आने वाले कुछ दिनों में आप अगर शौपिंग करने की सोच रहे हैं तो आपके लिए एक खुशखबरी है. क्योंकि फ्लिपकार्ट और अमेजन की ओर से समर सेल की घोषणा की है. आपको बता दें कि फ्लिपकार्ट और अमेजन के कड़ी टक्कर के बीच उनके ग्रहकों को फायदा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि देश की सबसे बड़ी ई-कौमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट को टक्कर देने के लिए अमेजन ने कमर कस ली है. अमेजन ने समर सेल 2018 की घोषणा की है. जो 13 मई से शुरु होकर 16 मई तक चलेगी. बता दें कि अमेजन के अलावा फ्लिपकार्ट ने भी कुछ दिन पहले अपने ग्राहकों के लिए फ्लिपकार्ट बिग शौपिंग डेज सेल पेश की है, जो 13 से 16 मई तक चलेगी.
इस समरसेल को लेकर लोगों में उत्सुकता बढ़ रही है. आखिर किस उत्पाद पर कितना डिस्काउंट होगा? क्या क्या औफर मिल रहा है? कैसे इसका लाभ लिया जा सकता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इस मेगा सेल में आपको 4 लाख रुपए के इनाम पाने का मौका मिल सकता है. आइए आपको भी बताते हैं इस मेगा सेल में मिलने वाले डिस्काउंट्स और चार लाख रुपए तक के ईनाम के बारें में.
13 मई से शुरू हो रही है मेगा सेल
अमेजन इंडिया और फ्लिपकार्ट दोनों ही 13 मई से समर सेल शुरू कर रहे हैं. इसस दौरान इलेक्ट्रौनिक्स आयटम पर बंपर डिस्काउंट दिया जाएगा. अमेजन इंडिया के अनुसार 4 दिनों तक चलने वाली इस सेल में तकरीबन 1,000 ब्रांड्स और 40,000 डील होगी. फ्लिपकार्ट ने भी इसी दौरान फ्लिपकार्ट बिग शौपिंग डेज पेश की है. दोनों कंपनियां एक-दूसरे को जबरदस्त टक्कर देने के लिए अपनी अपना कमर कस ली है.
क्या है औफर और डिस्काउंट
– अमेजन की इस सेल के दौरान मोबाइल फोन, कंज्यूमर इलेक्ट्रौनिक्स, फैशन, टीवी और स्पोर्ट्स के करीब 1,000 ब्रांड्स मौजूद होंगे.
– अमेजन समर सेल में स्मार्टफोन एक्सेसरीज पर 80 फीसदी तक का डिस्काउंट मिलेगा.
– ग्राहकों को टौप ब्रांड स्मार्टफोन, ब्लूटूथ हैडफोन, स्पीकर्स, फिटनेस ट्रेकर्स और स्मार्ट वौच पर 35 फीसदी तक डिस्काउंट मिलेगा.
– नोकिया 7 प्लस पर 10,000 रुपए तक का डिस्काउंट मिलेगा. लेटेस्ट स्मार्टफोन रियल मी 1 भी इस सेल में उपलब्ध कराया जाएगा.
– पावर बैंक पर 70 फीसदी तक डिस्काउंट और लैपटौप पर 20,000 रुपए तक छूट मिलेगी.
कैशबैक से होगी बचत
– ICICI क्रेडिट और डेबिट कार्ड से भुगतान करने पर यूजर्स को 10% कैशबैक मिलेगा.
– अगर आप अमेजन पे बैलेंस से खरीदारी करने जा रहे हैं तो 10% डिस्काउंट और 300 रुपए का फायदा मिलेगा.
4 लाख रुपए का इनाम
वहीं सबसे बड़ी खुशखबरी उनके लिए है जिनके पास अमेजन का मोबाइल एप्लीकेशन है उनके लिए कंपनी ने 4 लाख रुपए तक के ईनाम मोटे इनाम की घोषणा की हुई है. अमेजन ने ऐप के जरिए शौपिंग करने वाले को ये औफर दिया है.
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बल्लेबाज ऋषभ पंत ने गुरुवार को फिरोज शाह कोटला मैदान पर आईपीएल मैच में सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ 128 रनों की नाबाद पारी खेली. उन्होंने आईपीएल में ना सिर्फ अपना पहला शतक जमाया बल्कि लीग में अपने हजार रन भी पूरे कर लिये. यह ऋषभ पंत का आईपीएल में सर्वोच्च स्कोर भी है.
बता दें कि टौस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी दिल्ली की शुरुआत खराब रही और जेसन रौय-पृथ्वी शा एक ही ओवर में शाकिब अल हसन की गेंद पर आउट हो गए. इसके बाद दिल्ली के कप्तान श्रेयस अय्यर और हर्षल पटेल भी रन आउट गए. इस मैच के दौरान एक तरफ जहां दिल्ली के बल्लेबाज एक-एक कर पवेलियन लौटते रहे तो वहीं दूसरी ओर ऋषभ पंत लगातार बड़े शाट्स लगाते रहे. उन्होंने 63 गेंद पर 128 रनों की शानदार पारी खेली और दिल्ली को एक मजबूत लक्ष्य तक पहुंचाने का काम किया.
इस मैच में भले ही जीत सनराइजर्स हैदराबाद की हुई हो, लेकिन दिल्ली के बल्लेबाज ऋषभ पंत ने अपनी बल्लेबाजी से सभी को हैरान कर दिया. पंत की विस्फोटक बल्लेबाजी को देख किंग्स इलेवन पंजाब के मेंटर और पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग सहित क्रिकेट कई दिग्गजों ने उनकी जमकर तारीफ की. सहवाग ने ट्वीट कर लिखा, ” ऋषभ ने शानदार पारी खेली, भुवनेश्वर कुमार की गेंदों पर बड़े शाट्स लगाना किसी भी बल्लेबाज के लिए आसान नहीं होता” जानकारी के लिए बता दें कि आखिरी ओवर में पंत ने भुवनेश्वर कुमार की गेंदों पर 3 छक्के और दो चौके लगाकर 26 रन बटोरे..
सहवाग ने आगे लिखा, ”भुवी ने खराब गेंदें नहीं फेंकी थी, फुल टौस गेंद को छोड़ दें तो बाकी सभी गेंदे शानदार थी. इसके बावजूद ऋषभ ने उन गेंदों को बाउंड्री के पार पहुंचाया, ऋषभ की इस टैलेंट की जितनी तारीफ की जाए वो कम है.
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भारतीय युवाओं का अमेरिकी सपना अब धीरेधीरे टूट रहा है. जिन मूल भारतीयों को अमेरिकी नागरिकता मिल चुकी है उन्हें तो खैर कुछ नहीं हो रहा पर जिन्हें अमेरिका की नागरिकता नहीं मिली और एच-1-बी वीजा पर सालों से वहां कार्य कर रहे हैं उन का जीवनस्तर खतरे में है. इन इमीग्रैंटों को 2015 में बराक ओबामा ने तोहफे में पति या पत्नी के होने पर उन्हें भी अमेरिका में काम करने की टैंपरेरी इजाजत दे दी थी. नतीजतन, इन भारतीयों की आय दोगुनी हो गई थी.
पर जिन कारणों से नरेंद्र मोदी को भारत में जरूरत से ज्यादा वाहवाही मिली वही अमेरिका में मौजूद हैं. अमेरिका का गोरों का एक संपन्न वर्ग अपने को अमेरिका का पुश्तैनी मालिक समझता है और कालों, भूरों, पीलों, एशियाइयों, अफ्रीकियों, लैटिनों आदि को गुलाम मानता है. यह वर्ग कहता है कि ये सब लोग अमेरिका आएं, पर न बराबरी मांगें, न सुविधाएं मांगे. वे केवल सेवा करें और जब सेवा करने लायक न रहें तो अपने मूल देश चले जाएं.
जैसे भारतीय सवर्णों ने जम कर हल्ला मचा कर वोटरों को भ्रमित किया, वैसे ही गोरे कट्टरों ने अमेरिकियों को या तो डरा दिया या बहका दिया और अल्पमत में होते हुए भी डोनाल्ड ट्रंप को जितवा दिया जो अब एच-1-बी वीजा के पर कतरने को उतारू है. अब एच-1-बी वीजा की संख्या ही कम नहीं हो रही, टैंपरेरी वीजा की सहूलियत खत्म भी की जा रही है. ऐसे में हजारों पत्नियां और सैकड़ों पति अब नौकरी खो बैठेंगे.
अमेरिका अपने नागरिकों की बेरोजगारी का दोष इन बाहरी लोगों पर मढ़ रहा है ठीक वैसे ही जैसे भारत में ऊंची जातियां आरक्षण को योग्यता का हनन करने का दोषी मान रही हैं. अब अमेरिका जाने का सपना ही नहीं टूट रहा है, बल्कि जो अमेरिका में घर बना कर वर्षों से रह रहे हैं उन्हें लग रहा है कि उन्हें गंदे, बदबूदार, पिछड़े, भीड़भाड़ वाले देश में लौटना पड़ेगा जहां न नौकरियां है न इज्जत.
अमेरिका में दोयम दर्जे का निवासी होने पर भी उन्हें जो अवसर व स्तर प्राप्त था उस का अंश भी उन्हें अपने देश में न मिलेगा. यह भारतीयों के साथ ही नहीं, दूसरे कई कम विकसित देशों के साथ भी होगा. लेकिन, चूंकि भारतीयों को टैक्नोलौजी के क्षेत्र में बहुत सी नई नौकरियां मिली थीं, सो, उन्हें कुछ ज्यादा ही दर्द होगा.
अमेरिकी अपने फैसले में गलत नहीं हैं. अमेरिकी नागरिकता पाने के बाद भी बहुत से विदेशी मूल के लोग दोहरी मानसिकता में जीते हैं. वे अपनी संस्कृति अमेरिकियों पर थोपते हैं. मंदिर, मसजिद तो बनवाते ही हैं, दूसरों को कहते रहते हैं कि यह करो, यह न करो. भारतीय बीफ के खिलाफ तो मुसलिम हलाल मीट का हल्ला मचाते हैं. वे अपने अलग त्योहार मनाते हैं. वे अपने देशों के नेताओं, धर्मगुरुओं की अगवानी करते फिरते हैं. उन्हें अमेरिकी क्यों पालें जो 2-3 पीढि़यों के बाद भी अमेरिका के नहीं बन पाए.
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सोनम कपूर की उद्योगपति अंगद आहुजा के साथ शादी की खबर ठंडी होने से पहले ही नेहा धूपिया और अंगद बेदी द्वारा गुपचुप दिल्ली में शादी करने की खबरें आ गयी. मजेदार बात यह है कि दस मई को अपनी शादी कर लेने की इस खबर को नेहा धूपिया और अंगद बेदी ने अपने ट्वीटर और इंस्टाग्राम एकाउंट पर साझा की है.
यूं तो नेहा धूपिया व अंगद बेदी ने स्वीकार किया है कि उन्होंने इस वर्ष की शुरुआत में ही शादी की योजना बना ली थी, पर अब तक दोनों अपने रिश्तों को हर किसी से छिपाते रहे हैं. वैसे अंगद बेदी व नूरा फतेही के बीच अलगाव की खबर जरुर दो माह पहले आयी थी.
वैसे तो 37 वर्षीय नेहा धूपिया का फिल्मी करियर डांवाडोल ही चल रहा था. पर वह कई तरह के समारोहों में शिरकत कर अपने आपको खबरों में बनाए हुए थी. इसलिए अचानक उनकी शादी की खबर से बौलीवुड में हर कोई हैरान रह गया. बता दें कि नेहा धूपिया के पति अंगद बेदी उनसे दो वर्ष छोटे यानी कि 35 वर्ष के हैं. अंगद बेदी मशहूर क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी के बेटे हैं, जिन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत टीवी सीरियलों में अभिनय करते हुए की थी. फिर फिल्मों में भी छिटपुट किरदार निभाए. कुछ समय पहले वह फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’में नजर आए थे. इतना ही नहीं अंगद बेदी बहुत जल्द हौकी खिलाड़ी संदीप सिंह की बायोपिक फिल्म‘‘सूरमा’’में बिक्रमजीत सिंह के किरदार में नजर आएंगे. इस फिल्म में उनके साथ दिलजीत दोसांझ व तापसी पन्नू भी हैं. अभिनेता बनने से पहले अंगद बेदी क्रिकेट खेला करते थे.
नेहा ने अंगद के साथ अपनी तस्वीर के साथ ही इंस्टाग्राम पर लिखा है-‘‘बेस्ट डिसीजन आफ माई लाइफ..टुडे आई मैरीड माई बेस्ट फ्रेंड..यानी कि मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा निर्णय..मैंने आज अपने खास दोस्त से शादी कर ली.’’ जबकि अंगद बेदी ने इंस्टाग्राम पर तस्वीर के साथ पोस्ट किया..‘‘बेस्ट फ्रेंड नाउ वाइफ..’’
इसके बाद नेहा धूपिया और अंगद बेदी की तरफ से एक संयुक्त बयान आया, जिसमें लिखा है- ‘‘अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ शादी करना विश्व का सर्वश्रेष्ठ अहसास है. और हम दोनो भाग्यशाली हैं कि हमने एक दूसरे में प्यार पाया. एक दूसरे को जानने की खूबसूरत यात्रा के बाद हमने इस वर्ष की शुरुआत में शादी करने का निर्णय लिया था और आज हमने दिल्ली में सिख रीतिरिवाज यानी कि ‘आनंद करज सेरेमनी’ में शादी कर ली. हम बहुत जल्द मुंबई के अपने दोस्तों के साथ अपनी इस खुशी को बांटने वाले हैं….’’
नेहा धूपिया व अंगद बेदी की शादी की खबर ट्वीटर व इंस्टाग्राम पर आते ही सबसे पहले करण जोहर ने उन्हें बधाई देते हुए ट्वीट किया. उसके बाद रितेश देशमुख, अंगद बेदी के पिता बिशन सिंह बेदी, सोफिया चौधरी, रणविजय सिंह, साकिब सलीम, सोनू सूद व तुषार कपूर ने ट्वीट किया.
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देश के कुछ बुद्धिजीवी और कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं इस बहस को तूल देने की कोशिश में हैं कि आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) पद्धति से संतान पैदा करने वाले डाक्टरों और क्लिनिकों के लिए कानून बनाया जाए, क्योंकि कुछ दिन पहले मुंबई के एक डाक्टर दंपती अनिरुद्ध और अंजलि मालपानी का पंजीयन महाराष्ट्र मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ने 3 महीने के लिए रद्द कर दिया था. वजह विज्ञापन का मसौदा था, जिस में इन पतिपत्नी ने शर्तिया संतान पैदा होने का दावा किया था.
मगर यह बहस आकार नहीं ले पाई. इस की एकलौती वजह यह थी कि आईवीएफ पद्धति आखिरकार एक वैज्ञानिक और पारदर्शी पद्धति है. लिहाजा, आम लोगों ने इन आरोपों का समर्थन तो दूर की बात है इन से इत्तफाक भी नहीं रखा. इन्होंने इस में दिलचस्पी नहीं ली कि आईवीएफ सैंटर्स संचालित करने वाले लोगों को लूट रहे हैं.
लेकिन संतानप्राप्ति के नाम पर जिन लोगों ने अवैज्ञानिक तरीकों से बड़े पैमाने पर लूटपाट मचा रखी है उन के खिलाफ न तो कोई बोलने को तैयार होता है और न ही कानून बनाने की मांग की जाती है कि ये लोग किस आधार पर टोनोंटोटकों, पूजापाठ, यज्ञ, हवन और तंत्रमंत्र के जरीए औलाद हो जाने का दावा करते हैं.
इन लोगों के पास न क्लिनिक हैं, न उपकरण, न दवाइयां और न ही कोई पद्धति. है तो बस एक झूठा आश्वासन, अपना और धर्मग्रंथों का बेहूदा मसौदा, जिस के चलते बेऔलाद दंपती पूजापाठ, जपतप और यज्ञहवन में लगे रह कर ठगते रहते हैं और मुराद पूरी न होने पर कहीं शिकायत या काररवाई भी नहीं कर सकते, क्योंकि यह आस्था का विषय है विज्ञान का नहीं.
डाक्टरों और वैज्ञानिकों ने जब अंडाणु और शुक्राणु के निषेचन को गर्भाशय के बाहर कर के बताया तो लगा कि अब शायद लोग औलाद के लिए किए जाने वाले बेहूदे और अवैज्ञानिक तौरतरीकों को छोड़ डाक्टरों को प्राथमिकता देंगे पर यह खयाल गलत निकला, जिस से साबित होता है कि भारतीय समाज जब वैज्ञानिक पद्धति से सोचना ही नहीं सीख पाया तो पंडेपुजारियों के बिछाए जाल से निकलेगा कैसे.
संभव है बेऔलाद दंपती जब आईवीएफ सैंटरों में जाते हों तो पहले कोई दुआ मांग कर या टोटका कर के ही जाते हों कि हे भगवान, आज निषेचन करा ही देना. अक्ल के मारे इन लोगों, जो बहुतायत में हैं, पर तरस ही खाया जा सकता है कि अगर भगवान किसी तरीके से निषेचन करवा सकता तो कोख में ही क्यों नहीं करवा देता.
पाखंडों का बाजार
यह भाग्यवाद हर कोई बचपन से ही बड़े पैमाने पर देखता आता है और मान लेता है कि सब कुछ ऊपर वाले की मरजी से होता है. संतान होना या न होना भी इस का अपवाद नहीं. अधिकांश धार्मिक साहित्य जिस का आज भी बोलबाला है और जिस के सहारे बड़े पैमाने पर लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है, संतानों के मामलों में हास्यास्पद प्रसंगों से भरा पड़ा है. इसलिए मान लिया गया है कि संतान भगवान ही देता है, लेकिन कई बार पूजापाठ, टोटकों और तंत्रमंत्र, जपतप, यज्ञहवनों से प्रभावित हो कर अपना फैसला बदल भी देता है.
हिंदुओं का आराध्य देवता राम उस की मां कौशल्या के खीर खाने से पैदा हुआ था. इसी तरह उस के भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन हुए. इन के पिता दशरथ को एक ऋषि शृंग ने खीर सिद्ध कर के दी थी कि इसे अपनी पत्नियों को खिला दो तो संतान जरूर होगी. कहानी के मुताबिक यह सिद्ध खीर 3 हिस्सों में बंटनी थी, लेकिन दशरथ की दूसरी पत्नी सुमित्रा ने थोड़ी ज्यादा खा ली तो उस के 2 पुत्र हुए.
इसी तरह राम की पत्नी सीता का जन्म धरती से होना बताया जाता है. इसी तरह कौरवों की पैदाइश मटके से हुई. हिंदू धर्मग्रंथों में पौराणिक काल में संतान खासतौर से पुत्र प्राप्ति के यज्ञों का वर्णन इतना आम है कि लगता है इस युग में स्वाभाविक रूप से कोई पैदा ही नहीं होता था.
अंधविश्वास की इंतहा
इन किस्सेकहानियों का प्रभाव मौजूदा समाज पर साफ दिखता है, जो सभ्य और शिक्षित होने का दिखावा भर करता है. लेकिन संतान न हो तो सीधा मंदिरों और दरगाहों में जा कर मत्था टेकता है. उन धर्मस्थलों में उसे ऐसे पाखंडी मिलते हैं, जो संतानप्राप्ति के ग्रांटेड उपाय बताते हैं. मसलन, व्रत, दान, पूजापाठ और यज्ञहवन, जिन पर बेऔलाद दंपती पैसा खर्च करते हैं.
संतान क्यों नहीं हो रही, यह बात ज्योतिषी भी जन्मपत्री देख कर मिनटों में बता देता है कि संतान वाले खाने में खामी है, लेकिन फलां उपाय से दूर हो जाएगी. ज्योतिष से भी बात न बने तो बाबाओं का बाजार भी औलाद के लिए खुला है, जिन के आशीर्वाद मात्र से संतान हो जाती है.
आयुर्वेद में तो ऐसे तौरतरीकों की भरमार है, जिन के जरीए संतान होने का दावा ऐसे किया जाता है मानो कोई जड़ीबूटी या दवाई नहीं बताई जा रही हो, बल्कि कोई प्रोडक्ट बेचा जा रहा हो. सहवास के तौरतरीके भी इफरात से आयुर्वेद में बताए गए हैं कि किन ग्रहनक्षत्रों में कब इसे करने से संतान को पैदा होना ही पड़ता है.
लोगों की जरूरतों और कमजोरियों पर फूलनेफलने वाले पाखंडों की इंतहा यह है कि बाबा रामदेव भी पुत्र जीवक दवा बेचने के लालच से खुद को रोक नहीं पाए. हरियाणा में पिछले साल इस पर बवाल मचा था तो बड़ी मासूमियत से वे इस बात पर राजी हो गए कि इस दवा का नाम बदल दिया जाएगा.
फिर भी नहीं होती मुराद पूरी
संतान क्यों नहीं होती, चिकित्सा विज्ञान इस बारे में काफी कुछ स्पष्ट कर चुका है, लेकिन इस के बाद भी लोगों की पूजापाठ की आदत नहीं जा रही. नतीजतन, देश में करोड़ों लोग बेऔलाद रह रहे हैं. ठगे जाने को भी वे भाग्य मान कर खामोश बैठे रहते हैं.
बेऔलाद दंपतियों की पीड़ा हर कोई नहीं समझ सकता पर इस पर व्यापार कई लोग तरहतरह से कर रहे हैं. कई बाबा और देवियां तो इसलिए चले कि वे सिर्फ औलाद होने के लिए ही आशीर्वाद देते थे. इन के चमत्कार के किस्सेकहानियां ऐसे सुनाए जाते हैं कि बस जाओ और 9 महीने बाद गोद हरी हो ही जाएगी. इन में से एक चर्चित देवी माता गुजरात के भावनगर में हुई थी जिस के पास देश भर के बेऔलाद दंपती जाते थे. यह देवी महिलाओं को एक भभूत देती थी, जिस से महिलाओं को मासिकधर्म आना बंद हो जाता था और वे, हैरानी की बात है, महीनों तो दूर सालोंसाल खुद के गर्भवती होने का भ्रम पाले रहती थीं. भभूत के साथ इन्हें यह सख्त हिदायत भी दी जाती थी कि कुछ भी हो जाए डाक्टर के पास मत जाना नहीं तो बच्चा पेट से गायब हो जाएगा.
जब इस माता की पोल खुली तो इस दुकान के शटर भी गिर गए पर 20 साल में इस ने करोड़ोंअरबों रुपए लोगों से झटके और अब इस का कहीं अतापता नहीं.
भोपाल के नजदीक विदिशा के एक संभ्रांत परिवार के दंपती बताते हैं कि वे 1995 में इस देवी के पास गए थे. भभूत खाई तो पीरियड आना बंद हो गया. बच्चा तो नहीं हुआ पर पीरियड न आने से महिला का स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि लंबे इलाज के बाद ही वह सामान्य हो पाई.
फिर पूजापाठ क्यों
विदिशा के इस दंपती की तरह करोड़ों लोग हैं, जो पूजापाठ, जप, हवन में उलझे संतान से वंचित हैं. इस के बाद भी औलाद देने वालों का बाजार बढ़ रहा है तो इस की सीधी वजह यह है कि गिरोहबद्ध तरीके से पंडे प्रचारप्रसार करते हैं कि फलां को देखो शादी के 10-12 साल बाद बाबा की कृपा से बच्चा हुआ और मुंबई के एक फलां अरबपति भोपाल के नजदीक उजड़े से पड़े देवी के सिद्ध मंदिर में आए तो 2 साल में उन की पत्नी की गोद हरी हो गई. देखते ही देखते ऐसे सिद्घ मंदिरों में नोटों की हरियाली बरसने व बिछने लगती है.
चिकित्सा विज्ञान बेहद साफ लहजे में बताता है कि कई बार बच्चा होना चांस की बात भी होती है. अगर न हो तो डाक्टर जांच कर बता देते हैं कि खामी पति में है या पत्नी में और है तो किस तरह की है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है. इस पर भी बात न बने तो आईवीएफ पद्घति बेऔलाद दंपतियों के लिए वरदान साबित हो रही है.
परेशानी सिर्फ इतनी है कि जैसे मामूली बीमारी को भी लोगों ने भाग्य का लिखा मान लिया है वैसे औलाद पैदा न होने को भी भगवान की मरजी मान रखा है, इसलिए उन्हें पूजापाठ का रास्ता आसान लगता है. फिर इसे करनेकराने वाले भी कदमकदम पर मौजूद हैं.
अगर इन से संतान मिलती होती तो देश में एक भी बेऔलाद दंपती नहीं बचना चाहिए था. लेकिन वे करोड़ों में हैं तो जरूरत इस बात की भी महसूस होती है कि आईवीएफ पद्धति का व्यापक पैमाने पर प्रचारप्रसार बेहद जरूरी है.
इस की वजह ऐसे भी समझी जा सकती है कि करीब 40 साल पहले जब कंडोम और परिवार नियोजन के दूसरे तरीके चलन में आए थे तब इन का भारी विरोध हुआ था. भाग्यवादियों की दलील यह थी कि बच्चा भगवान की देन है. उसे यों दुनिया में आने से रोकना पाप है.
अब यह पाप लोग अपनी मरजी से बगैर भगवान की परवाह किए कर रहे हैं. करोड़ों कंडोम रोज बिक रहे हैं और लाखों नसबंदी औपरेशन रोज हो रहे हैं. जाहिर है, लोगों ने इस की अहमियत और जरूरत समझी और जाना कि बच्चा होने से रोका जा सकता है तो बच्चा न होने पर उसे खामियों और कमियों को दूर कर हासिल भी किया जा सकता है.
ऐसे में पूजापाठ, जपतप सब बेकार की बातें हैं. ये पंडेपुजारियों की कमाई का जरीया हैं, जिन से न केवल भाग्यवाद पनपता है, बल्कि लोग संतान जैसी अहम जरूरत और इच्छा से भी वंचित रह जाते हैं. संतान के लिए तिरुपति, शिर्डी या वैष्णो देवी में जाने के बजाए नजदीक के आईवीएफ सैंटर में जाना ज्यादा समझदारी की बात है, क्योंकि मन्नत के बजाय इलाज कराने से जरूर बच्चा हो सकता है.
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आजकल आए दिन बलात्कार की खबरें सुनने को मिलती हैं. कभी दिल्ली की घटना पूरे देश को झकझोर देती है, तो कभी बुलंदशहर राष्ट्रीय राजमार्ग पर मांबेटी के साथ हुई बलात्कार की घटना तो कभी 70 वर्ष की महिला से बलात्कार की घटना.
आप को 5 साल पहले की वह घटना याद होगी जब दिल्ली में चलती बस में एक गैंगरेप हुआ था. पीडि़त लड़की के साथ दरिंदों ने इतना अमानवीय व्यवहार किया था कि कुछ दिन बाद उस की मौत हो गई थी.
बलात्कार की इस घटना के 2 दिन बाद संसद के दोनों सदनों में इस घटना पर जोरदार हंगामा हुआ था. तब गृहमंत्री ने संसद को आश्वासन दिया था कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे. यही नहीं दिल्ली गैंगरेप पर बीबीसी के लिए फिल्मकार लेसली एडविन ने ‘इंडियाज डौटर्स’ शीर्षक से डौक्यूमैंटरी भी बनाई थी, जिस में उन्होंने देश में महिलाओं या लड़कियों के प्रति पुरुषों की मानसिकता को बताने की कोशिश की थी. इस के लिए तिहाड़ जेल में एक आरोपी का इंटरव्यू भी लिया था, लेकिन यह वृत्तचित्र विवाद में आ गया था और उस पर प्रसारण से पहले ही बैन लगा दिया गया. सरकार के आग्रह पर कंटैंट को यूट्यूब से भी हटा दिया गया था.
कैसे मिले इंसाफ
क्या उस क्रूर और अमानवीय घटना को सही इंसाफ मिला? अगर मिला तो कितना सही और कितना गलत और क्यों? हर साल की तरह इस वर्ष भी 16 दिसंबर को टीवी चैनल वाले फिर से उसे याद करेंगे और सरकार की नीतियों पर कुछ सवाल उठाएंगे. फिर कुछ लोग सरकार के पक्ष में तो कुछ विपक्ष में खड़े दिखेंगे.
आज सवाल यह है कि क्या सचमुच बलात्कार के बाद लड़की की जिंदगी बरबाद हो जाती है? ऐसी लड़की जीने लायक नहीं रहती? जिंदगी के माने क्या हैं, एक बलात्कार की पीडि़ता के लिए? इस पर समाज को गंभीरता से विचार करना होगा. उस लड़की को समझाना होगा, जो इस हादसे के चलते उम्र भर सिसकने के अलावा कुछ सोच नहीं पाती. कुछ लोगों ने एक लड़की का बलात्कार किया, न उस लड़की की नजर में, न ही सभ्य समाज की नजर में यह उचित था. ऐसी लड़की को समाज में जिल्लत की जिंदगी जीनी पड़ती है. समाज से पहले वह खुद अपनी नजरों में गिर जाती है, क्यों गिर जाती है?
वजह साफ है कि पहले तो ये सब उस की मरजी के खिलाफ हुआ, दूसरा वर्जिनिटी को ले कर जिस तरह की भ्रांतियां हमारे समाज में हैं उन से लड़की हीनभावना की शिकार हो जाती है. उसे लगता है अब शायद ही कोई पुरुष उस का दामन थामे, थाम भी लिया तो समाज उस के सामान्य जीवन में हस्तक्षेप करे बिना नहीं रहेगा. उसे सामान्य जीवन नहीं जीने देगा. कल को वह मां बनी व उस के बच्चों को पता चला कि उन की मां का बलात्कार हुआ था, तो उन्हें शर्मिंदगी होगी. हो सकता है बच्चे अपनी मां को घृणा की दृष्टि से देखें.
ये सब कुछ इसलिए होगा क्योंकि लोग बलात्कार की शिकार महिला को अच्छी नजरों से नहीं देखते, जबकि उस लड़की या महिला का इस में कोई दोष नहीं होता. हजारों सवाल खड़े कर दिए जाते हैं कि इतनी रात में हाईवे पर क्या कर रही थी? वहां जाने की क्या जरूरत थी?
हादसे के बाद भी जिंदगी
जब दिल्ली में उस लड़की के साथ 6 लोगों ने बलात्कार किया तो समाज यही कह रहा था कि रात 8 बजे अपने बौयफ्रैंड के साथ घूमने की क्या जरूरत थी? चलिए मान भी लें कि इन मामलों में लड़कियों का दोष है, पर कानून और सभ्य समाज की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या कानून इतना बेजार और लचर हो गया है कि
कोई कुछ भी करे, कुछ भी सोच ले? सभ्य समाज उस लड़की को अछूत मान कर उस का बहिष्कार कर दे?
विवाह संस्था को ले कर हमारे समाज के जो उसूल हैं कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हैं. अगर लड़की की शादी नहीं हुई तो उस की जिंदगी खराब हो गई. बिना पुरुष के अकेली लड़की का कोई भविष्य नहीं होता. हर हाल में उस के माथे पर पति के नाम का सिंदूर होना ही चाहिए. समाज सिंदूर को एक हथियार के रूप में देखता है, जिसे लगा कर एक महिला का वजूद सुरक्षित हो जाता है. यही विकृत सोच एक लड़की पर लागू होती है. किसी पुरुष के दामन नहीं थामने का मतलब उस की जिंदगी बरबाद. लड़की से यही कहा जाता है कि अब वह कैसे जी पाएगी? क्या करेगी? कहां जाएगी? मांबाप भी उसे ही दोषी मान कर उस से मुक्ति का उपाय ढूंढ़ने लगते हैं. समाज, परिवार, नातेरिश्तेदारों की उपेक्षा की शिकार हुई लड़की के लिए सिर्फ एक ही रास्ता बचता है और वह है खुदकुशी.
देश के विभिन्न जगहों पर हुई इन बलात्कार की घटनाओं ने न सिर्फ सभ्य समाज की चूलें हिला दीं, बहुत कुछ सोचने पर भी विवश कर दिया-
1. उत्तर प्रदेश के बदायूं में रेप की शिकार पीडि़ता ने आत्महत्या कर ली. आरोपी का परिवार लड़की पर केस वापस लेने का दबाव बना रहा था, जिस से तंग आ कर पीडि़ता ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली.
2. गोरखपुर के एक केस में आरोपियों के बाइज्जत बरी होने के बाद रेप पीडि़ता ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. दरअसल, क्लीन चिट मिलने के बाद आरोपियों ने लड़की के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी और उस के मातापिता उसे ही जिम्मेदार मानते थे.
3. दक्षिणपूर्व दिल्ली के प्रहलादपुर इलाके में शादी का वादा कर के एक औटोरिकशा चालक द्वारा बलात्कार किए जाने से गर्भवती हुई 19 वर्षीय लड़की ने आग लगा कर इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उस के मातापिता ने समाज के डर से उस से संबंध तोड़ लिया था.
4. सर्राफा कारोबारी मनोज भगत ने दुकान पर 17 साल की नाबालिक लड़की को काम पर रखा. लड़की पर मनोज के दोस्त रजत की बुरी नजर थी. मनोज भगत लड़की के घर वालों से यह कह कर कि परिवार सहित भोपाल घूमने जा रहे हैं, लड़की को बहलाफुसला कर विधायक निवास पर ले गया जो पहले से ही बुक किया गया था. मनोज भगत ने अपने दोस्त रजत के लिए सारी व्यवस्था की हुई थी.
लेकिन अकेली लड़की को देख कर मनोज की भी नीयत फिसल गई और दोनों ने मिल कर लड़की के साथ दुष्कर्म किया. बाद में उसे और उस के परिवार वालों को डरायाधमकाया. बलात्कार के बाद वह लड़की काफी दहशत में थी. इसी मानसिक तनाव के कारण उस ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया.
कारण क्या
मुकदमे दशकों तक चलते रहते हैं. ‘दामिनी’ फिल्म में सनी देओल का यह डायलौग याद है कि तारीख पर तारीख मिलती है पर न्याय नहीं मिलता, पीडि़ता युवावस्था से अधेड़ उम्र को पहुंच जाती है. इस दौरान सामाजिक सम्मान, आर्थिक स्थिति, परिवार की प्रतिष्ठा, अन्य बहनों का भविष्य सब खत्म हो जाता है. फिर भी अपराधियों को दंड नहीं मिल पाता और आम अपराधी को दंड मिल भी जाए तो पीडि़ता को क्या लाभ मिलता है? उस की सामाजिक स्थिति तो वही रहती है.
जिम्मेदार कौन
आखिर बलात्कार की घटनाएं क्यों बारबार होती हैं, इस की तह तक जाना ही होगा. एक कारण तो अपराधियों को सजा न मिल पाना है. अकसर बलात्कार के प्रकरणों में पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी की जाती है. पीडि़ता का डाक्टरी परीक्षण इतनी देर में कराया जाता है कि सुबूत स्वत: मिट जाते हैं. कभीकभी डाक्टर भी कमजोर या गलत मैडिकल रिपोर्ट दे देते हैं.
लड़कों का हर गुनाह माफ
लड़कियां जैसेजैसे आगे बढ़ रही हैं पुरुषप्रधान समाज इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है. इसलिए उन के खिलाफ हिंसा और बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोतरी कर उन्हें पुन: चारदीवारी के अंदर धकेलने की कोशिश में जुटा हुआ है. हमारा समाज आज भी लड़कों के हर गुनाह को माफ करता है. यहां तक कि लड़कों द्वारा किए गए कुकर्म की सजा भी लड़कियों को ही देता है.
भोगविलास की वस्तु है सिर्फ
आजकल जिस तरह से महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में पेश किया जा रहा है वह भी एक बहुत बड़ा कारण है. अश्लील विज्ञापनों और अश्लील तसवीरों के साथ प्रोडक्ट खुलेआम बेचे जा रहे हैं. ये सीधे तौर पर महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को बढ़ाने के मुख्य कारण हैं.
इस बात को अगर और आसान शब्दों में कहें तो औरत एक वस्तु के समान हो गई जिसे, जिन के पास पैसा होता है, वे तुरंत खरीद लेते हैं और जिन के पास पैसा नहीं होता है वे उसे या तो चुराते हैं या फिर पैसा चुरा कर उसे खरीदते हैं. कहने का मतलब यह है कि लोग ‘उपभोग की वस्तु’ को किसी भी तरह से हासिल करना चाहते हैं.
बलात्कार एक महिला के दिलदिमाग दोनों पर गहरा असर डालता है. अगर समाज का रवैया उस महिला के प्रति सकारात्मक हो तो ऐसी महिला एक सामान्य जीवन जी सकती है. सकारात्मक का मतलब उस महिला को उपेक्षात्मक नजरों से न देखा जाए. उस से सहानुभूति रखी जाए. पुरुष समाज उसे बेकुसूर मानते हुए उस से शादी करने की हिम्मत दिखाए तो काफी हद तक समाज में इस विकृति पर विजय पाई जा सकती है.
समाज को ऐसे दुराचारी पुरुषों का बहिष्कार करना चाहिए. बलात्कार को हादसा माना जाए न कि अभिशाप.
पुरुषप्रधान समाज को यह बरदाश्त नहीं
‘‘दरअसल, लड़कियों का आगे बढ़ना पुरुषप्रधान समाज स्वीकार नहीं कर पा रहा है. वह जुटा हुआ है कि किस तरह महिलाओं को डरा कर उसे पुन: चारदीवारी के अंदर धकेल दिया जाए.’’सख्त कानून बने
महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं. पुरुषप्रधान समाज को यह बरदाश्त नहीं है. रेप की बढ़ती घटनाएं इसी की देन है. इस अमानवीय कृत्य को तभी रोका जा सकता है जब कानून को सख्त किया जाए. बलात्कारियों को जल्दी सजा मिलेगी तो उन में कानून का खौफ होगा.
अभी हाल ही में पाकिस्तान की एक अदालत ने एक बलात्कारी को महज 1 महीने के अंदर फांसी की सजा दी. भारत में भी इसी तरह सख्ती की जाए. सब से अहम, लड़कियों से ज्यादा पेरैंट्स अपने लड़कों पर नजर रखें. उन्हें शुरुआत से संस्कारवान बनाएं और महिलाओं की इज्जत करना सिखाएं.
– प्रोमिला गुप्ता सदस्य, दिल्ली महिला आयोग
चुप्पी तोड़ो, कानून आप के साथ है
बलात्कार को ले कर सामाजिक तानाबाना कुछ इस कदर बुना गया है कि समाज के तथाकथित ठेकेदार कहते हैं कि महिला की इज्जत लुट गई, जबकि बलात्कार से एक महिला की नहीं बलात्कारी की इज्जत लुटती है.
समाज में घट रही बलात्कार की घटना सभ्य समाज के लिए एक कलंक है. दुख तो तब अधिक होता है जब बलात्कारी राक्षस 3 साल की मासूम बच्ची तक को नहीं छोड़ते.
इन्हीं सब मुद्दों को ले कर पिछले साल सितंबर से अक्तूबर माह में 35 दिनों तक कन्याकुमारी से एक यात्रा निकाली गई थी. यह यात्रा नोबल पुरस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी के साथ निकाली गई, जिस में हजारों लोग शामिल हुए. लोगों में एक गुस्सा था, अफसोस था कि आखिर मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को कैसे रोका जाए?
16 अक्तूबर को इस यात्रा की समाप्ति महामहिम राष्ट्रपति के साथ हुई, जहां उन्होंने अपने अभिभाषण में समाज में घट रही ऐसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे रोकने और जागरूकता फैलाने की आवश्यकताओं पर बल दिया.
आज जरूरत है कि अपने साथ घट रही ऐसी घटनाओं का महिलाएं खुल कर विरोध करें. सामने आएं और बलात्कारियों को सजा दिलाएं. समाज को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है.
प्यार में अकसर दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं, सांसें महकने लगती हैं, खयालों में कोई बस जाता है. पर प्यार का यह आलम तब आफत बन कर टूट पड़ता है जब दिल किसी और पर आ जाए.
पिछले दिनों एक पति दिल्ली के एक कोर्ट में जा पहुंचा और कोर्ट से गुहार लगाई कि वह अपनी पत्नी से परेशान है पुलिस उस की मदद नहीं कर रही.
दरअसल, दिल्ली के उत्तम नगर निवासी रवि की शादी सरिता (बदला नाम) से हुई तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. पत्नी सरिता खूबसूरत थी, जिस के प्रेम में वह खूब डूबताइतराता रहता था. पत्नी की खूबसूरती की तारीफ दोस्तों, रिश्तेदारों से सुनता तो बल्लियों उछलता.
मगर उस की यह खुशी चंद ही दिनों में तब काफूर हो गई, जब पत्नी की असलियत उपन्यास के पन्नों की तरह खुलने लगी. सरिता एक गैरपुरुष के प्रेम में दीवानी थी. 1-2 बार पति की नजरों में आई तो खुद हावी रहने के लिए पति के साथ ससुराल वालों को भी परेशान करने लगी. परिवार को दहेज व अन्य झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां देने लगी. वह अपने हाथ की नस काटने तक की धमकी देती.
रवि और उस के परिवार के लोगों ने कभी थानाकचहरी नहीं देखे थे. समाज में बदनामी का डर था. लिहाजा सभी ने सरिता को काफी समझानेबुझाने का प्रयास किया, मगर बजाय समझने के वह और उन्मुक्त हो गई. थकहार कर पति कोर्ट जा पहुंचा और न्याय की गुहार लगाई.
क्या कहता है कानून
ऐडवोकेट दीप्ति कहती हैं, ‘‘इस तरह के मामले कोर्ट में आएदिन आते रहते हैं. अवैध संबंध का राज जब खुलता है तो एकसाथ कई लोगों की जिंदगी दांव पर लग जाती है. रिश्ते खत्म हो जाते हैं. लिहाजा शादी खत्म करने वे कोर्ट की ओर रुख करते हैं. कानूनन ऐडल्टरी के मामले में पुरुषों के दोषी पाए जाने पर उन्हें सजा दिए जाने का तो प्रावधान है पर महिलाओं को नहीं. यह आईपीसी की धारा-497 के तहत आता है.
‘‘दरअसल, धारा-497 पुराना कानून है, जिस में संशोधन की मांग उठती रही है.’’
धारा 497 की पेचीदगियां
आमतौर पर क्रिमिनल लौ में जैंडर समानता दिखती है पर धारा-497 में नहीं. इस धारा के अंतर्गत सिर्फ पुरुष को ही अपराधी माना जाता है जबकि महिला सिर्फ विक्टिम होती है.
यानी अगर कोई विवाहित पुरुष किसी विवाहित औरत के साथ सहमति से संबंध बनाता है तो संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ तो उस औरत का पति ऐडल्टरी का मुकदमा दर्ज करा सकता है, लेकिन संबंध बनाने वाली औरत के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का कोई प्रावधान नहीं है.
आर्थिक जरूरत, रोमांच, कुछ नया करने व शारीरिक भूख को शांत करने की चाह में जब महिलापुरुष एक बार इस दलदल में फंसते हैं, तो फिर फंसते चले जाते हैं. उन के लिए इस दलदल से निकलना असंभव हो जाता है.
दिसंबर, 2011 में विवाहेतर संबंधों पर कराए गए एक अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे. इस अध्ययन के मुताबिक 16% भारतीय महिलाएं विवाहेतर संबंध यानी ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में रहती हैं.
क्रिकेटर शमी की जिंदगी में तूफान
हाल ही में भारतीय क्रिकेटर मो. शमी व उस की पत्नी हसीन जहां में भी विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा. हसीन ने खुलेआम आरोप लगाया है कि शमी दूसरी लड़कियों के संपर्क में रहते हैं और अंतरंग चैट करते हैं.
हसीन जहां की बातों में कितनी सचाई है, यह तो तहकीकात में ही पता चल सकता है पर इस आरोप से न सिर्फ शमी का कैरियर, बल्कि दांपत्य जीवन भी दांव पर लग गया है.
कभीकभी तो विवाहेतर संबंध शादीशुदा जिंदगी को खत्म कर खतरनाक रूप भी इख्तियार कर लेते हैं. यहां कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने सभ्य समाज की चूलें हिला दीं:
अलीपुर, दिल्ली के रहने वाले सुरेंद्र ईश्वर की हत्या उस की पत्नी के प्रेमी ने इसलिए कर दी कि सुरेंद्र को दोनों के रिश्ते का पता चल गया था. अब आरोपी जेल में है.
दिल्ली के गाजीपुर में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जब अवैध संबंधों में बाधा बन रही 4 साल की एक मासूम बच्ची को प्रेमी ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि बच्ची संबंध बनाते समय बाधा बन रही थी. आरोपी कानून की गिरफ्त में है.
मुंबई की एक घटना में पतिपत्नी ने मिल कर बाद में प्रेमी की हत्या कर दी ताकि शादीशुदा जिंदगी बरबाद न हो. दोनों ही पुलिस की गिरफ्त में हैं.
अशोक नगर में पतिपत्नी के बीच ‘वो’ आया तो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा. पति धर्मेंद्र को पत्नी के रिश्ते की भनक लगी तो धर्मेंद्र की हत्या खुद उस की पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर कर दी. अब दोनों जेल में हैं.
क्यों बनते हैं ऐसे संबंध
क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल वर्मा ने विवाहेतर संबंध बनने की कई वजहें बताईं:
भावनात्मक वजह: विवाहोपरांत दंपती एकदूसरे से भावनात्मक जुड़ाव चाहते हैं. एकदूसरे से अपेक्षा करते हैं कि जीवनसाथी उसे दिल की गहराइयों से प्रेम करे, उस का पूरा खयाल रखे. पर साथी से उपेक्षा मिलने पर यही सब किसी तीसरे से मिलने की चाहत होने लगती है. परिणाम विवाहेतर संबंध के रूप में सामने आता है.
अकेलापन: पतिपत्नी में से किसी एक का अकेलापन उसे विवाहेतर संबंध की ओर ले जाता है. फिर चाहे यह अकेलापन कामकाज में व्यस्तता की वजह से हो या फिर पारिवारिक वजहों से एकदूसरे के प्रति उदासीनता संबंध की ऊष्मा को खत्म कर देती है.
जीवन में रोमांच लाने के लिए: कुछ लोगों को जीवन में कुछ नयापन लाने की चाहत विवाहेतर संबंध की ओर ले जाती है. आमतौर पर ऐसे लोग पर्सनैलिटी डिसऔर्डर से पीडि़त होते हैं. इन का अधिकतर समय नैट सर्च करने, फ्रैंड बनाने, कामुक संदेश भेजने, सोशल नैटवर्किंग साइटों को खंगालने में बीतता है. ऐसे लोग जीवन को रोमांच समझते हैं और जीवन भर किसी एक व्यक्ति से बंधे रहना पसंद नहीं करते.
ताकि सुखद रहे दांपत्य
डा. अतुल वर्मा मानते हैं कि दांपत्य जीवन में साथी अगर निम्न बातों का ध्यान रखें तो विवाहेतर संबंध बनने और परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है:
पतिपत्नी भले ही कामकाजी हों पर एकदूसरे के लिए समय निकालें.
घर में टीवी, मोबाइल से दूर रहें.
साथ छुट्टियां मनाएं, साथ घूमने जाएं.
रात को खाना खाने के लिए एकसाथ डिनर टेबल पर बैठें.
एकदूसरे की जरूरतों का ध्यान रखें.
सैक्स में नएनए तरीके अपनाएं व खूब ऐंजौय करें.
सब से अहम साथी को भावनात्मक सहारे की कमी न महसूस होने दें.
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पैन में दूध डाल कर उबाल आने तक पकाएं. फिर चावल, ओट्स व नट्स डाल कर धीमी आंच पर 6-7 मिनट पकाएं. गाढ़ा होने पर शहद मिला दें. आंच से उतार कर थोड़ा ठंडा होने पर ऐसेंस डालें और फ्रिज में रखें. आइसक्रीम से सजा कर सर्व करें.
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फ्राइंगपैन में मक्खन गरम कर प्याज भूनें. दाल डाल कर फिर सफेद नमक डालें. 11/2 कप पानी डाल कर 5 मिनट पकाएं. ठंडा होने के बाद मिक्सर में पीस लें. फिर से आंच पर पकने के लिए रखें. दूध डालें. अब इस में कालानमक व कालीमिर्च डालें. आंच बंद कर दें. चीज से सजा कर गरमगरम सर्व करें.
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समर सीजन में जरा सी लापरवाही आप को गंभीर बीमारियों का शिकार बना सकती है. कुछ हैल्थ प्रौब्लम्स इस मौसम में कौमन होती हैं. आइए, जानते हैं कि क्या हैं वे और कैसे बचें उन से:
सनबर्न
सनबर्न इस सीजन की आम समस्या है. धूप में ज्यादा रहने के कारण अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आने से त्वचा के टिशूज जल जाते हैं. सनबर्न के कुछ लक्षण हैं जैसे त्वचा का लाल होना, हलका चक्कर आना और थकान महसूस होना. अगर सनबर्न यूवी किरणों के कारण है तो यह त्वचा कैंसर का कारण भी बन सकता है.
बचाव: खुद को सनबर्न से बचाने के लिए बाहर जाने से 20 मिनट पहले शरीर के खुले हिस्सों पर सनस्क्रीन लोशन लगाएं.
हीटस्ट्रोक यानी लू लगना
हीटस्ट्रोक हाइपरथर्मिया का गंभीर रूप है. शरीर में बहुत ज्यादा गरमी अवशोषित होने के कारण ऐसा होता है. इस का इलाज न करना घातक साबित हो सकता है. इस के कुछ लक्षण हैं -सांस लेने में परेशानी, पल्स बढ़ना, शरीर का तापमान बढ़ना, भ्रमित महसूस करना आदि.
बचाव: दोपहर 11 से शाम 4 बजे के बीच जहां तक हो सके घर के भीतर ही रहें. अगर इस दौरान बाहर जाना ही पड़े तो चेहरे और शरीर को स्टोल से अच्छी तरह ढक लें.
घमौरियां
इस में ज्यादा तापमान के कारण त्वचा पर लाल रैशेज हो जाते हैं. पसीने की ग्रंथियों के छेद बंद हो जाने से भी ऐसा हो सकता है.
बचाव: प्रभावित हिस्से पर प्रिक्ली हीट पाउडर लगाएं. शरीर के उन हिस्सों पर जहां पसीना ज्यादा आता है, प्रिक्ली हीट पाउडर इस्तेमाल करें. अगर फिर भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डाक्टर की सलाह लें.
फूड पौइजनिंग
इन दिनों ज्यादा गरमी के कारण भोजन जल्दी खराब हो जाता है. इसलिए हमेशा ताजे खा- एवं पेयपदार्थों का ही सेवन करें. अगर आप भोजन को कुछ समय के लिए रखना चाहते हैं तो पूरी सावधानी बरतें. फूड पौइजनिंग आमतौर पर खराब हो चुके भोजन या दूषित पानी के सेवन से होती है. इस के लक्षण हैं- पेट में दर्द, उलटी आना, डायरिया आदि. अत: कच्चे मांस, सड़क किनारे बेचे जाने वाले खुले भोजन का सेवन कतई न करें, क्योंकि इस के खराब होने की संभावना बहुत अधिक होती है.
बचाव: बचे भोजन को हमेशा फ्रिज में रखें. भोजन को अच्छी तरह पकाएं. खाने से पहले देख लें कि यह खराब तो नहीं हो गया है. फल और सब्जियां खरीदते समय ध्यान दें कि इन से किसी तरह की गंध तो नहीं आ रही है.
डायरिया
गरमी के मौसम में भोजन जल्दी दूषित होता है, इसलिए इस मौसम में डायरिया की संभावना अधिक होती है.
बचाव: डायरिया से बचने के लिए पानी को हमेशा उबाल कर पीएं. सब्जियों को काटने से पहले और बाद में अच्छी तरह धो लें. शरीर में तरल की कमी न होने दें.
पानी से फैलने वाले रोग
हम गरमियों में पानी में ज्यादा समय बिताना पसंद करते हैं. इस से बैक्टीरियल इन्फैक्शन फैलने की संभावना अधिक होती है. पाचनतंत्र संबंधी बीमारियां नदी, झील, पूल आदि के माध्यम से फैल सकती हैं. इस के अलावा इस से त्वचा, कानों और आंखों का संक्रमण, श्वसन, न्यूरोलौजिकल और वायरल बीमारियां भी फैलती हैं.
बचाव: साफ पेयजल का सेवन करें. ध्यान रखें कि जिस स्विमिंग पूल में आप जाते है वहां हमेशा क्लोरीन सही मात्रा में डाली जाती हो.
समर कोल्ड
एक तरह का वायरस ऐसी बीमारी पैदा करता है कि आप गरमियों में भी ठंड लगने जैसे लक्षण महसूस करते हैं. इसे ऐंट्रोवायरस कहा जाता है. इस के लक्षण हैं -सिर में दर्द, गले में खराश, मुंह सूखना, रैशेज आदि.
बचाव: आमतौर पर लक्षणों के अनुसार इलाज किया जाता है. ऐसे में फौरन चिकित्सक से संपर्क करें.
क्या खाएं क्या नहीं: खाने के लिए स्वादिष्ठ और सेहतमंद आहार के बहुत से विकल्प हैं. समर में मिलने वाली कई फलसब्जियां सेहत के लिए बहुत अच्छी मानी जाती हैं. इस मौसम में आप को सिट्रस फलों, तरबूज, कच्ची सब्जियां, मछली, ठंडा सूप, सफेद योगर्ट, अंडा, स्मूदी आदि का भरपूर सेवन करना चाहिए. इन के अलावा इस मौसम में ज्यादा कैफीन, कार्बोनेटेड पेयपदार्थों, अलकोहल और ज्यादा चीनी युक्त पदार्थों के सेवन से बचें.
खूब पानी पीएं: पानी शरीर को ठंडा रखता है. हवा में नमी होने के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता. इसलिए चाहे आप को प्यास न लगे तो भी थोड़ीथोड़ी देर बाद पानी पीते रहें.
ऐसा आहार लें जो फाइबरयुक्त हो. आसानी से पचने वाले भोजन का सेवन करें. गरम, तले, मसालेदार भोजन का सेवन न करें.
– डा. आर एस के सिन्हा, जनरल फिजिशियन, सीनियर कंसल्टैंट, जेपी हौस्पिटल, नोएडा
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