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बलात्कार, हत्या और साजिश : नेता खुद को बादशाह से कम नहीं समझते

राजनीति में किसी तरह के षडयंत्र से लाभ लेने वाले लोगों की कभी कमी नहीं रही. नेता को अपना विरोध कभी पसंद नहीं आता. ऐसे में करीबी से करीबी लोग भी दुश्मन बन जाते हैं. राजनैतिक लोगों पर आरोप भी लगते रहते हैं. कभीकभी इन आरोपों में सच्चाई भी होती है. अपनी पावर के गुरूर में कुछ नेता ऐसे काम कर बैठते हैं, जो उन के गले की फांस बन जाता है.

बलात्कार जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं. अगर ऐसी घटनाएं साजिशन होने लगें तो असल घटनाओं पर यकीन करना भी मुश्किल हो जाएगा. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में लड़की के बलात्कार और उस के पिता की हत्या से राजनीति का क्रूर चेहरा बेनकाब होता है. जरूरत इस बात की है कि साजिश का परदाफाश हो और पीडि़त को न्याय मिले. सच्चाई साबित होने से षडयंत्र बेनकाब होगा और आगे ऐसे मामलों को रोकने में मदद मिलेगी.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से यही कोई 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव का मामला कुछ ऐसा ही है. कविता के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले विधायक कुलदीप सेंगर के बेहद करीबी हुआ करते थे. गांव में कुलदीप के घर से कुछ घर छोड़ कर उन का भी मकान है.

कविता की 3 बहनें और एक भाई है. एक ही जाति के होने के कारण आपसी तालमेल भी अच्छा था. दोनों परिवार एकदूसरे के सुखदुख में शामिल होते थे. आपस में घनिष्ठ संबंध थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे.

कुलदीप सेंगर ने युवा कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वह सन 2002 में विधानसभा का पहला चुनाव बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बन गए.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के घर वालों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. अब वह उस परिवार से दूरी बनाने लगे थे. इस की अपनी वजहें भी थीं, जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को नाम से बुलाते थे.

कुलदीप ने अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनानी शुरू की. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. उस में घमंड आ गया है. वह किसी न किसी तरह से उन को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे.

इस का नतीजा यह हुआ कि उन के बीच मनमुटाव बढ़ता गया. जब आपस में दुश्मनी बढ़ने लगी तो विरोधी भी इस दरार को चौड़ा करने में लग गए. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था, वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर आगे बढ़ाते गए. कुलदीप सिंह सेंगर का नाम उन्नाव जिले की राजनीति से उठ कर राजधानी लखनऊ तक पहुंचने लगा.

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बारबार की जीत ने बढ़ाए विधायक कुलदीप सेंगर के हौसले

सत्ता के साथ संतुलन बनाए रखना कुलदीप भी सीख गए थे. अपने स्वभाव और ताकत से वह चुनाव जीतने का पर्याय बन चुके थे. ऐसे में वह दल बदल भी करने लगे. कुलदीप ने सन 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से जीता और 2012 में इसी पार्टी से भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए. कुलदीप की पत्नी संगीता सेंगर भी उन्नाव में जिला पंचायत की अध्यक्ष बन गईं.

उस समय उन्नाव जिले को महिला सशक्तिकरण की मिसाल कहा जाता था, क्योंकि वहां जिला पंचायत अध्यक्ष ही नहीं डीएम और एसपी की कुरसी को भी महिला अधिकारियों ने संभाल रखा था. 3 बार के विधायक कुलदीप सिंह को उम्मीद थी कि अखिलेश सरकार में उन्हें मंत्री पद मिलेगा, पर ऐसा नहीं हुआ.

इतना ही नहीं, कुलदीप सेंगर को जब लगा कि उन्हें पार्टी में दरकिनार किया जाने लगा है तो व्यथित हो कर उन्होंने सपा छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. 2017 का विधानसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के टिकट पर लड़ा और विधायक बने. बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से विधायक बन जाने के बाद उन की भाजपा के वरिष्ठ नेताओं तक अच्छी पहुंच हो गई. अब उन का कद भी बढ़ गया था.

उधर विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और कविता के परिवार की रंजिश गहरी होती गई. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की वहां बहुतायत है. माखी गांव को आसपास क्षेत्र के गांवों से संपन्न समझा जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है. कविता के ताऊ पर करीब एक दरजन मुकदमे माखी और दूसरे थानों में कायम थे. करीब 10 साल पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया था.

कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. तब से दोनों परिवारों के बीच दूरी और बढ़ गई. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए थे. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन पर करीब 10 मुकदमे थे. गांव में अब कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दरजन मुकदमे कायम थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन्हें बेहाल कर चुका था.

बलात्कार के आरोप के बावजूद पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की विधायक से कविता और विधायक कुलदीप सेंगर के परिवार में दुश्मनी का खतरनाक मोड़ जून, 2017 में तब आया, जब कविता और उस के परिवार ने विधायक कुलदीप सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाया. जानकारी के अनुसार जून, 2017 में राखी नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. जहां विधायक ने उसे बंधक बना कर उस के साथ बलात्कार किया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर भी लगा.

घटना के 8 दिन बाद कविता औरैया जिले के पास मिली. कविता और उस के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. तब पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. पुलिस ने घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं किया. कविता और उस का परिवार विधायक का नाम भी मुकदमे में शामिल कराना चाहते थे.

एक साल तक कविता और उस का परिवार विधायक के खिलाफ गैंगरेप का मुकदमा लिखाने के लिए उत्तर प्रदेश के गृह विभाग से ले कर उन्नाव के एसपी तक भटकता रहा. इस के बाद भी विधायक के खिलाफ एफआईआर नहीं हुई.

विधायक के खिलाफ मुकदमा न लिखे जाने के कारण कविता और उस के परिवार के लोगों ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत कोर्ट से मुकदमा लिखाए जाने की अपील की.

इस के बाद 3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट की और मुकदमा वापस लिए जाने को कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया.

पुलिस ने क्रौस एफआईआर लिखी पर एकतरफा काररवाई करते हुए केवल कविता के पिता को ही जेल भेज दिया. विधायक पक्ष के लोगों से पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की.

कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की. 8 अप्रैल, 2018 को कविता अपने परिवार के लोगों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास कालीदास मार्ग पहुंच गई. वहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया और गौतमपल्ली थाने ले गई.

डीजीपी ने इस पूरे मामले की जांच उन्नाव की एसपी पुष्पांजलि को करने के निर्देश दिए. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान मिले.

उन्नाव के सीएमओ डा. एस.पी. चौधरी की अगुवाई में 3 डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम किया. मृतक के पैर, हाथ, कमर, पीठ और पिंडली में चोट मिली. पेट में डंडे या किसी चीज से ताबड़तोड़ प्रहार होने पर आंत में घाव हो गया था. इस से वह सेप्टिसेमिया का शिकार हो गए, जो उन की मौत का कारण बना.

एक ओर बलात्कार का दर्द, दूसरी ओर पिता की मौत का गम

किसी लड़की के लिए इस से दर्दनाक क्या हो सकता है कि जिस समय वह न्याय की मांग ले कर मुख्यमंत्री से मिले, उसी समय उस का पिता मौत के मुंह में चला जाए. कविता के पिता की मौत के बाद सरकार भी हरकत में आ गई. एसपी पुष्पांजलि ने एकतरफा काररवाई करते हुए कविता के पिता को जेल भेजने के दोषी माखी थाने के थानाप्रभारी अशोक सिंह भदौरिया सहित 6 पुलिस वालों को तुरंत सस्पेंड कर दिया. इतना ही नहीं, मामले की जांच एसआईटी और क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई.

सत्ता में रहने वाले विधायक की हनक अलग होती है. उस के खिलाफ पुलिस में मुकदमा कायम करना आसान नहीं होता. कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. अपना विरोध करने वालों के साथ सत्ता की हनक में विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, अब वह योगी सरकार के गले की फांस बन गया.

उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बर्ताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है.

आप ने ऐसे दृश्य फिल्मों में देखे होंगे जिन में अपने विरोधी की पिटाई पानी डाल कर की जाती थी. फिर मरणासन्न अवस्था में पीडि़त के ही खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता था. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती, जहां उस का इलाज करने के बजाए जेल भेज दिया जाता. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता, जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

यहां हकीकत में भी ऐसा ही हुआ. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक कुलदीप सेंगर की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे.

जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो गई. मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पेंड कर दिया, पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई.

अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है. विधायक के भाई अतुल सिंह सेंगर को मारपीट के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है.

मामला मीडिया द्वारा उछालने के बाद 12 अप्रैल, 2018 को विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और सहयोग देने वाली महिला राखी के खिलाफ भादंवि की धारा 363, 366, 376, 505 और पोक्सो एक्ट में मुकदमा लिखा गया. कविता के पिता की मौत के बाद पूरा मामला हाईवोल्टेज ड्रामा में बदल गया. हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया.

पूरे घटनाक्रम को देखें तो इस में विधायक की धौंस पता चलती है. रेप कांड की शिकार कविता ने जिस राखी नाम की महिला के साथ विधायक के घर जाने की बात कही थी, उस ने नया खुलासा करते हुए बताया कि यह कविता विधायक से पहले उस के बेटे पर भी रेप का आरोप लगा कर जेल भिजवा चुकी है. कविता के साथ रेप की सच्चाई जो भी हो, पर उस के पिता की पिटाई और मौत के मामले में विधायक और उन के करीबी लोगों के खिलाफ तमाम सबूत मिल रहे हैं.

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कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सेंगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने आए. मुख्यमंत्री ने विधायक से मुलाकात नहीं कर के विधायक को यह संदेश दिया कि वह पुलिस जांच में सहयोग करें.

सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है. कविता का कहना है कि पूरे मामले में विधायक भी दोषी है, उन की भी गिरफ्तारी होनी चाहिए.

सरकारी अधिकारी पूरे मामले में विधायक की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं. सरकार ने एसआईटी गठित कर दी है. एसआईटी की जांच टीम के अधिकारी राजीव कृष्ण ने माखी गांव जा कर पूरा मामला समझा और अपनी जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी. इस के आधार पर पुलिस के साथ ही जिला अस्पताल के डाक्टर के खिलाफ भी कड़ी काररवाई करने के संकेत दिए.

उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई को पूरे मामले की जांच सौंप दी है, जिस से उन्नाव कांड को ले कर हो रही राजनीति के प्रभाव को दबाया जा सके और सरकार की छवि भी बची रहे.

विधायक कुलदीप सेंगर ने खुद एसएसपी लखनऊ के सामने पेश हो कर अपनी सफाई दी. दूसरी तरफ विधायक की पत्नी संगीता सेंगर उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओ.पी. सिंह से मिलीं और उन्हें बताया कि पूरा मामला राजनीतिक षडयंत्र से प्रेरित है. ऐसे में कविता और उन के पति का नारको टेस्ट कराया जाए.

संगीता ने यह भी दावा किया कि उन के पति और कविता की कभी मुलाकात ही नहीं हुई. भारी दबाव के कारण आखिर सीबीआई को आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को गिरफ्तार करना पड़ा. सीबीआई ने 13 अप्रैल, 2018 रात 10 बजे विधायक को गिरफ्तार कर लिया. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट इस पूरे मामले की जांच की निगरानी करेगा.

चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले की बेंच ने सीबीआई से 2 मई को जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांगी है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि सीबीआई कानून के तहत सख्ती से जांच करे.

घटना के बाद से लड़की को ले कर तमाम तरह के औडियो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिन से पता चलता है कि घटना के पीछे दुश्मनी की वजह को रख कर एक राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है. सत्ता में शामिल खुद भाजपा 2 खेमों में बंट गई है. इन वजहों से जांच का सही पक्ष सामने आना मुश्किल लग रहा है. ऐसे में अब कोर्ट के फैसले से ही सच का पता चल सकेगा. ?

– बलात्कार कानून के मद्देनजर पीड़ित और उस के पक्ष की हर पहचान छिपाने के लिए नाम नहीं लिखा गया है और कविता व राखी परिवर्तित नाम हैं.

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अपना खुद का चक्रव्यूह : भाग 1

21 मार्च, 2018 की प्रात: 9 बजे कानपुर के बर्रा थाने के प्रभारी भास्कर मिश्रा को गहोई निवासी बबलू भदौरिया ने सूचना दी कि पांडु नदी पर बने काठ पुल के नीचे एक युवक की लाश तैर रही है. मिश्रा को मामला गंभीर लगा. अपने उच्चाधिकारियों को लाश की जानकारी दे कर वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

पांडु नदी (काठ पुल) थाना बर्रा से करीब 3 किलोमीटर दूर है. भास्कर मिश्रा को वहां पहुंचने में आधा घंटा लगा. उस समय वहां भीड़ जुटी थी. लोग पुल से झांकझांक कर नदी में तैरते शव को देख रहे थे. कोई कह रहा था कि युवक की मौत डूबने से हुई है तो कोई आत्महत्या करने की बात कह रहा था. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो हत्या की आशंका भी जता रहे थे.

थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने युवक के तैरते हुए शव को गौर से देखा तो गले में बंधे दुपट्टे से वह समझ गए कि युवक की हत्या की गई है. साथी पुलिसकर्मियों ने भी उन की हां में हां मिलाई. मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा तथा सीओ (गोविंदनगर) सैफुद्दीन बेग भी वहां आ गए. उन्होंने मौके पर फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया.

पुलिस अधिकारियों ने नदी से लाश बाहर निकलवा कर उस का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक की उम्र करीब 30 वर्ष रही होगी. वह नीले रंग की शर्ट व पैंट पहने था. युवक का गला रेतने के अलावा उस के सीने को किसी नुकीली चीज से गोदा गया था. सिर पर भी कई घाव थे और उस के गले में स्टोल (दुपट्टा) बंधा था.

एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा ने मृतक की जामातलाशी कराई तो उस के पास से कुछ भी बरामद नहीं हुआ. थानाप्रभारी को यह देख कर जरूर ताज्जुब हुआ कि मृतक उल्टा अंडरवियर पहने था. उन्हें लगा कि संभवत: यह प्रेमिल संबंधों में हुई हत्या का मामला रहा होगा. उस की हत्या कहीं और की गई होगी और शव को यहां फेंक दिया गया होगा.

अब तक शव को सैकड़ों लोग देख चुके थे, लेकिन कोई भी मृतक की शिनाख्त नहीं कर पाया था. इस से यही लगा कि मृतक युवक यहां का नहीं है. शिनाख्त न होने पर पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश को मोर्चरी में रखवा दिया. साथ ही अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उस के हुलिए की सूचना वायरलैस से कानपुर नगर व कानपुर देहात के थानों को दे दी.

उसी रोज शाम 4 बजे थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा थाने में आए तो 2 लोग उन की प्रतीक्षा में वहां बैठे मिले. उन में से अधेड़ उम्र का व्यक्ति बोला, ‘‘सर, मेरा नाम महेंद्र सिंह है और यह मेरा बड़ा बेटा कुलदीप है. मैं घाटमपुर कस्बा के जवाहर नगर मोहल्ले में रहता हूं. मेराछोटा बेटा संदीप सिंह दिल्ली में नौकरी करता है और अपनी पत्नी व बच्चों के साथ वहीं रहता है.

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‘‘संदीप 19 मार्च को दोपहर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन द्वारा कानपुर के लिए रवाना हुआ और रात 10 बजे कानपुर स्टेशन पर उतरा था. इस बीच वह बराबर वीडियो कालिंग द्वारा अपनी पत्नी रेनू के संपर्क में रहा. नौबस्ता थाना के अंतर्गत आशानगर में हमारा मकान बन रहा है. इसी मकान में संदीप को आना था. लेकिन जब वह मकान में नहीं पहुंचा और उस का मोबाइल भी बंद हो गया तो हम ने उस की खोजबीन शुरू की.

‘‘बहू को जानकारी दी तो वह भी घबरा कर दिल्ली से कानपुर आ गई. जब संदीप का कुछ भी पता नहीं चला तो हम संदीप की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना नौबस्ता गए. वहां से पता चला कि बर्रा थाना क्षेत्र में एक युवक की लाश मिली है. हम उस लाश का फोटो देखना चाहते हैं कि वह किस की है.’’

थानाप्रभारी ने पांडु नदी से जो लाश बरामद की थी, उस के फोटो उन के मोबाइल फोन में थे. उन्होंने वे फोटो महेंद्र सिंह को दिखाए तो फोटो देखते ही वह फफक कर रो पड़े. उन्हें देख कर उन का बेटा कुलदीप सिंह भी रोने लगा. वह लाश संदीप की ही थी. संदीप की हत्या की खबर जैसे ही घर पहुंची तो घर में कोहराम मच गया. घर पर रिश्ते नातेदारों की भीड़ जुटने लगी.

थानाप्रभारी ने संदीप सिंह की हत्या के बाबत महेंद्र सिंह से पूछा तो वह बोले, ‘‘सर, हमारी किसी से कोई रंजिश नहीं है. मुझे तो लगता है कि संदीप की हत्या लूट के इरादे से हुई है.’’

लुटेरों द्वारा लूट की बात थानाप्रभारी को हजम नहीं हुई, क्योंकि लुटेरे इस तरह निर्मम हत्या नहीं करते. हत्या का कारण उन्हें कुछ और ही नजर आया.

एसपी (साउथ) अशोक कुमार वर्मा के निर्देश पर पुलिस ने सब से पहले मृतक संदीप की पत्नी रेनू सिंह से पूछताछ की. रेनू ने बताया, ‘‘वह 19 मार्च की दोपहर पौने एक बजे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से कानपुर जाने के लिए ट्रेन में बैठे थे. उन के पास 25 हजार रुपए नकद, गले में सोने की चेन, सोने की 2 अंगूठियां तथा महंगा मोबाइल फोन था.

‘‘शाम साढ़े 4 बजे उन्होंने मुझे वीडियो कालिंग की और बताया कि वह गाजियाबाद से आगे हैं. रात 9.55 बजे उन्होंने मुझे बताया कि वह कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर उतर गए हैं और टैंपो से आशानगर जा रहे हैं.

‘‘रात पौने 12 बजे उन्होंने फिर मुझे वीडियो काल कर के बताया कि वह नौबस्ता सब्जीमंडी पहुंच गए हैं. सवारी न मिलने से पैदल ही आशानगर स्थित निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहे हैं. इस के बाद उन से कोई बातचीत नहीं हुई.’’

रेनू सिंह ने आगे बताया, ‘‘मैं ने फिर सुबह के समय उन से बात करनी चाही तो उन का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद मैं ने ससुरजी को सारी जानकारी दी तो उन्होंने बताया कि संदीप न तो घर पहुंचा है और न ही बन रहे मकान पर. बेचैनी बढ़ी तो मैं कानपुर आ गई. यहां आ कर पता चला कि उन की किसी ने हत्या कर दी है’’

रेनू ने यह भी बताया कि वह पति के साथ सुखमय जीवन बिता रही थी. उस के पति की हत्या किस ने और क्यों की, उसे इस की जानकारी नहीं है.

काल डिटेल्स ने दिखाई जांच की राह

मृतक संदीप की पत्नी व परिवार के अन्य सदस्य रंजिश से इनकार कर रहे थे. लूट की घटना थानाप्रभारी को हजम नहीं हो रही थी. हकीकत जानने के लिए उन्होंने संदीप के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस दौरान संदीप की अपनी पत्नी के अलावा एक और नंबर पर बात हुई थी.

पुलिस ने उस नंबर का पता लगाया तो वह नंबर तिलसड़ा (घाटमपुर) की नेहा सिंह का निकला. यह पता चलते ही थानाप्रभारी को कहानी में प्रेमप्रसंग वाली बात नजर आने लगी.

इस के बाद पुलिस ने नेहा सिंह के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि 19 मार्च, 2018 की शाम नेहा ने एक नंबर पर एसएमएस भेजा था, जिस में उस ने लिखा था, ‘आ जाना, आज उसे उल्टा करूंगी.’

जिस नंबर पर उस ने वह एसएमएस भेजा था, वह नंबर पटेलनगर, कालपी (उरई) निवासी प्रवीण कुमार श्रीवास्तव का निकला. थानाप्रभारी भास्कर मिश्रा ने पुलिस टीम के साथ 22 मार्च, 2018 की रात प्रवीण कुमार के यहां दबिश दे कर उसे हिरासत में ले लिया.

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अंधविश्वास का अंधेरा : डायन के नाम पर डरावना तमाशा

जून की दहकती दोपहर का दहला देने वाला दृश्य था. बीहड़ सरीखे सघन जंगल के बीच बने विशाल मंदिर के बाहर लंबेचौड़े दालान में एकत्र सैकड़ों स्त्रीपुरुषों की भीड़ टकटकी लगाए उस लोमहर्षक मंजर को देख रही थी. सुर्ख अंगारों की तरह दहकती आंखों और शराब के नशे में धुत अघोरी जैसे लगने वाले 2 भोपे (ओझा) बेरहमी के साथ 4 युवतियों की जूतों से पिटाई कर रहे थे.

अंगारे सी बरसती धूप की चुभन और दर्द से बेहाल युवतियां चीखतीचिल्लाती तपते आंगन में लोटपोट हुई जा रही थीं. धूप से बचने के लिए तमाशाई आंगन के ओसारों की छाया में सरक आए थे. जिस निर्विकार भाव से लोग इस जल्लादी जुल्म का नजारा देख रहे थे, उस से लगता था कि यह सब उन के लिए नया नहीं था.

लगभग एक घंटे तक अनवरत चलने वाली इस दरिंदगी से युवतियां बुरी तरह लस्तपस्त और निढाल हो चुकी थीं. उन पर गुर्राते और गंदी गालियों की बौछार करते भोपे उन्हें बालों से घसीटते हुए फिर से खड़ा करने की मशक्कत में जुट गए.

नारकीय यातना का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा, अब उन्हें पीठ के बल रेंगतेघिसटते मंदिर की तपती सुलगती 200 सीढि़यां तय करनी थी.

जल्लादी जुल्म ढाने वाले आतताइयों को भी मात करने वाले इन दरिंदों की चाबुक सरीखी फटकार के आगे बेबस युवतियों ने यह काम भी किया. तब तक उन के कपड़े तारतार हो चुके थे, पीठ और कोहनियां छिलने के साथ बुरी तरह लहूलुहान हो गई थीं. हांफती, कराहती, बिलखती युवतियों पर कहर अभी थमा नहीं था.

यातना का दुष्चक्र उन्हें मारे जाने वाले जूतों के साथ आगे बढ़ता रहा. पांव उठाने तक में असमर्थ इन युवतियों को जूते सिर पर रख कर और मुंह में दबा कर 2 किलोमीटर नंगे पांव चलते देखना तो और भी भयावह था. और इस से भी कहीं ज्यादा दर्दनाक और दयनीय दृश्य था, उन जूतों में भर कर पीया जाने वाला जलकुंड का गंदा पानी.

आतंक और भय से थर्राई हुई युवतियों को जूतों में भर कर पानी पिलाया जाने वाला पानी कैसा था, इस की कल्पना मात्र ही विचलित करने वाली थी. बांक्याराणी मंदिर परिसर में ही बना है हनुमान मंदिर. इस के निकट बने जलकुंड में दिन भर में लगभग 300 से ज्यादा महिलाएं स्नान करती हैं.

समझा जा सकता है कि कुंड का पानी कितना मैला रहा होगा. इसी गंदे पानी को युवतियों को जूतों में भर कर पीने को बाध्य किया गया और वह भी एक बार नहीं लगातार 7 बार.

मंदिर की जिन सीढि़यों पर महिलाओं को पीठ के बल रेंग कर उतरना होता है, वह सफेद संगमरमर की है, जो गर्मियों में भट्ठी की तरह सुलगती हैं. नतीजतन औरतों की पीठ न केवल छिल जाती है, बल्कि उस पर फफोले भी पड़ जाते हैं.

जुल्म की इंतहा तो तब होती है, जब सीढि़यां उतर चुकने के बाद भोपा उन्हें अपने सामने ज्वाला मंदिर में बिठाता है और लहूलुहान और निढाल युवतियों पर एक बार फिर जूते बरसाता है. पीड़ा से रोतीबिलखती युवतियों की दहला देने वाली चीखपुकार जब वहां मौजूद उन के परिजन ही नहीं सुनते तो और कौन सुनेगा?

भोपों के रूप में अंधविश्वास का क्रूर चेहरा

राजस्थान में अंधविश्वास का यह वीभत्स और क्रूर चेहरा सिर्फ भीलवाड़ा जिले के बांक्याराणी मंदिर का ही नहीं है, बल्कि राजसमंद, बांसवाड़ा और चित्तौड़गढ़ भी महिलाओं को डायन घोषित कर के उन के कथित निवारण के नाम पर असहनीय अत्याचार के अड्डे बन गए हैं.

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अंधविश्वास की वजह से किसी को डायन बता कर भयानक यातनाएं देना और मार डालना सिद्ध करता है कि राजस्थान के पूर्वोत्तर समाज का एक बड़ा हिस्सा आदिम युग में जी रहा है.

इस सूबे का आदिवासी समुदाय आज भी आधुनिकता और बर्बरता के बीच असहज अस्तित्व में फंसा हुआ है. आदिवासी बहुल इलाकों में स्त्रियों को डायन घोषित कर उन्हें प्रताडि़त करना, यहां तक कि मार डालना सदियों पुराना चलन है.

प्रेत निवारण की परंपरा का मूल स्वरूप क्या था और उस की शुरुआत कैसे हुई? यह जानने के लिए हमें राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा के गांवों में अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम पर पत्थर गाड़ने की परंपरा को जानना होगा, जिसे ‘चीरा’ कहा जाता है. गाजेबाजे के साथ गाड़े गए ‘चीरे’ पर लोकदेवता की तसवीर उकेरी जाती है और विधिवत परिवार के पूर्वज का नाम अंकित किया जाता है.

ये चीरे आमतौर पर खुली जगहों में होते हैं, लेकिन कहींकहीं टापरों में स्थापित किए जाते हैं. चीरे मृत स्त्रियों के नाम पर भी गाड़े जाते हैं, लेकिन बहुत कम. इन को ‘मातोर’ कह कर पूजा जाता है. ऐसे कई शिलाखंडों पर तो साल, नाम आदि भी खुदे होते हैं. जिस गांव में चीरा स्थापित किया जाना होता है, उस स्थान पर गांव की कुंवारी कन्या दूध, जल आदि से ‘बावजी’ को स्नान कराती है और कुमकुम आदि से पूजा करती है.

संभवत: ‘बावजी’ शब्द लोक देवता के लिए इस्तेमाल किया जाता है. गांव के बाहर निर्धारित स्थल ‘गोदरा’, जहां चीरे स्थापित किए जाने होते हैं, उस जगह के जानकार को खत्री कहा जाता है. खत्री चीरे के भूतवंश की पूरी जानकारी कवितामय लहजे में सुनाता है. शिलाखंडों में कथित रूप से रह रही आत्मा के आह्वान की अलग प्रक्रिया है.

खत्री ही मृतात्माओं से संवाद स्थापित करता है. उस समय खत्री के हावभाव और बोली असामान्य हो जाती है, फिर शुरू होता है भविष्य कथन और कष्ट निवारण का क्रम. मृतात्मा, जिसे खाखरिया देव माना जाता है, खत्री उस का इन शब्दों के साथ आह्वान करता है, ‘कूंकड़ो बोल्यो, नेकालू साल्यो, कालू देवती, सोनावाला ने भला, वैसे हैं भाई कारूदेव, जोड़ी रा हुंकार है…’

इस अवसर पर निकट बैठे भोपों द्वारा कांसे की थाली और ढोलमजीरों से विशेष तरह का संगीत पैदा किया जाता है, जिस की सम्मिलित ध्वनि वातावरण को अजीब माहौल में बदल देती है. आदिवासियों की प्रचलित परंपराओं को समझें तो इन देवरों के भोपे अपनी जानकारी के मुताबिक लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए विशेष गणित का सहारा लेते हैं. यही है आदिवासियों की अपने पुरखों को ‘देव स्वरूप’ में सम्मानित करने की परंपरा.

लेकिन अब ये सारी परंपराएं नष्ट हो चुकी हैं और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने भोपों का रूप धारण कर नशे के उन्माद में लूटखसोट और यौनाचार को अपना कारोबार बना लिया है. अन्यथा आदिवासियों में चीरा प्रथा व्याधियों का उपचार करने, समस्याओं का निवारण करने और पूर्वजों की मृत आत्माओं का आह्वान करने की है.

बावजी आदिवासियों के लोकदेवता को कहा जाता है. कुछ अरसा पहले बांसवाड़ा के पड़ारिया गांव में तैनात एक शिक्षक ने चीरे की परंपरा को वृक्षारोपण से जोड़ दिया था, लेकिन यह सब तभी तक चला, जब तक शिक्षक का दूसरी जगह स्थानांतरण नहीं हो गया. चीरों के निकट काफी संख्या में दरख्त बन चुके फलदार पेड़ इस बात की तसदीक करते हैं. दूसरी ओर सरकार ने यहां कुछ भी संवारने की पहल तक नहीं की.

डायन के नाम पर मौत का नंगा नाच

आदिवासी जिलों में अब तक 105 स्त्रियों को डायन का बाना पहना कर अभिशप्त घोषित किया जा चुका है, जबकि 8 महिलाओं की पीटपीट कर हत्या की जा चुकी है. साथ ही 2 दरजन महिलाओं को मारपीट कर गांवों से निकाला जा चुका है.

स्वस्थ महिलाओं को डायन बनाने के ये आंकड़े पिछले 4 साल के हैं, लेकिन क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े 4 तक भी नहीं पहुंचते. काला जादू के नाम पर भोपे आज भी आदिवासी इलाकों में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. आस्था यहां अकसर बदला लेने का हथियार बन चुकी है.

प्रेतों से मुक्ति पाने की कहानी जहां से शुरू होती है, उसे देखना ही दहशत पैदा करता है. पीडि़त महिलाओं के परिजन ही मंदिर पहुंच कर उन्हें भोपों के हवाले कर देते हैं. भोपा इन्हें उलटे पांवों चला कर मंदिर परिसर में ले आता है. महिला को पीठ मंदिर की तरफ रखनी होती है तथा हथेलियों को प्रणाम की मुद्रा में रखना होता है.

महिला को सुलगती जमीन पर नंगे पांव चलना होता है. भोपों के बारे में कहा जाता है कि निर्दयता और दुर्दांतता में इन का कोई सानी नहीं होता. अपने जल्लादी काम में ये प्रोफेशनल की तरह पारंगत होते हैं. इन की फीस कोई निश्चित नहीं होती, हालांकि 5 सौ से हजार रुपए में ये अपनी सेवाएं उपलब्ध कराते हैं. इन भोपों को नकदी के साथ दारू भी देनी होती है, अपना काम ये नशे में धुत्त हो कर ही करते हैं. भोपों के कारोबार में मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं.

बांक्याराणी मंदिर एक ट्रस्ट के अधीन है, लेकिन इस वीभत्स कारोबार में ट्रस्ट के अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं होती. अलबत्ता ट्रस्ट के अध्यक्ष नारायणलाल गुर्जर की मजबूरी चौंकाती है. उन का कहना है, ‘भोपों की मनमानी मंदिर ट्रस्ट के लिए मुसीबत बनी हुई है.’

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नारायणलाल कहते हैं, ‘महिलाओं को इतनी दारूण यातना देना पूरी तरह अमानवीय और शैतानी कृत्य है. ट्रस्ट पूरी तरह इस के खिलाफ है. लेकिन फिर भी ये लोग डराधमका कर मनमानी पर उतारू हैं.’

बांक्याराणी मंदिर में प्रेत बाधा निवरण के नाम पर स्त्रियों के भयावह उत्पीड़न की खबरें मीडिया में सुर्खियां बनीं तो राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा बांक्याराणी मंदिर पहुंचीं भी, लेकिन पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकीं. भोपों की भयावह कारस्तानियों का खुलासा होने पर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए जवाब मांगा कि बताएं कितने भोपों पर काररवाई की गई.

हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ के न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिलाओं को कोई डायन कैसे बता सकता है? कानून होने के बाद भी इस तरह के मामले क्यों हो रहे हैं?

विद्वान न्यायाधीश ने तो यहां तक कहा, ‘भोपे किसी महिला को डायन न बना पाएं और उन्हें प्रताडि़त न कर सकें, इस के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाए.’ लेकिन हाईकोर्ट की इस हिदायत पर अमल नहीं हुआ.

नतीजतन भोपों के हौसले आज भी बुलंद हैं और महिलाएं आज भी जूते मुंह में दबाए उत्पीड़न का दर्द सहने को मजबूर हैं. घिनौनी आस्था के मल कुंड में डूबे लोगों का रूझान तब बुरी तरह चौंकाता है, जब नवरात्रों में भोपों के दरबार में लोगों की भीड़ का सैलाब उमड़ने लगता है.

हाईकोर्ट की सख्ती और पुलिस की दबिश का भोपों की मनमानी पर कोई असर तो क्या होता, इस के उलट वे और बेलगाम हो गए. अब तक प्रदेश के आदिवासी इलाकों में ही अंधविश्वास की परत मोटी करने वाले इन भोपों को फिल्म ‘पद्मावत’ विवाद से उफान में आए चेतन मृत्यु प्रकरण ने शहरी इलाकों में घुसपैठ करने का अवसर दे दिया.

खबरिया चैनलों ने टीवी स्क्रीन पर जो फुटेज दिखाए, उस का वर्णन करें तो नशे की तरंग और उन्माद में डूबे उन्मत्त भोपे पूरे दबदबे के साथ लोगों को डरा रहे थे और सूबे पर अंधविश्वास की काली चादर फैलाने में जुटे थे. तांत्रिकों का उत्पात और हवा में तलवारें भांजते हुए उन का डरावना अट्टहास. बदहवास लोग खबरिया चैनलों पर चकित भाव से देख रहे थे. इशारा साफ था कि भोपों को चेतन की घटना ने मौत का नाच दिखाने का अवसर दे दिया था.

भोपे अपना उन्मादी चेहरा तब दिखा रहे थे, जब तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अजीत सिंह यह कह कर हटे ही थे कि हम ने भोपों के गिर्द शिकंजा सख्त कर दिया है. लेकिन कथित तांत्रिक चेतन के आत्मघात की घटना पर उन्मत्त भोपों ने भयाक्रांत करने वाली उछलकूद मचा कर इस बात को हवा में उड़ा दिया.

सवाल है कि भीलवाड़ा जिले के गांव निंबाहेड़ा जाटान की महिला भोपी झूमरी जीभ लपलपाते हुए कैसे तलवार चमकाने का दुस्साहस कर रही थी? सिगरेट के धुआंधार कश लगाती हुई झूमरी अपने आप को 9 देवियों का अवतार बता रही थी. कांता भोपी तो निरंतर भाला घुमाते हुए अपना दरबार लगाए हुए थी. जाहिर है कि कानून इन के ठेंगे पर था.

आतंक का गहराता साया

डायन बता कर उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं भीलवाड़ा और राजसमंद जिलों में हुई हैं. भीलवाड़ा के भोली गांव के दबंगों की बेटी बीमार हुई तो रामकन्या को डायन घोषित कर दिया गया. लगभग एक महीने तक दबंगों की कैद में रहने के बाद बमुश्किल छुड़ाई गई रामकन्या को 6×4 फीट की अंधेरी कोठरी में बंद कर के रखा गया था. गांव के दबंग जाट शिवराज की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी पूजा बीमार हुई तो भोपे के कहने पर नजला रामकन्या पर गिरा.

भोपे का कहना था, ‘इसे डायन खा रही है.’ भोपे की बात पर शिवराज का शक रामकन्या पर गया, जिस का घर पूजा के स्कूल के पास ही था. नतीजतन रामकन्या को डायन करार दे दिया गया.

जिस बदतर हालत में रामकन्या को दबंगों की कैद से छुड़ाया गया, उसे देख कर डाक्टर का कहना था कि ये जिंदा कैसे बच गई? इस की हालत तो बहुत खराब है.

भीलवाड़ा में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 20 साल में डायन प्रताड़ना के 87 मामले आ चुके हैं और इन में एक दरजन से ज्यादा महिलाओं की मौत हो चुकी है. तंत्रमंत्र की ओट में इन भोपों की व्यभिचारी मानसिकता को समझें तो चित्तौड़गढ़ जिले के पुरोली गांव का बाबा सिराजुद्दीन महिलाओं के शरीर से डायन निकालने के करतबी तरीकों में निर्लज्जता के साथ उन के प्राइवेट पार्ट्स को टटोलता है.

भीलवाड़ा जिले के भुवास गांव के भोपा देवकिशन की दरिंदगी तो देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा कर देती है. यह भोपा महिलाओं की पीठ पर पूरी निर्ममता से कोड़े बरसाता है और देखने वाले उफ्फ भी नहीं करते.

भीलवाड़ा जिले की सुहाणा तहसील के आगरपुरा गांव की विधवा महिला रामगणी के पति और 2 बेटों की मौत के बाद उस की पुश्तैनी जमीन हथियाने के लिए पड़ोसियों ने रामगणी समेत परिवार की सभी महिलाओं को डायन घोषित कर दिया था.

कितने ही मामले संपत्ति के लिए

राजसमंद जिले के रणका गांव के दबंग परिवार में एक मौत क्या हुई, डोलीबाई को डायन बता कर उसे जगहजगह गरम सलाखों से दागा गया. राजसमंद के थाली का तलागांव की केशीबाई को डायन बता नंगा कर के गधे पर बिठा कर पूरे गांव में घुमाया गया. दबंगों की नजर उस की संपत्ति पर थी.

भीलवाड़ा जिले के बालवास गांव की नंदू देवी का पूरा परिवार पिछले साढ़े 4 साल से गांव के बाहर रहने को मजबूर है. पड़ोसी डालू का बेटा क्या बीमार हुआ, भोपे ने इस का इलजाम नंदू देवी पर डाल दिया. इस के बाद तो पूरे गांव ने मिल कर उसे पीटा और गांव से बाहर कर दिया. नंदू देवी गांव आने वाले हर अजनबी से पूछती है, ‘मैं डायन होती तो क्याआज मेरा पूरा परिवार जीवित रहता?’

भीलवाड़ा की करेड़ा तहसील के ऊदलपुरा गांव की गीता बलाई की जिंदगी उसी के परिजनों ने छीन ली. पति के मंदबुद्धि होने के कारण घर और खेती का सारा काम गीता ही संभाल रही थी, जो उस की जेठानी को बरदाश्त नहीं हुआ.

गीता पर डायन होने का आरोप लगा कर जेठानी उसे घनोप माता मंदिर ले गई, जहां नवरात्रों में उसे 11 दिनों तक भूखाप्यासा रखा गया. बाद में गीता जब कुएं से पानी निकाल रही थी तो जेठानी ने उसे धक्का दे दिया. कुएं में एक पेड़ पर गीता का शव 10 दिनों तक लटका रहा.

चाहे भोपा हो या भोपी, शराब के नशे में धुत्त ये डरावने चेहरे डायन निकालने के नाम पर पूरी हैवानियत पर उतारू रहते हैं. भोपों के ठौरठिकानों को अंधविश्वास की अदालतों का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा.

अंधविश्वास की परत दर परत दबे इन आदिवासी इलाकों में यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर महिलाएं ही डायन क्यों बनती हैं? और ऐसी कौन सी वजह होती है कि महिलाओं को सामान्य जीवनयापन करतेकरते एकाएक डायन करार दे दिया जाता है? सूत्र बताते हैं कि डायन प्रताड़ना के अधिकांश मामलों में संपत्ति और जमीन हड़पने के लिए उन के नातेरिश्तेदार ही ऐसी साजिश रचते हैं. कई मामलों में लोगों ने अदावत और रंजिश के चलते महिलाओं को डायन करार दे दिया.

अलबत्ता यह एक कड़वी सच्चाई यह है कि डायन बनने का नजला अधिकांशत: उन्हीं महिलाओं पर गिरता है, जो गरीब, निराश्रित या दलित वर्ग से होती हैं. स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों इन आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास का अंधेरा इतना घना हो गया है कि डायन से निजात पाने के लिए आने वाली महिलाओं की कतार नहीं थमती और न ही उन के परिजन उन्हें दहशत के तंदूर में धकेलने से बाज आते हैं?

एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि कुछ मामलों में तो डायन बता कर की गई हत्याएं भूमाफिया का काम है. बेइंतहा दर्द की ऐसी ढेरों अंतहीन कथाएं हैं, जिन में भोपों का कहर टूटा और सामान्य जीवनयापन करने वाली औरतों को यातनाएं भुगतने के लिए छोड़ दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीचंद पंत कहते हैं, ‘इन घटनाओं से अगर हमारी नसें नहीं चटखीं और दिल बेचैन नहीं हुआ तो मानवीय रिश्तों की बंदिशें कैसे बच पाएंगी?’

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सार्वजनिक राजनीतिक उपवास में ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’

भारतीय परिवारों में उपवास के दिनों में बड़ा उत्साह रहता है. परिवार के लोग उपवासपूर्व की रात्रि को खूब गरिष्ठ व तला खाना खाते हैं और एकदूसरे से कहते भी रहते हैं कि जितना ज्यादा हो सके, खा लो, कल तो उपवास है. कहने का मतलब यह नहीं उपवास के दिन वाकई उपवास किया जाता है, बल्कि इस दिन भी फलाहार के नाम पर मिष्ठान, मेवे और फल वगैरा पेट में ठूंसे जाते हैं.

सार्वजनिक राजनीतिक उपवास भी कुछकुछ ऐसे ही होने लगे हैं जिन में पहले से ही पेट को इतना तृप्त कर दिया जाता है कि 4-6 घंटे भूख वाले हार्मोंस सक्रिय न हों. नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी के उपवास का जवाब भी उपवास से दिया तो इस में उन का कहा जुमला चरितार्थ हो गया कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, यह और बात है कि सब खा रहे हैं और खाने भी दे रहे हैं.

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झटपट तैयार स्वाद मजेदार : रिची राइस

सामग्री

– 2 कप पालक

– 1 कप चावल

– 2 बड़े चम्मच चीज

– 1 पापड़

– 1 टमाटर कटा

– 1 प्याज कटा

– 2-3 कलियां हरा लहसुन कटी

– 1 हरा प्याज कटा

– 1 बड़ा चम्मच घी

– नमक स्वादानुसार.

विधि

चावलों को पका कर ठंडा होने दें. पालक को उबाल कर ठंडा होने पर मिक्सर में पीस लें. पालक में पानी नहीं होना चाहिए. पेस्ट गाढ़ा होना चाहिए. फ्राइंगपैन में घी डाल कर प्याज व लहसुन को हलका भून कर टमाटर डाल कर हलका सा भूनें. अब पालक का पेस्ट, चावल, नमक मिला दें. चावलों को ज्यादा ऊपरनीचे न करें वरना टूट सकते हैं. इन्हें बाउल में डाल चीज व पापड़ से सजा कर सर्व करें.

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झटपट तैयार स्वाद मजेदार : चिलाडू

सामग्री

– 1 कप चावल उबले

– 1 कप मक्की का आटा

– 2 पिंच कसूरी मेथी

– 1 छोटा चम्मच देगी मिर्च

– पर्याप्त देशी घी

– नमक स्वादानुसार.

विधि

चावलों को आधे घंटे के लिए पानी में भिगो दें. एक कड़ाही में 1/2 चम्मच घी डाल कर गरम करें. इस में भिगोए चावल डालें और 2 कप पानी डाल कर उबाल आने तक तेज आंच पर पकाएं. फिर 5-6 मिनट धीमी आंच पर ढक कर पकाएं. ठंडा होेने के लिए अलग रख दें. मक्के के आटे का घोल बना कर उस में नमक व कसूरी मेथी मिक्स करें. तवा गरम कर के थोड़ा घी लगाएं. पानी का छींटा मार कर कपड़े से पोंछ दें. आटे का घोल तवे पर फैलाएं और ऊपर से चावल की लेयर लगाएं. अब घी लगाएं.एक तरफ से पकने के बाद ऊपर से देगी मिर्च लगाएं और फिर पलट कर दोनों तरफ से हलका सेंक कर चटनी या दही के साथ चावल से गार्निश कर गरमगरम सर्व करें.

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डिजिटल वर्ल्ड में सभी नंगे

फेसबुक,व्हाट्सऐप के बिना जिंदगी भी, क्या जिंदगी होगी. इन 2 ऐप्स ने युवाओं की जिंदगी बदल डाली है. अब दोस्तों के साथ गपें कौफीहाउसों में कम, डिजिटली ज्यादा होती हैं और होंठों की जगह कीबोर्डों पर उंगलियां ऐसे थिरकती हैं मानो भरतनाट्यम कर रही हों. लेकिन फेसबुक और व्हाट्सऐप पर कुछ भी सीक्रेट नहीं, यह पक्का हो गया है. टैक्स्ट लिखा या पोस्ट किया हुआ चुन सकते हैं. फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि चलाने वाली कंपनियां आप को, आप की पसंद को, आप के आर्थिक स्तर को, आप की छुट्टियों को बेच सकती हैं ताकि जानकारी के आधार पर आप की मार्केटिंग की जा सके.

‘आई एम औफ टु शिमला’ टाइप करते ही आप को शिमला के होटलों के विज्ञापन दिखने लग जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं. गूगल में शिमला होटल सर्च करते ही आप पर होटलों की बमवर्षा होने लगती है और आप की स्क्रीन ऐसे विज्ञापनों से भरने लगती है. जो युक्ति ऐप है, उस में तो पूरी स्क्रीन थोड़ी देर बाद ही इन विज्ञापनों से भर सकती है.

विज्ञापन तो बात दूसरी, आप के पास अब पार्टी, धर्म, विचारक विशेष के विज्ञापन भी आ सकते हैं. आप को दूसरे धर्म के खिलाफ उकसाने वाले मैसेज अनजान सोर्सों से मिल सकते हैं. आप को उकसाने की कोशिश की जा सकती है. आप की जाति, आप का धर्म, आप का देश खतरे में है, ऐसा कहकह कर आप को भ्रमित किया जा सकता है. अगर तर्क और सत्य कहने वालों को पैसा न मिल रहा हो तो वे कैसे महंगा डाटा खरीद कर आप को बहकाई जा रही सामग्री परोसते. इन में आप को एकतरफा जानकारी मिलेगी.

अमेरिका में हाउस औफ रिप्रजैंटेटिव और सीनेट की संयुक्त जांच कमेटी के सामने फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने बहुत ही गलतियां मानीं पर हर बात पर उन की डिफैंस भी थी कि हर यूजर को महीन शब्दों में हर बात बता दी जाती है. वे बारबार कहते रहे कि लोग अपनी प्राइवेसी को प्रोटैक्ट कर सकते हैं पर सांसदों ने यह नहीं पूछा कि कंपनी प्रोटैक्शन की दीवार भेद सकती है या नहीं? अगर दीवार बनाई ही जुकरबर्ग ने है तो क्या उसे नहीं मालूम कि प्राइवेसी चूज करने के बावजूद आप के मैसेज हरेक शातिर के लिए खुले हैं. हैकर वे सब तकनीक जानते हैं जो फेसबुक के निर्माता बनाते हैं.

डिजिटल वर्ल्ड में कुछ भी छिपा नहीं है. अपनी प्रेमिका के साथ बिना कपड़ों के मोबाइल से शूट की गई फिल्म की रिकौर्डिंग सैकड़ों को उपलब्ध है, चाहे आप ने किसी को भेजा न हो. ‘मुक्ता, आई लव यू’ का संदेश मुक्ता तक पहुंचने से पहले सैकड़ों को पता चल जाएगा और यह भी कि  उस समय आप कहां बैठे हैं, कौन से मोबाइल से मैसेज कर रहे हैं.

भारत सरकार यों ही आधार से मोबाइल को लिंक नहीं करा रही. वह आप को, हरेक नागरिक को ब्लैकमेल करने का हथियार ढूंढ़ रही है. जब सौफ्टवेयर तैयार होने लगेंगे तो सरकारों को कैंब्रिज एनालिटिका की जरूरत भी नहीं होगी. वे स्वदेशी हैकरों के जरिए हर नागरिक का कच्चा चिट्ठा रखेंगी, फेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सऐप ही नहीं, ‘मेक माय ट्रिप’, ‘बुक माय शो’, ‘अमेजन’, ‘फ्लिपकार्ट’ सब आप के बारे में जानकारी जमा कर रहे हैं. आप आज की दुनिया में नंगे हैं. कपड़े, बस वर्चुअल हैं. आप का महत्त्व सिर्फ कुछ डिजिट्स का है. आप सरकार के मोहरे हैं और वही रहें. बिग ब्रदर आप को देख रहा है, यह न भूलें. आम आदमियों का व्यवहार धर्मसम्मत ही हो, यह अधर्मी तकनीक के सहारे तय किया जाएगा.

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भोजपुरी की सनी लियोनी का जलवा

भोजपुरी फिल्मों की सनी लियोनी कही जाने वाली सनी सिंह का असली नाम शायद ही कोई जानता हो, क्योंकि सनी लियोनी की तरह दिखने वाली पल्लवी सिंह ने अपना नाम बदल कर सनी सिंह जो रख लिया है. उन के चेहरे व बदन की बनावट हूबहू सनी लियोनी से मिलती है इसीलिए उन के फैन उन्हें सनी लियोनी ही कह कर बुलाते हैं.

सनी सिंह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की रहने वाली हैं. उन्होंने भोजपुरी फिल्मों में ऐक्टिंग की शुरुआत सुपरस्टार पवन सिंह के साथ फिल्म ‘लेके आजा बैंडबाजा ए पवन राजा’ में पवन सिंह की साली के रोल से की थी. वे भोजपुरी फिल्म ‘विधायकजी’, ‘भोजपुरिया राजा’, ‘तीन बुरबक’ समेत उडि़या फिल्म ‘टाइगर’ में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुकी हैं.

पेश हैं, सनी सिंह से हुई बातचीत के खास अंश:

भोजपुरी फिल्मों में कैसे आना हुआ?

मैं कालेज टाइम से ही थिएटर से जुड़ी रही हूं. स्टेज पर की गई ऐक्टिंग की तारीफ मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने हमेशा ही की. उन लोगों का कहना था कि मैं एकदम हीरोइन लगती हूं.

इस दौरान एक दोस्त के जरीए मुझे भोजपुरी फिल्मों में ऐक्टिंग करने का औफर मिला. चूंकि मेरा पहले से ही ऐक्टिंग की तरफ रुझान था इसलिए मैं ने इस मौके को गंवाना ठीक नहीं समझा और तुरंत हां कर दी.

यह फिल्म ‘लेके आजा बैंडबाजा ए पवन राजा’ थी जिस में मुझे पहली बार में ही भोजपुरी के सुपरस्टार पवन सिंह के साथ काम करने का मौका मिला था.

आप ने अपना असली नाम पल्लवी सिंह से बदल कर सनी सिंह क्यों रखा?

मैं सनी लियोनी से प्रभावित रही हूं लेकिन मैं ने अपना नाम सनी सिंह खुद ही नहीं रखा. यह नाम मुझे भोजपुरी इंडस्ट्री से ही मिला है क्योंकि भोजपुरी फिल्मों में काम करने के दौरान लोग मुझे असली नाम से न बुला कर सनी लियोनी के नाम से ही बुलाते थे. उन का कहना था कि मैं एकदम सनी लियोनी जैसी लगती हूं, इसलिए मुझे इसी नाम से भोजपुरी इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानी चाहिए.

मैं ने लोगों की मांग पर अपना नाम पल्लवी सिंह से बदल कर सनी सिंह कर लिया और आज यही बदला हुआ नाम मेरी पहचान बन गया है.

आप फिल्मों में आइटम डांस में ज्यादा नजर आती हैं. क्या आप को दूसरी हीरोइनों की तरह लीड रोल वाली फिल्में नहीं मिल रही हैं?

ऐसा बिलकुल नहीं है. मैं ने अभी तक सिर्फ 2 फिल्मों में ही आइटम डांस किया है, जबकि 8 फिल्मों में मैं ने बतौर हीरोइन काम किया है.

पर आप ने सैकंड लीड वाली फिल्में ज्यादा की हैं. क्या वजह रही है कि आप को मेन लीड की फिल्में नहीं मिल रही हैं?

इस की वजह यह रही है कि मैं भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में किसी की मदद के बिना ही आई हूं. इस इंडस्ट्री में मैं ने जो भी मुकाम हासिल किया है वह खुद के हुनर की बदौलत हासिल किया है. ऐसे में खुद को साबित करने के लिए वक्त तो लगता ही है. वैसे, आने वाली कई फिल्मों में मैं लीड रोल में नजर आने वाली हूं. मैं रितेश पांडेय के साथ फिल्म ‘किस में कितना है दम’ कर रही हूं. इस फिल्म में मैं लीड रोल में दिखूंगी.

अगर आप को भोजपुरी फिल्मों में सनी लियोनी की तरह बोल्ड सीन करने का औफर मिले तो खुद को तैयार कर पाएंगी?

सनी लियोनी की तरह तो नहीं लेकिन स्क्रिप्ट की मांग रही तो अभी तक जितना किया है उतना बोल्ड सीन करने में कोई गुरेज नहीं होगी.

सुना है कि आप के परिवार वालों को आप के ऐक्टिंग करने पर एतराज है? ऐसे में फिल्मों में खुद को बनाए रखना कितना मुश्किल रहा?

मैं उत्तर प्रदेश के उस शहर से हूं, जहां तमाम तरह की बंदिशें लगाई जाती हैं. मुझे भी इन्हीं बंदिशों का सामना करना पड़ा. जब मैं ने अपने मातापिता और परिवार वालों को भोजपुरी फिल्मों में काम करने की बात बताई तो मातापिता का कहना था कि फिल्म में काम करने के बजाय नौकरी कर लो. लेकिन फिल्मों में ऐक्टिंग के मेरे रुझान और जुनून को देखते हुए बाद में वे बोले कि ठीक है, पर संभल कर काम करना.

आप की आने वाली फिल्में कौनकौन सी हैं? आप का इन फिल्मों में किस तरह का रोल है?

मेरी कई फिल्में आ रही हैं. इन में ‘गदर 2’, ‘तुम्हीं तो मेरी जान हो राधा’, ‘सुनो ससुरजी 2’, ‘चोर मचाए शोर’ और ‘किस में कितना है दम’ खास हैं.

‘गदर 2’ भारतपाकिस्तान के रिश्तों पर बनी फिल्म है. मैं ने फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ में एक मजबूत लड़की का किरदार निभाया है. सुब्बा राव की फिल्म ‘सुनो ससुरजी’ में एक प्रमोशनल गाना किया है.

आप खुद को फिट व बोल्ड बनाए रखने के लिए क्या करती हैं?

अब वह जमाना गया, जब भोजपुरी हीरोइनों का फिगर भरापूरा हुआ करता था और लोग उस तरह की हीरोइनों को पसंद करते थे. अब भोजपुरी में फिट और स्लिम हीरोइनों को ही पसंद किया जाता है, इसलिए मैं अपनी फिटनैस को ले कर काफी सजग रहती हूं.

मैं खुद को फिट बनाए रखने के लिए रोजाना जिम जाती हूं और अपने खानपान का खासा खयाल रखती हूं.

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शादी को बनाना चाहती हैं यादगार, तो ये ब्यूटी टिप्स जरूर आजमाएं

गरमियों में चेहरे पर मेकअप को अधिक देर तक टिकाए रखना मुश्किल होता है. ऐसे में अगर ब्राइड स्किन की सही केयर नहीं करती और ब्यूटी ऐक्सपर्ट की गाइडैंस में सही मेकअप व ट्रीटमैंट टिप्स फौलो नहीं करती तो हो सकता है कि वह शादी के दिन उतनी खूबसूरत न दिखे जितना उस ने सोचा था.

पेश हैं, कुछ टिप्स जो दुलहनों को मनचाहा लुक पाने में सहायता करेंगी:

ब्यूटी ऐक्सपर्ट कोकिल कपूर बताती हैं कि स्किन को अट्रैक्टिव और ग्लोइंग बनाने का सब से जरूरी टूल पानी है, जिसे अधिकांश लड़कियां जरूरी नहीं समझ कर मिस कर देती हैं और बाद में बस यही सोचती हैं कि पता नहीं हमारी स्किन इतनी ड्राई क्यों रहती है.

आप की स्किन हमेशा चमकतीदमकती रहे, इस के लिए खूब पानी पीएं. ऐक्स्ट्रा व नैचुरल ग्लोइंग स्किन के लिए हैल्दी फूड लें. फाइबर युक्त खानपान को ज्यादा से ज्यादा अपने खाने में शामिल करें ताकि पाचन संबंधी दिक्कत न हो और आप पिंपल्स की समस्या से बची रहें.

कई बार चेहरे पर डार्क स्पौट्स ज्यादा दिखने लगते हैं, जिस से मेकअप करना काफी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में डाइट में जितना अधिक मोटा अनाज शामिल करेंगी सही रहेगा.

लुक में और गेटअप लाने के लिए शादी से 3 हफ्ते पहले अपनी स्किन व बालों को किसी अच्छे डर्मेटोलौजिस्ट को जरूर दिखाएं ताकि कोई भी प्रौब्लम होने पर आप को समय पर सही ट्रीटमैंट मिल सके.

समर ब्राइडल मेकअप

क्लींजिंग द फेस: इंडियन ब्राइड्स बोल्ड और ब्राइट कलर्स यूज करना पसंद करती हैं. ऐसे में अगर आप लंबे समय तक अपने लुक को बनाए रखना चाहती हैं तो सब से पहले अपने फेस को अच्छे से क्लीन कर टिशू से ड्राई करें ताकि फेस पर थोड़ी सी भी गंदगी या औयल न रहने पाए.

बेस तैयार करें: सब से पहले स्किन टोन इंप्रूव करने के लिए मौइश्चराइजर अप्लाई करें और उंगलियों की मदद से धीरेधीरे मसाज करें ताकि मौइश्चराइजर स्किन में अंदर तक जा सके.

बनाएं आंखों को खूबसूरत: वैडिंग डे पर ब्राउन और ब्लू लाइनर लगा कर ऐक्सपैरिमैंट करने की भूल न करें, बल्कि जैट ब्लैक वाटरप्रूफ लाइनर लगाएं. साथ ही आइलैशिज को और वौल्यूम देने के लिए मसकारा लगाना न भूलें, क्योंकि ये आंखों को बहुत ही अमेजिंग टच देगा.

फेस फिक्सअप: अब प्राइमर अप्लाई कर के उसे अच्छे से स्किन में मिक्स करें. इस से कंसीलर और फाउंडेशन को अपनी जगह टिकाए रखने में मदद मिलती है और मेकअप लंबे समय तक टिका भी रहता है. कंसीलर चेहरे के दागधब्बों को कवर करता है और अगर आप अपनी स्किनटोन को और अधिक इंप्रूव करना चाहती हैं तो यलो या ग्रीन कंसीलर का यूज करें.

बिना एसपीएफ वाला फाउंडेशन स्किन पर अप्लाई कर उसे मेकअप ब्रश या स्पौंज से अच्छे से मर्ज करें. अगर आप मैट फिनिश वाला फाउंडेशन यूज करेंगी तो ज्यादा अच्छा रहेगा, क्योंकि एसपीएफ वाले फाउंडेशन से फेस पर फ्लैश इफैक्ट आने से फोटोग्राफ पर प्रभाव पड़ता है.

ग्लोइंग लुक के लिए चिक बोन्स, नोज ब्रिज, फोरहैड के बीचोबीच और कपिड बो पर हाइलाइटर अप्लाई करें. इस का रिजल्ट आप को खुद देखने को मिलेगा. साथ ही ब्रौंजर का यूज कर के आप फेस की शेप दे सकती हैं.

लिपस्टिक से बढ़ाएं खूबसूरती: जब तक लिप्स खूबसूरत नहीं दिखेंगे तब तक आउटफिट्स की गेटअप नहीं आ पाएगी. ऐसे में पतले लिप्स पर पिंक शैड और मोटे लिप्स पर मरून या डार्क शैड अप्लाई करें.

ध्यान रखें रैग्युलर पैडिक्योर और मैनिक्योर कराना न भूलें. वैडिंग डे से 6 हफ्ते पहले से फेशियल व स्किन ट्रीटमैंट्स लेने शुरू कर दें तभी आप अपने खास दिन पर ब्यूटीफुल व अट्रैक्टिव दिख पाएंगी.

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जब फोन पड़ जाए एकदम से बंद, करें ये काम

हम सभी स्‍मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैॆं. ज्यादातर काम के लिए हम सभी फोन पर ही आश्रित होते हैं. लेकिन कई बार हम उसकी स्क्रिन के काम ना करने के कारण और फोन के एकदम से बंद पड़ जाने के कारण परेशान हो जाते हैं और उस वक्त समझ नहीं आता कि क्या करें.  आप उसकी स्‍क्रीन पर कुछ भी करिए, कुछ भी काम नहीं होता है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आपका फोन खराब हो गया है.

अगर आपके फोन में स्‍क्रीन फ्रीज होने की दिक्‍कत है तो परेशान न हों. आज हम आपको इस आर्टिकल में कुछ टिप्‍स को बताने जा रहे हैं जिसे अपनाकर आप इस समस्या से निजात पा सकते हैं.

फोन चार्ज करें

कई बार फोन चार्ज न होने पर ऐसे हो जाता है और स्‍क्रीन काम नहीं करती है. अगर बैट्री लेवल 50 प्रतिशत से कम है तो उसे चार्जिंग पर लगा दें. उसके 10 मिनट बाद देखें, आपका फोन काम करने लगेगा.

फोन को स्‍वीच औफ कर दें

अगर फोन हैंग हो जाएं या उसकी स्‍क्रीन ही काम करना बंद कर दें. तो सबसे पहले अपने फोन को स्‍वीच औफ कर दें. 2 मिनट बाद उसे औन करें और आपका फोन बिलकुल सही से काम करने लगेगा.

 

बैट्री निकाल दें

आप अपने फोन की बैट्री निकाल दें और 2 मिनट बाद फिर से लगाकर औन करें. आप देखेंगे कि फोन सही से काम करने लगा है.

 

रिस्‍टार्ट करें

फोन के बंद हो जाने पर या काम न करने की स्थिति में उसे रिस्‍टार्ट करने की कोशिश करें. रिस्‍टार्ट होने पर फोन ठीक से काम करने लगेगा.

एप को अनइंस्‍टौल करें

जिन ऐप का आप इस्‍तेमाल नहीं करते हैं या जो एप काफी ज्‍यादा स्‍पेस घेरती हैं उन्‍हें फोन से अनइंस्‍टौल कर लें. आपका फोन अपने आप सही से काम करने लगेगा.

VIDEO : दीपिका पादुकोण तमाशा लुक

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