे मोबाइलों से लूट बढ़ गई है. जीएसटी और नोटबंदी ने भी कुछ

इसी तरह की ऐक्सरसाइज कराई. गरीबी से लड़ाई में ये सैनिकों को भटकाने, नशा कर के चुप रहने के साधन बन गए हैं. यह सब हमारे भविष्य की छाया है – काली, धुंधली.

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